बॉलीवुड एक्टर सैफ अली खान इन दिनों अपनी आने वाली फिल्म ‘बंटी और बबली 2’ के प्रमोशन को लेकर बिजी हैं। इस दौरान वो कई प्रमोशनल इवेंट में हिस्सा लेते हुए दिलचस्प खुलासे करते दिखाई दे रहे हैं। हाल ही में अपनी को-स्टार रानी मुखर्जी को सैफ ने सालों पुराने उस वाकए के बारे में बताया है, जिसमें उन्होंने एक इंवेस्टमेंट में मिले धोखे के कारण अपनी कमाई का 70 प्रतिशत हिस्सा गँवा दिया था। ये वाकया सुनकर रानी हैरान रह गईं।
उनकी चैट का वीडियो यश राज फिल्म्स ने अपने यट्यूब चैनल पर जारी किया था। दरअसल जब रानी ने पूछा कि क्या उनके साथ कभी धोखाधड़ी हुई है। इस पर सैफ अली खान ने कहा, “मेरे साथ घोटाला हुआ है। ये मुंबई में संपत्ति खरीदने के दौरान हुआ था। उन्होंने कहा था कि आपके पास ये प्रॉपर्टी तीन साल में होगी और मैंने उन्हें अपनी उस समय की रकम का 70 प्रतिशत निवेश किया था।”
उन्होंने आगे कहा, “मुझे अभी भी वो नहीं मिला है। मुझे उम्मीद है कि जल्द मिल जाएगा। लेकिन अभी महामारी है।” रानी ने आगे कहा कि क्या यह वह घर है जिसमें वे रह रहे हैं, इस पर सैफ कहते हैं, “नहीं, नहीं, नहीं। वह ऑफिस की जगह है।”
बता दें कि सैफ और रानी की फिल्म ‘बंटी और बबली 2’ ऐसे ही धोखाधड़ी पर आधारित है। जिसमें सिद्धांत चतुर्वेदी और शरवरी वाघ भी अहम भूमिकाओं में दिखाई देंगे। सैफ और रानी 12 साल के बाद एक साथ स्क्रीन पर नजर आएँगे। इससे पहले इन दोनों को ‘थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक’ में एक साथ देखा गया था। उसे भी यश राज फिल्म्स बैनर के तहत ही बनाया गया था।
बातचीत के दौरान सैफ ने ये भी बताया कि एक बार उनके घर में एक अनजान महिला आ धमकी थी। इस किस्से को शेयर करते हुए सैफ ने कहा था कि उस वक्त करीना कपूर बेहद नाराज हो गई थीं। दरअसल, एक बार सैफ के घर की डोरबेल बजी तो जब दरवाजा खुला तो एक अजनबी महिला दौड़ कर सैफ के लिविंग रूम में आ घुसी। सैफ वहीं थे तो देख कर घबरा गए। तब तक करीना भी वहाँ पहुँच गईं और जब करीना ने देखा तो वह हैरान रह गईं। सैफ और करीना कुछ सेकेंड्स तक सोचते रहे कि वो कौन है। इसके बाद महिला सैफ के करीब गई और उनसे पूछा, “और तो तुम यहाँ रहते हो?”
सैफ ने बताया था कि उस वक्त वे काफी घबरा गए थे। तब करीना ने सैफ से गुस्से में कहा था, “अब कुछ बोलोगे तुम?’ ऐसे में सैफ ने बताया कि “मैं सोच रहा था क्या मैं इस महिला को जानता हूँ?” इसके बाद सैफ ने कहा, “कौन हैं आप? जाइए आप यहाँ से, क्या कर रही हैं यहाँ?” ऐसे में महिला ने ओके कहा और वो वहाँ से चलती बनी। ये देख सैफ और करीना हैरान रह गए थे।
इससे पहले सैफ ने यह भी बताया था कि तैमूर बड़ा होकर बुरा आदमी बनना चाहता है। वह बैंक लूट कर सभी के पैसे भी चुराना चाहता है। सैफ के अनुसार तैमूर अली खान नकली तलवार लेकर हिंसक रूप से लोगों के पीछे भागता है, उन्हें दौड़ाता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज (19 नवंबर 2021) देश को संबोधित करते हुए तीनों कृषि कानून की वापसी का ऐलान किया। इसके बाद अलग-अलग तरह की प्रतिक्रिया सामने आ रही है। आंदोलनरत किसान संगठनों ने इस फैसले का स्वागत किया है। हालाँकि भारतीय किसान यूनियन (BKU) के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने तत्काल आंदोलन वापस लेने से इनकार किया है।
टिकैत ने एक ट्वीट के जरिए यह बात करते हुए केंद्र सरकार के सामने एक शर्त भी रख दी है। उन्होंने लिखा, “आंदोलन तत्काल वापस नहीं होगा। हम उस दिन का इंतजार करेंगे जब कृषि कानूनों को संसद में रद्द किया जाएगा। सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के साथ-साथ किसानों के दूसरे मुद्दों पर भी बातचीत करें।”
आंदोलन तत्काल वापस नहीं होगा, हम उस दिन का इंतजार करेंगे जब कृषि कानूनों को संसद में रद्द किया जाएगा ।
वहीं भारतीय किसान यूनियन (भानू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष भानू प्रताप सिंह ने कहा, “मैं इस कदम का स्वागत करता हूँ। 75 साल से किसान विरोधी नीतियों के चलते कर्ज के कारण किसानों की मौत हो गई। मैं पीएम मोदी से एक कृषि समिति बनाने और फसल की दरें तय करने का आग्रह करता हूँ। आज की घोषणा की तरह ही किसानों का कर्ज एक दिन में माफ हो।”
I welcome this move. Due to anti-farm policies for 75 years, farmers died due to debts. I urge PM Modi to form a farm committee and let it decide crop rates. Farmers’ loans should be waived off in a day through an announcement like today’s: Bhanu Pratap Singh, BKU-BHANU President pic.twitter.com/GFMdKx39fR
अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने आंदोलनरत किसानों से अपने-अपने घर लौटने का आग्रह किया था। साथ ही किसानों के एक वर्ग को इन कानूनों के बारे में नहीं समझा पाने के लिए देश से माफी भी माँगी थी। उन्होंने कहा था, “मैं देश वासियों से क्षमा माँगते हुए, सच्चे मन से कहना चाहता हूँ कि हमारे प्रयास में कमी रही होगी कि हम उन्हें समझा नहीं पाए। आज गुरु नानक जी का पवित्र प्रकाश पर्व है। आज मैं आपको यह बताने आया हूँ कि हमने तीन कृषि कानूनों को वापस लेने का फैसला किया है। इस महीने के अंत में शुरू होने जा रहे संसद सत्र में तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की प्रक्रिया शुरू कर देंगे। मेरी किसानों से अपील है कि अपने घर लौटें, खेतों में लौटें।”
उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए सभी पार्टियों ने तैयारी शुरू कर दी है। सत्ताधारी BJP की निगाहें एक बार फिर यूपी फतह पर है। इसी कड़ी में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा की अध्यक्षता में 18 नवंबर 2021 को दिल्ली में संगठनात्मक बैठक हुई। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और खुद नड्डा के चुनावी कार्यक्रमों को लेकर अहम फैसला लिए गए।
पार्टी के पुराने राष्ट्रीय कार्यालय पर हुई उच्चस्तरीय बैठक में BJP संगठन के लिहाज से सभी 6 क्षेत्रों के बूथ अध्यक्षों के सम्मेलन को लेकर महत्वपूर्ण चर्चा हुई। पार्टी ने इन सभी छह क्षेत्रों को अपने 3 दिग्गज नेताओं राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, गृह मंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बीच बाँट दिया है।
बैठक के बाद मीडिया से बात करते हुए उत्तर प्रदेश भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह ने बताया कि बूथ अध्यक्षों की बैठक को लेकर क्षेत्रवार प्रभारी नियुक्त किए गए हैं। नड्डा को गोरखपुर और कानपुर की कमान सौंपी गई है। अमित शाह को बृज और पश्चिम क्षेत्र तथा राजनाथ सिंह को काशी और अवध क्षेत्र की जिम्मेदारी दी गई है।
बैठक के बारे में जानकारी देते हुए स्वतंत्र देव सिंह ने बताया कि बैठक में चुनावी रणनीति और कार्यक्रमों को लेकर चर्चा हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जेपी नड्डा, अमित शाह और राजनाथ सिंह समेत पार्टी के दिग्गज नेताओं के कार्यक्रमों और दौरों को लेकर भी चर्चा हुई। रथ यात्रा कार्यक्रम की जानकारी देते हुए यूपी BJP प्रदेश अध्यक्ष ने बताया कि विजय संकल्प यात्राओं के रूट और तारीखों को लेकर भी चर्चा हुई।
आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश में मतदाताओं से सीधे संपर्क के लिए बीजेपी रथ यात्राएँ निकालेगी। ये राज्य के चार कोनों से एक साथ शुरू होगी और सभी क्षेत्रों पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पूर्वांचल, ब्रज, अवध और बुंदेलखंड से होकर गुजरेंगी। चारों रथ यात्रा दिसंबर के पहले सप्ताह में शुरू करने की तैयारी हो रही है। यात्राओं में प्रदेश और केंद्र सरकार के मंत्रियों को भी शामिल किया जाएगा। करीब दो सप्ताह तक चलने वाली चारों यात्राओं का समापन एक साथ लखनऊ में करने की योजना है। यात्राओं के समापन पर लखनऊ में एक बड़ी रैली होगी, जिसमें पीएम मोदी भी मौजूद रह सकते हैं।
एडविना माउंटबेटन और उनके पति लॉर्ड माउंटबेटन से जुड़े दस्तावेजों और पत्रों को गुप्त रखने के लिए ब्रिटेन सरकार काफी पैसा खर्च कर रही है। WION की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि माउंटबेटन और उनकी पत्नी एडविना के इन पत्रों और डायरियों को (खास कर भारत के विभाजन के आसपास) को यूके सरकार गुप्त रखना चाहती है। उसे डर है कि इसे सार्वजनिक करने से भारत विभाजन और एडविना के रिश्तों के राज सामने आ सकते हैं।
WION की रिपोर्ट में कहा गया है कि एंड्रू लोनी नाम के एक लेखक ने उन दस्तावेजों को देखने की माँग की है, मगर ब्रिटिश सरकार लेखक को उन तक पहुँचने से रोकना चाहती है। यूके सरकार को डर है कि यदि वे दस्तावेज सार्वजनिक किए गए तो वे भारत, पाकिस्तान और ब्रिटेन के बीच के संबंधों को नुकसान पहुँचा सकते हैं।
भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के साथ एडविना माउंटबेटन का ‘विशेष’ संबंध कोई रहस्य नहीं है और कई विशेषज्ञों का यह भी तर्क है कि नेहरू ने एडविना के साथ अपने संबंधों के कारण भारत के राष्ट्रीय हितों को खतरे में डाल दिया था। WION की रिपोर्ट के मुताबिक एक पत्र में एडविना ने नेहरू को लिखा था, “मुझे आपको सुबह जाते हुए देखने से नफरत है। आपने मुझे एक अजीब सी शांति के साथ छोड़ दिया। शायद, मैं आपके लिए वही लाई हूँ?” इस पर नेहरू का उत्तर था, “जीवन एक नीरस प्रकरण है।”
लेखक ने ब्रिटेन सरकार को कोर्ट में खड़ा किया
लेखक एंड्रू लोनी ने ब्रिटिश सरकार से माउंटबेटन दस्तावेजों को जारी करने के लिए याचिका दायर की थी और उनमें से अधिकांश को ब्रिटिश फ्रीडम ऑफ इनफॉर्मेशन लॉ के तहत सफलतापूर्वक प्राप्त भी कर लिया था। हालाँकि, वर्ष 1947-48 से संबंधित दस्तावेज जारी नहीं किए गए। दस्तावेजों में माउंटबेटन दंपति द्वारा लिखी गई कई डायरियाँ और पत्र शामिल हैं। लोनी ने कहा कि इन दस्तावेजों में जरूर कुछ खास है जिसकी वजह से यूनिवर्सिटी और सरकार उन्हें सार्वजनिक करने से बचाने के लिए लाखों पाउंड खर्च कर रही है।
WION की रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिटिश सरकार उन दस्तावेजों की सुरक्षा के लिए कड़ी संघर्ष कर रही है और अब तक इन दस्तावेजों को छिपाने के लिए 600,000 पाउंड (करीब 6 करोड़ रुपए) से अधिक खर्च कर चुकी है। TOI ने बताया था कि हाल ही में एक ट्रिब्यूनल सुनवाई के दौरान, लोनियर के वकील क्लारा हैमर ने कहा कि 12 जुलाई 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन की डायरी एंट्री से पता चला कि उन्होंने ब्रिटिश न्यायाधीश सिरिल रेडक्लिफ, सीमा आयोग के अध्यक्ष और उनके सचिव क्रिस्टोफर ब्यूमोंट के साथ रात का भोजन किया था। लेकिन अगले दिन से डायरी एंट्री को ब्रिटिश सरकार ने यह कहते हुए संशोधित किया है कि यह डिटेल भारत और पाकिस्तान के साथ ब्रिटेन के संबंधों को खतरे में डाल सकता है।
हैमर ने कहा कि 12 जुलाई 1947 वह समय था जब माउंटबेटन का रैडक्लिफ के साथ संपर्क नहीं होना चाहिए था। 6 अगस्त 1947 की डायरी एंट्री को भी संशोधित किया गया है। दस्तावेजों में संशोधन भारत के विभाजन में माउंटबेटन की भूमिका और उसके बाद हुई हिंसा में हजारों लोगों की जान लेने के बारे में भी कई सवाल उठाता है। यह उस समय के भारत के पीएम नेहरू के आचरण पर भी सवाल उठाता है और बताता है कि एडविना के साथ उनके व्यक्तिगत लगाव ने उस समय भारत के राष्ट्रीय हितों को कितना प्रभावित किया।
क्यूरेटर ने बताया अत्यधिक संवेदनशील
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, प्रोफेसर क्रिस वूल्गर, रिटायर्ड आर्काइविस्ट और यूनिवर्सिटी ऑफ साउथेम्प्टन लाइब्रेरी में क्यूरेटर, जिनके पास ये दस्तावेज हैं, ने ट्रिब्यूनल के सामने इसे संवेदनशील बताया। उन्होंने आगे कहा कि इसमें यूके के शाही परिवार और विभाजन के बारे में डिटेल्स है जो भारत और पाकिस्तान के साथ तनाव पैदा कर सकता है।
वूल्गर ने ट्रिब्यूनल में कहा कि कैबिनेट कार्यालय ने 3 घंटे के भीतर जवाब दिया था, यह मानते हुए कि दस्तावेज संवेदनशील हैं और उन्हें बंद कर दिया जाना चाहिए। दस्तावेज़ ब्रॉडलैंड्स आर्काइव का हिस्सा हैं जो 4500 से अधिक बॉक्स में संग्रहित किया गया था। इसमें लॉर्ड माउंटबेटन की डायरी के 47 वॉल्यूम्स और एडविना माउंटबेटन के 36 वॉल्यूम्स शामिल हैं। वे ब्रॉडलैंड्स हाउस, माउंटबेटन की पारिवारिक संपत्ति में आयोजित किए गए और साउथेम्प्टन विश्वविद्यालय को बेच दिए गए। रिपोर्टों के अनुसार, साउथेम्प्टन विश्वविद्यालय ने उन दस्तावेजों को खरीदने के लिए कई मिलियन पाउंड के सार्वजनिक धन का उपयोग किया था।
साउथेम्प्टन विश्वविद्यालय भी एडविना और नेहरू के बीच पत्र साझा करने से इनकार कर रहा है। इसके पीछे उसका तर्क है वह सिर्फ इसे संग्रहित करता है, उनका स्वामित्व नहीं करता है। लॉर्ड लुइस माउंटबेटन प्रिंस फिलिप के मामा और महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के रिश्ते में भाई थे। वह भारत के पूर्व गवर्नर जनरल थे। वह ब्रिटेन के शाही परिवार के बहुत करीब थे और प्रिंस चार्ल्स के पिता तुल्य थे।
केंद्र की मोदी सरकार ने तीनों कृषि कानून वापस लेने का फैसला किया है। देश को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार (19 नवंबर 2021) को इसकी घोषणा की। उन्होंने आंदोलनरत किसानों से अपने-अपने घर लौटने का आग्रह किया। साथ ही किसानों के एक वर्ग को इन कानूनों के बारे में नहीं समझा पाने के लिए देश से माफी भी माँगी।
उन्होंने कहा, “मैं आज देशवासियों से क्षमा माँगते हुए, सच्चे मन से कहता हूँ कि शायद हमारी तपस्या में भी कोई कमी रह गई थी। हम अपनी बात कुछ किसान भाइयों को समझा नहीं पाए। आज गुरु नानक जी का प्रकाश पर्व है। आज मैं पूरे देश को ये बताने आया हूँ, हमने 3 कृषि कानूनों को वापस करने का निर्णय लिया है। जल्द ही इसको लेकर संवैधानिक प्रक्रिया भी शुरू कर दी जाएगी।”
#WATCH | We have decided to repeal all 3 farm laws, will begin the procedure at the Parliament session that begins this month. I urge farmers to return home to their families and let’s start afresh: PM Narendra Modi pic.twitter.com/0irwGpna2N
पीएम ने कहा, “हमारी सरकार देश के हित में, किसानों के हित में, कृषि के हित में, किसानों के प्रति पूर्ण समर्पण भाव से ये कानून लेकर आई थी। लेकिन इतनी पवित्र बात, पूर्ण रूप से किसानों के हित की बात, हम अपने प्रयासों के बावजूद कुछ किसानों को समझा नहीं पाए। कृषि अर्थशास्त्रियों ने किसानों को कृषि कानूनों को समझाने का पूरा प्रयास किया। हमने भी किसानों को समझाने की कोशिश की। हर माध्यम से बातचीत भी लगातार होती रही। किसानों को कानून के जिन प्रावधानों पर दिक्कत था, उसे सरकार बदलने को भी तैयार हो गई। दो साल तक सरकार इस कानून को रोकने पर भी तैयार हो गई।”
उन्होंने कहा कि किसानों की स्थिति सुधारने के लिए ही 3 कृषि कानून लाए गए थे। मकसद था कि किसानों को और ताकत मिले। उनको अपनी उपज बेचने का ज्यादा से ज्यादा विकल्प मिले। पहले भी कई सरकारों ने इस पर मंथन किया था। इस बार भी संसद में चर्चा हुई, मंथन हुआ और ये कानून लाए गए। देश के कोने-कोने अनेक किसान संगठनों ने इसका स्वागत किया, समर्थन किया। वो उन सभी के बहुत-बहुत आभारी हैं।
पीएम मोदी ने कहा कि किसानों को उनकी उपज का सही दाम मिले इसके लिए कई कदम उठाए गए हैं। उनकी सरकार द्वारा की गई उपज की खरीद ने पिछले कई दशकों के रिकॉर्ड तोड़ दिए गए हैं। देश की 1000 से ज्यादा मंडियों को ई नाम योजना से जोड़कर उन्होंने किसानों को कहीं पर भी अपनी उपज बेचने का एक प्लेटफॉर्म दिया है। कृषि मंडियों के आधुनिकीकरण पर करोड़ों खर्च किए। देश का कृषि बजट पहले के मुकाबले 5 गुना बढ़ गया है। हर वर्ष सवा लाख करोड़ कृषि पर खर्च किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि आपदा के समय ज्यादा से ज्यादा किसानों को मुआवजा मिल सके इसके लिए नियम भी बदले गए है। पिछले 4 सालों में किसान भाई-बहनों को 1 लाख करोड़ से ज्यादा का मुआवजा मिला है। छोटे किसानों की जरूरतों को पूरा करने के लिए सीधे उनके बैंक खातों में 1.62 लाख करोड़ रुपए ट्रांसफर किए गए हैं।
इंदिरा गाँधी, भारतीय राजनीति में एक ऐसा नाम जिन्होंने ‘जी हुजूरी‘ को ही कॉन्ग्रेस में आगे बढ़ने का पर्याय बना दिया। 19 नवंबर 1917 को जन्मीं इस महिला ने देश की पहली और अब तक कि एकमात्र महिला प्रधानमंत्री के तौर पर आपातकाल जैसे फैसले लिए। जिसने पुराने कॉन्ग्रेस को फुस्स कर एक ऐसी कॉन्ग्रेस खड़ी कर ली जहाँ उनके चाटुकारों ने ‘इण्डिया इज इंदिरा एंड इंदिरा इज इण्डिया’ कहने में भी संकोच नहीं किया।
नेहरू की किंगमेकर बनने की ख्वाहिश
बात वहीं से शुरू करते हैं जहाँ से प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के मन में कॉन्ग्रेस पर अधिपत्य का खयाल आया। सरदार पटेल की मृत्यु के बाद नेहरू ने कॉन्ग्रेस संगठन को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया। राजनीतिक इतिहास की गलियारों में यह बात खुलेआम कही जाती है कि कहीं न कहीं नेहरू बिलकुल क्लियर थे कि इंदिरा को तैयार कर अपना राजनीतिक वारिस तैयार किया जा सकता है। यहीं से वंशवाद की जो बेल उन्होंने लगाई वो अभी तक बीच में आए कुछ खर-पतवारों को छाँटते हुए फल-फूल रही है।
नेहरू साथ में युवा इंदिरा गाँधी
उस दौर की घटनाओं का कुलदीप नैयर सहित कई पत्रकारों, राजनीतिक इतिहासकारों ने विस्तार से अपनी किताबों में जिक्र किया है। हिंदुस्तान टाइम्स के पूर्व संपादक दुर्गादास ने अपनी किताब, ‘इंडिया फ्रॉम कर्जन टू नेहरू एंड आफ्टर’ में इस घटना का विस्तृत वर्णन करते हुए लिखा है कि कैसे नेहरू ने योजना बनाकर सबसे पहले कॉन्ग्रेस वर्किंग कमेटी में इंदिरा गाँधी को शामिल करवाया और साल भर के अंदर ही सर्वोच्च पद यानी कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के पद पर काबिज करा दिया। फिर ये ‘गूँगी गुड़िया’ ज्यादा दिन तक गूँगी न रही, पिता की छत्रछाया में सभी राजनीतिक दाँव-पेंच सीखती रही।
फिर 12 नवंबर 1969 का वह दिन भी आया जिस दिन इंदिरा गाँधी को कॉन्ग्रेस पार्टी ने बाहर निकाल दिया। इंदिरा गाँधी के खिलाफ यह आरोप था कि उन्होंने पार्टी अनुशासन को भंग किया है। कॉन्ग्रेस में जड़ जमाए सिंडिकेट से इस अपमान का बदला लेने के लिए इंदिरा ने न केवल नई कॉन्ग्रेस बना डाली बल्कि आने वाले समय में इसे ही असली कॉन्ग्रेस साबित कर दिया। यह उनकी राजनीतिक चतुराई ही है कि उन्होंने ना केवल कॉन्ग्रेस के सिंडिकेट को ठिकाने लगाया बल्कि प्रधानमंत्री के अपने पद को बरकरार रखते हुए अपनी सरकार भी बचाई।
दरअसल, उस दौर में कॉन्ग्रेस पर सिंडिकेट का दबदबा था। जो नेहरू की मौत के बाद पूरी पार्टी पर हावी हो गया था। जिनको नहीं पता उनकी जानकारी के लिए बता दूँ कि कॉन्ग्रेस के अंदर सिंडिकेट उन नेताओं का एक ताकतवर गुट था, जो गैर हिंदी भाषी थे और नेहरू की मौत के बाद लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गाँधी को पहली बार प्रधानमंत्री बनाने के पीछे भी इन्हीं नेताओं का हाथ था। ज्यादातर नेता दक्षिण भारत के थे और इनकी अगुवाई कर रहे थे के कामराज।
सिंडिकेट इंदिरा को पीएम पद से हटाने की बना रहा था योजना
कायदे से इस सियासी खेल की शुरुआत एक साल पहले ही हो चुकी थी जब कॉन्ग्रेस सिंडिकेट के सदस्यों ने इंदिरा को प्रधानमंत्री के पद से हटाने के लिए कमर कस ली थी। इंदिरा गाँधी को कॉन्ग्रेस सिंडिकेट ने ही 1966 में प्रधानमंत्री बनाया था, लेकिन तब ना तो उन्हें कोई खास राजनीतिक अनुभव था और ना ही संगठन में उनकी मजबूत पकड़ थी। 1967 के चुनावों ने उन्हें काफी हद तक राहत दी। उन्होंने अपनी सरकार पर कुछ हद तक पकड़ बना ली थी। लेकिन इसी सिंडिकेट के दवाब में इंदिरा को मोरारजी देसाई को फाइनेंस मिनिस्टर बनाना पड़ा था।
यहाँ संक्षेप में आपको यह भी बता दूँ कि इसी सिंडिकेट ने मोरारजी देसाई के पहले लाल बहादुर शास्त्री को देश का पीएम चुना था और दूसरी बार सिंडिकेट ने ही इंदिरा गाँधी को चुना, हालाँकि इस बार उनको मोरारजी देसाई और इंदिरा के बीच वोटिंग करवानी पड़ गई और इंदिरा ने बाजी मार ली जो उनके संगठन पर पकड़ बना लेने को भी दिखाता था।
इंदिरा गाँधी, सिंडिकेट के नेता के कामराज और मोरारजी देसाई के साथ
थोड़ा पीछे लौटते हैं, यह दौर है 1968-69 का, इस दौरान सिंडिकेट के सदस्यों ने इंदिरा गाँधी को गद्दी से उतारने की योजना बनानी शुरू कर दी थी। 12 मार्च 1969 को कॉन्ग्रेस अध्यक्ष एस निजलिंगप्पा ने अपनी डायरी में लिखा, मुझे ऐसा नहीं लगता कि वह (इंदिरा गाँधी) प्रधानमंत्री के रूप में बने रहने के काबिल हैं। शायद बहुत जल्दी मुकाबला होगा। 25 मार्च को उन्होंने लिखा कि मोरारजी देसाई ने उनसे प्रधानमंत्री को हटाए जाने की जरूरत पर चर्चा की।
इस तरह से कॉन्ग्रेस में जिस टकराव की भूमिका बहुत पहले से बनाई जा रही थी, वो मई 1969 में तत्कालीन राष्ट्रपति जाकिर हुसैन की मृत्यु से अचानक आ गई। सिंडिकेट के लोग राष्ट्रपति के पद पर अपने किसी आदमी को बिठाना चाहते थे। इंदिरा के विरोध के बाद भी सिंडिकेट के प्रमुख सदस्य नीलम संजीव रेड्डी को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार मनोनीत कर दिया गया। अब इंदिरा को लग गया कि उन्हें खुलकर सामने आना ही होगा। अब ‘गूँगी गुड़िया’ बने रहने से काम नहीं चलेगा। उन्होंने पहले तो मोरारजी देसाई से वित्त मंत्रालय छीना। फिर 14 प्रमुख बैंकों के राष्ट्रीयकरण की घोषणा कर दी। इसके बाद राजाओं के दिए जा रहे प्रिवीपर्स (जिन राजाओं ने भारत की सम्प्रभुता स्वीकार की थी उन्हें पेंशन के रूप में एक राशि दी जाती थी) को बंद करते ही जनता के बीच उनकी लोकप्रियता आसमान छूने लगी।
जनता को सम्बोधित करते हुए
राष्ट्रपति जाकिर हुसैन के निधन से मिला मौका
इंदिरा अब रोजमर्रा के कामों में भी सिंडिकेट का दखल पसंद नहीं कर रही थीं। वो सिंडिकेट को किनारे लगाने के अवसर तलाशने लगीं। ऐसे में इंदिरा गाँधी को भाग्य से एक मौका मिला, अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले ही भारत के राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन की मौत हो गई। वीवी गिरी उस वक्त वाइस प्रेसीडेंट थे, उनको कार्यवाहक राष्ट्रपति बना दिया गया। सिंडिकेट चाहता था कि उनके बीच के ही नेता नीलम संजीव रेड्डी को प्रेसीडेंट बना दिया जाए, जबकि वो पहले से लोकसभाध्यक्ष थे।
इंदिरा को ये डर था कि कहीं सिंडिकेट की पसंद का राष्ट्रपति बन गया तो कल को उन्हें ही सत्ता से हटाकर मोरारजी की ताजपोशी की जा सकती है। ऐसे में उन्होंने जगजीवन राम का नाम कॉन्ग्रेस वर्किंग कमेटी की मीटिंग में रखते हुए महात्मा गाँधी के उस जन्मशती वर्ष में दलित को सर्वोच्च अधिकार देने के सपने की याद दिलाकर माहौल अपने पक्ष में करना चाहा। लेकिन सिंडिकेट के आगे इंदिरा को मुँह की खानी पड़ी और नीलम संजीव रेड्डी को कॉन्ग्रेस का ऑफीशियल प्रेसीडेंट कैंडिडेट बना दिया गया। इधर वीवी गिरी प्रेसीडेंट की पोस्ट के लिए निर्दलीय ही खड़े हो गए।
इंदिरा खुलकर मैदान में आ गईं
माना तो यह भी जाता है कि गिरी को खड़ा करने में परदे के पीछे से इंदिरा ही थीं। जिन्हें वामदलों, डीएमके, अकाली दल और मुस्लिम लीग का समर्थन हासिल था। इंदिरा चाहती थीं कि वीवी गिरी को समर्थन दिया जाए लेकिन कैसे ये उनकी समझ में नहीं आ रहा था। इसका मौका कॉन्ग्रेस अध्यक्ष निजलिंगप्पा ने खुद ही दे दिया। उन्होंने नीलम संजीव रेड्डी की जीत सुनिश्चित करने के लिए जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी के नेताओं से मुलाकात की। बस अब तो इंदिरा ने खुलकर सिंडिकेट के नेताओं पर वार किया कि वो रेड्डी की जीत के लिए सांप्रदायिक और प्रतिक्रियावादियों से मिलकर उन्हें सत्ता से हटाने की साजिश कर रहे हैं।
अंतरात्मा की आवाज पर वोट की अपील
इंदिरा गाँधी ने अपनी चाल चली और बतौर लोकसभा में कॉन्ग्रेस सदस्यों का नेता होने के कारण कॉन्ग्रेस सदस्यों के लिए व्हिप जारी करने से साफ मना कर दिया। उन्होंने कॉन्ग्रेस के सदस्यों से अंतरात्मा की आवाज पर वोट करने को कहा। कुल 163 कॉन्ग्रेसी सासंदों ने गिरी को वोट दिया और कॉन्ग्रेस शासित 12 राज्यों में से 11 राज्यों में बहुमत भी गिरी को मिला। इस प्रकार वीवी गिरी 20 अगस्त को बहुत कम वोटों से चुन लिए गए। इधर जीत वीवी गिरी की हुई और उधर अपनी ही पार्टी के कैंडिडेट को हराकर इंदिरा भी जीत गईं।
सिंडिकेट के नेताओं के साथ
अब इंदिरा के निशाने पर सिंडिकेट के नेता थे। उनके इशारे पर ही कॉन्ग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष निजलिंगप्पा के खिलाफ सिग्नेचर कैम्पेन शुरू हो गया, इधर इंदिरा अलग-अलग राज्यों के दौरे पर जाकर संगठन पर अपनी पकड़ बनाने के लिए कॉन्ग्रेसियों को अपने पक्ष में लामबंद करने लगीं। इंदिरा के समर्थकों ने स्पेशल कॉन्ग्रेस सेशन बुलाने की माँग की ताकि नया प्रेसीडेंट चुना जा सके, उनको भरोसा हो चला था कि सिंडिकेट के लोगों के पास जनसमर्थन नहीं है। निजलिंगप्पा ने पीएम को खुला खत लिखकर पार्टी की इंटरनल डेमोक्रेसी को खत्म करने का आरोप लगाया, साथ में इंदिरा के दो करीबियों फखरुद्दीन अली अहमद और सी सुब्रामण्यिम को एआईसीसी से निकाल बाहर किया। बदले में इंदिरा ने निजलिंगप्पा की बुलाई मीटिंग्स में हिस्सा लेना बंद कर दिया।
अब कॉन्ग्रेस खुले तौर बँटी दिखने लगी थी। 1 नवम्बर, 1969 को कॉन्ग्रेस वर्किंग कमेटी की दो जगहों पर मीटिंग हुईं। एक पीएम आवास में और दूसरी कॉन्ग्रेस के जंतर-मंतर रोड कार्यालय में। कॉन्ग्रेस कार्यालय में हुई मीटिंग में इंदिरा गाँधी को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निकाल दिया गया और संसदीय दल से कहा गया कि वो अपना नया नेता चुन लें। कहते हैं कि इंदिरा को पार्टी से निकालने वाली सिंडिकेट की चाल काफी अखर गई थी। उनको इस बात का अंदाजा नहीं था कि पार्टी का कोई भी नेता उनके खिलाफ इस हद तक जा सकता है कि उन्हें अपने पिता की पार्टी से ही निकाल दे। कॉन्ग्रेस ने पहले तो इंदिरा गाँधी पर व्यक्तिगत हितों को ऊपर रखने का आरोप लगाया और फिर 12 नवंबर 1969 को उन्हें अनुशासनहीनता के आरोप में पार्टी से ही निकाल दिया।
शक्ति प्रदर्शन रहा कामयाब
हालाँकि, यह भी कहा जाता है कि इंदिरा को इस बात का अंदेशा हो गया था कि सिंडिकेट अब क्या करने वाला है। तभी उन्होंने भी दोनों सदनों के संसद सदस्यों की तत्काल मीटिंग बुला ली। अखिल भारतीय कॉन्ग्रेस कमेटी के 705 सदस्यों में 446 ने इंदिरा गाँधी खेमे यानि कॉन्ग्रेस (आऱ) के मीटिंग में हिस्सा लिया। दोनों सदनों के 429 कॉन्ग्रेसी सांसदों में 310 प्रधानमंत्री इंदिरा के गुट में शामिल हो गए। इसमें 220 लोकसभा सांसद थे। कॉन्ग्रेस (आर) को लोकसभा में बहुमत साबित करने के लिए 45 सांसद कम पड़ रहे थे।
इस तरह कॉन्ग्रेस दो भागों में बँट गई, खुद इंदिरा ने ही पार्टी के दो टुकड़े कर दिए। इंदिरा की पार्टी का नाम रखा गया कॉन्ग्रेस (आर— Requisition ) और दूसरी पार्टी का नाम रखा गया कॉन्ग्रेस (ओ-Organisation)। लेकिन समस्या यहीं समाप्त नहीं हुई। इससे इंदिरा गाँधी की पार्टी पर बहुमत का संकट आ गया। हालाँकि, इंदिरा ने आसानी से सीपीआई और डीएमके की मदद से समर्थन हासिल कर कॉन्ग्रेस (ओ) के अविश्वास प्रस्ताव को गिरा दिया।
इस तरह से इंदिरा को सिंडीकेट से मुक्ति मिल गई। इस घटना के बाद एस निजलिंगप्पा ने एक्टिव पॉलिटिक्स से संन्यास ले लिया और समाजसेवा के कार्यों से जुड़े गए। सबसे दिलचस्प बात यह थी कि 12 नवंबर को इंदिरा गाँधी को पार्टी से निकाला जाता है और 19 नवम्बर को उनका जन्मदिन था।
पिछले महीने त्रिपुरा में मुस्लिमों के खिलाफ हुई कथित हिंसा की आग में बीते दिनों महाराष्ट्र का अमरावती, नांदेड़ और मालेगाँव भी जल गया। इन जगहों पर सैकड़ों और हजारों की संख्या में कट्टरपंथी मुस्लिमों की भीड़ ने साम्प्रदायिक दंगा किया। अब इस मामले में महाराष्ट्र पुलिस ने कट्टरपंथी इस्लामी संगठन रजा अकादमी के दफ्तरों पर छापेमारी की। इस मामले में पुलिस ने अब तक 119 आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है। इन सभी पर हिंसा फैलाने का आरोप है।
रिपोर्ट के मुताबिक ये गिरफ्तारियाँ नासिक ग्रामीण पुलिस और नांदेड़ जिला पुलिस ने संयुक्त रूप से की। गिरफ्तार किए गए लोगों पर पिछले शुक्रवार (12 नवंबर) को बड़े पैमाने पर हिंसा में शामिल होने का आऱोप है। रजा अकादमी ने त्रिपुरा में मुसलमानों को कथित रूप से निशाना बनाए जाने के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था। इस दौरान हिंसक दंगाइयों की भीड़ ने पुलिस पर हमला करने के साथ ही सरकारी और निजी संपत्तियों में भी तोड़फोड़ की।
इस केस में पुलिस की टीम लगातार छापेमारी कर रही है और बीते दो दिनों में बड़ी कार्रवाई की गई है। नासिक जिले के मालेगाँव स्थित इस्लामपुरा में पुलिस ने सोमवार आधी रात को रजा अकादमी के कार्यालय पर छापा मारकर कई दस्तावेजों को जब्त किया। इस बीच पुलिस की टीम ने दंगे में कथित तौर पर शामिल होने के आरोप में 55 मुस्लिमों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार किए गए लोगों में अधिकतर रजा अकादमी से जुड़े हुए हैं।
इस घटना को लेकर अधिक जानकारी देते हुए नासिक ग्रामीण के एसपी सचिन पाटिल ने ऑपइंडिया से बात करते हुए बताया, “बुधवार की रात (17 नवंबर) तक हमने 52 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया था। आज दोपहर (18 नवंबर) हमने तीन और आरोपितों को गिरफ्तार किया है। ऐसा नहीं है कि सभी रजा अकादमी से ही जुड़े हैं, उनमें से कुछ दूसरे संगठनों से भी जुड़े हुए हैं। हम आरोपित व्यक्तियों की पहचान कर उन्हें गिरफ्तार कर रहे हैं। हम जाँच कर रहे हैं और हिंसा के अपराधियों की पहचान करने के लिए सबूत इकट्ठे कर रहे हैं।” इस घटना के मामले में नासिक पुलिस ने पाँच केस दर्ज किए हैं। इस विरोध प्रदर्शन में अखिल भारतीय सुन्नी जमीयत उलेमा से जुड़े लोग भी हिंसक प्रदर्शनों में शामिल थे।
वहीं त्रिपुरा कि कथित हिंसा का भ्रामक और आपत्तिजन वीडियो वायरल करने के मामले में एनसीपी पार्षद अयाज हलचल को साम्प्रदायिक तनाव भड़काने के आरोप में पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है।
Breaking : Maharashtra: Multiple Raids at Raza Academy offices; 52 Raza Academy Islamists arrested.#MaharashtraRiots
वहीं नांदेड़ के पुलिस अधीक्षक प्रमोद कुमार शेवाले ने ऑपइंडिया से बात करते हुए बताया कि अब तक 67 आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। उन्होंने कहा, “नांदेड़ में एफआईआर दर्ज की गई है। रजा अकादमी से जुड़े तीन आरोपित अभी फरार चल रहे हैं। मुझे उनका नाम याद नहीं है, लेकिन जहाँ तक इन गिरफ्तार आरोपितों का सवाल है तो वे दंगे में शामिल थे।”
नांदेड़ में पिछले हफ्ते इस्लामिक दंगाइयों के पथराव में आठ पुलिसकर्मी घायल हो गए जबकि पथराव कर करीब एक दर्जन से अधिक गाड़ियों को भी तोड़ दिया गया। इसके अलावा एक स्कूटर को आग के हवाले कर दिया गया। जबकि, नासिक के मालेगाँव में हुए पथराव की घटना में तीन पुलिसकर्मी और सात नागरिक घायल हो गए। इतना ही नहीं भीड़ ने पाँच से छह दुकानों और एक गाड़ी के अलावा सहारा अस्पताल के काँच को तोड़ दिया था।
पवार ने बीजेपी पर दंगे का आरोप लगाया
महाराष्ट्र में तीन शहरों में हुई हिंसा को लेकर एनसीपी चीफ शरद पवार ने कहा है कि दूसरे राज्य में हुई एक घटना को लेकर अमरावती, नांदेड़ और मालेगाँव में दंगे भड़क उठे। इन दंगों में कुछ बुरे लोग शामिल थे।
Riots broke out in Amravati, Nanded, and Malegaon over an incident that occurred in another state. Some bad people were involved in these riots. Police will investigate it and the truth will come out: NCP chief Sharad Pawar (1/2) pic.twitter.com/p7Y1alJdBD
पुलिस इसकी जाँच करेगी और सच्चाई सामने आएगी। लेकिन, इन दंगों के जवाब में देश (भाजपा) पर शासन करने वाली पार्टी की विचारधारा से जुड़े लोगों ने एक और तरह का दंगा किया। उन्होंने अमरावती में दुकानों पर हमला किया और छोटे उद्यमों को जबरन बंद कर दिया।
गुरुग्राम में शुक्रवार की नमाज का बवाल अब भी शांत नहीं है। वहाँ गुरुद्वारा सिंह सभा कमेटी ने गुरु पर्व पर गुरुद्वारे में नमाज पढ़ने के लिए जगह देने से मना कर दिया। कमेटी ने कहा कि गुरु पर्व पर गुरुद्वारे में भीड़ होगी। ऐसे में वो नमाज के लिए जगह नहीं दे सकते। ये नामुमकिन है।
बता दें कि सिख धर्म में कार्तिक मास की पूर्णिमा को गुरु नानक जयंती मनाई जाती है। इस साल 19 नवंबर दिन शुक्रवार को गुरु नानक जयंती मनाई जा रही है। सिखों के इस त्योहार को प्रकाश पर्व, गुरु पर्व और गुरु पूरब भी कहा जाता है।
ऐसे में गुरुद्वारा कमेटी ने मुस्लिमों को अपने गुरुद्वारे की जगह देने से मना किया है। खबर की पुष्टि के लिए हमने गुरुद्वारा कमेटी के हैरी सिद्धू और सदस्य प्रेम सिंह को फोन किया लेकिन दोनों से बात नहीं हो पाई। एक स्टाफ ने बताया कि आज गुरु पर्व है, इसलिए कार्यक्रम चलने तक बात नहीं हो सकती। वहीं एक अन्य सदस्य ने कॉन्ट्रोवर्सी के डर से कुछ नहीं कहा।
इससे पहले खबर आई थी कि कुछ सिख संगठनों ने मुस्लिम समुदाय को गुरुद्वारे में जुमे की नमाज अदा करने की पेशकश की थी। गुरुग्राम के सदर बाजार गुरुद्वारा ने एक बयान जारी कर कहा था कि उनका गुरुद्वारा ‘गुरु घर’ है और वहाँ सभी समुदायों का बिना किसी भेदभाव के स्वागत है। गुरुद्वारा अध्यक्ष शेरदिल सिंह सिंधु ने कहा था, ‘मुस्लिम भाई’ शुक्रवार को जुमे की नमाज अदा करने के लिए बेसमेंट का इस्तेमाल कर सकते हैं।
गुरुद्वारे के अलावा अक्षय यादव नाम के एक हिंदू बिजनेसमैन ने शुक्रवार की नमाज अदा करने के लिए मुस्लिमों को सेक्टर 12 में अपनी दुकान देने की पेशकश की थी। गुरुद्वारा और यादव के पेशकश को मीडिया और सोशल मीडिया में सहिष्णुता और भाइचारे के मिसाल का तौर पर प्रदर्शित किया जा रहा है। हालाँकि, इस दिखावटी सेक्युलरिज्म में, एक फैक्ट की अनदेखी की जा रही है और वह यह कि मुस्लिम मस्जिदों में नमाज़ क्यों नहीं पढ़ सकते हैं और उन्हें हर शुक्रवार को नमाज़ अदा करने के लिए सार्वजनिक स्थानों और गैर-मुस्लिमों के स्थानों की जरूरत क्यों है?
सेक्टर 47, सेक्टर 12 और अन्य जगहों पर स्थानीय निवासियों द्वारा विरोध-प्रदर्शन कभी भी नमाज़ से इनकार करने या मुस्लिमों को नमाज़ पढ़ने से रोकने को लेकर नहीं था। विरोध-प्रदर्शन सार्वजनिक स्थानों जैसे पार्कों और सड़कों को नमाज के लिए ब्लॉक किए जाने और सुरक्षा, विशेषकर महिलाओं की चिंताओं को लेकर था। सार्वजनिक स्थान सार्वजनिक उपयोग के लिए हैं। निवासियों का सवाल है कि मुस्लिम समुदाय उन स्थानों को क्यों ब्लॉक करता है जब वे मस्जिदों में नमाज अदा कर सकते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को ‘बिल्ड सिनर्जी फॉर सीमलेस क्रेडिट फ्लो एंड इकोनॉमिक ग्रोथ’ के लिए आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए देश के बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थाओं को हजारों करोड़ रुपए का चूना लगाकर विदेशों में छुपे बैठे आर्थिक अपराधियों को कड़ी चेतावनी दी।
उन्होंने स्पष्ट कहा, “भगोड़े आर्थिक अपराधियों को देश वापस लाने के लिए हम हर तरह के कूटनीतिक और कानूनी चैनलों का इस्तेमाल कर रहे हैं। मैसेज बहुत ही स्पष्ट है देश वापस लौट आओ। यही एकमात्र रास्ता है।”
भारत सरकार विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे बड़े आर्थिक अपराधियों को वापस लाने के लिए प्रयास कर रही है। उल्लेखनीय है कि हीरा कारोबारी नीरव मोदी पंजाब नेशनल बैंक को करीब 13,500 करोड़ रुपए से अधिक का चूना लगाकर विदेश फरार हो गया था, जबकि विजय माल्या ने बैंकों को 9000 करोड़ रुपए का चूना लगाया था। दोनों को ही भगोड़ा घोषित किया जा चुका है।
Speaking at a symposium to ‘Build Synergy for Seamless Credit Flow and Economic Growth.’ https://t.co/yO3gKO5awV
कार्यक्रम में पीएम नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण के दौरान हालाँकि, किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन उनका इशारा विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे बड़े आर्थिक अपराधियों की ओर था।
बैंकों को भागीदार बनने की सलाह
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बैंकों को संबोधित करते हुए कहा कि बैंको को लोन लेने के लिए आने वाले व्यक्ति के लिए मंजूरी देने वाला बनने की बजाय अब भागीदार की तरह व्यवहार करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा, “बीते 6-7 सालों में बैंकिंग सेक्टर में जो रिफॉर्म किए गए, बैंकों को जो समर्थन दिया गया, उससे मौजूदा वक्त में देश का बैंकिंग सेक्टर बहुत ही मजबूत स्थिति में है। 2014 से पहले की जितनी भी परेशानियाँ थीं, हमने उनके समाधान के रास्ते तलाशे हैं। हमने एनपीए की समस्या को सुलझाने के साथ ही बैंकों को रिकैपिटलाइज कर उनकी ताकत को बढ़ाया।”
कॉन्ग्रेस पर साधा निशाना
पीएम मोदी ने बिना नाम लिए कॉन्ग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि पहले की सरकारों के समय में जितने धन को इधर-उधर फँसाया गया था। उसमें से अब तक बड़े पैमाने पर वसूली की जा चुकी है। इससे पहले के लोगों की एक सोच थी ‘बैंक हमारी है और बैंक में जो भी है वो भी हमारा ही है’ वहाँ रहे या मेरे यहाँ रहे क्या फर्क पड़ता है? पीएम ने कहा कि हाल ही में स्थापित नेशनल एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड (NARCL) बैंकिंग क्षेत्र की लगभग 2 लाख करोड़ रुपए के स्ट्रेस एसेट के आने वाले समय में रिजॉल्व होने की संभावना है।
देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए काम करें बैंक
पीएम मोदी ने बैंकों से देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए काम करने की अपील करते हुए कहा कि भारत के बैंकों के लिए यही समय है कि अपनी बैलेंस शीट के साथ देश की बैलेंस शीट को भी बढ़ाने के लिए काम करें। इसके लिए पीएम मोदी ने बैंकों को कस्टमर का इंतजार करने की बजाय खुद उसकी जरूरतों का अनुमान लगाकर उसके पास जाने की सलाह दी है।
जनधन अकाउंट से कम हुए अपराध
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनधन अकाउंट खोलने की शुरुआत का जिक्र करते हुए बैंकिंग सेक्टर की तारीफ की और कहा कि बैंकों के कारण ही जनधन दुनिया के सामने एक बड़ा उदाहरण बन गया। उन्होंने ये भी कहा कि बैंकों की रिपोर्ट से ये भी पता चला है कि जनधन खातों के कारण अपराध में भी कमी आई है।
कॉन्ग्रेस पार्टी लगातार इस बात को साबित करने में जुटी है कि हिंदू और हिंदुत्व दो अलग-अलग चीजें होती हैं। इसी क्रम में सलमान खुर्शीद और राहुल गाँधी के बाद अब कॉन्ग्रेस नेता गौरव वल्लभ ने अपना बयान दिया है। वल्लभ ने गाँधी और गोडसे का उदाहरण देकर कहा कि पिछले 200 साल में जिस व्यक्ति ने सबसे अच्छे से हिंदू धर्म को अनुसरण किया वो महात्मा गाँधी हैं। वल्लभ कहते हैं, जिस व्यवहार पर गाँधी ने अमल किया को वो हिंदू धर्म है और जिस व्यवहार पर गोडसे चले वह हिंदुत्व है।
वल्लभ ने कहा, “गोडसे ने गाँधी को क्यों मारा? हिंदुत्व ने हिंदू धर्म को मारने की कोशिश क्यों की? हिंदू धर्म तो सर्वधर्म समभाव, वसुधैव कुटुम्बकम की ही बात करता है, सबको अपनाने की बात करता है जिसमें जो अच्छा लगा उसे ग्रहण करने की बात करता है। लेकिन गोडसे का हिंदुत्व ऐसा नहीं है उसका मतलब यही है कि जो सर्वधर्म समभाव, वसुधैव कुटुम्बकम की बात कर रहा है उसे गोली मारो।”
वह बोले, “हिंदू धर्म के उपदेशक महात्मा गाँधी हैं और हिंदुत्व का गोडसे है। इन दोनों के चरित्र में जो अंतर है, वही अंतर हिंदू और हिंदुत्व में है। ये दोनों अपनी-अपनी विचारधारा के शिखर पुरुष हैं…जो गाँधी है वह हिंदू है और जो गोडसे है वह हिंदुत्व है।”
कॉन्ग्रेस नेता ने कहा, “अब देश को तय करना है कि उसे गाँधी के बताए हुए अहिंसा के मार्ग पर चलना है या फिर गोडसे के बताए हिंसा के मार्ग पर चलना है।” खुर्शीद के बयान पर वल्लभ ने कहा कि बीजेपी को बताना चाहिए कि क्या वह लालकृष्ण आडवाणी की इस बात से सहमत हैं कि जिन्ना सबसे बड़े धर्मनिरपेक्ष थे? उन्होंने कहा कि भाजपा को आडवाणी, जसवंत और एस एम गोलवलकर की पुस्तकों को लेकर जवाब देना चाहिए।
यहाँ बता दें कि कॉन्ग्रेस नेता गौरव वल्लभ ने हिंदू और हिंदुत्व पर बात करने के अलावा कंगना रनौत के ख़िलाफ़ राष्ट्रद्रोह का मामला दर्ज करने की बात कही। उन्होंने कहा कि कंगना से सारे राष्ट्रीय पुरस्कार वापस ले लिए जाने चाहिए।
वल्लभ ने कहा, “इस सरकारी अदाकारा के बयान के दो कारण हो सकते हैं। एक कारण यह है कि उन्हें लिखकर दिया जा रहा है कि मुख्य मुद्दों पर से ध्यान भटकाओ। दूसरा कारण यह हो सकता है कि महात्मा गाँधी को अपमानित किया जाए और गोडसेवादी ताकतों को आगे लाया जाए।”
उल्लेखनीय है कि इससे पहले राशिद अल्वी, सलमान खुर्शी और राहुल गाँधी ने हिंदुत्व परअपना बयान दिया था। राहुल ने कहा था– बीजेपी हिंदुत्व की बात करती है। हिंदू और हिंदुत्व में क्या फर्क है, क्या ये एक हो सकते हैं? अगर हैं तो इनका नाम क्यों एक जैसा नहीं है। ये सच में अलग हैं। क्या हिंदू धर्म में ये है कि सिख और मुस्लिम को पीटा जाए? हिंदुत्व में ये है।