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सरस्वती पूजा पर ‘हिजाब’ की बात क्यों राहुल गाँधी? बसंत पंचमी पर किसान की तस्वीर, लेकिन हिंदू देवी गायब

राजनीति में स्थान, प्रतीक और शब्दों का एक गहरा संबंध होता है। कब, कहाँ, क्या और कैसे कहना है, एक मंझा हुआ राजनेता अच्छी तरह जानता है और उस संदेश को भी पहुँचाने में कामयाब रहता है, जिसे वाकई वो देना चाहता है। हालाँकि कई बार ऐसा भी होता है कि जिसे आप छिपाने की कोशिश करते हैं, वही दिख जाता है। कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी के मामले में भी कुछ ऐसा ही है। राहुल गाँधी अपनी छवि को बदलने के लिए प्रयास तो करते हैं, लेकिन उनका आंतरिक मन उनके शब्दों और प्रतीकों से झलक जाता है।

राहुल गाँधी ने शनिवार (5 फरवरी 2022) को ट्वीट कर लोगों को बसंत पंचमी और सरस्वती पूजा की शुभकामनाएँ दीं। उन्होंने ट्वीट किया, “किसान की मेहनत रंग लाती है, जब धरती पर फसल शान से लहलहाती है। सभी को बसंत पंचमी व सरस्वती पूजा की शुभकामनाएँ!”

यहाँ तक बात ठीक है, लेकिन जैसे ही आप बसंत पंचमी और सरस्वती पूजा के लिए दी गई शुभकामना संदेश में लगाई गई फोटो को देखेंगे तो आप चौंक जाएँगे। शुभकामना संदेश सरस्वती पूजा का और फोटो किसान का। सरस्वती पूजा पर किसान के तस्वीर का को तुक नहीं बनता है। दरअसल, सरस्वती पूजा के बहाने के यहाँ भी राहुल गाँधी राजनीतिक खेल करने की कोशिश की, लेकिन सोशल मीडिया यूजर ने उन्हें पकड़ लिया। बात यहीं तक रहती तो कोई बात नहीं थी। उन्होंने सरस्वती पूजा को हिजाब से जोड़ दिया।

यह पहली बार नहीं है, राहुल गाँधी ने अनजाने में ऐसा किया हो। राहुल गाँधी जब भी हिंदू त्योहारों की शुभकामनाएँ देते हैं, तब उससे जुड़े हिंदू देवी-देवता की तस्वीर गायब कर देते हैं। ये आरोप सोशल मीडिया पर उन पर लगते रहते हैं। पिछले साल गणेश चतुर्थी पर भी उन्होंने लोगों को शुभकामनाएँ दी थीं, लेकिन भगवान गणेश की तस्वीर लगाने से परहेज किया।

पिछले साल कृष्ण जन्माष्टमी की शुभकामनाएँ देते मोर पंख से काम चला लिए।

उसी तरह पैरालम्पिक में स्वर्ण पदक जीतने वाले सुमित अंतील को बधाई देते हुए राहुल गाँधी ने एक फोटो का इस्तेमाल किया था। राहुल गाँधी ने सुमित की जिस फोटो का इस्तेमाल किया था, उसमें उनके गले में ॐ का एक लॉकेट दिखाई दे रहा था, जो राहुल गाँधी द्वारा इस्तेमाल किए गए फोटो में दिखाई नहीं दिया। इसकी वजह ने सोशल मीडिया यूजर्स ने राहुल की खूब आलोचना की और आरोप लगाया कि वे हिंदू देवी-देवताओं से चिढ़ते हैं, इसलिए उनकी तस्वीरों और सनातनी प्रतीकों को लगाने से बचते हैं।

समय-समय पर राहुल गाँधी मंदिर जाते हैं, मस्तक पर त्रिपुण्ड लगाते हैं और देवी-देवताओं को प्रणाम करते हुए अपनी तस्वीरें मीडिया को सहर्ष देते हैं। वे खुद को जनेऊधारी ब्राह्मण भी बता चुके हैं, फिर हिंदू देवी-देवताओं से क्या वे वाकई चिढ़ते हैं? इसका जवाब कॉन्ग्रेस पार्टी के बयानों और कार्य-प्रणाली में छिपी है।

सरस्वती पूजा की शुभकामना देने के दो घंटे के भीतर राहुल गाँधी ने सरस्वती पूजा को हिजाब सो जोड़ते हुए ट्वीट किया, “छात्राओं की शिक्षा के बीच हिजाब को आने देना भारत के बेटियों का भविष्य बर्बाद करने जैसा है। माँ सरस्वती सबको ज्ञान देती है, किसी में भेदभाव नहीं करती।”

बता दें कि कर्नाटक में हिजाब विवाद पर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस नेता सिद्धारमैया ने कहा इसे मुस्लिम छात्राओं का मौलिक अधिकार बताया था। सिद्धारमैया ने कहा, “मुस्लिम लड़कियाँ शुरू से ही हिजाब पहनती आई हैं। यह उनका मौलिक अधिकार है। क्या वे (छात्र) इससे पहले जब भी स्कूल या कॉलेज जाते थे तो भगवा शॉल पहनते थे? यह राजनीति से प्रेरित है। इसलिए सरकार को स्टैंड लेना चाहिए।” इससे पहले मुस्लिम छात्राओं ने भी हिजाब को मौलिक अधिकार बताया था।

इसी तरह जुलाई 2020 में राहुल गाँधी ने ईवी रामासामी उर्फ ​​’पेरियार’ का महिमामंडन किया था। पेरियार को मूर्तिभंजक और हिंदू विरोधी माना जाता है। पेरियार की एक प्रतिमा पर भगवा रंग चढ़ाने की घटना के बाद कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने एक ट्वीट में लिखा, “घृणा की मात्रा किसी भी विशाल प्रतीक को कभी भी प्रभावित नहीं कर सकती है।”

पेरियार ने रामायण के बारे में कई भ्रम फैलाए। श्री राम पर जातिवादी होने का आरोप लगाने से लेकर यह तक दावा किया गया कि उन्होंने महिलाओं को मार डाला। पेरियार के अनुसार, हिंदू महाकाव्य रामायण और महाभारत को द्रविड़ पहचान को मिटाने के लिए ‘चालाक आर्यों’ द्वारा लिखा गया था। अगर पेरियार की मानें तो, राम, भरत को सिंहासन ना मिलने की साजिश का हिस्सा थे, जो पेरियार के अनुसार दशरथ के योग्य उत्तराधिकारी थे।

यूपीए शासन में मनमोहन सिंह द्वारा देश के संसाधनों पर मुस्लिमों का पहला अधिकार बताने की बात हो या, हरीश रावत द्वारा उत्तराखंड में पहला मुस्लिम यूनिवर्सिटी खोलने की बात और कर्नाटक में स्कूलों में हिजाब का समर्थन, कॉन्ग्रेस की नीतियों और प्रदर्शन में स्पष्ट है कि जो काम वो कभी खुल कर करती थी, उसे अब प्रतीकों के इस्तेमाल से करती है। हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीरों से बचना एक उदाहरण भर है।

भले ही इस विरोध प्रदर्शन को ‘हिजाब’ के नाम पर किया जा रहा हो, लेकिन मुस्लिम छात्राओं को बुर्का में शैक्षणिक संस्थानों में घुसते हुए और प्रदर्शन करते हुए देखा जा सकता है। इससे साफ़ है कि ये सिर्फ गले और सिर को ढँकने वाले हिजाब नहीं, बल्कि पूरे शरीर में पहने जाने वाले बुर्का को लेकर है। हिजाब सिर ढँकने के लिए होता है, जबकि बुर्का सर से लेकर पाँव। कई इस्लामी मुल्कों में शरिया के हिसाब से बुर्का अनिवार्य है। कर्नाटक में चल रहे प्रदर्शन को मीडिया/एक्टिविस्ट्स भले इसे हिजाब से जोड़ें, ये बुर्का के लिए हो रहा है।

‘अहमद हमीद को टिकट देना सबसे बड़ी गलती, नहीं पता था उन्होंने जाटों को मारा’: RLD सुप्रीमो जयंत चौधरी का वायरल ट्वीट – FACT CHECK

सोशल मीडिया पर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले एक ट्वीट वायरल हो रहा है। ये ट्वीट ‘राष्ट्रीय लोकदल (RLD)’ के अध्यक्ष जयंत चौधरी का बताया जा रहा है। इस ट्वीट में उनके हवाले से लिखा गया है, “बागपत में मेरे और RLD पार्टी द्वारा अहमद हमीद को दिया गया टिकट मेरे जीवन की सबसे बड़ी गलती है। मुझे नहीं पता था कि अहमद हमीद का परिवार बाबा शाहमल तोमर जाट को मार कर नवाब बने। उन्होंने मुजफ्फरनगर दंगों में भी जाटों को मारने के लिए हथियार भेजे थे।”

RLD सुप्रीमो जयंत चौधरी ने अपने ही उम्मीदवार अहमद हमीद को लेकर किया ‘गलती’ वाला ट्वीट?

इस ट्वीट में रालोद सुप्रीमो के हवाले से आगे लिखा गया है, “मैं इस टिकट को (बागपत से अहमद हमीद) रद्द कर रहा हूँ। पर्चा वापस तो नहीं होगा, लेकिन मेरा समाज अब बागपत में आज़ाद होकर मतदान करे।” बता दें कि इस बार रालोद अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन बना कर चुनाव लड़ रही है। सपा को उम्मीद है कि इससे पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जिसे जाटलैंड भी कहते हैं, वहाँ उन्हें अच्छी संख्या में सीटें मिलेंगी। हालाँकि, इस गठबंधन ने अधिकतर मुस्लिम उम्मीदवारों पर अपना भरोसा जताया है।

अहमद हमीद बागपत के सबसे अमीर प्रत्याशी भी हैं। उन्होंने जो विवरण चुनाव के लिए नामांकन भरते समय दर्ज कराए हैं, उसके अनुसार उनके बैंक खाते में 21 लाख रुपए हैं और तीन वाहन हैं। वो हथियार के भी शौक़ीन हैं। उनके पास 250 ग्राम सोना, 16 करोड़ रुपए की कृषि भूमि, 6.90 करोड़ रुपए की गैर-कृषि भूमि, गाजियाबाद सहित विभिन्न जगहों पर 12.85 करोड़ रुपए की अन्य संपत्ति और 138 दुकानें भी हैं। इस तरह से वो अरबपति प्रत्याशी हैं।

जाइए क्या है वायरल दावे की सच्चाई

अब आपको बताते हैं कि इस वायरल दावे की सच्चाई क्या है कि ‘नवाब’ अहमद हमीद को टिकट दिए जाने को जयंत चौधरी ने अपनी गलती बताया है। मामला इतना बढ़ गया कि जयंत चौधरी को खुद सफाई देनी पड़ी। उन्होंने इस वायरल स्क्रीनशॉट को शेयर करते हुए बताया, ” बागपत चुनाव पर झूठा पोस्ट बनाकर वायरल किया जा रहा है। बागपत पुलिस को तहरीर दी गई है। विकास पर जवाब जब दे नहीं पा रहे तो फोटोशॉप द्वारा फ़र्ज़ी पोस्ट बनाने वाले कौन हैं – जनता पहचान ले।”

बता दें कि अहमद हमीद के अब्बा कौकब हमीद खान बागपत से लगातार 5 बार विधायक रहे हैं। सबसे पहले उन्होंने कॉन्ग्रेस के टिकट पर 1985 में पहली बार चुनाव जीता था। उन्होंने कॉन्ग्रेस और ‘भारतीय क्रांति दल’ के टिकट पर 1993 और 1996 में चुनाव जीता था। फिर वो रालोद के टिकट पर लगातार 2 बार 2002 और 2007 में विधायक बने। हालाँकि, उनकी मौत के बाद बेटे को दो बार हार का मुँह देखना पड़ा। अब वो फिर से मैदान में हैं। रालोद के अलावा बसपा से भी वो अपनी किस्मत आजमा चुके हैं।

अजीत अंजुम खोलेंगे चिकन-पकौड़े की दुकान, CM योगी की दोबारा जीत पर पत्रकारिता छोड़ने की कसम – Fact Check

अजीत अंजुम नाम के एक पत्रकार हुआ करते थे। मीडिया कंपनियों में कभी जलवा-जलाल था। अब YouTube पर वीडियो बनाते हैं। इसी को वो पत्रकारिता का नाम देते हैं। वामपंथी लोग उनकी इस YouTube पत्रकारिता पर हुआँ-हुआँ भी करते पाए जाते हैं। इन्हीं अजीत अंजुम के नाम से अब एक ट्वीट वायरल हो रहा है। पढ़िए वो ट्वीट:

“अगर 2022 के चुनाव में उत्तर प्रदेश में योगी फिर से जीत गए तो मैं पत्रकारिता छोड़ कर दिल्ली की बिल्लिमरान में चिकन पकौड़े की दुकान खोल लूँगा।”

वायरल फोटो, जिस पर अजीत अंजुम को देनी पड़ी सफाई

वामपंथियों के हरदिल अजीज अजीत अंजुम को चिकन पकौड़े की दुकान खोलनी पड़े, यह लाल सलाम के कामरेडों पर एक धब्बा है। वामपंथी इकोसिस्टम क्या इतना कमजोर पड़ गया है? इसी कारण से हमने इस ट्वीट की पड़ताल करनी चाही।

सबसे पहले अजीत अंजुम के ट्विटर पर गए। वहाँ पहुँच कर सच्चाई पता चली। YouTube वीडियो बनाने वाले अजीत अंजुम को तो ब्लू टिक भी नहीं दिया है वामपंथी लॉबी करने वाली कंपनी ट्विटर ने। जबकि वायरल ट्वीट में इनके नाम के आगे ब्लू टिक लगा हुआ है। इसका मतलब हुआ कि किसी ने बहुत मेहनत करके फोटोशॉप किया और एडिटेड फोटो को ट्वीट कर दिया।

वायरल हो गए ट्वीट के बाद बेचारे अजीत अंजुम को ट्विटर पर आकर सफाई देनी पड़ रही है। वो लिखते हैं:

“मेरे बारे में दुष्प्रचार का नया फोटोशॉप। मेरे नाम से कुछ भी लिखकर वायरल किया जा रहा है। इसी से पता चलता है कि भक्तों की जमात मुझ पर कितनी बौखलाई हुई है। मेरा ट्वीटर हैंडल वेरिफाइड नहीं है लेकिन ब्लू टिक वाला फोटोशॉप करके खेल चालू है। ये फर्जी लोग हैं।”

अजीत अंजुम को लिखने से मन न भरा तो वीडियो भी बना डाले। खैर, वीडियो बनाना तो उनका काम ही है। इसी को ये पत्रकारिता कहते हैं। फोटोशॉप करने वाले को, हाथ में मोबाइल लेकर कंटेंट बनाने वाले को, वॉट्सऐप पर जानकारी (गलत या सही) फॉर्वर्ड करने वालों को हालाँकि ये पत्रकार नहीं मानते हैं। मतलब परिभाषा ये खुद तय करते हैं।

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बहुत अटपटा है पढ़ना लेकिन अजीत अंजुम के लिए कभी यह भी ट्विटर पर ट्रेंड हुआ था। ऑपइंडिया की संपादकीय टीम ने इसकी कड़ी आलोचना भी की थी। हुआ ये था कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ‘पत्रकार’ अजीत अंजुम ने खुला चैलेंज दिया था – वैक्सीनेशन को लेकर।

अजीत अंजुम का चैलेंज था 3 महीने में 9 करोड़ लोगों को टीके लगाने का, जबकि यूपी सरकार ने 10 करोड़ से अधिक डोज लगाकर रिकॉर्ड बना दिया था। इसके बाद सोशल मीडिया पर लोग अजीत अंजुम को खोज रहे थे और उनसे उन्हीं के चैलेंज के अनुसार सलामी देने के लिए बोल रहे थे।

YouTube पर वीडियो बना कर पत्रकार कहलाने वाले अजीत अंजुम पिछली बार यूपी सरकार या सीएम योगी के नाम पर चैलेंज देकर मुँह की खाए थे। बहुत छीछालेदर हुआ था बेचारे का। इस कारण से इस बार ऐसा कोई उटपटांग चैलेंज वो देंगे या लेंगे, इसकी संभावना कम थी। फिर भी असली पत्रकारिता और सही फैक्ट चेक क्या और कैसे होती है, इसी के तहत हमने चिकन-पकौड़े वाले वायरल फोटो की पड़ताल की… और यह पाया कि अजीत अंजुम ने ऐसा कुछ भी नहीं लिखा या कहा है।

‘छिप कर काठी-कबाब खाते हैं जैन लड़के’: महुआ मोइत्रा के बयान से जैन समुदाय नाराज़, पूछा – क्या हम अल्पसंख्यक नहीं?

तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की सांसद महुआ मोइत्रा (Mahua Moitra) अपने विवादित बयानों के कारण अक्सर चर्चा में रहती हैं। इस बार उन्होंने जैन समुदाय को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की है, जिसको लेकर सोशल मीडिया पर वह यूजर्स के निशाने पर आ गई हैं।

दरअसल, महुआ मोइत्रा ने 3 फरवरी को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव में भाग लेते हुए लोकसभा में अपने संबोधन के दौरान कहा था, “आप भविष्य के भारत से डरते हैं जो अपनी त्वचा में सहज है, जो परस्पर विरोधी वास्तविकताओं के साथ सहज है। आप उस भारत से डरते हैं, जहाँ एक जैन लड़का घर से छिपकर अहमदाबाद की सड़क पर एक ठेले से काठी कबाब खाता है।” 12:41 मिनट के यूट्यूब वीडियो में टीएमसी सांसद ने 5:57 से 6:08 के बीच यानी 18 सेकंड तक जैन समुदाय पर निशाना साधा।

ट्विटर पर जैन समुदाय के लोग टीएमसी सांसद से आहत हैं। उन्होंने माँग की है ​कि वह अपनी आपत्तिजनक टिप्पणी के लिए सार्वजनिक रूप से माफी माँगें। एक यूजर ने लिखा, “जैन और पूरी तरह से शाकाहारी होने के नाते (आलू भी न खाएँ) मैं जैनियों के लिए उनकी अपमानजनक टिप्पणी से आहत हूँ। जैन समुदाय महुआ मोइत्रा से माफी की माँग करते हैं।”

वहीं, एक यूजर ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को टैग करते हुए लिखा, “ममता की सांसद केवल मुस्लिमों के लिए चिंतित हैं (टीएमसी ग्रेटेस्ट वोटबैंक) अन्य अल्पसंख्यकों की भावनाओं से उनका कोई सरोकार नहीं है। ममता दीदी, क्या यह अपमान सेक्युलर?”

ट्विटर पर ‘विश्व जैन संगठन’ ने भी महुआ को आड़े हाथों लिया है। उन्होंने वीडियो का स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए लिखा, “कृपया उस वीडियो क्लिप को अपलोड करें, जिसमें अहमदाबाद की सड़क पर एक शाकाहारी जैन लड़का काठी कबाब खा रहा है। अगर आपके पास कोई क्लिप नहीं है, तो तुरंत इसके लिए माफी माँगें, क्योंकि आपको बिना किसी ठोस सबूत के लोकसभा में जैनियों को बदनाम करने का कोई अधिकार नहीं है। कृपया करके इस मामले में संज्ञान लें।”

एक और यूजर ने लिखा, “आप इस पर चुप क्यों हैं.. अल्पसंख्यकों की भावनाओं को ठेस पहुँचाना आजकल का फैशन बन गया है। दुख की बात है। तुरंत माफी माँगें।”

बता दें कि अपने लोकसभा भाषण से पहले तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) सांसद महुआ मोइत्रा ने गुरुवार (3 फरवरी 2022) को ट्विटर पर मोदी सरकार पर तंज कसते हुए ‘गोमूत्र’ का मजाक उड़ाया था। उन्होंने भाजपा को संबोधित करने के लिए गलत हैंडल को टैग करते हुए ट्वीट किया था, “मैं आज शाम को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर लोकसभा में बोलने जा रही हूँ। मैं सिर्फ इतना कहना चाहती हूँ कि बीजेपी की टीम खुद को तैयार रख ले। गोमूत्र के शॉट्स भी पीकर आएँ।”

‘सरकार से पैसे लेने वाले मदरसे मजहबी शिक्षा नहीं दे सकते’: गौहाटी हाईकोर्ट के फैसले को असम CM ने बताया ऐतिहासिक

असम के गौहाटी हाईकोर्ट (Gauhati High Court Assam) ने 4 फरवरी (शुक्रवार) को अपने फैसले में कहा कि सरकार से फंड प्राप्त करने वाले शिक्षण संस्थान मजहबी शिक्षा नहीं दे सकते। हाईकोर्ट ने राज्य के वित्तपोषित सभी मदरसों को सामान्य स्कूलों में बदलने के असम सरकार के फैसले को सही ठहराते हुए, मदरसों के लिए जमीन देने वाले 13 मुत्तवली (दानदाता) की याचिका को खारिज कर दिया।

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार ने विधानसभा में असम रिपीलिंग एक्ट-2020 पास करते हुए इस कानून के आधार पर सरकारी सहायता प्राप्त मदरसों को विद्यालयों में बदलने का निर्णय लिया था। इस ऐक्ट के तहत मदरसा शिक्षा (प्रांतीयकरण) अधिनियम- 1995 और असम मदरसा शिक्षा (कर्मचारियों की सेवाओं का प्रांतीयकरण और मदरसा शैक्षिक संस्थानों का पुनर्गठन) अधिनियम- 2018 को खत्म कर दिया गया था।

कोर्ट ने कहा कि विभिन्न धर्मों वाले देश में सरकार को धार्मिक मामलों में तटस्थ रहना चाहिए। कोर्ट ने कहा, “हम लोकतंत्र में और संविधान के अंतर्गत रहते हैं, जहाँ हर नागरिक बराबर है। इसलिए हमारे जैसे बहुधर्मी समाज में राज्य द्वारा किसी एक धर्म को वरीयता देना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन है। इस प्रकार एक धर्मनिरपेक्ष राज्य की प्रकृति है कि वह सुनिश्चित करे कि सरकार द्वारा वित्तपोषित किसी भी संस्थान में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाए।” यह संविधान के 28(1) के अनुकूल नहीं है।

उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सुधांशु धूलिया और जस्टिस सौमित्र सैकिया की पीठ ने अपने निर्णय में कहा है कि जो विधायिका और कार्यपालिका की ओर से बदलाव किया गया है, वह केवल सरकारी सहायता प्राप्त मदरसों के लिए है, न कि निजी अथवा सामुदायिक मदरसों के लिए। हाईकोर्ट ने एक्ट की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया। उच्च न्यायालय ने 27 जनवरी को मामले पर सुनवाई पूरी करते हुए अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

वहीं, हाईकोर्ट ने कहा कि प्रांतीय मदरसों में शिक्षक के तौर पर नौकरी करने वालों की नौकरी नहीं जाएगी और आवश्यक हुआ तो उन्हें दूसरे विषयों को पढ़ाने के लिए प्रशिक्षित किया जाएगा। हाईकोर्ट के फैसले को असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने ऐतिहासिक बताया है। उन्होंने कहा, “माननीय गौहाटी उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने एक ऐतिहासिक फैसले में मदरसा शिक्षा प्रक्रिया अधिनियम को निरस्त करने वाले 2020 के अधिनियम को बरकरार रखा और 397 प्रांतीय मदरसों को सामान्य शैक्षणिक संस्थानों में बदलने वाली अधिसूचनाओं को भी बरकरार रखा।”

बता दें कि मदरसों में दी जाने वाली मजहबी शिक्षा से कट्टरपंथी तत्वों को फायदे होने को आरोप लगते रहे हैं। कहा जाता इनके छात्र सोच में कट्टरवादी होते हैं। ऐसी कई खबरें भी आईं हैं, जहाँ कई गंभीर अपराधों में मदरसों और उससे जुड़े मौलानाओं की सीधी संलिप्तता पाई गई है।

सरकारी जमीनों पर कब्जा

मदरसों में मजहबी शिक्षा और कट्टरपंथी सोच वाले पौध ही नहीं तैयार होते, बल्कि कई मदरसे तो सरकारी जमीनों को कब्जा करने का जरिया भी बनते हैं। सूरत नगर निगम की जमीन पर कब्जा कर एक मदरसा बनाकर उस अवैध कब्जा कर लिया गया। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक वार्ड नंबर 3 में सिटी सर्वे नंबर 4936 और 4939 में अनवर-ए-रब्बानी तालीम-उल-इस्लाम के नाम से एक मदरसा चल रहा है। नगर निगम के स्वामित्व वाली भूमि पर अवैध रूप से बनाए गए इस मदरसे को ध्वस्त करने के लिए जिला प्रशासन ने पुलिस बंदोबस्त की भी माँग की थी।

केरल के मदरसे में यौन शोषण

मदरसों में महिलाओं के साथ-साथ नाबालिग बच्चों का यौन शोषण होने की खबरें भी प्राय: आती रहती हैं। केरल के कोझीकोड मुखदार तरबियाथुल इस्लामी सेंटर में इस्लाम कबूल करने वाली एक युवती ने बताया कि सेंटर के प्रमुख महिलाओं और लड़कियों को इस्लाम ‘सिखाने’ के बहाने उनका यौन शोषण करता है। महिला का कहना था कि इस्लामी मदरसा का प्रमुख बड़ी संख्या में लड़कियों का यौन शोषण कर चुका है। महिला ने केंद्र की तुलना जेल से की और कहा कि महिलाओं और लड़कियों को मजहबी मदरसा छोड़ने पर प्रतिबंध है।

अंधविश्वास और भेदभाव का पाठ

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि मदरसों में 400 साल पुराने पाठ्यक्रम को पढ़ाया जा रहा है, जो अंधविश्वास पर आधारित है। इन मदरसों में कई बच्चे पढ़ते हैं, जहाँ शिक्षा के नाम पर बताया जाता है कि सूरज पृथ्वी के चक्कर लगाता है। इस पर मौलवियों का कहना था कि वो कुरान-हदीस को नहीं बदल सकते। धार्मिक पुस्तक वैसी की वैसी पढ़ाई जाती हैं। मौलवियों ने यहाँ तक तक कहा था कि लड़के और लड़कियों के लिए अलग शैक्षणिक संस्थान होने चाहिए, नहीं तो उनके बीच नाजायज संबंध बन जाते हैं।

कट्टरपंथी शिक्षा का केंद्र

ऐसे कई मदरसे और उनसे जुड़े मौलवियों की खबरें आई हैं, जो हत्या और आतंकवादी गतिविधियों के लिए लोगों को उकसाते हैं। केरल सुन्नी शिक्षा बोर्ड के एक शिक्षक शफी सादी कुमारमपुत्तूर की एक वीडियो सामने आई थी वह बच्चों को पढ़ा रहा था कि जो कोई भी इस्लाम धर्म को छोड़ता है उसे मार दिया जाना चाहिए।

गुजरात का हालिया मामला इसका उदाहरण है। दिल्ली के एक मौलाना के निर्देश पर गुजरात में एक हिंदू युवक की हत्या कर दी गई और मदरसे के पास हथियारों आदि को छिपा दिया गया। इन हत्यारों को मौलवियों ने ही हथियार आदि उपकरण और सुविधाएँ उपलब्ध कराई थीं।

मुंबई बम धमाकों का मोस्ट वांटेड आतंकी अबु बक्र 29 साल बाद UAE से गिरफ्तार, दाऊद इब्राहिम का है करीबी

भारतीय जाँच एजेंसियों के हाथ बड़ी कामयाबी लगी है। उन्होंने 1993 के मुंबई सीरियल ब्लास्ट के मोस्ट वांटेड आतंकवादियों में से एक अबु बक्र को UAE से गिरफ्तार कर लिया है। जल्द ही अबु बक्र को भारत लाया जाएगा। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई देशों में चल रहे भारत के एक बड़े सर्च ऑपरेशन के तहत UAE की एजेंसियों के सहयोग से यह गिरफ्तारी की गई है।

अबु बक्र (Abu Bakar) को अंडरव‌र्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम का करीबी माना जाता है, जो पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (POK) में आतंकियों को हथियार और विस्फोटकों की ट्रेनिंग देने जैसी गतिविधियों में शामिल रहा है। इस आतंकवादी पर आरोप है कि मुंबई ब्लास्ट के दौरान भारी मात्रा में आरडीएक्स भारत में लाया था।

जानकारी के मुताबिक, वर्ष 2019 में भी भारतीय एजेंसियों ने UAE से अबु बक्र को गिरफ्तार किया था। उस वक्त दस्तावेजों की कमी के कारण मुंबई ब्लास्ट के इस गुनहगार के खिलाफ आरोप साबित नहीं हो पाया था। इसकी वजह से UAE के अधिकारी उसे रिहा करने में कामयाब रहे थे। हालाँकि, इस बार भारतीय एजेंसियों ने आतंकवादी को पकड़ लिया है।

बताया जाता है कि अबु बक्र के खिलाफ 1997 में एक रेड कॉर्नर नोटिस भी जारी हुआ था, जिसके बाद से भारतीय एजेंसियाँ उसकी तलाश कर रही थीं। उस पर आरोप था कि वह मुस्तफा दोसा के साथ मिलकर खाड़ी देशों से सोना, कपड़े और इलेक्ट्रॉनिक्स की तस्करी करके मुंबई लाता था।

बता दें कि 12 मार्च 1993 को मुंबई में अलग-अलग जगहों पर 12 धमाके हुए थे, जिसमें 257 लोग मारे गए थे और 713 घायल हुए थे। ये सभी ब्लास्ट दाऊद इब्राहिम के इशारों पर किए गए थे। धमाके में शामिल आतंकियों में अबू सलेम और फारुख टकला जैसे लोगों का नाम भी शामिल था, जिन्हे भारतीय जाँच एजेंसियों ने पकड़ा था। वहीं, इस ब्लास्ट का मास्टर माइंड दाऊद इब्राहिम अभी भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर है।

इंग्लैंड के हाउस ऑफ लॉर्ड्स का आजीवन सदस्य नजीर अहमद को साढ़े 5 साल सजा, नाबालिग लड़का-लड़की का किया था यौन शोषण

इंग्लैंड के हाउस ऑफ लॉर्ड्स के पूर्व सदस्य लॉर्ड नज़ीर अहमद (Nazir Ahmed) को पाँच साल और छह महीने की सजा सुनाई गई है। कारण है – 70 के दशक में एक नाबालिग लड़की से बलात्कार और 11 साल के लड़के से कुकर्म। इसके बाद पीड़ितों ने ब्रिटिश संसद के उच्च सदन हाउस ऑफ लॉर्ड्स में आजीवन सदस्य के रूप में नियुक्त किए गए पहले मुस्लिम सांसद को दिया गया सम्मान वापस लेने की माँग की है।

64 वर्षीय पूर्व लेबर नेता (Labour Politician) को जनवरी 2022 में शेफ़ील्ड क्राउन कोर्ट में दो नाबालिग बच्चों का यौन शोषण करने का दोषी ठहराया गया। एक महिला ने कोर्ट को बताया कि नजीर अहमद ने रॉदरहैम (Rotherham) में 1970 के दशक की शुरुआत में उसके साथ बलात्कार (जब यह महिला बच्ची थी) करने की कोशिश की थी। जूरी सदस्यों को यह भी बताया गया कि उसने (अहमद) 1970 के दशक की शुरुआत में सबसे पहले 11 साल से कम उम्र के लड़के के साथ कुकर्म किया था।

कानूनी कारणों से दोनों पीड़ितों की पहचान उजागर नहीं की गई है। पीड़ितों ने नज़ीर अहमद को कठोर से कठोर सजा दिलाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया। दोनों पी​ड़ितों ने अदालत के फैसले का स्वागत किया है, लेकिन अब वे इस दागदार और दोषी नेता से उसका खिताब छीनने की माँग कर रहे हैं।

मालूम हो कि भारत विरोधी अभियान और कश्मीरी अलगाववाद के पोस्टर बॉय के तौर पर मशहूर नजीर अहमद पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में पैदा हुआ था, जो बाद में ब्रिटेन चला गया था। रेप के मामले सामने आने के बाद शुरुआती दौर में उसने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों से इनकार कर दिया था, लेकिन नजीर और पीड़ित लड़की के बीच बातचीत का ऑडियो सामने आने के बाद सभी आरोपों की पुष्टि हो गई।

यह मामला 1970 के दशक का है। उस समय नजीर अहमद 17 साल का था। नजीर का बड़ा भाई मोहम्मद फारूक (71 साल) और मोहम्मद तारिक (65 साल) भी एक नाबालिग लड़के के साथ दुर्व्यवहार के मामले में सह-आरोपित थे। हालाँकि, दोनों को मुकदमा चलाने के योग्य नहीं माना गया।

ब्रिटेन में ग्रूमिंग गैंग का आतंक

पिछले 40 साल में ब्रिटेन में कम से कम 5 लाख गैर-मुस्लिम (जिन्हें ये लोग काफिर कहते हैं) लड़कियों के साथ मुस्लिम लोगों ने रेप किया है। रेप पीड़िता डॉ. एला हिल ने ‘Triggernometry’ को दिए एक इंटरव्यू में इसका खुलासा किया था। 20 साल पहले की डरावनी कहानी को याद करते हुए हिल ने बताया कि उन्हें उनके पाकिस्तानी मुस्लिम ब्वॉयफ्रेंड ने निशाना बनाया था। पाकिस्तानी मुस्लिम ब्वॉयफ्रेंड ने रॉदरहैम, शेफ़ील्ड और ब्रैडफोर्ड के आसपास अलग-अलग फ्लैटों में ले जाकर उनके साथ रेप किया और यातनाएँ दी थीं।

150 लोगों ने किया रेप, 1 दिन में 10-11 लोग करते थे सेक्स

ब्रिटेन के हर शहर में ग्रूमिंग गैंग के कारण छोटी बच्चियों का जीवन खतरे में है। स्काई न्यूज से बात करते हुए एक पीड़िता ने पिछले वर्ष इस बात का खुलासा किया था। उसने बताया था कि बच्चों का यौन शोषण करने वाली गैंग बड़ी तादाद में यहाँ पर मौजूद है, जो न केवल लड़कियों का खुद रेप करते हैं बल्कि उन्हें सेक्स के धंधे में धकेल देते हैं और अगर कोई इन चीजों का विरोध करता है तो उसे मारने और जलाने तक की धमकियाँ मिलती हैं। बकौल पीड़िता, “मुझे लगता है कि 3 साल के समय में मेरा 150 लोगों ने रेप किया होगा। कई बार 1 दिन में 10 और 11 लोग भी मेरा रेप करते थे।” सारा ने बातचीत में गैंग से जुड़े 11 लोगों की पहचान भी उजागर की है। इसमें उसके खरीददार, गैंग सदस्य उनके ग्राहक सब शामिल हैं।

महिला सांसद नाज शाह- पाकिस्तानी फ्री होकर रहें, इसलिए रेप की गईं बच्चियाँ चुप रहें

पाकिस्तानी मूल की इंग्लैंड में सांसद नाज शाह ने वर्ष 2021 में ग्रूमिंग गैंग का समर्थन करते हुए रेप की गईं बच्चियों को चुप रहने की हिदायद दी थी। एक महिला होकर इस तरह की अशोभनीय बात करना बेहद हैरान करने वाली है। एक महिला यह कैसे कह सकती है कि जिन बच्चे-बच्चियों का यौन शोषण हुआ है, वो चुप हो जाएँ, ताकि पाकिस्तान के लोग इंग्लैंड में फ्री होकर रह सके।

दिल्ली दंगों के आरोप-पत्र में किसके क्या-क्या षड्यंत्र, मीडिया बता सकती है लोगों को: उमर खालिद के वकील की शिकायत खारिज

दिल्ली के कड़कड़डूमा कोर्ट ने शुक्रवार (4 फरवरी 2022) को कहा कि अदालती कार्यवाही के दौरान मीडिया पर आरोप-पत्र की सामग्री पर रिपोर्ट करने से कोई नहीं रोक सकता है। इसलिए आरोप-पत्र का स्क्रीनशॉट लेने या उसे रिपोर्टिंग करने से मीडिया को नहीं रोका जा सकता है।

अपनी रिपोर्ट के लिए आरोप-पत्र का स्क्रीनशॉट लेने पर वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन ने आरोप लगाया था कि दिल्ली दंगों जैसी बड़़ी साजिश की सुनवाई के दौरान लॉबीट ने आरोपियों के बीच हुई व्हाट्सएप चैट और आरोप-पत्र के कंटेंट का स्क्रीनशॉट लिया और उससे अपनी रिपोर्ट बनाई। साथ ही आरोपितों के फोन नंबर सहित न सिर्फ अन्य व्यक्तिगत जानकारियों को सार्वजनिक किया। रिबेका ने इसे इसे अवमाननापूर्रण बताते हुए कहा कि आरोप-पत्र की सामग्री को कानून की कसौटी पर खरा उतरना बाकी है।

दरअसल, लॉबीट ने दिल्ली दंगों की सुनवाई को बड़े पैमाने पर कवर किया था। इस सुनवाई से जुड़े आरोप-पत्र एवं पूरक आरोप-पत्र कंटेंट पर रिपोर्टिंग की थी। जॉन कहना था कि लॉबीट द्वारा साझा किए गए स्क्रीनशॉट को हटाने का आदेश दिया जाएगा। इस पर विशेष लोक अभियोजक ने इसके लिए एक अलग आवेदन दायर करने की बात कही।

दरअसल, दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों के मामले में आरोपित जेएनयू के छात्रनेता उमर खालिद की वकील रेबेका जॉन ने कोर्ट में उन मीडिया संस्थानों पर नाराजगी जाहिर की थी, जिन्होंने दंगों से जुड़े लोगों के नामों का खुलासा करने वाली व्हॉट्सएप चैट को सोशल मीडिया पर रिवील किया था।

वरिष्ठ वकील जॉन ने कोर्ट में विशेष तौर पर ‘लॉबीट’ का नाम लेते हुए कहा था कि उन्होंने जिस तरह व्हॉट्सएप मैसेज साझा किए ये बेहद घृणायुक्त था। इन स्क्रीनशॉट्स को हटाया जाना चाहिए और कोर्ट की कार्यवाही के स्क्रीनशॉट नहीं लिए जाने चाहिए। इस दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से सलाह दी गई कि अगर उन चैट को हटवाना है तो इसके लिए उपयुक्त आवेदन दायर हो सकता है। यह तरीका ज्यादा सही होगा।

उल्लेखनीय है कि उमर खालिद की जमानत याचिका के विरोध में चल रही सुनवाई के बीच स्पेशल पब्लिक प्रोसेक्यूटर अमित प्रसाद ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमिताभ रावत के समक्ष खालिद के विरुद्ध कई सबूत पेश किए थे। अभियोजन पक्ष की ओर से बताया गया था कि कैसे गवाह ने बताया है कि विरोध प्रदर्शन के लिए डंडे, पत्थर, लाल मिर्च और तेजाब इकट्ठे किए गए।

हिंदू विरोधी दंगों (Delhi Anti Hindu Riots) के आरोपित और जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद (Umar Khalid) समेत 6 अन्य आरोपितों की जमानत याचिका पर गुरुवार (3 फरवरी 2022) को भी दिल्ली (Delhi) की अदालत ने सुनवाई की। इस दौरान पब्लिक प्रॉसीक्यूटर अमित प्रसाद ने अदालत में मुस्लिमों का साजिश के बारे में बताया कि गवाहों ने गवाही दी है कि आरोपित मुस्लिमों के लिए एक अलग देश बनाना चाहते थे। इसी के चलते इन्होंने हिंसा भड़काने की साजिश रची थी।

अमित प्रसाद ने 3 फरवरी को जारी जमानत की सुनवाई के दौरान एडिशनल सेशन जज अमिताभ रावत की पीठ को बताया कि उनके पास गवाहों के रिकॉर्ड हैं, जिसमें एक आरोपितों ने कहा था कि ‘मुस्लिमों के लिए अलग देश’ बनाना है। उनके पास रिकॉर्ड पर गवाह हैं कि आरोपित ने एक बयान दिया था जिसमें कहा गया था कि ‘मुसलमानों के लिए अलग राष्ट्र बनाना है’। एसएसपी ने कहा कि इसमें कोई अस्पष्टता नहीं है।

सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने डॉ अपूर्वानंद नाम के एक प्रोफेसर का एक और बयान पेश किया, जिसमें उन्होंने मजिस्ट्रेट के सामने कहा था कि दिल्ली दंगों के आरोपितों ने कथित तौर पर कहा था कि ‘सरकार को झुकाना और, हिंदू-मुसलमान करना है।’

ऋतुराज बसंत: ज्ञान, संगीत, कला की उपासना से लेकर काम और मोक्ष का जीवंत उत्सव भी, जानिए पौराणिक-सांस्कृतिक महत्व

बसंत पंचमी हर वर्ष हिन्दू पंचांग के अनुसार माघ महीने में शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। इसे माघ पंचमी भी कहते हैं। इस वर्ष आज शनिवार (5 फरवरी, 2022) को बसंत पंचमी का त्योहार पूरी श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। विश्व में बेशक ऋतुओं का कोई स्पष्ट वर्गीकरण न हो पर भारत में वर्ष को जिन छह ऋतुओं में बाँटा जाता है, उनमें वसंत अर्थात जब फूलों पर बहार आ जाती, खेतों में सोने सी चमकने वाली सरसों के पीले फूलों की चादर सी बिछ जाती है, नाना प्रकार के मनमोहक फूलों से प्रकृति धरती का शृंगार करती है। जौ और गेहूँ की बालियाँ खिलने लगतीं, आमों के पेड़ों पर बौर आ जाता और हर तरफ़ रंग-बिरंगी तितलियाँ मँडराने लगतीं है, कोयल की कूक से दिशाएँ गूँजने लगती हैं।

आमतौर पर बसंत के बारे में अब की पीढ़ी ये सब किताबों में पढ़ती है क्योंकि प्रकृति आज की पीढ़ी के लिए या तो टीवी में मौजूद है या फिर किताबों में। अब की पीढ़ी की कल्पनाएँ भी इतनी उर्वर नहीं कि उनकी कल्पनाओं में भी ऐसा बसंत हो! कहाँ है आपका बसंत? अपने फ़्लैट में मत खोजिए, ना ही शहरों की अट्टालिकाओं में, प्रकृति की गोद में ही बसंत से मुलाक़ात होगी।

चलिए आज की उन पीढ़ियों को ऋतुराज बसंत से मुलाकात कराता हूँ। बसंत, बसंत पंचमी, मदनोत्सव, सरस्वती पूजा, होली की प्रारम्भिक शुरुआत, श्मशान में मौत के तांडव पर भारी जीवन का उत्सव – बसंत यह सब कुछ है। यह लेख आज की उस व्यस्त पीढ़ी के लिए भी है, जो एक बार फिर जीवन के उत्सव में खो जाने को तैयार हैं।

ऋतु बसंत से जुड़ी पौराणिक मान्यता

आपको पता ही होगा कि बसंत ऋतु का सम्बन्ध प्रेम भाव से है, प्रेम को जिन्होंने हर रूप में अंगीकार किया ऐसे देव भगवान विष्णु और कामदेव की पूजा का शास्वत पाठ भी सनातन की ही देन है। शास्त्रों में बसंत पंचमी को ऋषि पंचमी के नाम से भी जाना जाता है।

बसंत पंचमी पर माँ सरस्वती की आराधना

कहते हैं कि सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने जीवों में प्रमुख मनुष्यों की रचना की। पर ब्रह्मा अपनी सर्जना से संतुष्ट नहीं थे। उन्हें लगता था कि कहीं न कहीं कुछ कमी रह गई है जिसके कारण चारों ओर मौन छाया रहता है। विष्णु से अनुमति लेकर ब्रह्मा ने अपने कमण्डल से जल छिड़का, पृथ्वी पर जलकण बिखरते ही उसमें कंपन होने लगा। इसके बाद वृक्षों के बीच से एक अद्भुत शक्ति का प्राकट्य हुआ।

यह प्राकट्य एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री का था जिसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में था। अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी। ब्रह्मा ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया। जैसे ही देवी ने वीणा का मधुरनाद किया, संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई। जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया। पवन चलने से सरसराहट होने लगी। तब ब्रह्मा ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा। वह दिन बसंत पंचमी का था। इसी वजह से हर साल बसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती का प्राकट्य उत्सव मनाया जाने लगा और उनकी पूजा की जाने लगी।

सरस्वती को बागेश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। ये विद्या और बुद्धि प्रदाता हैं। मधुर संगीत और सुरों की सृजनकर्ता होने के कारण ये संगीत की देवी भी हैं। ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए कहा गया है-

प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु।

अर्थात ये परम चेतना हैं। सरस्वती के रूप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं। हममें जो आचार और मेधा है उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं। इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है।

बसंत: काम मानवता का हिस्सा है

बसंत को ऋतुओं का राजा यूँ ही नहीं कहा गया है। पौराणिक मान्यता के अनुसार बसंत कामदेव के मित्र हैं, कामदेव ही इस मौसम को बेहद रूमानी कर देते हैं। आमतौर पर कामदेव को प्रेम का देवता माना गया है। इन्हें रागवृंत, अनंग, कंदर्प, मनमथ, मनसिजा, मदन, रतिकांत, पुष्पवान और पुष्पधंव नामों से भी जाना जाता है।

सनातन परम्परा में काम कभी वर्जित नहीं रहा, कामुकता हमेशा से मानवता का एक अभिन्न हिस्सा रही है। इसी वजह से आज मानवता का अस्तित्व है। अगर गुफा में रहने वाले मानव ने इसे त्याग दिया होता तो क्या आज हम होते। यह हमेशा से है और रहेगी, लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए कि काम आपकी चेतना पर हावी हो जाए। कहा गया है कि अगर काम आपकी चेतना पर शासन करने लगे, तो आप एक विवश इंसान हो जाएँगे। फिर आपके और किसी जानवर के बीच कोई फर्क ही नहीं रह जाएगा।

भारतीय संस्कृति ही है जहाँ खजुराहों और कोणार्क जैसे मंदिर हैं जो काम पर विजय के प्रेरक हैं। मंदिर के बाहर यौनरत मुद्राएँ हैं लेकिन कहीं भी मंदिर के भीतर इस तरह की कामोत्तेजक सामग्री नहीं है। यह प्रतीकात्मक रूप से हमेशा बाहरी दीवारों पर ही मिलेगी।

खजुराहो मंदिर

इसके पीछे जो सनातन सोच है वह यह है कि अगर आप यह महसूस करना चाहते हैं कि भीतर क्या है तो आपको अपनी भौतिकता या शारीरिक पहलू को यहीं बाहर छोड़ देना होगा। शारीरिक पहलू आसान होते हैं, ये बाहर ही हैं। लेकिन जो भी उसके परे है, वह तब तक उतना वास्तविक महसूस नहीं होता जब तक कि वह आपके अनुभव में न आ जाए। भारतीय परम्परा में ऐसे हर संभव साधनों का निर्माण किया गया, जिनका भौतिकता को कम करने में प्रयोग किया जा सके और जीवन की उच्चतर संभावनाओं के प्रति लोगों को ज्यादा संवेदनशील बनाया जा सके। सनातन परम्परा में बिना प्रयोग किए किसी भी चीज को अस्वीकार नहीं किया गया। पूरा जीवन ही उत्सव है यहाँ और जिसने भी जीवन को पूरी उत्सवधर्मिता से जिया, वो ईश्वर के रूप में पूजनीय है।

वासुदेव श्रीकृष्ण ने दिया था वर

पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण ने सरस्वती से ख़ुश होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी और यूँ भारत के कई हिस्सों में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की भी पूजा होने लगी जो कि आज तक जारी है।

ज्ञान की देवी भगवती सरस्वती

पारंपरिक रूप से बसंत पंचमी बच्चों के विद्यारम्भ के लिए शुभ है। इसलिए देश के अनेक भागों में इस दिन बच्चों की पढाई-लिखाई का श्रीगणेश किया जाता है। बच्‍चे को प्रथमाक्षर यानी पहला शब्‍द लिखना और पढ़ना सिखाया जाता है। आन्ध्र प्रदेश में तो इसे विद्यारम्भ पर्व ही कहते हैं।

पतंगबाज़ी का वसंत से कोई सीधा संबंध नहीं है। लेकिन पतंग उड़ाने का रिवाज़ हज़ारों साल पहले चीन में शुरू हुआ और फिर कोरिया और जापान के रास्ते होता हुआ भारत पहुँचा। और अब तो यह कई उत्सवों का हिस्सा ही हो गया है।

ज्ञान की देवी भगवती सरस्वती

यों तो माघ का यह पूरा माह ही उत्साह से परिपूर्ण है, पर वसंत पंचमी का पर्व प्राचीनकाल से ज्ञान और कला की देवी माँ सरस्वती की विशेष कृपा का दिन है। जो शिक्षाविद भारत और भारतीयता से प्रेम करते हैं, वे इस दिन माँ शारदे की पूजा कर उनसे और अधिक ज्ञानवान होने की प्रार्थना करते हैं। कलाकारों का तो कहना ही क्या? जो महत्व सैनिकों के लिए अपने शस्त्रों और विजयादशमी का है, जो विद्वानों के लिए अपनी पुस्तकों और व्यास पूर्णिमा का है, जो व्यापारियों के लिए अपने तराजू, बाट, बही खातों और दीपावली का है, वही महत्व कलाकारों के लिए वसंत पंचमी का है। चाहे वे कवि हों या लेखक, गायक हों या वादक, नाटककार हों या नृत्यकार, सब दिन का प्रारम्भ अपने उपकरणों की पूजा और माँ सरस्वती की वंदना से करते हैं।

शिक्षा जो जीवन का पाठ पढ़ाए

आमतौर पर आज जिस तरह की मशीनी शिक्षा के हम आदी होते जा रहे हैं उतना ही असली शिक्षा से कहीं दूर भी होते जा रहे हैं। शिक्षा जो जीवन को समृद्ध करे, विवेकवान, विचारवान बनाए। आज अधिक से अधिक लोग पढ़ तो रहे हैं, पूरा जीवन सूचनाओं के संग्रहण में खपा दे रहें हैं इस आशंका में कि हो सकता है शायद कभी जीवन में ये सब काम आए। ऐसे लोगों की पूरी ज़िन्दगी आपाधापी में बीत रही है। वे एक दिन जीने की आस में जीवन का सौंदर्य खो रहे हैं। न किसी काम में ध्यान केंद्रित कर पाते हैं और न ही ठीक से उत्सवों का ही आनंद उठा पाते हैं।

ज्ञान प्राप्त होने के बाद व्यक्ति को ज्यादा शांत और ज्यादा विचारशील होना चाहिए। लेकिन आज इसका उल्टा हो रहा है। भारतीय परंपरा के अभिन्न अंग ये उत्सव जीवन को ज्यादा गहराई के साथ महसूस करने के लिए शुरू किए गए थे।

समस्या यह है कि लोगों ने जीवन को ज्यादा गहराई के साथ देखने की आदत ही खो दी है। आज जीवन इतना उथला हो चुका है कि उसमें गहराई बची ही नहीं है। परिणाम स्वरूप लोग हर चीज को केवल सतही नजरिए से ही देखने के आदी हो गए हैं।

ध्यान से देंखे तो जीवन की प्रक्रिया में ही शिक्षा है। आज हम जिसे शिक्षा कहते हैं, अगर वह जीवन से अलग है तो उसे हम शिक्षा नहीं कह सकते। क्योंकि अगर जीवन ही नहीं रहा तो शिक्षा किस काम की।

अब सवाल यह है कि कोई शिक्षा कैसे प्राप्त करता है। एक शख़्स जो कभी स्कूल नहीं गया। जो अपने खेतों में काम करता है, क्या आप उसे अशिक्षित कहेंगे? जमीन के बारे में वह आपसे ज्यादा जानता है। फसलों, मौसम, प्रकृति जैसी चीजों के बारे में उसकी जानकारी भी आपसे कहीं ज्यादा है।

सद्गुरु जग्गी वासुदेव कहते हैं, “आप जितने संवेदनशील होंगे, आप उतनी ही सीमा तक जीवन को जान पाएँगे। तो ऐसे में जीवन के प्रति अपने को ज्यादा संवेदनशील बनाने के लिए हमें कुछ करना नहीं चाहिए? अगर हम संवेदनशील नहीं होंगे तो हम बिल्कुल नहीं जान पाएँगे।”

हमारे अंदर संवेदनशीलता है, इसलिए जब मच्छर भी काटता है तो हमें पता चल जाता है। मान लीजिए आपकी त्वचा मोटी है, उसमें कोई संवेदनशीलता नहीं है। ऐसे में अगर आपको मच्छर काटता है तो आपको पता ही नहीं चलेगा। अस्तित्व को जानने के लिए चीजों को ध्यान से देखना होगा। जो भी हमारे इर्द-गिर्द है उसे ध्यान से देखकर ही आत्मसात किया जा सकता है। तब आप ज्यादा संवेदनशील होंगे। आप जितना ज्यादा संवेदनशील होंगे उतने ही अधिक जागरूक होंगे, जितने अधिक जागरूक होंगे उतना ही अधिक जीवन के करीब होंगे।

बसंत अर्थात उत्सवों का मौसम

बसंत के आगमन के साथ ही होली, जो भारत का एक विशेष पर्व है, इसकी औपचारिक शुरुआत बसंत पंचमी के दिन से ही हो जाती है। आज से ही रंगों-उमंगों का त्योहार रंगोत्सव ब्रज में आरंभ हो जाएगा। भारत तथा विभिन्न देशों में मनाया जाने वाला यह उत्सव अगले पचास दिन तक चलेगा। ब्रज में बसंत पंचमी के दिन मंदिरों में ठाकुरजी को गुलाल अर्पण कर, रसिया, धमार आदि होली गीतों का गायन प्रारम्भ हो जाता है और मंदिरों में दर्शन के लिए आने वाले भक्तों पर भी गुलाल के छींटे डाले जाते हैं।

प्राचीन परम्पराओं के अनुसार, मंदिरों में होली की तैयारियों के साथ ही आम समाज में भी होली का आगाज़ हो जाता है। फाल्गुन शुक्ल पूर्णमासी की रात होलिका जलाए जाने वाले स्थानों पर होलिका के प्रतीक के रूप में रेड़ गाड़ दिया जाता है जो इस बात का भी प्रतीक है कि ब्रज में अब होली के पारम्परिक आयोजन शुरू हो गए हैं।

इसी दिन, राधारानी के गाँव बरसाना में बैलगाड़ियों पर शोभायात्रा निकाली जाती है। महाशिवरात्रि पर दूसरी और फाल्गुन शुक्ल नवमी के दिन तीसरी शोभायात्रा निकाली जाती है। फाल्गुन शुक्ल नवमी के दिन बरसाना में लट्ठमार होली खेली जाती है जो ब्रज की 50 दिन चलने वाली होली का प्रमुख आकर्षण है।

बरसाने की लट्ठ मार होली

फाल्गुन शुक्ल एकादशी को रंगपंचमी भी कहा जाता है। इस दिन वृन्दावन में ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर सहित सभी मंदिरों में गुलाल के स्थान पर ठाकुरजी को टेसू के फूलों से बने रंग के छींटे देकर ब्रज में गीले रंगों की होली शुरू हो जाती है। यही रंग प्रसाद रूप में भक्तजनों पर भी छिड़का जाता है।

बनारस : महाश्मशान की होली

बनारस में इसी दिन बाबा विश्वनाथ दरबार में भी होली की शुरुआत होती है। महाकाल से लेकर महाशमशान तक रंगों के उत्सव के रूप में बसंत की शुरुआत मृत्यु के मंच पर जीवन का उत्सव मनाने की सीख महादेव की नगरी काशी की ही देन है।

ओवैसी के हमलावर पर फँसी मीडिया, झूठ पकड़े जाने पर लल्लनटॉप ने माँगी माफी: कैबिनेट मंत्री के PRO को बता रहे थे ‘सचिन’

ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के सांसद असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi) के काफिले पर हमले के बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए दो आरोपितों सचिन और शुभम को गिरफ्तार किया था। इसके बाद से लगातार कई मीडिया चैनलों पर एक तस्वीर वायरल कर दावा किया जा रहा है कि ओवैसी पर हमला करने वाले व्यक्ति सचिन का सीएम योगी समेत बीजेपी के कई नेताओं के साथ करीबी संबंध है।

हालाँकि, जिस व्यक्ति की तस्वीर को वायरल कर उसे सचिन बताया जा रहा था औऱ ये साबित करने की कोशिश मीडिया और सोशल मीडिया पर किया जा रहा था कि सचिन के बीजेपी के बड़े नेताओं के साथ संबंध हैं वो दरअसल नीतेश सिंह तोमर हैं। इस न्यूज के वायरल होने के बाद नीतेश तोमर ने ट्वीट कर सच्चाई सामने रखी। उन्होंने लिखा, “मैं नितेश सिंह तोमर,कैबिनेट मंत्री श्री भूपेंद्र सिंह चौधरी जी का PRO हूँ। मेरी फोटो को सचिन हिंदू के नाम से प्रसारित कर मेरी छवि को खराब करने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है। चुनाव के समय ऐसा करने वालों की मैं भत्सर्ना करता हूँ। @Uppolice कृपया ऐसा करने वालो के खिलाफ कार्यवाही करें।”

इसके साथ ही नीतेश ने कई सारे चैनलों की स्क्रीनशॉट भी शेयर की है। इसके मुताबिक, द लल्लनटॉप ने प्रमुखता से सीएम योगी आदित्यनाथ के साथ नीतेश की तस्वीर को ओवैसी का हमलावर बता कर प्रसारित कर दिया। हालाँकि जैसे ही इसकी सच्चाई सामने आई तो शब्दों से खेलते हुए एक आर्टिकल लिखा और उसके अंत में केवल एक शब्द में माफी माँगी

साभार: नीतेश तोमर

लकीर के फकीर की तरह बिनी किसी रिसर्च के लाइव हिंदुस्तान ने भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ नीतेश तोमर की तस्वीर को सचिन पंडित की इमेज बताकर वायरल कर दिया। और सच्चाई सामने आने के बाद भी अभी तक किसी भी तरह की माफी नहीं माँगी है।

साभार: नीतेश तोमर

इसके अलावा पंकज चतुर्वेदी नाम के यूजर ने भी सीएम योगी के साथ नीतेश तोमर की तस्वीर को सचिन बताकर वायरल किया।

साभार: नीतेश तोमर

इसी तरह का झूठ AIMIM टाइगर फोर्स यूजर ने भी नीतेश की सीएम योगी के साथ तस्वीर को वायरल कर यह सिद्ध करने की कोशिश की कि सचिन पंडित के सीएम योगी समेत बीजेपी के कई नेताओं से संबंध हैं।

साभार: नीतेश तोमर

अपने खिलाफ चलाए जा रहे अभियान और CM योगी को बदनाम करने की साजिश का पर्दाफाश खुद नीतेश सिंह तोमर ने ही कर दिया। हालाँकि, यूपी पुलिस की त्वरित कार्रवाई के बाद ही ओवैसी पर हमला करने वाले दोनों आरोपितों की गिरफ्तारी के बाद तस्वीरें सामने आ गई थीं। फिर भी जानबूझकर सोशल मीडिया और मीडिया के कुछ धड़ों ने फेक न्यूज़ चलाई। ऐसे में अब खुद नितेश के खंडन, कुछ मीडिया समूहों के माफ़ी और उपलब्ध कराए गए सबूतों से ये स्पष्ट हो गया है कि कई मीडिया चैनलों में सचिन पंडित को सीएम योगी और बीजेपी नेताओं का करीबी बताकर प्रसारित किया जा रहा है वो पूरी तरह से झूठ और बेबुनियाद है।