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भगवान विष्णु की पौराणिक कहानी से प्रेरित है अल्लू अर्जुन की नई हिंदी डब फिल्म, रिलीज को तैयार ‘Ala Vaikunthapurramuloo’

‘पुष्पा: द राइज’ (Pushpa: The Rise) की बंपर सफलता के बाद से अल्लू अर्जुन के सितारे बुलंदी पर हैं। इस फिल्म से रातों रात उनके प्रशंसकों की संख्या बढ़ गई है। अल्लू के फैंस अब उनकी अगली फिल्म ‘अला वैकुंठपुरमुलु’ के हिंदी में रिलीज होने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। मंगलवार (18 जनवरी 2022) को हिंदी में फिल्म का टीजर रिलीज किया गया था, जिसे काफी पसंद किया। वहीं गुरुवार (20 जनवरी 2022) को हिंदी में इसका ट्रेलर रिलीज किया जाएगा। फिल्म का टाइटल भले ही बोलने में मुश्किल लगे, लेकिन इसका अर्थ उतना ही यूनिक है।

मेकर्स ने इस फिल्म के टाइटल का मतलब बताया है, ताकि अला वैकुंठपुरमुलु (Ala Vaikunthapurramuloo) से अधिक से अधिक दर्शकों का जुड़ाव हो सके। फिल्म निर्माण कम्पनी ‘गोल्डमाइंस टेलीफिल्म्स’ ने अपने ट्विटर हैंडल पर Ala Vaikunthapurramuloo का मतलब बताया है? उन्होंने लिखा, “अला वैकुंठपुरमुलु पोतन्ना (मशहूर कवि जिन्होंने श्रीमद्भागवत का संस्कृत से तेलुगु में अनुवाद किया) की मशहूर पौराणिक कहानी गजेन्द्र मोक्ष स्तुति की सुप्रसिद्ध पंक्ति है। भगवान विष्णु हाथियों के राजा गजेंद्र को मकरम (मगरमच्छ) से बचाने के लिए नीचे आते हैं। उसी प्रकार फिल्म में रामचंद्र के घर का नाम वैकुंठपुरम है, जहाँ बंटू (अल्लू अर्जुन) परिवार को बचाने आता है। अला वैकुंठपुरमुलू की यही खूबी है।”

अल्लू अर्जुन की फिल्म अला वैकुंठपुरमुलु गणतंत्र दिवस (26 जनवरी 2022) पर हिंदी में सिनेमाघरों में रिलीज की जाएगी। फिल्म 2000 स्क्रीन्स पर रिलीज की जाएगी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अगर ‘पुष्पा’ की तरह अल्लू की यह फिल्म भी बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचाने में कामयाब रही तो, इसके बाद और भी दक्षिण भारतीय फिल्मों को हिंदी में डब करके रिलीज किया जा सकता है।

बता दें कि ‘अला वैकुंठपुरमुलु’ फिल्म के निर्माता अल्लू अर्जुन के पिता अल्लू अरविंद हैं। इस तेलुगू फिल्म को तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में 12 जनवरी 2020 को सिनेमाघरों में रिलीज किया गया था, जो सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में से एक थी। इसे नेटफ्लिक्स पर तेलुगु के साथ मलयालम में भी डब करके रिलीज किया गया है। अला वैकुंठपुरमुलु का निर्देशन त्रिविक्रम श्रीनिवास (Trivikram Srinivas) ने किया है। त्रिविक्रम श्रीनिवास के डायरेक्शन में बनने वाली फिल्म में अल्लू अर्जुन और पूजा हेगड़े के अलावा तब्बू, जयराम, सुशांत, निवेथा पेथुराज, नवदीप और राहुल रामकृष्ण ने भी मुख्य भूमिका निभाई है।

लखनऊ में मिली थी माँ-बाप और बेटे की सिर कटी लाश: यूपी पुलिस ने किया इस ट्रिपल मर्डर केस का सनसनीखेज खुलासा, सरफराज गिरफ्तार

इस साल की शुरुआत में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से हत्या का एक सनसनीखेज मामला सामने आया था। जिसमें एक के बाद एक तीन मौतें हुईं लेकिन इसके तार थोड़े उलझे हुए थे। सबसे पहली लाश 6 जनवरी, 2022 को इटौंजा में 26 साल के एक युवक की मिली। इसके दो दिन बाद 8 जनवरी को मलिहाबाद में एक बुजुर्ग का शव मिला और फिर 13 जनवरी को मॉल इलाके में एक बुजुर्ग महिला की लाश मिली। यह तीनों मामले इसलिए भी चौकाने वाले थे कि इन सब की हत्या बहुत ही जघन्य तरीके से गला काटकर हुई थी।

यूपी पुलिस की जाँच में जैसे ही यह बात सामने आई कि तीनों लाशों में आपसी नाता है। पुलिस को पता चला कि मरने वाले तीनों कोई और नहीं माँ-बाप और उनका बेटा है। फिर मामले का सिरा खुलते देर नहीं लगा।

न्यूज़ 18 की रिपोर्ट के रिपोर्ट के अनुसार, आईजी लखनऊ रेंज लक्ष्मी सिंह ने बताया कि सबसे पहले युवक की सिर कटी लाश मिलने पर बीकेटी पुलिस ने जाँच शुरू की तो पता चला कि लखनऊ कमिश्नरेट के विकासनगर इलाके के रहने वाले रिटायर्ड इंडियन ऑयल अफसर महमूद अली खाँ और उनकी पत्नी भी जम्मू-कश्मीर के रामबन से लापता हो गए हैं। आईजी लक्ष्मी सिंह ने बताया कि सीओ नवीना शुक्ला को मामले के खुलासे की जिम्मेदारी दी गई, जिसके बाद सीओ ने एसपी रामबन से बातचीत की।

सीओ की अगुआई में जब जाँच टीम रिटायर्ड अफसर के घर गई तो वहाँ पूछताछ के दौरान ही रिटायर्ड अफ़सर के बड़े बेटे सरफराज पर पुलिस को संदेह हुआ। यूपी पुलिस ने जब सरफराज के साथ सख़्ती से पूछताछ की तो पूरे मामले में जो खुलासा हुआ उसने इस ट्रिपल मर्डर की गुत्थी को सुलझा दिया। जिसके बाद पुलिस ने बुजुर्ग दंपति के दूसरे बेटे आरोपित सरफराज और उसके साथी अनिल यादव को गिरफ्तार कर लिया।

रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस हिरासत में आरोपित बेटे सरफराज ने बताया कि उसके पिता उसे पसंद नहीं करते थे और उसे डर था कि कहीं पिता सारी जायदाद छोटे बेटे शावेज़ को न दे दें। सरफराज ने आरोप लगाया उसके पिता उसके साथ टोना टोटका करते थे। उसने बताया कि उसके पिता उसे बिरयानी में कुछ मिलाकर देते थे। ऐसे में सरफराज ने उनकी हत्या की साजिश रचते हुए अपने मित्र अनिल यादव के साथ मिलकर 5 जनवरी की रात 90 नींद की गोलियाँ दाल में मिलाकर माँ-बाप और भाई को खिला दी। फिर सबके सो जाने के बाद बिस्तर पर ही सबको हलाल कर दिया।

यूपी पुलिस को पूछताछ में सरफराज ने यह भी खुलासा कर दिया कि हत्या के बाद उसने ही पिता का शव मलिहाबाद में, माँ का मॉल में और भाई का शव इटौंजा में फेंका था।

‘एक्सप्रेस प्रदेश’ बन रहा है यूपी, ग्रामीण इलाकों में भी 15000 Km सड़कें: CM योगी कुछ यूँ बदल रहे रोड इंफ्रास्ट्रक्चर

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार न सिर्फ गाँव-गाँव तक अच्छी सड़कें पहुँचा रही है, बल्कि एक्सप्रेसवे का एक जाल भी बिछा रही है। दिसंबर 2020 में देश के सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का कहना है कि पहले 5 वर्षों (2017-22) में आपने जो देखा, वो तो सिर्फ ट्रेलर है। पूरी फिल्म तो अभी बाकी है। उन्होंने बताया कि कैसे भाजपा शासन के अंतर्गत उत्तर प्रदेश में पिछले 50 वर्षों से ज्यादा सड़कें इन 5 वर्षों में बन गईं। उनकी मानें तो राज्य को 5 लाख करोड़ रुपए के सड़कों की सौगात अभी मिलनी है।

केंद्रीय मंत्री और पूर्व भाजपा अध्यक्ष का ये बयान कोई अतिशयोक्ति नहीं था, क्योंकि 2017 से पहले उत्तर प्रदेश होकर गुजरने वाले और अब वहाँ की यात्रा करने वाले इस फर्क को समझते हैं। हाल ही में चालू किया गया ‘पूर्वांचल एक्सप्रेसवे’ हो या फिर सीएम योगी आदित्यनाथ के शासनकाल में आकार ले रहा ‘गंगा एक्सप्रेसवे’, राज्य में सड़कों का एक ऐसा जाल बिछ रहा है, जो न सिर्फ इसकी छवि बदल रहा है बल्कि निवेश को भी आकर्षित कर रहा है।

योगी सरकार ने गाँव-गाँव को अच्छी सड़कों से जोड़ा, किसानों को हो रहा सबसे बड़ा फायदा

ऐसा नहीं है कि सिर्फ बड़े-बड़े शहरों में ही सड़कें बनाई जा रही हैं या फिर दुनिया को दिखाने के लिए एक्सप्रेसवे ही बन रहे हैं। सिर्फ ग्रामीण इलाकों में योगी आदित्यनाथ की सरकार ने अब तक 15,000 किलोमीटर सड़कों का निर्माण किया है। कनेक्टिविटी और इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने का कार्य गाँवों में और तेज़ी से चल रहा है। 5 वर्षों में 15,246 किलोमीटर सड़कों का निर्माण पिछली सारी सरकारों के रिकार्ड्स को ध्वस्त करता है। तहसील और प्रखंड स्तर के कार्यालयों को दो लेन वाली चौड़ी सड़कों से जोड़ा जा रहा है।

इससे किसानों को भी फायदा हो रहा है, जो अपने उत्पाद को लेकर दूर-दूर तक यात्रा कर सकते हैं। गाँवों को अच्छी सड़कों के जरिए नगरों से जोड़ने पर आम लोगों का भी फायदा है। योगी सरकार ने 1557 ‘राजस्व गाँवों’ को चिह्नित कर के इन्हें शहरों से जोड़ने के लिए 1114 करोड़ रुपए में 1763 किलोमीटर सड़कों का निर्माण किया जा रहा है। अब तक 1546 ‘रिवेन्यू विलेजेज’ को 1740.24 किलोमीटर सड़कों के जरिए जोड़ा जा चुका है। साथ ही 1407 करोड़ रुपए खर्च कर के 2173.60 किलोमीटर सड़कों के माध्यम से 1717 गाँवों को बड़े राजमार्गों से जोड़ा गया है।

इसके अलावा ‘मुख्यमंत्री समग्र ग्राम विकास योजना’ के तहत भी 29 किलोमीटर सड़क बना कर 33 ‘Revenue Villages’ को 14.35 करोड़ रुपए खर्च कर के जोड़ा गया है। 26 ऐसे तहसील मुख्यालय बचे थे, जिन्हें दो लेन की सड़कों से नहीं जोड़ा गया था। इसके लिए 270 किलोमीटर रोड बनाए गए और इसमें 387 करोड़ रुपए खर्च आए। इसी तरह 144 प्रखंड मुख्यालयों को 1282 किलोमीटर की सड़कों के जरिए जोड़ा जा रहा है, जिसमें 2088 करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में बिछाए जा रहे एक्सप्रेसवेज के जाल

हाल ही में जिस ‘पूर्वांचल एक्सप्रेसवे’ का जिक्र कर लेते हैं, जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया। इस पर उनका विमान भी लैंड किया और हमें भारतीय वायुसेना का एक ‘एयर शो’ भी देखने को मिला। 341 किलोमीटर पूर्वांचल एक्सप्रेसवे राजधानी लखनऊ के चाँद सराय से गाजीपुर तक जाता है। इसके निर्माण के बाद दिल्ली से गाजीपुर की दूरी मात्र 10 घंटे में पूरी हो जाती है। इसे बनाने में 22,497 करोड़ रुपए एक खर्च आया है। लखनऊ, बाराबंकी, अमेठी, अयोध्या, सुल्तानपुर, अंबेडकरनगर, आजमगढ़, मऊ और गाजीपुर – ये वो 9 जिले हैं, जिन्हें पूर्वांचल एक्सप्रेसवे आपस में जोड़ता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जुलाई 2018 में आजमगढ़ में इसकी आधारशिला रखी थी। ये एक्सप्रेसवे गाजीपुर में NH-31 पर स्थित हैदरिया गाँव में आकर ख़त्म होता है। इससे बिहार वासियों को भी फायदा मिलेगा, क्योंकि इस गांव की दूरी बिहार सीमा से मात्र 18 किलोमीटर ही है। फ़िलहाल ये 6 लेन का है, लेकिन इसे इस तरह से बनाया गया है कि भविष्य में 8 लेन भी किया जा सके। अक्टूबर 2018 में इसका निर्माण कार्य शुरू हुआ था। इस हिसाब से इसे 3 वर्षों में पूरा कर लिया गया है।

इसके अलावा 2018 में उद्घाटन किया गया ‘आगरा लखनऊ एक्सप्रेसवे’, आने वाला 296 किलोमीटर लंबा ‘बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे’, 91 किलोमीटर लंबा ‘गोरखपुर लिंक एक्सप्रेसवे’ और 594 किलोमीटर लंबा ‘गंगा एक्सप्रेसवे’ उत्तर प्रदेश की पूरी तस्वीर ही बदल कर रख देगा। इन सभी के पूरे होने जाने के बाद उत्तर प्रदेश में 1788 किलोमीटर के लम्बे एक्सप्रेसवे का जाल बिछ जाएगा, जबकि फ़िलहाल पूरे भारत में 2049 किलोमीटर एक्सप्रेसवे का जाल बिछा हुआ है।

‘उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवेज औद्योगिक विकास प्राधिकरण (UPEIDA)’ इस निर्माण कार्य का पूरा जिम्मा उठा रहा है। लखनऊ से दिल्ली और देश के बाकी बड़े महानगरों के जुड़ने से उत्तर प्रदेश की सामाजिक-आर्थिक संरचना भी बदल रही है। इसी तरह 5876 करोड़ रुपए खर्च कर के बन रहा ‘गोरखपुर लिंक एक्सप्रेसवे’ गोरखपुर को आजमगढ़, आंबेडकर नगर और संत कबीर नगर को जोड़ेगा। उम्मीद है कि जल्द ही ये भी चालू हो जाएगा। वहीं 6 लेन वाला ‘गंगा एक्सप्रेसवे’ भी मेरठ को प्रयागराज से जोड़ेगा।

इन सभी एक्सप्रेसवेज के आसपास इंडस्ट्रियल हब्स भी बनाव जा रहे हैं। जैसे, महिलाबाद के आम को ही ले लीजिए। आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे बन जाने के बाद वो दिल्ली और देश के अन्य बाजारों तक पहुँच रहे हैं। इसी तरह औरैया में NTPC पॉवर प्लांट और GAIL का गैस आधारित पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स है, जिसे ‘बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे’ के चालू होने से फायदा होगा। पिछड़े रहे एक राज्य में इस तरह का विकास 2017 के बाद ही देखने को मिल रहा है।

इसी तरह पहले आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे को फंड करने वाला कोई नहीं मिल रहा था, लेकिन UPEIDA ने इसे फंड करने की कोशिश की और 22 महीने में इसे पूरा कर लिया गया। खास बात ये है कि इन परियोजनाओं को समय से पहले पूरा किया जा रहा है। पहले जमीन न मिलने और पर्यावरण सम्बंधित अनुमति न मिलने के कारण ये प्रोजेक्ट्स अटके रह जाते थे। अब इनके बनने से गाँवों में ग्रामीणों की संपत्ति के दाम भी बढ़ते हैं। उन्हें बेहतर सुविधाएँ मिलती हैं।

जब योगी आदित्यनाथ की सरकार सत्ता में आई थी, तब वहाँ दो ही एक्सप्रेसवे चालू अवस्था में थे – एक आगरा को दिल्ली से जोड़ने वाले 165 किलोमीटर लंबा ‘यमुना एक्सप्रेसवे’ और 302 किलोमीटर लंबा लखनऊ-आगरा एक्सप्रेसवे। 208-17 के बीच इन्हें पूरा किया गया था। अब उत्तर प्रदेश में 6 एक्सप्रेसवे हो जाएँगे। ‘बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे’ चित्रकूट से इटावा तक बाँदा, महोबा, हमीरपुर, जालौन और औरैया को जोड़ेगा। पारदर्शी प्रक्रियाओं के कारण योगी सरकार को 1132 करोड़ रुपए का फायदा हुआ है, खर्च 12.72% कम हुए हैं।

इसी तरह ‘गंगा एक्सप्रेसवे’ मेरठ, हापुड़, बुलंदशहर, अमरोहा, संभल, बदायूँ, शाहजहाँपुर, हरदोई, उन्नाव, रायबरेली, प्रतापगढ़ और प्रयागराज को आपस में जोड़ेगा। कुल 12 जिले इससे आपस में जुड़ जाएँगे और ये भारत का सबसे लंबा एक्सप्रेसवे बन जाएगा। ये एक्सप्रेसवे 6 लेन का होगा, जिसे बाद में 8 लेन तक बढ़ाया जाएगा। 7800 हेक्टेयर में से 64% भूमि का अधिग्रहण हो चुका है। इस तरह सपा-बसपा को मिला कर जितने किलोमीटर बने, उसका डेढ़ गुना योगी सरकार ने अभी ही बना दिया है।

इंग्लैंड के पूर्व क्रिकेटर केविन पीटरसन ने की गैंडों को बचाने के लिए पीएम मोदी के प्रयासों की तारीफ, वह खुद भी ऐसे कर रहे हैं वन्यजीवों की सुरक्षा

इंग्लैंड के पूर्व क्रिकेटर केविन पीटरसन (kevin Pietersen) इन दिनों गैंडों को बचाने के लिए जीतोड़ कोशिश कर रहे हैं। इसी क्रम में उन्होंने हुबोट के साथ मिलकर एक टीम बनाई है, जिससे वह गैंडों की विलुप्त हो रही प्रजातियों को बचा सकें। अपनी शानदार बल्लेबाजी के लिए दुनिया भर में मशहूर केविन ने भारत में गैंडों के अवैध शिकार को रोकने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा किए गए प्रयासों की भी जमकर तारीफ की है। उन्होंने ट्वीट किया, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत में वन्यजीवों की रक्षा के लिए काम करने वाले सभी लोगों मेरा सलाम। मैं उनमें से बहुत लोगों से मिला हूँ और उन सभी का सम्मान करता हूँ।” इस दौरान इंग्लैंड के खिलाड़ी ने इस बात का जिक्र भी किया कि भारत में गैंडों का शिकार लगभग खत्म हो चुका है।

पीटरसन जंगलों में गैंडों के अवैध शिकार से बेहद परेशान हैं। दक्षिण अफ्रीका में जन्मे क्रिकेटर ने हुबोट के साथ मिलकर एक टीम बनाई है, जिसमें बिग बैंग यूनिको सोराई II (Big Bang Unico SORAI II) के सहयोग से उन्हें अवैध शिकार के खिलाफ लड़ाई में मदद मिलेगी। वर्ष 2018 में पीटरसन ने चैरिटी सोराई (Save Our Rhinos Africa & India) की स्थापना की थी, ताकि वह जानवरों की विलुप्त होती प्रजातियों और उनके अवैध शिकार के प्रति लोगों को जागरूक कर सकें। इसे उन्होंने विश्व वन्यजीव कोष (World Wildlife Fund) समक्ष गंभीर रूप से संकटग्रस्त स्थिति के रूप में वर्णित किया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सोराई की मुख्य लड़ाई गैंडों का अवैध शिकार करने वालों से है। पिछले 10 वर्षों में, दक्षिण अफ्रीका के क्रूगर पार्क में दो तिहाई गैंडों को शिकारियों द्वारा मार दिया गया है। पीटरसन बताते हैं कि आज क्रूगर पार्क में 500 से भी कम काले गैंडे बचे हैं। उन्होंने बताया कि कोरोना महामारी की शुरुआत जानवरों के लिए काफी राहत भरी रही थी, क्योंकि उस वक्त इंसान घरों में बंद थे और वह खुले आसमान के नीचे बिना किसी डर के साँस ले रहे थे। जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें पिछले बारह महीनों में गैंडों की सुरक्षा में मदद मिली है या यह बाधित हुआ।

इसका जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि दक्षिण अफ्रीका में जब फुल लॉकडाउन था, वो समय जानवरों के लिए बहुत अच्छा था। वे बताते हैं, “मेरे रेंजर मित्र मुझे बता रहे थे कि वे उस समय ऐसी चीजें देख रहे थे, जो उन्होंने इससे पहले कभी नहीं देखी थीं, जैसे कि जानवर अलग-अलग रास्तों का इस्तेमाल कर रहे थे। खुले में घूम रहे थे, क्योंकि वहाँ कोई इंसान नहीं था। लेकिन जैसे ही लॉकडाउन खत्म हुआ फिर से उनकी जान का खतरा बढ़ गया।”

उन्होंने बताया, “इस समय मैं जिस दुनिया में हूँ, मैंने अपना जीवन पूरी तरह से जानवरों को सम​र्पित कर दिया है। मैं अपने देश और यहाँ विलुप्त हो रही प्रजातियों की रक्षा के लिए काम कर रहा हूँ। यह एक ऐसी जगह है जहाँ मुझे किसी से कोई प्रतिस्पर्धा करने की जरूरत नहीं है। यह एक ऐसी जगह है जहाँ मैं हर दिन हँस सकता हूँ, मैं जितना हो सके अपने परिवार के साथ रह सकता हूँ, जब चाहे यात्रा कर सकता हूँ और कोई भी निर्णय ले सकता हूँ। मैं दुनिया के कुछ सबसे दयालु लोगों के साथ काम कर सकता हूँ।”

जानवरों को बचाने के लिए नई तकनीक का प्रयोग

वह जानवरों को बचाने के लिए नई तकनीक का प्रयोग कर रहे हैं। हम अभी भी राइनो सैंक्चुरी केयर फॉर वाइल्ड के लिए कई प्रकार के संसाधन उपलब्ध करवाए हैं। इसके अलावा वह उन तरीकों को भी आजमा रहे हैं, जिससे शिकारियों पर नकेल कसी जा सके। वह नई तकनीक के माध्यम से शिकारियों को जानवरों के पास जाने से पहले ही रोक देते हैं। उन्होंने बताया कि हमारे पास थर्मल इमेजिंग कैमरे, रात के कैमरे और ड्रोन हैं। इन उपकरणों से हमें जानवरों को सुरक्षित करने में मदद मिलती है।

पीटरसन ने बताया कि हम 3,000 बच्चों को स्कूल के माध्यम से फंड देते हैं और छात्रवृत्ति कार्यक्रम आयोजित करते हैं। स्कूल के बच्चे और अधिकारी रेंजर्स की रक्षा कर रहे हैं, शिकारियों से लड़ रहे हैं, शिकार किए गए जानवरों और घायल जानवरों की इलाज में मदद करते हैं। इन सभी के माध्यम से हमें जानवरों को बचाने में मदद मिलती है। इसलिए हमें अवैध शिकार को रोकने के लिए जितना हो सके उतना प्रयास करना होगा।

मुझे खुद पर गर्व है: पीटरसन

उन्होंने कहा कि गैंडों को बचाने के लिए मैं जो कुछ भी कर रहा हूँ, मुझे उस पर गर्व है। दुनिया भर में करोड़ों लोग हैं, जो इसके बारे में नहीं जानते हैं। पिछले सात वर्षों में मैंने इस बारे में लोगों को जागरूक किया है, ताकि वह भी इसके लिए आगे आएँ। मुझे जानवरों से बेहद लगाव है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैंने कितने टेस्ट मैच खेले हैं, मेरी कलाई पर कितनी महँगी घड़ी है। आपको जानवरों और उस जगह का सम्मान करना होगा जहाँ वे रहते हैं।

बता दें कि असम में कॉन्ग्रेस के शासनकाल के दौरान 167 गैंडों का शिकार किया गया था। वहीं, 2021 में सिर्फ 1 गैंडे का ही शिकार हुआ है। इस लिहाज से देखा जाए तो साल 2021 में असम में गैंडों का शिकार बीते 21 सालों में सबसे कम हुआ है।

बहू अपर्णा यादव के बाद मुलायम सिंह के साढ़ू प्रमोद गुप्ता भी सपा छोड़ भाजपा में होंगे शामिल: कहा- नेताजी को बंधक बना लिया गया है

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव (UP Assembly Election 2022) से ठीक पहले समाजवादी पार्टी (सपा) को एक के बाद एक झटके लग रहे हैं। मुलायम सिंह यादव (Mulayam Singh Yadav) के परिवार के सदस्य और रिश्तेदार ए​क-एक करके उनका साथ छोड़ रहे हैं। छोटी बहू अपर्णा यादव (Aparna Yadav) के बाद मुलायम सिंह यादव के साढ़ू और पूर्व विधायक प्रमोद कुमार गुप्ता (Pramod Kumar Gupta) भी बीजेपी का दामन थामेंगे। रिश्ते में अखिलेश यादव के मौसा प्रमोद गुप्ता ने इसका ऐलान किया है।

सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव के साढ़ू और औरैया जिले के बिधूना क्षेत्र से विधायक रहे प्रमोद कुमार गुप्ता ने कहा कि सपा अपनी मूल विचारधारा से भटक गई है। पार्टी में अब नेता जी (मुलायम सिंह यादव) और शिवपाल सिंह यादव का कोई सम्मान नहीं बचा है। वह इसे आहत हैं, इसलिए अब भाजपा में शामिल होने जा रहे हैं।

मुलायम सिंह यादव की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता के बहनोई गुप्ता ने आरोप लगाया है कि सपा में मुलायम सिंह यादव को विक्रमादित्य मार्ग वाले आवास पर बंधक बना लिया गया है और उन्हें किसी से मिलने भी नहीं दिया जा रहा है। यही नहीं, नेता जी के जन्मदिन वाले दिन उन्हें बोलने भी नहीं दिया गया और उनसे माइक छीन लिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि आज पार्टी में गैर-समाजवादियों को तरजीह दी जा रही है और पुराने समाजवादियों की घोर उपेक्षा की जा रही है।

उन्होंने आगे कहा कि सपा में उन लोगों को शामिल किया जा रहा है, जो पार्टी और नेता जी को गालियाँ देते थे। जिस दल में नेता जी का ही अपमान होने लगा हो उस दल में रहने का अब कोई मतलब नहीं रह गया है, इसलिए मैं भाजपा में शामिल होने जा रहा हूँ।

बता दें कि मुलायम की छोटी बहू अपर्णा यादव ने बुधवार (19 जनवरी 2022) को भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया है। उन्होंने दिल्ली में बीजेपी की सदस्यता ग्रहण की।

‘अद्भुत है PM मोदी की सोच, वो देश को आगे ले जा रहे’: BJP में शामिल हुए दिवंगत CDS जनरल बिपिन रावत के भाई कर्नल विजय रावत

दिवंगत CDS जनरल बिपिन रावत के भाई कर्नल (रिटायर्ड) विजय रावत ने उत्तराखंड में भाजपा का दामन थाम लिया है। इस दौरान उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी मौजूद रहे। सीएम धामी ने कहा कि आज कर्नल विजय रावत भाजपा में शामिल हुए हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रवादी विचारधारा से प्रभावित होकर और प्रधानमंत्री से प्रभावित होकर आप ने भाजपा की सदस्यता हासिल की है। उन्होंने आगे कहा कि आपके आने से पार्टी को मज़बूती मिलेगी।

कर्नल विजय रावत ने कहा, “मैं इसके लिए कृतज्ञ हूँ कि भाजपा ने मुझे पार्टी में शामिल होने का मौका दिया है। मेरे पिता भाजपा में थे। अब भारतीय सेना ने सेवानिवृत्ति के बाद मुझे भाजपा में आने का मौका मिला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विजन काफी ज्ञानपूर्ण और दूरदर्शी है।” उन्होंने बताया कि उनके पिता भी फ़ौज में थे। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी की जो सोच है, वो काफी आगे का है और अद्भुत है। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी के जो विचार हैं, उनके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता।

उन्होंने कहा, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हमेशा देश को आगे ले जाने के बारे में सोचते हैं। उत्तराखंड की उन्नति के लिए जो मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की योजना है और वो जो करना चाहते हैं, वो काफी अच्छा है। भाजपा का जो समझने और कार्य करने का ढंग है, ये सभी को बहुत प्यारा है। यही एक पार्टी है, जो असलियत में देश का भला चाहती है। अर्थव्यवस्था से लेकर हर क्षेत्र को लेकर पार्टी के कार्य करने की सोच अच्छी है। भाजपा बदलाव लाने के लिए काम कर रही है।”

भाजपा में शामिल होने से पहले CM धामी से मिले थे CDS जनरल बिपिन रावत के भाई कर्नल (रिटायर्ड) विजय रावत

इससे पहले दिवंगत CDS जनरल बिपिन रावत के भाई कर्नल विजय रावत ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मुलाकात की और भाजपा की प्रशंसा की। उनके साथ मुलाकात की तस्वीर सोशल मीडिया पर डालते हुए सीएम थामी ने लिखा, “आज दिल्ली में देश के प्रथम CDS और उत्तराखंड के अभिमान स्वर्गीय श्री बिपिन रावत के भाई कर्नल विजय रावत से भेंट की। बिपिन रावत व उनके परिवार द्वारा की गई राष्ट्रसेवा को हमारा नमन है। मैं सदैव उनके सपनों के अनुरूप उत्तराखंड बनाने हेतु कार्य करता रहूँगा।”

इस दौरान कर्नल (रिटायर्ड) विजय रावत ने कहा कि वो उत्तराखंड राज्य को लेकर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के दृष्टिकोण को पसंद करते हैं। उन्होंने कहा कि सीएम धामी का विजन भी वही है, जो उनके दिवंगत भाई CDS जनरल बिपिन रावत के दिमाग में था। जब उनसे पूछा गया कि क्या आप भाजपा में शामिल होंगे, इस पर उन्होंने कहा कि वो उत्तराखंड की जनता की सेवा करना चाहेंगे। सीएम धामी ने अंगवस्त्र ओढ़ा कर कर्नल विजय रावत को सम्मानित किया।

ज्ञात हो कि 8 दिसंबर, 2021 को तमिलनाडु के सुलूर एयर बेस से से ऊटी के करीब वेलिंगटन में डिफेंस सर्विस स्टाफ कॉलेज जा रहा भारतीय वायुसेना का Mi-17V5 हेलिकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, जिसमें CDS रावत और उनकी पत्नी समेत 14 लोगों की मृत्यु हो गई थी। मौसम के चलते पायलट के ‘भटकने’ के कारण ऐसा हुआ था। हैलीकॉप्टर सीधा जमीन से जा टकराया था। कर्नल विजय रावत ने कहा कि उनके परिवार की विचारधारा भाजपा से मिलती-जुलती है, इसीलिए मौके मिलने पर वो पार्टी के टिकट पर आगामी विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए भी तैयार हैं।

बता दें कि CDS जनरल बिपिन रावत का भी अपने गृह राज्य उत्तराखंड से खास लगाव था। सितंबर 2019 में वो पत्नी के साथ केदारनाथ और गंगोत्री धाम का दर्शन करने पहुँचे थे। उन्होंने उत्तरकाशी के डुंडा स्थित अपने ननिहाल थाती जाकर लोगों से मुलाकात की थी।

उस दौरान उन्होंने पलायन को पहाड़ की सबसे बड़ी समस्या बताते हुए कहा था कि वो यहाँ के लोगों के लिए कुछ करना चाहते हैं। उन्होंने बताया था कि इस क्षेत्र में उच्च-शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए वो राज्य और केंद्र की सरकारों से बातचीत करते रहते हैं। उन्होंने पहाड़ों में इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज खोलने की वकालत करते हुए कहा था कि रिटायरमेंट के बाद वो यहाँ के गाँवों की सेवा करेंगे। हालाँकि, हैलीकॉप्टर क्रैश ने उन्हें देश से छीन लिया, जिससे लोग काफी शोक में डूब गए।

‘महापहित’ साम्राज्य के ‘नुसंतारा’ को अपनी नई राजधानी बनाएगा इंडोनेशिया, दुनिया के सबसे बड़े इस्लामी मुल्क में और मजबूत हो रही हिन्दू विरासत

इंडोनेशिया ने मंगलवार (18 जनवरी 2022) को दुनिया में सबसे तेजी से डूबने वाले शहर राजधानी जकार्ता में जगह की कमी, भूकंप, बाढ़ और आग जैसी प्राकृतिक आपदाओं के खतरे को देखते हुए नुसंतारा (Nusantara) को देश की नई राजधानी बनाने का ​फैसला लिया। नुसंतारा को 34 अरब अमेरिकी डॉलर खर्च कर बोर्नियो द्वीप (Borneo Island) के पूर्वी हिस्से में स्थित जंगलों से घिरे कालीमंतन (Kalimantan) प्रांत में 216 वर्गमील में बसाया जाएगा। नुसंतारा का अर्थ स्थानीय जैवनिज भाषा में ऐंचीपावागो (Archipelago) यानी द्वीपसमूह होता है।

इंडोनेशिया (Indonesia) भले ही मुस्लिम बहुल देश हो, लेकिन इसका इतिहास हिंदू समुदाय से जुड़ा है। 14वीं शताब्दी में जावा द्वीप पर मजापहीत (Majapahit) साम्राज्य के हिंदू शासक हयम वुरुक ((Hayam Wuruk) का राज था और उनके प्रधानमंत्री का नाम गज: मद (Gajah Mada) था। उस दौरान उन्होंने प्रतिज्ञा ली कि जब तक वह नुसंतारा पर विजय प्राप्त नहीं कर लेते, तब तक वे कोई स्पाइस नहीं खाएँगे। इसका मतलब था कि गज: मद अपनी प्रतिज्ञा पर तब तक कायम रहेंगे, जब तक कि वे वर्तमान सिंगापुर, मलेशिया, ब्रुनेई, दक्षिणी थाईलैंड और तिमोर लेस्ते को दक्षिण-पश्चिमी फिलीपींस को जीत नहीं लेते। साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने इसे कर दिखाया। गज: मद पूरे देश के लिए एक नायक साबित हुए हैं, जिनकी वीरता से सदियों बाद भी इंडोनेशिया के लोग प्रभावित हैं।

इंडोनेशिया का इतिहास हिंदू धर्म से जुड़ा है। पहली शताब्‍दी में हिंदू धर्म विभिन्‍न व्‍यापारियों और धर्म गुरुओं के माध्‍यम से इंडोनेशिया में पहुँचा था। इसके बाद छठी शताब्‍दी में भारत से हिंदू धर्म इंडोनेशिया पहुँचा था। श्रीजीवा और मजाफित काल में भी हिंदू धर्म को यहाँ पर बढ़ावा मिला। 1400 सीई में यहाँ इस्‍लाम का उदय हुआ था।

नरसिंहा को विष्‍णु का अवतार बताया गया

इंडोनेशिया में प्रचलित कथाओं में रता भटारा नरसिंहा को विष्‍णु का अवतार बताया गया है। यहाँ के गद्य में भी हिंदू देवी-देवताओं का जिक्र मिलता है। इनमें कई संस्‍कृत शब्‍दों का इस्‍तेमाल किया गया है। यहाँ पर हुई खुदाई में निकली कई सारी चीजों में हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ मिली हैं, जो भगवान शिव, पार्वती, गणेश, ब्रह्मा की हैं। इसके अलावा गरुड़ इंडोनेशिया का राष्ट्रीय प्रतीक है। गरुड़ पक्षी भगवान विष्णु का वाहन है। मौजूदा प्रतीक को इंडोनेशिया में 1950 के दशक में डिजाइन और आधिकारिक तौर पर मान्यता दी गई थी।

इसके अलावा इंडोनेशिया सरकार ने भी कई जगहों पर हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ स्‍थापित की हैं। इनमें बाली में स्‍थापित सरस्‍वती माता की मूर्ति है, जिसको भारत में संगीत शिक्षा की देवी माना जाता है। जावा और सुमात्रा भी हिंदुओं की बड़ी आबादी देवस्थानों के लिए प्रसिद्ध है। इंडोनेशिया के बाली मे स्थित भगवान विष्णु का तनह लोट मंदिर, यूनेस्को के विश्व धरोहर शामिल बुरा बेसकीह मंदिर, पुरा तमन सरस्वती मंदिर, सिंघसरी शिव मंदिर आदि बेहद प्रसिद्ध मंदिर हैं।

बता दें कि इंडोनेशिया दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश है। यहाँ करीब 23 करोड़ मुस्लिम रहते हैं, जबकि 4 मिलियन (40 लाख) से अधिक हिंदू और बौद्ध निवास करते हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि मुस्लिम आबादी वाले इंडोनेशिया की सरकार ने साल 1973 में एक अंतरराष्ट्रीय रामायण सम्मलेन (International Ramayana Conference) का आयोजन करवाया था। इस्लामी शासन के बावजूद, इंडोनेशियाई लोग धर्म और परंपराओं में हिंदू इतिहास को दोहराते हैं। बाली, सुलावेसी (मध्य, दक्षिण और दक्षिण-पूर्व), मध्य कालीमंतन और दक्षिण सुमात्रा उन कई क्षेत्रों में से हैं, जिनमें बड़ी संख्या में हिंदू समुदाय रहते हैं।

‘आँखों में डर की तस्वीर.. माथे पर वो तनाव की लकीर…’: कश्मीरी पंडितों के नरसंहार के 32 साल, अनुपम खेर ने पूछा- कैसे भूल जाऊँ मैं?

कैसे भूल जाएँ हम 19 जनवरी 1990 की वह सुबह जिस दिन कश्मीरी पंडितों को अपने घरों से पलायन करना पड़ा था और सरकारें मुस्लिम तुष्टिकरण में आतंक का साथ दे रहीं थीं। उस दिन कश्मीर में माहौल पहले से कहीं ज़्यादा सर्दी थी तभी मस्जिदों से उस रोज अज़ान के साथ-साथ कुछ और नारे भी गूँजे। ‘यहाँ क्‍या चलेगा, निजाम-ए-मुस्तफा’, ‘कश्‍मीर में अगर रहना है, अल्‍लाह-हू-अकबर कहना है’ और ‘असि गछि पाकिस्तान, बटव रोअस त बटनेव सान’ मतलब हमें पाकिस्‍तान चाहिए और हिंदू औरतें भी मगर अपने मर्दों के बिना। यह संदेश किसी और के लिए नहीं बल्कि कश्‍मीर में रहने वाले हिंदू पंडितों के लिए था। ऐसी धमकियाँ उन्‍हें पिछले कई महीनों से मिल रही थीं। आज 32 साल बाद भी कश्मीरी पंडित अपने घरों को नहीं लौट पाए हैं। वो आज भी अपने ही देश में एक शरणार्थी की तरह जीवन बिताने को विवश हैं।

1990 में घाटी से कश्मीरी पंडितों को बुरी तरह तरह से प्रताड़ित करके, पूरी क्रूरता और हिंसा के बल पर वहाँ से भगाया गया था, ये किसी से छिपा नहीं है। जो इस क्रूरता के भुक्तभोगी या गवाह रहे हैं, आज भी इन घटनाओं को याद करते ही उनका कलेजा काँप जाता है। आज सोशल मीडिया पर मशहूर अभिनेता अनुपम खेर ने कश्मीरी पंडितों के पलायन को याद करते हुए एक कविता के माध्यम से देश को एक बार फिर उस त्रासदी की याद दिलाई है जो लाखों कश्मीरी पंडितों के दिलों में आज भी एक नासूर की तरह चुभता है। कविता की पंक्तियाँ ‘कैसे भूल जाऊँ मैं…’ आपके सामने 1990 का वह तस्वीर खींचती हैं जब आतंकियों ने कश्मीरी पंडितों को अपने ही घर, जमीन, जायदाद सब छोड़कर भागने पर मजबूर कर दिया था।

बलिदान दिवस को याद करते अपनी कविता में वह कहते हैं, “कैसे भूल जाऊँ मैं… आँखों में डर की तस्वीर.. माथे पर तनाव की लकीर…बोलो कैसे भूल जाऊँ मैं…”

1990 में घाटी से कश्मीरी पंडितों का पलायन

घाटी में आतंकवाद की पहली वारदात 14 सितंबर 1989 में हुई, जब वरिष्ठ वकील और भारतीय जनता पार्टी के नेता टीका राम टपलू की दिनदहाड़े श्रीनगर में उनके घर के बाहर ही गोली मारकर हत्या कर दी गई।

कश्मीरी पत्रकार आरती टिकू सिंह ने भी एक इंटरव्यू में उस खौफनाक मंजर को साझा किया था। हालाँकि तब वह मात्र 12 वर्ष की थीं, जब उन्हें अपने घर को छोड़ना पड़ा था। वो मूल रूप से अनंतनाग की हैं। उन्होंने बताया कि इस हादसे से पहले 1986 में भी पंडितों का दक्षिण कश्मीर वालों के साथ संघर्ष हुआ था और पहली बार उन्होंने कर्फ्यू देखा, लेकिन उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि आगे होने वाली सारी घटनाएँ इसी से जुड़ी हुई हैं। कई लोगों ने इसे भाँप लिया था और वो 1986 में ही निकल गए थे। आरती टिक्कू सिंह कहती हैं, “जब मस्जिदों से नारे लगने शुरू हुए तो हजारों हिंदू घरों में उस दिन बेचैनी थी। सड़कों पर इस्‍लाम और पाकिस्‍तान की शान में तकरीरें हो रही थीं। हिंदुओं के खिलाफ जहर उगला जा रहा था। वो रात बड़ी भारी गुजरी थी, सामान बाँधते-बाँधते अपने पुश्‍तैनी घरों को छोड़कर कश्‍मीरी पंडितों ने घाटी से पलायन का फैसला किया।

हिंदुओं के घरों का नामोनिशान तक मिटा दिया गया

उस रात घाटी से पंडितों का पहला जत्‍था निकला। मार्च और अप्रैल आते-आते हजारों परिवार घाटी से भागकर भारत के अन्‍य इलाकों में शरण लेने को मजबूर हुए। अगले कुछ महीनों में खाली पड़े घरों को जलाकर खाक कर दिया। जो घर मुस्लिम आबादी के पास थे, उन्‍हें बड़ी सावधानी से बर्बाद कर दिया गया। सैकड़ों मंदिरों को नष्ट कर दिया गया था। कश्‍मीरी पंडित संघर्ष समिति के अनुसार, जनवरी 1990 में घाटी के भीतर 75,343 परिवार थे। 1990 और 1992 के बीच 70,000 से ज्‍यादा परिवारों ने घाटी को छोड़ दिया। एक अनुमान है कि आतंकियों ने 1990 से 2011 के बीच सैकड़ों कश्‍मीरी पंडितों की हत्‍या की।

अब यह भी जान लीजिए जब देश में इतना बड़ा कांड हुआ तो सत्ता में कौन था। उस वक्त जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस और कॉन्ग्रेस के गठबंधन की सरकार थी, लेकिन सही मायने में वहाँ हुकूमत आतंकवादियों और अलगाववादियों की चल रही थी। कश्मीरी पंडितों के खिलाफ आतंकवाद का ये खूनी खेल 1986-87 में ही शुरू हो गया था। जब सैय्यद सलाहुद्दीन और यासीन मलिक जैसे आतंकवादी जम्मू-कश्मीर में चुनाव लड़ रहे थे। लेकिन कॉन्ग्रेस गठबंधन की सरकार ने कश्मीरी पंडितों को यूँ ही आतंकियों के हाथों मरने के लिए छोड़ दिया था।

बता दें कि साल 1987 के विधान सभा चुनाव में जम्मू-कश्मीर की जनता के सामने बस दो विकल्प थे या तो वो भारत के लोकतंत्र में भरोसा करने वाली सरकार चुनें या फिर उस कट्टरपंथी यूनाइटेड मुस्लिम फ्रंट का साथ दे, जिसका मंसूबा कश्मीर को पाकिस्तान बनाना था और जिसके इशारे पर कश्मीरी पंडितों की हत्याएँ की जा रही थीं। ऐसे हिंसा और आतंकवाद के माहौल में भी जम्मू-कश्मीर की जनता ने अपने लिए लोकतंत्र का रास्ता चुना। फारूक अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बने। उसके बाद कट्टरपंथियों ने कश्मीर की आजादी की माँग और तेज करते हुए हिंदुओं का नरसंहार शुरू कर दिया, लेकिन जम्मू-कश्मीर की फारुक अब्दुल्ला सरकार मुस्लिम कट्टरपंथियों के आगे मूक दर्शक बनी रही।

एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, यदि आँकड़ों में बात की जाए तो ऐसे समझिए कि 20वीं सदी की शुरुआत में लगभग 10 लाख कश्‍मीरी पंडित थे। आज की तारीख में 9,000 से ज्‍यादा नहीं हैं। 1941 में कश्‍मीरी हिंदुओं का आबादी में हिस्‍सा 15% था। 1991 तक उनकी हिस्‍सेदारी सिर्फ 0.1% रह गई थी। अब आप ही बताइए जब किसी समुदाय की आबादी 10 लाख से घटकर 10 हजार से भी कम रह जाए तो उसे नरसंहार के अलावा और क्या कहा जाए।

370 के हटने के बाद बढ़ी उम्मीद लेकिन राह आज भी आसान नहीं

पिछले 32 साल में कश्‍मीरी पंडितों को वापस घाटी में बसाने की कई कोशिशें हुईं, यहाँ तक कि बीजेपी के सत्ता में आने के बाद यह प्रयास और तेज हुआ है। जिसके सकारात्मक असर भी दिख रहे हैं लेकिन नतीजा अभी भी संतोषजनक नहीं है। हाल के सालों में भी आतंकियों ने कश्मीरी पंडितों में डर बनाए रखने के लिए कई कश्मीरी पंडितों यहाँ तक की जम्मू-कश्मीर में भाजपा नेताओं की भी हत्या की।

वापसी की आशाओं के बीच कश्मीरी पंडितों को भी इस बात का अहसास है कि घाटी अब पहले जैसी नहीं रही। हालाँकि, 5 अगस्‍त, 2019 को जब भारत सरकार ने जम्‍मू और कश्‍मीर का विशेष दर्जा खत्‍म किया तो कश्‍मीरी पंडित बेहद खुश थे। मगर उनकी वापसी अभी भी सुनिश्चित नहीं हुई है। ऐसे में कोई भी कश्मीरी पंडित कैसे उस खौफनाक पलायन को भूल जाए। चलते-चलते पिछले साल का अनुपम खेर का वह वीडियो भी आपके सामने है जब कश्मीरी पंडितों के दर्द को वह इस उम्मीद में साझा कर रहे हैं कि जल्द ही वह दौर बदले और कश्मीरी पंडित सुरक्षित अपने घरों में हों।

‘मुस्लिम महिलाओं के हस्तमैथुन’ से लेकर ‘सेक्स के बाद नहाने’ और ‘गैर-किताबी महिला से निकाह’ तक: दारुल उलूम देवबंद के फतवे

इस्लाम में ‘क्या सही है और क्या नहीं’ इसकी जानकारी के लिए दारुल उलूम देवबंद के पास सैंकड़ों मुस्लिम आते हैं। वे अपनी निजी जीवन से संबंधी कुछ सवाल करते हैं और देवबंद से उन्हें जवाब ‘क्या हलाल है क्या हराम’ इसके आधार पर फतवा जारी करके दिया जाता है। इन्हीं सवालों में कई सवाल महिलाओं से जुड़े होते हैं। कुछ प्रश्न हस्तमैथुन पर होते हैं, कुछ सेक्स से जुड़े और कुछ गैर मजहबी औरतों से जुड़े।

आज ऑपइंडिया दोबारा कुछ चुनिंदा सवालों की सूची आपके लिए देवबंद की साइट दारुलइफ्ता से लेकर आया है। ये सारे सवाल महिलाओं से संबंधी हैं।

गैर-किताबी महिला से निकाह 

दारुलइफ्ता साइट पर जॉर्डन के एक शख्स ने मजहबी सलाह पाने के लिए दारुल उलूम से सवाल किया कि उसने एक जर्मन लड़की से शादी की थी। मगर लड़की न तो इस्लाम और न ईसाइयत और न ही कोई धर्म मानती है। वह मौत के बाद की जिंदगी और हूरों में भी विश्वास नहीं करती। मगर निकाह से पहले उसने ‘ला इला इल्लाह’ बोला है। शौहर ने पूछा कि आखिर उनकी शरिया के अनुसार क्या स्थिति है। वो अपनी बीवी को छोड़ना नहीं चाहता।

एक मजहबी शौहर के सवाल पर दारुल उलूम ने कहा कि अगर उस व्यक्ति की बीवी कोई मजहब नहीं मानती है तो मतलब है कि वो नास्तिक है/काफिर है। उससे साफ पूछा जाना चाहिए कि वो अल्लाह को मानेगी या नहीं और अगर वो मानने से मना करती है तो उससे फौरन दूरी बना ली जानी चाहिए।

वलीमा के कार्ड में दुल्हन का नाम

गैर-मजहबी महिला से जुड़े सवाल के अलावा इस साइट पर कई सवाल मजहबी लड़कियों/महिलाओं को लेकर भी हैं। यहाँ एक व्यक्ति ने सवाल किया हुआ है कि क्या वो अपने वलीमा के कार्ड में अपनी होने वाली बीवी का नाम छपवा सकता है या नहीं। इस सवाल के जवाब में दारुल उलूम देवबंद ने उसे बताया कि होने वाली बीवी का नाम दावत पत्र में नहीं लिखवाना चाहिए।

बैंक में काम करने वाले आदमी के घर निकाह

अगला सवाल है कि क्या उस परिवार से निकाह के ऑफर को स्वीकारा जाना चाहिए जहाँ लड़की के पिता बैंक क्षेत्र में हों। इस प्रश्न के जवाब में दारुल उलूम की ओर से कहा गया कि जो लोग हराम के पैसे कमाते हैं उनमें  नैतिकता की कमी होती है इसलिए ऐसे रिश्तों से बचा जाना चाहिए।

मुस्लिम महिला हस्तमैथुन कर सकती है क्या?

मजहबी शिक्षा से संबंधी साइट पर हस्तमैथुन को लेकर भी सवाल किए गए हैं। पूछा गया है कि क्या शरिया लॉ के अनुसार मुस्लिम लड़की हस्तमैथुन कर सकती है या नहीं। देवबंद ने इस सवाल पर जवाब दिया कि किसी भी मुस्लिम लड़की को ऐसे गुनाह करने से बचना चाहिए।

यौन संबंध के बाद नहाना जरूरी या नहीं?

ये सवाल एक महिला ने किया है। वह पूछती हैं कि अगर कोई शादीशुदा महिला सिर्फ संतुष्टि के लिए उंगली से स्पर्श करवाती है और कोई तरल पदार्थ बाहर नहीं निकलता तो क्या नहाना या खुद को साफ करना जरूरी है या नहीं। इसके जवाब में उसे बताया गया कि अगर खातून बिना किसी वासना के अपनी योनि में उंगली डालती है और उसे कुछ महसूस नहीं होता तो नहाना आवश्यक नहीं है। मगर ये काम अगर शौहर ने किया हो तो नहाना जरूरी है।

बहन की आधुनिक शिक्षा पर सवाल

इस साइट पर एक व्यक्ति ने अपनी 14 साल की बहन के लिए सवाल किया कि उसकी बहन मॉर्डन शिक्षा ले रही है और इस्लाम के निर्देश नहीं मानती। उसे इस्लामी संस्थान भी भेजा गया। दारुल उलूम ने इस सवाल को सुनकर कहा कि उन लोगों की कोशिशें फायदा देंगी और बहन जल्दी इस्लामी मानदंडों को अपनाना शुरू कर देगी।

विवादित फतवों के लिए नामी है दारुल उलूम देवबंद

बता दें कि इस्लामी शिक्षा देने के लिहाज से स्थापित किया गया दारुल उलूम देवंबंद मुस्लिमों में बेहद जाना-माना शिक्षण संस्थान है। ये उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में स्थित है और विवादित फतवों के लिए जाना जाता है। साल 2018 में इनकी ओर से सीसीटीवी लगाने का विरोध किया गया था। इसी प्रकार महिलाओं के फुटबॉल देखने पर भी इन लोगों ने विरोध किया हुआ है। इतना ही नहीं, एक बार इस जगह से फतवा जारी किया गया था कि चूड़ियाँ पहनाते वक्त भी दुकानदार को महिला को छूना नहीं चाहिए। अभी हाल में ‘गोद लिए बच्चे के वारिस बनने या न बनने’ पर फतवा जारी करके ये विवादो में आया था।

चीन को भारत में ‘मुस्लिमों के नरसंहार’ की चिंता: खुद उइगरों के अंग बेच कर कमा रहा, मुस्लिम महिलाओं की कराता है जबरन नसबंदी, पिलाता है शराब

चीन (China) उइगर मुस्लिमों (Uighur Muslim) के साथ क्या सलूक करता है इसके बारे में समूचा विश्व जानता है, लेकिन इसकी परवाह न करते हुए शी जिनपिंग की वामपंथी सरकार के मुखपत्र अखबार ग्लोबल टाइम्स (Global Times) ने भारत में मुस्लिमों को पीड़ित और प्रताड़ित बताने की कोशिश की है। ग्लोबल टाइम्स का कहना है कि भारत में बहुसंख्यक हिंदू समुदाय लगातार अल्पसंख्यक मुस्लिमों, ईसाइयों और दूसरे धर्म के लोगों को निशाना बना रहा है। उसका सवाल है कि आखिर पश्चिमी देश इस पर चुप क्यों हैं।

अपने प्रोपागैंडा को आगे बढ़ाते हुए चीनी मुखपत्र ने हिंदू राष्ट्रवादियों और दक्षिणपंथियों को टार्गेट किया। अखबार ने लिखा था कि पिछले महीने एक YouTube चैनल पर हिंदू महासभा की एक नेता पूजा शकुन पांडे ने उग्र हिंदू राष्ट्रवाद का समर्थन करते हुए अपने समर्थकों से मुस्लिमों को मारकर रक्षा करने का आह्वान किया। ग्लोबल टाइम्स पूजा को कोट कर लिखता है कि उसने कहा, “अगर हम में से 100 लोग 20 लाख को मारने के लिए तैयार हैं, तो हम जीतेंगे और भारत को एक हिंदू राष्ट्र बना देंगे। मारने और जेल जाने के लिए तैयार रहें!”

इसके साथ ही चीनी मुखपत्र ने आरोप लगाया कि भारत में मुस्लिमों के खिलाफ शत्रुता और हिंसा की घटनाएँ बढ़ी हैं जो मुस्लिमों के संभावित नरसंहार का संकेत है। इस तरह के लेख भी भारत के समाचार पत्रों में दिखाई देते हैं। ग्लोबल टाइम्स ने कथित विशेषज्ञों का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि हिंदू राष्ट्रवादी भाजपा के शासनकाल में मुस्लिमों के खिलाफ भेदभाव बढ़ा है।

शंघाई इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल स्टडीज में रिसर्च सेंटर फॉर चाइना-साउथ एशिया कोऑपरेशन के महासचिव लियू ज़ोंगई के हवाले से ग्लोबल टाइम्स ने लिखा, “मोदी सरकार ने भारतीय प्रशासित कश्मीर एक मुस्लिम-बहुल राज्य की स्वायत्त स्थिति को खत्म करने और नागरिकता संशोधन अधिनियम को पारित करने सहित कई उपाय किए, जिसे मुस्लिम विरोधी कानून करार दिया गया था। इन कदमों ने हिंदू राष्ट्रवादियों और उनके अहंकार को बढ़ावा दिया।” उल्लेखनीय है कि चीन कश्मीर को भारतीय प्रशासित कश्मीर कह रहा है, जबकि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग रहा है।

प्रोपागैंडा फैलाते हुए ग्लोबल टाइम्स ने ये भी झूठ फैलाया कि पाँच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव में बीजेपी मुस्लिमों के विरोध को और भड़काएगी। चीन का ये भी कहना है कि अमेरिका भले ही मानवाधिकारों की बात करता है, लेकिन वो भारत में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर चुप है। उसका ये भी कहना है कि अमेरिका और पश्चिम ने मुस्लिमों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।

उइगर मुस्लिमों की है बुरी हालत

भारत में मुस्लिमों की हालत पर भाषणबाजी करने वाला चीन अपने यहाँ उइगर मुस्लिमों के सुनियोजित नरसंहार से दुनिया का ध्यान हटाने की कोशिश कर रहा है। दिसंबर 2021 में ही ब्रिटेन (britain) के एक ट्रिब्यूनल ने कहा था कि चीन अपने पश्चिमी प्रांत शिनजियांग में उइगर मुस्लिमों का ‘नरसंहार’ (Genocide) कर रहा है। ट्रिब्यूनल ने उइगर मुस्लिमों को लेकर चीन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा था कि चीन की सरकार उइगर मुस्लिमों की आबादी को कम करने के लिए उन पर जबरन जन्म नियंत्रण और नसबंदी नीतियों को लागू कर रही है, जो एक नरसंहार है। ‘उइगर ट्रिब्यूनल’ ने इसे मुस्लिमों या दूसरे समुदायों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय अपराध करार दिया था।

इसी तरह से अक्टूबर 2021 में खुलासा हुआ था कि चीन उइगर मुस्लिमों के अंगों को बेच रहा है। ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न स्थित अख़बार ‘द हेराल्ड सन’ ने चीन के ऑर्गन ट्रैफिकिंग का खुलासा किया था। रिपोर्ट में बताया गया था कि उइगर मुस्लिम के स्वस्थ लिवर को चीन 1,60,000 डॉलर्स (1.20 करोड़ रुपए) में बेचा जा रहा है। अख़बार के मुताबिक, इन धंधों से चीन को 1 बिलियन डॉलर (7492 करोड़ रुपयों) की कमाई हो रही है। 2017-19 के बीच 80,000 उइगर मुस्लिमों को देह-व्यापार का शिकार बनाया गया था। खास बात यह है कि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग (UNHRC) को भी चीन के इस गोरखधंधे की जानकारी है।

हाल ही चीन के शिनजियांग क्षेत्र में आधी रात को गिरफ्तार हुई उइगर महिला हसिएत अहमत (57) को उसके पड़ोस के युवाओं को इस्लामिक शिक्षा देने और कुरान की प्रतियाँ छिपाने के लिए 14 साल जेल की सजा सुनाई गई थी। ये भी खबर आई थी कि शिनजियांग में मुस्लिम महिलाओं को जबरन सूअर का मांस खाने और शराब पीने के लिए मजबूर किया जाता है।