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शिवलिंग मतलब काला पत्थर, श्रीकृष्ण कहते हैं कुरान पढ़ो, धोती-शिखा वाला होता है अनपढ़ … ‘OMG 2’ से पहले 12 बिंदुओं में समझिए OMG का हिन्दू विरोधी प्रोपेगेंडा

साल 2012 में एक फिल्म आई थी – ‘OMG: Oh My God!’ नाम की, जिसमें परेश रावल ने एक नास्तिक व्यक्ति का किरदार निभाया था और अक्षय कुमार भगवान श्रीकृष्ण के रूप में दिखे थे। 2014 के बाद हिन्दू पुनर्जागरण का जो काल आया है और जिस तरह से एक-एक कर के एजेंडाधारी बेनकाब हुए हैं, आज की तारीख़ में बहुत आवश्यक है कि इस फिल्म की पुनः समीक्षा हो। उस समय इस फिल्म ने भारत में 100 करोड़ रुपए से भी अधिक का नेट कारोबार किया था और IMDb पर भी इसकी रेटिंग 8 से ज्यादा है।

अब ‘OMG 2’ का टीजर भी आया है, इसीलिए भी इस फिल्म के बारे में फिर से बात किया जाना चाहिए। क्या फिल्म में भगवान का इस्तेमाल कर के नास्तिकवाद को बढ़ावा दिया गया? क्या हिन्दू धर्म के प्रतीकों का अपमान किया गया? एक खास सन्देश देने के चक्कर में सीमाएँ लाँघ दी गईं? आइए, समझते हैं। अब हिन्दुओं का सामूहिक बौद्धिक विकास भी हुआ है और उन्हें बॉलीवुड का हर प्रपंच समझ में आने लगा है, एक-एक बिंदु में तोड़ कर इस फिल्म पर फिर से चर्चा की जानी आवश्यक है।

धार्मिक यात्रा में शराब, गंगाजल और उपवास का अपमान

भारत में गंगाजल का अपना एक महत्व है, गंगा को सबसे पवित्र नदी का दर्जा दिया गया है। ऐसे में फिल्म की शुरुआत में ही एक दृश्य में दिखाया गया है कि कैसे ‘कांजीभाई’ (परेश रावल) एक महिला की मृत्यु के बाद हो रही एक धार्मिक यात्रा में सभी को शराब पिला देते हैं, सारे लोग शराब पी लेते हैं धोखे से। क्या यहाँ गंगाजल से शराब की तुलना उचित थी? इस तरह की तुलना जमजम के पानी को लेकर कभी की जा सकती है? हिन्दू धर्म में इस तरह की अपमानजनक चीजों को इतना हल्का-फुल्का बना दिया गया है कि हम इस पर हँसते हैं।

जिस तरह से हमें अपने ही ऊपर अत्याचार करने वाले आक्रांताओं का अपमान करना सिलसिलेवार तरीके से सिखाया गया, कुछ इसी तरह से हमारे भीतर ये भी व्यवस्थागत रूप से बिठा दिया गया कि अपने ही धर्म के अपमान पर हम हँसें, आपत्ति जताना तो दूर की बात है। इसी के बाद वाले दृश्य में उपवास का मजाक भी बनाया गया है। उपवास के पीछे का वैज्ञानिक महत्व आयुर्वेद में वर्णित है और मेडिकल विज्ञान भी इसे मानता है। शराब पिला कर किसी मुस्लिम का रोजा तुड़वाने वाला दृश्य बॉलीवुड कभी दिखा सकता है?

मूर्ति का मतलब खिलौना

फिल्म के एक दृश्य में कांजीभाई को भगवान की मूर्तियों को एक बड़ी दुकान से खरीदते हुए दिखाया गया है। इसमें वो हनुमान जी को ‘बॉडी बिल्डर’ कहते हैं और इसी तरह हर देवी-देवताओं का मजाक बनाते हैं। सुधारवाद के नाम पर हिन्दू प्रतिमाओं को खिलौना कहना कहाँ तक उचित है? यानी, पूरी की पूरी मूर्तिपूजा ही बेकार है? फिर तो हिन्दू धर्म के प्राचीन साहित्य भी बेकार हो गए? मंदिर बनवाने वाले राजा-महाराजा और उन मंदिरों में पूजा-पाठ करने वाले साधु-संत भी मूर्ख थे?

मूर्तिपूजा का विरोध तो इस्लाम में किया जाता है और इस्लामी आक्रांता प्रतिमाओं को ‘बूत’ बता कर इसे तोड़ते थे। क्या हिन्दू धर्म में सुधारवाद का यही अर्थ है कि वो इस्लाम के हिसाब से काम करने लगे? माना कि आर्य समाज भी मूर्तिपूजा के खिलाफ है, लेकिन श्रीराम या श्रीकृष्ण में आस्था इसके अनुयायियों की भी है। इसी तरह एक दृश्य में भगवान शिव को ‘काला पत्थर’ कह दिया गया है। अर्थात, करोड़ों लोगों की जिनमें आस्था है उन महादेव के लिए इस तरह के शब्द पर तो फिल्म को रिलीज ही नहीं होने देना चाहिए था।

मूर्तिपूजा के विरोध में इस फिल्म में कभी तर्क दिया जाता है कि हिन्दू धर्म में 35 करोड़ देवी-देवता हैं तो कभी दिखाया जाता है कि कैसे मूर्तियों में श्रद्धा रखने वाले लोग बेवकूफ होते हैं और इसके चक्कर में मूर्ख बन कर मूर्तियाँ खरीद देते हैं। यानी, बहुदेववाद ढकोसला है – इस फिल्म में ये बताने की कोशिश की गई है। अब्राहमिक मजहबों का इससे अच्छा प्रचार क्या होगा भला? इस्लाम की शुरुआत ही अरब में मूर्तियों को तोड़े जाने के साथ हुई थी, फिल्म इस थ्योरी को बड़े सॉफ्ट तरीके से आगे बढ़ाती है।

मुस्लिमों की एरिया में हिन्दू देवी-देवताओं की प्रतिमाओं की दुकान

कांजीभाई की जो दुकान होती है, वो मुस्लिमों वाले एरिया में होती है। आप देखिएगा बॉलीवुड की चालाकी। जब-जब उस दुकान को दिखाया जाता है तब-तब वहाँ आसपास मुस्लिमों को चहलकदमी करते हुए दिखाया गया है। वास्तविकता इससे परे होती है, ये किसी से छिपा नहीं है। दिल्ली में फरवरी 2020 में हुए दंगों में चुन-चुन कर हिन्दुओं की दुकानों को जलाया गया था। शिव विहार में 2 स्कूल अगल-बगल थे, मुस्लिमों का स्कूल दंगाइयों का पनाहगाह बना जबकि हिन्दुओं के स्कूल को फूँक दिया गया।

बॉलीवुड इसी तरह हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे का सन्देश देता है, जहाँ हिन्दू हमेशा गुंडा होता है और मुस्लिम ‘मासूम’। हज को लेकर मजाक किए जाने पर मुस्लिम सुन कर रह जाता है, जबकि थोड़ा सा गुस्सा आने पर मंदिर का पुजारी पीटने के लिए कांजीभाई को दबोच लेता है – इस तरह के नैरेटिव ‘शोले (1975)’ के समय से ही चले आ रहे हैं जब गाँव में सबसे अच्छा और सच्चा मौलवी साहब ही हुआ करते थे।

जिसने धोती पहन रखी है, शिखा रखी है – उसका मजाक बनाओ

आप पूरी OMG: Oh My God!’ फिल्म में ‘सिद्धेश्वर महाराज’ के किरदार पर गौर कीजिए। बॉलीवुड के लिए शुरू से जोकर का अर्थ रहा है धोती-शिखा वाला ब्राह्मण। शक्ति कपूर को इस तरह से कई फिल्मों में कास्ट किया गया है। क्या आपने बॉलीवुड में जोकर के रोल में कभी ऊँचे पायजामे वाले मौलवी को देखा है? फिल्म की शुरुआत में ही भूकंप आता है और सिद्धेश्वर महाराज गिरने लगते हैं। कभी तो टाँगें फैला कर कुर्सी पर बैठ कर कुछ खाते रहते हैं तो कभी कोर्ट में उन्हें अजीबोगरीब हरकत करते हुए दिखाया गया है। पंडितों के IQ पर टिप्पणी की जाती है, ‘इंटरेस्टिंग आइटम’ बताया जाता है।

इसी तरह एक दृश्य में साधु-संतों को अनपढ़ बताते हुए कांजीभाई कह देते हैं कि अधिकारी तो पढ़े-लिखे होते हैं, उनसे इनकी तुलना नहीं हो सकती। ऐसे डायलॉग्स और दृश्यों से युवावर्ग में इस तरह का सन्देश जाता है कि साधु-संत अनपढ़ होते हैं। वेद-पुराणों का अध्ययन करने वाले को पढ़ा-लिखा नहीं कहा जा सकता। पढ़ा-लिखा दिखने की पहली शर्त है कि व्यक्ति भारतीय परिधान न पहने। पहनेगा तो वो जोकर है। एक दृश्य में एक लड़के को यज्ञ करा रहे पंडित का मजाक बनाते हुए दिखाया गया है। इससे क्या सन्देश गया होगा?

आरती फूँकना, तिलक मिटाना: नास्तिक द्वारा धृष्टता

एक नास्तिक आरती की थाली में फूँक कर दीया बुझा देता है। एक दृश्य में वो अपना और अपने सहयोगी का तिलक पोंछ देता है। हाल ही में खबर आई कि मध्य प्रदेश के इंदौर स्थित एक स्कूल में तिलक लगा कर जाने पर बच्चे को पीट-पीट कर भगा दिया गया। इस करतूत का समर्थन करने वाला स्कूल का प्रिंसिपल हिन्दू है, इस करतूत को अंजाम देने वाली शिक्षिका हिन्दू हैं। भला इस तरह की मानसिकता ऐसी फिल्मों से ही आती है न? ये सिखाते हैं कि तिलक हटा दो, आरती मत करो – तभी तुम आधुनिक कहलाओगे।

बॉलीवुड में किसी भी निर्देशक की हिम्मत है तो वो मस्जिद में जाकर इस तरह की हरकतें करने वाला दृश्य दिखा दे। यहाँ तो जो बातें लिखी हुई हैं उन्हें बोल देने पर एक महिला को साल भर अपने ही घर में कैद रहना पड़ता है और उनका समर्थन करने वालों का गला रेत दिया जाता है। ये नास्तिकवाद की बीमारी हिन्दुओं में ही क्यों धकेली जा रही है? अजान और नमाज के प्रति सम्मान की भावना दिखाने वाला ये बॉलीवुड, जिसके सितारे दरगाहों पर चादर चढ़ाने जाते रहे हैं, उन्हें विलेन के रूप में साधु-संत ही क्यों चाहिए?

अच्छा मुस्लिम वकील, हिजाबी बेटी: इस्लाम पर बच कर चलती है ‘OMG: Oh My God!’

जहाँ एक तरफ हिन्दू धर्म और देवी-देवताओं को लेकर ऐसी-ऐसी टिप्पणियाँ हैं, इस्लाम मजहब का नाम आते ही फिल्म के निर्माता-निर्देशक की हवा निकल जाती है। एक मुस्लिम वकील है, जो इतना अच्छा है कि पूछिए मत। उसकी हिजाब पहनी हुई बेटी है, जो बहुत अच्छी है व्यवहार में। हाल ही में हिजाब के समर्थन में कर्नाटक में दंगे हुए, हमने देखा। ईरान में महिलाओं ने सड़क पर निकल कर अपने हिजाब जलाए। ऐसे में किसी फिल्म में हिजाब को सकारात्मक और धोती-शिखा को नकारात्मक दिखाने से क्या सन्देश जा सकता है? एक जगह सिर्फ ‘पैगंबर’ कहा जाता है, पूरा नाम लेने की हिम्मत भी नहीं होती और हिन्दू देवी-देवताओं के समय जबान कैंची की तरह खुलने लगती है।

एक मुस्लिम जब उपरवाले पर केस करने आता है तो उसे सिखाया जाता है कि वो अल्लाह मियाँ के खिलाफ नहीं जा रहा। देखिए, यहाँ कितने संभल-संभल कर डायलॉग लिखे गए हैं। यहाँ आरती फूँकना, तिलक मिटाना, शिवलिंग को काला पत्थर कहना – ऐसी शब्दावली का इस्तेमाल नहीं किया गया है। फिल्म में सारे मुस्लिम किरदार बहुत अच्छे मिलेंगे आपको। एक से हज पर मजाक किया जाता है लेकिन वो सहिष्णु है, एक फ्री में कांजीभाई की मदद करता है, उसकी बेटी भी मदद करती है, मौलवी साहब भी संतों की तरह ‘बिगड़े हुए’ नहीं हैं।

मिथुन चक्रवर्ती का चित्रण आपको क्यों डिस्टर्ब करना चाहिए

इस फिल्म में एक और खास बात है – ‘लीलाधर स्वामी’ के किरदार में मिथुन चक्रवर्ती। लीलाधर स्वामी पुरुष हैं, लेकिन महिलाओं की तरह उनका चाल-चलन है। वो हमेशा अपना एक हाथ अपने मुँह के पास रखे रहते हैं। वो ज्ञानी हैं, लेकिन फिल्म में मुख्य विलेन भी। वो भी धोती पहनते हैं, स्पष्ट है कि उनका रोल सकारात्मक नहीं ही रहना चाहिए। बॉलीवुड में ये चीज एक तरह से नॉर्मल रही है, ‘सिंघम 2’ का हीरो साधु को थप्पड़ मार कर घसीटते हुए जेल ले जाता है, लेकिन दरगाह के सामने सर झुकाने के लिए दूसरों को भी मजबूर करता है।

लीलाधर स्वामी के बोलचाल के अंदाज़ को भी ऐसा रखा गया है। ये एक तरह से ट्रांसजेंडर समाज का भी अपमान है, सिर्फ साधु-संतों का ही नहीं। हमने साधु-संतों के इस चित्रण के खिलाफ आवाज उठाई होती तो न तो ‘सिंघम 2’ में कुछ वैसा दिखाया जाता और न ही ‘आश्रम’ जैसी वेब सीरीज में धर्म के साथ सेक्स जैसी चीजें परोसी जातीं। अगर एकाध ऐसी घटनाएँ वास्तविक भी हैं, फिर बिशप फ्रैंको मुलक्कल पर फिल्म बनेगी? मदरसों में यौन शोषण करने वाले मौलवियों पर आज तक फिल्म बनी है?

लोकतंत्र में ‘भगवान’ भी कटघरे में

ईश्वर तो तब भी विद्यमान थे जब लोकतंत्र नहीं था, संविधान नहीं था और पुलिस-कोर्ट नहीं हुआ करती थी। तब इन सबका कुछ और रूप हुआ करता था। उससे पहले कुछ और रूप। लेकिन, ईश्वर में आस्था इस संस्कृति की पहचान रही है। फिल्म के एक दृश्य में कहा जाता है कि ये लोकतंत्र और और यहाँ भगवान को भी न्यायालय में पेश होना पड़ेगा। लोकतंत्र का ये अर्थ तो बिलकुल भी नहीं है। उलटे सत्ता में, न्यायपालिका में और ब्यूरोक्रेसी में जो लोग हैं उन्हें ईश्वर का भय होना चाहिए कि उनसे गलती हुई तो उन्हें सज़ा मिलेगी।

हजारों वर्ष पुरानी इस संस्कृति में ईश्वर को सिर्फ इसीलिए नीचा नहीं दिखाया जा सकता, क्योंकि यहाँ 74 वर्षों से एक संविधान है और एक लोकतंत्र है। अक्सर आपने आजकल खबरों में पढ़ा होगा कि कभी हनुमान जी को कोर्ट द्वारा समन भेज दिया जाता है तो कभी किसी और देवी-देवता को। हो सकता है इस तरह की फ़िल्में देख कर कुर्सी पर बैठे लोग खुद को भगवान से ऊपर समझने लगें। ऐसी स्थिति न आए, इस स्थिति से हमें डरना चाहिए, क्योंकि ईश्वर और उसमें आस्था हजार वर्ष बाद भी होगी जब शायद सत्ता और न्यायपालिका का स्वरूप अलग हो।

मंदिरों को बदनाम करने के लिए अदालत में भाषण

कांजीभाई मंदिरों को गाली देने के लिए कोर्ट में पूरा का पूरा भाषण देते हैं और बड़ी बात ये कि कार्यवाही देख रहे ‘भगवान श्रीकृष्ण’ भी उनसे सहमत दिखते हैं। इसीलिए, इसे ये कह कर ख़ारिज नहीं किया जा सकता कि ये किरदार बोल रहा होता है। कांजीभाई तर्क देते हैं कि फूल, चंदन लड्डू वगैरह खरीदने होते हैं जो मंदिर बेचता है और पैसे कमाता है। नहीं कांजीभाई, मंदिर के बाहर ये चीजें बेचने वाले गरीब लोग ही होते हैं, जिनकी उस मंदिर के कारण आमदनी होती है।

महाशिवरात्रि के समय आप जो बेलपत्र खरीदते हैं वो मंदिर नहीं बेच रहा होता है बल्कि गरीब लोग ही बेच रहे होते हैं। पूजा सामग्रियों की दुकानें छोटे कारोबारियों की ही होती हैं। बड़ी आसानी से मंदिरों के पैसे को ब्लैक मनी बता दिया जाता है। जबकि मंदिरों पर सरकार का कब्ज़ा है और उनके पैसे सरकार की झोली में जाते हैं। अगर मंदिर सरकार कब्जे से मुक्त होते, तब इस तर्क पर बहस भी हो सकती थी। मंदिर में भिखारियों की एंट्री नहीं होती – ये नैरेटिव भी इसमें फैलाया गया है।

अगर कोई व्यक्ति कहीं बैठ कर भीख माँग रहा है तो ये सरकार और समाज की नाकामी है या धर्म और मंदिरों की? इसमें मंदिरों के पैसों से चलने वाले अस्पतालों और स्कूलों को एक लाइन में ये कह कर नकार दिया गया है कि ये ऐसा ही है जैसे गुटखा बेचने वाले कैंसर की दवा भी बेचें। क्या मंदिर जाना कैंसर है? कई गरीबों की कमाई एक मंदिर के कारण हो जाती है। ये तर्क नास्तिकवाद नहीं, हिन्दू विरोध है। भगवान की सह कर भला कोई कैसे इस तरह के तर्क दे सकता है? कहाँ, किस वेद-पुराण में लिखा है ऐसा?

आजकल आपने खबरों में देखा होगा कि कैसे उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में अवैध मजारों को तोड़ा जा रहा है। जबकि ‘OMG: Oh My God!’ फिल्म में कोई अवैध मजार नहीं होता, बल्कि खेल के मैदान में अवैध मंदिर बना दिया जाता है। इसमें बार-बार प्रतिमाओं के लिए पत्थर शब्द का इस्तेमाल किया गया है। क्या मक्का-मदीना में क्या है, इस पर मजाक उड़ाने की हिम्मत है? अब तो अवैध मजार तोड़े भी जा रहे हैं, 2012 के समय में तो अवैध मजार को अवैध बताना भी महापाप था।

बाल अर्पण करने का भी बनाया गया है मजाक, दावा – इसका धंधा होता है

श्राद्ध, यज्ञोपवीत और मुंडन में बाल अर्पण करने की परंपरा रही है। फिल्म में एक टीवी इंटरव्यू में कांजीभाई दवा करते हैं कि बाल अर्पण करने के पीछे एक बहुत बड़ा धंधा चलता है। किसी के घर में बाल ही बाल हो जाएँ तो कैसा लगेगा, भगवान को भी अच्छा नहीं लगेगा – ये तर्क दिया गया है। हिन्दू धर्म में बाल अर्पण करना अपने अहंकार के त्याग का प्रतीक है। मुंडन एक संस्कार है। अगर बालों का इस तरह का धंधा होता तो हर कोई अपने बाल बेच कर कमाई कर लेता। सैलून वाला कटे हुए बालों को बुहार कर फेंकता ही नहीं न?

ये अलग बात है कि लोग अपनी किसी खास मन्नत के पूरे होने पर भी बाल अर्पण करते हैं, लेकिन ये तो अपनी आस्था है न? मुंडन संस्कार का उल्लेख यजुर्वेद में भी मिलता है। शिशु के विकास के लिए इसे आवश्यक माना गया है। ऐसे तो हर एक परंपरा का विरोध किया जा सकता है? कोई इस फिल्म को बनाने वालों से ये पूछ सकता है कि सिनेमाघर और मॉल के बाहर भी भिखारी होते हैं, फिर तो फ़िल्में बननी ही नहीं चाहिए और बॉलीवुड को ही खत्म हो जाना चाहिए।

शिवजी को दूध नहीं चढ़ाना चाहिए, गरीब को देना चाहिए

अगर कोई बॉलीवुड वालों से पूछे कि जब देश में इतनी गरीबी है तो फिल्मों पर सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च करने की क्या ज़रूरत गई, क्योंकि न ये पैसे गरीबों में बाँट दिए जाएँ? युवा वर्ग में हिन्दू धर्म के खिलाफ भावना भरने के लिए अक्सर गरीबों का इस्तेमाल किया जाता है। फिल्म में कांजीभाई कहते हैं कि शिवलिंग पर दूध चढ़ाने से वो बर्बाद हो जाता है, गरीब प्यासा रह जाता है। सवाल ये है कि लोग दूध खुद की कमाई से खरीदते हैं, आस्था उनकी होती है, किसी का नुकसान नहीं करते – फिर दिक्कत क्या है?

फिर तो बॉलीवुड की हस्तियों को बड़े-बड़े घर भी नहीं बनाने चाहिए क्योंकि कई गरीब फुटपाथ पर सोते हैं। उन्हें अपने घरों में गरीबों को जगह देना चाहिए? आखिर हिन्दू परंपरा को तोड़ कर ही समाजसेवा क्यों? शिवलिंग पर जल चढ़ाने वाले तो गरीबों को भी कुछ पैसे दे देते हैं, ये बॉलीवुड वाले क्या करते हैं? मालदीव के ट्रिप? शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा भी हजारों वर्ष पुरानी है और हमारे प्राचीन साहित्य में इसका जिक्र है, एक फिल्म में एक लाइन में गरीबों की बात कर के बड़ी चालाकी से इसे दोषी ठहरा दिया गया है।

भगवान श्रीकृष्ण कुरान और बाइबिल पढ़ने के लिए देते हैं

बॉलीवुड में अक्सर ये कह कर भाईचारे का सन्देश दिया जाता है कि जो भगवद्गीता में लिखा है, वही कुरान और बाइबिल में भी लिखा है। मतलब कुछ भी? कहाँ हैं समानताएँ? गीता में न तो ये लिखा है कि जो तुम्हारे धर्म में न माने उसे मार डालो और न ही ये लिखा है कि दूसरों का धर्मांतरण कराओ। भगवान श्रीकृष्ण भला किसी को कुरान और बाइबिल पढ़ने को क्यों देंगे? पता नहीं ‘OMG: Oh My God!’ में ये दृश्य क्यों डाला गया है। वही बात हो गई कि मंदिरों में बजते हैं ‘ईश्वर अल्लाह तेरो नाम’, क्या किसी मस्जिद में सुना ‘रघुपति राघव राजा राम’?

कुरान और बाइबिल की तुलना भगवद्गीता से नहीं होनी चाहिए, किसी भी पुस्तक की नहीं होनी चाहिए। न तो बॉलीवुड में कोई ऐसा विद्वान बैठा है जिसने साबित किया हो कि तीनों के कंटेंट एक हैं, न ही वहाँ कुछ ऐसा रिसर्च किया जाता है। फिर ये सब क्यों? कोई मौलवी भी नहीं मानेगा कि गीता में वही सब लिखा है जो कुरान में है। रामायण, महाभारत, वेद, पुराण, संहिता, उपनिषद – कहाँ लिखा है कि गीता और कुरान-बाइबिल एक हैं? वेदों में तो पृथ्वी को चपटी नहीं बताया गया है।

अब आप कहिए, पहली नजर में कोई भी व्यक्ति इस फिल्म को देखेगा तो उसे अपने ही धर्म से घृणा हो जाए। खुद अक्षय कुमार ने कहा था कि इस फिल्म को करने के बाद उन्होंने परिवार सहित वैष्णो देवी की यात्रा की योजना रद्द कर दी थी। फिर दर्शकों पर इसका क्या असर पड़ा होगा, सोचिए। आज कुछ हिन्दू ही कभी काँवड़ यात्रा का विरोध करते हैं तो कभी होली पर पानी की बर्बादी और दीवाली पर प्रदूषण की बात करते हैं, वो यूँ ही नहीं है। ‘OMG: Oh My God!’ जैसी फिल्मों ने चरणबद्ध तरीके से इसके लिए माहौल बनाया है।

उत्तराखंड: पहचान बदल महिला को फँसाया, धर्मांतरण का दबाव-बेचने का भी प्रयास; हिंदू युवती को अगवा करने वाला सैफ गिरफ्तार

उत्तराखंड के 2 अलग-अलग हिस्सों से लव जिहाद के 2 अलग-अलग मामले सामने आए हैं। पहला मामला रुद्रपुर के सितारगंज का है। यहाँ एक मुस्लिम युवक पर हिन्दू लड़की से नाम बदल कर निकाह करने और बाद में उसे प्रताड़ित करने का आरोप लगा है। सोमवार (10 जुलाई 2023) को पीड़िता ने पुलिस को दी शिकायत में धर्म परिवर्तन के लिए दबाव डालने का भी आरोप लगाया है। दूसरा मामला हल्द्वानी के काठगोदाम इलाके का है। यहाँ एक हिन्दू लड़की के अपहरण के आरोपित सैफ को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। सैफ के खिलाफ शनिवार (8 जुलाई 2023) को FIR दर्ज हुई थी।

दैनिक जागरण के मुताबिक रुद्रपुर के कोतवाली सितारगंज में एक हिन्दू महिला ने शिकायत दर्ज करवाई है। शिकायत में बताया गया है कि 5 साल पहले उसने एक युवक से लव मैरिज की थी। अपने पहले पति पर शराब पीकर पिटाई का आरोप लगाते हुए पीड़िता ने बताया कि शादी के कुछ दिनों बाद उसका तलाक हो गया था। इस बीच उत्तर प्रदेश के पीलीभीत के बाँसखेड़ा इलाके के रहने वाला एक मुस्लिम युवक उसे मिला। उसने खुद को हिन्दू बताया।

पीड़िता का आरोप है कि आरोपित ने पहले तो उससे दोस्ती की फिर उसके साथ लिव इन रिलेशन में रहने लगा। इस दौरान आरोपित ने पीड़िता का शारीरिक शोषण किया और 1 लाख रुपए भी उधार के नाम पर ठग लिए। कुछ दिनों बाद पीड़िता को आरोपित के मुस्लिम होने की जानकारी हुई। बताया जा रहा है कि पोल खुलने के बाद आरोपित लड़की पर धर्मान्तरण का दबाव बनाने लगा। जब महिला ने इसका विरोध किया तो आरोपित ने उसे बेचने का भी प्रयास किया।

शिकायत में पीड़िता ने आरोप लगाया है कि सोमवार को आरोपित की अम्मी ने भी उसे फ़ोन पर जान से मारने की धमकी दी। अब आरोपित पीड़िता को छोड़ कर रुद्रपुर में एक अन्य लड़की के साथ रह रहा है। पुलिस के मुताबिक मामले में जाँच के बाद जरूरी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

पुरानी रंजिश में सैफ ने किया हिन्दू लड़की का अपहरण

वहीं लव जिहाद का एक अन्य मामला नैनीताल जिले के हल्द्वानी से आया है। यहाँ के थाना काठगोदाम में 8 जुलाई 2023 (शनिवार) को सैफ नाम के मुस्लिम युवक पर एक हिन्दू लड़की के अपहरण का आरोप लगा। पीड़िता के पिता ने अपनी शिकायत में बताया कि सैफ ने उनकी बेटी का अपहरण पुरानी रंजिश का बदला लेने के लिए किया था। पुलिस ने IPC की धारा 363 और 366 के तहत केस दर्ज किया और सैफ की तलाश शुरू कर दी। ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है।

इस मामले में बजरंग दल ने आरोपित की जल्द गिरफ्तारी की माँग की थी। आखिरकार पुलिस ने 10 जुलाई 2023 (सोमवार) को सैफ को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई कर रही है। बजरंग दल के जिला संयोजक जोगिंदर राणा जोगी ने ऑपइंडिया से बात करते हुए कहा कि जिस मोहल्ले से हिन्दू लड़की का अपहरण हुआ था, वह मुस्लिम बाहुल्य है।

मुस्लिम महिला संग राजकुमार ने बनाई रील, अशफाक और मेराज ने पार्क में बुला चाकुओं से गोद डाला: दिल्ली में बिहार के युवक की हत्या

मुस्लिम महिला के साथ रील बनाने के कारण दिल्ली में एक युवक की हत्या कर दी गई। मृतक की पहचान 20 साल के राजकुमार के तौर पर हुई है। वह बि​हार के अररिया जिले का रहने वाला था। उसकी हत्या के आरोप में अशफाक और मेराज की गिरफ्तारी हुई है। राजकुमार की हत्या 2 जुलाई 2023 को की गई थी। अगले दिन एक पार्क के पास उसका शव मिला था। 27 जून को उसने जिस महिला के साथ रील बनाई थी, वह अशफाक की भाभी है। उसे अपनी भाभी और राजकुमार के बीच अवैध संबंध होने का शक था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मामला उत्तरी दिल्ली के जखीरा इलाके का है। 3 जुलाई को पुलिस के इंदरलोक इलाके में एक युवक का शव मिला था। इस शव को एक पार्क के पास झाड़ियों में छिपाया गया था। मृतक के पास से कोई दस्तावेज नहीं मिला था। पुलिस ने शव को कब्ज़े में लेकर जाँच शुरू की। कई CCTV फुटेज खँगालने के बाद मृतक की पहचान बिहार के अररिया जिले के राजकुमार के तौर पर हुई।

पुलिस ने अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ हत्या का केस दर्ज कर जाँच शुरू की। जाँच के दौरान मुखबिर ने अशफाक और मेराज नाम के 2 व्यक्तियों को मामले में संदिग्ध बताया। पुलिस को मिले अन्य सुराग भी इन्ही दोनों की तरफ इशारा कर रहे थे। जब पुलिस ने अशफाक और मेराज को हिरासत में ले कर पूछताछ की तो दोनों ने अपना गुनाह कबूल कर लिया। अशफाक ने बताया कि उसे राजकुमार के साथ अपनी भाभी से अवैध संबंधों का शक था।

27 जून को राजकुमार और अशफाक की भाभी ने एक साथ रील बनाई थी। अशफाक के मुताबिक इस रील के कारण उसकी काफी बेइज्जती हुई। इसके बाद उसने राजकुमार की हत्या का प्लान बनाया। उसकी योजना 30 जून को ही हत्या करने की थी। लेकिन उस दिन शांति भंग के आरोप में वह गिरफ्तार हो गया। छूटने के बाद उसने मेराज के साथ मिलकर 2 जुलाई को राजकुमार को मिलने के लिए शहजादा बाग़ में बुलाया। यहीं दोनों ने चाकुओं से गोद कर राजकुमार की हत्या कर दी। उसकी लाश झाड़ियों में छिपाकर फरार हो गए। आरोपितों ने पुलिस को बताया कि राजकुमार अपने गाँव नहीं जाता था, इसलिए उन्हें लगा कि कोई उसकी तलाश नहीं करेगा।

सीमा हैदर नहीं आई तो हिंदू महिलाओं से करेंगे बलात्कार: पाकिस्तान से आया धमकी वाला Video, कहा- इज्जत प्यारी है तो हमारी लड़की वापस भेजो

सचिन के ‘प्यार’ में भारत आई सीमा हैदर को वापस भेजने के लिए पाकिस्तान से एक वीडियो आया है। इसमें बलूचिस्तान के झकरानी कबीले से ताल्लुक रखने वाले एक समूह ने सीमा हैदर की वापसी नहीं होने पर इसका बदला हिंदू महिलाओं से लेने की धमकी दी है। कहा है कि उसे वापस नहीं भेजा गया तो हिंदू महिलाओं का बलात्कार कर हत्या कर दी जाएगी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सीमा हैदर को पाकिस्तान भेजने के लिए धमकी दे रहा शख्स डकैत रानो शार है। उसने वीडियो जारी कर कहा है, “हमारी अपील है, हम झकरानी कबीले वाले हैं। हमारी लड़की इधर से गई है। पाकिस्तान से भारत के दिल्ली में गई है। ये बात समझ लो अगर तुमने हमारी लड़की वापस नहीं की तो जहाँ-जहाँ हिंदू महिलाएँ हैं वहाँ-वहाँ बलात्कार होगा। इज्जत प्यारी है तो हमारी लड़की बच्चों समेत वापस कर दो। हम बलूच कौम हैं, झकरानी हैं।” वीडियो में दिख रहा शख्स हिंदू महिलाओं को गालियाँ देता हुआ भी नजर आ रहा है।

बता दें कि अवैध रूप से भारतीय सीमा में प्रवेश करने के आरोप में नोएडा पुलिस ने सीमा हैदर को गत 3 जुलाई 2023 को गिरफ्तार किया था। 4 बच्चों की अम्मी सीमा हैदर ने पुलिस पूछताछ में बताया था कि उसका शौहर दुबई में नौकरी करता है। कोरोना महामारी के दौरान पबजी गेम खेलते हुए उसकी बातचीत नोएडा में रहने वाले सचिन से हुई। इसके बाद बातचीत आगे बढ़ी और दोनों में प्यार हो गया। सचिन के प्यार में सीमा हैदर ने पाकिस्तान में बना अपना घर बेंचकर भारत आने का फैसला किया। इसके लिए वह अपने 4 बच्चों के साथ नेपाल के रास्ते भारत आ गई।

भारत आने के बाद सचिन ने उसे रबूपुरा के अंबेडकर नगर मोहल्ले में किराए पर मकान दिला दिया था। उसके बच्चों के नाम मुस्लिमों की तरह थे। लेकिन वह हिंदू बनकर रह रही थी। बकरीद मनाने के चलते उसकी सच्चाई लोगों को उस पर शक हुआ। सूचना पाकर पुलिस ने सीमा हैदर, सचिन और उसके पिता नेत्रपाल को गिरफ्तार कर लिया था। हालाँकि इसके बाद 7 जुलाई को कोर्ट ने गिरफ्तार आरोपितों को जमानत पर रिहा कर दिया था। कोर्ट से रिहा होने के बाद सीमा ने हिंदू धर्म अपनाने और सचिन के साथ शादी करने का दावा किया था। 

हिमाचल प्रदेश में 23 दिनों से चल रहा था ईसाई धर्मांतरण का शिविर, हिंदू संगठनों ने किया पर्दाफाश: 11 गिरफ्तार, बाइबिल और कैश बरामद

भारी बारिश और बाढ़ का प्रकोप झेल रहे हिमाचल प्रदेश में ईसाई मिशनरी शिविर लगाकर धर्मान्तरण के कार्य में लगे हुए थे। रामपुर बुशहर इलाके में 23 दिनों से यह शिविर चल रहा था। हिन्दू संगठनों की सक्रियता से इनका पर्दाफाश हुआ। 11 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इनमें कुछ नेपाल के भी नागरिक बताए जा रहे हैं। इन सबको सरकारी बस से रामपुर से दिल्ली जाते समय 8 जुलाई 2023 को पकड़ा गया था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक हिमाचल परिवहन निगम की एक बस रामपुर से दिल्ली जा रहे थे। बस रामपुर के पुराने बस अड्डे पर रुकी तो कुछ लोग नीचे उतर कर आस-पास के लोगों से धर्मान्तरण की बात करने लगे। जब इसकी जानकारी हिन्दू संगठनों को हुई तो वे बस स्टॉप पर पहुँचे। उन्होंने इन लोगों को पुलिस के हवाले कर दिया। इस घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। वायरल वीडियो में हिन्दू संगठन के सदस्य बस में जा कर पूछताछ करते दिख रहे हैं।

हिन्दू संगठनों के मुताबिक 23 दिनों से रामपुर बुशहर के शैली गाँव में शिविर चल रहा था। बस में सवार लोग इस शिविर में शामिल होकर दिल्ली लौट रहे थे। इस दौरान रामपुर बस अड्डे के पास वे ईसाइयत का प्रचार करने लगे और पकड़े गए। जब शैली गाँव में शिविर की पड़ताल की गई तो वहाँ बाइबिल सहित कैश बरामद हुए। हिन्दू संगठन के सदस्यों ने इस पूरे प्रकरण की गहराई से जाँच की माँग की है।

विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ता प्रणेश ने एक वीडियो जारी करते हुए बताया कि बस में सवार एक नेपाली जैसी दिख रही महिला ने उनसे कहा, “आज भी तुम्हारे पास मौका है। तुम सुधर जाओ और ईसाई धर्म अपना लो। क़यामत होने वाली है।”

इस मामले में पुलिस ने 295/341 के तहत केस दर्ज कर 11 लोगों को गिरफ्तार किया है। रामपुर के थाना प्रभारी करमचंद के मुताबिक मामले में आगे की जाँच व कार्रवाई की जा रही है।

‘सीता की सुंदरता से पागल थे राम और रावण’: गहलोत सरकार के मंत्री के बिगड़े बोल, भगवान राम को ‘मनहूस’ भी बता चुके हैं राजस्थान के कॉन्ग्रेसी नेता

हिंदू देवी-देवताओं का अपमानित करने का कॉन्ग्रेसियों का इतिहास पुराना रहा है। राजस्थान में विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही एक कॉन्ग्रेस नेता ने माता सीता को अपमानित करने वाला बयान दिया है। गहलोत सरकार में मंत्री राजेन्द्र सिंह गुढ़ा ने न केवल खुद की तुलना माता सीता से की है, बल्कि यह भी कहा है कि भगवान राम और रावण दोनों ही माता सीता की सुंदरता के चलते पागल थे।

राजस्थान के होमगार्ड और सैनिक कल्याण राज्य मंत्री राजेन्द्र सिंह गुढ़ा झुंझुनूं के गुढ़ागौड़जी सीएचसी में एक्सरे मशीन का उद्घाटन करने पहुँचे थे। इस दौरान गुढ़ा ने कहा, “सीता माता की सुंदरता की कोई कल्पना नहीं की जा सकती। उनके आकर्षण के कारण ही श्रीराम और रावण जैसे अद्भुत इंसान पागल हो गए। उनकी सुंदरता की कोई कल्पना नहीं की जा सकती। इसी तरह गहलोत और पायलट दोनों आजकल मेरे पीछे भाग रहे हैं। मुझमें कोई तो क्वालिटी होगी।”

गुढ़ा ने आगे कहा,”आजकल लोग चर्चा कर रहे हैं कि गुढ़ा इस बार कौन सी पार्टी से टिकट लाएगा। मैं उन लोगों को बताना चाहता हूँ कि मुझे तो मेरे काम के आधार पर, मेरे खुद के चेहरे पर वोट मिलते हैं। किसी पार्टी के चुनाव चिन्ह पर नहीं।” बता दें कि राजेन्द्र सिंह गुढ़ा इससे पहले भी अपने बयानों के चलते विवादों में रहे हैं। नवंबर 2021 में उन्होंने कहा था कि उनके गाँव की सड़कें ‘हेमा मालिनी के गाल’ की तरह होनी चाहिए। कुछ देर रुकने के बाद उन्होंने हँसते हुए आगे कहा था कि हेमा मालिनी अब बूढ़ी हो चुकी हैं। इसलिए उनके गाँव की सड़कें ‘कैटरीना कैफ के गाल’ की तरह होनी चाहिए।

गहलोत सरकार में मंत्री गुढ़ा के इस बयान पर BJP ने कड़ा एतराज जताते हुए उन्हें बर्खास्त करने की माँग की है। भाजपा प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने ट्वीट कर कहा है, “यह बयान चौकाने वाला है। इसे किसी भी तरह से स्वीकार नहीं किया जा सकता। अशोक गहलोत के मंत्री ने कहा कि प्रभु राम माता सीता की सुंदरता के पीछे पागल थे। माता सीता और प्रभु राम पर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी कॉन्ग्रेस का असली हिंदू विरोधी चेहरा दिखाती है। श्रीराम के अस्तित्व को नकारा, राम मंदिर का विरोध किया, हिंदू आतंकवाद का नैरेटिव तैयार किया, गीता प्रेस का विरोध और अब प्रभु राम और माता सीता का अपमान। कॉन्ग्रेस को इस व्यक्ति को बर्खास्त करना चाहिए।”

हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करते रहे हैं कॉन्ग्रेसी

बात दें कि इससे पहले इसी साल अप्रैल में कॉन्ग्रेस नेता चताराम देशबंधु ने कथित तौर पर भगवान राम के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की थी। चताराम ने भगवान राम को ‘घटिया मनहूस आदमी’ कहा था। वहीं राजस्थान की मंत्री शकुंतला रावत ने फरवरी 2023 में अशोक गहलोत की तुलना भगवान से की थी। अक्टूबर 2022 में राजस्थान सरकार में मंत्री परसादी लाल मीणा ने राहुल गाँधी को भगवान राम से बड़ा बता दिया था। मीणा ने कहा था कि राहुल गाँधी 3500 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर रहे हैं और वह भगवान राम से अधिक पैदल चल रहे हैं। त्रेता युग में वनवास के समय भगवान राम ने भी इतनी लंबी यात्रा नहीं की थी। मीणा ने आगे कहा था कि भगवान राम अयोध्या से श्रीलंका तक पैदल गए थे और उससे भी ज्यादा राहुल गाँधी की यह ऐतिहासिक पदयात्रा जो कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक जाएगी।

बरखा दत्त, इरफ़ान हबीब, रोमिला थापर… अधिवक्ता J साई दीपक ने बताया किन 3 लोगों को मिलना चाहिए ‘देश निकाला’, यूट्यूबर पर पिल पड़े लिबरल

सोशल मीडिया पर इस बात पर चर्चा हो रही है कि प्रोपेगंडा पत्रकार बरखा दत्त, वामपंथी इतिहासकारों इरफ़ान हबीब और रोमिला थापर को देश से निकाला जाए या नहीं। दरअसल, YouTube पर ‘Beer Biceps’ के एक वीडियो के बाद ये चर्चा हो रही है। असल में उनके वीडियो में अधिवक्ता J साई दीपक आए हुए थे। उनसे पूछा गया था कि ऐसे कौन से 3 लोग हैं जिन्हें देश से निकाल दिया जाना चाहिए? इसके जवाब में उन्होंने इन तीनों का नाम लिया।

जब उनसे पूछा गया कि इन तीनों का नाम लेने के पीछे कारण क्या है, तो उन्होंने कहा कि इन तीनों ने ही अपने-अपने तरीके से देश का नुकसान किए है। उन्होंने कहा कि इन तीनों ने ही तथ्यों, सत्य और इतिहास और नैतिकता के साथ गंभीर अन्याय किया है। इसके बाद लिबरल गिरोह में हाहाकार मच गया। ‘नीमो ताई’ नामक ट्विटर हैंडल ने ‘बियर बायसेप्स’ पर सरकार के साथ मिले होने का आरोप लगाया। वहीं RJ सायमा ने कहा कि सेंसेशनल कंटेंट बनाने के लिए और चंद पैसों-लाइक्स के लिए लोगों का जीवन खतरे में डाला जा रहा है।

वहीं बरखा दत्त ने कहा कि ये हैरान करने वाला है कि इस तरह के सवाल भी पूछे जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि भला इस तरह के सवाल कौन पूछता है? सोशल मीडिया में लोगों ने कहा कि कारगिल युद्ध में बरखा दत्त की रिपोर्टिंग के कारण हमारे जवानों को जान गँवानी पड़ी थी। साथ ही याद दिलाया कि कैसे रोमिला थापर और इरफ़ान हबीब ने मुगलों का महिमामंडन कर के हमारी इतिहास की पुस्तकों को बर्बाद कर दिया। लोगों ने पूछा कि जब नूपुर शर्मा के जीवन को मोहम्मद जुबैर ने खतरे में डाला तब सब क्यों चुप थे?

लोगों ने बरखा दत्त का पुराना ट्वीट भी शेयर किया, जिसमें उन्होंने लिखा था कि VHP के पूर्व अध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया और AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी को भारत छोड़ देना चाहिए। लोगों ने पूछा कि जब बरखा दत्त ऐसा कहें तो ठीक, किसी और ने कहा तो गलत कैसे हो गया? वहीं कुछ लोगों ने कहा कि वो चाहते हैं कि बरखा दत्त, रोमिला थापर और इरफ़ान हबीब इसी भारत में रहें, साथ ही खुद को गर्त में जाते हुए देखें। बता दें कि तीनों ने एक से बढ़ कर एक प्रोपेगंडा चलाया है।

बता दें कि कोरोना काल में बरखा दत्त ने शमशान से रिपोर्टिंग कर के सनसनी पैदा करने की कोशिश की थी। आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद भी बरखा दत्त ने उसका महिमामंडन करने की कोशिश की थी। इतना ही नहीं, मुंबई के 26/11 हमलों में उनकी रिपोर्टिंग के कारण आतंकियों को फायदा हुआ था। आतंकी टीवी देख रहे थे और बरखा दत्त द्वारा होटल में कॉल किए जाने के कारण की लोगों के छिपे होने की लोकेशन उन्हें पता चल गया। सवाल पूछने पर एक व्यक्ति को बरखा दत्त ने लीगल नोटिस भेज दिया था।

वहीं रोमिला थापर के इतिहास ज्ञान का उदाहरण लीजिए। रोमिला थापर अपने एक लेख में मानती हैं कि महाभारत का युद्ध 3102 ईसा-पूर्व में हुआ था। यही रोमिला थापर कहती हैं कि 232 ईसा-पूर्व तक राज करने वाले अशोक से 3102 ईसा-पूर्व के बाद राज करने वाले युधिष्ठिर ने प्रेरणा ली। JNU द्वारा सीवी माँगे जाने के बाद रोमिला थापर ने विश्वविद्यालय के नियम-कायदों को मानने से इनकार करते हुए कहा था कि वो सीवी नहीं देंगी। उन्होंने गलत-सलत इतिहास की बातें लिखीं।

इसी तरह, इरफ़ान हबीब भी एक कुख्यात इतिहासकार हैं जो केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान से मंच पर ही हाथापाई करने लगे थे। उन्होंने AMU में जहरीला भाषण देकर छात्रों को भड़काया था। इतना ही नहीं, इरफ़ान हबीब औरंगजेब के महिमामंडन के लिए भी जाने जाते हैं। 90 वर्ष की उम्र में भी उनका अंदर का ज़हर कम नहीं हुआ है और वो अपने लिखे की आलोचना सुनना नहीं चाहते। उन्हें देश की अखंडता और एकता के लिए खतरा बताते हुए नोटिस भी जारी किया गया था।

370 पर शाह फैसल+शेहला रशीद को सुप्रीम कोर्ट ने याचिका वापस लेने की अनुमति दी, संवैधानिक पीठ 2 अगस्त से करेगी सुनवाई

आर्टिकल 370 को निरस्त करने के केंद्र सरकार के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ 2 अगस्त 2023 से सुनवाई करेगी। मंगलवार (11 जुलाई 2023) को शीर्ष अदालत ने कहा कि इस मामले की सुनवाई सोमवार और शुक्रवार को छोड़कर रोजाना आधार पर होगी। साथ ही आईपीएस अधिकारी शाह फैसल और फ्रीलांस प्रदर्शनकारी शेहला रशीद को इससे जुड़ी अपनी याचिका वापस लेने की भी अनुमति दे दी है।

इस मामले की सुनवाई करने वाली संवैधानिक पीठ में मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस संजय किशन कौल, संजीव खन्ना, बीआर गवई और सूर्यकांत शामिल हैं। पीठ ने सभी पक्षों को 27 जुलाई तक सभी दस्तावेज, संकलन और लिखित प्रस्तुतियाँ दाखिल करने के भी निर्देश दिए हैं।

उल्लेखनीय है कि आर्टिकल 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को हासिल विशेष दर्जा खत्म किए जाने के बाद शाह फैसल और शेहला रशीद ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। लेकिन बाद में दोनों ने ही कोर्ट से कहा कि वे इस मामले में ‘पक्ष’ नहीं बनना चाहते। इसलिए याचिका से उनके नाम हटा दिए जाएँ। मंगलवार की सुनवाई के दौरान दोनों की अपील स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उनका नाम याचिका से हटाने का आदेश दिया है।

 केंद्र के हलफनामा पर विचार नहीं

अनुच्छेद 370 को हटाने के अपने फैसले को लेकर केंद्र सरकार ने सोमवार (10 जुलाई 2023) को सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया था। इस हलफनामे में केंद्र ने कहा था कि जम्मू-कश्मीर ने तीन दशक तक आतंकवाद झेला है। इसे खत्म करने के लिए अनुच्छेद 370 को खत्म करना एकमात्र विकल्प था। अनुच्छेद 370 हटने के बाद से जम्मू-कश्मीर में शांति, उन्नति और समृद्धि का ऐसा माहौल बन गया है, जैसा पहले कभी नहीं रहा। साथ ही कहा था कि 3 दशक के लंबे समय तक घाटी में रही अस्थिरता के बाद अब जन-जीवन सामान्य हो गया है। 

इसके अलावा स्कूल-कॉलेज, हॉस्पिटल समेत अन्य संस्थानों के अच्छी तरह से चलने की बात कही गई है। बताया गया है कि रोजाना होने वाली पत्थरबाजी और विरोध प्रदर्शन जैसी घटनाएँ भी अब बंद हो गईं हैं। यही नहीं केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव कराने तथा G-20 जैसी बड़ी बैठक कराने का भी उदाहरण अपने हलफनामे में दिया है। हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इस सुनवाई के दौरान वह केंद्र के हलफनामे पर विचार नहीं करेगा।

AFSPA हटाने का नुकसान, ट्राइबल्स, चीन, ड्रग्स… कर्नल ने समझाया मणिपुर हिंसा का हर पहलू, बोले- ये हिन्दू बनाम ईसाई नहीं

कर्नल (रिटायर्ड) हनी बक्शी ने ‘वाद’ नामक YouTube चैनल पर मणिपुर में जारी हिंसा को लेकर बातचीत की है। इस दौरान उन्होंने कहा कि नागा समुदाय भी ST में आते हैं, लेकिन उन्होंने हिंसा में हिस्सा नहीं लिया। उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज के बीच टकराव आज से नहीं है, बल्कि ये उस इलाके की सभ्यतागत लड़ाइयाँ हैं। नागा-कुकी की लड़ाइयाँ होती थीं। 90 के दशक में एक पूरा गाँव जला दिया गया था। नागा समाज के भीतर भी कई समुदाय आपस में लड़ते रहते हैं।

उन्होंने बताया कि जब तक भारतीय सेना उधर थी, ये लड़ाइयाँ नियंत्रण में रहीं। उन्होंने कहा कि मणिपुर का सभ्य समाज, जो लोग केंद्र के विरोध में बोलते थे और AFSPA हटाने के लिए दबाव बनाया गया – वो अब चुप हैं। उन्होंने समझाया कि इस कानून के तहत किसी को भी गोली मारने की इजाजत नहीं थी, कोई किसी को ऐसे ही गोली नहीं मार सकता। उन्होंने बताया कि एनकाउंटर्स के समय एक खास परिस्थिति में गोली चलाने की अनुमति है।

‘AFSPA हटाए जाने के कारण हुआ नुकसान’

उन्होंने बताया कि भारतीय सेना के भीतर संस्थाएँ इतनी कड़ी हैं कि किसी ने गलत किया तो सज़ा मिलती ही मिलती है। कर्नल हनी बक्शी ने ‘संवाद’ कार्यक्रम में जानकारी दी कि आफ्स्पा से सिर्फ एक लीगल प्रोटेक्शन मिलता है, लेकिन 2022 में मणिपुर में 15 पुलिस थानों से आफ्स्पा हटा दिया गया, अगले साल मार्च आते-आते 19 पुलिस थाना क्षेत्रों से ये नियम हट गए, जिसके बाद राष्ट्रहित में काम करने के लिए वहाँ सुरक्षा बलों को प्रोटेक्शन नहीं मिली।

उन्होंने बताया कि सिविल सोसाइटी के दबाव में ऐसा किया गया, क्योंकि इसे राजनीतिक मुद्दा बना दिया गया था। उन्होंने कहा कि भारतीय सेना तो चाहिए, लेकिन वो किस कानून के तहत संचालित हो? उन्होंने बड़ी जानकारी दी कि भारतीय सेना के पास गोली चलाने की भी अनुमति नहीं है, बिना मजिस्ट्रेट की अनुमति के सेना फायर नहीं कर सकती। उन्होंने कहा कि ये लोकतांत्रिक राष्ट्र की सेना है। उन्होंने कहा कि कानूनी बंधन हैं कुछ, सेना आएगी लेकिन लीगल प्रोटेक्शन तो चाहिए?

उन्होंने कहा कि अगर किसी जवान ने गोली चला दी तो जीवन भर कोर्ट का चक्कर लग जाएगा। उन्होंने उदाहरण दिया कि एक ‘शौर्य चक्र’ विजेता कई वर्षों तक अदालत के चक्कर लगाता रहा, ये सब आफ्स्पा के बावजूद हुआ। ऐसा इसीलिए हुआ, क्योंकि सिविल सोसाइटी से कुछ लोगों ने केस कर दिया था। उन्होंने बताया कि कई बार अपराधी उस क्षेत्र में भाग जाते हैं, जहाँ AFSPA लागू नहीं है और वहाँ गोली लगने पर केस हो जाता है। उन्होंने आफ्स्पा हटाने के फैसलों के पीछे कुछ NGO भी थे, जिनमें से कइयों विदेशी फंडिंग अब रोकी गई है।

मणिपुर की स्थिति पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि अपराधियों को पकड़ने के बाद महिलाएँ आकर घेर लेती हैं, ऐसी स्थिति में महिलाओं पर गोली चलाने की बजाए अपराधियों को जाने दिया जाता है। उन्होंने कहा कि अब आफ्स्पा तभी आएगा, जब खुद लोग इसे माँगेंगे। उन्होंने बताया कि ‘नागा नेशनल काउंसिल (NNC)’ जैसी संगठनों के साथ डील के बाद मणिपुर शांत था और वहाँ विकास हो रहा था। उन्होंने बताया कि ऐसे कुछ ग्रुप्स को स्पेशल ट्रीटमेंट मिल गई, जिसके बाद कोई भी समूह बना कर खुद को अलगाववादी बताने लगा।

‘चीन भी कर रहा भारत में अशांति के लिए निवेश, दे रहा हथियार’

उन्होंने बताया कि केवल मणिपुर में ही 55-56 अलगाववादी संगठन हैं, जिन्हें आतंकवादी कह लीजिए। वो सभी हथियारबंद हैं। उन्होंने बताया कि पड़ोस से वहाँ हथियार आ रहा है, चीन ने इसमें इतना निवेश किया है। चीन भारत में अशांति चाहता है। उन्होंने बताया कि जिन जज ने मेइती हिन्दुओं को ST में शामिल करने की सलाह दी, वो नॉन-मणिपुर थे, कोई मेइती नहीं थे। उन्होंने बताया कि खुद पहाड़ी कुकी समाज ने कहा था कि विदेशी घुसपैठियों को डिटेंशन सेंटरों में डालने के लिए कहा था।

मणिपुर में मजहब कहाँ से आ गया? इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि अगर एक ट्राइब ईसाई बैनर के नीचे बात करती है तो कहीं गड़बड़ है। अमेरिकी राजदूत द्वारा मदद के ऑफर पर उन्होंने कहा कि ‘चर्च ऑफ नॉर्थ अमेरिका’ का यहाँ बहुत प्रभाव है, लेकिन उन्हें नहीं लगता ये हो पाएगा क्योंकि ये हमारा आंतरिक मामला है। UCC पर उन्होंने कहा कि शिक्षा और आवागमन के कारण नॉर्थ ईस्ट के लोगों में भारतीयता का भाव आया। उन्होंने कहा कि उन्हें इसका खेद है कि हमारे ही लोगों ने इन्हें स्वीकार नहीं किया।

उन्होंने नॉर्थ ईस्ट के लोगों को ‘चिंकी’ कहे जाने वाले ट्रेंड का विरोध किया। उन्होंने कहा कि चर्च ने मणिपुर में बहुत विभाजन कर दिया है, ईसाइयों में भी अलग-अलग संप्रदाय हैं। उन्होंने समझाया कि अंग्रेजों के आने से पहले ये लोग काफी अलग-थलग थे, ऐसे में 150 वर्षों में यहाँ तक आ पाए हैं। उन्होंने इसकी वकालत की कि नागा समाज को मीडिएटर बन कर सामने आना चाहिए और बातचीत करानी चाहिए। उन्होंने मणिपुर के भूगोल की बात करते हुए कहा कि घने जंगल और पहाड़ियों में काम करना मुश्किल होता है।

उन्होंने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि सुरक्षा बल जब जाते हैं तो ये लोग घंटी बजा कर सूचना दे देते हैं और सब इकट्ठे हो जाते हैं। उन्होंने इसमें ड्रग्स एंगल की भी बात की। उन्होंने मजाकिया लहजे में कहा कि अफगानिस्तान के बाद नॉर्थ ईस्ट के ‘माल’ की चर्चा होती है। उन्होंने कहा कि जहाँ आतंकवाद होगा, वहाँ ड्रग्स होगा ही। कर्नल हनी बक्शी ने बताया कि जिन आतंकी संगठनों का जहाँ प्रभाव है वहाँ के व्यापारियों से वो रंगदारी लेते हैं। इस दौरान रिटायर्ड कर्नल ने मणिपुर में हिन्दू बनाम ईसाई एंगल को भी नकार दिया।

उन्होंने कहा कि म्यांमार से कई समूह हथियारों के साथ मणिपुर में आए हैं। कर्नल हनी बक्शी ने बताया कि नागा समाज के भीतर भी 150 से अधिक ट्राइब्स हैं। इनके अधिकतर गाँव पहाड़ों के ऊपर हैं, जबकि पानी के लिए नदी के किनारे घर बनाए जाते हैं सामान्यतः, लेकिन पहाड़ पर से उन्हें सब पर नजर रखने में सहूलियत होती है। उन्होंने नॉर्थ ईस्ट में हत्याओं को बंद करने में चर्च के रोल को स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि आज की तारीख़ में जब हम ग्लोबल विलेज हैं, हर ट्राइब को अलग राज्य देना संभव नहीं है क्योंकि उनके भीतर भी कई समूह हैं।

केंद्र में हो BJP तो कंट्रोल में रहती है कीमतें, कॉन्ग्रेस राज में बढ़ती है महँगाई : आँकड़े झूठ नहीं बोलते, इसलिए 1991 से लेकर अब तक के नंबर्स आपके लिए

मौसमी सब्जियों की कीमतों में बढ़ोतरी के चलते विपक्ष महँगाई का ढिंढोरा पीट रहा है। शुक्रवार (7 जुलाई 2023) को कॉन्ग्रेस का समर्थन करने वाले कई सोशल मीडिया हैंडल्स ने ‘ModiFlation’  हैशटैग के साथ महँगाई के मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेरने की कोशिश की। दावा किया जा रहा है कि PM मोदी के सत्ता सँभालने के बाद से महँगाई में 2-3 गुना की बढ़ोतरी हुई है। साल 2013 की महँगाई से तुलना करते हुए कॉन्ग्रेस और उनके समर्थक यह कह रहे हैं कि BJP सरकार महँगाई रोकने में नाकाम रही है।

बीते कुछ हफ्तों में महँगाई बढ़ने की बात तेजी से हो रही है। हालाँकि ऐसा पहली बार नहीं है कि मानसून के दौरान सब्जियों की कीमत बढ़ी हो। दरअसल, भारी बारिश के चलते किसान अपनी सब्जियाँ बाजार तक नहीं पहुँचा पा रहे हैं। साथ ही जो सब्जियाँ बाजार में पहुँचती हैं वे मौसम की मार के चलते जल्द ही खराब भी हो रही हैं। ऐसे में कीमतों का बढ़ना स्वाभाविक है। लेकिन राजनीतिक पार्टियों और उनके समर्थकों को यह ‘आपदा में अवसर’ की तरह नजर आ रहा है। इसलिए वे ‘मौसमी महँगाई’ का शोर मचाकर केंद्र सरकार पर निशाना साधने की कोशिश कर रहे हैं।

क्या सच में महँगाई बढ़ गई है?

महँगाई-महँगाई के शोर के बीच के आँकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि बीजेपी के सत्ता में रहते हुए महँगाई में कमी आई है। वहीं, कॉन्ग्रेस के सत्ता में आते ही कीमतें में इजाफा होना शुरू हो जाता है। बीते 10 वर्षों में भी महँगाई दर में कमी ही देखने को मिली है। महँगाई बढ़ने और घटने की सच्चाई जानने के लिए ऑपइंडिया ने साल 1991 से लेकर अब तक के विश्व बैंक के आँकड़ों का अध्ययन किया है। दूसरे शब्दों में कहें तो मनमोहन सिंह के वित्त मंत्री बनने से लेकर नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री के कार्यकाल तक के आँकड़ें देखे हैं।

इन आँकड़ों के अनुसार, साल 1991 से लेकर 1995 तक कॉन्ग्रेस सत्ता में थी। इस दौरान 1991 में महँगाई दर 13.90% रही। वहीं 1992 में 11.80%, 1993 में 6.33%, 1994 और 1995 में महँगाई दर 10.20 प्रतिशत थी। साल 1996 में जनता दल के सत्ता में आते ही महँगाई दर 10% के नीचे पहुँच गई। उस साल महँगाई दर 8.98 प्रतिशत थी। वहीं साल 1997 में घटते हुए 7.16 प्रतिशत पहुँच गई।

जब केंद्र में रहती है बीजेपी तो नियंत्रण में रहती है महँगाई, स्रोत: वर्ल्ड बैंक

मार्च 1998 में सत्ता बीजेपी के हाथों में आई। इस साल महँगाई दर बढ़कर 13.20% पहुँच गई। लेकिन, बाद के वर्षों में बीजेपी ने महँगाई पर ऐसा कंट्रोल किया कि एक बार भी 5% के आँकड़ों को पार नहीं कर सकी। जहाँ 1998 में महँगाई 13% से अधिक थी, वहीं 1999 में यह तेजी से गिरकर 4.67% पर पहुँच गई। इसके बाद 2000 में 4.01%, 2001 में 3.78%, 2002 में 4.30%, 2003 में 3.81% और 2004 में 3.77% रही।

इसके बाद, कॉन्ग्रेस सत्ता में आई और ‘महान अर्थशास्त्री’ मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया गया। साल 2005 मनमोहन सिंह के कार्यकाल का पहला वर्ष था। इस साल महँगाई दर बढ़कर 4.25% पहुँच गई। वास्तव में साल 1991 के बाद से कॉन्ग्रेस के सत्ता में रहते हुए पहली और आखिरी बार हुआ था कि महँगाई दर 5% के नीचे रही हो। साल 2006 में महँगाई 5.8% पहुँच गई। इसके बाद लगातार बढ़ते हुए 2007 में 6.37%, 2008 में 8.35%, 2009 में 10.90%, 2010 में 12%, 2011 में 8.91%, 2012 में 9.48% और 2013 में 10% रही।

मई 2014 में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने। इसके कुछ महीनों बाद ही महँगाई 10% से घटकर 6.67% पर पहुँच गई। वहीं 2015 में, 5 प्रतिशत से नीचे यानी 4.91% हो गई। इसके बाद 2016 में महँगाई दर 4.95%, 2017 में 3.33%, 2018 में 3.94% और 2019 में 3.73% रही।

साल 2020 में पूरी दुनिया कोविड-19 महामारी से जूझ रही थी। ऐसे समय में तमाम देशों में महँगाई बढ़ना लाजिमी था। लेकिन भारत में अर्थव्यवस्था और महँगाई दोनों पर नियंत्रण बनाए रखा गया। वास्तव में उस साल महँगाई दर 6.62% रही। इसके बाद 2021 में 5.13%, 2022 में 6.70% रही। वहीं साल 2023 के रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया का अनुमान है कि महँगाई दर 5.1% रहेगी।

इन आँकड़ों से स्पष्ट पता चलता है भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के केन्द्र की सत्ता में रहते हुए महँगाई ज्यादातर समय 5% के नीचे ही रही। वहीं 2014 में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के सत्ता में आने के बाद महँगाई न केवल 5% के ऊपर रही बल्कि 10 और 12% के आँकड़ों को भी पार गई।

कॉन्ग्रेस के सत्ता में रहते हुए साल 2010 में महँगाई दर 12% पहुँच गई थी। ऐसे समय में बॉलीवुड फिल्म ‘पीपली लाइव’ में भी महँगाई के चलते देश की हालत दिखाई गई थी। यही नहीं फिल्म का गाना ‘सखी सैंया तो खूब ही कमात हैं, महँगाई डायन खाए जात है’, लंबे समय तक लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ था। दरअसल, तब महँगाई दर आज की तुलना में करीब ढाई गुना अधिक थी। बेशक आज टमाटर समेत अन्य मौसमी सब्जियों के चलते ‘मौसमी महँगाई’ अधिक नजर आ रही है। लेकिन आँकड़ों को देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि महँगाई का यह शोर सिर्फ राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए मचाया जा रहा है। बीते 10 वर्षों की महँगाई की सच्चाई यह है कि साल 2013 में महँगाई 10% थी और इस साल के अंत तक 5.1% रहने का अनुमान है।