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बुर्किनी पहनकर नहीं नहा सकेंगी मुस्लिम महिलाएँ, फ्रांस की अदालत ने लगाया बैन

फ्रांस की एक अदालत (French Court) ने उस फैसले को रद्द कर दिया है, जिसमें मुस्लिम महिलाओं को स्विमिंग पूल या समुद्र बीच पर बुर्किनी पहनने की इजाजत दी गई थी। यानी अब मुस्लिम महिलाएँ सार्वजनिक पूल में बुर्किनी नहीं पहन सकेंगी। फ्रांस के गृह मंत्री गेराल्ड डारमैनिन अपने ट्विटर हैंडल पर इसकी जानकारी दी है। डारमैनिन ने कहा, “प्रशासनिक अदालत का मानना ​​है कि ग्रेनोबल के मेयर का पूल में बुर्किनी पहनने की अनुमति देने का फैसला धर्मनिरपेक्षता को गंभीर रूप से कमजोर करने वाला है।”

डारमैनिन ने आगे कहा कि ग्रेनोबल के मेयर का बुर्किनी पहनने की छूट देने वाला फैसला 2021 के अलगाववाद कानून पर आधारित था, जो फ्रांस के सेक्युलिरज्म के बिल्कुल उलट था। राष्ट्रपति चुनाव के दौरान इमैनुल मैक्रों को कड़ी टक्कर देने वाली फ्रांस की दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन का कहना है कि वह स्विमिंग पूल में बुर्किनी पर प्रतिबंध लगाने वाला कानून लाना चाहती हैं। वहीं फ्रांस में मुस्लिम अधिकारों की रक्षा करने वाले संगठनों ने बुर्किनी के प्रतिबंध को उनके मौलिक अधिकारों का हनन और मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभाव करने वाला बताया है।

दरअसल, ग्रेनोबल शहर के मेयर ने 16 मई को मुस्लिम महिलाओं को पूल में बुर्किनी पहनने की मंजूरी दी थी। उस समय मेयर पियोल ने फ्रांस के रेडियो RMC पर कहा था, “हम सिर्फ इतना चाहते हैं कि महिलाएँ और पुरुष अपनी मर्जी से कपड़े पहन सकें।” गेराल्ड डारमैनिन ने ग्रेनोबल के मेयर के फैसले को नामंजूर करते हुए इसे भड़काऊ बताया था। उन्होंने कहा था, “ग्रेनोबल शहर के मेयर का बुर्किनी पहनने की छूट देने वाला फैसला सेक्यूलरिजम को कमजोर करने वाला है। कोर्ट ने जो फैसला लिया है वो 2021 में लाए गए अलगाववाद कानून पर आधारित है।” डारमैनिन ने मेयर के फैसले को फ्रांस के सेक्युलिरज्म के उलट बताते हुए इसे कोर्ट में चैलेंज करने को कहा था।”

उल्लेखनीय है कि फ्रांस में बुर्किनी का मुद्दा हमेशा से विवादों में रहा है। यूरोपीय देश फ्रांस में मुस्लिमों की आबादी लगभग 50 लाख है। यूरोपीय यूनियन के किसी देश में इतनी मुस्लिम आबादी नहीं है। फ्रांस में वर्ष 2010 में राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी ने सार्वजनिक जगहों पर पूरे चेहरे को ढकने पर प्रतिबंध लगा दिया था। उनका मानना था कि हिजाब या बुर्का महिलाओं के साथ अत्याचार है, यहाँ इसे किसी कीमत पर मंजूरी नहीं दी जा सकती। फ्रांस बुर्के पर प्रतिबंध लगाने वाला पहला यूरोपीय देश बना था।

क्या है अलगाववाद कानून?

इस कानून के तहत सरकार लोकल एडमिनिस्ट्रेशन के फैसलों को चुनौती दे सकती है, क्योंकि फ्रांस में सेक्यूलरिज्म को लेकर बहुत सख्त कानून लागू है। अगर इनके खिलाफ लोकल एडमिनिस्ट्रेशन या राज्य सरकारें कोई नियम बनाती हैं, और केंद्र सरकार इसे कोर्ट में चैलेंज कर देते हैं तो कोर्ट इन नियमों को रद्द कर देते हैं। ग्रेनोबल में बुर्किनी को लेकर मेयर का फैसला इसी कानून के तहत पलटा गया।

हिंदू युवती से सैफ ने रेप किया, अब्बा और साथियों से भी करवाया; गोमांस खिला कलमा पढ़वाया: आठ महीने तक बंधक बनी रही पीड़िता

लव जिहाद का एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। इसमें हिंदू युवती को फँसाकर सैफ अंसारी पर रेप करने, अपने परिजनों से भी रेप करवाने, उसका जबरन धर्मांतरण करवाने, गोमांस खिलाने और कलमा पढ़वाने का आरोप लगा है।

आरोपित सैफ अंसारी मूल रूप से बिहार के रोहतास जिले का रहने वाला है। उस पर पीड़िता को दिल्ली, गुरुग्राम और बिहार में बंधक बनाकर रखने का भी आरोप है। पीड़िता ने 13 मई 2022 को इस संबंध में गुरुग्राम में FIR दर्ज करवाई थी। अब दिल्ली पुलिस मामले की जाँच कर रही है।

पीड़िता की उम्र लगभग 26 साल है। जागरण की रिपोर्ट के मुताबिक पीड़िता गुरुग्राम में नौकरी करती थी। वह मेट्रो से रोज दिल्ली से आती-जाती थी। इस दौरान एक दिन इफ्को चौक मेट्रो पर उसकी मुलाकात सैफ से हुई। सैफ मेट्रो के बाहर बस स्टैंड पर नौकरी करता था। एक दिन सैफ ने पीड़िता से कोरोना में अपनी नौकरी जाने का बहाना बनाकर उसके ऑफिस में नौकरी के नाम पर बातचीत शुरू की। इस दौरान दोनों ने मोबाइल नंबर शेयर हो गए। धीरे-धीरे दोनों में दोस्ती हुई और सैफ ने उसे शादी का ऑफर दिया।

बताया जा रहा है कि सैफ के शादी के प्रस्ताव को पीड़िता ने खुद को हिन्दू बताते हुए ठुकरा दिया। फिर भी सैफ पीड़िता का पीछा करता रहा। 6 सितंबर 2021 को उसने लड़की को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन बुलाया। वहाँ बुलाने की वजह सैफ ने खुद को रोते हुए अपने गाँव बिहार जाना बताया। पीड़िता के आने पर सैफ ने उसको बिरयानी खिलाई, जिससे उसकी तबीयत बिगड़ गई। इस दौरान आरोपित पीड़िता को पहाड़गंज के एक होटल में ले गया। वहाँ पीड़िता के साथ दुष्कर्म कर वीडियो बना ली। आरोप है कि इस दौरान उसकी पिटाई भी की गई और सिगरेट से जलाया भी गया।

पीड़िता का आरोप है कि वीडियो से ब्लैकमेल कर सैफ उसे बिहार के रोहतास ले गया। वह कोढ़ीगोला थाना क्षेत्र के बुधुआ गाँव का रहने वाला है। वहाँ 4 दिनों तक सैफ के अब्बा और उसके अन्य साथियों पर पीड़िता से रेप का आरोप है। इसके बाद सैफ लड़की को लेकर गुरुग्राम आ गया। गुरुग्राम में पीड़िता को सैफ ने अपनी बुआ का घर रखा। यहाँ भी वो लड़की से लगातार दुष्कर्म करता रहा।

शिकायत के मुताबिक दिसंबर 2021 में सैफ और उसके रिश्तेदारों ने पीड़िता पर कलमा पढ़ने का दबाव बनाया। इनकार करने पर उसे काट कर बोरे में बाँध कर फेंक देने की धमकी दी। बाद में लड़की की गर्दन पर चाकू रख कर मुस्लिम बनने की धमकी दी गई। इस दौरान सैफ की बुआ ने उसे जबरन गोमांस खिलाया और कलमा पढ़वाया।

आखिरकार लगभग 8 माह बाद पीड़िता आरोपित की बुआ के घर से भागकर पुलिस के पास पहुँच पाई। गुरुग्राम पुलिस ने सैफ, उसके अब्बा शाहिद अंसारी, उसकी बुआ, उसके चाचा और सैफ के आधे दर्जन दोस्तों के खिलाफ FIR दर्ज कर केस दिल्ली के पहाड़गंज थाने में ट्रांसफर कर दिया। एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक आरोपित सैफ अपने गाँव की भी एक लड़की के साथ ऐसी ही हरकत कर चुका है। गाँव वालों की नाराजगी के चलते वह दिल्ली में लगभग डेढ़ साल से रहने लगा था। सैफ की अम्मी 10 साल पहले उसके अब्बा को छोड़ कर किसी और से निकाह कर चुकी है।

ऑपइंडिया ने इस घटना की जानकारी ले लिए दिल्ली पुलिस की DCP सेंट्रल को फोन किया तो उन्होंने फोन नहीं उठाया। पुलिस से बात होते ही हम इस खबर को अपडेट करेंगे।

कर्नाटक में फिर लौटा हिजाब का जिन्न: मंगलुरु यूनिवर्सिटी में हिजाब पहन आ रही मुस्लिम छात्राएँ, विरोध में ‘भगवा गमछे’ में कॉलेज आने की चेतावनी

कर्नाटक (Karnataka) में फिर से हिजाब को लेकर बवाल शुरू हो गया है। पहले यह विवाद उडुपी से शुरू हुआ था। अब मंगलुरु इसका केंद्र है। मंगलुरु यूनिवर्सिटी कॉलेज की मुस्लिम छात्राओं के एक समूह ने हिजाब पहनकर क्लासरूम में आने की इजाजत माँगते हुए मेमोरेंडम दिया है। इन छात्राओं का कहना है कि हजाब यूनिफॉर्म का ही हिस्सा है।

आरोप है कि कुछ मुस्लिम छात्रा हिजाब पहनकर क्लास अटैंड भी कर रही हैं। इसके विरोध में हिंदू छात्रों ने भगवा शॉल और भगवा गमछे में कॉलेज आने की चेतावनी दी है। बताया जा रहा है कि कर्नाटक हाई कोर्ट की रोक के बावजूद मुस्लिम छात्राएँ फैसला मानने को राजी नहीं है। रोक के बाबजूद वे हिजाब में मंगलुरु यूनिवर्सिटी में आ रही हैं। विरोध में गुरुवार (26 मई 2022) को छात्र संगठन ABVP ने यूनिवर्सिटी कैंपस में प्रदर्शन किया। 

उनके आरोप है कि हाई कोर्ट के फैसले के बाद भी मुस्लिम छात्राएँ हिजाब (Hijab Row) पहन कर कॉलेज आ रही हैं और कॉलेज प्रशासन इस पर एतराज नही कर रहा है। एक प्रदर्शनकारी छात्र ने दावा किया कि 44 छात्राएँ हिजाब पहनकर कॉलेज आती हैं और इनमें से कुछ इसे पहन कक्षाओं में भी शामिल हो रही हैं। प्रदर्शन के दौरान मंगलुरु यूनिवर्सिटी के हिंदू छात्र-छात्राओं ने चेतावनी दी कि अगर कैंपस में कोर्ट के आदेशों का पालन नहीं करवाया गया तो वे भी भगवा साफा पहन कॉलेज आना शुरू करेंगे।

यूनिवर्सिटी ने गुरुवार (26 मई 2022) शाम एक नोटिफिकेशन जारी कर कैंपस में किसी भी धार्मिक लिबास के इस्तेमाल की इजाजत ना होने की बात दोहराई। वहीं मुस्लिम छात्राओं ने माना कि उन्हें कॉलेज प्रशासन की ओर से हिजाब की इजाजत नहीं दी गई थी। लेकिन उन्होंने इस मुद्दे पर वाइस चांसलर से लेकर डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर तक मुलाकात की थी। 

बता दें कि मंगलुरु यूनिवर्सिटी की मुस्लिम छात्राओं ने डिप्टी कमिश्नर को एक मेमोरेंडम सौंपा है। इसमें छात्राओं ने क्लासरूम में हिजाब पहनने देने की अनुमति माँगी है। एक छात्रा फातिमा ने कहा, “कोर्ट के आदेश के बाद कुछ नहीं हुआ था। हमने शांतिपूर्ण तरीके से परीक्षाएँ दीं। हमें हाल ही में बिना हिजाब के कक्षाओं में जाने का एक अनौपचारिक नोट मिला है। हम हाई कोर्ट के आदेश के साथ प्रिंसिपल के पास गए और उनसे बात करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि वह कुछ नहीं कर सकते। वाइस चांसलर ने भी ऐसा ही कहा।”

कुछ मुस्लिम छात्राओं ने दावा किया कि उन्होंने हिजाब नहीं पहना था। उन्होंने अपने सिर को कॉलेज की यूनिफॉर्म के स्कार्फ से ढका था और कहा था कि कॉलेज के प्रॉस्पेक्टस के अनुसार इसकी अनुमति है। उन्होंने कहा कि अब यूनिवर्सिटी सिंडिकेट ने हिजाब के रूप में यूनिफॉर्म के स्कार्फ के इस्तेमाल पर अचानक प्रतिबंध लगा दिया है।

बता दें कि 16 मई को मैंगलोर विश्वविद्यालय के सिंडिकेट ने छात्रों के लिए एक ड्रेस कोड लागू करने को मँजूरी दी थी। इसमें हिजाब पहनने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया था।

एबीवीपी नेताओं ने कॉलेज प्रबंधन से यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया कि सभी छात्र सिंडिकेट के आदेश का पालन करें। कॉलेज प्रिंसिपल प्रो. अनसूया राय ने कहा कि सिंडिकेट के हालिया निर्णय के बारे में छात्रों को जागरूक करने के बावजूद कई लोग इसका पालन करने से कतरा रहे हैं। उन्होंने कहा, “वे दावा कर रहे हैं कि निर्णय कानूनी नहीं है। हमने छात्रों को 27 मई से रेस्टिंग रूम में हिजाब हटाने का निर्देश दिया है और इसका उल्लंघन करने वाले छात्रों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की जाएगी।” वहीं यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रो। पी सुब्रमण्य यदापादिथ्या ने इस मुद्दे पर यूनिवर्सिटी कॉलेज प्रबंधन के साथ शुक्रवार (27 मई 2022) को इमरजेंसी मीटिंग बुलाई है।

क्या है विवाद?

कर्नाटक में हिजाब विवाद की शुरुआत इस साल के जनवरी महीने में उडुपी जिले से हुई थी। यहाँ सरकारी पीयू कॉलेज में 6 मुस्लिम छात्राओं को हिजाब पहनकर कक्षा में प्रवेश नहीं दिया गया था। स्कूल प्रशासन का कहना था कि छात्राएँ पहले हिजाब पहनकर नहीं आती थी, स्कूल में समान ड्रेस के कारण के कारण यह कदम लिया गया था। इसके बाद छात्राओं ने कर्नाटक हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। धीरे-धीरे यह विवाद पूरे राज्य में फैल गया था और इस कारण कई दिनों तक स्कूलों को भी बंद करना पड़ा था। 

हाई कोर्ट ने खारिज की याचिका

हिजाब पहनने को लेकर मामले की सुनवाई एकल पीठ में हुई थी। इसके बाद मामले को बड़ी बेंच के पास भेज दिया गया था। मुख्य न्यायाधीश रितु राज अवस्थी की अध्यक्षता वाली पीठ ने 15 मार्च को फैसला सुनाते हुए छात्राओं की याचिका को खारिज कर दिया था। छात्राओं की दलील थी कि हिजाब पहनना उनका संवैधानिक अधिकार है। हालाँकि, कोर्ट ने यह कहते हुए उनकी याचिका खारिज कर दी कि हिजाब पहनना इस्लाम में एक अनिवार्य प्रथा नहीं है। 

जिस कश्मीरी अभिनेत्री को मारी गोली उसे इस्लाम के नाम पर दी जा रही थी गाली, हत्यारों को शाबाशी: अमरीना की हत्या करने वाले आतंकी ढेर

जम्मू-कश्मीर के बड़गाम में कश्मीरी एक्टर अमरीना भट्ट की हत्या करने वाले आतंकियों को सुरक्षा बलों ने मुठभेड़ में मार गिराया है। मारे गए आतंकियों की पहचान शाहिद मुश्ताक़ भट्ट और फरहान हबीब के तौर पर हुई है। दोनों लश्कर-ए-तैय्यबा से जुड़े थे। अमरीना की हत्या का ऑर्डर लश्कर कमांडर लतीफ़ ने दिए थे। कश्मीर पुलिस ने यह जानकारी 27 मई 2022 (शुक्रवार) को दी।

पुलिस के मुताबिक दोनों आतंकियों को 26 मई की रात घेर लिया गया था। दोनों की लोकेशन पुलवामा जिले के अवंतीपोरा में मिली थी। मुठभेड़ के बाद देर रात दोनों के मारे जाने की पुष्टि हुई। आतंकियों के पास से AK-56, मैगजीन और पिस्टल भी बरामद हुआ है।

पुलिस के मुताबिक आतंकी शाहिद मुश्ताक भट्ट बड़गाम के हफरू चंडूरा का रहने वाला था। दूसरा आतंकी फरहान हबीब पुलवामा के हकरीपोरा का निवासी है। दोनों अभी हाल ही में लश्कर में शामिल हुए थे।

गौरतलब है कि 25 मई 2022 को आतंकियों ने कश्मीरी अभिनेत्री अमरीना भट्ट की गोली मार कर हत्या कर दी थी। अमरीना भट्ट पर हमला बड़गाम के चाडूरा इलाके में हुआ था। हमले में उनका 10 साल का भतीजा भी घायल हुआ था जिसका इलाज चल रहा है।

यह बात भी सामने आई है कि अमरीना को हत्या से पहले कट्टरपंथी सोशल मीडिया पर इस्लाम की दुहाई देकर गाली दे रहे थे। उनकी हत्या के बाद कई लोग सोशल मीडिया पर जश्न मनाते भी दिखे। इंडिया टुडे की एंकर पूजा शाली ने अमरीना को दी गई गालियों के कुछ स्क्रीनशॉट्स शेयर किए हैं। इसके मुताबिक 4 सप्ताह पहले आसिफ बशीर ने अमरीना की फोटो पर लिखा था, “मुसलमानों का नाम बदनाम किया है आपने आंटी समझी।” इम्मू इमरान ने लिखा था, “अरे शर्म करो पागल औरत। क्या बनेगा तुम्हारा? खुदा का खौफ नहीं है तुम्हारे दिल में बदतमीज बेशर्म?”

अमरीना की हत्या के बाद एक अन्य स्क्रीनशॉट में मुशर्रफ अल्ताफ वानी लिखता है, “यह सुन कर ख़ुशी हुई कि अज्ञात बंदूकधारियों ने टिकटॉक गर्ल को मार डाला है। मुझे उन अज्ञात बंदूकधारियों पर गर्व है।” अमान रऊफ ने लिखा, “आख़िरकार तुम जिस लायक थी वो तुम्हें मिला। कम से कम तुम्हे पता चला कि जो तुम कर रही थी वो गलत था।” 33_Daniyal नाम की प्रोफ़ाइल से अमरीना के कातिलों को शाबाशी दी गई है। इसके अलावा शेंफू मालिक और शौकत आदि ने भी अमरीना की प्रोफ़ाइल पर अपमानजनक कमेंट किए हैं।

दिल्ली के स्टेडियम में कुत्ता घुमाने वाले IAS का लद्दाख ट्रांसफर, अफसर पत्नी भेजी गईं अरुणाचल: नेटिजन्स बोले- कुत्ता कहाँ जाएगा

दिल्ली के त्यागराज स्टेडियम में कुत्ते के साथ वॉक करने वाले आईएएस अधिकारी संजीव खिरवार (Sanjeev Khirwar) का लद्दाख ट्रांसफर कर दिया गया है। उनकी IAS पत्नी रिंकू दुग्गा (Rinku Dugga) का तबादला अरुणाचल प्रदेश किया गया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा एजीएमयूटी कैडर के दोनों अधिकारियों का ट्रांसफर किए जाने के बाद नेटिजन्स पूछ रहे हैं कि कुत्ते का क्या होगा। वह कहाँ जाएगा।

आईएएस दंपती का तबादला उन खबरों के सामने आने के बाद किया गया है जिनमें कहा गया था कि खिरवार त्यागराज स्टेडियम में शाम के समय अपने कुत्ते के साथ वॉक पर जाते हैं। इस दौरान खिलाड़ियों और कोच को स्टेडियम छोड़ने के लिए मजबूर किया जाता है। तबादले से पहले तक खिरवार दिल्ली के प्रधान सचिव (राजस्व) थे।

ट्रांसफर ऑर्डर के बाद कुछ यूजर्स गृह मंत्रालय की कार्रवाई से खुश हैं और आदेश की सराहना कर रहे हैं।

ट्विटर पर नावीद नाम के एक यूजर मीम के जवाब में कहते हैं, “पति-पत्नी कहीं भी रहे, कुत्ता तो दिल्ली में ही रहेगा।” इस पर एक अन्य यूजर कहता है, “कुत्ता एक दिन पत्नी के पास रहेगा, एक दिन पति के पास।”

जानिए क्या है पूरा मामला

गौरतलब है कि त्यागराज स्टेडियम दिल्ली सरकार के अधीन आता है। 2010 में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान यह स्टेडियम बना था। यहाँ राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय एथलीटों के साथ ही फुटबॉल खिलाड़ी प्रैक्टिस करते हैं। लेकिन, गुरुवार (25 मई 2022) को मीडिया में यह खबर सामने आई थी कि पिछले कुछ समय से एथलीट और कोच परेशान हैं। इंडियन एक्सप्रेस को एक कोच ने बताया था, “हम पहले यहाँ 8-8:30 बजे तक ट्रेनिंग कराते थे। लेकिन अब हमें शाम के 7 बजते ही स्टेडियम छोड़ने के लिए कहा जाता है ताकि अधिकारी अपने कुत्ते को टहला सकें। इस वजह से हमारी ट्रेनिंग और प्रैक्टिस पर असर पड़ रहा है।”

वहीं, 1994 बैच के आईएएस अधिकारी खिरवार ने इन आरोपों को सरासर गलत बताया था। उन्होंने ये माना था कि वह ‘कभी-कभी’ अपने पालतू कुत्ते को स्टेडियम में टहलाने के लिए ले जाते हैं। लेकिन इस बात से इनकार किया था कि इससे एथलीटों के प्रैक्टिस पर कोई असर पड़ता है।

इसके उलट कोच और एथलीटों का दावा था ,“पहले, हमने रात 8:30 बजे तक और कभी-कभी रात 9 बजे तक भी यहाँ ट्रेनिंग की। लेकिन अब हमारे पास कोई विकल्प नहीं है।” कई एथलीटों ने बताया कि उन्होंने अपनी ट्रेनिंग भारतीय खेल प्राधिकरण के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम (JLN) में ट्रांसफर कर ली है। वहाँ शाम 7:30 बजे के बाद फ्लडलाइट्स चालू हो जाती है।

बता दें कि मामला के तूल पकड़ने के बाद दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने ट्वीट कर जानकारी दी थी कि सरकार ने खिलाड़ियों को रात के 10 बजे तक सुविधाएँ मुहैया कराने के निर्देश सभी स्पोर्ट्स सेंटर्स को दिए हैं।

बिहार के इस सूर्य मंदिर को नहीं तोड़ पाया था औरंगजेब: इस्लामी आक्रांता ‘काला पहाड़’ ने हमला कर लूट ली संपत्ति

भारत मंदिरों का देश है। यहाँ कदम-कदम पर हिंदू संस्कृति के धरोहर और विरासत भरे पड़े हैं। हिंदू धर्म की एक ऐसी ही विरासत है देव का सूर्य मंदिर। कहा जाता है कि इस मंदिर को स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने बनाया था। स्थानीय लोगों की मान्यता के अनुसार इस मंदिर का निर्माण त्रेता युग में किया गया बताया जाता है। इस मंदिर को इस्लामिक आक्रांता औरंगजेब और काला पहाड़ ने ध्वस्त करने की कोशिश की थी।

बिहार के औरंगाबाद जिले में स्थित देव में भगवान सूर्य का यह मंदिर अति प्राचीन मंदिरों में से एक है। एक भारत का संभवत: अकेला मंदिर है, जिसका मुख्य द्वार पूरब की दिशा में ना होकर पश्चिम की दिशा में स्थित है। हालाँकि, इसको लेकर भी एक कहानी प्रचलित है, जिसकी चर्चा इस लेख में आगे करेंगे।

सम्राट ऐल ने त्रेतायुग में किया था मंदिर का शिलान्यास

कहा जाता है कि इस मंंदिर का निर्माण देवों के शिल्पी भगवान विश्वकर्मा ने स्वयं एक रात में की थी। मंदिर में स्थित एक शिलालेख में इस मंदिर का निर्माण त्रेता युग में 12 लाख 16 हजार वर्ष बीत जाने के बाद किए जाने का जिक्र है।

शिलालेख पर अंकित जानकारी के अनुसार मंदिर के शिलान्यास की तिथि माघ मास शुक्ल पक्ष पंचमी तिथि गुरुवार के दिन प्रतापी राजा इलापुत्र यानी इला के पुत्र ‘पुरुरवा ऐल’ ने करवाया था। मंदिर परिसर में मिले शिलालेख ब्राह्मी लिपि एवं प्राकृत भाषा में लिखित हैं। इनमें कुछ श्लोक संस्कृत में भी अनुवादित किए गए हैं।

शास्त्र के जानकारों के अनुसार, त्रेता युग का काल 12 लाख 96 हजार वर्ष का होता है। त्रेतायुग के बाद द्वापर युग आया, जिसका काल 8 लाख 64 हजार वर्ष का था। वर्तमान समय कलियुग का चल रहा है, जिसका काल 4 लाख 32 हजार वर्ष बताया गया है। कलियुग में 6,128 वर्ष बीत चुके हैं। स्थानीय मान्यताओं के अलावे सरकारी आँकड़ों में भी यह मंदिर नया नहीं है।

औरंगाबाद जिले की आधिकारिक वेबसाइट पर इस सूर्य मंदिर को 15वीं शताब्दी का बताया गया है। इसमें कहा गया है कि उमगा के राजा भैरेन्द्र सिंह ने इस मंदिर को बनवाया था। वहीं, बिहार पर्यटन की वेबसाइट कहा गया है कि यह मंदिर की 6वीं से 8वीं सदी के के बीच की हो संभावना है।

जो भी हो धार्मिक ग्रंथ इसे त्रेता युग में शिलान्यास करने के बात कहते हैं। वहीं, बिहार पर्यटन की आधिकारिक वेबसाइट भी कहता है कि अलग-अलग पौराणिक विवरणों पर आधारित मान्यताओं और जनश्रुतियों में इसे त्रेता युग अथवा द्वापर युग के मध्यकाल में निर्मित बताया जाता है।

मंदिर निर्माण की कहानी

कहा जाता है कि त्रेता युग में एक बार महाराजा ऐल देव स्थित जंगलों में शिकार खेलने गए थे। शिकार खेलते-खेलते उन्हें प्यास लगी और अपने आदेशपाल को आसपास से पानी लाने के लिए कहा। आदेशपाल घुमता हुआ एक गड्ढ़े के पास पहुँचा और उसमें से पानी भरकर उसने राजा को दे दिया।

उस गड्ढे का पानी जैसे ही राजा के हाथ से स्पर्श हुआ, उनके हाथ का कुष्ठ रोग ठीक हो गया। इसके बाद राजा उस गड्ढे के पास पहुँचे और वहाँ स्नान किया। स्नान के बाद वह कुष्ठ रोग से पूरी तरह ठीक हो गए। उसके बाद राजा वापस राजमहल लौट आए।

उसी रात उन्हें एक सपना आया। सपने में राजा ऐल ने देखा कि जिस गड्ढे में उन्होंने स्नान किया था, उसमें तीन मूर्तियाँ हैं। इसके बाद राजा अपने सहयोगियों के साथ उस स्थान पर पहुँचे और वहाँ से उन मूर्तियों को निकालकर उन्हें वहीं स्थापित किया और एक भव्य मंदिर का शिलान्यास किया। भगवान सूर्य के तीन रूपों- पूर्वाभिमुख, मध्याभिमुख और पश्चिमाभिमुख मूर्तियाँ मंदिर में स्थापित हैं। उस गड्ढे को सूर्यकुंड कहा जाता है।

सम्राट हर्षवर्धन के कवि मयूर भट्ट को मिला कुष्ठ से छुटकारा

बिहार और उत्तर प्रदेश का प्रमुख पर्व छठ भगवान सूर्य का पर्व है। इस दिन देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु छठ व्रत के लिए देव पहुँचते हैं। राजा हर्ष के दरबार में राजकवि बाण भट्ट के साथ उनके साले मयूर भट्ट भी रहते थे। मयूर भट्ट को सर्प विद्या में महारत हासिल थी। उन्होंने सूर्यशतकम नाम से एक प्रसिद्ध ग्रंथ लिखा है।

कहा जाता है कि एक बार महाकवि बाण भट्ट अपनी पत्नी से प्रणय निवेदन कर रहे थे, लेकिन सूर्योदय होने तक वह नहीं मानी। तब बाम भट्ट ने कहा ‘गतप्राया रात्रि: कृशतनु शशी शीर्यत इवप्रदीपोऽयं निद्रा वशमुपगतो घूर्णन इव। प्रणामांतो मानस्त्यजसि न तथापि क्रुधमहो…’। पद पूरा होने से पहले ही उनके साले मयूर भट्ट आ गए और कवि हृदय होने के कारण उस पद यह कहते हुए पूरा किया कि ‘कुंचप्रत्यासत्त्या हृदयमपि ते चंडि कठिनतम्।’

बीच में भाई के हस्तक्षेप और मर्यादाहीन आचरण को देखकर उनकी बहन नाराज हो गईं और उन्होंने मयूर भट्ट को कोढ़ी हो जाने के शाप दे दिया। कुष्ठ से ग्रसित मयूर भट्ट देव पहुँचे और यहाँ भगवान भास्कर की घोर आराधना की। उसके बाद वह कुष्ठ रोग से मुक्त हो गए।

मंदिर का वास्तु एवं कलाकृतियाँ

मंदिर की वर्तमान संरचना नागर वास्तु शैली में बनी है। यह ओडिशा के पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर की संरचना से बहुत मिलता जुलता-जुलता है। इस मंदिर को काले पत्थरों को तराश कर बनाया गया है। इसके हर पत्थर पर अद्भुत नक्काशी की गई है और कलाकृतियाँ उकेरी गई हैं।

लगभग 100 फीट ऊँचे इस प्राचीन मंदिर के शीर्ष पर कमल के आकार का गुंबद बना है। इस पर सोने का एक कलश भी स्थापित किया गया है। मंदिर को बेहद भव्य तरीके से बनाया गया है। इसने भूकंप जैसी कई प्राकृतिक आपदाओं को झेला है। मंदिर परिसर में जगह-जगह मूर्तियों के अवशेष भी हैं। इन्हें इस्लामिक आक्रांताओं का विध्वंस बताया जाता है।

जब औरंगजेब ने मंदिर का विध्वंस करने की कोशिश की

कहा जाता है कि मुगल आक्रांता औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ और मथुरा के केशवदेव जैसे मंदिरों का विध्वंस करने के बाद देव के इस सूर्य मंदिर को भी ध्वस्त करने का आदेश दे दिया। इसकी प्राचीनता और महिमा के बारे में सुनकर औरंगजेब खुद अपने सैनिकों के साथ यहाँ पहुँचा।

औरंगजेब को मंदिर को तोड़ने का आदेश देता देखकर स्थानीय लोगों और पुजारियों ने उससे ऐसा ना करने का आग्रह किया। इस पर औरंगजेब ने कहा कि इस मंदिर को इतना महिमा वाला बता रहे हो। अगर इसका द्वार आज रात पूरब दिशा से पश्चिम की ओर हो जाएगा तो वह इस मंदिर को छोड़ देगा। लेकिन, अगर ऐसा नहीं हुआ तो वह इसे तोड़ देगा। 

ऐसा कहकर औरंगजेब वहाँ से चला गया। स्थानीय लोगों और मान्यताओं के अनुसार, अगले दिन औरंगजेब आया तो उसने देखा मंदिर का मुख्यद्वार पश्चिम की तरफ हो गया है। इसके बाद डर से औरंगजेब ने इस मंदिर को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया और वहाँ से चला गया।

हालाँकि, औरंगजेब मंदिर को बिना नुकसान पहुँचाए वहाँ से चला गया, लेकिन एक अन्य इस्लामी आक्रमणकारी काला पहाड़ ने इसे भारी नुकसान पहुँचाया। मंदिर में रखे सूर्य देव की मूर्ति के अलावा उसने सभी प्रतिमाओं को खंडित कर दिया।

मुस्लिम में धर्मांतरित हुआ था हमलावर ‘काला पहाड़’

स्थानीय लोगों का मानना है कि देश के सूर्य मंदिर के आसपास बिखरी मूर्तियों के अवशेष काला पहाड़ नाम के क्रूर शासक ने अंजाम दिया था। काला पहाड़ का वास्तविक नाम कालाचंद राय था और वह ब्राह्मण परिवार में पैदा हुआ था। उसने बाद में इस्लाम धर्म अपना लिया था और इस्लामी शासकों का सेनापति बन गया था।

काला पहाड़ 16वीं सदी में बंगाल के शासक ‘सुलेमान कर्रानी’ का सेनापति था। उसने ओडिशा के जगन्नाथ पुरी मंदिर, कोणार्क मंदिर और असम के कामाख्या मंदिर पर हमला किया था। उसने जगन्नाथ मंदिर में पूजा भी बंद करा दिया था। काला पहाड़ को हिंदू का उत्पीड़न करने वाले एक क्रूर अत्याचारी के रूप में जाना जाता है।

इतिहासकारों के अनुसार, काला पहाड़ ने देव के सूर्य मंदिर पर हमला किया था। कहा जाता है कि काला पहाड़ ने यहाँ भारी लूटपाट की थी और मंदिर से कीमती आभूषण और हीरे-जवाहरात आदि को लूटकर ले गया था। कहा जाता है कि भगवान सूर्य की तीन मूर्तियों को खंडित नहीं कर पाया था।

मुठभेड़ के बाद आजमगढ़ में कुख्यात गौ तस्कर आमिर, जावेद, अब्दुल्ला और मशरूफ गिरफ्तार, 140 किलो मांस, तमंचा और मोटरसाइकिल बरामद

उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) पुलिस लगातार अपराधियों पर नकेल कसने की कोशिशें कर रही है। इसी क्रम में आजमगढ़ जिले में पुलिस ने कुख्यात गौ तस्कर (Cow Smuggler) आमिर समेत 4 आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है। इनके पास से पुलिस को बैन किया गया मांस, तमंचा, कारतूस और दो मोटरसाइकिल बरामद किया है। ये घटना जिले के सरायमीर थाना क्षेत्र की है।

रिपोर्ट के मुताबिक, सरायमीर थाने की पुलिस टीम बुधवार (25 मई 2022) की रात गौतस्करों के होने के इनपुट के बाद गश्त के लिए निकली थी। गश्ती के दौरान पुलिस की टीम जैसे ही रामराय के पुरा गाँव पहुँची तो उसे वहाँ पर दो संदिग्ध बाइक दिखीं। पुलिसवालों ने बाइक सवारों को रोका तो उन्होंने पुलिस पर फायर कर दिया। पुलिस ने भी काउंटर फायरिंग की। इस दौरान एक व्यक्ति घायल हो गया। जबकि तीन अन्य को भी गिरफ्तार कर लिया गया।

गिरफ्तारी के बाद पता चला कि जिस शख्स को गोली लगी है, वो कोई और नहीं, बल्कि कुख्यात गौ तस्कर आमिर है। आमिर अलावा पकड़े गए तीन अन्य आरोपित जावेद अख्तर, मशरूफ अहमद और मोहम्मद अब्दुल्लाह के तौर पर हुई है। पुलिस ने फिलहाल आमिर को घायल अवस्था में इलाज के लिए जिला अस्पताल में भर्ती कराया है। वहीं इस एनकाउंटर के दौरान एक अन्य शख्स अँधेरे का फायदा उठाकर वहाँ से भागने में सफल रहा।

पुलिस को आरोपितों के पास से 140 किलो प्रतिबंधित मांस, दो तमंचे और दो बाइक मिली हैं। इस घटना की पुष्टि जिले के एसपी अनुराग आर्य ने की है। उन्होंने कहा कि इनपुट्स के आधार पर पुलिस ने कार्रवाई की थी। इलाके में लगातार गौतस्करी को लेकर शिकायतें होती रहती थीं। फिलहाल सभी आरोपितों के खिलाफ संबंधित धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया है। अब इन सभी को कोर्ट में पेश किया जाएगा। इसके बाद सभी को जेल भेजा जाएगा।

तमिलनाडु को ₹31,000 करोड़+ सौगात, पीएम आवास से लेकर एक्सप्रेस वे और रेलवे स्टेशन तक: प्रधानमंत्री मोदी ने कहा- लोगों तक सभी योजनाओं का लाभ पहुँचाएगा केंद्र

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार (26 मई 2022) को तमिलनाडु का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने राज्य में 31,000 करोड़ रुपए से अधिक के कई डेवपलमेंट प्रोजेक्ट्स का शिलान्यास किया। इसके साथ ही पीएम मोदी ने बंगलुरू-चेन्नई एक्सप्रेस वे की आधारशिला रखी। इस मौके पर उन्होंने तमिल भाषा को जीवंत भाषा करार देते हुए कहा कि यहाँ की संस्कृति बेजोड़ है।

चेन्नई के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में आयोजित कार्यक्रम के दौरान पीएम मोदी ने तमिलनाडु के विकास को लेकर बात की। प्रधानमंत्री ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि केंद्र सरकार लगातार लोगों तक अपनी सभी योजनाओं के लाभ को पहुँचाने का काम कर रही है। इसके तहत शौचालय, घर और वित्त पोषण समेत अन्य क्षेत्रों में काम किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि अब तक सड़क, पानी और बिजली को ही बुनियादी ढाँचा माना जाता था, लेकिन अब देश में गैस पाइपलाइन के नेटवर्क को तेजी से फैलाया जा रहा है। सरकार का लक्ष्य देश के हर गाँव में हाई स्पीड इंटरनेट को पहुँचाना है।

इसके अलावा प्रधानमंत्री ने कहा, “मैं उन सभी को बधाई देना चाहता हूँ, जिन्हें चेन्नई लाइट हाउस परियोजना के तहत घर मिले हैं। यह पीएम-आवास योजना के तहत मिला है।” उन्होंने आगे कहा कि देश के आर्थिक विकास को बढ़ावा देने और चेन्नई बंदरगाह को आर्थिक विकास का केंद्र बनाने की दृष्टि से आज चेन्नई में मल्टी-मोडल लॉजिस्टिक पार्क की आधारशिला रखी गई है। हमारी सरकार देश के अन्य हिस्सों में ऐसे पार्क विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध है। ये मल्टी-मॉडल लॉजिस्टिक पार्क हमारे देश के फ्रेट इकोसिस्टम में एक आदर्श बदलाव होंगे। विभिन्न क्षेत्रों में इनमें से प्रत्येक परियोजना रोजगार सृजन और ‘आत्मनिर्भर’ होने के हमारे संकल्प को बढ़ावा देगी।

किन-किन योजनाओं की मिली सौगात

गौरतलब है कि अपनी इस यात्रा के दौरान पीएम मोदी ने 31400 करोड़ रुपए की लागत से 11 परियोजनाओं का शिलान्यास औऱ उद्घाटन किया। इसके तहत प्रधानमंत्री शहरी आवास योजना के तहत 116 करोड़ रुपए की निर्मित चेन्नई लाइट हाउस प्रोजेक्ट के 1152 घरों का भी उद्घाटन किया। इसके अलावा इसमें उन्होंने 28500 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाली 6 परियोजनाओं का शिलान्यास किया। इस मौके पर पीएम मोदी ने 1800 करोड़ रुपए की लागत से बनाए जा रहे पाँच रेलवे स्टेशनों रामेश्वरम, चेन्नई एग्मोर, कटपडी, मदुरै और कन्याकुमारी के पुनर्विकास का शिलान्यास भी किया।

श्रीलंका संकट का किया जिक्र

इस मौके पर पीएम मोदी ने श्रीलंका में उपजे आर्थिक और राजनीतिक संकट पर भी बात की। उन्होंने कहा कि श्रीलंका इन दिनों कठिन दौर से गुजर रहा है। इसको लेकर आप सब चिंतित होंगे। लेकिन पड़ोसी और मित्र होने के नाते भारत लगातार उसकी मदद कर रहा है।

HC के आदेश को ठेंगा दिखा अफजल खान की अवैध कब्र को बचाने में लगी है महाराष्ट्र सरकार, वन विभाग की जमीन पर कर रखा है कब्जा: जानें क्या है मामला

इतिहास कि किताबों में ये किस्सा अक्सर पढ़ने में आता है कि कैसे शिवाजी महाराज ने अफजल खान को मारा था। ये घटना 10 नवंबर, 1659 की है। ये वो दौर था जब छत्रपति शिवाजी की विजय पताका जोरों-शोरों से लहरा रही थी। ऐसे में जब मुगल आक्रान्ता शिवाजी को सामने से मात नहीं दे पाए तो बीजापुर के शासक अफजल खान ने उन्हें छल से मारने की योजना बनाई। उसने शिवाजी को महाराष्ट्र में महाबलेश्वर के पास प्रतापगढ़ के किले पर मिलने के लिए बुलाया। उसने आगे बढ़कर शिवाजी को गले लगाया और पीछे से उनकी पीठ पर खंजर घोंपने की कोशिश की। हालाँकि, उसके मंसूबों से वाकिफ शिवाजी ने एक खंजर से उसके ही पेट को चीर दिया।

उस दौरान शिवाजी की उम्र केवल 19 साल की ही थी, लेकिन उनके सामने अफजल खान की एक न चली। शिवाजी के वार करते ही वो चीखते हुए जमीन पर ढेर हो गया। बाद में अफजल खान की मौत के बाद का सम्मान रखते हुए उसे उसी स्थान पर दफनाया गया और उसके ऊपर समाधि के तौर पर पत्थर रख दिया गया।

1916 में अफजल खान की कब्र (फोटो साभार: महाबलेश्वर के डीबी परासनिस)

दो दशक पहले तक आक्रान्ता अफजल खान की कब्र जीर्ण-शीर्ण अवस्था में थी, इस पर किसी का कोई ध्यान नहीं था। प्रतापगढ़ किले के प्रवेश द्वार से अंदर जाते ही कुछ सीढ़ियाँ चढ़ने पर दाहिनी तरफ इसकी कब्र को देखा जा सकता है। हालाँकि, ये चर्चा में साल 2000 में उस वक्त आया जब कुछ मुस्लिमों ने इस कब्र पर दावा करते हुए वहाँ पर एक शेल्टर बनाने का फैसला किया। अपुष्ट जानकारियों के मुताबिक, करीब एक दशक पहले राज्य के वन विभाग ने दरगाह ट्रस्ट को कब्र के आसपास जमीन का आवंटन कर दिया, ताकि वो वहाँ पर निर्माण कर सकें।

इजाजत मिलने के बाद बीते 10 सालों में धीरे-धीरे यहाँ कब्र पर चारों तरफ से एक आर्केड के साथ एक स्थायी संरचना खड़ी कर दी गई है। माना जाता है कि अफजल खान की कब्र पर एसबेस्टस की पतली शीट की छत बनाई गई है। इसके अंदर मुस्लिमों के लिए स्पेशल कमरे बनाए गए हैं। जल्द ही बीजापुर के अत्याचारी शासक और शिवाजी के कट्टर दुश्मन रहे अफजल खान का किले में महिमानंडन शुरू कर दिया गया।

प्रतापगढ़ किले में मौजूदा वक्त में अफजल खान की कब्र

यहाँ पर ‘हजरत मोहम्मद अफजल खान मेमोरियल ट्रस्ट’ के नाम से अवैध तरीके से निर्माण कर किले की लगभग 5,500 वर्ग फुट की जमीनों पर कब्जा कर लिया गया है। छत्रपति शिवाजी महाराज के प्रतापगढ़ किले में अब मुस्लिम मौलवी अफजल खान का गुणगान करते हैं और यहाँ आने वाले लोगों से भी मुगल आक्रान्ता का गुणगान करने को कहा जाता है। यहाँ अंधविश्वास ये फैलाया गया है कि अफजल खान की कब्र के सामने प्रार्थना करने से मानसिक बीमारियाँ ठीक हो सकती हैं। इस अंधविश्वास को फॉलो करते हुए आस-पास के ग्रामीण मौलवियों की बातें मानने लगे हैं।

विश्व हिन्दू परिषद ने कब्जे के खिलाफ उठाई थी आवाज

मुस्लिमों द्वारा कब्र के नाम पर किए गए अवैध के कब्जे के खिलाफ विहिप ने 2004 में अपनी आवाज बुलंद की थी। ये साइट एएसआई के अंतर्गत आती है। वीएचपी के कार्यकर्ताओं ने श्राइन ट्रस्ट को जमीन के आवंटन पर भी सवाल उठाया था। इस मामले में जब विहिप ने किले पर आंदोलन करने की चेतावनी दी थी तो पास की महाबलेश्वर पुलिस ने किले और मकबरे के चारों ओर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी थी।

प्रतापगढ़ का किला, जो कभी हिंदवी स्वराज्य का गढ़ था

इस मामले में सही इतिहास से अनभिज्ञ महाबलेश्वर नगर परिषद की उपाध्यक्ष प्रभावती शेटे ने कहा था, “बस बहुत हो गया। हम अब विहिप को बर्दाश्त नहीं करेंगे। कौन होते हैं इस मकबरे पर विवाद करने वाले? वे इसके बारे में क्या जानते हैं?” ट्रस्ट को वन विभाग की आधिकारिक जमीन के आवंटन से राज्य सरकार से नाखुश प्रतापगढ़ उत्सव समिति का गठन विहिप के कुछ सदस्यों द्वारा किया गया था। इसे विजयताई भोंसले से सक्रिय समर्थन मिला। विजयताई भोंसले सतारा के वाई के रहने वाले शाही वंश से आती थीं।

एक इंटरव्यू के दौरान विजयताई भोंसले ने इस बात पर हैरानी जताई थी कि शिवाजी महाराज के कट्टर दुश्मनों में से एक अफजल खान के लिए बने मकबरे का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। इस मामले को लेकर उन्होंने जब स्थानीय अधिकारियों से इसकी शिकायत की और उनसे मिलने का समय माँगा तो किसी ने इस पर ध्यान ही नहीं दिया। बावजूद इसके जब उन्होंने मामले की गहराई में झाँका तो पता चला कि कब्र की देखरेख और वित्तपोषण राज्य सरकार कर रही है। सैम टीवी के साथ बातचीत में उन्होंने कहा था, “मैंने किले में रोज मालाएँ आती देखीं। जब मैंने माला के पीछे का कारण पूछा, तो मुझे बताया गया कि ये अफजल खान के लिए था।”

वो कहती हैं, “ऐसे समय में जब शिवाजी महाराज की मूर्ति और किले पर भवानी मंदिर उपेक्षित अवस्था में है, अफजल खान की काल्पनिक कब्र को मालाओं से सजाया जा रहा है।” उन्होंने इस बात को नोट किया है कि कब्र का रखरखाव और अवैध अतिक्रमण को स्थानीय अधिकारियों और राज्य सरकार के द्वारा बढ़ावा दिया जा रहा है।

अवैध कब्जे पर लापरवाह बनी महाराष्ट्र सरकार

विजयाताई भोसले के ही समर्थन से प्रतापगढ़ उत्सव समिति के स्थानीय नगरसेवक मिलिंद एकबोटे की अध्यक्षता में अफजल खान की कब्र पर दरगाह को हटाने के लिए 2007 में बॉम्बे हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई थी। मामले में सुनवाई के बाद हाई कोर्ट के जस्टिस जेएन पटेल और जस्टिस एस के कथावाला की बेंच ने अवैध ढाँचे को गिराने का आदेश दिया था। इसमें कहा गया था कि ये जमीन वन विभाग की है और इस पर किसी भी निर्माण की इजाजत नहीं दी जाएगी।

हालाँकि, ‘ढाक के तीन पात’ वाली स्थिति रही। राज्य सरकार ने हाई कोर्ट के आदेश को अनसुना कर दिया। इसके बाद एक बार फिर से मिलिंद एकबोटे ने हाई कोर्ट में अवमानना ​​याचिका दायर की, जिसे राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। हालाँकि, विध्वंस के संबंध में अपनी स्थिति पर जोर देने में दो साल की देरी के बाद राज्य सरकार मकबरे पर अनधिकृत दरगाह को बचाने के अपने रुख पर कायम रहने में विफल रही। जस्टिस डी के जैन और जस्टिस अनिल दवे की पीठ ने 13 फरवरी 2012 को अपने आदेश में कहा कि अगर सरकार बेहतर हलफनामा दाखिल करने में विफल रहती है तो राज्य सरकार द्वारा दायर एसपीएल को खारिज कर दिया जाएगा।

इसी तरह से 2017 में भी एक पीआईएल फिर से बॉम्बे हाईकोर्ट में दाखिल की गई, जिसके बाद राज्य सरकार को अवैध ढाँचे को गिराने के लिए अल्टीमेटम दिया गया। 2020 में कुछ स्थानीय राजनेताओं ने इस स्ट्रक्चर को पब्लिक यूज में इस्तेमाल के लिए खोलने की माँग की। सालों से राज्य सरकार इस अवैध अतिक्रमण का संरक्षण कर रही है। हाल ही में मनसे चीफ राज ठाकरे ने भी इसे ढहाने की माँग की थी।

पुणे में एक रैली को संबोधित करते हुए रविवार को प्रमुख राज ठाकरे ने कहा था, “जिस अफजल खान को हमारे छत्रपति शिवाजी महाराज ने मार डाला था। उसका मकबरा है और विशेष समुदाय के लोगों द्वारा उसकी कब्र पर फूलों की माला अर्पित की जा रही है। इस मुद्दे पर महाराष्ट्र सरकार खामोश बैठी है। अगर राज्य सरकार ने इस कब्र को नहीं गिराया, तो मनसे पार्टी के कार्यकर्ता इसे जल्द ही ध्वस्त कर देंगे।”

ठाकरे की इस धमकी के बाद उद्धव ठाकरे सरकार ने सतारा जिले के प्रतापगढ़ किले में अफजल खान की कब्र के आसपास रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) के जवानों को तैनात कर दिया। एसपी अजय कुमार बंसल के मुताबिक, अफजल खान का मकबरा 2005 से प्रतिबंधित क्षेत्र रहा है। इसलिए मौके पर अतिरिक्त पुलिस बल भी तैनात किया गया था।

सर्दियों में पराली जलाना वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण, पटाखों का असर एक दिन भी नहीं रहता: IIT दिल्ली की स्टडी में बड़ा खुलासा

दिवाली के दौरान दिल्ली की वायु की खराब गुणवत्ता के लिए पटाखे नहीं, बल्कि पराली जिम्मेदार है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली (IIT दिल्ली) ने अपने सर्वे में इसकी पुष्टि की है। दरअसल दिवाली और फसल काटने के बाद पराली जलाने का समय लगभग एक ही होता है। इसकी वजह से प्रदूषण की असली वजह का पता लगाना मुश्किल हो जाता था।

प्रदूषण की असली वजह जानने के लिए आईआईटी दिल्ली के विभिन्न विभागों में विभिन्न स्कॉलर द्वारा किए गए शोध में दिवाली के मौसम में दिल्ली के विभिन्न स्थानों से लिए गए नमूनों की जाँच की गई और हवा में विभिन्न कणों के अनुपात को मापा गया। अध्ययन से पता चला है कि जैव ईंधन जलाने (Biomass Burning) से राष्ट्रीय राजधानी में वायु गुणवत्ता खराब होती है। इसमें कहा गया कि दिवाली के पटाखों से निकलने वाले प्रदूषक एक दिन के लिए भी हवा में नहीं रहते हैं। रिसर्च के अनुसार, सर्दियों के दौरान जलने वाले जैव ईंधन में गर्मी के लिए पराली जलाना और जलाऊ लकड़ी आदि जलाना शामिल है।

अध्ययन का शीर्षक ‘दिवाली आतिशबाजी के पहले, दौरान और बाद में नई दिल्ली में PM2.5 का रासायनिक विशिष्टता और स्रोत विभाजन’ (‘Chemical speciation and source apportionment of ambient PM2.5 in New Delhi before, during, and after the Diwali fireworks’) है। इसमें त्योहार के पहले, दौरान और बाद में राजधानी में वायु गुणवत्ता को प्रभावित करने वाले प्रदूषण स्रोतों पर स्टडी की गई है।

यह एल्सेवियर बीवी के वायुमंडलीय प्रदूषण अनुसंधान पत्रिका के वॉल्यूम 13 अंक 6 (जून 2022) में साइंस डायरेक्ट में प्रकाशित हुआ है। इस रिसर्च पेपर के लेखक और योगदानकर्ता आईआईटी दिल्ली के विभिन्न विभागों से हैं। चिराग मनचंदा और मयंक कुमार मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग से हैं। विक्रम सिंह और मोहम्मद फैसल केमिकल इंजीनियरिंग विभाग से हैं। अप्लायड मैकेनिक्स विभाग के नबा हजारिका ने भी रिसर्च में भाग लिया है। विपुल लालचंदानी, आशुतोष शुक्ला और सच्चिदानंद त्रिपाठी सिविल इंजीनियरिंग विभाग के शोधकर्ता हैं जिन्होंने इस शोध में अपने इनपुट दिए। इसके अलावा, अहमदाबाद के भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला का भूविज्ञान (Geoscience) डिवीजन भी रिसर्च टीम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

यह स्टडी दिल्ली में आधारित था और 20 अक्टूबर 2019 से 31 अक्टूबर 2019 तक 12 दिनों तक के सैंपल पर किया गया था। 27 अक्टूबर 2019 को दिवाली थी। पटाखों के जलने के तत्काल प्रभाव को ध्यान में रखते हुए, छह- दिन के अंतराल में दिवाली के आसपास आतिशबाजी कार्यक्रम पर ध्यान केंद्रित किया गया। इसे तीन चरणों में बाँटा गया था। पहला दिवाली से पहले (25 अक्टूबर 2019 24:00 IST – 27 अक्टूबर 2019 18:00 IST), दूसरा दिवाली के दौरान (27 अक्टूबर 2019 18:00 IST – 28 अक्टूबर 2019 6:00 IST), और तीसरा दीवाली के बाद (28 अक्टूबर 2019 6:00 IST – 31 अक्टूबर 2019 24:00 IST)।

इस अवधि के दौरान दिल्ली में दो स्थानों से नमूने एकत्र किए गए थे- मध्य दिल्ली के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेटेओरॉलॉजी कैंपस और दक्षिणी दिल्ली में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी कैंपस। अध्ययन में हवा में प्रदूषकों का सटीक माप लेने के लिए Xact 625i एम्बिएंट मेटल मॉनिटर, मल्टी-चैनल एथेलोमीटर, हाई-रिज़ॉल्यूशन टाइम-ऑफ-फ्लाइट एरोसोल मास स्पेक्ट्रोमीटर जैसे विभिन्न उपकरणों का इस्तेमाल किया गया।

अध्ययन के मुख्य लेखक चिराग मनचंदा ने कहा है कि टीम ने पाया कि दीवाली के बाद के दिनों में जैव ईंधन जलने संबंधी उत्सर्जन में तेजी से इजाफा हुआ है, जिसमें दीवाली के पहले की तुलना में औसत स्तर लगभग दोगुना बढ़ गया है। साथ ही, कार्बनिक पीएम 2.5 से संबंधित स्रोत विभाजन परिणाम दिवाली के बाद के दिनों में प्राथमिक और द्वितीयक दोनों कार्बनिक प्रदूषकों में इजाफे का संकेत देते हैं, जो प्राथमिक जैविक उत्सर्जन वृद्धि में जैव ईंधन जलाने की भूमिका की तरफ इशारा करते हैं।

चिराग मनचंदा ने कहा है कि टीम ने यह भी पाया कि दिवाली के दौरान पीएम 2.5 के स्तर में धातु की मात्रा 1,100 प्रतिशत बढ़ी और अकेले आतिशबाजी में पीएम 2.5 धातु का 95 प्रतिशत हिस्सा था। हालाँकि आतिशबाजी का असर त्यौहार के लगभग 12 घंटों के भीतर ही कम हो गया। 

आईआईटी-दिल्ली के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के विक्रम सिंह ने कहा कि सर्दियों में क्षेत्र में पराली जलाने और ठंड से बचने के लिए किए जाने वाले उपायों के चलते जैव ईंधन जलाने की गतिविधियाँ बढ़ती हैं। इस तरह से रिसर्च से नतीजा निकला कि आतिशबाजी के बजाय जैव ईंधन जलाने से दिवाली के बाद के दिनों में दिल्ली में हवा की गुणवत्ता खराब होती है। 

गौरतलब है कि साल 2021 में दिवाली के मौके पर दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर पटाखों पर पूरी तरह से रोक लगा दी थी। केजरीवाल के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा 1 जनवरी, 2022 तक सभी प्रकार के पटाखों की बिक्री और फोड़ने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के बाद, दिल्ली पुलिस ने इस त्योहारी सीजन में पटाखों की बिक्री और वितरण पर कार्रवाई शुरू की थी। इसके लिए पटाखा विक्रेताओं ने दिल्ली सरकार को फटकार लगाई थी। उन्होंने इसे सरकार का लापरवाही भरा फैसला बताते हए कहा था कि  अगर भारत में दिवाली नहीं मनाई जाएगी तो क्या पाकिस्तान में भी मनाई जाएगी?

सुप्रीम कोर्ट ने पटाखा प्रतिबंध मामले की सुनवाई करते हुए कहा था कि पटाखों का मुद्दा एक अस्थायी मुद्दा है और मुख्य मद्दा पराली जलाने से संबंधित है। अब IIT दिल्ली द्वारा किए गए रिसर्च ने वैज्ञानिक सबूत के साथ अदालत की टिप्पणी को मजबूत किया है।