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‘जो नकली शराब पीएगा, वो मरेगा ही’: नकली शराब पीकर सारण में 38 लोगों की मौत पर बोले CM नीतीश कुमार

बिहार में शराबबंदी पूरी तरह फेल होने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (CM Nitish Kumar) अपना आपा खो बैठे। शराबबंदी के बाद बिहार में जहरीली शराब पीने से लोगों की लगातार मौत हो रही है। सारण में 38 लोगों की मौत पर नीतीश कुमार ने कहा कि जो नकली शराब पीएगा, वो मरेगा ही।

जहरीली शराब पीने से हो रही मौतों को लेकर राज्य की विपक्षी दल भाजपा (BJP) जदयू-राजद (JDU-RJD) गठबंधन सरकार को घेर रही है। यह मुद्दा विधानसभा में भी विपक्ष ने जोर-शोर से उठाया। विपक्ष के सवालों से नीतीश कुमार गुस्सा हो गए। उन्होंने मीडिया से भी कहा कि जो पीएगा, वो मरेगा ही। लोगों को सचेत रहना चाहिए।

नीतीश कुमार ने कहा, “क्या कर सकते हैं? कुछ लोग गलती करते ही हैं। जो नकली शराब पीएगा, वो मरेगा। बिहार में तो शराबबंदी है तो कुछ गड़बड़ बेचेगा ही। पिछली बार भी जहरीली शराब पीने से मौत हुई तो लोगों ने कहा कि इनको क्षतिपूर्ति मिलनी चाहिए। मैं कहा कि वाह, जो शराब पीएगा वो तो मरेगा ही। ये तो उदाहरण ही सामने है।”

हालाँकि, इस दौरान नीतीश कुमार पीने वालों पर दोष मढ़कर और खुद को समाज सुधारक साबित करने की कोशिश करते रहे, लेकिन ये नहीं बताया कि बिहार में जहरीली शराब बिक कैसे रही है। उन्होंने राज्य की कानून-व्यवस्था और शराब तस्करों से पुलिसकर्मियों की मिलीभगत पर एक शब्द नहीं बोला।

नीतीश कुमार ने आगे कहा, “मैंने अधिकारियों से कहा है कि गरीब लोगों को ना पकड़े। जो लोग इस व्यवसाय में शामिल हैं, उन्हें पकड़े। शराबबंदी कानून से कई लोगों को फायदा हुआ है। उन्होंने शराब पीनी छोड़ दी।” उन्होंने कहा कि शराब से जुड़े व्यवसाय नहीं करनी चाहिए। इसके बदले लोग दूसरा व्यवसाय करें। इसके लिए सरकार एक लाख रुपए तक की मदद देने को तैयार है।

बता दें कि बिहार के सारण जिले के इसुआपुर और मशरख में जहरीली शराब पीने से अभी तक 38 लोगों की मौत हो गई है। वहीं, अभी कई लोग अस्पतालों में भर्ती है। इनमें से कई की हालत गंभीर बताई जा रही है। मृतकों के परिजनों का कहना है कि मौत जहरीली शराब के कारण हुई है। हालाँकि, प्रशासन इस पर चुप्पी साधे हुए हैं।

बता दें कि बिहार में जहरीली शराब पीने से मौत का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले सारण में ही जहरीली शराब पीने से कई लोगों की मौत हो गई थी। इसके बाद वैशाली में भी ऐसी ही घटना सामने आई थी। बिहार में शराबबंदी भले लागू है, लेकिन शराब आसानी से उपलब्ध है। वहीं, राज्य में जहरीली शराब बनाने वालों का गैंग भी सक्रिय है।

काफिरों पर कहर: मोरक्को की हार या जीत से नहीं, कट्टरपंथी इस्लामी मानसिकता और 72 हूरों के लिए दंगे-आतंक

हार में हिंसा, जीत में आतंक, खुशी में बम फोड़ना, गम में जान से मारना… हर मानवीय संवेदना में कट्टरपंथी मुस्लिमों की भीड़ का व्यवहार एकसमान रहता है – हूरों की याद में, काफिरों के खिलाफ! फुटबॉल वर्ल्ड कप में इस्लामी मुल्क मोरक्को की जीत या हार इसका ताजा उदाहरण है।

फ्रांस के कई शहरों में दंगे हो रहे हैं। बेल्जियम में पत्थरबाजी चालू कर आतंक कायम किया जा चुका है। नीदरलैंड में सड़कों पर खौफ है, शांति के लिए दंगा-रोधी पुलिस को उतारा गया है। यह सब इसलिए क्योंकि इस्लामी मुल्क मोरक्को फुटबॉल वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में फ्रांस से हार गया।

कट्टरपंथी मुस्लिम हैं तो क्या हुआ, इंसान तो हैं ही – यह तर्क दिया जा सकता है, वाजिब भी है। अपनी पसंदीदा टीम की हार पर गुस्सा आना इंसानी फितरत है। गुस्से में लड़कों से गलतियाँ हो जाती हैं, यह तर्क भी गढ़ सकते हैं। इसमें 14 साल का एक बच्चा मर भी गया तो क्या? 72 हूरों की याद में सब जायज है! आखिर फ्रांस में ही रहने वाले फ्रांसीसी नागरिक की इतनी औकात कैसे हो गई कि वो अपने ही पैसे से खरीदी कार पर फ्रांस का झंडा लगा सके? इस्लामी मुल्क हारा है तो हर झंडा गम में झुका होना चाहिए – इस ‘फतवे’ को शायद वो कार ड्राइवर समझ नहीं पाया।

…और जीत में हिंसा? यह भी वाजिब है जनाब! खेल मतलब जुनून, दिल में उफान, उबलता खून… इतने सब कुछ के बाद मिली जीत पर थोड़ा-बहुत खून सड़कों पर बहा देना कहाँ से गलत है? शहीद होकर 72 हूरों के पास जाने के अलावे काफिरों का खून बहाना भी एक ऑप्शन है, इसको समझिए। पुर्तगाल को फुटबॉल वर्ल्ड कप के क्वार्टर फाइनल में इस्लामी मुल्क मोरक्को द्वारा हराने के बाद फ्रांस के अलग-अलग शहरों में बम-गोली-पत्थरबाजी करने के पीछे कट्टरपंथी मुस्लिमों की मंशा क्या थी – 72 हूरों का ख्वाब, इस्लाम का वर्चस्व!

हारा मोरक्को, जीता फ्रांस तो हिंसा बेल्जियम और नीदरलैंड में क्यों? जीता मोरक्को, हारा पुर्तगाल तो हिंसा फ्रांस में क्यों? कृपया ऐसे सवाल मत पूछिए। इस्लाम भाईचारे का नाम है, इसको समझिए। 20 नवंबर से फुटबॉल वर्ल्ड कप शुरू हुआ। हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई-जैन-बौद्ध सबके मुख्यमंत्री रहे उमर अब्दुल्ला ने तब से लेकर अब तक फुटबॉल पर सिर्फ 3 ट्वीट/रिट्वीट किया है:

  • 22 नवंबर को सउदी अरब की टीम के लिए लिखा – What an amazing goal #SaudiArabia #FIFAWorldCup
  • 22 नवंबर को ही एक रिट्वीट किया – ‘बकरे’ मेसी को आग पर भुनते हुए (संदर्भ यह है कि मेसी की टीम सउदी अरब से हार गई थी)
  • 10 दिसंबर को मोरक्को की टीम के लिए ट्वीट किया – Morocco woo hoo!!!!!! (मोरक्को ने पुर्तगाल को हरा दिया था)

“मेरी कोई फेवरिट टीम नहीं है। मैं सबको एकसमान नजर से देखता हूँ। धर्म के चश्मे से इंसान को बाँट कर राजनीति करने वाली पार्टी का नाश हो… मैं तो लिबरल हूँ, इसलिए जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं होगा, कहने की हिम्मत रखता हूँ” – उमर अब्दुल्ला के लिए इस तरह के विचार किसी के भी मन में आ सकते हैं क्योंकि उन्होंने किसी एक नहीं बल्कि दो टीमों का समर्थन किया। यह और बात है कि ये वो 2 टीमें हैं, जिनके मुल्क में इस्लामी झंडे का निजाम है!

घटना फिलिस्तीन में हो, सड़कें जाम भारत-ऑस्ट्रेलिया का आम मुस्लिम करता है। कार्टून किसी और देश में बनता है, फतवा हिंदुस्तान-पाकिस्तान के मुल्ले-मौलवी जारी करने लग जाते हैं। लड़ाई सीरिया में चलती है, लड़ाके केरल-इंग्लैंड से जाने लगते हैं। हीरो-हिरोइन-नेता-पत्रकार… सब पैसा कमाते हैं इंडिया में, डर भारत में रहने से लगने लगता है। इसीलिए कहा था, कट्टरपंथी मुस्लिम भीड़ दंगा क्यों कर रही है, कहाँ कर रही है, ऐसे बेतुके सवाल मत कीजिएगा… इस्लाम भाईचारे का नाम है, इसको समझिए।

“ये अल्लाह की जीत है, ये इस्लाम की जीत है।” – कभी किसी को बोलते सुना है, किसी का लिखा पढ़ा है? अगर नहीं तो आप इस गोले के नहीं हैं। आम इंसान (जो किसी माँ की पेट से पैदा होता है) के लिए सामान्यतः जीत-हार किसी देश/टीम/जगह/जिले/राज्य आदि की होती है। लेकिन यह आम इंसानों की सोच है। जो खास मतलब कट्टरपंथी मुस्लिम होते हैं, उनकी टीम कभी जीत ही नहीं सकती। वो मानते हैं कि सब कुछ उनके अल्लाह करते हैं, इस्लाम के लिए किया जाता है।

शुक्र मनाइए फुटबॉल वर्ल्ड कप का फाइनल फ्रांस और अर्जेंटीना के बीच है। ‘इस्लाम की जीत’ से अगर सउदी अरब या मोरक्को फाइनल में पहुँच कर हारते या जीतते तो तीसरा विश्व-युद्ध होने का तात्कालिक कारण यही होता!

एक पिल्ले के कान काटे-दूसरे की पूँछ, फिर नमक लगाकर खा गए: चखने के लिए बरेली के 2 शराबी बन गए अमानुष

उत्तर प्रदेश के बरेली में कुत्ते के बच्चों के साथ क्रूरता का मामला सामने आया है। शराबियों ने दो पिल्ले के अंग को पहले काटा। उसके बाद नमक लगाकर चखने की तरह उसे खा गए। इस संबंध में दो लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर पुलिस जाँच कर रही है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार शराबियों ने एक पिल्ले का कान तो दूसरे की पूँँछ काट दी। घटना बरेली जिले के फरीदपुर इलाके की एसडीएम कॉलोनी की है। पुलिस के अनुसार, दोनों पिल्ले घटना के बाद लहूलूहान हो गए थे। पिल्लों की हालत गंभीर है और फिलहाल दोनों का इलाज चल रहा है। मामले में पीपल फॉर एनिमल संस्था के सदस्य धीरज पाठक ने फरीदपुर थाना में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। इसके बाद पुल‍िस ने पशु क्रूरता अध‍िन‍ियम के तहत मामला दर्ज कर ल‍िया है।

शिकायत के मुताबिक, मुख्य आरोप‍ित का नाम मुकेश वाल्मीकि है। वह मंगलवार (13 दिसंबर 2022) को एक अन्य व्यक्ति साथ शराब पी रहा था। उसने नशे में धुत होकर एक पिल्ले की कान और एक की पूँँछ काट दी। वाल्‍मीक‍ि पर यह भी आरोप है क‍ि उसने प‍िल्‍ले के कान और पूँछ को चखने की तरह इस्‍तेमाल क‍िया और उसमें नमक लगाकर चट कर गया। र‍िपोर्ट की माने तो कुत्तों के बच्चों के साथ इससे पहले मारपीट भी की गई थी।

दैन‍िक भास्‍कर की रिपोर्ट के मुताबिक, मोहल्‍ले के कुछ लड़कों ने पुल‍िस को बताया क‍ि मुकेश अपने दोस्‍त के साथ शराब पी रहा था। इस बीच वह दो प‍िल्‍लों को अपने साथ लेकर जाने लगा। उन्‍हें लगा क‍ि वह कुत्‍ते को दुलारने और उसके साथ खेलने के ल‍िए अपने साथ लेकर जा रहा है। हालॉंक‍ि कुछ देर बाद प‍िल्‍लों के जोर-जोर से च‍िल्‍लाने की आवाज आई। छत से देखने पर पता चला क‍ि मुकेश एक प‍िल्‍ले के पैर को दबा रहा था और दूसरे चाकू से दूसरे प‍िल्‍ले का कान काट रहा था।

घटना के बाद लोगों ने व‍िरोध क‍िया तो दोनों आरोप‍ित मौके से फरार हो गए। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अखिलेश चौरसिया ने बताया कि जाँच चल रही है। आरोपितों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। पशुओं के साथ क्रूरता की यह पहली घटना है। इससे पहले भी बरेली में कुछ लोगों ने चूहे की पूँछ में पत्थर बाँधकर उसे नाले में डुबोकर मारने की कोशिश की थी।

जंगलों में बना दिए मजार, उत्तराखंड में 15 पर चले बुलडोजर: 2000+ अवैध मजारें होने का दावा आया था सामने, CM ने कहा था- कुकुरमुत्ते की तरह पनप रहे

उत्तराखंड में चल रहे ‘मजार जिहाद’ पर बुलडोजर चलने लगा है। देहरादून और पौढ़ी जिलों के जंगलों में बने 15 मजारों को ध्वस्त कर दिया गया है। हाल ही में वन विभाग की जमीन पर बनी 17 मजारों को चिह्नित किया गया था। लेकिन, कार्रवाई के दौरान दस्तावेज दिखाए जाने के बाद दो मजारों को फिलहाल छोड़ दिया गया है।

रिपोर्टों के अनुसार दो दिन पहले गुपचुप तरीके से वन विभाग ने ये कार्रवाई की। टीम टीन-टप्पर, लोहा, ईंट, गारा सब उठाकर ले गई। इस दौरान किसी प्रकार के विरोध की खबर नहीं है। देहरादून वन प्रभाग के डीएफओ नीतिश मणि त्रिपाठी ने कार्रवाई की पुष्टि की है। पौढ़ी में वन विभाग की जमीन पर बने मकबरे को भी हटा दिया गया है। यहाँ पीर बाबा मकबरे के टीन शेड निर्माण के लिए विधायक निधि से दो लाख रुपए स्वीकृत किए जाने की बात भी सामने आई थी।

रिपोर्ट के अनुसार आने वाले दिनों में ​राज्य के अन्य जिलों में भी बनाए गए अवैध मजारों पर कार्रवाई होगी। अमर उजाला ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि कई मजार तो फॉरेस्ट रेंज चौकी के नजदीक भी बना दिए गए हैं। इसको लेकर नैनीताल हाई कोर्ट भी कई बार राज्य सरकार और वन विभाग को फटकार लगा चुका है।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कुछ महीनों पहले ऐसे मजारों पर कार्रवाई की बात कही थी। दिल्ली में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने बताया था कि राज्य में कुकुरमुत्ते की तरह मजार उग आए हैं, जबकि पहाड़ी वन संरक्षित और आरक्षित हैं। वयोवृद्ध संत स्वामी दर्शन भारती ने ऑपइंडिया को बताया था कि उत्तराखंड में 37 साल पहले एक मस्जिद तक नहीं थी। लेकिन अब राज्य में दो हजार से अधिक अवैध मजार होने का अनुमान है।

ऑपइंडिया ने अपनी ग्राउंड रिपोर्ट में जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क में भी इसी तरह की ‘घुसपैठ’ देखी थी। जंगल में कई मजार मिली थी। भले ही इस पार्क के भीतर किसी को रहने की अनुमति नहीं हो, लेकिन प्रवेश करने के करीब 1 किलोमीटर बाद ही हमने पहली मजार देखी थी। यह मजार सड़क से एकदम सटा कर बनाई गई थी। इस पर बाकायदा रंग रोशन किया गया था और चादर भी चढ़ाई गई थी। गौर करने की बात यह है कि इस जगह पर गाइड ने हमें वाहन से उतरने से मना कर दिया क्योंकि इलाका बाघों का क्षेत्र माना जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि फिर इस मजार पर रंग-रोशन कौन करता होगा?

सैफ अली सलीम ने नाबालिग दलित लड़की को फाँसा, बलात्कार का वीडियो बना कर किया वायरल: गिरफ्तार

महाराष्ट्र के पाटन (Patan, Maharashtra) में सैफ अली सलीम नाम के 26 साल के एक मुस्लिम शख्स द्वारा 14 साल की एक नाबालिग दलित लड़की का रेप और वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर अपलोड करने का मामला सामने आया है। इस मामले पुलिस ने आरोपित को गिरफ्तार कर लिया है।

सामने आए वीडियो में दिख रहा है कि सलीम एक स्कूल के पीछे नाबालिग का वीडियो बना रहा है। इतना ही नहीं, उसने वीडियो बनाने के बाद उस वीडियो को सोशल मीडिया पर भी शेयर कर दिया। घटना 14 नवंबर 2022 की बताई जा रही है। जब यह क्लिप वायरल हो गया तो पीड़ित परिवार ने इसकी पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई।

घटना सतारा जिले के पाटन से सटे मोरगिरी नाम के गाँव की बताई जा रही है। आरोपित सलीम ने नाबालिग का एक साल में दो बार रेप किया था। सलीम पाटन के पेठशिवापुर का रहने वाला है और उसने नाबालिग को प्यार का झाँसा देकर फुसलाया था। इसके बाद वह उसे सितंबर में एक होटल में ले गया और बिना उसकी मर्जी के उसके साथ रेप किया।

14 नवंबर को आरोपि सलीम ने फिर से उसे मोरगिरी में उसके स्कूल के पीछे पकड़ लिया और उसका बलात्कार किया। इस दौरान उसने मोबाइल से वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल दिया। 9वीं में पढ़ने वाली लड़की ने शिकायती पत्र में कहा है कि आरोपित ने नवंबर में स्कूल के बाद शाम करीब 5 बजे उसके साथ दुष्कर्म किया था।

पीड़ित ने 5 दिसंबर 2022 को इस संबंध में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत को बाद आरोपित को गिरफ्तार कर लिया गया। घटना के सामने आने के बाद पाटन के लोगों ने 24 घंटे के लिए दुकानें और बाजार बंद कर प्रदर्शन किया था। उन्होंने आरोपित के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की माँग की।

वहीं, जिले के बार एसोसिएशन ने आरोपित का मुकदमा नहीं लड़ने का ऐलान किया है। वकीलों ने नाबालिग लड़की को न्याय दिलाने में मदद करने का भरोसा दिया है। बता दें कि इस साल के शुरुआत में महाराष्ट्र के जवाहर तालुका में एक दलित की रेप के बाद हत्या कर दी गई थी। इस मामले में दो लोगों को गिरफ्तार किया गया था।

‘बैन के बावजूद कैसे खरीदा गया तेज़ाब?’: LG ने दिल्ली पुलिस से जवाब तलब किया, इलाज की सर्वोत्तम व्यवस्था का आदेश, छात्रा पर एसिड अटैक करने वाले 3 गिरफ्तार

दिल्ली के द्वारका में नाबालिग स्कूली छात्रा पर एसिड अटैक मामले में पुलिस ने तीन आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है। बुधवार (14 दिसंबर, 2022) सुबह अपनी छोटी बहन के साथ स्कूल जा रही 17 साल की छात्रा पर बाइक सवार दो बदमाशों ने तेजाब फेंक दिया। तेजाब से लड़की के चेहरे, गर्दन और आँखों पर गंभीर चोटें आई हैं। छात्रा का इलाज सफदरजंग अस्पताल में किया जा रहा है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक दिल्ली के उत्तम नगर के मोहन गार्डन इलाके में छात्रा अपनी बहन के साथ स्कूल जाने के लिए निकली थी। तभी बाइक सवार दो नकाबपोश बदमाशों ने पीड़िता पर तेजाब फेंक दिया। पुलिस के मुताबिक सुबह करीब 9 बजे छात्रा पर हुए तेजाब हमले को लेकर PCR कॉल आई। हमले की जानकारी मिलते ही पुलिस ने आरोपितों की तलाश शुरू कर दी।

पुलिस ने जानकारी दी कि सीसीटीवी फुटेज से आरोपितों की पहचान की गई और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। आरोपितों की पहचान सचिन अरोड़ा, हर्षित और वीरेंद्र सिंह के तौर पर हुई है। मुख्य आरोपित सचिन और हर्ष बताए जा रहे हैं। वीरेंद्र को उनकी मदद के लिए पकड़ा गया है। जानकारी के मुताबिक, घटना के समय वीरेंद्र ने सचिन का मोबाइल अपने पास रखा हुआ था ताकि जाँच में पुलिस को लगे कि सचिन की लोकेशन घटनास्थल से दूर है। जानकारी यह भी है कि आरोपितों ने तेजाब फ्लिपकार्ट से खरीदा था।

दिल्ली के उप-राज्यपाल वीके सक्सेना ने मामले पर दिल्ली पुलिस से रिपोर्ट माँगी है। उन्होंने पुलिस कमिश्नर संजय अरोड़ा से बात की। इस बात की जानकारी दिल्ली राज निवास की तरफ से ट्वीट कर दी गई। दिल्ली के एलजी ने पुलिस से रिपोर्ट में यह भी जानकारी माँगी है कि शहर में बिक्री पर प्रतिबंध के बावजूद तेजाब कैसे खरीदा गया।

ट्वीट के जरिए यह भी जानकारी दी गई कि एलजी ने मामले की गहराई से जाँच के आदेश दिए हैं। एलजी द्वारा दोषियों को सख्त से सख्त सज़ा दिलाने की बात भी कही गई है। कहा गया है कि एलजी अस्पताल अधिकारियों के संपर्क में भी हैं और पीड़िता के लिए सर्वोत्तम इलाज की व्यवस्था प्रदान करने के निर्देश दिए गए हैं। एलजी ने पीड़िता और उसके परिवार के लिए हर संभव मदद का भरोसा भी दिया है।

‘भाग जाओ नहीं तो मार देंगे’: असम के गाँव में अकेला हिन्दू परिवार को धमकी, जमीन पर कब्जा के लिए घर को जला डाला, CM सरमा ने लिया संज्ञान

असम के मोरीगाँव जिले के एक मुस्लिम बहुल गाँव में एक हिंदू परिवार को भगाने और उसकी संपत्ति हड़पने के लिए लगातार उसे प्रताड़ित किया जा रहा है। कट्टरपंथियों ने हिंदू परिवार के घर को आग के हवाले कर दिया और उसे वहाँ से तुरंत भाग जाने के लिए कहा है। ऐसा नहीं करने पर उसे जान से मारने की धमकी दी है।

राजू रविदास का परिवार लहरीघाट क्षेत्र के एक गाँव में रहता है। यह गाँव मुस्लिम बहुल है और राजू का परिवार गाँव का अकेला हिंदू परिवार है। राजू 100 साल से भी अधिक समय से इस गाँव में रह रहे हैं। अंग्रेजों के समय उनका परिवार बिहार से यहाँ आकर बसा था। अब उन्हें और उनके परिवार को अपनी जमीन-जायदाद छोड़कर भागने के लिए विवश किया जा रहा है।

जिस गाँव में राजू रविदास का परिवार रहता है, वह मुस्लिमों का गाँव है और वे सब भी दूसरी जगहों से यहाँ आकर बसे हैं। कभी इस इलाके में सैकड़ों हिंदू परिवार रहा करते थे, लेकिन कट्टरपंथी मुस्लिमों के आतंक से डरकर वे सभी वहाँ से भागने को विवश हो गए। आज पूरे इलाके में सिर्फ 16 परिवार बचे हैं, जो अलग-थलग रहने को मजबूर हैं।

राजू रविदास के पास एक एकड़ से अधिक पैतृक भूमि है। उनका पड़ोसी अब्दुल जलील लंबे समय से उस जमीन पर नजर गड़ाए हुए है। अब्दुल के परिवार में 25 लोग हैं और वे सभी राजू के परिवार को धमकी देते रहते हैं। राजू के परिजनों के कहना है कि अब्दुल के परिवार वाले अक्सर उनके परिवार पर हमला कर किसी ना किसी को पीटते रहते हैं।

हाल ही राजू को एक बार फिर धमकी दी गई और उन्हें गाँव को छोड़कर जाने के लिए कहा गया। कुछ साल पहले जब वे परिवार के साथ एक शादी में शामिल होने के लिए गए थे और कट्टरपंथियों ने उनके घर को आग के हवाले कर दिया था। इसमें उनका सारा सामान जलकर खाक हो गया था।

इस परिवार की कहानी जब एक स्थानीय अखबार में छपी तो असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने परिवार को सुरक्षा देने का आदेश दिया है। इसके बाद सोमवार (12 दिसंबर 2022) को जिले के एसपी पुलिसबल के साथ गाँव पहुँचे और हिंदू परिवार से मुलाकात की। अलग-बगल के लोगों का कहना है कि बड़े पैमाने पर मुस्लिमों के घुसपैठ के कारण वे अल्पसंख्यक हो गए हैं और तरह-तरह की परेशानियों का सामना कर रहे हैं।

राजीव गाँधी की हत्या में दोषी अपराधी का कार्यक्रम रद्द, The Hindu’ वाले एन राम से जुड़े पत्रकारिता स्कूल ने ‘गेस्ट लेक्चरर’ बना कर बुलाया था: हो रहा था विरोध

एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म (ACJ) ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की हत्या में शामिल एजी पेरारीवलन का कार्यक्रम रद्द कर दिया है। संस्थान ने पहले राजीव गाँधी के हत्या के दोषी पेरारीवलन को गेस्ट लेक्चर देने के लिए बुलाया था। कार्यक्रम 17 दिसंबर, 2022 को चेन्नई में होने वाला था।

‘नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (एनएलयू)’ की तरफ से संक्षिप्त बयान जारी कर कार्यक्रम रद्द होने की जानकारी दी गई। विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार द्वारा 14 दिसंबर, 2022 को जारी एक परिपत्र में कहा गया है, “अनपेक्षित परिस्थितियों के कारण P39A पर आयोजित 5वाँ वार्षिक व्याख्यान रद्द कर दिया गया है।” दरअसल, यह कार्यक्रम नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (दिल्ली) और एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म मिल कर आयोजित कर रहा था। व्याख्यान के लिए राजीव गाँधी की हत्या में शामिल पेरारीवलन को आमंत्रित किया गया था। पेरारीवलन को इसी साल की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने जेल से रिहा किया था।

पेरारीवलन के आमंत्रण को लेकर कई लोग आपत्ति जता रहे थे। सोशल मीडिया पर भी पूर्व प्रधानमंत्री के हत्या में शामिल आतंकी को मंच प्रदान किए जाने की जम कर आलोचना की जा रही थी। भारी विरोध की वजह से आयोजकों को अपना फैसला बदलना पड़ा।

बता दें कि गेस्ट लेक्चर ‘प्रोजेक्ट 39A’ द्वारा आयोजित किया जाता है, जो नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली (NLW, Delhi) की एक पहल है। ACJ में प्रोजेक्ट 39A पर एक अध्याय भी है और इसी पर लेक्चर देने के लिए ACJ ने सजायाफ्ता अपराधी बुलाया था। यह लेक्चर कॉलेज के एमएस सुब्बुलक्ष्मी ऑडिटोरियम में 17 दिसंबर 2022 को होना था। इसे अब रद्द कर दिया गया है।

राजीव गाँधी के हत्यारे का लेक्चर अब ऑनलाइन होगा

इससे पहले 13 दिसंबर, 2022 को एक सजायाफ्ता आतंकी के व्याख्यान के खिलाफ नाराजगी को देखते हुए आयोजकों ने व्याख्यान को ऑनलाइन आयोजित करने का फैसला किया था। आयोजकों की तरफ से कहा गया था कि हिंसा और तोड़-फोड़ की धमकियों को देखते हुए यह फैसला लिया गया है। लेकिन, अब नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी ने एक सर्कुलर जारी कर बिना कोई कारण बताए लेक्चर रद्द करने की बात कही है।

आपको बता दें कि चेन्नई स्थित एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म (ACJ) मीडिया डेवलपमेंट फाउंडेशन संस्था द्वारा संचालित है, जिसके अध्यक्ष पत्रकार शशि कुमार हैं। उनके अलावा ‘द हिंदू’ के एन. राम भी ‘मीडिया डेवलपमेंट फाउंडेशन’ के संस्थापक ट्रस्टी हैं।

इतने भयभीत थे अंग्रेज कि 2 बार फाँसी पर लटकाया, नहीं जीते तो धोखा और गद्दारी को बनाया हथियार: 1857 में आक्रांताओं को कई बार हराने वाला ‘महाराणा’

जब बात 1857 के क्रांति की आती है तो आरा के वीर कुँवर सिंह, झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई, बलिया के मंगल पांडेय, नासिक के तांत्या टोपे और पेशवा नानासाहब जैसे योद्धाओं के नाम बरबस ही जबान पर आ जाते हैं। इनमें कुछ नायक ऐसे भी हैं, जिन्होंने बुरी तरह अंग्रेजों के दाँत खट्टे किए लेकिन उनके बारे में ज़्यादा लोगों को पता नहीं। मध्य प्रदेश के निमाड़ के महाराणा बख्तावर सिंह उन्हीं में से एक हैं, जिन्हें अंग्रेजों ने 2 बार फाँसी पर लटकाया था।

वो महाराणा बख्तावर सिंह ही थे, जिन्होंने मालवा में क्रांति की मशाल जलाई थी। कई आक्रांता अंग्रेज अधिकारियों को उन्होंने मौत के घाट उतार दिया था। 10 फरवरी, 1858 को जब उन्हें सज़ा-ए-मौत दी गई थी, तब उनकी उम्र मात्र 34 वर्ष ही थी। मालवा क्षेत्र को आज उज्जैन और इंदौर के अलावा उसके आसपास के जिलों वाला इलाका समझ लीजिए। महाराणा बख्तावर सिंह ने मालवा के साथ-साथ गुजरात से भी अंग्रेजों को खदेड़ने के लिए तैयार कर ली थी।

7 साल की उम्र में गद्दी पर बैठे, 1857 के युद्ध में अंग्रेजों को कई बार खदेड़ा

मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित अमझेरा कस्बे में 14 दिसंबर, 1824 को उनका जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम अजीत सिंह और माता का नाम इन्द्रकुँवर था। महाराजा और महारानी के यहाँ जन्मे बख्तावर सिंह ने जब अपने रियासत की शासन व्यवस्था अपने हाथ में ली थी, तब उनकी उम्र मात्र 7 वर्ष ही थी। राष्ट्रभक्ति बचपन से उनके भीतर थी और अंग्रेजों से बदला लेना उनका लक्ष्य। जब उन्होंने सक्रियता बढ़ानी शुरू की, उस समय देश के कई इलाकों में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की तैयारी चल रही थी।

हमें आज वीर विनायक दामोदर सावरकर जैसे महापुरुष का धन्यवाद करना चाहिए, वरना 1857 के युद्ध को तो अंग्रेजों ने ‘सिपाही विद्रोह’ बता दिया था और वामपंथी इतिहासकारों ने इसे इसी तरह आगे बढ़ाया। रियासतों के राजाओं के पास भी क्रांतिकारियों के दूत आते थे और प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से सम्बंधित तैयारियों की खबर देते थे। सरदारपुर तहसील में स्थित भोपावर में उस समय अंग्रेजों की छावनी हुआ करती थी। महाराणा बख्तावर सिंह की सेना ने ‘हर-हर महादेव’ नारे के साथ इस छावनी पर हमला बोल दिया।

वो 3 जुलाई, 1857 का दिन था। सुबह-सवेरे अंग्रेजों की सेना पर मालवा की अमझेरा रियासत का हमला हुआ। अमझेरा की बहादुर सेना के सामने अंग्रेजों की फ़ौज बिना लड़े ही भाग खड़ी हुई। वहाँ से अंग्रेजों का झंडा उखाड़ कर फेंक डाला गया। भोपावर में सारे हथियार और धन महाराणा बख्तावर सिंह के कब्जे में आ गया। सरदारपुर और मानपुर-गुजरी छावनी मालवा रियासत का अगला निशाना बने। सैकड़ों अंग्रेज मारे गए। मालवा की जनता भी बख्तावर सिंह की राष्ट्रवाद की भावना में बहने लगी।

महू, आगर, नीमच, महिदपुर और मंडलेश्वर – उस इलाके में स्थित अन्य छावनियों को भी महाराणा बख्तावर सिंह की सेना ने अपना निशाना बनाया और अंग्रेजों को भगाया। कई सैनिक तो अंग्रेजों से बगावत और मालवा रियासत के समर्थन के लिए भी तैयार हो गए। इंदौर में उस समय अंग्रेजों की एक बड़ी व महत्वपूर्ण छावनी थी। 31 अक्टूबर, 1857 को अंग्रेजों ने एक विशाल सेना के साथ धार के किले पर धावा बोल दिया। उन्हें पता था कि अगर महाराणा को नहीं रोका गया तो वो उनके लिए बड़ा संकट बन सकते हैं।

धार से कुछ ही दूरी पर अमझेरा का किला था, जहाँ उस समय महाराणा बख्तावर सिंह मौजूद थे। उनकी गैर-मौजूदगी में अंग्रेजी सेना ने धार के किले पर कब्ज़ा कर लिया। कर्नल डूरंड ने इसके बाद 5 दिसंबर, 1857 को अमझेरा के किले पर हमले की योजना बनाई, लेकिन ब्रिटिश सेना में मालवा रियासत का इतना खौफ था कि अधिकतर भाग खड़े हुए। इसके बाद लेफ्टिनेंट हचिंसन के नेतृत्व में एक पूरी बटालियन को हमले के लिए भेजने की साजिश रची।

महाराणा बख्तावर सिंह को पकड़ने के लिए अंग्रेजों ने लिया था धोखे और गद्दारी का सहारा

जब महाराणा बख्तावर सिंह लालगढ़ के किले में थे, तब कर्नल डूरंड को ये सूचना मिल गई। अब अंग्रेजों ने वही ‘फूट डालो, राज करो’ वाली नीति का सहारा लिया, क्योंकि सीधी लड़ाई में वो देशभक्तों की सेना से जीत नहीं पा रहे थे। अमझेरा रियासत के कुछ जागीरदारों को खरीद लिया गया और उन्हें गद्दारी के लिए तैयार किया गया। उन्हें मध्यस्थ बना कर भेजा गया और संधि-वार्ता का झूठा लालच दिया गया। महाराणा बख्तावर सिंह को अंदाज़ा नहीं था कि अंग्रेज, या फिर उनके अपने ही लोग इस हद तक गिर सकते हैं।

11 नवंबर को वो उनके कुछ खास लोगों के साथ धार के लिए निकल गए, हालाँकि उनके वफादार करीबियों ने उन्हें ऐसा करने से मना भी किया था। उसी समय हैदराबाद से घुड़सवारों का एक दल वहाँ आया हुआ था, जिसने उन्हें रोक लिया। अंग्रेजों ने धोखा दिया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया। एक व्यक्ति ऐसा भी था, जिसने इन विपरीत परिस्थितियों में भी एक लड़ाई लड़ी। राघोगढ़ (देवास) के ठाकुर दौलत सिंह ने महू छावनी पर हमला कर के महाराणा को छुड़ाने का प्रयास किया, लेकिन दुर्भाग्य से वो सफल नहीं हो पाए।

महाराणा बख्तावर सिंह को इसके बाद प्रताड़ित करने के लिए इंदौर ले जाया गया, क्योंकि महू में उन्हें रखे जाने पर पूरे मालवा में विद्रोह और अंग्रेजों पर हमले होने लगे थे। 21 दिसंबर को इंदौर रेजीडेंसी में सुनवाई हुई। कई वकील वहाँ मौजूद थे। महाराज ने अंग्रेजों को सरकार मानने से इनकार कर दिया और अपना बचाव नहीं किया। फरवरी 1858 में उन्हें फाँसी देने का निर्णय ले लिया गया। अंग्रेज इस क्रूरता से अपने खिलाफ हुए विद्रोह को और दबाना चाहते थे और जनता के मन में खौफ बिठाना चाहते थे।

आज भी हरा-भरा लहलहा रहा है वो पेड़, जहाँ अमझेरा के राजा को 2 बार दी गई थी फाँसी

इंदौर में वो नीम का पेड़ आज भी मौजूद है, जहाँ उन्हें फाँसी पर चढ़ाया गया था। अच्छी कद-काठी के मालिक महाराणा बख्तावर सिंह को जब फाँसी पर चढ़ाया गया तब उनके वजन से रस्सी भी टूट गई। उस समय नियम था कि ऐसी स्थिति में सज़ा को टाल दिया जाता था। लेकिन, महाराणा का अंग्रेजों के मन में ऐसा भय बैठा हुआ था कि उनके लिए उन्होंने अपने नियम-कानून भी बदल डाले। उन्हें दोबारा फाँसी पर चढ़ा दिया गया और वो देश के लिए बलिदान हो गए।

उनकी पत्नी रानी दौलत कुँअर भी वीरांगना थीं और उन्होंने अपने पति द्वारा जलाई गई क्रांति की मशाल को आगे बढ़ाते हुए अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी। वो भी वीरगति को प्राप्त हुईं। इंदौर में जिस नीम के पेड़ पर महाराणा को फाँसी दी गई थी, वो आज भी हरा-भरा है। इंदौर के बारे में बता दें कि कभी इसे बगीचों का शहर कहा गया था। नौलखा (9 लाख पेड़ों वाला क्षेत्र) सहित कई इलाकों के नाम यहाँ पेड़ों से पड़े हैं। 200 वर्ष पुराना नीम का पेड़ आज देशभक्तों के लिए एक पवित्र स्थल है।

ये महाराजा यशवंत राव चिकित्सालय के पास KEH परिसर में स्थित है। महाराणा बख्तावर सिंह के साथ-साथ उनके सहयोगियों  सलकूराम, भवानी सिंह, चिमन लाल, मोहनलाल, मंशाराम, हीरा सिंह, गुलखां, शाह रसूल खां, वशीउल्ला खां, अता मोहम्माद, मुंशी नसरूल्ला और नगाड़ावादक फकीर को भी यहाँ फाँसी दी गई थी। कई दिनों तक लाशों को यहाँ लटका कर रखा गया था। लोगों के बीच अपना खौफ पैदा करने के लिए ब्रिटिश राज़ ने ऐसा किया था।

राजा बख्तावर सिंह के बारे में बता दें कि उनके पूर्वज मूल रूप से राजस्थान के जोधपुर के राठौड़ वंशीय राजा हुआ करते थे। पिता की असामयिक मृत्यु के कारण इन्हें काफी कम उम्र में सिंहासन पर बैठना पड़ा था, लेकिन उनकी शिक्षा-दीक्षा पूरी होने तक उनकी माँ ही शासन चलाती रहीं। महाराणा ने मध्य प्रदेश-गुजरात के कई रियासतों को अंग्रेजों के खिलाफ संयुक्त लड़ाई का न्योता दिया था, लेकिन उनकी कोई दिलचस्पी न होने के कारण उन्हें अकेले ही मैदान में उतरना पड़ा।

लालगढ़ के किले में तांत्या टोपे से भी उनकी मुलाकात हुई थी और वो उनसे खासे प्रभावित भी थे। जब उन्होंने भोपावर पर आक्रमण किया था, तब वहाँ के मुख्य अंग्रेज अधिकारियों को बैलगाड़ी पर बैठ कर वहाँ से भागना पड़ा था। झाबुआ के राजा द्वारा शरण दिए जाने के कारण उनकी जान बच गई थी। महाराणा ने अक्टूबर 1857 में पुनः भोपावर में आक्रमण किया था। उन्हें इंदौर के जेल में गहरी यातनाएँ दी गई थीं। उनकी मृत्यु के बाद उनकी माँ ने अंतिम संस्कार के लिए सामान भिजवाते हुए कहा था कि उनका बेटा आज इतना सुंदर लग रहा है कि भारत की सभी माताएँ उसकी बलाएँ ले रही हैं।

छत्तीसगढ़ में हिस्ट्रीशीटर कॉन्ग्रेस नेता संजू त्रिपाठी की गोली मारकर हत्या: जमीन कब्जाने का था काम, संपत्ति विवाद में सगे छोटे भाई के सिर पर मार दिया था फरसा

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर (Bilaspur, Chhattisgarh) में बुधवार (14 दिसंबर 2022) को हिस्ट्रीशीटर और कॉन्ग्रेस नेता संजीव उर्फ संजू त्रिपाठी की फिल्मी स्टाइल में गोली मारकर हत्या कर दी गई। अपराधियों ने उसे दिन-दहाड़े घर गोलियों से भून दिया और वहाँ से फरार हो गए। घटना के बाद इलाके में हड़कंप मच गया है।

घटना बुधवार (14 दिसंबर 2022) की शाम करीब चार बजे की है। संजू तावाताल गाँव में स्थित अपने फार्म हाउस से कार में सवार होकर बिलासपुर के कुदुदंड इलाके में स्थित अपने घर जा रहा था। उसकी गाड़ी जैसे ही सकरी बाइपास से गुजरते हुए एक स्पीड ब्रेकर पर धीमी हुई, वैसे ही पीछा कर रहे अपराधियों ने उसे गोलियों से छलनी कर दिया।

अपराधी दो कारों में सवार थे। स्पीड ब्रेकर के पास जैसे ही संजू की कार धीमी हुई, वैसे ही अपराधियों ने दोनों से घेर लिया और उस पर फायरिंग कर दी। माना जा रहा है कि अपराधियों को पता था कि गाड़ी मृतक ही चला रहा है।

कहा जा रहा है कि उस पर दोनों ओर से 6 फायर किए गए। इस फायरिंग में उसे तीन गोलियाँ लगीं। एक गोली सिर में और दो शरीर में लगने की बात कही जा रही है। गोली लगते ही त्रिपाठी की मौके पर ही मौत हो गई। पुलिस ने घटनास्थल से गोलियों के खोखे बरामद किए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि दो कारों में सवार हमलावरों ने अपने चेहरे ढंक रखे थे।

यह घटना आपसी रंजिश का परिणाम बताई जा रही है। संजीव उर्फ संजू त्रिपाठी पर कई जमीनों को खाली कराने और उस पर कब्जा करने के आरोप हैं। इतना ही नहीं, वह लोगों को डरा-धमका कर जमीन के सौदे भी कराता था। उस पर हत्या, मारपीट, बलवा, अपहरण जैसी धाराओं में कई थानों में मामले दर्ज हैं। हालाँकि, अपनी रसूख की वजह से वह बच जाता था।

उसका हालिया विवाद अपने छोटे सगे भाई कपिल त्रिपाठी के संग हुआ था। 7 महीना पहले दोनों के बीच जमीन-जायदाद को लेकर मारपीट हुई थी। इस झगड़े में उसने अपने भाई पर फरसा मार दिया था। इस दौरान बीच-बचाव करने वाले कॉन्स्टेबल को भी उसने बुरी तरह मारा था। इसके बाद कॉन्स्टेबल ने भागकर अपनी जान बचाई थी।

इस मामले में पुलिस संजू के छोटे भाई कपिल त्रिपाठी को भी तलाश कर रही है। पुलिस पता लगाने का प्रयास कर रही है कि इस हत्याकांड में कहीं उसका हाथ तो नहीं है। अपराधियों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने कई टीमों का गठन किया है।