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GST कलेक्शन में हुआ 12 फीसदी का इजाफा, पिछले महीने सरकारी खजाने में पहुँचे ₹1.61 लाख करोड़: एक देश-एक टैक्स के 6 साल पूरे

वस्तु एवं सेवा कर यानि जीएसटी को लागू हुए 6 वर्ष पूरे हो चुके हैं। देश में पहली बार 1 जुलाई 2017 को GST लागू हुआ था। बीते 6 वर्षों में जीएसटी कलेक्शन लगातार बढ़ता ही रहा है। केंद्र सरकार ने जून 2023 के जीएसटी कलेक्शन के आँकड़े जारी किए हैं। इसके मुताबिक, जून में सरकार को जीएसटी से 1.61 लाख करोड़ रुपए हासिल हुए। यह आँकड़ा बीते साल की तुलना में 12% अधिक है।

केंद्रीय वित्त मंत्रालय द्वारा जारी आँकड़ों के अनुसार, जून 2023 में जीएसटी का कुल कलेक्शन 161497 करोड़ रुपए रहा। इसमें से सीजीएसटी कलेक्शन 31013 करोड़ रुपए, एसजीएसटी कलेक्शन 38292 करोड़ रुपए, आईजीएसटी 80292 करोड़ रुपए तथा शेष अन्य टैक्स का कलेक्शन 11900 करोड़ रुपए रहा। जीएसटी का यह कलेक्शन जून 2022 की तुलना में 12% अधिक है। तब सरकार ने जीएसटी से 1.44 लाख करोड़ रुपए जुटाए थे। सीधे तौर पर देखें तो बीते एक साल में जीएसटी कलेक्शन में बम्पर उछाल हुआ है।

मंत्रालय द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि बीते 6 साल में यानी कि जीएसटी लागू से अब तक 4 बार GST कलेक्शन 1.6 लाख करोड़ रुपए से अधिक हो चुका है। वहीं, बीते 16 महीने से लगातार जीएसटी कलेक्शन 1.44 लाख करोड़ रुपए से अधिक रहा है। यही नहीं, GST की शुरुआत होने के बाद अब तक 7 बार जीएसटी कलेक्शन 1.5 लाख करोड़ रुपए से अधिक रहा है।

लगातार बढ़ रहा है GST Collection

जीएसटी लागू होने के बाद इसको लेकर कई तरह की भ्रांतियाँ थीं। साथ ही कई तरह की अफवाहें भी फैलाई जा रहीं थीं। हालाँकि बीते 3 वित्तीय वर्षों के आँकड़ों पर ही नजर डालें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि जीएसटी कलेक्शन में लगातार इजाफा हो रहा है। वित्तीय वर्ष 2021-22 की पहली तिमाही में जीएसटी कलेक्शन 1.10 लाख करोड़ रुपए था। वहीं, 2022-23 में यह बढ़कर 1.51 लाख करोड़ रुपए रहा। वहीं, अब जारी वित्तीय वर्ष 2023-24 की पहली तिमाही में GST कलेक्शन 1.69 लाख करोड़ रुपए हो गया है।

जीएसटी कलेक्शन के ये आँकड़े ऐसे समय में सामने आए हैं जब केंद्र की सत्ताधारी मोदी सरकार के 9 वर्ष पूरे हुए हैं। जीएसटी लागू करने को लेकर विपक्ष ने खूब हो हल्ला मचाया था। विपक्ष का कहना था कि इससे आम आदमी की जेब ढीली होगी और महँगाई 7वें आसमान पर पहुँच जाएगी। हालाँकि आँकड़े कहते हैं कि बीते 9 सालों में महँगाई दर में तेजी से कमी आई है। साल 2014 में महँगाई दर 6.65% थी। वहीं, जून 2023 में महँगाई दर 4.25% है। इसका सीधा मतलब है कि जीएसटी लागू होने से न केवल सरकार के राजस्व में बढ़ोतरी हुई है। बल्कि विपक्ष द्वारा किए गए फर्जी दावों की पोल खुल गई है।

10000 गाड़ियाँ फूँकी, 307 इमारतों को जला दिया, ₹1794 करोड़ का नुकसान… 18 साल पहले भी दहला था फ्रांस, नैरेटिव – बेरोजगारी-नस्लवाद से भड़के युवा

फ्रांस में ट्रैफिक नियमों को तोड़ रहे 17 वर्षीय नहेल नाम के एक मुस्लिम किशोर को गोली मार दी, जिसके बाद वहाँ दंगे भड़क गए। सैकड़ों गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया गया, कई सरकारी इमारतों को नुकसान पहुँचाया गया और सैकड़ों पुलिसकर्मियों को घायल कर दिया गया। यूरोप में घुसपैठियों का जम कर जम कर स्वागत किया गया, ऐसे में अब ये उनके गले की फाँस बनते दिख रहे हैं। फ्रांस में एक बड़े पुस्तकालय को भी फूँक दिया गया है। दंगे रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं।

क्या आपको पता है कि फ्रांस में 2005 में भी इसी तरह का दंगा हुआ था, जो इससे भी भयंकर था और लंबे समय तक चला था। तब देश में 1 महीने तक हिंसा जारी रही थी और पुलिस के बल प्रयोग का भी कोई असर नहीं पड़ रहा था। तब पहली बार था जब यूरोप के इस देश ने देखा था कि कैसे जिहाद के नाम पर भीड़ जुटाई जा सकती है। असल में तब भी दंगे 2 किशोरों की मौत के बाद ही शुरू हुए थे, जिनमें से एक अरब मूल का था तो एक अफ़्रीकी मूल का।

आइए, बताते हैं कि 2005 में क्या हुआ था। घटना उस वर्ष 27 अक्टूबर को शुरू होती है, जब क्लिची-सूस-बोइस सबअर्ब के 2 किशोरों की पेरिस के सबअर्ब सीन-सेंट-डेनिस में एलेक्ट्रोक्यूट होने की वजह से मौत हो गई। बताया गया कि पुलिस के डर से वो एक इलेक्ट्रिकल पॉवर स्टेशन में छिप गए थे, जिसके बाद ये घटना हुई। इसके बाद उसी रात उस इलाके में दंगे शुरू हुए और 23 गाड़ियों को आग के हवाले के दिया गया।

मृतकों में एक 15 वर्षीय किशोर का नाम Bouna Traoré था, जो अपने घर के 11 बच्चों में से एक था। वहीं दूसरे का नाम ज़ायद बेन्ना था, जो अपने घर की 6 संतानों में सबसे छोटा था। दोनों के पिता घरों की साफ़-सफाई का काम करते थे। जहाँ पहला मूल रूप से पश्चिमी अफ्रीका के मौरीटानिया का था, वहीं दूसरा उत्तरी अफ्रीका के ट्यूनीशिया से ताल्लुक रखता था। आरोप लगा था कि इसघटना के बाद फ्रांस के तत्कालीन गृह मंत्री निकोलस सरकोजी ने सबअर्ब के युवाओं के लिए गलत भाषा का इस्तेमाल किया, जिससे लोग और भड़क गए।

निकोलस सरकोजी आगे चल रहा 2007 में फ्रांस के राष्ट्रपति बने। हालाँकि, इन दंगों की असली वजह कुछ और ही थी। अक्सर देखा जाता जाता है कि इस तरह की हिंसा के बाद किसी असली वजह छिपाते हुए दोष किसी के सर मढ़ दिया जाता है। दिल्ली में फरवरी 2020 में हुए हिन्दू विरोधी दंगों के बाद भी कई दिनों तक भाजपा नेता कपिल मिश्रा को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जाता रहा, जबकि उनके भाषण से पहले ही पत्थरबाजी शुरू हो गई थी।

जहाँ तक 2005 के फ्रांस दंगों की बात है, सबसे पहले स्थानीय इलाके में दंगे शुरू हुए। इसके बाद राजधानी पेरिस के आसपास के इलाकों में हिंसा शुरू हो गई। इन सबमें अधिकतर युवक ही शामिल थे। इस घटना के लगभग 10 दिन बाद पूरे फ्रांस में दंगों की आग फ़ैल गई। सबसे भयानक रात आई 7-8 नवंबर को, जब डेढ़ हजार गाड़ियों को जला दिया गया। फ्रांस के 274 शहरों में हिंसा की घटनाएँ हुईं। दंगों का स्तर ऐसा था कि 17 नवंबर को ‘मात्र 100’ गाड़ियाँ जलाई गईं तो माहौल सामान्य होने की बात कही जाने लगी।

फ्रांस में 2005 में हुए इन दंगों में 10,000 गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया गया था। सोचिए, इन दंगों में हुआ कुल नुकसान 20 करोड़ यूरो का आँका गया था, आज के समय में ये रकम 1794 करोड़ रुपए की होगी। उस समय के हिसाब से भी ये 1120 रुपए करोड़ बैठता। 233 सरकारी और 74 प्राइवेट इमारतों को आग के हवाले कर दिया गया था। इनमें स्कूल और जिम से लेकर होटल तक शामिल थे। 10-15 हजार युवक इन दंगों में शामिल थे, जिनमें 15 युवकों तक जैसे छोटे-छोटे समूह भी थे।

आपको ये जान कर हैरानी होगी कि दंगाइयों की औसत उम्र मात्र 16 वर्ष ही थी। जिन 4800 लोगों को हिरासत में लिया गया था, उनमें से 1000 नाबालिग थे। इनमें फ्रांस के नागरिकों के साथ-साथ कई विदेशी नागरिक भी थे, जिनमें से अधिकतर इस्लाम मजहब को मानने वाले अरब और अफ़्रीकी थे। फ्रांस के तत्कालीन गृह मंत्री निकोलस सरकोजी ने इस ओर इशारा किया था कि मुस्लिम समूह इन दंगों में शामिल थे और बेरोजगारी से लेकर नस्लवाद तक के मुद्दों पर लोगों को भड़काया गया।

तब फ्रांस में मुस्लिमों की जनसंख्या 50 लाख थी और वो कुल जनसंख्या का 8% हिस्सा हुआ करते थे। जैसा कि भारत में शाहीन बाग़ के समय हुआ था, इन दंगों को भी बाद में बेरोजगारी और नस्लवादी भेदभाव के खिलाफ हुआ आंदोलन बता दिया गया। शाहीन बाग़ के बारे में यही फैलाया गया कि ये मुस्लिम महिलाओं का आंदोलन था, जो महिला सुरक्षा से लेकर बेरोजगारी तक के मुद्दों पर हुआ। जबकि सच्चाई ये थी कि ये पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने के खिलाफ उतरे थे और लाखों दिल्लीवासियों को रोज परेशान किया गया।

फ्रांस के उन दंगों को लेकर भी मीडिया के एक बड़े धड़े ने ऐसा ही माहौल बनाया। बाद में मौलानाओं और मुस्लिम संस्थानों से अपील करवा दी जाती है कि शांति बनाए रखें। इसी तरह फ्रांस में भी तब वहाँ के सबसे बड़े इस्लामी संगठनों में से एक ‘फ्रेंच फतवा’ ने इस घटना की निंदा की थी। फ्रांस की सरकार को मौलानाओं से मुलाकात करनी पड़ी थी। ‘अल जज़ीरा’ जैसे इस्लामी अख़बारों ने फ्रांस की पुलिस द्वारा कार्रवाई को ही दंगों के और फैलने का कारण बता दिया

सवाल ये उठता है कि बार-बार इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा इस तरह की हरकतें किए जाने के बावजूद फ्रांस ने विदेशी घुसपैठियों के लिए अपने दरवाजे खुले रखे। इतना ही नहीं, इमैनुएल मैक्रों की बतौर राष्ट्रपति पहली जीत को लिबरलों की जीत बताया गया। वो अलग बात है कि एक कट्टरपंथी मुस्लिम छात्र द्वारा पैगंबर मुहम्मद के कार्टून को लेकर अपने शिक्षक सैमुएल पैटी का गला रेते जाने के बाद फ्रांस की जनता सड़कों पर उतरी और सरकार पर कार्रवाई करने के लिए दबाव बनाया।

तब दंगों को रोकने के लिए 11,000 पुलिसकर्मियों को सक्रिय किया गया था। अगर आप आज भी इन दंगों के बारे में इंटरनेट पर पढ़ेंगे तो वहाँ यही लिखा मिलेगा कि ये बेरोजगारी और नस्लीय भेदभाव के खिलाफ हुआ था। क्या इसके लिए सार्वजनिक संपत्ति को लोग तबाह करेंगे? मुस्लिम भीड़ या जिहादियों द्वारा उकसाए गए हर एक दंगे का बचाव करने के लिए ऐसे ही बेकार तर्क दिए जाते हैं और उलटा किसी और के ही माथे सब मढ़ दिया जाता है, कभी सरकार तो कभी कोई विपक्षी।

रानी दुर्गावती की देश भर में मनाई जाएगी 500वीं जन्म शताब्दी, जीवन पर बनेगी फिल्म: PM मोदी ने मध्य प्रदेश के शहडोल में की घोषणा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) पाँच दिन में दूसरी बार मध्य प्रदेश पहुँचे। शहडोल के लालपुर में प्रधानमंत्री मोदी ने शनिवार (1 जुलाई 2023) को राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन 2047 को लॉन्च किया। इस अवसर पर उन्होंने महारानी दुर्गावती को भी याद किया।

पीएम ने कहा कि भारत सरकार इस साल पूरे देश में रानी दुर्गावती की 500वीं जन्म शताब्दी मनाएगी। 5 अक्टूबर को रानी दुर्गावती की 500वीं जयंती है। उनके जीवन पर फिल्म बनाई जाएगी, एक चाँदी का सिक्का निकाला जाएगा।

पीएम मोदी ने कहा, “मैं आपके बीच रानी दुर्गावती के पराक्रम की इस पवित्र भूमि पर आया हूँ। मैं आज देशवासियों के समक्ष घोषणा करता हूँ कि रानी दुर्गावती जी की 500वीं जन्म शताब्दी पूरे देश में भारत सरकार मनाएगी। रानी दुर्गावती के जीवन के आधार पर फिल्म बनाए जाएगी।”

प्रधानमंत्री ने आगे कहा, “रानी दुर्गावती का एक एक चाँदी का सिक्का भी निकाला जाएगा। रानी दुर्गावती जी का पोस्टल स्टैंप भी निकाला जाएगा। देश और दुनिया में 500 साल पहले जन्म हुए हमारे लिए इस पवित्र माँ के समान, उनकी प्रेरणा की बात हिंदुस्तान के घर-घर में पहुँचाने का एक अभियान चलाएगा।

पीएम मोदी ने कहा कि पिछले 70 सालों में सिकल सेल एनीमिया बीमारी लेकर ठोस योजना नहीं बनाई गई। इससे प्रभावित ज्यादातर लोग आदिवासी समाज के हैं। पहले की सरकारों के लिए ये कोई मुद्दा नहीं था, भाजपा सरकार ने इस चुनौती से निपटने का बीड़ा उठाया है।

बिहार में नीतीश सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरे 2000+ शिक्षक अभ्यार्थी, पुलिस ने लाठियाँ भाँजी: कई घायल, 18 हिरासत में

बिहार में होने वाली शिक्षक भर्ती के नियमों में संशोधन का विरोध कर रहे अभ्यर्थियों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया। साथ ही 18 लोगों को हिरासत में लिया। दरअसल, बिहार सरकार ने शिक्षक भर्ती में दूसरे राज्यों के अभ्यर्थियों को छूट दी है। इसका बिहार में विरोध हो रहा है। इस मामले में BJP राज्य सरकार पर हमलावर है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, शिक्षक भर्ती के नियमों में संशोधन के विरोध में 2000 से अधिक अभ्यर्थी शनिवार (1 जुलाई 2023) को पटना के गाँधी मैदान में एकजुट हुए थे। इसके बाद अभ्यर्थी हाथों में तिरंगा लेकर पैदल मार्च करते हुए नीतीश सरकार के विरोध में नारेबाजी कर रहे थे। हालाँकि पुलिस प्रदर्शनकारियों को रोकने में लगी हुई थी। लेकिन वे आगे बढ़ते जा रहे थे। 

इसके बाद पुलिस ने उन पर लाठीचार्ज करना शुरू कर दिया। प्रदर्शन कर रहे छात्रों ने पुलिस के लाठीचार्ज के विरोध में पत्थरबाजी शुरू कर दी। इसके बाद पुलिस ने लाठीचार्ज तेज करते हुए अभ्यर्थियों को पटना जंक्शन तक खदेड़ दिया। पुलिस की लाठीचार्ज से प्रदर्शन कर रहे कई अभ्यर्थी घायल हुए। वहीं, पुलिस ने 2 महिला अभ्यर्थियों समेत कुल 18 लोगों को हिरासत में लिया। कई लोग घायल भी हुए हैं।

बता दें कि इससे पहले शिक्षक भर्ती के अभ्यर्थियों ने राज्य सरकार को पुराना नियम लागू करने के लिए 72 घण्टे का अल्टीमेटम दिया था। यह समय सीमा पूरी होने के बाद भी सरकार की ओर से कोई जवाब नहीं दिया गया। ऐसे में छात्रों ने विरोध-प्रदर्शन किया

बिहार सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे अभ्यर्थियों में से एक अभ्यर्थी अभिषेक झा ने दैनिक भास्कर से हुई बातचीत में कहा है कि सरकार को 72 घंटे का समय दिया गया था। लेकिन इसके बाद भी माँगे पूरी नहीं की गईं। सीएम नीतीश कुमार को डोमिसाइल नीति लागू करना ही होगा। शिक्षा मंत्री को अगर यह लगता है कि योग्य शिक्षक की नियुक्ति के लिए राष्ट्रीय स्तर पर भर्ती निकाली जाएगी तो वह आगे यह भी कह सकते हैं कि भर्ती को अंतरराष्ट्रीय कर दिया जाए। ताकि ब्रिटेन और अमेरिका के लोग भी यहाँ आकर शिक्षक बन सकें।

BJP ने खोला मोर्चा

शिक्षक भर्ती के नियमों में संशोधन को लेकर भाजपा नीतीश सरकार पर हमलावर है। बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष विजय कुश्ती सिन्हा ने कहा है कि पहले तो अभ्यर्थियों को भटकाया और बरगलाया गया। लेकिन चरवाहा विद्यालय के लोगों के साथ सरकार बनाने के बाद शिक्षकों की नौकरी समाप्त करने की हो रही रही है। शिक्षक भर्ती की नीति में बार-बार संशोधन किया जा रहा है। शिक्षा मंत्री कहते हैं कि राज्य में योग्य शिक्षक नहीं है। उन पर धिक्कार है वह बिहार का अपमान कर रहे हैं। सरकार सिर्फ चाचा-भतीजावाद के नाम पर लोगों को बरगलाना चाहती है। ये लोग भर्ती के नाम पर वसूली कर बाहर के लोगों से माल कमाना चाहते हैं। यह सब दुःखद है। इस मुद्दे पर भाजपा सड़क से लेकर सदन तक आंदोलन करेगी।

क्या है मामला…

दरअसल, बिहार में 1.70 लाख अभ्यर्थियों की भर्ती होनी है। इस भर्ती के नियमों में बिहार सरकार अब तक कई बार संशोधन कर चुकी है। सबसे बड़ा संशोधन डोमिसाइल यानी निवास प्रमाण पत्र को लेकर किया गया संशोधन है। इस संशोधन के बाद बिहार के अलावा अन्य राज्यों के अभ्यर्थी भी शिक्षक भर्ती में शामिल हो सकेंगे। इसके खिलाफ ही बिहार के अभ्यर्थी सड़क पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे हैं। अभ्यर्थियों का कहना है कि डोमिसाइल नीति में संशोधन होने से दूसरे राज्यों के अभ्यर्थियों को नौकरी मिल जाएगी और बिहार के लोग बेरोजगार रह जाएँगे।

शशि थरूर ने एस जयशंकर को दी थी ‘विदेशों’ के सामने शांत रहने की सलाह, अब दे रहे सफाई: बताया- अच्छा दोस्त और काबिल विदेश मंत्री

भारत के आतंरिक मुद्दों पर बोलने को लेकर विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पश्चिमी देशों को लताड़ लगाई थी। इसके बाद खबर आई कि कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर ने विदेश मंत्री को शांत रहने की सलाह दी थी। अब इसी मामले पर शशि थरूर ने अपनी उस टिप्पणी को लेकर करीब 2 महीने बाद सफाई दी है। साथ ही एस जयशंकर को अपना दोस्त और योग्य विदेश मंत्री बताया है।

शशि थरूर ने ट्वीट कर कहा है, “दोस्तों ने मुझे ट्रोलर्स का एक मैसेज फॉरवर्ड किया है। इसमें दावा किया जा रहा है कि खालिस्तानियों द्वारा भारतीय दूतावास से तिरंगा उतारने को लेकर मैंने विदेश मंत्री एस जयशंकर को शांत रहने की सलाह दी थी। हालाँकि ऐसा नहीं था। तिरंगा उतारने वाली घटना पर विदेश मंत्रालय से पहले ही मैंने नाराजगी व्यक्त की थी। दरअसल, यह घटना होने के बाद लोकसभा के बाहर मैं कैमरों से घिर गया था। उस घटना पर तो आक्रोश व्यक्त करना ही सबसे बेहतरीन जवाब था।”

थरूर ने आगे कहा, “बेंगलुरू के कब्बन पार्क में भाजपा युवा मोर्चा के कार्यक्रम में जयशंकर के पश्चिमी देशों को दिए गए जबाव पर मैंने कमेंट किया था। उनकी इस जवाब को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया द्वारा उठाया गया और विदेशों तक में खराब तरीके से चलाया गया। बिना उकसावे के विदेशों के मुद्दे पर बोलना हमारी शैली नहीं है। झंडा उतारने की घटना उकसावे की घटना थी। इस घटना पर भारत की प्रतिक्रिया उचित थी। इस पर विदेश मंत्री से मेरा कोई मतभेद नहीं है। मैं उन्हें दोस्त और एक कुशल व योग्य विदेश मंत्री मानता हूँ। आइए अपनी विदेश नीति को द्विदलीय रखें। हम सभी भारतीय हैं। देश हित से बढ़कर कुछ भी नहीं होना चाहिए।”

दरअसल, विदेश मंत्री एस जयशंकर ने 2 अप्रैल 2023 को कर्नाटक के हुबली में स्थित कब्बन पार्क में आयोजित कार्यक्रम में कहा था, “मैं आपको इस का सच बता रहा हूँ। वास्तव में इसके पीछे दो वजह हैं। पहला यह है कि पश्चिमी देशों को दूसरों पर टिप्पणी करने की बुरी आदत है। उन्हें लगता है कि भगवान ने उनको दूसरों पर टिप्पणी करने का अधिकार दिया है। पश्चिमी देशों को पुरानी चीजों से सीखने की जरूरत है। यदि वे ऐसा करते रहेंगे तो दूसरे लोग भी कमेंट करने लगेंगे और ऐसा होने पर उन्हें अच्छा नहीं लगेगा। मैं देख रहा हूँ कि ऐसा हो रहा है।”

उन्होंने यह भी कहा था, “हमने बीते कुछ दिनों में लंदन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और सैन फ्रांसिस्को में तिरंगे के अपमान की कुछ घटनाएँ देखी हैं। भारत जब तिरंगे के अपमान को हल्के में लेता था वह दिन अब जा चुके हैं। यह वो भारत नहीं है जो किसी के द्वारा उसके राष्ट्रीय ध्वज के अपमान को स्वीकार करेगा। तिरंगे के अपमान के बाद भारतीय उच्चायोग ने और भी बड़ा तिरंगा फहरा दिया था। यह केवल वहाँ के तथाकथित खालिस्तानियों के लिए संदेश नहीं था बल्कि अंग्रेजों के लिए भी एक तरह का मैसेज था। यह मेरा झंडा है, अगर कोई इसका अपमान करने की कोशिश करेगा तो मैं इस झंडे को और भी बड़ा कर दूँगा।”

पश्चिमी देशों पर विदेश मंत्री एस जयशंकर की टिप्पणी पर शशि थरूर ने उन्हें शांत रहने की सलाह देते हुए कहा था कि कि हर टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देना ठीक नहीं है। उन्होंने कहा था कि किसी की टिप्पणी पर इतना भी कमजोर होने की जरूरत नहीं है। थरूर ने कहा था कि उन्हें लगता है कि एक सरकार के रूप में पश्चिमी देशों से आने वाली टिप्पणियों को सामान्य तरह से लेना चाहिए। अगर वह हर कमेंट पर जवाब देंगे तो ऐसे में वह अपना ही नुकसान कर रहे हैं। इसलिए विदेश मंत्री को थोड़ा शांत रहना चाहिए।

सारे ब्राह्मणों को मार डाला, विश्वविद्यालय को फूँक दिया… नालंदा के 830 साल बाद फ्रांस में धू-धू कर जली लाइब्रेरी, घुसपैठियों को गले लगा कर फँसा यूरोप?

पूरा फ्रांस दंगों की आग में जल रहा है। मंगलवार (27 जून, 2023) को पुलिस की गोली लगने से नहेल नाम के एक 17 वर्षीय मुस्लिम युवक की मौत हो गई, जिसके बाद ये हिंसा शुरू हुई। नहेल मूल रूप से अल्जीरिया का रहने वाला था। पुलिस का कहना है कि वो कार से लोगों को कुचल सकता था, इसीलिए गोली चलाई गई। उक्त पुलिस अधिकारी को हिरासत में लेकर जाँच शुरू कर दी गई है। लेकिन, इधर दंगाइयों ने कई बसों और कारों समेत मार्सेय के सबसे बड़े पुस्तकालय को फूँक दिया।

17 वर्ष की उम्र में फ्रांस में ड्राइविंग लाइसेंस भी नहीं मिलता है और नहेल पर गलत तरीके से गाड़ी चलाने का भी आरोप है। वो बस लेन में मर्सिडीज ड्राइव कर रहा था। पुलिस बार-बार कहती रही कि वो कार को रोक कर पार्क करे, लेकिन वो कार को भगाने लगा। नहेल अफ़्रीकी मूल का था, ऐसे में फ्रांस में बसे प्रवासियों ने दंगे शुरू कर दिए। नियम तोड़ने वाले फ्रांस के उस लड़के की बात नहीं हो रही, लेकिन पुलिस की आलोचना हो रही है।

पूरे फ्रांस में सैकड़ों सरकारी इमारतों को नुकसान पहुँचाया गया है। 40,000 पुलिसकर्मियों को कानून-व्यवस्था काबू में करने के लिए लगाया गया है। 600 से भी अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। 2000 दंगाइयों को गिरफ्तार किया गया है। वहाँ के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों एक कंसर्ट में अपनी पत्नी के साथ डांस करते हुए देखे गए। सोशल मीडिया पर लोग कह रहे हैं कि यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ को वहाँ भेज दिया जाए, वो 24 घंटे के भीतर दंगों को नियंत्रित कर सकते हैं।

बतौर राष्ट्रपति अपने दूसरे कार्यकाल में उन्हें बड़ा विरोध झेलना पड़ रहा है क्योंकि पेंशन योजना में बदलाव के कारण उनके खिलाफ देश भर में प्रदर्शन हुए थे। 2005 में फ्रांस ऐसी ही स्थिति को झेल चुका है, जब पुलिस से छिपते हुए दो किशोरों की मौत के बाद 21 दिनों तन दंगे होते रहे थे और पुलिस को ‘स्टेट ऑफ इमरजेंसी’ घोषित करनी पड़ी थी। फ्रांस में कई बड़े कार्यक्रमों को बैन कर दिया गया है। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने लोगों को अपने बच्चों पर नजर रखने को कहा है, उन्हें घर में रखने को कहा है।

उन्होंने TikTok और स्नैपचैट को संवेदनशील कंटेंट्स हटाने के लिए भी कहा है। दुनिया भर के मानवाधिकार संगठन फ्रांस में मुस्लिमों के साथ भेदभाव के आरोप लगा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र तक ने फ्रांस की पुलिस को कार्रवाई में भेदभाव न करने के आरोप लगा दिए। फ्रांस में हमने ये भी देखा था कि कैसे पैगंबर मुहम्मद का कार्टून छापने के कारण जनवरी 2015 में शार्ली-हेब्दो मैगजीन के 12 कर्मचारियों को मार डाला गया था। इस कार्टून की बात करने पर एक मुस्लिम छात्र ने शिक्षक सैमुएल पैटी का गला रेत दिया था।

विद्यालयों-पुस्तकालयों को फूँकने वाली वो कौन सी मानसिकता है?

आखिर वो कौन सी मानसिकता है, जो विद्या के मंदिरों को भी फूँक देती है। विद्यालयों और पुस्तकालयों को जलाने वाले ये लोग कौन होते हैं? इसे जानने के लिए हमें 830 वर्ष पहले सन् 1193 में चलना पड़ेगा, जब इस्लामी आक्रांता बख्तियार खिलजी ने पूरे नालंदा विश्वविद्यालय को तबाह कर दिया था। साथ ही उसके 9 मंजिला पुस्तकालय को आग के हवाले कर दिया था। कहते हैं, वहाँ दुर्लभ प्राचीन पांडुलिपियों समेत लाखों पुस्तकें थीं जो धू-धू कर ऐसी जली कि महीनों तक जलती रही।

जब नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी, उसके अगले हजार वर्षों तक यूरोप में कोई यूनिवर्सिटी नहीं थी। संस्कृत व्याकरण से लेकर दर्शनशास्त्र और राजनीतिक शास्त्र की शिक्षा का गढ़ था नालंदा, जहाँ की कई इमारतें राजा-महाराजाओं और अमीर व्यापारियों ने अपने दान से बनवाई थी। दूर-दूर से छात्र यहाँ शिक्षा अर्जन के लिए आते थे। खुदाई में नालंदा को जलाए जाने के सबूत मिले, पता चला कि यहाँ कभी विशाल लाइब्रेरी हुआ करती थी। बौद्ध इतिहास का अध्ययन करने वालों ने भी इसे माना है।

दिल्ली सल्तनत के इतिहासकार मिन्हाज-ए-सिराज ने अपनी फ़ारसी पुस्तक ‘तबकात-ए-नासिरी’ में लिखा है कि वहाँ पर कई ब्राह्मण थे, जिनके सिर मूँड़े हुए थे और फिर उनकी हत्या कर दी गई। उसने कई अन्य हिन्दुओं के नरसंहार की बात भी लिखी है। इस्लामी आक्रांताओं को कई पुस्तकें वहाँ मिली, इसका जिक्र भी इस किताब में है। नालंदा और इसके आसपास कई बौद्ध विहार थे, उन सबको भी बख्तियार खिलजी ने नष्ट किया था।

सवाल ये है कि आखिर ये कौन सी मानसिकता है जो विद्या का सम्मान नहीं करती? सनातन धर्म में तो कहा गया है कि ‘अविद्यस्य कुतः धनम्’, अर्थात जिसके बाद विद्या नहीं है उसके पास धन कैसे आ सकता है। यानी, शिक्षा को सबसे ऊपर रखा गया है। तभी हमारे यहाँ राजा-महाराजाओं से भी ज्यादा ऋषि-मुनि लोकप्रिय हुए। विश्वामित्र-वशिष्ठ की धरती पर साधु-संतों को सबसे ज्यादा सम्मान मिला क्योंकि वो विद्वान थे, इन्होंने सिखाया कि कैसे शिक्षा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाती है और ये क्रम अनवरत ही चलता रहता है।

क्या यूरोप ने घुसपैठियों के लिए जो दरवाजे खोले हैं, उसके बाद इस तरह की समस्याएँ बढ़ गई हैं? 2021 में 23 लाख घुसपैठियों ने यूरोपियन यूनियन के देशों को अपना ठिकाना बनाया, वहीं 2022 में भी ये आँकड़ा इतना ही रहा। जर्मनी, फ्रांस और स्पेन वो तीन देश हैं, जो सबसे ज्यादा घुसपैठियों के ठिकाने बने। अब स्थिति ये है कि इतने कम समय में यूरोप की जनसंख्या का 6% हिस्सा प्रवासियों का हो गया है। उनकी जनसंख्या ढाई करोड़ के पार चली गई है।

समुद्री रास्तों से ये प्रवासी यहाँ आते हैं। यूरोपियन समुदाय हमेशा से खुले समाज के रूप में जाना जाता रहा है और वहाँ की प्राकृतिक सुंदरता के अलावा औद्योगिक सफलता के कारण ये महाद्वीप खासा समृद्ध है। इंग्लैंड ने तो एक समय दुनिया के अधिकतर हिस्से पर राज किया। अब स्थिति ये है कि किसी वीडियो में देखने को मिलता है कि बीच का आनंद लेती महिलाओं के सामने ही समुद्र से सीधे घुसपैठियों की खेल पहुँचती है तो कभी घुसपैठियों द्वारा महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार की खबरें आती हैं।

इटली में 2013 में एक रिपोर्ट में सामने आया था कि वहाँ हो रहे अधिकतर अपराधों में विदेशी घुसपैठिए ही शामिल थे। इसी तरह जर्मनी में 2017 में 27 घुसपैठियों ने हत्या या हत्या का प्रयास किया। स्थिति ये है कि फ़्रांस ने जब मोरक्को को FIFA वर्ल्ड कप 2022 के सेमीफाइनल में हरा दिया तो फ्रांस में दंगे शुरू हो गए। कारण साफ़ है, 99% सुन्नी मुस्लिमों वाला देश है मोरक्को और मुस्लिम जहाँ भी रहें, उनकी वफादारी अपने ‘उम्माह’ के प्रति रहती है, मातृभूमि नहीं इस्लाम के प्रति रहती है।

₹1 लाख की दी मदद, बेटी की शादी का जिम्मा उठाया: वसुंधरा राजे पहुँची कन्हैया लाल हत्या के गवाह के घर, परिजन भावुक होकर बोले- किसी ने तो हाल पूछा

राजस्थान के उदयपुर में पिछले साल हुई टेलर कन्हैया लाल की हत्या के मुख्य गवाह राजकुमार शर्मा से भाजपा नेता वसुंधरा राजे सिंधिया ने मुलाकात की। कन्हैया लाल की गला कटते देखने की घटना को याद करके राजकुमार को दो बार ब्रेन हैमरेज हो चुका है। वहीं, आरोपित मोहम्मद रियाज और गौस मोहम्मद का 25 किलोमीटर तक पीछा कर पकड़वाने वाले शक्ति सिंह और प्रह्लाद सिंह को आज तक सुरक्षा नहीं दी गई। अशोक गहलोत की सरकार ने इसका वादा किया था।

वसुंधरा राजे मावली विधायक धर्मनारायण जोशी के साथ शनिवार (1 जुलाई 2023) को राजकुमार के घर जाकर उनकी पत्नी और बेटे से मुलाकात की। उन्होंने परिवार को 1 लाख रुपए की सहायता दी और उनकी बेटी की शादी का जिम्मा उठाने की बात कही। राजे ने उनकी मदद के लिए जो भी हो पाएगा, वह करेंगी।

राजकुमार की पत्नी ने बताया कि उनकी बेटी 25 साल की हो गई है। साल भर पहले बेटी की शादी होनी थी, लेकिन टल गई। उन्होंने बताया कि उनका परिवार बुरी तरह डरा हुआ है। राजकुमार की पत्नी पुष्पा ने बताया कि बेटे को अच्छे से पढ़ाना चाहती थी, लेकिन अब ऐसी स्थिति हो गई कि बेटा घर चलाने के लिए 10 से 12 हजार रुपए की नौकरी कर रहा है।

बताते चलें कि राजकुमार शर्मा बिस्तर पर हैं। कन्हैया लाल का गला कटते देखकर उन्हें भारी सदमा लगा है। इसकी वजह से उन्हें दो बार ब्रेन हैमरेज हो चुका है। अक्टूबर 2022 में उनकी ब्रेन का पाँच घंटे तक ऑपरेशन हुआ था। इनके परिवार को पुलिस सुरक्षा मिली हुई है।

कन्हैया लाल को बचाने की कोशिश करने वाले ईश्वर सिंह की सुध लेने वाला कोई नहीं

देर से ही सही राजकुमार शर्मा की सुध लेने के लिए वसुंधरा राजे उनके घर पहुँचीं, लेकिन कन्हैया लाल को बचाने की कोशिश में घायल हुए ईश्वर सिंह की सुध लेने वाला कोई नहीं। उन्हें ना ही किसी तरह सुरक्षा दी गई है और ना ही कोई आर्थिक मदद देने वाला है। उनके परिवार को भी जान का खतरा है। इसके बावजूद सरकार लापरवाह है।

बताते चलें भाजपा की निलंबित नेता नूपुर शर्मा द्वारा पैगंबर पर दिए गए बयान का समर्थन करने के कारण कन्हैया लाल की हत्या कर दी गई थी। 28 जून 2022 को दोनों आरोपित कपड़ा सिलवाने के बहाने से दुकान में घुसे थे। एक आरोपित वीडियो बनाता रहा, जबकि दूसरा अपना नाप देने लगा। कन्हैया नाप लेने में व्यस्त हो गए। फिर अचानक से आरोपितों ने उन पर हमला कर दिया। 

इस दौरान दुकान में ईश्वर सिंह और राजकुमार शर्मा भी मौजूद थे। कन्हैया लाल को बचाने में ईश्वर सिंह घायल हो गए थे। इस घटना को लेकर ईश्वर सिंह ने बताया था कि रियाज नाप देने लगा और गौस वहाँ खड़ा रहा। इस दौरान वो भी अपने साथी राजकुमार के साथ वहाँ मौजूद थे। अचानक चिल्लाने की आवाज आई और उन्होंने मुड़कर देखा तो रियाज कन्हैया लाल पर धारदार हथियार से लगातार हमला कर रहा था। 

ईश्वर सिंह ने बताया कि सके बाद वो कन्हैया लाल को छुड़ाने की कोशिश की तो आरोपितों ने अपने हथियारों ने उन पर हमला कर दिया। इस हमले में उनके सिर और बाएँ हाथ पर चोट जख्म हो गया था और वहाँ से खून निकल रहा था। इसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उनके सिर में 16 टाँके लगे।

कन्हैया के हत्यारे गौस और रियाज को पकड़ने वाले शक्ति सिंह और प्रह्लाद का परिवार बदहाल

कन्हैया लाल की हत्या के गवाह ईश्वर सिंह ही नहीं, बल्कि हत्यारे मोहम्मद रियाज और गौस मोहम्मद का 25 किलोमीटर तक पीछा करके पकड़वाने वाले शक्ति सिंह और प्रह्लाद सिंह का हाल लेने वाला कोई नहीं है। इन दोनों को ना सिर्फ अपनी जान का खतरा है, बल्कि इस केस के कारण नौकरी भी छूट गई और वे बदहाली तक पहुँच गए हैं।

दरअसल, अशोक गहलोत की सराकर ने ईश्वर सिंह के साथ शक्ति सिंह और प्रह्लाद सिंह को सुरक्षा देने का वादा किया था, लेकिन ये आज तक नहीं दी गई है। इस मुद्दे को राजस्थान विधानसभा में विपक्ष के नेता राजेंद्र राठौड़ और राजसमंद की भाजपा सांसद दिया कुमारी ने करीब 20 दिन पहले उठाया था।

दोनों नेताओं ने कहा कि कन्हैया लाल के हत्यारों को पकड़ने में शक्ति सिंह और प्रहलाद सिंह की काफी भूमिका रही। ये लोग पहले गुजरात के सूरत में नौकरी करते थे, लेकिन केस में नाम आने के बाद सुरक्षा कारणों से इन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। वहीं, दोनों युवाओं का कहना है कि गाँव के लोग भी उन पर हँसते हैं कि और करो समाज सेवा।

दोनों नेताओं ने कहा कि वादा करने के बाद भी अशोक गहलोत की नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने इन दोनों युवकों को किसी प्रकार की मदद नहीं की। जान का खतरा होने के बावजूद इन्हें सुरक्षा भी नहीं दी गई। सरकार और समाज की मदद करने का परिणाम दोनों युवाओं को गरीबी और बेबसी में अपना और परिवार का जीवन गुजारने के लिए मजबूर होकर करना पड़ रहा है।

‘आलिया नहीं हो पाएँगी सीता के रोल में फिट’ : ‘नई रामायण’ की कास्टिंग पर बोले सुनील लहरी, रणबीर को बताया- अच्छा ऑप्शन

आदिपुरुष फिल्म के पर्दे पर आने के बाद जहाँ इसके डॉयलॉग्स और स्क्रीनप्ले के कारण फिल्म की फजीहत हुई। वहीं कास्टिंग को लेकर भी तमाम सवाल उठे। ऐसे में जब खबर आई कि नीतेश तिवारी भी रामायण पर एक फिल्म बनाने की सोच रहे हैं जिसमें राम-सीता का किरदार रणबीर-आलिया निभाएँगे तो इस पर एक्टर सुनील लहरी ने अपनी राय दी।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, रामानंद सागर की रामायण में लक्ष्मण का किरदार निभाने वाले सुनील लहरी ने कहा, “रणबीर, भगवान राम की भूमिका के लिए बहुत अच्छा ऑप्शन हैं और अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं। लेकिन आलिया सीता के किरदार के साथ इंसाफ कर पाएँगी, इसमें थोड़ी शक है।”

उन्होंने कहा, “आलिया भी प्रतिभाशाली हैं, मगर मुझे लगता है कि अगर उन्होंने पाँच साल पहले सीता की भूमिका निभाई होती तो वे इस किरदार के साथ ज्यादा न्याय कर पातीं।” सुनील लहरी ने कहा कि उन्हें लगता है कि आलिया पिछले कुछ वर्षों में बदल गई हैं इसलिए वह पक्का नहीं कह सकते कि आलिया अब सीता के रूप में आकर्षक लगेंगी या नहीं।

सुनील लहरी ने बड़े पर्दे पर रामायण लाने की सोचने वालों को सुझाव देकर कहा कि बड़े पर्दे पर रामायण लाते समय उसका आधार न बदला जाए। रामायण का व्यवहार शालीन और सम्मानजनक ही होना चाहिए। इसके साथ नया संस्करण बनाते समय उसके साथ प्रयोग नहीं किया जा सकता है।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि रामायण दिखाते हुए भाषा, पात्रों का चित्रण और दृश्य महाकाव्य के अनुरूप ही होना चाहिए। पात्रों को अच्छी तरह से परिभाषित किया जाना चाहिए। उनका शो रामायण के सार के प्रति सच्चा था। इसलिए सभी धर्मों, आयु समूहं और जनसांख्यिकी के लोग इससे जुड़े और पसंद किया।

प्रिय केजरीवाल जी, शायद ‘शीशमहल’ की बालकनी से नहीं दिखता हो ‘पेरिस’, पर हम दिल्ली वालों ने गड्ढे में डूबकर अजीत को मरते देखा है

मॉनसून शुरू होते ही दिल्ली नाले में तब्दील हो जाता है। सड़कों पर पानी भर जाता है और उसमें गाड़ियाँ घंटों तक रेंगने के लिए मजबूर हो जाती हैं। गड्ढे में पानी भरने के लिए दुर्घटनाएँ भी होती हैं और लोगों को अपनी जान गँवानी पड़ती है। राजधानी के हर्ष विहार इलाके में बारिश के कारण पानी से भरे गड्ढे में ऑटो गिरने से चालक अजीत की मौत हो गई।

ये कोई पहली घटना नहीं है। ऐसी घटनाएँ हर साल मॉनसून में सामने आती हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने राजधानी वासियों से वादा किया था कि उनकी पार्टी की सरकार बनने के बाद वे दिल्ली को विश्वस्तरीय राजधानी बना देंगे। उन्होंने दिल्ली को लंदन, पेरिस, टोक्यो आदि की कैटेगरी में खड़ा करने का वादा किया था।

अगल अरविंद केजरीवाल की सरकार के कुल आठ साल के सफर को देखें तो उन्होंने दिल्ली के विकास पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया है। जो थोड़ा बहुत बदलाव दिख रहा है, उसकी वजह केंद्र सरकार और भाजपा शासित नगर निगम रहा है। हाँ, इस दौरान वे अपना सीएम हाउस को निखारने में जरूरत सक्रिय रहे। अपने बंगले को सँवारने के लिए उन्होंने कोविड महामारी के दौरान 45 करोड़ रुपए खर्च कर दिए।

बंगले के बाथरूम के टाइल्स से लेकर घर के पर्दे तक, रसोई के चम्मच से लेकर सोफे तक उन्होंने विदेशों से मँगवाए। सीएम हाउस को तोड़कर उसे और बड़ा करने का टेंडर जारी किया। ये सब होता रहा, वो भी कोविड काल में, लेकिन दिल्ली की जनता कोविड महामारी के दौरान भी सड़कों पर भटकती रही है। उनकी मदद करने के बजाय दिल्ली की सरकार उन्हें डराने के लिए अफवाह फैलाती रही। वो तो भला को यूपी की योगी सरकार का, जिन्होंने इन मजदूरों को उनके घर तक पहुँचाया।

सरकारी बंगला नहीं लेने से लेकर आलीशान बंगला बनवाने तक सफर तय करने वाले दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली को विश्वस्तरीय राजधानी बनाने और यमुना को लंदन की टेम्स नदी की तरह साफ-सुथरा करने का सपना यहाँ के लोगों को बार-बार दिखाया। इन सपनों के आधार पर लोगों की भावनाओं का शोषण करते हुए वे वोटों का सौदा करते रहे, हालात सुधरने के बजाय बदतर हुए हैं।

आज भी बारिश शुरू होते ही नालों से पानी बाहर आकर सड़कों पर भर जाने जाते हैं और दुर्गंध से लोगों का जीना हराम कर देते हैं। बारिश की थोड़ी सी बूँदे क्या बनी दिल्ली की सड़कों में बने गड्ढों में पानी भरकर वह तालाब बन जाता है। यमुना नदी का हाल तो दिल्ली के लोग देख ही रहे हैं। यमुना को प्रदूषण मुक्त करना तो दूर, उनमें गिरने वाले शहर के कचरों के प्रबंधन का भी केजरीवाल सरकार कोई हल आजतक नहीं खोज पाई।

अब तक दिल्ली सरकार इन सबके लिए दिल्ली नगर निगम की भाजपा सरकार को दोषी ठहराते आई थी। उसने अक्सर आरोप लगाया कि वह काम करना तो चाहती है, लेकिन केंद्र सरकार फंड नहीं दे रही है, या भाजपा शासित नगर निगम उनके अभियान को सफल नहीं होने दे रही है। हालाँकि, अब MCD भी केजरीवाल के पास है। ऐसे में अब बहाना करने के लिए उनके पास कुछ नहीं बचा।

दिल्ली में जब-जब चुनाव होता है, केजरीवाल सरकार लंदन-पेरिस की बात करती है। साल 2013 और 2015 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने यही मुद्दा लोगों के सामने उठाया। इसके लिए उन्होंने सारा दोष कॉन्ग्रेस की शीला दीक्षित की सरकार पर मढ़ा। लोकसभा चुनाव से पहले 2018 में लोगों को संबोधित करते हुए उन्होंने कच्ची कॉलोनी वालों को यही सपना बेचा।

उन्होंने घोषणा की थी कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनाने के बाद अगर 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्हें दिल्ली की सभी 7 लोकसभा सीटों पर AAP के उम्मीदवार जीतते हैं, दिल्ली की कच्ची कॉलोनियों को लंदन-पेरिस की तरह बना दिया जाएगा। उन्होंने जनता को मूर्ख बनाने के लिए एक बैठक की और कमिटी बनाने की घोषणा भी की। उसका क्या हुआ, आज तक किसी को पता नहीं चला।

उन्होंने दिल्ली को लंदन-पेरिस जैसा स्वच्छ बनाने का वादा किया, लेकिन प्रदूषण के लिए वे पंजाब के किसानों पर दोष मढ़ते रहे। पंजाब में जब उनकी पार्टी आम आदमी पार्टी की सरकार बनी तो उन्होंने किसानों द्वारा पराली जलाए जाने के खिलाफ ना ही जागरूकता अभियान चलाया और ना ही उन्हें रोकने की कोशिश की। ये वादे भी वादे ही रह गए।

कुल मिलाकर दिल्ली सरकार ना ही सड़कों, नालों, फुटपाथों आदि की दशा सुधारने के लिए ठोस कदम उठाए और ना ही प्रदूषण को कम करने और दिल्ली को साफ सुथरा बनाने के लिए कोई निर्णय लिया। अंडरपास में पानी भरना, सॉसायटी और कॉलनियों को डूबना दिल्ली के आम बात सी हो गई है।

जगह-जगह बिजली तारों का लटकना, कूड़े-कचरों का सड़ना, बरसात के बाद भी बीमारी का कारण बन गया है। दिल्ली के लोग डेंगू, चिकनगूनिया और मलेरिया के डर से सहमे हुए हैं। हालाँकि, दिल्ली सरकार इन पर प्रभाव काम करने के बजाय राजनीति में व्यस्त है।

आकिब जावेद ने नौकरी दिलाने के नाम पर किया हिंदू लड़की का बलात्कार, मारपीट करके धर्मांतरण का दबाव बनाया: मिन्नतों के बाद छत्तीसगढ़ पुलिस ने पकड़ा

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में लव जिहाद, बलात्कार और धर्मांतरण के लिए दबाव बनाने का मामला सामने आया है। आरोप है कि आकिब जावेद नामक युवक ने नौकरी दिलाने के नाम पर हिंदू लड़की का बलात्कार किया और जब लड़की ने शादी की बात की तो आकिब उससे मारपीट करके उस पर धर्मांतरण का दबाव डालने लगा। अब पीड़िता की शिकायत पर पुलिस ने आरोपित आकिब को गिरफ्तार कर लिया है। 

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मामला बिलासपुर के सकरी थाना क्षेत्र का है। पीड़ित लड़की ने अपनी शिकायत में बताया है कि आकिब जावेद ने लड़की को नौकरी दिलाने की बात कही थी। बाद में उसने पीड़िता को प्राइवेट नौकरी दिलाई, लेकिन उसके बाद वो उसे कार में बैठाकर अपने साथ ले गया। लड़की के मुताबिक, आकिब ने नौकरी दिलाने के बदले में उसका रेप किया। लड़की ने जब इसकी शिकायत करने की बात कही तो आरोपित आकिब उससे शादी करने का वादा करने लगा।

इसके बाद वह लड़की का लगातार शारिरिक शोषण करता रहा। इस दौरान वह दो बार गर्भवती भी हुई। पीड़िता का कहना है कि बीते साल आकिब जावेद के जन्मदिन पर जब उसने गर्भवती होने की खुशखबरी सुनाई, तब आकिब ने उसके साथ मारपीट की थी। यही नहीं, दोनों बार गर्भवती होने पर आरोपित ने पीड़ित लड़की को जबरदस्ती दवा खिलाकर उसका गर्भपात करा दिया था।

इन सबके बावजूद जब लड़की ने आकिब से फिर शादी करने के लिए कहा तब भी उसके साथ मारपीट हुई। वहीं, जब लड़की आरोपित से बार-बार शादी करने की बात कहने लगी तब वह लड़की पर धर्मांतरण करने का दबाव बनाने लगा। लड़की के मना करने पर आकिब उसके साथ मारपीट करने के साथ ही कई तरीके से परेशान करता था। 

पीड़िता का आरोप है कि आकिब हर बात पर उसे मारता था। यहाँ तक कि जब लड़की ने उससे हिंदू रीति रिवाजों से शादी करने के लिए कहा तब भी उसने पीड़िता के साथ मारपीट की थी। यही नहीं, लड़की ने उस पर आईफोन छीनने तथा नकदी हड़पने का भी आरोप लगाया है।

पीड़ित लड़की का कहना है कि आकिब की मारपीट और धर्मांतरण के दबाव से तंग आकर उसने बीते सप्ताह पुलिस से शिकायत की थी। लेकिन तब पुलिस ने आकिब के खिलाफ मामूली धाराओं में केस दर्ज कर उसे थाने से भगा दिया था। इसके बाद पीड़िता अपनी शिकायत लेकर आईजी बद्रीनारायण मीणा के पास गई। जहाँ, आईजी के आदेश पर पुलिस ने आरोपित आकिब जावेद के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उसे गिरफ्तार किया है।