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5 हजार सालों में कभी नहीं आया ‘शिंदे’ जैसा राक्षस: शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ में महाराष्ट्र CM पर निशाना, छत्रपति शिवाजी को मारने आए ‘अफजल’ से तुलना

महाराष्ट्र में शिवसेना के दो गुट बँटने के बाद पार्टी का मुखपत्र ‘सामना’ उद्धव ठाकरे की ओर से मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के लिए जहर उगल रहा है। हाल में ‘सामना’ में प्रकाशित लेख में सीएम शिंदे को राक्षस कहा गया। इसमें लिखा गया कि ऐसा दानव 5 हजार सालों में भी नहीं देखा गया।

उद्धव के गुट ने मुख्यमंत्री शिंदे की तुलना उस अफजल से की जो एक मुगल था और जिसे छत्रपति शिवाजी को मारने के लिए भेजा गया था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, मुखपत्र में कहा गया कि शिंदे गुट ने बाला साहेब ठाकरे की विरासत पर धब्बा लगाया है। सीएम और उनके विधायकों की वजह से शिवसेना और मराठी लोग कमजोर हुए हैं। लेकिन पार्टी की लड़ाई इस तरह खत्म नहीं होगी। वह लोग उठेंगे और दुश्मनों को अपने पैरों पर झुकाएँगे।

बता दें कि शिवसेना के दो गुटों में बँटने के बाद चुनाव चिह्न को लेकर लड़ाई चल रही थी। विवाद था कि कौन सा गुट शिवसेना के चिह्न का इस्तेमाल करेगा। ऐसे में चिह्न को फ्रीज कर दिया गया और निर्वाचन आयोग ने दोनों धड़ों को उपलब्ध चिह्नों में से तीन चिह्न और तीन नाम चुनकर उन्हें 10 अक्टूबर को 1 बजे से पहले बताने को कहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ठाकरे गुट अब ‘शिवसेना बालासाहेब ठाकरे’ दूसरे विकल्प के तौर पर ‘शिवसेना उद्धव बाला साहेब ठाकरे’ और तीसरे विकल्प के तौर पर ‘शिवसेना प्रबोधन ठाकरे’ नाम से चुनावी मैदान में उतर सकता है।

ट्विटर हैंडल पर ठाकरे गुट का कब्जा

उल्लेखनीय है कि शिवसेना का आधिकारिक ट्विटर हैंडल फिलहाल उद्धव गुट ही प्रयोग कर रहा है। ‘@ShivSena’ नाम का ये हैंडल वेरिफाइड है, और इस पर लगभग 8.14 लाख फॉलोवर्स हैं। इस हैंडल की प्रोफ़ाइल फोटो में अभी भी तीर कमान का चित्र बना हुआ है और कवर पर उद्धव ठाकरे की फोटो लगी हुई है। 6 अक्टूबर 2022 को इस हैंडल से बाकायदा ट्वीट भी किया गया है जिसमें, किसी पर इशारा करते हुए आज के 50 हाथों वाला रावण बताया गया है।

बता दें कि शिवसेना को तीर-कमान का सिंबल अक्टूबर 1989 में मिला था। इस स पहले शिवसेना रेल इंजन, नारियल पेड़, कप-प्लेट, ढाल-तलवार और मशाल जैसे निशानों पर चुनाव लड़ चुकी है।

‘तीन तलाक’ हटाने के 3 साल पूरे होने पर PM मोदी को ‘थैंक यू’ कहने पहुँची थी मुस्लिम महिलाएँ, राजस्थान में इस्लामी भीड़ ने कर दिया हमला: फेंकी कुर्सियाँ, हंगामा

राजस्थान के सीकर जिले में तीन तलाक (Triple Talaq) के मुद्दे पर आयोजित भाजपा के ‘थैंक यू मोदी’ कार्यक्रम में जमकर हंगामा किया गया। कार्यक्रम में मुस्लिम महिलाओं के पहुँचने से नाराज लोगों को यहाँ कुर्सियाँ फेंकते और पोस्टर फाड़ते हुए देखा गया। इस घटना का वीडियो भी सामने आया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सीकर जिले के रानोली कस्बे में तीन तलाक कानून के तीन साल पूरे होने पर रविवार (9 अक्टूबर 2022) को मैरिज गार्डन में दोपहर तीन बजे ‘थैंक यू मोदी’ कार्यक्रम रखा गया था। महिलाओं का यहाँ एक बजे से ही आना शुरू हो गया। इसी दौरान सैंकड़ों लोग वहाँ पहुँच गए। इन लोगों ने यहाँ जमकर हंगामा किया। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा नेताओं ने स्वरोजगार के लिए सिलाई मशीन बाँटने के नाम पर मुस्लिम महिलाओं को यहाँ धोखे से बुलाया।

यही नहीं, इन लोगों ने कार्यक्रम में पहुँची भाजपा प्रदेश मंत्री मधु कुमावत के खिलाफ भी जमकर प्रदर्शन किया। सूचना पाकर मौके पर पहुँची पुलिस ने किसी तरह कुमावत को प्रदर्शनकारियों के बीच से बाहर निकाला। भाजपा प्रदेश मंत्री ने इस घटना को कॉन्ग्रेस की साजिश करार दिया है। उन्होंने प्रदर्शनकारियों पर कार्यक्रम में पहुँची महिलाओं और भाजपा कार्यकर्ताओं को जान से मारने की धमकी देने का आरोप लगाया है। साथ ही रानोली थाने में इनके खिलाफ केस भी दर्ज करवाया है।

प्रदेश मंत्री मधु कुमावत ने अपनी शिकायत में बताया कि मैरिज गार्डन में आयोजित कार्यक्रम में करीब 150 महिलाएँ पहुँची थीं। तभी करीब 400 से 500 लोग वहाँ पहुँचे और हंगामा करने लगे। कुमावत का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों ने खाली कुर्सियाँ फैंकी। भाजपा के तीन कार्यकर्ताओं के साथ मारपीट की, जिन्होंने खिड़की से कूदकर अपनी जान बचाई। उन्होंने अपनी शिकायत में हमीद मौलवी, आसिफ, रोशन, नयुम, मुजफ्फर व इशाक को मुख्य आरोपित बताया है।

कुमावत का दावा है कि यह हंगामा कॉन्ग्रेस की साजिश हिस्सा है। मुस्लिम वोट भाजपा की तरफ खिंचता देख स्थानीय विधायक की शह पर ये बवाल किया गया। कॉन्ग्रेस पार्टी तीन तलाक के मुद्दे को धर्म से जोड़ते हुए लोगों को बरगलाने का काम कर रही है।

मरते हुए सड़क पर रक्त से लिखा सीताराम, मरने के बाद भी खोपड़ी में मारी गई 7 गोलियाँ… वो एक रामभक्त था

2 नवंबर 1990, आईजी एसएमपी सिन्हा अपने मातहतों से

लखनऊ से साफ निर्देश है कि भीड़ किसी भी कीमत पर सड़कों पर नहीं बैठेगी।

लखनऊ की कुर्सी पर कौन बैठा था? वह ऐसे आदेश क्यों दे रहा था? कट्टरपंथियों का मसीहा बनने के लिए उसकी होड़ किससे लगी थी? इन सबसे पहले यह जानते हैं कि अयोध्या में 1990 की 2 नवंबर को क्या हुआ था?

सुबह के नौ बजे थे। कार्तिक पूर्णिमा पर सरयू में स्नान कर साधु और रामभक्त कारसेवा के लिए रामजन्मभूमि की ओर बढ़ रहे थे। पुलिस ने घेरा बनाकर रोक दिया। वे जहाँ थे, वहीं सत्याग्रह पर बैठ गए। रामधुनी में रम गए।

फिर आईजी ने ऑर्डर दिया और सुरक्षा बल एक्शन में आ गए। आँसू गैस के गोले दागे गए। लाठियाँ बरसाई गईं। लेकिन रामधुन की आवाज बुलंद रही। रामभक्त न उत्तेजित हुए, न डरे और न घबराए। अचानक बिना चेतावनी के उन पर फायरिंग शुरू कर दी गई। गलियों में रामभक्तों को दौड़ा-दौड़ा कर निशाना बनाया गया।

3 नवंबर 1990 को जनसत्ता में छपी एक रिपोर्ट में लिखा गया:

“राजस्थान के श्रीगंगानगर का एक कारसेवक, जिसका नाम पता नहीं चल पाया है, गोली लगते ही गिर पड़ा और उसने अपने खून से सड़क पर लिखा सीताराम। पता नहीं यह उसका नाम था या भगवान का स्मरण। मगर सड़क पर गिरने के बाद भी सीआरपीएफ की टुकड़ी ने उसकी खोपड़ी पर सात गोलियाँ मारी।”

3 नवंबर 1990 को जनसत्ता में छपी रिपोर्ट

इस घटना का उस समय की मीडिया रिपोर्टिंग से लिए गए कुछ और विवरण पर गौर करिए:

  • पुलिस और सुरक्षा बल न खुद घायलों को उठा रहे थे और न किसी दूसरे को उनकी मदद करने दे रहे थे।
  • फायरिंग का लिखित आदेश नहीं था। फायरिंग के बाद जिला मजिस्ट्रेट से ऑर्डर पर साइन कराया गया।
  • किसी भी रामभक्त के पैर में गोली नहीं मारी गई। सबके सिर और सीने में गोली लगी।
  • तुलसी चौराहा खून से रंग गया। दिगंबर अखाड़े के बाहर कोठारी बंधुओं को खींचकर गोली मारी गई।
  • राम अचल गुप्ता का अखंड रामधुन बंद नहीं हो रहा था, उन्हें पीछे से गोली मारी गई।
  • रामनंदी दिगंबर अखाड़े में घुसकर साधुओं पर फायरिंग की गई।
  • कोतवाली के सामने वाले मंदिर के पुजारी को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया गया।
  • रामबाग के ऊपर से एक साधु आँसू गैस से परेशान लोगों के लिए बाल्टी से पानी फेंक रहे थे। उन्हें गोली मारी गई और वह छत से नीचे आ गिरे।
  • फायरिंग के बाद सड़कों और गलियों में पड़े रामभक्तों के शव बोरियों में भरकर ले जाए गए।
साभार: पुस्तक अयोध्या का चश्मदीद

कोठारी बंधु भी इसी दिन बलिदान हुए

2 नवंबर 1990 को विनय कटियार के नेतृत्व में दिगंबर अखाड़े की तरफ से हनुमानगढ़ी की ओर जो कारसेवक बढ़ रहे थे, उनमें 22 साल के रामकुमार कोठारी और 20 साल के शरद कोठारी भी शामिल थे। सुरक्षा बलों ने फायरिंग शुरू की तो दोनों पीछे हटकर एक घर में जा छिपे।

सीआरपीएफ के एक इंस्पेक्टर ने शरद को घर से बाहर निकाल सड़क पर बिठाया और सिर को गोली से उड़ा दिया। छोटे भाई के साथ ऐसा होते देख रामकुमार भी कूद पड़े। इंस्पेक्टर की गोली रामकुमार के गले को भी पार कर गई।

साभार: अयोध्या का चश्मदीद

कितने रामभक्त बलिदान हुए?

जनसत्ता में अगले दिन छपी खबर में बलिदानियों की संख्या 40 बताई गई थी। साथ ही लिखा गया था कि 60 बुरी तरह जख्मी हैं और घायलों का कोई हिसाब नहीं है। मौके पर रहे एक पत्रकार ने मृतकों की संख्या 45 बताई थी।

दैनिक जागरण ने 100 की मौत की बात कही थी। दैनिक आज ने यह संख्या 400 बताई थी। आधिकारिक तौर पर बाद में मृतकों की संख्या 17 बताई गई। हालाँकि घटना के चश्मदीदों ने कभी भी इस संख्या को सही नहीं माना।

दिलचस्प यह है कि घटना के फौरन बाद प्रशासन ने अपनी ओर से कोई आँकड़े तो नहीं दिए थे, लेकिन मीडिया के आँकड़ों का खंडन भी नहीं किया था। यहाँ तक कि फैजाबाद के तत्कालीन आयुक्त मधुकर गुप्ता तो फायरिंग के घंटों बाद तक यह नहीं बता पाए थे कि कितने राउंड गोली चलाई गई थी। उनके पास मृतकों और जख्मी लोगों का आँकड़ा भी नहीं था।

जनसत्ता ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट शब्दों में लिखा था, “निहत्थे कारसेवकों पर गोली चलाकर प्रशासन ने जलियांवाले से भी जघन्य कांड किया है।”

कुछ महीने पहले तक एक समुदाय विशेष के लोगों को देश की राजधानी की सड़क पर डेरा जमाए बैठे देखने वाले लोगों को शायद यकीन न हो कि 1990 में इस घटना को तब अंजाम दिया गया था, जब प्रशासन को काफी पहले से अयोध्या में कारसेवकों के जुटान और निश्चित तारीख को कारसेवा की पहले से सूचना थी। यहाँ तक कि 30 अक्टूबर 1990 के दिन भी कारसेवकों पर गोलियाँ बरसाई गई थी। आधिकारिक आँकड़े 30 अक्टूबर को 5 रामभक्तों के बलिदान की पुष्टि करते हैं।

किस सनक में यह सब कुछ हुआ?

असल में 25 सितंबर 1990 को एक रथ यात्रा शुरू हुई थी। सोमनाथ से शुरुआत हुई और 30 अक्टूबर को अयोध्या पहुँच यात्रा खत्म होनी थी। मकसद था- रामजन्मभूमि को वापस पाने के संघर्ष को जन-जन का संघर्ष बनाना। हिंदुओं को अपने गौरव और अपनी पहचान को लेकर जिंदा करना।

उस समय के प्रधानमंत्री वीपी सिंह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह के बीच एक-दूसरे को नीचा दिखाने का खेल चल रहा था। यात्रा शुरू होते ही मुलायम ने इसे खुद को खास मजहब का सबसे बड़ा मसीहा साबित करने के मौके के तौर पर देखा। लिहाजा रथ के पहियों के साथ ही हिंदुओं को उनका धमकाना शुरू हो गया था। उन्होंने बकायदा ऐलान किया था कि आडवाणी अयोध्या में घुस कर दिखाएँ, फिर वे बताएँगे कानून क्या होता है। उनकी इस बयानबाजी का एक मकसद उत्तेजना पैदा करना भी था।

इधर वीपी सिंह नहीं चाहते थे कि मुलायम अकेले मजहब के मसीहा बने। सो उनके इशारे पर तब के बिहार के मुख्यमंत्री लालू यादव ने आडवाणी को समस्तीपुर में 23 अक्टूबर की सुबह गिरफ्तार करवाया। इससे एक दिन पहले वीपी सिंह की सरकार ने 20 अक्टूबर की रात लागू किया गया अध्यादेश वापस लिया था।

इस अध्यादेश में विवादित ढाँचे और उसके चारों तरफ 30 फीट जमीन छोड़कर अधिग्रहित जमीन रामजन्मभूमि न्यास को सौंपने की बात कही थी। हालाँकि इसके लिए भी समुदाय के नुमाइंदे राजी नहीं थे और उनका हीरो बनने के लिए मुलायम ने भी अध्यादेश को लागू नहीं करने की धमकी दी थी।

लेकिन, आडवाणी की गिरफ्तारी ने मुलायम के खेल को बिगाड़ दिया। इधर लालू रातोंरात मजहब विशेष के हीरो बन गए। बाद में उन्होंने माई समीकरण भी गढ़ा। अब मुलायम के पास एक ही विकल्प बचा था कुछ ऐसा करना, जिससे समुदाय में उनकी हनक बने। इसी सनक में 30 अक्टूबर और 2 नवंबर को अयोध्या को रामभक्तों के खून से रंग दिया गया और लखनऊ से वह ऑर्डर दिया गया, जिसका जिक्र आईजी सिन्हा अपने मातहतों से कर रहे थे।

इस ऑर्डर से मुलायम को मौलाना मुलायम की उपाधि नसीब हुई। 2017 में अपनी इस करतूत का बखान करते हुए उन्होंने कहा था कि यदि जरूरत पड़ती तो और लोगों को भी मारा जाता। लालू और मुलायम ने उन कारनामों से सालों सत्ता का सुख भी भोगा। बाद में समधी भी बने। पर आज एक जेल में अपना किया भोग रहा है, तो दूसरा बेटे का मारा भोग रहा है। और गुमनाम रामभक्तों के उस बलिदान यात्रा से अयोध्या भव्य श्रीराम मंदिर की यात्रा की ओर बढ़ रहा है।

30 अक्टूबर और 2 नवंबर 1990 को अयोध्या जय सियाराम और हर-हर महादेव के जयकारे से गूंजायमान था। 5 अगस्त 2020 फिर उसका साक्षी बनेगा। उस समय विहिप के नेता एससी दीक्षित ने कहा था:

“राम हमारे खून में हैं। उनके जन्मस्थान के क्या मायने हैं, यह हिंदू होकर ही जाना जा सकता है।”

हिंदुओं को इसका एहसास करने के लिए किसी जमशेद या फैज की जरूरत नहीं है। न यह जानने की जरूरत है कि उनके पूर्वज कौन थे।

[यह आर्टिकल पहली बार 4 अगस्त 2020 को प्रकाशित हुआ था। मुलायम सिंह यादव के निधन होने पर इसे 10 अक्टूबर 2022 को पुनः प्रकाशित किया गया।]

बीदर में जिस ‘मस्जिद’ का ताला तोड़ने का आरोप हिंदुओं पर लगा, वो कभी ‘मंदिर’ ही था: सदियों से हो रही थी थी दशहरे की पूजा, पुलिस ने खुद ओवैसी को ‘झूठा’ बताया

कर्नाटक के बीदर में स्थित महमूद गेवान मदरसा में 6 अक्टूबर 2022 को प्रवेश करने वाले 9 हिंदुओं पर एफआईआर दर्ज की गई। उन पर महमूद गेवान मदरसा और मस्जिद में ताला तोड़कर प्रवेश करने और पूजा करने का आरोप लगाया गया है, लेकिन सच्चाई इन आरोपों से कोसों दूर है।

दरअसल, मदरसा पहले एक हिंदू मंदिर था। यही कारण है कि हिंदू समुदाय के लोग कई वर्षों से यहाँ पूजा-अर्चना करते आ रहे हैं। इसकी प्रमाणिकता सिद्ध करने के लिए @Bharadwajagain नाम के एक ट्विटर यूजर ने सिलसिलेवार कई ट्वीट किए हैं। इसमें उन्होंने उन सभी तथ्यों और साक्ष्यों का जिक्र किया है, जो यह बताते हैं कि यह मदरसा पहले कभी एक हिंदू मंदिर था।

मदरसे का निर्माण दक्कन की इंडो-इस्लामिक वास्तुकला शैली में किया गया है। यूनेस्को ने 2014 में इसे विश्व धरोहर स्थलों की अस्थायी सूची में शामिल किया था। भारद्वाज के मुताबिक, इसका इतिहास रक्तरंजित रहा है।

बताया जाता है कि 15वीं शताब्दी में मुहम्मद बिन तुगलक (Muhammad Bin Tuglaq) के शासन काल के आखिरी दौर में दक्षिण भारत में बहमनी सल्तनत की स्थापना की गई थी। बहमनी स्वयंभू फारसी थे। इन दावों के उलट ऐसी भी संभावना है कि सभी बहमनी हिंदू धर्मांतरित थे और उनके संस्थापक हसन गंगू भी हिंदू समुदाय से थे। इसलिए, उन्होंने अपने पूर्व धर्म की कई मान्यताओं को आगे बढ़ाया।

ध्यान दें कि बहमनी ब्राह्मणों को नहीं मारना चाहते थे । लेकिन इस सल्तनत में महमूद गेवान (Mahmud Gavan) के आने के साथ कुछ बदल गया। गेवान एक विदेशी था और वह ब्राह्मणों को मारने और मंदिरों को नष्ट करने के पक्ष में था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, वह मुख्य रूप से ईरान के पारसी समुदाय से आता था। महमूद गेवान को एक और नाम से जाना जाता है और वो नाम है ख्वाजा महमूद गिलानी। मुगलकालीन साहित्य तारिख-ए-फ़रिश्ता के अनुसार, उसने ही बहमनी राजा (Bahmani king) से मंदिरों को नष्ट करने और ब्राह्मणों को मारने को कहा था। उसके लिए यह एक पुण्य का कार्य था। इसके बाद बहमनी राजा ने गेवान से प्रभावित होकर ब्राह्मणों को मौत के घाट उतार दिया और राजा को गाजी की उपाधि दी गई।

कर्नाटक के बीदर में महमूद गेवान मदरसा मूल रूप से एक हिंदू मंदिर था, जिसे महमूद शाह ने नष्ट कर दिया था। गेवान की सलाह मानकर महमूद शाह एक ब्राह्मण को मारने वाले बहमनी सल्तनत के पहले राजा बने। वहीं, अभिलेखों के अनुसार, उसने मंदिर के स्थान पर एक मस्जिद बनाने का आदेश दिया। इसके बाद महमूद गेवान ने स्वयं कहा था कि महमूद शाह ने काफिरों (ब्राह्मणों) को अपने हाथों से मार डाला था।

तारिख-ए-फ़रिश्ता के मुताबिक, महमूद शाह की सूची में मारने वाले लोगों में ब्राह्मणों का पहला स्थान था। हालाँकि, दक्कन के कई लोगों को पहले से ही इसका आभास हो गया था कि यह कुकृत्य घातक साबित होगा। उनका मानना था कि इससे बहमनी साम्राज्य का पतन होगा। जल्द ही यह सब हो गया।

मुगलकालीन साहित्य तारिख-ए-फ़रिश्ता खंड II का अंश

विशेष रूप से, इस स्मारक को सीताराम गोयल की पुस्तक ‘Hindu Temples: What Happened To Them’ में स्थान मिला। पुस्तक के खंड I में, बीदर जिले में हिंदू मंदिर को नष्ट कर उसके स्थान पर बने मदरसे को एक स्मारक के रूप में नामित किया गया है।

सीताराम गोयल की पुस्तक Hindu Temples: What Happened To Them के खंड- I का अंश

हिंदू यहाँ सदियों से पूजा करते आ रहे

बता दें कि इस मंदिर को नष्ट कर उसके स्थान पर एक मदरसा बना दिया गया था। इसके बावजूद इस क्षेत्र के हिंदुओं ने इस मंदिर में कभी भी पूजा-अर्चना करना नहीं छोड़ा। इस मामले में पुलिस का कहना है कि सदियों से यहाँ दशहरे के मौके पर पूजा करने की परंपरा चलती आ रही है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि असदुद्दीन ओवैसी जैसे मुस्लिम नेता जो दावा कर रहे हैं, वह बेबुनियाद है। किसी ने भी मस्जिद में अवैध रूप से प्रवेश नहीं किया और ना ही ताला तोड़ने का प्रयास किया।

बाइक को साइड न देने पर अमीन जंगूशेख ने दोस्तों संग श्रीराम सेना के सदस्यों पर चाकू-रॉड से किया हमला, अस्पताल में चल रहा इलाज: ईद की नमाज़ के बाद हुई घटना

कर्नाटक के बेलगावी में ईद की नमाज़ के बाद हिंसा होने की खबर है। यहाँ दो पहिया वाहन से घूम रहे रहे मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों का हिन्दूवादी संगठनों ने विवाद होने के बाद माहौल हिंसक हो गया। इस विवाद में श्रीराम सेना के 3 कार्यकर्ताओं पर 5 हमलवारों ने हमला किया है। हमले के लिए चाकुओं और लोहे की रॉड का प्रयोग किया गया है। पुलिस ने इसे आपस की व्यक्तिगत दुश्मनी बताते हुए लोगों से शाँति की अपील की है। घटना रविवार (9 अक्टूबर 2022) की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना रामदुर्ग बाजार की है। यहाँ घटना के दिन ईद की नमाज़ के बाद दोपहर में अमीन जंगूशेख अपने 4 साथियों के साथ बाइक से घूम रहा था। आरोप है कि इस दौरान श्रीराम सेना के सदस्यों ने उनकी बाइक को साइड नहीं दिया। इसी बात पर दोनों पक्षों में विवाद शुरू हो गया। बताया जा रहा है कि इस विवाद ने धीरे-धीरे बढ़ कर हिंसक रूप ले लिया।

आरोप है कि इस दौरान अमीन जंगूशेख और उसके 4 साथियों ने लोहे की रॉड और चाकुओं से श्रीराम सेना के 2 सदस्यों पर चाकुओं से हमला बोल दिया। इन पीड़ितों के नाम गोपाल और रवि हैं। इस दौरान बीच बचाव करने गए नंजुंडी बांदीवद्दर को भी लोहे की रॉड से घायल कर दिया गया। हमले में घायल तीनों पीड़ितों को नजदीकी अस्पताल में भर्ती करवाया गया है जहाँ उनका इलाज चल रहा है। बताया जा रहा है कि इस विवाद में अमीन जंगूशेख को भी चोटें आई हैं।

इस घटना के बाद बेलगावी जिले के SP संजीव पाटिल ने इसे व्यक्तिगत शत्रुता बताया है। उन्होंने लोगों से अपील की है कि वो शाँति और व्यवस्था बनाए रखें। क्षेत्र में कोई अप्रिय घटना न घटे इसके लिए भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया है। घायल व्यक्ति की तहरीर पर जंगूशेख और 4 अन्य आरोपितों के खिलाफ केस दर्ज किया गया है। पुलिस मामले की जाँच कर रही है।

मौत के बाद महान बनाने की परिपाटी कब तक, जिनका आज इंतकाल हुआ उन्होंने सबरी के राम को ठुकरा ‘मौलाना मुलायम’ होना खुद चुना

मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav) का आज (10 अक्टूबर 2022) इंतकाल हो गया। इसकी पुष्टि उनके उस बेटे (अखिलेश यादव) ने भी की है, जिन पर राजनीतिक विरासत को हड़पने के लिए पिता को मुगलों वाले तरीके से बेदखल करने के आरोप लगते हैं। हमारे यहाँ सामाजिक परिपाटी है कि किसी की मौत हो जाए तो गाँधी जी का बंदर बन जाना है। न उसके बारे में बुरा कहना है। न उसके बारे में बुरा सुनना है। उसके बुरे कर्म आँखों में तैरने लगे तो आँख ही बंद कर लेनी है। सो, मुलायम सिंह के इंतकाल के बाद भी शोक संदेशों का आना स्वभाविक है। साइकिल सवार सपाई तो आँसुओं से बाढ़ भी ला सकते हैं। आखिर उनके कुल के धृतराष्ट्र जो चले गए, जो भरे मंच से कहते थे- लड़के हैं, गलती हो जाती है।

मुलायम सिंह यादव ने यह बात उस देश में बलात्कार के अपराध को हल्का दिखाने के लिए कही, जिसकी परंपरा स्त्री सम्मान के लिए लंका दहन और महाभारत की रही है। यह सत्य है कि मुलायम सिंह यादव ने उत्तर प्रदेश में पिछड़ों की राजनीति को उभार दिया। हिंदुत्व को समर्पित पिछड़ों के लिए राजनीति में मजबूत जगह बनाई। लेकिन, जिनकी भावनाओं के ज्वार ने उन्हें देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया, देश का रक्षा मंत्री बनाया, आगे चलकर ‘वोट बैंक’ के लिए उन्होंने उनके ही अराध्य राम के भक्तों के रक्त से अयोध्या को लाल कर दिया। पिछड़ों की पीठ पर सवार हो मुलायम ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ में ऐसे डूबे कि उनके बगलगीर आजम खान अभिनेत्री से नेत्री बने जयाप्रदा की चड्डी का रंग बताने लगे।

खुद मुलायम सिंह पर ‘मुल्ला मुलायम’, ‘मौलाना मुलायम’ की सनक सवार हो गई। इसी सनक में उनके रहते 2 नवंबर को अयोध्या में रामधुन में रमे भक्तों पर फायरिंग हुई। अयोध्या की गलियों में रामभक्तों को दौड़ा-दौड़ा कर निशाना बनाया गया। 3 नवंबर 1990 को जनसत्ता में छपी एक रिपोर्ट में लिखा गया, “राजस्थान के श्रीगंगानगर का एक कारसेवक, जिसका नाम पता नहीं चल पाया है, गोली लगते ही गिर पड़ा और उसने अपने खून से सड़क पर लिखा सीताराम। पता नहीं यह उसका नाम था या भगवान का स्मरण। मगर सड़क पर गिरने के बाद भी सीआरपीएफ की टुकड़ी ने उसकी खोपड़ी पर सात गोलियाँ मारी।”

2 नवंबर 1990 को ही कोठारी बंधुओं की हत्या हुई थी। 20 साल के शरद कोठारी को घर से बाहर निकाल सड़क पर बिठाया गया और उनके सिर को गोली से उड़ा दिया। छोटे भाई के साथ ऐसा होते देख 22 साल के रामकुमार कोठारी भी कूद पड़े। एक गोली रामकुमार के गले को भी पार कर गई। उस दिन अयोध्या में किसी भी रामभक्त के पैर में गोली नहीं मारी गई थी। सबके सिर और सीने में गोली लगी थी। तुलसी चौराहा खून से रंग गया था। राम अचल गुप्ता का अखंड रामधुन बंद नहीं हो रहा था तो उन्हें पीछे से गोली मारी गई।

रामनंदी दिगंबर अखाड़े में घुसकर साधुओं पर फायरिंग की गई। कोतवाली के सामने वाले मंदिर के पुजारी को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया गया। रामबाग के ऊपर से एक साधु आँसू गैस से परेशान लोगों के लिए बाल्टी से पानी फेंक रहे थे। उन्हें गोली मारी गई और वह छत से नीचे आ गिरे। फायरिंग के बाद सड़कों और गलियों में पड़े रामभक्तों के शव बोरियों में भरकर ले जाए गए।

इस सबकी शुरुआत से पहले तत्कालीन आईजी एसएमपी सिन्हा ने अपने मातहतों से कहा था, “लखनऊ से साफ निर्देश है कि भीड़ किसी भी कीमत पर सड़कों पर नहीं बैठेगी।” अब सवाल है कि उस समय लखनऊ की कुर्सी पर कौन बैठा था। जवाब है- मुलायम सिंह यादव।

उस दिन मरने वाले कारसेवकों की संख्या को लेकर अलग-अलग आँकड़े दिए जाते हैं। कारसेवकों द्वारा जारी की गई सूची में 40 कारसेवकों के मारे जाने की बात कही गई थी और उनके नामों की सूची भी प्रकाशित की गई थी। मुलायम ने बताया था कि अटल बिहारी वाजपेयी ने उनसे 56 लोगों के मारे जाने की बात कही थी। वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा अपनी क़िताब ‘युद्ध में अयोध्या‘ में लिखा है कि उन्होंने 25 लाशें देखी थी। केंद्र सरकार ने 15 कारसेवकों के मारे जाने का आँकड़ा दिया था, जबकि विश्व हिन्दू परिषद ने 59 लोगों के मारे जाने की बात कही थी।

राम भक्तों के इस नरसंहार के बाद मुलायम को ‘मौलाना मुलायम’ का तमगा हासिल हुआ। वे जीवनपर्यंत अपने इस कृत्य को जायज ठहराते रहे। ऐसा ही मौका नवंबर 2017 में मुलायम सिंह के 79वें जन्मदिन पर आया था। तब मुलायम ने कहा था कि अगर और भी लोगों को मारना पड़ता तो जरूर मारते। मुलायम ने तब गर्व के साथ आँकड़े गिनाते हुए कहा था कि उस गोलीकांड में 28 कारसेवकों को मौत के घाट उतार दिया गया था।

उत्तर प्रदेश में मुलायम ने कांशीराम से हाथ मिलाया तो नारे लगे- मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्री राम। क्या हिंदुत्व को समर्पित, राम के लिए अपना जीवन खपाने वाले दलित-पिछड़े ऐसे मुलायम को उनके इंतकाल के बाद भी माफ कर पाएँगे?

अपनी गति को पा चुके मुलायम के लिए तो बाबा तुलसीदास का लिखा यह भी नहीं कहा जा सकता कि ‘सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ। हानि लाभु जीवन मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ।’ क्योंकि बिधि ने मुलायम को ‘राम भक्त’ बनने का मौका दिया था, उन्होंने राजनीति के लिए ‘मौलाना मुलायम’ होना खुद लिखा।

‘गर्भवती अहमदिया औरतों का कर दो कत्ल, बच्चा पैदा हो जाए तो उसे भी मारो’: पाकिस्तानी मौलवी की Video

पाकिस्तान के एक मौलवी ने अहमदिया समुदाय की गर्भवती महिलाओं पर हमला करने का फतवा जारी किया है। मौलवी का नाम मुहम्मद नईम चट्ठा कादरी है। मौलवी का तर्क है कि ऐसा करना इसलिए जरूरी है जिस से कोई नया अहमदिया पैदा न होने पाए। इसी के साथ मौलवी के मुताबिक इस्लाम की बुराई करने वालों के लिए ‘सिर तन से जुदा’ की ही सज़ा होनी चाहिए। मुहम्मद नईम का यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।

वायरल हो रहे वीडियो में मौलवी पंजाबी भाषा में बोलता दिखाई दे रहा है। उसने महमूद गज़नवी का नाम लिया और अहमदिया समुदाय की गर्भवती औरतों पर हमले का फतवा दिया। अपने बयान में मौलवी ने पाकिस्तान के पुलिस प्रशासन को भी चेतावनी दी। उसने कहा, “अगर कोई पुलिस या प्रशासनिक अधिकारी मेरी बात को सुन रहे हों तो ये जान लें कि हम रुकने वाले नहीं हैं।” मौलवी के बयान पर मंच के नीचे भीड़ में से विरोध के बजाए समर्थन में नारेबाजी होती रही।

मौलवी ने साफ तौर पर कहा कि इस्लाम की निंदा करने वालों के लिए सिर तन से जुदा की सज़ा मुकर्रर है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मौलवी ने आगे कहा, “अगर हम गर्भवती अहमदिया महिलाओं को मारने में सफल नहीं हो पाएँ तो उन बच्चों को पैदा होने के बाद कत्ल कर दो।” मौलवी मुहम्मद नईम चट्ठा कादरी पाकिस्तान के प्रतिबंधित और कट्टरपंथी कहे जाने वाली जमात तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (TLP) का सदस्य है।

इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स कमेटी ने इस घटना पर चिंता व्यक्त की है। एक पत्र जारी करते हुए कमेटी ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इस मामले में हस्तक्षेप करने और अहमदियों की रक्षा करने की माँग की। इसी पत्र में बताया गया है कि तहरीक-ए-लब्बैक का पाकिस्तान में अहमदियों के खिलाफ हिंसा का पुराना इतिहास रहा है। पत्र में अगस्त 2022 में पाकिस्तान में हुई नसीर अहमद की हत्या का जिक्र किया गया है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक हत्या के दौरान नसीर अहमद 62 साल के थे। वो 3 साल की बच्ची के पिता थे जब उन्हें रबवाह शहर में चाकुओं से गोद दिया गया था। माना जा रहा है कि इस फतवे के बाद अहमदियों पर हमलों की तादाद बढ़ सकती है।

‘नहीं रहे मेरे पिता और सबके नेताजी’… 82 साल की उम्र में मुलायम सिंह यादव का निधन, अखिलेश ने दी जानकारी

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव का 82 साल की उम्र में सोमवार (10 अक्टूबर) को निधन हो गया। समाजवादी पार्टी के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से अखिलेश यादव का बयान ट्वीट करके कहा गया- “मेरे आदरणीय पिता जी और सबके नेता जी नहीं रहे।”

इससे पहले सपा के अकॉउंट से मुलायम सिंह यादव की तबीयत के बारे में अपडेट दिया गया था कि मुलायम सिंह यादव की स्थिति बहुत गंभीर है। वह दवाइयों पर जीवित हैं। उनका इलाज आईसीयू में हो रहा है और विशेषज्ञों की खास टीम उनका इलाज कर रही है।

2020 से बीमार थे मुलायम सिंह यादव, 2022 में तबीयत बिगड़ी

बता दें कि मुलायम सिंह की तबीयत अगस्त 2020 से बिगड़नी शुरू हुई थी। पहले उन्हें पेट दर्द हुआ था, जिसकी जाँच में उन्हें यूरिन इन्फेक्शन आया था और बाद में वह कोरोना पॉजिटिव हो गए थे। इसके बाद 2021 में भी एक बार भर्ती हुए थे। वहीं 2022 में वह पहले जून में भर्ती हुए, फिर अगस्त में और फिर सितंबर में। 26 सितंबर को मुलायम सिंह यादव को जब मेदांता में भर्ती किया गया तब से वह वहीं थे।

बाद में खबर आई कि उन्हें साँस लेने में तकलीफ होनी शुरू हुई थी, जिसके बाद उन्हें आईसीयू में भर्ती करवाया गया। उनकी देखरेख खुद मेदांता ग्रुप के निदेशक डॉ नरेश कर रहे थे। हालाँकि थोड़ी देर पहले खबर आई कि उन्होंने आज सुबह 8: 16 पर अपनी अंतिम साँस ली।

मुलायम सिंह यादव का सफर

गौरतलब है कि यूपी में 3 बार मुख्यमंत्री रहे मुलायम सिंह यादव समाजवादी पार्टी के संस्थापक थे। उनका जन्म 22 नवंबर 1939 को सैफई में हुआ था। कुछ दिन पहले जैन इंटर कॉलेज के प्राध्यापक भी थे। लेकिन फिर वह राजनीति में सक्रिय हो गए और जीवन के 6 दशक उन्होंने राजनीति को दिए। इस दौरान वह 8 बार वह विधानसभा के सदस्य बने, 7 बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए और 3 बार मुख्यमंत्री। इसके अलावा 1996 में एचडी देवगौड़ा की संयुक्त गठबंधन वाली सरकार में उन्होंने रक्षामंत्री के तौर पर भी काम किया। मुलायम सिंह यादव की 2 शादियाँ हुई थीं। उनकी दूसरी पत्नी देहांत अभी कुछ समय पहले ही हुआ था।

आदिपुरुष के सवालों पर सनातनी पर्दा: शुक्ला का मुंतशिर होना नहीं है सनातन, इसलिए धंधे के लिए धर्म का इस्तेमाल बंद करो

एक फिल्म अगले बरस यानी 2023 के जनवरी में रिलीज होनी है। नाम है- आदिपुरुष (Adipurush)। पिछले दिनों इस फिल्म का टीजर जारी किया गया। उसके बाद से इस फिल्म को लेकर विवाद चल रहा है।

सवाल इस फिल्म के किरदारों के लुक को लेकर है। फिल्म पर हिंदू धर्म का मजाक बनाने के आरोप लग रहे हैं। फिल्मों में मेरी दिलचस्पी न के बराबर है। भारत का फिल्म उद्योग, खासकर हिंदी फिल्म उद्योग (Hindi cinema) जिस तरह हिंदू घृणा से सना है, यह गंभीरता से लेने की चीज भी नहीं है। लेकिन जिस तरह इस फिल्म को लेकर उठ रहे सवालों को दबाने के लिए फिल्म से जुड़े लोग सनातन, राष्ट्र धर्म, हिंदुत्व की दुहाई दे रहे हैं, हर हिंदू के लिए बोलना जरूरी हो जाता है। ऐसा नहीं होने पर यह परिपाटी चलती ही रहेगी। यह एक तरह से आपके घर में घुस कर, खुद को आपकी तरह का बताकर, आप की पहचान धर कर, आपकी ही मूल्यों पर हमले जैसा है। इस अभियान के अगुवा बने हुए हैं, मनोज मुंतशिर (Manoj Muntashir)। वे इस फिल्म से बतौर डायलॉग राइटर जुड़े हुए हैं। आगे बढ़ने से पहले जरा मनोज के इस बयान को सुनिए, उन्होंने खुद ट्विटर पर इसे साझा किया है।

दरअसल, मनोज चाहते हैं कि इस फिल्म को लेकर कोई सवाल इसलिए नहीं पूछे जाने चाहिए क्योंकि उनके अनुसार इससे जुड़े सभी लोग ‘सनातनी’ हैं। अब आगे आप एक दो साल पुराना क्लिप देखिए;

जी हाँ, आपने सही सुना। खुद को बचनदेव शर्मा बताने वाले इस व्यक्ति ने कहा है कि उसने रामायण में पढ़ा है कि प्रभु ईशु आएँगे। अयोध्या कांड में ऐसा लिखे होने की बात कह रहा है। यह व्यक्ति हमें 2020 में बिहार विधानसभा चुनाव की रिपोर्टिंग के दौरान मिला था। मधुबनी जिले के कुछ गाँवों में हमें ईसाई धर्मांतरण की जानकारी मिली थी। ये वे इलाके थे, जहाँ चर्च के पहुँचने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। हमने खोजबीन की तो धर्मांतरण करवाने में इस व्यक्ति की भूमिका सामने आई थी। खुद को पत्रकार बताने वाला यह व्यक्ति वेद, पुराण और हिंदू धर्मग्रंथों का अध्ययन करने का दावा करता था। कहता था कि इसमें हिंदू और सनातन टाइप का कुछ नहीं है। लेकिन ईसामसीह का जिक्र होने का दावा करता था। इसके फर्जीवाड़े पर आप पूरी रिपोर्ट ऑपइंडिया के यूट्यूब चैनल पर देख सकते हैं।

क्या हिंदुओं का मजाक बनाने वाली फिल्म आदिपुरुष से जुड़े मनोज मुंतशिर और हिंदुओं को ईसाई बनाने वाले बचनदेव शर्मा, एक ही तरह की बात नहीं कर रहे? एक सनातन का हवाला देकर तो दूसरा हिंदू धर्म ग्रंथों का हवाला देकर, सवालों को खारिज करने की कोशिश नहीं कर रहा? जबकि हम जानते हैं कि न तो आदिपुरुष का सनातन से सरोकार है, न रामायण में ईसामसीह का कोई जिक्र है।

आदिपुरुष में रावण का किरदार सैफ अली खान ने निभाया है। टीजर रिलीज होने के बाद लोगों ने पाया कि सैफ कहीं से भी रावण की तरह नहीं दिखते। लुक, हावभाव से वे बर्बर इस्लामी अक्रांताओं जैसे दिखते हैं। इसको लेकर पूछे सवाल के जवाब में मनोज मुंतशिर ने एक इंटरव्यू में कहा है कि फिल्म में रावण को जानबूझकर खिलजी की तरह नहीं दिखाया गया है। लेकिन फिर भी ऐसा है तो इस पर ऐतराज नहीं होना चाहिए, क्योंकि हर दौर में बुराई का अपना प्रतीक होता है। कल रावण था, आज खिलजी है।

यदि मनोज के इस तर्क को मान लिया जाए तो यह कहने की क्या आवश्यकता है कि आदिपुरुष की कहानी प्रभु राम के कालखंड की है। जब आप किसी खास कालखंड की बात करते हैं तो चरित्र और उनके आचरण उस कालखंड के अनुसार ही होने चाहिए। क्रिएटिव फ्रीडम के नाम पर आप रावण को राफेल उड़ाते नहीं दिखा सकते। उसे चमगादड़ और ड्रैगन के बीच के किसी जीव पर भी सवार नहीं दिखा सकते। मनोज के इस तर्क को मान्यता दे दी जाए तो कल को कोई लिबरल फिल्मकार राम के हावभाव राहुल गाँधी की तरह भी दिखा सकता है। फिर वह कहेगा कि हर दौर के अपने नायक होते हैं। उसके लिए आज के दौर का नायक राहुल गाँधी हैं। इस स्थिति में जो कुछ पर्दे पर दिखेगा, वह पप्पू ही होगा। लिबरई की इंतहा हुई तो इसी तर्क की आड़ में कोई राम के हावभाव और कर्म प्रतीक सिन्हा या मोहम्मद जुबैर की तरह भी दिखा सकता है। ऐसी स्थिति में तो रावण के बचाव के लिए राम फैक्टचेक करते और फर्जी तथ्य गढ़ते दिखेंगे, जैसा ये इस्लामी कट्टरपंथियों के बचाव में करते हैं। आदिपुरुष में चरित्रों के लुक को लेकर यह समस्या राम से लेकर हनुमान तक के पात्रों में दिखती है।

यह सच है कि हमने इन पौराणिक पात्रों को अपनी नग्न नेत्रों से नहीं देखा है। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि ये पौराणिक पात्र कैसे दिखते रहे होंगे या इनके आचरण को लेकर उल्लेख हमारे पौराणिक ग्रंथों में नहीं हैं। इन्हीं के आधार पर इन पात्रों की लोकछवि बनी हुई है। जब भी आप पौराणिक किरदारों को पर्दे पर उतारने का निर्णय लेते हैं तो संदर्भ इन्हीं जगहों से प्राप्त करते हैं। कई लोगों ने इस पर विस्तार से लिखा है, इसलिए मैं उसकी गहराई में नहीं जाना चाहता। लेकिन उदाहरण के तौर पर आप तुलसीदास की लिखी इन पंक्तियों से समझ सकते हैं कि प्रभु श्रीराम कैसे दिखते रहे होंगे;

नवकंज लोचन, कंजमुख, करकुंज, पदकंजारुणं
कंदर्प अगणित अमित छबि, नवनीलनीरद सुन्दरं
पट पीत मानहु तडीत रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरं
सिर मुकुट कुंडल तिलक चारू उदारु अंग विभुशनम
आजानुभुज शर चाप-धर, संग्राम-जित-खर दूषणं

वैसे भी पौराणिक चरित्रों को गढ़ते वक्त उनकी पौराणिक और लोक छवि का ध्यान रखा जाना चाहिए। जाहिर है आदिपुरुष में ऐसा नहीं किया गया है। यह कहना कि कौन सा खिलजी त्रिपुंड लगाता है, इसलिए उसे रावण ही मान लिया जाए तो और भी बचकाना है। मैं जो कुछ कह रहा हूँ वह अतिशयोक्ति नहीं है। या मेरी कल्पनाओं की उड़ान नहीं है। क्रिएटिव फ्रीडम के नाम पर हिंदू देवी-देवताओं की नग्न तस्वीर बनाने वाले को हमने इस देश में देखा है। माँ काली को सिगरेट पीते देखा है। भगवान शिव को हिंदी फिल्म में शौचालय से भागते देखा है…

इसलिए आदिपुरुष पर उठते सवालों को सनातनी चादर दिखाकर छिपाने की कोशिश कर रहे मनोज को समझना चाहिए कि ये करियर के लिए शुक्ला का मुंतशिर होना और फिर हिंदू जागरण की आहट देख मुंतशिर के आगे शुक्ला के जुड़ जाने जितना आसान नहीं है। ये सवाल फिल्म के धंधे से भी बंद नहीं होते। हिंदी की तमाम सफल फिल्मों में हिंदुओं का, उनके प्रतीक चिह्नों का, उनकी आस्थाओं का, उनके अराध्यों को नीचा दिखाने का काम किया गया है। बावजूद वे फिल्में सफल रहीं, क्योंकि हिंदुओं में सेकुलर बीमारी गहरी है। 2014 के बाद इसका उपचार शुरू हुआ है। जहर धीरे-धीरे जाना है। इसलिए कुछ फिल्में अब पिटती भी हैं। लेकिन कुछ चल भी जाती हैं। इसलिए संभव है बॉक्स आफिस पर आदिपुरुष भी कमाई कर ले, लेकिन उससे जुड़े सवाल उस कमाई से नहीं दबेंगे।

यह भी कहा जा रहा है कि ये टीजर है पूरी फिल्म नहीं। लेकिन धंधेबाजों से पूछना चाहिए कि वह कौन सी व्यवसायिक नीति है, जिसके तहत टीजर में मुल्ले की तरह दिखने वाले हनुमान, असल फिल्म में पौराणिक और लोक छवि वाले हनुमान की तरह दिखेंगे। मनोज मुंतशिर हो या ओम राउत वे स्वतंत्र हैं, अपने प्रोडक्ट का प्रचार करने को। चैनल-चैनल घुमने को। लेकिन उन्हें यह याद रखना चाहिए कि सनातन उनकी क्रिएटिविटी फ्रीडम से उपजा हुआ नहीं है कि वे अपने निकृष्ट कर्मों को छिपाने के लिए ढाल की तरह उसका इस्तेमाल करें।

ये आज का भारत। हम आज के सनातनी हैं। हमें अपनी पौराणिकता पर गर्व है। हम न तो किसी को उसका मान-मर्दन करने की अनुमति दे सकते हैं और न कोई कालनेमि हमें अपनी माया में उलझा हमारे प्रभु के चरित्र को कलंकित कर सकता है। मुंतशिर बना शुक्ला भी नहीं। जिनको लगता है कि आदिपुरुष पर सवाल बेवजह हैं, किसी प्रोपेगेंडा से जुड़े हैं, उन बुद्धिजीवियों को समझना चाहिए कि आदिपुरुष पर सवाल हमारा दृष्टि दोष नहीं, आपकी बुद्धि भ्रष्ट होना है।

बंगाल के मोमिनपुर में फिर कट्टरपंथियों का हमला, हिंदुओं के घरों में फेंके पेट्रोल बम: BJP ने केंद्रीय बलों की तैनाती के लिए अमित शाह को लिखा पत्र

पश्चिम बंगाल में रविवार (अक्टूबर 9, 2022) को एक बार फिर हिंदुओं पर हमला हुआ है। इस बार घटना खिर्दीपोर मोमिनपुर इलाके की है। यहाँ लक्ष्मी पूजा की शाम हिंदुओं की दुकानों और घरों पर दंगाइयों ने हमला किया। इस दौरान हिंदुओं के घरों पर पेट्रोल बम फेंके गए, उनकी झोपड़ियों में आग लगा दी गई, उनके सामान तोड़ दिए गए। इसके बाद ये कट्टरपंथी भीड़ इकबालपुर थाने के भीतर इस्लामी झंडा लेकर घुसी और वहाँ भी काफी उत्पात मचाया गया।

दंगाइयों का मजहब देख नहीं हो रही कार्रवाई

हिंसा के मद्देनजर प्रदेश के भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने बंगाल के गवर्नर व गृहमंत्री अमित शाह को पत्र लिख अपील की कि वह मोमिनपुर में सेंट्रोल फोर्स (CAPF) तैनात करें क्योंकि राज्य सरकार दंगाइयों का मजहब देख उन्हें कुछ भी कहने से बच रही है।

उन्होंने याद दिलाया कि इससे पहले जून में हुई पंचला हिंसा के दौरान भी इसी तरह से हिंदुओं को निशाना बनाया गया था। वहीं नादिया और मुर्शिदाबाद जिलों की घटनाओं के समय भी कोई कार्रवाई नहीं हुई थी। पत्र में अधिकारी ने लिखा कि राज्य सरकार कट्टरपंथियों के आगे सरेंडर कर चुकी है।

हिंसा के पीछे की वजह

उल्लेखनीय है कि बंगाल में यह हिंसा रविवार (9 अक्टूबर 2022) को भड़की। बताया जा रहा है कि वहाँ पैगंबर मोहम्मद के जन्मदिन के मौके पर इस्लामियों ने हिंदुओं के घर व दुकानों पर इस्लामी झंडे लगा दिए थे, जिन्हें कथिततौर पर हिंदुओं ने खोल दिया। इसी के बाद 700 से अधिक की भीड़ में कट्टरपंथी इकट्ठा हुए और हिंदुओं के घर में तोड़फोड़ शुरू कर दी। बार-बार पुलिस को बुलाए जाने के बाद भी सुनवाई नहीं हुई। बाद में पता चला कि उपद्रवियों ने इकबालपुर थाने में भी हल्ला मचा रखा था। वह वहाँ इस्लामी झंडों के साथ घुस गए थे और पुलिस उन्हें देख एकदम चुप थी।

हिंदू घर से भागने को मजबूर, पुलिस मौन खड़ी

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सुकांता मजूमदार ने मोमिनपुर इलाके में भड़की हिंसा के बाद एक वीडियो ट्वीट किया। उन्होंने दावा किया कि हालात देखने के बाद मयूरभंज से हिंदू भाग रहे हैं, उनके घरों पर हमला हो रहा है। पुलिस बिलकुल चुप है। कानून व्यवस्था का कोई नामों निशान नहीं है।

ट्वीट के साथ साझा की गई वीडियो में व्यक्ति बता रहा है कि कैसे हिंसा वाले इलाके में आकर भी पुलिस दूर खड़ी तमाशा देख रही है। कोई इतनी हिम्मत नहीं दिखा रहा कि मामला सुलझा सके। प्रशासन को कह दिया गया है कि स्थिति कंट्रोल में है। लेकिन हकीकत में हालत अब भी वैसे हैं घरों में पत्थरबाजी हो रही है, बम फेंके जा रहे हैं।

हिंसा भड़कने के बाद की कई वीडियोज सोशल मीडिया पर सामने आई हैं। इनमें दिख रहा है कि कैसे कट्टरपंथी यहाँ-वहाँ देखे बिना हर चीज को तोड़ रहे हैं। साथ ही हिंदुओं के घरों के आस पास जो बड़ी बिल्डिंग हैं उनपर चढ़कर वह पत्थर व पेट्रोल बम फेंक रहे हैं।

वीडियो में गेट को पीटने की आवाज और शोर साफ सुना जा सकता है। इसके अलावा हिंदुओं के खाली घरों की वीडियो भी इंटरनेट पर आ गई है। इन सबके बावजूद राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन पर आरोप है कि वो हालातों को सुधारने के लिए कोई प्रयास नहीं कर रहे बल्कि दंगाइयों का मजहब देख चुप बैठे हैं।