केरल के कासरगोड स्थित श्री आनंदपद्मनाभ स्वामी मंदिर की सालों से रखवाली करने वाले ‘शाकाहारी’ मगरमच्छ बाबिया (Crocodile Babiya) का रविवार (10 अक्टूबर 2022) रात को निधन हो गया। बाबिया मंदिर के पास मृत पाया गया था। बताया जाता है कि यह मगरमच्छ मंदिर परिसर के अंदर बने तालाब में रहता था और 70 से अधिक सालों से इसकी रक्षा कर रहा था।
मंदिर के पुजारियों के अनुसार, दिव्य मगरमच्छ अपना अधिकांश समय गुफा के अंदर बिताता था। वह सिर्फ दोपहर में प्रसाद के लिए बाहर निकलता था। वहीं, मंदिर के ट्रस्टी उदयकुमार आर गैट्टी ने कहा कि बाबिया की तबीयत पिछले कुछ दिनों से खराब चल रही थी। मंगलुरु के पिलिकुला बायोलॉजिकल पार्क के पशु चिकित्सक उसकी देखभाल कर रहे थे। उन्होंने कहा, “पिछले दो दिनों से बाबिया भोजन के लिए भी नहीं आया था। जब हमने उसकी तलाश की तो वह हमें नहीं मिला। लेकिन रविवार की रात, हमने इसे झील में मृत पाया। मंदिर में उसके अंतिम संस्कार में 1000 से अधिक भक्तों के आने की उम्मीद है।” गैटी ने कहा, “बाबिया को पूरे सम्मान के साथ मंदिर के मैदान में दफनाया जाएगा।”
मंदिर प्रबंधन के अनुसार, बाबिया दिन में दो बार भगवान के दर्शन करने निकलता था। इस दौरान वह परोसे जाने वाले चावल और गुड़ के प्रसाद को ही खाकर रहता था। इसलिए उसे शाकाहारी मगरमच्छ कहा जाता है। मगरमच्छ बाबिया तालाब में रहने के बावजूद मछलियाँ और दूसरे जलीय जीवों को नहीं खाता था। उसने आज तक किसी के साथ भी हिंसक व्यवहार नहीं किया था। कहा जाता है कि मगरमच्छ बाबिया उस गुफा की रक्षा करता था, जिसमें भगवान गायब हो गए थे। कोई नहीं जानता था कि बाबिया तालाब में आखिर कैसे और कहाँ से आया था। बाबिया की तस्वीरें सोशल मीडिया पर भी वायरल हो गई हैं।
Divine Crocodile Babiya which was guarding Sri Anantapura Lake Temple in #Kasaragod of Kerala is no more.
Vegetarian #Babiya lived here in the Temple lake for the last 70+ years eating the Prasadam of Sri Ananthapadmanabha Swamy.
बता दें कि यह मंदिर कासरगोड जिले के अनंतपुर नाम के छोटे से गाँव में बना है। इस मंदिर को तिरुवनंतपुरम के पद्मनाभ स्वामी के मंदिर के मूलस्थान के तौर पर जाना जाता है।
देश में सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ने की लगातार कोशिश की जा रही है। रविवार (9 अक्टूबर, 2022) को उत्तर प्रदेश के अमेठी और राजस्थान के जोधपुर में ईद मिलादुन्नबी के अवसर पर ‘सिर तन से जुदा’ के नारे लगाए गए हैं। इन नारों की वजह से समाज में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। इन दोनों ही घटनाओं पर स्थानीय पुलिस से शिकायत की गई है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उत्तर प्रदेश के अमेठी में ईद मिलादुन्नबी के मौके पर जुलूस जा रहा था। इस जुलूस में सैकड़ों की संख्या में स्थानीय लोग जुटे थे। इस जुलूस के दौरान कई लोग एकजुट होकर देश विरोधी नारों के साथ ही ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगने की खबर सामने आयी है। इस पूरी घटना का वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस से शिकायत की गई है। इस शिकायत के आधार पर पुलिस ने 9 लोगों पर नामजद तथा 10-15 अज्ञात व्यक्तियों के विरुद्ध धारा 147, 153ए, 188 व 506 आईपीसी के तहत मुकदमा दर्ज करते हुए आरोपितों की तलाश शुरू कर दी है।
प्रकरण के संबन्ध में थाना जायस पर 9 नामजद व 10-15 अज्ञात के विरूद्ध मु0अ0सं0 285/22 धारा 147,153ए,188,506 भादवि पंजीकृत कर आवश्यक विधिक कार्यवाही की जा रही है ।
इसी प्रकार, राजस्थान के जोधपुर जिले के पीपाड़ में भी ईद मिलादुन्नबी का जुलूस निकाला गया था। जहाँ इस जुलूस में इस्लाम से संबंधित नारे बाजी के बीच युवा ‘सिर तन से जुदा’ के नारे लगाते हुए देखे गए हैं। इस घटना का वीडियो भी सामने आ चुका है। सबसे बड़ी बात यह है कि जब जुलूस में ‘सिर तन से जुदा’ के नारे लगाए जा रहे थे तब वहाँ पुलिस भी मौजूद थी। हालाँकि, वहाँ खड़े सभी पुलिसकर्मी सिर्फ मूकदर्शक ही बने रहे।
इस घटना की जानकारी जब हिंदू संगठनों को हुई तो उन्होंने पुलिस को इस घटना की पूरी जानकारी देते हुए शिकायत दर्ज कराई है। इस शिकायत और वीडियो के आधार पर पुलिस रविवार रात आरोपितों की तलाश करती रही। हालाँकि, वीडियो फुटेज होने के बाद भी देर रात सिर्फ एक आरोपित को को गिरफ्तार किया है। उसकी पहचान रोशन अली सिंधी के रूप में हुई है। फिलहाल पुलिस उससे पूछताछ कर रही है।
ईद मिलादुन्नबी पर ‘सिर तन से जुदा’ के नारे लगने पर जोधपुर ग्रामीण एसपी अनिल कयाल का कहना है कि ईदमिलादुन्नबी के मौके पर पीपाड़ में निकाले गए धार्मिक जुलूस के दौरान ‘सिर तन से जुदा’ करने के नारे लगाने की शिकायत की गई थी। इसके साथ ही इस घटना का वीडियो भी पुलिस के पास था। इस वीडियो के आधार पर ही पुलिस ने मुख्य आरोपित रोशन अली की पहचान करते हुए उसे गिरफ्तार किया है।
बिग बॉस-16 में साजिद खान की एंट्री को लेकर बवाल अभी थमा नहीं है। सोशल मीडिया पर सवाल उठने के बाद दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर को पत्र लिखा है। इसमें माँग की गई है कि शो से साजिद खान को हटाया जाए।
बता दें कि साजिद खान ने बिग बॉस-16 में 1 अक्टूबर को एंट्री की थी। वो इस शो में घर के सदस्य के तौर पर आए हैं। महिला आयोग की अध्यक्ष ने पत्र में इस बात पर गौर करवाया कि कम से कम 10 महिलाएँ साजिद पर यौन शोषण के आरोप लगा चुकी हैं।
इन आरोपों के कारण उन्हें साल 2018 में हाउसफुल-4 में डारेक्टर पद से भी हटा दिया गया था। ऐसे में कुछ साल बाद उसका बिग बॉस में घर का सदस्य बनकर आना दुर्भाग्यपूर्ण है। ये शो बड़े-बच्चे सब देखते हैं ऐसे में एक यौन आरोपित को लाना बेहद गलत है।
Delhi Commission for Women (DCW) chief @SwatiJaiHind has written letter to I&B Minister Anurag Thakur demanding the removal of Sajid Khan from #BiggBoss16 over allegations of sexual harassment levelled against him by several women during the #MeToo movement
पत्र में कहा गया कि इस तरह साजिद को घर में लाना मतलब उन्हें एक अवसर देना है जिसमें वो अपने कुकर्मों पर लीपापोती कर सकें और अपने आपको भारतीय दर्शकों के सामने दोबारा आने के लिए तैयार कर सकें।
मालीवाल ने अनुरोध किया है कि अनुराग ठाकुर इस मामले में हस्तक्षेप करें और साजिद खान को पर्दे पर आने से रोकने के लिए कोई कदम उठाएँ। उन्होंने सरकार से अपील की है कि वह इस मामले में उनका साथ दें।
उनका कहना है कि इस तरह साजिद खान का शो में दाखिल करना बताता है कि कैसे इंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में अपमानजनक कृत्य करने के बावजूद कुछ मर्द बिना परिणाम भुगते बच निकलते हैं। ये उन महिलाओं का अपमान है जो यौन अपराधियों के विरुद्ध आवाज उठाती हैं। स्वाति ने अपील की है कि साजिद खान को बिग बॉस शो से बाहर किया जाए।
अपने पत्र में उन्होंने उन 10 महिलाओं के आरोपों को भी जोड़ा है जिन्होंने साजिद खान का मीटू के दौरान नाम लिया। इसमें बताया गया कि कैसे कभी साजिद ने किसी पीड़िता को जबरन किस किया, किसी से उसके अंडरगार्मेंट उताने को कहे, किसी के सामने प्राइवेट पार्ट निकाला, किसी से पूछा कि ‘क्या तुम 100 करोड़ में कुत्ते के साथ सेक्स करोगी।’
साजिद खान के ख़िलाफ़ 10 महिलाओं ने #MeToo मूव्मेंट के दौरान यौन शोषण के आरोप लगाए थे। ये सभी कम्प्लेंट साजिद की घिनौनी मानसिकता दिखाती है। अब ऐसे आदमी को Bigg Boss में जगह दी गयी है जो कि पूरी तरह ग़लत है। मैंने @ianuragthakur जी को पत्र लिखा है की साजिद खान को इस शो से हटवाएँ! pic.twitter.com/4ao9elyvkk
उल्लेखनीय है कि साजिद खान पर ‘मी टू’ (MeeToo) कैंपेन के दौरान 9-10 महिलाओं ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। इसके बाद इन आरोपों के आधार पर द इंडियन फिल्म एंड टेलीविजन डायरेक्टर्स एसोसिएशन (IFTDA) ने उनके फिल्में डायरेक्ट करने पर रोक लगा दी थी। शनिवार (1 अक्टूबर, 2022) को जब साजिद खान ‘बिग बॉस’ के मंच पर पहुँच तो उन्होंने सलमान खान (Salman Khan) से बातचीत करते हुए अपना दुखड़ा रोया। उन्होंने कहा कि कड़ी मेहनत करने के बाद भी हाउसफुल 4 का क्रेडिट उनसे छीन लिया गया और बीते 4 सालों में उन्हें किसी ने कोई काम नहीं दिया।
कुछ दिनों पहले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें मुस्लिमों को रिझाने के लिए वो रिलायंस समूह के मुखिया मुकेश अम्बानी का घर ‘एंटीलिया’ को तुड़वाने की बात कर रहे थे। केजरीवाल और उनकी पार्टी ने इससे पहले भी रमजान के मौके पर मुस्लिम कर्मचारियों को 2 घंटे की छुट्टी देकर और ‘मुस्लिमों के मसीहा जनाब केजरीवाल’ के पोस्टरों के माध्यम से मुस्लिम तुष्टिकरण के भरपूर प्रयास किए हैं।
अम्बानी का घर भी वक़्फ़ बोर्ड की प्रॉपर्टी हैं , हमारी सरकार होती अम्बानी का घर तुड़वा देती । pic.twitter.com/BO3sWVnZ4C
लेकिन, ये प्रयास नए नहीं हैं। ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ आंदोलन एवं आम आदमी पार्टी (AAP) के शुरुआती दिनों में जब बाबा रामदेव, श्री श्री रविशंकर, साध्वी ऋतम्भरा, भाजपा एवं RSS के स्वयंसेवक अपना समर्थन अन्ना एवं केजरीवाल को दे रहे थे, तब मुस्लिमों ने केजरीवाल से दूरी बना रखी थी। उस समय भी केजरीवाल और उनकी टीम ने मुस्लिमों का समर्थन लेने के लिए अफलातून प्रयास किए, लेकिन मुस्लिमों की ओर से उन्हें धोखा ही मिला।
IAC मूवमेंट में कोर टीम के सदस्य रहे एवं आप आदमी पार्टी की नेशनल एग्जीक्यूटिव कमिटी के पूर्व सदस्य मयंकगाँधी ने अपनी पुस्तक ‘AAP & Down’ में आम आदमी पार्टी की परदे के पीछे की घटनाओं का उल्लेख किया है। इस पुस्तक के तीसरे अध्याय वे लिखते हैं, “जब IAC मूवमेंट आगे बढ़ रहा था, तब लोगों के बीच ऐसी धारणा बन रही थी कि IAC एक अल्पसंख्यक-विरोधी एवं प्रो-अपर क्लास हिन्दुओं का आंदोलन है। दुर्भाग्य से कोर कमिटी में एक भी विश्वसनीय मुस्लिम या पिछड़ी जातियों का नेता नहीं था।”
वो आगे लिखते हैं, “तब मैंने स्वामी अग्निवेश को कॉल किया और पूछा, यदि वे महाराष्ट्र से किसी राष्ट्रवादी मुस्लिम नेता को जानते हैं जो हमारे साथ जुड़ सके। तब स्वामी अग्निवेश ने एक मैगज़ीन के एडिटर जावेदआनंद के बारे में बताया। मैंने तुरंत ही जावेद से पूछा यदि वह कुछ अच्छे मुस्लिम नेताओं के नाम सुझा सकें। इसके दो दिन बाद, 14 अप्रैल 2011 को मैंने The Indian Express में उसी जावेद आनंद का सम्पादकीय पढ़ा जिसमें वह दावा कर रहा था कि मैं (मयंक गाँधी) मुस्लिमों को अच्छे और बुरे की श्रेणी में बाँट रहा हूँ। यह पढ़कर मैं हक्का-बक्का रह गया।”
मयंक गाँधी की पुस्तक का हिस्सा
दूसरा किस्सा 2014 के लोकसभा चुनाव का है, जब मयंक गाँधी ने महाराष्ट्र की नॉर्थ-वेस्ट मुंबई की सीट से आम आदमी पार्टी की ओर से चुनाव लड़ा था। मयंक लिखते हैं, “चुनाव प्रचार के दौरान मैं अल्पसंख्यक समुदाय के नेताओं के पास पहुँचा। मैंने उनको कहा कि आम आदमी पार्टी के पास मुस्लिम समुदाय के लिए तीन बेहतरीन एजेंडा हैं। एक, जिन मुस्लिम युवाओं को आतंकवाद के मामलों में फ्रेम किया गया है उनके केसेस को फ़ास्ट-ट्रेक में ले जाना और जो वास्तव में दोषी है उसे सा दिलवाना। दूसरा, गरीबी दूर करना और तीसरा, मुस्लिम नेताओं को पार्टी की निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल करना।”
AAP में मयंक गाँधी के अनुभव, जो उन्होंने पुस्तक में लिखा
मयंक बताते हैं कि मुस्लिम नेताओं द्वारा तीनों सुझावों का दिल खोल के स्वागत किया गया। लेकिन, चुनाव के ठीक एक दिन पहले, मुस्लिमों के लिए मस्जिदों एवं मदरसों से कॉन्ग्रेस को ही वोट देने के का फरमान जारी किया गया। जब परिणाम आए तो मयंक के चुनावी-क्षेत्र से शिवसेना जीत चुकी थी। दूसरे क्रम पर कॉन्ग्रेस थी और AAP के मयंक मात्र 50,000 के वोट के साथ चौथे क्रम पर थे। मयंक की जमानत भी जब्त हो चुकी थी।
बिहार के दो जिलों से राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा का अपमान करने का मामला सामने आया है। ईद मिलादुन्नबी (पैगंबर मुहम्मद के जन्मदिवस) के जुलूस के दौरान रविवार (9 अक्टूबर, 2022) को सिवान में तिरंगे झंडे से अशोक चक्र को हटाकर इसकी जगह दो तलवारों के चिह्न वाला तिरंगा लहराया गया। वहीं, शिवहर में अशोक चक्र की जगह चाँदनुमा आकार वाले झंडे के साथ जुलूस निकाला गया। इसका वीडियो वायरल होने के बाद लोगों में खासा आक्रोश है। विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने इस घटना को राष्ट्रद्रोह और तिरंगे का अपमान बताते हुए दोषियों के खिलाफ जल्द से जल्द कार्रवाई करने की माँग की है।
ईद मिलाद उल नबी के जुलूस में तिरंगे का अपमान, अशोक चक्र की जगह बने थे तलवार और लिखा था ‘आमद मरहबा’ – बिहार के सिवान जिला के एमएच नगर हसनपुरा थाना क्षेत्र के अरंडा की घटना।@NitishKumar@HMOIndiapic.twitter.com/FuD9tzQwwS
रिपोर्ट्स के मुताबिक, सिवान और शिवहर में ईद मिलादुन्नबी के दौरान राष्ट्रीय ध्वज के अपमान का मामला तूल पकड़ने के बाद दोनों जिले की पुलिस जाँच में जुट गई है। शिवहर में आरोपितों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। सदर एसडीओ ने बताया कि मामले की जाँच चल रही है। इस दौरान एक युवक को हिरासत में भी लिया गया है। वहीं कुछ लोगों का कहना है कि यह किसी पार्टी विशेष का भी झंडा हो सकता है, क्योंकि बिना अशोक चक्र के तिरंगा झंडा राष्ट्रीय ध्वज नहीं हो सकता।
#बिहार#शिवहर मुस्लिम समुदाय के द्वारा जिला मुख्यालय पर जुलूस निकाला गया जिसमे एक युवक के हाथ में #तिंरगा झंडा के बीच से अशोक #चक्र हटाकर और चांद नुमा आकार बनाकर जुलूस के साथ पूरे रास्ते में लहराते हुए ले जाया गया… pic.twitter.com/OZpb1eTWkD
शिवहर का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। जुलूस में तिंरगे के बीच से अशोक चक्र हटाकर और चाँदनुमा आकार का झंडा बनाया गया था। यह झंडा जुलूस के साथ पूरे रास्ते में लहराते हुए नजर आया। एसपी अनन्त कुमार राय ने कहा कि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इसकी जानकारी मिलने के बाद भाजपा जिलाध्यक्ष संजीव कुमार पांडेय ने जिलाधिकारी मुकुल गुप्ता से कहा कि तिंरगे का अपमान बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। ऐसे असामाजिक तत्वों पर राष्ट्रद्रोह की धारा के तहत मुकदमा दर्ज किया जाए।
इसके बाद डीएम मुकुल गुप्ता ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जाँच के आदेश दिए है। जाँच की जिम्मेदारी सदर एसडीओ मोहम्मद इश्तियाक अली अंसारी और डीएसपी को सौंपी गई है। इस मामले में विश्व हिंदू परिषद के जिलाध्यक्ष अशोक उपाध्याय ने कहा, “हम इस तरह के राष्ट्र विरोधी कुकृत्य की घोर निंदा करते हैं और जिला प्रशासन से आग्रह करते हैं कि इन असामाजिक तत्वों को चिन्हित कर कड़ी से कड़ी कानूनी कार्रवाई करें, ताकि भविष्य में कोई भी इस तरह की घटनाओं को दोहरा ना सके।”
बता दें कि जून 2022 में भी तेलंगाना के महबूबनगर से इसी तरह राष्ट्रीय ध्वज की एक हैरान करने वाली तस्वीर सामने आई थी। महबूबनगर में बीजेपी की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा की विवादित टिप्पणी को लेकर प्रदर्शन किया गया था। विरोध के दौरान प्रदर्शनकारियों ने तिरंगे का अपमान किया था। इसमें अशोक चक्र की जगह ‘कलमा’ लिखा हुआ था। अशोक पंडित ने इस तस्वीर को अपने ट्विटर हैंडल पर साझा किया था।
आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल अपने झूठे दावों और गलत बयानों के चलते हमेशा ही सुर्खियों में बने रहते हैं। गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले अरविंद केजरीवाल कई बेतुके बयान दे चुके हैं। उनके एक बयान को लेकर पंजाब के किसान संगठनों व विपक्षी दल भाजपा व शिरोमणि अकाली दल ने कहा है कि केजरीवाल और भगवंत मान ने एमएसपी पर जनता को गुमराह किया है।
दरअसल, अरविंद केजरीवाल ने शनिवार (8 अक्टूबर, 2022) को कहा था कि आम आदमी पार्टी की सरकार पंजाब में 5 फसलों पर एमएसपी दे रही है। यदि गुजरात की जनता विधानसभा चुनाव में आप को वोट देती है तो यहाँ के किसानों को भी इन फसलों पर एमएसपी मिलेगा।
केजरीवाल के इस बयान पर पंजाब के किसान संगठनों ने आरोप लगाया है कि केजरीवाल और पंजाब के सीएम भगवंत मान गुजरात के लोगों को गुमराह कर रहे हैं। किसान संगठनों का कहना है कि केंद्र सरकार द्वारा गेहूँ, धान और कपास पर एमएसपी प्रदान किया जाता है, जबकि मक्का पर कोई एमएसपी नहीं है। यह भी कहा गया है कि सरकार द्वारा मूँग के लिए एमएसपी की घोषणा की गई थी, लेकिन इसके बाद भी किसानों को मूँग की फसल कम कीमत पर बेचनी पड़ी है।
भारतीय किसान यूनियन एकता उगराहां के अध्यक्ष जोगिंदर सिंह उगराहन ने कहा कि आप सरकार ने मूँग पर एमएसपी देने वादा किया था, लेकिन किसानों को नहीं मिला। वह सभी फसलों पर एमएसपी की माँग कर रहे हैं, लेकिन यह पंजाब में गेहूँ और धान से आगे नहीं जा रहा है। कपास के अलावा किसी अन्य फसल को वह मूल्य नहीं मिला है, एमएसपी किसानों को हक है।
वहीं, ‘भारतीय किसान यूनियन एकता डकौंडा’ के उपाध्यक्ष मनजीत सिंह धनेर का कहना है कि केजरीवाल का पंजाब में पाँच फसलों पर एमएसपी का दावा हास्यास्पद और पूरी तरह झूठा है। इसके अलावा, भाजपा नेता हरजीत सिंह ग्रेवाल ने कहा कि आप (AAP) लगातार झूठ बोल रही है और झूठे दावे कर रही है जैसे वह दिल्ली में करती है। केजरीवाल और भगवंत मान को फसलों पर एमएसपी देने के लिए भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के योगदान के बारे में बताना चाहिए और लोगों को गुमराह करना बंद करना चाहिए।
शिरोमणि अकाली दल के प्रवक्ता और पूर्व कैबिनेट मंत्री दलजीत सिंह चीमा ने कहा है कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि अरविंद केजरीवाल गुजरात में दावा कर रहे हैं कि पंजाब में आप की सरकार 5 फसलों पर एमएसपी दे रही है तथा गुजरात में सरकार बनने पर यही फॉर्मूला दोहराया जाएगा।
उन्होंने कहा, “सच तो यह है कि केन्द्र सरकार भारतीय खाद्य निगम के माध्यम से पंजाब में एमएसपी पर गेंहू और धान की खरीद कर रही है। इसी प्रकार ही कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया से कपास की खरीद करता है। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने किसानों से मूँग की बुवाई करने का आग्रह किया था और पूरी फसल को 7250 रुपए में खरीदने का वादा किया था। लेकिन, उन्होंने इस फसल का दस फीसदी भी नहीं खरीदा। पंजाब सरकार भी मक्का की फसल खरीदने से मुकर गई तथा किसानों को भाग्य के सहारे छोड़ दिया।”
अकाली दल के नेता चीमा ने यह भी कहा कि केजरीवाल से गुजरात के किसानों को झूठी उम्मीदें नही देने की अपील करते हुए कहा कि गुजरात के किसानों को पंजाब में आकर जमीनी हकीकत खुद देखनी चाहिए। पंजाब के किसान कर्जदार हैं क्योंकि उन्होंने आप पार्टी की सरकार पर विश्वास करके बड़े पैमाने पर मक्का और मूँग की फसल की बुवाई की थी।
दलजीत सिंह चीमा ने यह भी कहा कि सभी फसलों पर एमएसपी देना तो दूर की बात है। पंजाब सरकार ने अब तक उन किसानों को मुआवजा तक नहीं दिया, जिनकी फसल बेमौसम बारिश के कारण बर्बाद हो गई थी। सरकार ने किसानों को मौजूदा धान की फसल में बड़े पैमाने पर हुए नुकसान का भी कोई मुआवजा भी नहीं दिया है।
महाराष्ट्र में शिवसेना के दो गुट बँटने के बाद पार्टी का मुखपत्र ‘सामना’ उद्धव ठाकरे की ओर से मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के लिए जहर उगल रहा है। हाल में ‘सामना’ में प्रकाशित लेख में सीएम शिंदे को राक्षस कहा गया। इसमें लिखा गया कि ऐसा दानव 5 हजार सालों में भी नहीं देखा गया।
उद्धव के गुट ने मुख्यमंत्री शिंदे की तुलना उस अफजल से की जो एक मुगल था और जिसे छत्रपति शिवाजी को मारने के लिए भेजा गया था।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, मुखपत्र में कहा गया कि शिंदे गुट ने बाला साहेब ठाकरे की विरासत पर धब्बा लगाया है। सीएम और उनके विधायकों की वजह से शिवसेना और मराठी लोग कमजोर हुए हैं। लेकिन पार्टी की लड़ाई इस तरह खत्म नहीं होगी। वह लोग उठेंगे और दुश्मनों को अपने पैरों पर झुकाएँगे।
बता दें कि शिवसेना के दो गुटों में बँटने के बाद चुनाव चिह्न को लेकर लड़ाई चल रही थी। विवाद था कि कौन सा गुट शिवसेना के चिह्न का इस्तेमाल करेगा। ऐसे में चिह्न को फ्रीज कर दिया गया और निर्वाचन आयोग ने दोनों धड़ों को उपलब्ध चिह्नों में से तीन चिह्न और तीन नाम चुनकर उन्हें 10 अक्टूबर को 1 बजे से पहले बताने को कहा है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ठाकरे गुट अब ‘शिवसेना बालासाहेब ठाकरे’ दूसरे विकल्प के तौर पर ‘शिवसेना उद्धव बाला साहेब ठाकरे’ और तीसरे विकल्प के तौर पर ‘शिवसेना प्रबोधन ठाकरे’ नाम से चुनावी मैदान में उतर सकता है।
ट्विटर हैंडल पर ठाकरे गुट का कब्जा
उल्लेखनीय है कि शिवसेना का आधिकारिक ट्विटर हैंडल फिलहाल उद्धव गुट ही प्रयोग कर रहा है। ‘@ShivSena’ नाम का ये हैंडल वेरिफाइड है, और इस पर लगभग 8.14 लाख फॉलोवर्स हैं। इस हैंडल की प्रोफ़ाइल फोटो में अभी भी तीर कमान का चित्र बना हुआ है और कवर पर उद्धव ठाकरे की फोटो लगी हुई है। 6 अक्टूबर 2022 को इस हैंडल से बाकायदा ट्वीट भी किया गया है जिसमें, किसी पर इशारा करते हुए आज के 50 हाथों वाला रावण बताया गया है।
परंपरेनुसार दसरा मेळाव्यानंतर रावण दहन झाले..पण यावेळचा रावण वेगळा होता. जसा काळ बदलतो तसा रावण ही बदललेला आहे. दहा डोक्याचा नाही तर 50 खोक्यांचा खोकासूर आहे, धोकासूर आहे. pic.twitter.com/LZVh9fIuGs
बता दें कि शिवसेना को तीर-कमान का सिंबल अक्टूबर 1989 में मिला था। इस स पहले शिवसेना रेल इंजन, नारियल पेड़, कप-प्लेट, ढाल-तलवार और मशाल जैसे निशानों पर चुनाव लड़ चुकी है।
राजस्थान के सीकर जिले में तीन तलाक (Triple Talaq) के मुद्दे पर आयोजित भाजपा के ‘थैंक यू मोदी’ कार्यक्रम में जमकर हंगामा किया गया। कार्यक्रम में मुस्लिम महिलाओं के पहुँचने से नाराज लोगों को यहाँ कुर्सियाँ फेंकते और पोस्टर फाड़ते हुए देखा गया। इस घटना का वीडियो भी सामने आया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सीकर जिले के रानोली कस्बे में तीन तलाक कानून के तीन साल पूरे होने पर रविवार (9 अक्टूबर 2022) को मैरिज गार्डन में दोपहर तीन बजे ‘थैंक यू मोदी’ कार्यक्रम रखा गया था। महिलाओं का यहाँ एक बजे से ही आना शुरू हो गया। इसी दौरान सैंकड़ों लोग वहाँ पहुँच गए। इन लोगों ने यहाँ जमकर हंगामा किया। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा नेताओं ने स्वरोजगार के लिए सिलाई मशीन बाँटने के नाम पर मुस्लिम महिलाओं को यहाँ धोखे से बुलाया।
यही नहीं, इन लोगों ने कार्यक्रम में पहुँची भाजपा प्रदेश मंत्री मधु कुमावत के खिलाफ भी जमकर प्रदर्शन किया। सूचना पाकर मौके पर पहुँची पुलिस ने किसी तरह कुमावत को प्रदर्शनकारियों के बीच से बाहर निकाला। भाजपा प्रदेश मंत्री ने इस घटना को कॉन्ग्रेस की साजिश करार दिया है। उन्होंने प्रदर्शनकारियों पर कार्यक्रम में पहुँची महिलाओं और भाजपा कार्यकर्ताओं को जान से मारने की धमकी देने का आरोप लगाया है। साथ ही रानोली थाने में इनके खिलाफ केस भी दर्ज करवाया है।
प्रदेश मंत्री मधु कुमावत ने अपनी शिकायत में बताया कि मैरिज गार्डन में आयोजित कार्यक्रम में करीब 150 महिलाएँ पहुँची थीं। तभी करीब 400 से 500 लोग वहाँ पहुँचे और हंगामा करने लगे। कुमावत का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों ने खाली कुर्सियाँ फैंकी। भाजपा के तीन कार्यकर्ताओं के साथ मारपीट की, जिन्होंने खिड़की से कूदकर अपनी जान बचाई। उन्होंने अपनी शिकायत में हमीद मौलवी, आसिफ, रोशन, नयुम, मुजफ्फर व इशाक को मुख्य आरोपित बताया है।
कुमावत का दावा है कि यह हंगामा कॉन्ग्रेस की साजिश हिस्सा है। मुस्लिम वोट भाजपा की तरफ खिंचता देख स्थानीय विधायक की शह पर ये बवाल किया गया। कॉन्ग्रेस पार्टी तीन तलाक के मुद्दे को धर्म से जोड़ते हुए लोगों को बरगलाने का काम कर रही है।
लखनऊ से साफ निर्देश है कि भीड़ किसी भी कीमत पर सड़कों पर नहीं बैठेगी।
लखनऊ की कुर्सी पर कौन बैठा था? वह ऐसे आदेश क्यों दे रहा था? कट्टरपंथियों का मसीहा बनने के लिए उसकी होड़ किससे लगी थी? इन सबसे पहले यह जानते हैं कि अयोध्या में 1990 की 2 नवंबर को क्या हुआ था?
सुबह के नौ बजे थे। कार्तिक पूर्णिमा पर सरयू में स्नान कर साधु और रामभक्त कारसेवा के लिए रामजन्मभूमि की ओर बढ़ रहे थे। पुलिस ने घेरा बनाकर रोक दिया। वे जहाँ थे, वहीं सत्याग्रह पर बैठ गए। रामधुनी में रम गए।
फिर आईजी ने ऑर्डर दिया और सुरक्षा बल एक्शन में आ गए। आँसू गैस के गोले दागे गए। लाठियाँ बरसाई गईं। लेकिन रामधुन की आवाज बुलंद रही। रामभक्त न उत्तेजित हुए, न डरे और न घबराए। अचानक बिना चेतावनी के उन पर फायरिंग शुरू कर दी गई। गलियों में रामभक्तों को दौड़ा-दौड़ा कर निशाना बनाया गया।
3 नवंबर 1990 को जनसत्ता में छपी एक रिपोर्ट में लिखा गया:
“राजस्थान के श्रीगंगानगर का एक कारसेवक, जिसका नाम पता नहीं चल पाया है, गोली लगते ही गिर पड़ा और उसने अपने खून से सड़क पर लिखा सीताराम। पता नहीं यह उसका नाम था या भगवान का स्मरण। मगर सड़क पर गिरने के बाद भी सीआरपीएफ की टुकड़ी ने उसकी खोपड़ी पर सात गोलियाँ मारी।”
3 नवंबर 1990 को जनसत्ता में छपी रिपोर्ट
इस घटना का उस समय की मीडिया रिपोर्टिंग से लिए गए कुछ और विवरण पर गौर करिए:
पुलिस और सुरक्षा बल न खुद घायलों को उठा रहे थे और न किसी दूसरे को उनकी मदद करने दे रहे थे।
फायरिंग का लिखित आदेश नहीं था। फायरिंग के बाद जिला मजिस्ट्रेट से ऑर्डर पर साइन कराया गया।
किसी भी रामभक्त के पैर में गोली नहीं मारी गई। सबके सिर और सीने में गोली लगी।
तुलसी चौराहा खून से रंग गया। दिगंबर अखाड़े के बाहर कोठारी बंधुओं को खींचकर गोली मारी गई।
राम अचल गुप्ता का अखंड रामधुन बंद नहीं हो रहा था, उन्हें पीछे से गोली मारी गई।
रामनंदी दिगंबर अखाड़े में घुसकर साधुओं पर फायरिंग की गई।
कोतवाली के सामने वाले मंदिर के पुजारी को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया गया।
रामबाग के ऊपर से एक साधु आँसू गैस से परेशान लोगों के लिए बाल्टी से पानी फेंक रहे थे। उन्हें गोली मारी गई और वह छत से नीचे आ गिरे।
फायरिंग के बाद सड़कों और गलियों में पड़े रामभक्तों के शव बोरियों में भरकर ले जाए गए।
2 नवंबर 1990 को विनय कटियार के नेतृत्व में दिगंबर अखाड़े की तरफ से हनुमानगढ़ी की ओर जो कारसेवक बढ़ रहे थे, उनमें 22 साल के रामकुमार कोठारी और 20 साल के शरद कोठारी भी शामिल थे। सुरक्षा बलों ने फायरिंग शुरू की तो दोनों पीछे हटकर एक घर में जा छिपे।
सीआरपीएफ के एक इंस्पेक्टर ने शरद को घर से बाहर निकाल सड़क पर बिठाया और सिर को गोली से उड़ा दिया। छोटे भाई के साथ ऐसा होते देख रामकुमार भी कूद पड़े। इंस्पेक्टर की गोली रामकुमार के गले को भी पार कर गई।
साभार: अयोध्या का चश्मदीद
कितने रामभक्त बलिदान हुए?
जनसत्ता में अगले दिन छपी खबर में बलिदानियों की संख्या 40 बताई गई थी। साथ ही लिखा गया था कि 60 बुरी तरह जख्मी हैं और घायलों का कोई हिसाब नहीं है। मौके पर रहे एक पत्रकार ने मृतकों की संख्या 45 बताई थी।
दैनिक जागरण ने 100 की मौत की बात कही थी। दैनिक आज ने यह संख्या 400 बताई थी। आधिकारिक तौर पर बाद में मृतकों की संख्या 17 बताई गई। हालाँकि घटना के चश्मदीदों ने कभी भी इस संख्या को सही नहीं माना।
दिलचस्प यह है कि घटना के फौरन बाद प्रशासन ने अपनी ओर से कोई आँकड़े तो नहीं दिए थे, लेकिन मीडिया के आँकड़ों का खंडन भी नहीं किया था। यहाँ तक कि फैजाबाद के तत्कालीन आयुक्त मधुकर गुप्ता तो फायरिंग के घंटों बाद तक यह नहीं बता पाए थे कि कितने राउंड गोली चलाई गई थी। उनके पास मृतकों और जख्मी लोगों का आँकड़ा भी नहीं था।
जनसत्ता ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट शब्दों में लिखा था, “निहत्थे कारसेवकों पर गोली चलाकर प्रशासन ने जलियांवाले से भी जघन्य कांड किया है।”
कुछ महीने पहले तक एक समुदाय विशेष के लोगों को देश की राजधानी की सड़क पर डेरा जमाए बैठे देखने वाले लोगों को शायद यकीन न हो कि 1990 में इस घटना को तब अंजाम दिया गया था, जब प्रशासन को काफी पहले से अयोध्या में कारसेवकों के जुटान और निश्चित तारीख को कारसेवा की पहले से सूचना थी। यहाँ तक कि 30 अक्टूबर 1990 के दिन भी कारसेवकों पर गोलियाँ बरसाई गई थी। आधिकारिक आँकड़े 30 अक्टूबर को 5 रामभक्तों के बलिदान की पुष्टि करते हैं।
किस सनक में यह सब कुछ हुआ?
असल में 25 सितंबर 1990 को एक रथ यात्रा शुरू हुई थी। सोमनाथ से शुरुआत हुई और 30 अक्टूबर को अयोध्या पहुँच यात्रा खत्म होनी थी। मकसद था- रामजन्मभूमि को वापस पाने के संघर्ष को जन-जन का संघर्ष बनाना। हिंदुओं को अपने गौरव और अपनी पहचान को लेकर जिंदा करना।
उस समय के प्रधानमंत्री वीपी सिंह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह के बीच एक-दूसरे को नीचा दिखाने का खेल चल रहा था। यात्रा शुरू होते ही मुलायम ने इसे खुद को खास मजहब का सबसे बड़ा मसीहा साबित करने के मौके के तौर पर देखा। लिहाजा रथ के पहियों के साथ ही हिंदुओं को उनका धमकाना शुरू हो गया था। उन्होंने बकायदा ऐलान किया था कि आडवाणी अयोध्या में घुस कर दिखाएँ, फिर वे बताएँगे कानून क्या होता है। उनकी इस बयानबाजी का एक मकसद उत्तेजना पैदा करना भी था।
इधर वीपी सिंह नहीं चाहते थे कि मुलायम अकेले मजहब के मसीहा बने। सो उनके इशारे पर तब के बिहार के मुख्यमंत्री लालू यादव ने आडवाणी को समस्तीपुर में 23 अक्टूबर की सुबह गिरफ्तार करवाया। इससे एक दिन पहले वीपी सिंह की सरकार ने 20 अक्टूबर की रात लागू किया गया अध्यादेश वापस लिया था।
इस अध्यादेश में विवादित ढाँचे और उसके चारों तरफ 30 फीट जमीन छोड़कर अधिग्रहित जमीन रामजन्मभूमि न्यास को सौंपने की बात कही थी। हालाँकि इसके लिए भी समुदाय के नुमाइंदे राजी नहीं थे और उनका हीरो बनने के लिए मुलायम ने भी अध्यादेश को लागू नहीं करने की धमकी दी थी।
लेकिन, आडवाणी की गिरफ्तारी ने मुलायम के खेल को बिगाड़ दिया। इधर लालू रातोंरात मजहब विशेष के हीरो बन गए। बाद में उन्होंने माई समीकरण भी गढ़ा। अब मुलायम के पास एक ही विकल्प बचा था कुछ ऐसा करना, जिससे समुदाय में उनकी हनक बने। इसी सनक में 30 अक्टूबर और 2 नवंबर को अयोध्या को रामभक्तों के खून से रंग दिया गया और लखनऊ से वह ऑर्डर दिया गया, जिसका जिक्र आईजी सिन्हा अपने मातहतों से कर रहे थे।
इस ऑर्डर से मुलायम को मौलाना मुलायम की उपाधि नसीब हुई। 2017 में अपनी इस करतूत का बखान करते हुए उन्होंने कहा था कि यदि जरूरत पड़ती तो और लोगों को भी मारा जाता। लालू और मुलायम ने उन कारनामों से सालों सत्ता का सुख भी भोगा। बाद में समधी भी बने। पर आज एक जेल में अपना किया भोग रहा है, तो दूसरा बेटे का मारा भोग रहा है। और गुमनाम रामभक्तों के उस बलिदान यात्रा से अयोध्या भव्य श्रीराम मंदिर की यात्रा की ओर बढ़ रहा है।
30 अक्टूबर और 2 नवंबर 1990 को अयोध्या जय सियाराम और हर-हर महादेव के जयकारे से गूंजायमान था। 5 अगस्त 2020 फिर उसका साक्षी बनेगा। उस समय विहिप के नेता एससी दीक्षित ने कहा था:
“राम हमारे खून में हैं। उनके जन्मस्थान के क्या मायने हैं, यह हिंदू होकर ही जाना जा सकता है।”
हिंदुओं को इसका एहसास करने के लिए किसी जमशेद या फैज की जरूरत नहीं है। न यह जानने की जरूरत है कि उनके पूर्वज कौन थे।
[यह आर्टिकल पहली बार 4 अगस्त 2020 को प्रकाशित हुआ था। मुलायम सिंह यादव के निधन होने पर इसे 10 अक्टूबर 2022 को पुनः प्रकाशित किया गया।]
कर्नाटक के बीदर में स्थित महमूद गेवान मदरसा में 6 अक्टूबर 2022 को प्रवेश करने वाले 9 हिंदुओं पर एफआईआर दर्ज की गई। उन पर महमूद गेवान मदरसा और मस्जिद में ताला तोड़कर प्रवेश करने और पूजा करने का आरोप लगाया गया है, लेकिन सच्चाई इन आरोपों से कोसों दूर है।
दरअसल, मदरसा पहले एक हिंदू मंदिर था। यही कारण है कि हिंदू समुदाय के लोग कई वर्षों से यहाँ पूजा-अर्चना करते आ रहे हैं। इसकी प्रमाणिकता सिद्ध करने के लिए @Bharadwajagain नाम के एक ट्विटर यूजर ने सिलसिलेवार कई ट्वीट किए हैं। इसमें उन्होंने उन सभी तथ्यों और साक्ष्यों का जिक्र किया है, जो यह बताते हैं कि यह मदरसा पहले कभी एक हिंदू मंदिर था।
This Madrasa was once a Hindu temple.
A Persian Tyrant, Mahmud Gawan became Bahmani Prime minister. He urged the king to kiII Brahmins as an act of piety.He built this Madrasa after destroying temple.
The local Hindus never stopped their tradition of performing Puja every year. https://t.co/ZHRdkgXYqE
मदरसे का निर्माण दक्कन की इंडो-इस्लामिक वास्तुकला शैली में किया गया है। यूनेस्को ने 2014 में इसे विश्व धरोहर स्थलों की अस्थायी सूची में शामिल किया था। भारद्वाज के मुताबिक, इसका इतिहास रक्तरंजित रहा है।
बताया जाता है कि 15वीं शताब्दी में मुहम्मद बिन तुगलक (Muhammad Bin Tuglaq) के शासन काल के आखिरी दौर में दक्षिण भारत में बहमनी सल्तनत की स्थापना की गई थी। बहमनी स्वयंभू फारसी थे। इन दावों के उलट ऐसी भी संभावना है कि सभी बहमनी हिंदू धर्मांतरित थे और उनके संस्थापक हसन गंगू भी हिंदू समुदाय से थे। इसलिए, उन्होंने अपने पूर्व धर्म की कई मान्यताओं को आगे बढ़ाया।
ध्यान दें कि बहमनी ब्राह्मणों को नहीं मारना चाहते थे । लेकिन इस सल्तनत में महमूद गेवान (Mahmud Gavan) के आने के साथ कुछ बदल गया। गेवान एक विदेशी था और वह ब्राह्मणों को मारने और मंदिरों को नष्ट करने के पक्ष में था।
The Mahmud Gawan Madrasa is a majestic structure built in the Indo-Islamic architectural style of Deccan.
It was also on the tentative list of UNESCO world heritage sites.
रिपोर्ट्स के मुताबिक, वह मुख्य रूप से ईरान के पारसी समुदाय से आता था। महमूद गेवान को एक और नाम से जाना जाता है और वो नाम है ख्वाजा महमूद गिलानी। मुगलकालीन साहित्य तारिख-ए-फ़रिश्ता के अनुसार, उसने ही बहमनी राजा (Bahmani king) से मंदिरों को नष्ट करने और ब्राह्मणों को मारने को कहा था। उसके लिए यह एक पुण्य का कार्य था। इसके बाद बहमनी राजा ने गेवान से प्रभावित होकर ब्राह्मणों को मौत के घाट उतार दिया और राजा को गाजी की उपाधि दी गई।
कर्नाटक के बीदर में महमूद गेवान मदरसा मूल रूप से एक हिंदू मंदिर था, जिसे महमूद शाह ने नष्ट कर दिया था। गेवान की सलाह मानकर महमूद शाह एक ब्राह्मण को मारने वाले बहमनी सल्तनत के पहले राजा बने। वहीं, अभिलेखों के अनुसार, उसने मंदिर के स्थान पर एक मस्जिद बनाने का आदेश दिया। इसके बाद महमूद गेवान ने स्वयं कहा था कि महमूद शाह ने काफिरों (ब्राह्मणों) को अपने हाथों से मार डाला था।
तारिख-ए-फ़रिश्ता के मुताबिक, महमूद शाह की सूची में मारने वाले लोगों में ब्राह्मणों का पहला स्थान था। हालाँकि, दक्कन के कई लोगों को पहले से ही इसका आभास हो गया था कि यह कुकृत्य घातक साबित होगा। उनका मानना था कि इससे बहमनी साम्राज्य का पतन होगा। जल्द ही यह सब हो गया।
मुगलकालीन साहित्य तारिख-ए-फ़रिश्ता खंड II का अंश
विशेष रूप से, इस स्मारक को सीताराम गोयल की पुस्तक ‘Hindu Temples: What Happened To Them’ में स्थान मिला। पुस्तक के खंड I में, बीदर जिले में हिंदू मंदिर को नष्ट कर उसके स्थान पर बने मदरसे को एक स्मारक के रूप में नामित किया गया है।
सीताराम गोयल की पुस्तक Hindu Temples: What Happened To Them के खंड- I का अंश
हिंदू यहाँ सदियों से पूजा करते आ रहे
बता दें कि इस मंदिर को नष्ट कर उसके स्थान पर एक मदरसा बना दिया गया था। इसके बावजूद इस क्षेत्र के हिंदुओं ने इस मंदिर में कभी भी पूजा-अर्चना करना नहीं छोड़ा। इस मामले में पुलिस का कहना है कि सदियों से यहाँ दशहरे के मौके पर पूजा करने की परंपरा चलती आ रही है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि असदुद्दीन ओवैसी जैसे मुस्लिम नेता जो दावा कर रहे हैं, वह बेबुनियाद है। किसी ने भी मस्जिद में अवैध रूप से प्रवेश नहीं किया और ना ही ताला तोड़ने का प्रयास किया।