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‘पंजाब में AAP से गठबंधन डेथ वारंट पर साइन करना है’: खैरा की गिरफ्तारी के बाद पंजाब की मान सरकार पर भड़की कॉन्ग्रेस, I.N.D.I. गठबंधन में फूट के आसार

आम चुनाव 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को रोकने के लिए बनाए गए I.N.D.I. गठबंधन की पंजाब में दुर्गति हो रही है। पंजाब कॉन्ग्रेस के नेता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा ने कहा है कि 2024 के आम चुनावों में पंजाब में आम आदमी पार्टी (AAP) के साथ गठबंधन ‘डेथ वारंट’ जैसा होगा।

पंजाब में आम आदमी पार्टी सत्ता में है और कॉन्ग्रेस मुख्य विपक्षी दल है। दोनों पार्टियाँ केंद्र में एक साथ I.N.D.I. गठबंधन में काम कर रही हैं, लेकिन पंजाब में आपसी लड़ाई चरम पर है। इससे पहले भी दोनों पार्टियों के काई नेता इस बात को स्पष्ट कर चुके हैं कि वह गठबंधन नहीं चाहते।

दोनों पार्टियों के बीच की लड़ाई कॉन्ग्रेस विधायक सुखपाल सिंह खैरा की गिरफ्तारी के बाद चरम पर पहुँच गई है। खैरा को एक पुराने मामले में पंजाब पुलिस ने गिरफ्तार करके जेल भेज दिया है। यह मामला ड्रग्स की बरामदगी से जुड़ा हुआ है।

प्रताप सिंह बाजवा ने NEWS18 को दिए एक इंटरव्यू में कहा है, “साल 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए पंजाब में AAP से गठबंधन कॉन्ग्रेस के डेथ वारंट जैसा होगा और हम कॉन्ग्रेस को ध्वस्त नहीं होने देना चाहते।” बाजवा ने आम आदमी पार्टी की सरकार गिराने की भी बात की है।

उन्होंने कहा, “अगर हमें लोकसभा चुनावों में पंजाब से 10-11 सीटें मिल गईं (पंजाब में कुल 13 लोकसभा सीटें हैं) तो हम भगवंत मान की सरकार गिरा सकते हैं। आम आदमी पार्टी के कई विधायक हमारे सम्पर्क में हैं। हमें जब भी मौक़ा मिलेगा, हम सरकार गिरा देंगे। अगर उनके अधिकांश विधायक उनके साथ ना रह कर हमारे साथ आना चाहते हैं तो मैं क्या कर सकता हूँ? एक विफल शादी को कौन बचा सकता है?”

खैरा वाले मामले पर बाजवा ने कहा कि भगवंत मान ने 2017 में उनको क्यों टिकट दिया, जबकि उनके ऊपर मुकदमा चल रहा था। एक वर्ष बाद अरविन्द केजरीवाल ने उन्हें नेता प्रतिपक्ष बना दिया। मान ने ही पहले कहा है कि सुखपाल खैरा के ऊपर यह मामला राजनीतिक बदले का है। खैरा को सुप्रीम कोर्ट से भी एक तरह की क्लीन चिट मिल चुकी है।

बाजवा ने कहा कि पार्टी के कार्यकर्ता, जिलाध्यक्ष और विधायक कोई भी आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन नहीं चाहता है। कॉन्ग्रेस और आम आदमी पाीर्टी, एक दूसरे के खिलाफ एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं। ऐसे में AAP के साथ कॉन्ग्रेस मंच कैसे साझा कर सकती है।

बाजवा ने आम आदमी पार्टी की सरकार को पंजाब का सबसे बड़ा लुटेरा बताया है। उन्होंने कहा कि जितनी जल्दी ये सरकार चली जाएगी, उतना ही अच्छा होगा। उन्होंने भगवंत मान की सरकार पर तंज कसते हुए कहा, “हर शाख पर उल्लू बैठा है, अंजाम ए गुलिस्तां क्या होगा।”

इससे पहले पंजाब में आम आदमी पार्टी के भीतर से भी कॉन्ग्रेस के साथ गठबंधन ना करने के स्वर उठ चुके हैं। आम आदमी पार्टी सरकार में मंत्री अनमोल गगन मान ने कुछ दिन पहले बयान देकर स्पष्ट किया था कि राज्य में कॉन्ग्रेस के साथ कोई समझौता नहीं होगा।

पंजाब में हो रही कॉन्ग्रेस और आम आदमी पार्टी की इस लड़ाई ने I.N.D.I. गठबंधन के भविष्य पर भी प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए हैं। कॉन्ग्रेस नेता अलका लाम्बा भी कह चुकी हैं कि दिल्ली में लोकसभा चुनावों के लिए कॉन्ग्रेस सभी सात सीटों पर तैयारी करेगी।

पंजाब और दिल्ली के अलावा केरल में भी कॉन्ग्रेस के सामने यही स्थिति है। केरल में कॉन्ग्रेस विपक्ष में है और वामपंथियों के पास सत्ता है। दोनों दल I.N.D.I. गठबंधन में सहयोगी हैं। पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी यही स्थितियां बन रही हैं।

नूहं में है इस पाकिस्तानी खिलाड़ी का ससुराल, वर्ल्ड कप में नातिन को गोद में लेने के लिए बेताब हैं लियाकत अली: इंजीनियर बेटी ने तेज़ गेंदबाज हसन अली से किया था निकाह

हरियाणा के नूहं जिले में रिटायर्ड BDO (खंड विकास अधिकारी) 63 वर्षीय लियाकत खान इसी माह 14 अक्टूबर को अहमदाबाद में होने वाले भारत पाकिस्तान-मैच को ले कर बेहद उत्साहित है। इस उत्साह की वजह सिर्फ क्रिकेट ही नहीं है, बल्कि इस दिन उन्हें अपनी नातिन को गोद में लेने का मौका मिलेगा। लियाकत की बेटी सामिया ने पाकिस्तान के तेज गेंदबाज़ हसन अली से साल 2019 में निकाह किया था। इस निकाह के कार्यक्रम दुबई में सम्पन्न हुए थे।

‘इंडियन एक्सप्रेस’ के मुताबिक, लियाकत खान की बेटी सामिया दुबई में रह कर एमिरेट्स एयरलाइन में फ्लाइट इंजीनियर के तौर पर काम करती थी। यहीं पर उनकी मुलाकात पाकिस्तानी क्रिकेटर हसन अली से हुई थी। दोनों में कुछ समय की दोस्ती प्यार में बदल गई और आखिरकार दोनों ने एक दूसरे से निकाह करने का फैसला किया। सामिया ने अपने अब्बा लियाकत से निकाह की अनुमति माँगी। लियाकत ने भी अपनी रजामंदी दे दी। साल 2019 में सामिया और हसन अली का निकाह दुबई में ही हुआ।

लियाकत खान नूहं जिले के गाँव चंदेनी के रहने वाले हैं। बँटवारे के समय उनके परिवार के कुछ लोग पाकिस्तान चले गए थे। भारत-पाकिस्तान के तनावपूर्ण संबंधों के बीच हो रहे क्रिकेट के बीच लियाकत के परिवार को भी आशंका थी कि शायद वो अपनी बेटी और पोती से न मिल पाएँ। 2021 में जब उनकी बेटी गर्भवती थी तब लियाकत की बीवी पाकिस्तान गईं थी। बाद में सामिया ने एक बेटी को जन्म दिया था। अब 2 साल बाद लियाकत और उनका परिवार उम्मीद जता रहा है कि वो अपनी नातिन से अहमदाबाद में मिल पाएँगे।

लियाकत उस दिन की प्रतीक्षा कर रहे हैं जब भारत और पाकिस्तान का मैच दिल्ली में हो और उसमें हसन अली खेल रहे हों। उनको उम्मीद है कि तब उनकी बेटी, नातिन और दामाद उनके गाँव जा कर रहेंगे। क्रिकेट के मुद्दे पर बोलते हुए लियाकत खान ने खुद को विराट कोहली और राहुल द्रविड़ का प्रशंसक बताया। हसन अली से निकाह करना लियाकत अपनी बेटी की इच्छा मानते हैं। उनका मानना है कि उनकी बेटी सही फैसले ले सकती है।

लियाकत ने बताया कि वो हर दिन भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध सुधरने की दुआ करते हैं। बताते चलें कि इस सीरीज में पाकिस्तानी खिलाड़ी हसन अली का नाम पहले टीम में शामिल नहीं किया गया था। पिछले माह एशिया कप के दौरान नसीम शाह को चोट लगने के चलते अंतिम समय में हसन अली को मौका दिया गया है।

चीन के ‘गुलाम’ पत्रकारों पर UAPA, उर्मिलेश और प्रांजय गुहा को उठाकर ले जाती दिखी दिल्ली पुलिस: अभिसार शर्मा की गिरफ्तारी के भी सोशल मीडिया में दावे

चीन के पैसे पर प्रोपेगेंडा करने वाले पोर्टल न्यूज क्लिक (NewsClick) के पत्रकारों पर दिल्ली पुलिस ने UAPA के तहत मामला दर्ज किया है। 3 अक्टूबर 2023 की सुबह दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने इन पत्रकारों से जुड़े दिल्ली, नोएडा और गाजियाबाद में 30 ठिकानों पर छापेमारी की।

इनमें से कई पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने की भी चर्चा है। उर्मिलेश और प्रांजय गुहा ठाकुरता को लेकर जा रही दिल्ली पुलिस के वीडियो सामने आए हैं। उर्मिलेश के वकील गौरव यादव ने न्यूज एजेंसी एएनआई को बताया है, “उर्मिलेश की गिरफ्तारी के बारे में मुझे उनकी पत्नी ने बताया है। इसके अलावा फिलहाल मेरे पास और जानकारी नहीं है।”

सोशल मीडिया में न्यूज एंकर से यूट्यूबर बने अभिसार शर्मा को गिरफ्तार करने की भी चर्चा है। लेकिन एएनआई ने दिल्ली पुलिस के सूत्रों के हवाले से बताया है कि फिलहाल किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है। छापेमारी को लेकर दिल्ली पुलिस की तरफ से आधिकारिक तौर पर विवरण साझा नहीं किया गया है। लेकिन अभिसार शर्मा ने एक्स/ट्विटर पर पोस्ट कर बताया है, “दिल्ली पुलिस मेरे घर पहुँची। मेरा लैपटॉप और फोन ले लिया।”

सामने आ रही जानकारियों के अनुसार न्यूज क्लिक से जुड़े संजय राजौरा, भाषा सिंह, उर्मिलेश, प्रबीर पुरकायस्थ, अनिंदो चकवर्ती और सोहेल हाशमी के ठिकानों पर भी रेड पड़ी है। पत्रकार नेहा दीक्षित ने इनके नाम लेते हुए एक्स पर पोस्ट कर कहा है कि इनके फोन और लैपटॉप पुलिस ने अपने कब्जे में लिया है। कुछ को थाने भी ले जाया गया है।

अमेरिकी अखबार ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ में अगस्त 2023 में प्रकाशित एक लेख में न्यूजक्लिक और चीन के बीच संबंधों के बारे में बताया था। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने लोकसभा में भी यह मामला उठाया था। इस दौरान उन्होंने न्यूयार्क टाइम्स की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा था कि न्यूज क्लिक को विदेशी फंडिंग से 38 करोड़ रुपए मिले थे, जिसे उसने कुछ पत्रकारों में बाँट दिया था।

अगस्त में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने मनी लॉन्ड्रिंग केस की जाँच में न्यूज क्लिक के चीफ एडिटर प्रबीर पुरकायस्थ के दिल्ली वाले फ्लैट को अटैच कर दिया था। ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ के अनुसार, “यह बहुत कम लोगों को पता है कि गैर-लाभकारी संगठनों और शैल कंपनियों की आड़ में नेविल रॉय सिंघम चीन के सरकारी मीडिया के साथ मिलकर काम करता है और चीन के प्रोपेगेंडा को दुनिया भर में फैलाने के लिए फंडिंग कर रहा है।”

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 9 फरवरी 2021 को न्यूजक्लिक के संस्थापक और एडिटर-इन-चीफ प्रबीर पुरकायस्थ के घर पर छापा मारा था। ईडी के सूत्रों के अनुसार, न्यूज़क्लिक को एक अमेरिकी कंपनी से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के तहत 10 करोड़ रुपए मिले थे।

सनातन एकमात्र धर्म, इस पर हमला हुआ तो विनाश होगा: गोरखनाथ मंदिर से CM योगी आदित्यनाथ ने हिंदू विरोधियों को पढ़ाया पाठ

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि सनातन एकमात्र धर्म है। बाकी सब संप्रदाय और उपासना पद्धति हैं। उन्होंने कहा है कि यदि सनातन पर हमला हुआ तो यह विनाशकारी होगा और पूरी दुनिया में मानवता के लिए संकट पैदा हो जाएगा।

उन्होंने सोमवार (2 अक्टूबर 2023) को यह बात गोरखुपर के गोरखनाथ मंदिर में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कही। यह कार्यक्रम ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की 54वीं और ब्रह्मलीन महंत अवैद्यनाथ की 9वीं पुण्यतिथि पर आयोजित किया गया था।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने हिंदू विरोधियों को यह पाठ ऐसे समय में पढ़ाया है जब विपक्षी नेता लगातार सनातन को निशाना बना रहे हैं। इनमें तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के मंत्री बेटे उदयानिधि स्टालिन भी शामिल हैं। स्टालिन ने सनातन की तुलना डेंगू और मलेरिया से की थी और कहा था कि इसे खत्म करना होगा। इसको लेकर उन्हें सुप्रीम कोर्ट ने भी नोटिस जारी किया था।

गोरखनाथ मंदिर में ‘श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ’ कार्यक्रम के समापन को संबोधित करते हुए सीएम योगी आदित्यनाथ कहा कि भागवत की विराटता का दर्शन संकुचित सोच वाले नहीं कर सकते। इसके सार को समझने के लिए विचारों में संकीर्णता नहीं होनी चाहिए।

महंत दिग्विजयनाथ को स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने ही वर्ष 1949 में श्रीराम जन्मभूमि पर रामलला के प्रकटीकरण के माध्यम से तत्कालीन सरकार की कुत्सित मंशाओं को विफल कर दिया था। वह वर्ष 1920 से लेकर 1970 तक के राष्ट्र जागरण और हिन्दू समाज से जुड़े सभी आंदोलनों में हिस्सा लेते रहे।

मुख्यमंत्री योगी ने बताया कि महंत दिग्विजयनाथ राजस्थान के राणा समुदाय से थे। उन्होंने देश के सम्मान के लिए अपना पूरा जीवन लगा दिया। उन्होंने युवाओं में शिक्षा का प्रसार करने के लिए गोरखपुर में महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद की स्थापना की थी। उन्होंने विश्वविद्यालय की भी स्थापना की।

अभिसार शर्मा, उर्मिलेश, भाषा सिंह… चीन के पैसे पर प्रोपेगेंडा ठेलने वाले NewsClick से जुड़े पत्रकारों के ठिकानों पर दिल्ली पुलिस की रेड

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने मंगलवार (3 अक्टूबर 2023) की सुबह न्यूज क्लिक (NewsClick) से जुड़े कई कथित पत्रकारों के ठिकानों पर दबिश दी। जानकारी के मुताबिक छापेमारी दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद में करीब 30 ठिकानों पर हुई है। न्यूज क्लिक वही प्रोपेगेंडा पोर्टल है, जिसे चीन से करोड़ों की फंडिंग मिल चुकी है।

छापेमारी को लेकर दिल्ली पुलिस की तरफ से खबर लिखे जाने तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया था। जिन लोगों के ठिकानों पर छापेमारी पड़ने की सूचना है उनमें एक न्यूज एंकर से यूट्यूबर बना अभिसार शर्मा भी है। उसने एक्स/ट्विटर पर पोस्ट कर खुद इसकी जानकारी दी है। उसने लिखा है, “दिल्ली पुलिस मेरे घर पहुँची। मेरा लैपटॉप और फोन ले लिया।”

सामने आ रही जानकारियों के अनुसार न्यूज क्लिक से जुड़े कई अन्य लोगों के ठिकानों पर भी रेड पड़ी है। इनमें संजय राजौरा, भाषा सिंह, उर्मिलेश, प्रबीर पुरकायस्थ, अनिंदो चकवर्ती और सोहेल हाशमी भी शामिल हैं। पत्रकार नेहा दीक्षित ने इनके नाम लेते हुए एक्स पर पोस्ट कर कहा है कि इनके फोन और लैपटॉप पुलिस ने अपने कब्जे में लिया है। कुछ को थाने भी ले जाया गया है।

अमेरिकी अखबार ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ में अगस्त 2023 में प्रकाशित एक लेख में न्यूजक्लिक और चीन के बीच संबंधों के बारे में बताया था। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने लोकसभा में भी यह मामला उठाया था। इस दौरान उन्होंने न्यूयार्क टाइम्स की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा था कि न्यूज क्लिक को विदेशी फंडिंग से 38 करोड़ रुपए मिले थे, जिसे उसने कुछ पत्रकारों में बाँट दिया था।

अगस्त में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने मनी लॉन्ड्रिंग केस की जाँच में न्यूज क्लिक के चीफ एडिटर प्रबीर पुरकायस्थ के दिल्ली वाले फ्लैट को अटैच कर दिया था। ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ के अनुसार, “यह बहुत कम लोगों को पता है कि गैर-लाभकारी संगठनों और शैल कंपनियों की आड़ में नेविल रॉय सिंघम चीन के सरकारी मीडिया के साथ मिलकर काम करता है और चीन के प्रोपेगेंडा को दुनिया भर में फैलाने के लिए फंडिंग कर रहा है।”

‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने लेख में कहा है कि नेविल रॉय सिंघम भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देशों में प्रगतिशील होने की वकालत करने के बहाने चीनी सरकार के मुद्दों को लोगों के बीच फैलाने में कामयाब रहा है। नई दिल्ली स्थित कॉर्पोरेट फाइलिंग से भी पता चलता है कि नेविल रॉय सिंघम के नेटवर्क ने प्रोपेगेंडा पोर्टल न्यूज़क्लिक को फंडिंग की थी। इसके तहत न्यूजक्लिक ने अपनी कवरेज को चीनी सरकार के मुद्दों से जोड़ते हुए एक वीडियो में कहा था, “चीन का इतिहास श्रमिक वर्गों को प्रेरित करता रहा है।”

ईडी ने भी किया था खुलासा

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 9 फरवरी 2021 को न्यूजक्लिक के संस्थापक और एडिटर-इन-चीफ प्रबीर पुरकायस्थ के घर पर छापा मारा था। ईडी के सूत्रों के अनुसार, न्यूज़क्लिक को एक अमेरिकी कंपनी से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के तहत 10 करोड़ रुपए मिले थे।

दिलचस्प बात यह है कि पुरकायस्थ को इस बात का पता ही नहीं था कि अमेरिकी कंपनी ने उनकी कंपनी के खाते में पैसा क्यों ट्रांसफर किया। वास्तव में, अमेरिकी कंपनी से मिले फंड के बदले उन्होंने क्या काम किया था वह उस बारे में कोई सबूत नहीं दे पाए थे।

आगे की जाँच में पता चला कि अमेरिका स्थित एक अन्य कंपनी ने न्यूज़क्लिक को 20 करोड़ रुपए दिए और इसे ‘एक्स्पोर्ट रेमिटेंस’ के रूप में बताया गया था। यह फंड इसलिए ट्रांसफर किया गया था क्योंकि न्यूजक्लिक ने पीपल्स डिस्पैच नामक पोर्टल पर कंटेंट अपलोड किया था।

सूत्रों से यह भी पता चला था कि न्यूजक्लिक के संस्थापक पुरकायस्थ ने रखरखाव के नाम पर 1.5 करोड़ रुपए भी लिए थे। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने अपने कार्यालय में रखरखाव के लिए 9वीं कक्षा पास इलेक्ट्रीशियन को काम पर रखा था। यही नहीं उन्होंने जो पैसा लिया था वह बिना किसी कागजी कार्यवाही के उन्हें मिला था। ऐसे में वह इस लेन-देन के बारे में ED को कुछ भी नहीं बता पाए थे।

जुलाई 2021 में, ED ने बताया था कि ‘न्यूज़क्लिक’ के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जाँच से पता चला है कि इसके प्रमोटरों को करीब 38 करोड़ रुपए प्राप्त हुए थे। इस फंडिंग के चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े होने का संदेह है। मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जाँच कर रहे एक अधिकारी ने खुलासा किया था कि ‘न्यूज़क्लिक’ का नेविल रॉय सिंघम नामक श्रीलंकाई-क्यूबा स्थित व्यवसायी के साथ वित्तीय लेनदेन था।

सिंघम ने ही कथित तौर पर विदेश से 2018 से 2021 के बीच ‘पीपीके न्यूज़क्लिक स्टूडियो प्राइवेट लिमिटेड’ को 38 करोड़ रुपए दिए थे। ‘न्यूजक्लिक’ को मिले पैसों की जाँच करने वाले अधिकारियों का कहना है कि नेविल रॉय सिंघम कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (CCP) के प्रोपेगेंडा फैलाने वाली शाखा के लिए काम करता है।

पिछड़ा वर्ग में मुस्लिमों को घुसाया, अब ‘छीनने’ और ‘कब्जा हटाने’ की धमकियाँ: बिहार की जातिगत जनगणना के पीछे हिन्दुओं को बाँटने की राजनीति, फूँके सैकड़ों करोड़

बिहार में जाति आधारित जनगणना के आँकड़े जारी किए जा चुके हैं। बिहार की 2 प्रमुख सत्ताधारी दलों राजद और जदयू के समर्थकों में जश्न का माहौल है। ऐसा प्रदर्शित किया जा रहा है जैसे राज्य सरकार ने किसी बहुत बड़ी जन-कल्याणकारी योजना को पूरा कर के दिखा दिया हो। बिहार सरकार ने जो आँकड़े जारी किए है, उसकी मानें तो राज्य में 36.01% जनसंख्या अत्यंत पिछड़ा वर्ग की है। वहीं 27.12% जनसंख्या पिछड़ा वर्ग की है। अनारक्षित या सामान्य वर्ग के लोगों की जनसंख्या 15.52% बताई गई है।

यहाँ ये ध्यान रखिए कि ‘अत्यंत पिछड़ा वर्ग’ का मतलब बिहार में 130 जातियों और उप-जातियों वाले EBC समुदाय से है, जो लंबे समय से नीतीश कुमार के एजेंडे में रहा है। उन्होंने गैर-यादव पिछड़ी जातियों की गोलबंदी तैयार करने के उद्देश्य से इसे अलग से वर्गीकृत किया था। इसमें यादव और कुर्मी जैसी OBC जातियाँ शामिल नहीं हैं। तो क्या अब EBC और OBC नामक 2 गुट बन जाएँगे और गोलबंदी अलग-अलग होगी इनकी? इन सवालों का जवाब भविष्य देगा, लेकिन अब OBC में भी ज़्यादा प्रभाव वाली जातियों के खिलाफ अलग-अलग जातियों के संयुक्त मोर्चे बनने लगेंगे। पहले भी ऐसे प्रयोग हुए हैं, ये अब और तेज़ हो सकता है।

इस तरह बिहार में OBC और EBC को मिला दें तो ये 63% बैठता है। इस ‘Caste Census’ रिपोर्ट में कुल 203 जातियों का जिक्र किया गया है। इनमें से 196 जातियाँ ऐसी हैं जिन्हें आरक्षण मिल रहा है। बिहार की नौकरियों में अब तक EBC को 18%, SC को 16%, BC को 12% और EWS को 10% आरक्षण मिलता रहा है। EWS छोड़ कर बाकी आरक्षित वर्ग में महिलाओं को 3% आरक्षण है। वहीं 1% सीटें ST समाज के लिए आरक्षित होती हैं।

बिहार की इस जाति आधारित जनगणना के बारे में एक और बड़ी बात जान लीजिए कि मुस्लिम समाज को भी सामान्य वर्ग, EBC और BC में बाँटा गया है। जैसे – सैयद, शेख और पठान (खान) सामान्य वर्ग में रखे गए हैं। मदारिया, नालबंद, सुरजापुरी और मलिक मुस्लिमों को BC में रखा गया है। वहीं लगभग 31 मुस्लिम जातियाँ EBC में हैं। मुस्लिमों की कुल जनसंख्या का 10% EBC है। अब देखना ये होगा कि आरक्षण से लेकर आने वाली योजनाओं में इन मुस्लिमों को किस तरह से फायदा पहुँचाया जाता है।

बिहार: जाति आधारित जनगणना के क्या हैं आँकड़े

जातिगत जनगणना के आँकड़ों पर नज़र डालें तो बिहार में अनुसूचित जाति (SC) की जनसंख्या 19.65% और अनुसूचित जनजाति (ST) की जनसंख्या 01.68% है। इस जनगणना में बिहार की कुल जनसंख्या 13.07 करोड़ पाई गई है, जिनमें से 6.41 करोड़ पुरुष हैं। महिलाएँ पुरुषों के मुकाबले 30 लाख कम हैं। राज्य में प्रति 1000 पुरुष पर 953 महिलाएँ हैं। कुल 2.83 करोड़ परिवार हैं, जो 215 जातियों एवं उप-जातियों में विभाजित हैं। 1971 में इससे पहले जातिगत जनगणना कराई गई थी, उस हिसाब से देखें तो सवर्णों की जनसंख्या में कमी आई है।

बिहार सरकार की तरफ से आँकड़े जारी करते हुए विकास आयुक्त विवेक कुमार सिंह ने बताया है कि आगे की योजनाओं में ‘सभी वर्गों के संतुलित विकास’ के लिए इन आँकड़ों का ध्यान रखा जाएगा। इन आँकड़ों में ये भी बताया गया है कि अन्य राज्यों के 53.72 लोग बिहार में अस्थायी रूप से रह रहे हैं। कुछ आँकड़े ऐसे भी हैं, जिन्हें गोपनीय बताते हुए सरकार ने प्रकाशित करने से इनकार कर दिया है। बड़ी बात ये है कि सरकार ने पिछड़ों और अत्यंत पिछड़ों के अलावा सवर्णों में भी मुस्लिमों के विभिन्न समूहों को रखा है।

बिहार सरकार ने जो जाति आधारित जनगणना के आँकड़े सार्वजनिक किए हैं, उनके हिसाब से राज्य में हिन्दुओं की जनसंख्या जहाँ 81.99% है, वहीं मुस्लिम 17.70% हो चुके हैं। बाकी सभी मजहबों की जनसंख्या 0.1% प्रतिशत भी नहीं है। इन आँकड़ों के सामने आने से नीति निर्धारण में क्या मदद मिलेगी, योजनाओं की रूपरेखा किस तरह से बदल जाएगी और गरीबों का क्या फायदा होगा – इस संबंध में स्पष्ट रूप से कुछ भी नहीं कहा गया है।

आइए, एक बार बिहार में जातियों की जनसंख्या भी देख लेते हैं। राज्य में यादव 14.26%, रविदास 5.2%, कोइरी 4.2%, ब्राह्मण 3.65%, राजपूत 3.45%, मुसहर 3.08%, भूमिहार 2.86%, कुर्मी 2.80%, मल्लाह 2.60%, बनिया 2.31% और कायस्थ 0.60% बताए गए हैं। संविधान निर्माताओं और देश की पहली कैबिनेट ने जाति आधारित जनगणना न कराने का निर्णय लिया था, क्योंकि इससे समाज में विभाजन पैदा होगा। आज बात-बात में संविधान का रट्टा मारने वालों ने ही ये जनगणना कराई है।

जैसा कि आप देख सकते हैं, बिहार की सत्ताधारी पार्टी RJD ने भी इस बात की पुष्टि की है कि इस आँकड़े में सभी धर्मों के सामान्य, पिछड़ा और अति पिछड़ा वर्ग हैं। यानी, सिर्फ मुस्लिम ही नहीं बल्कि ईसाइयों और बौद्धों को भी सामान्य, BC और EBC में एडजस्ट किया गया है। पार्टी ने बताया कि अति पिछड़ा वर्ग की आबादी में 10.60% मुस्लिम हैं। इन मजहबों को कैटेगरी असाइन करने का पैमाना क्या था, ये साफ़ नहीं किया जा रहा है।

एक पिछड़े और गरीब राज्य में जाति जनगणना प्राथमिकता

लेकिन, इतना ज़रूर साफ़ हो गया है कि इन आँकड़ों का इस्तेमाल आगे की राजनीति में भरपूर तरीके से किया जाना है। सबसे बड़ी बात कि एक पिछड़े राज्य में सिर्फ जिद के लिए जाति आधारित जनगणना कराने के लिए पूरी की पूरी सरकारी मशीनरी को काम पर लगा दिया गया। कई अधिकारियों को अलग-अलग जिम्मेदारी दी गई थी। इसके लिए 2.34 लाख जनगणना करने वाले कर्मचारियों और 40,726 पर्यवेक्षकों की नियुक्ति की गई थी। अगर आप समझ रहे हैं कि इसके लिए अलग अस्थायी भर्तियाँ निकाली गई थीं, तो आप गलत हैं।

इसकी जिम्मेदारी उन शिक्षकों को दी गई थी, जिनका काम है बच्चों को पढ़ाना और देश-समाज के लिए एक बेहतर भविष्य तैयार करना। लेकिन, इन शिक्षकों को लोगों की जाति पूछने के लिए लगा दिया गया। जिला और अनुमंडल स्तर के अधिकारियों को जिम्मेदारियाँ दी गईं। इसके लिए 500 करोड़ रुपए से ज़्यादा फूँक दिए गए। वो भी ऐसे राज्य में, जो GST कलेक्शन के मामले में निचले पायदान पर है। यही नहीं, बिहार एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ GST कलेक्शन ग्रोथ के मामले में नेगेटिव में है।

सितंबर 2023 के जीएसटी कलेक्शन के आँकड़ों की बात करें तो ये देश के 1.62 लाख करोड़ रुपए रहा। अधिकतर राज्यों में पिछले साल के मुकाबले दो अंकों में उछाल प्रतिशत देखा गया, जबकि बिहार में ये -5% घट ही गया। ये बताता है कि राज्य विकास के मामले में पीछे छूट रहा है। इस पर काम करने की बजाए वहाँ की राजद-जदयू गठबंधन सरकार ने जातिगत जनगणना को प्राथमिकता दी। जिस राज्य के नेता खुले रूप में नहीं चाहते हैं कि विकास हों, उनमें विकास को लेकर कोई गंभीरता दिखती ही नहीं, अब उनकी प्राथमिकताएँ भी स्पष्ट नज़र आने लगी हैं।

जाति आधारित पार्टियों का उभार और जातिवादी मानसिकता

अब बात करते हैं कि ये जाति आधारित जनगणना वाली मानसिकता कहाँ से आई। असल में इसकी शुरुआत तभी हो गई थी जब भारत में जाति के आधार पर क्षेत्रीय दल बनने लगे। राजद और सपा – इन दोनों दलों को ही ले लीजिए। नब्बे के दशक में स्थापित इन दोनों ही दलों ने यादव जाति को अपना वोट बैंक बनाया। इसी तरह नब्बे के दशक में ही बनी RLD ने जाट समाज को अपना वोट बैंक बनाया। आज तो ऐसी कई पार्टियाँ खड़ी हो गई हैं।

बिहार की ही बात करें तो कोइरी वोटरों को साधने के लिए उपेंद्र कुशवाहा कई बार नई पार्टी बना चुके हैं। मुकेश साहनी खुद को ‘सन ऑफ मल्लाह’ बोल कर निषाद समाज पर डोरे डालते हैं। खुद नीतीश कुमार की राजनीति में बड़ा मोड़ तब आया था जब वो ‘कुर्मी चेतना रैली’ में पहुँचे थे। रामविलास पासवान ने एक बड़े पासवान वर्ग के वोटरों को अपनी पार्टी लोजपा के साथ जोड़े रखा। यूपी की ही बात करें तो जहाँ SVSP राजभर समाज पर दावा ठोकती है, वहीं ‘अपना दल’ कुर्मी वोटरों को अपने पाले में रखने पर ध्यान केंद्रित रखता है। इसके अब 2 टुकड़े हो चुके हैं।

यूपी की बसपा को हम कैसे भूल सकते हैं, जिसने जाटव समाज को अपना प्रमुख वोट बैंक बनाया और बाद में अन्य दलितों को जोड़ा। इसी तरह संजय निषाद अपनी ‘निषाद पार्टी’ के जरिए मल्लाह समाज को साधने की कोशिश में लगे रहते हैं। हरियाणा में दुष्यंत चौटाला की JJP भी वहाँ के जाट वोटरों को आकर्षित करती है। इससे पहले देवी लाल द्वारा स्थापित INLD हरियाणा में जाट वोटरों की पार्टी मानी जाती थी।इस तरह भारत में जाति आधारित दलों की भरमार हो गई और सबने तुष्टिकरण कर-कर अपने अपनी-अपनी जातियों को साधना शुरू कर दिया।

अब चूँकि राजद और जदयू जैसी पार्टियाँ जाति के आधार पर ही आगे बढ़ी हैं, इनकी कार्यप्रणाली से जाति को निकालना एक असंभव कार्य है। राजद ने लंबे समय तक मुस्लिम+यादव (MY) गठबंधन बना कर सत्ता की मलाई खाई। जदयू ‘लव-कुश’ (कुर्मी-कोइरी) के जरिए राजनीति करती रही। ऐसे में इन्होंने अपने वोट बैंकों को समझने और उस पर मंथन करने के लिए जातिगत जनगणना करवाई। अब ये उसी हिसाब से तुष्टिकरण का खेल खेलेंगे, अपना वोट बैंक मजबूत करेंगे।

हिन्दुओं को बाँटने के लिए जाति आधारित जनगणना की साजिश

जाति आधारित जनगणना करने का एक दूसरा कारण है हिन्दुओं को बाँटना। मोदी लहर में जातिवाद की हवा निकल जाती है और 2014 व 2019 में देखा जा चुका है कि सभी जाति के लोगों ने जाति से ऊपर उठ कर नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट दिया। बिहार में भी ऐसा ही हुआ, तभी 2014 में राजद-जदयू और 2019 में राजद की हवा निकल गई। ये पार्टियाँ इससे निपटने का कोई रास्ता खोज रही थीं और इन्होंने जाति आधारित जनगणना को हिन्दुओं को विभाजित करने के लिए एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है।

ये अब विभाजनकारी राजनीति पर उतर आए हैं। ऐसा नहीं है कि मुस्लिमों में जातियाँ नहीं हैं, लेकिन मुस्लिम समाज में जाति को लेकर कभी उस तरह की लड़ाई नहीं देखी गई जो हिन्दुओं का इतिहास रहा है। इसीलिए, जातिगत जनगणना से हिन्दुओं को ही बाँटने का खेल खेला गया है, ये स्पष्ट है। मुस्लिमों की प्रमुख जातियों में शेख 3.82%, अंसारी 3.54%, सुरजापुरी 1.87% और दुनिया 1.43% हैं। लेकिन, इसकी कोई संभावना नहीं है कि मुस्लिम जाति के आधार पर बँटेंगे, खासकर बिहार में।

सवाल तो ये भी पूछा जा सकता है कि राज्य में पिछले 33 वर्षों से उन्हीं नेताओं का शासन है जो आज जातिगत जनगणना की बातें कर रहे हैं, फिर आखिर राज्य इतना पीछे कैसे रह गया? जातियाँ इतने पीछे क्यों रह गईं? पिछले 33 वर्षों के ‘सामाजिक न्याय’ का क्या असर हुआ? 33 वर्ष एक लंबा समय होता है। अगर इसमें सब कुछ ठीक नहीं हुआ तो क्या गारंटी है कि इन सत्ताधारी दलों के नए पैंतरों से सब कुछ ठीक हो जाएगा? सत्ता तो साढ़े 3 दशक से इनके हाथ में है, अब तक इन्होंने जो किया उसके कोई सकारात्मक परिणाम हैं इनके पास गिनाने को?

आप राहुल गाँधी का ट्वीट देखिए तो सब कुछ साफ़ हो जाता है। उन्होंने लिखा कि बिहार में ‘OBC + SC + ST’ की जनसंख्या 84% है। उन्होंने इसका खास ख्याल रखा कि हिन्दुओं की जनसंख्या न बताई जाए, न ही ये शब्द इस्तेमाल किया जाए। राहुल गाँधी ने ‘जितनी आबादी, उतना हक़’ को कॉन्ग्रेस का प्रण करार दिया। अब कई मुस्लिम ये पूछ रहे हैं कि आबादी में उनकी हिस्सेदारी 18% होने के बाद संसाधनों और पदों पर उनकी हिस्सेदारी की बात कोई क्यों नहीं कर रहा?

जातिगत जनगणना के सहारे सोशल मीडिया में ज़हर बोने की राजनीति

भाजपा के लिए आईटी सेल-आईटी सेल चिल्लाने वाले नेताओं को सोशल मीडिया पर उतर कर देखना चाहिए कि आखिर IT सेल होता क्या है। जैसे ही जाति आधारित जनगणना के आँकड़े सार्वजनिक किए गए, नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव को मसीहा बताने वाले ट्वीट्स की बौछार हो गई। यहाँ आइए हम कुछ ऐसे हैंडलों को देखते हैं जिन्होंने इसे ऐसे पेश किया जैसे बिहार में एक नई ‘सिलिकॉन वैली’ बन गई हो, जहाँ बड़े-बड़े कंपनियों में लाखों लोगों को नौकरियाँ मिल गई हों।

राजद आईटी सेल से जुड़े आलोक चिक्कू ने ‘जियो तेजस्वी’ हैशटैग के साथ ट्रेंड चलाया। उसने सवाल खड़ा किया कि इतनी कम आबादी के बावजूद हर जगह सवर्ण क्यों हैं? उसने ऐलान किया कि अब ‘सामाजिक न्याय होगा’, सदियों से हकमारी कर रहे वर्गों के होश उड़ गए हैं। वैसे लालू यादव और उनके समर्थक भी कहते रहे हैं कि उनके 15 वर्षों के कार्यकाल में ‘सामाजिक न्याय’ हुआ। फिर क्या वो झूठ था? आलोक चिक्कू ने ऐलान किया कि सवर्णों से छीन कर पिछड़ों में सब कुछ बाँटा जाएगा।

इसी तरह खुद को सोशलिस्ट बताने वाले जैकी यादव के ट्वीट्स देखिए, जो भारतीय क्रिकेट टीम के हर मैच के बाद खिलाड़ियों की जाति गिनता है। उसने इन आँकड़ों को ऐतिहासिक बताते हुए इसका पूरा इतिहास गिनाया। उसने ’15 बनाम 85′ का नारा देते हुए धमकाया कि हक़ नहीं दोगे तो OBC अब छीन कर लेगा। उसने अपने दोस्तों को पार्टी भी दी। साथ ही एक ट्वीट डाल कर लिखा कि बर्नोल की बिक्री बढ़ गई है। केंद्र सरकार के सचिवों से लेकर न्यायपालिका तक में सामान्य वर्ग के ज़्यादा लोग होने का रोना भी उसने रोया।

इसी तरह प्रोपेगंडा पत्रकार से RLD नेता बने प्रशांत कनौजिया ने संसाधनों और भूमि पर कब्जा हटाने की बात करते हुए लिखा कि ‘जंग का ऐलान’ हो गया है। राजद के एक अन्य एक्टिविस्ट प्रियांशु कुशवाहा ने बिहार सरकार से विशेष सत्र बुला कर आरक्षण की सीमा बढ़ाने की माँग कर डाली। उसने ’15 में बँटवारा है, 85 भाग हमारा है’ का नारा दिया। जातिवादियों के सरगना दिलीप मंडल ने एससी आरक्षण बढ़ाने पर तत्काल सर्वदलीय सहमति बनाने की माँग करते हुए धमकी भरे अंदाज़ में कहा कि न कोई पार्टी इसका विरोध करेगी, न किसी कोर्ट की हिम्मत होगी इसमें पड़ने की।

आप देखिए कि इन सबका माहौल कैसे बनाया गया। संसद में राजद के मनोज झा ने ‘ठाकुर का कुआँ’ कविता पढ़ते हुए ‘अंदर के ठाकुर’ को मारने की बात कही। उनकी ही पार्टी के चेतन आनंद ने उनका विरोध किया। इसके बाद बयानों और प्रतिक्रियाओं का सिलसिला चल पड़ा। राजद ने भिखारी ठाकुर और कर्पूरी ठाकुर को ‘असली ठाकुर’ बता कर बीच-बीच में आग में घी डाला। ब्राह्मण बनाम राजपूत की लड़ाई का माहौल बना कर जातिगत जनगणना के आँकड़े सार्वजनिक कर दिए गए।

क्या इन दलों के इन समर्थकों की धमकियों को गंभीरता से लिया जा सकता है? सवाल है – ‘हर छीनने’ या ‘संसाधनों पर से कब्ज़ा हटाने’ से उनका क्या अर्थ है? क्योंकि, शिक्षित और अमीर लोग जिस भी समाज में हैं उनके पास संसाधन हैं। मान लीजिए, अगर कोई स्वर्ण व्यक्ति ही है और उसने अपना पूरा जीवन खपा कर अपनी मेहनत की कमाई से जमीन खरीदी, तो क्या ‘हिस्सेदारी’ और ‘कब्ज़ा हटाने’ के नाम पर उसकी जमीन छीन ली जाएगी? ये तो फिर नब्बे के दशक वाला बिहार हो जाएगा, जहाँ नक्सली खुलेआम नरसंहार करते थे।

कोरोना की वैक्सीन बनाने में अहम mRNA तकनीक की खोज की थी: कैटालिन कोरिको और वीसमैन को मिला मेडिसिन का नोबल पुरस्कार

चिकित्सा के क्षेत्र में 2023 का नोबेल पुरस्कार कैटालिन कारिको और ड्रू वीसमैन को दिया गया है। प्रोफेसर कारिको हंगरी के सेज्ड विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं, जबकि प्रोफेसर वीसमैन पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं। इन दोनों वैज्ञानिकों को एमआरएनए (mRNA) टीकों के विकास में अहम योगदान के लिए सम्मानित किया गया है।

इन दोनों वैज्ञानिकों की खोजों ने कोविड-19 महामारी से लड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके काम के बिना, एमआरएनए टीके संभव नहीं होते, जो दुनिया भर में करोड़ों लोगों की जान बचाने में मददगार साबित हो चुके हैं।

कोविड महामारी आने से पहले उनकी खोज जारी थी। महामारी के दौरान जब वैक्सीन बनाने की जरूरत पड़ी तो उनकी खोज लगभग पूरी हो चुकी थी। साल 2021 में उन्होंने इसे पूरी तरह से विकसित कर लिया था।

अब इसका उपयोग लोगों को गंभीर कोरोना वायरस से बचाने के लिए एमआरएनए टीके विकसित करने के लिए किया जाता है। वैज्ञानिक कैंसर सहित अन्य बीमारियों से निपटने के लिए इस प्रौद्योगिकी का उपयोग करने के तरीके खोजने पर भी काम कर रहे हैं।

नोबल पुरस्कार समिति ने की घोषणा

नोबेल पुरस्कार के आधिकारिक एक्स हैंडल पर लिखा, “कैटालिन कारिको और ड्रू वीसमैन की खोज – फिजियोलॉजी या मेडिसिन में 2023 नोबेल पुरस्कार से सम्मानित – महामारी के दौरान COVID ​​​​-19 के खिलाफ प्रभावी एमआरएनए टीके विकसित करने के लिए महत्वपूर्ण थे। उन्होंने आधुनिक समय में मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक के दौरान वैक्सीन विकास की अभूतपूर्व दर में योगदान दिया है।”

कौन हैं प्रोफेसर कैटालिन कारिको?

कैटालिन कारिको एक हंगेरियन-अमेरिकी बायोकेमिस्ट हैं, जो पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं। उन्होंने एमआरएनए (mRNA) के स्थिरीकरण के लिए एक विधि विकसित की, जिससे इसे टीके के रूप में उपयोग करना संभव हो गया।

न्यूक्लियोसाइड आधारित संशोधनों से संबंधित उनकी खोजों के लिए उन्हें यह पुरस्कार प्रदान किया गया है। उनकी खोजों ने कोविड-19 के खिलाफ प्रभावी एमआरएनए टीकों के विकास को सक्षम बनाया है।

प्रोफेसर डू वीसमैन का अहम कामय़

ड्रू वीसमैन एक अमेरिकी चिकित्सक-वैज्ञानिक हैं, जो पेंसिल्वेनिया विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर हैं। उन्होंने एमआरएनए टीकों को सुरक्षित और प्रभावी बनाने के लिए एक तकनीक विकसित की। ड्रू वीसमैन ने अपने काम से दुनिया को बेहतर बनाने में मदद की है। उनकी खोजों ने कोविड-19 के खिलाफ विकसित किए गए अधिकांश टीकों को सही तरीके से काम करने में सफल बनाता है।

इन टीकों में एमआरएनए को एक लिपोसोम के साथ जोड़ा जाता है जो इसे कोशिकाओं में प्रवेश करने में मदद करता है। एक बार कोशिकाओं में एमआरएनए कोविड-19 के प्रोटीन के लिए कोड बनाने के लिए उपयोग किया जाता है। शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली कोविड-19 प्रोटीन को एक एंटीजन के रूप में पहचानती है और इसके खिलाफ एंटीबॉडी बनाती है।

‘अच्छा दिखने के लिए वह भूखी रहती थी’: श्रीदेवी की मौत पर बोले पति बोनी कपूर- उसकी आँखों के सामने अक्सर अँधेरा छा जाता था

बॉलीवुड एक्ट्रेस श्रीदेवी की बाथटब में डूबने से मौत हो गई थी। इसको लेकर अब उनके पति और फिल्म प्रोड्यूसर बोनी कपूर ने कहा है कि सुंदर दिखने के लिए श्रीदेवी बिना नमक का खाना खाती थीं। इससे उन्हें ब्लैक आउट यानी आँखों के सामने अंधेरा छाने की समस्या हो गई थी। एक्टर नागर्जुन ने भी उन्हें बताया था कि श्रीदेवी बेहोश होकर गिर गई थीं। इससे उनके दाँत टूट गए थे।

द न्यू इंडियन के साथ इंटरव्यू में बोनी कपूर ने कहा, “श्रीदेवी की मौत प्राकृतिक नहीं, बल्कि हादसे की वजह से हुई थी। मैंने इसके बारे में न बोलने का फैसला किया था। श्रीदेवी की मौत के बाद जब मुझसे पूछताछ की जा रही थी तो मैंने 24 से 48 घण्टों तक सिर्फ इसी बारे में बात की थी। मुझसे अधिकारियों ने कहा था कि हमें यह सब इसलिए करना पड़ रहा है, क्योंकि भारतीय मीडिया का बहुत दबाव था।”

दरअसल, श्रीदेवी की मौत दुबई में हुई थी। इसलिए वहाँ की पुलिस ने बोनी कपूर से पूछताछ की थी। हादसे की खबर आने के बाद मीडिया लगातार इसे ही दिखा रहा था। बोनी कपूर आगे कि पूछताछ और जाँच में वह निर्दोष साबित हुए, लेकिन इससे पहले उन्हें कई तरह के टेस्ट से गुजरना पड़ा। इसमें लाई डिटेक्टर समेत कई तरह के टेस्ट शामिल थे। इसके बाद जो रिपोर्ट आईं, उनमें भी यही कहा गया था कि हादसे की वजह से ही श्रीदेवी की जान गई।

बोनी का दावा है कि जब श्रीदेवी की मौत हुई उस समय भी वह डाइट पर थीं। उन्होंने कहा, “वह खुद को सुंदर दिखाना चाहती थीं, इसलिए अक्सर भूखी रहती थी। वह चाहती थीं कि वह फिट रहें, ताकि स्क्रीन पर सुंदर नजर आएँ। जब से हमारी शादी हुई थी, तब से कई बार उसे ब्लैकआउट हुआ था। डॉक्टर ने भी कहा था कि उसे लो ब्लड प्रेशर की समस्या है।”

उन्होंने आगे कहा कि नागार्जुन ने भी उन्हें बताया था कि एक बार शूटिंग के दौरान श्रीदेवी बेहोश कर बाथरूम में गिर गई थीं। उन्होंने कहा, ”श्रीदेवी के जाने के बाद संवेदना व्यक्त करने के लिए नागार्जुन घर आए थे। इस दौरान उन्होंने मुझे बताया था कि एक फिल्म की शूटिंग दौरान वह डाइट पर थीं। दुबई में हुए हादसे की तरह वह बेहोश होकर बाथरूम में गिर गई थीं। इससे उनके दाँत टूट गए थे।”

बोनी ने आगे कहा कि शादी होने के बाद ही उन्हें श्रीदेवी के डाइट और अक्सर भूखे रहने के बारे में पता चला। डॉक्टर ने उन्हें अपने खाने में नमक मिलाने की सलाह दी थी, लेकिन वह रात में भी नमक के बिना खाने की माँग करती थीं।

उन्होंने दुख जताते हुए कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि श्रीदेवी ने यह सब गंभीरता से नहीं लिया। शायद उन्होंने इस तरह के हादसे की कल्पना नहीं की थी। बता दें कि श्रीदेवी 24 फरवरी, 2018 को दुबई स्थित होटल में थीं। इसी दौरान वह बाथरूम के बाथटब में मृत पाई गईं थीं। कहा गया था कि बाथटब में डूबने से उनकी मौत हुई।

गुजरात की बसंती पटेल को ‘मरियम’ बना कर किया निकाह; इंजीनियरिंग की डिग्री… 7 दिन की पुलिस रिमांड में भेजे गए ISIS आतंकी शाहनवाज और उसके साथी

दिल्ली पुलिस ने सोमवार (2 अक्टूबर, 2023) को ISIS से जुड़े 3 लाख रुपए के इनामी आतंकी शाहनवाज को गिरफ्तार किया है। इसी साल जुलाई माह में शाहनवाज महाराष्ट्र में पुणे पुलिस की कस्टडी से भाग निकला था। विदेश में बैठे आकाओं ने शाहनवाज को भारत में ISIS का स्लीपर सेल खड़ा करने का काम दिया था जिसे वो बखूबी अंजाम भी दे रहा था। शहनवाज ने एक हिन्दू लड़की को इस्लाम कबूल करवा कर उस से निकाह किया था। पेशे से वह इंजीनियर था लेकिन उसने आतंकवाद का रास्ता अपनाया।

हिन्दू लड़की को इस्लाम कबूल करवा के किया निकाह

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मूल रूप से शाहनवाज झारखंड के हजारीबाग का रहने वाला है। उसने गाजियाबाद के विश्वेश्वरैया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से माइनिंग इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की थी। अब तक मिली जानकारी के मुताबिक शाहनवाज ने एक हिन्दू लड़की से निकाह किया है। उसकी बीवी का नाम बसंती पटेल है जो मूल रूप से गुजरात की रहने वाली बताई जा रही है। शाहनवाज ने बसंती को पहले इस्लाम कबूल करवाया फिर उस से निकाह किया। निकाह के बाद बसंती का नया इस्लामी नाम मरियम रखा गया था।

बाइक चोरी से हुआ था भंडाफोड़

इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने के बाद शाहनवाज पुणे चला गया। वहाँ पर वो ISIS का स्लीपर सेल तैयार करने में जुट गया। उसकी गैंग के तमाम सदस्य बम बना कर उसे पास के जंगलों में टेस्ट करने जाया करते थे। विस्फोट की साजिश को अंजाम देने के लिए शाहनवाज की गैंग को चोरी की बाइक की जरूरत थी। शाहनवाज के साथ इस नेटवर्क से जुड़े इमरान और युसूफ को जुलाई 2023 में बाइक चोरी करने के मिशन पर भेजा गया था लेकिन वो पुलिस द्वारा पकड़े गए। हालाँकि शाहनवाज फरार होने में कामयाब रहा था।

इधर इमरान और युसूफ को शुरुआत में पुलिस ने दोनों को मामूली चोर समझा। लेकिन, बाद में उनके ISIS से जुड़े होने का खुलासा हुआ। तब से इस मामले में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) और महाराष्ट्र ATS ने भी पड़ताल शुरू की। कोढ़वा इलाके में दबिश दे कर 7 लोगों को गिरफ्तार भी किया गया। इधर शाहनवाज और उसके 3 अन्य फरार साथियों पर 3-3 लाख का इनाम भी घोषित कर दिया गया। NIA शाहनवाज को पकड़ने के लिए ताबड़तोड़ दबिश दे रही थी। हालाँकि इस बीच शाहनवाज दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के हत्थे चढ़ गया।

ज्यादा से ज्यादा लोगों को मारने की थी तैयारी

पुलिस को शाहनवाज के ठिकाने से लोहे की पाइपें और प्लास्टिक केमिकल मिले हैं। उसके मोबाइल से विस्फोटक बनाने के तरीकों का लिट्रेचर भी बरामद हुआ है। ये लिट्रेचर उसे उसके पाकिस्तानी आका भेजते थे। पुलिस के मुताबिक गिरफ्तार ये सभी आरोपित भीड़भाड़ वाली जगह ब्लास्ट कर के ज्यादा से ज्यादा जनहानि करना चाहते थे। इस गैंग के निशाने पर कुछ बड़े नाम भी थे। पुलिस को इन सभी के फंडिंग सोर्स की भी जानकारी मिली है। हालाँकि पुलिस ने इन मामलों में खुल कर जानकारी देने से मना कर दिया।

शाहनवाज के साथ जो 2 अन्य आरोपित गिरफ्तार हुए हैं उनके नाम मोहम्मद रिज़वान अशरफ और मोहम्मद अशरफ वारसी हैं। मोहम्मद रिज़वान अशरफ को लखनऊ जबकि अशरफ वारसी को मुरादाबाद से गिरफ्तार किया गया है। गिरफ्तार हुए तीनों आतंकी पेशे से इंजिनियर हैं। पुलिस ने तीनों आरोपितों को अदालत में पेश किया। यहाँ से तीनों को 7 दिनों की कस्टडी रिमांड पर भेज दिया गया है। रिमांड के दौरान इन सभी से और अधिक कबूलनामे की उम्मीद जताई जा रही है।

भारतीय मूल के अमेरिकी एंकर फरीद जकारिया ने आतंकी निज्जर को बताया ‘खालिस्तानी एक्टिविस्ट’, ट्रूडो के बचाव में भारत में चुनाव की गढ डाली कहानी

अमेरिकी समाचार चैनल CNN ने 2 अक्टूबर 2023 को भारतवंशी अमेरिकी टीवी एंकर फरीद जकारिया का एपिसोड जारी किया है। इसमें जकारिया ने खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या पर भारत और कनाडा के बीच चल रही राजनयिक रस्साकशी के विषय में बात की है।

पाँच मिनट के इस वीडियो में कॉन्ग्रेस सरकार में मंत्री रहे रफीक जकारिया के पुत्र फरीद जकारिया खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर को सामान्य एक्टिविस्ट बताने की पूरी कोशिश करते हैं। इसी वीडियो में वह भारत को लेकर खालिस्तानी खतरे को कम कर के आंकते हैं।

जकारिया दावा करते हैं कि भारत खालिस्तान के मुद्दे को आवश्यकता से अधिक उठा रहा है। जकारिया यह भी कहते हैं कि खालिस्तान का मुद्दा अधिक इसलिए उठाया जा रहा है, ताकि प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा को वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों में आसानी हो।

जकारिया अपने वीडियो की शुरुआत कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो द्वारा भारत पर लगाए गए आरोपों से करते हैं और हरदीप सिंह निज्जर को एक ‘एक्टिविस्ट’ और गुरुद्वारे का मुखिया बताते हैं और जून में हुई उसकी हत्या का जिक्र करते हैं।

खालिस्तानी आतंकी निज्जर को ‘एक्टिविस्ट’ बताते बताते समय जकारिया यह भूल जाते हैं कि उसके विरुद्ध दो बार इंटरपोल का रेड कार्नर नोटिस निकल चुका था। निज्जर भारत में 10 मामलों में नामजद था जिसमें बम विस्फोट जैसे गंभीर आरोप भी हैं।

जकारिया जानबूझ कर यह तथ्य छुपा ले जाते हैं कि ट्रूडो खालिस्तानियों का पक्ष राजनीतिक कारणों से ले रहे हैं। वह भारत के क़दमों को राजनीतिक बताते हैं, लेकिन यह बताना भूल जाते हैं कि जस्टिन ट्रूडो की खुद की सरकार जगमीत सिंह के भरोसे चल रही है और वह उन्हीं को खुश करने के लिए खालिस्तानियों का समर्थन कर रहे हैं।

जकारिया जस्टिन ट्रूडो की बचकाना हरक़तों का पक्ष लेते हुए कहते हैं कि उन्होंने सार्वजनिक रूप से भारत पर इसलिए आरोप लगाए हैं, ताकि भारत को जाँच में सहयोग करने पर मजबूर किया जा सके।

हालाँकि, यह कोई पहला मौका नहीं है जब जकारिया ने भारत विरोधी रवैया अपनाया हो। वह इससे पहले अमेरिका को भारत में हस्तक्षेप करने की अपील कर चुके हैं। उन्होंने इस बात की अपील भी की थी कि अमेरिका को भारत में NGO, सांस्कृतिक समूहों और प्रेस आदि से सीधे संवाद करना चाहिए।

यह सीधे-सीधे इस बात इशारा है कि भारत में सत्ता किसी तरह बदली जाए। हास्यास्पद रूप से उन्होंने भारत को अपने हितों को पूरा करने के लिए निशाने पर लिया था। उनका कहना था कि अमेरिका के सहयोगी को उसके हित ऊपर रखने चाहिए।

कनाडा वाले मामले पर डाले गए वीडियो में वह भारतीय मीडिया की कुछ क्लिप चलाते हैं। जकारिया का कहना है कि मीडिया द्वारा चलाई गई इन खबरों से भारत में अति राष्ट्रवाद की भावनाएँ उत्पन्न हो रही हैं।

जकारिया वीडियो में कहते हैं, “भारत में इस मामले पर प्रतिक्रिया काफी अलग हैं और यह बात सामने आती है कि ट्रूडो ने बड़ी गलती कर दी है। आप भारतीय प्रेस को देखिए, इस कहानी (निज्जर से सम्बंधित) ने भारत में अति राष्ट्रवाद की भावनाएँ जगा दी हैं, जिसमें कनाडा को एक बहु-सांस्कृतिक नहीं, बल्कि आतंकियों को शरण देने वाला एक राष्ट्र बताया जा रहा है।”

अपने दावे को मजबूत करने के लिए वह टीवी एंकर अर्नब गोस्वामी का एक वीडियो दिखाते हैं जिसमें गोस्वामी ट्रूडो को आतंकियों का मददगार और उनका समर्थक बताते हैं। जकारिया का यह भी कहना है कि राजनीतिक विश्लेषक सुशांत सरीन ने इस पूरी स्थिति को सही ढंग से लिखा है। इसके लिए वह सुशांत का एक ट्वीट दिखाते हैं जिसमें यह लिखा है, “अगर ये (निज्जर की हत्या) हमने किया है तो ठीक किया है और अगर हमने नहीं किया है तो आप गलत हैं।”

फरीद जकारिया आगे कहते हैं, “हिन्दुस्तान टाइम्स का एक विश्लेषण बताता है कि निज्जर की हत्या एक ऐसा लम्हा होगा जब पश्चिमी शक्तियाँ भारत के विरुद्ध एकत्रित हो जाएँगी।”

जकारिया अपने दर्शकों को भारत द्वारा कनाडा को आतंकियों की शरणस्थली क्यों कह रहा है, यह समझाते समय भारत के लिए खालिस्तानी खतरे को काफी छोटा करके बताते हैं। वह निज्जर को सिख कार्यकर्ता बताकर लगातार उसकी आतंकी गतिविधियों को छुपाते हैं।

इस संबंध में वह कहते हैं, “भारतीय अधिकारियों ने कनाडा पर आतंकियों को शरण देने का आरोप लगाया है। ये आपको थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन यह इस बात का संदर्भ है कि निज्जर एक सिख अलगाववादी था। उन सिखों में से एक जो कि भारत में एक सिख राष्ट्र की माँग करते हैं। यह माँग दशकों पुरानी है और 1980 के दशक में इसके लिए एक हिंसा का रास्ता भी चुना गया था।”

इन सब के बीच जकारिया यह बताना भूल जाते हैं कि कनाडा में लगातार हिन्दुओं को हिंसा की धमकियां दी जा रही हैं और रैलियाँ आयोजित की जा रही हैं। इसके लिए वह द इकॉनोमिस्ट का सहारा लेकर बताते हैं कि खालिस्तान सिख समुदाय में चर्चा का विषय है।

जकारिया कहते हैं, “इकॉनोमिस्ट के अनुसार, 1980 और 1990 के दशक में खालिस्तान आन्दोलन ने हजारों जानें ली थीं, लेकिन तब से यह विदेशों में रहने वाले सिखों में केवल बातचीत का मुद्दा है और भारत में इसे कोई समर्थन नहीं हासिल है।”

यह राष्ट्रीय सुरक्षा का नहीं, पीएम मोदी के लिए राजनीतिक लाभ का मुद्दा

जकारिया का कहना है कि कनाडा यदि भारत द्वारा उठाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेशों में रह रहे भारतीयों की सुरक्षा को लेकर कदम उठाता है तो इसका राजनीतिक रूप से फायदा प्रधानमंत्री मोदी को होगा।

जकारिया का कहना है, “इस मामले में जो कुछ भी सच्चाई हो, भारत और कनाडा में ‘सिख एक्टिविस्टों’ को लेकर लम्बे समय से विवाद चल रहा है। जैसा की फाइनेंसियल टाइम्स कहता है, भारत ने कनाडा पर आतंकियों पर सख्त रवैया ना अपनाने के आरोप लगाए हैं जिनका परीक्षण होना चाहिए। लेकिन यह भी सत्य है कि इस मुद्दे को उठाना भाजपा और नरेंद्र मोदी के लिए फायदेमंद है।”

जकारिया ने पुलवामा हमले का उदाहरण देते हुए बताया कि ट्रूडो ने जो नीति इस मामले में अपनाई है वह गलत है। जकारिया यहीं नहीं रुके, वह इन सब विवाद के बीच में हिन्दू राष्ट्रवाद को भी खींच लाए।

उन्होंने कहा, “आप समझिए कि सार्वजनिक तौर पर भारत का नाम लेने की ट्रूडो की नीति मोदी के हिन्दू राष्ट्रवाद को नहीं समझ पाती जो कहता है कि भारत बहुत लम्बे समय से पश्चिमी ताकतों और अल्पसंख्यकों के सामने दब्बू रहा है। जब भी कोई अवसर आएगा, प्रधानमंत्री मोदी जानते हैं कि इसका लाभ कैसे लिया जाए।”

जकारिया ने 2019 के पुलवामा हमले के विषय में बताते हुए कहा, “वर्ष 2019 में एक आत्मघाती हमलावर ने हमला करके बड़ी संख्या में भारतीय सैनिकों को मार दिया था। भारत ने पाकिस्तान पर इसका आरोप लगाया और भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के अंदर एक आतंकी ट्रेनिंग कैम्प पर हमले किए। हालाँकि, पाकिस्तान ने किसी भी नुकसान से मना किया था, लेकिन यह पचास वर्षों में पहली बार था कि भारत ने सीमा पार ऐसी कार्रवाई की थी।”

तब की परिस्थितियों को जकारिया ने वर्तमान से जोड़ते हुए बताने का प्रयास किया कि कनाडा भारत के लिए नया पाकिस्तान है। जकारिया ने दावा किया कि कि प्रधानमंत्री मोदी के लिए यह फायदेमंद होगा कि वह प्रदर्शित करें कि वह पश्चिमी देशों के रवैये और सिख अलगाववाद के विरुद्ध खड़े हैं।

जकारिया ने समाचार पत्र ब्लूमबर्ग का हवाला देते हुए कहा, “जैसा कि ब्लूमबर्ग ने कहा है, मोदी की जीत में इस बात का बड़ा रोल था कि उन्होंने एक चुनावी रैली में आतंकियों को घुस कर मारने की बात की थी। उन्होंने यह भी बिना सबूत के कहा था कि विपक्षी दलों को आतंकियों के साथ सहानुभूति है।”

जकारिया ने आगे कहा, “इसके बाद प्रधानमंत्री की लोकप्रियता में बढ़त देखी गई। अब उनके सामने एक और चुनाव है और अगर वह अपने आप को ऐसे प्रदर्शित करते हैं कि वह सिख अलगाववाद और पश्चिमी देशों के विरुद्ध खड़े हैं तो उनके लिए यह फायदेमंद होगा, भले ही यह असल मुद्दा हो या नहीं।”