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पंजाब में 65000 पादरी, जिस चर्च के 14 साल पहले थे 3 मेंबर- अब हैं उसके 300000 सदस्य: पंज प्यारों की जमीन पर ‘पगड़ी वाले ईसाइयों’ की छाया कैसे

भारत धर्मांतरण (Religious Conversion) के घातक जाल में उलझा हुआ है। भोले-भाले जनजातीय समाज के लोगों को प्रलोभन दे ईसाई बनाने से मिशनरियों ने इस घातक जाल के धागे जोड़ने शुरू किए। अब यह एक ऐसे जाल के रूप में सामने आ चुका है, जिसमें दलित, पिछड़े, सर्वण… सब उलझे नजर आ रहे हैं। इस घातक जाल की जद में पंजाब (Religious Conversion In Punjab) भी है। इंडिया टुडे मैगजीन ने पंजाब में ईसाई धर्मांतरण पर कवर स्टोरी की है। इससे जो तथ्य सामने आए हैं, वे बताते हैं कि यदि इस पर लगाम न लगी तो परिणाम घातक हो सकते हैं।

साल 2022 की शुरुआत में जब पंजाब में विधानसभा चुनाव हुए, तब यहाँ की आबादी का एक ऐसा वर्ग चर्चा में था जो खुद को दलित भी बताता है और ईसाई भी। वास्तव में ये वो लोग हैं जिन्हें मिशनरियों ने कन्वर्ट कर ईसाई बना दिया है। हालाँकि, आँकड़े यह कहते हैं कि राज्य की 1.26% आबादी ही ईसाई है। लेकिन, यहाँ बढ़ रहे धर्मांतरण के कारण जमीनी हकीकत पूरी तरह बदल चुकी है।

पंजाब में ईसाई मिशनरियों द्वारा सिखों के धर्मांतरण की स्थिति का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह को सामने आकर धर्मांतरण विरोधी कानून की माँग करनी पड़ी है। यही नहीं, उन्होंने स्पष्ट रूप से यह भी कहा है कि ईसाई मिशनरियाँ चमत्कारिक इलाज और कपट से सिखों का जबरन धर्म परिवर्तन करा रही हैं। पंजाब के सिखों और हिंदुओं को ईसाई धर्म में परिवर्तित करने के लिए गुमराह किया जा रहा है। उन्होंने यह भी बताया था कि वोट बैंक की राजनीति के कारण सरकार उनके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए तैयार नहीं है। उन्होंने यह भी कहा था कि पंजाब एक सीमावर्ती राज्य है और यहाँ के गरीब हिंदुओं और सिखों को धर्मांतरित करने के लिए ‘विदेशी ताकतें’ फंडिंग कर रही हैं। 

यूँ तो पूरे पंजाब में ईसाई मिशनरी सक्रिय होकर सिखों को ईसाई बना रही है और ऐसा लगता है कि यह सब दबे पाँव हो रहा है। लेकिन, जालंधर जिले के खाँबड़ा गाँव में बने चर्च में प्रत्येक रविवार को प्रार्थना करने के लिए मोटर साइकिल से लेकर कारों और किराए की स्कूली बसों में पहुँचने वाले 10-15 हजार लोगों को देखने के बाद यह स्पष्ट होता है कि धर्मांतरण का ‘बाजार’ तेजी से फल-फूल रहा है।

इंडिया टुडे की कवर स्टोरी के अनुसार, इस गाँव में हजारों लोगों के जमा होने के पीछे जो व्यक्ति है उसका नाम है- पादरी अंकुर नरूला। अंकुर का जन्म हिंदू खत्री परिवार में हुआ था। लेकिन, साल 2008 में ईसाई मिशनरियों के संपर्क में आने के बाद उसने धर्मांतरण कर लिया। इसके बाद उसने अंकुर नरूला मिनिस्ट्री की स्थापना की और फिर ‘चर्च ऑफ साइंस एंड वंडर्स’ भी शुरू कर दिया। दावा किया जा रहा है कि यहाँ निर्माणाधीन चर्च का निर्माण पूरा होने के बाद यह एशिया के सबसे बड़ा चर्च होगा। शुरुआत में इस चर्च से जुड़े लोगों की संख्या महज 3 थी। लेकिन, बीते 14 सालों में यह संख्या 3 लाख के आँकड़े को पार कर चुकी है।

अंकुर नरूला ने खाँबड़ा गाँव 65 एकड़ से अधिक क्षेत्र में धर्मांतरण का साम्राज्य स्थापित किया हुआ है। इसके अलावा पंजाब के नौ जिलों व बिहार और बंगाल के साथ ही अमेरिका, कनाडा, जर्मनी और ग्रेटर लंदन के हैरो में भी उसके ठिकाने हैं। अंकुर नरूला को उसकी मिनिस्ट्री से जुड़े हुए लोग या यह कहें कि धर्मांतरण का शिकार हुए लोग ‘पापा’ बुलाते हैं।

ऐसा कहा जाता है कि पंजाब में हो रहे धर्मांतरण के पीछे सबसे बड़ा हाथ नरूला का ही है। साल 2011 की जनगणना के अनुसार, पंजाब में ईसाइयों की कुल जनसंख्या 348000 (3 लाख 48 हजार) थी। लेकिन, अब नरूला मिनिस्ट्री से जुड़े लोगों की संख्या ही 3 लाख से पार हो चुकी है। यानी राज्य में, ईसाई मिशनरियों के जाल में फँसकर ‘पगड़ी वाले ईसाईयों’ की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है।

जालंधर ही नहीं, अमृतसर में भी मिशनरियों ने सिखों को ‘पगड़ी वाला ईसाई’ बना दिया है। अमृतसर सिखों का पवित्र शहर है। यहीं पवित्र स्वर्ण मंदिर भी है। लेकिन यहाँ के सेहंसरा कलां गाँव की सकरी गलियों के बीच बना चर्च कथित तौर पर धर्मांतरण का केंद्र है। इस चर्च का पादरी गुरुनाम सिंह है जो कि एक पुलिसकर्मी भी है। इस चर्च में रविवार को प्रार्थना होती है। गुरुनाम सिंह का दावा है कि वह सिर्फ प्रार्थना कराता है। लेकिन, सवाल यह है कि यदि वह सिर्फ प्रार्थना कराता है तो लोग ईसाई कैसे बन रहे हैं?

ईसाइयों के लिए पंजाब धर्मांतरण की नई प्रयोगशाला नहीं है। लेकिन यहाँ सैकड़ों पादरी नए हैं। इन पादरियों में अमृत संधू, कंचन मित्तल, रमन हंस, गुरनाम सिंह खेड़ा, हरजीत सिंह, सुखपाल राणा, फारिस मसीह कुछ बड़े नाम हैं। इनका नाम इसलिए बड़ा है क्योंकि ‘पगड़ी वाले ईसाइयों’ की संख्या बढ़ाने में इनका बड़ा योगदान है। पंजाब में इनकी कई शाखाएँ हैं और यूट्यूब पर लाखों फॉलोअर्स भी। ये सभी वे लोग हैं जो या तो पेशे से डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, पुलिस, कारोबारी और जमींदार हैं। वहीं कुछ ऐसे भी हैं जो नौकरी या काम छोड़कर रविवार को प्रार्थना के नाम पर ईसाइयत का प्रचार करते हैं।

कपूरथला जिले के खोजेवाल गाँव में बना ओपन डोर चर्च पूर्वी यूरोपीय प्रोटेस्टेंट डिजाइन का है। इस चर्च के पादरी हरप्रीत देओल जट्ट सिख हैं, जिनके ऑफिस में बड़े-बड़े बाउंसर्स तैनात हैं। इसी प्रकार बटाला के हरपुरा गाँव के सर्जन-पादरी गुरनाम सिंह खेड़ा भी जट्ट सिख हैं। पटियाला के बनूर में चर्च ऑफ पीस के पादरी मित्तल बनिया हैं। चमकौर साहिब के रमन हंस मजहबी सिख हैं। इन पादरियों में से कई पादरियों के पास निजी सुरक्षा गार्ड भी हैं।

पंजाब में सिखों को ईसाई बनाने के तमाशे ने लाखों लोगों को चर्च तक पहुँचा दिया है। यह संख्या लगातार बढ़ रही है। हालत यह है कि ईसाई मिशनरी और नरूला जैसे लोगों की मिनिस्ट्री यहाँ के सभी 23 जिलों में फैली हुई हैं। ये मिशनरियाँ माझा और दोआबा बेल्ट के अलावा मालवा में फिरोजपुर और फाजिल्का के सीमावर्ती इलाकों में सबसे ज्यादा सक्रिय हैं। पंजाब में ईसाइयत के प्रचार का बेड़ा उठाए लोगों की संख्या का कोई ठोस आँकड़ा नहीं हैं। लेकिन, इंडिया टुडे की रिपोर्ट में कहा गया है कि अनुमान के मुताबिक यहाँ पादरियों की संख्या 65,000 के करीब है।

कुछ समय पहले न्यूज़ नेशन ने यूनाइटेड क्रिश्चियन फ्रंट के आँकड़ों के हिसाब से बताया था कि पंजाब के 12,000 गाँवों में से 8,000 गाँवों में ईसाई धर्म की मजहबी समितियाँ हैं। वहीं अमृतसर और गुरदासपुर जिलों में 4 ईसाई समुदायों के 600-700 चर्च हैं। इनमें से 60-70% चर्च पिछले 5 सालों में अस्तित्व में आए हैं।

कुल मिलाकर आज पंजाब की कुछ-कुछ वैसी ही स्थिति तमिलनाडु जैसे दक्षिण के राज्यों में 1980 और 1990 के दशक में हुआ करती थी। हालाँकि शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) के अध्यक्ष एचएस धामी धर्मांतरण पर अधिक चिंतित नहीं हैं। उनका कहना है, “लोग जिंदगी की समस्याओं के हल के लिए पादरियों के पास जाते हैं। देर-सबेर उन्हें सच्चाई पता चलेगी और वे मूल धर्म में लौट आएँगे।” लेकिन ‘घर घर अंदर धर्मसाल’ जैसे अभियान बताते है कि स्थिति कितनी विस्फोटक हो चुकी है। इस अभियान के तहत सिख स्वयंसेवक अपने धर्म का प्रचार करने घर-घर जा रहे हैं।

इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि पंज प्यारों की जमीन पर देखते-देखते ही कैसे ‘पगड़ी वाले ईसाई’ छा गए। इस सवाल का जवाब देने में जितनी देरी होगी, धर्मांतरण माफिया की जड़ें उतनी ही मजबूत होती जाएगी।

गुजरात में जिस शंकर सिंह वाघेला के लिए तड़प रही थी AAP, उन्होंने अरमानों पर झाडू फेरा: कहा- रेवड़ी के झाँसे में न आएँ, घोषणा पत्र के नाम पर ठग रही

गुजरात (Gujarat) में आम आदमी पार्टी (Aam Adami Party) को एक शख्स राजनीतिक शख्स की तलाश है, जो उसकी इज्जत को पूरी तरह धुलने से बचा सके। मेधा पाटकर जैसी विवादास्पद महिला के बाद AAP ने गोपाल इटालिया पर भरोसा जताया, लेकिन इटालिया कोई जमीनी प्रभाव नहीं है। इसका असर भी नहीं दिख रहा है। ऐसे में पार्टी राज्य की राजनीति में कभी बेहद कद्दावर रहे पूर्व मुख्यमंत्री शंकर सिंह वाघेला (Ex CM Shankar Singh Vaghela) को अपनी तरफ मिलाने का प्रयास कर रही है।

हालाँकि, वाघेला ने AAP में जाने से स्पष्ट इनकार कर दिया है। वाघेला का कहना है कि AAP का कोई नैतिक आधार नहीं है और ना ही पार्टी में नीतिगत निर्णय लिए जाते हैं। अब खबर आ रही है कि वाघेला एक बार फिर कॉन्ग्रेस में शामिल हो सकते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री को हाथ से निकलता देख AAP ने उनके बेटे महेंद्र सिंह वाघेला पर डोरे डालना शुरू कर दिया है।

AAP को उम्मीद है कि महेंद्र सिंह के पार्टी से जुड़ने के बाद शंकर सिंह वाघेला का प्रभाव आम आदमी पार्टी को कुछ सीटें दिलाकर साख बचाने में मदद करेगा। AAP ने महेंद्र सिंह को वयाड सीट से टिकट का प्रस्ताव रखा है। हालाँकि, कॉन्ग्रेस नेता महेंद्र सिंह का इस पर कोई बयान नहीं आया है, लेकिन उनके पिता शंकर सिंह वाघेला ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर उनके बेटे AAP का प्रस्ताव स्वीकार करते हैं तो वे चुनावों उनकी मदद नहीं करेंगे।

इस बार वाघेला भाजपा और AAP को हराने के लिए कॉन्ग्रेस का प्रचार करेेंगे। उनके बेटे भी कॉन्ग्रेस में ही हैं। बेटे के AAP या भाजपा में जाने के सवाल पर वाघेला ने कहा, “तब मैं कॉन्ग्रेस के लिए प्रचार भी नहीं कर सकता, क्योंकि कोई मुझ पर विश्वास नहीं करेगा। वे कहेंगे कि आपने अपने बेटे को वहाँ भेज दिया और यहाँ कॉन्ग्रेस के लिए प्रचार करके हमें बेवकूफ बना रहे हैं। अगर मुझे कॉन्ग्रेस के लिए प्रचार करना है तो मेरा परिवार जो सक्रिय राजनीति में है उसे कॉन्ग्रेस से लड़ना है।”

इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में शंकर सिंह वाघेला ने कहा कि चुनावी घोषणा पत्र के नाम पर पार्टियाँ लोगों को ठग रही है। आम आदमी पार्टी द्वारा बिजली-पानी मुफ्त देने के वादे को लेकर कहा कि मुफ्त जैसा कुछ भी नहीं होता। उन्होंने कहा, “यह 300 यूनिट मुफ्त बिजली क्या है? किसकी बाप की दिवाली है? यह सार्वजनिक पैसा है।”

उन्होंने कहा, “बताओ किस पार्टी ने मुफ्त शिक्षा का वादा किया और फिर 200 करोड़ रुपए सरकारी खजाने में जमा करके अपना वादा निभाया? मैं गुजरात और देश के मतदाताओं से कहता हूँ कि रेवड़ी के झाँसे में न आएँ। क्या किसी पार्टी ने कोई फंड जुटाया है जिससे वह अपने वादों को पूरा करेगी? यह सब जनता के पैसे के बल पर कहना आसान है।”

बता दें कि विजन के नाम पर आम आदमी पार्टी के पास बिजली और पानी मुफ्त देने का वादा है। दिल्ली में इसी विजन से जीत के बाद AAP ने इसे पंजाब में भी अपनाया। कई अन्य कारणों से AAP को इसमें सफलता भी मिली। फिर पार्टी ने गुजरात के लोगों को इसी लॉलीपॉप का लालच दिखाना शुरू कर दिया है।

वाघेला का कहना है कि चुनाव आयोग को पार्टियों से हिसाब माँगना चाहिए कि पिछले पाँच सालों में उन्होंने अपने कितने चुनावी वादों को पूरा किया। अगर पाँच सालों में अपने किए वादे पूरे नहीं करते हैं तो उन्हें बाहर प्रक्रिया से बाहर कर देना चाहिए, ताकि वे फिर से ऐसे वादे न करें।

वाघेला ने कहा कि जो लोग भाजपा को वोट नहीं कर रहे हैं, उन्हें कॉन्ग्रेस को वोट करना चाहिए। उनका कहना है कि AAP को वोट करने से भाजपा को फायदा होगा। वाघेला का कहना है कि वे कॉन्ग्रेस में शामिल नहीं होंगे, लेकिन उसके लिए प्रचार करेंगे।

केजरीवाल सरकार को सुप्रीम कोर्ट में झटका: दिल्ली LG के खिलाफ मनीष सिसोदिया के हलफनामे को बताया गैर जरूरी, कहा- केंद्र को जवाब देने की जरूरत नहीं

दिल्ली की केजरीवाल सरकार को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने शुक्रवार (11 नवंबर 2022) को उपराज्यपाल वीके सक्सेना के खिलाफ दिल्ली के डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया (Manish Sisodia) के हलफनामे को गैरजरूरी बताया। साथ ही कहा है कि केंद्र को इसका जवाब देने की कोई जरूरत नहीं है।

केंद्र की ओर से पेश हुए एएसजी संजय जैन (ASG Sanjay Jain) ने कहा कि हलफनामा दाखिल करने की प्रक्रिया का दुरुपयोग किया गया है। दिल्ली सरकार ने अपने राजनीतिक घमासान में उच्चतम न्यायालय को घसीटने का प्रयास किया है। वहीं, दिल्ली सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत से अनुरोध किया कि शीर्ष अदालत केंद्र और उपराज्यपाल को अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दे।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट राजनीतिक मुद्दे से नहीं निपटेगा। उन्होंने कहा, “यह स्पष्ट कर देना चाहते ​हैं कि हम केवल संवैधानिक मुद्दे से ही निपटेंगे, न कि राजनीतिक मुद्दे से। हम नए हलफनामों पर भी कोई जवाब नहीं माँग रहे हैं। यह हलफनामा गैरजरूरी है।”

कोर्ट ने आगे कहा कि 24 नवंबर से मामले से जुड़े कानूनी सवालों पर संविधान पीठ को सुनवाई करनी है। नए हलफनामे की जरूरत नहीं थी। जो बात इस तरह कही गई, उसे जिरह के दौरान भी कहा जा सकता था। इस पर केंद्र सरकार के वकील ने आरोप लगाया कि ‘आप’ ने सिर्फ मीडिया में प्रचार के लिए हलफनामा दाखिल किया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, दिल्ली की सरकार ने शीर्ष अदालत के समक्ष दायर हलफनामे में आरोप लगाया कि सक्सेना एकतरफा कार्यकारी निर्णय लेकर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में शासन की समानांतर प्रणाली चला रहे हैं। अधिकारी उनकी बात नहीं सुन रहे। मनीष सिसोदिया (Manish Sisodia) द्वारा दायर हलफनामे में कहा गया था, “राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सरकार में सेवारत अधिकारी चुनी गई सरकार के प्रति उदासीन रवैया अपना रहे हैं। इसकी वजह से दिन-प्रतिदिन के कामकाज में दिक्कत आ रही है।”

इसके अलावा इसमें यह भी कहा गया है, “इस साल की शुरुआत में उपराज्यपाल की नियुक्ति के साथ यह समस्या और भी जटिल हो गई है। सिविल सेवकों और चुनी हुई सरकार के बीच कोई भी सामंजस्य नहीं है। हमारी शक्तियों का असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक तरीके से अतिक्रमण किया गया।”

बता दें कि शीर्ष अदालत के समक्ष दो अलग-अलग हलफनामे दायर किए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट केंद्र और दिल्ली सरकार की विधायी और कार्यकारी शक्तियों से संबंधित इन हलफनामों पर सुनवाई कर रही है।

AIMIM नेता तौफीक प्रधान के ‘अवैध निर्माण’ पर चला योगी सरकार का बुलडोजर, BDA की कार्रवाई देख बोले- ‘मैं मुसलमान हूँ इसलिए मेरा होटल तोड़ा’

उत्तर प्रदेश सरकार राज्य में अतिक्रमण और अवैध निर्माण से सख्ती से निपट रही है। इसी प्रयास के तहत असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi) की पार्टी एआईएमआईएम (AIMIM) के नेता तौफीक प्रधान के अवैध होटल को ध्वस्त कर दिया गया। यह कार्रवाई बरेली विकास प्राधिकरण (BDA) ने की है।

BDA ने कहा कि तौफीक प्रधान ने अधिकारियों से अनुमति लिए बिना बाईपास रोड के ग्रीन बेल्ट क्षेत्र में दो मंजिला होटल का निर्माण करवाया था। होटल 700 वर्ग मीटर भूमि पर बनाया गया था।

बरेली विकास प्राधिकरण अब ग्रीन बेल्ट में बने अवैध ढाबों और होटलों के खिलाफ कार्रवाई कर रहा है। बीडीए अधिकारियों ने बाइपास के पास ग्रीन बेल्ट पर बने दो मंजिला होटल को गिराने के लिए बुलडोजर का इस्तेमाल किया।

बीडीए के ओएसडी गौतम सिंह ने कहा, ”तौफीक प्रधान ने बरेली विकास क्षेत्र के तहत लगभग 700 वर्ग मीटर के क्षेत्र में गाँव कचोली के पास ग्रीन बेल्ट में बायपास पर बिना सहमति के दो मंजिला अवैध ढाबा / रेस्तरां बनाया। यूपी टाउन प्लानिंग एंड डेवलपमेंट एक्ट, 1973 के सुसंगत धाराओं के अंतर्गत कार्रवाई करते हुए, प्रवर्तन दल की उपस्थिति में होटल को ध्वस्त कर दिया गया है।”

तौफीक ने मुसलमान होने का राग अलापा

AIMIM नेता तौफीक प्रधान ने आरोप लगाया है की उनका होटल ग्रीन बेल्ट छोड़कर बना हुआ था, इसके बावजूद बीडीए ने उसके होटल को गिरा दिया। तौफीक प्रधान ने आरोप लगाया कि वो AIMIM के नेता है और वो मुसलमान है, इसलिए उसके होटल को ध्वस्त कर दिया गया ।

इस साल अप्रैल में, यूपी सरकार ने शहर में भोजीपुरा विधायक शहजील इस्लाम द्वारा संचालित एक अवैध पेट्रोल पंप के खिलाफ कार्रवाई की थी। बरेली विकास प्राधिकरण (बीडीए) ने बरेली के सीबीगंज इलाके में समाजवादी पार्टी विधायक के पेट्रोल पंप को गिराने के लिए बुलडोजर का इस्तेमाल किया था।

सूत्रों के अनुसार, बरेली विकास प्राधिकरण ने पेट्रोल पंप के अवैध निर्माण को देखते हुए इसे ध्वस्त करने का आदेश दिया था। वहाँ केवल उपकरण को चालू छोड़ दिया गया था। सुरक्षा कारणों से भारी संख्या में पुलिस बल और पीएसी के जवानों को तैनात किया गया था।

योगी सरकार द्वारा अवैध संपत्तियों और अतिक्रमणों पर कार्रवाई

योगी सरकार ने पिछले पाँच वर्षों में अवैध अतिक्रमणों को हटाने और अपराधियों पर नकेल कसने पर जोर दिया है, जिसकी लोग सराहना भी कर रहे हैं। सरकार ने साफ कर दिया है कि वह अवैध निर्माण या सार्वजनिक संपत्ति पर अतिक्रमण को बर्दाश्त नहीं करेगी। मजबूत कानून व्यवस्था और भ्रष्टाचार मुक्त शासन लागू करने का वादा कर मार्च 2022 में सीएम योगी की सरकार एक शानदार जनादेश के साथ फिर सत्ता में लौटी है।

राजीव गाँधी के सभी हत्यारे 30 साल बाद जेल से बरी: SC ने सुनाया फैसला, 1 घंटे में रिहाई मिली

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की हत्या मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (11 नवंबर 2022) सारे दोषियों को रिहा करने का निर्णय लिया है। कोर्ट ने मुख्य आरोपित की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि अगर दोषियों पर किसी और मामले में आरोप न हों तो सारे दोषियों को रिहा किया जाता है।

जस्टिस बीआर गवई और बीवी नागरत्न की पीठ ने अपना यह निर्णय दिया और केस की दोषी नलिनी, संथन, मुरुगन, श्रीहरण, रॉबर्ट पयास और रविचंद्रन को जेल से रिहा किया। कोर्ट ने कहा कि लंबे समय से राज्यपाल ने इस पर कदम नहीं उठाया इसलिए वह इस पर निर्णय ले रहे हैं। उन्होंने आर्टिकल 142 का हवाला देते हुए कहा कि मामले के एक दोषी की रिहाई का आदेश बाकी दोषियों पर भी लागू होगा।

जानकारी के मुताबिक कोर्ट का आदेश आने के एक घंटे बाद ही उम्रकैद की सजा काट रहे सभी दोषियों को रिहाई मिल गई। इससे पहले दोषी पेरारिवलन को पहले ही इस मामले में रिहा किया जा चुका है। उसकी रिहाई जेल में उसके अच्छे बर्ताव को देखकर की गई थी। इसके बाद बाकी दोषियों ने भी उसी आदेश का हवाला देकर रिहाई माँगी थी जिस पर कोर्ट ने सुनवाई करते हुए अपना फैसला सुनाया।

राजीव गाँधी की हत्या और दोषियों को सजा

बता दें कि राजीव गाँधी की हत्या 21 मई 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेरंबुदूर में एक चुनावी रैली के दौरान धनु नाम के लिट्टे आत्मघाती हमलावर ने की थी। वह राजीव गाँधी को फूलों का हार पहनाने के बाद उनके पैर छूने के बहाने आगे आया और झुककर उसने कमर पर बंधे विस्फोटक को ब्लास्ट कर दिया। धमाके में राजीव गाँधी समेत कई लोगों की मौत हुई थी।

1999 में इस मामले में 26 लोगों को मृत्युदंड दिया गया। इनमें से 19 को पहले ही बरी कर दिया गया जबकि बाकी 7 सजा काटते रहे और इनकी सजा उम्रकैद कर दी गई। इनमें से नलिनी गर्भवती थीं जिन्हें सोनिया गाँधी ने ये कहकर माफ किया कि उनकी गलती की सजा उनके बच्चे को नहीं दी जा सकती जो अभी जन्मा ही नहीं है।

दृष्टि IAS वाले दिव्यकीर्ति सर पढ़ा रहे हिंदू घृणा का पाठ: माता सीता की तुलना कुत्ते के चाटे घी से, शम्बूक वध पर जाति का जहर बोया

यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी के एसोसिएट प्रोफेसर सोशियोलॉजिस्ट सैल्वाटोर बेबोनेस ने कुछ दिन पहले ही कहा था कि भारत का बुद्धिजीवी वर्ग देश विरोधी है। ये इलिट वर्ग सिर्फ देश विरोधी ही नहीं संस्कृति विरोधी भी है। अगर किसी देश की संस्कृति नष्ट हो जाए तो राष्ट्र स्वयं नष्ट हो जाता है, ऐसा विद्वानों ने कहा है। देश में बुद्धिजीवियों का एक विशेष वर्ग पैदा करने वाले कई कोचिंग संस्थान जातिवाद फैलाकर न सिर्फ समाज को तोड़ने का देश विरोधी काम कर रहे हैं, बल्कि यहाँ की संस्कृति के कण-कण में बसे देवों और महापुरुषों का भी चरित्रहनन कर भस्मासुर की भूमिका निभा रहे हैं।

सोशल मीडिया पर एक आजकल एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें UPSC की तैयारी कराकर देश में IAS, IFS, IPS जैसे नौकरशाह पैदा करने वाले संस्थान का एक शिक्षक गलत संदर्भ देकर भगवान राम और माता सीता के प्रति अभद्र भाषा और झूठ का प्रचार-प्रसार कर रहा है। यह संस्थान कोई और नहीं, बल्कि कुछ दिन पहले भी इन्हीं कारणों से विवादों में आ चुका दृष्टि IAS कोचिंग संस्थान है। ‘दृष्टि द विजन’ (The Drishti Vision) की स्थापना नवंबर 1999 में डॉ. विकास दिव्यकीर्ति (Vikas Divyakirti) और डॉ. तरुणा वर्मा (Taruna Verma) ने की थी। इसके संस्थापक दिव्यकीर्ति झूठ का सहारा लेकर छात्रों के मन में हिंदू विरोध और जातिवादी मानसिकता को उभार रहे हैं।

दिव्यकीर्ति अपनी क्लास में विद्यार्थियों बता रहे हैं कि भगवान राम ने रावण से युद्ध माता सीता के लिए नहीं, बल्कि अपनी कुल के सम्मान की रक्षा करने के लिए किया था। अगर बात यहीं खत्म हो जाती तो भारतीय ज्ञान परंपरा के तहत आने वाले चिंतन-मनन और मीमांसा के आधार पर भारतीय जनमानस उनकी बातों को रोष नहीं जाहिर करता। इससे हजारों कदम आगे बढ़कर और मर्यादा की सीमा को पार करते हुए उन्होंने माता सीता की तुलना ‘कुत्ते द्वारा चाटे हुए घी’ से कर दी। जरा आप भी सुनिए नौकरशाह पैदा करने वाले दिव्यकीर्ति क्या कह रहे हैं।

दिव्यकीर्ति अपने बात में पुरुषोत्तम अग्रवाल के लेख का जिक्र कर रहे हैं। इसके साथ ही वे ये भी बता रहे हैं कि इस लेख में अग्रवाल ने संस्कृत का एक कथन का जिक्र किया है, जो ‘शायद’ वाल्मीकी रामायण का है या उसके ‘नजदीकी’ किसी रचना का है। इसके बाद वे कहते हैं, “जब राम युद्ध जीते रावण से तो सीता मुक्त हुईं। जैसे फिल्मों में नहीं होता है ना कि नायक भागते हुए स्लो मोशन में? ऐसा दृश्य बनना चाहिए था कि नहीं? फाइनली इतने दिनों के बाद, इतना बड़ा युद्ध जीतने के बाद हमलोग मिले हैं। मजाक थोड़े ही ना है? हिंदी फिल्मों में तो नायक-नायिका मिलते हैं। नायिका का पिता हार मान लेता है। फिर देखिए क्या दृश्य बनता है उसके बाद?”

फिर वो आगे कहते हैं, “तो सीता प्रफुल्लित हैं कि मेरे राम ने रावण को नष्ट कर दिया और फाइनली मैं अपने घर जाऊँगी। वो राम के पास आ रही हैं। राम समझ गए कि थोड़ा ज्यादा खुश हो रही है ये तो। तो राम को लता कि थोड़ा ठीक कर दूँ, ज्यादा खुश नहीं होना चाहिए। तो राम ने कहा- रूको सीते! तो सीता रूक गईं। उन्हें लगा कि पहले पूजा-पाठ करना होगा शायद। (हँसते हुए) तो राम ने जो वाक्य बोला है ना बड़ा खराब वाक्य बोला है। मुझे तो बोलते हुए जबान कट के रह जाएगी। पर, बोलना होगा, क्या करें। (इस दौरान कक्षा के सारे विद्यार्थी खूब जोर से ठहाका लगाते हैं।) तो ऐसा वाक्य बोला है- हे सीते, अगर तुम्हें लगता है कि ये युद्ध मैंने तुम्हारे लिए लड़ा है तो तुम्हारी गलतफहमी है। युद्ध तुम्हारे लिए नहीं लड़ा है। युद्ध अपने कुल के सम्मान के लिए लड़ा है। तो रही तुम्हारी बात तो जैसे कुत्ते द्वारा चाटी जाने के बाद घी भोजन योग्य नहीं रहता है, वैसे ही तुम अब मेरे योग्य नहीं हो।”

हालाँकि, भारतीय संस्कृति के नायक भगवान राम के बारे में छात्रों को बताने के बाद उन्होंने इस पर लीपापोती भी कोशिश की और इसका दोष लेखक पर डाल दिया, लेकिन साथ में उन्होंने गोस्वामी तुलसीदास पर कटाक्ष करने से भी नहीं चूके। उन्होंने कहा, संस्कृत के एक ग्रंथ में राम के मुँह से ये कहलवाया गया है। ये राम नहीं कह रहे, लेखक कह रहे हैं। लेखक लोग अपनी मुँह की बातेें चरित्रों के मुँह से कहलवाते हैं और छवि बनती है चरित्र की। छवि बिगड़ती है उसकी। तुलसीदास से एकदम चुपचाप गोल कर गए इस मामले को। उन्हें बता था कि ये सब नहीं चलेगा, फैमिनिज्म पैदा होने वाला है 300-400 साल बाद और उस समय की महिलाएँ बैंड बजा देेंगी। हालाँकि, फिर बहुत सी ऐसी बातें महिलाओं के कह गए हैं कि बैंड बजाने के लिए पर्याप्त कारण है।”

ये वही दिव्यकीर्ति हैं, जो पढ़ाई और ‘लेखक के मन की बात’ वाली एक लाइन जोड़कर अपने मन की बात छात्रों के मन में भरते रहते हैं और उन्हें उनके मन को पूर्वाग्रह से ग्रसित करने के लिए छोड़ जाते हैं। जब दिव्यकीर्ति जानते हैं कि पुरुषोत्तम अग्रवाल ने जिस संस्कृत ग्रंथ का उल्लेख किया है, वो भगवान राम के संदर्भ में सत्यापित नहीं है। जिस तरह महाभारत के संदर्भ में महर्षि वेद व्यास के लिखित ग्रंथ के अलावा अन्य कोई विश्वसनीय नहीं हो सकता, उसी तरह भगवान राम के संदर्भ में वाल्मीकी रामायण से विश्वसनीय कोई ग्रंथ नहीं है।

महर्षि वाल्मीकी ने रामायण की रचना को ‘युद्ध कांड’ पर ही समाप्त कर दिया है। उसके बाद पाखंडी लेखकों ने तरह-तरह की किताबों लिखीं और अपने हिसाब से भगवान राम के चरित्र को गढ़ा। आज इसे ‘उत्तर कांड’ के रूप में रामायण में देखा जा रहा है, जो कि विश्वसनीय है ही नहीं। वाल्मीकी रामायण के आधार पर सैकड़ों लेखकों ने अपनी हिसाब से लिखा है और चरित्रों की व्याख्या की है, लेकिन इन सब रामायणों को विश्वसनीय नहीं माना जा सकता है और भारतीय समाज वाल्मीकी रामायण के अलावा किसी और रामायण को विश्वसनीय मानता भी नहीं। इसी कारण अन्य रामायण भी कोई है, भारतीय जनमानस जानता तक नहीं।

दिव्यकीर्ति जानते हैं कि इन ग्रंथों की विश्वसनीयता नहीं है, फिर भी अपनी कक्षाओं में इनकी चर्चा करके लोगों को इस अविश्वसनीयता को विश्वसनीयता में बदलने की कोशिश करते हैं और इसके आधार पर अपनी प्रोपेगेंडा भी समझा देते हैं। दिव्यकीर्ति का ऐसा ही एक और वीडियो है, जिसमें वे भगवान राम द्वारा शंबूक वध की चर्चा करते हैं। इसके साथ ही ये भी कहते हैं कि भगवान राम के गुरु वशिष्ठ ने उन्हें शंबूक वध के लिए उकसाया, क्योंकि शंबूक शूद्र थे। इस तरह वे धार्मिक ग्रंथों के झूठे संदर्भ देकर समाज में जातिवाद और जाति आधारित नफरत की बीज बोने का काम कर रहे हैं। इतना ही नहीं सनातन संस्कृति का अपमान करके वे इसकी शाखाएँ बौद्ध, जैन, सिख आदि का भी अपमान कर रहे हैं।

इसी एक इनका एक और वीडियो सामने आया है। इस वीडियो में वे कहते हैं, “वाल्मीकी रामायण में एक प्रसंग आता है। प्रसंग ये है कि राम राजा बन गए हैं और वशिष्ठ उनके राजगुरु हैं। अचानक वशिष्ठ ने राम से कहा कि देखिए राजन हमारे क्षेत्र में कुछ गलत हो रहा है, जिसकी वजह से प्रकोप हो सकता है। तो राम अपने राज्य में देखने निकले कि कहाँ अनैतिक कार्य हो रहा है। घूमते-घूमते अंत में एक व्यक्ति उन्हें मिल गया तपस्या करता हुआ। तो राम ने पूछा कि भाई तुम कौन हो। तो उसने कहा कि मेरा नाम शंबूक है। राम ने पूछा कि किस वर्ण से हो तो उसने बताया कि वह शूद्र जाति से है। बस यही मामला था। राम के राज्य मे एक शूद्र व्यक्ति तपस्या कर रहा है। ये भगवान राम कैसे बर्दाश्त करते। वशिष्ठ जी ने कहा कि ये अनैतिक है। ज्ञान आ वहीं से रहा है सारा। इतना सुनना था कि राम ने उस व्यक्ति की गर्दन धड़ से अलग कर दी।”

धार्मिक संदर्भ को लेकर जिस तरह से दिव्यकीर्ति ने ‘राम के राज्य मे एक शूद्र व्यक्ति तपस्या कर रहा है, ये भगवान राम कैसे बर्दाश्त करते’ और ‘ज्ञान आ वहीं से रहा है सारा’ जैसे अपने विचारों के जरिए उन्होंने साफ तौर पर जातिवाद फैलाने का काम किया है। इसके साथ ही उन्होंने ये भी दर्शाने की कोशिश की कि रामराज्य में शूद्रों का उत्पीड़न होता है। दिव्यकीर्ति जैसे अपनी कक्षाओं में इन बातों का कभी जिक्र नहीं करते कि भगवान राम के सबसे अच्छे दोस्त निषादराज गुह थे, जो तथाकथित शूद्र की श्रेणी में आते हैं। उन्होंने शबरी का कभी जिक्र नहीं किया होगा, जिनके जूठे बेर को भगवान राम प्रेम से खाते रहे। शबरी आदिवासी महिला थीं, लेकिन भगवान राम ने कभी उनके प्रति विद्वेष नहीं दिखाया। सुग्रीव, जामवंत, जटायु जैसे प्रकृति के हर जीव-जंतु को उन्होंने गले लगाया और अपना माना, लेकिन ये तर्क इन जैसे प्रोपेगेंडावादियों की तर्क पर खतरे नहीं उतरते। इन्हें झूठे और अविश्वसनीय किताबों का सहारा लेकर तो सब समाज में तोड़ पैदा करना होता है।

दिव्यकीर्ति का ये दोनों प्रसंग उत्तर कांड के हैं, जो कि असत्यापित है। इतना ही नहीं, भगवान राम क्षत्रिय धर्म के अनुसार निहत्थों पर कभी वार नहीं करते थे। तपस्या करता हुआ शंबुक निहत्था ही होगा। इसलिए ये भी तथ्यात्मक रूप से सही प्रतीत नहीं हो रहा है। दिव्यकीर्ति ने यह जानबूझकर सिर्फ प्रचार पाने के लिए किया है या यह उनका स्वाभाविक गुण है, ये तो वही स्पष्ट रूप से बता सकते हैं, लेकिन इतना तो तय है कि विद्यार्थियों के मन में पूर्वाग्रह पैदा करके ये देश का हित कतई नहीं कर रहे हैं। ये विद्यार्थी कल नौकरशाह बनेंगे, फिर ये संदर्भ मन-मतिष्क का हिस्सा रहेगा और साथ ही छात्र जीवन का पला हुआ पूर्वाग्रह भी। इस असर समाज और कानून-व्यवस्था पर स्पष्ट रूप से परिलक्षित भी होगा। इस बात से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता है।

ऐसा नहीं है कि दिव्यकीर्ति ही अकेले इस तरह के काम कर रहे हैं। इस तरह का काम UPSC की तैयारी कराने वाले अन्य कुछ शिक्षक भी करके विवादों में आ चुके हैं। इनमें एक हैं ओझा सर के नाम से मशहूर अवध प्रताप ओझा। हिंदू धर्म पर ऐसे ही एक विवादास्पद मामले में अवध प्रताप ओझा ने कहा था, “बलराम ने एक बार कहा कि यादव लोग तुम को पकड़कर मारने वाले हैं। कृष्ण ने पूछा ‘क्यों’ तो बलराम बोले तुम इनकी बीवियों के साथ नाचते हो तो पीटेंगे नहीं। ये सुन श्रीकृष्ण ने कहा कि तुम टेंशन मत लो हम संभाल लेंगे। इसके बाद एक दिन वृंदावन में बारिश होनी शुरू हुई तो कृष्ण ने जाकर पर्वत उठा लिया। अब सोच कर देखो उंगली पर अगर कोई पर्वत उठा ले तो ये क्या हुआ- शक्ति का प्रदर्शन। तब यादवों ने श्रीकृष्ण को हाथ जोड़ कर कहा कि तुम बीवी के साथ तो नाच ही रहे हो, साली के साथ भी नाचो। हमें कोई टेंशन नहीं।”

हिंदुओं को गाली देने वाले ओझा सर ने तो यहाँ तक कह दिया था कि इस्लाम के आने से पहले दुनिया में अँधेरा था। वे कहते हैं, “इस्लाम जब पैदा हुआ तब पूरी दुनिया में अँधेरा छाया हुआ था। इस्लाम का इतिहास पढ़ो। यूरोप में विच हंट के नाम पर महिलाओं को जलाया जा रहा था। भारत में सती प्रथा थी। चीन में लड़कियों की हत्या की जा रही थी। चारों तरफ अँधेरा था, और अँधेरे के बीच मोहम्मद साहब हाथ में दीया लिए खड़े थे, इस्लाम…प्यार…संदेश। मोहम्मद एक रास्ते से हर रोज जाते थे। वहाँ एक महिला उनके ऊपर कूड़ा डालती थी। अगर कोई हमारे ऊपर कूड़ा डाले तो हम उसे गोली मार देंगे कि हमारे ऊपर किसी ने कूड़ा कैसे फेंका। वाजीराम के टीचर पर कूड़ा कैसे फेंका, इतनी औकात तुम्हारी। एक दिन उस महिला ने कूड़ा नहीं फेंका। मकान के अंदर गए। पूछा मोहतरमा कहाँ है। पता चला वो बीमार हैं। उनका हाल चाल पूछा कि मालिक से दुआ करूँगा आप जल्दी ठीक हो जाएँ।”

इसी तरह विजन IAS की टीचर स्मृति शाह का एक वीडियो सामने आया था, जिसमें वे हिंदू को नीचा दिखाने की कोशिश कर रही थीं। वीडियो में स्मृति शाह कहती हैं, “इस्लाम था बहुत लिबरल। वह समानता के बारे में बात करता था। कोई जाति व्यवस्था भी नहीं थी। अगर इस्लाम पढ़ा होगा तो एक चेरामन जुमा मस्जिद है जिसका मिनिएचर आपके पीएम ने सऊदी किंग को दिया । ये भारत का पहला मस्जिद है जो 7वीं-8वीं शताब्दी में बना। तब इस्लाम आया नहीं था। लेकिन इस्लाम आना शुरू हो गया था। उस समय वह उदारवाद, समानता के बारे में बात कर रहे थे। वह किसी भी तरह की कठोरता और जातिवाद से मुक्त थे। इस्लाम की एक खासियत थी जिसमें वह ईश्वर (अल्लाह) के प्रति पूरे समर्पण को लेकर बात करते थे। वे एक ईश्वर के कॉन्सेप्ट पर बात कर रहे थे।”

जब-जब इन शिक्षकों के बयान या वीडियो सामने आए, तब-तब लोगों में गुस्सा फुट पड़ा, लेकिन कड़ी कार्रवाई ना होने के कारण हिंदुओं को अपमानित करने का काम लगातार जारी है। दिव्यकीर्ति के इस अपमानजनक व्याख्या पर भी लोगों में गुस्सा है। सोशल मीडिया यूजर विकास दिव्यकीर्ति के खिलाफ ट्विटर पर #BanDrishtiIAS का ट्रेंड चला रहे हैं। हालाँकि, संस्थान की ओर से इस पर अभी किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं आई है। हालाँकि, प्रतिक्रिया आ भी जाती है तो भारत की संस्कृति और धर्म का मजाक बनाने का यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहेगा, जब तक कि गलत तथ्यों के आधार पर समाज में विभाजन करने वालों पर कड़ी कार्रवाई नहीं होती।

जिस मस्जिद के लिए चंदा देना कुछ मुस्लिमों के लिए भी हराम, उसके लिए हिंदू कर रहे दान: अयोध्या में मस्जिद बनाने के लिए आया 40% पैसा हिंदुओं का

हिंदुओं ने करीब 500 साल संघर्ष किया तो एक फैसला नवंबर 2019 में आया। इस फैसले ने उन्हें अयोध्या में अपने अराध्य के पूजन और उनका मंदिर बनाने का अधिकार दिया। साथ ही 5 एकड़ जमीन बतौर मुआवजा मस्जिद के लिए देकर एक तरह हिंदुओं से जुर्माना भी वसूल लिया।

अब अयोध्या में बनने वाली मस्जिद को लेकर एक और जानकारी सामने आई है। यह बताती है कि मस्जिद निर्माण के लिए जो ‘दान’ आया है, उसका 40 फीसदी हिस्सा हिंदुओं का दिया हुआ है। 30 फीसदी कॉरपोरेट से तो इतना ही मुस्लिम समुदाय से भी आया है। यह कोई मनगढ़ंत नंबर नहीं है। दैनिक भास्कर को मस्जिद ट्रस्ट के सचिव अतहर हुसैन ने यह बात बताई है। उन्होंने कहा है, “अगस्त, 2020 में हमने मस्जिद निर्माण में सहयोग के लिए बैंक डिटेल जारी किए थे। अब तक हमारे पास 40 लाख रुपए का डोनेशन आ चुका है। डोनेशन का करीब 30% हिस्सा कॉर्पोरेट से आया है, 30% मुस्लिम समुदाय से आया है बाकी 40% हिस्सा हिंदू समुदाय की तरफ से आया है।”

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

अमर उजाला ने ट्रस्ट के ह​वाले से बताया है कि ‘गुप्त दान’ करने वाले हिंदुओं की तादाद भी भारी है। कथित तौर पर मस्जिद निर्माण के लिए धन देने वाले जो पहले 11 लोग हैं, वे हिंदू ही हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार इस मस्जिद के निर्माण के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड को मस्जिद निर्माण के लिए अयोध्या से सटे धन्नीपुर गाँव में 5 एकड़ जमीन आवंटित की गई है। मस्जिद को मिले दान को लेकर ये तथ्य इसलिए बाहर आ गए हैं क्योंकि मस्जिद निर्माण में देरी हो रही है। नक्शा पास नहीं हुआ है। लैंड यूज बदलने को आवेदन दिया गया है।

यह कैसा संयोग

कन्हैया लाल का सर तन से जुदा होने के बाद जब सहिष्णु हिंदुओं की चेतना जगी तो उन्होंने भी मजारों पर शत-प्रतिशत जाना बंद नहीं किया। इसी साल जुलाई में ऑपइंडिया ने दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर आने वाले जायरीनों का जायजा लिया था। दरगाह के दीवान अली मूसा निजामी ने बताया था कि सालभर में मजार पर आने वाले हिंदू जायरीन 60 फीसदी कम हो गए हैं। मतलब 40 फीसद हिंदुओं की लिबरई कन्हैया लाल का कटा गला देखने के बाद भी नहीं डोला। ऐसे ही अजमेर की ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती दरगाह को लेकर भी देखने को मिला था।

जिस मस्जिद में नमाज भी ‘हराम’, उसके लिए ‘गुप्त दान’

आश्चर्यजनक यह भी है कि जिस मस्जिद निर्माण के लिए हिंदू अपने श्रम का पैसा दान कर रहे, यहाँ तक कि ‘गुप्त दान’ कर रहे हैं, उसको लेकर खुद मुस्लिम भी वैसा उत्साह नहीं दिखा रहे। इसकी वजह शायद उलेमाओं का वह मंतव्य है, जिसके बारे में हैदराबाद के सांसद और AIMIM के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी ने जनवरी 2021 में बताया था। उनका कहना था कि अयोध्या में बनने वाली मस्जिद ‘मस्जिद-ए-ज़ीरार’ होगी और उसके लिए चंदा देना हराम होगा। वहाँ नमाज पढ़ना भी हराम होगा।

ओवैसी ने बीदर की एक जनसभा में कहा था, “यह मस्जिद मुनाफ़िकों की मस्जिद है। इस मस्जिद में न केवल चंदा देना, बल्कि नमाज़ पढ़ना भी हराम है। इस्लाम के सभी फ़िरकों के उलेमाओं ने इस मस्जिद में नमाज़ पढ़ने को हराम क़रार दिया है।” 

एआईएमआईएम ने ट्वीट कर मुनादी की थी, “मुनाफ़िकों की जमात जो बाबरी मस्जिद के बदले 5 एकड़ ज़मीन पर मस्जिद बनवा रहे हैं, हकीक़त में वह मस्जिद नहीं बल्कि ‘मस्जिद-ए-ज़ीरार’ है। मुहम्मदुर रसूलुल्लाह के ज़माने में मुनाफ़िकों ने मुसलमान की मदद करने के नाम पर एक मस्जिद बनवाई थी। हकीकत में उसका मकसद उस मस्जिद में नबी का खात्मा और इस्लाम को नुकसान पहुँचाना था (कुरान में उसे मस्जिद-ए-ज़ीरार कहा गया है)। ऐसे में मस्जिद में नमाज़ पढ़ना या चंदा देना हराम है।”  

यह तो गंगा जमुनी तहजीब का भी अपमान

अयोध्या में मस्जिद बनाने के लिए हिंदुओं का दान देना गंगा-जमुनी तहजीब की वो मिसाल हो सकती है, जिस पर लिबरल लहालोट हो जाएँ। भाई भले चारा हो, लेकिन सेकुलर तो इसी तरह के भाईचारे पर मर मिटते हैं। पर क्या यह गंगा-जमुनी तहजीब की भावना के विपरीत नहीं है कि जो मस्जिद बनने के बाद कुछ मुस्लिमों के लिए ‘मस्जिद-ए-ज़ीरार’ रहेगी, उनके लिए इस मस्जिद में नमाज पढ़ना ‘हराम’ होगा, मस्जिद के लिए चंदा देना ‘हराम’ है, उसके लिए हिंदू सबसे बड़े दानदाता समूह के रूप में उभरे? क्या यह मजहबी भावनाओं का अपमान नहीं है? क्या यह इस्लाम को नीचा दिखाना नहीं है? सवाल यह भी है कि काफिरों के दान से मस्जिद बनाया जा सकता है? क्या यह पाक होगा?

इस लिबरई का इलाज क्या है?

सवाल मस्जिद के लिए 40 प्रतिशत पैसा देने वाले हिंदुओं से भी है। क्या यह उन हुतात्माओं का अपमान नहीं है, जिन्होंने रामलला की जन्मभूमि (जिस पर इस्लामी आक्रांता ने एक मस्जिद खड़ी कर दी थी) को पाने के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया। मस्जिद ट्रस्ट का तो यहाँ तक कहना है कि उसने राम मंदिर की तरह पैसा जुटाने के लिए कोई अभियान नहीं चलाया है। लोग खुद आकर पैसा दिए जा रहे हैं। खुद जाकर पैसा देना हिंदुओं की वह बीमारी है, जिसमें वह हर बार कहते हैं कि मेरा अब्दुल वैसा नहीं है और हर बार वही अब्दुल उनका गला काट चला जाता है। इसलिए एक बार चेक कर लीजिए ‘सर तन से जुदा’ वाली मजहबी विचारधारा को पोषित करने में कहीं आपका भी तो गुप्त दान नहीं लगा है, क्योंकि कल्कि भी जब अवतार लेंगे तो उनकी ही रक्षा करेंगे जो निज धर्म के लिए खड़े होना जानते हैं।

‘हफ्ते में 80 घंटे काम करने को रहो तैयार’: एलन मस्क ने ट्विटर के कर्मचारियों को दी चेतावनी, अधिकारियों ने इस्तीफा देना शुरू किया

दुनिया के सबसे अमीर आदमी और ट्विटर के नए मालिक एलन मस्क (Elon Musk) ने गुरुवार (10 नवंबर 2022) को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर के दिवालिया (Bankruptcy) होने की संभावना जताई। एलन मस्क ने ट्विटर से लगातार अधिकारियों के इस्तीफा देने के बीच अपने कर्मचारियों से कहा कि कंपनी के दिवालियापन से इनकार नहीं किया जा सकता है।

ब्लूमबर्ग न्यूज के मुताबिक, ट्विटर के प्रति लोगों का विश्वास कम हुआ है। 44 बिलियन डॉलर करीब (362461220000 रुपए) में ट्विटर को खरीदने के दो हफ्ते बाद ही मस्क ने कंपनी के कर्मचारियों को बताया कि वह ट्विटर के दिवालियापन से इनकार नहीं कर सकते हैं।

मस्क ने कर्मचा​रियों से कहा कि उन्हें हफ्ते में 80 घंटे कार्य करने के लिए तैयार रहना होगा। उन्होंने कोरोना काल में काम करने के उस लचीलेपन को भी समाप्त कर दिया है, जिसमें कर्मचारियों को घर से काम करने की अनुमति दी गई थी। इस मामले की जानकारी रखने वाले एक व्यक्ति के अनुसार एलन मस्क ने कहा, “यदि आप नहीं आना चाहते हैं, तो इस्तीफा स्वीकार कर लिया जाएगा। हम सभी को और अधिक मेहनत करने की आवश्यकता है।”

बताया जा रहा है कि ट्विटर के दो अधिकारियों योएल रोथ और राबिन व्हीलर ने बुधवार (9 नवंबर 2022) को विज्ञापन दाताओं के चिंताजनक मुद्दों पर चर्चा की। इसके बाद उन्होंने अपना इस्तीफा दे दिया। हालाँकि रोथ और व्हीलर ने इस बारे में तुरंत कोई जवाब नहीं दिया है। इससे पहले गुरुवार को ट्विटर की मुख्य सुरक्षा अधिकारी ली किसनर ने ट्वीट किया कि उन्होंने इस्तीफा दे दिया है।

इनके अलावा चीफ प्राइवेसी ऑफिसर डेमियन कीरन (Damien Kieran) और मुख्य अनुपालन अधिकारी मैरिएन फोगार्टी ने भी कंपनी से अपना इस्तीफा दे दिया है।

बता दें कि टेस्ला (Tesla) और स्पेसएक्स (SpaceX) के मालिक एलन मस्क (Elon Musk) ने ट्विटर (Twitter) को खरीदने के बाद कंपनी में बड़े पैमाने पर छंटनी की है। इसका सीधा प्रभाव भारतीय कर्मचारियों पर पड़ा है। मस्क ने ट्विटर के भारत के लगभग सभी कर्मचारियों को बाहर निकाल दिया है। एलन मस्क ने भारतीय मूल के सीईओ पराग अग्रवाल को हटाने और पूरे बोर्ड के भंग करने के बाद कंपनी में कर्मचारियों की बड़े पैमाने पर छंटनी शुरू कर दी है।

ट्विटर का माई-बाप बनते ही मस्क ने सबसे पहले सीईओ पराग अग्रवाल (Parag Agrawal) सहित CFO नेड सेगल और लीगल अफेयर-पॉलिसी हेड विजया गाड्डे की छुट्टी कर दी थी और इन्हें कंपनी हेडक्वार्टर से भी बाहर निकलवा दिया गया था। इसके बाद उन्होंने ट्वीट किया था- द बर्ड इज फ्रीड (the bird is freed) यानी आजाद हुई चिड़िया।

कर्ज से बचने के लिए पूर्व फौजी ने छोड़ा था घर, राधा स्वामी का सत्संग सुन मन बदला: वापस लौट पुलिस को सच्चाई बताई

राजधानी दिल्ली के प्रेम नगर इलाके से गायब हुए 60 वर्षीय रिटायर्ड फौजी राजेन्द्र प्रसाद को पुलिस ने ढूँढ न‍िकाला है। दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच को वह सराय रोहिल्ला रेलवे स्टेशन के पास मिले।

राजेंद्र प्रसाद ने बताया कि उनका अपहरण नहीं हुआ था और वह स्वेच्छा से पंजाब चले गए थे। वहां ब्यास में राधा-स्वामी का सत्संग सुन उनका मन बदल गया और घर लौटने का विचार किया। उन्होंने कहा कि जब वह सराय रोहिल्ला रेलवे स्टेशन पर लौटे तो पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया।

पुलिस की जाँच में खुलासा हुआ है कि पूर्व फौजी राजेंद्र प्रसाद ने खुद पर कर्ज होने के कारण यह कहानी रची थी। उसने अपने फोन से ‘सर तन से जुदा, अजमेर वाया पाकिस्तान’ का वॉट्सऐप मैसेज और पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया के झंडे व कुछ क्लिपिंग का फोटो लगा हुआ मैसेज घर पर भेजा था।

पूछताछ करने पर राजेंद्र ने बताया कि वह अपने परिवार और आर्थिक समस्याओं को लेकर तनाव में थे, इसलिए वह घर से दूर रहना चाहता थे। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि उन्होंने खुद ही अपने फोन से अपने परिवार को धमकी भरे मैसेज भेजे थे।

दिल्ली पुलिस के विशेष पुलिस आयुक्त (अपराध शाखा) रविंद्र यादव ने बताया, ”मूलरूप से हरियाणा में रोहतक के गाँव बोहर निवासी राजेंद्र प्रसाद प्रेम नगर सुल्तानपुरी में परिवार के साथ रहते हैं। उनके तीन बच्चे हैं। वह सात नवंबर को अचानक गायब हो गए। उन्होंने अपने मोबाइल से परिजनों को मैसेज भेजा कि सर तन से जुदा, अजमेर वाया पाकिस्तान भेजा। साथ में प्रतिबंधित संगठन पीएफआई का झंडा डाला था।”

उनके परिजनों ने 7 नवंबर 2022 को शिकायत दर्ज कराई थी कि उनके ही नंबर से ‘सर तन से जुदा इन अजमेर वाया पाकिस्तान’ का मैसेज आया है। साथ ही प्रतिबंधित कट्टरपंथी संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) के झंडे की फोटो भेजी गई है। परिजनों का यह भी दावा है कि कुछ मुस्लिम कई दिनों से उनका पीछा कर रहे थे।

वहीं, पूर्व सैनिक की बेटी किरन ने दावा किया था कि कुछ मुस्लिम कई दिनों से उनके पिता का पीछा कर रहे थे। यह बात उनके पिता ने खुद घर में बताई थी। उन्होंने बताया था कि पीछा करने वाले मुस्लिम उन पर अपने संगठन में शामिल होने और धर्मांतरण का दबाव बना रहे हैं। हालाँकि संगठन का नाम उन्होंने नहीं बताया था। राजेंद्र प्रसाद की छोटी बेटी गुलशन ने बताया कि उसके पिता संविदा पर प्रेम नगर स्थित सर्वोदय कन्या विद्यालय में सिक्योरिटी गार्ड के पद पर तैनात हैं।

कॉन्ग्रेस की ‘बिकिनी गर्ल’ ने बिग बॉस में की हाथापाई: शिव ठाकरे का गला पकड़कर बोलीं- ‘गाड़ दूँगी तुझे यहाँ’, घर से निकाले जाने पर गिड़गिड़ाईं

रिएलिटी शो बिग बॉस 16 (Bigg Boss 16) में ‘वीकेंड का वार’ में शिव ठाकरे (Shiv Thakare) और अर्चना गौतम (Archana Gautam) ने लड़ाई की सारी हदें पार कर दीं। एक मामूली टिश्यू पेपर से शुरू हुआ विवाद देखते ही देखते हाथापाई में बदल गया। इस दौरान अर्चना ने शिव ठाकरे का गला पकड़ लिया। इसके बाद उन्हें शो से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। सोशल मीडिया पर इस हाथापाई का वीडियो सामने आया है। वीडियो में आप देख सकते हैं कि कैसे अर्चना शिव के गले को पकड़कर उन्हें पीछे धकेल रही हैं, लेकिन शिव ने अपने आपको बचाने के लिए उन्हें छुआ भी नहीं।

दरअसल, शो में एक टास्क के बाद अर्चना घरवालों के लिए आने वाले टिश्यू पेपर बॉक्स और चीनी जैसी चीजें छिपाने लगीं। इस पर टीना दत्ता (Tina Datta), शालिन भनोट (Shalin Bhanot) व अन्य ने आपत्ति जताई। जब वे उससे टिश्यू बॉक्स रखने के लिए कह रहे थे, तभी अर्चना ने लड़कियों को अपमानजनक और अश्लील टिप्पणियाँ कीं। इस पर अर्चना के पास खड़े शिव ने उनसे सवाल किया और उसे दोहराने के लिए कहा। अर्चना ने उसे इससे दूर रहने को कहा।

बदले में शिव ने इनडारेक्टली उसके राजनीतिक दल के नेता का नाम लेते हुए उसका मजाक उड़ाया। इससे अर्चना चिढ़ गई और उसने शिव की गर्दन पकड़ ली। निमृत (Nimrit Kaur Ahluwalia) को इस वक्त बीच बचाव करते हुए देखा गया। अर्चना शिव को धमकी देती रही। अर्चना ने शिव को फिर धमकाते हुए कहा, “गाड़ दूँगी तुझे यहाँ।”

इसके बाद सभी घरवाले शिव ठाकरे के समर्थन में आ गए। कुछ देर बाद शिव ठाकरे को कमरे के अंदर बुलाया गया और बिग बॉस (Bigg Boss) ने शुरू में उन पर उनकी (अर्चना) राजनीतिक पार्टी का हवाला देकर अर्चना को प्रताड़ित करने का आरोप लगाया। इसके बाद उन्होंने शिव से अर्चना को लेकर फैसला करने के लिए कहा। बिग बॉस ने अर्चना को शिव से बात करने और माफी माँगने का मौका भी दिया।

हालाँकि अर्चना माफी माँगने की बजाए अपना बचाव करती रहीं और खुद को सही ठहराती रहीं। इसके बाद बिग बॉस ने उसे घर से बेघर करने का फैसला किया, जिसके बाद वह रोने लगती हैं और हाथ जोड़ती हैं। वह शिव से अपने फैसले पर फिर से विचार करने का अनुरोध करती हैं।

अर्चना शिव से कहती हैं, “मैं यहाँ से नहीं जाना चाहती हूँ। आपको चोट पहुँचाने का मेरा कोई इरादा नहीं था। बस मुझे एक मौका दें। मैं अपने माता-पिता की कसम खाती हूँ कि मैं भविष्य में इसे नहीं दोहराऊँगी। मैंने कभी भी इस तरह किसी के सामने हाथ नहीं जोड़े हैं। मेरे माँ-बाप के सपने मत तोड़ो।”

शिव ने कहा कि घर के सभी सदस्यों को लगता है कि वह अक्सर अपनी हदें पार करती हैं, लेकिन उन्होंने हमेशा उन्हें माफ कर दिया है। इसके बाद वह सभी को गले लगाती हैं और बिग बॉस के घर से बाहर निकल जाती हैं।

उल्लेखनीय है अर्चना गौतम बिग बॉस में अपनी आवाज और हर मुद्दे पर बोलने के लिए भले ही अब जानी जाती हैं लेकिन मीडिया में वो चर्चा में यूपी चुनावों के बाद से हैं। दरअसल, कॉन्ग्रेस ने चुनावों के दौरान जो ‘लड़की हूँ लड़ सकती हूँ’ मुहिम के तहत महिलाओं को टिकटें दी थीं। उसमें हस्तिनामपुर सीट से अर्चना ही कॉन्ग्रेस की प्रत्याशी थीं। उन्हें मीडिया में ‘बिकिनी गर्ल’ के नाम से जाना गया था और जब नतीजे आए थे तो उन्हें मात्र 1519 वोट मिले थे।