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‘दूसरे बेटे को सड़क पर काटेंगे’: तरुण खटीक की जान लेने वाले जिहादी बना रहे केस वापस लेने का दबाव, पढ़ें पीड़ित परिवार की आपबीती

दिल्ली के उत्तम नगर में होली के दिन हुई तरुण खटीक की मॉब लिंचिंग अब एक नया रूप ले चुकी है। पीड़ित परिवार न्याय की लड़ाई लड़ रहा है तो वहीं आरोपित पक्ष ने घर में घुसकर जान से मारने की खुली धमकी दे दी है। इससे त्रस्त होकर तरुण का परिवार अब उत्तम नगर छोड़कर पलायन करने की तैयारी कर रहा है।

हालाँकि इस बीच दिल्ली हाईकोर्ट ने पीड़ित परिवार को सुरक्षा देने के लिए दिल्ली पुलिस को आदेशित किया है। साथ ही सोशल मीडिया से भड़काऊ वीडियो हटाने की बात कही है। इसे लेकर ऑपइंडिया ने पीड़ित परिवार से बातचीत कर उनका हाल जाना। मृतक तरुण खटीक के चाचा टेकचंद ने ऑपइंडिया को बताया कि बीते 13 अप्रैल को आरोपित परिवार की कुछ महिलाएँ उनके घर पहुँची थीं।

उस समय घर पर कोई मर्द मौजूद नहीं था। तरुण की माँ और अन्य महिलाएँ घर पर थी। जिन्हें आरोपी परिवार की महिलाओं ने जाति सूचक शब्द बोलते हुए तरह-तरह की गालियाँ दीं और फिर केस वापस न लेने पर दूसरे बेटे को भी बीच चौराहे पर ले जाकर जान से मारने की धमकी देकर चली गईं।

पलायन करने को मजबूर तरुण का परिवार

टेकचंद ने बताया कि इस धमकी के बाद से हमारा पूरा परिवार भयभीत है। अब हम इस मकान को बेचना चाहते हैं और यहाँ से पलायन करना चाहते हैं। इसके लिए हम एक बेहतर जगह की तलाश कर रहे हैं। जहा हम सुरक्षित रह सकें। हम नहीं चाहते कि परिवार के सामने फिर से कोई मुसीबत आए।

घर के सामने दिल्ली पुलिस की तैनाती पर टेकचन्द्र कहते हैं कि दिल्ली पुलिस भले ही हमारे यहाँ तैनात हो। हाल ही में एसीपी भी हमसे मिलने और बातचीत के लिए आए थे उन्होंने भी हमें सुरक्षा का भरोसा दिया था, लेकिन पुलिस हमारे पास या हमारी सुरक्षा में कब तक रहेगी? एक न एक दिन पुलिस यहाँ से जाएगी तो फिर हमारी रक्षा कौन करेगा? इसलिए हमारा यहाँ से जाना ही बेहतर है। हम यहाँ से पलायन करेंगे। टेकचन्द्र ने बताया कि आरोपित परिवार द्वारा दी गई धमकी को लेकर हमने दिल्ली पुलिस में शिकायत भी की है।

दिल्ली हाईकोर्ट का परिवार को सुरक्षा देने का आदेश

इस बीच दिल्ली हाई कोर्ट ने पीड़ित परिवार द्वारा लगाई गई याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली पुलिस को सुरक्षा मुहैया कराने का आदेश दिया है। साथ ही सोशल मीडिया से भड़काऊ वीडियो हटाने का भी आदेश दिया है। हाई कोर्ट ने पुलिस आयुक्त से कहा है कि वह संबंधित एसएचओ से कहें कि पीड़ित परिवार को वह अपना पर्सनल नंबर दें ताकि किसी भी स्थिति में पीड़ित परिवार मदद के लिए उनसे संपर्क कर सके।

आपको बता दें कि 5 मार्च होली के दिन दिल्ली के उत्तम नगर में रहने वाले तरुण खटीक की देर शाम घर लौटते समय मुस्लिमों की भीड़ ने मॉब लिंचिंग कर दी थी। विवाद सिर्फ इतना था कि तरुण के परिवार की एक बच्ची जो कि छत पर होली खेल रही थी जिससे एक पानी भरा गुब्बारा नीचे गिर गया था उसकी कुछ छींटे पड़ोस में रहने वाली मुस्लिम महिला के पैरों तक चले गए थे। इसी बात को लेकर दोनों पक्षों में कहासुनी हुई और फिर पहले से तैयार बैठी जिहादियों की भीड़ ने घर लौट रहे 22 वर्षीय तरुण पर हमला बोल दिया और उसे पीट-पीटकर मौत के घाट उतार दिया।

इस घटना के इलाके में तनाव पैदा हो गया और गुस्साए लोगों ने आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की माँग को लेकर विरोध प्रदर्शन किया। यहाँ तक कि उत्तम नगर में आयोजित विराट आक्रोश सभा में पहुँचे हजारों हिंदुओं ने मुसलमानों को ईद नहीं मनाने देने की चेतावनी दी थी। इसके बाद और भी माहौल बिगड़ गया। हालाँकि पुलिस प्रशासन ने सभी आरोपितों की गिरफ्तारी करके और आरोपितों के घर बुलडोजर एक्शन लेकर हिंदुओं को गुस्से को शांत करने की कोशिश की थी।

BJP उम्मीदवारों पर हमला, सुरक्षाबलों पर निशाना और वोटरों को रोकने की कोशिश: बंगाल विधानसभा चुनाव में TMC की ‘लुंगी वाहिनी’ का आतंक, पढ़ें- हिंसा के 9 मामले

पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनाव में हार की आशंका से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) बौखलाई हुई नजर आ रही है। इसी के चलते पहले चरण के मतदान के दौरान राज्य में हिंसा, डर और अराजकता फैलाने की कोशिशें सामने आईं।

आरोप है कि मतदाताओं को वोट डालने से रोकने और सरकार के खिलाफ माहौल बनने से बचाने के लिए TMC के गुंडों ने कई जगहों पर हिंसा और दबाव का सहारा लिया। गुरुवार (23 अप्रैल 2026) को हिंसा के कई ऐसे मामले सामने आए थे।

पूर्व मेदिनीपुर जिले के मोयना विधानसभा क्षेत्र में TMC उम्मीदवार चंदन मंडल आम लोगों को प्रभावित करने की कोशिश करते नजर आए। इस पर स्थानीय लोग विरोध में सामने आए, नारेबाजी की और उन्हें वहाँ से खदेड़ दिया।

रानीनगर में TMC के गुंडों ने लोगों को वोट डालने से रोका

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, TMC के गुंडों ने रानीनगर विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले बूथ नंबर 54 पर मतदाताओं को वोट डालने से रोक दिया। लोगों की शिकायत के बाद, पुलिस और सुरक्षा बलों ने नाराज मतदाताओं से मुलाकात की और उन्हें मतदान केंद्र तक पहुँचाया।

कुमारगंज में भाजपा उम्मीदवार को मारा घूँसा, पोलिंग एजेंट को बूथ में प्रवेश करने से रोका

पहले चरण के मतदान के दौरान कुमारगंज विधानसभा क्षेत्र में TMC के गुंडों ने आम लोगों के रूप में सामने आकर बीजेपी उम्मीदवार के साथ मारपीट की। एक वायरल वीडियो में देखा गया कि पुलिस की मौजूदगी में ही उन्हें घूँसे मारे गए। पीड़ित बचने की कोशिश करता रहा लेकिन पुलिस ने हमलावरों को रोकने के लिए कोई ठोस कार्रवाई नहीं की।

इसी क्षेत्र में TMC के लोगों ने बीजेपी के पोलिंग एजेंट को बूथ में प्रवेश करने से भी रोका जिसके बाद बीजेपी कार्यकर्ताओं ने उन्हें खदेड़ दिया।

उसी निर्वाचन क्षेत्र में TMC के गुंडों ने भाजपा के मतदान प्रतिनिधि को बूथ में प्रवेश करने से रोक दिया। बाद में भाजपा कार्यकर्ताओं ने उन्हें खदेड़ दिया।

मुर्शिदाबाद में TMC के गुंडों ने जाम की सड़क

अपनी ताकत का प्रदर्शन करने और मतदाताओं को डराने के मकसद से TMC के गुंडे मुर्शिदाबाद की सड़कों पर उतर आए और यातायात बाधित कर दिया। हालाँकि, इलाके में तैनात पुलिस बलों ने उन्हें रोकने की कोशिश की लेकिन वे TMC का झंडा लहराते हुए अराजकता फैलाते रहे।

TMC और AJUP के बीच झड़प

मुर्शिदाबाद जिले के नाओदा विधानसभा क्षेत्र में सत्ताधारी TMC के सदस्यों और पूर्व TMC विधायक हुमायूं कबीर के समर्थकों के बीच भीषण झड़प हुई। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के प्रमुख कबीर को TMC के कार्यकर्ताओं ने रोका।

इसके चलते TMC सदस्यों और AJUP कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़प हुई। लाठी-पत्थरों से लैस होकर दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर जमकर हमला किया। एक वीडियो में हुमायूं कबीर को TMC कार्यकर्ताओं को ‘वेश्या का बेटा’ कहकर गाली देते और उनकी माँओं के साथ दुष्कर्म करने की धमकी देते हुए सुना गया।

‘लुंगी वाहिनी’ का पुलिस और केंद्रीय बलों पर हमला

गुरुवार (23 अप्रैल 2026) को ममता बनर्जी की ‘लुंगी वाहिनी’ ने पश्चिम बंगाल पुलिस और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) के जवानों पर हमला किया। यह घटना बीरभूम जिले के दुबराजपुर विधानसभा क्षेत्र में घटी।

सामने आए वीडियो में भीड़ को ईंट-पत्थर फेंकते हुए देखा जा सकता है, जबकि सुरक्षा बल जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहे हैं। उन्होंने एक पुलिस वाहन की विंडशील्ड को भी तोड़ दिया।

लाभपुर में बीजेपी उम्मीदवार और पोलिंग एजेंट पर हमला

पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के लाबपुर विधानसभा क्षेत्र में भी हिंसा की खबर सामने आईं। सोशल मीडिया पर सामने आए एक वीडियो में TMC के ‘गुंडे’ भाजपा के उम्मीदवार की गाड़ी पर हमला करते नजर आए। उन्होंने मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों को पकड़ा और गाड़ी पर लात-घूँसे बरसाए। बेकाबू भीड़ ने गाड़ी का पिछला शीशा तोड़ दिया जबकि पुलिस उन्हें काबू करने में नाकाम रही।

बाद में यह बात सामने आई कि TMC के गुंडों ने भाजपा के मतदान एजेंट पर बेरहमी से हमला किया और उसे खून से लथपथ हालत में छोड़ दिया।

कूचबिहार में बूथ कैप्चरिंग की कोशिश

कूच बिहार के तुफानगंज निर्वाचन क्षेत्र में बूथ जैमिंग की खबरें सामने आईं। केंद्रीय बलों ने तुरंत कार्रवाई करते हुए उनकी योजना को विफल कर उन्हें खदेड़ दिया। इस घटना का वीडियो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

आसनसोल में बीजेपी नेता की गाड़ी पर हमला

गुरुवार (23 अप्रैल 2026) को पश्चिम बंगाल के आसनसोल शहर में सत्तारूढ़ TMC के गुंडों ने भाजपा उम्मीदवार अग्निमित्रा पॉल की कार पर हमला किया। उन्होंने उनकी गाड़ी पर पत्थर और ईंटें फेंकीं, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गईं। हालाँकि, भाजपा नेता बाल-बाल बच गईं। बाद में पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई और मामले की जाँच शुरू कर दी गई।

ममता सरकार और उनकी ‘लुंगी वाहिनी’ द्वारा मतदाताओं को डराने-धमकाने, उन पर दबाव डालने और हिंसा और धमकियों के माध्यम से उन्हें प्रभावित करने के तमाम प्रयासों के बावजूद, पश्चिम बंगाल के लोग भारी संख्या में अपने लोकतांत्रिक अधिकार का प्रयोग करने के लिए निकले।


सपाइयों की पिटाई ने खोली ‘जातिवादी राजनीति’ की पोल: जानिए कैसे गाजीपुर में अखिलेश यादव के खिलाफ दिखा जनता का ‘खुला विद्रोह’

बुधवार (22 अप्रैल 2026) को गाजीपुर में जो हुआ, उसे कोई साधारण घटना नहीं माना जा सकता है। यहाँ एक नाबालिग लड़की की मौत के बाद पैदा हुए संवेदनशील माहौल में जिस तरह समाजवादी पार्टी (सपा) के नेता सक्रिय हुए और उसके बाद जो कुछ हुआ, वह एक बड़े राजनीतिक संकेत की तरह सामने आता है।

सपा का प्रतिनिधिमंडल यहाँ पीड़ित परिवार से मिलने पहुँचा था, लेकिन गाँववालों ने उन्हें गाँव के बाहर रोक दिया। इस दौरान झगड़े के बाद पत्थरबाजी हुई। इसमें पूर्व मंत्री रामआसरे विश्वकर्मा के सिर पर भी गंभीर चोट लगी और गाँववालों ने सपा प्रतिनिधिमंडल को गाँव में प्रवेश ही नहीं करने दिया।

यह केवल भीड़ का गुस्सा नहीं था, बल्कि उस राजनीति के खिलाफ प्रतिक्रिया थी, जिसे लंबे समय से जातीय समीकरणों के जरिए चलाया जाता रहा है। इस बार फर्क सिर्फ इतना था कि जनता ने इस खेल को न केवल पहचान लिया बल्कि उसी के मुताबिक ऐसा जवाब दिया, जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी।

दुखद घटना पर राजनीति का प्रयास हुआ बैकफायर

गाजीपुर में जिस लड़की की मौत हुई थी, वह विश्वकर्मा समाज से थी और आरोपित का नाम पांडेय है, जो कि ब्राह्मण समाज से आता है। यह तथ्य सामने आते ही जिस तेजी से राजनीतिक गतिविधि शुरू हुई, उसने कई सवाल खड़े किए। संवेदना और न्याय की माँग स्वाभाविक होती है, लेकिन जब घटनाओं को तुरंत जातीय चश्मे से देखने की कोशिश होने लगे, तो मंशा पर सवाल उठना तय है।

सपा का प्रतिनिधिमंडल जिस तरह गाँव पहुँचा, उससे यह धारणा मजबूत हुई कि यहाँ उद्देश्य केवल शोक व्यक्त करना नहीं, बल्कि एक नैरेटिव स्थापित करना भी था। बस फिर क्या था, गाँव की जनता का गुस्सा उबल पड़ा और उसकी चपेट में सपा के पूर्व मंत्री रामआसरे विश्वकर्मा आ गए, जो स्वयं विश्वकर्मा समाज से आते हैं।

गाँव के लोगों की ये कार्रवाई स्पष्ट संदेश था कि वह इस संवेदनशील मामले को जातिगत सियासत की रोटियाँ सेंकने के लिए इस्तेमाल नहीं करना चाहते थे। उन्होंने प्रतिनिधिमंडल को इस विषय में आगाह भी किया, मगर जब उनकी बात को अनसुना किया गया तो जनता ने अपना क्रोध दिखाकर सपा का सारा नैरेटिव ध्वस्त कर दिया।

जातीय नैरेटिव गढ़ने की पुरानी रणनीति

समाजवादी राजनीति पर लंबे समय से यह आरोप लगते रहे हैं कि वह घटनाओं को जातीय आधार पर बाँटकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश करती है। गाजीपुर की घटना में भी यही पैटर्न देखने को मिला। सोशल मीडिया पर भ्रामक सूचनाओं का प्रसार, गैंगरेप जैसी अपुष्ट बातों को हवा देना और दो समुदायों के बीच तनाव पैदा करने की कोशिश, यह सब उस रणनीति का हिस्सा नजर आया, जो पहले भी कई बार देखी जा चुकी है।

प्रशासन ने स्पष्ट किया कि कई बातें तथ्यात्मक रूप से गलत थीं, इसके बावजूद उन्हें आगे बढ़ाया गया। इससे यह संदेश गया कि सत्य से ज्यादा महत्व उस नैरेटिव को दिया जा रहा है, जिससे राजनीतिक लाभ मिल सके।

फतेहपुर से बदायूं तक- हर घटना को जातीय रंग देने का पैटर्न

गाजीपुर की घटना को अगर एक अलग मामला मान भी लिया जाए, तो फतेहपुर और बदायूं के हालिया प्रकरण इस पूरे नैरेटिव को और स्पष्ट कर देते हैं। हाल में, फतेहपुर में आर्यन यादव का मामला देखें, जहाँ एक साधारण घटना को पहले ‘चाय पिलाने की सजा’ जैसा राजनीतिक रंग दिया गया और फिर उसे बड़े स्तर पर उछालने की कोशिश हुई। फूड सेफ्टी की कार्रवाई को सियासी बदले के तौर पर पेश किया गया, उसके बाद स्थानीय विवाद को भी एकतरफा नैरेटिव में ढाल दिया गया।

जब मामला आगे बढ़ा, तो मुस्लिम समाज की नाराजगी खुलकर सामने आई और उन्होंने खुद आरोप लगाया कि बिना पूरा पक्ष सुने इसे राजनीतिक मुद्दा बनाया गया। यानी जिस राजनीति के सहारे सपा संतुलन बनाने की कोशिश कर रही थी, वहीं उसे अपने ही कथित वोटबैंक में असहज स्थिति का सामना करना पड़ा।

इसी तरह का एक मामला मार्च 2026 में भी सामने आया था बदायूं के दोहरा हत्याकांड के रूप में, जो मूल रूप से आपसी रंजिश का मामला था, उसे भी जातीय वर्चस्व और ‘ठाकुर बनाम अन्य’ के चश्मे से दिखाने की कोशिश की गई। जबकि हकीकत यह थी कि इस मामले में त्वरित कार्रवाई हुई, एनकाउंटर हुआ, बुलडोजर चला और SIT जाँच तक बैठाई गई।इसके बावजूद नैरेटिव इस तरह गढ़ा गया मानो यह किसी विशेष जाति की गुंडई का उदाहरण हो।

सवाल यह है कि जब हर घटना को इसी तरह जातीय टकराव के फ्रेम में डालने की कोशिश होगी, तो क्या इससे समाज में विश्वास बढ़ेगा या विभाजन गहरा होगा?

फतेहपुर और बदायूं के ये दोनों उदाहरण यह संकेत देते हैं कि सपा और उसके नेतृत्व की राजनीति अब भी घटनाओं को संतुलित तरीके से देखने की बजाय उन्हें जातीय संघर्ष में ढालकर प्रस्तुत करने की कोशिश करती है।

जब जनता ने पहचान ली मंशा

अब इन दोनों प्रकरणों की तुलना गाजीपुर वाले मामले से करें तो गाँव के लोगों की प्रतिक्रिया इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने सपा प्रतिनिधिमंडल को गाँव में प्रवेश करने से रोका और स्थिति टकराव में बदल गई। यह प्रतिक्रिया अचानक नहीं थी। यह उस अनुभव का परिणाम थी, जिसमें लोगों ने बार-बार देखा है कि कैसे घटनाओं को राजनीतिक रंग दिया जाता है।

लोगों को यह साफ दिखा कि जो लोग आए हैं, वे समाधान का हिस्सा बनने नहीं, बल्कि विवाद को और गहरा करने आए हैं। यही वजह रही कि उन्होंने उन्हें स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

यह केवल विरोध नहीं था, बल्कि एक स्पष्ट संदेश था कि अब ऐसी राजनीति को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह बदलाव संकेत देता है कि समाज अब अधिक जागरूक हो रहा है। वह केवल पहचान के आधार पर समर्थन नहीं दे रहा, बल्कि यह भी देख रहा है कि उसके बीच आने वाला व्यक्ति किस उद्देश्य से आया है।

भरोसा किस पर, यह भी साफ हुआ

गाजीपुर की घटना ने यह भी स्पष्ट किया कि लोगों का भरोसा अब किस दिशा में है। उन्हें यह विश्वास है कि कानून व्यवस्था अपनी प्रक्रिया के अनुसार काम करेगी और अपराधी को सजा मिलेगी, चाहे वह किसी भी जाति या धर्म का क्यों न हो। यही भरोसा इस पूरे घटनाक्रम में झलकता है।

लोगों ने यह मान लिया कि न्याय के लिए उन्हें राजनीतिक मध्यस्थता की जरूरत नहीं है। इसके विपरीत, उन्होंने उन प्रयासों को ही खारिज कर दिया जो इस प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश करते दिखे। यह भरोसा किसी भी सरकार के लिए सबसे बड़ी पूँजी होता है।

सपा के लिए चेतावनी

समाजवादी पार्टी के लिए यह घटना एक बड़ी चेतावनी के रूप में देखी जानी चाहिए। यह केवल एक जगह की प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि उस व्यापक भावना का हिस्सा है, जो धीरे-धीरे बनती गई है। जब किसी पार्टी की छवि इस रूप में बन जाए कि वह हर घटना को राजनीतिक अवसर के रूप में देखती है, तो जनता का विश्वास कमजोर होना स्वाभाविक है।

अखिलेश यादव के लिए यह जरूरी है कि वे इस संकेत को समझें। केवल बयानबाजी या आरोप-प्रत्यारोप से स्थिति नहीं बदलेगी। अगर राजनीति की शैली में बदलाव नहीं आता, तो ऐसी घटनाएँ आगे भी इसी तरह सामने आती रहेंगी।

बदलते समाज में नहीं चलेगा पुराना राजनीतिक ढर्रा

गाजीपुर की घटना यह बताती है कि अब न केवल समाज बदल रहा है बल्कि उसकी राजनीतिक अपेक्षाएँ भी बदल रही हैं। अब केवल जातीय समीकरणों के सहारे राजनीति करना उतना प्रभावी नहीं रह गया है। लोग अब ज्यादा सजग हैं, ज्यादा सवाल करते हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे प्रतिक्रिया देने से भी पीछे नहीं हटते।

यह घटना एक स्पष्ट संदेश है कि जनता अब केवल दर्शक नहीं है। वह समझती है, परखती है और जरूरत पड़ने पर विरोध भी करती है। ऐसे में जो राजनीतिक दल इस बदलाव को नहीं समझेंगे, उनके लिए आगे का रास्ता आसान नहीं होगा।

सामने काटी भैंस, गोमांस खाने का दबाव बनाया, 5 साल किया टॉर्चर: फरीदाबाद में हिंदू युवती को फँसाने वाले J&K के जुल्फिकर का पाकिस्तान से लेकर अल-फलाह तक कनेक्शन; पीड़िता ने ऑपइंडिया को बताया दर्द

चाहे कोई भी आरफा ‘बेगम’ या उसके जैसे इस्लामी कट्टरपंथी बार-बार इस सच्चाई से इनकार करें कि ‘लव जिहाद’ जैसा कुछ नहीं होता। या चाहे वामपंथी-लिबरल गैंग और कुछ फेमिनिस्ट इसे महज एक शब्द कहकर सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की बहस में दबाने की कोशिश करें। लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से कहीं अलग तस्वीर पेश करती है। ऐसी ही एक तस्वीर हरियाणा के फरीदाबाद से सामने आई है, जिसने एक बार फिर इस बहस को जमीन पर ला खड़ा किया है।

यह मामला एक ऐसी हिंदू महिला की जिंदगी का है जिसे प्रेमजाल में फँसाकर झूठे रिश्ते में बाँधा गया और उसकी दुनिया ही उजाड़ दी गई। आज वही महिला न्याय के लिए दर-दर भटक रही है, जबकि आरोपित मुस्लिम व्यक्ति खुलेआम घूम रहा है। मुस्लिम व्यक्ति का असली नाम जुल्फिकर अहमद है। उसने अपनी मुस्लिम पहचान छिपाते हुए हिंदू नाम ‘कृष्णा’ की आड़ ली और हिंदू महिला को अपने झाँसे में लिया।

मूलरूप से जम्मू-कश्मीर के पुंछ के रहने वाले जुल्फिकर अहमद ने कृष्णा बनकर हिंदू महिला के साथ धोखे से निकाह किया। महिला का धर्म परिवर्तन करवाकर मुस्लिम नाम ‘रूबिया’ रख दिया। इसके बाद जुल्फिकर और उसके अम्मी-अब्बा-भाई-बहनों ने मिलकर पीड़िता को गोमांस खाने, नमाज पढ़ने, मस्जिद जाने से लेकर बुर्का पहनने तक के लिए दबाव डाला। 5 साल तक जुल्फिकर ने पीड़िता के साथ रेप किया। इतना ही नहीं वह पाकिस्तान प्रेमी है और कई बार पाकिस्तान जा भी चुका है। जुल्फिकर ने पीड़िता से यह तक कहा- “भारत के सारे ‘अब्दुल’ भारत के नहीं बल्कि पाकिस्तान के हैं, युद्ध की स्थिति में सारे पाकिस्तान के साथ खड़े दिखेंगे।”

पीड़िता ने जुल्फिकर के खिलाफ थाने में शिकायत दर्ज कराई, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। रोजाना कोर्ट के चक्कर लगा रही है। हिंदू संगठनों ने पीड़िता की न्याय की लड़ाई में उसका साथ दिया। पीड़िता की कानूनी लड़ाई अब भी जारी है, क्योंकि आरोपित जुल्फिकर अब तक गिरफ्तार नहीं हुआ है। इसी बीच पीड़िता ने ऑपइंडिया के साथ अपनी आपबीती साझा की है, जिसे हम विस्तार से सामने रखेंगे।

मुस्लिम सहेली शबनम ने हिंदू महिला को आरोपित जुल्फिकर से मिलवाया

ये आपबीती उस हिंदू महिला की है, जो साल 2020 में फरीदाबाद की एक फैक्ट्री में मजदूरी कर महज ₹6000 महीने कमाकर किसी तरह अपनी जिंदगी गुजार रही थी। उसी फैक्ट्री में फतेहपुर तगा निवासी शबनम नाम की एक मुस्लिम महिला भी नौकरी करती थी। शबनम ने पीड़ित हिंदू महिला का भरोसा जीतने के लिए बोलचाल बढ़ानी शुरू की। इसके बाद शबनम ने पीड़िता से जम्मू-कश्मीर के रहने वाले जुल्फिकर अहमद से दोस्ती कराई। शबनम ने जुल्फिकर को हिंदू महिला की इंस्टाग्राम अकाउंट साझा किया।

यहाँ से शुरू हुआ जुल्फिकर का खेल। जुल्फिकर ने अपने फर्जी इंस्टाग्राम अकाउंट से पीड़िता को मैसेज किया। पीड़िता ने एक-दो बार को अनदेखा किया। लेकिन बार-बार मैसेज आने के चलते पीड़िता ने जवाब दे दिया। तब जुल्फिकर ने पीड़िता को अपने झाँसे में लेना शुरू किया।

जुल्फिकर ने ‘फौजी’ कृष्णा बन हिंदू महिला को जाल में फँसाकर किया रेप

जुल्फिकर ने अपनी मुस्लिम पहचान पीड़िता से छिपाए रखी। उसने अपना नाम ‘कृष्णा’ और खुद को भारतीय सेना का जवान बताकर परिचित किया। इंस्टाग्राम पर बातचीत के दौरान उसने पीड़िता को कभी शक नहीं होने दिया कि वह असल में ‘मुस्लिम’ है। कई हफ्तों तक बातचीत करने के बाद एक दिन जुल्फिकर ने हिंदू महिला से मिलने की बात कही।

पीड़िता के अनुसार, जुल्फिकर ने कहा कि वह किसी काम से दिल्ली आ रहा है और उससे मिलना चाहता है। वह दिल्ली आया और पीड़िता से फरीदाबाद में ही बाहर किसी जगह मिला। फिर होटल न मिलने का बहाना बनाया और पीड़िता के घर में घुस गया। पीड़िता अकेली रहती थी, जुल्फिकर ने इसका फायदा उठाया। उसने कोल्ड ड्रिंक में नशे की दवा मिलाकर पीड़िता को पिलाई, जिससे पीड़िता बेसुध हो गई। इसके बाद पीड़िता का रेप किया और अश्लील फोटो और वीडियो भी बना लीं।

इन फोटो और वीडियो को वायरल करने की धमकी देकर वह 20 दिन तक पीड़िता के घर ही रहा और रोजाना रेप किया। फिर पीड़िता पर अपने जम्मू-कश्मीर में अपने घर ले जाने का दबाव बनाया। पीड़िता ने इनकार किया तो जान से मारने की धमकी दी।

फरीदाबाद से जम्मू-कश्मीर के रास्ते में जुल्फिकर की खुली पोल, पीड़िता को पता लगी असली पहचान

अब जुल्फिकर अकेला नहीं था। उसका चाचा और चाचा का बेटा भी पीड़िता पर जम्मू-कश्मीर जाने का दबाव बनाने लगे। पीड़िता ने बताया कि उन्होंने उसे जबरन गाड़ी में बिठाया और जम्मू-कश्मीर की ओर रवाना हो गए। इसी सफर के बीच पीड़िता को आरोपित जुल्फिकर की ‘मुस्लिम’ पहचान के बारे में पता लगा। जब रास्ते में सिक्योरिटी चेकिंग में जुल्फिकर ने पीड़िता को अपना नाम ‘रुबिया’ बताने को कहा, तो यही पीड़िता को पता लग गया कि उसके साथ कुछ बुरा होने वाला है।

पीड़िता, जो जुल्फिकर को अब तक कृष्णा नाम से जानती थी, वह दंग रह गई। उसने कृष्णा से ‘रुबिया’ नाम बताने के पीछे की वजह पूछी, तो जुल्फिकर ने अपनी सच्चाई उगली कि वह मुस्लिम है। तब पीड़िता ने विरोध किया। लेकिन जुल्फिकर ने अश्लील वीडियो वायरल करने और जान से मारने की धमकी देकर पीड़िता को चुप करा दिया।

जम्मू-कश्मीर में जबरन निकाह के बाद कराया धर्म परिवर्तन

पीड़िता ने बताया कि जुल्फिकर उसे जम्मू-कश्मीर के पुंछ जिले में अपने चाचा के घर लेकर आया। यहाँ वे लोग 15 दिन ठहरे। इस बीच कई बार पुलिस चाचा के घर पर आई। जुल्फिकर बताता था कि वह घर पर बिना बताए दिल्ली गया था, इसीलिए उसके परिवार वालों ने गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई है। लेकिन पीड़िता को उसकी बात पर यकीन नहीं हुआ। वह पीड़िता को अपने घर भी नहीं ले जाता था।

इन 15 दिनों में उसने पीड़िता को पूरी तरह से इस्लाम में परिवर्तित कर दिया। एक आम हिंदू महिला की तरह पहनावा रखने वाली पीड़िता को बुर्का पहनने के लिए मजबूर किया। जुल्फिकर ने पीड़िता के साथ मस्जिद में जबरन निकाह तक कर लिया। इसके बाद पीड़िता से धोखे से साइन करवाकर कोर्ट मैरिज भी कर ली। वो पीड़िता को पूरी तरह मुस्लिम बनाकर अपने घर ले जाने की तैयारी कर रहा था और इसमें निकाह करना उसका सबसे पहला चरण था।

जुल्फिकर और उसके अम्मी-अब्बा ने गोमांस-नमाज पढ़ने को किया मजबूर, खूब यातनाएँ दीं

पीड़िता से निकाह करने के बाद जुल्फिकर 15 दिन बाद उसे अपने घर लेकर गया। यहाँ जुल्फिकर के अब्बा अब्दुल गफार, अम्मी सायरा बेगम, भाई जावेद और बहन अफसाना ने पीड़िता को खूब यातनाएँ दी। पीड़िता को 3 महीने तक बँधक बनाकर रखा। पीड़िता के मुताबिक, जुल्फिकर के परिवार ने उसे बुर्का पहनने पर मजबूर किया। गोमांस खिलाने का दबाव बनाया। रोजाना 5 वक्त की नमाज पढ़ने को कहा और ऐसा न करने पर मारपीट करते थे।

जुल्फिकर उससे कहता था कि ‘तुम्हें मुस्लिम बनना पड़ेगा, तुम्हारी जैसी आसपास काफी लड़कियाँ हैं जो पहले हिंदू थीं और अब मुस्लिम बन गई हैं।’ पीड़िता ने बताया कि उसके सामने भैंस काटी गई। उसे भी भैंस का मांस खाने के लिए मजबूर किया गया, लेकिन वह नहीं मानी तो जुल्फिकर उसके साथ बदसलहूकी करता था। उसका रेप करता था और मारपीट करता था। 3 महीने तक ऐसा ही चलता रहा। एक दिन वह किसी तरह भागने में सफल हुई और फरीदाबाद लौटी। लेकिन उसके पीछे-पीछे जुल्फिकर भी आ गया।

दिल्ली बम ब्लास्ट और अल फलाह यूनिवर्सिटी से जुल्फिकर के लिंक

फरीदाबाद वापस लौटने के बाद भी पीड़िता के जीवन में कोई सुधार नहीं आया। जुल्फिकर ने उसको यातनाएँ देनी जारी रखी। जुल्फिकर ने अपनी परिचित शबनम की मदद से फरीदाबाद में तकिया वाली मस्जिद के पास कमरा लिया, ये वही इलाका है जहाँ से अक्सर जाँच एजेंसियाँ विस्फोटक जब्त करती हैं और दिल्ली बम ब्लास्ट में भी इस इलाके से कई आतंकी पकड़े गए थे। साल 2021 से 2025 तक पीड़िता को लेकर जुल्फिकर इसी जगह रहता था।

पीड़िता ने बताया कि जुल्फिकर अल फलाह यूनिवर्सिटी से जुड़े कई लोगों से मिलता-जुलता था। शबनम भी इसी गैंग का हिस्सा थी। पीड़िता ने बताया कि फरीदाबाद वापस आने के बाद जुल्फिकर उसके साथ ही रहता था। इस दौरान वह कोई नौकरी भी नहीं करता था, फिर भी उसके बैंक अकाउंट में मोटी रकम क्रेडिट होती थी, जिसको वह कई बार पीड़िता के अकाउंट में डालता था और फिर उन पैसों को इस्तेमाल करता था। पूछने पर कहता था कि ‘ये पैसा बाहर से आता है।’

पीड़िता ने बताया कि उसकी एक बेटी हुई, जिसे जुल्फिकर पसंद नहीं करता था। बेटी होने के बाद उसने पीड़िता का दो बार गर्भपात भी करवाया था। इसके बाद अचानक सितंबर 2025 में वह पीड़िता को अकेले छोड़कर भाग गया।

शबनम की बेटी समा से किया दूसरा निकाह

पीड़िता ने बताया कि जुल्फिकर ने शबनम की बेटी से दूसरा निकाह कर लिया है। वह पीड़िता को छोड़कर अब उसके साथ ही रहता है। पीड़िता के साथ रहने के बावजूद भी जुल्फिकर के समा के साथ संबंध थे। जुल्फिकर ने परिवार की रजामंदी से समा के साथ दूसरा निकाह किया है। जब पीड़िता ने इसका विरोध किया तो कहने लगा, “हम मुस्लिमों में तो कई सारे निकाह चलते हैं, तू भी मेरे साथ आकर रह सकती है, मुझे कोई हर्ज नहीं है।”

लेकिन इस बार पीड़िता जुल्फिकर की बातों में नहीं आई। वह अपनी आपबीती को लेकर डबुआ पुलिस थाने पहुँची और शिकायत दी। लेकिन थाने में पुलिस ने उसकी शिकायत लिखने से इनकार कर दिया। इसके बाद वह कोर्ट पहुँची और हरियाणा के मुख्यमंत्री से लेकर सभी प्रशासनिक अधिकारियों के नाम न्याय की गुहार की चिट्ठी लिखी।

जुल्फिकर का पाकिस्तान से कनेक्शन

जुल्फिकर कोई आम मुस्लिम व्यक्ति नहीं है। उसने पीड़िता को लव जिहाद में फँसाया और फिर दूसरा निकाह कर लिया। लेकिन वह अब भी पीड़िता को धमकी देता है। पीड़िता ने अपनी शिकायत में बताया कि जुल्फिकर के पाकिस्तान से कनेक्शन हैं। वह कई बार पाकिस्तान जा चुका है। पीड़िता ने बताया कि जब जुल्फिकर उसे लेकर जम्मू-कश्मीर गया था, तब भी जुल्फिकर दो-तीन दिन के लिए पाकिस्तान गया था और कह रहा था कि पाकिस्तान में उसके करीबी रहते हैं।

दूसरा निकाह करने के बाद जुल्फिकर ने पीड़िता को पाकिस्तान के नाम पर धमकी भी दी। जुल्फिकर ने कहा, “भारत के अब्दुल भारत के नहीं बल्कि पाकिस्तान के हैं, युद्ध की स्थिति में सारे पाकिस्तान के साथ खड़े दिखेंगे।” वह यह भी कहता है, “वह जल्द ही पाकिस्तान की नागरिकता लेकर वही बस जाएगा।”

बजरंग दल ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला बताया

फरीदाबाद में बजरंग दल के संयोजक पुनीत वशिष्ठ उर्फ सोनू, जो पीड़िता की न्याय की लड़ाई में उसका साथ दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि पुलिस थाने में पीड़िता की शिकायत देने पहुँचे थे, लेकिन कोई कार्यवाही नहीं हुई। शिकायत में उन्होंने कहा कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है, क्योंकि आरोपित पाकिस्तान की तारीफ करता है और वहाँ की नागरिकता लेने की बात करता है। उन्होंने आरोपित के खिलाफ UAPA या NSA एक्ट में मुकदमा करने की माँग की है।

वहीं पुलिस का कहना है कि मामले की जाँच जारी है, जाँच के बाद ही आगे की कार्रवाई की जाएगी। इसके अलावा मामले पर ज्यादा बाद करने से पुलिस बचती नजर आई।

लव जिहाद एक सच्चाई और इसके परतें देश के लिए संकट

तो यह गंभीर मामला, लव जिहाद पर सवाल उठाने वाले हर व्यक्ति के मुँह पर ताला लगा देने वाला मामला है। इस मामले से पता लग रहा है कि कैसे एक मुस्लिम व्यक्ति एक हिंदू महिला को अलग-अलग चरणों में प्रताड़ित करता है और यहाँ तक कि उसके पाकिस्तान के साथ कनेक्शन तक सामने आ जाते हैं। वह भारत में बैठकर भी अल-फलाह और देश-विरोधी गतिविधियों में सक्रिय है।

यह मामला बेसहारा हिंदू लड़कियों को लव जिहाद में फँसाने वाले मुस्लिम लड़कों की सच्चाई उजागर करता है। इससे पता चलता है कि यहाँ महिला को ऑप्शन नहीं, बल्कि उसे मजबूर किया जाता है। शुरू में प्रेम दिखाकर, तो अंत में हिंसा दिखाकर। इस मामले को गहराई से समझने वाले लोग लव जिहाद को सिर्फ ‘विचार’ नहीं मानेंगे, बल्कि इसे एक संगठित अपराध करार देंगे।

योगी आदित्यनाथ का चुनावी मैदान में दिखा दम, बिहार के बाद बंगाल में छाए: अखिलेश यादव सोशल मीडिया तक सिमटें, समझें- किस बात है उन्हें डर, जो ममता से बनाई दूरी

एक तरफ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री जिन्हें लोग प्यार से बाबा योगी आदित्यनाथ बोलते हैं, उनकी देश भर में आँधी चल रही है। वो बिहार से लेकर असम और पश्चिम बंगाल तक डटे हुए हैं, तो दूसरी तरफ अखिलेश यादव डर के मारे बंगाल की मिट्टी पर पैर रखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे।

दरअसल, बिहार 2025 में योगी ने मात्र दस दिनों में 31 धुआँधार रैलियाँ कीं। समस्तीपुर, मोहिउद्दीननगर, सीवान, वैशाली, भोजपुर, दानापुर, सहरसा, दरभंगा, बगहा, बेला समेत दर्जनों जिलों में लाखों हिंदू वोटरों को एकजुट किया। बुलडोजर हिंदुत्व, सख्त कानून-व्यवस्था और विकास का जादू चला।

इसका नतीजा ये हुआ कि एनडीए को 243 सीटों वाली बिहार विधानसभा में 200 से ज्यादा सीटें मिलीं। ऐतिहासिक दो-तिहाई बहुमत और 87 प्रतिशत का स्ट्राइक रेट। योगी आदित्यनाथ ने जिन 43 उम्मीदवारों के लिए प्रचार किया, उसमें से 27 उम्मीदवार जीत गए। वहीं, अखिलेश यादव का PDA फॉर्मूला पिछड़ा-दलित-मुस्लिम बुरी तरह फ्लॉप हो गया। पूरा महागठबंधन महज 40 सीटों के आसपास सिमट गया।

लेकिन अखिलेश को यह हार अभी तक हजम नहीं हुई। बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 पूरे जोरों पर हैं। बाबा योगी वहां भी रैलियों का तूफान ला रहे हैं। हर जगह उनकी डिमांड है। हिंदू वोट एक हो रहा है। टीएमसी की सत्ता हिल रही है।

और अखिलेश यादव? वो लखनऊ के एयर-कंडीशंड कमरे में बैठे सिर्फ ट्विटर पर बयानबाजी कर रहे हैं। वो जुलाई 2024 में धरमतला रैली में ममता बनर्जी के साथ सिर्फ चेहरा दिखाने के बाद एक बार भी बंगाल की मिट्टी पर नहीं उतरे हैं। 27 जनवरी 2026 को पत्नी के साथ ‘व्यक्तिगत यात्रा’ का बहाना बनाकर कोलकाता पहुंचे। नबन्ना में ममता से मुलाकात भी की, लेकिन कोई रैली नहीं की। कोई कैंपेनिंग नहीं की, सड़क पर कोई लड़ाई नहीं और न किसी जनसभा में दिखे।

दरअसल, अखिलेश यादव के डर का असली कारण बिहार की वो सुनामी है। नवंबर 2025 में बाबा ने 30 से ज्यादा रैलियों में हिंदू वोट को एकजुट कर दिया था। उनकी आँधी में यादव-मुस्लिम गठजोड़ का जादू बिहार में टूट गया। अब वही लहर बंगाल पहुँच रही है। बाबा की आँधी यहाँ भी चली तो अखिलेश का वंशवादी साम्राज्य हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा। अखिलेश को बस इसी बात का डर है। यही वजह है कि सपा मुखिया मैदान छोड़कर भाग रहे हैं।

दरअसल, अखिलेश यादव को अब उनके अपने गठबंधन वाले भी नहीं पूछ रहे। बिहार में रैली की थी तो क्या हुआ? वहाँ भी PDA फ्लॉप हो चुका है। अब बंगाल में महुआ मोइत्रा जैसे ट्वीट को रीट्वीट करके अपना अहंकार सहला रहे हैं। इसमें टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने योगी आदित्यनाथ पर हमला बोला, जिसे अखिलेश यादव ने तुरंत रीट्वीट कर दिया। जैसे कोई बड़ी जीत हासिल कर ली हो। जबकि असलियत यह है कि अखिलेश खुद मैदान में उतरने की हिम्मत नहीं रखते। डरपोक वंशवादी सिर्फ ट्विटर पर बहादुरी दिखाते हैं। असली नेता तो मैदान में लड़ेगा। बाबा लड़ रहे हैं और अखिलेश भाग रहे हैं।

अखिलेश जानते हैं कि अगर बाबा की सुनामी आई तो यादव-मुस्लिम गठजोड़ का अंत निश्चित है। इसलिए लखनऊ में छिपे बैठे हैं। पत्नी के साथ व्यक्तिगत यात्रा का ढोंग रच रहे हैं। अखिलेश यादव जानते हैं बिहार में हार गए, बंगाल में भी हारने वाले हैं। 2027 में उत्तर प्रदेश में भी यही तस्वीर दोहराएगी। वंशवादियों को लखनऊ से निकलने की हिम्मत नहीं रहेगी।

कैंपेन स्लोगन अब हकीकत बन चुके हैं। अखिलेश यादव डर के मारे बंगाल नहीं जा रहे… क्योंकि बिहार में बाबा की बढ़ती लोकप्रियता ने अखिलेश को दहला दिया। योगी का जादू बिहार जीत गया, तो अब बंगाल में भी वंशवादियों का दिल डर रहा है। बंगाल में हिंदुओं की एकजुटता देख अखिलेश यादव के होश उड़े हुए हैं। ऐसे में अगले ही साल यानी 2027 में सत्ता जाने के डर ने उन्हें लखनऊ में ही कैद कर लिया है।

जो नेता डर से मैदान छोड़ दे, वह कभी नेता नहीं बन सकता। अखिलेश ने बंगाल से दूरी बना ली है। यह दूरी उनकी हार की दूरी है। बाबा की लोकप्रियता हर दिन बढ़ रही है। उनकी हर रैली में जनसैलाब उमड़ रहा है। हिंदू एकजुटता की दीवार खड़ी हो रही है। अखिलेश इस दीवार को देखकर ही कांप रहे हैं। इसलिए बंगाल नहीं जा रहे। इसलिए सिर्फ रीट्वीट कर रहे हैं।

बाबा योगी की बढ़ती लोकप्रियता ने न सिर्फ अखिलेश को दहला दिया है, बल्कि पूरे विपक्ष को हिला दिया है। इंडी गठबंधन के नेता अब एक-दूसरे को भी नहीं पूछ रहे। अखिलेश अकेले पड़े हैं। ट्विटर पर महुआ मोइत्रा का ट्वीट रीट्वीट करके खुद को संतोष दे रहे हैं। लेकिन हकीकत यह है कि मैदान खाली है। बंगाल का मैदान बाबा के लिए तैयार है।

अखिलेश यादव को अब समझ आ जाना चाहिए कि समय बदल चुका है। वंशवादी राजनीति की उम्र खत्म हो रही है। लोगों को अब चेहरा नहीं, काम चाहिए। बाबा योगी काम दिखा रहे हैं। अखिलेश सिर्फ ट्वीट दिखा रहे हैं। एक तरफ मैदान में संघर्ष, दूसरी तरफ एसी कमरे में छुपना। यह अंतर बहुत बड़ा है। यह अंतर ही 2026 बंगाल और 2027 यूपी का फैसला करेगा।

नोएडा में मजदूरों के प्रदर्शन की आड़ में चल रहा था बड़ा खेल, टारगेट था UP की औद्योगिक विकास की गति को तोड़ना: जानें योगी सरकार ने गलत मंसूबों को कैसे किया ध्वस्त

नोएडा (गौतम बुद्ध नगर जिला) उत्तर प्रदेश का सबसे विकसित औद्योगिक और आईटी हब है, जो राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) का हिस्सा है। उत्तर प्रदेश के ‘आर्थिक प्रवेश द्वार’ नोएडा में होने वाली किसी भी हलचल का सीधा असर राज्य की निवेश छवि पर पड़ता है।

इसी के चलते अब नोएडा में औद्योगिक अशांति फैला कर उत्तर प्रदेश को नाकाम साबित करने की कोशिश की जा रही है। अप्रैल में हुए श्रमिक विरोध और हिंसक प्रदर्शनों से तो कम से कम यही जान पड़ता है।

हालाँकि जाँच एजेंसियों की तफ्तीश बताती है कि मजदूरों की हिंसा नोएडा को टारगेट करने की थी। 2017 के बाद योगी सरकार ने कानून-व्यवस्था सुधार, निवेश आकर्षण और बुनियादी ढांचे को मजबूत किया।

इसी के जरिए सरकार ने नोएडा को मोबाइल/इलेक्ट्रॉनिक्स हब, डेटा सेंटर और लॉजिस्टिक्स केंद्र बना दिया। अब इस पर चोट करने की कोशिश की जा रही है।

जाँच से पता चला कि नोएडा हिंसा स्पॉन्टेनियस नहीं थी। मुख्य आरोपित अदित्य आनंद (मास्टरमाइंड) को तमिलनाडु से गिरफ्तार किया गया। उसने 5 साल से तैयारी कर रखी थी।

अदित्य 2022 में मजदूर बिगुल से जुड़ा। इसके बाद नोएडा की फैक्टरियों का पूरा डाटा इकट्ठा किया। इसमें कर्मचारियों की संख्या और वेतन से लेकर उनकी स्थिति तक का पूरी जानकारी जुटाई।

मार्च 30 से अप्रैल 1 के बीच सेक्टर-37, अरुण विहार में एक कमरे में 5 संगठनों (मजदूर बिगुल दस्ता, दिशा संगठन, RWPI, नवजवान भारत सभा, एकता संघर्ष समिति) की मीटिंग हुई।

जाँच में मुख्य आरोपी रुपेश राय (मजदूर बिगुल दस्ता के सदस्य) के व्हाट्सएप चैट्स से साबित हुआ कि अप्रैल की शुरुआत से प्लानिंग चल रही थी।

श्रमिकों को भड़काने के लिए 17+ व्हाट्सएप ग्रुप्स बनाए गए। मजदूर बिगुल दस्ता ( जो कि असल में एक लेफ्ट विंग संगठन है और CPI-ML से जुड़ा है, उसने मजदूरों को मोबिलाइज किया।

अदित्य आनंद और कुछ अन्य ने झूठी खबर और अफवाहें फैलाईं। जाँच के बाद जो गिरफ्तारियाँ हुईं उनमें 66 लोगों में से 45 गैर-मजदूर (आउटसाइडर्स) थे।

नोएडा के विकास को पटरी से उतारने की सुनियोजित साजिश

1. ‘मजदूर बिगुलऔर बाहरी विचारधारा का दखल

‘मजदूर बिगुल’ जैसी संस्थाएं और पत्रिकाएं, जो कट्टरपंथी वामपंथी विचारधारा से प्रेरित हैं, नोएडा के औद्योगिक क्षेत्रों में सक्रिय देखी गई हैं। इनका मुख्य काम श्रमिकों को ‘हक’ के नाम पर भड़काकर ‘हड़ताल’ की स्थिति पैदा करना है।

जिस तरह 70 और 80 के दशक में पश्चिम बंगाल में ‘घेराव’ और ‘उग्र आंदोलन’ से टाटा और बिड़ला जैसे उद्योगों को बाहर निकाला गया, वही मॉडल नोएडा में लागू करने की कोशिश हो रही है।

खुफिया इनपुट बताते हैं कि कुछ एक्टिविस्ट जो बंगाल और केरल के आंदोलनों में सक्रिय थे, अब नोएडा-ग्रेटर नोएडा की झुग्गी बस्तियों में ‘श्रमिक पाठशाला’ चला रहे हैं।

2. जेवर एयरपोर्ट और इन्वेस्टमेंट वॉर

जेवर एयरपोर्ट और फिल्म सिटी के आने से उत्तर प्रदेश, विशेषकर नोएडा, दुनिया भर के निवेशकों के लिए ‘हॉटस्पॉट’ बन गया है।अब जैसे ही जेवर एयरपोर्ट का काम तेजी से बढ़ा, वैसे ही अचानक श्रमिक आंदोलनों और जातीय रैलियों (जैसे गुर्जर रैली) में तेजी आई।

विदेशी कंपनियों (सैमसंग, विवो, माइक्रोसॉफ्ट) के मन में जबरन यह डर पैदा करने की कोशिश की गई कि ‘यहाँ का माहौल कभी भी खराब हो सकता है।‘ यदि निवेश रुकेगा तो यूपी की 1 ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी का सपना टूटेगा।

नोएडा विरोध प्रदर्शन – घटनाक्रम और नैरेटिव विश्लेषण

नोएडा और ग्रेटर नोएडा में किसानों और श्रमिकों के प्रदर्शनों को एक सोची-समझी रणनीति के तहत ‘कानून-व्यवस्था की विफलता’ के रूप में पेश करने की कोशिश की गई है।

घटनाक्रम और प्रभाव तालिका (1 से 10 के पैमाने पर)

तिथि/घटनाक्या नैरेटिव सेट करने की कोशिश हुई?प्रभाव (1-10)वास्तविक अपराधी/तत्व
श्रमिक विरोध (शुरुआती चरण)“कंपनियां असुरक्षित हैं, श्रमिक पलायन कर रहे हैं।”4स्थानीय यूनियन नेता और कुछ बाहरी कंटेंट क्रिएटर।
राजकुमार भाटी एवं गुर्जर रैली“सरकार एक विशिष्ट समुदाय के खिलाफ है, सामाजिक वैमनस्य है।”7राजनैतिक महत्वाकांक्षा रखने वाले नेता और डिजिटल एक्टिविस्ट।
सोशल मीडिया कैंपेन (UP Industry in Danger)“यूपी अब निवेश के लायक नहीं रहा, गुंडागर्दी बढ़ गई है।”8पेड बॉट्स और कुछ विशेष विचारधारा वाले डिजिटल प्लेटफॉर्म्स।
पुलिस कार्रवाई एवं गिरफ्तारी“लोकतंत्र की हत्या हो रही है, शांतिपूर्ण प्रदर्शन दबाया जा रहा है।”5वे तत्व जो धारा 144 का उल्लंघन कर हिंसा भड़का रहे थे।

इन घटनाओं का मुख्य उद्देश्य विदेशी निवेशकों (जैसे सैमसंग, विवो, डेटा सेंटर निवेशक) के मन में असुरक्षा पैदा करना था। इस नैरेटिव का प्रभाव 7/10 तक देखा गया, जिसे योगी सरकार ने तुरंत काउंटर भी किया।

तथ्यों ने उजागर कर दिए विपक्ष के नैरेटिव

बेरोजगारी दर में ऐतिहासिक गिरावट: जहाँ अखिलेश सरकार के दौरान उत्तर प्रदेश में बेरोजगारी दर दोहरे अंकों (17.5% के आसपास) तक पहुँच गई थी, वहीं योगी सरकार के कार्यकाल में यह गिरकर 3% से 4% के बीच आ गई है। यह डेटा साबित करता है कि रोजगार खत्म नहीं हो रहा, बल्कि बढ़ रहा है।

सपा काल (2012-2017) में उत्तर प्रदेश में अपराध दर ऊँची थी। NCRB 2012-2015 डेटा के अनुसार, IPC अपराधों में 24% वृद्धि हुई। हत्या, बलात्कार, अपहरण और दंगे बढ़े। 2012-2017 के बीच 815 दंगे हुए, जिनमें 192 मौतें हुईं।

इस काल के दौरान माफिया राज, लैंड ग्रैबिंग और राजनीतिक संरक्षण आम थे। गौतम बुद्ध नगर सहित पश्चिमी UP में भी औद्योगिक क्षेत्रों में सुरक्षा की शिकायतें थीं। ऐसे में जो उद्योग यूपी में आने वाले थे नहीं आए।

सपा सरकार की तुलना में योगी सरकार (2017-2026) में स्थिति में बेहद सुधार आया। NCRB 2023 रिपोर्ट के मुताबिक, UP का कुल अपराध दर 181.3 से 335.3 प्रति लाख (राष्ट्रीय औसत 270.3-448.3 से कम) है। हत्या दर 1.4 प्रति लाख, डकैती और लूट में भारी कमी (85% तक कुछ श्रेणियों में) आई।

2017 के बाद बड़े दंगे शून्य रहे। बरेली और बहराइच जैसी घटनाओं में भी 24 घंटे में मामला काबू कर लिया गया। UP-112, पुलिस सुधार और ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति ने प्रभाव दिखाया। नोएडा-ग्रेटर नोएडा में औद्योगिक शांति बढ़ी, जिससे निवेशक आकर्षित हुए।

योगी सरकार की नीतियों की वजह से जो उद्योग थे, उन्होंने यूपी में विस्तार किया। जो उद्योग नहीं थे, उन्हें योगी सरकार लेकर आई। सरकारी स्तर पर बड़ी कंपनियों की स्थापना हुई।

डिफेंस कॉरिडोर, SEZ जैसी व्यवस्थाएँ, औद्योगिक पार्क, वाहन निर्माण, स्मार्टफोन निर्माण, फूड एवं प्रोसेसिंग यूनिट्स की तादात बहुत बढ़ी। हजारों करोड़ के निवेश से सिर्फ नोएडा ही नहीं यूपी के अलग-अलग हिस्सों में इंडस्ट्रीज लगी।

MSME का गढ़ बनता उत्तर प्रदेश

योगी काल में औद्योगिक क्रांति हुई। साल 2017 से अब तक 17,841 नई फैक्टरियां रजिस्टर्ड, 16 लाख+ प्रत्यक्ष रोजगार। नोएडा-ग्रेटर नोएडा यमुना एक्सप्रेसवे के कारण भारत का सबसे बड़ा इलेक्ट्रॉनिक्स हब बन गया।

योगी सरकार ने ‘एक जनपद एक उत्पाद’ (ODOP) के माध्यम से सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों को पुनर्जीवित किया है। फैक्ट्रीज की संख्या की बात की जाए तो पिछले 7 वर्षों में पंजीकृत फैक्ट्रियों की संख्या में 25% से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है।

इसके अलावा MSME लोन को बढ़ावा मिला है। बैंकों के माध्यम से छोटे उद्यमियों को रिकॉर्ड लोन वितरित किए गए हैं।

पिछड़े जिलों (पूर्वांचल, बुंदेलखंड) का विकास

सपा सरकार पर आरोप था कि विकास सैफई और पश्चिमी UP तक सीमित रहा; पूर्वांचल-बुंदेलखंड माफिया और गरीबी की चपेट में।

2011-12 में पूर्वांचल की प्रति व्यक्ति आय राज्य औसत से काफी कम थी; बुंदेलखंड में सूखा और बेरोजगारी चरम पर। 

योगी सरकार ने संतुलित विकास पर जोर दिया, जिसमें पूर्वांचल एक्सप्रेसवे (340 km), बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे (296 km), गंगा एक्सप्रेसवे। इनसे पिछड़े क्षेत्रों में उद्योग, रोजगार और कनेक्टिविटी बढ़ी।

योगी सरकार में गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों से 3.14 करोड़ लोग गरीबी रेखा से ऊपर उठे। पूर्वांचल और बुंदेलखंड अब विकास के नए केंद्र बन रहे हैं, जबकि नोएडा जैसी जगहें राज्य को गति दे रही हैं। बीते लगभग 1 दशक में प्रति व्यक्ति आय को योगी सरकार ने दोगुना से भी अधिक कर दिया। साल 2024-25 में ये ₹1,09,844 से 1,26,304 रुपए तक हो गया।

इसके अलावा GSDP ₹13.3 लाख करोड़ से ₹30.25 लाख करोड़ हो गया। गौतम बुद्ध नगर की प्रति व्यक्ति आय ₹10.17 लाख (2023-24) हुई, जो जापान के बराबर Public Private Partnership पर काम कर रही है। इसके अलावा सभी 75 जिलों में वृद्धि दर्ज की गई। 15 से अधिक जिलों में ₹1 लाख+ की आय दर्ज की गई है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की मजदूर हबसे मैन्युफैक्चरिंग हबकी यात्रा

एक साजिश के तहत यह प्रचारित किया जा रहा है कि यूपी के लोगों को अन्य राज्यों में श्रमिक बनने के लिए मजबूर किया जा रहा है।वास्तविकता इसके ठीक उलट है:

जेवर एयरपोर्ट और फिल्म सिटी: ये प्रोजेक्ट्स पश्चिमी यूपी को केवल सेवा क्षेत्र ही नहीं, बल्कि वैश्विक पर्यटन और लॉजिस्टिक्स का केंद्र बना रहे हैं।

औद्योगिक सुरक्षा बल (UPISF): उद्योगों की सुरक्षा के लिए विशेष बल का गठन किया गया है, ताकि उद्यमियों को डराया न जा सके।

सीएम योगी की जीरो टॉलरेंसनीति

दंगाइयों और अवैध कब्जा करने वालों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई (बुलडोजर एक्शन और कुर्की) ने उद्यमियों में यह विश्वास पैदा किया है कि उनकी संपत्ति और निवेश सुरक्षित है। पूर्ववर्ती सरकारों में जहाँ ‘रंगदारी’ एक उद्योग बन गया था, अब वहाँ ‘पारदर्शिता’ है।

कौन हैं हिंदूवादी कार्यकर्ता गौतम खट्टर, जिनके खिलाफ गोवा पुलिस ने जारी किया लुक-आउट सर्कुलर: जानें- उन्होंने कैसे ‘सेंट फ्रांसिस जेवियर’ की करतूतों को किया उजागर

गोवा में एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है, जहाँ एक यूट्यूबर और आर्य समाज से जुड़े गौतम खट्टर के बयान ने माहौल गरमा दिया है। मामला शनिवार (18 अप्रैल 2026) का है, जब साउथ गोवा के वास्को में भगवान परशुराम जयंती के एक कार्यक्रम के दौरान खट्टर ने 16वीं सदी के जेसुइट मिशनरी फ्रांसिस जेवियर को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की।

उनका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते ही राज्य में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए और कई जगहों पर शिकायतें दर्ज कराई गईं। बताया जा रहा है कि कार्यक्रम में बोलते हुए गौतम खट्टर ने फ्रांसिस जेवियर को आतंकी, क्रूर और बर्बर शासक बताया और उन पर जबरन धर्मांतरण कराने के आरोप लगाए। इसके साथ ही उन्होंने उनके अवशेषों को लेकर भी अपमानजनक बातें कहीं, जिससे ईसाइयों में नाराजगी फैल गई।

इस मामले में गोवा के कई ईसाई संगठनों और राजनीतिक दलों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। गोवा और दमन के आर्चडायोसीज ने इन बयानों को नफरत फैलाने वाला और दुर्भावनापूर्ण बताया। वहीं कॉन्ग्रेस नेता पीटर डिसूजा ने वास्को पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई। दो दिनों के भीतर राज्य के अलग-अलग इलाकों में दर्जनों शिकायतें दर्ज हुईं।

पुलिस ने सभी शिकायतों को वास्को थाने में ट्रांसफर कर गौतम खट्टर के खिलाफ धार्मिक भावनाएँ आहत करने के आरोप में एफआईआर दर्ज की और बाद में केस को गोवा क्राइम ब्रांच को सौंप दिया गया। गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने भी कहा कि आरोपित को जल्द गिरफ्तार किया जाएगा।

जाँच के दौरान पुलिस ने गौतम खट्टर के खिलाफ लुकआउट सर्कुलर जारी किया, ताकि वह देश छोड़कर न जा सके। हालाँकि, वह अभी फरार बताया जा रहा है। इस बीच पुलिस ने उनके भाई माधव खट्टर को हरिद्वार से गिरफ्तार कर लिया है, जिन पर भाषण तैयार करने और उसे फैलाने में भूमिका निभाने का आरोप है। साथ ही गौतम खट्टर का इंस्टाग्राम अकाउंट भी भारत में ब्लॉक कर दिया गया है।

गौतम खट्टर कौन हैं?

4 फरवरी 2000 को दिल्ली में जन्मे गौतम खट्टर खुद को स्पिरिचुअल बीट जर्नलिस्ट, यूट्यूबर, लेखक और वक्ता बताते हैं। अपने यूट्यूब चैनल के डिस्क्रिप्शन में वे लिखते हैं कि “मैं गौतम खट्टर, एक स्पिरिचुअल बीट जर्नलिस्ट हूँ या आप मुझे आधा जर्नलिस्ट और आधा यूट्यूबर कह सकते हैं।” उनका यूट्यूब कंटेंट बाबा-साधुओं, सनातन धर्म, विदेशी भक्तों और धार्मिक स्थलों से जुड़ा होता है। उनके चैनल पर करीब 8.97 लाख से ज्यादा सब्सक्राइबर हैं।

उत्तराखंड में पले-बढ़े गौतम खट्टर को खास पहचान 2021 के हरिद्वार महाकुंभ के दौरान साधुओं के इंटरव्यू और वहाँ से जुड़े वीडियो बनाने के बाद मिली। इसके बाद उन्होंने लगातार धार्मिक और सांस्कृतिक विषयों पर वीडियो बनाए, जिससे उनकी लोकप्रियता बढ़ती गई।

उनकी पहचान खास तौर पर वेदों, उपनिषदों, भगवद गीता, आर्य समाज के सिद्धांतों और सनातन युवाओं पर पश्चिमी प्रभाव की आलोचना करने वाले कंटेंट से बनी है। इसके अलावा वे सोशल मीडिया पर धर्म और संस्कृति से जुड़े मुद्दों पर भी सक्रिय रहते हैं।

सोशल मीडिया के अलावा गौतम खट्टर सनातन महासंघ नाम के एक संगठन के संस्थापक भी हैं, जो वैदिक साहित्य, हिंदू धर्म और सांस्कृतिक जागरूकता को बढ़ावा देने का काम करता है। वे आर्य समाज और महर्षि दयानंद सरस्वती के प्रबल अनुयायी माने जाते हैं। उनके धार्मिक और युवाओं से जुड़े कंटेंट और आक्रामक अंदाज ने उन्हें लोकप्रिय बनाया है।

वहीं गोवा में बढ़ते विरोध और राजनीतिक माहौल के बीच इस समय गोवा क्राइम ब्रांच की टीमें फरार चल रहे गौतम खट्टर की तलाश में जुटी हुई हैं।

‘सेंट’ जेवियर का धर्मांतरण मिशन

फ्रांसिस जेवियर 06 मई 1542 को भारत के गोवा पहुँचा। वह अकेला नहीं आया था, बल्कि पुर्तगाल के राजा जॉन III के समर्थन और आदेश के साथ आया था। उस समय गोवा पूरी तरह पुर्तगाल के कब्जे में था और वहीं से पूरे एशिया में ईसाई मिशन चलाने की योजना बनाई गई थी।

गोवा पहुँचते ही जेवियर ने सबसे पहले बच्चों और गरीब तबके को निशाना बनाकर ईसाई का प्रचार शुरू किया। 1542 से 1545 के बीच उसने तटीय इलाकों, खासकर फिशरमैन समुदाय में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण अभियान चलाया। कई ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि पुर्तगाली शासन के दबाव और लालच में आकर स्थानीय हिंदू लोगों को अपना धर्म छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।

1545 के बाद जेवियर ने गोवा को अपना बेस बनाकर मिशन को और फैलाया। उसने बार-बार पुर्तगाल के शासकों को पत्र लिखकर यहाँ ” कड़े धार्मिक कानून’ लागू करने की माँग की, ताकि जो लोग धर्मांतरण नहीं कर रहें उन पर दबाव बनाया जा सके। यही वह दौर था जब गोवा में संगठित तरीके से धर्मांतरण की प्रक्रिया तेज हुई और चर्च का प्रभाव लगातार बढ़ता चला गया।

‘सेंट’ जेवियर की हिंदू-घृणा और हिंदुओं पर अत्याचार

‘सेंट’ जेवियर पर मौजूदा लेख बताते हैं कि उन्हें हिंदू से इतनी घृणा थी कि वह उन्हें विधर्मी, काफिर तक कहकर संबोधित करते थे। वहीं ब्राह्मणों से उन्हें इतनी दिक्कत थी कि उन्हें वो ‘धोखेबाज और झूठा’ बताकर पेश करते थे ताकि समाज का विश्वास उनपर से उठ जाए। इसके अलावा वो ईसाई धर्म में लोगों को लाने के लिए ईसाई धर्म की खूबियों के अलावा ये बताते थे कि कैसे हिंदू और उनके देवी-देवता बुरे होते हैं।

फ्रांसिस के बारे में कहा जाता है कि उनके होते हुए गोवा में इतनी तेजी से धर्मांतरण की रफ्तार बढ़ी थी कि वो कई बार पूरे के पूरे गाँव को ईसाई बनवा देते थे। फिर हिंदू बच्चों को मंदिर में ले जाते थे और उनसे देवी-देवताओं को गाली देने को कहते थे, मूर्तियाँ तोड़ने, उनपर थूकने और उन्हें रौंदने के लिए कहते थे। साथ ही उन कलाकारों को भी धमकी दी जाती थी जो मूर्तियाँ बनाने का काम करते थे।

‘सेंट’ फ्रांसिस जेवियर ने गोवा पर जब पूरा कब्जा किया तो गैर इसाइयों के लिए स्थिति और बद्तर हो गई क्योंकि तब सत्ता ईसाई पादरियों के हाथ आ गई और हिंदू विरोधी कानून बनने शरू हुए। धर्मांतरण के लिए नृशंस यातनाएँ दी जाने लगी। हिंदू माता पिता के सामने बच्चों के अंग काटे जाने लगे। वहीं जो धर्मांतरण के लिए नहीं मानता था उसे सूली पर लटकाकर जलाना शुरू कर दिया गया।

इस तरह जेवियर के काल में धर्मांतरण को अंजाम दिया गया और आगे चल कर जब इतिहासकारों ने इस सच्चाई को लिखना चाहा तो उन्हें भी असहनीय यातनाएँ दी गईं। गोवा में एक ‘हाथकाटरो’ खंभ भी है। बताया जाता है कि ये हिंदुओं पर पुर्तगाली शासकों के बर्बरता का जीवंत साक्ष्य है। ईसाइयों द्वारा हिंदुओं को इससे बाँधकर उनके अंगों को तोड़ा जाता था।

अब ‘सेंट’ जेवियर का काल बीते कई सदी हो चुकी हैं। आज ईसाई समुदाय जो हमें उनके बारे में बताता है हम उसी को जानते हैं लेकिन अगर लोगों की सुनी सुनाई बातों से हटकर खुद समझना चाहते हैं कि ‘सेंट’ जेवियर हिंदुओं के लिए सोच क्या रखते थे तो एक पत्र में लिखी बात पढ़िए जो उन्होंने 1545 में कोचीन से लिखी थी

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

‘भाषा-कला-खाना-पहनावा… सब मुगलों की देन’: ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने यूँ किया इस्लामी आक्रांताओं का महिमामंडन, लोगों ने पूछा- बाबर से पहले देश में कुछ नहीं था क्या?

1992 की बॉलीवुड फिल्म ‘बेमिसाल’ के एक सीन में अमिताभ बच्चन ने कहा था, “कश्मीर को छोड़कर, भारत के सभी हिल स्टेशन अंग्रेजों ने खोजे थे, कश्मीर को मुगलों ने खोजा था।” यह बात उन्होंने राखी गुलजार यानी कविता से कही थी। उस वक्त कविता मुगल शासकों की ‘शानदार संगीत, चित्रकला और वास्तुकला’ के लिए तारीफ कर रही थीं और जोर दे रही थीं कि उनका कोई मुकाबला नहीं है। तब अमिताभ ने मजाकिया अंदाज में जवाब दिया कि उनकी सबसे बड़ी देन तो ‘मुगलाई खाना’ है।

यह क्लिप 2022 में फिर से सामने आई और वायरल हो गई। लोगों ने इस बात पर नाराजगी जताई कि फिल्म इंडस्ट्री किस तरह लगातार सच को तोड़-मरोड़कर पेश करती है, ताकि हमलावरों को महिमामंडित किया जा सके। वैसे भी यह हिंदू-विरोधी प्रोपेगेंडा के लिए बदनाम रही है।

अब 2026 की बात करें, तो ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने उस फिल्मी सीन को अपने तरीके से लिखा है। इसमें मुगल वंश को ‘भाषा, खान-पान, वास्तुकला, संगीत, कला और मिली-जुली संस्कृति’ का श्रेय दिया गया है। साथ ही, व्यंग्य करते हुए यह भी जोड़ा गया है कि इसी वंश की वजह से 2014 में भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई।

“What have the Mughals ever done for us?” शीर्षक वाला लेख 19 अप्रैल 2026 (रविवार) को प्रकाशित हुआ। इसके साथ यह टैगलाइन थी कि भारत के सबसे महान मुस्लिम साम्राज्य ने अपनी सबसे शक्तिशाली हिंदू पार्टी का निर्माण कैसे किया।

यह मुस्लिम शासकों का स्तुतिगान है, जो यह बताता है कि मुगलों ने भारत को समृद्ध बनाया। लेकिन, मुगलों के प्रभाव के बिना भी भारत की हजारों साल पुरानी ऐतिहासिक सभ्यता थी। यह दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है। इसकी अर्थव्यवस्था मजबूत थी। कला और विज्ञान के क्षेत्र में उपलब्धियाँ थीं। साहित्य में योगदान था और जिसकी एक समृद्ध सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत थी।

बाबर ने मुगल साम्राज्य की नींव रखी थी। वह परिवारिक झगड़ों और लड़ाइयों में बार-बार मिली हार के कारण अपने पैतृक घर फरगना (जो अब उज़्बेकिस्तान में है) से बेदखल हो गया। इसकी वजह से वह भारत की ओर रुख किया। उसे यहाँ की अपार धन-संपदा और संसाधनों ने आकर्षित किया था। वह इस्लामी आक्रमणकारी था।

इस्लामवादियों से लेकर श्वेत उपनिवेशवादियों तक— सभी भारत को लूटने आए थे। इसका शोषण करने आए थे। इसमें वे सफल भी रहे। आक्रमणकारी किसी भी तरह से यहाँ के मूल निवासियों का धर्म परिवर्तन करवाना चाहते थे। मुगलों का उद्देश्य भी कुछ ऐसा ही था।

मुगलों ने भारतीय सभ्यता को समृद्ध किया: एक हास्यास्पद तर्क

‘द इकोनॉमिस्ट’ पत्रिका के मुताबिक, “उन सभी में, मुगलों का शासन सबसे लंबे समय तक चला। 21 अप्रैल को पानीपत की पहली लड़ाई के ठीक 500 साल पूरे हो रहे हैं; यह वह समय था जब तैमूरलंग और चंगेज खान के मध्य एशियाई वंशज बाबर (इसीलिए ‘मुगल’, जो ‘मंगोल’ शब्द से बना है) ने दिल्ली के अंतिम सुल्तान को हराया था।

उसके द्वारा स्थापित साम्राज्य, अपने चरमोत्कर्ष पर, दुनिया के सबसे समृद्ध और शक्तिशाली साम्राज्यों में से एक था। इसके शासकों ने भारतीय राजशाही की रीतियों को अपनाया, स्थानीय लोगों से विवाह किए, और वास्तव में वे भारतीय ही बन गए (अंग्रेजों के विपरीत)। उनकी उपलब्धियाँ भारतीय ही हैं,”

मुगल साम्राज्य की धन-संपदा और सत्ता का स्रोत वह भारतीय भूभाग ही था, जिसे उन्होंने सदियों तक लूटा-खसोटा। उन्होंने देश की फलती-फूलती प्राचीन रीतियों और परंपराओं का लाभ उठाकर नई संरचनाएँ खड़ी कीं। इन संरचनाओं का निर्माण स्थानीय कारीगरों द्वारा केवल स्थानीय संसाधनों का उपयोग करके किया गया था। बाद में इन्हें ‘समन्वय के प्रतीक’ स्मारक के रूप में महिमामंडित किया गया।

वे अपनी लूटी हुई धन-संपत्ति को अपनी मूल मातृभूमि तक नहीं ले जा सके, क्योंकि उन्हें अपने ही सगे-संबंधियों द्वारा वहाँ से खदेड़ दिया गया था। बाबर ने वापस जाने के लिए कई प्रयास किए, लेकिन सफल नहीं हो पाया।

दरअसल वे भारत में किसी प्रेम या लगाव के कारण नहीं, बल्कि केवल मजबूरी के कारण रुके रहे। भारत के प्रति उनके तथाकथित प्रेम का एक और प्रमाण इस बात से मिलता है कि बाबर के पार्थिव अवशेषों को, उसकी इच्छानुसार काबुल ले जाकर दफनाया गया। वह उसी स्थान को अपना ‘घर’ मानता था।

वामपंथी-उदारवादी खेमा (लेफ्ट-लिबरल ब्रिगेड) आमतौर पर आक्रमणकारियों की निंदा का तो स्वागत करते हैं, लेकिन तब नहीं, जब वे अत्याचार भारत या हिंदुओं के विरुद्ध किए गए हों। ऐसे कृत्यों को नजरअंदाज कर दिया जाता है या उन्हें सही ठहराने जाता है। जैसा कि इस लेख (कॉलम) में देखा जा सकता है, उनका गुणगान किया जाता है।

इसी क्रम में, ‘द इकोनॉमिस्ट’ पत्रिका ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी मजाक उड़ाया। ऐसा उन्होंने इसलिए किया, क्योंकि प्रधानमंत्री ने भारत के उस इतिहास का जिक्र किया था, जिसमें भारत को विदेशी शक्तियों के अधीन रहना पड़ा।

इतिहासकारों ने माना कि मुगलों ने मंदिरों तोड़ा, साथ ही दावा किया कि इसे उनका अपमान नहीं माना जा सकता। ‘जजिया’ लगाना, हिंदुओं का नरसंहार और जबरदस्ती धर्म परिवर्तन, जिनका जिक्र इस्लामी शासकों ने खुद अपनी लेखनी में किया था, उन्हें उसने आसानी से नजरअंदाज कर दिया।

हालाँकि वह गुट जो छोटी-मोटी घटनाओं को मुस्लिम समुदाय के खिलाफ ‘उकसावा’ करार देता है, वह हिंदू धर्म के सबसे पवित्र स्थानों पर हुए हमलों को अपमान नहीं मानता। वह यह कहना चाहता है कि इसे आस्था पर हमला नहीं समझा जाना चाहिए। ध्यान दें तो हिंदू-विरोधी आचरण को सामान्य सी बात मानता है।

इसके बाद लेखक ने कहा, “उन्होंने भारत के पास जो कुछ भी था, सब ले लिया। साथ ही, यह विचारधारा पूछती है कि बदले में उन्होंने हमें क्या दिया?” फिर मुगलों का गुणगान करना शुरू कर देता है।

मुगलों के जरिए भारत का परिचय फारस से हुआ, जिन्होंने भारतीय भाषा में योगदान दिया- द इकोनॉमिस्ट

लेख में जोर देकर कहा गया, “उनके ऊपर दिए गए उद्धरण के मूल 28 शब्दों में से, एक-चौथाई शब्द फारसी के जरिए भारत में आए। यह बात मुस्लिम भारत के इतिहासकार रिचर्ड ईटन बताते हैं। मुगल दरबार की भाषा ने उत्तरी भारत की ज्यादातर भाषाओं को प्रभावित किया है। सच तो यह है कि हिंदी और हिंदू—दोनों ही ‘हिंद’ शब्द से आए हैं। यह उस नदी का फारसी नाम है, जिसे अंग्रेजी में ‘इंडस’ (और इस तरह ‘इंडिया’) कहा जाता है। लेकिन हिंदू राष्ट्रवाद में ‘हिंदू’ शब्द जोड़ने के अलावा, मुगलों ने हमारे लिए और क्या किया है?”

भारत में भाषाओं का सबसे विविध संग्रह मौजूद है, जो समय के साथ लगातार विकसित होता रहा है। भाषाएँ एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं और समय के साथ आगे बढ़ती हैं। इसी तरह हिंदी का फारसी के साथ इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार के एक ही पूर्वज है। हालाँकि हिन्दी की जड़ें संस्कृत में हैं। भाषाओं का यह जुड़ाव मुगलों के प्रभाव से ज्यादा, इन भाषाओं के मूल से संबंधित था।

अगर इसी तर्क को माना जाए, तो अंग्रेजी भाषा का श्रेय अंग्रेजों को दिया जाना चाहिए। लेकिन ऐसा करना गलत, भ्रामक और ऐतिहासिक रूप से गलत होगा। ठीक वैसे ही, जैसा कि मौजूदा तर्क है। इससे भी ज्यादा जरूरी बात यह है कि भाषा, कला और साहित्य के प्रसार के लिए दमन की जरूरत नहीं होती। कई देश बिना किसी की गुलामी किए भी विदेशी भाषाओं को अपना चुके हैं।

मुगलों ने भारतीय खान-पान और वास्तुकला में एक खास नजाकत जोड़ी- द इकोनॉमिस्ट

‘द इकोनॉमिस्ट’ ने मुगलों की तारीफ करते हुए उनके खान-पान पर जोर दिया। इन्हें अक्सर ‘मुगलाई’ कहा जाता है, इनमें तंदूरी व्यंजन और बिरयानी शामिल हैं।

“तंदूर—मिट्टी का एक ओवन जिससे परतदार नान और भुने हुए कबाब निकलते हैं— फारसी दुनिया से आया था। ठीक वैसे ही जैसे समोसे, शरबत, अलग-अलग तरह की मिठाइयाँ और बिरयानी आई थीं। बिरयानी पिछले दस सालों से लगातार डिलीवरी ऐप्स पर भारत में सबसे ज्यादा ऑर्डर की जाने वाली डिश रही है।

BJP का वह धड़ा, जो मौज-मस्ती का विरोधी है, वह मांस और अंडों को पसंद नहीं करता, लेकिन शाकाहारी लोग भी अच्छे तंदूरी पनीर का मजा लेते हैं। लेख में कहा गया है कि पनीर शब्द फारसी के ‘पनीर’ से आया है, जो एक तरह का चीज है और शायद अफगानों के जरिए भारत पहुँचा।

तंदूर का आविष्कार सिंधु घाटी और हड़प्पा सभ्यताओं में हुआ था। मध्य एशिया में बाबर के राज में चावल की खेती नहीं होती थी, जबकि बिरयानी का एक मुख्य हिस्सा चावल ही है। भारतीय उपमहाद्वीप मशहूर मसालों के लिए मशहूर रहा है। लेकिन यह विचार कि मसालों और मीट के साथ पकाया गया चावल एक बेहतरीन डिश बन सकता है, इसके लिए शायद मुगलों का ही शुक्रिया अदा करना होगा।

लेख के अनुसार, मुगलों के आने से पहले भारतीय लोग शायद संघर्ष कर रहे थे या बहुत ही साधारण भोजन पर निर्भर थे, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि उनके पास स्वादिष्ट व्यंजन बनाने का ज्ञान और महारत नहीं थी। इसके बाद भारतीय मजदूरों और संसाधनों से तैयार की गई भव्य परियोजनाओं के लिए मुगलों की तारीफ की गई।

लेख में बताया गया, “भारत के दस सबसे मशहूर ऐतिहासिक स्थलों में से चार (जिनके लिए टिकट लगता है), जिन्हें स्थानीय पर्यटक सबसे ज़्यादा पसंद करते हैं और विदेशियों की पसंद वाली सूची के छह स्थल मुगलों के ही बनवाए हुए हैं। इन दोनों सूचियों में ताजमहल सबसे ऊपर है। हर साल प्रधानमंत्री लाल किले से स्वतंत्रता दिवस का भाषण देते हैं। यह दिल्ली में स्थित एक मुगल स्मारक है और भारत की अपनी पहचान के लिए इतना अहम है कि यह हमारे सबसे आम नोट के पीछे भी छपा हुआ है।”

विडंबना यह है कि इन इमारतों का निर्माण उस समय हुआ था, जब आम भारतीय (ज्यादातर हिंदू) मुगलों की तानाशाही और बर्बरता को झेल रहे थे। ये इमारतें मुगलों की बेहद आलीशान जीवनशैली की प्रतीक हैं और इन्हें उनके समृद्ध साम्राज्य की शान दिखाने के लिए ही बनाया गया था।

इसके अलावा उनके पास इस धन-दौलत को मध्य एशिया ले जाने का कोई विकल्प नहीं था, इसलिए उन्होंने अपनी मर्जी के मुताबिक और अपने फायदे के लिए ही इस धन का इस्तेमाल किया।

बहरहाल, ये सभी ऐतिहासिक स्थल पूरी तरह से भारत की संपत्ति हैं। चुनी हुई सरकार का पूरा अधिकार है कि वह इनका इस्तेमाल मुद्रा (नोटों) पर छापने के लिए करे या किसी अन्य काम के लिए। फिर भी, इससे इन स्थलों से जुड़ा इतिहास या मुगलों की वह धूमिल विरासत मिट नहीं जाती। दिलचस्प बात यह है कि उर्दू की नींव संस्कृत और प्राकृत भाषाओं में है, फिर भी इस बात को खुलकर नहीं बताया जाता, क्योंकि ऐसा करने से मुस्लिम बादशाहों की बड़ाई करने वाले एजेंडे कमजोर पड़ जाएँगे।

शेरवानी, सितार और BJP की जबरदस्त बढ़त के लिए मुगल जिम्मेदार हैं- द इकोनॉमिस्ट

‘द इकोनॉमिस्ट’ ने शेरवानी और सितार को लेकर मुगलों की खूब तारीफ़ की। ये दोनों चीज़ें 16वीं और 18वीं सदी के बीच विकसित हुई थीं। इसने इतिहासकार जदुनाथ सरकार का हवाला देते हुए कहा, “मध्यकालीन भारत के लोकप्रिय धर्म सूफीवाद, उर्दू भाषा और कला—विजेताओं और पराजितों की साझा विरासत थे। इन्होंने इन दोनों को आपस में जोड़ने का काम किया।

लेख में अकबर के कथित ‘धर्मनिरपेक्षता’ के उस घिसे-पिटे और उबाऊ ढोंग का प्रचार किया, जिसने हिंदू महाकाव्यों का अनुवाद करवाया था। साथ ही, उस समुदाय के खिलाफ चलाए गए अपने हिंसक अभियानों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया। मानो यह महिमामंडन ही काफी न हो, इस लेख ने हिंदू मान्यताओं का उपहास उड़ाते हुए यह दावा भी कर दिया कि अगर राम जन्मभूमि पर ‘बाबरी मस्जिद’ न होती, तो ‘भगवा पार्टी’ (BJP) कभी सत्ता में नहीं आ पाती।

लेख में कहा गया, “1990 में, जब पार्टी के पास संसद में केवल 16% सीटें थीं, तब उसने एक राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू किया। इसमें रामजन्मभूमि स्थल पर एक मंदिर बनाने की माँग की गई। इसे रामायण के नायक भगवान राम का जन्मस्थान माना जाता है। उस जगह पर एक मस्जिद खड़ी थी, जिसे पहले मुगल बादशाह बाबर के शासनकाल में बनवाया गया था।”

इसमें कहा गया, “1992 में, BJP के अधिकारियों की मौजूदगी में एक भीड़ ने उस मस्जिद को ढहा दिया। इस घटना से पूरे देश में हिंसा की आग भड़क उठी, जिसने पार्टी के जनाधार को मजबूत किया और अंततः उसे सत्ता के शिखर तक पहुँचा दिया। 2024 की शुरुआत में, जब मोदी ने उस बहुप्रतीक्षित मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा की, तब तक उनकी पार्टी के पास 56% सीटें हो चुकी थीं। पिछले एक दशक में पार्टी ने मुगल-कालीन शहरों के नाम बदलने, मुगलई खान-पान को नकारने और इतिहास की किताबों से मुगलों का जिक्र मिटाने पर ही अपना सारा ध्यान केंद्रित कर रखा है।”

राम मंदिर हिंदू धर्म का मूल आधार है। इसे महज एक चुनावी हथकंडा बताकर उसकी गरिमा को कम करने की कोशिश की गई। ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि BJP ने इस मुद्दे का समर्थन किया था। इस मीडिया संस्थान ने बाबर को नायक के तौर पर दिखाया, जबकि वह मंदिरों को ढहाने वाला था। वहीं दूसरी ओर BJP को हिंदुओं के अधिकारों की पैरवी करने के कारण, एक खलनायक के तौर पर पेश किया गया।

लेख के आखिर में कहा गया, “ईंटों से बनी किसी इमारत को ढहा देना एक बात है, लेकिन उस संस्कृति को मिटाना कहीं ज्यादा मुश्किल है। यह पाँच सदियों से भी ज्यादा समय से भारत के खून और मिट्टी में रच-बस गई है। तो फिर उनके इस सवाल का सबसे अच्छा जवाब यही है कि मुगलों ने उनके लिए आखिर किया क्या है। उन्होंने राजनीतिक हिंदुत्व को उसका एक ऐसा ‘खलनायक’ दिया, जो हमेशा रहेगा और जिसके बिना उसका काम नहीं चल सकता।”

इंटरनेट यूजर्स ने जताई हैरानी

एक यूज़र ने इस पर टिप्पणी करते हुए लेक को बेतुका करार दिया। उसने लिखा “यह कहना कि मुगलों की वजह से ही नरेंद्र मोदी की पार्टी सत्ता में आई, कुछ-कुछ ऐसा ही है जैसे यह कहना कि हिटलर और नाजियों ने ही इजरायल देश बनाया था,”

वरुण ने मीडिया प्लेटफॉर्म से कहा कि वे अपने दायरे को केवल कला या संगीत तक ही सीमित न रखें, बल्कि सूर्य, चंद्रमा और हिमालय की रचना के लिए मुगलों का भी गुणगान करें।

‘द इकोनॉमिस्ट’ भी दूसरी मुख्यधारा के मीडिया संस्थानों की तरह ही ऐसी कहानियाँ गढ़ने में माहिर है, जो भारत की उपलब्धियों का श्रेय विदेशियों को देती हैं। चाहे वे अतीत से जुड़ी हों या वर्तमान से। दरअसल ये भारतीय हिन्दू समाज की उपलब्धियों को नकारने का तरीका है।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

‘मैं मंदिर ले जाने के पैसे नहीं लेता’ कहकर रिक्शा चालक जुबैर ने फँसाया, घर में घुसकर किया रेप: पढ़िए राजकोट की हिंदू पीड़िता की आपबीती

गुजरात के राजकोट में एक हिंदू महिला के साथ रेप के आरोप में रिक्शा चालक जुबैर कुरैशी को गिरफ्तार किया गया है। 25 मार्च 2026 को दर्ज इस मामले की पीड़िता हाल ही में सामने आई और मीडिया के सामने अपनी आपबीती सुनाई। उसने बताया कि किस तरह जुबैर ने उसके साथ जबरदस्ती की और उस पर धर्मांतरण का दबाव भी बनाया।

पीड़िता और उनकी मदद करने वाले विश्व हिंदू परिषद के नेताओं का कहना है कि आरोपित खुद को आम आदमी पार्टी का कार्यकर्ता बताता था। महिला ने बताया कि चार साल पहले उन्होंने मंदिर जाने के लिए एक रिक्शा लिया था। उस समय जुबैर ने कहा था कि वह मंदिर जाने के पैसे नहीं लेता और इसी बहाने उसने महिला से संपर्क बढ़ाने की कोशिश की।

घर का पता जानने के बाद वह उसके घर आने लगा। महिला का आरोप है कि इसके बाद जुबैर कुरैशी बार-बार जबरदस्ती घर में घुसता और उसका शारीरिक शोषण करता था। वह किसी को नहीं बताने के लिए कहता और धमकी देता था कि फोटो-वीडियो वायरल कर देगा। पीड़िता ने आगे बताया कि जुबैर ने उसका बाहर निकलना और जीना मुश्किल कर दिया था।

एक बार महिला ने पुलिस में शिकायत भी की, लेकिन पुलिस ने मामला दर्ज करने के बजाय जुबैर को समझाकर छोड़ दिया। कोई सख्त कार्रवाई नहीं होने की वजह से उसने फिर से परेशान करना शुरू कर दिया। महिला का आरोप है कि जुबैर उसे एक दरगाह पर भी ले गया था, जहाँ ताबीज पहनाने की कोशिश की गई। उसने धर्मांतरण के लिए भी दबाव बनाया।

पीड़िता का कहना है कि जुबैर की वजह से वह कोई हिंदू त्योहार भी नहीं मना पाती थीं। उसने आरोपित के परिवार से संपर्क करने की कोशिश भी की, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।

मैं आम आदमी पार्टी से हूँ, मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता: पीड़िता को धमकाता था जुबैर

महिला ने आरोप लगाया कि जुबैर धमकी देते हुए कहता था, “मैं आम आदमी पार्टी का आदमी हूँ, मेरा कोई कुछ नहीं कर सकता।” इसी वजह से शिकायत करने के बावजूद पुलिस ने कार्रवाई नहीं की। उसने बताया कि आरोपित के डर से उन्हें 3-4 बार घर बदलना पड़ा और सिम कार्ड भी बदलने पड़े, लेकिन हालात में कोई खास बदलाव नहीं आया।

आखिरकार पीड़िता ने सूरत के बजरंग दल से संपर्क किया, जहाँ से उसे राजकोट विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं से जोड़ा गया। VHP के कार्यकर्ता उसे लेकर कमिश्नर ऑफिस पहुँचे और वहाँ शिकायत दर्ज कराई। कमिश्नर के आदेश के बाद ही जुबैर के खिलाफ मामला दर्ज हुआ।

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान विश्व हिंदू परिषद के धर्म प्रसार विभाग के केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र भावाणी ने बताया कि महिला के साथ न सिर्फ शारीरिक शोषण हुआ, बल्कि मारपीट भी की जाती थी। उन्होंने कहा कि आरोपित जुबैर खुद को आम आदमी पार्टी का बताकर महिला को डराता था और कहता था कि पुलिस भी उसकी जेब में है, इसलिए कोई उसकी शिकायत नहीं सुनेगा।

VHP के पदाधिकारियों का कहना है कि पीड़िता ने कई बार पुलिस में शिकायत की, लेकिन आरोपी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। बाद में महिला ने सोशल मीडिया के जरिए विश्व हिंदू परिषद से संपर्क किया, जिसके बाद उनकी टीम पुलिस के पास पहुँची और शिकायत दर्ज कराने में मदद की।

गौरतलब है कि VHP की मदद से FIR दर्ज होने के बाद आजीडेम पुलिस ने आरोपित जुबैर के खिलाफ BNS की धारा 64(2)(m), 115(2) और 351(2) के तहत मामला दर्ज कर उसे गिरफ्तार किया है। फिलहाल आरोपित जेल में है। उसने सेशंस कोर्ट में जमानत की अर्जी दी थी, लेकिन कोर्ट ने उसे खारिज कर दिया।

मूल रुप से यह रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

पहले IRS अधिकारी के यहाँ था नौकर, काम छूटा तो बेटी का रेप-हत्या करके भागा: जानिए कैसे 4 श्रेणी की सुरक्षा को चकमा देकर ली थी एंट्री, कितनी मशक्कत के बाद पुलिस ने पकड़ा

दिल्ली की पॉश अमर कॉलोनी में इंडियन रेवन्यू सर्विस (IRS) अफसर की 22 साल की बेटी से रेप के बाद हत्या के सनसनीखेज मामले में बड़ा खुलासा हुआ है। इस गंभीर मामले में पुलिस ने राजस्थान के रहने वाले 23 साल के आरोपित राहुल मीणा को द्वारका के एक होटल से गिरफ्तार कर लिया है। जाँच में सामने आया है कि आरोपित पहले इस घर में नौकर के रूप में काम कर चुका था।

यही वजह है कि उसकों घर के हर कोने के बारे में जानकारी थी, इसीलिए वह उच्चाधिकारी के घर में चार श्रेणी की सुरक्षा को पार कर घर में घुसा और उनकी बेटी के साथ रेप किया। बाद में हत्या कर दी।

घर में 4 श्रेणी की सुरक्षा, फिर भी कैसे घुसा आरोपित नौकर?

जिस घर में घटना हुई, वह किसी आम इंसान का घर नहीं था बल्कि वह IRS अफसर का था। जहाँ कड़ी सुरक्षा व्यवस्था थी। हर फ्लोर और लिफ्ट पर लॉक लगे थे और पूरे परिसर में CCTV निगरानी थी। पीड़िता तक पहुँचने के लिए कम से कम चार लॉक खोलने पड़ते, जिनमें तीन में पासकोड लगा था। पुलिस को शक है कि राहुल को इन पासकोड की पहले से जानकारी थी। उसे यह भी पता था कि स्पेयर चाबियाँ कहाँ रखी जाती हैं।

इसी जानकारी के आधार पर वह घर में बड़ी आसानी से घुसा और किसी को शक भी नहीं हुआ। CCTV फुटेज के अनुसार आरोपित नौकर सुबह करीब 6 बजकर 28 मिनट पर पीले रंग की शर्ट और काले पैंट में सोसायटी के भीतर आता दिख रहा है, जबकि करीब एक घंटे बाद वह बदले हुए कपड़ों में बाहर निकलता नजर आ रहा है। पुलिस का मानना है कि उसने वारदात के बाद कपड़े बदलकर भागने की कोशिश की।

नौकर ने पहले रेप किया, फिर हत्या कर हुआ फरार

पुलिस के मुताबिक, घटना के वक्त पीड़िता घर में अकेली थी। सुबह के समय उसके माता-पिता जिम गए हुए थे, जब वह 2 घंटे बाद 8 बजे लौटे तो बेटी को खून से लथपथ हालत में देखा। शुरुआती जाँच में सामने आया कि आरोपित नौकर राहुल ने पहले पीड़िता के साथ रेप किया और फिर मोबाइल चार्जिंग केबल से गला घोंटकर हत्या कर दी। पुलिस ने बताया कि पीड़िता के कपड़े भी फटे हुए थे। हालाँकि, फिलहाल पीड़िता की मेडिकल जाँच सामने नहीं आई है।

घटनास्थल पर सामान बिखरा हुआ मिला, जिससे लूटपाट की भी आशंका जताई जा रही है। पुलिस ने कुछ सामान बरामद कर लिया है। बताया जा रहा है कि आरोपित ऑनलाइन गेमिंग की लत के कारण कर्ज में डूबा हुआ था, जिसके चलते उसने इश वारदात को अंजाम दिया।

IRS अफसर की बेटी से पहले अलवर में महिला से किया रेप

जाँच में यह भी सामने आया है कि आरोपित राहुल ने दिल्ली आने से कुछ घंटे पहले राजस्थान के अलवर में एक महिला के साथ दुष्कर्म किया था। जिसके बाद पुलिस ने आरोपित के चाचा को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया। उन्होंने बताया कि घटना से पहले राहुल ने उन्हें तीन मोबाइल फोन दिए थे, जिन्हें उसने एक स्थानीय दुकान पर बेच दिया था।

पुलिस ने उन तीनों फोन को दुकान से बरामद कर लिया। इनमें से एक फोन राहुल का था। अपने सभी फोन बेचने के बाद फरार राहुल ने एक मोबाइल भी चोरी किया था।
स्थानीय पुलिस ने दिल्ली पुलिस को बताया कि राहुल मंगलवार (21 अप्रैल 2026) को अपने एक दोस्त के साथ राजस्थान के अलवर में एक शादी में गया था।

शादी के दौरान उसने दोस्त से कहा कि उसे जरूरी पारिवारिक काम के लिए जाना है। इसके बाद वह दोस्त के घर वापस गया, जहाँ उसने दोस्त की पत्नी के साथ रेप किया और जाते समय चार्जिंग पर लगा एक डूअल सिम मोबाइल फोन भी चुरा लिया।

जाँच में सामने आया कि राहुल ने चोरी किए गए फोन के एक सिम की कॉलिंग सर्विस बंद कर दी थी, लेकिन दूसरे सिम के जरिए इंटरनेट चला रहा था। पुलिस ने दोनों सिम कार्ड्स के इंटरनेट प्रोटोकॉल डिटेल रिकॉर्ड निकाले, जिससे पता चला कि वह WiFi नेटवर्क के जरिए इंटरनेट इस्तेमाल कर रहा था।

आरोपित राहुल की कैसे हुई गिरफ्तारी?

रिकॉर्ड्स से यह भी पता चला कि वह गुरुग्राम में रहने वाले अपने किसी भाई से लगातार संपर्क में था, लेकिन कॉल की बजाय इंस्टाग्राम मैसेंजर के जरिए बात कर रहा था। यही सावधानी आखिरकार उसकी गिरफ्तारी की वजह बनी। इस सुराग के आधार पर पुलिस ने पहले उसके भाई को हिरासत में लिया और फिर तकनीकी सर्विलांस के जरिए राहुल की लोकेशन ट्रेस की।

वह द्वारका के एक होटल में सुबह 10 बजे से रुका हुआ था। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि घटना वाले दिन सुबह साउथ दिल्ली आने के लिए राहुल ने राजगढ़ के एक निजी अस्पताल में एंबुलेंस के रूप में इस्तेमाल होने वाली ईको वैन को किराए पर लिया था।

दिल्ली पहुँचने के बाद उसने ड्राइवर से घर ढूँढने के बहाने गाड़ी रुकवाई और बिना किराया दिए वहाँ से निकल गया। इसके बाद वह पैदल पीड़िता के घर तक पहुँचा था।