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लखीमपुर खीरी हिंसा: 14 आरोपित, 5000 पन्नों की चार्जशीट दाखिल; बीजेपी कार्यकर्ताओं की हत्या मामले में 3 ‘किसान’ गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी (Lakhimpur Kheri) जिले के तिकुनिया (Tikunia Violence) में 3 अक्टूबर को हुई हिंसा के मामले में सोमवार (3 जनवरी 2022) को एसआईटी (SIT) ने CJM कोर्ट में चार्जशीट दायर की है। एसआईटी ने 5,000 पन्ने की चार्जशीट में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा ‘टेनी’ के बेटे आशीष मिश्रा को मुख्य आरोपित बताया है। लखीमपुर हिंसा मामले में पहले 13 अभियुक्त आरोपित बनाए गए थे, जो बढ़कर अब 14 हो गए हैं।

चार्जशीट में केंद्रीय मंत्री टेनी के बेटे आशीष मिश्रा के साथ ही उनके साले वीरेंद्र शुक्ला का भी नाम जोड़ा गया है। शुक्ला ब्लॉक प्रमुख हैं। उन पर पुलिस को झूठी सूचना देने और सबूत मिटाने के आरोप हैं। घटना के दिन काफिले में वीरेंद्र शुक्ल की स्कॉर्पियो गाड़ी भी शामिल थी, जिसे संपूर्णानगर से पुलिस ने बरामद की थी।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट में माना है कि यह क्राइम किसी लापरवाही का नतीजा नहीं, बल्कि जानबूझकर, साजिशन और जान लेने की नीयत से किया गया अपराध है। इस खुलासे के बाद सभी आरोपितों पर गैर-इरादतन हत्या की बजाय हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया है। एसआईटी ने अब सभी आरोपितों पर 307, 326, 302, 34,120बी, 147, 148, 149 के तहत मामला दर्ज किया है। इससे पहले लखीमपुर कांड के गुनहगारों पर आईपीसी की धारा 279, 338, 304ए के तहत कार्रवाई की जा रही थी।

वहीं, लखीमपुर खीरी में दो बीजेपी कार्यकर्ताओं की पीट-पीट कर हत्या करने के मामले में एसआईटी ने अपराधियों पर कार्रवाई करते हुए दो ‘किसानों’ को गिरफ्तार किया है। एसआईटी ने इसकी सूचना देते हुए बताया कि लखीमपुर खीरी से दो किसान कमलजीत सिंह (उम्र 29) और कंवलजीत सिंह सोनू (उम्र 35) को गिरफ्तार किया गया है। ताजा रिपोर्टों के अनुसार, गुरप्रीत सिंह (उम्र 22) नाम के एक अन्य किसान को भी एसआईटी ने लिंचिंग मामले में गिरफ्तार किया है।

गौरतलब है कि 3 अक्टूबर को हुई इस घटना में चार किसानों व एक स्थानीय पत्रकार समेत आठ लोगों की हत्या हुई थी। आशीष मिश्रा व उसके साथियों पर आरोप है कि वह फायरिंग करते हुए किसानों को अपनी गाड़ी से रौंदते हुए निकल गया। इस घटना में चार की मौत हो गई और कई गंभीर रूप से घायल हो गए थे। इसके बाद 4 अक्टूबर को तिकुनिया थाने में आशीष मिश्रा समेत कई अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी।

क्या साकेत गोखले यौन दुराचारी है? वित्तीय हेरफेर के आरोपों के बाद TMC कार्यकर्ता के ‘दोस्त’ ने दिया बयान: पढ़ें डिटेल

कॉन्ग्रेस के वफादार से तृणमूल कॉन्ग्रेस (टीएमसी) नेता बने साकेत गोखले (Saket Gokhale) सार्वजनिक धन के दुरुपयोग को लेकर लोगों के निशाने पर आने के बाद अब उन पर यौन शोषण के आरोप सामने आए हैं। गोखले की प्रबल समर्थक आकाशी कौल (Akashi Kaul) ने ‘कुछ लोगों’ द्वारा सार्वजनिक धन के दुरुपयोग को लेकर बयान दिया है। साथ ही यौन दुराचार का भी आरोप लगाया है। हालाँकि, कौल ने किसी का ‘नाम’ नहीं लिया, लेकिन नेटिजन्स का कहना है कि उनके दिमाग में गोखले का ही नाम है।

अपने बयान में कौल ने कहा, “एक ऑनलाइन पूर्व परिचित, जिसके साथ मैं नजदीकी रूप से जुड़ी थी, वह अब सरकारी पारदर्शिता (विडंबना) की माँग करते हुए सामाजिक भलाई के लिए इकट्ठा किए गए धन के संभावित और कथित दुरुपयोग को लेकर तूफान खड़ा हो गया है।”

उन्होंने कहा, “उनके साथ मेरा जुड़ाव एक अंतरराष्ट्रीय और ऑनलाइन था। काफी लोगों ने उनकी अनुशंसा की थी, लेकिन बाद में महसूस हुआ है कि वह आदमी ठीक नहीं है। भारत आने और उनसे मिलने के बाद कई लोगों से यौन दुराचार की कहानियाँ सुनने को मिलीं। इसमें एक राजनीतिक दल द्वारा उनके पद से हटाने की बात भी शामिल है। उसके बाद मुझे महसूस हुआ कि मैं गलत आदमी के साथ जुड़ गई थी।”

आकाशी कौल ने स्वीकार किया कि उन्हें यौन दुराचार के आरोपों की पूर्व जानकारी थी, लेकिन आरोपी के साथ संबंध तोड़ने में ‘धीमी’ थी। उसने दावा किया, “मैंने तब से उनके यौन दुराचार के मुद्दे को उठाया। हालाँकि हमारे महान देश में एक महिला का शील भंग करना गंभीर अपराध की श्रेणी में नहीं है, जैसा कि धन की हेराफेरी है। ”

उन्होंने आगे कहा, “मेरा मानना है कि यह व्यक्ति किसी भी रूप में ऐक्टिविस्ट या किसी कॉस को लेकर चलने वाला व्यक्ति है। वह एक अवसरवादी है। पहले उसका लक्ष्य किसी राजनीतिक दल धन लाभ लेना था और अब राज्यसभा की सीट हासिल करना है। उनके पास किसी भी स्तर पर चुनाव लड़ने की साख या क्षमता नहीं है और प्रसिद्धि का उनका एकमात्र दावा ड्रामेबाजी है।”

साकेत गोखले के साथ उनके लंबे समय से जुड़ाव और फंड गबन के बाद उनके आक्रोश को देखते हुए नेटिज़न्स यह अनुमान लगा रहे हैं कि कौल का बयान आरटीआई कार्यकर्ता और टीएमसी नेता साकेत गोखले को लेकर है। सोशल मीडिया यूजर्स ने आरोपों की जानकारी होने के बावजूद गोखले के कथित यौन दुराचार पर चुप्पी को लेकर कौल पर सवाल उठाया। हालाँकि, कौल ने उनके बयान को साकेत गोखले के साथ नेटिजन्स द्वारा जोड़े जाने का खंडन नहीं किया। इस यही स्पष्ट होता है कि उनका बयान साकेत गोखले को लेकर ही था।

ट्विटर पर एक यूजर ने पूछा, “विडंबना है कि आप व्यंग्यात्मक रूप से कह रही हैं कि भारत में धन की हेराफेरी एक महिला की शील भंग करने की तुलना में एक बड़ा मुद्दा है, लेकिन आप स्वयं यौन दुराचार के आरोपों चुप थीं और धन के दुरुपयोग का मुद्दा सामने आने के बाद ही बोलीं!” आकाशी कौल ने अपने बचाव में दावा किया कि उन्होंने क्लब हाउस पर लगे आरोपों के बारे में महीनों तक खुलकर बात की।

एक अन्य यूजर ने पूछा, “यौन दुराचार के बारे में जानने के बाद भी क्या आप बार-बार उसके/उनके क्लब हाउस का हिस्सा नहीं रहीं?” इस पर जवाब देने के बजाय कौल ने कहा, “नहीं। एक बार फिर कह रही हूँ कि मुझे अपने कार्यों को किसी के सामने सही ठहराने की आवश्यकता नहीं है। मैं जिसके प्रति जवाबदेह हूँ उसी के लिए ऐसा कर सकती हूँ। आप जैसा मुझे जवाबदेह उठा रही हैं, वैसे अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को ठहराएँ।”

टर यूजर ओपिनियन बेकरी ने कहा, “यह महिला क्लब हाउस में साकेत गोखले की सबसे बड़ी चैंपियन थीं। दिलचस्प है कि महिलाओं के साथ साकेत के अनुचित व्यवहार के बारे में जानने की बात स्वीकार करती हैं, लेकिन बोलने का विकल्प अब चुनती हैं। वह भी सीधे तौर पर उनका नाम लिए बिना तीखे अंदाज में।”

एक अन्य ट्विटर यूजर ने कहा कि कौल के दावों को ‘राजनीति से प्रेरित’ के रूप में समझा जा सकता है, क्योंकि कौल ने गोखले की राजनीति से नफरत करने के बाद ही इसके बारे में बात की थी।

यहाँ उल्लेख करना आवश्यक है कि आकाशी कौल ने एक बार क्लब हाउस रूम की मेजबानी की थी और इसे ‘संघियों का सफाई अभियान’ नाम दिया था। चर्चा के दौरान उन्होंने कई महिलाओं को निशाना बनाया था। यहाँ तक कि ऑपइंडिया की संपादक नुपुर जे शर्मा को ‘आवारा’ भी कह दिया था। कौल अपने विश्वासपात्र द्वारा यौन दुराचार के बारे में जानने के बावजूद चुप रहने के लिए ट्विटर पर तीखी आलोचना का सामना कर रही हैं।

रविवार (2 दिसंबर) को राजनीतिक विश्लेषक अभिजीत अय्यर मित्रा ने ट्वीट किया, “लगता है कि वामपंथी महिलाएँ आखिरकार साकेत गोखले द्वारा गंभीर कदाचार के कई उदाहरणों को स्वीकार करने लगी हैं। मुझे उम्मीद है कि वे इसके बारे में सार्वजनिक रूप से बात करने और अपने अनुभवों को नहीं छुपाने का साहस दिखाएँगी, क्योंकि वह उसी विचारधारा से ताल्लुक रखते हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “साकेत गोखले पर न केवल कदाचार, बल्कि शील भंग के गंभीर आरोप हैं। क्लब हाउस से जो कोई भी आकाशी को जानता होगा, उसे पता होगा कि वह उनके करीब थीं। ऐसा कई महिलाएँ आरोप लगा रही हैं, जैसा कि दो अलग-अलग महिलाओं को देखा जा सकता है।” अभिजीत स्पष्ट संकेत दिया है कि साकेत गोखले के खिलाफ आरोप लंबे समय से चल रहे थे, बस साकेत के दोस्त वित्तीय घोटाले के आरोपों के बाद ही बोलना शुरू कर रहे हैं।

धन गबन और दवाओं की खरीद में जनता के धन के दुरूपयोग का आरोप

फरवरी 2021 में गोखले के खिलाफ लेफ्ट लिबरल सहित कई लोगों द्वारा धोखाधड़ी के आरोप लगाए गए थे। अमित बेहेरे नाम के एक ‘आप’ समर्थक ने गोखले पर आरटीआई दाखिल करके पैसा बर्बाद करने का आरोप लगाया था। बेहरे ने इसे ‘निवेश पर शून्य रिटर्न’ बताया था।

उन्होंने आरोप लगाया था कि कॉन्ग्रेस के वफादारों को दिए गए चंदे से व्यक्तिगत लाभ के अलावा आम जनता को कोई फायदा नहीं हुआ। साल 2020 में गोखले ने ‘बीजेपी हेट मशीन’ को लेकर ₹22 लाख से अधिक एकत्र करने का दावा किया था और सोशल मीडिया पर ‘नफरत फैलाने वालों को हटाने के लिए अभियान’ शुरू किया था।

मार्च 2021 में कानूनी कार्यकर्ता समूह लीगल राइट ऑब्जरवेटरी (LRO) द्वारा साकेत गोखले के खिलाफ नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) में शिकायत दर्ज कराई गई थी, जिसमें उन पर क्राउडफंडिंग कर ड्रग के जरिए पैसे कमाने का आरोप लगाया गया था। एलआरओ के मुताबिक, साकेत गोखले एक पूर्व पुलिस अधिकारी के बेटे हैं, जो कभी नशीले पदार्थों की तस्करी के मामले में आरोपी थे।

गुरुवार (30 दिसंबर 2021) को कवि और लेखक हुसैन हैदरी ने क्राउड फंडिंग के माध्यम से एकत्र किए गए धन के उपयोग को लेकर साकेत गोखले से जवाबदेही की माँग करते हुए मुद्दा उठाया था। उन्होंने कहा कि साकेत गोखले इस बात का ब्योरा दें कि उन्होंने क्राउडफंडिंग कैंपेन के माध्यम से जुटाए गए धन को कैसे खर्च किया। उन्होंने कहा कि पिछले 2-3 वर्षों में सैकड़ों और हजारों लोगों, विशेषकर मुसलमानों ने गोखले को चंदे दिए, लेकिन उनके द्वारा कोई भी शानदार काम नहीं किया गया है। साकेत गोखले से जवाब माँगने पर हैदरी को ट्विटर पर व्यापक समर्थन मिला।

यहाँ ध्यान देना दिलचस्प होगा कि साकेत गोखले ने एक बार खुद कहा था कि वह एक पूर्णकालिक कार्यकर्ता हैं। इसलिए एकत्र की गई राशि उनके खर्चों का भुगतान करने में मदद करती हैं। उन्होंने यह भी दावा किया था कि इसमें अन्य लोग भी शामिल हैं और और उनके खर्च का भुगतान भी चंदे के पैसे से किया जाता है।

नोट: आकाशी कौल के बयान में उल्लिखित व्यक्ति के साकेत गोखले होने की अटकलें लगाई जा रही हैं, क्योंकि उन्होंने साकेत गोखले के खिलाफ सामने आए धन की हेराफेरी के आरोपों के संदर्भ में बयान दिया है। यहाँ तक ​​कि अभिजीत अय्यर मित्रा ने भी संकेत दिया है कि यौन उत्पीड़न के आरोप लंबे समय से चल रहे थे। हालाँकि, यह सुनिश्चित करने के लिए ‘ऑपइंडिया’ ने साकेत गोखले से संपर्क किया। गोखले ने अब तक आरोपों का जवाब नहीं दिया है। यदि उनकी तरफ से कोई जवाब आता है तो इस लेख को अपडेट किया जाएगा।

अमित शाह ने मोदी के लिए कहा- इसकी अकल मार रखी है लोगों ने: सतपाल मलिक का दावा, वीडियो में PM को बताया घमंडी

मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने दावा किया है कि पीएम मोदी ने उनके साथ ‘घमंडी’ जैसा व्यवहार किया और किसानों के मुद्दे पर चर्चा करने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा है कि उनकी चर्चा 5 मिनट के भीतर बहस में बदल गई।

मेघालय के राज्यपाल को हरियाणा के दादरी में एक कार्यक्रम में यह दावा करते हुए देखा गया। मलिक ने दावा किया, “मैं जब किसानों के मामले पर प्रधानमंत्री से मिलने गया तो मेरी 5 मिनट में लड़ाई हो गई। वो बहुत घमंड में थे। जब मैंने उन्हें कहा कि 500 लोग मर गए। तुम तो कुतिया मरती है तो चिट्ठी भेजते हो। तो उसने कहा- वे मेरी वजह से मरे हैं?”

सत्यपाल मलिक ने आगे दावा किया कि उन्होंने पीएम से कहा, “हाँ आपके लिए तो मरे थे, जो आप राजा बने हुए हो तो उनकी वजह से। उन्होंने कहा कि वह अमित शाह से मिले। इस मुलाकत के बारे में बताते हुए सत्यपाल मालिक ने कहा, “मैं अमित शाह से मिला तो उसने कहा…सतपाल, इसकी (PM मोदी) अकल मार रखी है लोगों ने तुम बेफिकर रहो मिलते रहो… ये किसी न किसी दिन…” हालाँकि, मेघालय के राज्यपाल ने यह नहीं बताया कि यह विशेष बैठक कब हुई थी।

पूरे वीडियो में राज्यपाल सत्यपाल मालिक ने पीएम मोदी के लिए अपशब्द बोलते नजर आए। उल्लेखनीय है कि किसान विरोध को लेकर सत्यपाल मलिक महीनों से ऐसे विवादास्पद बयान दे रहे हैं। वह विपक्ष के रुख को दोहराते रहे हैं। कुछ दिन पहले सामने आए एक वीडियो में उन्होंने पीएम नरेंद्र मोदी को धमकी देते हुए कहा था कि अगर उन्होंने किसानों की माँग पूरी करते हुए कृषि कानून को वापस नहीं लिया तो उनका हाल भी इंदिरा गाँधी (खालिस्तानी आतंकवादियों द्वारा हत्या) जैसा होगा।

‘नशे की हालत में SRK के बेटे आर्यन खान ने एयरपोर्ट पर ही कर दिया पेशाब’: सोशल मीडिया पर वायरल हुआ वीडियो, जानिए सच्चाई

सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसके साथ दावा किया जा रहा है कि ये आर्यन खान की एयरपोर्ट पर पेशाब करते हुए तस्वीर है। हाल ही में ड्रग्स मामले में NCB द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बाद आर्यन खान खासे चर्चा में थे। व्हाट्सएप्प के माध्यम से और ट्विटर से भी इस तरह के दावे वायरल किए जा रहे हैं। हमने इस वायरल दावे का पोस्टमॉर्टम भी किया। हम आपको बताएँगे कि इसकी सच्चाई क्या है, लेकिन उससे पहले जानिए क्या है वायरल दावा।

व्हाट्सएप्प पर इस वीडियो के साथ वायरल सन्देश में कहा जा रहा है, “ये है अमीर बाप का वो चरसी बेटा, जिसके जेल में बस कुछ दिन रहने पर मीडिया ने ऐसी हाय-तौबा मचाई थी जैसे देश में आपातकाल आ गया हो। अब देखिए कैसे ये ड्रग्स लेकर देश को बदनाम कर रहा है। ये वीडियो 2 साल पहले अमेरिका का है, जहाँ इसने नशे में एयरपोर्ट पर पेशाब किया था। फिर पुलिस ने इसकी पिटाई की थी। वाह रे! बाप को अमेरिका नंगा करता है और बेटा खुद नंगा हो जाता है।”

साथ ही वायरल सन्देश में इस वीडियो को आगे शेयर करने की बात भी कही जा रही है, ताकि सच्चाई का पता चले। इसी तरह एक ट्वीट में लिखा है, “अभी अभी ये वीडियो एक मित्र ने भेजा है, कहा जा रहा है कि वीडियो में दिखाई दे रहा युवक शाहरुख का बेटा आर्यन खान है, और ये हरकत अमेरिका के किसी एयरपोर्ट पर हुई है। कृपया इस बारे में ज्यादा जानकारी मिले तो जरूर बताएँ।” इस वीडियो को ‘hunlogindia’ नाम के एक ट्विटर हैंडल ने भी शेयर किया:

जब हमने इस वीडियो को सर्च इंजिन पर ‘रिवर्स इमेज सर्च’ के सहारे ढूँढा तो हमें रेडिट का एक पेज मिला। इस पर लोग इस वीडियो को लेकर चर्चा कर रहे थे। 3 साल पहले पोस्ट किए गए इस वीडियो में लिखा था कि एयरपोर्ट पर शराब पीकर एक व्यक्ति ने पेशाब कर दिया। कुछ लोगों ने लिखा कि नशे के कारण वो कंट्रोल नहीं कर पाया होगा तो किसी ने लिखा कि कुछ ने लिखा कि ये कोई अपराध नहीं है कि इस पर जेल हो। कुछ ने लिखा कि नशे के कारण वो होश में नहीं थे।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा मैसेज

इस चर्चा को पढ़ने के बाद हमें 22 फरवरी, 2013 की वो खबर मिल गई, जिससे इसकी सच्चाई का पता चलता है। असल में वीडियो में दिख रहा व्यक्ति आर्यन खान नहीं, बल्कि 2009-12 में ‘The Twilight Saga’ सीरीज की की 4 फिल्मों में काम करने वाले ब्रोंसन पेलेटियर। कनाडा के इस अभिनेता की उम्र 35 साल है। दिसंबर 2012 की इस घटना के बारे में उनकी विकिपीडिया पेज पर भी लिखा है। उन्हें तब 2 साल प्रोबेशन पर भेजा गया था। उन्होंने अपने ऊपर लगे आरोपों के खिलाफ अदालत में कुछ नहीं कहा।

इस तरह इस वायरल वीडियो में दिख रहे व्यक्ति शाहरुख़ खान के बेटे आर्यन खान नहीं, बल्कि कनाडा के अभिनेता ब्रोंसन पेलेटियर हैं। ये वीडियो 9 साल पुराना है और अब फिर से गलत दावे के साथ वायरल हो रहा है।

गुरुग्राम में भी बुलंद हुई कालीचरण महाराज की रिहाई की आवाज, इंडियन एक्सप्रेस ने बताया- एंटी नमाज ब्रिगेड

इंडियन एक्सप्रेस ने अपने हालिया रिपोर्ट में हिंदुत्व विरोधी प्रचार के साथ नए साल की शुरुआत की है, जहाँ उसने ‘नमाज विरोधी ब्रिगेड’ (anti-namaz brigade) शब्द गढ़ा है और इसे गुरुग्राम में हिंदू संत कालीचरण महाराज की कानून को ताक पर रखकर की गई गिरफ्तारी के खिलाफ चल रहे शांतिपूर्ण विरोध से जोड़ दिया है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि विरोध मार्च का नेतृत्व कुलभूषण भरवा ने किया था, जो संयुक्त संघर्ष समिति के कानूनी सलाहकार हैं, जो सार्वजनिक स्थानों पर खुले में नमाज का विरोध कर रहे हैं। गुरुग्राम के हिंदू केवल नमाज के लिए सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। इसे राजनीतिक इस्लाम के दावे के रूप में देखा जाना चाहिए।

गुरुग्राम बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष भरवा, जिन्होंने 2019 में जामिया मिलिया इस्लामिया के पास सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों पर बंदूक तानने वाले किशोर का बचाव किया था। उन्होंने गाँधी के खिलाफ कालीचरण महाराज के आक्रोश का समर्थन किया और जिस तरह से छत्तीसगढ़ पुलिस ने अंतरराज्यीय प्रोटोकॉल का उल्लंघन करते हुए मध्य प्रदेश से उन्हें गिरफ्तार किया, उसकी निंदा की।

भरवा ने कहा, “हम कालीचरण महाराज द्वारा गाँधी के खिलाफ की गई टिप्पणी का पुरजोर समर्थन करते हैं और जिस तरह से छत्तीसगढ़ सरकार ने उन्हें गिरफ्तार किया हम उसकी निंदा करते हैं। जब धर्म के आधार पर देश का बँटवारा हुआ तो गाँधी ने इसका विरोध क्यों नहीं किया? देश के विभाजन को स्वीकार करने में उनकी भूमिका के लिए यह देश गाँधी को कभी माफ नहीं करेगा।”

भाजपा के पूर्व नेता नरेंद्र सिंह पहाड़ी, जो 2019 के विधानसभा चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में हार गए थे, ने आरोप लगाया कि कालीचरण महाराज की गिरफ्तारी जानबूझकर किये गए टारगेट का मामला है। उन्होंने कहा, “जब कोई हिंदू राष्ट्र और हिंदू हितों की बात करता है, तो तुरंत प्राथमिकी और गिरफ्तारी होती है, जबकि अन्य छूट जाते हैं।”

कालीचरण महाराज

परवीन यादव, जो गुरुग्राम में खुले में नमाज का विरोध करने वाले एक समूह का हिस्सा थे, उन्होंने भी इसी तरह के विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा, “अधिकारियों ने ओवैसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है, जो अपने भाषणों में हिंदुओं को धमका रहे हैं और भड़का रहे हैं।”

मामला एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की पुलिस को खुली धमकी का था। “यह याद रखना। योगी हमेशा के लिए मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे। मोदी हमेशा के लिए प्रधान मंत्री नहीं रहेंगे…” जिसका वीडियो वायरल हो गया था।

“हम मुसलमान समय के कारण चुप हैं लेकिन याद रखें कि हम अन्याय को नहीं भूलेंगे। हम आपके अन्याय को याद रखेंगे। अल्लाह, अपनी शक्तियों से, तुम्हें नष्ट कर देगा, इंशाअल्लाह। हम याद करेंगे। समय बदलेगा। फिर कौन आएगा तुम्हें बचाने? जब योगी वापस अपने मठ में जाएँगे, जब मोदी पहाड़ों पर जाएँगे, तो आपको बचाने कौन आएगा। याद रखें, हम नहीं भूलेंगे।”

गिरफ्तारी को तो भूल जाइए, ओवैसी के भाषण की निंदा उन छद्म धर्मनिरपेक्षतावादियों ने भी नहीं की थी, जो रायपुर मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा अब 13 जनवरी तक न्यायिक हिरासत में कालीचरण महाराज को फटकारने के लिए तैयार थे।

उत्तराखंड में हाल ही में धर्म संसद में अपने भाषण के दौरान, कालीचरण महाराज ने कहा था, “हमारी आँखों के सामने भारत दो भागों में कट गया था। ईरान, इराक और अफगानिस्तान पहले ही अलग हो चुके थे। बांग्लादेश और पाकिस्तान उनके द्वारा हमारी आँखों के सामने अलग हो गए। उन्होंने इन हिस्सों को भारत से अलग करने के लिए राजनीति का इस्तेमाल किया। उस ह#मी मोहनदास करमचंद गाँधी ने भारत को तबाह कर दिया। मैं उस ह#मी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे जी को नमन करता हूँ।”

उन्होंने भारत में नेहरू वंश के कुशासन का मार्ग प्रशस्त करने के लिए गाँधी की आलोचना भी की।

जबकि कालीचरण महाराज को दंडित किया जाना चाहिए या नहीं, इस पर कानून अपना काम करता है, लेकिन यह मामला यह सवाल खड़ा करता है कि गाँधी कितने सम्मान के पात्र हैं। और, हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए मानदंड कैसे निर्धारित करते हैं?

2015 में, सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि क्या गाँधी जैसे ऐतिहासिक शख्सियतों की रक्षा करना “समाज की सामूहिक जिम्मेदारी” नहीं थी। चूँकि “राष्ट्रपिता” के रूप में कोई आधिकारिक घोषणा या शीर्षक नहीं है, तकनीकी रूप से वह एक ऐतिहासिक व्यक्ति हैं, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा थे। तो, क्या अन्य ऐतिहासिक शख्सियतों जैसे कि, बहुत ज़्यादा तिरस्कार किए जाने वाले वीर सावरकर को भी ऐसी ‘सुरक्षा’ नहीं मिलनी चाहिए?

यह भी ध्यान देने योग्य है कि मीडिया, विशेष रूप से इंडियन एक्सप्रेस, हिंदुत्व के खिलाफ हर अवसर का प्रोजेक्ट कर रहा है। जबकि गुड़गाँव के हिंदू सार्वजनिक स्थानों पर नमाज का विरोध कर रहे थे, जिससे गंभीर उपद्रव हो रहा था, मीडिया इसे “नमाज विरोधी” विरोध के रूप में प्रदर्शित कर रहा है, जिसमें कहा गया है कि विरोध करने वाले हिंदू खुद नमाज के खिलाफ थे। हालाँकि, यह पूरी तरह झूठ है।

तस्वीरें ट्वीट कर दिखाई नेट की बल्लेबाजी, पर टॉस से पहले टेस्ट टीम से विराट कोहली बाहर: कप्तान के ‘खिंचाव’ से नेटिजन्स हैरान

भारतीय टेस्ट क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली जोहान्सबर्ग में दूसरे टेस्ट से पहले अनफिट पाए जाने के कारण मैच से बाहर हो गए हैं। अब उनकी जगह कप्तानी के एल राहुल कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि कोहली की पीठ में ऐंठन/खिंचाव की वजह से उन्हें अंतिम समय में टॉस से पहले मैच से बाहर होना पड़ा। इस बात की जानकारी आज के मैच के कप्तान के एल राहुल ने दी। उन्होंने यह भी बताया कि कोहली की जगह टीम में हनुमा विहारी को जगह मिली है।

बता दें कि 3 जनवरी 2022 को होने वाले मैच से पहले 2 जनवरी को विराट कोहली ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट किया था। इस पोस्ट में साझा की गई तस्वीरों में वह नेट पर बैटिंग प्रैक्टिस करते दिखाई दिए थे। पोस्ट में उन्होंने लिखा था, “नया साल, नोटिवेशन वही।” तस्वीरों को देख ऐसा नहीं लग रहा था कि उन्हें कोई दिक्कत है। हालाँकि आज खबर आई कि उन्हें कमर की समस्या है। अब सोशल मीडिया पर लोग इसे देख अलग-अलग प्रतिक्रिया दे रहे हैं।

एक यूजर ने उन्हें कहा, “विराट कोहली एक बच्चे की तरह बर्ताव कर रहे हैं और चाहते हैं कि बीसीसीआई उन्हें दुलार करे। लेकिन वो ये नहीं समझ रहे कि उन्हें पहले अपने बैट से स्कोर बनाने होंगे। जैसा चल रहा है। मुझे लग रहा है कि कैप्टेंसी जल्द छोड़नी होगी।”

कुछ कोहली फैन्स तो ऐसे भी दिखे जिन्होंने कोहली के मैच से बाहर होने के पीछे भारतीय जनता पार्टी और ‘आरएएस गुंडों’ को वजह बताया। अहमद वरीच ने लिखा, “कोहली बाहर है सिर्फ बीजेपी और आरएसएस गुंडों के कारण।” कुछ यूजर ने इस फैसले के पीछे सौरव गांगुली और जय शाह के मीम्स भी शेयर किए।

कुछ लोगों ने कोहली के अनफिट होने पर सवाल किया है कि क्या 24 घंटे के अंदर कमर में दर्द हो गया। वहीं कुछ लोग राणा अयूब को भेजे गए उपहार की तस्वीरें शेयर करके कोहली पर निशाना साध रहे हैं। यूजर्स का पूछना है कि आखिर देश से नफरत करने वालों के लिए इतना प्यार क्यों हैं? आखिर दिमाग में चल क्या रहा है।

साकेत गोखले ही नहीं, लिबरल जमात की इन हस्तियों पर भी रुपए इकट्ठे कर गड़बड़ी के आरोप: शेहला, राना अय्यूब और मेवानी का नाम भी शामिल

आजकल न तो फंड जुटाने वाले प्लेटफॉर्म्स की कमी है और न ही सार्वजनिक रूप से फंड की माँग करने वाले लोगों की। ‘Ketto’ और ‘Donatekart’ सहित ऐसे कई ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स हैं, जो लोगों को सामाजिक कार्यों के लिए फंड इकट्ठा करने की सुविधा देते हैं। ऐसे में तथाकथित पत्रकार राना अय्यूब, TMC नेता और कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी के पूर्व करीबी साकेत गोखले और कॉन्ग्रेस नेता के करीबी गुजरात के विधायक जिग्नेश मेवानी जैसे विवादित चेहरे भी शामिल हैं, जिन पर जनता से जुटाए गए फंड्स के दुरुपयोग का आरोप लगा

साकेत गोखले ने सोशल मीडिया पर खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, RSS और भाजपा के खिलाफ एक बड़ा एक्टिविस्ट बता कर प्रचारित किया। उन्होंने ‘मोदी सरकार की पोल खोल कर समाज में बदलाव लाने’ की बातें करते हुए खुद को ‘RTI एक्टिविस्ट’ बताया। उन्होंने 2019 में पूर्णकालिक RTI एक्टिविस्ट बनने के लिए लिबरल जमात से रुपए इकट्ठे किए। उन्होंने इसके लिए लाखों रुपए जुटा लिए। उन्होंने कई RTI दायर कर के दिखाया भी कि वो ‘काम’ कर रहे हैं, लेकिन इन RTIs का शायद ही कोई असर हुआ और ये महत्वपूर्ण भी नहीं थे।

साकेत गोखले का ट्वीट

केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी की पत्नी और IFS अधिकारी लक्ष्मी पुरी पर अनर्गल आरोप लगाने के लिए अदालत से उन्हें फटकार भी मिली। उन्होंने लोगों द्वारा इकट्ठा किए गए फंड्स के दुरुपयोग के आरोपों पर इसकी तुलना अपनी ‘सैलरी’ से कर डाली। उन्होंने कहा कि वो अपने मासिक खर्चे के लिए ऑडिट के डिटेल्स देने के इच्छुक नहीं हैं। राहुल गाँधी के साथ ट्विटर डीपी हटा कर उन्होंने ममता बनर्जी की तृणमूल कॉन्ग्रेस का दामन थाम लिया। अब वो क्राउडफंडिंग से मिले पैसों को अपनी ‘सैलरी’ बता रहे।

अब बात करते हैं फेक न्यूज़ फैलाने और इस्लामी कट्टरवादियों का एजेंडा आगे बढ़ाने के लिए कुख्यात राना अय्यूब की, जिन्होंने कोरोना महामारी के दौरान खुद को गरीबों का मसीहा साबित करने की भरसक कोशिश की। वो किसी NGO से जुड़ी नहीं थीं, लेकिन उन्होंने ‘Ketto’ के जरिए पैसे इकट्ठा करने शुरू कर दिए। पत्रकार होते हुए वो FCRA के नियमानुसार विदेशी चंदा नहीं ले सकतीं, लेकिन उन्होंने विदेश से भी फंड्स लिए। कोरोना की दूसरी लहर में भी उन्होंने ऐसा अभियान चलाया एक करोड़ रुपए जुटा लिए।

इसके बाद उन्होंने ज़रूरतमंदों की मदद करते हुए कुछ तस्वीरें पोस्ट की। नियम है कि ऐसे फंड जुटाने वाले को टैक्स देने से लेकर ज़रूरी दस्तावेजों को जमा कराना पड़ता है। लेकिन, उन्हें बिना किसी दस्तावेजों के रुपए मिल गए। हालाँकि, इसके बाद जब आपत्ति जताई गई तो सोशल मीडिया के विरोध के बाद उन्होंने विदेशी चंदे लौटा दिए। उन्होंने अपने ‘चैरिटी के कार्य’ के लिए सरकार द्वारा खुद को निशाना बनाए जाने के आरोप मढ़े। ‘Ketto’ को भी बयान जारी करना पड़ा कि उनके फंडरेजर की जाँच चल रही है।

इसी तरह मई 2021 में गुजरात के निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवानी ने ‘We The People Charitable Trust’ नामक संस्था के एक फंडरेजर का समर्थन किया। इस पर विवाद हुआ, क्योंकि ‘We The People Charitable Society’ नाम की एक NGO पहले से मौजूद थी। चैरिटी कमिश्नर ने नाम में इस समानता के कारण कार्रवाई की चेतावनी भी दी। प्रशासन ने इस NGO के बैंक खाते फ्रीज किए, लेकिन मेवानी ने सरकार को ही दोषी ठहराया। नेता भी FCRA के तहत विदेशी चंदा इकट्ठा नहीं कर सकते।

इसी तरह 2018 में कठुआ रेप कांड की पीड़िता के नाम पर पीड़ित परिवार के लिए JNU की छात्र नेता रहीं शेहला रशीद और अधिवक्ता दीपिका सिंह राजावत ने फंड्स जुटाए। हालाँकि, बाद में मीडिया रिपोर्ट्स से पता चला कि ये रुपए पीड़ित परिवार तक कभी पहुँचे ही नहीं। इस फंडरेजर में सक्रिय रहे ताहिर हुसैन को बाद में बलात्कार के आरोप में जेल हुई। शेहला ने आधार कार्ड के कारण ज्वाइन अकाउंट खुलवाने में दिक्कत, डायरेक्ट ट्रांसफर के लिए माध्यम न होने से लेकर परिवार द्वारा मीडिया रिपोर्ट्स को नकारे जाने जैसे बहाने बनाए।

लेकिन, लोगों ने उनके हर दावे की पोल खोल दी। इस खबर को प्रकाशित करने वाले पत्रकार ने परिवार के रिकॉर्डिंग्स के हवाले से दावा किया कि उन तक ये पैसे पहुँचे ही नहीं। दीपिका सिंह राजावत ने कॉन्ग्रेस में शामिल होने का फैसला लिया और अब वो जम्मू कश्मीर में पार्टी की प्रवक्ता हैं। वो कठुआ रेप पीड़िता के लिए अदालत में भी पेश नहीं होती थीं और 110 सुनवाइयों में से वो मात्र 2 में पहुँचीं। शेहला रशीद ने पूर्व IAS शाह फैसल की पार्टी का साथ देने का निर्णय लिया, लेकिन शाह फैसला ने राजनीति ही छोड़ दी।

इसी तरह के आरोप पूर्णकालिक ‘आंदोलनजीवी’ तीस्ता सेतलवाड़ पर भी लगे। उन पर गोधरा दंगा के पीड़ितों के नाम पर पैसे इकट्ठा कर के उसमें गड़बड़ी करने का आरोप है। 1.51 करोड़ रुपए जुटाए गए थे, जिनमें गड़बड़ी के आरोप लगे। बाल ‘पर्यावरण एक्टिविस्ट’ के रूप में प्रचारित की जा रहीं लिसीप्रिया कँगुजम पर भी ऑक्सीजन सिलिंडरों के लिए 75 लाख जुटा कर गड़बड़ी के आरोप लगे। उनके नाम पर एक NGO ने फंडरेजिंग का जिम्मा संभाला था। इसी तरह की गड़बड़ी के आरोप ‘हेमकुंड फाउंडेशन’ के खालिस्तानी समर्थकों पर भी लगे।

पाकिस्तान के दावत-ए-इस्लामी पर कॉन्ग्रेस सरकार मेहरबान: बवाल के बाद बघेल सरकार ने रद्द किया जमीन आवंटन

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली छत्तीसगढ़ की कॉन्ग्रेस सरकार पर कानून की धज्जियाँ उड़ाते हुए सार्वजनिक जमीन के एक बड़े भूभाग को इस्लामिक संस्था के नाम पर आवंटित करने का आरोप लगा है। संस्था भी ऐसी, जो भारत की नहीं बल्कि पाकिस्तान के सीधा ताल्लुक रखती है और उस पर आतंकी गतिविधियों, विदेशी फंडिंग और इस्लामिक धर्मांतरण में सीधे तौर पर शामिल रहने के आरोप लगे हैं।

भाजपा नेता और छत्तीसगढ़ के पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने प्रशासन के उस विज्ञापन को भी सार्वजनिक किया, जिसमें संगठन को जमीन आवंटन करने से पहले दावा-आपत्ति माँगी गई है। अग्रवाल ने कहा कि इस संस्था को आतंकी गतिविधियों और विदेशी फंडिंग के वाली वाली पाकिस्तान की इस्लामिक संस्था दावत-ए-इस्लामी को 25 एकड़ (10 हेक्टयर) जमीन देने का इश्तिहार निकाला गया है। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार आनन-फानन में जमीन बाँटने का काम कर रही है।

बृजमोहन अग्रवाल ने कहना है कि ऐसी कई संस्थाएँ हैं, जिनके आवेदन 10 सालों से पेंडिंग हैं, लेकिन 2020 में आवेदन करने वाली इस संस्था को फौरन जमीन देने की तैयारी है। इसका इश्तिहार छपवाया गया है। बृजमोहन अग्रवाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में मांग करते हुए सरकार से कहा कि सरकार यह बताए कि इस संस्था का हेड क्वार्टर कहां है और इस संस्था को इतने फौरी तौर पर जमीन देने की क्या जरूरत।

वहीं, एक ट्विटर यूजर ने संस्था का एक आवेदन साझा किया है। इसमें संस्था ने 28 दिसंबर को आवंटन के लिए आवेदन किया था। ताज्जुब की बात है कि 28 दिसंबर को किए गए आवेदन को उसी दिन अनुमोदित भी कर दिया और ठीक अगले दिन यानी 29 दिसंबर को राज्य के मंत्री के आदेश के रायपुर जिलाधिकारी ने जमीन को आवंटित भी कर दिया।

जमीन आवंटन के लिए दिए गए अपने आवेदन में दावत-ए-इस्लामी ने लिखा, छत्तीसगढ़ पंजीकृत संस्था माशा एजुकेशन सोसायटी के द्वारा (अंजुमन गर्ल्स स्कूल) शास्त्री मार्केट के प्रथम तल पर संचालित है जो आधुनिक हिंदी, उर्दू, अरबी, फारसी हदीस के माध्यम से बच्चों को पढ़ाया जाता है। स्वयं की जमीन नहीं होने के कारण हमें एकेराजात में तकलीफ हो रही है। इसलिए सरकार द्वारा शासकीय भूमि आवंटित करने की कृपा करेंगे।”

पाकिस्तानी संस्था के लिए इतनी जल्दी निर्णय लेने वाले मंत्री का नाम है मोहम्मद अकबर। अकबर राज्य के वन मंत्री हैं और राज्य के उसी कवर्धा विधानसभा क्षेत्र से कॉन्ग्रेस के विधायक हैं, जहाँ हाल ही में भगवा झंडा को अपमानित करने के कारण सांप्रदायिक दंगे फैले थे। इस घटना में मोहम्मद अकबर का नाम आया था और भाजपा ने उनके इस्तीफे की माँग की थी।

रायपुर के अनुविभागीय दंडाधिकारी देवेंद्र पटेल ने बताया कि आवेदक संस्था की ओर से सैयद कलीम ने सामुदायिक भवन के लिए बोरिया खुर्द 10 हेक्टेयर माँगी थी। इसके लिए कलेक्ट्रेट कार्यालय में 28 जनवरी 2021 को आवेदन दिया गया था। आवेदन मिलने के बाद अतिरिक्त तहसीलदार ने इश्तिहार जारी किया था। पटेल ने बताया इसके बाद कलीम ने अपना आवेदन यह कहकर वापस लिया कि गलती से उन्होंने द्वारा रकबा 10 हेक्टेयर लिखा गया है, जबकि उन्हें केवल 10 हजार वर्ग फुट की ही आवश्यकता है।

हालाँकि, बवाल बढ़ने के बाद जिला प्रशासन की ओर से सफाई दी गई है। जिला प्रशासन ने कहा है कि 25 एकड़ (10 हेक्टेयर) जमीन दावत-ए-इस्लामी को नहीं दी जा रही है। संगठन ने आवेदन 10 हजार वर्ग फीट जमीन के लिए किया था, इस आवेदन को भी निरस्त कर दिया गया है। इसके साथ ही जमीन आवंटन के लिए दो अधिकारियों को नोटिस भी जारी किया गया है।

क्या है दावत-ए-इस्लामी?

इस संस्था का तंत्र भारत के अधिकांश राज्य में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के 194 से अधिक देशों में फैला है। इसका संस्थापक मौलाना इलियास अत्तारी पाकिस्तान के कराची में रहता है। वहीं से इस संस्था का संचालन होता है। दावत-ए-इस्लामी का दिल्ली और मुंबई में मुख्यालय है। वर्ष 1989 से पाकिस्तान से उलेमाओं का एक प्रतिनिधिमंडल भारत आया था, उसके बाद से इस संस्था ने भारत में अपने पाँव जमा लिए। साल 1994 में हलीम कालेज के मैदान में तीन दिवसीय इज्तेमा (सेमिनार) का आयोजिन किया गया था, जिसमें पाकिस्तान से मौलाना इलियास कादरी ने भी शिरकत की थी। इलियास कादरी को विध्वंसक गतिविधियों के जाना जाता है।

दावत-ए-इस्लामी का नाम भारत में चल रहे धर्मांतरण गतिविधियों में भी आ चुका है। दावत-ए-इस्लामी पर सूफी इस्लामिक बोर्ड ने देश विरोधी गतिविधियों में चंदे का उपयोग करने और मतांतरण कराने के आरोप लगाए था। सूफी बोर्ड ने इसे देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बताया था। इसने अपनी विचारधारा के प्रचार के लिए मदनी नाम का चैनल खोल रखा है। इस चैनल पर उर्दू, अंग्रेजी और बांग्ला में इस्लामिक कार्यक्रमों का प्रसारण किया जाता है।

अक्टूबर 2021 में दिल्ली से पकड़ा गया पाकिस्तानी आतंकी मोहम्मद अशरफ भी दावत-ए-इस्लामी से जुड़ा था। अशरफ को कोडिंग में महारत हासिल था और वह इसका उपयोग आतंकी गतिविधियों में इस्तेमाल करता था। अशरफ बांग्लादेश के जरिए भारत में दाखिल हुआ था और दिल्ली में उसे गिरफ्तार किया गया था।

‘भगवान श्रीकृष्ण की प्रेरणा से पत्र लिख रहा, CM योगी को मथुरा से बनाएँ उम्मीदवार’: BJP अध्यक्ष नड्डा से कहा- ब्रज की भावनाओं का रखें ख्याल

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में मथुरा से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को बीजेपी का उम्मीदवार बनाए जाने की माँग उठी है। इस संबंध में बीजेपी के राज्यसभा सांसद हरनाथ सिंह यादव ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा को पत्र लिखा है। पत्र में सीएम योगी को आगामी विधानसभा चुनाव में मथुरा से उम्मीदवार बनाने पर विचार करने का आग्रह किया गया है। कहा गया है कि योगी आदित्यनाथ ने अपने कर्तव्य और चिंतन से प्रदेश में भारी प्रतिष्ठा अर्जित की है और प्रदेशवासियों की चिंतन की धारा बदल दी है।

हरनाथ सिंह ने नड्डा को लिखे पत्र में कहा है, “मुख्यमंत्री ने खुद ही घोषित किया है कि पार्टी जहाँ से कहेगी मैं वहीं से चुनाव लड़ूँगा। इसलिए मैं आपसे विनम्र शब्दों में निवेदन करता हूँ कि ब्रज क्षेत्र की जनता की विशेष इच्छा है कि योगी जी भगवान कृष्ण की नगरी मथुरा से चुनाव लड़ें।” साथ ही सिंह ने कहा है कि वह पत्र भगवान श्रीकृष्ण की प्रेरणा से लिख रहे हैं। ब्रज क्षेत्र की जनता की भावना है कि मुख्यमंत्री यहीं से चुनाव लड़ें।

बता दें कि योगी आदित्यनाथ इस समय उत्तर प्रदेश विधानपरिषद के सदस्य हैं। उन्होंने पिछले दिनों पत्रकारों से औपचारिक बातचीत में साफ कहा था, “मेरे चुनाव लड़ने पर कोई संशय नहीं हैं। लेकिन मैं चुनाव कहाँ से लडूँगा इस बात का फैसला पार्टी नेतृत्व करेगा।” मुख्यमंत्री से जब पूछा गया कि वह अयोध्या से चुनाव लड़ेंगे या मथुरा से या गोरखपुर से, तब उन्होंने कहा था, “पार्टी जहाँ से कहेगी, मैं वहाँ से चुनाव लडूँगा।” बता दें कि इस वक्त उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा मथुरा से विधायक हैं।

उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों सीएम योगी ने कहा था, “हमने कहा था अयोध्या में प्रभु राम के भव्य मंदिर निर्माण का कार्य प्रारंभ कराएँगे, मोदी जी ने कार्य प्रारंभ करा दिया है। काशी में भगवान विश्वनाथ का धाम भी भव्य रूप से बन रहा है। फिर मथुरा-वृंदावन कैसे छूट जाएगा? वहाँ पर भी काम भव्यता के साथ आगे बढ़ चुका है। हमने बृज तीर्थ विकास परिषद गठित कर वहाँ पर भी विकास कार्यों को एक नई गति देना प्रारंभ कर दिया है।”

इससे पहले हरनाथ सिंह यादव ने कहा था कि अयोध्या के बाद अब मथुरा की बारी है। श्रीकृष्ण जन्मभूमि को खाली कराना ही भाजपा की प्राथमिकता है। यूपी विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी मथुरा को मुख्य एजेंडे में शामिल करने जा रही है। उन्होंने कहा था कि आने वाला विधानसभा चुनाव केवल प्रदेश में भाजपा की सरकार या योगी जी को मुख्यमंत्री बनाने के लिए नहीं है, और न ही जिले की चारों सीटों पर भाजपा प्रत्याशियों को जिताने के लिए है। यह चुनाव राम जन्मभूमि की तरह कृष्ण जन्मभूमि को मुगलकाल के काले धब्बे से मुक्त कराने के लिए है।

चारधाम का फैसला और कंधे पर PM मोदी का हाथ: उत्तराखंड में ‘बहुत Upyogi’ साबित हो रहे CM धामी, BJP की बम्पर वापसी के आसार

उत्तराखंड में इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए जो भी ओपिनियन पोल्स आ रहे हैं, उनमें भाजपा को बढ़त मिलती दिख रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की छवि अब भी बेदाग़ बनी हुई है और भाजपा ने चुनाव की तैयारियाँ भी जोर-शोर से शुरू कर दी हैं। हाल ही में हल्द्वानी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दौरा हुआ, जहाँ उन्होंने इस दशक को उत्तराखंड का बताया। उससे पहले उन्होंने केदारनाथ धाम का दौरा कर के वहाँ कई विकास परियोजनाओं का उद्घाटन किया।

उत्तराखंड में भाजपा के लिए बिगड़ने लगी थी चीजें

लेकिन, मार्च 2021 से पहले तक स्थिति ऐसी नहीं थी। उत्तराखंड में साधु-संत भी नाराज़ चल रहे थे और चार धाम वाले इस राज्य में उनकी भावनाएँ काफी मायने रखती हैं। साथ ही पार्टी के भीतर भी बगावत के सुर उभर रहे थे। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को हटा कर तीरथ सिंह रावत को लाया गया। ये दोनों ही RSS (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) से जुड़े रहे थे। ऐसे में न तो उनके चेहरों को लेकर कोई खास विवाद था और न ही उन्होंने विकास परियोजनाओं को दरकिनार किया।

इन सबके बावजूद राज्य में अगले चुनावों में भाजपा के लिए अच्छे संकेत नजर नहीं आ रहे थे। मामला महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोशियारी तक पहुँच गया था, जो उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे हैं और वहाँ के सबसे बुजुर्ग नेताओं में से एक हैं। कुछ भाजपा विधायकों ने उनके साथ बैठक भी की। कॉन्ग्रेस अचानक से राज्य में सक्रिय हो गई थी और भाजपा के कई नेताओं पर डोरे डालने भी शुरू कर दिया था। उत्तराखंड ऐसा राज्य है, जहाँ ब्राह्मणों और राजपूतों के साथ OBC समुदाय भी राजनीतिक रूप से काफी मायने रखता है।

राज्य में भाजपा पर इस कार्यकाल में विपक्ष तक ने भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगाए, लेकिन ऐसा कहा जा रहा था कि ब्यूरोक्रेसी अपनी मनमानी कर रही है और भाजपा कार्यकर्ता/नेता जनता का कोई काम नहीं करा पा रहे हैं। इसके बाद मुख्यमंत्री बनाए गए तीरथ सिंह रावत के महिलाओं के ‘रिप्ड जीन्स’ पहनने को लेकर दिए गए बयान को भी मुद्दा बनाया गया। ऊपर से 6 महीने में वो विधायक नहीं बन पाए तो उनका इस्तीफा संवैधानिक मजबूरी भी थी। ‘चार धाम देवस्थानम बोर्ड’ को लेकर साधु-संतों की नाराजगी को भी वो थाम नहीं पाए।

ताज़ा सर्वे और ओपिनियन पोल में BJP को उत्तराखंड में दिख रही है बढ़त, CM धामी पहली पसंद

अब बात करते हैं हाल ही में आए ‘टाइम्स नाउ नवभारत’ के एक ओपिनियन पोल की। 70 सदस्यीय उत्तराखंड विधानसभा में बहुमत के लिए 36 विधायकों की जरूरत पड़ती है और इस सर्वे में भाजपा को इससे कहीं ज्यादा 42-48 सीटें मिलती हुई दिख रही हैं। वहीं कॉन्ग्रेस पार्टी के 12-16 सीटों पर सिमटने का अनुमान लगाया गया है। AAP खाता खोल ले, यही बहुत है। लेकिन, उसे 4-7 सीटें मिलती हुई दिख रही हैं। लेकिन, सबसे बड़ी हाइलाइट कुछ और है।

इस सर्वे की सबसे बड़ी बात है कि मात्र 6 महीने पहले मुख्यमंत्री बनाए गए पुष्कर सिंह धामी इस पद के लिए 40.15% लोगों की पसंद है। कॉन्ग्रेस में ही नज़रअन्दाज़ किए जा रहे 73 वर्षीय हरीश रावत अभी भी 25.89% लोगों की पसंद हैं, लेकिन उनकी अपनी ही पार्टी उनके नाम पर दाँव नहीं लगा रही है और नाराज़गी में उन्होंने आलाकमान के खिलाफ बयान भी दिया है। AAP ने कर्नल अजय कोठियाल के नाम पर दाँव आजमाया है, लेकिन इस सर्वे में उन्हें 14.25% लोगों की पसंद ही माना गया है।

पिछले 1 वर्ष में 3 मुख्यमंत्री देने वाली भाजपा के लिए आखिर ऐसा क्या हो गया जो अब उसके लिए उत्तराखंड में उम्मीदें सकारात्मक होती जा रही हैं? सबसे पहले तो पुष्कर सिंह धामी के बारे में बता दें कि वो राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री ज़रूर हैं, लेकिन राज्यवासी उनके नाम से काफी पहले से वाकिफ रहे हैं। हाँ, पिछले कुछ वर्षों से वो चर्चा में नहीं थे। 46 वर्षीय धामी आज से 20 वर्ष पूर्व तत्कालीन मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी के सलाहकार और ‘ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी’ के रूप में चर्चा में आए थे।

लखनऊ यूनिवर्सिटी से स्नातक के बाद LLB की डिग्री लेने वाले पुष्कर सिंह धामी को 2008 में ‘भाजपा जनता युवा मोर्चा (BJYM)’ का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था। इस दौरान राज्य के उद्योग में स्थानीय युवाओं के लिए 70% आरक्षण की व्यवस्था करवाने का श्रेय उन्हें ही दिया जाता है। उससे पहले वो ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP)’ से जुड़े रहे थे। ऐसे में कुमाऊँ क्षेत्र के पिथौरगढ़ स्थित टुंडी गाँव से ताल्लुक रखने वाले धामी शुरू से जमीन से जुड़े रहे हैं। उनके पूर्वज इसी जिले के हरखोला गाँव के निवासी थे।

पुष्कर सिंह धामी उधम सिंह नगर के खटीमा विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं। उन्होंने लगातार दूसरी बार यहाँ से जीत दर्ज की है और अब हैट्रिक लगाने के लिए उतरेंगे। ये अलग बात है कि मुख्यमंत्री बनने से पहले वो मंत्री भी नहीं रहे थे। राज्य के छात्रों के बीच वो काफी लोकप्रिय रहे हैं, जिसका उन्हें अब फायदा मिलता भी दिख रहा है। स्पष्ट है, भाजपा को भी इससे फायदा है। चूँकि वो 90 के दशक से ही छात्र/युवा राजनीति में सक्रिय रहे हैं, वो कोई ऐसा नाम भी नहीं हैं जिनसे जनता वाकिफ न रही हो।

उत्तराखंड में भाजपा के लिए क्या बदल गया? वो फैसले, जिनसे अगले चुनाव में बढ़ गई उम्मीदें

ऐसे में भाजपा के लिए पहला फैक्टर यही काम कर रहा है कि राज्य के युवाओं में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की लोकप्रियता है। दूसरा फैक्टर ये है कि उन्होंने ‘चारधाम देवस्थानम प्रबंधन अधिनियम’ को वापस लेकर साधु-दंतों की नाराजगी को भी दूर कर दिया है। हिन्दुओं, खासकर ब्राह्मणों में इस फैसले से खासी ख़ुशी नजर आई। यही कारण है कि जब पीएम मोदी केदारनाथ के पुनर्निर्माण के बाद यहाँ विकास परियोजनाओं और शंकराचार्य की प्रतिमा का उद्घाटन करने पहुँचे तो राज्य के लगभग सभी बड़े साधु-संतों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

इसे उनके कुशल प्रबंधन और रणनीति का परिणाम ही माना जाएगा कि उन्होंने जनता का मूड भाँप कर ये फैसला लिया, वरना कॉन्ग्रेस ने ये ऐलान कर के मुश्किल खड़ी कर दी थी कि वो सत्ता में आते ही सबसे पहले इस बोर्ड को भंग करेगी। विपक्ष के हाथ से सीएम धामी ने ये मुद्दा छीन लिया। पीएम मोदी का ड्रीम प्रोजेक्ट बिना किसी बाधा के पूरा हुआ और उत्तरकाशी एवं चमोली के अलावा रुद्रप्रयाग में जनता की नाराज़गी थम गई। भाजपा को सही समय पर इस फैसले से एक मजबूती मिली।

हाल ही में हल्द्वानी पहुँचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीएम धामी के कंधे पर हाथ रखा, जो तस्वीर काफी वायरल हुई। साथ ही उनके हाथ में फ्रैक्चर को लेकर उनका कुशल-क्षेम भी पूछा, जिसका सीएम धामी ने भी आभार जताया। सन्देश साफ़ है – जिस तरह उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर भाजपा आलाकमान का भरोसा है, ठीक उसी तरह उत्तराखंड में पुष्कर सिंह धामी के साथ आलाकमान ने एकजुटता दिखाते हुए प्रदर्शित किया है कि राज्य में चेहरे को लेकर कोई कन्फ्यूजन नहीं है।

राजनीति में प्रतीकों का बड़ा महत्व होता है, इसीलिए इस तस्वीर के मायने फ़िलहाल यही निकाले जाएँगे। ऊपर से तीसरा बड़ा फैक्टर ये है कि भाजपा में अंदरूनी बगावत थम गई है और उलटा कॉन्ग्रेस-AAP ही समस्या में फँसी हुई है। चुनाव के दौरान दलबदल सामान्य है, लेकिन शायद ही भाजपा को इसका नुकसान हो। AAP के कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष कॉन्ग्रेस में शामिल हुए हैं और भाजपा नेता यशपाल आर्य अपने बेटे संजीव के साथ कॉन्ग्रेस में चले गए, लेकिन ये व्यक्तिगत हितों को लेकर लिया गया इन नेताओं का फैसला था और भाजपा को इसका नुकसान होने की उम्मीद न के बराबर है।

केंद्र में संसदीय मामलों के अलावा कोयला एवं खनन विभाग का जिम्मा संभाल रहे प्रह्लाद जोशी को भाजपा ने उत्तराखंड में पार्टी का प्रभारी बनाया है। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि पार्टी पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में चुनाव लड़ने जा रही है और 2022 में वो सत्ता में वापस आएँगे। उन्होंने कहा कि पुष्कर सिंह धामी को लेकर पार्टी में संशय की कोई स्थिति नहीं है और वो मुख्यमंत्री के रूप में बने रहेंगे। कृषि कानूनों के वापस लिए जाने के बाद से किसानों की नाराजगी भी थम गई है, ऐसे में भाजपा की राह में कोई बड़ा रोड़ा है भी नहीं।

इन सबके अलावा पुष्कर सिंह धामी के बयान भी चर्चा का मुद्दा तो बनते हैं, लेकिन उनसे विवाद पैदा नहीं होता। हाल ही में BJYM नेताओं के साथ उन्होंने क्रिकेट मैच भी खेला। पीएम मोदी जिस तरह से खेल को प्रमोट कर रहे हैं, खिलाड़ियों से मिल कर उनका मनोबल बढ़ाते हैं और मेरठ में ‘मेजर ध्यानचंद खेल विश्वविद्यालय’ का उद्घाटन हुआ है, उस हिसाब से ये उनकी नीति के अनुरूप ही है। देहरादून में अब भाजपा की ‘संकल्प यात्रा’ भी शुरू हो गई है।

राज्य में भाजपा के लिए मीडिया में बगावत की जो बात चलाई जा रही थी और जिससे पार्टी को नुकसान हो सकता था, वो था हरक सिंह रावत को लेकर। एक कैबिनेट बैठक में उनकी गैर-मौजूदगी को लेकर ये बातें चलाई जा रही थीं। लेकिन, मुख्यमत्री आवास में पुष्कर सिंह धामी ने कोटद्वार के विधायक के साथ भोजन कर के इन अटकलों को विराम दे दिया। इस ‘रात्रिभोज’ से मीडिया का भी मुद्दा छिन गया। हरक रावत ने उन्हें अपना छोटा भाई बताया। अब सवाल ये है कि क्या इस ‘डैमेज कंट्रोल’ की तरह धामी भाजपा को उत्तराखंड में एक बड़ा बहुमत दिलाएँगे? आँकड़े और अनुमान तो यही कह रहे।