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तेलंगाना के ऐतिहासिक मंदिर में ‘क्रिश्चियन प्रेयर’, माँसाहारी खाना भी परोसाः हिंदू संगठनों के विरोध के बाद पादरी और उसके साथियों पर FIR

पिछले दिनों तेलंगाना के वारंगल स्थित एक ऐतिहासिक हिंदू मंदिर का वीडियो वायरल हुआ था। इसमें कुछ लोग मंदिर में ईसाई प्रार्थना (Christian prayer) करते दिखे थे। अब इस मामले में पादरी गंधम अरुण कुमार और उसके साथियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। मंदिर परिसर में माँसाहारी खाना परोसने का भी आरोप है। वीडियो वायरल होने के बाद हिंदू संगठनों ने इसे देवी-देवताओं का अपमान बताते हुए सख्त कार्रवाई की माँग की थी।

एक नॉन प्रॉफिट एक्टिविस्ट ग्रुप ‘लीगल राइट्स प्रोटेक्शन फोरम’ की तरफ से ट्विटर पर इस घटना को लेकर जानकारी साझा की गई है। बताया गया है कि मंदिर में क्रिश्चियन प्रेयर का वीडियो वायरल होने के बाद सब इंस्पेक्टर डी.सांबैया की शिकायत पर पादरी और अन्य के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। घटना में शामिल पादरी अरुण कुमार और उनके सहयोगियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 295-A, 153A, 153B, 504, 505 r/w 34 के तहत केस दर्ज हुआ है।

जिस मंदिर का वीडियो वायरल हुआ था, वह वारंगल किले में है। काकतीय राजवंश ने इसका निर्माण करवाया था। यह मंदिर पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है। तेलंगाना बंदोबस्ती विभाग (Telangana Endowments Department) इसकी देखरेख करता है। वीडियो वायरल होने के बाद विश्व हिंदू परिषद और बजरंगदल के कार्यकर्ताओं ने पादरी और उसके सहयोगियों के खिलाफ कार्रवाई की माँग करते हुए प्रदर्शन किया था। इसे हिंदू देवी-देवताओं का अपमान बताया था।

हिंदू संगठन के लोगों ने डीसीपी श्रीकांत राव और एसीबी रामाला सुनीता से मामले की शिकायत की थी। मीडिया से बात करते हुए संगठन के लोगों ने पूछा कि आखिर दूसरे पंथ के लोगों ने ऐतिहासिक मंदिर परिसर में इस तरह के कार्यक्रम का आयोजन कैसे किया? संगठन के नेताओं ने जानकारी दी कि मंदिर में भगवान राम के पद चिन्ह (पाद मुद्रा) और शंकु चक्र देखे जा सकते हैं। यहाँ धूम-धाम से शिवरात्रि मनाया जाता है। ऐसे में ईसाई सभा, प्रार्थना और माँसाहारी खाना परोसा जाना धार्मिक अशांति फैलाने वाला कदम है। हिंदू संगठनों की तरफ से चेतावनी दी गई थी कि यदि दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं हुई तो वे सड़कों पर उतरकर बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन करेंगे।

सफेद कुर्ता-पायजामा, चेहरे पर नकाब, गोलियाँ बरसाई-कुल्हाड़ी से भी किए वार: बठिंडा आर्मी कैंप में फायरिंग करने वाले नकाबपोश कौन, कहाँ गायब हो गए

पंजाब के बठिंडा छावनी में बुधवार (12 अप्रैल 2023) को तड़के हुई गोलीबारी में चार जवानों की मौत हो गई। एशिया की सबसे बड़ी सैन्य छावनी में हमल को लेकर पुलिस ने FIR दर्ज की है। एफआईआर (FIR) में कहा गया है कि चार जवान ड्यूटी के बाद अपने कमरे में सो रहे थे। उसी दौरान सफेद कुर्ता-पजामा पहने दो नकाबपोश आए और उन पर गोलियाँ बरसा दीं।

बठिंडा छावनी में जवानों की हत्या करने वाले एक शख्स को आर्मी ने हिरासत में ले लिया है। सेना उससे पूछताछ कर रही है। वहीं, सेना की टुकड़ी फरार दूसरे शख्स की तलाश कर रही है। अधिकारियों की तरफ से अभी हमलावरों की पहचान जाहिर नहीं की गई है। वहीं, कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दो लोगों को हिरासत में लेने की बात कही जा रही है।

मिलिट्री स्टेशन की मेस में बुधवार तड़के 4.35 बजे आए एक हमलावर के दाहिने हाथ में INSAS रायफल थी और दूसरे हमलावर के हाथ में कुल्हाड़ी होने की बात कही जा रही है। फायरिंग के बाद दोनों हमलावरों को मेस के पीछे से जंगल में जाते हुए देखा गया था। कहा जा रहा है कि अंधेरे का लाभ उठाकर हमलावर भागने में सफल रहे थे।

पकड़े गए जवान ने बताया है कि वे दो लोग सादे कपड़ों में थे। उन्होंने इंसास राइफल से सोए हुए 4 जवानों पर 19 गोलियाँ बरसाकर उनकी हत्या कर दी थी। सेना ने मौके से इंसास (INSAS) रायफल के अलावा गोलियों के 19 खोखे भी बरामद किए हैं।

इस हमले में जिन लोगों की जान गई है, वे हैं- गनर सागर, गनर कमलेश, गनर योगेश कुमार और गनर संतोष। इन सबकी उम्र 25 से 30 साल के बीच है और ये सभी 80 मीडियम रेजिमेंट से ताल्लुक रखते थे। ड्यूटी खत्म होने के बाद ये जवान मेस के पास स्टाफ के रुकने के लिए बनी बैरक में सो रहे थे। इसी दौरान इन्हें गोलियाँ मार दी गईं।

इस इंसास रायफल से इन जवानों को गोली मारी गई है, वह 9 अप्रैल 2023 को गुम हुई थी। इसके साथ ही 28 गोलियाँ भी चोरी कर ली गई थीं। यह रायफल लान्स नायक मूपदी हरीश के नाम पर 31 मार्च 2023 को अलॉट की थी। पंजाब पुलिस ने मेजर आशुतोष के बयान पर हत्या और आर्म्स एक्ट की धाराओं में केस दर्ज किया है।

सेना ने कहा कि बठिंडा कैंप में सर्च टीम ने मैगजीन के साथ INSAS रायफल बरामद की है। सेना को मौके से गोलियों के 19 खोखे भी बरामद हुए हैं। सेना और पुलिस की संयुक्त टीमें और अधिक जानकारी दिलाने के लिए हथियार को फोरेंसिक जाँच के लिए भेजेगी। इस मामले में पंजाब पुलिस के साथ मिलकर सेना जाँच कर रही है।

इसका मतलब कि चार जवानों को हमलावरों ने 19 गोलियाँ मारी हैं। इस घटना पर थलसेना अध्यक्ष मनोज पांडे खुद निगाह रखे हुए हैं। उन्होंने हर छोटी से छोटी जानकारी ली और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के समक्ष उसकी ब्रीफिंग की। उन्होंने हर एक घटना की जानकारी दी।

बता दें कि बठिंडा छावनी एशिया की सबसे बड़ी सैन्य छावनी है। इसकी बाउंड्री करीब 45 किलोमीटर की है। बठिंडा का एम्युनिशन डिपो देश के सबसे बड़े डिपो में से एक है। यह शहर से भी लगी हुई है। पहले यह छावनी शहर से कुछ दूर थी, लेकिन शहर फैलने के साथ ही यह रिहायशी इलाके से सट गई है।

बठिंडा के एसएसपी गुलनीत खुराना ने कहा है कि रक्षा प्रतिष्ठान द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, इस समय किसी आतंकी खतरे का संदेह नहीं है। SSP खुराना ने कहा, “प्रारंभिक जानकारी में कहा गया है कि सेना के कुछ लोगों ने एक-दूसरे पर अंधाधुन गोलियाँ चलाई है।”

3 चौराहे, 3 मूर्ति… राजस्थान के भरतपुर में बवाल, पत्थरबाजी और आगजनी

राजस्थान के भरतपुर में महाराजा सूरजमल और डॉ. भीमराव अंबेडकर की मूर्ति लगाने को लेकर बवाल मच गया है। बुधवार (12 अप्रैल 2023) की देर रात तक पथराव और आगजनी होती रही। मौके पर पहुँची पुलिस की टीम पर भी पथराव किया गया। प्रदर्शनकारियों को शांत करने के लिए पुलिस ने आँसू गैस के गोले दागे। देर रात तक उपद्रव जारी रहा।

दरअसल, भरतपुर के नदबई में नगरपालिका द्वारा तीन स्थानों पर मूर्तियाँ लगवाई जा रही हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, तय किया गया कि कुम्हेर चौराहे पर महाराजा सूरजमल, बैलारा चौराहे पर बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर और नगर चौराहे पर भगवान परशुराम की मूर्ति लगाई जाएगी।

स्थानीय जाट समुदाय के लोग नगरपालिका के फैसले से खुश नहीं हैं। वे बैलारा चौराहे पर डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के स्थान पर महाराजा सूरजमल की प्रतिमा लगाने की माँग कर रहे हैं। इसको लेकर वे हिंसक प्रदर्शन कर रहे हैं।

रिपोर्टों के अनुसार, बैलारा चौराहे पर महाराजा सूरजमल की प्रतिमा लगाने की माँग को लेकर जाट समुदाय के लोगों ने स्थानीय विधायक जोगेंद्र सिंह अवाना के खिलाफ धरना भी दिया। विधायक जोगेंद्र सिंह अवाना ने ही नदबई में मूर्तियाँ लगाने का ऐलान किया था। दरअसल, नदबई का मुख्य चौराहा बैलारा है, ऐसे में यहाँ महाराजा सूरजमल की मूर्ति लगाने की माँग जाट समाज कर रहा है।

धरना देने वालों को राजस्थान के पर्यटन मंत्री और महाराजा सूरजमल के भरतपुर राजपरिवार से जुड़े विश्वेंद्र सिंह ने समझा-बुझा कर धरना खत्म करने के लिए मना लिया। खबर है कि मंत्री विश्वेंद्र सिंह ने बैलारा चौराहे पर बाबा साहब भीमराव अंबेडकर और डेहरा मोड़ चौराहे पर महाराजा सूरजमल की मूर्ति लगाने का ऐलान किया। इसे लेकर मंत्री की तरफ से एक लेटर भी जारी किया गया।

जाट समुदाय के लोग बैलारा चौक पर ही महाराजा सूरजमल की मूर्ति लगवाना चाहते थे। शाम होते-होते आसपास के जाट समुदाय के लोग बैलारा चौराहे की तरफ बढ़ने लगे। भीड़ को जमा होता देख बैलारा चौराहे पर पुलिस बलों की भी तैनाती कर दी गई।

प्रदर्शनकारियों ने पहले तो सड़कों को जाम कर दिया, उसके बाद सड़कों पर आगजनी शुरू कर दी। पुलिस की गाड़ियों पर पथराव किया गया। हंगामा रात 2.00 बजे तक जारी रहा। पुलिस बल ने आँसू गैस के गोले छोड़ प्रदर्शन कर रहे लोगों को खदेड़ा। गुरुवार (13 अप्रैल) सुबह तक इलाके में तनाव था।

‘और कितने आयोग…’: ईसाई-मुस्लिम बने दलितों को भी SC दर्जा पर सुप्रीम कोर्ट का सवाल, रंगनाथ मिश्रा कमिटी की रिपोर्ट केंद्र ने खारिज की

ईसाई और मुस्लिम दलितों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने की माँग वाली याचिका पर सुनवाई की रूपरेखा जुलाई 2023 में तय होगी। लगभग 20 सालों से लंबित इस मामले पर निर्णय लेेने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है। वहीं, केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि पूर्व चीफ जस्टिस केजी बालाकृष्णन के नेतृत्व में बनी कमेटी की रिपोर्ट का वह इंतजार कर रही है।

दरअसल, केंद्र सरकार ने पूर्व CJI रंगनाथ मिश्रा की अध्यक्षता में बनाई गई कमिटी की रिपोर्ट को खारिज कर दिया है। इस रिपोर्ट में ईसाई और मुस्लिम दलितों को अनुसूचित जाति में शामिल करने की सिफारिश की गई थी, ताकि उन्हें शिक्षा एवं नौकरी में दलितों की भाँति आरक्षण का लाभ मिल सके।

साल 2007 में कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) की गठबंधन में मनमोहन सिंह सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंगनाथ मिश्रा की अध्यक्षता में आयोग का गठन किया था। जस्टिस रंगनाथ मिश्रा ने साल 2009 में अपनी रिपोर्ट दी थी। 

मिश्रा कमिटी की रिपोर्ट को खारिज करते हुए केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि यह रिपोर्ट बिना फील्ड स्टडी और किसी से सलाह के बिना तैयार की गई थी। इसके बाद 7 अक्टूबर 2022 को केंद्र की मोदी सरकार ने बालाकृष्णन के नेतृत्व में 3 सदस्यीय आयोग गठित किया। इस आयोग को कहा गया कि वे पता लगाएँ कि धर्मांतरित ईसाई और मुस्लिमों दलित को अनुसूचित जाति का दर्जा देने की जरूरत है या नहीं। इसके लिए 2 साल का समय दिया गया है।

इस मामले की इसकी अगली सुनवाई 11 जुलाई 2023 को की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह जुलाई में होने वाली अगली सुनवाई में विचार करेगा कि सरकार द्वारा स्वीकार ना की जाने वाली कमीशन की रिपोर्ट पर भरोसा किया जाना चाहिए या नहीं। अगर विश्वास किया जा सकता है तो किस हद तक।

केंद्र द्वारा केजी बालाकृष्णन की रिपोर्ट का इंतजार करने के आग्रह पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे पर और कितने कमीशन बनेंगे?  इनका क्या औचित्य है? ये भी नहीं पता कि वर्तमान कमीशन की रिपोर्ट भी पहले जैसी नहीं होगी? अदालत ने कहा कि पूर्व चीफ जस्टिस रंगनाथ मिश्रा कमिटी की रिपोर्ट को स्वीकार नहीं किया गया।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि यह एक संवैधानिक सवाल है कि क्या राज्य धर्म के आधार पर भेदभाव कर सकता है?  सरकार अब कह रही हैं कि उसने दो साल के कार्यकाल वाले एक नया आयोग को नियुक्त किया है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या अदालत को सरकार के इस बयान पर फिर इंतजार करना चाहिए?

प्रशांत भूषण ने तर्क दिया, “हम शामिल करने के लिए नहीं, बल्कि दलित ईसाइयों और दलित मुस्लिमों के बहिष्कार को असंवैधानिक, अवैध और मनमाना कह रहे है। दरअसल, केवल हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के लोगों को अनुसूचित जाति के रूप में मान्यता दी गई है और उन्हें नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण दिया गया है।

बता दें कि इससे पहले केंद्र ने कहा था कि जिन लोगों ने ईसाई एवं इस्लाम में धर्मांतरण कर लिया है, उन्हें एससी का दर्ज नहीं दिया जा सकता। इसके पीछे केंद्र ने तर्क दिया था कि इस्लाम और ईसाइयत में भेदभाव नहीं होता और ना ही पिछड़ापन है।

दरअसल, 1936 में ब्रिटिश शासन ने भी अपने आदेश में कहा था कि धर्म परिवर्तन कर ईसाई बने दलितों को शोषित नहीं माना जाएगा। 1950 में राष्ट्रपति की तरफ से जारी ‘दि कॉन्स्टिट्यूशन (शेड्यूल्ड कास्ट्स) ऑर्डर’ में इस बात का प्रावधान किया गया है कि सिर्फ हिंदू, सिख और बौद्ध समुदाय से जुड़े दलितों को ही अनुसूचित जाति का दर्जा मिलेगा।

इसके पीछे कारण दिया कि ईसाई और मुस्लिम समाज में जाति व्यवस्था नहीं होती है। इसलिए धर्म परिवर्तन के बाद हिंदू से ईसाई या मुस्लिम बने दलित लोगों को सामाजिक भेदभाव नहीं होता है और वे इस आधार पर खुद को अलग दर्जा देने की माँग नहीं कर सकते। 

साल 1980 के दशक में 1950 में दिए गए राष्ट्रपति आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। ‘सूसाई बनाम भारत सरकार’ नाम के इस केस का फैसला 1985 में आया था और इसमें सुप्रीम कोर्ट ने धर्मांतरित ईसाई और मुस्लिम दलितों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने से मना कर दिया था।

इसके बाद साल 2004 में गाज़ी सादुद्दीन नाम के याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर मुस्लिम दलितों को भी आरक्षण का लाभ देने की माँग की। इसके बाद ईसाई संगठनों की तरफ से भी ऐसी ही कई याचिकाएँ दाखिल की गईं। तब से यह मामला लंबित है।

दुनिया में बजेगा भारत का झुनझुना… अकेले अमेरिका देगा ₹3280 करोड़ का ऑर्डर, यूरोप से भी बढ़ रही माँग: मोदी सरकार की नई नीतियों का प्रभाव

दुनिया भर के देशों में भारतीय खिलौने अपनी मौजूदगी दर्ज कराने वाले हैं। यूरोप और अमेरिका के वैश्विक खिलौना विक्रेताओं ने भारतीय खिलौना निर्माताओं से संपर्क किया है। रिपोर्टों के अनुसार बताया जा रहा है कि विक्रेता कंपनियों ने अनुपालन आवश्यकताओं (Compliance requirements) को पूरा करने के लिए भारतीय खिलौना निर्माताओं की मदद का भी भरोसा दिया है। सरकारी अधिकारी की तरफ से दी गई जानकारी के अनुसार वैश्विक खिलौना मार्केट के दिग्गज विक्रेता भारत से बड़े पैमाने पर खिलौनों की खरीददारी करना चाहते हैं।

‘प्लेग्रो टॉयज इंडिया’ के प्रमोटर और ‘टॉय एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ के चेयरमैन मनु गुप्ता ने जानकारी दी कि अमेरिका के एक खिलौना रिटेलर ने भारतीय खिलौना उद्योग जगत से संपर्क किया है। अमेरिकी कारोबारी राइड-ऑन, ऑउटडोर, मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल खिलौनों में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। यदि यह डील फाइनल होती है तो भारतीय कारोबारियों को 400 मिलियन (3279.31 करोड़ रुपए) अमरीकी डॉलर का ऑर्डर मिल सकता है। वहीं इटली की एक फर्म ने भी भारत से सोर्सिंग के लिए खिलौना निर्माताओं से संपर्क किया है।

बता दें कि भारत सरकार के वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के तहत आने वाले उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग (DPIIT) द्वारा भारत में खिलौना निर्माण को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं। DPIIT के अधिकारी भारतीय खिलौना उद्योग जगत को वैश्विक कंपनियों से जुड़ने और ऑर्डर हासिल करने में मदद कर रहे हैं। अमेरिकी और यूरोपीय कंपनियाँ उन मैन्यूफैक्चरर्स से सामान खरीदती हैं जो उनके उत्पाद और सामाजिक अनुपालन को पूरा करती हैं।

मनु गुप्ता ने के अनुसार भारतीय खिलौने माँग के मुताबिक मानकों को पूरा कर सकें इसके लिए विदेशी फर्म भारतीय खिलौना निर्माताओं के मौजूदा कार्यबल, अपस्किलिंग और रीस्किलिंग करने के लिए तैयार हैं। ताकि हम जल्द से जल्द वैश्विक कंपनियों के मानकों को पूरा कर सकें। दूसरी तरफ भारत अब खिलौनों का आयात कम कर रहा है। 2021-22 में भारत में खिलौनों का कुल आयात 70 प्रतिशत घटकर 870 करोड़ रुपए रह गया था।

गुजरात पुलिस ने दंगाई अब्दुल रशिद शेख को पकड़ा: वडोदरा में रामनवमी की शोभायात्रा पर किया था पथराव, पुलिस से रायफल छिनने की कोशिश भी की थी

गुजरात के वडोदरा में रामनवमी के अवसर पर निकाली गई शोभायात्रा पर मस्जिद के सामने पत्थरबाजी की गई थी। इसके बाद इलाके में तनाव फैल गया था। जब हालात पर काबू पाने के लिए पुलिस बल ने कार्रवाई शुरू को पुलिस जवानों की रायफलें छिनने की भी कोशिश की गई थी। इस मामले में वडोदरा पुलिस ने अब्दुल शेख रशीद नाम के शख्स को गिरफ्तार किया है।

हिंसा में शामिल आरोपितों की पहचान CCTV के फुटेज के आधार पर की गई है। इसके बाद पुलिस ने छापेमारी करके आरोपियों की धरपकड़ शुरू की है। इस सिलसिले में गुजरात पुलिस ने अब्दुल रशीद शेख को मंगलवार (11 अप्रैल 2023) को गिरफ्तार कर लिया।

बता दें कि शोभायात्रा पर मस्जिदों एवं अन्य जगहों से पथराव के बाद जब पुलिस ने कार्रवाई शुरू की थी मुस्लिम महिलाओं ने पुलिस का रास्ता रोक लिया था। इतना ही उन्होंने पुलिस के साथ बदतमीजी भी की और उन्हें गालियाँ भी दीं। इन घटनाओं को लेकर कई वीडियो सामने आए थे।

सामने आए वीडियो में दिख रहा था कि शोभा यात्रा पर पथराव सिर्फ मस्जिद के आसपास की छतों से ही नहीं, बल्कि मस्जिद से भी की गई। वीडियो में नमाजी टोपी पहना एक शख्स मस्जिद से शोभायात्रा में शामिल लोगों पर पत्थर फेंकता है और फिर भाग जाता है।

शोभा यात्रा पर पथराव करने वाले अपराधियों को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस जब मुस्लिम इलाके में गई तो मुस्लिम महिलाओं ने उन्हें घेर लिया। कट्टरपंथी मुस्लिम महिलाएँ पुलिस के सामने ना सिर्फ चीख-चिल्ला रही थीं, बल्कि ‘पत्थर मारो सालों को’ कहकर गाली भी दे रही थीं।

बता दें कि 30 मार्च 2023 को देश भर में हर्ष और उल्लास के साथ रामनवमी मनाया गया, लेकिन कुछ राजनीतिक वजह से और कुछ कट्टरपंथियों की मजहहबी वजह से कई राज्यों में शोभा यात्रा पर हमले किए गए। बंगाल में सीएम ममता बनर्जी द्वारा जूलुस को मुस्लिम इलाके में ले जाने की धमकी के बाद वहाँ बड़े पैमाने पर हिंसा भड़क उठी। कट्टरपंथियों ने उनके बयान को सहयोग माना। वडोदरा में यही हालत रही।

प्रियंका गाँधी का ‘अहिंसा से मिली आज़ादी’ वाला झूठ: ये वायनाड के जनजातीय समाज का भी अपमान, आंबेडकर ने भी कहा था – अहिंसा से सब कुछ हासिल नहीं किया जा सकता

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के मध्य में स्थित गणेश चंद्र एवेन्यू के पास एक INOX का एक सिनेमा हॉल है। इसके पास ही आपको 4 लोगों की प्रतिमाएँ दिखेंगी, साथ ही एक अजीब सी बंदूक की तस्वीर। बहुतों को इसके बारे में नहीं पता। इसका सम्बन्ध 26 अगस्त, 1914 से है जब कोलकाता के बीबीडी बाग़ में कुछ क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश गन स्टोर ‘रोड्डा एन्ड कंपनी’ से भारी मात्रा में हथियार लूटे थे। इनमें से कई क्रांतिकारियों में बाँटे गए, तो कई अंग्रेजों ने जब्त कर लिए।

हथियारों को ठिकाने लगाने में ‘गीताप्रेस’ के संस्थापक हनुमान प्रसाद पोद्दार ने भी क्रांतिकारियों की मदद की थी। अंग्रेजों ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था, “डकैती/हत्या/हत्या के प्रयास के 54 मामलों में रोड्डा से लूटे गए पिस्तौलों का इस्तेमाल किया गया।” रास बिहारी बोस से लेकर बाघा जतिन तक, कइयों ने इन बंदूकों का इस्तेमाल किया। ये चारों मूर्तियाँ बिपिन बिहारी गांगुली, अनुकूल मुखर्जी, गिरीन्द्र नाथ बनर्जी और हरिदास दत्ता की हैं, जिन्होंने इस लूटकांड को अंजाम दिया था।

अब चलते हैं वायनाड, केरल की वो सुंदर जगह जहाँ से राहुल गाँधी ने 2019 में लोकसभा चुनाव जीता था। समय 102 साल और पीछे, सन् 1812 में। ये वो साल था, जब केरल की कुरुचियार जनजातीय समूह ने अंग्रेजों के खिलाफ बड़ा विद्रोह किया था। ये इतिहास की पुस्तकों में नहीं मिलता। इसके अलावा एक और जनजातीय समुदाय है यहीं का – कुरुमा। उसने भी ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ के खिलाफ युद्ध छेड़ा था। थालाक्कल चंदू और रमन नाम्बि इस संघर्ष के नायक थे।

‘कोलपयट्टु’ नामक मर्शक आर्ट की लड़ाई में दक्ष नाम्बि के नेतृत्व में जनजातीय समाज के लोगों ने अंग्रेजों से जम कर लोहा लिया था। तीर-धनुष और भाले चलाने का प्रशिक्षण उन्होंने अपने समाज के लोगों को दिया। तब चिन्गेरी, पोक्कम, मुद्रामूला, गणपतवट्टोम और मुट्टी जैसी जगहों पर अंग्रेजों से जनजातीय समाज की लड़ाई हुई। उनकी मौत के बाद अंग्रेजों ने उनके सिर को काट कर उनके छोटे से बेटे के सामने प्रदर्शनी लगा दी थी, ताकि लोगों में भौ फैले। उत्तरी वायनाड और कूर्ग की सीमा पर उनकी मृत्यु हुई थी।

अब चलते हैं कर्नाटक के शिवमोगा में। यहाँ एक जगह है ईस्सूर, जहाँ अंग्रेजों की फ़ौज ने जम कर तबाही मचाई थी। चूँकि क्रांतिकारी आसपास के जंगलों में छिपे हुए थे, महिलाओं को अंग्रेजों ने शिकार बनाया। महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया और उनके घरों को आग के हवाले कर दिया गया। 20 निर्दोषों को मार डाला गया। नाबालिगों को गिरफ्तार किया गया। ये घटना आज़ादी के आंदोलन के अंतिम चरण की है, 1942-43 की।

अंग्रेजों ने लोगों ने घरों से बाहरी मात्रा में लूट को अंजाम दिया था। रुपए और आभूषण लूट लिए गए थे। जमींदारों के घरों में भी छापेमारी कर के उन्हें प्रताड़ित किया गया था। दर्जनों को बेंगलुरु के सेन्ट्रल जेल में भेज दिया गया था। इन सबका कारण था – गाँव ने 1942 में खुद को आज़ाद घोषित कर दिया था। यहाँ के स्वतंत्रता सेनानियों को उचित सम्मान नहीं मिला। पूरे कर्नाटक को ईस्सूर से प्रेरणा मिली। एक कहावत चलने लगी कि पूरा कर्नाटक दे देंगे लेकिन ये जगह नहीं।

पश्चिम बंगाल, केरल और कर्नाटक की इन 3 घटनाओं का जिक्र करने के पीछे एक कारण है। पहली घटना बताती है कि क्रांतिकारियों को हथियारों की सख्त ज़रूरत थी, इसीलिए इस तरह की कई लूट की घटनाओं को अंजाम दिया गया। हथियार क्यों, अंग्रेजों से लड़ने के लिए। दूसरी घटना बताती है कि सुदूर जंगलों के आदिवासी भी बरछे-धनुष लेकर अंग्रेजों के छक्के छुड़ाए हुए थे। तीसरी घटना बताती है कि क्रांतिकारियों से अंग्रेजों को इतनी दिक्कतें थीं कि उनके महिलाओं-बच्चों तक को वो नहीं छोड़ते थे।

हमें इन तीनों घटनाओं को इसीलिए याद करानी पड़ रही है, क्योंकि कॉन्ग्रेस नेता प्रियंका गाँधी ने वायनाड में एक भाषण देते हुए कहा है कि भारत की स्वतंत्रता का आंदोलन अहिंसा पर आधारित था। राहुल गाँधी भी कई बार इस झूठ को दोहरा चुके हैं। क्या ये उन क्रांतिकारियों का अपमान नहीं है, जिन्हें अंग्रेजों ने फाँसी पर लटका दिया? क्या ये उनके परिवारों का अपमान नहीं, जिन्होंने देश के लिए उनके योगदान का परिणाम उन्हें खो कर चुकाया?

पूछने को तो पहला सवाल यही पूछा जाना चाहिए कि अगर अहिंसा से आज़ादी मिली तो भगत सिंह, राजदुरु और सुखदेव ने किस चीज के लिए हँसी-ख़ुशी फाँसी के फंदे पर झूलना पसंद किया? सुभाष चंद्र बोस ने जर्मनी से लेकर जापान तक की यात्रा कर के एक संगठित सेना किसलिए बनाई? मंगल पांडेय ने विद्रोह का कौन सा बिगुल फूँका था? झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने बेटे को पीठ पर लाद कर युद्ध क्यों लड़ा था? इतनी कम उम्र में खुदीराम बोस ने क्यों बलिदान दिया?

आज़ादी उनलोगों ने नहीं दिलाई, जो कहते थे कि अहिंसा ही हमारा हथियार होना चाहिए लेकिन भारतीयों को विश्व युद्ध में अंग्रेजों के लिए लड़ने को भेज देते थे। ये कैसी अहिंसा? आज़ादी उनलोगों ने भी नहीं दिलाई, जो 12 दिन जेल में रह जाते थे तो उनका खानदान दिन-रात एक कर के उन्हें निकालता था। आज़ादी उस पार्टी ने भी नहीं दिलाई, जिसने देश को खंडित कर दिया। आज़ादी उनलोगों ने भी नहीं दिलाई, जो क्रांतिकारियों का केस तक लड़ने से इनकार कर देते थे।

इस झूठ को कॉन्ग्रेस पोषित वामपंथी इतिहासकारों ने इतनी बार पढ़ाया और दोहराया है कि लोगों के मन में बैठने लगा कि अहिंसा से ही आज़ादी मिली। कुछ इसी तरह का झूठ अंग्रेजों के समय भी फैलाया गया था, उनके द्वारा ही। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को ‘सिपाही विद्रोह’ बताया गया। वो तो भला हो वीर विनायक दामोदर सावरकर का, जिन्होंने लंदन में गहरा रिसर्च कर के पुस्तक लिखा और अंग्रेजों के इस प्रोपेगंडा का पर्दाफाश कर दिया।

कुल मिला कर बात ये है कि न तो आज़ादी अहिंसा से मिली और न ही कॉन्ग्रेस पार्टी ने दिलाई। खुद बाबासाहब भीमराव आंबेडकर ने लिखा है कि अहिंसा से सब कुछ हासिल नहीं किया जा सकता। अहिंसा के धर्म को भी पालन करना उन्होंने अंसभव बताया है, क्योंकि कई ऐसे जीव हैं जो आँखों से दिखते भी नहीं। उन्होंने पूछा था कि कोई आपके घर में घुस कर आपकी पत्नी या बेटी का बलात्कार करे, तो क्या आप अहिंसा के धर्म का पालन करेंगे।

डॉ आंबेडकर की शब्दों में, “धर्मग्रंथ भी बुरे की हत्या को स्वीकृति देते हैं। सीमित दायरों में आधुनिक कानून भी इसे मंजूरी देता है। यदि आत्मरक्षा के लिए हिंसा के अलावा कोई चारा ही नहीं है, तो हिंसा का प्रयोग करना ही पड़ेगा।” उन्होंने अहिंसा की व्यापक परिभाषा को समझने पर जोर देते हुए कहा था कि महात्मा गाँधी जिसे अहिंसा कहते हैं, वो भी पूरी तरह अहिंसा नहीं है, क्योंकि किसी को दुःख पहुँचे तो वो भी हिंसा ही है।

रवि बिश्नोई सहित LSG के खिलाड़ियों ने अयोध्या में भगवान राम का किया दर्शन, बन रहे राम मंदिर में भी घूमे: IPL 2023 में No.1 पर है टीम

IPL 2023 में लखनऊ सुपर जायंट्स (Lucknow Super Giants- LSG) की टीम चार में से तीन मैच जीतकर टॉप पर है। सोमवार (10 अप्रैल 2023) को टीम ने एक रोमांचक मुकाबले में रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर (RCB) को मात दी। इस जीत से टीम के खिलाड़ियों का मनोबल अपने शिखर पर है। इसी बीच LSG की टीम के खिलाड़ी अयोध्या पहुँचकर भगवान राम के दर्शन किए।

लखनऊ सुपर जायंट्स के खिलाड़ी रवि बिश्वोई, सहायक कोच विजय दहिया सहित टीम के अन्य सदस्यों की तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। इस तस्वीर में खिलाड़ी सुरक्षाकर्मियों के साथ नजर आ रहे हैं। इनके हाथों में हेलमेट भी है।

दरअसल, अयोध्या में भगवान श्रीराम के मंदिर के निर्माण का काम जारी है। इसलिए जब ये खिलाड़ी वहाँ पहुँचे तो सुरक्षा कारणों से इन्हें हेलमेट पहनकर अंदर जाने की इजाजत मिली होगी। इस तस्वीर को रवि दहिया ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर डाला था। इसके बाद यह तस्वीर वायरल हो गई।

केएल राहुल की अगुवाई वाली यह फ्रेंचाइजी पिछले सीजन से काफी परिपक्वता दिखाई है। आखिरी गेंद पर रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर पर LSG की जीत ने एक बार फिर अपनी साख साबित कर दी। लखनऊ स्थित फ्रेंचाइजी इस बार अपने पहले खिताब की तलाश में है।

LSG टीम में कैप्टन केएल राहुल के अलावा क्विंटन डी कॉक, मनन वोहरा, निकोलस पूरन, आयुष बडोनी, कृष्णप्पा गौतम, दीपक हुड्डा, काइल मेयर्स, क्रुणाल पांड्या, करण शर्मा, मार्कस स्टोइनिस, रोमारियो शेफर्ड, डेनियल सैम्स, प्रेरक मांकड़, स्वप्निल सिंह, युधवीर चरक, आवेश खान, मोहसिन खान, रवि बिश्नोई, मार्क वुड, मयंक यादव, जयदेव उनादकट, यश ठाकुर, अमित मिश्रा, नवीन-उल-हक शामिल हैं।

टीम के कुछ सदस्यों की भगवान राम के दर्शन की तस्वीर वायरल होने के बाद सोशल मीडिया यूजर तरह-तरह के कमेंट कर रहे हैं। SarcasticCowboy नाम के हैंडल ने लिखा, “अगले मैच में बिश्नोई की हैट्रिक पक्की है।” वहीं, राघव नाम के यूजर ने लिखा है कि इसीलिए LSG टॉप पर रहै।

संकल्प दुबे नाम के यूजर ने लिखा, “अगर वे आईपीएल 2023 जीत जाते हैं तो आश्चर्य नहीं होगा। वे पहले से ही आगे चल रहे हैं। कप्तान के बिना भी धार्मिक मूल्यों वाली एक टीम। सच में रामचंद्र के भरोसे।”

ज्ञापन देने गए हिन्दू कार्यकर्ता, लेकिन झारखंड पुलिस ने वकील सहित कर लिया गिरफ्तार: एक तो 2 दिन पहले ही माँ का श्राद्ध कर लौटा था, कोर्ट में कामकाज बंद

झारखंड के जमशेदपुर में हुई सामप्रदायिक हिंसा मामले में SSP से मिलने गए 1 वकील सहित हिन्दू संगठन से जुड़े 7 युवकों को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया गया है। इन पर हत्या के प्रयास सहित अवैध हथियार रखने और विस्फोटक अधिनियम की धाराएँ लगा दी गईं हैं। जेल भेजे गए आरोपितों ने खुद को बेगुनाह बताते हुए पुलिस के रैवैये को गलत बताया है। इन सभी को सोमवार (10 अप्रैल, 2023) को हिरासत में लिया गया था।

जमशेदपुर पुलिस के इस कदम के खिलाफ जिला अदालत के वकीलों ने भी नाराजगी जताई है। अधिवक्ताओं द्वारा कोर्ट में प्रदर्शन कर के आक्रोश जताया गया और आंदोलन की चेतावनी दी गई।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सोमवार को अधिवक्ता चंदन चतुर्वेदी के नेतृत्व में हिन्दू संगठनों का एक समूह जमशेदपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक से मिलने उनके ऑफिस गया था। वकील के अलावा 7 अन्यत लोगों में अनिरुद्ध गिरी, चंदन दास, भोला लोहार, भीम यादव, कन्हैया पांडेय, शंकर राव और राजेश चौबे शामिल हैं। ये सभी SSP प्रभात कुमार को शास्त्रीनगर में रविवार की रात दो गुटों में हुई झड़प के मामले में माँग पत्र सौंपना चाहते थे। आरोप है कि वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के ऑफिस से ही इन सभी को हिरासत में ले लिया गया।

सभी 8 लोगों पर 24 घंटे के बाद हत्या का प्रयास, आर्म्स एक्ट, विस्फोटक एक्ट की धारा लगा कर FIR दर्ज कर ली गई। इसमें वकील के अलावा अन्य सदस्य ‘विश्व हिंदू परिषद’ और गोरक्षा आंदोलन से जुड़े हुए थे। बाद में मंगलवार (11 अप्रैल 2023) को इन सभी को जेल भेज दिया गया। गिरफ्तार लोगो में अनिरुद्ध गिरी के बारे में बताया जा रहा है कि वो 2 दिन पहले अपनी माँ का श्राद्ध कर्म कर के लौटे थे। भाजपा विधायक सरयू राय ने पुलिस के इस रवैये पर हैरानी जताई है। उन्होंने कहा कि SSP से मिलने गए वकील को भी जेल भेज दिया गया।

जेल जाने के दौरान वकील ने और अन्य आरोपितों ने खुद को बेगुनाह बताया। उन सभी ने SSP ऑफिस में लगे CCTV की जाँच की माँग की है। उनका कहना है कि SSP के ऑफिस के गेट पर उन्हें मिलाने के बहाने हिरासत में ले लिया गया। हिरासत से पहले सभी आरोपितों का फोन ले लेने का आरोप लगाया गया है। वकील ने इस हरकत को एमरजेंसी जैसा बताया। वकील के मुतबिक एक रात पहले कदमा से विश्व हिन्दू परिषद के कुछ कार्यकर्ताओं को उठाया गया था जिसकी वजह पूछ्ने वो लोग ऑफिस गए थे। वहीँ एक हिंदूवादी कार्यकर्ता के अनुसार, उन्हें एसएसपी ऑफिस से ही बुलाया गया था। सभी आरोपितों ने अपने साथ दुर्व्यवहार की शिकायत की है।

पुलिस की इस कार्रवाई पर जमशेदपुर कोर्ट के वकीलों ने नाराजगी जताई है। वकीलों ने कोर्ट में कामकाज बंद रखा और ‘पुलिस प्रशासन होश में आओ’ के नारे लगाए। वकील चंदन चौबे को हथकड़ी लगा कर जेल भेजे जाने से अधिवक्ताओं ने नाराजगी जताई।

वकीलों के मुताबिक महज ज्ञापन देने गए उनके साथी वकील को हिरासत में लिया गया और झूठे मामले में 24 घंटे बाद जेल भेजा गया। नाराजगी जताते हुए वकीलों ने कहा कि अगर वकील को हथकड़ी लगाने वाले पुलिस वालों पर कार्रवाई नहीं की गई तो अदालत में न्यायिक कार्य बंद रखा जाएगा।

हिंदुओं पर झूठे मुकदमे, दंगा भड़काने में CM ममता बनर्जी का हाथ: रामनवमी हिंसा पर फैक्ट फाइंडिंग कमिटी की रिपोर्ट, खुलासा – डर से शिकायत तक करने नहीं गए हिन्दू पीड़ित

पश्चिम बंगाल के हावड़ा और हुगली में रामनवमी के अवसर पर हुई हिंसा के लिए मानवाधिकार आयोग की फैक्ट फाइंडिंग कमेटी ने ममता सरकार को जिम्मेदार ठहराया था। पटना उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश नरसिम्हा रेड्डी के नेतृत्व में छह सदस्यीय कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया है कि दंगे पूर्व नियोजित थे जिन्हें सुनियोजित तरीके से भड़काया गया था। अपने रिपोर्ट में आयोग ने राज्य पुलिस की तटस्थता को लेकर भी सवाल खड़े किए थे।

फैक्ट फाइंडिंग कमेटी के अलावा कलकत्ता हाई कोर्ट भी हिंसा को पूर्व नियोजित करार दे चुकी है। कलकत्ता हाई कोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश टीएस शिवगणनम ने कहा कि यदि छतों से पत्थर फेंके गए। तो जाहिर है पत्थरों को 10-15 मिनट में छत पर नहीं ले जाया जा सकता था। कलकत्ता उच्च न्यायालय और फैक्ट फाइंडिंग कमेटी की रिपोर्ट ने बंगाल हिंसा पर पश्चिम बंगाल सरकार और पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाए। साथ ही हिंसा के लिए हिंदुओं को जिम्मेदार ठहराने वाले ममता बनर्जी और पूरे इको सिस्टम का भी भंडाफोड़ कर दिया।

ऑपइंडिया के पास मानवाधिकार आयोग की फैक्ट फाइंडिंग कमेटी की पूरी रिपोर्ट उपलब्ध है। कमेटी द्वारा दिए गए विवरण और माँगो को हम संक्षेप में प्रस्तुत कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार-

1.बंगाल में हुई हिंसा का मुख्य कारण पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा रामनवमी से पहले दिया गया घोर भड़काऊ भाषण था। रिपोर्ट के अनुसार सीएम ममता केंद्र सरकार के खिलाफ एक दिन के धरने पर बैठी थीं। इस दौरान उन्होंने अपने भाषण में कहा था कि मुस्लिम इलाकों से गुजरने वाले जुलूस पर कार्रवाई की जाएगी। इसके बाद शांतिपूर्वक शोभा यात्रा पर भीड़ हमला कर देती है। राज्य की पुलिस दंगाइयों को नियंत्रित करने में न सिर्फ विफल रही बल्कि मौके से गायब रही।

2.ममता बनर्जी हिंसा के बाद राम भक्तों को दोषी ठहराने के लिए आरोप लगा रही हैं कि अंतिम समय में शोभा यात्रा का मार्ग बदल दिया गया। जबकि कमेटी की रिपोर्ट में इस दावे को खारिज किया गया है। पीड़ितों और शोभा यात्रा में शामिल लोगों के अनुसार किसी मार्ग को अंतिम समय में नहीं बदला गया। राज्य पुलिस को इस मार्ग के बारे में पहले ही सूचित कर दिया गया था। पुलिस द्वारा इसकी स्वीकृति भी दी गई थी।

3.रिपोर्ट से पता चलता है कि हिंदुओं ने शोभा यात्रा पर संभावित खतरे को देखते हुए अतिरिक्त सुरक्षा माँगी थी। शोभा यात्रा आयोजकों के अनुसार पिछले साल भी उनकी यात्रा को निशाना बनाया गया था इसलिए पुलिस से अतिरिक्त सुरक्षा माँगी गई जिसे देने में राज्य की पुलिस विफल रही। रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य सरकार की विफलता के कारण ही शोभा यात्रा निकालने वालों पर भारी पथराव किया गया। पथराव के कई वीडियो सोशल मीडिया पर उपलब्ध हैं।

  1. रिपोर्ट में पुलिस पर जानबूझकर पक्षपातपूर्ण तरीके से काम करने का आरोप लगाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार शोभा यात्रा को पर्याप्त सुरक्षा न दिया जाना और दंगाईयों के खिलाफ कार्रवाई न करना इसी तरफ इशारा करता है।
  2. रिपोर्ट में कहा गया है कि रामनवमी के बाद भी सीए ममता बनर्जी बिना किसी जाँच के हिंसा के लिए हिदुओं को दोष देती रहीं। ममता बनर्जी ने कहा कि रमजान के महीने में मुस्लिम गलत हरकत नहीं कर सकते। उनके एक तरफा बयान दंगाईयों का हौसला बढ़ा रहे थे और रामनवमी के कई दिनों बाद तक बंगाल के कई इलाके हिंसा की आग में जलते रहे।
  3. रिपोर्ट में हिंसा के लिए ममता बनर्जी के एक और बयान को जिम्मेदार ठहराया गया है। इस वीडियो में ममता बनर्जी अल्पसंख्यकों को कानून हाथ में लेकर दंगाईयों ( बंगाल के सीएम के अनुसार हिंदुओं) को सबक सिखाने की बात कर रही हैं। अल्पसंख्यकों को खुश करने के लिए ममता लगातार ऐसे बयान दे रही हैं। जिससे समाज के बड़े वर्ग में असंतोष फैले और असमाजिक तत्वों का मनोबल बढ़े।
  4. कमेटी के अनुसार ममता बनर्जी न सिर्फ जाँच को प्रभावित कर रही थीं बल्कि अपने नफरती भाषणों से धार्मिक आधार पर भीड़ को उकसा रही थीं। रिपोर्ट के अनुसार इस तरह के कई वीडियो वायरल हैं जो धार्मिक आधार पर हिंसा और हत्या को प्रोत्साहित करने वाले हैं।
  5. रिपोर्ट में ममता बनर्जी के उस भाषण की बात प्रमुखता से की गई है जिसमें वे अल्लाह’ का जिक्र करते हुए शोभा यात्रा निकालने वालों के खिलाफ मुस्लिमों को भड़का रही हैं। सीएम ममता उन्हें जुलूस निकालने वालों को दंगाबाज (दंगाई) कहते हुए खत्म करने की बात कह रही हैं।
  6. रिपोर्ट में कहा गया है कि CISF सुरक्षा होने के बावजूद विधायक बिमन घोष भी हिंसा में घायल हो गए थे इससे राज्य पुलिस की मंशा जाहिर होती है। इस आधार पर पुलिस पर सांप्रदायिक तत्वों के समर्थन का आरोप लगाया गया है।
  7. रिपोर्ट के अनुसार, राज्य सरकार और राज्य पुलिस के पक्षपात पूर्ण रवैया के कारण पीड़ित पक्ष पुलिस की मदद के लिए आगे नहीं आया। डर के मारे कई मामलों की रिपोर्ट ही दर्ज नहीं कराई गई। रिपोर्ट के अनुसार पुलिस पीड़ितों की मदद करने की जगह उन्हें झूठे केस में फँसाने की धमकी देती है। बंगाल के लोग राज्य मशीनरी के गुंडों को भय में रहने को मजबूर हैं।
  8. रिपोर्ट में कही गई अहम बातों में से एक यह भी है कि पश्चिम बंगाल पुलिस झूठी गिरफ्तारियाँ कर रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पुलिस अपनी नाकामियाँ छिपाने के लिए धारा 144, सीआरपीसी और विचाराधिन मामलों की आड़ ले रहा है।
  9. रिपोर्ट के अनुसार राज्य में कानून व्यवस्था बनाए रखने में पुलिस के आला ऑफिसर भी अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा सके। रिपोर्ट में कहा गया है कि चंदननगर पुलिस आयुक्त (Commissioner of Police) अमित पी जवालगी और हावड़ा पुलिस आयुक्त प्रवीण कुमार त्रिपाठी दंगा नियंत्रण में अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभा सके। जिन क्षेत्रों में हिंसा की सूचना मिली थी वहाँ पुलिस द्वारा बहुत देरी से कार्रवाई की गई। कमेटी के लोगों को दंगा प्रभावित इलाके का दौरा न करने देना भी दर्शाता है कि पुलिस के वरिष्ठ ऑफिसर राज्य सरकार को खुश करने के लिए काम कर रहे हैं।
  10. दावा है कि जब कमेटी को लोगों को चंदननगर पुलिस आयुक्त अमित जवालगी और हावड़ा पुलिस आयुक्त प्रवीण त्रिपाठी ने दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा करने की इजाजत नहीं दी। पुलिस की तरफ से उन्हें उन स्थानों पर न जाने के लिए लेटर जारी कर दिया गया। इसे बाद कमेटी की तरफ से खतों का जवाब दिया गया। जब पुलिस की तरफ से पत्राचार नहीं हुआ तो लोग प्रभावित इलाकों का दौरा करने पहुँचे। पुलिस ने उन्हें रोक दिया। इसके बाद टीम के मेंबर एक अस्पताल पहुँचे जहाँ एक हिंदू युवक गंभीर रूप से घायल था। अस्पताल में बताया गया कि गंभीर रूप से घायल होने के बाद भी पुलिस ने उस युवक की शिकायत दर्ज नहीं की थी।
  11. ऑपइंडिया को प्राप्त कमेटी की रिपोर्ट में विस्तार से उस घटना की जानकारी दी गई है कि कैसे 8 और 9 अप्रैल को बंगाल पुलिस ने टीम के मेंबरों को प्रभावित इलाकों में जाने से रोक दिया था। कमेटी द्वारा बंगाल पुलिस को यह प्रस्ताव दिया गया था कि पुलिस की टीम चाहे तो उनके साथ दंगा प्रभावित इलाकों में चल सकती है। इस अनुरोध को भी अस्वीकार कर दिया गया। जिससे पुलिस की भूमिका संदेहास्पद हो जाती है।

रिपोर्ट के अनुसार, चूँकि समिति को हिंसा वाले इलाकों में जाने नहीं दिया गया इसलिए पीड़ितों को खुली पेशकश की गई कि वे अपनी सुविधानुसार समिति के मेंबरों से मिल सकते हैं। इसके बाद सांप्रदायिक दंगों के 24 पीड़ितों ने एक निजी और सौहार्दपूर्ण बातचीत में समिति से मिलने की इच्छा जाहिर की। पीड़ितों में से कुछ लोग ऐसे थे जो हावड़ा के शिवपुर शोभा यात्रा में शांतिपूर्ण रूप से शामिल हो रहे थे और कुछ लोग वो थे जो यात्रा में शामिल लोगों को पानी और फल उपल्बध कराने जैसी सेवा दे रहे थे। पीड़ितों ने बताया कि उनके पास हथियार होने का प्रश्न ही नहीं था। यात्रा हर साल निकाली जाती है। रास्ते भी वही होते हैं। विगत कुछ सालों से यात्रा को निशाना बनाया जाने लगा है। रामनवमी वाले दिन भी अचानक छतों से पत्थरों की बौछार होने लगी।

बताया गया कि हमला करने के लिए छतों पर पहले से ठिकाने बनाए गए थे। एक तरफ से पत्थर चलाने और दूसरी तरफ छिपने की जगह बनाई गई थी। पुलिस इन हमलों को रोकने में नाकाम रही। बच्चे-बुढ़े सब चोटिल हो गए। इसके बाद हिंदुओं की संपत्तियों को भी नुकसान पहुँचाया जाने लगा।

  1. रिपोर्ट से सामने आई चौंकाने वाली बातों में से एक यह भी था कि पुलिस ने दंगाइयों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की उल्टे पीड़ित पक्ष पर ही लाठी चार्ज किया। पीड़ितों ने समिति को जानकारी दी कि पुलिस के इलाके से निकलते ही मुस्लिम तबके के लोग हिंसा शुरू कर देते थे। मुस्लिम भीड़ नुकसान पहुँचाने के मकसद से हिंदू इलाकों में दाखिल हुई। रिपोर्ट में कहा गया है कि पीड़ित पक्ष अपने दावों को सही साबित करने के लिए घटना के वीडियो भी जारी करेगा। पीड़ितों के अनुसार दंगा भड़कने के बाद पुलिस ने फोन कॉल स्वीकार करने बंद कर दिए। थाना से सटे इलाकों में भी दंगाई हिंसा कर रहे थे।

16.कमेटी के मेंबरों से बात करने वाले पीड़ितों को झूठे मामलों में फँसाए जाने का डर सता रहा था। लगभग सभी पीड़ितों ने अनुरोध किया कि उनकी पहचान गोपनीय रखी जाए। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार कई स्थानों पर पुलिस ने दंगाईयों को हिंसा फैलाने के लिए खुला मैदान दे दिया।

अंत में समिति कुछ अहम निष्कर्ष पर पहुँचती है जो इस प्रकार हैं-

दंगाइयों और उनके समर्थकों को राज्य सरकार का समर्थन प्राप्त था। राज्य सरकार के समर्थन के बिना इतना व्यापक नुकसान असंभव है। सबूत हिंसा में पुलिस की सक्रिय भूमिका की ओर इशारा करते हैं। पुलिस को शोभा यात्रा के रूट की जानकारी थी। कुछ इलाके ऐसे थे जहाँ पिछले साल भी हिंसा हुई थी। अनुरोध के बावजूद पुलिस ने उन्होंने सुरक्षा नहीं दी। राज्य पुलिस की कार्रवाई राजनीतिक लाभ से प्रेरित लग रही हैं।

कमेटी की तरफ से की गई माँग

1.दंगा करने वालों के खिलाफ मामला दर्ज कर कार्रवाई की जाए।
2.दंगों की निष्पक्ष जाँच के लिए जाँच की जिम्मेदारी एनआईए को सौंपी जाए।
3.खौफ में रह रहे पीड़ितों को सुरक्षा प्रदान की जाए।
4.निर्दोष पीड़ितों के खिलाफ दर्ज किए गए झूठे मामलों को वापस लिया जाए।
5.चूँकि लोगों का पुलिस पर भरोसा कम हो चुका है अतः प्रभावित क्षेत्रों में विश्वास बहाली तक केंद्रीय बलों की तैनाती की जाए।

बता दें कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के जन्मोत्सव रामनवमी के अवसर पर पश्चिम बंगाल के कई हिस्सों में हिंसक झड़पें हुई थीं। इस हिंसा में दर्जनों लोग घायल हुए थे। वहीं, कुछ लोगों के मारे जाने की भी खबर सामने आई थी। इसी तरह हुगली जिले के रिसड़ा में हिंसा की शुरुआत 2 अप्रैल की शाम भाजपा रामनवमी शोभायात्रा में हुए पथराव के साथ हुई थी। इसके बाद सड़कों पर खड़ी गाड़ियाँ भी आग के हवाले कर दी गईं थीं। इस हिंसा में महिलाएँ और बच्चे घायल हुए थे।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में नुपूर जे शर्मा ने लिखी है। विस्तार से इसे इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं।)