ब्रिटेन की संसद में हाल ही में ग्रूमिंग गैंग स्कैंडल को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई। ग्रेट यारमाउथ से सांसद रुपर्ट लोव ने संसद में कई पीड़ित महिलाओं और लड़कियों की गवाहियाँ पढ़कर सुनाईं। इन गवाहियों में टूटी बोतलों के टुकड़ों से रेप, पुलिस ऑफिसर द्वारा रेप, नस्लीय आधार पर ब्रिटिश लड़कियों को निशाना बनाने जैसी बेहद दर्दनाक घटनाएँ सामने आई हैं।
संसद में बोलते हुए लोव ने कहा कि कई पीड़िताओं ने वर्षों तक अत्याचार झेला, लेकिन उनकी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया गया। उन्होंने कहा कि यह केवल कुछ अलग-अलग घटनाएँ नहीं थीं, बल्कि एक ऐसा संगठित अपराध था जिसे रोकने में कई संस्थाएँ नाकाम रहीं। सांसद लोव ने इन ग्रूमिंग गैंग के मामलों में स्वतंत्र रूप से जाँच की। जाँच में पता लगा कि इन बाल यौन शोषण के मामलों में स्थानीय क्षेत्रों से ज्यादा सबूत मिले हैं।
ग्रूमिंग गैंग में ‘मुस्लिम’ एंगल
लोव ने एक महिला की गवाही का जिक्र किया, जिसके अब्बा इमाम थे। उस महिला ने बताया कि कई वर्षों तक उसके साथ 600 से 700 अलग-अलग पुरुषों ने रेप किया। एक बच्ची ने बताया कि उसके चेहरे को सिगरेट से दागा गया।
तो एक अन्य पीड़िता ने बताया कि जब वह 12 से 13 साल की थी तब उसके प्राइवेट पार्ट में शराब की बोतल डाल कर फोड़ दी गई। एक ने गवाही दी कि ग्रूमिंग गैंग करने वाले नस्लीय टिप्पणियाँ भी करते थें और कहते थे- “गोरी लड़कियों के संस्कार मुस्लिम लड़कियों से कम होते हैं।”
एक पीड़िता ने बताया कि इस्लाम में त्यौहारों के समय उनके साथ अत्याचार बढ़ जाता था। खासकर, ईद के आसपास ज्यादा पार्टियाँ होती थीं तो उन्हें निशाना बनाया जाता था, जिनमें पार्टी में शामिल होने वाले अन्य लोग भी उनके साथ दुष्कर्म करते थे।
धर्म और नस्लीय भेदभाव के आधार पर बनाया निशाना
कई पीड़िताओं ने शारीरिक हिंसा के साथ-साथ मानसिक शोषण का भी जिक्र किया। एक पीड़िता ने बताया कि उसे ईसाई होने के नाते निशाना बनाया गया। पीड़िता ने बताया कि शोषण करते समय वे लोग क्रॉस देखते और कहते थे, “अब तुम्हारा ईश्वर कहाँ है? क्या तुम्हारे ईश्वर ने तुम्हे त्याग दिया है?”
ग्रूमिंग गैंग ने अधिकतर ब्रिटिश मूल की गोरी लड़कियों को निशाना बनाया। पीड़िताओं ने बताया कि नस्लीय भेदभाव किया गया। उसने कहा, “मेरे साथ जितनी भी लड़िकयाँ थीं वे लगभग सभी श्वेत (ब्रिटिश मूल) थीं।” ऐसे ही एक अन्य पीड़िता ने कहा कि उसने 15 से 20 लड़कियों को कुत्तों के पिंजरों में बंद देखा था, जो सभी ब्रिटिश मूल की थीं।
इतना ही नहीं इन मामलों में पुलिस ऑफिसर की भी संलिप्तता सामने आई। एक पीड़िता ने बताया कि देश की अलग-अलग जगहों पर उसके साथ कई पुलिस ऑफिसर ने रेप किया।
दशकों से ब्रिटेन में खतरा है ग्रूमिंग गैंग स्कैंडल
ब्रिटेन में फिर से चर्चा में आए ग्रूमिंग गैंग स्कैंडल दशकों पुराना है। पिछले 20 सालों से बाल यौन शोषण के मामले सामने आते रहे हैं। इन मामलों में देश के रॉदरहैम के अलावा रोचडेल, ओल्डहम और टेलफोर्ड जैसे कई शहरों और कस्बों में संगठित समूह नाबालिग लड़कियों को बहला-फुसलाकर रेप और शारीरिक शोषण जैसी घिनौनी घटनाओं का खुलासा हुआ। पुलिस की जाँच में कई मामलों में मानव तस्करी और अन्य गंभीर अपराधों के आरोप भी सामने आए।
2002 के आसपास पहली बार ऐसे मामले उजागर हुए थे, जहाँ पाकिस्तानी मूल के पुरुषों पर इन नाबालिगों के शोषण के आरोप लगे थे। 2010 में यह ग्रूमिंग गैंग स्कैंडर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना, जब ब्रिटिश अखबार ‘द टाइम्स’ ने जाँच के बाद अपनी रिपोर्ट में इन बाल यौन शोषण के मामलों का खुलासा किया। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि अधिकतर आरोपित ब्रिटिश या पाकिस्तानी थे और वे कमजोर एवं असुरक्षित परिस्थितियों में रहने वाली लड़िकयों को अपना शिकार बना रहे थे।
बाद में ब्रिटेन सरकार की जाँच और रिपोर्ट्स में सामने आया कि स्थानीय प्रशासन, पुलिस और दूसरी सरकारी एजेंसियाँ समय पर कार्रवाई नहीं कर सकीं। कहीं न कहीं अधिकारियों की लापरवाही, पीड़ितों को ही जिम्मेदार ठहराने की सोच और कमजोर जाँच के कारण ये अपराध लंबे समय तक चलते रहे। इसी वजह से बड़ी संख्या में लड़कियाँ इसका शिकार बनीं।
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह का भारत के साथ सीमा विवाद के मुद्दे पर दिया गया बयान नेपाल की राजनीति से लेकर भारत-नेपाल संबंधों तक चर्चा का विषय बन गया है। संसद में सीमा विवाद से जुड़े सवाल का जवाब देते हुए बालेन शाह ने कहा कि नेपाल केवल भारत और चीन से ही नहीं, बल्कि ब्रिटेन (UK) से भी बातचीत कर रहा है।
उन्होंने यह भी कहा कि कई जगहों पर भारत ने नेपाल और नेपाल ने भी भारतीय भूमि पर कब्जा किया हुआ है। पीएम बालेन शाह के इस बयान पर उनके ही सांसदों ने तर्क दिया कि भारत और नेपाल की खुली सीमा वाले क्षेत्रों में दोनों देशों के नागरिकों द्वारा भूमि का उपयोग और किसी राज्य द्वारा दूसरे देश की जमीन पर कब्जा करने में बड़ा अंतर है।
दशकों पुरानी खुली सीमा व्यवस्था के कारण सीमा के दोनों ओर रहने वाले लोग खेती, व्यापार और आवागमन के लिए एक-दूसरे की जमीन का उपयोग करते रहे हैं। इसलिए इसे अतिक्रमण या कब्जा कहना उचित नहीं है।
इसके बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय की ओर कहा गया कि प्रधानमंत्री बालेन ‘क्रॉस-बॉर्डर होल्डिंग’ यानी सीमा पार जमीन पर स्वामित्व शब्द का इस्तेमाल करना चाहते थे, लेकिन उनकी ओर से गलती से ‘क्रॉस-बॉर्डर ऑक्युपेशन’ यानी सीमा पार कब्जा शब्द इस्तेमाल हो गया।
हालाँकि बालेन शाह के बयान का सबसे चर्चित हिस्सा ब्रिटेन के सामने उनका हाथ फैलाकर मदद माँगना था। सवाल उठने लगा कि आखिर भारत-नेपाल सीमा विवाद में ब्रिटेन का नाम क्यों आया और नेपाल इस मुद्दे को ब्रिटेन से क्यों जोड़ रहा है। इस सवाल का जवाब सीधे तौर पर 210 साल पुरानी सुगौली संधि और लिपुलेख-कालापानी विवाद से जुड़ा हुआ है।
ब्रिटेन का जिक्र क्यों आया?
नेपाल का तर्क है कि सीमा विवाद की शुरुआत ब्रिटिश शासन काल में हुई थी। सुगौली संधि नेपाल और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुई थी। इसलिए नेपाल के कुछ नीति-निर्माताओं और विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रिटेन के अभिलेखागार में ऐसे दस्तावेज, नक्शे और रिकॉर्ड हो सकते हैं जो सीमा विवाद की ऐतिहासिक स्थिति को स्पष्ट कर सकें।
इसी के तहत बालेन शाह के मुख्य सलाहकार कुमार ब्यंजनकर ने ब्रिटिश राजदूत रॉब फेन के साथ इस बात पर चर्चा की थी कि यूनाइटेड किंगडम इस विवाद को सुलझाने में कैसे मदद कर सकता है। हालाँकि उपलब्ध जानकारी के अनुसार, ब्रिटेन ने इस मुद्दे को भारत और नेपाल के बीच का द्विपक्षीय मामला माना है और किसी तरह की मध्यस्थता में रुचि नहीं दिखाई है।
आलोचकों का कहना है कि भारत लगातार यह रुख रखता आया है कि सीमा विवादों का समाधान द्विपक्षीय बातचीत से होना चाहिए और किसी तीसरे पक्ष की भूमिका स्वीकार्य नहीं है। ऐसे में ब्रिटेन का नाम लेने से विवाद को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप देने की कोशिश के रूप में देखा गया।
आखिर क्या है लिपुलेख दर्रा? भारत के पास मौजूद हैं ऐतिहासिक साक्ष्य
लिपुलेख दर्रा हिमालय की ऊँची पर्वत श्रृंखलाओं में स्थित एक महत्वपूर्ण दर्रा है। यह भारत, नेपाल और चीन (तिब्बत) के त्रि-जंक्शन क्षेत्र के करीब स्थित है। भारतीय पक्ष से यह उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में पड़ता है और तिब्बत के पुरांग (तकलाकोट) क्षेत्र को जोड़ता है।
भौगोलिक और सामरिक दृष्टि से यह दर्रा बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। सदियों से यह भारत और तिब्बत के बीच व्यापारिक संपर्क का रास्ता रहा है। इसके अलावा कैलास मानसरोवर यात्रा के लिए भी यह एक प्रमुख मार्ग है। भारत और चीन के बीच होने वाली कैलास मानसरोवर यात्रा के दो प्रमुख मार्गों में से एक लिपुलेख होकर गुजरता है।
हाल ही में भारत और चीन ने 2026 से कैलास मानसरोवर यात्रा फिर शुरू करने का फैसला किया है। इसी घोषणा के बाद लिपुलेख एक बार फिर चर्चा में आ गया, क्योंकि नेपाल ने इस मार्ग के उपयोग पर आपत्ति जताई और कहा कि विवादित क्षेत्र से जुड़े मामलों पर उससे कोई परामर्श नहीं किया गया।
बालेन शाह सरकार ने दावा किया कि लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा का क्षेत्र उसका अभिन्न हिस्सा है, इसीलिए वहाँ से गुजरना नेपाल के कानून के खिलाफ है।
नेपाल के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर भारत और चीन को इस स्थिति से अवगत कराया। बयान में कहा गया कि नेपाल सरकार अपने इस रुख पर पूरी तरह से कायम है कि महाकाली नदी के पूर्व में स्थित लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी 1816 की सुगौली संधि के आधार पर उसके अविभाज्य क्षेत्र हैं।
नेपाल के इस दावे को लेकर भारत ने कड़ा रुख अपनाया और विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “इस मामले में भारत का रुख हमेशा स्पष्ट और एक जैसा रहा है। लिपुलेख दर्रा 1954 से कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए पारंपरिक मार्ग रहा है और इस रास्ते से यात्रा दशकों से जारी है। यह कोई नई बात नहीं है।”
उन्होंने यह भी कहा, “जहाँ तक क्षेत्रीय दावों का सवाल है, भारत लगातार यह कहता रहा है कि ऐसे दावे न तो उचित हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित हैं। इस तरह के एकतरफा दावों का विस्तार स्वीकार्य नहीं है। भारत नेपाल के साथ द्विपक्षीय संबंधों से जुड़े सभी मुद्दों पर रचनात्मक बातचीत के लिए तैयार है।”
लिपुलेख विवाद की जड़ क्या है और क्या दावा करता है नेपाल?
भारत और नेपाल के बीच वास्तविक विवाद केवल लिपुलेख दर्रे तक सीमित नहीं है। इसके साथ कालापानी और लिम्पियाधुरा क्षेत्र भी जुड़े हुए हैं। कुल मिलाकर लगभग 372 वर्ग किलोमीटर का इलाका दोनों देशों के बीच विवाद का विषय बना हुआ है।
इस पूरे विवाद की जड़ काली नदी (महाकाली नदी) के उद्गम स्थल को लेकर है। 1816 की सुगौली संधि के अनुसार, काली नदी को नेपाल और ब्रिटिश भारत के बीच प्राकृतिक सीमा माना गया था। लेकिन समस्या यह है कि दोनों देश काली नदी के वास्तविक उद्गम को अलग-अलग स्थान मानते हैं।
नेपाल बिना किसी साक्ष्य के दावा करता है कि काली नदी का मूल स्रोत लिम्पियाधुरा क्षेत्र में है और कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा नेपाल के क्षेत्र में आते हैं।
वहीं भारत ने हमेशा इस दावे का खंडन किया है। भारत का कहना है कि नदी का वास्तविक स्रोत नेपाल द्वारा बताए गए स्थान से नीचे स्थित है। भारत के अनुसार, सीमा निर्धारण उसी आधार पर होना चाहिए, जिसके चलते कालापानी, लिपुलेख और आसपास का क्षेत्र उत्तराखंड का हिस्सा बनता है।
भारत का यह भी कहना है कि नेपाल के दावे ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित नहीं हैं और वह बातचीत के माध्यम से समाधान चाहता है, जबकि इस क्षेत्र पर नियंत्रण भारत के पास बना हुआ है। रणनीतिक दृष्टि से लिपुलेख दर्रा बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत और चीन को जोड़ने वाला मार्ग है, जो दोनों देशों की संवेदनशील हिमालयी सीमा के पास स्थित है।
सुगौली संधि क्या थी?
लिपुलेख विवाद को समझने के लिए सुगौली संधि को समझना बेहद जरूरी है। 18वीं और 19वीं शताब्दी में गोरखा साम्राज्य तेजी से विस्तार कर रहा था। नेपाल ने कुमाऊं, गढ़वाल और तराई के कई क्षेत्रों तक अपना प्रभाव बढ़ा लिया था। इस विस्तार के कारण नेपाल और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच संघर्ष शुरू हुआ।
1814 से 1816 के बीच एंग्लो-नेपाल युद्ध लड़ा गया। युद्ध में नेपाल को नुकसान उठाना पड़ा और अंततः उसे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ समझौता करना पड़ा। 2 दिसंबर 1815 को सुगौली संधि पर हस्ताक्षर हुए और 4 मार्च 1816 से यह प्रभावी हो गई। इस संधि के तहत नेपाल ने अपने कई क्षेत्रों पर दावा छोड़ दिया।
साथ ही यह तय किया गया कि काली नदी दोनों पक्षों के बीच सीमा का काम करेगी। नेपाल आज भी अपने दावों के समर्थन में इसी संधि और ब्रिटिश काल के कई पुराने नक्शों का हवाला देता है। नेपाल का तर्क है कि यदि मूल संधि और शुरुआती नक्शों को आधार बनाया जाए तो कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख उसके हिस्से में आते हैं।
2020 में क्यों बढ़ा था विवाद और क्या है भारत का पक्ष?
लिपुलेख विवाद 2020 में भी सुर्खियों में आया था। भारत ने उत्तराखंड के धारचूला से लिपुलेख दर्रे तक जाने वाली सड़क का उद्घाटन किया था। इस सड़क का उद्देश्य कैलास मानसरोवर यात्रियों और सीमावर्ती इलाकों तक पहुँच आसान बनाना था। नेपाल ने इस पर कड़ा विरोध जताया और कहा कि सड़क विवादित क्षेत्र से होकर गुजरती है।
इसके जवाब में नेपाल ने नया राजनीतिक नक्शा जारी किया, जिसमें कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख को अपने क्षेत्र का हिस्सा दिखाया गया। बाद में नेपाल ने इस नक्शे को संवैधानिक मान्यता भी दे दी। भारत ने नेपाल की इस कार्रवाई को एकतरफा कदम बताते हुए खारिज कर दिया और कहा कि सीमा विवाद का समाधान बातचीत के जरिए होना चाहिए।
भारत का कहना है कि कालापानी और लिपुलेख क्षेत्र लंबे समय से उसके प्रशासनिक नियंत्रण में रहे हैं। स्वतंत्रता के बाद भारत ने ब्रिटिश भारत की प्रशासनिक सीमाएँ विरासत में प्राप्त कीं और उसी आधार पर इन क्षेत्रों का प्रबंधन किया जाता रहा है। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद इस क्षेत्र का सामरिक महत्व और बढ़ गया।
भारत ने यहाँ अपनी सुरक्षा और प्रशासनिक मौजूदगी मजबूत की। भारत का यह भी तर्क है कि कैलास मानसरोवर यात्रा के लिए लिपुलेख मार्ग का उपयोग दशकों से किया जाता रहा है और यह क्षेत्र हमेशा से भारतीय प्रशासन के अधीन रहा है। भारत और नेपाल के बीच करीब 1,751 किलोमीटर लंबी खुली सीमा है।
दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक और पारिवारिक संबंध बेहद गहरे हैं। यही कारण है कि सीमा से जुड़े अधिकांश मुद्दों का समाधान बातचीत के जरिए किया जाता रहा है, लेकिन नेपाल ने एक बार फिर बिना सबूतों के दावा तो ठोका ही साथ ही द्विपक्षीय वार्ता के बजाय तीसरे देश को भी बेवजह शामिल करने की कोशिश की।
उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले से एक ऐसी हृदयविदारक और कानून-व्यवस्था को चुनौती देने वाली घटना सामने आई है, जिसने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया है। गैंड़ास बुजुर्ग थाना क्षेत्र के पिपराराम गाँव में महज एक सामान्य पूछताछ और टोकने की बात पर शुरू हुआ विवाद अगले दिन तड़के एक सोची-समझी हिंसक वारदात में बदल गया। रात में 10 बजे के बाद गाँव में संदिग्ध परिस्थितियों में घूम रहे आसिफ को जब स्थानीय निवासी ने सुरक्षा के लिहाज से रोका, तो उसने इसे अपना अपमान मान लिया। अगले दिन सुबह वह अपने पूरे कुनबे और धारदार हथियारों के साथ आया और एक हिंदू परिवार पर जानलेवा हमला बोल दिया।
इस बर्बर और अमानवीय हमले में गंभीर रूप से घायल हुए धनराज मौर्य ने आखिरकार लखनऊ के अस्पताल में दम तोड़ दिया।
क्या था पूरा मामला, जिसमें आसिफ ने बनाया हिंदू परिवार को खत्म करने का प्लान
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस घटना की शुरुआत 26 मई 2026 की रात करीब 10 बजे हुई थी। ग्रामीण परिवेश में रात के समय सुरक्षा को लेकर अमूमन लोग सतर्क रहते हैं। इसी सतर्कता के तहत, पिपराराम गाँव के निवासी राजू मौर्य ने गाँव की गलियों में देर रात संदिग्ध परिस्थितियों में घूम रहे मोहम्मद आसिफ खान को देखा। इतनी रात गए किसी बाहरी या संदिग्ध गतिविधि को देखकर राजू मौर्य ने आसिफ को रोक लिया और वहाँ घूमने की वजह पूछी।
एक जिम्मेदार नागरिक और ग्रामीण होने के नाते राजू मौर्य की यह पूछताछ बेहद सामान्य और सुरक्षा के दृष्टिकोण से आवश्यक थी। लेकिन अहंकार और आपराधिक प्रवृत्ति से ग्रस्त मोहम्मद आसिफ खान को यह बात नागवार गुजरी। उसने इस सामान्य टोकने को अपनी झूठी शान के खिलाफ माना। मौके पर ही आसिफ ने राजू मौर्य के साथ तीखी बहस शुरू कर दी और गाली-गलौज पर उतर आया। ग्रामीणों के हस्तक्षेप के बाद उस वक्त तो मामला शांत हो गया, लेकिन आसिफ वहां से जाते-जाते राजू मौर्य को ‘सुबह देख लेने’ और अंजाम भुगतने की खुली धमकी देकर गया।
सोची-समझी साजिश के तहत सुबह के समय मुस्लिमों के गुट ने किया हमला
आसिफ रात की बात को भूला नहीं था, बल्कि वह रातभर अपने साथियों के साथ मिलकर एक खूनी साजिश को अंजाम देने की योजना बना रहा था। अगले दिन यानी 27 मई की सुबह-सुबह, जब पूरा गांव अभी ठीक से जागा भी नहीं था, मोहम्मद आसिफ खान ने अपने पिता वारिस अली और अपने अन्य भाइयों व साथियों साजिद खान, सलीम उर्फ सालिम अली, माजिद अली, आकिब और वाजिद को इकट्ठा किया।
यह कोई अचानक हुआ झगड़ा नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी और योजनाबद्ध हत्या की कोशिश थी। आरोपित अपने घरों से लाठी, डंडे, लोहे की रॉड और धारदार हथियारों से लैस होकर आए थे। उनका एकमात्र मकसद राजू मौर्य और उनके परिवार को सबक सिखाना और अपनी दबंगई कायम करना था।
आरोपितों ने बिना किसी हिचकिचाहट के राजू मौर्य के घर पर धावा बोल दिया। घर के बाहर पहुँचते ही उन्होंने गाली-गलौज शुरू कर दी और जैसे ही राजू मौर्य बाहर आया, इन सभी दरिंदों ने उस पर बेरहमी से हमला कर दिया।
बीच-बचाव करने आए पूरे परिवार को बनाया निशाना
राजू मौर्य की चीख-पुकार सुनकर उनके परिवार के लोग उन्हें बचाने के लिए दौड़े। हमलावरों की क्रूरता का आलम यह था कि उन्होंने बीच-बचाव करने आए बुजुर्गों, महिलाओं और युवाओं में से किसी को नहीं बख्शा। हमलावर इस कदर अंधाधुंध वार कर रहे थे कि जो भी सामने आया, उसे लहूलुहान करते गए। इस अमानवीय हमले में धनराज मौर्य (जिन्होंने अपने भाई को बचाने का प्रयास किया) के सिर पर लोहे की रॉड और लाठियों से कई घातक वार किए गए।
इसके साथ ही मीना देवी (महिला होने के बावजूद अपराधियों ने उन पर जरा भी रहम नहीं खाया और उन्हें गंभीर रूप से पीटकर मरणासन्न कर दिया), हीरालाल मौर्य, सोहनलाल मौर्य और आकाश मौर्य को भी बुरी तरह पीटा गया, जिससे वे सभी गंभीर रूप से घायल होकर जमीन पर गिर पड़े।
FIR की कॉपी
पूरे घर में खून बिखर गया और चीख-पुकार मच गई। जब ग्रामीणों की भीड़ जुटने लगी, तो आरोपित जान से मारने की धमकी देते हुए मौके से फरार हो गए। अपराधियों का यह कृत्य उनकी अत्यंत हिंसक और समाज-विरोधी मानसिकता को उजागर करता है।
अस्पताल में जिंदगी की जंग और धनराज मौर्य का दुःखद अंत
घटना के तुरंत बाद सभी घायलों को आनन-फानन में स्थानीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) ले जाया गया। प्राथमिक उपचार के बाद अन्य घायलों की स्थिति में थोड़ा सुधार हुआ, लेकिन धनराज मौर्य की हालत अत्यंत नाजुक बनी हुई थी। उनके सिर में गंभीर चोटें आई थीं और अंदरूनी रक्तस्राव हो रहा था। जिला अस्पताल के डॉक्टरों ने उनकी गंभीर स्थिति को देखते हुए उन्हें तत्काल लखनऊ के उच्च चिकित्सा संस्थान (ट्रॉमा सेंटर) के लिए रेफर कर दिया।
शनिवार (30 मई 2026) को लखनऊ में कई दिनों तक जिंदगी और मौत के बीच जूझने के बाद आखिरकार धनराज मौर्य ने दम तोड़ दिया। डॉक्टरों के तमाम प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। जैसे ही धनराज की मौत की खबर पिपराराम गाँव पहुँची, पूरे इलाके में शोक की लहर दौड़ गई और ग्रामीणों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। वहीं दूसरी ओर घायल महिला मीना देवी की स्थिति भी अभी पूरी तरह खतरे से बाहर नहीं है और उनका इलाज अस्पताल में जारी है। धनराज की मौत के बाद पुलिस को मजबूरन दर्ज प्राथमिकी में हत्या की संगीन धाराएँ बढ़ानी पड़ीं।
शव पहुँचते ही भड़का जन-आक्रोश, बस्ती-बलरामपुर मार्ग पर किया चक्काजाम
रविवार (31 मई 2026) सुबह जब धनराज मौर्य का शव पोस्टमार्टम के बाद एम्बुलेंस से पिपराराम गाँव पहुँचा, तो परिजनों के सब्र का बाँध टूट गया। मृतक के रोते-बिलखते बूढ़े माता-पिता, पत्नी और मासूम बच्चों को देखकर पूरे गाँव का कलेजा मुंह को आ गया। अपराधियों की इस घिनौनी हरकत के खिलाफ ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा। सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण और पीड़ित परिवार के सदस्य शव को लेकर बलरामपुर-बस्ती मार्ग पर उतर आए। उन्होंने मुख्य सड़क के बीचों-बीच शव को रखकर चक्काजाम कर दिया।
ग्रामीणों का साफ कहना था कि क्षेत्र में इन दबंगों का हौसला इतना बढ़ गया है कि अब लोग अपने घरों में भी सुरक्षित नहीं हैं।
इस चक्काजाम के कारण उत्तर प्रदेश के इस व्यस्ततम मार्ग पर दोनों तरफ वाहनों की कई किलोमीटर लंबी कतारें लग गईं। भीषण गर्मी में यात्री परेशान होते रहे, लेकिन ग्रामीणों का रुख स्पष्ट था कि जब तक न्याय का ठोस और लिखित आश्वासन नहीं मिलता, तब तक अंतिम संस्कार नहीं किया जाएगा।
अपराधियों को जानिए, जिन्होंने दिनदहाड़े बहाया खून
पुलिस रिकॉर्ड और दर्ज एफआईआर के अनुसार, इस खूनी खेल में एक ही परिवार के कई लोग और उनके साथी शामिल थे। अब्बू वारिस अली ने अपने बेटों को सही रास्ता दिखाने के बजाय खुद इस जघन्य अपराध में उनका साथ दिया, जो यह साबित करता है कि पूरा परिवार ही आपराधिक मानसिकता से ग्रस्त है।
इस मामले में मुख्य आरोपित मोहम्मद आसिफ खान को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। उसके साथ ही आसिफ के अब्बू वारिस अली, उसके साथी साजिद खान, सलीम उर्फ सालिम अली, माजिद अली और आकिब को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। वहीं वाजिद नाम का अपराधी अब तक फरार है। पुलिस उसकी तलाश कर रही है।
FIR में दर्ज हत्यारोपितों के नाम
प्रशासनिक मुस्तैदी और राजनीतिक हस्तक्षेप से खुला जाम
मामले की संवेदनशीलता और दो अलग-अलग समुदायों से जुड़े होने के कारण जिला प्रशासन में हड़कंप मच गया था। किसी भी अप्रिय स्थिति या सांप्रदायिक तनाव को रोकने के लिए क्षेत्राधिकारी (सीओ) उतरौला राघवेंद्र प्रताप सिंह, उपजिलाधिकारी (एसडीएम) उतरौला मनोज कुमार सरोज, गैंड़ास बुजुर्ग के प्रभारी निरीक्षक राजीव कुमार मिश्र और उतरौला के प्रभारी निरीक्षक अवधेश राज सिंह भारी पुलिस बल और पीएसी (PAC) के साथ मौके पर पहुँचे।
अधिकारियों ने कई दौर की वार्ता की, ग्रामीणों को कानून का हवाला दिया और आश्वासन दिया कि किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। लेकिन ग्रामीण इस बात पर अड़े थे कि पूर्व में भी ऐसी घटनाओं में ढीली कार्रवाई होती रही है, इसलिए उन्हें उच्च स्तरीय ठोस आश्वासन चाहिए।
जब प्रशासनिक स्तर पर गतिरोध नहीं टूटा, तो क्षेत्रीय भाजपा विधायक राम प्रताप वर्मा अपने सहयोगियों (विधानसभा संयोजक सुधीर श्रीवास्तव, चेयरमैन प्रतिनिधि अनूप चंद गुप्त, विकास गुप्त, महेंद्र प्रताप सिंह, आयुष जायसवाल और राम गोपाल चौधरी) के साथ प्रदर्शन स्थल पर पहुंचे।
विधायक राम प्रताप वर्मा ने सीधे पीड़ित परिवार के बीच बैठकर उनका दर्द साझा किया। उन्होंने तात्कालिक राहत के रूप में 2 लाख रुपये की आर्थिक सहायता की तत्काल घोषणा की। साथ ही उन्होंने वादा किया कि शासन स्तर (मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष) से अतिरिक्त वित्तीय मदद और परिवार के एक सदस्य के पुनर्वास के लिए वे स्वयं पैरवी करेंगे। उन्होंने पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया कि अपराधियों पर ऐसी कार्रवाई की जाए जो एक मिसाल बने।
विधायक के इस ठोस आश्वासन और कठोरतम कानूनी कार्रवाई के वादे के बाद, ग्रामीण और परिजन शांत हुए। करीब दो से तीन घंटे के बाद मार्ग से जाम हटाया गया और परिजन शव को अंतिम संस्कार के लिए ले जाने को राजी हुए। कड़ी सुरक्षा के बीच धनराज मौर्य का अंतिम संस्कार संपन्न कराया गया।
समाज में ऐसे अपराधियों के लिए कोई जगह नहीं
इस पूरे मामले में सीओ राघवेंद्र प्रताप सिंह ने मीडिया से बताया कि कुल 7 नामजद आरोपितों में से 6 को गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है और फरार वाजिद की गिरफ्तारी के लिए पुलिस की तीन विशेष टीमें लगातार दबिश दे रही हैं। पुलिस ने यह भी स्पष्ट किया है कि चार्जशीट दाखिल करने की प्रक्रिया को फास्ट-ट्रैक पर रखा जाएगा और आरोपितों पर गैंगस्टर एक्ट के तहत भी कार्रवाई की जाएगी।
कॉन्ग्रेस के ‘दरबारी’ और कथित इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने हाल ही में लेख लिखा है। मूलरूप से ‘द टेलीग्राफ’ के लिए लिखे गए इस लेख को ‘स्क्रॉल’ ने भी छापा है। लेख में उन्होंने एक बड़ी बात कही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सत्ता को मजबूत करने में गाँधी परिवार का भी हाथ है। गुहा का कहना है कि ‘परिवारवाद’ के कारण राहुल गाँधी ने कभी कोई असली काम नहीं किया, इसके चलते लगातार कॉन्ग्रेस के विधायक घटते गए। गुहा ने कहा कि इसके बावजूद राहुल गाँधी जमीनी स्तर पर पार्टी को मजबूत करने या शासन की विफलताओं पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय प्रधानमंत्री पर व्यक्तिगत रूप से हमला करते रहे।
Ramachandra Guha: How the Gandhi family has helped Modi consolidate power https://t.co/Au9xjm2Kp5
स्क्रॉल ने इस लेख को “गाँधी परिवार ने मोदी को सत्ता मजबूत करने में कैसे मदद की” शीर्षक से छापा है। वहीं ‘द टेलीग्राफ’ ने इसे “मोदी के समर्थक” नाम दिया है। इस लेख में प्रियंका गाँधी के वायनाड से चुनाव लड़ने को गुहा ने गलत फैसला बताया गया। संविधान की 75वीं वर्षगाँठ पर प्रियंका को मुख्य वक्ता बनाने को भी गुहा ने अजीब बताया क्योंकि उनकी दादी इंदिरा गाँधी ने ही आपातकाल लगातकर संविधान को नुकसान पहुँचाया था।
गुहा ने पीएम मोदी को का मानना है कि इसमें कोई शक नहीं है कि मई 2014 से ‘गणतंत्र के पतन’ के मुख्य सूत्रधार नरेंद्र मोदी, अमित शाह और उनकी पार्टी भाजपा है। गुहा ने साथ में यह भी कहा कि इसमें गाँधी परिवार ने जाने-अनजाने उनकी मदद ही की है। वे 2029 की भविष्यवाणी करते हुए कहते हैं कि पीएम मोदी की अजेय छवि टूट सकती है लेकिन साथ में यह भी कहा कि उस वक्त जो नेता इस नाराजगी को राजनीतिक चुनौती में बदलेंगे, वो राहुल या प्रियंका गाँधी नहीं होंगे।
गुहा जो कह रहे हैं वो न तो भाजपा की तारीफ है न ही कोई एकतरफा बात। वो मानते हैं कि भाजपा की सत्ता को आगे बढ़ाने मोदी फैक्टर है और शाह की रणनीति है। साथ में तथ्यों के साथ में इसका श्रेय कॉन्ग्रेस को देने के पीछे भी वजह सामने रखी। यानी गुहा ने जो कहा वो तथ्यात्मक रूप से गलत नहीं है, बस कॉन्ग्रेसी इसे पचा नहीं पा रहे हैं। और जैसे ही उन्होंने गाँधी परिवार की आलोचना की, कॉन्ग्रेस समर्थक उनके इतिहासकार होने पर ही सवाल उठाने लगे।
रामचंद्र गुहा के लेख से कॉन्ग्रेसियों को लगी मिर्ची
कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम ने रामचंद्र गुहा के इस लेख की खूब आलोचना की। कॉन्ग्रेसी रामचंद्र गुहा के ‘इतिहासकार’ वाला लाइसेंस रद्द करने में जुट गए। किसी ने लेख को ‘बौद्धिक बेईमानी’ बताया और कहा कि यह विश्लेषण भाजपा के लिए ही काम करता है। किसी ने सीधा सवाल पूछा कि दूसरों को दोष देने से पहले बताइए कि आपने खुद मोदी को कमजोर करने के लिए क्या किया? एक ने तो गुहा को सीधे ‘फ्रॉड’ तक बुला दिया।
पेशे से पत्रकार और कॉन्ग्रेस के चाटूकार औनिंद्यो चक्रवर्ती ने कहा कि गुहा हमेशा से मोदी सरकार के आलोचक रहे हैं, इसलिए गाँधी परिवार की आलोचना करने से वो भाजपा समर्थक नहीं हो जाते। साथ में गुहा पर सवाल उठाया कि सिर्फ आर्काइव किताबें लिखने से कोई इतिहासकार नहीं बन जाता।
Prof Ram Guha has always been an outspoken critic of the Modi government. Opposing the Gandhi family or writing analytical pieces about why Narendra Modi wins doesn’t make one pro-Modi. Just as writing books with a lot of archival information doesn’t make one a historian.
— Aunindyo Chakravarty (@Aunindyo2023) June 1, 2026
राजेश ग्रीगलानी, जो खुद कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता हैं, उन्होंने गुहा के लेख को ‘बौद्धिक बेईमानी’ बताया। उन्होंनेराहुल गाँधी की तरफ लेते हुए कहा कि संसद में अडानी, NEET और संस्थाओं पर कब्जे जैसे मुद्दे लगातार उठा रहे हैं और 2024 में भाजपा का बहुमत तोड़ना उनकी रणनीति का नतीजा है। वो कहते हैं कि गुहा का ‘दोनों तरफ गलती है’ वाला रुख खतरनाक है और यह विपक्षी कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ता है।
Dear @Ram_Guha, Your "Modi's Enablers" Piece is Intellectual Dishonesty That Only Helps BJP & Fundamentalists! Link: https://t.co/AdOyOfaan1 As a long-time Congress worker who has worked closely with the party ecosystem, I stand firmly with @RahulGandhi . Your article, Mr. Guha,…
शिवानी वर्मा ने तंज कसा कि गुहा सालों से राहुल गाँधी पर कॉलम पर कॉलम लिखते आ रहे हैं, अगर राहुल इतने ही अप्रासंगिक हैं तो वो उनके बारे में लिखना बंद क्यों नहीं कर पाते। वो नाम चॉमस्की का हवाला देते हुए कहती हैं कि सबसे खतरनाक बुद्धिजीवी वो होता है जो बिना पैसे लिए भी बारीक विश्लेषण के जरिए सत्ता के लिए सुविधाजनक निष्कर्ष पर पहुँचता है।
प्रोफेसर रामचंद्र गुहा सालों से उल्लेखनीय समर्पण के साथ राहुल गांधी की कमियों के बारे में लिखते आ रहे हैं।
पन्ने के पन्ने। कॉलम के बाद कॉलम। एक ऐसे व्यक्ति के लिए जो खुद को निराश (भ्रममुक्त) बताता है, उनके लेखन की यह मात्रा लगभग प्रभावित करने वाली है।
कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम से जुड़ा ‘एक्स’ हैंडल Rofl Democrazy का कहना है कि गुहा ने जानबूझकर यह नजरअंदाज किया कि मुसलमानों के खिलाफ नफरत में अँधे हो चुके बहुसंख्यक वोटरों ने मोदी को मजबूत किया है। वो राहुल को अकेला लड़ने वाला बताते हैं और कहते हैं कि उदारवादियों पर भरोसा नहीं करना चाहिए।
Ramachandra Guha deliberately missed how the majority of this country blinded by Anti-Muslim hatred has helped Modi consolidate power.
Instead he is blaming the lone fighter who is fighting against the ideology of hate despite so many electoral defeats.
सौरभ ने गुहा से सीधा सवाल पूछा कि चलो मान लिया गाँधी परिवार ने मोदी को मजबूत किया, लेकिन आपने मोदी को कमजोर करने के लिए क्या किया? भाजपा जब नेहरू-गाँधी पर झूठ फैला रही थी तब इतिहासकार के तौर पर आप कहाँ थे?
रामचद्र गुहा साहब चलिए मान लिया कि मोदी जी की सत्ता मजबूत करने में गांधी फैमिली ने मदद की…लेकिन आप अपना तो बताइए कि आपने उनकी सत्ता कमजोर करने के लिए क्या किया❓ आप लेखक हैं तो आपने उनकी पोल खोलते हुए कितने लेख लिखे❓ आप इतिहासकार हैं तो बीजेपी जब नेहरू-गांधी के खिलाफ झूठ फैला… https://t.co/sTLo7Gdx7r
जवाहरलाल नेहूर के करीबी वीके कृष्ण मेनन के पैरॉडी ‘एक्स’ अकाउंट ने गुहा को ‘फ्रॉड’ करार दिया और कहा कि एक सच्चे इतिहासकार को राजनीतिक टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। आगे कहा कि गाँधी परिवार को नीचा दिखाने के लिए गुहा ने नेहरू के बारे में भाजपा के झूठ को भी आगे बढ़ाया है।
@Ram_Guha is fraud ; neither knows history nor geography nor civics. A true historian should never involve in political activism and commentary. It is conflict of interest. In order to undercut Gandhis, Guha perpetrated many of BJP lies on Jawaharlal Nehru. Congress is too stupid…
कैसे रामचंद्र गुहा ने कॉन्ग्रेस को बताया ‘पारिवारिक फर्म’?
गुहा लिखते हैं कि भारत जोड़ो यात्रा के बाद लगा था कि कॉन्ग्रेस बदल रही है, लेकिन 2024 के चुनाव खत्म होते ही पार्टी फिर ‘पारिवारिक फर्म’ बन गई। राहुल के वायनाड छोड़ते ही वहाँ प्रियंका गाँधी को बिठा दिया गया और दावा किया गया कि राहुल उत्तर भारत और प्रियंका दक्षिण का प्रतिनिधित्व करती हैं। गुहा यह भी आपत्ति जताते हैं कि संविधान की 75वीं वर्षगाँठ पर कॉन्ग्रेस ने प्रियंका को मुख्य वक्ता बनाया, जबकि उनकी दादी इंदिरा गाँधी ने ही आपातकाल लगाकार उसी संविधान को सबसे बड़ा नुकसान पहुँचाया था।
(स्क्रीनशॉट साभार: The Telegraph)
गुहा आँकड़े देते हुए बताते हैं कि 2008 से जब से राहुल ने कमान संभाली है तब से देशभर में कॉन्ग्रेस के विधायकों की संख्या 1,204 से घटकर 676 रह गई है। प्रियंका के बारे में भी गुहा लिखते हैं कि 2022 यूपी विधानसभा चुनाव में उनकी अगुवाई में कॉन्ग्रेस को महज 2.27% वोट मिले। फिर भी 99 सीटें आते ही चापलूसों और दिल्ली के कुछ हिंदू-विरोधी पत्रकारों ने राहुल को ‘भविष्य का प्रधानमंत्री’ घोषित कर दिया, नतीजा यह हुआ कि आज कॉन्ग्रेस ज्यादातर हिस्सों में धीरे-धीरे जमीन खो रही है जबकि गुजरात, मध्य प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों में भाजपा ‘शासन की स्वाभाविक पार्टी’ बन चुकी है।
(स्क्रीनशॉट साभार: The Telegraph)
राहुल में क्या कमी देखते हैं गुहा?
गुहा लिखते हैं कि राहुल गाँधी व्यक्तिगत रूप से अच्छे इंसान हैं लेकिन 55 साल की उम्र में भी वो अपनी माँ सोनिया गाँधी की इच्छा के साधन हैं। उन्होंने UPA के 10 साल में मंत्री बनने से मना कर दिया, कभी कोई असली काम नहीं किया तो फिर इतने बड़े और विविध देश के प्रधानमंत्री के तौर पर भरोसा कैसे बनेगा।
गुहा यह भी लिखते हैं कि राहुल किसी मुद्दे पर टिककर काम नहीं करते, कभी चुनाव आयोग के पक्षपात पर प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे तो अगले ही दिन यूरोप या लैटिन अमेरिका की यात्रा पर निकल जाएँगे। सिर्फ भारत जोड़ो यात्रा के कुछ महीनों में ही उन्होंने भाजपा नेताओं जैसा फोकस्ड काम दिखाया, बाकी उनकी राजनीति ज्यादातर ट्विटर (एक्स) तक सिमटी रहती है जो 24 घंटे में भुला दी जाती है।
गुहा आगे लिखते हैं कि 2019 में ‘चौकीदार चोर है’ वाला अभियान बुरी तरह फेल हुआ, लेकिन राहुल ने उससे कोई सबक नहीं लिया और आज भी मोदी पर निजी हमले जारी हैं। गुहा यह भी लिखते हैं कि मोदी, शाह और भाजपा गणतंत्र के मुख्य दुश्मन हैं, लेकिन गांधी परिवार जाने-अनजाने उनका साथ देने वाला बन गया है।
अंत में गुहा हंगरी का उदाहरण देते हैं जहाँ एक बिल्कुल नए और साफ चेहरे ने गाँव-गाँव घूमकर वहाँ के ताकतवर नेता को चुनौती दी और साफ तौर पर कहते हैं कि 2029 में जब मोदी के खिलाफ नाराजगी राजनीतिक चुनौती बनेगी, तो उसे आगे ले जाने वाला नेता राहुल या प्रियंका गाँधी नहीं होंगे।
कौन है रामचंद्र गुहा और उनसे जुड़े विवाद?
रामचंद्र गुहा का जन्म 1958 में देहरादून में हुआ। दून स्कूल से प्रारंभिक पढ़ाई पूरी करने के बाद दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से अर्थशास्त्र में डिग्री ली। फिर समाजशास्त्र में डॉक्टरेट किया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, गुहा येल, स्टैनफोर्ड और कैलिफोर्निया के विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर रहे हैं। महात्मा गाँधी की जीवनी और भारत के इतिहास पर कई किताबें भी लिखी हैं। खुद को इतिहासकार कहते हैं, हालाँकि इतिहास में उनका कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं है। वामपंथी मीडिया द टेलीग्राफ, द वायर जैसे पोर्टल में नियमित कॉलम लिखते हैं।
लेकिन इनका एक और चेहरा भी है। साल 2018 की बात करें जब गुहा गोवा गए और वहाँ से एक ट्वीट किया। लिखा कि ‘चूँकि यह भाजपा शासित राज्य है, इसीलिए मैंने बीफ खाकर जश्न मनाया’ यानी खाने को भी राजनीति बना दिया। जब बवाल मचा तो माफी माँग ली और कहा कि ट्वीट गैरजरूरी था। लेकिन मकसद साफ था, किसी भी बहाने भाजपा को घेरना।
फिर 2019 में देश में CAA के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे थे। गुहा बेंगलुरु की सड़कों पर उतर आए, प्रदर्शन में शामिल हुए और हिरासत में लिए गए। यानी सिर्फ लिखना नहीं, सड़क पर भी उतरते हैं, जब मुद्दा मोदी सरकार के खिलाफ हो।
फिर एक विवाद और। इन्होंने ट्वीट किया, “गुजरात के पास सिर्फ पैसा है, संस्कृति नहीं। बंगाल के पास संस्कृति है।” तब बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार थी। यानी प्रधानमंत्री के गृह राज्य की संस्कृति पर सीधा हमला किया गया। इस पर भी लताड़े गए और जवाब मिला कि गरबा, सोमनाथ, नरसिंह मेहता, सरदार पटेल, महात्मा गाँधी, ये सब गुजरात की संस्कृति नहीं है तो क्या है?
2022 में गुजरात दंगों की 20वीं बरसी पर स्क्रॉल के लिए एक लेख लिखा। इसमें 2002 के दंगों को ‘Pogrom’ यानी एक समुदाय के खिलाफ सुनियोजित हमला बताया। लेकिन उसी लेख में गोधरा में जिंदा जलाए गए 59 कारसेवकों का जिक्र तक नहीं था। और इसके साथ ही कॉन्ग्रेस की तारीफ करते हुए लिखा कि मोदी ने गुजरात दंगों पर माफी नहीं माँगी, यह जानते हुए भी कि नानावती आयोग मोदी को क्लीन चिट दे चुका था।
और केदारनाथ में जब पीएम मोदी ने आदि शंकराचार्य की प्रतिमा का अनावरण किया तो उस पर भी आपत्ति जताने वालों में गुहा शामिल थे।
तो यह है असली तस्वीर। हिंदू आस्था हो, भाजपा शासित राज्य हो, मोदी सरकार का कोई भी फैसला हो, गुहा निशाना साधने का कोई मौका नहीं छोड़ते। और बीच-बीच में कॉन्ग्रेस पर भी कुछ लिख देते हैं ताकि निष्पक्ष दिखें। अब जब इन्होंने गाँधी परिवार की आलोचना की है तो वही कॉन्ग्रेस इनके इतिहासकार होने पर सवाल उठा रही है। यानी जब तक काम का था, बुद्धिजीवी थे। जैसे ही गाँधी परिवार पर लिखा, फ्रॉड हो गए।
कभी मुंबई अंडरवर्ल्ड का सबसे खतरनाक शार्पशूटर और दाऊद इब्राहिम के सबसे करीबियों में एक मुन्ना झिंगाडा एक बार फिर एक्टिव है। ISI और दाऊद इब्राहिम की आतंकी साजिश में मुन्ना झिंगाडा का नाम आने के बाद भारतीय सुरक्षा एजेंसियाँ अलर्ट हो गई हैं। हाल ही में 9 आतंकवादियों की गिरफ्तारी के बाद से वह एक बार फिर चर्चा में है। वह पाकिस्तान में बैठकर भारत में आईएसआई के आतंकी हमलों के नेटवर्क को हैंडल कर रहा था।
झिंगाड़ा के मॉड्यूल का पता चलते ही ये बात भी सामने आ गई है कि दाऊद इब्राहिम के आपराधिक गिरोह और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के बीच पुराना गठजोड़ एक बार फिर भारत के खिलाफ साजिश रच रहा है। लंबे समय से चले आ रहे इस गठजोड़ ने ही मुंबई समेत देश के कई हिस्सों को दहलाया था। अधिकारियों ने कहा कि यह दाऊद इब्राहिम द्वारा सिकुड़ते डी-कंपनी नेटवर्क में अपनी प्रासंगिकता को पुनः स्थापित करने के प्रयासों का संकेत देता है।
मुंबई के जोगेश्वरी की गलियों से शुरू हुआ मुन्ना का सफर अब पाकिस्तान से भारत पर हमला करने के मंसूबे तक पहुँच गया है।
कौन है मुन्ना झिंगाड़ा?
मुन्ना झिंगाडा उर्फ सैयद मुदस्सर हुसैन उर्फ सैयद मुजक्किर हुसैन अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम और उसकी डी-कंपनी का एक कुख्यात शार्प शूटर है। वह मुंबई के जोगेश्वरी का रहने वाला है। 90 के दशक में वह दाऊद इब्राहिम और छोटा शकील के गैंग में एक खतरनाक शूटर के तौर पर जाना जाता था। दाऊद को उसके अचूक निशाने पर इतना भरोसा था कि गैंग के सबसे मुश्किल काम भी मुन्ना को सौंपे जाते थे। उसपर मर्डर, एक्सटॉर्शन और गैंग वॉर से जुड़े 70 से ज्यादा केस दर्ज हैं।
झिंगाड़ा का आपराधिक इतिहास दाऊद इब्राहिम और उसके पूर्व सहयोगी छोटा राजन के बीच हुए गैंगवार से भी जुड़ा हुआ है।
थाईलैंड में छोटा राजन पर हमला किया
2000 में बैंकॉक में छोटा राजन की हत्या करने की कोशिश की गई थी। उस वक्त झिंगाड़ा काफी सुर्खियों में आया था। दाऊद के खासमखास छोटा शकील के निर्देशों पर कार्रवाई करते हुए झिंगाड़ा अपने गिरोह के कुछ शूटरों के साथ थाईलैंड गया और राजन पर जानलेवा हमला किया। राजन बुरी तरह घायल हुआ, लेकिन उसकी जान बच गई, लेकिन उसका करीबी रोहित वर्मा इस हमले में मारा गया।
इस हमले के कारण छोटा राजन को लगभग दो साल तक छिपकर रहना पड़ा। इस दौरान अंडरवर्ल्ड के गुटों के बीच काफी खूनखराबा हुआ।
थाईलेंड में झिंगाड़ा को वहाँ की पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और रोहित वर्मा की हत्या के आरोप में उसे 10 साल जेल की सजा सुनाई। जब थाई पुलिस ने मुन्ना झिंगाड़ा को गिरफ्तार किया, तो उसके पास से ‘मोहम्मद सलीम’ के नाम का एक पाकिस्तानी पासपोर्ट भी मिला था।
इसके बाद उसकी राष्ट्रीयता और निर्वासन को लेकर लगभग दो दशकों तक भारत और पाकिस्तान के बीच थाईलेंड की कोर्ट में लड़ाई चली। झिंगाड़ा ने मोहम्मद सलीम नाम से पाकिस्तानी पासपोर्ट पर थाईलैंड में प्रवेश किया था, इसलिए पाकिस्तान का दावा था कि वह पाकिस्तानी नागरिक है, जबकि भारत का कहना था कि वह मुंबई के जोगेश्वरी में पैदा हुआ भारतीय नागरिक है।
हालाँकि थाई कोर्ट ने शुरू में भारत के प्रत्यर्पण करने की माँग के पक्ष में फैसला सुनाया था, लेकिन बाद में कानूनी कार्यवाही के बाद 2019 में थाईलैंड ने झिंगाडा को पाकिस्तान को सौंप दिया। इससे झिंगाड़ा को भारत लाने के प्रयासों को बड़ा झटका लगा।
कराची से नए हमले की प्लानिंग बना रहा झिंगाड़ा
2019 में बैंकॉक जेल से रिहा होने के बाद आईएसआई मुन्ना को सीधे कराची ले गई। वहाँ पहुँच कर वह फिर से दाऊद के नेटवर्क में शामिल हो गया। दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए 9 आतंकवादियों की जांच में यह बात सामने आई है कि मुन्ना झिंगाडा अब पाकिस्तान में बैठकर भारत विरोधी गतिविधियों को कोऑर्डिनेट कर रहा है। मुन्ना और उसके साथियों को दिल्ली, मुंबई और दूसरे बड़े शहरों में हमला करने का काम सौंपा है।
मुंबई धमाकों के बाद दाऊद गैंग जिस तरह से आतंकी कार्रवाईयों को अंजाम देता रहा है, उसमें मुन्ना झिंगाडा का रोल अहम है। सिर्फ गैंगस्टर के तौर पर जाना जाने वाला मुन्ना अब ISI के कहने पर सीधे आतंकवादी मॉड्यूल संभाल रहा है। मुन्ना झिंगाडा नाम एक बार फिर भारत की सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है, सुरक्षा एजेंसियां अब उसके नेटवर्क की जाँच कर रही हैं।
9 आतंकियों की हुई थी गिरफ्तारी
जिन 9 आतंकियों को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया है। उससे पूछताछ और प्रारंभिक जाँच में सामने आया है कि ये लोग देश की राजधानी समेत अन्य प्रमुख शहरों में संवेदनशील ठिकानों को निशाना बनाने की तैयारी कर रहे थे। स्पेशल सेल के अनुसार, गिरफ्तार आरोपितों के संपर्क विदेशी हैंडलरों से थे, जो उन्हें एन्क्रिप्टेड ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया के माध्यम से निर्देश दे रहे थे।
जाँच एजेंसियों का कहना है कि गिरफ्तार आतंकियों को महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की रेकी करने, स्थानीय स्तर पर नेटवर्क तैयार करने और संभावित हमलों की योजना बनाने का जिम्मा सौंपा गया था।
पुलिस ने आरोपितों के कब्जे से हथियारों, ग्रेनेड और विस्फोटक सामग्री का बड़ा जखीरा बरामद किया है। बरामद सामग्री की जाँच की जा रही है, ताकि उसके स्रोत और संभावित उपयोग का पता लगाया जा सके। जाँच में यह भी सामने आया है कि आरोपित देश के रणनीतिक महत्व वाले स्थानों, जैसे ऊर्जा प्रतिष्ठान, हवाई अड्डे और रेलवे स्टेशन को निशाना बना सकते थे।
दिल्ली पुलिस का कहना है कि हाल के वर्षों में विदेशों में बैठे आतंकी संचालक भारत में भर्ती, कट्टरपंथी फैलाने और स्लीपर सेल सक्रिय करने के लिए डिजिटल माध्यमों का अधिक उपयोग कर रहे हैं।
गुजरात के कच्छ जिले के माधापार पुलिस स्टेशन के रायधनपार गाँव में पड़ोसी गाँव के कुछ लोगों ने मामूली कहासुनी के बाद हिंदू समुदाय के लोगों पर हमला कर दिया। यह घटना 30 मई 2026 की रात को हुई। शिकायत के मुताबिक, हमलावरों ने पहले गाँव की बिजली बंद कर दी और फिर पहले से प्लान बनाकर हमला किया। इस हिंसा में कई हिंदू युवक और पुलिसवाले घायल हो गए।
स्थानीय हिंदू युवक दर्शन बरडिया की शिकायत के आधार पर माधापार पुलिस ने 23 नामजद लोगों और कई अज्ञात लोगों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं के तहत FIR दर्ज की है।
क्या है मामला
FIR और शिकायतकर्ता दर्शन बरडिया ने ऑपइंडिया को बताया कि घटना 30 मई की रात करीब 10:30 बजे शुरू हुई, जब वह और उसके दोस्त गाँव के बाहरी इलाके में बैठे थे। पड़ोस के वरनोरा गाँव के मुस्लिम युवकों का एक ग्रुप उनके गाँव पहुँचे। इनमें सलीम, अबू सुफियान, साहिल, अब्बास, समीर और अन्य शामिल थे। उन्होंने गाली-गलौज देते हुए धमकी की और कहा, “तुम हमें क्यों घूर रहे हो? अगर तुमने दोबारा देखा, तो हम तुम्हें पीटेंगे।”
यह बहस जल्द ही हाथापाई में बदल गई। इस दौरान, रजाक सिद्दीकी नाम का एक आदमी बोलेरो पिकअप गाड़ी में आया और हिंदू युवकों के साथ लड़ाई में शामिल हो गया। फिर वह चला गया। वह यह दिखाने की कोशिश कर रहा था कि मामला खत्म हो गया है। हालाँकि यह एक बड़ी घटना की शुरुआत थी।
जब गाँव वाले झड़प के जवाब में इकट्ठा हुए, तो रजाक फिरोज रजक मेमन, शोएब सिद्दीकी मोखा, अमन करीम मेमन, अकरम जुसब मेमन, माजिद इब्राहिम केवरा और दूसरे लोगों के साथ वापस आ गया। बताया जाता है कि उन्होंने इकट्ठा हुए गाँव वालों की तरफ तेज रफ्तार में बोलेरो चलाई, ताकि उन्हें कुचल सकें। हालाँकि गाँव वाले किसी तरह हट गए, लेकिन गाड़ी एक खड़ी मोटरसाइकिल से टकरा गई। FIR में इसे हत्या की कोशिश के तौर पर दर्ज किया गया है।
मुस्लिम युवकों ने हथियारों से हमला किया
इस दौरान आरोपितों ने और लोगों को बुलाया। जल्द ही वर्नोरा गाँव से बड़ी संख्या में मुस्लिम मोटरसाइकिल और दूसरी गाड़ियों पर लाठी, पाइप, पत्थर और दूसरे हथियारों से लैस होकर आ गए। हनीफ, उमर, रेहान, दाऊद, एजाज, आफताब, अल्ताफ और दूसरे लोगों को लेकर एक और बोलेरो भी मौके पर पहुँच गई।
शिकायत के मुताबिक, भीड़ ने पहले बिजली के खंभे पर तारों से छेड़छाड़ करके पूरे गाँव की बिजली काट दी। फिर उन्होंने गांव के एंट्री गेट पर जमा हिंदू गाँववालों और रिहायशी इलाकों के घरों पर पत्थर फेंकना शुरू कर दिया। पत्थरबाजी से दहशत फैल गई, जिससे कई लोगों को अपने घरों के अंदर छिपना पड़ा।
दर्शन बरदिया और राजेश चावड़ा समेत कई हिंदू नौजवान घायल हो गए। राजेश चावड़ा की बाईं आँख के पास गंभीर चोटें आई। कम से कम एक नौजवान गंभीर रूप से घायल हो गया, जबकि तीन से चार अन्य को मामूली चोटें आईं। इतना ही नहीं, पुलिस की गाड़ियों पर भी हमला किया गया।
जब माधापार पुलिस स्टेशन और लोकल क्राइम ब्रांच (LCB) की पुलिस टीमें मौके पर पहुंची, तो भीड़ ने उनकी गाड़ियों को भी निशाना बनाया। पथराव में एक LCB गाड़ी समेत दो से तीन पुलिस गाड़ियाँ डैमेज हो गईं। एक पुलिसवाला भी घायल हो गया।
हिंदू संगठन ने सोची समझी साजिश करार दिया
हिंदू युवा संगठन के नेता रघुवीर सिंह जडेजा ने इस हमले को ‘जिहादी सोच’ का परिणाम बताया। उन्होंने कहा कि इसके लिए पहले से योजनाबद्ध तरीके से साज़श रची गई। ऑपइंडिया से बात करते हुए, उन्होंने दावा किया कि ऐसा बहुत कम होता है कि किसी पूरे हिंदू गाँव को इस तरह से टारगेट किया जाए और हमले से पहले बिजली और CCTV कथित तौर पर बंद कर दिए गए हों।
उन्होंने कहा कि साजिश के तहत भीड़ हथियारों से लैस होकर आई थी। वे चेन लेकर आए थे जिन्हें उन्होंने बिजली के खंभों पर तारों पर लगाकर शॉर्ट सर्किट करके पूरे गाँव की बिजली बंद कर दी थी। रघुवीर सिंह ने आगे कहा कि देश के दूसरे हिस्सों में हिंदू समुदाय को भी इस घटना से सीखना होगा। उन्होंने कहा कि जिला पुलिस प्रमुख की मौजूदगी में मुस्लिम भीड़ ने पथराव किया, जिसमें एक पुलिसकर्मी भी घायल हो गया।
उन्होंने वर्नोरा गाँव की तलाशी लेने की माँग की। इसे ‘जिहादी का केंद्र’ कहा और इलाके से गोहत्या और गैर-कानूनी बीफ के व्यापार के पिछले मामलों का हवाला दिया। उन्होंने मुस्लिम बहुल गाँव की पूरी जाँच की माँग की है।
पुलिस ने की कार्रवाई
कच्छ पश्चिम के पुलिस अधीक्षक विकास सुंडा ने कहा कि पुलिस ने तेजी से कार्रवाई की और उसी रात लगभग 23 लोगों को हिरासत में लिया। 23 नामजद आरोपितों और 5-7 अज्ञात लोगों के खिलाफ BNS की संबंधित धाराओं, 109(1), 115(2), 118(1), 125(F), 125(B), 189(2), 190, 191(2), 191(3), 351(3), 296(B), और गुजरात पुलिस एक्ट की धारा 135 के तहत FIR दर्ज की गई है। आरोपों में हत्या की कोशिश, गैर-कानूनी तरीके से जमा होना, जानलेवा हथियारों के साथ दंगा करना और लापरवाही से गाड़ी चलाकर जान को खतरे में डालना शामिल है।
पुलिस ने वरनोरा गाँव में गैर-कानूनी बिजली कनेक्शन के खिलाफ भी कार्रवाई शुरू की है। इलाके में गैर-कानूनी कंस्ट्रक्शन के खिलाफ जल्द ही बुलडोजर एक्शन देखने में आ सकता है। इलाके में अभी हालात काबू में हैं और भारी पुलिस बल तैनात है। पूरे मामले की जाँच जारी है।
(ये खबर मूल रूप से गुजराती में बनी है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने राज्य की माध्यमिक शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन करते हुए वर्षों से चले आ रहे भर्ती संकट को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। प्रदेश में एक समय ऐसा था जब माध्यमिक शिक्षा के क्षेत्र में नियुक्तियाँ पूरी तरह से ठप पड़ी थीं, जिससे न केवल शिक्षण कार्य प्रभावित हो रहा था बल्कि युवाओं का सरकारी तंत्र से भरोसा भी उठने लगा था। लेकिन साल 2017 में सत्ता की कमान संभालते ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस पूरी व्यवस्था को सुधारने का बीड़ा उठाया और ठप पड़ी चयन प्रक्रिया को रफ्तार दी।
ऐतिहासिक आँकड़ों पर नजर डालें तो उत्तर प्रदेश में वर्ष 2012 से लेकर 2017 तक माध्यमिक शिक्षा विभाग में भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह से ठहराव का शिकार रही। पूर्ववर्ती सरकार के पाँच सालों के कार्यकाल के दौरान विद्यालयों में शिक्षकों की सेवानिवृत्ति तो होती रही, लेकिन नए पदों पर भर्ती के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। इसका सीधा खामियाजा प्रदेश के लाखों छात्र-छात्राओं को भुगतना पड़ा, जो बिना विषय विशेषज्ञ शिक्षकों के पढ़ाई करने को मजबूर थे। विद्यालयों में प्रशासनिक नेतृत्व का भी अकाल पड़ चुका था क्योंकि प्रधानाचार्यों के पद भी सालों से खाली पड़े थे।
साल 2017 में सूबे में योगी सरकार के गठन के बाद स्थिति में अभूतपूर्व और तेज बदलाव देखा गया। मुख्यमंत्री ने माध्यमिक शिक्षा को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल करते हुए रिक्त पदों को भरने के लिए सख्त निर्देश जारी किए। सरकार ने पुरानी सुस्त कार्यप्रणाली को दरकिनार करते हुए पूरी चयन प्रक्रिया को ‘मिशन मोड’ में आगे बढ़ाया। इस नई कार्ययोजना के तहत किसी भी स्तर पर भाई-भतीजावाद या भ्रष्टाचार की गुंजाइश को खत्म कर पूरी तरह से पारदर्शिता, सुशासन और मेरिट (योग्यता) को चयन का मुख्य आधार बनाया गया।
इसी पारदर्शी व्यवस्था का सुखद परिणाम आज उत्तर प्रदेश के सामने है, जहाँ अप्रैल 2017 के बाद से कुल 33,401 पदों पर योग्य उम्मीदवारों का सफल चयन किया जा चुका है। उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड द्वारा जारी किए गए आधिकारिक और प्रामाणिक आँकड़ों के मुताबिक, अप्रैल 2017 से लेकर वर्ष 2022 की अवधि के भीतर ही रिकॉर्ड स्तर पर नियुक्तियाँ की गईं। इसमें प्रशासनिक ढाँचे को मजबूत करने के लिए 783 प्रधानाचार्यों, उच्च शिक्षण स्तर को सुधारने के लिए 5,321 प्रवक्ताओं (पीजीटी) तथा जमीनी स्तर पर कक्षाओं को संभालने के लिए 27,297 प्रशिक्षित स्नातक शिक्षकों (टीजीटी) की चयन प्रक्रिया को सफलतापूर्वक संपन्न कराया गया।
माध्यमिक शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों और सरकार के नीति निर्धारकों ने इस प्रशासनिक और शैक्षिक क्रांति पर प्रसन्नता व्यक्त की है। सरकार की इस ऐतिहासिक उपलब्धि और दूरगामी विजन को स्पष्ट करते हुए विभागीय अधिकारियों ने आधिकारिक रूप से अपना संयुक्त बयान जारी किया है।
शासन और शिक्षा विभाग के उच्चाधिकारियों ने अपने साझा बयान में कहा, “उत्तर प्रदेश की माध्यमिक शिक्षा में 33 हजार से अधिक पदों पर की गई यह बंपर भर्ती केवल एक प्रशासनिक आँकड़ा या सामान्य उपलब्धि मात्र नहीं है। यह असल में राज्य के भीतर उस बड़े व्यवस्था परिवर्तन और नीतिगत बदलाव की जीवंत कहानी है, जिसमें सालों से ठप पड़ी चयन प्रक्रिया को न सिर्फ गति मिली, बल्कि प्रदेश के मेधावी युवाओं को उनकी योग्यता के आधार पर आगे बढ़ने का उचित अवसर भी प्राप्त हुआ।”
बयान में आगे कहा गया, “राज्य सरकार की नीति हमेशा से साफ रही है कि विद्यालयों में शिक्षकों की किसी भी प्रकार की कमी को तुरंत दूर किया जाए। हमारी नीयत पूरी तरह से पारदर्शी, निष्पक्ष और भ्रष्टाचार मुक्त चयन प्रक्रिया सुनिश्चित करने की रही, जिसके सुखद नतीजे आज सबके सामने हैं। राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रभावी प्रशासनिक क्रियान्वयन के बल पर ही हमने इस पांच साल पुराने ठहराव को तोड़कर शिक्षा जगत को एक नई और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान की है।”
इस बड़े भर्ती अभियान का सबसे सकारात्मक असर स्कूलों में विषय विशेषज्ञ शिक्षकों की कमी दूर होने के रूप में सामने आया है। लंबे समय से गणित, विज्ञान, अंग्रेजी और कंप्यूटर जैसे महत्वपूर्ण विषयों के शिक्षकों के पद खाली होने से ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों के सरकारी स्कूल गंभीर चुनौतियों से जूझ रहे थे। विषय विशेषज्ञों की तैनाती होने से अब छात्रों की पढ़ाई की गुणवत्ता में भारी सुधार दर्ज किया गया है। इसके अलावा स्कूलों में स्थायी प्रधानाचार्यों की नियुक्ति होने से विद्यालयों का प्रशासनिक नियंत्रण मजबूत हुआ है, जिससे दैनिक शैक्षणिक माहौल और अनुशासन दोनों में गुणात्मक सुधार हुआ है।
शिक्षकों की इस बड़े पैमाने पर हुई नियुक्तियों ने उत्तर प्रदेश सरकार के व्यापक शिक्षा सुधार एजेंडे को एक बेहद मजबूत और ठोस आधार प्रदान कर दिया है। वर्तमान में राज्य के माध्यमिक विद्यालयों का कायाकल्प करने के लिए ‘ऑपरेशन अलंकार’ जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिसके तहत जर्जर भवनों को आधुनिक रूप दिया जा रहा है। इसके साथ ही स्कूलों में स्मार्ट क्लासेस की स्थापना, अत्याधुनिक आईसीटी लैब्स (इन्फॉर्मेशन एंड कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी), विज्ञान एवँ कंप्यूटर प्रयोगशालाओं का सुदृढ़ीकरण और डिजिटल लर्निंग को बढ़ावा दिया जा रहा है।
इन सभी भौतिक संसाधनों की उपयोगिता तभी संभव थी, जब इन्हें संचालित करने के लिए पर्याप्त संख्या में शिक्षक मौजूद हों। अब जबकि प्रदेश के विद्यालयों को पारदर्शी तरीके से चुने गए ऊर्जावान और योग्य शिक्षक मिल चुके हैं, तो राज्य की नकलविहीन परीक्षा प्रणाली और इन डिजिटल सुधारों का लाभ सीधे तौर पर राज्य के अंतिम पायदान पर खड़े छात्र तक पहुँच रहा है।
ऐसे में पारदर्शी और मेरिट आधारित इस पूरी प्रक्रिया ने न केवल उत्तर प्रदेश के युवाओं के भीतर सरकारी भर्ती प्रणालियों के प्रति खोए हुए विश्वास को दोबारा बहाल किया है, बल्कि राज्य के सरकारी स्कूलों को एक नई पहचान और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के योग्य बनने की नई ऊर्जा भी प्रदान की है।
उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में सूर्या चौहान की कट्टरपंथियों ने बकरीद के दिन बेरहमी से हत्या कर दी। उसकी चिता की आग अभी ठंडी भी ना हुई थी कि समाजवादी पार्टी ने उस पर राजनीतिक करनी शुरू कर दी। राजनीति, फिर भी संयमित शब्द लगता है, अगर साफ शब्दों में कहें तो सपा ने हत्यारों के लिए ही बैटिंग करनी शुरू कर दी। सपा ने ये दिखाने की कोशिश की जो मारा गया, वो इसलिए मारा गया क्योंकि मारा जाना ही उसकी नियति थी। ऐसे लोगों के लिए हिंदुओं की नियति मारा जाना ही है।
खैर, वापस मुद्दे पर लौटते हैं और समझते हैं कि सपा ने किस तरह झूठ के सहारे एक नया नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की है। सपा के प्रवक्ता अमीक जामेई ने X पर एक पोस्ट किया। अमीक ने लिखा, “असद का एनकाउंटर हुआ सूर्य (सूर्या) के परिवार को बेशक न्याय मिला जो मिलना चाहिए था।” अब ये पढ़कर आपको लगेगा कि सपा ने तुष्टिकरण करना छोड़ दिया है लेकिन अगली ही लाइन में अमीक ने जो लिखा, उसे पढ़कर आपको शायद इस सपाई सोच से घिन आएगी।
अमीक ने लिखा, “पर जाँच हो तो पता चलेगा कि गाजियाबाद में नाबालिग असद और सूर्य दोस्त थे, एक ही गली मे रहते थे, सूर्य (सूर्या) के असद की बहन से दोस्ती थी। जो असद को पसंद न था जिसे लेकर विवाद चल रहा था। जिसके बाद असद के परिवार ने मुहल्ला बदल लिया पर दोस्ती का सिलसिला न रुका यह मुद्दा सूर्य (सूर्या) की जान पर बन आया।”
असद का एनकाउंटर हुआ सूर्य के परिवार को बेशक न्याय मिला जो मिलना चाहिए था
पर जाँच हो तो पता चलेगा की ग़ाज़ियाबाद मे नाबालिग असद और सूर्य दोस्त थे एक ही गली मे रहते थे सूर्य के असद की बहन से दोस्ती थी जो असद को पसंद न था जिसे लेकर विवाद चल रहा था जिसके बाद असद के परिवार ने…
अमीक ने मनगढ़ंत कहानी के जरिए झूठ परोसने की पूरी कोशिश की। या यूँ कहें कि यह दिखाने की कोशिश की कि हिंदू युवक ने एक मुस्लिम युवती से दोस्ती कैसे कर ली? अमीक ने साफ तौर पर यह बताने की कोशिश की है कि यह मामला ‘कथित दोस्ती’ या व्यक्तिगत विवाद से जुड़ा था, मानो इससे हत्या की गंभीरता किसी तरह कम हो जाती हो। लेकिन क्या यह हत्या को जायज ठहराने की कोशिश नहीं है?
मान लीजिए, तर्क के लिए ही सही कि यदि किसी युवक और युवती के बीच संबंध थे तो क्या इसका अर्थ यह हो जाता है कि किसी की जान ले ली जाए? यदि किसी परिवार या व्यक्ति को किसी संबंध पर आपत्ति थी, तो उसके लिए कानूनी रास्ते मौजूद थे। बातचीत, शिकायत, पुलिस, कानून देश में इन सबकी व्यवस्था है। लेकिन किसी युवक को निर्ममता से चाकूओं से गोदकर मार देना? यह कैसे जायज हो सकता है। यह कट्टरता का चरम है और अमीक ने इसे भी जायज बताने की कोशिश की है।
सिर्फ इतना ही नहीं, इस पोस्ट में अमीक ने एक और झूठ भी परोसा है। अमीक ने लिखा, “हम देखते है की उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार हत्यारा PDA यानि दलित हो मुसलमान हो ब्रह्मण या यादव हो तो उसे मीडिया द्वारा खूब हेट का मुद्दा बनाया जाता है क्या यह सही नहीं की असद को पुलिस ने डिटेन कर रखा था बाद मे उसका फुल एनकाउंटर हुआ?”
यानी जो ‘पाप’ अमीक ने पहली लाइन में ‘न्याय’ लिखकर किया था अब वो उसको पूरी तरह धो रहे हैं। पुलिस भी अमीक के लिए झूठी हो गई है। हमने अमीक की प्रोफाइल भी खँगाली कि क्या उन्हें सूर्या की हत्या का कोई दुख था, क्या उन्हें असद से कोई नाराजगी थी। जवाब है- नहीं। असद के खिलाफ, या सूर्या की निर्मम हत्या पर अमीक ने कुछ भी नहीं लिखा है।
असद के एनकाउंटर की पूरी कहानी पुलिस खुद ही बता चुकी है जिसे आप नीचे लिंक में पढ़-सुन सकते हैं।
— POLICE COMMISSIONERATE GHAZIABAD (@ghaziabadpolice) May 31, 2026
बहरहाल, उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में हुए सूर्यप्रताप उर्फ सूर्या चौहान हत्याकांड और उसके मुख्य आरोपी असद के पुलिस एनकाउंटर के बाद अब इस मामले पर गंभीर राजनीतिक विवाद छिड़ गया है। समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रवक्ता अमीक जामेई द्वारा सोशल मीडिया पर किए गए एक पोस्ट को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं, जिसमें अमीक जामेई के बयान को विभाजनकारी बताया जा रहा है।
उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से एक बेहद सनसनीखेज मामला सामने आया। यहाँ खोड़ा थाना क्षेत्र में बकरीद के दिन एक 17 वर्षीय हिंदू किशोर सूर्या चौहान की उसके ही पूर्व परिचित मुस्लिम दोस्तों ने बेरहमी से चाकुओं से गोदकर हत्या कर दी।
इस खौफनाक वारदात को अंजाम देने से ठीक पहले कट्टरपंथी हमलावरों ने पीड़ित से पूछा, “क्या तुमने कभी बकरा हलाल होते देखा है? आज तुझे दिखाते हैं।”
यह कहते ही उन्होंने सूर्या पर ताबड़तोड़ चाकुओं से हमला कर दिया। नोएडा के फोर्टिस अस्पताल में इलाज के दौरान तड़प-तड़प कर इस हिंदू लड़के ने दम तोड़ दिया। पुलिस की FIR कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है, जो इस पूरी खौफनाक साजिश की गवाही दे रही है।
सूर्या चौहान हत्याकांड में मुख्य आरोपितअ सद को पुलिस ने एनकाउंटर में ढेर कर दिया है। पुलिस के अनुसार, इस मामले में पाँच लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया था। तीन आरोपितों को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका था, जबकि मुख्य आरोपित असद फरार चल रहा था।
उस पर 50 हजार रुपए का इनाम भी घोषित किया गया था। इस मामले में ऑपइंडिया की टीम उस गली तक पहुँची, जहाँ सूर्या को चाकू मारा गया था। एक स्थानीय व्यक्ति ने मामले को लेकर कई और भी खुलासे किए।
जहाँ असद ने सूर्या को मारा था चाकू वहाँ पहुँची ऑपइंडिया की टीम
ऑपइंडिया के रिपोर्टर को स्थानीय व्यक्ति ने वह जगह दिखाई, जहाँ सूर्या को चाकू घोंपा गया था। उसने गली दिखाते हुए कहा, “ये वही पतली गली है, वे 7 बंदे थे वो, उसको प्यार से घर से बुलाए, बुलाकर के यहाँ लाकर के चाकू मारा। फिर पकड़कर गोद में ले जाने की कोशिश करने लगे कि ले जा कर फेंक दें, लेकिन दिन का टाइम था, फेंक नहीं पाए।”
असद ने सूर्या को गली में ले जाकर पहले सीढ़ी पर बिठाया
आराम से कोल्ड ड्रिंक पिलाई और फिर उसी गली में चाकू मारे
उसने आगे कहा, “ये सब एक घंटे के अंदर ही हो गया। बहुत चाकू मारे उसे, कई बार मारा, घुमा दिया, मारा घुमा दिया, अकेला बंदा 7 लोगों के बीच में क्या कर सकता है।”
उस शख्स ने बताया कि पहले उसे पास की सीढ़ी पर बैठाकर कोल्डड्रिंक पिलाई गई, उसके बाद गली में लाकर उसे चाकू मारा गया। बातचीत में सामने आया कि असद की कोशिश तो यहीं थी कि उसकी लाश को ठिकाने भी लगा दिया जाए, लेकिन गली से निकल कर तिराहे तक आते-आते सूर्या गिर गया।
पुरानी रंजिश का बदला और बकरीद पर साजिश
मृतक सूर्या चौहान मूल रूप से एटा का रहने वाला था। वह नवनीत विहार, खोड़ा में अपनी माँ, बड़े भाई यश चौहान और छोटी बहन के साथ रहता था। उसके पिता कौशलेंद्र की पहले ही मृत्यु हो चुकी है। सूर्या 11वीं कक्षा का छात्र था। जानकारी के मुताबिक, करीब 8 महीने पहले सूर्या का पड़ोस में रहने वाले असद नाम के युवक से किसी बात पर मामूली विवाद हुआ था।
इसी पुरानी रंजिश का बदला लेने के लिए असद ने बकरीद के पवित्र दिन को चुना। 28 मई की दोपहर को असद ने सूर्या को फोन किया। उसने सूर्या को बकरीद की पार्टी के बहाने मिलने के लिए चौधरी स्कूल के पास वाली गली नंबर 2 में बुलाया।
सूर्या अपने दोस्त आयुष और विक्की के साथ असद से मिलने पहुँचा था। विक्की और आयुष ने आँखों देखा हाल बताते हुए बेहद चौंकाने वाला खुलासा किया। विक्की ने बताया कि जैसे ही वे गली में पहुँचे, वहाँ पहले से ही असद, नवाब, फरहान, आतिफ और सारिक समेत 5 से 6 मुस्लिम युवक हथियारों के साथ घात लगाकर बैठे थे।
आते ही उन्होंने सूर्या को चारों तरफ से दबोच लिया। इसके बाद उन्होंने सांप्रदायिक और हिंसक टिप्पणी करते हुए पूछा कि क्या कभी बकरा हलाल होते देखा है? चश्मदीदों के मुताबिक, आरोपितों ने चिल्लाते हुए कहा कि आज बकरीद है और आज कुर्बानी इस हिंदू लड़के की देंगे।
यह कहते ही सभी आरोपितों ने सूर्या पर बड़े चाकुओं से हमला बोल दिया। उन्होंने सूर्या के पेट, सीने और शरीर के अन्य हिस्सों पर ताबड़तोड़ कई वार किए। हमला इतना बर्बर था कि चाकुओं की गोदने की वजह से सूर्या की आंतें तक बाहर आ गईं।
मौके पर चीख-पुकार और शोर मच गया। शोर सुनकर पास ही मौजूद सूर्या का भाई यश चौहान और उसकी माँ दौड़ते हुए घटना स्थल की तरफ भागे। परिजनों को अपनी तरफ आता देख सभी मुस्लिम हमलावर खून से लथपथ सूर्या को तड़पता हुआ छोड़कर मौके से फरार हो गए थे।
गाजियाबाद के खोड़ा में सूर्या चौहान की हत्या के बाद एनकाउंटर में मुख्य आरोपित असद भी ढेर हो गया। वामपंथी लिबरल गैंग ने सूर्या की हत्या से ज्यादा एनकाउंटर में मारे गए असद की चिंता की। यहाँ तक कि कुर्बानी देखने के लिए बुलाए गए सूर्या की निर्मम हत्या को आपसी विवाद में हत्या करार दे दिया।
सूर्या की हत्या में शामिल नवाब, फरहान, आतिफ और शारिक को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। घटना के बाद से असद फरार था, जिस पर 50 हजार रुपए इनाम की घोषणा की गई थी। पुलिस ने सूचना मिलने पर उसे इंदिरापुरम में ढेर कर दिया। इससे पहले इलाके में तनाव को देखते हुए पुलिस लगातार सतर्क है। बकरीद के दिन सूर्या चौहान की घर से बुला कर हत्या कर दी गई। उसे ‘आओ कुर्बानी कैसे दी जाती है, तुम्हें दिखाते हैं…’ कह कर घर से बुलाकर सूर्या को ले जाने और उसकी चाकूओं से निर्मम हत्या करने पर लिबरल वामपंथी गैंग की मुँह नहीं खुली।
घटना की निंदा करना तो दूर प्रोपेगेंडाबाजों ने घटना की जानकारी देना भी जरूरी नहीं समझा। देता भी कैसे? इस खबर से उनकी पोल खुल जाती, जो हमेशा देश में मुस्लिमों पर तथाकथित ‘अत्याचार’ की दुहाई देते-देते नहीं थकते। ट्वीट करते हैं, रिट्वीट करते हैं, लंबी-लंबी पोस्ट लिखते हैं, सरकार की आलोचना करते हैं। लेकिन, 17 साल के हिन्दू युवक की इस तरह हत्या राजधानी दिल्ली से सटे गाजियाबाद के खोड़ा में हो जाती है, ये कुछ नहीं बोलते।
प्रोपेगेंडाबाजों की पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग
हत्या की हर हाल में आलोचना की जानी चाहिए। यहाँ नाबालिग युवक को बुला कर हत्या कर दी जाती है। चूँकि सभी आरोपित मुस्लिम हैं, इसलिए चुप रह जाओ। आरफा खानम को ही देख लो, सीएम योगी के आपत्तिजनक शब्द का इस्तेमाल करने की उसने आलोचना नहीं की, लेकिन ऐसा बोलने वाले मुस्लिम को जब पुलिस उठा कर ले गई, तो सामने आ गई अत्याचार की कहानी लेकर।
हिन्दू नाबालिग लड़के की बेरहम हत्या पर बात करना, तो वैसे भी उसके सिलेबस से बाहर का विषय है। द वायर, द क्विंट, द प्रिंट में तो खबर छापी, लेकिन हत्या को नाबालिगों द्वारा की गई वारदात कहा। द प्रिंट ने कहा, “सूर्या को पास के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था। शुक्रवार को चोटों के कारण उनकी मृत्यु हो गई, जिससे खोड़ा कॉलोनी में विरोध प्रदर्शन भड़क उठे। शनिवार को स्थानीय बाजार बंद रहा, जबकि पुलिस ने फ्लैग मार्च किया।”
Surya was admitted a nearby hospital. He succumbed to his injuries on Friday, sparking protests in Khoda Colony. Local market remained closed on Saturday as police conducted flag march. https://t.co/pgu2EycJsP
वहीँ द क्विंट ने मुख्य आरोपित असद के पुलिस एनकाउंटर में मौत पर जोर देते हुए बताया कि 31 मई 2026 को, उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में बकरीद के दौरान 17 साल के एक हिंदू छात्र की हत्या के मुख्य आरोपी असद को पुलिस मुठभेड़ में मार गिराया गया। पीड़ित, सूर्य चौहान को बकरीद के दिन एक कहासुनी के दौरान चाकू मार दिया गया था, और 29 मई 2026 को इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। पुलिस ने असद की तलाश शुरू कर दी थी, जो घटना के बाद से कथित तौर पर फरार था।
(साभार- द क्विंट)
क्यों की गई सूर्या की हत्या
सूर्या और असद पड़ोसी हैं। खोड़ा की गली में दोनों का मकान है। बताया जाता है कि सात आठ महीने पहले एक छोटा सा विवाद हुआ था। दोनों के माता-पिता ने अपने-अपने बच्चे को समझाया और मामला शांत हो गया। लेकिन बातचीत दोनों परिवारों में लगभग नहीं होती थी। बकरीद के दिन सूर्यो चौहान का बाइक चलाने को लेकर असद और उसके दोस्तों से विवाद हुआ। इनलोगों ने उसे चाकूओं से गोद कर हत्या कर दी।
चश्मदीदों के मुताबिक, असद और उसके साथियों ने सूर्या से कहा, “क्या तुमने कभी बकरे की कुर्बानी देखी है?” जब सूर्या ने मना किया, तो उन्होंने कथित तौर पर कहा, “आज तुझे दिखाते हैं।” इसके बाद आरोपियों ने उस पर चाकू से ताबड़तोड़ वार कर दिए। हमले में सूर्या बुरी तरह घायल हो गया और अस्पताल ले जाते समय दम तोड़ दिया।
सूर्या का भाई मानसिक रूप से विक्षिप्त है। वह अपने माँ-बाप का एकमात्र सहारा था। इस मामले में असद, नवाब, फरहान, आतिफ और शारिक सहित कई लोगों के नाम सामने आए। सभी आरोपितों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। मुख्य आरोपित असद फरार चल रहा था, जिसे इंदिरापुरम में एक मुठभेड़ में पुलिस ने मार गिराया।
पड़ोसी घटना को लेकर जता रहे अनभिज्ञता
घर से कुछ दूर पर 17 साल के युवक सूर्या चौहान की हत्या हो जाती है। उसके आस पड़ोस में ज्यादातर मुस्लिम परिवार रहते हैं। ये लोग मुँह खोलने को तैयार नहीं हैं। ये ऐसे जता रहे हैं, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। भीडभाड़ पूरी है, लेकिन कोई ये नहीं बता रहा कि उसे घटना की जानकारी है।
इन हरामियों को गाजा फिलिस्तीन ईरान तक कि खबर रहती है, बस इतना नहीं पता होता है कि इनके पडोस में एक 17 वर्षीय हिंदू युवा सूर्या चौहान की हत्या मुस्लिम लड़को ने कर दी । pic.twitter.com/kj2HdaAcfT
सोशल मीडिया पर ऐसे कई वीडियो आए हैं, जिससे पता चलता है कि हिन्दू युवक की बेरहमी से कत्ल किए जाने पर लोगों को कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा। ये लोग कैमरा देख कर चुपचाप बचते नजर आ रहे हैं।
सूर्या केस पर सवाल पूछते मुंह छुपाकर भागे मुस्लिम
इनको अपने इलाके में क्या होता नहीं पता लेकिन गाजा में कोई मर गया तो पूरी खबर रहती हे
— Amrendra Bahubali 🇮🇳 (@TheBahubali_IND) May 30, 2026
सूर्या की मौत के बाद पड़ोसी मुस्लिम घर के बाहर एक किलो से ज्यादा बकरे का मांस नीचे रखा मिला। जब कुछ लोगों ने बोला, तो बच्चों को भेजकर उसे नाली में डाल दिया गया। इससे भी हिन्दुओं में गुस्सा है।
सूर्या की माँ ने असद के एनकाउंटर पर संतोष जताया
मुख्य आरोपित असद की मुठभेड़ में मौत के बाद सूर्या की माँ का बयान सामने आया। सूर्या की माँ सरोज का कहना है कि उसने सिर्फ एक का एनकाउंटर देखा है। वह चाहती है कि असद की तस्वीर उसे दिखाई जाए। तस्वीर देखने के बाद ही उसे विश्वास होगा कि वह मारा जा चुका है। सरोज का कहना है कि बाकी आरोपितों को भी इसी तरह से मौत के घाट उतारा जाना चाहिए। इतना ही नहीं उनके घरों पर बुलडोजर भी चलना चाहिए।
इस मामले में 5 नामजद आरोपितों को पुलिस ने 30 मई 2026 को गिरफ्तार किया। असद के बारे में पुलिस को जानकारी मिली कि वह इंदिरापुरम में छिपा हुआ है। उसे पुलिस ने घेर लिया, उसने पुलिस पर फायरिंग की। इस दौरान असद को पुलिस ने बुरी तरह घायल कर दिया और अस्पताल ले जाते वक्त उसकी मौत हो गई। बाकी आरोपित भी पहले से ही पुलिस की गिरफ्त में हैं।