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श्रीलंका में भारतीय कंपनी को पावर प्रोजेक्ट मिलने से राहुल गाँधी निराश, द वायर के ‘प्रोपेगेंडा’ को हथियार बना PM मोदी पर किया वार

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी (Rahul Gandhi) ने वामपंथी वेबसाइट ‘द वायर’ के एक लेख को आधार बनाकर भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधा है। ‘द वायर’ ने श्रीलंका में अडानी ग्रुप से जुड़े एक सौदे में पीएम मोदी की भूमिका को लेकर लेख प्रकाशित किया था। हालाँकि, श्रीलंकाई राष्ट्रपति इस दावे को नकार चुके हैं। इस संबंध में गलत दावा करने को लेकर सीलोन इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड (CEB) के अध्यक्ष एमसीसी फर्डिनेंडो भी बिना शर्त माफी माँग चुके हैं।

फर्डिनेंडो का कहना है कि वे COPE मीटिंग में भावुक हो गए थे, जिसके कारण उन्होंने झूठ बोल दिया। साथ ही कहा है कि पीएम मोदी को लेकर उन्होंने जो कहा था, वह उसे वापस ले रहे हैं। वहीं, श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे भी इसको नकार चुके हैं।

इसके बावजूद राहुल गाँधी मोदी सरकार पर आरोप लगाने से बाज नहीं आ रहे हैं। यह समझ में नहीं आ रहा है कि कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष एक भारतीय कंपनी के विदेश में एक बड़े प्रोजेक्ट को लगाने को लेकर इतना आगबबूला क्यों हो रहे हैं। राहुल ने ट्विटर के जरिए द वायर के दावों को सच मानते हुए पीएम मोदी पर हमला बोला है। ट्वीट में उन्होंने द वायर के लेख का स्क्रीनशॉट लगाते हुए लिखा है कि बीजेपी की उद्योगपतियों को फायदा पहुँचाने की नीति अब पाल्क स्ट्रीट पार कर श्रीलंका तक चली गई है।

उल्लेखनीय है कि 10 जून को हुई COPE मीटिंग के दौरान CEB चेयरमैन ने दावा किया था कि पवन ऊर्जा का एक टेंडर अडानी ग्रुप को पीएम मोदी के जोर देने पर मिला है। उन्होंने कहा था कि राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे ने उन्हें ये सब बताया। हालाँकि, इस बयान के तुरंत बाद श्रीलंका के राष्ट्रपति ने इन आरोपों का खंडन करते हुए ट्वीट किया था। राजपक्षे ने लिखा था कि उन्होंने किसी भी समय किसी भी संस्था या व्यक्ति को पवन ऊर्जा का टेंडर देने के लिए नहीं कहा है। ऐसे में कहा जा सकता है कि द वायर जैसी वामपंथी झुकाव वाली वेबसाइट ने इस लेख को केवल मोदी सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार और नफरत फैलाने के मकसद से प्रकाशित किया।

बता दें कि यह मामला मन्नार पवन ऊर्जा परियोजना के विकास से संबंधित है। अडानी ग्रुप ने मन्नार के पास एक बिलियन डॉलर से अधिक की 1,000 मेगावाट की पवन ऊर्जा परियोजना लगाने की बोली जीती है।

‘राजस्थान में हिन्दुओं पर चुन-चुन कर केस, कइयों को छोड़ना पड़ा पढ़ाई और घर’: करौली के पीड़ित का दर्द, कहा – मुस्लिम पक्ष के साथ सरकार

राजस्थान के करौली में 2 अप्रैल 2022 (शनिवार) को हिन्दू नववर्ष पर निकली शोभायात्रा के दौरान हिंसा हुई थी। मुस्लिम भीड़ के हमले में शोभायात्रा में शामिल हिन्दू कार्यकर्ताओं के साथ हिंसा को काबू कर रहे पुलिसकर्मी भी घायल हुए थे। पुलिस ने अपनी FIR दोनों पक्षों को आरोपित किया था। कुछ लोग जेल काट कर निकल चुके हैं जबकि अभी कई लोग फरार हैं। ऑपइंडिया ने 10 जून, 2022 (शनिवार) को इस घटना में नामजद किए गए वैभव पाल से अभी के हालात की जानकारी ली।

प्रशासन साथ था तो हम निश्चिन्त थे

वैभव पाल ने ऑपइंडिया को बताया, “हमने शोभायात्रा की सभी कानूनी औपचारिकताएँ पूरी की थीं। इसी वजह से प्रशासन हमारे साथ था और हम निश्चिंत थे। जो हुआ उसका तो अनुमान भी नहीं था हमें। जहाँ घटना हुई थी वो जगह मुख्य मार्ग है और मंदिर जाने का रास्ता था। कोई मुस्लिम बहुल आबादी नहीं थी वहाँ। घटना स्थल से लगभग 100 मीटर दूरी से मुस्लिमों के घर शुरू होते हैं। हमला मुख्य मार्ग से हुआ था जिसमें हमलावर औरतें और बच्चे भी शामिल थे।”

हिन्दू हमलावर नहीं बल्कि पीड़ित

बकौल वैभव पाल, “हिन्दुओं की तरफ से हम तो हमला हुआ और न ही हिंसा। हम तो पीड़ित हैं। हमारे लगभग 70 लोग घायल हुए और हमारे वाहनों को भी तोड़ा गया। इसके बाद हम लोगों पर ही केस दर्ज कर दिया गया। अब कई दर्जन हिन्दू पुलिस के डर से घरों से फरार चल रहे हैं। न सिर्फ कई नामजद हिन्दू भागे हुए हैं बल्कि कई अन्य लोग भी सहमें हैं क्योकि पुलिस की FIR में कई आरोपित अज्ञात में भी हैं। मैं इस केस में नामजद हूँ और तब से अपने घर नहीं जा पाया हूँ। हालाँकि पुलिस हमारे परिवार से कोई अभद्रता नहीं कर रही है। शायद उन्हें भी पता है कि हम बेगुनाह हैं। लेकिन कॉन्ग्रेस सरकार न जाने क्या करवा रही है।”

अब खतरे से बाहर है अमित शर्मा की हालत

वैभव पाल ने आगे बताया, “हमले में सबसे ज्यादा अमित शर्मा घायल हुए थे। उन्हें छत से एक बड़ा पत्थर फेंक कर मारा गया था जो कई वीडियो में भी दिखा है। उनकी हालत गंभीर थी इसलिए उन्हें जयपुर भेज दिया गया था। फ़िलहाल अब वो ठीक हैं और उनकी हालत खतरे से बाहर है। इसी के साथ हमारे साथ एक संघ कार्यकर्ता को भी चाकू मार दी गई थी जिनकी हालत अब ठीक है। कई अन्य को भी पत्थर लगे थे लेकिन वो स्थानीय स्तर पर ही इलाज से ठीक हो गए थे।”

घटना के बाद मुस्लिमों ने हिन्दू युवाओं पर चुन-चुन कर दर्ज करवाए केस

वैभव ने बताया, “जिस दिन हिंसा हुई उस दिन पुलिस ने FIR दर्ज कर के दोनों पक्षों के दर्जनों लोगों को नामजद किया। लेकिन उसके लगभग 8 से 10 दिन बीत जाने के बाद मुस्लिम समुदाय के लोगों ने चुन-चुन कर अलग-अलग घटनाओं में कई हिन्दू लड़कों पर FIR दर्ज करवाई। ये FIR अलग-अलग दिनों में लगातार दर्ज हुईं जिनकी संख्या लगभग 80 है। लगभग 60 से 70 हिन्दू युवक इन केसों में नामजद कर दिए गए जिसमें से अधिकतर फिलहाल इधर-उधर छिप और भटक रहे हैं। ये वो हिन्दू युवक हैं जो पुलिस द्वारा दर्ज FIR में नहीं आ पाये थे। इसका मकसद सिर्फ हिन्दुओं की प्रताड़ना है। इसमें कार्रवाई भी एकतरफा हो रही है।” वैभव ने ऑपइंडिया के पास दर्जनों FIR की कॉपी भी भेजी।

पुलिस FIR में दर्ज लगभग कई हिन्दुओं की गिरफ्तारी हुई

वैभव ने आगे कहा, “घटना के दिन पुलिस द्वारा दर्ज करवाई गई FIR में नामजद 1 या 3 को छोड़ कर लगभग सभी लोग गिरफ्तार कर लिए गए हैं। उनमें से कईयों की जमानत भी हो चुकी है। घटना के दिन अपने काम से भी कहीं जा रहे व्यक्ति को पकड़ कर FIR में नामजद किया गया। कार्रवाई एकतरफा हो रही है। FIR में नामजद किए जा रहे अधिकतर 20 से 22 साल की उम्र के हैं। जबकि पुलिस ने अपनी ही FIR में लिखा है कि प्रदर्शन शांतिपूर्ण ढंग से हो रहा था। फिर हमको दोषी क्यों बना दिया गया ये अब तक नहीं जान पाया।”

हिंदुत्व और धर्म का काम करने वाले निशाने पर

वैभव ने कहा, “FIR करवाते समय उन सभी पर नजर रखी गई जो हिंदुत्व का काम करते थे। यहाँ तक कि धार्मिक आस्था रखने वाले और पूजा-पाठ करने वालों को भी जान बूझ कर निशाने पर लिया गया। 30-40 लोग ऐसे भी हैं जिन्हें धारा-151 में पकड़ा गया। हिन्दू सेना के साहिब गुर्जर और राजाराम गुर्जर को पुलिस ने हिंसा का मुख्य आरोपित बनाया है। मुस्लिम पक्ष को कॉन्ग्रेस पार्टी के विधायक लाखन सिंह मीणा ने पूरा सपोर्ट किया।”

मुख्य आरोपित मतलूब फरार जबकि उसके करीबी अस्पताल में कम्पाऊंडर

वैभव ने आगे कहा, “अब तक मतलूब नहीं पकड़ा गया। इलाके में चर्चा है कि मुख्य आरोपित कॉन्ग्रेस नेता मतलूब के करीबी मुश्ताक अहमद ने RSS कार्यकर्ता विपिन को चाकू मारी थी। मुश्ताक अहमद यहीं करौली के ही एक सरकारी अस्पताल में कम्पाउंडर है। उस पर पुलिस एक्शन लेगी या नहीं ये नहीं पता पर मुश्ताक अभी भी अस्पताल में दवाएँ बाँटने के काऊँटर पर काम करते हुए बताया जा रहा। करौली में इस बात की भी चर्चा है कि मुख्य आरोपित मतलूब को भागने में कॉन्ग्रेस विधायक ने मदद की थी। मुस्लिमों की तरफ से जेल भेजे गए तमाम लोग जमानत पा चुके हैं।”

फँसाए गए तमाम लोग छात्र इसलिए उनकी आर्थिक स्थिति खराब

वैभव के मुताबिक, “केसों में फँसाए गए अधिकतर लड़के युवा और छात्र जीवन वाले हैं। उनकी आर्थिक स्थिति काफी खराब हैं। उनके पास पैरवी के पैसे नहीं हैं। उनकी पढ़ाई लिखाई भी खराब हो रही है। हम लोगों की तरफ से कोई भी बोलने वाला नहीं है। हिन्दुओं में बहुत ऐसे परिवार हैं जिनके घर की हालत बहुत खराब है और वो जमानत आदि में सक्षम नहीं हैं। जबकि दूसरे पक्ष की तरफ से सीधे सरकार ही काम पर लगी हुई है। उनका साथ कॉन्ग्रेस विधायक ही दे रहा है।”

भारत का अगला राष्ट्रपति किसका? NDA को करना होगा 9194 वोटों का जुगाड़, BJD-YSR के साथ आने के आसार; ममता को लेफ्ट का झटका

चुनाव आयोग ने राष्ट्रपति चुनाव के तारीख की घोषणा कर दी। 18 जुलाई को मतदान होना है और 21 जुलाई को हमें देश का अगला राष्ट्रपति मिल जाएगा। वर्तमान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का कार्यकाल आगामी 25 जुलाई को समाप्त हो रहा है। इससे पहले चुनावी प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। राष्ट्रपति के चुनाव में लोकसभा के सांसद, राज्यसभा सदस्य और विधायक अपना मत डालते हैं, लेकिन विधान परिषद के सदस्य और किसी सदन के नामित सदस्यों को वोट करने का अधिकार नहीं है।

भारत में राष्ट्रपति चुनाव की वर्तमान व्यवस्था 1974 से चली आ रही है और यह 2026 तक लागू रहेगी। इसमें 1971 की जनसंख्या को आधार माना गया है।

किसके पास कितने वोट?

चुनाव के कुल वोटरों की संख्या 4809 है। इसमें लोकसभा के सांसद और सभी राज्यों के विधानसभा के विधायक शामिल हैं। राष्ट्रपति चुने जाने के लिए किसी भी उम्मीदवार को 50 फीसदी वोट चाहिए। एनडीए के पक्ष में 440 सांसद हैं जबकि यूपीए के पास लगभग 180 सांसद हैं। एनडीए के पास तकरीबन 5,35,000 वोट हैं। इसमें उसके सहयोगियों के साथ उसके सांसदों के समर्थन से 3,08,000 वोट शामिल हैं। 

राज्यों में बीजेपी के पास उत्तर प्रदेश से सबसे ज्यादा 56,784 वोट हैं, जहाँ उसके 273 विधायक हैं। उत्तर प्रदेश में प्रत्येक विधायक के पास अधिकतम 208 वोट हैं। राज्यों में एनडीए को बिहार में अपना दूसरा सबसे ज्यादा वोट मिलेगा, जहाँ 127 विधायकों के साथ, उसे 21,971 वोट मिलेंगे, क्योंकि प्रत्येक विधायक के पास 173 वोट हैं। इसके बाद महाराष्ट्र से 18,375 वोट हैं, जहाँ उसके 105 विधायक हैं और प्रत्येक के पास 175 वोट हैं।

वर्ष 2017 के राष्ट्रपति चुनाव के मुकाबले देखा जाए तो भाजपा और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के उसके सहयोगियों के विधायकों में संख्या में कमी आई है लेकिन उसके सांसदों की संख्या में वृद्धि जरूर हुई है। भाजपा के पास 465,797 वोट हैं और उसके गठबंधन सहयोगी के पास 71,329 वोट हैं। यानी कुल मिलाकर 5,37,126 वोट है। NDA को जीत के लिए 9194 और वोटों की जरूरत है।

बहुमत का आँकड़ा आसानी से पार करने के लिए भाजपा की BJD और YSR कॉन्ग्रेस से बातचीत अंतिम दौर में है। दोनों ने ही 2017 के राष्‍ट्रपति चुनाव में बीजेपी का साथ देते हुए राम नाथ कोविंद के लिए वोट किया था। बीजेपी को एक बार फिर इन दोनों से अपने उम्‍मीदवार को समर्थन की उम्‍मीद है। अगर YSR कॉन्ग्रेस या BJD का समर्थन मिल जाता है तो एनडीए उम्‍मीदवार की जीत का रास्‍ता साफ हो जाएगा।

सबसे ज्यादा वोट मिलने पर भी जीत जरूरी नहीं

सामान्य तौर पर चुनाव में जो उम्मीदवार सबसे ज्यादा वोट पाता है वह अपनी सीट पर विजेता घोषित कर दिया जाता है, लेकिन राष्ट्रपति चुनाव में हार या जीत वोटों की संख्या से नहीं बल्कि वोटों की वैल्यू से तय होती है। राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार को सांसदों और विधायकों के वोटों के कुल मूल्य का आधा से ज्यादा हिस्सा हासिल करना होता है। इस समय राष्ट्रपति चुनाव के लिए निर्वाचक मंडल या इलेक्टोरल कॉलेज के सदस्यों के वोटों का वेटेज 10,98,903 है। किसी प्रत्याशी को राष्ट्रपति पद के लिए जीत हासिल करने के लिए वोटों के कम से कम 5,46,320 वोटों की जरूरत होगी। यह संख्या हासिल करने वाले प्रत्याशी देश के राष्ट्रपति चुने जाते हैं। 

शरद पवार को विपक्ष का उम्मीदवार बना सकती है कॉन्ग्रेस

इस बीच, कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने राष्ट्रपति चुनाव को लेकर राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (राकांपा) प्रमुख शरद पवार, तृणमूल कॉन्ग्रेस की अध्यक्ष व पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सहित कुछ विपक्ष के नेताओं से संपर्क किया है। राष्ट्रपति चुनाव में बहुमत का आँकड़ा नहीं होने के बावजूद कॉन्ग्रेस ने विपक्ष की ओर से साझा उम्मीदवार को खड़ा कर सकती है। सोनिया गाँधी ने कभी उनकी नागरिकता के मुद्दे पर पार्टी छोड़ने वाले राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी के नेता शरद पवार के साथ ही मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सीताराम येचुरी एवं तृणमूल कॉन्ग्रेस की अध्यक्ष और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से फोन पर बात की।

माना जाता है कि गाँधी ने इन विपक्षी नेताओं के साथ बातचीत में राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष की एकजुटता दिखाने की जरूरत पर बल दिया। बताया जा रहा है कि सोनिया गाँधी शरद पवार को संयुक्त विपक्ष का उम्मीदवार बना सकती है। हालाँकि एनसीपी या शरद पवार की ओर से इस मामले में अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।

विपक्ष को लामबंद करने में जुटी ममता बनर्जी

बता दें कि ममता बनर्जी ने राष्ट्रपति चुनाव के मद्देनजर राजधानी दिल्ली में 15 जून को विपक्षी दलों के नेताओं की एक बैठक बुलाई है। उन्होंने इसमें गैर एनडीए दलों और विपक्षी पार्टियों के मुख्यमंत्रियों को भी आमंत्रित किया है। यह कॉन्फ्रेंस कांस्टीट्यूशन क्लब में होगी। जिन प्रमुख नेताओं को इसमें बुलाया गया है इसमें कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी, आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल, सीताराम येचुरी, उद्धव ठाकरे सहित विपक्ष के 22 नेताओं के नाम शामिल हैं।

बता दें कि राष्ट्रपति चुनाव के लिए अधिसूचना 15 जून को जारी की जाएगी। नामांकन की अंतिम तिथि 29 जून और नामांकन पत्रों की जाँच 30 जून को निर्धारित की गई है। उम्मीदवार अपना नामांकन दो जुलाई तक वापस ले सकते हैं।

राहुल गाँधी से ED कर रही पूछताछ, प्रियंका भी गईं साथ: जिनको हुड़दंग के लिए कॉन्ग्रेस ने जुटाया वे भी विरोध के मुद्दे से अनजान, हिरासत में कई नेता

नेशनल हेराल्ड से जुड़ी मनी लॉन्ड्रिंग केस में कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी प्रवर्तन निदेशालय के कार्यालय अपनी बहन व पार्टी महासचिव प्रियंका गाँधी के साथ पहुँचे। इस दौरान उनके साथ पार्टी के कई अन्य वरिष्ठ नेता भी साथ रहे। ईडी कार्यालय के बाहर पहुँचते ही सैंकड़ों की तादाद में वह अपने कार्यकर्ताओं के साथ आगे बढ़े। हालाँकि मौके पर तैनात पुलिस ने अन्य लोगों को वहीं रोक दिया और ज्यादा हुड़दंग मचाने वाले व बिन अनुमति इकट्ठा हुए लोग हिरासत में लिए गए। प्रदर्शनस्थल पर कुछ महिलाएँ भी पहुँची जिनसे सवाल किए जाने पर पता चला कि प्रदर्शनस्थल पर इकट्ठा भीड़ को ये भी नहीं पता कि वहाँ हो क्या रहा है।

हिरासत में लिए गए कॉन्ग्रेस नेता

समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार, दिल्ली पुलिस द्वारा हिरासत में लिए गए लोगों में कॉन्ग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी, केसी वेणुगोपाल भी शामिल हैं। पुलिस उन्हें तुगलक रोड थाने में लेकर गई। उनके अलावा दीपेंद्र सिंह हुड्डा, अशोक गहलोत भी हिरासत में लिए गए हैं। इन लोगों को फतेहपुर थाने ले जाया गया है।

बता दें कि राहुल गाँधी के साथ एकजुटता दिखाने के लिए दिल्ली में अलग-अलग राज्यों से कॉन्ग्रेस नेता आए हैं। अधीर रंजन चौधरी जहाँ राहुल गाँधी के साथ न जा पाने के लिए कारण मीडिया में शिकायतें कर रहे हैं। वहीं कार्ति चिदंबरम ने दावा किया है कि ईडी का पूरा केस ही फर्जी है। उन्हें भी ईडी से कई बार नोटिस मिल चुके हैं। इसलिए वो इन मामलों में जानकार हैं।

ईडी कार्यालय के बाहर नारेबाजी

ईडी कार्यालय के बाहर कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ता लगातार राहुल गाँधी जिंदाबाद, जिंदाबाद के नारे बुलंद कर रहे हैं। केंद्र पर जाँच एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगाया जा रहा है। राजस्थान सीएम अशोक गहलोत भी प्रदर्शन में शामिल हुए हैं। उन्होंने कहा है कि देश में जो कुछ भी चल रहा है उसे किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उनके अलावा जयराम रमेश, सचिन पायलट, मल्लिकार्जुन खड़गे, कार्ति चिदंबरम आदि शामिल हैं।

मुद्दे से अंजान महिलाएँ पहुँची प्रदर्शन में

राहुल गाँधी के लिए प्रदर्शन में कुछ महिलाएँ भी आती दिखीं। मीडिया ने जब इन महिलाओं से पूछा कि वो प्रदर्शन में क्यों आई हैं तो बुजुर्ग महिला को कहते सुना गया- “हमारी बात नहीं सुनी जाती, महंगाई बढ़ रही है, हमारा घर कहाँ से चलाएँ।” रिपोर्टर ने पूछा कि क्या वो लोग जानती हैं कि ये प्रदर्शन क्यों हैं। इस पर महिला ने कहा राहुल गाँधी के लिए है इसलिए वो लोग मिलने आई हैं। जब रिपोर्टर ने दोबारा सवाल किया तो महिलाएँ कैमरे से अलग चली गईं।

पुलिस ने प्रदर्शन से किया मना

पुलिस ने इस संबंध में बताया कि कॉन्ग्रेस नेताओं ने उन्हें पिछली रात 200 अधिकारी, सांसदों और वरिष्ठ नेताओं समेत 1000 कार्यकर्ताओं को कॉन्ग्रेस हेडक्वार्टर के बाहर इकट्ठा होने की परमिशन माँगी थी। लेकिन पुलिस ने उन्हें साफ कहा था कि अगर उन्हें इतना बड़ी भीड़ इकट्ठा करनी है तो वो जंतर-मंतर जा सकते हैं। क्षेत्र में धारा 144 लगा दी गई थी। इसलिए पुलिस उन्हें अनुमति नहीं दे सकती थी। पुलिस ने 100 लोगों को जाने की अनुमति दी। फिर आज सुबह पता चला कि 198 लोग कॉन्ग्रेस कार्यालय जाएँगे। बाद में ये लिस्ट 200 हो गई। पुलिस की मानें तो उन्होंने कॉन्ग्रेस नेताओं को इतने लोगों की अनुमति दी और बिन अनुमति के लगी भीड़ से लोगों को हिरासत में लिया। पुलिस ने कहा कि अब हालात स्थिर हैं। किसी प्रकार के प्रदर्शन को अनुमति नहीं दी गई है।

14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजे गए AAP के मंत्री सत्येंद्र जैन, 14 जून को जमानत पर सुनवाई: घर से मिला था 1.80 kg सोना, ₹2.82 करोड़ कैश

दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में आम आदमी पार्टी (AAP) के नेता व दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र कुमार जैन (Satyendra Kumar Jain) को सोमवार (13 जून 2022) को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। प्रवर्तन निदेशालय ने सत्येंद्र जैन को 30 मई की रात को गिरफ्तार किया था। उन पर मनी लॉन्ड्रिंग (Money Laundering Case) का आरोप है। बताया जा रहा है कि कोर्ट दिल्ली के मंत्री की जमानत याचिका पर मंगलवार (14 जून, 2022) को सुनवाई करेगा। यह जमानत याचिका पिछले सप्ताह ही दायर की गई थी।

अदालत में सत्येंद्र जैन की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने पूछताछ के तरीके और ईडी के जाँच के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि जाँच एजेंसी केवल परेशान करने के लिए हिरासत की माँग कर रही है। जैन को डिस्पेप्सिया समेत कई बीमारियाँ हैं। उन्हें कोरोना भी हुआ था और वह ईडी के जाँच के तरीके से परेशान हैं।

उल्लेखनीय है कि 6 जून को प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने ‘आप’ नेता के घर सहित उनके 7 ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापेमारी की थी। इस दौरान ईडी ने 2.82 करोड़ की अघोषित नकदी व 1.80 किग्रा सोना बरामद किया था। इसके बाद ईडी ने 9 जून को मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में जैन को दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट में पेश किया था। उस वक्त भी कोर्ट ने AAP आप नेता को 13 जून तक के लिए ईडी की कस्टडी में भेज दिया था।

क्या है पूरा मामला

गौरतलब है कि साल 2017 में आय से अधिक संपत्ति रखने के मामले में केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) ने मनी लॉन्ड्रिंग के तहत सत्येंद्र जैन के खिलाफ FIR दर्ज की थी। इसी शिकायत के आधार पर प्रवर्तन निदेशालय ने AAP नेता के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया था। जाँच एजेंसी ने ये आरोप लगाया था कि जैन चार कंपनियों से मिली फंडिंग के स्त्रोत के बारे में नहीं बता सके थे, जबकि वो उसमें शेयर होल्डर थे। इन कंपनियों ने कथित तौर पर 2010 से 2014 तक 16.39 करोड़ रुपए की मनी लॉन्ड्रिंग की थी।

मजहब के नाम पर जज्बाती, हिंदुओं के अराध्यों का अपमान: यह खतरनाक खेल, इस हिंसक भीड़ को हिंदुओं का आक्रोश ही झुलसाएगा

विदेशी शक्तियों की दासता से मुक्त हुए 75 वर्ष बीत रहे हैं। देश आजादी का अमृत-महोत्सव मनाने में मस्त है और देश विरोधी ताकतें आजादी के नाम पर उन्माद, आगजनी, भड़काऊ बयानबाजी, हिंसा और तोड़फोड़ में व्यस्त हैं। आम नागरिक डरा-सहमा है और अपराधी तत्व निरंकुश हो रहे हैं। आंदोलनों और विरोध-प्रदर्शनों के नाम पर भीड़ एकत्रित कर जनजीवन को त्रस्त और अशांत बना देना कुछ लोगों के लिए आम बात हो गई है।

भीड़ को पुलिस-प्रशासन का भय नहीं रह गया है। कानून की परवाह नहीं है। दंड की चिंता नहीं है, क्योंकि हिंसा, आगजनी और तोड़फोड़ पर उतारू भीड़ जानती है कि उसके इन आपराधिक कुकृत्यों पर उसे दंडित करने वाली संवैधानिक प्रक्रियाएँ इतनी लंबी हैं कि उसका कुछ बिगड़ने वाला नहीं है। बड़े-बड़े विपक्षी नेता उसके पक्ष में खड़े मिलते हैं और बड़े-बड़े वकील निचली अदालतों से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक उसकी सुरक्षा और उसके हितों की रक्षा के लिए कमर कसकर खडे़ हैं।

जेएनयू में ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ जैसे देश विरोधी नारे लगाने वालों के समर्थन में खड़े बड़े नेताओं और दिल्ली के जहाँगीरपुरी इलाके में दंगाइयों के अवैध निर्माण ढहाने की सरकारी मुहिम को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देकर विफल कर देने बाले कानून के रखवालों की कारगुजारियाँ इस तथ्य को दूर तक स्पष्ट करती हैं। जब शीर्ष नेतृत्व, कानून के मंजे हुए खिलाड़ी और दूर विदेशों तक सक्रिय भारत-विरोधी प्रचारतंत्र तथा गुमनाम आर्थिक शक्तियाँ इस उन्मादी भीड़ की पृष्ठभूमि में पूरी ताकत से सक्रिय हों तो प्रतिकूल विषम परिस्थितियों से पार पाना और भी कठिन हो जाता है।

देश की चुनी हुई संवैधानिक लोकतांत्रिक केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के निर्णयों को उग्र हिंसक आंदोलनों के बल पर बदलने, वापस कराने का यह खतरनाक खेल देश की प्रगति, शांति और सुरक्षा के लिए जितना बड़ा खतरा है, विपक्षी राजनेताओं के लिए भी उतना ही अशुभ और विनाशकारी है, क्योंकि भविष्य के निर्वाचनों में यदि वे सत्ता में आए तो यही हिंसक उन्मादी भीड़ उनकी राजनीति का पथ भी कंटकाकीर्ण कर देगी और तब उनके लिए भी लोकतांत्रिक मान-मूल्यों का संरक्षण करना कठिन होगा। अतः उग्र-हिंसक आंदोलनों को उकसाना, दंगे भड़काना किसी के भी हित में नहीं है। ना सत्तापक्ष के, ना विपक्ष के और ना जनता के। अब यह खतरनाक खेल बंद होना चाहिए।

एक पुरानी फिल्म का गीत है ‘पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए’। यही बात आज हमारे देश में उग्र-हिंसक आंदोलनों के संदर्भ में सत्य सिद्ध हो रही है। रोज किसी न किसी बहाने से उग्र-हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं। कभी किसी राजनीतिक दल की शक्ति प्रदर्शनकारी रैली के नाम पर, कभी आरक्षण अथवा अन्य किसी माँग की पूर्ति के नाम पर, कभी एनआरसी, सीएए अथवा किसान आंदोलन के नाम पर तो कभी किसी धार्मिक उत्सव के अवसर के विरुद्ध एकत्रित की गई भीड़ ध्वंस का नग्न-नृत्य करती ही रहती है। हर बार भीड़ कुछ निर्दोषों की बलि ले लेती है, कुछ पुलिसकर्मी अधिकारी हत-आहत हो जाते हैं, फिर पुलिस फ्लैग मार्च निकालती है, एफआईआर दर्ज होती है, कानून की चक्की धीमी गति से चलती है और तब तक केंद्र अथवा राज्य सरकार बदल जाने पर केस वापस ले लिए जाते हैं।

प्रायः अपराधी अपराध करने के बाद भी दंडित नहीं हो पाते। ऐसी स्थितियों में भीड़ को एकत्रित कर उसे अपने निहित स्वार्थों के लिए देश के विरुद्ध एक प्रभावी शस्त्र के रूप में प्रयोग करना देश-विरोधी और सत्ता की प्रतिपक्षी ताकतों के लिए और भी सहज हो जाता है। इन्हीं कारणों से ये हिंसक प्रदर्शन बराबर बढ़ रहे हैं, बढ़ते ही जा रहे हैं। यदि समय रहते कठोर कदम नहीं उठाए गए तो इन्हें नियंत्रित कर पाना और भी कठिन हो जाएगा।

हमारी संवैधानिक व्यवस्था में अपनी बात रखने का सबको बराबर अधिकार है। किंतु झूठी बयानबाजी करने और मनमाने कृत्यों द्वारा दूसरों की भावनाओं को आहत करने की छूट किसी को नहीं है। भाजपा की प्रवक्ता नूपुर शर्मा के जिस बयान को लेकर जुमे की नमाज के बाद देश में अनेक स्थानों पर उग्र प्रदर्शन हुए वह बयान भी इसी दृष्टि से विचारणीय है। यदि नूपुर शर्मा ने हजरत मोहम्मद साहब के विरुद्ध कोई मनगढ़ंत झूठी बात कहकर उनका अपमान करके संप्रदाय विशेष के लोगों की भावनाओं को आहत किया है तो उनके विरुद्ध भारतीय दंड विधान के अनुरूप न्यायिक कार्यवाही अवश्य होनी चाहिए, किंतु यदि उन्होंने इस्लामी पवित्र ग्रंथों में कथित तथ्यों की ही पुनः प्रस्तुति की है तो फिर इतना बवाल क्यों ?

क्या संप्रदाय विशेष अपने ही ग्रंथों में उल्लिखित तथ्यों के प्रति आस्था और विश्वास नहीं रखता? धार्मिक महापुरुषों और कथित पैगंबरों-अवतारों के जीवन सत्य को आज बदला नहीं जा सकता। उसे उसी रूप में स्वीकार करना होगा जिस रूप में वह उनसे संबंधित मूल प्राचीन ग्रंथों में वर्णित है। अतः विवेचना का विषय यह होना चाहिए कि नूपुर शर्मा के कथन के स्रोत क्या हैं और उन स्रोतों की सत्यता विश्वसनीयता कितनी है? सच को सामने लाए बिना केवल उग्र प्रदर्शन कर जनजीवन को अशांत करना आज के इक्कीसवीं शताब्दी के सभ्य समाज के मस्तक पर कलंक के सिवा कुछ भी नहीं है। इसे प्रदर्शनकारियों का बौद्धिक दिवालियापन ही कहा जा सकता है।

यह भी अत्यंत रोचक और दुखद विषय है कि जिस संप्रदाय विशेष के लोग अपनी धार्मिक भावनाएँ आहत होने के कारण उग्र हिंसक प्रदर्शन पर जब-तब उतर आते हैं वे समाज के अन्य संप्रदायों की भावनाओं के साथ निरंतर खिलवाड़ करते रहते हैं? राँची में हिंसक भीड़ से बचने के लिए मौके पर तैनात पुलिसकर्मियों, पत्रकारों और अन्य धर्मावलंबियों ने मेन रोड स्थित महावीर मंदिर में शरण लेकर अपने प्राण बचाए तो उपद्रवियों ने मंदिर के बंद द्वार और छत पर पत्थर फेंक कर महावीर मंदिर को क्षतिग्रस्त कर दिया। क्या महावीर मंदिर पर हुए इस आक्रमण के कारण इस मंदिर से जुड़े लोगों की भावनाएँ आहत नहीं हुईं?

कैसी विडंबना है कि जो कट्टर मानसिकता पिछले 1000 वर्षों से भी अधिक समय से भारतवर्ष के पूजा स्थलों को नष्ट करती आ रही है, उनकी मूर्तियों को तोड़ती रही है, उनके अश्लील चित्र अंकित करके हर प्रकार से उन्हें अपमानित करने में ही स्वयं को गौरवान्वित मानती है, वह अन्य धर्मावलंबियों द्वारा उनके पैगंबर के संबंध में कुछ कहे जाने मात्र से हिंसा पर उतर आती है। अपने महापुरुष, अपने पूजास्थल और अपनी संस्कृति के सम्मान के प्रति अत्यंत जागरूक इस समुदाय को अन्य धर्मों का सम्मान करना भी सीखना होगा, सीखना भी चाहिए अन्यथा अन्य पक्षों की रोषाग्नि उन्हें भी झुलसा सकती है। शिवाजी का आक्रोश औरंगजेब की सत्ता को कमजोर कर उसे विनाश की ओर ही धकेलेगा।

अनेक मीडिया चैनलों पर प्रसारित होने वाले तथाकथित डिबेट के ऐसे कार्यक्रम भी गंभीर चिंता का विषय हैं। धर्म आदि अत्यंत संवेदनशील ऐसे मुद्दे जो प्रशासनिक एवं न्यायिक स्तरों पर विचाराधीन हैं, उन पर ऐसी बहसों का आयोजन उनकी टीआरपी बढ़ाने की दृष्टि से भले ही उनके लिए लाभप्रद हो किंतु जनमानस पर कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं डाल पाता क्योंकि इन विमर्शों का निष्कर्षहीन अंत कुछ ज्वलंत प्रश्न ही छोड़ता है, कोई सार्थक समाधान नहीं देता। सब जानते हैं कि जो प्रवक्ता जिस धर्म अथवा राजनीतिक दल की ओर से आया है, वह हर प्रकार से अपने पक्ष का ही समर्थन करेगा।

सत्य-असत्य से दूर जाकर तर्कों-कुतर्कों के सहारे प्रस्तुत होने वाली ये बहसें सच को सामने लाने के स्थान पर भ्रांतियाँ ही अधिक निर्मित करती हैं। सामंतवादी युग में तीतर-बटेर और मुर्गों की लड़ाई के प्रदर्शन जैसे यह डिबेट आयोजन समय और श्रम की बर्बादी के साथ-साथ जनता जनार्दन के मध्य वैमनस्य भी उत्पन्न करते हैं। अतः इनकी आवश्यकता भी विचार का विषय है। नूपुर शर्मा का बयान और उससे उपजा बवाल इस दिशा में गंभीरता पूर्वक विचार की अपेक्षा करता है। यदि यह डिबेट नहीं हुई होती तो यह अनावश्यक बवाल भी नहीं होता।

इस प्रकार के उग्र-हिंसक प्रदर्शन भी आतंक का ही एक रूप हैं जो समाज और शासन-प्रशासन पर अनुचित दबाव डालकर अपनी बात मनवाने का प्रयत्न करते हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसे दबाव स्वीकार नहीं किए जा सकते, किए भी नहीं जाने चाहिए, क्योंकि इनसे राज्य-सत्ता की दुर्बलता प्रकट होती है और दबाव डालने वाली अलोकतांत्रिक ताकतों का मनोबल बढ़ता है।

कृषि-विधेयक के विरोध में गणतंत्र दिवस के दिन लाल किले पर हुए तथाकथित किसानों का उग्र खालिस्तानी अलगाववादी प्रदर्शन, शाहीन बाग का प्रदर्शन, कोविड-19 के समय कुछ विशेष बस्तियों के लोगों द्वारा चिकित्सकों और नर्सों पर की गई पत्थरबाजी तथा जब-तब भड़कते दंगों में पुलिस बल पर होने वाले हमले लोकतंत्र के आकाश पर मंडराते गहराते काले बादलों की ओर इशारा कर रहे हैं। सबका साथ और सबका विकास का नारा देकर सबको समान रूप से निशुल्क अन्न बाँटने वाली, आवास और अन्य सुविधाएँ देने वाली सरकार सब का विश्वास जीतने में अभी भी विफल है, क्योंकि हैदराबाद से ओवैसी और कश्मीर घाटी से महबूबा मुफ्ती जैसे नेता अभी भी समुदाय विशेष को बहकाने-भड़काने में लगे हैं।

परिस्थितियाँ विषम हैं। देश एक अघोषित अराजक आपातकाल की ओर जा रहा है। राजनेता अपने-अपने दलों का हित ध्यान में रखकर निर्णय ले रहे हैं। अतः हम नागरिकों का दायित्व है कि वर्ग, धर्म आदि के खांचों में विभाजित राजनीति और उसके रहनुमाओं के चंगुल से निकलकर देशहित में स्वयं निर्णय लें और आपराधिक मानसिकता वाले कथित नेताओं के हाथों में हथियार बन कर अपने ही देश की देह लहूलुहान ना करें। राष्ट्र की एकता, अखंडता और स्वायत्तता के लिए समर्पित हों।

(लेखक डॉ. कृष्णगोपाल मिश्र, शासकीय नर्मदा स्नातकोत्तर महाविद्यालय, नर्मदापुरम् (मध्य प्रदेश) में हिन्दी के विभागाध्यक्ष हैं)

पूर्व नियोजित था हैदराबाद गैंगरेप, खरीदे गए थे कंडोम: 6 आरोपितों में सदुद्दीन मलिक एकमात्र बालिग़, पुलिस खँगाल रही कॉल रिकार्ड्स

हैदराबाद गैंगरेप मामले में बड़ा खुलासा हुआ है। शुरुआती सबूतों से पता चला है कि 28 मई को जुबली हिल्स में 17 वर्षीय लड़की का सामूहिक बलात्कार पूर्व नियोजित था। इसे अंजाम देने के लिए पूरी तैयारी की गई थी।  

एक पुलिस अधिकारी ने रविवार (12 जून 2022) को टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए कहा, “चार नाबालिगों और एक बालिग सहित पाँच आरोपितों ने पूर्व नियोजित तरीके से अपराध को अंजाम दिया। उनके पास कंडोम भी था और अपराध करते समय उन्होंने प्रोटेक्शन का भी इस्तेमाल किया था।” अब पुलिस अधिकारी यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि आरोपितोंको कंडोम कहाँ से मिला।

बता दें कि आरोपितों को हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है। इस दौरान यह भी जानने की तफ्तीश की जा रही है कि आरोपितों ने पब में जाने से पहले कंडोम खरीदा था या फिर पब से निकल कर बेकरी और फिर रोड नंबर 44 पर वारदात को अंजाम देने के लिए जाने के दौरान खरीदा था। पुलिस ने सभी आरोपियों के कॉल डेटा रिकॉर्ड (CDR) को भी खँगाला है और सोमवार (13 जून, 2022) को उनसे आगे की पूछताछ में इसके बारे में सवाल-जवाब किया जाएगा। अधिकारी ने बताया कि इससे पता चलेगा कि अपराध को अंजाम देने के दौरान कौन-कौन से आरोपित पीड़िता के साथ संपर्क में था।

इस बीच, रविवार को नाबालिग समेत सभी छह आरोपितों को क्राइम का सीन रीक्रिएट करने के लिए जुबली हिल्स रोड नंबर 44 पर ले जाया गया, ताकि घटनाओं के सीक्वेंस को एक साथ जोड़कर समझा जा सके कि अपराध को किस तरह से अंजाम दिया गया और फिर इसके बाद वो लोग कहाँ फरार हो गए थे। हालाँकि, पुलिस सूत्रों ने कहा कि आरोपितों द्वारा दिए गए बयानों में कुछ असमानताएँ थीं। एक सूत्र ने कहा, “कॉल रिकॉर्ड के आधार पर हमें उनसे दोबारा पूछताछ करने की जरूरत है।”

रविवार को पूछताछ के दौरान आरोपित ने पीड़िता को मिलनसार बताया और कबूल किया कि उन्होंने उसके ‘दोस्ताना रवैये’ का फायदा उठाकर उसका यौन शोषण किया। अधिकारी ने कहा, “यह मायने नहीं रख सकता कि किसने पहले उसका बलात्कार किया और किसके उकसावे पर किया, सच्चाई यही है कि सभी लड़के अपराध में शामिल थे।” पुलिस उस्मानिया जनरल अस्पताल (OGH) के डॉक्टरों से पाँचों मुख्य आरोपितों की शक्ति परीक्षण रिपोर्ट (Potency Test) का इंतजार कर रही है।

गौरतलब है कि पिछले दिनों यह बात भी सामने आई थी कि नाबालिग से गैंगरेप को अंजाम देने के लिए सरकारी गाड़ी का इस्तेमाल हुआ था। आरोपितों की निशानदेही पर वह इनोवा जब्त कर ली गई। पुलिस कमिश्नर सीवी आनंद ने बताया था कि यह गाड़ी एक वरिष्ठ नेता को अलॉट की गई थी। इस मामले में कुल 6 गिरफ्तारी हुई है। इनमें से 5 नाबालिग हैं। एकमात्र बालिग आरोपित की पहचान सदुद्दीन मलिक बताई गई।

UK ने इमाम को पद से हटाया, पैगंबर मुहम्मद की बेटी पर बनी फिल्म का किया था विरोध: सिनेमाघरों के बाहर जुटी है मुस्लिम भीड़, कई शो रद्द

यूनाइटेड किंगडम ने पैगंबर मुहम्मद की बेटी पर बनी फिल्म का विरोध करने वाले इमाम को सलाहकार पद से हटा दिया है। इस फिल्म पर ‘ईशनिंदा (Blasphemy)’ का आरोप लगाते हुए ब्रिटेन में हजारों मुस्लिम सड़क पर हैं। इसी क्रम में इमाम कारी मुहम्मद असीम ने भी सिनेम हॉल्स को ये फिल्म न लगाने को कहा था। लीड्स स्थित मक्का मस्जिद के मुखिया इमाम कारी मुहम्मद असीम को इस्लामोफोबिया पर सरकार ने सलाहकार बनाया हुआ था।

साथ ही वो ‘एंटी मुस्लिम हेट्रेड वर्किंग ग्रुप (मुस्लिम विरोधी घृणा कार्यकारी समूह)’ का अध्यक्ष भी था। इस पद से भी उसे मुक्त कर दिया गया है। ये सारा विवाद ‘The Lady Of Heaven’ नामक फिल्म को लेकर हो रहा है, जिसमें पैगंबर मुहम्मद की बेटी फातिमा की कहानी दिखाई गई है। इंग्लैंड के कई शहरों में इस फिल्म की स्क्रीनिंग के खिलाफ मुस्लिम भीड़ प्रदर्शन करने में लगी हुई है। इमाम ने इस फिल्म को इस्लाम को नीचे दिखाने वाला बताया था।

उसने कहा था कि इससे मुस्लिमों को काफी दर्द पहुँचा है और उनकी भावनाएँ आहत हुई हैं। यूके सरकार ने एक पत्र में कहा है कि उसकी सेवाएँ त्वरित रूप से ख़त्म करने के अलावा अब कोई विकल्प नहीं बचा है। सरकार ने कहा है कि फिल्म के विरोध में चल रहे अभियान से सांप्रदायिक तनाव पैदा हुआ है और इमाम ने इस अभियान को समर्थन देकर फ्री स्पीच के विरुद्ध काम किया है। इसीलिए, सांप्रदायिक अमन-चैन कायम करने के सरकार के प्रयासों में उसका कोई रोल न बताते हुए उसे हटा दिया गया है।

यूके सरकार ने कहा, “कई सिनेमाघरों के बाहर जो दृश्य हैं, उन्हें आपने देखा-सुना होगा। इसमें मजहबी नारों के साथ शिया समुदाय के खिलाफ घृणा फैलाई जा रही है। इसका हमें विरोध करना चाहिए, अगर हमें मुस्लिम विरोधी घृणा से निपटना है तो। आप इस तरह की करतूतों की निंदा करने में विफल रहे हैं।” बता दें कि ‘Cineworld’ थिएटर चेन ने सबसे पहले इस फिल्म की स्क्रीनिंग्स को रद्द किया। कारी इमाम ने कई इमामों के साथ मिल कर सिनेमघरों से बात कर के और प्रदर्शन कर के स्क्रीनिंग्स रद्द कराने की योजना बनाई थी।

इस फिल्म में ईराक में युद्ध की कहानी दिखाते हुए 1400 साल पहले पैगंबर मुहम्मद की बेटी फातिमा की कहानी बताई गई है, जिन्हें बुर्के में दिखाया गया है। फिल्म के एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर मलिक शिबाक को सोशल मीडिया पर जान से मार डालने की धमकियाँ मिली हैं। उन्होंने कहा कि इस देश में बोलने और अभिव्यक्त करने की आज़ादी है, इसीलिए फिल्म को रोकना सही नहीं है। उन्हें काफिर बताया जा रहा है। हालाँकि, उनका कहना है कि वो इन सबसे डरने वाले नहीं हैं।

‘ये काफिर हैं इन्हें मत छोड़ो’: प्रयागराज की अटाला मस्जिद का इमाम गिरफ्तार, फिरोजाबाद में दंगाइयों के लगे पोस्टर; UP में जुमे की हिंसा को लेकर 300 से अधिक गिरफ्तार

प्रयागराज की बड़ी अटाला मस्जिद के इमाम अली अहमद को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। उस पर 10 जून 2022 को जुमे की नमाज के बाद भीड़ को भड़काने का आरोप है। रिपोर्ट के अनुसार इमाम ने पुलिस वालों को काफिर कह कर उन पर हमले के लिए उकसाया था। इसके बाद हुई हिंसा और आगजनी को लेकर दर्ज FIR में इमाम को नामजद किया गया था। 12 जून 2022 (रविवार) को उसकी गिरफ्तारी हुई।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इमाम अली अहमद के ही भड़काने के बाद भीड़ ने पुलिस पर पथराव शुरू कर दिया था। इसी के बाद हिंसा की शुरुआत हो गई जिसमें कई अधिकारी और पुलिसकर्मी घायल हो गए थे। प्रयागराज हिंसा में गिरफ्तार हो चुके इमाम अली अहमद और जावेद पंप के अलावा जीशान रहमानी, सारा अहमद, पार्षद मोईनुद्दीन और वामपंथी विचारधारा के आशीष मित्तल मुख्य आरोपितों के तौर पर शामिल हैं। पुलिस बाकी आरोपितों की तलाश कर रही है।

रिपोर्ट के मुताबिक अली अहमद ने भीड़ को भड़काने के लिए मस्जिद के लाऊडस्पीकर का प्रयोग किया था। आरोप है कि उसने पुलिस वालों की तरफ इशारा करते हुए कहा था कि ये काफिर हैं इन्हें मत छोड़ो। अली अहमद से पुलिस की पूछताछ जारी है। इस केस में 80 नामजद आरोपित हैं। 5 हजार अज्ञात आरोपित भी हैं। जावेद पंप के बाद AIMIM प्रयागराज के जिलाध्यक्ष शाह आलम भी पुलिस की रडार पर है।

फिरोजाबाद में लगे पोस्टर

फ़िरोज़ाबाद में 10 जून को जुमे की नमाज़ के बाद उपद्रव करने वालों के पोस्टर चिपकाए गए हैं। पोस्टर में दिख रहे 18 आरोपितों की पहचानने वालों से उनकी जानकारी पुलिस को देने की अपील की गई है। पुलिस ने सूचना और सुराग देने वालों का नाम व अन्य जानकारी गुप्त रखने का भी भरोसा दिया है। फ़िरोज़ाबाद में 8 नामजद और 80 अज्ञात लोगों पर केस दर्ज किया गया है। अब तक 15 लोगों की गिरफ्तारी की भी खबर है।

UP में 300 से अधिक दंगाई गिरफ्तार

गौरतलब है कि UP पुलिस ने अब तक जुमे की नमाज़ के बाद हिंसा करने और कानून तोड़ने वाले 300 से अधिक आरोपितों को गिरफ्तार किया है। 9 जिलों में अब तक कुल 13 FIR दर्ज हुई हैं। इसमें सहारनपुर में 84, हाथरस में 51, अंबेडकरनगर में 34, प्रयागराज में 92, मुरादाबाद में 35, फिरोजाबाद में 15, अलीगढ़ में 6 और जालौन में 2 आरोपित शामिल हैं।

शक्ति कपूर का बेटा सिद्धांत बेंगलुरु के होटल से ड्रग्स केस में गिरफ्तार, रिपोर्ट पॉजिटिव: बेटी श्रद्धा कपूर से भी NCB कर चुकी है पूछताछ

बेंगलुरु के होटल में चल रही रेव पार्टी पर रेड के दौरान पुलिस ने बॉलीवुड अभिनेत्री श्रद्धा कपूर के भाई सिद्धांत कपूर को हिरासत में लिया है। सिद्धांत होटल के कमरे में मौजूद उन 6 लोगों में से एक हैं जिन्होंने रेड के दौरान ड्रग्स लिए हुए थे।

पुलिस ने बताया कि उन्होंने छापेमारी के बाद कुछ लोगों हिरासत में लेकर इनका टेस्ट कराया था जिसमें सिद्धांत की रिपोर्ट पॉजिटिव आई। बेंगलुरु सिटी के डीसीपी डॉ भीमाशंकर गुलेड ने बताया कि पुलिस अब सिद्धांत को अपने साथ उलसूर थाने ले गई है।

बता दें कि सिद्धांत कपूर बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता शक्ति कपूर के बेटे और फेमस एक्ट्रेस श्रद्धा कपूर के भाई हैं। बॉलीवुड में उन्होंने अपने करियर की शुरुआत शूटआउट एड वडाला से की थी। इसके बाद वह अनुराग कश्यप की ‘अगली’ में नजर आए और फिर उन्होंने अपने बहन के साथ ‘हसीना पार्कर’ में भी किरदार निभाया था। तमाम कोशिशों के बावजूद सिद्धांत का बॉलीवुड सफर सफल नहीं माना जाता है। वहीं उनकी बहन बॉलीवुड में अच्छा नाम कमा चुकी हैं।

जानकारी के लिए बता दें कि जिस तरह सिद्धांत कपूर का नाम अचानक से ड्रग मामले में सामने आया है। वैसे ही उनकी बहन भी साल 2020 में ड्रग केस में काफी चर्चा में रही थीं। सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या मामले में ड्रग एंगल खुलने के बाद श्रद्धा से पूछताछ हुई थी। श्रद्धा ने सुशांत के साथ पार्टी की बात कुबूल की थी लेकिन ड्रग्स लेने से इनकार कर दिया था। वहीं जया साहा नाम ने स्वीकार किया था कि उन्होंने जो सीबीडी ऑयल खरीदा वो श्रद्धा के लिए ही था।