निष्पक्ष पत्रकारों की बात हो तो रवीश कुमार खुद को नंबर वन होने का दावा करते हैं। लेकिन उनकी पत्रकारिता में निष्पक्ष का ‘न’ भी नहीं झलकता। इसी हवा-हवाइया दावे के साथ उनका हालिया बयान एक बार फिर यह दिखाता है कि उनके तर्क तथ्यों से कम और पूर्वाग्रहों से ज्यादा चलते हैं। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की पत्नी रिनिकी भुइयां सरमा पर कॉन्ग्रेस नेता पवन खेड़ा ने लगाए आरोपों के मामले में उनकी टिप्पणी यही बताती है कि उन्होंने आधी-अधूरी जानकारी के साथ खुद को ‘निष्पक्ष’ पत्रकार के तौर पर पेश करने की कोशिश की है।
रवीश कुमार ने इस मामले में कॉन्ग्रेस नेता पवन खेड़ा पर दर्ज FIR को लेकर सवाल उठाते हुए कहा, “कायदे से आरोप का खंडन करना चाहिए या जाँच के आदेश देने चाहिए। आरोप लगाने वाले के पीछे पुलिस कैसे भेज सकते हैं?” सुनने में यह बात सिद्धांतों की बात लगती है, लेकिन हकीकत यह है कि उन्होंने पूरे मामले के मूल तथ्यों को या तो नजरअंदाज किया या जानबूझकर दबा दिया।
बिहार चुनाव के दौरान प्रशांत किशोर ने सम्राट चौधरी से लेकर अनेक नेताओं के ख़िलाफ़ आरोप लगाए। उनके ख़िलाफ़ तो FIR नहीं हुई है लेकिन पवन खेड़ा के मामले में तुरंत FIR हो गई। कायदे से आरोप का खंडन करना चाहिए या जाँच के आदेश देने चाहिए। आरोप लगाने वाले के पीछे पुलिस कैसे भेज सकते हैं? https://t.co/ULy00YMK1x
— ravish kumar (@ravish_journo) April 15, 2026
दरअसल, कॉन्ग्रेस के पवन खेड़ा ने सीएम हिमंता बिस्वा सरमा की पत्नी रिनिकी भुइयां सरमा पर गंभीर आरोप लगाए थे कि उनके तीन विदेशी पासपोर्ट हैं, दुबई में संपत्तियाँ हैं। उन्होंने ये सारे आरोप बिना किसी सबूत पेश किए हुए लगाए। हालाँकि, पवन खेड़ा ने कुछ दस्तावेज जरूर पेश किए, जिनमें कई गड़बड़ियाँ पाई गईं। इन गड़बड़ियों पर जब पवन खेड़ा से सवाल किया गया तो उन्होंने ठोस सबूत पेश करेंगे बोलकर अब तक वो नहीं दिखाए।
रवीश कुमार का ‘खंडन’ पाठ और तथ्यों की अनदेखी
सबसे अहम बात यह है कि जिस ‘खंडन’ का पाठ रवीश कुमार पढ़ा रहे हैं, वह पहले ही किया जा चुका था। खुद सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने सामने आकर दस्तावेजों में मौजूद गड़बड़ियों को विस्तार से बताया था। सरनेम की स्पेलिंग तक गलत थी, फोटो बायोमेट्रिक मानकों से मेल नहीं खा रही थी और कई ऐसी गड़बड़ियाँ थीं जो इन दस्तावेजों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करती हैं।
यहाँ तक कि खुद रिनिकी भुइयां सरमा ने इन तस्वीरों के AI जेनरेटेड होने की बात कही थी। ऐसे में साफ और सार्वजनिक रूप से खंडन करने के बावजूद रवीश कुमार का यह कहना कि असम सरकार ने खंडन नहीं किया, यह दिखाता है कि उन्होंने तथ्यों की अनदेखी की है या अपने नैरेटिव के लिए चयनात्मक जानकारी प्रस्तुत की।
FIR पर सवाल, पर पवन खेड़ा ने क्यों नहीं किया इस्तेमाल?
जहाँ तक रवीश कुमार FIR पर सवाल उठा रहे हैं, यहाँ भी उनका तर्क जमीन पर टिकता नजर नहीं आता। FIR कोई मनमाना कदम नहीं होता, यह एक कानूनी प्रक्रिया है जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का अहम हिस्सा है। अगर किसी पर सार्वजनिक तौर पर गंभीर आरोप लगाए जाते हैं, तो कानून के तहत कार्रवाई होना स्वाभाविक है।
यही विकल्प पवन खेड़ा पास भी खुला था, अगर उनके पास ठोस और विश्वसनीय दस्तावेज होते तो वे खुद FIR दर्ज कराते या सीधे अदालत का दरवाजा खटखटाते। लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया, जो अपने आप में बहुत कुछ कह देता है।
इसके उलट जब रिनिकी भुइयां सरमा ने पवन खेड़ा के खिलाफ FIR दर्ज कराई, तो पूरा रुख ही बदल गया। तब पवन खेड़ा तुरंत अग्रिम जमानत करवाने तेलंगाना हाई कोर्ट पहुँच गए। सवाल यह उठता है कि जब मामला असम से जुड़ा है, तो तेलंगाना कोर्ट का सहारा क्यों लिया गया। यही बात जब सुप्रीम कोर्ट के सामने पहुँची तो कोर्ट ने भी इस पर आपत्ति जताई कि आखिर असम के मामले में दूसरे राज्य के अधिकार क्षेत्र का फायदा कैसे उठाया जा सकता है।
उधर, कोर्ट के आदेशों पर भी रवीश कुमार खिसियाए। उन्होंने जाँच के आदेश की वकालत करनी शुरू कर दी। रवीश कुमार का पता होना चाहिए कि ऐसे मामलों में जाँच के आदेश देना कोई विकल्प नहीं, बल्कि जरूरी कदम होता है, क्योंकि यह सीधे किसी की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता से जुड़ा मामला है।
इस पर सीएम हिमंता बिस्वा सरमा भी चिंता जता चुके हैं। उन्होंने साफ कहा कि आज उनके खिलाफ इस तरह के फर्जी दस्तावेज पेश किए जा रहे हैं, तो कल को लोकसभा चुनाव के दौरान केंद्रीय मंत्री अमित शाह जैसे बड़े-बड़े नेताओं के खिलाफ भी इसी तरह के मनगढ़ंत आरोप गढ़े जा सकते हैं, इसलिए ऐसे मामलों की जाँच होना बेहद जरूरी है।
निष्कर्ष: रवीश कुमार की एकतरफा लाइन
पूरे विवाद को देखें तो तस्वीर साफ हो जाती है। पवन खेड़ा ने अपनी सुविधा के हिसाब से आरोप लगाए, बिना पुख्ता सबूत के उन्हें हवा दी गई और जब जवाबदेही की बारी आई तो पीछे हट गए। एक तरफ किसी की प्रतिष्ठा दाँव पर लगा दी और दूसरी तरफ कानूनी जाँच से बचने के रास्ते खोजे गए।
ऐसे में यह उम्मीद करना कि जिस व्यक्ति पर आरोप लगाए गए हैं वह चुप बैठा रहे और कोई कानूनी कार्रवाई न करे, यह तर्क नहीं बल्कि सरासर ढोंग है। अगर आरोप लगाने वालों के पास सच में सबूत होते, तो वे भी कोर्ट जाते या FIR दर्ज कराते, लेकिन वहाँ तो सबूत पेश करने पड़ते और यही वह जगह है जहाँ पूरी कहानी कमजोर पड़ती दिखती है।
असम चुनाव के बीच कॉन्ग्रेस का इस तरह का दाँव चलना यह भी दिखाता है कि राजनीतिक फायदा लेने के लिए किसी भी हद तक जाने की कोशिश की गई। लेकिन झूठ और फर्जीवाड़ा ज्यादा समय तक टिक नहीं पाता और आखिरकार उसी में उनकी हार भी दिख गई।
रवीश कुमार भी इसी झूठ और फर्जीवाड़े की लाइन में खड़े नजर आते हैं, जहाँ पूरी जानकारी लिए बिना एकतरफा टिप्पणी उनकी आदत बन चुकी है। अगर उन्हें पूरे तथ्य नहीं मालूम, तो यह उनकी अपनी चूक है। खंडन हो चुका हो, कानूनी कार्रवाई हो चुकी हो, फिर भी उसी पर सवाल उठाना सिर्फ एक एजेंडा साधने जैसा लगता है। अगर वे खुलकर कॉन्ग्रेस के पक्ष में बोलना चाहते हैं तो सीधे बोलें। लेकिन अधूरी जानकारी और बिना तथ्य के इस तरह की बातें कहकर वे भले ही कॉन्ग्रेस का ‘सिपाही’ बनने का इम्तिहान पास कर लें, लेकिन पत्रकारिता से हाथ धो बैठेंगे।








