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बीजेपी की जीत से बाजार ने भरी उड़ान, अब तक के सर्वोच्च स्तर पर पहुँच निफ्टी-सेंसेक्स ने मनाया जश्न: ₹6 लाख करोड़ की कमाई

3 दिसंबर 2023 को तीन राज्यों में बीजेपी को बड़ी जीत मिली। इसका असर अगले दिन शेयर बाजार में भी देखने को मिला। सोमवार (4 दिसंबर 2023) को बाजार खुलते ही दोनों सूचकांक रिकॉर्ड उच्च स्तर पर आ गए। बाजार में आई इस तेजी की वजह से निवेशकों की पूँजी ₹6 लाख करोड़ बढ़ गई।

भाजपा ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ तीनों राज्यों में बहुमत प्राप्त किया है। बीते सप्ताह 1 दिसंबर को बाजार 67,447 के स्तर पर बंद हुआ था। नतीजों के बाद सोमवार को यह सुबह 9 बजे 68,435 के स्तर पर खुला। इसके बाद बाजार दिन में ट्रेडिंग के बीच 68,918 तक गया। यह आज तक सेंसेक्स का सबसे ऊँचा स्तर है।

इसके अलावा सूचकांक निफ्टी50 1 दिसंबर को 20,248 के स्तर पर बंद हुआ था। यह सोमवार को 20,565 के स्तर पर खुला। दिन में शेयर बाजार में खूब तेजी रही जिसके कारण यह 20,702 तक गया। यह आज 20,684 पर बंद हुआ है।

गौरतलब है कि जीडीपी वृद्धि के मजबूत आँकड़ों और बढ़ी हुई कारोबारी गतिविधि के कारण बाजार पहले ही ऊँचे स्तर पर चल रहा था। भाजपा की जीत के बाद यह और बढ़ गया। इस तेजी के बीच इन्फ्रा और बिजली क्षेत्र से जुड़े हुए शेयर खूब बढ़े। तेजी के कारण BSE पर अंकित कम्पनियों की बाजार में कुल वैल्यू बढ़ कर ₹3.43 लाख करोड़ हो गई। आज की तेजी के कारण बाजार में 6 लाख करोड़ की बढ़ोतरी हुई है।

भाजपा की तीन राज्यों में जीत के कारण बाजार में यह सन्देश गया है कि आने वाले 2024 के आम चुनावों में भी जीत हासिल कर सकती है, जिससे देश में राजनीतिक स्थिरता बनी रहेगी। इससे बाजार में यह भी भावना आती है कि नीतियों में भी कोई बड़ा बदलाव नहीं आएगा। इसी कारण से बाजार में यह तेजी देखी गई।

भाजपा ने मध्य प्रदेश में 230 में से 163, राजस्थान में 199 में से 115 और छतीसगढ़ में 90 में से 54 सीट हासिल की हैं। उसने जहाँ राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कॉन्ग्रेस को सत्ता से बाहर किया है वहीं मध्य प्रदेश में अपनी सत्ता बचाते हुए प्रचंड बहुमत हासिल किया है। तेलंगाना में भी उसने 8 सीट हासिल की है। मिज़ोरम में उसे 2 सीट हासिल हुई है।

26/11 के जिस गुनहगार को चीन ने बचाया, उसे पाकिस्तान की जेल में ‘अज्ञात’ ने दे दिया जहर: वेंटिलेटर पर लश्कर आतंकी साजिद मीर

पाकिस्तान में ‘अज्ञात लोगों’ ने एक और आतंकी को निपटा दिया है। लश्कर-ए-तैय्यबा का आतंकवादी सरगना साजिद मीर वेंटिलेटर पर है। उसे अज्ञात लोगों ने ज़हर दे दिया। वो मुंबई में 2008 में हुए 26/11 हमलों का साजिशकर्ता है। उसे पाकिस्तान के डेरा गाजी खान स्थित सेन्ट्रल जेल में ही ज़हर दे दिया गया। इसके बाद CMH बहावलपुर में उसका इलाज चल रहा है। पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी ISI उसे एयरलिफ्ट कर के यहाँ के अस्पताल में लेकर आई है।

पाकिस्तान का पुलिस-प्रशासन इस मामले में जेल में खाना बनाने वाले शख्स पर ही शक ज़ाहिर कर रहा है और उसके खिलाफ जाँच शुरू भी कर दी गई है। वो एक प्राइवेट कुक है, जिसे अक्टूबर 2023 में जेल में बहाल किया गया था। अब वो फरार हो गया है। हाल के दिनों में पाकिस्तान में कई आतंकवादियों को ठिकाने लगाने की खबरें आई हैं और इनमें ‘अज्ञात लोगों’ के नाम आए हैं। अब ये ‘अज्ञात’ कौन हैं, इस संबंध में किसी को कुछ खास पता नहीं चला पा रहा है।

साजिद मीर उन आतंकियों में से है जिसका 26/11 हमलों की साजिश रचने में बड़ा रोल है। उसे कुछ ही दिनों पहले लाहौर सेन्ट्रल जेल से शिफ्ट किया गया था। उसे अमेरिकी ने भी मोस्ट वॉन्टेड की सूची में रखा है। साजिद मीर की उम्र 40-50 साल के बीच है। उस पर अमेरिका ने 5 मिलियन डॉलर (41.68 करोड़ रुपए) का इनाम रखा है। जून 2022 में उसे एक टेरर फाइनेंसिंग के मामले में पाकिस्तान के आतंकरोधी कोर्ट ने सज़ा सुनाई थी।

पाकिस्तान के अधिकारियों ने कुछ महीनों पहले तक ये फैलाने की कोशिश भी की थी कि साजिद मीर मर चुका है। लेकिन, पश्चिमी देशों ने इसे मानने से इनकार करते हुए कहा था कि वो इसे साबित कर के दिखाए। उसे हाल ही में ग्लोबल टेररिस्ट घोषित किए जाने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC)में प्रस्ताव लाया गया था लेकिन चीन ने वीटो लगा कर इसे ब्लॉक कर दिया था। भारत ने इस दौरान कहा भी था कि आतंकवाद से लड़ने को लेकर चीन गंभीर नहीं है।

‘चलो नई मिसाल हो, बढ़ो नया कमाल हो’ : नेवी डे पर PM मोदी ने किया छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा का अनावरण, कहा- सेना में बढ़ाएँगे नारी शक्ति​

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज (4 दिसंबर 2023) नौसेना दिवस के मौके पर महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग पहुँचे। यहाँ से वह सिंधुदुर्ग किले गए। उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा का अनावरण किया। यह प्रतिमा भारतीय नौसेना की तरफ से सिंधुदुर्ग जिले में स्थापित की गई है।

अनावरण के दौरान पीएम मोदी ने छत्रपति शिवाजी महाराज को पुष्प चढ़ाकर श्रद्धांजलि दी और फिर दोनों हाथ जोड़कर उन्हें नमन किया। इसके बाद वह सिंधुदुर्ग के तारकर्ली बीच भी गए। वहाँ कार्यक्रम का आयोजन हुआ। जिसके बाद पीएम मोदी ने जनसभा को संबोधित किया।

संबोधन में पीएम मोदी ने नौसेना को बधाई देते हुए कहा, “आपके लिए ही कहा गया है कि… चलो नई मिसाल हो, बढ़ो नया कमाल हो, झुको नहीं, रुको नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो।”

उन्होंने कहा, “अपनी विरासत पर गर्व करने की भावना के साथ मुझे एक और घोषणा करते हुए गौरव हो रहा है। भारतीय नौसेना अब अपने रैंक्स का नामकरण भारतीय परंपराओं के अनुरूप करने जा रही है। हम सशस्त्र बलों में अपनी नारीशक्ति की संख्या बढ़ाने पर भी जो दे रहे हैं।”

वह बोले कि छत्रपति शिवाजी महाराज से प्रेरणा लेकर भारत औपनिवेशिक विचारों को खत्म कर रहा है। उन्होंने कहा, “ये भारत के इतिहास का वो कालखंड है जो सिर्फ 5-10 साल का नहीं, बल्कि आने वाली सदियों का भविष्य लिखने वाला है। 10 वर्ष से भी कम के कालखंड में भारत, दुनिया में 10वें नंबर की आर्थिक ताकत से बढ़कर 5वें नंबर पर पहुँच गया है। अब तीसरे नंबर की आर्थिक शक्ति बनने की ओर अग्रसर है।”

सिंधुदुर्ग में नौसेना दिवस कार्यक्रम

गौरतलब है कि दरअसल, सिंधुदुर्ग भारतीय नौसेना के लिए आज के समय में बहुत महत्वपूर्व द्वीप है जिसे 1664 से 1667 के बीच में छत्रपति शिवाजी महाराज ने बनवाया था। ये पूरा किला 48 एकड़ में फैला है। यहाँ पदमगढ़ नामक अन्य किला है जो मराठा नौसेना के लिए शिपयार्ड के रूप में काम आता था। इसे सिंधुदुर्ग के सामने एक छोटे से द्वीप पर बनाया गया था। यही वो द्वीप थे जिसे मराठाओं ने अंग्रेजी, डच और पुर्तगाली नौसेना के खिलाफ अपनी मजबूत पकड़ बनाने के लिए इस्तेमाल किया।

पिछले साल ही नौसेना को अपना निशान मिला था उसक कनेक्शन भी छत्रपति शिवाजी महाराज के समय से जुड़ा था। नए एनसाइन, जिसमें भारत के गौरवशाली इतिहास की शौर्य गाथा और उपनिवेशवाद से आजादी का प्रतीक शामिल किया गया था। नए एनसाइन में बाईं ओर ऊपरी में राष्ट्रीय ध्वज, और फ्लाई साइड के केंद्र में एक नेवी ब्लू – गोल्ड अष्टकोण रखा गया।

अष्टकोण के भीतर शामिल डिजाइन को भारतीय नौसेना के शिखर से लिया गया, जिसमें औपनिवेशिक विरासत से जुड़े फाउल्ड एंकर को हटाकर भारतीय नौसेना की दृढ़ता को रेखांकित करने के लिए एंकर के साथ बदल दिया गया।

मालूम हो कि अष्टकोणीय आकार का नेवी ब्लू रंग भारतीय नौसेना की नीली जल क्षमताओं को दर्शाता है। वहीं जुड़वाँ अष्टकोणीय सीमाएँ छत्रपति शिवाजी महाराज की मुहर से प्रेरणा लेती हुई है।

3 राज्यों के नतीजों से विदेशी मीडिया भी नतमस्तक, माना और मजबूत हुए PM मोदी: ‘अल जजीरा’ को ‘हिन्दू राष्ट्रवाद’ से चिढ़

भारतीय जनता पार्टी ने राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में बहुमत के साथ विजय पाई है। जहाँ मध्य प्रदेश में उसने सत्ता को बचाए रखा है, वहीं छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कॉन्ग्रेस को सत्ता से बेदखल किया है। भाजपा की इस जीत को विदेशी मीडिया संस्थानों में भी खासी कवरेज मिली है।

यूरोपियन मीडिया संस्थानों से लेकर अमेरिकी मीडिया संस्थान, जो कि अधिकांश समय भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी को ‘हिन्दू राष्ट्रवादी’ की संज्ञा देते हैं, ने इस बार कुछ रुख बदला है। इस बार मीडिया रिपोर्ट में भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी को लेकर कुछ नरमी दिखी है।

ब्रिटिश मीडिया संस्थान बीबीसी ने भाजपा की तीन राज्यों में जीत पर लिखा है, “राज्य चुनाव परिणाम: तीन राज्यों की जीत ने प्रधानमंत्री मोदी के फिर से चुने जाने को मजबूती दी है।” हालाँकि, बीबीसी का कहना है कि इन चुनावों से 2024 के आम चुनावों में उतना फर्क नहीं पड़ने की संभावना है लेकिन हाँ इससे प्रधानमंत्री मोदी की छवि जरूर मजबूत हुई है। BBC ने इसी वर्ष प्रधानमंत्री मोदी की 2002 में गुजरात दंगों में भूमिका पर एक डाक्यूमेंट्री बनाई थी और प्रोपगैंडा फैलाने का प्रयास किया था।

प्रमुख अमेरिकी मीडिया संस्थान ‘द न्यू यॉर्क टाइम्स’ (NYT) ने लिखा, “राज्यों में बड़ी जीत के साथ मोदी ने भारत में अपना प्रभाव बढ़ाया।” न्यूयॉर्क टाइम्स का कहना है कि भाजपा ने इन राज्यों में जीत के साथ अपने हिन्दू राष्ट्रवाद के वोटरबेस को मजबूत किया है। इसने जनवरी 2024 में अयोध्या रामलला के मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा का भी जिक्र किया है।

यूरोप के बड़े प्रकाशन DW ने लिखा, “भारतीय प्रधानमंत्री मोदी की भाजपा ने 3 राज्यों में जीत हासिल की।” इसने भी इन चुनावों के जरिए प्रधानमंत्री मोदी की अगले साल के चुनावों के लिए दावेदारी मजबूत होने की बात की है। इसका कहना है कि भाजपा ने उम्मीदों से अच्छा प्रदर्शन किया है।

अधिकतर समय प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा को हिन्दू राष्ट्रवादी बताने वाले और भारत में मानवाधिकारों का रोना रोने वाले प्रकाशन फाइनेंसियल टाइम्स ने लिखा, “नरेन्द्र मोदी की भाजपा राज्य चुनावों में विजयी।” गौरतलब है कि इस बार ‘फाइनेंसियल टाइम्स’ की भाषा कहीं नरम है और इसमें एक भी बार ‘हिन्दू राष्ट्रवाद’ का जिक्र नहीं है।

हालाँकि, अरब जगत का सबसे बड़ा प्रकाशन ‘अल जज़ीरा‘ अभी भी अपने एजेंडे से चिपटा हुआ है। इसने भाजपा की चुनावी जीत के विषय बताने वाली रिपोर्ट की पहली लाइन में भाजपा को हिन्दू राष्ट्रवादी बताया। इसने फिर से वही मुस्लिमों के खिलाफ बयान आदि का राग भी अपने रिपोर्ट में छेड़ा है। इसके अलावा तुर्की के बड़े मीडिया संस्थान TRT वर्ल्ड ने भी इस बार भाजपा की जीत पर लिखते हुए कॉन्ग्रेस के नेपथ्य में चले जाने की बात की है। TRT वैसे अन्य मीडिया संस्थानों की तरह ही भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी पर हमले करता आया है लेकिन इस बार उसके स्वर बदल गए हैं।

भंवरी देवी से बंद हुई पिता की राजनीतिक दुकान, बेटी से भैराराम ने चुकता किया ‘हिसाब’: CM के थे ख्वाब, पर ओसियाँ भी जीत नहीं पाईं दिव्या मदेरणा

2011 का साल था। राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस की सरकार चल रही थी। अचानक से भंवरी देवी नाम ने प्रदेश में सियासी तूफान खड़ा कर दिया। इस प्रकरण ने महिपाल मदेरणा की राजनीति पर ग्रहण लगा दिया। इन्हीं महिपाल मदेरणा की बेटी हैं दिव्या जो इस विधानसभा चुनाव में ओसियाँ के मैदान में परास्त हुईं हैं।

चुनाव प्रचार के दौरान समर्थक दिव्या को भविष्य का मुख्यमंत्री बता रहे थे। उनकी गिनती प्रदेश में कॉन्ग्रेस के बड़े युवा चेहरों में हो रही थी। इसके कारण ओसियाँ राजस्थान की सबसे चर्चित सीटों में से एक बनी हुई थी। लेकिन बीजेपी के भैरा राम चौधरी ने उन्हें हराकर पुराना हिसाब चुकता कर लिया है।

भाजपा के भैरा राम चौधरी को 1,03,746 वोट मिले हैं, जबकि दिव्या 1,00,939 वोट पा सकी हैं। वह 2018 में भैरा राम को हराकर ही पहली बार विधायक बनीं थी।

दिव्या मदेरणा करीबी मुकाबले में हार गई हैं।

दिव्या ने अपनी राजनीतिक पारी 2010 में चालू की थी, जब वह जोधपुर जिला परिषद सदस्य चुनी गईं थी। उनकी माँ भी जिला परिषद की सदस्य और अध्यक्ष भी रही हैं। दिव्या पुणे और इंग्लैंड में पढ़ चुकी हैं।

दिव्या मदेरणा राजस्थान के सबसे ताकतवर राजनीतिक परिवारों में से एक मदेरणा परिवार से आती हैं। उनके पिता महिपाल मदेरणा भंवरी देवी कांड में फँसने से पहले तत्कालीन अशोक गहलोत की सरकार में कैबिनेट मंत्री हुआ करते थे। महिपाल मदेरणा की 2021 में मौत हुई थी। उससे पहले ही वे अपनी राजनीतिक विरासत बेटी दिव्या को सौंप चुके थे। दिव्या के दादा परसराम मदेरणा भी अपने जमाने में राजस्थान कॉन्ग्रेस के बड़े नेताओं में शुमार थे।

भंवरी देवी केस

भंवरी देवी का मामला अगस्त 2011 का है। उस समय एएनएम भंवरी देवी के अचानक गायब होने पर उनके पति अमरचंद ने प्रदेश के तत्कालीन मंत्री महिपाल मदेरणा पर पत्नी को गायब कराने का आरोप लगाया था। कुछ समय बाद मामला परत दर परत खुला और एक के बाद एक कर कई लोग इस पूरी कहानी में जुड़ते गए, लेकिन भंवरी का कहीं पता नहीं लग पाया। बाद में सीबीआई मामले की जाँच में जुटी और तभी भंवरी देवी और महिपाल मदेरणा की एक सीडी वायरल हो गई।

मदेरणा इस मामले में जेल भी गए थे। बाद में उन्हें और मलखान सिंह को जमानत पर रिहा किया गया था। 2021 में जब महिपाल मदेरणा की कैंसर से मौत हुई वे जेल से बाहर ही थे।

दिव्या ने अपने पिता की राजनीतिक विरासत को पाँच साल तक आगे बढ़ाया, लेकिन इस हार के बाद अब उन्हें नए सिरे से अपनी जमीन तैयार करनी होंगी। दिव्या को पार्टी में भी मुखर नेता माना जाता रहा है, लेकिन कॉन्ग्रेस की आंतरिक लड़ाई के कारण गहलोत सरकार के अंतिम दिनों में वह साइडलाइन हो गईं थी।

मिजोरम में ZPM की सरकार, जानिए कौन हैं लालडुहोमा जिनसे परास्त हो गई 62 साल पुरानी पार्टी: 01 सीटों पर सिमटी कॉन्ग्रेस

मिजोरम की 40 सीटों में से 27 सीटों पर बहुमत पाकर ‘जोरम पीपुल्स मूवमेंट’ ने 2023 विधानसभा चुनावों में सत्ता हासिल कर ली है। राज्य की 62 साल पुरानी पार्टी ‘मिजो नेशनल फ्रंट’ को सिर्फ 10 सीट मिल पाई जबकि भाजपा को जहाँ 2 और कॉन्ग्रेस को सिर्फ 1 सीट मिली है।

जिस पार्टी ने इस बार मिजोरम को जीता है उसे पिछले वर्ष यानी 2018 के चुनावों में सिर्फ 8 सीटें मिली थी और एमएनएफ ने 26 सीट से बहुमत पाकर सरकार बनाई थी। जेडपीएम पार्टी की बात करें तो ये केवल 6 साल पहले ही शुरू हुई थी।

इस पार्टी को शुरू करने वाले पूर्व आईपीएस अधिकारी लालडुहोमा है। उन्होंने साल 1972 से 1977 तक लालडुहोमा ने मिजोरम के मुख्यमंत्री के प्रधान सहायक के तौर पर काम किया था। स्नातक की पढ़ाई के बाद उन्होंने सिविल परीक्षा दी और 1977 में आईपीएस बने। उन्होंने सक्वाड लीडर के तौर पर काम किया।

1982 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने उन्हें अपना सुरक्षा प्रभारी नियुक्त किया था। पुलिस आयुक्त के रूप में विशेष पदोन्नति दी गई थी। फिर राजीव गाँधी की अध्यक्षता में 1982 एशियाई खेलों के आयोजन समिति के सचिव भी बने। बाद में पुलिस की नौकरी छोड़कर वो 1984 में कॉन्ग्रेस से जुड़ गए और लोकसभा चुनाव में जीत हासिल करके लालडुहोमा संसद पहुँचे।

साल, 1988 में उन्होंने कॉन्ग्रेस की सदस्यता से इस्तेफा दे दिया। इसके कारण दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्य घोषित करके लोकसभा की सदस्यता छीन ली गई। 2017 में जाकर उन्होंने छह छोटे क्षेत्रीय दलों को मिलाकर जेडपीएम बनाई। 2018 में उनकी पार्टी को मान्यता नहीं मिली लेकिन स्वतंत्र रूप से इस पार्टी से 38 उम्मीदवार उतारे गए जिनमें से 8 ने जीत हासिल की और इसके अध्यक्ष लालडुहोमा बने। 2019 में इस पार्टी को मान्यता मिली।

साल 2021 में वो सेरछिप सीट से निर्दलीय से जेडपीएम पार्टी में आ गए, पर फिर से उनपर दलबदल कानून की तलवार चली और इनकी विधायकी चली गई। फिर चुनाव हुए तो इन्होंने अपनी पार्टी जेडपीएम से चुनाव लड़े और इस पार्टी से पहले विधायक बने। इसके बाद 2023 की तैयारी शुरू हुई और नतीजा आज सबके सामने है कि जिस कॉन्ग्रेस के साथ उन्होंने राजनीति शुरू की थी, उसी की आज ऐसी हालत कर दी कि वो एक सीट ही जुटा पाए।

1 साल में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 45000 मामले, 3.12 लाख क्राइम: बलात्कार के मामले में राजस्थान को No.1 बना कर विदा हुए हैं अशोक गहलोत

तीन राज्य के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी स्पष्ट बहुत के साथ सत्ता में आई है। इनमें से राजस्थान में उसने अशोक गहलोत की कॉन्ग्रेस सरकार को सत्ता से बेदखल किया है। अशोक गहलोत ने काफी रेवड़ियों का ऐलान किया था लेकिन अपराध पर काबू ना कर पाना उनके फेल होने का एक बड़ा कारण बना है।

अशोक गहलोत कानून-व्यवस्था के मामले में किस तरीके से विफल रहे हैं, यह चुनावों के बाद सामने आए ‘राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो’ (NCRB) के आँकड़ो ने स्पष्ट किया है। NCRB हर साल देश में होने वाले अपराधों के विषय में आँकड़े जारी करती है। NCRB के आँकड़ों के अनुसार, राजस्थान देश में बलात्कार के मामलों में नम्बर एक है। अशोक गहलोत की सरकार के दौरान महिला सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा रहा है। भाजपा ने इसे अपने चुनावी कैम्पेन में प्रमुख मुद्दा बनाया था।

वर्ष 2022 में राजस्थान से 5399 बलात्कार के मामले सामने आए हैं। इससे पहले वर्ष 2020 और 2021 में राजस्थान के भीतर बलात्कार की क्रमशः 5310 और 6337 घटनाएँ हुई थीं। बलात्कार की घटनाओं पर कार्रवाई के मामले में भी राजस्थान काफी पीछे है। NCRB की रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2022 में राजस्थान में बलात्कार समेत महिलाओं के विरुद्ध अपराध के कुल 45,058 मामले सामने आए हैं। वर्ष 2021 और वर्ष 2020 की तुलना में महिलाओं के विरुद्ध अपराध राजस्थान में बढ़ गए हैं।

वर्ष 2020 में महिलाओं के विरुद्ध राजस्थान में 34,535 अपराध के मामले सामने आए थे जबकि 2021 के दौरान यह बढ़ कर 40,378 हो गए थे। इस प्रकार वर्ष 2021 के मुकाबले 2022 में राजस्थान में महिलाओं के विरुद्ध अपराध के मामलों में 11.5% की वृद्धि हुई है।

राजस्थान में महिलाओं के विरुद्ध अपराध जहाँ लगातार बढ़ रहे हैं वहीं अशोक गहलोत के शासन में पुलिस भी अकर्मण्य रही है। NCRB की यह रिपोर्ट बताती है कि महिलाओं के विरुद्ध हुए अपराधों के मामलों में राजस्थान पुलिस केवल 54% में ही चार्जशीट लगा पाई है। देश के अन्य बड़े राज्यों में यह आँकड़ा 70% के ऊपर है।

ऐसा नहीं है कि राजस्थान केवल बलात्कार के मामलों में ही आगे है। अन्य अपराध भी राजस्थान में तेज़ी बढ़े हैं। राजस्थान में वर्ष 2022 में अपराधों की संख्या 3 लाख पार कर गई है। वर्ष 2022 में राजस्थान में 3,12,804 आपराधिक घटनाएँ सामने आई हैं। 2020 में यह घटनाएँ 2.84 लाख और 2020 में 2.60 लाख थी। वर्ष 2022 में 2021 की तुलना में राजस्थान के भीतर 10% की वृद्धि हुई है। राजस्थान में वर्ष 2022 में 1,834 हत्या की वारदातें हुई हैं। यह वर्ष 2021 में 1,786 और 2020 में 1,719 थीं।

इन वर्ष 2022 में राजस्थान में हुई 1834 हत्याओं में से मात्र 57% मामलों में ही राजस्थान पुलिस चार्जशीट लगाने में सफल हुई है। 43% मामलों में अब भी चार्जशीट तक नहीं लग पाई है। राजस्थान में हत्या, बलात्कार के इन बढ़ते मामलों और उन पर कार्रवाई ना होने के कारण लोगों का अशोक गहलोत की सरकार में विश्वास चला गया था। इसलिए भाजपा ने जब इसे चुनावी मुद्दा बनाया तो जनता ने कॉन्ग्रेस को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया।

बीजेपी MP ने रखा प्रस्ताव और राज्यसभा ने खत्म कर दिया राघव चड्ढा का निलंबन, उप-सभापति को धन्यवाद दे AAP सांसद ने पढ़ा ‘चराग़’ वाला शेर

राज्यसभा से AAP के सांसद राघव चड्ढा का निलंबन वापस ले लिया गया है। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और सभापति जगदीप धनखड़ को धन्यवाद दिया है। बता दें कि सोमवार (4 दिसंबर, 2023) को उच्च सदन ने राज्यसभा से राघव चढ़ा का निलंबन वापस ले लिया गया। वो 115 दिनों से निलंबित चल रहे थे। उन्हें 11 अगस्त, 2023 को राज्यसभा से निलंबित किया गया था। राघव चड्ढा ने इसके बाद सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का संज्ञान लिया था।

राघव चड्ढा ने अब वीडियो जारी कर के कहा है, “सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद संसद भवन के भीतर एक प्रस्ताव लाकर मेरे निलंबन को रद्द किया गया। इस दौरान मैं जनता के सवाल सरकार से नहीं पूछ सका, आपके हक़ की आवाज़ नहीं उठा सका। इस 115 दिन के निलंबन के मेरे समय में मुझे आप सबका बहुत आशीर्वाद और प्यार मिला लड़ाई लड़ने की और डट कर मुकाबला करने की, कैसे मैसेज और फोन आए। इसके लिए मैं आपका धन्यवाद करता हूँ।”

इस दौरान उन्होंने ‘दुआ करो कि सलामत रहे मेरी हिम्मत, ये एक चराग़ कई अंधेरों पर भारी है’ शेर भी पढ़ा। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने राघव चड्ढा को निर्देश दिया था कि वो चयन समिति को लेकर हुए विवाद पर वो उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ से बिना शर्त माफ़ी माँगें, इसके बाद सभापति इस पर सहानुभूतिपूर्वक विचार कर सकते हैं। बता दें कि भाजपा सांसदों ने आरोप लगाया था कि एक प्रस्ताव में राघव चड्ढा ने उनकी सहमति के बिना उनके नाम जोड़ दिए थे।

इस प्रस्ताव में ‘दिल्ली सेवा विधेयक’ की जाँच के लिए एक चयन समिति के गठन की माँग की गई थी। दिल्ली कैडर के अधिकारियों की तैनाती और उनके तबादले के मुद्दे पर ये विधेयक आया था। राघव चड्ढा ने इस पर प्रस्ताव तैयार कर के सभापति को दे दिया था। उन पर फर्जीवाड़े और विशेषाधिकार हनन के आरोप लगे थे। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी इस मामले में जाँच की माँग की थी। जाँच पूरी होने तक सभापति ने राघव चड्ढा को निलंबित कर दिया था।

निलंबन का प्रस्ताव उत्तर प्रदेश से भाजपा के राज्यसभा सांसद GVL नरसिंहा राव लेकर आए। उन्होंने नियमों का हवाला देते हुए मोशन मूव किया और कहा कि राघव चड्ढा को विशेषाधिकार हनन का दोषी पाया गया है और अब तक उन्होंने जो निलंबन भुगता है, वो उनके लिए पर्याप्त सज़ा है। उन्होंने इसके सभापति ने मौखिक रूप से इस पर सांसदों से वोट लिया और मोशन को अडॉप्ट किया। फिर उन्होंने कहा कि राघव चड्ढा अब संसद की कार्यवाही में हिस्सा ले सकते हैं।

जब भारतीय नौसेना की 3 मिसाइल बोट ने कराची में कर दिया अँधेरा… उसी विजय दिवस पर सिंधुदुर्ग में PM मोदी: 2022 में दिया था शिवाजी वाला शौर्य निशान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज नौसेना दिवस (4 दिसंबर) पर महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग में 4 बजे के बाद शिवाजी प्रतिमा का अनावरण करने वाले हैं। इसके बाद सिंधुदुर्ग में ही होने वाले नौसेना के कार्यक्रम में वो शामिल होंगे। सिंधुदुर्ग और शिवाजी महाराज से नौसेना से नाता है इसी वजह से नौसेना दिवस पर अनावरण के अवसर को और इस जगह को चुना गया।

सिंधुदुर्ग में नौसेना दिवस का समारोह

दरअसल, सिंधुदुर्ग भारतीय नौसेना के लिए आज के समय में बहुत महत्वपूर्व द्वीप है जिसे 1664 से 1667 के बीच में छत्रपति शिवाजी महाराज ने बनवाया था। ये पूरा किला 48 एकड़ में फैला है। यहाँ पदमगढ़ नामक अन्य किला है जो मराठा नौसेना के लिए शिपयार्ड के रूप में काम आता था। इसे सिंधुदुर्ग के सामने एक छोटे से द्वीप पर बनाया गया था। यही वो द्वीप थे जिसे मराठाओं ने अंग्रेजी, डच और पुर्तगाली नौसेना के खिलाफ अपनी मजबूत पकड़ बनाने के लिए इस्तेमाल किया।

आज भी इस जगह को छत्रपति शिवाजी महाराज के सैन्य कौशल और दूरदृष्टि के प्रमाण के रूप में देखा जाता है। इस किले को उन्होंने अपनी निगरानी में बनवाया था। निर्माण के वक्त मजबूत डिजाइन और कड़ी सुरक्षा को ध्यान में रखा गया था। बताया जाता है कि किले को पूरा 500 से अधिक राजमिस्त्री, 200 लोहार, 100 पुर्तगाली और 3000 के कार्यबल ने 3 वर्षों तक अथक परिश्रम किया।

भारतीय सेना को मिला नए एनसाइन

पिछले साल ही नौसेना को अपना निशान मिला था उसक कनेक्शन भी छत्रपति शिवाजी महाराज के समय से जुड़ा था। नए एनसाइन, जिसमें भारत के गौरवशाली इतिहास की शौर्य गाथा और उपनिवेशवाद से आजादी का प्रतीक शामिल किया गया था। नए एनसाइन में बाईं ओर ऊपरी में राष्ट्रीय ध्वज, और फ्लाई साइड के केंद्र में एक नेवी ब्लू – गोल्ड अष्टकोण रखा गया।

अष्टकोण के भीतर शामिल डिजाइन को भारतीय नौसेना के शिखर से लिया गया, जिसमें औपनिवेशिक विरासत से जुड़े फाउल्ड एंकर को हटाकर भारतीय नौसेना की दृढ़ता को रेखांकित करने के लिए एंकर के साथ बदल दिया गया।

मालूम हो कि अष्टकोणीय आकार का नेवी ब्लू रंग भारतीय नौसेना की नीली जल क्षमताओं को दर्शाता है। वहीं जुड़वाँ अष्टकोणीय सीमाएँ छत्रपति शिवाजी महाराज की मुहर से प्रेरणा लेती हुई हैं जिन्हें एक दूरदर्शी समुद्री दृष्टिकोण वाले राजाओं में से एक माना जाता है।

4 दिसंबर को नौसेना दिवस क्यों मनाया जाता है।

4 दिसंबर को ही नौसेना दिवस क्यों मनाया जाता है ये जानना बेहद दिलचस्प है क्योंकि इसके तार जुड़े हैं पाकिस्तान को करारी शिकस्त देने से।

बात 1971 की है जब भारतीय सेना ने ऑपरेशन त्रिडेंट को अंजाम दिया था। उस समय बांग्लादेश में आजादी की लड़ाई चल रही थी… इसी बीच 3 दिसंबर को पाकिस्तान ने ‘ऑपरेशन चंगेज खान’ के तहत भारत के 11 एयरबेसों पर हमला कर दिया। इस ऑपरेशन का जो भारत ने जवाब दिया उसी को ऑपरेशन त्रिडेंट कहा गया।

ऑपरेशन त्रिडेंट

3 दिसंबर 1971 के हमले के बदले पाकिस्तान के लोंगेवाला में भारतीय नौसेना के तीन मिसाइल बोट कराची भेजी गईं, जिनका नाम INS निपत, INS निर्घाट और INS वीर था। वहीं उन्हें पाकिस्तान का जहाज पीएनएस खैबर मिला। रात में जब पाकिस्तान जहाज को भारतीय सेना के आने का इल्म हुआ तो वो भी अटैक करने आगे आ गया। भारत की मिसाइल बोटों ने फौरन रडार का इस्तेमाल कर उसपर इतना सटीक हमला किया कि खैबर में आग लग गई। भारत ने फिर मिसाइल दागी और खैबर को पूरा समुद्र में डुबा दिया। इसमें 222 पाकिस्तानी सेलर थे।

ऑपरेशन ट्राइडेंट, नौसेना दिवस
ऑपरेशन ट्राइडेंट (तस्वीर साभार: The Indian Express )

इसके बाद एक और जहाज को भारतीय मिसाइल बोट निपत ने निशाना बनाया। बाद में पता चला कि वो एमवी वीनस चैलेंजर बोट थी जिसमें अमेरिका से पाकिस्तान के लिए गोला-बारूद हथियार भेजे जा रहे थे। फिर, भारत की तीसरी मिसाइल बोट INS VEER ने एक और पाकिस्तान के जंगी जहाज को डुबाया जिसका नाम पीएनएस मुहाफिज था जिसमें 33 पाकिस्तानी नाविक थे।

इन तीनों बोट्स ने कराची के बंदरगाहों को तबाह किया। फिर रडार में किमारी ऑयल टैंक आए तो उसपर भी मिसाइल दागी गईं। बताया जाता है कि कुल 90 मिनट में भारतीय नौसेना ने 6 मिसाइलें दागीं, जिससे पाकिस्तान के 4 जहाज डूब गए।

भारतीय नौसेना ने अपने इस मिशन में पाकिस्तान के कराची बंदरगाह को बमबारी करके पूरा तबाह कर दिया था और सैंकड़ों पाकिस्तानी फौजियों को मौत के घाट उतार दिया था। कहा जाता है कि इस बमबारी के बाद पाकिस्तान के जो हालात हुए थे वहाँ 7 दिन तक सूरज की किरण साफ नहीं दिखी थी। पाकिस्तान का एक गाजी पनडुब्बी युद्ध से पहले ही आईएनएस विक्रांत द्वारा डुबाया जा चुका था चुका था।

भारतीय नौसेना की इसी जांबाजी को देखते हुए 4 दिसंबर को नौसेना दिवस घोषित किया गया। इसके बाद से हर साल भारतीय नौसेना इस दिवस को मनाने लगी। इस दिन को भारत की उपलब्धि के तौर पर भी मनाया जाता है।

KCR की ‘टोपी’ चुग गई कॉन्ग्रेस, जानिए क्यों तेलंगाना में मुस्लिमों ने थामा ‘हाथ’: वो ‘सूत्र’ जिसे पकड़ प्रदीप भंडारी ने किया नतीजों का सबसे सटीक आकलन

5 राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में सिर्फ एक से ही कॉन्ग्रेस के लिए अच्छी खबर आई है और वो है – तेलंगाना। तेलंगाना के गठन के बाद से ही वहाँ BRS सत्ता में थी। बता दें कि BRS (भारत राष्ट्र समिति) का नाम पहले TRS (तेलंगाना राष्ट्र समिति) हुआ करता था, लेकिन मुख्यमंत्री KCR (कलवाकुन्तला चंद्रशेखर राव) की राष्ट्रीय राजनीति की महत्वकांक्षाओं के कारण इसका नाम दिसंबर 2022 में BRS कर दिया गया था। हालाँकि, अब अपने ही राज्य में उनकी ऐसी दुर्गति हो गई है कि दिल्ली तो एकदम दूर है।

तेलंगाना के विधानसभा चुनावों की बात करें तो कॉन्ग्रेस 64 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी है। बहुमत के लिए 60 सीटों की आवश्यकता होती है, ऐसे में उसका सरकार बनाना तय है। वहीं पिछले 10 वर्षों से वहाँ सत्ता में रही BRS 39 सीटों पर सिमट गई है। भाजपा की बात करें तो पहले वहाँ उसका एक ही विधायक था लेकिन अब 8 हैं। वहीं हैदराबाद की 8 में से 7 सीटें AIMIM ने अपने पास रखी, जो पहले से ही उसके पास थी। हैदराबाद की एकमात्र सीट भाजपा जीतती रही है जो है गोशामहल – वहाँ से राजा सिंह ने बतौर MLA हैट्रिक लगाई है।

तेलंगाना में BRS और AIMIM एक समझौते के तहत चुनाव लड़ती रही है। हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी के साथ के कारण BRS को मुस्लिम वोटों का भी फायदा मिलता रहा है। हैदराबाद के मुस्लिम वोटर तो AIMIM के साथ रहते ही हैं। लेकिन, इस चुनाव में ऐसा प्रतीत होता है कि मुस्लिम वोटरों ने कॉन्ग्रेस को प्राथमिकता दी, BRS-AIMIM की जगह। इस चुनाव में कॉन्ग्रेस का मत प्रतिशत 39.40 रहा तो वहीं BRS को 37.35% वोट मिले।

KCR ने किया था ‘मुस्लिम IT पार्क’ का वादा

दोनों पक्षों ने मुस्लिम वोटरों को लुभाने की पूरी कोशिश की। KCR ने तो यहाँ तक वादा किया था कि मुस्लिमों के लिए अलग से IT पार्क बनवाया जाएगा। उन्होंने हैदराबाद के पास पहाड़ीशरीफ में मुस्लिमों के लिए ये आईटी पार्क बनवाने की बात कही थी, अगर बीआरएस सत्ता में लौटती है तो। उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान कॉन्ग्रेस पर मुस्लिमों को सिर्फ वोट बैंक समझने और उनके विकास के लिए कोई काम न करने का आरोप लगाया। यहाँ तक कि उन्होंने शिक्षा एवं रोजगार में मुस्लिमों के आरक्षण को 12% तक करने की घोषणा कर डाली।

उन्होंने मुस्लिमों के लिए ‘शादीखाना’ तैयार करने की घोषणा की। सिर्फ मुस्लिमों के लिए 296 आवासीय विद्यालय खोले। यानी, उन्होंने राज्य की 13% जनसंख्या पर 12,000 करोड़ रुपए अलग से खर्च करना पड़ा। अब ये भी साफ़ हो गया है कि I.N.D.I. गठबंधन में भी BRS को कोई एंट्री नहीं मिलेगी। लोकसभा चुनावों में पार्टी की स्थिति और कमजोर होगी, क्योंकि मुस्लिम वोटों के लिए मारामारी और तेज़ होगी। हालाँकि, मुस्लिम वोटरों के रुख से साफ़ है कि वो 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले कॉन्ग्रेस को मजबूत करना चाहती है ताकि वो भाजपा के खिलाफ लड़ाई में आ सके।

वो मुस्लिम लड़कियों के लिए ‘शादी मुबारक’ नामक योजना लेकर आए, जिसके तहत उन्हें शादी के लिए वित्तीय मदद दी जाती है। उन्होंने पुराने हैदराबाद के विकास को तुर्की की राजधानी इस्ताम्बुल की तर्ज पर करने की बात कही थी। चुनाव से पहले जमात-ए-इस्लामी के राज्य अध्यक्ष हामिद मोहम्मद खान ने कहा था कि हमारे पास इसका कोई कारण नहीं है कि हम BRS को समर्थन देना जारी रखें। उन्होंने पार्टी पर संसद में मुस्लिम विरोधी बिल्स के समर्थन का आरोप लगाया।

बता दें कि तीन तलाक के खिलाफ आए बिल के दौरान KCR की पार्टी वोटिंग से अनुपस्थित रही थी। वहीं जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के पूर्व राज्य अध्यक्ष हाफिज पीर सब्बीर अहमद ने भी BRS पर मुस्लिमों को 12% आरक्षण के मुद्दे पर मुस्लिमों से वादाखिलाफी का आरोप लगाया था। तेलंगाना में मुस्लिमों की 13% जनसंख्या है। राहुल गाँधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ भी तेलंगाना में मुस्लिमों के प्रभाव वाले इलाकों से गुजरी। इस बार ओवैसी की पार्टी ने 9 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, वहीं बाकी सभी सीटों पर BRS का समर्थन किया था।

कॉन्ग्रेस ने मुस्लिम वोटरों को साधने के लिए बनाई विशेष रणनीति

इसके बावजूद मुस्लिम वोटरों ने KCR को अपनी पहली पसंद नहीं बनाया, जबकि ओवैसी 9 में से 7 सीटें जीतने में कामयाब रहे। जहाँ एक तरफ KCR मुस्लिम तुष्टिकरण में डूबे हुए थे, वहीं कॉन्ग्रेस ने भी मुस्लिम वोटरों को रिझाने के लिए कम प्रयास नहीं किए। कर्नाटक के आवासन एवं अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री ज़मीर अहमद खान को तेलंगाना में मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने के लिए लगाया था। उन्होंने 28 दिन तेलंगाना में रह कर मुस्लिम समुदाय के नेताओं, चिंतकों और पार्टी के मुस्लिम नेताओं के साथ एक के बाद एक बैठकें की।

उन्होंने कई रैलियाँ भी मुस्लिमों के प्रभाव वाले इलाकों में की। 49 सीटों पर उन्होंने मुस्लिमों को कॉन्ग्रेस के पक्ष में ध्रुवीकृत करने के लिए खूब प्रयास किए। उन्होंने कॉन्ग्रेस महासचिव KC वेणुगोपाल के साथ मिल कर रणनीतियों पर विचार-विमर्श किया और वो पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से भी लगातार संपर्क में थे। BRS और AIMIM के कई नेताओं को भी इस रणनीति के तहत कॉन्ग्रेस में लाया गया। कर्नाटक के कई अन्य मुस्लिम नेताओं को भी तेलंगाना में लगाया गया था।

यही सब कारण रहे कि ग्रेटर हैदराबाद को छोड़ दें तो तेलंगाना के लगभग हर जिले में मुस्लिम वोट कॉन्ग्रेस को मिले। हैदराबाद के गोशामहल जहाँ से फायरब्रांड हिन्दू नेता राजा सिंह जीतते रहे हैं, वहाँ से ओवैसी ने कोई प्रत्याशी नहीं उतारा। वहीं जुबली हील्स क्षेत्र में BRS प्रत्याशी के रहते हुए कॉन्ग्रेस उम्मीदवार अज़हरुद्दीन के सामने अपना प्रतयषी उतारा। नतीजा ये हुआ कि यहाँ से कॉन्ग्रेस को हार मिली। हालाँकि, कॉन्ग्रेस ने इसे इस तरह से प्रचारित किया था कि मुस्लिम वोटों को जानबूझकर विभाजित किया जा रहा है।

इसीलिए, ये कहा जा सकता है कि असदुद्दीन ओवैसी ने अपने हैदराबाद का गढ़ तो जैसे-तैसे बचा लिया लेकिन बाकी के तेलंगाना में वो अपने मित्र KCR को मुस्लिम वोट ट्रांसफर नहीं करा सके। तभी ज़मीर अहमद खान ने भी कहा कि कॉन्ग्रेस की गारंटी योजनाओं के अलावा 49 सीटों के लिए ‘मुस्लिम थिंक टैंक’ के साथ मिल कर चुनावी रणनीति बनाने की प्रक्रिया सफल रही। उन्होंने मुस्लिम समुदाय के नेताओं के साथ बैठकों को भी जीत का श्रेय दिया।

‘जन की बात’ के संस्थापक प्रदीप भंडारी भी मानते हैं कि मुस्लिम वोट कॉन्ग्रेस को मजबूत करने के लिए उसकी तरफ गया है। उन्होंने विधानसभा चुनावों में तेलंगाना के लिए सटीक आकलन किया था। ‘जन की बात’ के आकलन का कहना था कि वहाँ कॉन्ग्रेस को 48-64 सीटें मिल सकती हैं, वहीं BRS 40-55 सीटों के बीच रहेगी, और भाजपा की सीटों की 13 रहेगी। उनका आकलन सटीक रहा और BRS को उनके आकलन से सिर्फ 1 सीट कम मिली।

‘जो मोदी के खिलाफ मजबूत होगा, उसके खिलाफ गोलबंद होगा मुस्लिम वोट’: प्रदीप भंडारी

प्रदीप भंडारी से ऑपइंडिया ने तेलंगाना में मुस्लिम वोटरों के रुख को लेकर बात की। उन्होंने कहा कि मुस्लिम वोटों के मुख्य मकसद है कि उसे भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को रोकना है, उसकी हमेशा से पहली प्राथमिकता कॉन्ग्रेस पार्टी होती है। उन्होंने कहा कि जब भी मुस्लिम मतदाता देखते हैं कि कॉन्ग्रेस मजबूत हो सकती है तो वो उस तरफ शिफ्ट होते हैं। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे कर्नाटक में कॉन्ग्रेस की सरकार बनने के बाद पार्टी ने ये माहौल बनाने की कोशिश की कि 2024 में नरेंद्र मोदी को हराया जा सकता है।

प्रदीप भंडारी मानते हैं कि इसी कारन मुस्लिम वोटरों को लगा कि ‘उनकी कॉन्ग्रेस’ बहुत अच्छे तरीके से चुनाव लड़ रही है, तो ऐसी स्थिति में अधिकतर मुस्लिम वोटर BRS से कॉन्ग्रेस की तरफ शिफ्ट हुए। उन्होंने राजस्थान का जिक्र करते हुए कहा कि कन्हैया लाल तेली के ‘सर तन से जुदा’ की इस्लामी कट्टरपंथियों ने हत्या कर दी तो उन्हें मिले मुआवजे में देरी हुई, जबकि जयपुर में एक आपसी संघर्ष में मुस्लिम युवक की मौत हुई तो कलक्टर ने रातोंरात 50 लाख रुपए दे दिए। इसीलिए, मुस्लिमों को पता है कि उनकी पहली प्राथमिकता कॉन्ग्रेस है और वो इसीलिए ‘घर-वापसी’ करना चाहता है।

बता दें कि राजस्थान में जब ये सब हुआ तब वहाँ मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस पार्टी की सरकार थी। उन्होंने आँकड़ों का जिक्र करते हुए कहा कि जहाँ मुस्लिम वोटर ज़्यादा हैं, यानी 30% के आसपास हैं वहाँ राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा जीती है। उन्होंने कहा कि पहले कॉन्ग्रेस को लगता था कि जिस सीट पर मुस्लिम ज़्यादा हैं वहाँ वो केवल उनकी ही बातें कर के चुनाव जीत जाएगी, लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा। अब तुष्टिकरण के खिलाफ लोग एकजुट हो रहे हैं।

प्रदीप भंडारी ने इस दौरान तमिलनाडु के मंत्री उदयनिधि स्टालिन के बयान का भी जिक्र किया, जिसमें उन्होंने सनातन धर्म को डेंगू-मलेरिया बता कर इसे खत्म करने की बात की थी। ‘जन की बात’ के संस्थापक ने कहा कि जानबूझकर कॉन्ग्रेस पार्टी ने इस बयान की निंदा नहीं की, जिसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ा। उन्होंने बताया कि मध्य प्रदेश की 35 सीटें जहाँ मुस्लिम वोट प्रभावी है वहाँ भाजपा की जीत हुई। छत्तीसगढ़ की 12 ऐसी सीटों में से भी अधिकतर भाजपा के खाते में गईं।

प्रदीप भंडारी ने कहा कि मुस्लिम वोट सिर्फ कॉन्ग्रेस के पीछे ही गोलबंद नहीं होगा, बल्कि अगर वो पश्चिम बंगाल में देखता है कि ममता बनर्जी की TMC मजबूत है तो वो उसके पीछे गोलबंद होगा। वहीं तेलंगाना में कॉन्ग्रेस मजबूत है तो उसके पीछे ये वोट गोलबंद हुआ। प्रदीप भंडारी इसमें एक और चीज ध्यान देने लायक बताते हैं – हिंदी हार्टलैंड के जो नतीजे आए हैं उसके बाद मुस्लिम वोटरों में एक हताशा आ गई है कि वो पूरी कोशिश कर के भी नरेंद्र मोदी को नहीं रोक पा रहे।

प्रदीप भंडारी आगे कहते हैं, “मुस्लिम वोटर हर उस पार्टी के खिलाफ गोलबंद होगा जो उसके हिसाब से 2024 में नरेंद्र मोदी को हरा सकती हो। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी या फिर दक्षिण भारत में कॉन्ग्रेस पार्टी, लेकिन वो तमिलनाडु में DMK के पीछे गोलबंद होगा। बंगाल और बिहार में वो कॉन्ग्रेस के पीछे नहीं जाएगा।” यानी, उनका साफ़ मानना है कि कॉन्ग्रेस मुस्लिमों की पहली पसंद होगी, लेकिन जहाँ क्षेत्रीय ताकतें भाजपा के खिलाफ मजबूती से लड़ रही हों वहाँ उनके साथ ये वोटर जाएँगे।