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CIA की नकल कर साथियों से बातें करता था ISIS का आतंकी शाहनवाज, मालदीव की महिला हैंडलर के भी था संपर्क में

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने आईएसआईएस के जिन खूँखार आतंकियों- शाहनवाज आलम, अरशद वारसी और मोहम्मद रिजवान अरशद को गिरफ्तार किया है, वो आतंकी बेहद हाईप्रोफाइल तकनीकी का इस्तेमाल करके आपस में जुड़े रहते थे। यही नहीं, माइनिंग इंजीनियर की पढ़ाई करने वाले आतंकी शाहनवाज ने सीक्रेट ट्रिक्स का इस्तेमाल कर बाकी आतंकियों से संपर्क भी रखा था।

सभी आतंकी इसके लिए एक शेयर्ड आईडी और पासवर्ड के माध्यम से अपने मैसेज लिखते थे और उसे बिना भेजे (सेंड किए) सुरक्षित रख देते थे। ऐसे में दूसरा आतंकी उस आईडी-पासवर्ड का इस्तेमाल करके अपना मैसेज पा जाता था और उस मैसेज को हटाकर उसका जवाब लिख देता था। इसके कारण ये आतंकी बिना मैसेज भेजे संवाद स्थापित कर सुरक्षा एजेंसियों को चकमा दे रहे थे।

हालाँकि, अब दिल्ली पुलिस ने उनके मैसेजिंग प्लेटफॉर्म को एक्सेस कर लिया है और एक पत्र को भी फिर से (रिट्राइव) प्राप्त कर लिया है। टाइम्स ग्रुप की रिपोर्ट के मुताबिक, ये आतंकी बेहद चालाकी से उन तकनीकों का इस्तेमाल करते थे, जिनका इस्तेमाल अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए और कनाडाई जासूस अपने रुसी साथियों से जानकारी प्राप्त करने के लिए करते थे।

रिपोर्ट में बताया गया है कि आईएसआईएस के ये ऑपरेटिव न्यूजीलैंड बेस्ड क्लाउड सर्विस मेगा.एनजे का इस्तेमाल इस काम के लिए करते थे। यह डेस्कटॉप और मोबाइल दोनों ही माध्यम से एक्सेस हो जाता था। इसके कारण बिना इंटरनेट प्रोटोकॉल का इस्तेमाल किए अपनी बात आगे बढ़ा देते थे। दरअसल, इंटरनेट पर कोई मैसेज भेजे बिना उसे इंटरसेप्ट नहीं किया जा सकता है।

शाहनवाज आलम ने यह भी बताया कि वह मालदीव की एक महिला हैंडलर के भी संपर्क में था। इसके अलावा उसने सीरिया और इराक के बॉर्डर पर ISIS के डिटेंशन सेंटर अल-हाउल कैंप के लिए चंदा भी भेजा था। बताते चलें कि हिंद महासागर में भारत का पड़ोसी देश मालदीव ISIS के लिए प्रमुख पनाहगाह साबित हो रहा है।

ऑपइंडिया ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि किस तरह से शाहनवाज आलम पाकिस्तान के आतंकियों के संपर्क में रहता था और भारत में आईएसआईएस के मॉड्यूल खड़े करने की कोशिश कर रहा था। इनमें आईएसआईएस का पुणे मॉड्यूल, अलीगढ़ मॉड्यूल, हैदराबाद मॉड्यूल, दिल्ली मॉड्यूल और महाराष्ट्र मॉड्यूल शामिल थे। पाकिस्तान का फरहतुल्ला इनका हैंडलर था और वो हर मॉड्यूल में अलग-अलग नाम से पहचाना जाता था।

महाराष्ट्र के पुणे भागने के बाद शानवाज को फरहतुल्ला ने ही दिल्ली और अलीगढ़ मॉड्यूल से जोड़ा था। शाहनवाज और उसके साथियों ने गुजरात के कई शहरों में रेकी की थी। दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच और एनआईए की पूछताछ में आईएसआईएस के पुणे, दिल्ली और अलीगढ़ मॉड्यूल से जुड़े आतंकी शाहनवाज ने माना था कि साल 2023 में उसने गुजरात में कई जगहों का दौरा किया था। शाहनवाज बोहरा मस्जिद, दरगाह, अहमदाबाद की मजार, दरगाह और साबरमती आश्रम की तस्वीरें भी खींची थी और हमले का ब्लू प्रिंट बनाया था।

शाहनवाज ने ट्रेनिंग के लिए जगह भी देखी थी और कुछ ट्रेनिंग भी पूरी कर ली थी। यही नहीं, उसे पाकिस्तानी हैंडलर से हथियारों को जमा करने में मदद भी मिल रही थी और वो भारत में कई धमाकों को अंजाम देने के लिए आखिरी दौर में पहुँच चुके थे। संभव है कि अगर कुछ समय ये आतंकवादी भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के हाथ नहीं लगते तो वो अब तक कई धमाके भी कर चुके होते।

गौरतलब है कि पुणे पुलिस ने जुलाई 2023 में चोरी की बाइक के साथ 2 लोगों को पकड़ा था। इसमें शाहनवाज भी था। शुरुआत में पुलिस ने दोनों को वाहन चोर समझा, पर जाँच में उनके ISIS नेटवर्क से जुड़े होने की बात सामने आई। इस बीच शाहनवाज पुलिस को चकमा देकर फरार हो गया था। इसके बाद इस साल अगस्त माह में पुणे के कोंढवा स्थित एक घर में दबिश डाली। 

दबिश के दौरान बम बनाने और ब्लास्ट करने की ट्रेनिंग लेते हुए 7 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इस दौरान 3 अन्य संदिग्ध फरार हो गए थे। फरार होने वालों के नाम रिज़वान अब्दुल हाजी, अब्दुल्लाह फ़ैयाज़ शेख और तलहा लियाकत खान है। इन तीनों के साथ शाहनवाज पर भी 3-3 लाख रुपए का इनाम रखा गया था। इसके बाद शाहनवाज को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने एनआईए के साथ मिलकर गिरफ्तार किया था।

महुआ मोइत्रा के ‘कैश फॉर क्वेरी’ केस में CBI ने लोकसभा सचिवालय से साधा संपर्क, TMC सांसद पर FIR के लिए माँगी रिपोर्ट

‘कैश-फॉर-क्वेरी’ मामले में तृणमूल कॉन्ग्रेस की नेता महुआ मोइत्रा की परेशानी बढ़ सकती है। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की तैयारी कर रही है। इस कड़ी में सीबीआई ने मोइत्रा के खिलाफ आचार समिति (Ethics Committee) की रिपोर्ट हासिल करने के लिए लोकसभा सचिवालय से संपर्क साधा है।

बताते चलें कि आचार समिति ने ही ‘कैश-फॉर-क्वेरी’ मामले में टीएमसी सांसद रहीं मोहुआ को निष्कासित करने की सिफारिश की थी। वहीं, सीबीआई लोकपाल की भेजी गई एक शिकायत के आधार पर महुआ के खिलाफ केस की जाँच कर रही है। आचार समिति की सिफारिश में शिकायतकर्ता वकील जयअनंत देहाद्राई और मोइत्रा सहित अन्य के बयान शामिल हैं।

आचार समिति की सिफारिशों के बाद ही महुआ को अपनी सांसदी गँवानी पड़ी थी। कहा जा रहा है कि इस मामले में संभावित मनी ट्रेल पर अलग से नजर रखने के लिए सीबीआई इस रिपोर्ट की स्टडी कर सकती है। रिपोर्ट में कारोबारी दर्शन हीरानंदानी से टीएमसी नेता महुआ मोइत्रा को मिले महँगे उपहारों और अन्य वस्तुओं का जिक्र है। इस ही कई लोगों के बयान भी हैं।

वहीं, लोकसभा सचिवालय के अधिकारियों ने कहा कि उन्होंने अभी तक सीबीआई को रिपोर्ट मुहैया नहीं कराई है। एक अधिकारी ने कहा, “सीबीआई ने सचिवालय को पत्र लिखकर एथिक्स कमेटी की रिपोर्ट की एक प्रति माँगी है। हम इस पर गौर करेंगे। हमने अनुरोध के संबंध में अभी तक कोई फैसला नहीं लिया है।”

बताते चलें कि आचार समिति पहले ही महुआ के खिलाफ आरोपों की जाँच की सिफारिश कर चुकी है। इस हालात में जब लोकसभा सचिवालय भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17 ए के तहत जरूरी मंजूरी हासिल कर एथिक्स कमिटी की रिपोर्ट सीबीआई को देती है तो CBI लोकपाल की मंजूरी के बगैर सीधे मोइत्रा पर FIR दर्ज कर सकती है।

सीबीआई भी अपनी जाँच रिपोर्ट लोकपाल को सौंपेगी और अगर लोकपाल एजेंसी को आपराधिक केस दर्ज करने का निर्देश देती है तो वह एफआईआर दर्ज कर सकती है। बताते चलें कि मोइत्रा के खिलाफ आचार समिति की रिपोर्ट 8 दिसंबर 2023 को लोकसभा में पेश की गई थी। स्पीकर ओम बिड़ला ने इस पर बहस के बाद जानकारी दी कि समिति ने मोइत्रा को कैश फॉर क्वेरी मामले में दोषी पाया है।

हालाँकि, टीएमसी नेता महुआ मोइत्रा अपने खिलाफ लगे आरोपों को सिरे से नकारती आ रही हैं। दरअसल, आचार समिति ने बीजेपी के सांसद निशिकांत दुबे और सुप्रीम कोर्ट के वकील एवं मोइत्रा के पूर्व पार्टनर जय अनंत देहाद्राई की शिकायत के बाद महुआ को निष्कासित करने की सिफारिश की थी।

टीएमसी नेता महुआ मोइत्रा पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने संसद में सवाल पूछने के बदले में कारोबारी दर्शन हीरानंदानी से पैसे और महँगे गिफ्ट सहित कई तरह के फायदे लिए थे। हीरानंदानी अडानी समूह के प्रतिद्वंद्वी कारोबारी हैं और उनके इशारे पर महुआ ने संसद में कई सवाल पूछे थे। महुआ ने लोकसभा के अपने लॉग-इन क्रेडेंशियल भी हीरानंदानी से शेयर किए थे।

जय अनंत देहाद्राई ने महुआ पर यह भी आरोप लगाया था कि वो उन पर और पूर्व प्रेमी सुहान मुखर्जी के खिलाफ निगरानी कर रही थीं। इसकी शिकायत उन्होंने CBI में दर्ज कराई। देहाद्राई ने 2 जनवरी 2023 को आरोप लगाया था कि TMC नेता महुआ मोइत्रा पश्चिम बंगाल पुलिस में अपने संपर्कों की वजह से वो उनकी अवैध निगरानी कर रही थीं।

‘मुस्लिम बन गए इसका मतलब ये नहीं हमारे मामले में बोलो’ : स्मृति ईरानी के मदीना जाने पर कट्टरपंथी बक रहे थे गाली, सऊदी वालों ने करारा जवाब दिया

केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी मदीना गईं थीं। उनके साथ गैर-मुस्लिमों का प्रतिनिधिमंडल था जिसमें कश्मीरी हिंदू IRS अधिकारी निरुपमा कोतरू भी शामिल थे। इस प्रतिनिधिमंडल ने वहाँ हज तैयारियों का जायजा लिया। सऊदी के नेताओं से बात की। जेद्दाह में उमराह कॉन्फ्रेंस को अटेंड किया।

इस दौरान उनकी एक फोटो वायरल हुई जिसमें वह अल-मस्जिद अल-नबावी के सामने सामान्य परिधान साड़ी में खड़ीं थीं। उनकी फोटोज देख पाकिस्तान, बांग्लादेश, और भारत के इस्लामी कट्टरपंथी बिगड़ गए और अपशब्द कहने लगे। लेकिन, उन्हें सऊदी वालों से ही करारा जवाब मिल गया।

पाकिस्तानी मीडिया चिढ़ा

भारतीय प्रतिनिधिमंडल की फोटो देख पाकिस्तानी न्यूज पोर्टल ‘द न्यूज’ ने तो इसे हिंदू प्रतिनिधिमंडल बताया। वह लोग इस बात से भी नाराज दिखे कि आखिर भारतीय मंत्री मुरलीधरण ने मस्जिद के सामने धोती और भगवा कुर्ता क्यों पहना था और ईरानी ने अपना सिर क्यों नहीं ढका था।

कुछ लोगों ने स्मृति ईरानी को ‘काफिर खातून और काफिर औरत’ कहा। इसी क्रम में उजैर नाम के इस्लामी कट्टरपंथी ने सऊदी वालों को बेवकूफ बताया और कहा कि आखिर किस बिनाह पर मदीना में गैर मुस्लिमों को एंट्री दी गई।

यूजर ने कहा स्मृति ईरानी मदीना में इसलिए आईं ताकि वो और महिलाओं के सिर से स्कॉर्फ को हटवा सकें। यूजर ने एक पोस्ट में ये भी बद्दुआ की थी कि जो बुद्धिजीवी सऊदी के इस निर्णय का समर्थन कर रहे हैं उनपर भी अल्लाह का कहर बरसे।

इस पर इससे पहले कोई भारतीय जवाब देता, सऊदी यूजर ने उन्हें लताड़ दिया। देख सकते हैं पोस्ट में लिखा है- “हमारी जमीन हमारी मर्जी। सिर्फ इसलिए कि तुम्हारे पूर्वज इस्लाम में परिवर्तित हो गए थे और तुम्हें अरबी नाम मिल गया इसका मतलब ये नहीं कि तुम इसमें अपनी ज्ञान दो। तुम अप्रांसगिक हो और हम लोग एक जैसे नहीं हैं।”

दिलचस्प बात ये है कि सिर्फ सऊदी के मुसलमान ही इन कट्टरपंथियों को नहीं गाली देते, हाल में ईरानी मुस्लिम भी इनपर पारसी धर्म का मखौल उड़ाने के लिए बरसे थे। एक यूजर ने पाकिस्तान में डॉल्फिन की रेप वाली खबर दिखाकर उन्हें कहा गया था- “तुम चुप रहो, तुम पाकिस्तानी हो। तुम्हारी राय अप्रासंगिक है।”

कॉन्ग्रेस की चंदाखोरी में फिर निकला झोल: पार्टी के पोस्टर में शेयर किया ‘डोनेट फॉर देश’ का फर्जी लिंक, पैसा गया दूसरों के खातों में

कॉन्ग्रेस ने एक बार फिर अपने चंदा माँगने के अभियान ‘डोनेट फॉर देश’ के जरिए खुद की फजीहत करवा ली है। इस बार मूर्खता का स्तर कुछ ज्यादा बड़ा है। कॉन्ग्रेस ने चंदा माँगने के अभियान के लिए एक फर्जी वेबसाइट का जोर-शोर से प्रचार किया, जो कि चंदा माँगने के लिए बनाई गई इसकी आधिकारिक वेबसाइट की तरह ही दिखती है। हालाँकि, इस पर भेजा गया पैसा पार्टी को ना मिलकर किसी और के पास गया।

कॉन्ग्रेस ने बुधवार (10 जनवरी 2024) को राहुल गाँधी की आगामी ‘भारत न्याय यात्रा’ के लिए एक स्पेशल पैम्फलेट जारी किया। इस पैम्फलेट में कॉन्ग्रेस के चंदा एकत्रीकरण अभियान ‘डोनेट फॉर देश’ की वेबसाइट और चंदा देने के लिए QR कोड भी दिया गया था। वह बात अलग है कि वेबसाइट और QR कोड, दोनों ही गलत थे।

कॉन्ग्रेस के आधिकारिक पोस्टर में दिया गया फर्जी लिंक
कॉन्ग्रेस के आधिकारिक पोस्टर में दिया गया फर्जी लिंक

डोनेट फॉर देश अभियान की आधिकारिक वेबसाइट Donateinc.in है, लेकिन यात्रा को लेकर जारी पैम्फलेट में Donateinc.co.in प्रिंट किया गया था। यही हाल QR कोड का भी था। इसे संयोग ही कहा जाएगा कि गलत वेबसाइट Donateinc.co.in खोलने पर एक वेबसाइट खुलती है जहाँ कॉन्ग्रेस के इस चंदा लेने के अभियान की आधिकारिक वेबसाइट की तरह ही सभी जानकारी और तस्वीरें उसी स्टाइल में लिखी हुई हैं।

कॉन्ग्रेस चंदा फर्जी वेबसाइट
ऐसी दिखती है फर्जी वेबसाइट

यह साफ है कि यह फर्जी वेबसाइट कॉन्ग्रेस को चन्दा देने वाले लोगों को चूना लगाने के उद्देश्य से बनाई गई है। अगर कोई व्यक्ति सतर्क नहीं है और इस पर पैसा डालता है तो उसे लगेगा कि यह पैसा कॉन्ग्रेस को जा रहा है, लेकिन असल में यह पैसा अनजान लोगों को जाएगा। यह फर्जी वेबसाइट अभी भी (रिपोर्ट के प्रकाशित होने तक) UPI (फ़ोनपे, गूगल पे, भीम, पेटीएम) के जरिए चंदा ले रही है।

चूँकि यह QR कोड और url कॉन्ग्रेस की आधिकारिक पैम्फलेट में है, इसलिए लोगों को इसके फर्जी होने का शक नहीं होगा। ऊपर से इस वेबसाइट ने चंदा इकट्ठा करने के लिए बनाई गई वेबसाइट से सब कुछ कॉपी कर लिया है। जो भी व्यक्ति इसके जरिए कॉन्ग्रेस को पैसा देना चाह रहा है उसे अधिक सतर्क रहना होगा, ताकि वह जान सके कि पैसा कॉन्ग्रेस को नहीं बल्कि कहीं और ही जा रहा है।

कॉन्ग्रेस को पैसा देने के लिए इस लिंक को खोलने के बाद गूगल पे पर भुगतान वाले पेज पर ऊपर की तरफ इंडियन नेशनल कॉन्ग्रेस नाम लिखा दिखेगा। हालाँकि, नीचे की तरफ इस पेज में बैंकिंग नाम की जगह पर ‘रोज कैश’ नाम लिखा दिखता है। इससे स्पष्ट होता है कि यह एक घोटाला है।

फर्जी लिंक खोलने पर यह जानकारी आती है
फर्जी लिंक खोलने पर यह जानकारी आती है

भले ही गहन जाँच के बाद यह पकड़ में आ जाता हो, लेकिन हर व्यक्ति इस मामले में सतर्कता नहीं बरत सकता और ना ही इस गड़बड़ी को पकड़ सकता है। इसके पीछे वजह यह है कि वह कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा दिए गए एक आधिकारिक दस्तावेज़ के क्यूआर कोड को स्कैन करने के बाद ही वह वेबसाइट पर पहुँचा है। रिपोर्ट के अनुसार, इसके कारण कॉन्ग्रेस को अब तक लाखों रुपए का चूना लग चुका है।

गूगल में खोजने पर पता चलता है कि रोज कैश नाम के कुछ एप हैं, जो वादा करते हैं कि जो भी इन एप को डाउनलोड करके साइनअप करेगा और कुछ एक्टिविटी करेगा तो उन्हें पैसा मिलेगा। हालाँकि, स्पष्ट तौर पर यह नहीं कहा जा सकता कि कॉन्ग्रेस को चूना लगाने के लिए बनाई गई है। हालाँकि, यह जरूर कहा जा सकता है कि यह एक घोटाला है और कॉन्ग्रेस को चूना लग चुका है।

इस पूरे मामले में यह बात गौर करने वाली है कि कॉन्ग्रेस ने इस पूरे गड़बड़झाले पर कोई विशेष आपत्ति नहीं दर्ज करवाई है, जबकि इसमें बड़ी संख्या में लोग कॉन्ग्रेस को पैसा देने के नाम पर मूर्ख बन रहे हैं। कॉन्ग्रेस ने जब यह अभियान चालू किया था तो इसके लिए Donatefordesh.com और Doantefordesh.org वेबसाइट डोमेन को नहीं खरीदा था। इसको लेकर कॉन्ग्रेस ने खूब हो-हल्ला किया था।

यह बात अलग है कि पिछली बार कॉन्ग्रेस के किसी कार्यकर्ता के साथ धोखाधड़ी नहीं हो रही थी। ऐसा इसलिए था, क्योंकि यह लिंक खोलने पर यूजर दूसरी वेबसाइट पर पहुँचा जाता था, जहाँ कॉन्ग्रेस से सम्बंधित कुछ भी नहीं लिखा होता था। हालाँकि, इस बार के घोटाले में जो वेबसाइट खुलती है, वह कॉन्ग्रेस की हू-ब-हू वेबसाइट जैसी ही है।

इस फर्जी वेबसाइट के बारे में सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध जानकारी बताती है कि यह वेबसाइट राजस्थान के किसी व्यक्ति द्वारा 19 दिसम्बर 2023 को बुक की गई थी। इसके सिर्फ एक दिन पहले यानी 18 दिसम्बर 2023 को डोनेट फॉर देश को कॉन्ग्रेस ने आधिकारिक रूप से शुरू किया था।

कॉन्ग्रेस के नाम पर लोगों के साथ धोखाधड़ी हो रही है, इसके बावजूद कॉन्ग्रेस ने कभी भी यह नहीं कहा कि वह इसके खिलाफ पुलिस में मुकदमा दर्ज करवाएगी। यह भी पता नहीं चल सका है कि कॉन्ग्रेस के आधिकारिक पोस्टर में यह फर्जी वेबसाइट कैसे आई।

यह रिपोर्ट अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

शादी का झाँसा दे किया रेप, फिर इस्लाम कबूलने का बनाने लगा दबाव: बोली पीड़िता- मौलवी के पास ले गया, पूजा करने से रोका

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शादी का झाँसा देकर एक युवती से रेप और फिर उस पर धर्मांतरण का दबाव बनाने का मामला सामने आया है। आरोपित की पहचान अफीफउल्ला के तौर पर हुई है। पीड़िता के अनुसार उसे पूजा करने से रोका गया। उसे मौलवी के पास ले जाया गया। इस्लाम कबूलने से इनकार करने पर उसके साथ मारपीट की गई।

पीड़िता ने 9 जनवरी 2024 को लखनऊ में इस संबंध में रिपोर्ट दर्ज करवाई। लेकिन नोएडा से मामला जुड़ा होने की वजह से इसे नोएडा पुलिस को ट्रांसफर किया जाएगा। रिपोर्ट के मुताबिक, लखनऊ की रहने वाली 27 साल की हिंदू पीड़िता नोएडा की एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करती थी। इसी दौरान उसकी मुलाकात रामपुर के रहने वाले अफीफउल्ला से हुई। अफीफउल्ला ने युवती से दोस्ती गाँठी। उससे शादी का वादा किया।

युवती का आरोप है कि उसे भरोसे में लेने के बाद अफीफउल्ला अपने साथ एक होटल में ले गया और वहाँ रेप किया। विरोध करने पर उसने शादी करने की बात करके उसे चुप करा दिया। शादी के नाम पर अफीफउल्ला युवती को अलग-अलग होटल में ले जाकर उसके साथ जिस्मानी रिश्ते बनाता रहा। बाद में जब युवती ने उससे शादी करने के लिए कहा तो वो इसके लिए राजी नहीं हुआ।

अमर उजाला में 11 जनवरी 2024 को प्रकाशित संबंधित खबर

पीड़िता के अनुसार अफीफउल्ला ने उसकी मुलाकात अपनी बहनों ऊरसा और हमना से भी कराई थी। इनके सामने भी शादी करने का भरोसा दिलाया था। लेकिन बाद में वह शादी करने के लिए इस्लाम कबूलने का दबाव डालने लगा। कथित तौर पर इसके लिए अफीफउल्ला उसे एक मौलवी के पास भी लेकर गया था। इस मौलवी ने भी मजहब बदलने को कहा। युवती का आरोप है कि अफीफउल्ला उसे इस्लामिक किताबें भी लाकर देता था और इस्लामिक कार्यक्रमों में भी लेकर जाता था।

पीड़िता के अनुसार आरोपित ने उससे कहा कि उसके मजहब में गैर इस्लामिक लड़की से शादी करने की मनाही है। इसलिए उसे इस्लाम कबूलना होगा। वह पीड़िता के पूजा-पाठ करने का भी विरोध करता था। कथित तौर पर युवती जब इस्लाम कबूलने को राजी नहीं हुई तो उसने अपनी बहनों के साथ मिलकर उससे मारपीट की।

लखनऊ थाने के इंस्पेक्टर अखिलेश कुमार के मुताबिक पीड़त युवती की शिकायत पर अफीफउल्ला के खिलाफ केस दर्ज किया गया है। घटना नोएडा की है, इसलिए केस की विवेचना नोएडा पुलिस करेगी। शीघ्र ही यह केस नोएडा ट्रांसफर किया जाएगा।

आसमान में जलती थी लाल बत्ती, नीचे कारसेवकों पर होने लगती थी फायरिंग: बलिदानियों के परिजनों का दावा, नरसंहार में MP रहे मुन्नन खाँ को भी बताया शामिल

समाजवादी पार्टी के नेता और अखिलेश यादव के करीबी स्वामी प्रसाद मौर्य ने बुधवार (10 जनवरी 2024) को एक विवादित बयान दिया। इस बयान में उन्होंने सन 1990 में कारसेवा करने गए रामभक्तों को उपद्रवी बताया है और मुलायम सिंह यादव के आदेश के गोली चलाने को सही ठहराया। इस बयान का पूरे देश के अलावा समाजवादी पार्टी में भी विरोध हो रहा है।

ऑपइंडिया की टीम ने अयोध्या के स्थानीय निवासियों के साथ बलिदानी व जीवित कारसेवकों के परिजनों से मिलकर सन 1990 में हुए उस सामूहिक नरसंहार की जानकारी जुटाई। इस दौरान हमें नरसंहार में मुन्नन खाँ नाम के नेता के शामिल होने की जानकारी मिली। इस दौरान उन कारसेवकों की भी हत्या किए जाने की जानकारी मिली जो कि विवादित ढाँचे से काफी दूर थे।

सांसद मुन्नन खाँ को किसने दिया था नरसंहार का अधिकार ?

सन 1990 में अयोध्या में तैनात रहे एक पुलिस अधिकारी ने ऑपइंडिया से बात की। अपना नाम नहीं छापने की शर्त पर उस पूर्व पुलिस अधिकारी ने बताया कि साल 1990 में उन्हें जानकारी मिली थी कि बलरामपुर जिले का सांसद मुन्नन खाँ अपने साथियों के साथ कारसेवकों पर हमला करने वालों में शामिल था। मुन्नन खाँ का पूरा नाम ‘फसी उर रहमान’ था।

इस पूर्व अधिकारी ने हमें बताया कि कारसेवकों पर मुन्नन खाँ द्वारा किए गए हमले की जानकारी स्थानीय प्रशासन से लेकर शासन तक थी। हालाँकि, तब की राजनीति में उसका कद इतना बड़ा था कि उस पर कार्रवाई होना तो दूर की बात थी, उसका नाम भी सामने नहीं आया। घटना के चश्मदीद रुदौली के कुछ जीवित बचे कारसेवकों ने भी ऑपइंडिया से बातचीत में मुन्नन खाँ का नाम लिया।

इन कारसेवकों ने बताया कि मुन्नन खाँ अपने साथियों के साथ एक बस में पुलिस की वर्दी पहनकर घूम रहा था। वह सड़क से पैदल जा रहे कारसेवकों से कहता था, “आओ बस में बैठ जाओ। चलो तुम्हें अयोध्या का प्रसाद दिला दें।” जहाँ कारसेवकों को पैदल चलने पर भी पकड़ लिया जा रहा था, वहाँ मुन्नन खाँ को नकली पुलिस बन बस लेकर घूमने की छूट कैसे मिली, ये किसी भी कारसेवक को नहीं पता।

बलिदानी कारसेवक राम अचल गुप्ता के बेटे संजय और राम बहादुर वर्मा के पुत्र काली सहाय ने भी कारसेवकों के नरसंहार में सांसद मुन्नन खांँ को सीधे तौर पर शामिल बताया। कुछ स्थानीय निवासियों का कहना है कि मुन्नन खाँ ने अपने साथियों सहित कारसेवकों पर न सिर्फ बमबारी की थी, बल्कि पुलिस बनकर कई रामभक्तों को बस में बैठाकर कहाँ ले गया ये आज तक किसी को पता नहीं है।

मुन्नन खाँ साल 1985 से 1989 तक गोंडा जिले के अंतर्गत आने वाले कटरा विधानसभा क्षेत्र से विधायक था। इसके बाद वह साल 1989 से साल 1991 तक बलरामपुर जिले से सांसद रहा। मुन्नन खाँ को कॉन्ग्रेस और समाजवादी पार्टी के बड़े नेताओं का करीबी माना जाता था। गोंडा जिले के एक चौराहे का नाम भी मुन्नन खाँ के नाम पर रखा गया है। साल 2009 में मुन्नन खाँ की मौत हो गई।

स्वामी प्रसाद मौर्य के बयान से आहत बलिदानी कारसेवकों के परिजन यह जानना चाहते हैं कि मुन्नन खाँ द्वारा कारसेवकों की हत्या समाजवादी पार्टी के समर्थकों द्वारा किस रूप में कानून सम्मत है? मुन्नन खाँ के काले कारनामों और आपराधिक इतिहास के साथ उसके बेहद शातिर दिमाग के बारे में हम जल्द ही अपनी दूसरी रिपोर्ट में बताएँगे।

जो ढाँचे से काफी दूर थे, उनकी भी हत्या

गोंडा जिले के निवासी शिवदयाल मिश्रा नाम के एक कारसेवक ने ऑपइंडिया से बात की। सन 1990 की कारसेवा में उनके पैर में 2 गोली लगी थी। उन्होंने हमें बताया कि जिस जगह उन्हें गोली मारी गई थी, वह गोंडा जिले की सीमा थी। यह जगह ढाँचे से काफी दूर है। उन्होंने उस दौरान पुलिस की गोलीबारी से डरकर अस्थाई कैम्पों में सरकारी आदेश पर जो डॉक्टर बैठे थे, वे भी कैम्प छोड़ कर भाग गए थे।

बलिदानी कारसेवक महावीर प्रसाद अग्रवाल के बेटे अभिषेक ने पहले अपने पिता की हत्या और बाद में उस पर आए मुलायम सिंह यादव के बयान से खुद को बेहद आहत बताया। अभिषेक का कहना है कि 2 नवंबर 1990 को उनके पिता को गोली कारसेवकपुरम के पास मारी गई थी, जो कि विवादित ढाँचे से काफी दूर है।

वहीं बलिदानी रमेश पांडेय के बेटे सुरेश ने ऑपइंडिया को बताया कि उनके पिता को गोली शहीद गली के पास मारी गई थी। शहीद गली वो जगह है, जहाँ कई रामभक्तों का नरसंहार हुआ था। यह जगह भी विवादित ढाँचे से काफी दूर है और बीच में हनुमानगढ़ी पड़ता है।

बलिदानी राम अचल गुप्ता के बेटे संजय ने ऑपइंडिया को बताया कि 2 नवंबर 1990 को उनके पिता को विवादित ढाँचे से काफी दूर अयोध्या कोतवाली के आगे गोली मारी गई थी। उनके भाई रामतेज उस समय कारसेवा में मौजूद थे। वो सन 1990 में हुए नरसंहार के चश्मदीद जीवित गवाह हैं। रामतेज ने बताया कि गोलीबारी के दौरान सभी कारसेवक एक जगह बैठकर भगवान राम का भजन गा रहे थे।

निहत्थे कारसेवकों पर हेलीकॉप्टर से भी चली थीं गोलियाँ

ऑपइंडिया को अयोध्या के स्थानीय बुजुर्गों ने भी बताया कि सन 1990 में कारसेवक निहत्थे ही आए थे। अयोध्या जिले में रुदौली क्षेत्र के कारसेवक रघुवर सिंह का दावा है कि 2 नवंबर 1990 को तो उन सभी को जन्मभूमि का दर्शन करवाने के लिए जमा किया गया था और फिर गोलियाँ बरसा दी गई थीं। 30 अक्टूबर 1990 को एक हेलीकॉप्टर विवादित ढाँचे के 10 किलोमीटर की परिधि में घूम रहा था।

ऑपइंडिया से बात करते हुए बलिदानी कारसेवक वासुदेव गुप्ता की बेटी सीमा गुप्ता ने कहा कि उनके पिता और अन्य रामभक्तों को मारने का इशारा हेलीकॉप्टर से किया गया था। तब आसमान में उड़ता एक हेलीकॉप्टर हरे रंग की बत्ती जलाकर पूरे अयोध्या में घूम रहा था। जिस जगह पर हेलीकॉप्टर नीचे की तरफ उड़ान भरता और उसकी बत्ती लाल हो जाती, वहीं पुलिस गोलियाँ चलानी शुरू कर देती। 30

एक अन्य बलिदानी राम सेवक वर्मा के बेटे काली सहाय ने हमें बताया कि हेलीकॉप्टर की लाल बत्ती का संकेत मिलते ही ना सिर्फ जवान गोलियाँ चला रहे थे, बल्कि हेलीकॉप्टर से भी कुछ हथियारबंद लोग गोलियाँ चला रहे थे। बकौल काली सहाय वर्मा, उनके पिता के शरीर में तिरछे एंगल से छर्रे घुसे थे। काली सहाय को आशंका है कि उनके पिता को ये गोलियाँ हेलीकॉप्टर से मारी गई थीं।

गोलियाँ बरसाने वाली टीम के लीडर मोहम्मद उस्मान और जेएस भुल्लर

अयोध्या में रहने वाले तमाम बुजुर्गों और बलिदानी कारसेवकों को आज भी मोहम्मद उस्मान और सरदार जेएस भुल्लर के नाम याद हैं। ये दोनों अधिकारी पैरामिलिट्री के थे। जेएस भुल्लर अपनी टीम सहित अयोध्या के महाराजा इंटर कॉलेज में कैम्प करता था। सन 1990 में दिखाई गई क्रूरता के चलते स्थानीय निवासियों को महाराजा इंटर कॉलेज की वो जगह भी याद है, जहाँ भुल्लर नहाया करता था।

एक स्थानीय निवासी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर भुल्लर से जुड़ी एक घटना बताई। उस व्यक्ति ने कहा, “30 अक्टूबर 1990 में लखनऊ से गोली चलाने का आदेश लेकर हेलीकॉप्टर आया। तब अयोध्या में तैनात UP पुलिस के जवानों के हाथ काँपने लगे। पुलिस के जवान कारसेवकों पर गोली नहीं चलाना चाहते थे। वो हवा में गोलियाँ चला रहे थे।”

उस व्यक्ति ने आगे बताया कि हवा में गोली चलाते देखकर जेएस भुल्लर पुलिस के इन जवानों के पास आया और डाँटने लगा। जेएस भुल्लर ने सामने से गुजर रहे एक रामभक्त के सिर को निशाना बनाकर गोली मारी। गोली लगते ही रामभक्त गिर गया और मौके पर ही उसकी मौत हो गई। तब भुल्लर ने हँसते हुए कहा कि ‘ऐसे चलाई जाती है गोली’।

वहीं, गोलियाँ बरसा रही दूसरी टीम को मोहम्मद उस्मान लीड कर रहा था। उस्मान CRPF में डिप्टी कमांडेंट रैंक पर तैनात बताया जाता है। शहीद गली और दिगंबर अखाड़े के पास हुए कारसेवकों के सामूहिक नरसंहार के दौरान उस्मान और उसकी टीम की ही मौजूदगी बताई जाती है। इस दौरान इन सभी ने रामभक्तों के पैरों के बजाय सीधे सिर और सीने में गोलियाँ मारी थीं।

अयोध्या के बुजुर्ग तिब्बती पुलिस का नाम बहुत लेते हैं। असल में वो तिब्बती पुलिस ITBP की बटालियन बताई जा रही है। इसे तब अयोध्या में तैनात किया गया था। ऑपइंडिया से बात करने वाले सन 1990 में अयोध्या में तैनात पुलिस अधिकारी ने भी बताया कि UP पुलिस ने कारसेवकों पर गोलियाँ नहीं चलाई थीं।

इस पूर्व अधिकारी ने कहा कि गोलियाँ चलाने के लिए बाहर से फ़ोर्स बुलाई गई थी। अयोध्या नरसंहार के बाद स्थानीय जिलों में एक कविता भी चर्चित हुई थी। इस कविता के बोल थे, “काँप धरती उठी आसमाँ रो पड़ा, जब अयोध्या में गोली चलाई गई।” इसी कविता में आगे पढ़ा जाता था, “जब UP की सेना ने इनकार की तो तिब्बत से सेना बुलाई गई।”

अब गाय का मांस बेचेंगे फेसबुक वाले जुकरबर्ग? ड्राई फ्रूट्स और बियर खिला-पिलाकर करेंगे तैयार, मुस्लिम यूजर बोला- हलाल से आएगा स्वाद

मेटा के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने बीफ खाने के लिए गायों को पालना शुरू किया है। हाल में उन्होंने इसकी जानकारी अपने सोशल मीडिया पोस्ट में दी। पोस्ट देख कयास लगने लगे कि शायद ये उनका नया बिजनेस प्लान हो क्योंकि उन्होंने दावा किया है कि उनका मकसद दुनिया का सबसे बेहतर बीफ बनाना है।

उन्होंने बताया कि उन्होंने हवाई द्वीप के ‘काउआई आइलैंड’ हिस्से में अपना फार्म खोला है, जिसका नाम ‘कोलाऊ रैंच’ है। यहाँ वह जापानी और स्कॉटिश नस्लों के गायें पाल रहे हैं। इन्हें खाने में बीयर और मैकाडामिया मेवे वाला भोजन दिया जाता है।

9 जनवरी 2024 को लिखे अपने पोस्ट में उन्होंने कहा, “मेरा मकसद दुनिया में सबसे उच्च गुणवत्ता वाला गोमांस बनाना है। मवेशी वाग्यू और एंगस हैं और ये मैकाडामिया मील खाकर और बीयर पीते हुए बड़े होंगे। इसे हम यहाँ खेत में उगाते और पैदा करते हैं। हम चाहते हैं कि पूरी प्रक्रिया स्थानीय और पूरी तरह से एक हो।”

उन्होंने आगे कहा, “हर गाय हर साल 5000-10000 पाउंड भोजन खाती है इसके लिए कई एकड़ में मैकाडामिया के पेड़ लगाने होंगे। मेरी बेटियाँ मैक के पेड़ लगाने और हमारे कई जानवरों की देखभाल में मदद करती हैं। हम अभी भी सफर के शुरुआती दौर में हैं और हर सीज़न में इसमें सुधार करना मज़ेदार है। मेरे सभी प्रोजेक्ट में ये सबसे स्वादिष्ट है।”

जुकरबर्ग ने बताया है कि उनका ये खेत तैयार होने की प्रकिया पहले चरण में है। ये उनका फैमिली प्रोजेक्ट है। उनकी बेटियों ने 1400 एकड़ में फैले खेत पर कई मैकाडामिया पेड़ लगाए हैं।

बताते चलें कि मैकाडामिया एक तरह का मेवा पैदा करता है जिसे मार्क गायों को खिलाएँगे और फिर उन्हीं गायों का बीफ बनाएँगे।

पेटा ने दी मार्क जुकरबर्ग को नसीहत- टेक्नॉलजी पर ध्यान दो

मार्क के इस पोस्ट के बाद उनके पोस्ट पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ आईं हैं। पेटा ने इस पोस्ट को देख लिखा- “तुम टेक्नॉलजी से ही जुड़े रहो। ये प्रोजेक्ट जानवरों को मार रहा है और आपके बच्चों को भी सदमा देगा। करने के लिए कई अन्य प्रोडक्टिव काम है। जैसे नए शाकाहारी खाद्य पदार्थ बनाना जो जानवरों को बचाते हैं, ग्रह की मदद करते हैं और मानव स्वास्थ्य में सुधार करते हैं।

जुकरबर्ग के इस पोस्ट को देखने के बाद कई भारतीयों ने मेटा को बॉयकॉट करने की बात कही।

वहीं कुछ यूजर थे जिन्हें ये पोस्ट देख बहुत आनंद आया। एक मुस्लिम यूजर ने उन्हें कहा, “इसे हलाल सर्टिफाइड रखना, तो ज्यादा स्वादिष्ट होगा”

वहीं कुछ लोगों ने जुकरबर्ग के इस ऐलान पर कहा कि वह ऐसे लोगों का मखौल उड़ा रहे हैं जो अपनी जरूरतों को पूरा करने में असमर्थ हैं या फिर वेजिटेरियन हैं। यूजर्स ने उन्हें कहा कि वो ये काम छोड़कर कुछ और कर लें क्योंकि गायों को मारना ठीक नहीं है। भारत में इनकी पूजा होती है।

‘लाल कृष्ण आडवाणी का आना जरूरी, सब चाहते हैं वे आएँ’: रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा के साक्षी बनेंगे ‘रामरथी’, 22 जनवरी को अयोध्या में होंगे

22 जनवरी 2024 को अयोध्या के भव्य राम मंदिर में भगवान रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा होगी। बीजेपी के वयोवृद्ध नेता लाल कृष्ण आडवाणी भी इस अवसर के साक्षी बनेंगे। विश्व हिंदू परिषद (VHP) के अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार ने दी है।

आडवाणी 96 वर्ष के हैं। ऐसे में शुरुआत में उम्र के कारण उनके इस समारोह में शामिल होने को लेकर संशय था। उल्लेखनीय है कि आडवाणी ने अपनी रथ यात्रा के जरिए राम मंदिर आंदोलन को घर-घर पहुँचा दिया था।

आलोक कुमार के अनुसार आडवाणी के परिवार को आश्वस्त किया गया है कि इस दौरान उन्हें सभी जरूरी मेडिकल सुविधाएँ मुहैया कराई जाएँगी। विहिप नेता ने कहा है कि लालकृष्ण आडवाणी का इस कार्यक्रम में आना महत्वपूर्ण है। सब उनकी उपस्थिति चाहते थे। इसके लिए जो भी आवश्यकता होगी वो सारी व्यवस्थाएँ की जाएँगी।

19 दिसंबर 2023 को विहिप और संघ के नेताओं ने आडवाणी को उनके घर पहुँचकर न्योता दिया था। आलोक कुमार ने बताया है कि इस दौरान भी इस बात पर चर्चा हुई थी कि यदि आडवाणी अयोध्या आते हैं तो क्या-क्या व्यवस्था करने की आवश्यकता होगी। वीएचपी नेता कहा है, “हमको प्रसन्नता है कि 96 वर्ष की आयु में और अपने स्वास्थ्य के ठीक न होने के बावजूद उन्होंने आना स्वीकार किया है।”

वहीं लाल कृष्ण आडवाणी ने इस अवसर पर उ​पस्थिति को सौभाग्य का योग बताया है। उन्होंने कहा है, ” यह बड़ा सौभाग्य का योग है कि ऐसे भव्य प्रसंग पर प्रत्यक्ष उपस्थिति का अवसर मिला है। श्रीराम का मंदिर यह केवल एक पूजा की दृष्टि से अपने आराध्य का मंदिर, केवल ऐसा प्रसंग नहीं है। इस देश की पवित्रता और इस देश की मर्यादा की स्थापना पक्की होने का यह प्रसंग है।”

उन्होंने कहा, “हम प्रत्यक्ष वहाँ उपस्थित रहेंगे, उस प्रसंग को देखेंगे, उसमें सहयोगी बनेंगे। यह कहीं किसी जन्म में पुण्य हुआ होगा उसी का फल हमको मिल रहा है। ये तो माँग के भी न मिलने वाला अवसर है, वो मिला है। जरूर उसमें रहूँगा।” गौरतलब है कि प्राण-प्रतिष्ठा से एक हफ्ते पहले 16 जनवरी से अयोध्या में अनुष्ठान शुरू हो जाएँगे।

180 में केवल 37 मुस्लिम, फिर अल्पसंख्यक संस्थान कैसे: सुप्रीम कोर्ट का AMU से सवाल, बचाव में बोले कपिल सिब्बल- इनकी हालत SC से भी बदतर

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक दर्जे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सवाल खड़े हुए हैं। केंद्र ने कहा है कि एएमयू कभी अल्पसंख्यक संस्थान नहीं हो सकता क्योंकि ये किसी विशेष मजहब या मजहबी संप्रदाय का विश्वविद्यालय नहीं है। इसे राष्ट्रीय महत्व वाला संस्थान घोषित किया गया है। वहीं एएमयू का कहना है कि सिर्फ इसलिए कि संस्थान में सरकार की दखल है इसके कारण यूनिवर्सिटी का अल्पसंख्यक दर्ज नहीं छीना जा सकता।

केंद्र ने उठाया मुद्दा

केंद्र की ओर से इस मामले में एएमयू सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दायर अपनी लिखित दलील में कहा कि विश्वविद्यालय हमेशा से राष्ट्रीय महत्व का संस्थान रहा है, यहाँ तक कि आजादी के पहले से भी। यूनिवर्सिटी की स्थापना 1875 में हुई थी।

केंद्र ने कहा कि जिस संस्थान को राष्ट्रीय महत्व मिला है वो गैर अल्पसंख्यक ही होना चाहिए। केंद्र ने बताया कि राष्ट्रीय महत्व वाला संस्थान होने के बावजूद भी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के एडमिशन प्रोसिजर अलग हैं।

सुप्रीम कोर्ट का सवाल

केंद्र की दलील सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट की सात सदस्यों वाली पीठ ने यूनिवर्सिटी से पूछा है जब विश्वविद्यालय के 180 सदस्यों में 37 ही मुस्लिम हैं तो फिर ये संस्थान अल्पसंख्यक संस्थान कैसे हुआ। मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जे बी पारदीवाला, जस्टिस दीपांकर दत्ता, जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस सतीश शर्मा ने विश्वविद्यालय से कहा कि वह अब यूनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक दर्जा क्यों दिया जाए इस बात को साबित करें।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का पक्ष

विश्वविद्यालय की ओर से इस मामले की पैरवी राजीव धवन ने की। उन्होंने कहा कि संविधान के आर्टिकल 30 (1) के तहत, सभी धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यक समुदायों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और प्रशासित करने का अधिकार है। उन्होंने यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक दर्ज को बनाए रखने के लिए दलील दी कि 1875 में मुहम्मदम एंगो-ओरिएंटल कॉलेज ने स्थापना की थी, जो 1920 में एएमयू बन गया।

सीजेआई ने इस दौरान सवाल किया कि क्या प्रशासन के 180 सदस्यों में से 37 के मुस्लिम होने से ये दावा कमजोर नहीं होता। इसपर धवन ने कहा कि संस्थान को अल्पसंख्यक दर्जा दिलाए रखने के लिए बिलकुल जरूरी नहीं है कि सौ फीसद स्टाफ समुदाय द्वारा ही नियंत्रित किया जाए।

धवन ने दलील दी कि स्थापना के बाद से इस यूनिवर्सिटी के सारे वीसी मुस्लिम रहे। इसलिए इसे अल्पसंख्यक द्वारा प्रशासित संस्थान कहा जाएगा। यहाँ बताया गया कि एएमयू की अन्य खासियतें भी इस्लाम से जुड़ी है। ऐसे में सिर्फ इसलिए कि मैनेजमेंट में सरकार का दखल है, इसके अल्पसंख्यक चरित्र को खारिज नहीं किया जा सकता। इस संस्थान को मुस्लिमों के उत्थान के लिए स्थापित किया गया था।

दलितों से बद्तर हैं मुस्लिमों की हालत

वहीं कपिल सिब्बल ने इस मामले पर दलील देते हुए कहा, “मैं ये बताना चाहता हूँ कि शिक्षा के मामले में मुसलमान अनुसूचित जातियों (SC) से भी नीचे हैं। ये तथ्य हैं। हमें पर्याप्त रूप से सशक्त नहीं बनाया गया है और खुद को सशक्त बनाने का एकमात्र तरीका शिक्षा का माध्यम है और अधिकांश लोकप्रिय पाठ्यक्रमों में अल्पसंख्यक बहुत कम हैं और केवल बहुसंख्यक हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्हें सशक्त नहीं बनाया गया है।”

दशकों से चल रही AMU पर बहस

गौरतलब है कि एनडीए सरकार ने साल 2016 में ये मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में उठाया था कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी कोई अल्पसंख्याक संस्थान नहीं है। उन्होंने एस अजीज बाशा केस में कोर्ट के 1967 के फैसले को आधार बनाकर ये दावा किया, जहाँ इस यूनिवर्सिटी को केंद्रीय यूनिवर्सिटी माना गया था। सरकार ने कहा था कि ये केंद्रीय यूनिवर्सिटी है क्योंकि इसे फंड सरकार से मिलता है। इसके बाद इस मामले पर 7 जजों की पीठ ने सुनवाई की जिसकी अध्यक्षता चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने की।

‘अजमेर की मस्जिद में फिर से गूँजेंगे मंत्र’: अब ‘ढाई दिन का झोपड़ा’ की बारी, संस्कृत कॉलेज और मंदिर को इस्लामी आक्रांताओं ने किया था ध्वस्त

अजमेर की ‘ढाई दिन का झोपड़ा’ मस्जिद को फिर से देवालय बनाने की माँग ने जोर पकड़ लिया है। बीजेपी सांसद रामचरण बोहरा ने कहा है कि जल्द ही इस जगह पर फिर से संस्कृत के मंत्र गूँजेंगे। उन्होंने इस जगह को मूल स्वरूप में लाने के लिए केंद्रीय संस्कृति, पर्यटन व पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्री जी किशन रेड्डी जी को पत्र भी लिखा है।

इस्लामी आक्रांताओं ने सैकड़ों हिंदू देवस्थानों को ध्वस्त कर उन पर मस्जिदें खड़ी कर दी थी। इनमें से एक ढाई दिन का झोपड़ा भी है। आज जिसे ‘ढाई दिन का झोपड़ा‘ कहा जाता है, वह मूल रूप से विशालकाय संस्कृत महाविद्यालय (सरस्वती कंठभरन महाविद्यालय) हुआ करता था। यह ज्ञान और बुद्धि की हिंदू देवी माता सरस्वती को समर्पित मंदिर था।

1192 ई. में, मुहम्मद गोरी ने महाराजा पृथ्वीराज चौहान को हराकर अजमेर पर अधिकार कर लिया था। उसने अपने गुलाम सेनापति कुतुब-उद-दीन-ऐबक को शहर में मंदिरों को नष्ट करने का आदेश दिया। ऐसा कहा जाता है कि उसने ऐबक को 60 घंटे के भीतर मंदिर स्थल पर मस्जिद के एक नमाज सेक्शन का निर्माण करने का आदेश दिया था ताकि वह नमाज अदा कर सके। चूँकि, इसका निर्माण ढाई दिन में हुआ था, इसीलिए इसे ‘अढाई दिन का झोपड़ा’ नाम दिया गया।

इस मस्जिद को दोबारा मूल स्वरूप में लाने की मांग ने ऐसे समय में जोर पकड़ा है, जब अयोध्या में भगवान रामलला की 22 जनवरी 2024 को प्राण-प्रतिष्ठा होनी है। अयोध्या में भी रामजन्भूमि पर बाबर के नाम से इस्लामी आक्रांताओं ने ढाँचा खड़ा कर दिया था। करीब 500 साल के संघर्ष के बाद इस जगह पर अब भव्य राम मंदिर आकार ले रहा है।

जयपुर के सांसद रामचरण बोहरा ने केंद्रीय मंत्री जी किशन रेड्डी को लिखे पत्र में कहा है, “ढाई दिन का झोपड़ा जो कि 12वीं सदी में महाराज विग्रहराज चौहान द्वारा देवालय और संस्कृत शिक्षण केंद्र के रूप में स्थापित किया गया था, उसे 1294 ई. में मोहम्मद गौरी के कहने पर कुतुबुद्दीन ऐबक ने तोड़ दिया था। यह केंद्र वेद पुराणों का प्रसारक होने के साथ ही संस्कृति शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।”

पत्र में उन्होंने लिखा है, “दासता का यह चिह्न आज भी भारतीय समाज के लिए कलंक है। अत: इसे मूल स्वरूप में परिवर्तित करने के लिए यह पत्र आपके विचारार्थ प्रस्तुत है। इससे महाराज विग्रहराज के लोकोत्तर व्यक्तित्व एवं कृतित्व के साथ ही पुरातन एवं महात्वपूर्ण संस्कृत शिक्षण केंद्र पुन: स्थापित हो सकेगा, जोकि सनातन धर्म के संरक्षण एवं विस्तार में महत्वपूर्ण सिद्ध होगा।”‘

बोहरा ने यह पत्र 9 जनवरी 2024 को लिखा है। इस ठीक एक दिन पहले उन्होंने राजस्थान विश्वविद्यालय के 78वें दीक्षांत समारोह के दौरान अपने संबोधन में भी इसका जिक्र किया था। उन्होंने कहा था, “ढाई दिन के झोपड़ा को बनाने के लिए वहाँ मौजूद संस्कृत विद्यालय को तोड़ दिया गया। अब बो दिन दूर नहीं जब एक बार फिर से यहाँ संस्कृत भाषा में लिखे मंत्र गूँजेंगे।” इस दौरान मंच पर राजस्थान के राज्यपाल कलराज मिश्र भी मौजूद थे।

बता दें कि ये ढ़ाई दिन का झोपड़ा, मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह से महज 500 मीटर की दूरी पर है। इसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) विभाग की तरफ से संरक्षित किया गया है। इसमें स्थित मस्जिद की देखरेख राजस्थान मुस्लिम वक्फ बोर्ड करता है। ढाई दिन के झोपड़ा पर ऑपइंडिया का विस्तृत लेख आप यहाँ क्लिक कर पढ़ सकते हैं।