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व्हीलचेयर से ताकती बेटियाँ… सुप्रीम कोर्ट के 50वें CJI बने जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़: सबसे लंबे समय तक भारत के मुख्य न्यायाधीश रह चुके हैं पिता भी

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ सुप्रीम कोर्ट के 50वें मुख्य न्यायाधीश बन गए हैं। इस दौरान उनके परिवार की तस्वीरें भी मीडिया में सामने आई हैं। उनके परिवार में उनकी पत्नी व बेटे के अलावा दो गोद ली हुई बच्चियाँ भी हैं। सामने आई मंगलवार (8 नवंबर, 2022) की तस्वीर में तीनों अपने घर में हँसी-ख़ुशी बातचीत करते दिख रहे हैं। उनकी बेटियाँ व्हीलचैर पर दिख रही हैं। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने इंटरव्यू के दौरान ये तस्वीरें ली। बुधवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें नए CJI की शपथ दिलाई। उनके पिता भी फरवरी 1978 से लेकर जुलाई 1985 तक CJI (सुप्रीम कोर्ट के 16वें मुख्य न्ययाधीश यशवंत विष्णु चंद्रचूड़) रहे हैं।

11 अक्टूबर को ही तत्कालीन CJI यूयू ललित ने जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ का नाम अगले मुख्य न्यायधीश के रूप में प्रस्तावित किया था, जिसे 17 अक्टूबर को राष्ट्रपति ने स्वीकार कर लिया। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ 10 नवंबर, 2024 तक इस पर पर बने रहेंगे। पिछले एक दशक से कोई भी मुख्य न्यायाधीश इतने दिन तक पद पर नहीं रहे। उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के अलावा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय कानून मंत्री किरण रिजिजू भी इस शपथग्रहण समारोह में मौजूद रहे।

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ का कहना है कि व्यक्तिगत प्रतिष्ठा के साथ-साथ सामाजिक एकजुटता बनाए रखने को भी वो अपनी जिम्मेदारी समझते हैं। उन्होंने कहा कि उनकी पहली प्राथमिकता होगी कि अपने नेतृत्व से उदाहरण पेश करना। उन्होंने बताया कि इलाहाबद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के दिनों से ही वो मानते आ रहे हैं कि एक चीफ जस्टिस कभी न्यायिक कार्यों को नहीं छोड़ सकता। उन्होंने कहा कि जज के कार्यों को करने पर उनका मुख्य ध्यान रहेगा।

उन्होंने कहा कि मौजूदा न्यायिक व्यवस्था ब्रिटिश काल पर ही आधारित है, ऐसे में उनका प्रयास ये रहेगा कि एक सामान्य व्यक्ति को न्यायपालिका के करीब लाना। उन्होंने कहा कि जनता के वास्तविक समस्याओं पर ध्यान देना और पिछले कुछ दशक में जनता का जो विश्वास न्यायपालिका पर बना है, उसे बनाए रखना उनका मुख्य दायित्व होगा। एक मामले में उन्हें अपने पिता के निर्णय को पलटना पड़ा था। उन्होंने कहा कि एक जज के रूप में उन्हें अपनी भावनाओं को नियंत्रित करना प्रशिक्षित किया जाता है और जो सही है वही करना पड़ता है।

उन्होंने न्यायपालिका में विवधिता लाने की बात करते हुए कहा कि आज का सुप्रीम कोर्ट 40 वर्ष पहले के लीगल सिस्टम का उत्पाद है, जब उन जैसे कई लोग बार में शामिल हुए थे। कॉलेजियम सिस्टम पर उन्होंने कहा कि दुनिया की कोई भी संस्था परफेक्ट होने का दावा नहीं कर सकती, ऐसे में व्यवस्था में सुधार होते रहेंगे। उन्होंने कहा कि जजमेंट लिखते समय वो ये भी ध्यान रखते हैं कि ये एकदम से कठिन लीगल भाषा में न हो, क्योकि इसे पढ़ने वाले जज और वकील के अलावा आम लोग भी हो सकते हैं।

जर्सी फुटबॉल की-दाढ़ी मुल्लों जैसी, चाकू-बंदूक और रॉकेट से भी लैस: कतर टीम पर फ्रेंच पत्रिका के कार्टून से भड़के इस्लामवादी

20 नवंबर 2022 से कतर में फुटबॉल वर्ल्ड कप (FIFA WC 2022) शुरू होना है। इससे पहले इस्लामी राष्ट्र के सख्त कानूनों को लेकर खिलाड़ी और प्रशंसकों में चिंता देखी जा रही है। इस बीच फ्रांस की एक पत्रिका के कार्टून को लेकर विवाद हो गया है। कतर फुटबॉल टीम को इस कार्टून में जिस तरीके से दिखाया गया है, उससे दुनिया भर के मुस्लिम भड़क गए हैं।

यह कार्टून फ्रेंच पत्रिका लु कैना हौसेने (Le Canard enchaîné) में छपी है। इसमें कुछ लोग फुटबॉल जर्सी पहने इस्लामी आतंकियों की वेशभूषा में दिख रहे हैं। जर्सी पर कतर लिखा हुआ है। इन लोगों की दाढ़ी मौलवियों की तरह बढ़ी हुई है। साथ ही उनके पास चाकू, बंदूक और रॉकेट लॉन्चर भी दिख रहे हैं।

फ्रेंच पत्रिका के अक्टूबर अंक में प्रकाशित इस कार्टून की मंगलवार (8 अक्टूबर 2022) को कतर ने निंदा की। दुनियाभर के मुस्लिम इसका विरोध कर रहे हैं। इसे नस्लवादी, इस्लामोफोबिया और अपमानजनक बताया है। कतर ने प्रकाशकों की नैतिकता पर भी सवाल उठाए हैं। सोशल मीडिया पर भी कार्टून का विरोध हो रहा है।

कतर के रक्षा विभाग के पूर्व प्रवक्ता नवाफ एल एम थामी ने भी ट्वीट कर इस कार्टून को नस्लवादी और घृणा से भरा बताया है। उन्होंने दो कार्टून ट्वीट किए हैं। एक le canard enchainé में प्रकाशित 2022 का कार्टून है और दूसरा 1940 का। इसके जरिए उन्होंने तंज कसते हुए कहा है कि यूरोपीय मुल्कों ने अपने चरम राष्ट्रवाद और औपनिवेशिक ग​लतियों से कुछ नहीं सीखा है।

वैसे यह पहला मौका नहीं है जब इस्लामी कट्टरपंथ पर फ्रांस की पत्रिका ने इस तरह व्यंग्य किया है। फ्रेंच पत्रिका शार्ली हेब्दो (Charlie Hebdo) को पैंगबर मोहम्मद का कार्टून छापने की वजह से आतंकी हमले का शिकार होना पड़ा था। 7 जनवरी 2015 को उसके दफ्तर पर हुए हमले में 12 लोगों की मौत हो गई थी। पत्रिका ने पैगंबर के कार्टून छापने को ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ बताया था।

गौरतलब है कि फुटबॉल विश्वकप की मेजबानी मिलने के बाद से ही कतर अपने खराब प्रबंधन, मानवाधिकार इत्यादि के लिए चर्चा में रहा है। अभी हाल ही में फीफा के पूर्व अध्यक्ष सेप ब्लाटर ने कहा था कि उन्होंने कतर को फीफा वर्ल्ड कप की मेजबानी देकर बड़ी भूल की थी। उन्होंने कहा था कि यह एक बुरा विकल्प था और उस समय फीफा प्रेसिडेंट रहने के कारण वे इसके जिम्मेदार हैं।

‘1984 के हत्यारे का सम्मान हो रहा है…’: कमलनाथ को गुरु नानक जयंती में बुलाने पर भड़के कीर्तनकार, बोले- हमारी मरी हुई कौम फिर भुगतेगी, मैं प्रण लेता हूँ इंदौर नहीं आऊँगा

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ (MP Ex CM & Congress Leader Kamal Nath) के इंदौर के खालसा कॉलेज में पहुँचने पर बवाल हो गया है। प्रकाश पर्व (गुरु नानक जयंती) के अवसर पर मंगलवार (8 नवंबर 2022) को कीर्तन कार्यक्रम में पहुँचे कमलनाथ को सरोपा सौंपकर सम्मानित किया गया था।

कॉलेज में कमलनाथ के आगमन और उन्हें सम्मानित करने पर कीर्तनकार मनप्रीत सिंह कानपुरी नाराज हो गए। उन्होंने हजारों लोगों की उपस्थिति में समाज के सचिव जसबीर सिंह गाँधी उर्फ राजा गाँधी को लताड़ दिया। कानपुरी ने कहा, “शर्म करो गाँधी। जिसने हजारों सिखों के घर बर्बाद कर दिए, जो 1984 के सिख दंगों का दोषी है, उसके तुम गुणगान कर रहे हो।”

मनप्रीत सिंह ने कहा कि 1984 में जिस व्यक्ति के कहने पर हजारों सिखों का कत्ल कर दिया गया, दुकानें जला दी गईं, माताओं-बहनों की इज्जत पर हाथ डाला गया, उस व्यक्ति का सिखों द्वारा सम्मान किया जा रहा है। सिंह ने कहा, “मैं वाहे गुरु गोविंद सिंह की सौगन्ध खाकर कहता हूँ कि अब कभी इंदौर नहीं आऊँगा।”

मनप्रीत सिंह कानपूरी का कहना था कि समाज के पदाधिकारियों द्वारा कीर्तन के दौरान राजनीति करना गलत है। उन्होंने कमिटी को गलत बताते हुए कहा, “आप लोग सिख समाज के नहीं हो, जो गुरु साहिब के समक्ष खुलेआम राजनीति कर रहे हो।” उन्होंने कहा, “तुम लोगों के अंदर जमीर ही नहीं है। हमारी कौम मरी हुई है। याद रख लो कि दुबारा भुगतोगे। यह बात तुम लोगों को समझ में नहीं आती है।”  

इस बीच जसबीर सिंह गाँधी कहते हुए नजर आए, “मैं गलत हूँ तो मैं भुगत लूँगा और आप गलत हो तो आप भुगतोगे।” इस घटना का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। हालाँकि, इस बवाल के बाद गुरुसिंह सभा ने सफाई देने की कोशिश की।

इस मामले में गुरुसिंह सिख सभा के प्रभारी अध्यक्ष दानवीर सिंह छाबड़ा ने कहा कि ऐसा कुछ नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि दोपहर को कमलनाथ के आने के कारण कीर्तन का कार्यक्रम दो-पाँच मिनट लेट हो गया था। इसके कारण कीर्तनकार मनप्रीत सिंह नाराज हो गए थे।

छाबड़ा ने आगे कहा कि कीर्तनकार मनप्रीत सिंह कानपुरी की नाराजगी कमलनाथ को सरोपा सौंपे जाने को लेकर थी कि इसे सिर्फ समाज के लोगों को ही सम्मानित किया जाता है। कमलनाथ को सरोपा नहीं, स्मृति चिन्ह दिया जाना था। छाबड़ा ने कहा कि मनप्रीत सिंह ने जो कहा है कि वह उनका निजी विचार है।

दरअसल, राहुल गाँधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ की तैयारियों का जायजा लेने के लिए कलमनाथ इंदौर आए हुए थे। इसी दौरान उन्हें गुरुनानक देव की जयंती पर खालसा कॉलेज में आमंत्रित किया गया था। इस दौरान कमलनाथ का सरोपा सौंपकर सम्मान किया गया। इसके बाद भड़के मनप्रीत सिंह ने जब मंच से ही 1984 के दंगों का जिक्र करना शुरू किया तो कमलनाथ वहाँ से चल दिए।

बता दें कि साल 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों में कमलनाथ आरोपित हैं। सिख दंगा इंदिरा गाँधी की हत्या के विरोध में भड़का था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की उन्हीं के दो सिख गार्ड ने ऑपरेशन ब्लूस्टार के विरोध में गोली मारकर हत्या कर दी थी।

सानिया मिर्जा और शोएब मलिक का हो गया तलाक: पाकिस्तानी क्रिकेटर के साथी ने मीडिया को बताया, पहली बीवी से तलाक के 4 दिन बाद किया था निकाह

सानिया मिर्जा और शोएब मलिक के बीच तलाक (Sania Mirza Shoaib Malik Divorce) हो चुका है। पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक के एक बेहद करीबी शख्स ने इनसाइडस्पोर्ट नाम की वेबसाइट को यह बात बताई है।

शोएब मलिक के करीबी के अनुसार सानिया मिर्जा और उनके शौहर काफी समय से अलग रह रहे थे लेकिन अब औपचारिक रूप से दोनों ने तलाक ले लिया है। जिस शख्स ने यह खुलासा किया है, वो पाकिस्तान में शोएब मलिक की मैनेजमेंट टीम का सदस्य है। उसने इनसाइडस्पोर्ट को बताया:

“हाँ, अब इन दोनों का (सानिया मिर्जा और शोएब मलिक का) आधिकारिक रूप से तलाक हो गया है। मैं इससे अधिक खुलासा नहीं कर सकता लेकिन पुष्टि कर सकता हूँ कि वे अलग हो गए हैं।”

उमैर संधु नाम के एक ट्विटर अकाउंट ने लिखा है कि तलाक के बाद सानिया मिर्जा बहुत बुरे डिप्रेशन से गुजर रही हैं।

सानिया मिर्जा, शोएब मलिक और तलाक

सानिया मिर्जा और शोएब मलिक (Sania Mirza and Shoaib Malik) के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा, इसकी भनक मीडिया को किसी सूत्र से नहीं लगी थी बल्कि खुद सानिया मिर्जा की इंस्टाग्राम स्टोरी से इन अटकलों को बल मिला। इसमें उन्होंने पूछा था टूटे हुए दिल कहाँ जाते हैं? फिर उन्होंने खुद ही जवाब देते हुए लिखा था कि वो अल्लाह को ढूँढने जाते हैं।

सानिया मिर्जा के ‘टूटे दिल’ वाला पोस्ट

इस पोस्ट को बाद में डिलीट कर दिया गया। इसके बाद सानिया मिर्जा ने अपने बेटे के साथ एक फोटो डाली। कैप्शन में लिखा – “ऐसे लम्हे, जो सबसे मुश्किल दिनों में राहत देते हैं, उससे निकल पाने की शक्ति देते हैं।”

इंस्टाग्राम पर सानिया मिर्जा और उनके बेटे की बहुत सारी तस्वीरों को देखा जा सकता है। शोएब मलिक की तस्वीर खोजने के लिए काफी नीचे स्क्रॉल करना पड़ेगा। सानिया मिर्जा ने 40 सप्ताह पहले शोएब मलिक के साथ वाली आखिरी तस्वीर पोस्ट की थी।

शोएब मलिक, पहली बीवी से तलाक… और सानिया मिर्जा से निकाह

शोएब मलिक की पहली बीवी का नाम आयशा सिद्दीकी है। दोनों का निकाह साल 2002 में हुआ था। सानिया मिर्जा से निकाह करने से 4 दिन पहले शोएब मलिक ने आयशा से तलाक ले लिया था।

आयशा सिद्दीकी के अब्बा ने तब इसकी शिकायत पुलिस से भी की थी। आपको बता दें कि शोएब मलिक से निकाह से पहले सानिया मिर्जा की भी सगाई हो गई थी उनके बचपन के दोस्त सोहराब मिर्जा के साथ। यह सगाई लेकिन 6 महीने में ही टूट गई थी।

ओला ड्राइवर निकला लव जिहादी: राजू बन 2 बच्चों के अब्बा शाहरुख ने हिंदू युवती को फँसाया, पोल खुली तो कहा- तू भी मुस्लिम बन, हमारे में 4 निकाह जायज

मध्य प्रदेश के इंदौर की एक हिंदू युवती के राजस्थान के उदयपुर में लव जिहाद का शिकार बनने का मामला सामने आया है। आरोपित का नाम शाहरुख है। वह एक ओला ड्राइवर है। शाहरुख पर आरोप है कि उसने राजू बनकर युवती से दोस्ती की, फिर कोर्ट मैरिज कर उस पर धर्मांतरण का दवाब बनाने लगा।

पीड़िता को शादी के 5 महीने बाद पता चला कि जिसे वह राजू समझ रही है, असल में वह शाहरुख है। सोमवार (7 नवंबर 2022) को कोर्ट में पीड़िता का बयान रिकॉर्ड किया गया। आरोपित पक्ष पर उसने धमकी देने का भी आरोप लगाया है। इस संबंध में अलग से शिकायत दर्ज कराते हुए पुलिस को रिकॉर्डिंग सौंपी है। फिलहाल आरोपित जेल में बंद है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, 25 वर्षीय पीड़िता लगभग 10 महीने पहले अपनी सहेली के साथ इंदौर से उदयपुर आई थी। यहाँ उसे और उसकी सहेली को एक होटल में हाउसकीपिंग की नौकरी मिली। दोनों ने उदयपुर रेलवे स्टेशन से होटल जाने के लिए एक ओला टैक्सी बुक कराई। उस वक्त पहली बार कैब ड्राइवर शाहरुख (29 साल) से पीड़िता की मुलाकात हुई थी। उसने बातचीत में अपना नाम राजू उर्फ राजकुमार बताया। इसके बाद उनकी जान-पहचान हो गई और वह रोज रूम से होटल तक लाने और छोड़ने के लिए उसे ही कॉल करके बुलाती थी।

पीड़िता के मुताबिक, कुछ दिनों तक उन दोनों में सामान्य दोस्ती रही। फिर करीब 7 महीने पहले शाहरुख ने उसे शादी का प्रस्ताव दिया। इस बीच युवती को भी उससे प्यार हो गया था और वह शादी के लिए राजी हो गई। इसके बाद लगभग 5 महीने पहले उन दोनों ने कोर्ट मैरिज कर ली और साथ रहने लगे। रात में शाहरुख उसके साथ रहता था। एक दिन शाहरुख के मोबाइल पर उसकी पहली बीवी का कॉल आया। उसने बताया कि वह शाहरुख की बीवी बोल रही है। इसके बाद युवती ने उससे पूछताछ की तो पता चला कि शाहरुख ही उसका शौहर है और कई सालों से यह नंबर चला रहा है। इसके बाद युवती ने राजू उर्फ शाहरुख का आधार कार्ड चेक किया, तो असलियत उसके सामने आ गई।

युवती के शब्दों में, “दीवाली के समय मुझे पता चला कि उसका असली नाम राजू नहीं, शाहरुख है और वह पहले से शादीशुदा है। उसके 2 बेटे हैं। एक 7 साल का और दूसरा 4 साल का। जब मैंने उससे अपना धर्म, निकाह और बच्चों की जानकारी छिपाने के बारे में पूछा तो वह मुझसे बोला कि हमारे में तो चार निकाह जायज हैं। तू भी मुस्लिम बन जा, धर्म परिवर्तन कर ले और मेरे साथ चलकर मेरे घर में रह। उसने बात नहीं मानने पर मुझे जान से मारने की धमकी भी दी।”

इसके बाद पीड़िता उदयपुर से इंदौर आ गई, लेकिन यहाँ भी शाहरुख ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। शाहरुख उसे कॉल करके धमकी देने लगा, जिसके बाद लड़की ने परिवार के लोगों, पूर्व सरपंच, जनपद सदस्य व हिंदू जागरण मंच के लोगों से मदद माँगी और उन्हें इस घटना से अवगत कराया। इसके बाद पुलिस के कहने पर पीड़िता ने शाहरुख को उसके परिवार को बातचीत करने के लिए इंदौर बुलाया। उसके यहाँ आते ही पुलिस ने केस दर्ज कर उसे हिरासत में ले लिया। इस मामले में पुलिस ने आरोपित को 2 नवंबर 2022 को गिरफ्तार किया था। उसके खिलाफ बार-बार रेप करने, बंधक बनाने और धमकाने की धाराओं की तहत केस दर्ज किया गया है।

बता दें कि कुछ दिन पहले भी इंदौर से लव जिहाद और धर्मांतरण की खबर सामने आई थी। यहाँ, साकिर मोहम्मद नामक व्यक्ति ने खुद को राजकुमार बताते हुए युवती से दोस्ती की और फिर उसका रेप कर उसका अश्लील वीडियो बना लिया। इसके बाद उस पर धर्मांतरण करने का दवाब बनाया। कोर्ट के आदेश के बाद इस मामले में एफआईआर दर्ज की गई।

‘प्राइवेट पार्ट में होता रहता था दर्द’: नाबालिगों को चॉकलेट-फल में मिलाकर देते थे ड्रग्स, मुरुघा मठ अपने ​कंट्रोल में ले सकती है कर्नाटक सरकार

मुरुघा मठ के शिवमूर्ति मुरुघा शरणारू से जुड़े यौन शोषण के मामले में कर्नाटक पुलिस ने चार्जशीट दाखिल कर दी है। मीडिया रिपोर्टों में चार्जशीट के हवाले से बताया है कि नाबालिग बच्चियों को फल और चॉकलेट में ड्रग्स मिलाकर दिया जाता था। इसके बाद उन्हें शरणारू के बेडरूम में भेजा जाता था। यह भी कहा जा रहा है कि कर्नाटक सरकार अब इस मठ का नियंत्रण अपने हाथों में ले सकती है।

चित्रदुर्ग जिले में स्थित यह मठ कर्नाटक के प्रभावशाली लिंगायत समुदाय से जुड़ा हुआ है। पुलिस के अनुसार, शरणारू के बेडरूम में ड्रग्स, शराब और अन्य नशीले पदार्थ सप्लाई किए जाते थे। दो नाबालिग लड़कियों ने मठ प्रमुख के खिलाफ 27 अगस्त 2022 को यौन उत्पीड़न का मामला दर्ज करवाया था, जिसके बाद उसे 1 सितंबर को गिरफ्तार किया गया था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, चित्रदुर्ग पुलिस ने यौन उत्पीड़न मामले में शरणारू के खिलाफ 694 पन्नों का आरोप-पत्र 27 अक्टूबर को कोर्ट में दाखिल किया। पुलिस का दावा किया है कि मठ द्वारा संचालित छात्रावास में फलों और पेय पदार्थों में ड्रग्स मिलाकर लड़कियों को दिया जाता था। इसके बाद नाबालिगों को शरणारू के बेडरूम में भेजा जाता था, जहाँ यौन शोषण होता था। नाबालिगों ने सीआरपीसी की धारा 164 के तहत अपने बयान दर्ज करवाए हैं।

नहीं जाने पर करते थे परेशान

लड़कियों ने अपने बयान में कहा कि उन्हें ड्रग्स देने के बाद शरणारू के बाथरूम और ऑफिस में भी भेजा गया। उन्होंने आरोप लगाया कि विरोध करने पर वार्डन उन्हें परेशान करते थे और सजा देते थे। चित्रदुर्ग के एसपी के परशुराम ने कहा, “हम गंगाधरैया और अन्य आरोपितों के खिलाफ भी मामला दर्ज कर सबूत जुटा रहे हैं।”

जिस एनजीओ ने इन लड़कियों की मदद की, उसके निदेशक स्टैनली ने बताया कि ड्रग्स वाले फल और चॉकलेट को खाने के बाद लड़कियाँ बेसुध हो जाती थीं। इसके बाद उन्हें रात में आरोपित के बेडरूम में भेज दिया जाता था। सुबह जब वे छात्रावास आने के लौट रही होती थीं तो काफी सुस्त रहती थीं। उनके शरीर के विभिन्न हिस्सों और निजी अंगों में तेज दर्द होता था।

एक लड़की को मठ से दूर भेजा

एनजीओ के निदेशक स्टैनली ने कहा कि चार्जशीट में कर्नाटक-आंध्र प्रदेश सीमा पर रेलवे ट्रैक पर रहस्यमय परिस्थितियों में एक लड़की की मौत के संदेह का भी उल्लेख किया गया है। घटना से कुछ दिन पहले हॉस्टल की रहने वाली लड़की को मठ से दूर भेज दिया गया था। लड़की के पिता नेत्रहीन थे, इसलिए वह छात्रावास में रहती थी। अगर मठ ने प्रक्रिया का पालन किए बिना उसे घर भेज दिया गया।

इसको लेकर चित्रदुर्ग पुलिस ने कहा कि लड़की की मौत को अप्राकृतिक मौत (Unnatural Death) के रूप में दर्ज किया गया था। इस मामले को रेलवे पुलिस ने बंद कर दिया था। परशुराम ने कहा, “हमने पाया कि हिंदूपुर रेलवे पुलिस में एक यूडीआर दर्ज था, जिसमें कहा गया था कि एक लड़की ट्रेन से गिर गई और उसकी मौत हो गई। जाँच के बाद, यह एक आकस्मिक मृत्यु पाई गई और मामला बंद कर दिया गया।”

अनाथ लड़कियों को बनाता था शिकार

बताया जा रहा है कि पीड़ित लड़कियों को उनकी पृष्ठभूमि के आधार पर चुना जाता था। इसमें अनाथ और सिंगल माता-पिता की बेटियाँ होती थीं। अगर किसी पीड़िता ने आरोपित के कमरे में जाने से इनकार किया, तो उन्हें कैद कर दिया जाता था। भूखा रखा जाता था और कड़ी सजा दी जाती थी।

सरकार सँभाल सकती है बागडोर

कर्नाटक सरकार मुरुघा मठ को अपने हाथों में लेने की योजना बना रही है। राज्य प्रशासक नियुक्त करने पर विचार कर रहा है। शरणारू को मठ के प्रमुख के पद से हटाने के बढ़ते दबाव के बीच मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने कहा, “हमने डीसी से एक रिपोर्ट माँगी है, रिपोर्ट को देखने के बाद निर्णय लिया जाएगा।”

PAK vs NZ T20 वर्ल्ड कप सेमीफाइनल के लिए सुप्रीम कोर्ट में TV लगाओ, पाकिस्तानी चीफ जस्टिस का आदेश, भ्रष्टाचार पर सुनवाई टालने का आग्रह

पाकिस्तान और न्यूजीलैंड (Pakistan vs New Zealand) के बीच T20 क्रिकेट वर्ल्ड कप का सेमीफाइनल खेला जाना है। ऑस्ट्रेलिया में खेले जाने वाले इस पहले सेमीफाइनल (T20 World Cup First Semi-Final) मैच का नशा पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गया। नशा भी ऐसा कि वहाँ के चीफ जस्टिस उमर अता बंदियाल ने भ्रष्टाचार से संबंधित एक मामले की सुनवाई एक दिन टालने तक का आग्रह कर दिया।

ऑस्ट्रेलिया के सिडनी क्रिकेट ग्राउंड (SCG: Sydney Cricket Ground) में पाकिस्तान और न्यूजीलैंड के बीच यह मैच 9 नवंबर 2022 को भारतीय समय के अनुसार 1:30 दोपहर को शुरू होगा। इस मैच से एक दिन पहले पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रीय जवाबदेही ब्यूरो अध्यादेश 1999 संशोधन मामले की सुनवाई चल रही थी। इसी दौरान जब वहाँ के चीफ जस्टिस उमर अता बंदियाल को पता चला कि पाकिस्तान और न्यूजीलैंड के बीच सेमीफाइनल मैच (Pak vs NZ Semi Final) है तो उन्होंने इतने महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई को एक दिन टालने का आग्रह वकीलों से कर दिया।

चीफ जस्टिस के सामने वकील बेचारा क्या करता। असमंजस में खड़ा रह गया। तभी पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट के ही एक और जज मंसूर अली शाह ने सुझाव दिया:

“यदि आपको तकलीफ न हो तो हम जज लोग मैच देखते रहेंगे, आप इस मामले पर बहस जारी रखना।”

जज मंसूर अली शाह की ओर से हालाँकि खुल कर चीफ जस्टिस उमर अता बंदियाल के खिलाफ यह सुझाव नहीं आया। इस सुझाव से पहले उन्होंने भी सुनवाई को एक दिन टालने का आग्रह यह कहते हुए किया कि वो क्रिकेट के बड़े वाले दिवाने हैं। जरा सोचिए पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट के जजों का मानसिक दिवालियापन! वकील को बहस करने बोल रहे और खुद टीवी पर मैच देखेंगे! तो भइया… वकील अपनी बहस सुनाएगा किसे?

पाकिस्तान के चीफ जस्टिस ने इसके बाद अपना फैसला सुनाया – “मैच देखने के लिए कोर्ट के बाहर एक टीवी स्क्रीन लगाएँ। मैच से पहले तक इस मामले की सुनवाई को खत्म किया जाए। अल्लाह करे कि पाकिस्तान सेमीफाइनल जीत जाए।”

पाकिस्तान और न्यूजीलैंड के बीच मैच (Pakistan vs New Zealand)

ऑस्ट्रेलिया में खेले जा रहे T20 क्रिकेट वर्ल्ड कप (T20 World Cup) की बात करें तो ग्रुप-1 में न्यूजीलैंड अंक तालिका में पहले स्थान पर रहा जबकि ग्रुप-2 में पाकिस्तान दूसरे स्थान पर रहा। अंक तालिका के आधार पर पाकिस्तान और न्यूजीलैंड के बीच पहला सेमीफाइनल सिडनी क्रिकेट ग्राउंड (SCG: Sydney Cricket Ground) पर होना है। स्टार स्पोर्ट्स नेटवर्क भारत में इस पहले सेमीफाइनल मैच का प्रसारण करेगा जबकि Disney+Hotstar पर आप इसका लाइव-स्ट्रीम देख सकते हैं।

दोनों देशों के बीच T20 क्रिकेट वर्ल्ड कप के मुकाबलों में पाकिस्तान का पलड़ा भारी रहा है। 2007 से लेकर 2021 तक के T20 क्रिकेट वर्ल्ड कप के 6 मैचों में अब तक 4 बार पाकिस्तान की जीत हुई है जबकि 2 बार न्यूजीलैंड जीता है।

PFI का झंडा और ‘सर तन से जुदा’ का मैसेज: दिल्ली से पूर्व सैनिक हुए गायब, परिवार का दावा- कई दिनों से कुछ मुस्लिम पड़े थे पीछे

दिल्ली से एक पूर्व सैनिक गायब हैं। उनके परिजनों को उनके ही नंबर से ‘सर तन से जुदा इन अजमेर वाया पाकिस्तान’ का मैसेज आया है। साथ ही प्रतिबंधित कट्टरपंथी संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) के झंडे की फोटो भेजी गई है। परिजनों का यह भी दावा है कि कुछ मुस्लिम कई दिनों से उनका पीछा कर रहे थे। गायब पूर्व सैनिक की पहचान राजेंद्र प्रसाद के रूप में हुई है।

प्रेम नगर थाना पुलिस ने मामल दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है। दिल्ली के प्रेम नगर थाना इलाके से पूर्व सैनिक के लापता होने का मामला सामने आया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पूर्व सैनिक सुल्तानपुरी के एक सरकारी स्कूल में काम करते हैं। आमतौर पर दोपहर 2 बजे तक वह अपने घर पर पहुँच जाते थे। लेकिन सोमवार (7 नवंबर 2022) को राजेंद्र प्रसाद घर नहीं पहुँचे। इसके बाद 2:30 पर राजेंद्र के फोन से उनकी पत्नी के फोन पर ‘सर तन से जुदा’ का मैसेज आया।

वहीं, पूर्व सैनिक की बेटी किरन ने दावा किया है कि कुछ मुस्लिम कई दिनों से उनके पिता का पीछा कर रहे थे। यह बात उनके पिता ने खुद घर में बताई थी। उन्होंने बताया था कि पीछा करने वाले मुस्लिम उन पर अपने संगठन में शामिल होने और धर्मांतरण का दबाव बना रहे हैं। हालाँकि संगठन का नाम उन्होंने नहीं बताया था।

इस घटना के बाद से पूर्व सैनिक के परिवार वाले दहशत में हैं। रोहिणी के डीसीपी गुरइकबाल सिंह सिद्धू ने समाचार एजेंसी एएनआई को बताया, “प्रेम नगर थाने में हमें सोमवार (7 नवंबर) को एक शिकायत मिली है कि पूर्व सैनिक राजेंद्र प्रसाद का अपहरण हो गया है। जिसके बाद हमने मामला दर्ज कर जाँच शुरू कर दी। हमें बाद में पता चला कि उनकी पत्नी के व्हाट्सएप पर दो मैसेज आए हैं।”

उन्होंने बताया कि पूछताछ में पता चला कि ये मैसेज पहली बार आया है। हमारी टीम सभी एंगल से मामले की जाँच कर रही है। पुलिस स्कूल के आसपास के सभी सीसीटीवी फुटेज भी खँगाल रही है।

अयोध्या और 9 नवंबर: जिस तारीख को चला महंत का फावड़ा-दलित ने रखी नींव की ईंट, उसी तारीख को सुप्रीम कोर्ट भी बोला- रामलला ही रहेंगे विराजमान

हिंदुओं का यह संघर्ष 1528 में ही शुरू हो गया था, जब मीर बाकी ने अयोध्या में भगवान राम के जन्मस्थान पर ​बाबरी मस्जिद का निर्माण करवाया। इस लंबे संघर्ष में 9 नवंबर की तारीख बेहद महत्वपूर्ण है। इसके दो विशेष कारण हैं। पहली, 9 नवंबर 1989 को अयोध्या में राम मंदिर का शिलान्यास हुआ। दूसरी, 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट का वह निर्णय आया, जिसने अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया और आज वहाँ निर्माण कार्य जोरों-शोरों से चल रहा है।

1528 से 2019 की इस यात्रा में कई मोड़ आए। लेकिन, 1989 के 9 नवंबर को ध्यान में रखकर हिंदू समाज ने जो तैयारी की उसने राम मंदिर को इस देश के गाँव-गाँव, जन-जन का मुद्दा बना दिया। इस तारीख ने तय किया कि अब भारत की राजनीति से मुस्लिम तुष्टिकरण के दिन लदने वाले हैं। इसी दिन वैदिक मंत्रोच्चार के बीच एक महंत ने पहला फावड़ा चलाया और एक दलित ने नींव की ईंट रखी। यह वह दिन था जब अयोध्या का आसमान ‘सौगंध राम की खाते हैं मंदिर वहीं बनाएँगे’ से गूँजायमान था। उस समय की मीडिया रिपोर्ट बताते हैं कि 30 हजार की आबादी वाले अयोध्या में करीब 11 लाख लोग एकत्र हुए थे। जनसत्ता की 9 नवंबर 1989 की एक रिपोर्ट में फैजाबाद के तत्कालीन एसएसपी हरभजन सिंह के हवाले से बताया गया है कि 10 लाख लोग उस दिन पंचकोसी परिक्रमा के लिए अयोध्या पहुँचे थे।

9 नवंबर 1989 की पटकथा

ऐसा नहीं है 1989 नवंबर की 9 तारीख अचानक से ही आ गई थी। 1983 में विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने हिंदुओं को एकजुट करने के उद्देश्य से ‘एकात्म यात्रा’ निकाली। 1984 में धर्म संसद बैठी। लेकिन इंदिरा गाँधी की हत्या से उपजी सहानुभूति ने इस देश पर वंशवाद के एक चिराग को थोप दिया। ‘मिस्टर क्लीन’ की छवि लेकर आए राजीव गाँधी के इस दौर में देश ने मुस्लिम तुष्टिकरण का चरमोत्कर्ष शाहबानो प्रकरण में देखा। बोफोर्स के भ्रष्टाचार ने मिस्टर क्लीन के शासन का नकाब उतार दिया। फिर 1988 आया। जून 1988 में इलाहाबाद उपचुनाव में कॉन्ग्रेस को करारी शिकस्त मिली। फरवरी 1989 में इलाहाबाद में धर्म संसद हुई। उसी साल 9 नवंबर को अयोध्या में भूमि पूजन निश्चित किया गया। देश के हर गाँव से मंदिर के लिए एक शिला लाने की योजना बनाई गई। उस समय दो सांसदों वाली पार्टी रही बीजेपी ने भी उसी साल जून में हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक की और राम मंदिर आंदोलन के समर्थन की घोषणा की।

रामजन्मभूमि आन्दोलन के कुछ रणनीतिकार पृष्ठभूमि में थे। इनमें से एक थे मोरोपंत त्र्यंबक पिंगले जिन्हें ‘मोरोपंत पेशवा’ भी कहते हैं। यह उनकी ही बनाई योजना थी कि शिलान्यास से पहले इसका अलख घर-घर तक पहुँचा। हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ में लिखा है, “उनकी बनाई योजना के तहत देशभर में करीब तीन लाख रामशिलाएँ पूजी गई। गाँव से तहसील, तहसील से जिला और जिलों से राज्य मुख्यालय होते हुए लगभाग 25 हजार शिला यात्राएँ अयोध्या के लिए निकली थीं। 40 देशों से पूजित शिलाएँ अयोध्या आई थी। यानी, अयोध्या के शिलान्यास से छह करोड़ लोग सीधे जुड़े थे। इससे पहले देश में इतना सघन और घर-घर तक पहुँचने वाला कोई आंदोलन नहीं हुआ था।”

अयोध्या: 9 नवंबर 1989

‘अयोध्या का चश्मदीद’ में जनसत्ता में छपी रिपोर्टों के हवाले से बताया गया है कि 9 नवंबर 1989 को 9 बजकर 33 मिनट पर भूमि पूजन और नींव की खुदाई शुरू हुई। मंत्रोच्चार के बीच स्वामी वामदेव ने भूमि पूजन किया। पहला फावड़ा महंत अवैद्यनाथ ने चलाया। दोपहर के एक बजकर 34 मिनट पर शंखनाद और मुख्य ज्योति के बीच बिहार के दलित कामेश्वर चौपाल था के हाथों नींव की पहली शिला रखी गई। उस समय 35 वर्ष के रहे कामेश्वर चौपाल ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद कहा था, “पहली ईंट रखने वाला वो समय मैं कभी भूल नहीं सकता। वह समय मुझे गर्व का एहसास कराता है।”

रामशिला
रामशिला ने घर-घर राम मंदिर की अलख जगाई थी

इधर मंदिर शिलान्यास, उधर खुदी ‘सेकुलर राजनीति’ की कब्र

इधर हिंदू समाज मंदिर शिलान्यास की तैयारियों में लगा था, उधर इसमें अड़ंगा डालने के भी तमाम प्रयास हो रहे थे। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे कॉन्ग्रेस के बड़े नेता कमलापति त्रिपाठी ने ऐलान किया कि यदि मंदिर निर्माण के लिए फावड़ा चला तो पहला फावड़ा उनकी पीठ पर चलेगा। ‘युद्ध में अयोध्या’ में हेमंत शर्मा ने लिखा है कि कॉन्ग्रेस का एक वर्ग उनके इस बयान से काफी खुश था। चुनाव के वक्त कमलापति त्रिपाठी के बेटे लोक​पति ने उनको बताया था कि कॉन्ग्रेस को इस स्टैंड से फायदा हो रहा और मुस्लिम वीपी सिंह से छिटक कर पार्टी की तरफ आ रहे हैं। हालाँकि जब चुनाव हुआ तो कॉन्ग्रेस बुरी तरह हारी और उत्तर प्रदेश में उसे केवल 15 सीटें ही मिली। बकौल शर्मा नतीजों के कुछ समय बाद इन्हीं लोकपति ने इस संबंध में पूछ जाने पर उनसे कहा, “मेरे बाबू बाबर के नाती चले थे मस्जिद बनाने और पार्टी घुस गई…।”

इसके बाद अयोध्या में राम मंदिर का आंदोलन कैसे आगे बढ़ा, इसने कैसे हिंदुओं को एकजुट किया, कैसे भारतीय जनमानस पर प्रभाव डाला, बीजेपी के उदय और सेकुलर राजनीति के खात्मे का मार्ग प्रशस्त किया इससे हम भली-भाँति परिचित हैं। फिर आया 9 नवंबर 2019 का दिन जब देश की शीर्ष अदालत ने भी संविधान की रोशनी में माना कि अयोध्या की वह जगह हिंदुओं के अराध्य श्रीराम की ही है। 9 नवंबर 1989 को राम मंदिर का शिलान्यास भले उस जगह से कुछ मीटर दूर करना पड़ा था जहाँ रामलला विराजमान थे, लेकिन इसी तारीख ने यह तय कर दिया था कि भव्य राम मंदिर इस देश में बनकर जरूर खड़ा होगा।

‘अलग है हिन्दुओं का चिह्न और हिटलर का नाजी हुक्ड क्रॉस’: ट्विटर के नए नियम में स्वस्तिक को घृणा से जोड़ा, लोगों ने एलन मस्क से की बदलाव की माँग

पूरी दुनिया में हिंदूफोबिया बढ़ता जा रहा है। खासतौर से पश्चिमी देशों में हिंदुओं के खिलाफ नफरत और हिंसा एक अलग रूप में नजर आ रही है। इस नफरत में हिंदुओ के प्रतीक चिह्नों को देखकर टारगेट करना अब आम हो गया है। हाल ही में माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर ने अपने नियमों में बदलाव किया है। इसमें हिंदुओं के पवित्र चिह्न स्वस्तिक को ‘नाजी स्वस्तिक’ बताते हुए नफरती चिह्न कहा गया है। इस पर लोग ट्विटर को ईसाइयों के ‘हुक्ड क्रॉस’ से स्वास्तिक को अलग बताते हुए इसे हटाने की माँग कर रहे हैं।

दरअसल, एलन मस्क के ट्विटर खरीदने के बाद से इसमें कई बदलाव हुए हैं। इसमें सोमवार (7 नवंबर, 2022) को ट्विटर ने अपने नियमों में भी बदलाव किया है। इस बदलाव में ‘नफरती प्रतीकों’ के अंतर्गत ‘नाजी स्वास्तिक’ लिखा गया है।

ट्विटर के इस नए नियम पर अमेरिका में हिंदुओं के लिए आवाज उठाने वाली संस्था ‘हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन’ ने ट्वीट कर कहा, “ट्विटर को सुरक्षित बनाने के आपके प्रयासों के लिए धन्यवाद। जैसे-जैसे आपके नियम सामने आ रहे हैं, कृपया इसमें बदलाव करने का विचार करें और हिंदू धर्म की आस्था के प्रतीक “स्वस्तिक” को घृणित नाज़ी ‘हेकेनक्रेज’ या ‘हूक्ड क्रॉस’ से अलग करने का विचार करें।” इस ट्वीट के साथ ही उन्होंने एक यूआरएल भी दिया है। इसमें पवित्र स्वास्तिक के बारे में विस्तार पूर्वक बताया गया है।

वहीं, Yann Meridex नामक ट्विटर यूजर ने कहा है, “क्या आपकी टीम हिंदू हिंदू प्रतीक स्वास्तिक को हकेंक्रूस से बदल सकती है, जो हिंदूफोबिक परिभाषा के पहले हिटलर की पुस्तक ‘Mein Kampf’ में नाजियों का प्रतीक था? हिन्दू स्वस्तिक का नाज़ीवाद से कोई सम्बन्ध नहीं है।”

दरअसल, विदेशों में रहने वाले हिंदू और हिंदू संगठन लगातार वहाँ के अधिकारियों और सरकार को बताते रहे हैं कि नाजियों के हुक्ड क्रॉस और हिंदुओं के स्वस्तिक में भारी अंतर है। इस अंतर को समझते हुए हुक्ड क्रॉस को स्वस्तिक से ना जोड़ा जाए और ना ही उसे स्वस्तिक कहा जाए। इसके बावजूद हिंदू विरोधी लोग और संस्थान, हिंदुओं के इस प्रतीक का इस्तेमाल कर उनके खिलाफ हिंसा के लिए स्थानीय लोगों को लगातार उकसा रहे हैं।

अमेरिका के राज्यों और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने इस अंतर को समझते हुए इसके लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश भी दिए हैं। पिछले महीने 23 अगस्त को अमेरिकी राज्य कैलिफोर्निया ने इसको लेकर एक कानून भी पारित किया है। कैलिफोर्निया राज्य की सीनेट ने सर्वसम्मति से एक विधेयक AB2282 पारित किया।

इस विधेयक में नाजी हेकेनक्रेज़ (जर्मन में हुक्ड क्रॉस) के प्रदर्शन को अपराध बनाया गया है। इसके साथ ही इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यह स्वस्तिक जैसा दिखता है, लेकिन यह बिल हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म से जुड़े स्वस्तिक के प्रदर्शन को अपराधीकरण नहीं करता। इसका मतलब स्पष्ट है कि कैलिफोर्निया की सीनेट मानती है कि हिंसा को प्रतीक बना हुक्ड क्रॉस हिंदुओं के स्वस्तिक से अलग है।

वहीं, ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स संसद (NSW Parliament) ने हेक्रेनक्रेज के प्रदर्शन को अपराध घोषित किया, लेकिन स्वस्तिक को उससे अलग रखा। इसी तरह का बिल ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया और क्वींसलैंड में पास किया गया। यहाँ भी सरकारों ने हिंदुओं के माँग को ध्यान में रखते हुए नाजी हेकेनक्रेज और स्वस्तिक से अलग माना।

हिटलर ने अपनी आत्मकथा या अपने भाषणों में हेकेनक्रेज को स्वस्तिक कभी नहीं बताया है। इसके बावजूद भी इस हिंसक नाजी प्रतीक को हिंदुओं के पवित्र प्रतीक स्वस्तिक से जोड़ने का प्रयास किया जाता है। जब नाजी सिंबल का कहीं पर प्रदर्शन होता है, उसे स्वस्तिक बता देते हैं।

ब्रिटिश स्कॉलर मैक्स मुलर ने भी ‘स्वस्तिक’ को भारतीय शब्द बताते हुए इसके प्रयोग पर आपत्ति जताई थी। वो ये नहीं चाहते था कि दुनिया ये मानें कि इस क्रॉस की उत्पत्ति भारत में हुई है। असल में हिटलर बचपन में अकेले में चर्च में गायिकी का आनंद लेता था और साथ ही पादरी भी बनना चाहता था। वो एक मोनेस्टरी है, जहाँ ऐसे ही चिह्न थे। यही चिह्न नाजी ‘Hakenkreuz’ की प्रेरणा बना। चैनल ने इसे 20वीं शादी का ऐसा विश्वासघात बताया है, जिसमें मोहरे सिर्फ एक ही तरफ से चले जा रहे थे।

बता दें, इसी साल फरवरी में कनाडा के सांसद चंद्र आर्य ने वहाँ के पार्लियामेंट में आवाज़ उठाते हुए अपील की थी कि नाजियों के निशान ‘हकेनक्रेज’ की तुलना हिन्दू ‘स्वस्तिक’ से नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने संसद में स्पीकर को सम्बोधित करते हुए कहा था कि कई धर्मों/मजहबों को मानने वाले 10 लाख कनाडा के नागरिकों, खासकर हिन्दू-कनाडियन समुदाय की तरफ से वो ये बात रख रहे हैं। उन्होंने खुद को भी एक हिन्दू-कनाडियन बताया। उन्होंने समझाया कि स्वस्तिक होता क्या है।

कनाडाई सांसद ने कहा, “मैं संसद के सभी सदस्यों से आग्रह करता हूँ कि वो हिन्दुओं के धार्मिक और पवित्र चिह्न स्वस्तिक और नाजियों के घृणा भरे निशान, जिसे जर्मनी में ‘Hakenkreuz (हकेनक्रेज)’ और अंग्रेजी में ‘Hooked Cross’ कहा जाता है – इन दोनों के बीच के अंतर को समझें। प्राचीन भारतीय भाषा संस्कृत में स्वस्तिक का अर्थ होता है – जो अच्छा सौभाग्य लेकर आए और कल्याण करे। ये एक प्राचीन और काफी पवित्र प्रतीक चिह्न है।”

उन्होंने संसद में कहा कि आज भी हिन्दू इसका प्रयोग करते हैं और हमारे हिन्दू मंदिरों, शुभ कार्यक्रमों (धार्मिक एवं सांस्कृतिक), घर में घुसने वाले दरवाजों एवं हमारे दैनिक जीवन में भी ‘स्वस्तिक’ चिह्न का उपयोग किया जाता है। उन्होंने कहा, “कृपया नाजियों के निशान को ‘स्वस्तिक’ कहना बंद कीजिए।” चंद्र आर्य ने स्पष्ट किया कि हम नाजी प्रतीक ‘हकेनक्रेज’/हुक्ड क्रॉस पर प्रतिबंध का स्वागत करते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसे ‘स्वस्तिक’ बताने का अर्थ है हिन्दुओं के धार्मिक अधिकारों को छीनना।