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ITBP को जमीन देने के खिलाफ HC पहुँचा वक्फ बोर्ड, नहीं मिली राहत: 123 संपत्तियों में कब्रिस्तान भी, केंद्र को नोटिस जारी

मुस्लिमों के लिए काम करने वाले दिल्ली वक्फ बोर्ड ने केंद्र सरकार द्वारा कथित तौर पर उसकी 123 संपत्तियों को भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) को देने के फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी, लेकिन कोर्ट ने बुधवार (9 मार्च 2022) को वक्फ बोर्ड को राहत देने से इनकार कर दिया। इस्लामिक बॉडी ने जिन संपत्तियों को वापस पाने के लिए कोर्ट का रुख किया था, उसमें कदीम नाम का एक कब्रिस्तान भी शामिल है।

इस कब्रिस्तान को केंद्र सरकार ने (ITBP) को दे दिया है। मामले की सुनवाई दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा की बेंच ने की। उन्होंने केंद्र सरकार के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर वक्फ बोर्ड के मंसूबों पर पानी फेर दिया। जस्टिस वर्मा ने कहा, “मैं फिलहाल स्टे देने के लिए इच्छुक नहीं हूँ। ये भी नहीं है कि ये संपत्ति निजी लोगों के पास गई है। हम भारत संघ से इसे वापस सौंपने के लिए कह सकते हैं।” बहरहाल अब कोर्ट ने केंद्र सरकार और आईटीबीपी को नोटिस जारी कर इस मामले में जबाव तलब किया है। मामले की अगली सुनवाई 28 अप्रैल 2022 को लिस्टेड है।

मामले की टाइमलाइन

गौरतलब है कि ये मामले 8 साल पुराना साल 2014 का है, जब केंद्र सरकार ने भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया के जरिए 123 संपत्तियों को गैर-अधिसूचित करने के लिए भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्वास अधिनियम 2013 में उचित मुआवजे और पारदर्शिता के अधिकार के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग किया। इन प्रॉपर्टीज को वक्फ बोर्ड को दिया जाना था। हालाँकि, बाद में इंद्रप्रस्थ विश्व हिंदू परिषद सरकार की अधिसूचना को चुनौती दी, जिसके बाद दिल्ली की एक अदालत ने लाभार्थियों की शिकायतों की सुनवाई करने और फैसला देने के लिए एक आदेश जारी किया।

इसके बाद 2016 में केंद्र सरकार ने इस मामले के लिए एक सदस्यी कमेटी का गठन किया। सालभर बाद समिति ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी। इसी साल 10 फरवरी 2022 को दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि बिना किसी विवाद के कदीम कब्रिस्तान को 2017 में आईटीबीपी को सौंप दिया गया था।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, “वक्फ बोर्ड ने पहले अदालत को बताया कि उसे 2017 में एक अलग मामले में संपत्ति के आईटीबीपी को सौंपे जाने की जानकारी मिली। इसके आवेदन ने कब्रिस्तान में किसी भी गतिविधि पर रोक लगाने की माँग की गई थी।”

इन 123 संपत्तियों का फैसला करने के लिए साल 2018 में केंद्र सरकार एक बार फिर से दो सदस्यीय कमेटी गठित की। इस पर वक्फ बोर्ड ने केंद्र सरकार पर मनमाने ढंग से काम करने का आरोप लगाया और कहा कि एक सदस्यीय समिति की रिपोर्ट को कभी सार्वजनिक नहीं किया गया। इस पर दिल्ली हाई कोर्ट में केंद्र सरकार ने दलील दी कि एक सदस्यीय रिपोर्ट निर्णायक नहीं होने के कारण दो सदस्यीय कमेटी गठित की गई थी। लेकिन उस रिपोर्ट को वक्फ के साथ साझा करने से मना कर दिया।

इसी क्रम में पिछले साल नवंबर 2021 में दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) ने एख पब्लिक नोटिस जारी कर विवादित संपत्तियों के मामले में सार्वजनिक प्रतिनिधित्व की माँग की।

कब्रिस्तान वापस लेने की फिराक में दिल्ली वक्फ बोर्ड

जिन 123 संपत्तियों को केंद्र सरकार ने आईटीबीपी को सौंप दिया है, उस पर दिल्ली वक्फ बोर्ड अपना दावा करता है। उसका कहना है कि कथित तौर पर ये संपत्तियाँ उसकी हैं और भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्वास अधिनियम 2013 में उचित मुआवजे और पारदर्शिता का अधिकार वापसी के आदेश को वापस लेने का कोई प्रावधान नहीं है।

वक्फ बोर्ड का कहना है कि वक्फ से जुड़ी किसी भी संपत्ति के विवाद को वक्फ एक्ट 1995 के तहत केवल वक्फ ट्रिब्यूनल ही तय कर सकता है। वक्फ ने निष्कर्ष निकाला, “संपत्तियों ने अपनी वक्फ की पात्रता को कभी नहीं छोड़ा और ये हमेशा से वक्फ एक्ट-1995 के प्रवाधानों के तरहत संचालित होता है, जो इसे अलग होने से रोकता है।”

दिल्ली वक्फ बोर्ड का आऱोप है, “ऐसा कुछ भी नहीं है जो हाल ही में नियुक्त दो सदस्यों की समिति वक्फ संपत्तियों के संबंध में कर सकती है। एक सदस्य समिति के समक्ष मामले को विचाराधीन रखते हुए और उसके बाद हाल ही में नियुक्त दो सदस्यों की समिति भारत सरकार ने उन 123 वक्फ संपत्तियों में से एक को स्थानांतरित कर दिया है। जिसे हस्तांतरित किया गया है वो क़ब्रिस्तान क़दीम, खसरा नंबर 484, साउथ इंद्रप्रस्थ, मथुरा रोड, दिल्ली में आईटीबीपी को दी गई है।

‘रलिव गलिव चलिव’… जब भारतीय महिलाओं को गुलाम बना कर कश्मीर को Pak बनाना चाहते थे आतंकी, अब्दुल्ला-कॉन्ग्रेस की थी सरकार

“असि गछि पाकिस्तान, बटव रोअस त बटनेव सान” – मतलब “हमें पाकिस्तान चाहिए और हिंदू महिलाएँ भी लेकिन अपने मर्दों के बग़ैर।” ये उन नारों में से एक है जो 90 के दशक में कश्मीर घाटी में गूँज रहा था। ये वो दौर था जब रोज़ घाटी के मस्जिदों से हिंदुओं व अन्य ग़ैर-मुस्लिमों के ख़िलाफ़ मौत का फ़रमान जारी होता था। 16-17 साल के कश्मीरी मुस्लिम बड़े शौक़ से हथियार उठा रहे थे। उनके लिए आतंकवादी बनना बड़े फ़ख्र की बात थी।

आज़ादी और जेहाद के नाम पर हिंदुओं, उनके बच्चों का कत्ल और महिलाओं का रोज़ बलात्कार हो रहा था। उस वक्त जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस और कॉन्ग्रेस के गठबंधन की सरकार थी, लेकिन हुकूमत चल रही थी आतंकवादियों और अलगाववादियों की। मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला और कॉन्ग्रेस की केंद्र सरकार ने अपनी आँखों पर पट्टी बाँध रखी थी। मीडिया के नाम पर घाटी के लोग पाकिस्तान का PTV देख रहे थे।

14 सितम्बर, 1989 को कश्मीरी पंडितों के सबसे बड़े नेता माने जाने वाले पंडित टीका लाल टपलू को श्रीनगर में सरेआम गोलियों से भून दिया जाता है। उनका दोष सिर्फ इतना था की वो हिंदू थे। हत्या से ठीक 2 दिन पहले उनके घर पर हमला भी किया गया था। ये घाटी के हिंदुओं को ख़त्म करने की शुरुआत थी। इसके बाद मानो हत्याओं का सिलसिला चल पड़ा। लगभग चार महीने बाद 4 जनवरी।, 1990 को श्रीनगर के एक उर्दू अख़बार में हिज़बुल मुजाहिद्दीन का एक बयान छपता है जिसमें हिंदुओं को घाटी छोड़ने के लिए कहा जाता है।

सार्वजनिक तौर पर हिंदुओं के ख़िलाफ़ भड़काऊ भाषणों की भरमार थी। कश्मीर घाटी में हर तरफ़ ख़ौफ़ का माहौल था और हिंदुओं के ख़िलाफ़ तबीयत से ज़हर उगला जा रहा था। 18 जनवरी, 1990 को फारूक अब्दुल्ला के इस्तीफ़ा देते ही रातों-रात हिंदुओं के घरों पर धमकी भरे पोस्टर चिपका दिए गए। हिंदुओं के घरों पर लाल घेरे बनाए गए ताकि उनकी पहचान हो सके। उनके घर की दीवारों पर लिख दिया गया – “कश्मीर छोड़ दो, नहीं तो मार दिए जाओगे।”

पूरी कश्मीर घाटी में हिंदुओं के ख़िलाफ़ भड़काऊ केसेट्स तक बाँटे गए। “रलिव गलिव चलिव” का नारा दिया गया, जिसका मतलब है या तो इस्लाम अपना के हमारे साथ मिल जाओ, या मरो या फिर भाग जाओ। ये कश्मीरी हिंदुओं के लिए सीधी धमकी थी। अगले ही दिन 19 जनवरी, 1990 को कश्मीर के इतिहास का सबसे काला अध्याय लिखा गया। सैकड़ों कश्मीरी मुस्लिम पाकिस्तान ज़िंदाबाद चिल्लाते हुए हाथों में AK-47 ले के सड़कों पर उतर आए।

“कश्‍मीर में अगर रहना है, अल्‍लाहू अकबर कहना है” और “यहां क्‍या चलेगा, निज़ाम-ए-मुस्तफा” जैसे इस्लामी नारों से पूरा कश्मीर गूँज रहा था। दिन-दहाड़े हिंदुओं को उनके घरों में घुस के मारा गया। महिलाओं का बलात्कार किया गया। छोटे मासूम बच्चों तक को नहीं छोड़ा गया। ये नरसंहार सिर्फ कश्मीर तक सीमित नहीं था, श्रीनगर में भी हिंदुओं को उनके घरों में घुस के मारा गया। सिर्फ एक रात में ही 60,000 से ज़्यादा हिंदुओं ने पलायन किया। माना जाता है कि वास्तविक आँकडे इससे कहीं ज़्यादा हैं।

कश्‍मीरी पंडित संघर्ष समिति के आंकड़ों की माने तो जनवरी 1990 में कश्मीर में हिंदुओं के 75,343 परिवार थे। 1992 तक लगभग 70,000 से ज़्यादा परिवार इस्लामी आतंकवाद की वजह से घाटी से पलायन कर गए। वर्तमान में कश्मीर में लगभग 800 हिंदू परिवार ही बचे हैं। 1941 में कश्मीरी पंडितों की संख्या 10 लाख के आसपास थी जो की कुल आबादी का 15 प्रतिशत था। ये संख्या 1991 में घट कर 9000 यानी सिर्फ 0.1 प्रतिशत रह जाती है।

ये घटनाएँ और आँकडें यह बताने के लिए काफ़ी हैं की कश्मीर में इस्लामिक कट्टरपंथियों ने संगठित तरीक़े से हिंदुओं का नरसंहार किया है। फ़िल्म निर्माता विवेक अग्निहोत्री ने ‘द कश्मीर फ़ाइल्स’ में कहानी नहीं बल्कि कश्मीरी हिंदुओं की उस सच्चाई को दिखाया है जिसको इतिहास ने हमेशा दबा के रखा। ये फ़िल्म नहीं बल्कि कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार और पलायन का जीता जागता दस्तावेज़ है। फ़िल्म में दिखाई गई घटनाएँ सीन दर सीन सच्चाई को बयाँ करती हैं और हमारे सामने कई गम्भीर सवाल खड़े करती हैं।

आख़िर क्या कारण था की उस समय पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद अपने चरम पे था? क्यूँ घाटी में हिंदुओं की दिन-दहाड़े हो रही हत्याओं को जम्मू-कश्मीर और केंद्र की कोंग्रेस सरकारें चुपचाप देखती रहीं? क्यों मस्जिदों से अज़ान की बजाए हिंदुओं को मारने के फ़रमान सुनाई देते थे? आखिर कैसे इतनी आसानी से घाटी के कश्मीरी मुस्लिमों को जिहाद और आज़ादी के नाम पर AK-47 जैसे अत्याधुनिक हथियार मिल रहे थे?

क्यों फारूक अब्दुल्ला के इस्तीफ़ा देने के अगले दिन ही सैंकड़ों हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया गया? क्यों टीका लाल टपलु और उनके जैसे सैंकड़ों हिंदुओं के क़ातिलों पर मुक़दमे नहीं चलाए गए? क्यों जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ़्रंट जैसे आतंकी संगठन को साफ़ नहीं किया गया? क्यों यासीन मालिक जैसे आतंकियों को सज़ा नहीं दी गई? और आखिर क्यों कभी किसी सरकार ने कश्मीरी हिंदुओं की पुनर्स्थापना के लिए कुछ नहीं किया? इंसाफ़ की इस लड़ाई को लड़ते हुए 32 साल बीत चुके हैं और आज भी लाखों कश्मीरी हिंदू अपने घरों में जाने का इंतज़ार कर रहे हैं और सैंकड़ों इसी इंतज़ार में इस दुनिया को अलविदा कह चुके हैं।

मोहम्मद साजिद से झाड़-फूँक करवाने गई तो फोन पर होने लगी बातें… पति राकेश पटेल ने रोका तो सुनीता ने करा दी हत्या

UP के प्रतापगढ़ जिले में राकेश कुमार पटेल नाम के व्यक्ति की हत्या में पुलिस ने मोहम्मद साजिद उर्फ़ छोटे को गिरफ्तार किया है। इस कत्ल की मुख्य सूत्रधार मृतक की पत्नी है, जो मोहम्मद साजिद से फोन पर बात किया करती थी। मृतक द्वारा अपनी पत्नी को इसके लिए रोकना ही हत्या की वजह बनी। कत्ल में मृतक की पत्नी और मोहम्मद साजिद का साथ देने वाले एक अन्य आरोपित सदाशिव सरोज को भी पुलिस ने गिरफ्तार किया है। प्रतापगढ़ पुलिस ने यह जानकारी 12 मार्च (शनिवार) को दी।

प्रतापगढ़ पुलिस के मुताबिक, “9 मार्च को थाना संग्रामगढ़ के गाँव पीथनपुर में नाले के पास एक व्यक्ति की लाश मिली थी। बाद में उसकी पहचान लगभग 32 साल के राकेश पटेल के रूप में हुई। वह गाँव महुआ रोकैयापुर का रहने वाला था। मृतक के चचेरे भाई विनोद कुमार पटेल ने इसकी शिकायत पुलिस में दर्ज करवाई। पुलिस ने अज्ञात लोगों पर केस दर्ज करके जाँच शुरू कर दी।

जाँच के दौरान पुलिस को मृतक की पत्नी सुनीता पर शक हुआ और उसकी कॉल रिकॉर्ड खंगाली। इसके बाद पुलिस ने सुनीता को हिरासत में लेकर पूछताछ की तो उसने अपना अपराध स्वीकार कर लिया। उसने पुलिस को बताया, “मेरे पति अक्सर मुझ से मारपीट करते थे। इस बीच मैं झाड़-फूँक करने वाले मोहम्मद साजिद से मिली थी। इसके बाद फोन पर मोहम्मद साजिद से मेरी बात होने लगी। मेरे पति को यह बात बुरी लगती थी। उन्होंने इसके लिए भी मुझे मारा पीटा। मैंने साजिद को सारी बात बताई। आखिरकार हम सबने मिलकर अपने पति की हत्या की प्लानिंग तैयार की।”

सुनीता के बयान के बाद पुलिस ने झाड़-फूँक करने वाले मोहम्मद साजिद को गिरफ्तार कर लिया। मोहम्मद साजिद ने इस पूरी घटना में अपने साथ सदाशिव सरोज का भी शामिल होना बताया। आरोपित के बयान के बाद पुलिस ने सदाशिव सरोज को भी गिरफ्तार कर लिया है।

साजिद ने पुलिस को बताया, “मृतक राकेश की पत्नी सुनीता के कहने पर ही हमने ऐसा किया। योजना के मुताबिक 8 मार्च को हमने रात में राकेश को पीथनपुर नाले के पास घेर लिया, फिर खेतों में ले जाकर मोटे डंडे से पीट-पीट कर उसकी हत्या कर दी। बाद में उसकी लाश वहीं छोड़ कर चले आए।” इसके बाद साजिद ने मृतक के जेब से मोबाइल निकालकर उसकी पत्नी को फोन भी किया और हत्या की जानकारी दी।

पुलिस समझ रही थी महिला, लेकिन बुर्के में से निकला सोहैल: लड़कियों से करता था छेड़खानी, थाने में भी नहीं हटा रहा था बुर्का

उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में पुलिस ने बुर्का पहन कर लड़कियों को छेड़ने वाले एक आरोपित सुहैल को गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक, सुहैल 2-3 दिनों से ये हरकत कर रहा था। घटना के दिन वो बस में बुर्का पहन कर बैठा था। तब लोगों ने एतराज किया था। घटना 12 मार्च, 2022 (शनिवार) की है।

बुर्का पहन कर पकड़े गए सुहैल की वीडियो भी सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रही है। वीडियो में देखा जा सकता है कि सुहैल को कुछ लोगों ने कुर्सी पर बिठा रखा है। हिजाब हटाए जाने के बाद उसके सिर पर टोपी दिखाई दे रही है। कुछ लोग उसको गालियाँ दे रहे हैं। वो अपने मुँह को बार-बार छिपाने की कोशिश कर रहा है।

पुलिस के मुताबिक, सुहैल बिजनौर के थानाक्षेत्र नजीबाबाद में आने वाले मोहल्ला पठानपुरा का निवासी है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पकड़े जाने के बाद भी पुलिस तुरंत ये नहीं जान पाई कि बुर्के में कोई पुरुष है। वो सुहैल को काफी देर तक लड़की ही समझती रही। इसके ही चलते महिला पुलिस बुलानी पड़ी। बाद में जब सुहैल को पुलिस स्टेशन ले जाया गया।

थाने में भी सुहैल बुर्का हटाने के लिए तैयार नहीं था। पुलिस की सख्ती के बाद उसने बुर्का उतारा। पुलिस यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही है कि वो कब से ऐसी हरकत कर रहा था। साथ ही इसके पीछे उसकी असल मंशा क्या थी। पुलिस के मुताबिक, सुहैल बिजनौर के थानाक्षेत्र नजीबाबाद में आने वाले मोहल्ला पठानपुरा का निवासी है।

रूस से लड़ने के लिए यूक्रेन की पैरामिलिट्री में शामिल हुआ इंजीनियरिंग का छात्र… अब पिता ने भारत सरकार से जताई सुरक्षित वापसी की उम्मीद

रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान यूक्रेन की पैरामिलिट्री में शामिल हो कर रूस के खिलाफ लड़ने निकले भारतीय छात्र सैनिकेश रविचंद्रन (Sainikesh Ravichandran) अब भारत वापस लौटना चाहते हैं। इस बात की जानकारी सैनिकेश के पिता रविचंद्रन ने शनिवार (12 मार्च) को दी। उन्होंने भारत सरकार से आशा जताई है कि वो उनके बेटे को सुरक्षित वापस ले आएगी। सैनिकेश ने पिछ्ले माह फरवरी में यूक्रेन के सशत्र बल को ज्वाइन कर लिया था।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक सैनिकेश के 52 वर्षीय पिता रविचंद्रन ने कहा, “मेरी 3 दिन पहले ही बेटे से बात हुई है। वो भारत वापस लौटने को राजी था। सरकार हमारे सम्पर्क में है। यूक्रेन में भारतीय दूतावास से आशा करते हैं कि वो मेरे बेटे को जल्द ही खोज लेंगे और सरकार उसे सुरक्षित वापस ले आएगी। पिछले 3 दिन से मेरा सम्पर्क बेटे से नहीं हो पाया है। मीडिया में आने वाली रिपोर्ट उसकी वापसी में बाधा नहीं बन सकती।”

वहीं एक पुलिस अधिकारी का कहना है, ‘सैनिकेश के पिता ने अपने बेटे से वापस आने के लिए कहा था। लेकिन उसने ठीक से जवाब नहीं दिया। जब लड़ाई शुरू हुई थी तब उन्होंने यूक्रेन में भारत के दूतावास को सम्पर्क नहीं किया था। अब युद्ध चल रहा है। उनके बेटे को युद्ध क्षेत्र से खोज कर लाना आसान काम नहीं है।”

बताते चलें कि सैनिकेश फ़िलहाल यूक्रेन की पैरामिलिट्री वालेंटियर विंग जॉर्जियन नेशनल लीगियन में भर्ती हुए हैं। उनको लंबाई कम होने के चलते 2 बार प्रयासों के बाद भी भारतीय सेना में शामिल होने का मौका नहीं मिला था। सैनिकेश मूल रूप से इंजीनियरिंग के छात्र हैं। उनका परिवार तमिलनाडु के कोयंबटूर में रहता है।

‘हमने पिच तैयार की, लेकिन UP चुनाव में विपक्षी दलों ने अच्छी गेंदबाजी नहीं की’: योगेंद्र यादव ने कहा – किसान आंदोलन था चुनावी स्टंट

पाँचों राज्य में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे सामने आ चुके हैं। गुरुवार (10 मार्च 2022) को मतगणना के दौरान सभी चैनलों की तरह NDTV ने भी इससे संबंधित शो किया। इसके होस्ट थे- रवीश कुमार और इसमें चर्चा करने के लिए योगेंद्र यादव और कई मुद्दा आधारित भाड़े के ऐक्टिविस्ट को बुलाया गया था। 

अब इस प्रोग्राम का एक छोटा सा हिस्सा (Snippet) सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इसमें योगेंद्र यादव को यह कबूल करते हुए देखा जा सकता है कि उन्होंने और राकेश टिकैत ने किसान आंदोलन के माध्यम से भाजपा को हराने के लिए एक अनुकूल ‘पिच’ बनाई थी, लेकिन विपक्ष ने ‘अच्छी गेंदबाजी’ नहीं की और इसका लाभ नहीं उठा सका।

वायरल वीडियो में यादव NDTV के रवीश कुमार से कह रहे हैं कि किसान आंदोलन ने यूपी में बीजेपी को हराने के लिए विपक्षी दलों की नींव बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन विपक्षी दलों ने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया। उन्होंने कहा कि संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) ने उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले एक रणनीति बनाई और सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि वे आगामी चुनावों में उत्तर प्रदेश राज्य में भाजपा को ‘सजा’ देंगे। 

यादव बोले, “राकेश टिकैत और मैंने पूरे यूपी का दौरा किया। चुनाव के खिलाड़ी हम नहीं हैं। क्रिकेट की बात करें तो हमारा काम था रोलर चलाना। हमने रोलर चलाया। हमने रोलर इसलिए चलाया कि फास्ट बॉल को मदद मिले, लेकिन बॉलिंग करना हमारा काम नहीं था।” यादव का कहना था उन्होंने किसान आंदोलन के जरिए भाजपा के खिलाफ जमीन तैयार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन इसके बावजूद उत्तर प्रदेश में भाजपा की मुख्य प्रतिद्वंद्वी समाजवादी पार्टी ने अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभाई।

पंजाब में राजनीतिक स्थिति के बारे में बोलते हुए योगेंद्र यादव ने कहा कि किसान आंदोलन का मुख्य लक्ष्य राज्य के सभी स्थापित राजनीतिक दलों को पूरी तरह से बदनाम (Discredit) करना था और ऐसा करने में इसने एक प्रमुख उत्प्रेरक के रूप में काम किया। बता दें कि पंजाब में कॉन्ग्रेस की सरकार थी, मगर 2022 के विधानसभा चुनाव में AAP ने यहाँ पर जीत हासिल की।

योगेंद्र यादव ने कहा, “मैं नहीं जानता कि इससे सबसे ज्यादा किसे फायदा हुआ, लेकिन हमारे कुछ दोस्त ‘बिना पैड के मैदान में उतर गए’ (बिना तैयारी के)। हमने कहा कि बल्लेबाजी करना या गेंदबाजी करना हमारा काम नहीं है। हमारा काम पिच को तैयार करना है… हम पिच को थोड़ा टेढ़ा जरूर कर सकते हैं, जो हमने किया।” इस दौरान, एक अन्य पैनलिस्ट ने यह कहते हुए हस्तक्षेप किया, “कभी-कभी एक बॉलर मैदान पर यॉर्कर फेंकता है, लेकिन फुल टॉस पड़ जाता है और वह छक्का हो जाता है…”

उसी शो के एक अन्य हिस्से में योगेंद्र यादव ने स्वीकार किया कि ‘किसानों का विरोध प्रदर्शन’ किसानों के अधिकारों की लड़ाई के बजाय एक राजनीतिक स्टंट था। उन्होंने कहा कि वह गेंद और बल्लेबाजी करने वाले नहीं हैं। उनका काम केवल पिच तैयार करना है, जैसा कि उन्होंने पश्चिम बंगाल में भी किया था। 

यादव ने आगे कहा कि बंगाल में उन्होंने घर-घर जाकर लोगों से भाजपा के खिलाफ वोट करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा, “हमने नींव रखी। खुल्लम खुल्ला बोला कि बीजेपी को हराओ। लेकिन, इसका मतलब यह नहीं कि हम तृणमूल कॉन्ग्रेस पार्टी की जीत का श्रेय लेंगे। टीएमसी ने शानदार प्रदर्शन किया। हमने उत्तर प्रदेश में भी यही किया… हम केवल पिच तैयार कर सकते हैं, लेकिन खिलाड़ियों को खेलना चाहिए।”

एक अन्य Snippet में योगेंद्र यादव ने अनजाने में स्वीकार किया कि किसानों का विरोध वास्तव में एक ‘चुनावी आंदोलन’ (चुनावी विरोध) था। गौरतलब है कि 10 मार्च को शुरुआती चुनावी रुझानों में जैसे ही यूपी में बीजेपी की स्पष्ट जीत की भविष्यवाणी की जाने लगी, वैसे ही योगेंद्र यादव का मेल्टडाउन शुरू हो गया।

मथुरा ईदगाह मस्जिद की जगह हो श्रीकृष्ण जन्मभूमि, याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में होगी सुनवाई: मंदिर की भूमि हिंदुओं को देने की माँग

उत्तर प्रदेश की इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने मथुरा की शाही ईदगाह मस्जिद स्थल को श्रीकृष्ण जन्मभूमि के रूप में मान्यता देने की माँग वाली याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति दी है। इसके पहले 19 जनवरी 2021 को हाईकोर्ट ने इस याचिका को याचिकाकर्ता के अनुपस्थिति के कारण खारिज कर दी थी। 

उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश राजेश बिंदल और न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की खंडपीठ ने अधिवक्ता महक माहेश्वरी द्वारा दायर इस याचिका पर सुनवाई की सहमति दी। कोर्ट ने कहा कि याचिका खारिज करने के बाद इसे बहाल करने के लिए तुरंत आवेदन दिया गया था।

अपने आदेश में पीठ ने उस याचिका को बहाल कर दिया। कोर्ट ने कहा कि मुख्य याचिका को याची की अनुपस्थिति में खारिज करने के आदेश को वापस लिया जाता है। मुख्य याचिका को उसके मूल नंबर पर बहाल किया जाता है।अब इस पर अगली सुनवाई 25 जुलाई को होगी।

याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर बनी मथुरा की शाही ईदगाह मस्जिद को हटाने की माँग करते हुए मंदिर की जमीन हिंदुओं को सौंपने का आग्रह किया गया है। इसके साथ ही उक्त भूमि पर मंदिर निर्माण के लिए श्रीकृष्ण जन्मभूमि जन्मस्थान के लिए एक ट्रस्ट का गठन करने की माँग भी की गई है। इसके साथ ही याचिका में मामले के निपटारे तक हिंदुओं को सप्ताह में कुछ दिन और जन्माष्टमी को मस्जिद में पूजा करने की अनुमति देने का आग्रह किया गया है।

पौराणिक इतिहास का हवाला देते हुए याचिका में कहा गया है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म राजा कंस के कारागार में हुआ था और यह जन्मस्थान शाही ईदगाह के वर्तमान ढाँचे के ठीक नीचे है। सन 1670 में मुगल आक्रांता औरंगजेब ने मथुरा पर हमला कर दिया था और केशवदेव मंदिर को ध्वस्त करके उसके ऊपर शाही ईदगाह मस्जिद बनवा दिया था। याचिका में कहा गया है कि सरकारी वेबसाइट में भी इसका जिक्र किया गया है।

याचिका में पूर्व में किए गए समझौते को लेकर कहा गया है, “ट्रस्ट मस्जिद ईदगाह के प्रबंधन समिति ने 12.10.1968 (12 अक्टूबर 1968) को सोसायटी श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ के साथ एक अवैध समझौता किया और दोनों ने संपत्ति पर कब्जा करने और हड़पने के लिए अदालत, वादी देवताओं और भक्तों के साथ धोखाधड़ी की। वास्तव में श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट 1958 से गैर-कार्यात्मक है।”

बता दें कि मथुरा का मुद्दा नया नहीं है। अदालत में इस मामले में याचिकाएँ दाखिल की गई हैं और उन सुनवाई होती रही है। 13.37 एकड़ जमीन पर दावा करते हुए हिन्दू यहाँ से शाही ईदगाह मस्जिद को हटाने की माँग करते रहे हैं। 1935 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने वाराणसी के हिन्दू राजा को भूमि के अधिकार सौंपे थे।

साल 1951 में ‘श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट’ बना और यहाँ भव्य मंदिर के निर्माण का संकल्प लिया गया। 1958 में ‘श्रीकृष्ण जन्म सेवा संघ’ का गठन हुआ। इसी ट्रस्ट ने प्रबंधन का जिम्मा उठाया। साल 1968 का एक समझौता ही सारे विवाद की जड़ है, जिसे मंदिर और मस्जिद पक्ष की बैठक के बाद तय किया गया था। उसमें मुस्लिमों को मस्जिद के प्रबंधन के अधिकार दे दिए गए।

शाकाहारी महिला ने शुक्रवार को पहली बार खाया चिकन, फिर आधी रात में पति को काट डाला… त्रिपुरा पुलिस जाँच में जुटी

त्रिपुरा से हैरान कर देने वाला एक मामला सामने आया है। यहाँ एक शाकाहारी महिला ने पहले चिकन खाया और फिर अपने पति का सिर कलम कर दिया। इसके बाद महिला ने खून से लथपथ पति के सिर को प्लास्टिक के बैग में रख दिया। शुक्रवार (11 मार्च 2022) को घटी यह घटना खोवई जिले की है।

जानकारी के मुताबिक वारदात को अंजाम देने वाली महिला सावित्री तांती शाकाहारी थी, लेकिन उसने शुक्रवार की रात चिकन खाया था। इसके साथ ही वह पिछले कुछ दिनों से अजीब सी हरकतें किया करती थी, अकेले में बैठकर बातें किया करती थी। सावित्री के बेटे ने बताया कि घटना वाली रात भी वह अजीब हरकतें कर रही थी। पूछने पर टॉयलेट के बहाने कमरे से बाहर गई और फिर साड़ी के पल्लू में कुछ बाँधकर सो गई। बताया गया कि वह मानसिक रूप से बीमार थी।

सावित्री तांती अपने पति और दो नाबालिग बेटों के साथ खोवई जिले के इंदिरा कॉलोनी में रहती है। उसके बड़े बेटे ने बताया कि जब आधी रात को उसकी नींद खुली तो उसने देखा कि उसकी माँ के हाथ में चॉपर (बड़ा चाकू) है और वहीं पर खून से लथपथ पिता का शव पड़ा हुआ था। उसने जैसे ही कंबल हटाया और पिता का सिर धड़ से अलग देखा तो उसके होश उड़ गए। फिर जब उसने शोर मचाया तो स्थानीय लोग उनके घर पर जमा हो गए और दोनों बच्चों को बचा लिया। इसके बाद पुलिस को इसकी जानकारी दी गई।

सूचना मिलते ही एडिशनल एसपी अमिताभ पॉल के नेतृत्व में पुलिस की एक टीम शनिवार (12 मार्च 2022) तड़के घटनास्थल पर पहुँची और आरोपित पत्नी को उसके आवास से गिरफ्तार कर लिया। वारदात में इस्तेमाल किया गया हथियार भी मौके से बरामद कर लिया गया है।

मामले में जानकारी देते हुए एडीशनल एसपी अमिताभ पॉल ने कहा, “जाँच जारी है। हमें उम्मीद है कि जल्द ही सच्चाई सामने आ जाएगी।” उन्होंने कहा कि शुरुआती सबूत बताते हैं कि मृतक की हत्या उसकी पत्नी ने की। लेकिन घटना के असली रहस्य का पता पूरी पड़ताल के बाद ही चल पाएगा।

‘सैन्य छावनी की बिजली-पानी काट दूँगा’: तेलंगाना CM के बेटे और राज्य के मंत्री KTR ने सेना के अधिकारियों को दी धमकी

तेलंगाना की के. चंद्रशेखर राव (KCR) सरकार ने भारतीय सेना को धमकी दी है। केसीआर के बेटे और राज्य सरकार में मंत्री केटी रामाराव (KTR) ने कहा है कि सिकंदराबाद छावनी में रहने वाले सेना के अधिकारियों की बिजली-पानी का कनेक्शन काट दिया जाएगा।

सेना के अधिकारियों को धमकाते हुए तेलंगाना के आईटी मंत्री और तेलंगाना राष्ट्र समिति (TRS) के कार्यकारी अध्यक्ष केटीआर ने राज्य विधानसभा में कहा, “जरूरत पड़ने पर हम छावनी सेना के सैन्य अधिकारियों की बिजली और पानी की आपूर्ति में कटौती करेंगे, क्योंकि जब चाहें सड़कों को बंद करना उचित नहीं है।”

बता दें कि यहाँ पर सेना ने कैंटोनमेंट एरिया (छावनी क्षेत्र) में आने वाले 21 सड़कों को बंद करके उन्हें आर्मी एरिया में शामिल कर लिया है। केटीआर का दावा है कि इससे स्थानीय लोगों को आवाजाही में मुश्किल हो रही है। 

विधानसभा में प्रश्नकाल के दौरान केटीआर ने कहा कि स्थानीय आर्मी अफसरों द्वारा सड़कों को बंद करने और उनके द्वारा किए जा रहे निर्माण कार्यों से आम लोगों को परेशानी हो रही है। उन्होंने दावा किया कि कई इलाकों में लोगों के सुबह की सैर पर भी रोक लगा दी गई है।

उन्होंने कहा कि सेना के अधिकारियों ने बल्कापुर नाला पर चेक डैम बनाया है। इससे नदीम कॉलोनी में पानी भरने लगा है। ऑर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) गोलकुंडा किले के पास काम करने से राज्य सरकार को रोक रहा है। इस वजह से राज्य सरकार शतम टैंक से गोलकुंडा किले में पानी नहीं छोड़ पा रही है। 

केटीआर ने कहा, “हमने सेना के लोगों को कई बार बताया है कि उनके काम से यहाँ पर आम लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। हमारे अधिकारी उनके साथ बैठक करेंगे। अगर वह फिर भी नहीं समझते हैं तो हम कड़ा कदम उठाएँगे। अगर जरूरत तो पड़ी तो हम उनके इलाके की बिजली और पानी की सप्लाई भी काट देंगे।”

उन्होंने कहा कि इस संबंध में राज्य सरकार ने केंद्र सरकार से भी शिकायत की है। बता दें कि राज्य सरकार केंद्र से लगातार माँग करती रही है कि सिकंदराबाद छावनी क्षेत्र को ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम के साथ मिला दिया जाए।

The Kashmir Files की टीम से मिले नरेंद्र मोदी, PM से मिली बधाई पर बोले निर्माता – ‘पहले किसी फिल्म को बना इतना गर्व महसूस नहीं हुआ’

कश्मीरी पंडितों के नरसंहार पर बनी चर्चित फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ (The Kashmir Files) के निर्माताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की है। प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें फिल्म के लिए बधाई दी है। मुलाकात करने वालों में प्रोड्यूसर अभिषेक अग्रवाल, डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री और फिल्म की अभिनेत्री पल्ल्वी जोशी शामिल हैं। अभिषेक अग्रवाल ने पीएम मोदी को धन्यवाद करते हुए इस मुलाकात की तस्वीरें 12 मार्च (शनिवार) को शेयर की हैं।

अपने ट्वीट में अभिषेक ने लिखा, “प्रधानमंत्री मोदी से एक सुखद मुलाकात रही। उनके द्वारा द कश्मीर फाइल्स के लिए बोले गए उत्साहवर्धक शब्दों ने इसे और स्पेशल बना दिया है। किसी और फिल्म को बनाने में अब तक इतना गर्व नहीं महसूस हुआ। धन्यवाद मोदी जी।” अभिषेक ने अंत में एक हैशटैग भी दिया है, जिसमें लिखा है #ModiBlessedTKF

अभिषेक अग्रवाल के इस ट्वीट पर निर्माता विवेक अग्निहोत्री ने लिखा, “मैं इस बात को ले कर खुश हूँ अभिषेक कि तुमने भारत के सबसे कठिन चुनौती को प्रोड्यूस करने की हिम्मत दिखाई। द कश्मीर फाइल्स (The Kashmir Files) की अमेरिका में स्क्रीनिंग होना यह साबित करता है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में दुनिया का मन बदल रहा है।”

गौरतलब है कि 3 दशक पहले कश्मीर घाटी में किए गए कश्मीरी पंडितों के नरसंहार पर बनी फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ शुक्रवार (11 मार्च) को रिलीज हो गई है। बॉलीवुड गैंग के विरोध के बावजूद इस फिल्म ने पहले ही दिन जबरदस्त कमाई की है। बॉलीवुड में इस फिल्म के विरोध का स्तर आप ऐसे समझ सकते हैं कि जिस आतंकी घटना में पति के खून से सना चावल पत्नी को खिलाया जाता है, उसके रेप के बाद आरी से 2 हिस्सों में काटा जाता है… इन जघन्य हत्याओं के बावजूद बॉलीवुड डायरेक्टर विधु विनोद चोपड़ा की बीवी अनुपमा चोपड़ा ने द कश्मीर फाइल्स का मजाक उड़ाया।

इस फिल्म के प्रमोशन के लिए कपिल शर्मा द्वारा पैसे माँगे जाने का भी आरोप विवेक अग्निहोत्री ने लगाया था। यद्यपि बाद में उस पर कपिल शर्मा ने सफाई भी दी थी। वहीं कमाल राशिद खान (KRK) जैसे विवादित कलाकारों ने इस फिल्म पर ‘मुग़ल ए आज़म’ न होने का तंज भी कसा। फिल्म को रोकने की याचिका को भी बॉम्बे हाईकोर्ट ख़ारिज कर चुका है।