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‘आपका पैगाम लंदन पहुँचा दिया है, अच्छा काम हो रहा है’: विदेश से आ रहा पैसा, ‘लालच’ दे गुजरात के गाँव में आदिवासी बनाए जा रहे मुस्लिम

भरूच, नर्मदा नदी के मुहाने पर, अहमदाबाद से लगभग 200 किलोमीटर दूर है। परिवार के साथ उस जगह पर जाने की मेरी बहुत शुरुआती यादें हैं। मेरी दादी का जन्म और पालन-पोषण भरूच में हुआ था और मैं यह सुनकर बड़ी हुई हूँ कि कैसे उन्होंने गाँधी जी को 1930 में ऐतिहासिक नमक मार्च पर दांडी समुद्र तट की ओर जाते देखा था।

इससे पहले जनवरी में, मैं सूरत में जबरन धर्मांतरण की कहानियों के साथ-साथ उन मामलों को कवर कर रही थी जहाँ अशांत क्षेत्र अधिनियम की खामियों का फायदा उठाया गया था। आप उन्हें यहाँ, यहाँ और यहाँ पढ़ सकते हैं। सूरत में रहते हुए, मैंने अपने चचेरे भाई की कार माँगी और हाल ही में रिपोर्ट किए गए सामूहिक धर्म परिवर्तन के मामलों के बारे में अधिक जानने के लिए भरूच तक लगभग 80 किलोमीटर की दूरी तय की।

आमोद भरूच जिले का एक तालुका है। यह ‘दांडी हेरिटेज मार्ग’ पर पड़ता है।

आमोद तालुका, दांडी मार्ग

जब आप राष्ट्रीय राजमार्ग से आमोद तालुका की ओर दाएँ मुड़ते हैं, जिसकी आबादी लगभग 1 लाख (2011 में) है, तो आपका स्वागत विशाल मस्जिदों के साथ किया जाता है, जो सुन्दर नक्कासी वाली पत्थरों से निर्मित हैं। यहाँ तक ​​कि शहरों में भी इतनी बड़ी मस्जिदें नहीं हैं, जितनी कि लगभग 32% मुसलमानों की आबादी वाले इस छोटे से शहर में थी।

आमोद तालुका, छोटी सी जगह में ढेर सारे मस्जिद

एक छोटे से शहर के लिए, छोटी सी जगह में इतनी सारी मस्जिदें हैं, जैसा कि ऊपर के नक्शे से देखा जा सकता है।

थोड़ा आगे, आप मुख्य सड़क पर बाएँ मुड़ते हैं और एक सिंगल लेन राज्य राजमार्ग/सड़क पर ड्राइव करते हैं जो आपको तालुका के अंदरूनी हिस्से में ले जाती है। यदि आपने कभी भारत में राज्य के राजमार्गों पर ड्राइव किया है तो आपको उन ब्लू बोर्ड को देखना याद होगा जो आपको कुछ अस्पष्ट गाँवों की ओर इशारा करते हैं जो आगे और भी अन्दर कहीं है।

मैं हमेशा सोचती थी कि ये गाँव कैसे होते हैं। एक शहर की लड़की के रूप में, मैं कभी भी ‘गाँव’ नहीं गई थी और मेरे लिए वे हमेशा फिल्मों से प्रेरित एक रोमांटिक अवधारणा थी।

आमोद में जब कांकरिया गाँव की ओर बाएँ मुड़ी तो सड़कें संकरी होने लगीं और सड़क पर शायद ही कोई और था। कभी-कभी गायों और भैंसों के झुंड को गाँवों में घर वापस जाते देखा होगा। मैं गाँव की ओर मुड़ने से चूक गई क्योंकि साइनबोर्ड पर जंग लग गया था और उस पर जो लिखा था वो धुँधला हो गया था। मैंने अपने सोर्स को गाँव की दिशा जानने के लिए फोन किया।

जब मैंने गाँव की ओर एक और मोड़ लिया, तो सड़क और भी संकरी हो गई। संकरी सड़क के दोनों ओर बबूल के पेड़ थे और मेरे मोबाइल फोन का नेटवर्क गायब हो गया।

मैं अपने आप में एक अजीब जगह पर थी जहाँ मैं किसी को नहीं जानती थी।

यह इसी गाँव में था कि जहाँ पिछले कुछ वर्षों में वसावा समुदाय के आदिवासियों का बड़े पैमाने पर इस्लाम में धर्मांतरण हुआ था।

मैंने गाँव के कुछ लोगों से बात की, जिन्हें पैसे, भोजन और नौकरी की पेशकश के वादे पर इस्लाम कबूल करने का लालच दिया गया था। वे खुल गए कि उन्हें कैसे फुसलाया गया और आखिरकार उन्हें क्या बोलने के लिए मजबूर किया गया और इसके खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई। चूँकि उनकी जान को खतरा है और उनमें से कुछ पर हमले हुए हैं, इसलिए मैं उनके असली नामों का खुलासा नहीं कर रही हूँ।

प्रकाश (बदला हुआ नाम) ने 2018 में इस्लाम धर्म अपना लिया और सलमान पटेल बन गए। नवंबर 2021 में उसने 9 लोगों के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। आमोद पुलिस ने 15 नवंबर 2021 को गुजरात फ्रीडम फॉर रिलिजन बिल के तहत मामला दर्ज किया था। शिकायत के बाद आरोपित अब्दुल अजीज पटेल (अजीतभाई छगन वसावा), यूसुफ जीवन पटेल (महेंद्र जीवन वसावा), अयूब बरकत पटेल (रमन बरकत वसावा), इब्राहिम पुनाभाई पटेल (जितुभाई पुनाभाई वसावा) को आमोद तालुका के काकरिया गाँव के ही सभी निवासी हैं। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

16 दिसंबर को भरूच पुलिस ने मामले में छह और आरोपितों को गिरफ्तार किया था। पाटन से याकूब इब्राहिम शंकर, पालेज से रिजवान महबूब पटेल, ठाकोरभाई गिरधरभाई वसावा, आमोद से साजिद मोहम्मद पटेल और यूसुफ पटेल जबकि जंबूसर से अयूब बशीर पटेल को गिरफ्तार किया गया।

कैसे गरीब आदिवासियों को इस्लाम कबूल करने का लालच दिया गया

जब आप कांकरिया गाँव में प्रवेश करते हैं, तो आप देख सकते हैं कि गाँव में केवल एक ही घर है जो गाँव के सरपंच का ‘पक्का घर’ है। प्रकाश ने हमें बताया, “हम यहाँ बहुत गरीब लोग हैं। हम यहाँ के खेतों में काम करते हैं, जिनमें से ज्यादातर पर मुस्लिम जमींदारो का कब्ज़ा है। हमारे लिए 500 रुपए भी बड़ी बात है।”

मूल प्राथमिकी में नामजद आरोपितों में से एक ठाकोरभाई गिरधरभाई वसावा दुकान के मालिकों में से एक थे। प्राथमिकी में नामजद आरोपित शब्बीर और समाज बेकरीवाला भी उसके आपूर्तिकर्ता थे। प्रकाश ने कहा कि उन्होंने 2008-09 में वसावा को पहली बार इस्लाम कबूल करने का लालच दिया। इसके बाद, उसने अजीत छगन वसावा (जिसे प्राथमिकी में एक आरोपित के रूप में भी नामित किया गया) को अपने झाँसे में लिया और कुछ महीने बाद उसे इस्लाम में परिवर्तित कर दिया। उनके बाद गाँव के करीब 5-6 लोगों ने इस्लाम कबूल कर लिया।

2009 में गाँव से इस्लाम धर्म अपनाने वाला सातवाँ व्यक्ति वह था जो गाँव के मंदिर में भजन और आरती करता था। तभी ग्रामीणों ने विरोध किया। ग्रामीणों ने ठाकोर और अन्य लोगों को या तो हिंदू धर्म में लौटने या गाँव छोड़ने के लिए कहा। इसके बाद सभी 7 लोग गाँव छोड़कर चले गए। जबकि ठाकोर ने अपने भले के लिए गाँव छोड़ दिया, बाकी शेष छह गाँव लौट आए और 2009-10 में किसी समय हिंदू धर्म में वापस लौटने का फैसला किया।

सिवाय, अजीत वसावा के जो हिंदू धर्म में वापस आ गए थे, अब लोगों को फिर से इस्लाम में परिवर्तित करना शुरू कर दिया है। 2010 से 2018 के बीच 37 आदिवासी परिवारों को इस्लाम में परिवर्तित किया गया। और यह सिलसिला 2021 तक एफआईआर दर्ज होने तक चलता रहा।

उन्होंने हमें आगे बताया, “जिस गाँव में हम झोपड़ी में रहते हैं और घर जैसी स्थायी संरचना नहीं है, अजीत के घर को इबादत घर में बदल दिया गया था। इसे 16 लाख रुपए की लागत से बनाया गया है। उन्होंने कहा कि इबादत घर का इस्तेमाल नमाज अदा करने और इस्लाम का प्रचार करने के लिए किया जाता था। एक मौलाना, जो मदरसा भी चलाता था, अछोद (पास के एक गाँव) से यहाँ तकरीर देने आता था।”

पैसा, हिंदू देवी-देवताओं का अपमान और ब्रेनवॉश : कैसे आदिवासियों को इस्लाम में परिवर्तित किया गया

प्रकाश ने कहा, “यह एक रैकेट था जिसे वे चला रहे थे। वे यह दावा करके विदेश से धन की उगाही करते थे कि वे हमें दे रहे हैं क्योंकि उन्होंने हमें पैसे देने का वादा किया था यदि हम इस्लाम में परिवर्तित हो जाते हैं। लेकिन अगर वे प्रति व्यक्ति 1 लाख रुपए माँगते हैं, तो वे हमें केवल 500 रुपए से 2,000 रुपए का भुगतान करेंगे। करोड़ों हमारे नाम आए लेकिन वे हम तक कभी नहीं पहुँचे।”

उन्होंने आगे कहा कि अजीत दावा करेगा कि पूरा गाँव इस्लाम में परिवर्तित हो गया है और उनके नाम पर पैसे माँगेगा।

जब उनसे पूछा गया कि इस्लाम में धर्मांतरण पर उन्हें क्या सिखाया गया, तो प्रकाश ने कहा कि उन्हें नमाज़ पढ़ना सिखाया गया था। साथ ही प्रकाश ने यह भी कहा, “हमें बताया गया कि हिंदू धर्म जैसा कुछ नहीं है। हिंदू कोई धर्म नहीं है क्योंकि हर कोई अलग-अलग देवताओं की पूजा करता है। इतने सारे देवता कैसे हो सकते हैं?”

उन्होंने आगे बताया कि वे नियमित रूप से हिंदू देवी-देवताओं को बदनाम करते थे और उनके लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करते थे ताकि यह साबित हो सके कि हिंदू धर्म बुरा है और इस्लाम एक सच्चा और शुद्ध धर्म है। प्रकाश ने कहा, “हमें पार्वती और गणेश की कहानी के बारे में बताया गया। कैसे एक बार देवी पार्वती स्नान कर रही थीं और गणेश जी पहरेदारी कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भगवान शिव ने क्रोधित होकर गणेश जी का सिर काट दिया।” वे पूछते, “यह कैसा पिता जो अपने ही बेटे को नहीं पहचानता?’ उन्होंने आगे बताया, “गणेश जी के सिर के लिए एक निर्दोष हाथी को मारना क्रूर हरकत थी। अगर भगवान शिव असली देवता होते, तो वह अपने बेटे को जीवित कर देते।”

उन्होंने आगे कहा कि कैसे भगवान राम को बदनाम करने के लिए अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया। हमसे बात करते हुए प्रकाश ने कहा, “उन्होंने हमें बताया कि भगवान राम की पूजा करना अच्छा नहीं है। ‘भगवान राम भगवान नहीं थे, वह एक राजा थे, एक इंसान थे और फिर हम दूसरे इंसान की पूजा क्यों करें? उन्हें यह भी बताया गया कि कैसे देवताओं को चढ़ाए जाने वाले प्रसाद में अक्सर मक्खियाँ होती हैं। यदि आपके (हिंदू) भगवान इतने शक्तिशाली थे, तो क्या वे मक्खियों को भोजन पर रहने देंगे? अगर वह भगवान मक्खियों को प्रसाद से दूर नहीं भगा सकता, तो वह आपकी रक्षा कैसे करेगा?”

साथ ही उसने हमें यह भी कहा, “हमें बताया गया कि गोधरा कांड में, (पीएम) मोदी और (एचएम) शाह ने वास्तव में ट्रेन के अंदर मुसलमानों को जिंदा जला दिया और फिर दावा किया कि हिंदू मारे गए थे। उन्होंने हमें बताया कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद स्थल पर कोई मंदिर नहीं था और यह हमेशा एक मस्जिद रहेगा।”

प्रकाश ने यह भी कहा कि उन्हें बताया गया था कि कैसे महिलाओं को परदा में रखा जाना चाहिए और उन्हें बिना बुर्के के बाहर नहीं जाने देना चाहिए। एक चौकाने वाला खुलासा करते हुए प्रकाश ने कहा, “वे हमें जिहादी हमलों के लिए भी प्रशिक्षित करना चाहते थे। उन्होंने हमें आत्मघाती हमलों के लिए प्रेरित किया और हमें बताया कि दीन (धर्म / आस्था) के लिए मरने से हमें जन्नत मिलेगी। हमें बताया गया कि मूर्ति पूजा करने वाले काफिरों (गैर-मुसलमानों) को मारना कोई अपराध नहीं है। ये कट्टरपंथी बातें हमारे मुसलमान होने के कुछ सालों बाद बताई गईं।”

जबरन धर्म परिवर्तन के लिए फंडिंग

“आपका पैगाम लंदन पहुँचा दिया है, अच्छा काम हो रहा है (आपका संदेश लंदन को दिया गया है। आप लोग अच्छा काम कर रहे हैं),” धर्मांतरण रैकेट के मुख्य आरोपितों में से एक, हाजी अब्दुल्ला फेफड़ावाला को यह कहते हुए सुना जा सकता है इस वीडियो में जो कुछ समय पहले वायरल हुआ था।

उपरोक्त वीडियो में फेफड़ावाला कहता कि वह लंदन से है। उसने आगे कहा, “मुझे आप लोगों के बारे में पता चला कि आपने इस्लाम कबूल कर लिया है। मैं आपसे विशेष रूप से मिलने आया हूँ। मैं लंदन में आपके संदेश को पहुँचाऊँगा कि अल्लाह ने आपको स्वीकार कर लिया है। अब तुम कलमा के अनुसार हमारे भाई हो। हम हर संभव मदद प्रदान करेंगे।” बिना तारीख वाले वीडियो में, उसे यह कहते हुए सुना जा सकता है कि उसने लंदन में यह संदेश दिया है कि वह आमोद के कांकरिया गाँव में हैं, जहाँ 37 परिवारों ने इस्लाम धर्म अपना लिया था। उन्होंने मदद के लिए ‘अजीत भाई’ का शुक्रिया अदा किया। फिर वह ‘अजीत भाई’ से पूछता है कि क्या उन्हें भोजन, घर या ऐसी किसी वित्तीय सहायता के संबंध में किसी मदद की ज़रूरत है।

फिलहाल हाजी फेफड़ावाला के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी है। वह मूल रूप से भरूच के पास नबीपुर का रहने वाला है लेकिन वह फिलहाल लंदन में रहता है।

पिछले साल अक्टूबर में, वडोदरा शहर पुलिस के विशेष जाँच दल (एसआईटी) ने पाया कि शहर स्थित अमेरिकन फेडरेशन ऑफ मुस्लिम ऑफ इंडियन ओरिजिन (एएफएमआई) ने बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुसलमानों के विस्थापितों के लिए गाजियाबाद के पास 400 फ्लैटों के निर्माण सहित कई गतिविधियों के लिए हवाला से फंड भेजा था। उस पर भारत-नेपाल सीमा के पास मौलवियों को फंडिंग करने का भी आरोप लगा था।

सलाउद्दीन शेख AFMI के ट्रस्टियों में से एक हैं। कुछ साल पहले मुंबई में इस्लामिक उपदेशक जाकिर नाइक से प्रभावित होकर शेख ने ट्रस्ट की शुरुआत की थी। उसका नाम उत्तर प्रदेश सामूहिक धर्म परिवर्तन रैकेट में भी सामने आया था, जहाँ उमर गौतम प्रमुख संदिग्धों में से एक है।

हाजी फेफड़ावाला पर 2019 में वडोदरा में भड़काऊ भाषण देने का भी आरोप है और वह 2002 के गुजरात दंगों में भी शामिल था, जो गोधरा में एक ट्रेन के जलने के बाद भड़के थे, जहाँ अयोध्या से लौट रहे हिंदू कारसेवकों को जिंदा जला दिया गया था। उसने कहा था कि 2003 में उसने यूके में ट्रस्ट की स्थापना की जहाँ उसने करीब 125 दानदाताओं से संपर्क किया और भारत को डोनेशन के पैसे भेजने शुरू किए। फेफड़ावाला ने कहा था कि पैसा समुदाय को मजबूत करने के लिए एकत्र किया गया था ताकि वह ‘अन्य धर्मों के हमलों के खिलाफ खुद का बचाव’ कर सके। करीब एक घंटे तक फेफड़ावाला गुजरात में ‘समुदाय को मजबूत करने’ की बात करता रहा।

उक्त कार्यक्रम में सलाहुद्दीन शेख और उमर गौतम भी शामिल थे, जिन्हें हाल ही में हवाला और धर्म परिवर्तन केस में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। ऐसा माना जाता है कि फेफडावाला ने पिछले 18 वर्षों में भारत में मुस्लिम समुदाय को 150 करोड़ रुपए से अधिक का ‘दान’ दिया है।

बता दें कि दिसंबर 2021 में, वडोदरा पुलिस द्वारा एक रिपोर्ट भेजे जाने के बाद, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने AFMI ट्रस्ट का FCRA लाइसेंस रद्द कर दिया। ट्रस्ट के सबसे बड़े लाभार्थियों में से दो फेफड़ावाला और मुस्तफा थानावाला के लिए पुलिस ने रेड कॉर्नर नोटिस जारी करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है।

हवाला और टेरर फंडिंग

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, वडोदरा सिटी के सहायक पुलिस आयुक्त ने कहा कि ट्रस्ट के माध्यम से धन का दुरुपयोग विभिन्न इस्लामिक गतिविधियों के लिए किया गया था, जिसमें अवैध धार्मिक रूपांतरण, मस्जिदों का निर्माण, कश्मीर और भारत-नेपाल के पास गतिविधियों के लिए लोगों को पैसे देना शामिल था। फेफड़ावाला और थानावाला ने कथित तौर पर अपने सभी संपर्क सूत्रों को नष्ट कर दिया है और वो सम्मन का भी जवाब नहीं दे रहे हैं। जाँच में आगे पता चला कि सलाउद्दीन शेख ने दो और लोगों के लिए इस्लाम धर्म परिवर्तन के लिए पैसे की व्यवस्था की थी।

नवंबर 2021 में, एसआईटी द्वारा दायर एक चार्जशीट से पता चला कि एएफएमआई द्वारा प्राप्त 80 करोड़ रुपए की जाँच की जा रही है, जिसमें से 1.65 करोड़ रुपए एक आईएच कासुवाला ट्रस्ट की मिलीभगत से फर्जी चालान पेश करके निकाले गए। पुलिस ने यह भी आरोप लगाया है कि ट्रस्ट ने फरवरी 2020 में दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगों के साथ-साथ सीएए के विरोध प्रदर्शनों को बढ़ावा देने के लिए भी विदेशी धन का इस्तेमाल किया, जो बाद में हिंसक हो गया था।

सलाउद्दीन शेख के साथ भारतीय दावा केंद्र के उमर गौतम पर वर्तमान में आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है और वह वर्तमान में उत्तर प्रदेश एटीएस की हिरासत में है।

इस तरह की गतिविधियों को फण्ड देने के प्रमुख तरीकों में से एक है ओवर-इनवॉइसिंग और जीएसटी रिफंड के माध्यम से फंडिंग, ऐसी बातों की जानकारी रखने वाले एक सूत्र ने हमें बताया, “अगर सरकार वास्तव में गंभीर है, तो वे सूरत से हीरे की बिक्री की जाँच करे। हीरे और वस्त्रों के लिए ओवर-इनवॉइसिंग या अंडर-इनवॉइसिंग के जरिए अधिकारियों को धोखा देते हुए भारत को ‘कानूनी रूप से’ पैसा भेजने के बहुत प्रमुख तरीकों में से एक है, जिसका इस्तेमाल किया जाता है और ज्यादातर पैसा दुबई के रास्ते पाकिस्तान से आता है।”

उन्होंने कहा कि इस तरह से भेजे जाने वाले ज्यादातर पैसे का इस्तेमाल टेरर फंडिंग के लिए किया जाता है। हमारे सूत्र ने आगे समझाते हुए कहा, “एक व्यक्ति दुबई में व्यक्ति B को 10 रुपए का हीरा बेचता है। वह 1,000 रुपए का इनवॉइस बनाता है और दुबई में 1,000 रुपए का भुगतान करता है। फिर भारत में तुरंत पैसा निकाल लिया जाता है और इस पर बाकायदा करों का भुगतान किया जाता है। यह हवाला का नया कानूनी तरीका है।”

उन्होंने आगे कहा कि अक्सर कुछ ट्रस्ट मदरसों को फंडिंग और मुस्लिम समुदाय के गरीब लोगों के उत्थान के नाम पर विदेशों से पैसा लाते हैं, लेकिन फिर उन्हें टेरर फंडिंग में इस्तेमाल किया जाता है। हाल ही में, सूरत स्थित एक ऐसा ट्रस्ट कोरोनावायरस महामारी के दौरान किए गए अपने ‘अच्छे काम’ के लिए चर्चा में था। हालाँकि, इस मामले की जानकारी रखने वाले सूत्रों का कहना है कि ट्रस्ट के संदिग्ध संबंध हैं और डोनेशन उसके लिए एक मुखौटा है।

ऐसे ही अन्य संदिग्ध ट्रस्ट भरूच में हैं जो अस्पताल चलाता है। भरूच में कई प्रमुख अस्पताल भी धर्म परिवर्तन के केंद्र हैं। भरूच में एक सूत्र, जिन्होंने कांकरिया गॉँव के आदिवासी परिवारों को पुलिस शिकायत दर्ज करने और हिंदू धर्म में वापस लाने में मदद की, उन्होंने हमें यह भी बताया, “महिलाओं को आदिवासी बेल्ट से लाया जाता है और नर्स बनने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। आखिरकार, उन्हें बेहतर जीवन, पैसा और नौकरी का वादा किया जाता है और इस्लाम में परिवर्तित कर दिया जाता है।”

वहीं सूरत के एक सूत्र ने बताया कि इस तरह के मनी लॉन्ड्रिंग में मुस्लिम समुदाय के कुछ प्रमुख वकील, व्यवसायी भी शामिल हैं, लेकिन प्रशासन के ढुलमुल रवैए के कारण ये कानून से बच जाते हैं।

नोट: मूल रूप से गुजरात के भरूच से यह ग्राउंड रिपोर्टिंग Opindia अंग्रेजी की संपादक निरवा मेहता ने किया है। उनकी इंग्लिश में इस ग्राउंड रिपोर्ट का हिंदी रूपांतरण रवि अग्रहरि ने किया है।

छत्रपति शिवाजी के जिस ‘लोहागढ़’ का बाल बाँका न कर सके मुगल, वहाँ भी बन गया मजार-लगने लगा उर्स: 21वीं सदी में इस्लामी आक्रमण ऐसे भी

इतिहास के गलत पक्ष में होना एक विकल्प है, लेकिन जब आक्रमणकारियों को अपना मानकर उसे स्थापित करने की कोशिश की जाए तो वह अक्षम्य हो जाता है। छत्रपति शिवाजी महाराज के साथ भी कुछ ऐसा ही है। चाहे उनकी घुड़सवार सेना में काल्पनिक सैन्य कमांडरों को स्थापित करने का प्रयास हो या उनके द्वारा बनाए गए किलों के साथ झूठे धार्मिक संबंधों का दावा करना हो, छत्रपति शिवाजी को एक ‘धर्मनिरपेक्ष’ राजा के रूप में स्थापित करने की कोशिश लंबे समय से चल रही है।

अपने इस्लामी समकालीनों के विपरीत छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपनी प्रजा के साथ एक समान व्यवहार किया और वे भारतीय सभ्यता के इतिहास में सबसे सम्मानित शासकों में से एक बन गए। वह वर्तमान राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में समान रूप से प्रासंगिक हैं, लेकिन व्यक्तिगत राजनीतिक लाभ या धार्मिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए उन्हें इस्तेमाल करने के नापाक इरादों पर पानी फेरा जाना चाहिए।

हाल ही में सोशल मीडिया पर पुणे के पास स्थित लोहागढ़ किले पर स्थित एक कथित सूफी संत के लिए ‘उर्स शरीफ’ आयोजित करने की अपील वायरल हुई थी। ‘सर्वधर्म समभाव’ से शुरू करके इस पोस्टर में किसी ‘उमर शहावली बाबा’ के 17 जनवरी को तय ‘उर्स’ उत्सव में भाग लेने के लिए कहा गया, जिनकी कब्र लोहागढ़ किले पर स्थित है। इस कार्यक्रम के बारे में पुणे निवासी मल्हार पांडे ने बिना किसी सांस्कृतिक प्रासंगिकता या ऐतिहासिक पहचान वाले दिवंगत ‘संत’ के लिए उत्सव आयोजित करने को लेकर ट्वीट किया।

इतिहास के जानकार और सामाजिक संगठन झुंज के अध्यक्ष मल्हार पांडे ने मराठा इतिहास और विरासत में आंडबरपूर्ण मुस्लिम पहचान को स्थापित करने के राजनीतिक चाल को लेकर गंभीर सवाल उठाए। अपने ट्वीट में उन्होंने कहा, “ऐसा कोई समकालीन सबूत नहीं है जो बताता हो कि छत्रपति शिवाजी महाराज या संभाजी महाराज के समय में लोहागढ़ किले पर मस्जिद थी। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुस्लिमों ने नेताओं की मदद से पहले भी कई किलों पर कब्जा किया है।”

ऑपइंडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि उर्स के ऐसे किसी भी उत्सव की कोई ऐतिहासिक या सांस्कृतिक प्रासंगिकता नहीं है। उन्होंने कहा, “सन 1818 तक मराठों के नियंत्रण में रहे लोहागढ़ किले में छत्रपति शिवाजी महाराज के समय में या किसी भी समय इस तरह के आयोजन के सबूत नहीं हैं। मराठों के बाद लोहागढ़ में ऐसे किसी भी आयोजन की उम्मीद करना असंभव है, क्योंकि 20वीं सदी तक यह किला सख्त ब्रिटिश शासन के अधीन था।”

पांडे ने इसके पीछे राजनीतिक मंशा का संदेह जताया, जो मुस्लिम भावनाओं को भड़काना चाहती है। पोस्टर के अनुसार, शिवसेना के एक दिग्गज नेता हाजी हुसैन बाबा शेख इस कार्यक्रम के अध्यक्ष हैं, जबकि मावल से राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (राकांपा) के विधायक सुनील शेल्के आमंत्रित अतिथि हैं।

लोहागढ़ किले में उमर शहावली औलिया का कथित मकबरा। फोटो सौजन्य: केविन स्टैंडेज फोटोग्राफी

‘उमर शहावली बाबा’ का अगर वास्तव में अस्तित्व था तो हम उनकी जड़ों का पता लगाने के लिए थोड़ा आगे बढ़ते हैं। पुणे स्थित इतिहासकार आशुतोष पोटनिस ने सन 1889 के पुणे के बॉम्बे स्टेट गजेटियर में उनका उल्लेख पाया। उन्होंने बताया, “शेख उमर औलिया उन सूफी संतों में शामिल थे, जो 14वीं शताब्दी में अरब से दक्कन पहुँचे थे। स्थानीय सुल्तानों के समर्थन से वह लोहागढ़ में बस गए। शेख उमर शहावली बाबा, जिसे आज संत के रूप में पूजा जाता है, उसके बारे में कहा जाता है कि जब वह यहाँ रहने के लिए आए तो उन्होंने किले पर स्थित एक स्थानीय देवता के मंदिर को ध्वस्त कर दिया।” पोटनिस कहते हैं, “बॉम्बे गजेटियर में उल्लेख है कि एक स्थानीय लोक देवता को उसके द्वारा अपवित्र किया गया था। उमर शहावली का मकबरा वही स्थान है, जहाँ कभी इस लोक देवता अवस्थित थे।”

लोहागढ़ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के तहत एक संरक्षित स्मारक होने के कारण बॉम्बे में पुरातत्व विभाग ने पहले ही वहाँ किसी भी धार्मिक समारोह के आयोजन की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। यदि कुछ लोगों के लिए एक मूर्तिभंजक की पूजा करना नैतिक रूप से सही हो सकता है तो हाल की घटना एएसआई द्वारा निर्धारित विरासत से संबंधित कानून का भी उल्लंघन करती है। शाह का दूर-दराज स्थित मकबरा वर्षों तक अनजान रहा और उनके संदिग्ध अतीत के बारे में किसी को पता नहीं था। फिर अचानक लोगों का एक समूह उन्हें लोहागढ़ से जोड़ते हुए उनकी धार्मिक पहचान को स्थापित करने के लिए उर्स मनाना शुरू कर देता है। ऐसा लगता है कि यह उत्सव आध्यात्मिक से अधिक राजनीतिक चालबाजी है।

लोहागढ़ किले का मामला सबसे अलग है, लेकिन यह अकेला मामला नहीं है। महाराष्ट्र में कई ऐसे किले हैं, जो पुनर्निर्माण की आस लिए अधिकारियों की आँखों से अब तक ओझल हैं, लेकिन इस धार्मिक विस्तारवाद के राडर पर हैं। पिछले हफ्ते कोल्हापुर के युवराज संभाजी ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को फोर्ट रायगढ़ पर एक मस्जिद बनाने के प्रयासों के बारे में लिखा था, जो कभी हिंदवी स्वराज्य की राजधानी के रूप में खड़ा था।

रायगढ़ के मदारी मोर्चा में एक ढाँचा खड़ा करने के लिए बदमाशों का पत्थर ले जाने वाला एक वीडियो वायरल होने के बाद यह बात सामने आई। इस दौरान पता चला कि कि परिसर का एक हिस्सा को मुस्लिम पहचान देने के लिए पहले ही उसे पेंट कर दिया गया था और उस पर चादर चढ़ा दी गई थी। संभाजी ने पत्र में लिखा, “यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि रायगढ़ किले जैसी प्रतिष्ठित जगह पर अवैध निर्माण गतिविधियों को चलने दिया गया।”

सेनापति बाजीप्रभु देशपांडे की विरासत की लेकर मजबूती खड़ा एक अन्य किला, किल्ले विशालगढ़ भी उपेक्षा का शिकार है। वहीं, देशपांडे की पावनखिंड के पास दूर-दराज स्थित समाधि भी उपेक्षित है। हालाँकि, राज्य सरकार ने अवैध रूप से कब्जा करके कंक्रीट से बनाए गए बाबा रेहान की दरगाह के लिए धन दने की घोषणा की है। सरकार ने दरगाह द्वारा लगातार किए जा रहे अवैध अतिक्रमण पर नकेल कसने के बजाय ढाँचे तक सड़क के साथ फुटपाथ बनाने के लिए धनराशि स्वीकृत की है।

यह सब तब हो रहा है, जब किले पर बने पारंपरिक मंदिर पूरी तरह जर्जर अवस्था में पहुँच चुका है। स्थानीय इतिहासकारों का कहना है कि मलिक रेहान ने एक बार घेराबंदी कर विशालगढ़ पर हमला किया था और उस युद्ध में उसकी मृत्यु हो गई थी। इस तरह रेहान की दरगाह विशालगढ़ पर खड़ी है, जबकि छत्रपति शिवाजी के दुश्मन को उनकी ही विरासत पर स्थापित करने की कोशिश की जा रही है।

उपरोक्त मामले आँख खोलने वाले हैं कि कैसे विरासत में साजिश के तहत दावा कर अतिक्रमण किए जा रहे हैं। ऐतिहासिक नैरेटिव से परे कुछ इस्लामवादी बिना किसी तथ्य, संदर्भ और इतिहास में भागीदारी के जमीनी विरासत स्थलों पर कब्जा करने का प्रयास कर रहे हैं। पिछले साल फरवरी में सतारा में वंदनगढ़ के किले का नाम बदलने का प्रयास राज्य के वन विभाग द्वारा ‘पीर वंदनगढ़’ (मुस्लिम संत) के रूप में करने का प्रयास किया गया था। यह किला प्रतिबंधित वन क्षेत्र में स्थित होने के बावजूद, यहाँ भी अब्दल सहाब दरगाह ट्रस्ट द्वारा अतिक्रमण कर लिया गया है।

हिंदू जनजागृति समिति ने इस कदम की आलोचना की थी। वहीं, किले का नाम बदलने का मुद्दा अब सुलझा लिया गया है। हाल ही में डॉ विनय सहस्त्रबुद्धे (निदेशक, आईसीसीआर), सुनील देवधर (राष्ट्रीय सचिव, भाजपा) और वैभव डांगे वाले एक इतिहास प्रेमी पैनल ने संस्कृति राज्यमंत्री अर्जुन राम मेघवाल को कई ऐतिहासिक किलों पर अवैध निर्माण गतिविधियों को रोकने के लिए एक ज्ञापन सौंपा गया।

एक तरफ हमारी निर्मित विरासत का संरक्षण एक बड़ी चुनौती बनी हुई है, वहीं दूसरी तरफ इन पर अवैध अतिक्रमण के जरिए कानून-व्यवस्था का सीधा उल्लंघन हो रहा है। छत्रपति शिवाजी की विरासत पर अतिक्रमण के प्रयासों से इस्लामवादियों द्वारा अपनाई जाने वाली बेशर्म रणनीति का पता चलता है और हमारी विरासत की सुरक्षा के लिए चुनौतियों को रेखांकित करता है। घटिया नैरेटिव के माध्यम से इतिहास का मिथ्याकरण का जब पर्याप्त नहीं हुआ तो 21वीं सदी के आक्रमणकारियों ने अब हिंदुओं की बेशकीमती विरासत में सीधे तौर पर हिस्सेदारी का दावा कर दिया है। यह हिंदुओं के लिए एक संदेश है कि आक्रमण और विजय जारी रहेगी, क्योंकि इस्लामवादी छत्रपति शिवाजी के किलों को हड़पना चाहते हैं, जिसे मुगल नहीं कर सके थे।

दीपक के पास से मिले केवल 250 रुपए, इसलिए फैज और फराज ने सोए में ही गला रेता: दिल्ली की घटना

दिल्ली (Delhi) के जगतपुरी इलाके से हत्या (Murder) की घटना प्रकाश में आई है। मृतक की प​हचान 38 वर्षीय बस कंडक्टर दीपक के तौर पर हुई है। बस के भीतर ही उसकी हत्या कर दी गई। इस मामले में पुलिस ने फैज रहमान और मोहम्मद फराज को गिरफ्तार किया है। रिपोर्ट के अनुसार दोनों आरोपित लूटपाट के इरादे से बस में घुसे थे। उस समय दीपक नींद में था। उसके पास से केवल 250 रुपए ही मिलने पर दोनों ने गुस्से में आकर उसका गला रेत दिया।

घटना बुधवार (19 जनवरी 2022) की रात की है। बताया जाता है कि मृतक दीपक बीते 10 साल से वजीराबाद के प्रवीण नाम के व्यक्ति की बस में कंडक्टर के तौर पर काम कर रहा था। वह रात में बस में ही सो जाता था। हमेशा की ही तरह जगतपुरी में यमुना बायोडायवर्सिटी पार्क के पास रात में दीपक बस खड़ी कर सो रहा था। यहाँ पर अन्य बसें भी पार्क की जाती हैं।

गुरुवार की सुबह करीब 11 बजे जब बस ड्राइवर कांति आया तो बस का दरवाजा खुला हुआ था। लेकिन बस के अंदर से कोई आवाज नहीं आ रही थी। कांति बस के भीतर गया तो देखा कि दीपक अंदर खून से लथपथ औंधे मुँह मृत पड़ा था। बस के अंदर खून फैला हुआ था। सूचना मिलने पर पुलिस मौके पर पहुँची और शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।

लूटपाट के इरादे से की गई हत्या

बस कंडक्टर दीपक की हत्या की जाँच के क्रम में पुलिस ने आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज को खँगाला तो हत्यारों का पता चल गया। इस घटना को लेकर पुलिस ने दो आऱोपितों को गिरफ्तार किया है। इनकी पहचान फैज रहमान और मोहम्मद फराज के तौर पर हुई है। पुलिस ने कहा कि आरोपित नशे के आदी हैं। उन्होंने गला रेतकर दीपक की हत्या की। पुलिस के अनुसार आरोपितों ने लूटपाट के इरादे से हत्या की वारदात को अंजाम दिया। आरोपितों को लगा था कि दीपक के पास पाँच हजार रुपए होंगे। लेकिन उन्हें केवल 250 रुपए ही मिले। इससे नाराज हो दोनों ने उसकी हत्या कर दी।

सोनिया के गढ़ में कॉन्ग्रेस को झटका, BJP में ‘लड़की हूँ लड़ सकती हूँ’ वाली प्रियंका: साइकिल से मुलायम के साढ़ू भी उतरे

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए कॉन्ग्रेस ने 41 उम्मीदवारों की दूसरी लिस्ट जारी कर दी है। इसमें 16 महिलाओं के नाम हैं। लेकिन प्रदेश में उसे दो महिला नेत्रियों ने तगड़ा झटका दिया है। पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली से विधायक अदिति सिंह ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। प्रियंका गाँधी के कैम्पेन ‘लड़की हूँ, लड़ सकती हूँ’ की पोस्टर गर्ल प्रियंका मौर्या बीजेपी में शामिल हो गई हैं। मुलायम सिंह के साढ़ू पूर्व विधायक प्रमोद गुप्ता भी भाजपा में शामिल हुए हैं। यूपी में समाजवादी पार्टी को परिवार से यह दूसरा झटका लगा है। इससे पहले मुलायम की बहू अपर्णा ने भाजपा का दामन थामा था।

अदिति सिंह ने रायबरेली की सदर सीट से विधायक हैं। उन्होंने सोनिया गाँधी को पत्र लिखकर प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफे की बात कही है। कभी वे गाँधी परिवार के काफी करीब मानी जाती थीं। लेकिन पिछले कुछ समय से पार्टी के साथ उनके संबंध बेहद तल्ख रहे हैं।

कॉन्ग्रेस पर कई बार पलटवार कर चुकी हैं अदिति

अदिति ने नवंबर 2021 में खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से प्रेरित बताया था। अदिति सिंह कई बार प्रियंका गाँधी पर खुलकर हमला कर चुकी हैं। अदिति सिंह ने एक बार कहा कि था जब कृषि कानून लाए गए थे तब भी उनको परेशानी थी। अब जब कृषि कानूनों को रद्द किया गया तो भी उन्हें तकलीफ हो रही है। उन्होंने आरोप लगाया था कि प्रियंका गाँधी सिर्फ मामले का राजनीतिकरण कर रही हैं। उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि प्रियंका गाँधी के पास सियासत करने के लिए अब मुद्दे खत्म हो गए हैं, इसलिए वह किसानों के मुद्दों पर राजनीति कर रही हैं।

महिलाओं के 40 फीसदी आरक्षण पर भी उठाया था सवाल

अदिति सिंह ने प्रियंका गाँधी के महिलाओं को 40 फीसदी आरक्षण देने के ऐलान का भी मुद्दा उठाया था। उन्होंने सवाल किया कि पंजाब में कॉन्ग्रेस की सरकार है वहाँ पार्टी ने आरक्षण देने का ऐलान क्यों नहीं करती। इसके साथ ही उन्होंने प्रियंका के इस ऐलान को लॉलीपॉप बताया था। अदिति सिंह ने कहा कि प्रियंका गाँधी जनता को सिर्फ लॉलीपॉप बाँट रही हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि जब प्रियंका की माँ खुद पार्टी की अध्यक्ष हैं तो फिर वह दूसरे राज्यों में बातचीत किए जाने की बहानेबाजी क्यों कर रही हैं।

सीएम योगी की कर चुकी हैं तारीफ 

गौरतलब है कि कुछ समय पहले अदिति सिंह ने सबके सामने सीएम योगी की भी जमकर तारीफ की थी। उन्होंने कहा था, “मैं कहना चाहती हूँ कि गरीबों की जो दुकानें बची हैं वह मेरे राजनीतिक गुरु और हमारे माननीय मुख्यमंत्री महाराज योगी आदित्यनाथ की वजह से है। उनकी वजह से हम यह लड़ाई लड़ रहे हैं।”

प्रियंका ने टिकट के बदले में पैसे माँगने का लगाया था आरोप

प्रियंका मौर्या ने कॉन्ग्रेस पर टिकट बँटवारे में घोटाले का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि प्रियंका गाँधी के सचिव ने टिकट के लिए उनसे पैसे माँगे थे।

मौर्या ने कहा था, “लड़की हूँ लड़ सकती हूँ’ को केवल एक नारा के रूप में प्रस्तुत किया गया है, क्योंकि लड़की के रूप में मुझे चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं थी क्योंकि मैं रिश्वत नहीं दे सकती थी। टिकट उन्हें देने की बजाय एक महीने पहले पार्टी में शामिल हुए व्यक्ति को दिया गया।” मौर्या ने कहा कि वह सरोजिनी नगर विधानसभा क्षेत्र में एक साल से अधिक समय से लगातार काम करने में जुटी हैं, लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिली।

कॉन्ग्रेस ने जारी की दूसरी लिस्ट

बता दें कि उत्तर प्रदेश चुनाव के लिए कॉन्ग्रेस ने उम्मीदवारों की दूसरी लिस्ट जारी की है। इस लिस्ट में कुल 41 उम्मीदवारों के नाम हैं। इससे पहले कॉन्ग्रेस ने पहली लिस्ट में 125 उम्मीदवारों के नाम जारी किए थे। उस लिस्ट में 50 महिलाओं को टिकट दिया गया था। यूपी चुनाव के लिए कॉन्ग्रेस अब तक 166 उम्मीदवारों का ऐलान कर चुकी है। इसमें 66 महिलाओं को विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाया गया है।

लोन देने वाली ‘Better’ के सीईओ विशाल गर्ग फिर से काम पर लौटे: Zoom पर 3 मिनट की मीटिंग में 900 लोगों को नौकरी से निकाल दिया था

क्या आपको विशाल गर्ग (Vishal Garg) का नाम याद है? दिमाग पर थोड़ा ज़ोर डालेंगे तो याद आ जाएगा कि इस शख्स ने एक साथ 900 लोगों की नौकरी से छुट्टी कर दी थी। वह भी एक जूम मीटिंग के दौरान। उनके इस फैसले की दुनियाभर में काफी आलोचना हुई थी। अब खबर है कि वह बेटर.कॉम (Better.com) में फिर से लौट आए हैं और उन्होंने CEO पद सँभाल लिया है। बता दें कि 900 लोगों को ज़ूम कॉल पर हटाने के बाद कंपनी बोर्ड ने विशाल गर्ग को लंबी छुट्टी पर भेजने का फैसला लिया था। तब से वे छुट्टी पर थे।

बुधवार (19 जनवरी 2022) को कंपनी की तरफ से यह घोषणा की गई कि विशाल गर्ग अपने पद पर लौट रहे हैं। द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में कंपनी बोर्ड द्वारा कर्मचारियों को भेजे गए एक ईमेल का हवाला दिया गया है। इसमें कहा गया है, “जैसा कि आप जानते हैं, बेटर डाॅट काॅम के सीईओ विशाल गर्ग अपने पूर्णकालिक कर्तव्यों को फिर से शुरू कर रहे हैं। उनके नेतृत्व में मूल्यों के साथ फिर से जुड़ें जो बेटर को महान बनाते हैं और मिलकर काम करें।”

सीएनएन की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि कर्मचारियों को एक अलग पत्र में गर्ग ने कहा, “मैं समझता हूँ कि पिछले कुछ सप्ताह कितने कठिन रहे हैं। मेरे कार्यों के कारण हुए गुस्से, व्याकुलता और शर्मिंदगी के लिए मुझे गहरा खेद है। मैंने यह सोचने में बहुत समय बिताया है कि हम एक कंपनी के रूप में कहाँ हैं और किस प्रकार के नेतृत्व की जरूरत है और मुझे कैसा लीडर बनना चाहिए।”

गौरतलब है कि Better.com एक अमेरिकी कंपनी है, जो ग्राहकों को ऑनलाइन लोन देती है। इसके सीईओ विशाल गर्ग भारतीय मूल व्यक्ति हैं। विशाल गर्ग ने बीते साल दिसंबर के महीने में Zoom पर 3 मिनट की मीटिंग कर कंपनी के 900 कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया था। गर्ग ने वीडियो में कहा था, “अगर आप इस कॉल से जुड़े हैं, तो आप उस बदकिस्मत ग्रुप के सदस्य हैं, जिनकी छँटनी की जा रही है। आपकी सेवा को यहाँ तत्काल प्रभाव से समाप्त किया जाता है। एचआर की ओर से आपको मेल आ जाएगा।” 

इस फैसले को लेकर उनकी खूब आलोचना हुई थी। इसके बाद उन्होंने माफी भी माँगी थी। गर्ग ने कहा था, “मुझे एहसास हुआ है कि संदेश देने का मेरा ये तरीका सही नहीं था। मैंने कर्मचारियों के मुश्किल समय को और भी ज्यादा कठिन कर दिया। मैं अपनी गलती स्वीकार कर रहा हूँ।”

उल्लेखनीय है कि विशाल गर्ग ने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी (Oxford University) से एमबीए किया है। वो पत्नी और तीन बच्चों के साथ न्यूयॉर्क के ट्रेबेका में रहते हैं। ट्रेबेका न्यूयॉर्क की सबसे महंगी जगहों में से एक है, जहाँ केवल अमीर लोग रहते हैं। उन्होंने 7 साल की उम्र में भारत छोड़ा था।

अरुणाचल प्रदेश के दो भारतीय युवकों को चीन की सेना ने किया अगवा, एक भागने में रहा कामयाब: बीजेपी सांसद ने बताया

चीनी सेना ने अरुणाचल प्रदेश के एक 17 वर्षीय किशोर को अगवा कर लिया है। बीजेपी सांसद तापिर गाओ (Tapir Gao) ने ट्वीट कर यह बात कही है। अगवा किए गए किशोर की पहचान मीरम तरोन (Miram Taron) के तौर पर की गई है। वह जीडो गाँव का रहने वाला है। उसे 18 जनवरी 2022 को अप्पर सियांग जिले से अगवा करने की बात कही जा रही है।

सांसद ने बताया है कि उन्होंने केंद्रीय गृह राज्य मंत्री निशीथ प्रमाणिक को घटना से अवगत कराया है। केंद्रीय एजेंसियों से तरोन की जल्द सुरक्षित रिहाई के लिए आवश्यक कदम उठाने की अपील की है। उन्होंने बताया है कि तरोन को उसके दोस्त जॉनी यइयिंग (Johny Yaiying) के साथ चीन की सेना ने अगवा कर लिया था। लेकिन वह किसी तरह चीनी सेना के कब्जे से भागने में सफल रहा। इसके बाद तरोन के अपहरण की बात सामने आई।

सांसद ने तरोन की फोटो शेयर करते हुए बताया है कि जिस लुंगता जोर इलाके से उसे अगवा किया गया वहाँ 2018 में चीन ने 3-4 किलोमीटर सड़क बना ली थी। इसी जगह से शियांग नदी अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है। शियांग नदी ही भारत में ब्रह्मपुत्र के नाम से जानी जाती है।

न्यूज एजेंसी एएनआई ने रक्षा सूत्रों के हवाले से बताया है कि इस संबंध में भारतीय सेना ने चीन की सेना से संपर्क किया है। चीनी अधिकारियों ने इस मामले का तत्काल संज्ञान लेते हुए उसे लौटाने का आश्वासन दिया है।

गौरतलब है कि सितंबर 2020 में चीन की सेना ने अरुणाचल प्रदेश के अप्पर सुबानसिरी जिले से 5 भारतीय युवकों को अगवा कर लिया था। केंद्र सरकार के हस्तक्षेप के बाद इन युवकों को रिहा कर दिया गया था।

बुजुर्ग माँ की दुहाई दे सोशल मीडिया में प्रोपेगेंडा बो रहा था ‘हिस्ट्रीशीटर’ कफील खान, UP पुलिस ने बताया पूरा माजरा

गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की कमी से बच्चों की हुई मौत के मामले में आरोपित डॉक्टर कफील खान ने 19 जनवरी 2022 (बुधवार) को उत्तर प्रदेश पुलिस पर ज्यादती का आरोप लगाते हुए एक ट्वीट किया। इस ट्वीट में उसने पुलिस पर अपने परिजनों को परेशान करने का आरोप लगाया। कफील खान ने लिखा, “मैं केरल में हूँ। अपनी किताब लोगों तक पहुँचाने के लिए। उत्तर प्रदेश चुनाव से दूर। बच्चों के इलाज में व्यस्त। पर बर्दाश्त नहीं। पुलिस भेज कर मेरी 70 साल की ज़ईफ़ माँ को डरा-धमकाकर क्या साबित करना चाहते हैं? गिरफ़्तार करना चाहते हैं, मारना चाहते हैं? कर लो मैं डरता नहीं साहब।”

कफील खान के ट्वीट करते ही लिबरल गैंग उसके प्रोपेगेंडा को हवा देने में लग गया। कॉन्ग्रेसी मुखपत्र नेशनल हेराल्ड के न्यूज़ एडिटर एश्लिन मैथ्यू (Ashlin Mathew) ने लिखा, “जब कफील खान केरल में अपनी किताब ‘द गोरखपुर हॉस्पिटल ट्रेजिडी’ का प्रमोशन कर रहे हैं, तब UP पुलिस उनके घर पहुँची है। घर में उनकी 70 वर्षीया माँ ही रहतीं हैं। उन्हें चेतावनी देते हुए सवाल जवाब करती है।” एश्लिन ने कफील के भाई अदील खान के हवाले से बताया कि पुलिस ने कफील को व्यक्तिगत रूप से थाने में पेश होने को कहा है।

मिली गैज़ेट ने लिखा, “सबसे मासूम पुलिस चिंतित है एक हिस्ट्रीशीटर डॉक्टर के बारे में। डॉक्टर कफील आने वाले चुनावों में समस्या खड़ी कर सकते हैं।”

इन आरोपों का जवाब देते हुए गोरखपुर पुलिस ने बताया है कि कफील खान हिस्ट्रीशीटर है। थाना राजघाट में उसकी हिस्ट्रीशीट दर्ज है। चुनावों को ध्यान में रखते हुए सभी हिस्ट्रीशीटरों के सत्यापन की कार्रवाई चल रही है। इसी क्रम में राजघाट थाना पुलिस कफील के घर गई थी। परिजनों ने पुलिस को बताया कि वे काम से बाहर गए हुए हैं।

कॉन्ग्रेस पार्टी के एर्नाकुलम से सांसद हिबी ईडन (Hibi Eden) ने केरल में कफील खान की पुस्तक का विमोचन किया है। कफील खान के साथ किताब के विमोचन को कॉन्ग्रेस के सांसद ने ‘गर्व का क्षण’ बताया है। गौरतलब है कि गोरखपुर के अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी से बच्चों की मौत के मामले में यूपी सरकार ने नवम्बर 2021 में डॉक्टर कफील खान को बर्खास्त कर दिया था। CAA के खिलाफ प्रदर्शनों के दौरान कफील खान पर AMU में उत्तेजक भाषण देने का आरोप था। इसी आरोप के चलते फरवरी 2020 में उस पर NSA लगाया गया था।

महाराष्ट्र के नगर पंचायतों में BJP सबसे आगे, शिवसेना चौथे नंबर की पार्टी बनी: जानिए कैसा रहा OBC रिजर्वेशन रद्द होने का असर

महाराष्ट्र (Maharashtra) के नगर पंचायत चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। रिपोर्टों के अनुसार भाजपा के कुल 384 उम्मीदवार जीते हैं। दूसरे नंबर पर एनसीपी है, जिसके 344 उम्मीदवार जीते हैं। कॉन्ग्रेस के 316 उम्मीदवारों को जीत मिली है। महाराष्ट्र की महाविकास अघाड़ी सरकार का नेतृत्व कर रही शिवसेना चौथे नंबर पर है। उसे 284 सीट मिली है। 206 निर्दलीय भी जीतने में कामयाब रहे हैं।

नगर पंचायत की 1649 सीटों के लिए मंगलवार (18 जनवरी 2022) को मतदान हुआ था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यह चुनाव ओबीसी आरक्षण के बगैर हुआ था। पंचायत चुनावों में मिली सफलता के बाद भाजपा नेता और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा है कि सत्ताधारी पार्टी ने इन चुनावों में पैसे, पावर और प्रशासन का गलत इस्तेमाल किया, इसके बाद भी महाराष्ट्र के लोग दृढ़ता के साथ भाजपा के साथ खड़े रहे। उन्होंने ट्वीट कर कहा, “बीजेपी फिर एक बार महाराष्ट्र में नम्बर 1। जब प्रदेश में हमारी सरकार थी तब से भी 65 सीट, इस बार अधिक आई है। महाराष्ट्र की जनता ने फिर एक बार हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर विश्वास जताया है। मैं महाराष्ट्र की जनता का बहुत बहुत आभार व्यक्त करता हूँ।”

इन चुनावों में लगभग 81 प्रतिशत मतदाता ने अपने वोट का इस्तेमाल किया। भाजपा की राज्य इकाई के प्रमुख चंद्रकांत पाटिल ने दावा किया कि पार्टी राज्य की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत है। लगभग 26 महीनों तक सत्ता से बाहर रहने के बावजूद, भाजपा सफल रही है और इससे पता चलता है कि हम सरकारी तंत्र के दुरुपयोग के बावजूद अच्छे परिणाम दे सकते हैं। उन्होंने दावा किया है कि पार्टी 24 नगर पंचायतों का नेतृत्व हासिल कर सकती है।

बात अगर अलग-अलग क्षेत्रों की करें तो मराठवाड़ा में कुल 22 नगर पंचायत हैं। इसमें बीजेपी के खाते में 6 गई हैं। शिवसेना को चार, कॉन्ग्रेस को तीन और एनसीपी को 2 जगहों पर सफलता मिल पाई। वहीं विदर्भ की बात करें तो वहाँ की 28 पंचायतों में से बीजेपी और कॉन्ग्रेस को 5-5 और एनसीपी को दो मिली है। शिवसेना का यहाँ खाता भी नहीं खुला है। कोंकण और पश्चिमी महाराष्ट्र में बीजेपी ने पाँच नगर पंचायत जीती है। शिवसेना को यहाँ चार,  NCP को 8 और कॉन्ग्रेस को केवल एक नगर पंचायत में सफलता मिली है।

गौरतलब है कि नगर पंचायत चुनावों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा ओबीसी को राजनीतिक आरक्षण से इनकार किए जाने के बाद सभी सीटे अनारक्षित कर दी गई थी। जानकारों का मानना है कि चुनावों में इसका असर नहीं दिखा। महाराष्ट्र सरकार ने वैसे यह फैसला वापस लेने के लिए दिसंबर में शीर्ष अदालत के सामने एक अनुरोध भी दायर किया था।

26 साल की महिला को ईशनिंदा में सजा-ए-मौत: फारूक से ऑनलाइन मिली, दोस्ती टूटी तो लगा WhatsApp पर इस्लाम के अपमान का आरोप

पाकिस्तान की एक अदालत ने ईशनिंदा के आरोप में एक महिला को मौत की सजा सुनाई है। यह फैसला रावलपिंडी की गैरिसन सिटी अदालत ने दिया है। महिला के खिलाफ साल 2020 में फारूक हसनत नाम के व्यक्ति ने शिकायत दर्ज करवाई थी। शिकायत में इस्लाम और पैगम्बर मोहम्मद के अपमान का आरोप लगाया गया था। महिला को बुधवार (19 जनवरी 2022) को सुनाई गई।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक दोषी करार दी गई अनिका अतीक की उम्र करीब 26 साल है। ईशनिंदा के आरोप लगाने वाले फारूक से वह 2019 में ऑनलाइन मिली थी। अनिका का कहना था कि जब उसने फारूक के साथ दोस्ती बनाए रखने से इनकार कर दिया तो उसने बदला लेने के लिए उस पर ईशनिंदा के आरोप लगाए।

आरोप था कि अनिका ने व्हाट्सएप पर इस्लाम को अपमानित करने वाले संदेश भेजे थे। फारूक ने संदेशों को डिलीट करने के लिए कहा, लेकिन उसने ऐसा करने से इंकार कर दिया। इसके बाद फारूक ने इसकी शिकायत संघीय जाँच एजेंसी की साइबर क्राइम ब्रांच में की थी। शुरुआती जाँच में अनिका को दोषी पाया गया। उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था। अब उसे 20 साल जेल और फाँसी की सजा सुनाई गई है।

गौरतलब है कि अमेरिका के अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग के मुताबिक पाकिस्तान की जेलों में लगभग 80 लोग ईशनिंदा का आरोप में बंद हैं। इनमें से आधे आजीवन कारावास या मौत की सजा पा चुके हैं। दिसंबर 2021 में श्रीलंका के नागरिक प्रियांथा कुमारा को कट्टरपंथियों की भीड़ ने ईशनिंदा के आरोप में सियालकोट में जिन्दा जला दिया था। कुमारा यहाँ की एक फैक्ट्री में मैनेजर ​थे। उससे पहले अगस्त 2021 में पंजाब प्रांत के रहीम यार खान जिले में 8 साल के हिन्दू बच्चे को ईशनिंदा के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। पाकिस्तान का ईशनिंदा कानून काफी विवादों में रहा है। आपसी विवादों में भी इसका दुरुपयोग किया जाता है। यहाँ तक कि ऐसे मामलों आरोपितों का बचाव करने वालों को भी कट्टरपंथी नहीं छोड़ते। 2011 में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या उनके ही सुरक्षाकर्मी ने कर दी थी, क्योंकि उन्हें ईशनिंदा की आरोपित ईसाई महिला आसिया बीबी का बचाव किया ​था।

ओडिशा सरकार के खिलाफ धरने पर बैठे जगन्नाथ मंदिर के बॉडी बिल्डर सेवायत अनिल गोछीकर, ‘अवैध रूप से’ घर तोड़ने के आरोप

जगन्नाथपुरी मंदिर की रथयात्रा से लोगों की नजरों में आए ओडिशा के लोकप्रिय बॉडी बिल्डर अनिल गोछीकर जनवरी के पहले सप्ताह से ओडिशा सरकार के खिलाफ ‘धरने’ में बैठे हैं। गोचिकर का दावा है कि उनके परिवार के पास पुरी जगन्नाथ मंदिर के पास घर और जमीन थी जिसे ओडिशा सरकार ने ‘अवैध रूप से’ ध्वस्त कर दिया था। सोशल मीडिया पर धरने पर बैठे गोचिकर की तस्वीरें वायरल हो रही हैं।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रही गोछीकर की तस्वीरें

क्या है गोछीकर की शिकायत?

श्री जगन्नाथ मंदिर के सेवादारों के परिवार से ताल्लुक रखने वाले गोछीकर का कहना है कि उनके परिवार के पास श्री जगन्नाथ मंदिर के बहुत करीब की इमारतें थीं, जिन्हें सरकार ने कानूनी प्रक्रिया के बावजूद ध्वस्त कर दिया है। उनका कहना है कि परिवार को भूखंड के बदले मुआवजे की राशि और वैकल्पिक स्थल की पेशकश की गई है, लेकिन मुआवजे की राशि पर्याप्त नहीं है। उनका कहना है कि उनको दिया जाने वाला वैकल्पिक भूखंड भी मंदिर से बहुत दूर है।

एक फेसबुक पोस्ट में गोछीकर ने दावा किया कि पुरी प्रशासन द्वारा उच्च न्यायालय के पूर्व आदेश के बिना उनकी 4 इमारतों को ध्वस्त कर दिया गया। उन्होंने कहा कि उन्होंने विरोध में अपने बाल और दाढ़ी काट ली है और न्याय मिलने तक सड़क किनारे अपना धरना जारी रखेंगे। गोछीकर का कहना है कि उनके परिवार ने पर्याप्त मुआवजे और मंदिर के नजदीक भूखंड की माँग करते हुए सरकार के खिलाफ अदालत में मामला दायर किया था, इसलिए अदालत के आदेश तक ओडिशा सरकार को मंदिर के पास स्थित उनकी इमारतों को ध्वस्त नहीं करना चाहिए था।

5 जनवरी 2022 को ओडिया मीडिया पोर्टल ओडिशा भास्कर से बात करते हुए उन्होंने स्वीकार किया था कि कई परिवार जो मंदिर के करीब की इमारतों में रह रहे थे, उन्होंने स्वेच्छा से इमारतों को खाली कर मुआवजे को स्वीकार कर लिया था। कुछ परिवार पैसे की राशि और उन्हें मिल रहे वैकल्पिक भूखंड से नाखुश थे, लेकिन सरकार के डर से विरोध नहीं किया। उन्होंने आगे कहा कि उनके परिवार को मुआवजे की पेशकश की गई राशि और उन्हें प्रदान की गई वैकल्पिक साइट पसंद नहीं है। इसलिए वे तब तक विरोध करेंगे, जब तक कि ओडिशा सरकार उनकी माँगों पर ध्यान नहीं देती। गौरतलब है कि अधिकांश भूखंड कानूनी रूप से इन लोगों के स्वामित्व में नहीं थे, लेकिन ये पीढ़ियों से यहाँ रहे थे।

ओडिशा सरकार की जगन्नाथ मंदिर परिक्रमा परियोजना

राज्य के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के नेतृत्व वाली ओडिशा सरकार ने जगन्नाथ मंदिर के आसपास से अवैध अतिक्रमण को हटाने और आसपास के मठों और अन्य धार्मिक संरचनाओं को अन्य स्थानों पर स्थानांतरित करने की प्रक्रिया शुरू की है, ताकि हर साल होने वाले भव्य रथ यात्रा के लिए मंदिर के गलियारे को चौड़ा किया जा सके।

इसी साल 24 नवंबर को पुरी के गजपति महाराज ने जगन्नाथ मंदिर के आसपास हेरिटेज कॉरिडोर प्रोजेक्ट का शिलान्यास किया था। ओडिया में ‘परिक्रमा प्रकल्प’ कहे जाने वाले इस कॉरिडोर को बनाने का उद्देश्य 12वीं शताब्दी के इस मंदिर की दीवारों, जिसे ‘मेघनाद पचेरी’ कहा जाता है, उसके सौंदर्यीकरण और हर साल आने वाले तीर्थयात्रियों के आराम और सुविधाओं के लिए विकसित करना है।

अगस्त 2019 में ओडिशा सरकार ने घोषणा की थी कि इस मंदिर की सुरक्षा और अखंडता सुनिश्चित करने के लिए जगन्नाथ मंदिर की मेघनाद दीवार के 75 मीटर के दायरे में सभी संरचनाओं को हटा दिया जाएगा। इसके तहत जिन संरचनाओं की पहचान की गई, उनमें वर्षों से चले आ रहे जूता स्टैंड, दुकानें, स्टॉल और बिजली आपूर्ति भवन, सूचना केंद्र, पुलिस चौकी जैसी सरकारी सुविधाएँ थीं। न्यायमूर्ति बीपी दास आयोग द्वारा की गई सिफारिशों के पहले चरण को लागू करने का निर्णय लिया गया।

ओडिशा सरकार ने कहा था कि मेघनाद दीवार के चारों ओर बने अवैध अतिक्रमण और संरचनाएँ मंदिर और तीर्थयात्रियों की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा पैदा करती हैं। पुरी के तत्कालीन जिलाधिकारी ने कहा था, “हम चाहते हैं कि इस क्षेत्र को इमारतों से मुक्त किया जाए, जिनमें से कई अवैध हैं, ताकि कड़ी निगरानी के जरिए आतंकी हमलों को रोका जा सके। मुख्य मंदिर से सटे कई ढाँचे हैं, इसलिए आतंकवादियों के लिए मंदिर पर हमला करना बहुत आसान है।

नवीन सरकार के इस अभियान के बाद इससे संबंधित लोगों में आक्रोश पैदा हो गया था और उन लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में कई जनहित याचिकाएँ दायर की थीं। मठों के कई धर्मगुरुओं ने भी सुप्रीम कोर्ट को लिखा था। सुप्रीम कोर्ट ने तब रंजीत कुमार को एमिकस क्यूरी नियुक्त किया था और उन्हें इस कार्य का निरीक्षण करने के लिए भेजा था। रंजीत कुमार एसजी तुषार मेहता के साथ पुरी पहुँचे थे और मठों के प्रमुखों, सरकारी अधिकारियों और मंदिर प्रशासन के अधिकारियों के साथ बैठक की थी।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट

बैठकों और निरीक्षणों के बाद एमिकस क्यूरी ने अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंप दी थी। इसमें कहा गया था कि यहाँ जबरन हटाने का काम नहीं हो रही है और यह हेरिटेज परियोजना आवश्यक और उचित है। इसलिए उडिशा सरकार को अतिक्रमण हटाने का काम जारी रखना चाहिए। रिपोर्ट मिलने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा सरकार को अतिक्रमण हटाने का कार्य जारी रखने की अनुमति दे दी थी। ओडिशा सरकार भी एकाम्र क्षेत्र परियोजना के तहत भुवनेश्वर के प्रसिद्ध लिंगराज मंदिर के आसपास भी इसी तरह के विकास कार्य कर रही है।