Thursday, July 25, 2024
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‘यहाँ पहले शाम में हिंदू ही हिंदू दिखते, अनाज-पैसा बाँटते, लेकिन अब…’: दिल्ली में निजामुद्दीन की दरगाह पर आने वाले हिंदू 60% तक हुए कम

"पहले यहाँ खूब हिंदू आते थे। हर रोज। दोपहर के 2 बजे से रात के 11 बजे तक दरगाह पर आने वालों में खूब हिंदू होते थे। लेकिन अब इक्का-दुक्का हिंदू ही आते हैं। पहले यहाँ हिंदू भंडारे भी करते थे। करीब-करीब रोज। अन्न-पैसा बाँटते थे। लेकिन अब वैसी स्थिति नहीं रही।"

यहाँ शाम होते ही हिंदू ही हिंदू दिखते थे। दो बजे से रात के 11 बजे तक हिंदू खूब आते थे। लेकिन अब कम आने लगे हैं। आप बाहर देखिए कोई नजर आ रहा है…

यह कहना है अली मूसा निजामी का। वे दिल्ली स्थित हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह के दीवान हैं। निजामी के अनुसार वे 84 साल के हैं और उन्होंने कई दौर देखे। पर ऐसा दौर नहीं देखा। उनके मुताबिक ये ‘नफरत’ अभी और बढ़ेगी। उनका दावा है कि इसी नफरत के प्रचार ने दरगाह पर आने वाले हिंदू कम कर दिए हैं।

निजामी के अनुसार निजामुद्दीन की दरगाह पर आने वाले हिंदुओं की संख्या में सालभर के भीतर करीब 60 फीसदी गिरावट आई है। वे बताते हैं कि पहले यहाँ खूब हिंदू आते थे। हर रोज। दोपहर के 2 बजे से रात के 11 बजे तक दरगाह पर आने वालों में खूब हिंदू होते थे। लेकिन अब इक्का-दुक्का हिंदू ही आते रहते हैं। उन्होंने बताया कि पहले यहाँ हिंदू भंडारे भी करते थे। करीब-करीब रोज। अन्न-पैसा बाँटते थे। लेकिन अब वैसी स्थिति नहीं रही।

निजामुद्दीन की गली से हिंदू गायब

निजामी जो बता रहे थे वह रविवार (17 जुलाई 2022) को जब ऑपइंडिया की टीम दरगाह पर गई तो दिख भी रहा था। मुख्य सड़क से उतरकर हमने जब दरगाह का रास्ता पकड़ा तो चहल-पहल थी। पर हिंदू नजर नहीं आ रहे थे। न रास्ते में, न दरगाह के भीतर। दरगाह में करीब 2 घंटे बिताने के बाद जब हम लौट रहे थे तब भी यही हाल था।

दीवान अली मूसा के अनुसार दरगाह पर आने वाले हिंदू सालभर में 60 फीसदी कम

हमें यह बताने वाले कई मिले कि रात के 2 बजे तक यहाँ इस तरह की चहल-पहल रहती है। लेकिन, कोई यह कैमरे पर कबूल करने को तैयार नहीं था कि अजमेर की दरगाह की तरह यहाँ आने वाले भी कम हुए हैं और उसका असर रोजी-रोजगार पर भी पड़ रहा। खुद निजामी भी शुरुआत में सूफीवाद की शान में कसीदे पढ़ते हुए हमें बताते रहे कि यहाँ हर कौम के लोग आते हैं। हिंदू-मुस्लिम, सरदार भी। लेकिन सवाल दर सवाल जब वे खुलने लगे तो यह सच स्वीकार कर लिया कि दरगाह पर आने वाले हिंदुओं की संख्या घटी है।

निजामी के अनुसार दरगाह पर आने वाले हिंदुओं की संख्या में गिरावट अचानक नहीं हुई है। करीब सालभर से ऐसा दिख रहा है। उनका कहना है कि हिंदुओं के बीच प्रचार किया जा रहा है कि ये कब्र है। यहाँ सजदा करने से कुछ नहीं होता। मंदिर जाओ (अपनी बात को वजनदार बनाने के लिए वे किसी दुबे जी का हवाला देते हैं। जो उनके अनुसार अमेरिका में रहते हैं। उनके मित्र हैं। दरगाह पर आते रहते हैं। ​दीवान के अनुसार उन्हें दुबे जी ने भी इस तरह के प्रचार की बातें बताई थी)।

कभी शाम होते ही दरगाह परिसर में हिंदू ही हिंदू आते थे नजर

निजामी आगे बताते हैं कि हिंदू भाई अच्छे लोग हैं, लेकिन ये जो प्रचार चल रहा वह उनमें नफरत पैदा कर रहा है। जब हमने उनसे नूपुर शर्मा को लेकर हुए हालिया विवाद, उदयपुर में कन्हैया लाल की निर्मम हत्या, अजमेर दरगाह से जुड़े लोगों की भड़काऊ बयानबाजी के असर को लेकर सवाल किया तो उनका कहना था कि ये सब होता रहता है। हमेशा मजहब को लड़ाने में लोग लगे रहते हैं। लेकिन, ये दरगाह अमन का पैगाम देता है। मोहब्बत का पैगाम देता है। इन जगहों पर हिंदुओं का आना इसलिए कम हुआ है कि काफी समय से उनके बीच नफरत का प्रचार हो रहा। दरगाह के रास्ते में ही तबलीगी जमात का वह​ मरकज है जो कोरोना काल में कुख्यात हुआ था। उस घटना के असर को भी निजामी नकार देते हैं। वे कहते हैं कि उसका असर नहीं है। मरकज में केवल मुस्लिम आते हैं। ये हर कौम के लोगों की जगह है। लेकिन, इसका भी गलत तरीके से प्रचार हो रहा है।

हमने निजामी से पूछा कि जब कभी यहाँ हिंदू इतनी तादाद में आते थे तो क्या दरगाह वाली गली में उनकी भी दुकानें हैं? क्या वे दुकानें आज भी चल रही हैं? हँसते हुए निजामी ने हमारे सवाल का जवाब तो नहीं दिया, लेकिन ये बताया- मेरा नौकर हिंदू है। यहाँ सेवा करने वाले कई हिंदू हैं।

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अजीत झा
अजीत झा
देसिल बयना सब जन मिट्ठा

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