पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के मियांवाली जिले में पाँच प्रमुख कबीलों के बीच 11 साल से चल रहा खूनी संघर्ष आखिरकार समाप्त हो गया। रविवार (28 जून 2026) को एक सुलह समारोह के दौरान प्रतिद्वंद्वी परिवारों ने एक-दूसरे को गले लगाकर वर्षों पुरानी दुश्मनी खत्म करने की औपचारिक घोषणा की।
इस संघर्ष में अब तक 11 लोगों की मौत हो चुकी थी और 9 अन्य घायल हुए थे। यह झगड़ा कुंडी, कालो, बिखन खेल, हजारा खेल और यारो खेल कबीलों के बीच 2015 से लगातार हिंसा का कारण बना हुआ था।
2015 में शुरू हुआ था पहला बड़ा खूनी संघर्ष
इस लंबे विवाद की शुरुआत वर्ष 2015 में मियांवाली के वान भच्छरन थाना क्षेत्र में हुई थी, जब यारो खेल कबीले के दो भाइयों अशरफ खान और असगर खान समेत उनके सहयोगियों मोहम्मद जमान हजारा खेल और शेर अब्बास भट्टी की हत्या कर दी गई थी।
इसी हिंसा में कालो कबीले के मोहम्मद लतीफ की भी जान चली गई थी। इस घटना ने कबीलों के बीच तनाव को इतना बढ़ा दिया कि बदले की आग लगातार भड़कती रही और क्षेत्र में कई बार हिंसक झड़पें होती रहीं।
तीन साल बाद 2018 में मियांवाली सिटी थाना क्षेत्र में एक और बड़ा हमला हुआ, जब कालो और कुंडी कबीलों के लोग अदालत की सुनवाई में जा रहे थे, तभी घात लगाकर उन पर हमला कर दिया गया। इस हमले में अब्दुल वहीद कालो, मोहम्मद मेहरान कुंडी, मोहम्मद नोमान कुंडी और दो राहगीरों की मौत हो गई।
इसके बाद 2019 में कायदाबाद के पास हुई एक और घटना में अशरफ खान बिखन खेल की हत्या कर दी गई, जिसने दोनों पक्षों के बीच दुश्मनी को और गहरा कर दिया।
11 साल बाद खत्म हुआ लंबा संघर्ष
इस संघर्ष को समाप्त कराने में मियां रियाज मियाना, शौकत खान, सिब्तैन खान और इंस्पेक्टर इरफान गुज्जर की अहम भूमिका मानी जा रही है। लंबे संवाद और भरोसा बहाली की कोशिशों के बाद आखिरकार मियांवाली के नूर मार्केट में सुलह समारोह आयोजित किया गया।
इस कार्यक्रम में पंजाब के राज्यपाल सरदार सलीम हैदर खान समेत कई पूर्व सांसद, राजनीतिक नेता और स्थानीय लोग मौजूद रहे। समारोह के दौरान कबीलों के सदस्यों ने एक-दूसरे को गले लगाकर दुश्मनी खत्म करने की घोषणा की।
राज्यपाल ने इसे सामाजिक स्थिरता और शांति की दिशा में अहम कदम बताया। इसी मौके पर अकरम खान ने 12 मिलियन रुपए के किसास (खून बहा) को माफ करने की घोषणा करते हुए कहा कि उन्होंने यह फैसला अल्लाह की रजा के लिए लिया है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर राम मंदिर, सनातन और तुष्टिकरण का मुद्दा गरमा गया है। समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया अखिलेश यादव द्वारा अयोध्या में राम मंदिर के दर्शन न करने और उसके बदले अन्य धार्मिक स्थलों का रुख करने को लेकर सियासी गलियारों में तीखी बहस छिड़ गई है।
उत्तर प्रदेश की सियासत में राम मंदिर और अयोध्या हमेशा से धुरी रहे हैं। दरअसल, अखिलेश यादव का राम मंदिर न जाना कोई सामान्य फैसला नहीं, बल्कि एक सोची-समझी चुनावी रणनीति का हिस्सा है। उनका असल मकसद बहुसंख्यक समाज के भीतर ही ‘हिंदू बनाम हिंदू’ की एक नई राजनीतिक रेखा खींचना और अपने पारंपरिक वोटरों को एकजुट रखना है।
इस राजनीतिक उठापटक के बीच, अखिलेश यादव द्वारा राम मंदिर न जाने के पीछे केदारेश्वर मंदिर के दर्शन को एक ढाल की तरह इस्तेमाल करने के मामले को अगर देखा जाए, तो यह साफ है कि उन्होंने अयोध्या की भव्यता से ध्यान भटकाने के लिए केदारेश्वर मंदिर जाने का सिर्फ एक तात्कालिक बहाना बनाया।
अखिलेश यादव ने रविवार (28 जून 2026) को कहा कि इटावा में बन रहे केदारेश्वर शिव मंदिर का काम पूरा होने के बाद वह अयोध्या में स्थित राम मंदिर के दर्शन करने के लिए जाएँगे।
हालाँकि बात सिर्फ इतनी सी नहीं है। इस बहानेबाजी के पीछे सपा का एक लंबा इतिहास, चुनावी मजबूरियाँ और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा उनके प्रोपेगेंडा को ध्वस्त किए जाने की पूरी कहानी छिपी है, जिसे विस्तार से समझना जरूरी है।
राम मंदिर से दूरी और ‘हिंदू बनाम हिंदू’ की नई सियासी जंग
अखिलेश यादव का राम मंदिर से दूरी बनाना और अन्य धार्मिक स्थलों का रुख करना उनके किसी व्यक्तिगत लगाव की कमी को नहीं, बल्कि उनकी सोची-समझी चुनावी महत्वाकांक्षा को दर्शाता है। आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए सपा एक ऐसी पिच तैयार करने की कोशिश कर रही है, जहाँ वह खुद को एक अलग तरह के हिंदू नैरेटिव के साथ पेश कर सके।
अखिलेश यादव भली-भांति जानते हैं कि आज के दौर में सनातन या राम मंदिर का सीधा विरोध करना उनके लिए राजनीतिक रूप से आत्मघाती साबित हो सकता है। इसलिए उन्होंने एक नई रणनीति अपनाई है, जो है हिंदुओं को ही आपस में लड़ाना।
चढ़ावा चोरी जैसे विवादित बयान देकर वह यह दिखाना चाहते हैं कि वे सनातन के विरोधी नहीं हैं, बल्कि मंदिर व्यवस्था या पुजारियों के एक वर्ग के खिलाफ हैं। इस प्रोपेगेंडा के जरिए वे भाजपा के ‘राष्ट्रवादी और सांस्कृतिक’ हिंदुत्व के समानांतर एक ऐसा वर्ग खड़ा करना चाहते हैं, जो आपस में ही बंटा रहे। यानी ‘हिंदू बनाम हिंदू’ की यह लड़ाई इसलिए लड़ी जा रही है ताकि बहुसंख्यक वोट बैंक में सेंध लगाई जा सके और साथ ही सपा का जो अपना पारंपरिक मुस्लिम-यादव (M-Y) समीकरण है, उसे यह संदेश दिया जा सके कि पार्टी अभी भी भाजपा के कोर एजेंडे के सामने पूरी तरह नतमस्तक नहीं हुई है। यह राजनीति पूरी तरह से वोट बैंक को साधने और सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ने के लिए बुनी गई है।
सपा का ‘काला इतिहास’: 1990 का वो दौर जब सरयू का जल हुआ था लाल
अखिलेश यादव की आज की राजनीति को समझने के लिए उनकी पार्टी के उस अतीत को देखना होगा, जिसे भारतीय राजनीति का एक बेहद कड़वा और विवादित अध्याय माना जाता है। राम मंदिर निर्माण को लेकर समाजवादी पार्टी का इतिहास हमेशा से विरोधाभासों और विवादों से घिरा रहा है, जो आज भी समय-समय पर उनकी राजनीतिक कलई खोल देता है।
इतिहास गवाह है कि जब 1990 में अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन अपने चरम पर था, तब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव थे। 30 अक्टूबर और 2 नवंबर 1990 को अयोध्या में जो कुछ हुआ, उसकी गूँज आज भी हर सनातनी के दिल में दर्द पैदा करती है।
मुलायम सरकार के सख्त आदेश पर अयोध्या में जमा हुए निहत्थे और शांतिपूर्ण कारसेवकों पर पुलिस ने बेरहमी से गोलियाँ चला दी थीं। इस ऐतिहासिक और कड़वे सच से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता कि उस फायरिंग में दर्जनों रामभक्तों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी और कहा जाता है कि सरयू नदी का जल सनातनियों के खून से लाल हो गया था।
मुल्ला-मुलायम की मिली थी उपाधि
अयोध्या में हिंदुओं के नरसंहार की इस घटना के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति का रुख पूरी तरह बदल गया। मुलायम सिंह यादव की सरकार ने बाद में रामभक्तों पर गोलियाँ चलाने वाले पुलिसकर्मियों और अधिकारियों पर दर्ज मुकदमों को भी वापस ले लिया था। राजनीतिक गलियारों में यह साफ माना गया कि यह कदम एक खास समुदाय (मुस्लिमों) को खुश करने और अपना वोट बैंक पक्का करने के लिए उठाया गया था। इसी दौर में उन्हें ‘मुल्ला मुलायम’ की उपाधि तक दे दी गई थी।
आज जब अखिलेश यादव खुद को एक नए रूप में पेश करने की कोशिश करते हैं, तो उनकी पार्टी का यही इतिहास उनके दावों के आड़े आ जाता है। जनता के सामने यह विरोधाभास साफ दिखता है कि जिस मंदिर आंदोलन को कभी सपा ने पूरी ताकत से रोकने की कोशिश की, आज उसी मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा और दर्शन को लेकर वे असहज नजर आते हैं।
‘चढ़ावा चोरी’ का प्रोपेगेंडा और सीएम योगी की दो-टूक चुनौती
अखिलेश यादव ने हाल ही में धार्मिक स्थलों और आयोजनों में ‘चढ़ावे और प्रबंधन’ को लेकर सवाल उठाए थे। अखिलेश ने जानबूझकर ‘चढ़ावा चोरी’ का मुद्दा उछाला ताकि इसके जरिए वह हिंदू समाज और संतों के एक वर्ग को मंदिर प्रबंधन या सरकार के खिलाफ खड़ा कर सकें। यह भी ‘हिंदू बनाम हिंदू’ के उसी प्रोपेगेंडा का हिस्सा था, जिसके जरिए वे बहुसंख्यकों के बीच अविश्वास की भावना पैदा करना चाहते थे।
रामपुर में जनसभा को संबोधित करते हुए सीएम योगी ने कहा कि जो लोग ‘जय श्री राम’ का नारा लगाने वालों पर लाठीचार्ज करवाते थे, वे आज राम भक्ति की वकालत कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जो लोग राम भक्तों पर गोलियाँ चलवाते थे, वे आज भगवान राम के प्रति भक्ति की बातें कर रहे हैं। सीएम योगी ने कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी, जिसने 2017 से पहले भगवान राम और भगवान कृष्ण में विश्वास करने से इनकार कर दिया था, आज अयोध्या जाने के लिए उत्सुक है। सीएम योगी ने आगे कहा कि भगवान राम जानते हैं कि कौन सही है और कौन गलत।
सीएम योगी ने हनुमान का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि रामभक्ति हर प्रकार की बाधा को दूर करने का सामर्थ्य देती है। रामभक्ति ऐसे कालनेमियों को निपटाने में पूरी सहायक है। उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी और कॉन्ग्रेस पहले भगवान राम और भगवान श्रीकृष्ण के अस्तित्व पर सवाल उठाती थीं, लेकिन आज अयोध्या जाने की होड़ लगी हुई है।
सीएम योगी ने अखिलेश को दी मथुरा की चुनौती
इससे पहले, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रविवार (28 जून 2026) को हाथरस में अखिलेश यादव पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि अयोध्या को धार्मिक नगरी बनाने की बात करने वालों को पहले अपना इतिहास देखना चाहिए। जिनकी सरकार में रामभक्तों पर गोलियां चलीं, काँवड़ यात्रा पर रोक लगी और कृष्ण जन्माष्टमी जैसे धार्मिक आयोजनों तक को दबाने की कोशिश हुई। आज जब राम भक्तों के परिश्रम और पुरुषार्थ से प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में अयोध्या अब त्रेता युग का स्मरण करा रही है, तो इनके भी मुँह में पानी आने लग गया है। अब तैयारी करिये कि हम कृष्ण कन्हैया के लिए भी कुछ कर सकें।
उन्होंने आगे बोलते हुए कहा कि अखिलेश यादव अब मथुरा की बात करिए, अगर सचमुच अपने को धार्मिक कहलाने का प्रयास कर रहे हो तो मथुरा-वृंदावन, श्रीकृष्णजन्मभूमि पर खुलकर बोल दीजिए। उन्होंने कहा, “बोलिये कि राम जन्मभूमि मुक्ति के आंदोलन की तर्ज पर ही कृष्ण जन्मभूमि की मुक्ति का भी अभियान चलना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि को भी सम्मान मिलना चाहिए। हमारी सरकार वहाँ श्रद्धालुओं को बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध कराने का कार्य कर रही है।”
दरअसल, अखिलेश ने कहा था कि वो अयोध्या को धार्मिक नगरी में बदलेंगे। इसी के बाद सीएम योगी ने उन पर पलटवार किया और कहा, “अखिलेश में हिम्मत नहीं है, क्यों कि मुल्ला और मोलबियों के सामने घुटने टेकने के सिवाय उनके पास कोई ऐसा एजेंडा नहीं जो प्रदेश के विकास के लिए हो। अयोध्या, मथुरा या काशी के उत्थान के लिए हो, उनकी पहचान को पौराणिक पहचान दिलाने के लिए हो।”
तुष्टिकरण बनाम सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
अखिलेश यादव की मौजूदा राजनीतिक छटपटाहट यह साफ करती है कि वे एक तरफ अपने पारंपरिक मुस्लिम मतदाताओं को छिटकने नहीं देना चाहते, और दूसरी तरफ भाजपा के मजबूत हिंदू वोट बैंक में दरार डालना चाहते हैं। लेकिन राम मंदिर जैसे बेहद संवेदनशील और आस्था से जुड़े विषय पर इस तरह की बहानेबाजी और ‘हिंदू बनाम हिंदू’ की खाई पैदा करने की कोशिशें जनता की नजरों से छिपी नहीं हैं।
1990 के कारसेवक गोलीकांड का काला इतिहास और हाल के दिनों में तुष्टिकरण की राजनीति के जो सबूत (जैसे गंगा पर इफ्तार पार्टियां) सामने आए हैं, वे समाजवादी पार्टी की धर्मनिरपेक्षता के दावों की पोल खोलते हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सीधी चुनौतियों और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के मजबूत नैरेटिव के सामने अखिलेश यादव का यह नया राजनीतिक प्रयोग फिलहाल पूरी तरह असफल होता दिखाई दे रहा है।
कुल मिलाकर देखें तो अखिलेश यादव की मौजूदा रणनीति पूरी तरह बेनकाब हो चुकी है। चूँतकि मतदाता अब तुष्टिकरण और छद्म धर्मनिरपेक्षता के खेल को अच्छी तरह समझने लगा है, ऐसे में अखिलेश यादव के लिए ‘हिंदू बनाम हिंदू’ का यह प्रोपेगेंडा उल्टा पड़ता दिखाई दे रहा है।
फुटबॉल में सबसे ख़तरनाक टीम वह नहीं होती जिसके पास सबसे बड़े सितारे हों। सबसे ख़तरनाक टीम वह होती है, जिसे हारने का डर नहीं होता। विश्व कप का इतिहास बार-बार यही सिखाता आया है कि नॉकआउट फुटबॉल में प्रतिष्ठा, इतिहास और ट्रॉफियाँ केवल कागज़ पर लिखी बातें हैं। मैदान पर अंततः वही टीम जीतती है जो अंतिम सीटी तक उम्मीद नहीं छोड़ती।
एक ऐतिहासिक जापानी एनीमे सीरीज़ है, Neon Genesis Evangelion। उसमें एक यादगार किरदार है मिसातो कात्सुरागी। इस सीरीज़ में वह कहती हैं, “Giving up halfway is worse than never trying at all.” अर्थात, बीच रास्ते हार मान लेना, कभी कोशिश ही न करने से भी अधिक बुरा है।
बीती रात और आज खेले गए फीफा विश्व कप के राउंड ऑफ 32 के मुकाबलों ने इस एक पंक्ति को बार-बार सच साबित किया। कहीं आख़िरी मिनट में वापसी हुई, कहीं इतिहास बदल गया और कहीं हारने वाली टीम भी पूरे विश्व का दिल जीतकर मैदान से बाहर निकली। फुटबॉल के लिहाज़ से यह सिर्फ़ एक नॉकआउट राउंड ना होकर साहस, धैर्य और उम्मीद का उत्सव था।
इस कहानी की शुरुआत होती है ह्यूस्टन से, जहाँ पाँच बार की विश्व विजेता ब्राज़ील के सामने थी एशिया की सबसे अनुशासित और निडर टीम- जापान।
सबसे पहले बीती रात ह्यूस्टन के स्टेडियम में ब्राज़ील का सामना एशियाई महाद्वीप के ‘जाएंट स्लेयर’ जापान से था। स्टेडियम में बड़ी संख्या में दर्शक मौजूद थे। पीली जर्सियाँ पहने ब्राज़ीलियाई समर्थक अपनी टीम का उत्साह बढ़ाने पहुँचे थे, जबकि जापान इतिहास रचने की उम्मीद के साथ मैदान में उतरा था।
मैच शुरू होते ही दोनों टीमों ने आक्रामक रुख अपनाया। दोनों की कोशिश थी कि शुरुआती बढ़त हासिल कर मुकाबले को अतिरिक्त समय या पेनाल्टी शूटआउट तक जाने से रोका जाए। पहले हाफ में जापान ने अपेक्षाकृत अधिक संगठित और आत्मविश्वास भरा खेल दिखाया। उसके खिलाड़ी लगातार ब्राज़ील पर दबाव बनाए रखते रहे।
मैच के 29वें मिनट में 25 वर्षीय काएशू सानो ने शानदार गोल दागकर जापान को 1-0 की बढ़त दिला दी। यह जापान की राष्ट्रीय टीम के लिए उनका पहला अंतरराष्ट्रीय गोल था। विश्व कप के नॉकआउट मुकाबले में, वह भी ब्राज़ील जैसी दिग्गज टीम के खिलाफ, अपनी राष्ट्रीय टीम के लिए पहला गोल करना किसी भी खिलाड़ी के लिए अविस्मरणीय क्षण होता। गोल होते ही स्टेडियम में सनसनी फैल गई।
इसके बाद विनीसियस जूनियर और उनके साथी खिलाड़ियों ने लगातार बराबरी हासिल करने की कोशिश की, लेकिन जापान ने अनुशासित रक्षात्मक खेल का शानदार प्रदर्शन किया। गोलकीपर सुज़ुकी ने भी कई अहम बचाव करते हुए ब्राज़ील को निराश किया। पहले हाफ की समाप्ति तक स्कोर 1-0 से जापान के पक्ष में रहा। ब्राज़ीलियाई समर्थकों का पीला समंदर चिंता में डूबा दिखाई दे रहा था।
दूसरे हाफ की शुरुआत के साथ ही ब्राज़ील पूरी तरह बदली हुई टीम की तरह मैदान पर उतरा। खिलाड़ियों की ऊर्जा, आक्रामकता और प्रतिबद्धता पहले से कहीं अधिक दिखाई दे रही थी। इसका असर भी ज्यादा देर तक इंतज़ार नहीं करवाता।
अनुभवी मिडफील्डर कैसेमीरो ने जापानी रक्षा पंक्ति को चकमा देते हुए एक शानदार हेडर लगाया। गेंद सीधे जाल में समा गई और ब्राज़ील ने मुकाबले में 1-1 की बराबरी कर ली। पूरे स्टेडियम में फिर से जान लौट आई।
इसके बाद मुकाबला लगातार रोमांचक होता गया। ब्राज़ील ने आक्रमणों की रफ्तार और तेज कर दी, जबकि जापानी खिलाड़ी पूरे समर्पण के साथ रक्षा करते रहे। सुज़ुकी लगातार बेहतरीन बचाव करते हुए अपनी टीम को मुकाबले में बनाए हुए थे। समय बीतने के साथ ऐसा लगने लगा कि मैच अतिरिक्त समय में जाएगा।
लेकिन फुटबॉल का सबसे बड़ा आकर्षण यही है कि अंतिम सीटी बजने तक कुछ भी निश्चित नहीं होता। ब्राज़ील लगातार हमले कर रहा था। दाएँ फ्लैंक से आया एक आक्रमण जापानी रक्षा पंक्ति से टकराकर उछला और गेंद जर्सी नंबर 22 पहने गैब्रिएल मार्टिनेली के सामने आ गिरी। उनके सामने दो जापानी डिफेंडर मौजूद थे। मार्टिनेली ने एक पल भी गंवाए बिना शानदार नियंत्रण दिखाया और गोलकीपर को छकाते हुए गेंद को गोलपोस्ट के दाएँ कोने में पहुँचा दिया।
ह्यूस्टन का स्टेडियम खुशी से गूंज उठा। ब्राज़ीलियाई समर्थकों का उत्साह चरम पर था। कुछ ही मिनट बाद रेफरी ने अंतिम सीटी बजाई और ब्राज़ील ने 2-1 से मुकाबला जीतकर अगले दौर (राउंड ऑफ 16) में अपनी जगह पक्की कर ली।
उधर, जापानी खिलाड़ियों के चेहरों पर निराशा साफ झलक रही थी। कई खिलाड़ियों की आँखें नम थीं। उनके समर्थकों के लिए भी यह हार बेहद भावुक करने वाली थी। मैच समाप्त होते ही मुख्य कोच हाजिमे मोरियासु मैदान पर पहुँचे और अपने खिलाड़ियों को गले लगाकर उनके साहस, अनुशासन और जुझारूपन की सराहना की। स्टैंड्स में मौजूद जापानी समर्थकों ने तालियों की गड़गड़ाहट से अपनी टीम का उत्साह बढ़ाया। जवाब में खिलाड़ियों और कोचिंग स्टाफ ने झुककर अपने समर्थकों का अभिवादन किया।
दरअसल, जापान के लिए यह विश्व कप शुरू होने से पहले ही चुनौतियों से भर गया था। टूर्नामेंट से पहले उसके कई प्रमुख खिलाड़ी चोटों से जूझ रहे थे। काओरू मितोमा और ताकुमी मीनामिनो पहले ही बाहर हो चुके थे। टूर्नामेंट शुरू होने से लगभग एक सप्ताह पहले कप्तान वातारू एंडो भी चोटिल होकर पूरी प्रतियोगिता से बाहर हो गए। इसके बाद स्टार खिलाड़ी टाकेफुसा कुबो भी पहले ही मैच के दौरान चोटिल हो गए और आगे नहीं खेल सके।
इन तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद जापान ने जिस साहस, अनुशासन और सामूहिक खेल का प्रदर्शन किया, उसने दुनिया भर के फुटबॉल प्रेमियों का दिल जीत लिया। वे भले ही यह मुकाबला हारकर घर लौटेंगे, लेकिन अपने प्रदर्शन से उन्होंने सम्मान, प्रशंसा और असंख्य शुभकामनाएँ जरूर अर्जित कर ली हैं।
आज खेले गए राउंड ऑफ 32 के बाकी तीनों मुकाबले किसी बेहतरीन मलयाली क्राइम थ्रिलर से कम रोमांचक नहीं थे। ब्राज़ील को जापान के खिलाफ अंतिम क्षणों तक संघर्ष करना पड़ा, लेकिन वह तो मानो इस नाटकीय दिन की भूमिका भर थी। असली कहानी अभी बाकी थी।
अगला मुकाबला बोस्टन में खेला जाना था, जहाँ चार बार की विश्व विजेता और खिताब की प्रबल दावेदार जर्मनी का सामना दक्षिण अमेरिकी टीम पराग्वे से था।
मुख्य कोच जूलियन नागेल्समान ने अपनी टीम को 4-2-3-1 फॉर्मेशन में मैदान पर उतारा। पिछले मुकाबले में इक्वाडोर से मिली हार को पीछे छोड़ते हुए जर्मनी जीत के साथ क्वार्टर फाइनल में जगह बनाना चाहता था। दूसरी ओर पराग्वे की टीम पर किसी तरह का अतिरिक्त दबाव नहीं था। वह पूरे आत्मविश्वास के साथ मैदान में उतरी थी और जानती थी कि यदि उसने शुरुआती दबाव झेल लिया, तो जर्मनी की बेचैनी ही उसकी सबसे बड़ी ताकत बन सकती है।
मैच की शुरुआत अपेक्षा के अनुरूप हुई। जर्मनी ने गेंद पर नियंत्रण बनाए रखा और लगातार छोटे-छोटे पासों के जरिए खेल को आगे बढ़ाने की कोशिश की। लेकिन उसके अधिकांश आक्रमण अंतिम तिहाई तक पहुँचते-पहुँचते बिखर जाते। पराग्वे ने अपनी रक्षापंक्ति को बेहद अनुशासित रखा और जर्मन खिलाड़ियों को खुलकर खेलने का अवसर नहीं दिया। जर्मनी के पास गेंद जरूर अधिक थी, लेकिन उसके खेल में वह धार दिखाई नहीं दे रही थी जिसकी उससे उम्मीद की जाती है। पेनाल्टी बॉक्स के आसपास पहुँचने के बाद भी निर्णायक पास और सटीक फिनिशिंग का अभाव साफ़ नज़र आ रहा था। दूसरी ओर पराग्वे हर अवसर का धैर्यपूर्वक इंतज़ार कर रहा था।
फिर आया मैच का 42वाँ मिनट।
पराग्वे को कॉर्नर किक मिली। गेंद बॉक्स के भीतर पहुँची और महज़ साढ़े पाँच फ़ुट लंबे 22 वर्षीय जूलियो इनसिसो ने ऊँची छलांग लगाते हुए शानदार हेडर लगाया। गेंद सीधे जाल में समा गई और पराग्वे ने 1-0 की अप्रत्याशित बढ़त हासिल कर ली।
गोल होते ही पराग्वे के खिलाड़ी खुशी से झूम उठे, जबकि जर्मन डगआउट में सन्नाटा पसर गया। स्टेडियम में मौजूद हजारों जर्मन समर्थक कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत हो गए। पहले हाफ की समाप्ति तक यही स्कोर बना रहा। हाफ टाइम के दौरान नागेल्समान अपने खिलाड़ियों से लंबी चर्चा करते दिखाई दिए। स्पष्ट था कि अब केवल गेंद पर कब्ज़ा बनाए रखना पर्याप्त नहीं होगा। जर्मनी को परिणाम चाहिए था।
दूसरे हाफ की शुरुआत के साथ ही जर्मन टीम ने अपने खेल की गति बढ़ा दी। लगातार दबाव का असर आखिरकार 56वें मिनट में दिखाई दिया। फ्लोरियन विर्ट्ज़ ने शानदार विज़न का परिचय देते हुए सटीक पास काई हावर्ट्ज़ तक पहुँचाया। हावर्ट्ज़ ने बिना कोई गलती किए गेंद को गोलपोस्ट के भीतर भेज दिया और जर्मनी ने मुकाबले में 1-1 की बराबरी कर ली।
इसके बाद ऐसा लगा कि अब मैच पूरी तरह जर्मनी की ओर झुक जाएगा। लेकिन पराग्वे ने हार नहीं मानी। उसकी पूरी टीम एकजुट होकर रक्षण करती रही। जर्मनी लगातार गोल की तलाश में आक्रमण करता रहा, लेकिन हर बार पराग्वे का कोई न कोई खिलाड़ी उसके सामने दीवार बनकर खड़ा हो गया। कई मौकों पर जर्मनी बेहद करीब पहुँचा, लेकिन अंतिम स्पर्श या तो चूक गया या फिर पराग्वे की रक्षापंक्ति ने खतरे को टाल दिया।
90 मिनट का निर्धारित समय समाप्त हुआ और स्कोर 1-1 पर बराबर रहा। मुकाबला अतिरिक्त समय में पहुँच गया। एक्स्ट्रा टाइम शुरू होते ही पराग्वे ने रणनीतिक बदलाव किया। अनुभवी मिडफील्डर मिगुएल अलमिरोन को बाहर बुलाकर एक अतिरिक्त डिफेंडर मैदान पर उतारा गया। संदेश बिल्कुल साफ़ था; अब हर हाल में मैच को पेनाल्टी शूटआउट तक ले जाना है।
दूसरी ओर जर्मनी किसी भी कीमत पर शूटआउट से बचना चाहता था।
जोशुआ किमिख, निक वोल्टेमाडे, फ्लोरियन विर्ट्ज़ और काई हावर्ट्ज़ लगातार अवसर बनाने की कोशिश करते रहे। गेंद बार-बार पराग्वे के पेनाल्टी क्षेत्र में पहुँचती, लेकिन हर बार कोई न कोई लाल-सफेद जर्सी उसके सामने आ खड़ी होती। पराग्वे का सामूहिक रक्षण पूरे मुकाबले में उसकी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरा।
एक अवसर पर काई हावर्ट्ज़ ने फिर शानदार हेडर लगाया, लेकिन वह भी गोल में तब्दील नहीं हो सका। धीरे-धीरे अतिरिक्त समय भी समाप्ति की ओर बढ़ा। पूरे 120 मिनट बीत गए, लेकिन दोनों टीमें एक-दूसरे की बराबरी पर रहीं। अब फैसला पेनाल्टी शूटआउट से होना था।
पहली कुछ पेनाल्टियों के बाद मुकाबला बराबरी पर चलता रहा, लेकिन फिर दबाव ने जर्मनी का साथ छोड़ दिया। काई हावर्ट्ज़, निक वोल्टेमाडे और जोनाथन ताह अपनी-अपनी पेनाल्टी को गोल में तब्दील नहीं कर सके। दूसरी ओर पराग्वे ने संयम बनाए रखा और आखिरकार शूटआउट 4-3 से अपने नाम कर लिया।
अंतिम पेनाल्टी गोल में जाते ही पराग्वे के खिलाड़ी मैदान पर दौड़ पड़े। बेंच से पूरा कोचिंग स्टाफ खुशी में मैदान के भीतर आ गया। खिलाड़ियों की आँखों में अविश्वास और खुशी एक साथ दिखाई दे रही थी। उन्होंने विश्व फुटबॉल की सबसे सफल टीमों में से एक को विश्व कप से बाहर कर दिया था।
इसके साथ ही एक नया इतिहास भी दर्ज हुआ।
यह पहली बार था जब जर्मनी विश्व कप के किसी पेनाल्टी शूटआउट में पराजित हुआ। वर्षों तक शूटआउट में अजेय रहने वाली जर्मन टीम आखिरकार इस बार दबाव के आगे टिक नहीं सकी।
मैच के बाद सोशल मीडिया पर कुछ प्रशंसकों ने मज़ाकिया अंदाज़ में इसे ‘मेसुत ओज़िल का श्राप’ तक कहना शुरू कर दिया। हालांकि यह केवल प्रशंसकों की प्रतिक्रिया थी, लेकिन इतना तय है कि लगातार तीसरे विश्व कप में अपेक्षाकृत कमज़ोर मानी जा रही टीम के हाथों जर्मनी की विदाई उसके फुटबॉल ढाँचे पर गंभीर सवाल खड़े करेगी। कप्तान जोशुआ किमिख सहित कई वरिष्ठ खिलाड़ियों के लिए यह शायद विश्व कप का आख़िरी अध्याय साबित हो। आने वाले वर्षों में जर्मन फुटबॉल को बड़े बदलावों से गुजरना पड़ सकता है।
उधर, पराग्वे में जश्न का माहौल था। खिलाड़ियों ने अपने समर्थकों के साथ इस ऐतिहासिक जीत का भरपूर उत्सव मनाया। विश्व कप ने एक बार फिर साबित कर दिया कि नॉकआउट फुटबॉल में इतिहास, प्रतिष्ठा और पिछले रिकॉर्ड तभी तक मायने रखते हैं, जब तक रेफरी पहली सीटी नहीं बजाता।
अब बारी थी दिन के तीसरे और अंतिम मुकाबले की। मेक्सिको के नुएवो लिओन प्रांत के खूबसूरत स्टेडियम में नीदरलैंड्स और मोरक्को आमने-सामने थे। एक ओर युवा और अनुभवी खिलाड़ियों का संतुलित मिश्रण लिए टीम ओरांजे थी, तो दूसरी ओर वह मोरक्को, जिसने पिछले कुछ वर्षों में अपने जुझारू खेल से दुनिया भर के फुटबॉल प्रेमियों के दिलों में खास जगह बना ली थी। ‘एटलस लायंस’ के नाम से मशहूर यह टीम एक और बड़े उलटफेर के इरादे से मैदान में उतरी थी।
रेफरी की सीटी बजते ही मुकाबले की शुरुआत हुई। शुरुआती कुछ मिनटों में नीदरलैंड्स ने आक्रामक रुख अपनाया और मोरक्को के पाले में लगातार दबाव बनाने की कोशिश की। लेकिन जैसे-जैसे मैच आगे बढ़ा, मोरक्को ने लय पकड़नी शुरू कर दी। उसके खिलाड़ी आत्मविश्वास के साथ गेंद पर नियंत्रण बनाए रखने लगे और धीरे-धीरे खेल की रफ्तार अपनी शर्तों पर तय करने लगे।
पहले हाफ में दोनों टीमों ने कुछ अच्छे मौके बनाए, लेकिन कोई भी उन्हें गोल में तब्दील नहीं कर सका। मोरक्को का मिडफील्ड लगातार गेंद पर नियंत्रण बनाए हुए था, जबकि नीदरलैंड्स जवाबी हमलों के जरिए अवसर तलाश रहा था। निर्धारित 45 मिनट समाप्त होने तक स्कोर 0-0 ही रहा, लेकिन मैच का रोमांच लगातार बढ़ता जा रहा था।
दूसरे हाफ की शुरुआत के बाद भी मुकाबले का स्वरूप बहुत अधिक नहीं बदला। मोरक्को ने गेंद पर अपना प्रभाव बनाए रखा और लगातार डच रक्षा पंक्ति को परखता रहा। दूसरी ओर नीदरलैंड्स अपेक्षाकृत नीरस और बिखरा हुआ फुटबॉल खेलता दिखाई दिया। उसकी ओर से वह धार नज़र नहीं आ रही थी जिसने पूरे टूर्नामेंट में उसे खिताब का दावेदार बनाया था।
डच गोलकीपर ने हालांकि कुछ बेहद महत्वपूर्ण बचाव किए और अपनी टीम को मुकाबले में बनाए रखा। ऐसा लगने लगा था कि यदि किसी टीम को गोल मिलेगा तो वह मोरक्को होगी।
लेकिन फुटबॉल अक्सर वही कहानी लिखता है जिसकी सबसे कम उम्मीद होती है।
72वें मिनट में नीदरलैंड्स ने तेज़ जवाबी हमला बोला। गेंद को तेजी से आगे बढ़ाया गया और आखिरकार कोडी गाक्पो ने सटीक फिनिश करते हुए नीदरलैंड्स को 1-0 की बढ़त दिला दी।
गोल होते ही उनके साथी खिलाड़ी खुशी से उनकी ओर दौड़े, लेकिन गाक्पो की आँखों में मुस्कान नहीं थी। वह भावुक होकर मैदान पर रो पड़े। दरअसल, कुछ ही दिन पहले गाक्पो और उनकी साथी ने अपने अजन्मे शिशु को खो दिया था। उस निजी पीड़ा के बीच विश्व कप के मंच पर आया यह गोल उनके लिए केवल एक खेल उपलब्धि नहीं था, बल्कि गहरे व्यक्तिगत भावनाओं का विस्फोट भी था। उनके साथी खिलाड़ियों ने उन्हें घेर लिया और पूरे स्टेडियम में कुछ क्षणों के लिए एक अलग ही भावनात्मक वातावरण बन गया।
इसके बाद मुकाबला और तेज़ हो गया। मोरक्को ने बराबरी के लिए पूरी ताकत झोंक दी। लगातार हमले होने लगे और डच खिलाड़ी अपनी बढ़त बचाने में जुट गए। समय तेजी से बीत रहा था और ऐसा लगने लगा था कि नीदरलैंड्स किसी तरह यह मुकाबला जीत लेगा।
लेकिन फिर आया इंजरी टाइम।
90+1वें मिनट में मोरक्को ने शानदार मूव तैयार किया। तेज़ पासिंग के बाद गेंद डच पेनाल्टी बॉक्स में पहुँची और उसे गोल में बदल दिया गया। स्कोर 1-1 हो गया। पूरे स्टेडियम में मौजूद मोरक्को के समर्थक खुशी से झूम उठे, जबकि नीदरलैंड्स के खिलाड़ियों के चेहरे पर अविश्वास साफ दिखाई दे रहा था।
निर्धारित समय समाप्त हुआ और मुकाबला अतिरिक्त समय में चला गया।
एक्स्ट्रा टाइम में दोनों टीमों ने जीत हासिल करने की पूरी कोशिश की। मोरक्को का आत्मविश्वास बढ़ चुका था, जबकि नीदरलैंड्स लगातार दबाव में दिखाई दे रहा था। दोनों ओर से कुछ अवसर बने, लेकिन कोई भी निर्णायक साबित नहीं हुआ। 120 मिनट पूरे होने के बाद भी स्कोर 1-1 ही रहा और अब फैसला पेनाल्टी शूटआउट से होना था। शूटआउट शुरू हुआ। दोनों टीमों के खिलाड़ी बारी-बारी से पेनाल्टी लेने लगे। लेकिन इस बार मोरक्को के सबसे भरोसेमंद खिलाड़ी यासीन बोनू एक बार फिर दीवार बनकर खड़े हो गए। उनके शानदार बचावों ने नीदरलैंड्स की उम्मीदों पर पानी फेर दिया।
आखिरकार मोरक्को ने पेनाल्टी शूटआउट 3-2 से जीत लिया और लगातार एक और यूरोपीय दिग्गज को विश्व कप से बाहर का रास्ता दिखा दिया।
कई लोग इसे दिन का एक और बड़ा उलटफेर कहेंगे, लेकिन जिसने पूरा मुकाबला देखा होगा, वह शायद इस निष्कर्ष से पूरी तरह सहमत न हो। मोरक्को ने अधिकांश समय खेल की गति नियंत्रित रखी, गेंद पर बेहतर पकड़ दिखाई और पूरे मुकाबले में कहीं अधिक आत्मविश्वास के साथ खेलता नज़र आया। उसके प्रदर्शन ने यह साबित कर दिया कि यह जीत किसी संयोग का परिणाम नहीं थी, बल्कि पूरे 120 मिनट के अनुशासित और धैर्यपूर्ण खेल का पुरस्कार थी। इस हार के साथ नीदरलैंड्स का विश्व कप अभियान समाप्त हो गया, जबकि मोरक्को लगातार दूसरी बार फुटबॉल जगत को यह याद दिलाने में सफल रहा कि अब उसे केवल ‘डार्क हॉर्स’ कहकर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। खैर, अब नज़रें आज रात खेले जाने वाले मुकाबलों पर होंगी।
भारतीय समयानुसार रात साढ़े दस बजे डलास में कोटे डी आइवोर का सामना नॉर्वे से होगा। नॉर्वे के पास एरलिंग हालांड की अगुवाई में बेहद मजबूत आक्रमण है, जबकि कोटे डी आइवोर पूरे टूर्नामेंट में अपने जुझारूपन और आक्रामक तेवर से प्रभावित करता आया है। ऐसे में यह मुकाबला किसी भी दिशा में जा सकता है।
इसके बाद भारतीय समयानुसार रात ढाई बजे फ्रांस और स्वीडन आमने-सामने होंगे। न्यू जर्सी में खेले जाने वाले इस मुकाबले में दोनों टीमों के पास कई खतरनाक गोल स्कोरर मौजूद हैं। हालांकि फ्रांस का पलड़ा भारी माना जा रहा है। पिछले मुकाबले में उस्मान डेंबेले ने मात्र 32 मिनट के भीतर हैट्रिक लगाकर यह बता दिया था कि उन्हें थोड़ी-सी भी जगह देना किसी भी टीम के लिए कितना महंगा साबित हो सकता है। स्वीडन को यदि क्वार्टर फाइनल में पहुँचना है तो उसकी रक्षापंक्ति को पूरे मुकाबले में लगभग त्रुटिहीन प्रदर्शन करना होगा।
इसके बाद अपने घरेलू समर्थकों के बीच मेक्सिको का सामना उस इक्वाडोर से होगा जिसने पिछले दौर में जर्मनी जैसी दिग्गज टीम को बाहर का रास्ता दिखाकर पूरे फुटबॉल जगत को चौंका दिया था। भारतीय समयानुसार यह मुकाबला कल सुबह साढ़े छह बजे खेला जाएगा। इक्वाडोर ने पिछले दौर में अपने इरादे स्पष्ट कर दिए हैं, जबकि मेक्सिको को घरेलू दर्शकों का भरपूर समर्थन मिलेगा। ऐसे में यह मुकाबला भी बेहद दिलचस्प रहने की पूरी उम्मीद है। अब तक इस विश्व कप ने एक बात पूरी तरह स्पष्ट कर दी है; यह बड़े नामों का नहीं, बल्कि बड़े जज़्बे का टूर्नामेंट बन चुका है।
इक्वाडोर, पराग्वे और मोरक्को जैसी टीमों ने दिखा दिया है कि यदि विश्वास, अनुशासन और साहस साथ हों तो फुटबॉल के सबसे मजबूत किले भी ढहाए जा सकते हैं। इन टीमों का प्रदर्शन काबो वर्दे जैसी अन्य उभरती टीमों के लिए भी प्रेरणा बनेगा कि विश्व कप में कोई भी मुकाबला पहले से तय नहीं होता। यही फुटबॉल की सबसे बड़ी खूबसूरती है।
यहाँ अंतिम सीटी बजने तक कुछ भी संभव है। वीवा ला फुटबॉल।
प्लेन की उड़ान का सबसे जरूरी हिस्सा टेक-ऑफ और लैंडिंग होता है। ज्यादातर हादसे इन्हीं दो प्रक्रियाओं के दौरान होते हैं। प्लेन लैंडिंग करते समय जिस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हैं, उसे इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम (ILS) कहते हैं। यह एक सटीक रेडियो नेविगेशन सिस्टम है, जो विमानों को खराब मौसम, घने कोहरे या रात के समय रनवे पर सुरक्षित उतरने में मार्गदर्शन करती है।
भारत में उड़ने वाले प्लेन हर दिन इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते रहे हैं, लेकिन 27 जून, 2026 को एक अलग घटना हुई। उदयपुर एयरपोर्ट पर पहुँची इंडिगो की एक फ्लाइट ने लैंडिंग के लिए इस इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम की जगह भारत के स्वदेशी सैटेलाइट-बेस्ड नेविगेशन सिस्टम यानी GAGAN का इस्तेमाल किया। (GPS बेस्ड GEO ऑगमेंटेड नेविगेशन)। इस सिस्टम को भारत के इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइज़ेशन यानी ISRO और एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने मिलकर बनाया है।
पहले GAGAN सिस्टम को छोटे एयरक्राफ्ट के साथ टेस्ट किया गया था, लेकिन अब इंडिगो के कमर्शियल एयरक्राफ्ट ने GAGAN का इस्तेमाल करके सफलतापूर्वक लैंडिंग की है। यह एविएशन के क्षेत्र में ऐतिहासिक है। इससे पता चलता है कि भारत के पास अब स्वदेशी सैटेलाइट-बेस्ड सिस्टम की मदद से ग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर हुए बिना कमर्शियल एयरक्राफ्ट को सफलतापूर्वक लैंड कराने की क्षमता है।
इसमें कोई शक नहीं कि लैंडिंग किसी भी एयरक्राफ्ट के लिए जरूरी है। आमतौर पर पायलट दूर से ही रनवे को देख सकते हैं और उसी हिसाब से सफलतापूर्वक लैंड कर सकते हैं। लेकिन बारिश के मौसम में, कोहरे या बादलों में, या अक्सर रात में, पायलट को बाहर से मदद की जरूरत होती है। दशकों से इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम यह काम कर रहा है।
यह सिस्टम जमीन पर लगे रेडियो एंटेना और दूसरे उपकरण की मदद से पायलट को बताता रहता है कि उसका एयरक्राफ्ट रनवे की लाइन में है या नहीं। वह यह भी बताता है कि एयरक्राफ्ट रनवे पर बहुत तेजी से आ रहा है या बहुत धीरे, या उसकी स्पीड बहुत धीमी है या बहुत तेज। इसके आधार पर पायलट एयरक्राफ्ट को बाएँ-दाएँ, ऊपर-नीचे, ज्यादा स्पीड या कम स्पीड कर लैंड कर सकता है।
इसके लिए एयरक्राफ्ट को रनवे से लगातार रेडियो सिग्नल मिलते रहते हैं। अगर विजिबिलिटी बहुत कम हो, तो अब मॉडर्न एयरक्राफ्ट में ऐसी सुविधा है जो ऑटोमैटिक लैंडिंग भी कर सकती है और उसके लिए भी ILS काम आता है। ILS की कमी यह है कि हर रनवे पर यह सिस्टम होना जरूरी है और रेडियो ट्रांसमीटर लगाना, उसे लगातार मेंटेन करना और लगातार बदलाव करना इसके लिए बेहद जरूरी है। इसलिए कुछ छोटे एयरपोर्ट पर या तो यह सिस्टम होता ही नहीं है या कुछ ही रनवे पर रखा जाता है।
भारत एविएशन नेटवर्क पर तेजी से काम कर रहा है और रीजनल कनेक्टिविटी पर जोर दिया जा रहा है। ऐसे में इन लिमिटेशन पर काम करना जरूरी है, इसीलिए GAGAN बनाया गया था।
GAGAN क्या है?
GAGAN सिस्टम को एविएशन की भाषा में LPV (लोकलाइजर परफॉर्मेंस विद वर्टिकल गाइडेंस) कहा जाता है। यह ILS की तरह ही काम करता है, लेकिन फर्क यह है कि यह जमीन पर लगे रेडियो एंटीना पर निर्भर नहीं करता, बल्कि सैटेलाइट पर निर्भर करता है। आसान शब्दों में – रनवे से एयरक्राफ्ट को गाइड करने के बजाय, यह काम सैटेलाइट की मदद से होता है। इसके लिए जमीन पर एंटीना या सिस्टम की जरूरत नहीं होती।
यहाँ एक सवाल उठता है कि अगर एयरक्राफ्ट पहले से ही GPS का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो सैटेलाइट-बेस्ड सिस्टम की क्या जरूरत है?
यह सच है कि हर एयरक्राफ्ट नेविगेशन के लिए GPS का इस्तेमाल करता है, लेकिन सटीक लैंडिंग के लिए नॉर्मल GPS काफी नहीं है। हम अपने मोबाइल फोन में भी GPS का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन उसकी लोकेशन कुछ मीटर तक गलत होती है। यह सही लोकेशन नहीं दिखाता है। हालाँकि यह सिस्टम कार चलाने के लिए सही है, लेकिन एयरक्राफ्ट में 2-5 मीटर की सटीकता की ही जरूरत नहीं होती उसे लैंड करने से कुछ किलोमीटर पहले से ही बहुत सटीक जानकारी होना जरूरी है, वह थोड़ा भी नहीं भटक सकता।
GPS सैटेलाइट पृथ्वी से हजारों किलोमीटर दूर काम करते हैं। उनके सिग्नल हम तक पहुँचने से पहले पृथ्वी के कई स्तर वाले वातावरण से गुजरते हैं। वातावरण के आयनोस्फीयर में कुछ इलेक्ट्रिकल पार्टिकल GPS सिग्नल की स्पीड और दिशा को थोड़ा बदल देते हैं, जिससे हम तक पहुँचने वाली जानकारी में थोड़ी गलती हो जाती है।
भारत के मामले में यह समस्या थोड़ी ज्यादा है, क्योंकि हम पृथ्वी के उस हिस्से में हैं जहाँ आयनोस्फीयर सबसे ज्यादा एक्टिव है। यहाँ इलेक्ट्रिकली चार्ज्ड कण की मात्रा लगातार बदलती रहती है। कभी ये कण ज्यादा होते हैं, कभी कम। जैसा कि पहले बताया गया है, यह सिर्फ मोबाइल फोन या कार नेविगेशन के लिए ही प्रॉब्लम नहीं है, बल्कि किसी एयरक्राफ्ट की सटीक लैंडिंग के लिए भी रिस्क लेने जैसा है, इस रिस्क को खत्म कर GPS सिग्नल्स को सटीक बनाना का काम GAGAN करता है।
GAGAN कैसे काम करता है?
आइए समझते हैं कि GAGAN कोई GPS सिस्टम नहीं है। यह GPS पर ही रखे गए एक इंटेलिजेंट करेक्शन सिस्टम की तरह काम करता है। अगर हम स्मार्टफोन का उदाहरण लें, तो यह ‘ऑटोकरेक्ट’ जैसा है। GPS एक सिग्नल भेजता है, GAGAN सिर्फ यह देखता है कि यह जानकारी पूरी तरह सही है या नहीं। अगर कोई गलती मिलती है, तो यह सिग्नल के एयरक्राफ्ट तक पहुँचने से पहले उसे ठीक कर देता है। एक तरह से यह एक फैक्ट चेकर की भूमिका निभाता है। इसका काम सिग्नल भेजना नहीं है।
इस सिस्टम में 15 रेफरेंस स्टेशन अहम भूमिका निभाते हैं, जो पूरे भारत में अलग-अलग जगहों पर मौजूद हैं। इन स्टेशनों को GPS सिग्नल मिलते हैं। इन स्टेशनों की असली लोकेशन पहले से तय होती हैं और सेंटीमीटर लेवल तक सटीक होती हैं। इसलिए उन्हें अपनी लोकेशन के बारे में पहले से ही बहुत सटीक जानकारी होती है। इस दौरान, वे लगातार GPS सिग्नल से उनकी तुलना करते रहते हैं ताकि यह देखा जा सके कि GPS उनकी लोकेशन सही दिखा रहा है या नहीं। इसलिए यह जरूरी है कि GPS लोकेशन असली (पहले मापी गई) लोकेशन से मेल खाए।
अगर GPS में थोड़ा सा भी बदलाव दिखता है, तो GPS इसे गलती मान लेता है। यह काम सभी स्टेशन करते हैं। वहाँ से डेटा इकट्ठा होकर एक मास्टर कंट्रोल स्टेशन तक पहुँचता है। यहाँ का कंप्यूटर पूरे देश से मिले डेटा की समीक्षा करता है और यह पता लगाता है कि GPS सिग्नल में कितनी गलती है। इसके बाद इस गलती को ठीक करके एक करेक्शन डेटा तैयार किया जाता है।
हालाँकि यह करेक्शन डेटा सीधे एयरक्राफ्ट को नहीं भेजा जाता है। इसे सबसे पहले ISRO के GSAT-8 और GSAT-10 जैसे जियोस्टेशनरी सैटेलाइट को भेजा जाता है। ये सैटेलाइट धरती से करीब 36000 km की ऊँचाई पर एक ही जगह पर रहकर पूरे भारतीय इलाके को कवर करते हैं। यह सैटेलाइट करेक्शन डेटा एयरक्राफ्ट को भेजता है। फिर पायलट इसी डेटा के आधार पर लैंडिंग के लिए आगे बढ़ता है।
इसके अलावा GAGAN एक और काम भी करता है। यह लगातार चेक करता है कि GPS से आ रहे सिग्नल सही हैं या नहीं। अगर इसमें कोई गलती मिलती है, तो यह तुरंत एयरक्राफ्ट को चेतावनी देता है कि इस समय इस जानकारी पर भरोसा नहीं किया जा सकता, इस सिस्टम को ‘इंटीग्रिटी मॉनिटरिंग’ कहते हैं। इसे एक सेफ्टी फीचर के तौर पर रखा गया है।
ISRO की मदद से देश में ही बनाए गए इस सिस्टम की मदद से एयरक्राफ्ट ज्यादा आसानी से सही और सुरक्षित तरीके से लैंड कर पाएँगे और इससे एयर ट्रैफिक मैनेजमेंट भी आसान हो जाएगा। पिछले दस सालों में भारत में सैकड़ों एयरपोर्ट जोड़े गए हैं। लेकिन सरकार भी जानती है कि सिर्फ एयरपोर्ट बनाने से काम नहीं चलता। एविएशन इंडस्ट्री के डेवलपमेंट के लिए ऐसी सभी चीजें जरूरी हैं। नए भारत में इन सभी पर काम चल रहा है।
(यह लेख मूलरूप से गुजराती में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
दिल्ली सरकार ने नई EV पॉलिसी 2026–2030 को मंजूरी दे दी है। इसके तहत इलेक्ट्रिक वाहनों की खरीद में बंपर छूट के साथ सब्सिडी दी जाएगी। 30 लाख तक की इलेक्ट्रिक वाहनों पर कोई रोड टैक्स नहीं लगेगा। यहाँ तक कि रजिस्ट्रेशन फीस भी नहीं देना होगा। 1 जुलाई 2026 से ये पॉलिसी लागू हो जाएगी और 31 मार्च 2030 तक रहेगी।
इसका मकसद राजधानी में वायु प्रदूषण कम करना, पेट्रोल-डीजल वाहनों पर निर्भरता घटाना और इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना है। रेखा गुप्ता सरकार का कहना है कि अगले चार वर्षों में इस पर लगभग ₹15,000 करोड़ खर्च किए जाएँगे।
दिल्ली कैबिनेट ने दिल्ली EV पॉलिसी 2026 को मंजूरी दी है। यह नीति 1 जुलाई 2026 से 31 मार्च 2030 तक लागू रहेगी।
Delhi EV Policy के मुख्य प्रावधान:
✅ ₹30 लाख तक की इलेक्ट्रिक कारों पर रोड टैक्स और रजिस्ट्रेशन फीस पूरी तरह माफ़ ✅ EV खरीद पर ₹30,000 से ₹1 लाख तक प्रोत्साहन राशि… pic.twitter.com/X8wCokumR8
₹30 लाख तक की इलेक्ट्रिक कारों पर रोड टैक्स और रजिस्ट्रेशन शुल्क में 100% छूट दी गई है। इससे EV खरीदने की शुरुआती लागत कम हो जाएगी। नई नीति के तहत जनवरी 2027 में सिर्फ ई-ऑटो का रजिस्ट्रेशन होगी जबकि अप्रैल 2028 से दोपहिया वाहनों का रजिस्ट्रेशन किया जाएगा। इलेक्ट्रिक टू व्हीलर के खरीदारों को पहले साल ₹30,000, दूसरे साल ₹20,000 और तीसरे साल ₹10,000 की सब्सिडी मिलेगी।
स्क्रैपेज (पुरानी गाड़ी हटाने) पर प्रोत्साहन
पुरानी BS-IV या उससे पुराने वाहन को स्क्रैप कर नया EV खरीदने को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने वाहनों की खरीद में छूट दी है। कार के लिए अधिकतम ₹100000 तक का स्क्रैपेज इंसेंटिव दिया जा रहा है।
दोपहिया और तिपहिया वाहनों के लिए भी अलग-अलग प्रोत्साहन राशि का ऐलान किया गया है। इसमें दो पहिया वाहनों के लिए ₹10000, तिपहिया वाहनों के लिए ₹25000, चार पहिया वाहनों के लिए ₹100000, N1 ट्रक के लिए ₹50000 और ग्रामीण सेवा वाहन के लिए ₹15000 इंसेंटिव की घोषणा की गई है।
इलेक्ट्रिक ऑटो और थ्री व्हीलर को लेकर बदलाव
1 जनवरी 2027 से दिल्ली में नए रजिस्ट्रेशन केवल इलेक्ट्रिक ऑटो के होंगे। CNG और पेट्रोल ऑटो के नए रजिस्ट्रेशन बंद कर दिए जाएँगे। नई EV पॉलिसी के मुताबिक, खरीदारों को पहले साल ₹50,000, दूसरे साल ₹40,000 और तीसरे साल ₹30,000 की सब्सिडी दी जाएगी। अधिकारियों ने साफ कहा है कि हाइब्रिड वाहनों के लिए कोई सब्सिडी नहीं मिलेगी। यह पॉलिसी पूरी तरह से जीरो इमिशन वाहनों के लिए है।
दिल्ली की नई नीति के तहत चरणबद्ध तरीके से प्लान लागू होंगे। इसमें 1 जनवरी 2027 से केवल इलेक्ट्रिक ऑटो रिक्शा का ही रजिस्ट्रेशन होगा। जबकि 1 अप्रैल 2028 से नए पेट्रोल या CNG दोपहिया वाहनों का रजिस्ट्रेशन बंद होगा। इसके बाद केवल इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों का नया रजिस्ट्रेशन होगा।
चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार
सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशन बढ़ाए जाएँगे। बैटरी स्वैपिंग और चार्जिंग नेटवर्क को मजबूत किया जाएगा। स्कूलों और कई व्यावसायिक वाहनों के लिए चरणबद्ध तरीके से EV अपनाने के लक्ष्य तय किए गए हैं। कैबिनेट के फैसले की जानकारी देते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि यह एक ऐतिहासिक दिन है और राज्य को पॉलिसी से ₹15,000 करोड़ के निवेश की उम्मीद है।
EV खरीदने पर लागत कम हो जाएगी। लोगों को रोड टैक्स और रजिस्ट्रेशन शुल्क में बचत होगी। पुरानी गाड़ी स्क्रैप करने पर अतिरिक्त रकम मिलेगा। वैसे भी इलेक्ट्रिक वाहन को चलाने की लागत पेट्रोल-डीजल की तुलना में काफी कम होती है। इससे शहर को वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण से मुक्ति मिलने की उम्मीद है। चार्जिंग स्टेशन बढ़ने से EV इस्तेमाल करना आसान होगा।
30 लाख की कार पर 5 लाग की बचत
दिल्ली में फिलहाल रोड टैक्स की बात करें तो ₹6 लाख तक की पेट्रोल कार पर 4 फीसदी, ₹10 लाख तक की कार पर 7 फीसदी और ₹10 लाख से ऊपर की कार पर 10 फीसदी रोड टैक्स लिया जाता है। ऐसे में अब दिल्ली के लोगों को ₹30 लाख तक की इलेक्ट्रिक कार खरीदने पर ₹3 लाख रोड टैक्स और रजिस्ट्रेशन फीस, ₹1लाख पुरानी कार की स्क्रैप और ₹1लाख की सब्सिडी यानी कुल मिलाकर ₹5 लाख तक की बचत हो जाएगी।
नई EV पॉलिसी क्यों लाई गई?
दिल्ली दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में एक मानी जाती है। खासकर सर्दियों में तो शहर के दमघोंटू हवा में दिल्ली वासियों का जीना मुहाल हो जाता है। सरकार का कहना है कि वाहनों से निकलने वाला धुआँ प्रदूषण का बड़ा कारण है।
गौरतलब है कि दिसंबर 2025 में सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, सर्दियों में पीएम 2.5 स्तर पर था। इसमें वाहनों के इमिशन की हिस्सेदारी करीब 46-53 फीसदी थी।
दिल्ली में हर साल करीब 5 लाख पेट्रोल-डीजल के वाहन बिकते हैं, जबकि मात्र 70 हजार इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री होती है। परिवहन विभाग का मानना है कि नई नीति से लाखों वाहन इलेक्ट्रिक में बदल जाएँगे या सड़क से बाहर होंगे। इससे वायु प्रदूषण कम करने में मदद मिलेगी। इतना ही नहीं, लोगों को जाम से भी निजात मिलेगी।
ई-वाहनों का नया बाजार तैयार होगा। कई नामी गिरामी कंपनियों ने इलेक्ट्रिक कारों, ऑटो, छोटे व्यावसायिक वाहनों को बाजार में उतार दिया है। कई कंपनियाँ अपने प्रोडक्ट लेकर बाजार में उतरने की तैयारी कर रही हैं। इन्हें दिल्ली की EV नीति से काफी फायदा होगा। चार्जिंग स्टेशन में बढोतरी से काफी फायदा होगा।
पेट्रोल-डीजल की खपत पर भी इसका असर पड़ेगा। जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटेगी और इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग और रोजगार को बढ़ावा मिलेगा। हाल ही में कई कंपनियों ने ई- मॉडल पेश किए हैं। 32 हजार चार्जिंग स्टेशन बनाए जाने से इन्हें फायदा होगा और रोजगार के मौके बढ़ेंगे।
दिल्ली में दूसरे राज्यों की तुलना में सब्सिडी ज्यादा है। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश समेत कई राज्यों ने अपनी वाहन नीति घोषित कर दी है। पेट्रोल-डीजल के वाहनों को हतोत्साहित किया गया है और इलेक्ट्रिक वाहनों में सब्सिडी दी गई है।
EV पॉलिसी 2020 और EV पॉलिसी 2026 में अंतर
2020 EV पॉलिसी में पूरा जोर सब्सिडी और स्वैच्छिक EV अपनाने पर था जबकि अब प्रोत्साहन के साथ कई क्षेत्रों में अनिवार्य बदलाव की समय-सीमा तय की गई है। 2020 में EV खरीद पर सब्सिडी और रोड टैक्स में छूट दी गई थी, लेकिन अब स्क्रैपेज, इंसेंटिव और रजिस्ट्रेशन फ्री जैसी आकर्षक छूट दी गई है। दमघोंटू हवा से दिल्ली को मुक्त कराने के लिए अब रेखा सरकार की प्रतिबद्धता दिख रही है।
पहले पेट्रोल के दोपहिया वाहनों और CNG ऑटो पर कोई तय प्रतिबंध नहीं था, लेकिन अब 2027 से नए इलेक्ट्रिक ऑटो और 2028 से नए इलेक्ट्रिक दोपहिया अनिवार्य किए गए हैं। पहले चार्जिंग नेटवर्क विकसित करने पर जोर था, लेकिन अब चार्जिंग नेटवर्क के साथ बड़े पैमाने पर फ्लीट विद्युतीकरण और नियामकीय बदलाव शामिल किए गए हैं।
3 साल तक दिल्ली के बाहर नहीं बेचे जा सकते ई-वाहन
नई ईवी नीति का मकसद दिल्ली को देश का अग्रणी EV शहर बनाना है। ई-वाहन खरीदते समय सब्सिडी और स्क्रेपिंग पॉलिसी का फायदा सिर्फ दिल्लावालों को मिलेगा। वाहन खरीदते समय वोटर आई कार्ड, आधार कार्ड दिखाना होगा। दिल्ली की सीएम रेखा गुप्ता के मुताबिक, इन वाहनों को 3 साल तक दिल्ली से बाहर नहीं बेचा जा सकता है। परिवहन विभाग एनओसी इससे पहले जारी नहीं करेगा।
परिवहन कमिश्नर निहारिका राय के मुताबिक, सब्सिडी, स्क्रैप और दूसरी प्रोत्साहन राशि ग्राहक के बैंक अकाउंट में डीबीटी के माध्यम से सीधा भेजी जाएगी। सब्सिडी पाने वाले को इसके लिए ईवी पोर्टल पर अप्लाई करना होगा। इसके लिए नया ईवी पोर्टल तैयार किया गया है, जिसे 1 जुलाई 2026 को लॉन्च किया जा रहा है। ग्राहक को अप्लाई करने के 60 दिनों के भीतर रकम मिल जाएगी।
दिल्ली सरकार चाहती है कि ये वाहन दिल्ली में ही चलाए जाएँ, ताकि दिल्ली को प्रदूषण से राहत मिल सके। जानकारों के मुताबिक, दिल्ली से सभी पेट्रोल- डीजल वाहनों के आवागमन को रोक दिया जाए और ई-वाहनों को ही जाने दिया जाए, तो दिल्ली का प्रदूषण आधा हो जाएगा। दरअसल सीएनजी वाहनों में भी कुछ हद तक धुआँ निकलता है, लेकिन इलेक्ट्रिक वाहन पूरी तरह इससे मुक्त होते हैं। दरअसल ये फैसला दिल्ली को स्वच्छ बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।
अल-नीनो को चकमा देते हुए मॉनसून अंततः भारत में दस्तक दे चुका है। चाय-पकौड़ों का मौसम आने लगा है। इधर कई राज्यों में बरसात होने लगी है। वहीं, अमेरिकी महाद्वीप में गोलों की बौछार जारी है। बरसात के चलते गोवा में मछली पकड़ने पर रोक लगने लगी है। मछुआरे अपनी नावें तटों पर बांध चुके हैं। तमाम छोटे-बड़े बारों में बीयर लिए दिन भर की थकान मिटाते लोग हैं। उनके बीच चर्चा का विषय है – फीफा विश्व कप। वहीं, केरल में लोगों ने सड़कों पर मेसी, नेमार व रोनाल्डो के आदमकद पोस्टर लगाए हैं। चारों तरफ विभिन्न टीमों की जर्सियां पहने लोग हैं। लोगों ने अपने वाहनों व मकानों को अपनी पसंदीदा टीम के रंग में रंग लिया है। क्या बच्चे, क्या बुजुर्ग; फीफा फीवर सभी के सिर चढ़कर बोल रहा है।
गुजरे दो हफ्तों में हर तरफ बस फीफा विश्व कप के ही किस्से गूंज रहे हैं। जैसे-जैसे विश्व कप आगे बढ़ता जा रहा है, माहौल और भी मजेदार होता जा रहा है। पहले तो हमें ग्रुप चरण के अंतिम छह मुकाबले देखने को मिले। फिर, बीती रात, Round of 32 का पहला मुकाबला खेला गया।
ग्रुप एल के अंतिम दो मैच खेले जाने थे। पहले मैच में इंग्लैंड ने ज्यूड बेलिंघम व हैरी केन के गोलों की मदद से पनामा को 2-0 से हराया। अगला मुकाबला फिलाडेल्फिया में क्रोएशिया व घाना के मध्य खेला जाना था। इस शानदार मैच में 2-1 से क्रोएशियाई टीम की जीत होती है। इन परिणामों के आधार पर इंग्लैंड, क्रोएशिया व घाना अगले दौर में जगह बनाने में सफल हो जाते हैं।
वहीं, ग्रुप के के अंतिम दो मैच भी खेले गए। पहले मैच में मियामी के मैदान में पुर्तगाल की टीम का सामना कोलंबिया से था। यहां, सभी को चौंकाते हुए कोलंबिया ने पुर्तगाल के खिलाफ काफी बढ़िया फुटबॉल खेली। हालांकि मैच ड्रॉ रहा, परन्तु कोलंबिया इस मुकाबले में लगभग हर मामले में पुर्तगाल पर भारी नजर आया। पुर्तगाली टीम, जो टूर्नामेंट की शुरुआत से पहले जीत की प्रबल दावेदार मानी जा रही थी, अब तक आशा के अनुरूप प्रदर्शन करती नजर आई नहीं है। उन्हें ट्रॉफी जीतने के लिए आगे काफी मशक्कत करनी होगी। गौरतलब है कि अपने ग्रुप में पुर्तगाली टीम, कोलंबिया के ठीक पीछे, दूसरे स्थान पर रही। इस ग्रुप का अगला मैच DR CONGO व उज़्बेकिस्तान के बीच खेला गया। यहां योआन विस्सा के दो बेहतरीन गोलों की बदौलत DR CONGO, मैच में वापसी करते हुए, उज़्बेकिस्तान को 3-1 से हरा कर अगले दौर में जगह बनाने में सफल रहा। इस ग्रुप से कोलंबिया, पुर्तगाल व DR CONGO अगले दौर में जगह बनाने में सफल रहे।
अंततः, ग्रुप जे के दो अंतिम मैच खेले गए। इस ग्रुप के पहले मैच में अल्जीरिया का सामना ऑस्ट्रिया से था। यह बेहद ही हाई वोल्टेज ड्रामा वाला मैच रहा, जिसमें नब्बे मिनटों में दोनों टीमों द्वारा कुल छह गोल दागे गए। यह मैच 3-3 से ड्रॉ रहा। आगे, अगले मैच में, डल्लास स्टेडियम में अर्जेंटीना की टीम जॉर्डन के खिलाफ मैदान में उतरी। क्योंकि अर्जेंटीना पहले ही अगले दौर में जगह बना चुकी है, इसलिए इस मैच में कोच लियोनेल स्कालोनी ने अपनी स्टार्टिंग लाइन-अप में सात-आठ परिवर्तन किए थे। लियोनेल मेसी को भी मैच के शुरू होते वक्त बेंच पर ही रखा गया था। इसके बावजूद अर्जेंटीना यह मैच 3-1 से जीत गया। लियोनेल मेसी विश्व कप में लगातार सात मैचों में गोल करने वाले इकलौते खिलाड़ी बन गए। इस शानदार जीत के संग पिछले विश्व कप की विजेता अर्जेंटीनी टीम ने भी अगले दौर में जगह बना ली। इस ग्रुप से अर्जेंटीना, ऑस्ट्रिया व अल्जीरिया अगले दौर में जगह बनाने में सफल रहे।
गौरतलब है कि अफ्रीकी महाद्वीप की दस में से नौ टीमें Round of 32 में जगह बनाने में सफल रहीं। ग्रुप स्टेज में एक ओर कई मुकाबले ड्रॉ होते दिखे तो वहीं दूसरी ओर कई हाई स्कोरिंग मुकाबले भी हुए। इस टूर्नामेंट की अब तक की खासियत यह रही कि कमोबेश छोटी टीमों ने अपने खेल के बूते तमाम खेलप्रेमियों का दिल जीत लिया। कई नए और अपेक्षाकृत कम चर्चित खिलाड़ियों ने भी अपने शानदार प्रदर्शन से सबका ध्यान अपनी ओर खींचा। इक्वाडोर का जर्मनी को हरा देना। Cape Verde का एक कठिन ग्रुप से भी अगले दौर में जगह बना लेना। यह सब लंबे समय तक याद रखा जाएगा।
आगे, आज रात (भारतीय समयानुसार रात साढ़े बारह बजे) Round of 32 का पहला मुकाबला खेला गया। लॉस एंजिलिस स्टेडियम में मेजबान राष्ट्रों में शुमार कनाडा का मुकाबला था दक्षिण अफ्रीका की टीम से। इस मैच में गेंद ज्यादातर अपने पास रखते हुए भी दक्षिण अफ्रीका कुछ खास कर न सकी। उन्होंने कनाडा के गोलपोस्ट पर छह बार आक्रमण किया, लेकिन केवल दो ही प्रयास निशाने पर रहे और दोनों को कीपर ने शानदार तरीके से रोक दिया। कनाडाई टीम ने आक्रामक फुटबॉल खेलते हुए चौदह दफा विरोधी गोलपोस्ट पर शॉट लगाए, जिनमें से सात निशाने पर रहे। लेकिन नब्बे मिनटों में भी कोई टीम गोल नहीं कर सकी थी। कनाडा ने मैच की शुरुआत से ही कई बार गोल करने के अवसर बनाए, मगर दक्षिण अफ्रीकी कप्तान, जो कि टीम के गोलकीपर हैं, ने कई शानदार बचाव करते हुए अपनी टीम को मैच में बनाए रखा। दूसरे हाफ में उन्होंने एक शानदार वन-ऑन-वन सेव भी किया। उनकी रक्षापंक्ति ने भी आज काफी बढ़िया रक्षात्मक खेल दिखाया।
एक वक्त तो ऐसा प्रतीत हो रहा था कि नॉकआउट चरण का पहला ही मैच एक्स्ट्रा टाइम तक चला जाएगा। सभी की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी। लेकिन तभी, मैच के 90+2 मिनट पर कनाडा की टीम मैदान की दाईं दिशा से गेंद को लेकर आगे बढ़ती दिखी। अंदर की दिशा में एक क्रॉस डाला गया जिस पर एक दफा फिर दक्षिण अफ्रीका ने अच्छा बचाव किया। गेंद दक्षिण अफ्रीकी “डी” के बाहर की ओर गई। लेकिन तभी, कनाडाई मिडफील्डर स्टीफन एस्ताक्वियो ने मौका पाते ही एक जोरदार राइट फुटर किक लगा कर गेंद को गोलपोस्ट के भीतर भेज दिया।
इस गोल के साथ लॉस एंजिलिस से लेकर ओटावा तक खुशियों की लहर सी दौड़ गई। कनाडाई समर्थकों की खुशी का ठिकाना न रहा। कनाडा यह मैच 1-0 से जीत कर अगले दौर में चली गई। यह पहली दफा है जब कनाडा ने नॉकआउट चरण का मैच जीत लिया है। दक्षिण अफ्रीका की टीम अच्छा खेल दिखा कर भी आज टूर्नामेंट से वापसी करने को मजबूर हो गई।
अब, आज, भारतीय समयानुसार रात साढ़े दस बजे, Round of 32 का अगला मैच खेला जाएगा। आज ह्यूस्टन स्टेडियम में अपनी पारंपरिक पीली जर्सी पहने सेलेकाओ के खिलाड़ी समुराई ब्लूज़ से दो-दो हाथ करते नजर आएंगे। मकसद होगा यह मैच जीत कर सफलतापूर्वक अगले दौर में जगह बनाना। दोनों ही टीमें आज रात मैदान में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देंगी।
एकतरफ पांच बार की विजेता ब्राजील है, जो सदैव खिताब के दावेदारों में शामिल होती है, वहीं दूसरी ओर जापान रूपी एशियाई तूफान होगा, जिसको आप हल्के में लेने की भूल नहीं कर सकते। जापान की टीम एक बार फिर चाहेगी कि दाईची कमाडा व अयासे ऊएडा, जो अब तक टूर्नामेंट में उनके टॉप स्कोरर रहे हैं, जल्द से जल्द उन्हें इस मैच में जरूरी बढ़त दिला दें ताकि ब्राजील पर दबाव बनाया जा सके। लेकिन विनीसीयस व माथियूस कुन्हा भी गजब फॉर्म में हैं। सो, ब्राजील भी चाहेगा कि तुरंत गोल कर के मैच को अपनी दिशा में मोड़ लिया जाए। यह एक ऐसा मुकाबला होगा जिसमें अंतिम व्हिस्ल बजने तक रोमांच अपने चरम पर रहने की पूरी उम्मीद है। यहां अंतिम व्हिस्ल बजने तक एक घमासान युद्ध होगा। मनोरंजन होना गारंटीड है।
आगे, आज रात भारतीय समयानुसार रात दो बजे, जर्मनी अपने नॉकआउट चरण का पहला मैच खेलने पेराग्वे के विरुद्ध बोस्टन स्टेडियम में उतरेगी। सन् 2014 में जर्मनी ने अर्जेंटीना को हराकर ट्रॉफी जीती थी। उसके बाद यह पहली दफा होगा कि जर्मन टीम नॉकआउट चरण का कोई मैच खेलेगी। पेराग्वे अपने इतिहास में कुल पांच बार नॉकआउट चरण में पहुंचा है, परन्तु अब तक वह नॉकआउट चरण में गोल स्कोर करने में नाकाम रहे हैं। वह निश्चित ही आज रात इस दाग को मिटाने का प्रयास करेंगे। ग्रुप स्टेज के अंतिम मैच में मिली हार को भुलाकर जर्मनी, बोस्टन में खेले जाने वाले इस मैच में, एक बड़ी जीत से सभी को सचेत करना चाहेगी कि उन्हें हल्के में लेने की भूल न की जाए।
आगे, कल सवेरे भारतीय समयानुसार साढ़े छह बजे, नीदरलैंड्स का सामना होगा एटलस लायंस से। नीदरलैंड्स व मोरक्को दोनों ही टीमों ने ग्रुप चरण में अच्छे खेल का प्रदर्शन करते हुए अपने-अपने ग्रुप में सात-सात अंक हासिल किए थे। मोरक्को ने पिछली दफा बेल्जियम, स्पेन व पुर्तगाल को हराते हुए सेमीफाइनल तक का सफर तय किया था। वहीं, डच टीम भी इस दफा फिर अच्छी फुटबॉल खेलती नजर आई है। मेक्सिको में कल जरूर एक बेहद जबरदस्त मैच होना तय है।
इस दफा पहली बार टूर्नामेंट के इतिहास में, 48 टीमें होने के चलते, Round of 32 खेला जा रहा है। और, इस राउंड में कई रोचक मुकाबले खेले जाने वाले हैं। नीदरलैंड्स और मोरक्को के बीच होने वाला यह मुकाबला भी उन्हीं में से एक होगा। दोनों ही टीमें जीत के लिए लालायित हैं। दोनों ही टीमें अंतिम क्षणों तक जीत के लिए प्रयासरत रहेंगी। ब्राजील बनाम जापान के साथ-साथ फुटबॉल प्रेमियों की नजरें इस मुकाबले पर भी टिकी रहेंगी।
अब तो हर मैच ही रोचक होगा। अब तो हर मैच में कुछ भी हो सकता है। एक अच्छा दिन किसी भी टीम की किस्मत बना या बिगाड़ सकता है। अब, लगातार बेहतरीन फुटबॉल देखने को मिलेगी। बने रहिए साथ, क्योंकि……..the party has just begun!
भारत की विदेश नीति को लेकर एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है, जब कॉन्ग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने तीखा हस्तक्षेप किया। शनिवार (27 जून 2026) को द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित अपने एक लेख में वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता ने नरेंद्र मोदी सरकार पर जोरदार हमला बोला।
उन्होंने पश्चिम एशिया में जारी मानवीय संकट पर सरकार के रुख की आलोचना करते हुए कहा कि इजरायल द्वारा किए जा रहे ‘गाजा नरसंहार’ पर उसकी ‘पत्थर जैसी चुप्पी’ और निष्क्रियता न केवल नैतिक रूप से निंदनीय है, बल्कि राष्ट्रीय हित के दृष्टिकोण से भी समझ से परे है।
उन्होंने दावा किया कि अपनी ऐतिहासिक जियोपॉलिटिकल नीतियों से हटकर भारत ने फिलिस्तीन, ईरान और व्यापक पश्चिम एशियाई क्षेत्र में अपने लंबे समय से चले आ रहे सहयोगियों को खुद से दूर कर लिया है।
उनका तर्क था कि इस कूटनीतिक तौर पर पीछे हटने के कारण से भारत वैश्विक जनमत से भी दूर हो गया है, जबकि पाकिस्तान ने इस खाली जगह का फायदा उठाकर खुद को एक मध्यस्थ के रूप में स्थापित करने की कोशिश की है।
उनका मानना है कि ऐतिहासिक रूप से क्षेत्र के सभी प्रमुख पक्षों के साथ भारत के मैत्रीपूर्ण संबंधों को देखते हुए यह भूमिका स्वाभाविक रूप से भारत की होनी चाहिए थी।
अपने संपादकीय में गाँधी ने विशेष रूप से प्रधानमंत्री के कूटनीतिक कार्यक्रम को निशाना बनाते हुए कहा कि ईरान को लेकर अमेरिका-इजरायल की संयुक्त सैन्य कार्रवाइयों से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इजरायल दौरा एक हैरान करने वाला रणनीतिक निर्णय था।
उन्होंने कहा कि भारतीय राष्ट्र की भावना यह माँग करती है कि वह उन फिलिस्तीनियों के पक्ष में आवाज उठाए, जिनके बच्चों को इतनी निर्ममता से निशाना बनाया गया है। अपने तर्कों को आधार देने के लिए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय निष्कर्षों का भी हवाला दिया।
उन्होंने लिखा कि सितंबर 2025 में संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जाँच आयोग ने निष्कर्ष निकाला था कि इज़रायली अधिकारी गाजा में नरसंहार कर रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि जून 2026 में इसी आयोग ने, जिसकी अध्यक्षता अब सेवानिवृत्त भारतीय न्यायविद न्यायमूर्ति एस मुरलीधर कर रहे हैं, उन निष्कर्षों को दोहराया और विशेष रूप से सबसे कम उम्र के नागरिकों पर पड़े भारी असर पर ध्यान केंद्रित किया।
लेख का स्क्रीनशॉट
संयुक्त राष्ट्र के निष्कर्षों का हवाला देते हुए गाँधी ने लिखा, “94 पन्नों की यह रिपोर्ट बेहद भयावह है, जिसमें गाजा में इजरायल द्वारा मचाई गई तबाही की भयावह तस्वीर और उसकी कार्रवाई के पीछे मौजूद नरसंहार की मंशा का विवरण दिया गया है। कम से कम 20,000 बच्चों की मौत हो चुकी है और 44000 अन्य बच्चे घायल हुए हैं, जिनमें से कई पूरी जिंदगी के लिए गंभीर रूप से प्रभावित हो गए हैं।”
उन्होंने दावा किया कि बच्चों को निशाना बनाना एक सोची-समझी रणनीति है। उन्होंने कहा, “मारे गए या घायल हुए लोगों में 27 प्रतिशत बच्चे हैं और कई लड़कों के सिर और गर्दन पर गोली लगने के निशान पाए गए। गाजा के 97 प्रतिशत स्कूल नष्ट कर दिए गए हैं।”
उन्होंने यह भी कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं के ढाँचे के नष्ट होने के कारण गर्भपात और प्रसव संबंधी जटिलताओं के मामलों में 300 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। हालाँकि गाँधी ने अक्टूबर 2023 में हमास द्वारा इजरायल पर किए गए हमले को कायरतापूर्ण, भयावह और पूरी तरह अस्वीकार्य हमला बताया, लेकिन उनका कहना था कि इसके बाद इजरायली सशस्त्र बलों की जवाबी कार्रवाई बेलगाम क्रूरता और बर्बरता से भरी रही है।
उन्होंने लिखा, “प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से लेकर उनके वरिष्ठ कैबिनेट सहयोगियों तक, इजरायल के कई वरिष्ठ नेताओं ने गाजा की पूर्ण घेराबंदी और पूरी तरह विनाश की माँग की है, फिलिस्तीनियों को जानव’ बताया है जिनका अस्तित्व में रहने का कोई अधिकार नहीं है और इजरायल की सफलता की परिभाषा लाखों लोगों के गाजा छोड़कर भाग जाने को बताया है।”
कॉन्ग्रेस के शीर्ष नेताओं ने ओप-एड का किया समर्थन
सोनिया गाँधी के इन विचारों को कॉन्ग्रेस के शीर्ष नेताओं का भी जल्द ही मजबूत समर्थन मिल गया। उन्होंने इस अवसर का इस्तेमाल भारत की वैश्विक कूटनीतिक प्राथमिकताओं में बदलाव की माँग उठाने के लिए किया।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इस लेख को साझा करते हुए कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इसे बेहद प्रभावशाली बताया और कहा कि यह लेख इस बात की “कड़ी याद दिलाता है कि हमारी मौजूदा विदेश नीति ने फिलिस्तीन, ईरान और व्यापक मध्य-पूर्व क्षेत्र में हमारे ऐतिहासिक सहयोगियों को हमसे दूर कर दिया है।”
Congress Parliamentary Party Chairperson, Smt. Sonia Gandhi's evocative piece calling out Modi Govt's silence and inaction for our Palestinian brothers and sisters whose children have been brutally targeted is a stark reminder of how our current foreign policy has alienated our… pic.twitter.com/VSWCA0qJPv
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने भी इस संपादकीय को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर साझा किया, ताकि इसका संदेश डिजिटल मंचों पर अधिक से अधिक लोगों तक पहुँच सके।
उन्होंने लिखा, “अपने इस संपादकीय के माध्यम से कॉन्ग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गाँधी जी ने भारत से अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को फिर से स्थापित करने, मानवीय मूल्यों को कायम रखने और गाजा के मुद्दे पर नैतिक स्पष्टता के साथ अपनी आवाज उठाने का आह्वान किया है।”
वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेतृत्व द्वारा किए गए इस समन्वित अभियान से संकेत मिलता है कि कॉन्ग्रेस पार्टी पश्चिम एशिया को लेकर सरकार की नीति को राजनीतिक संघर्ष का एक प्रमुख मुद्दा बनाने की तैयारी में है।
“We are slipping further into Israel’s strategic orbit, at a time when the world is increasingly pivoting away from it. The Prime Minister’s visit to Israel will go down in history as a bewildering strategic decision.
अंतरराष्ट्रीय संबंधों का मार्गदर्शन वैचारिक भावुकता के बजाय ठोस राष्ट्रीय सुरक्षा हितों से होना चाहिए। पिछले तीन दशकों में भारत और इजरायल के बीच एक मजबूत साझेदारी विकसित हुई है।
हालाँकि भारत ने 1950 में इजरायल को मान्यता दे दी थी, लेकिन दोनों देशों के बीच पूर्ण राजनयिक संबंध 1992 में स्थापित हुए। इसके बाद से रक्षा, प्रौद्योगिकी, कृषि, साइबर सुरक्षा और व्यापार जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के संबंधों का उल्लेखनीय विस्तार हुआ है।
वर्तमान सरकार के कार्यकाल में भारत, इजरायल से हथियार खरीदने वाला सबसे बड़ा देश बन गया है। वहीं दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 1992 में 20 करोड़ अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2024 तक 6 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक हो गया।
इस आर्थिक और रक्षा साझेदारी को सितंबर 2025 में हस्ताक्षरित द्विपक्षीय निवेश संधि का भी समर्थन मिला, जिसने पेट्रोलियम, रसायन, इंजीनियरिंग उत्पादों और पॉलिश किए गए हीरों जैसे क्षेत्रों में व्यापार को और गति दी है।
सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि राष्ट्रीय संकट के गंभीर समय में, जब दुनिया की अन्य बड़ी शक्तियाँ तत्काल सहायता देने से हिचकिचा रही थीं, तब इजरायल ने लगातार एक भरोसेमंद और महत्वपूर्ण रक्षा साझेदार होने का प्रमाण दिया है।
इजरायल के साथ भारत के रक्षा संबंधों का इतिहास काफी पुराना है। इसकी शुरुआत 1962 से मानी जाती है, जब चीन के साथ युद्ध के दौरान इजरायल ने भारत को सैन्य सहायता प्रदान की थी।
इसके बाद 1999 में पाकिस्तान के साथ कारगिल युद्ध के दौरान इजरायल ने भारतीय वायुसेना (IAF) को सर्चर मानव रहित हवाई वाहन (Unmanned Aerial Vehicle) और जगुआर तथा मिराज स्क्वाड्रनों के लिए निगरानी प्रणालियाँ उपलब्ध कराई थीं।
साल 2014 के बाद से भारत और इजरायल के बीच रक्षा संबंधों में और तेजी आई है। इजरायल के कुल हथियार निर्यात का लगभग 42.1 प्रतिशत हिस्सा भारत को जाता है, जबकि अज़रबैजान, वियतनाम और अमेरिका उसके अन्य प्रमुख रक्षा ग्राहक हैं।
भारत की इजरायल के साथ साझेदारी केवल रक्षा क्षेत्र तक सीमित नहीं है। हालाँकि भारत का निर्यात कुछ प्रमुख क्षेत्रों में केंद्रित है, जिनमें रत्न एवं आभूषण, विशेष रूप से कटे और पॉलिश किए गए हीरे शामिल हैं, जिन्हें इजरायल के बड़े हीरा व्यापार केंद्रों में भेजा जाता है।
इसके अलावा पेट्रोलियम उत्पाद, ऑर्गेनिक केमिकल्स, प्लास्टिक और इंजीनियरिंग उत्पाद भी भारत के प्रमुख निर्यात का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। हाल के वर्षों में इजरायल को भारत के निर्यात में तेज गिरावट दर्ज की गई है।
माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इजरायल दौरा विभिन्न रणनीतिक समझौतों और साझेदारियों के जरिए एक बार फिर दोनों देशों के बीच व्यापार और भारतीय निर्यात को गति दे सकता है।
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत-इजरायल पार्टनरशिप ने कैसे मदद की
इस रक्षा साझेदारी का व्यावहारिक महत्व ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पूरी तरह सामने आया। यह संघर्ष 22 अप्रैल 2025 को पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों द्वारा पहलगाम की बैसरन घाटी में किए गए घातक आतंकी हमले के बाद तेजी से बढ़ गया, जिसमें सीमा पार से आए आतंकियों ने 26 हिंदू पर्यटकों की हत्या कर दी थी।
इस उकसावे के जवाब में भारतीय सशस्त्र बलों ने ऑपरेशन सिंदूर नाम से एक सटीक और तीव्र जवाबी सैन्य कार्रवाई शुरू की, जिसका उद्देश्य पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (POK) में लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद द्वारा चलाए जा रहे आतंकी ढाँचे और लॉन्च पैड्स को नष्ट करना था।
7 मई को रात 1:05 बजे शुरू हुआ यह 23 मिनट का अभियान दुश्मन के ठिकानों पर सटीक हमले करने और संभावित जवाबी हमलों से भारतीय हवाई क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्वदेशी और रूसी प्रणालियों के साथ-साथ अत्याधुनिक इज़रायली तकनीक पर भी काफी हद तक निर्भर था। इस अभियान की सफलता सुनिश्चित करने में इजरायल के सैन्य उपकरणों ने निर्णायक भूमिका निभाई:
हारोप लोइटरिंग म्यूनिशन्स (Harop Loitering Munitions): भारतीय सशस्त्र बलों ने इजरायल में निर्मित हारोप कामिकाज़े ड्रोन तैनात किए, जिन्हें विशेष रूप से दुश्मन की वायु रक्षा प्रणालियों और रडार इकाइयों को नष्ट करने के लिए डिजाइन किया गया है।
ये ड्रोन लक्ष्य क्षेत्र के ऊपर नौ घंटे तक मंडराने में सक्षम हैं और 50 पाउंड के वारहेड से लैस होते हैं। उच्च स्तर की स्वायत्त क्षमता से युक्त इन ड्रोन ने ऑपरेशन के दौरान लाहौर में स्थित पाकिस्तान की एक महत्वपूर्ण वायु रक्षा सुविधा पर सफलतापूर्वक हमला कर उसे नष्ट कर दिया।
हेरॉन Mk2 यूएवी (Heron Mk2 UAVs): निगरानी और टोही अभियानों के लिए भारतीय वायुसेना ने हेरॉन Mk2 ड्रोन का इस्तेमाल किया, जो 35000 फीट तक की ऊँचाई पर उड़ान भर सकते हैं और 40 घंटे से अधिक समय तक लगातार हवा में रह सकते हैं।
अग्रिम सैन्य ठिकानों से संचालित इन लंबी अवधि तक उड़ान भरने वाले ड्रोन ने दुर्गम उत्तरी क्षेत्र में वास्तविक समय (रियल-टाइम) खुफिया जानकारी, लक्ष्य की पहचान (टारगेट एक्विजिशन) और हमले के बाद हुए नुकसान का आकलन (बैटल डैमेज असेसमेंट) उपलब्ध कराया। साथ ही ये पारंपरिक जमीनी विमानभेदी हथियारों की पहुँच से सुरक्षित दूरी पर रहकर अपना मिशन पूरा करते रहे।
स्काईस्ट्राइकर ड्रोन (SkyStriker Drones): इजरायल की एल्बिट सिक्योरिटी सिस्टम्स और भारत की बेंगलुरु स्थित अल्फा डिजाइन टेक्नोलॉजीज़ की साझेदारी में निर्मित इन शांत, विद्युत चालित (इलेक्ट्रिक प्रोपेल्ड) लोइटरिंग म्यूनिशन्स का इस्तेमाल गुप्त रूप से कम ऊँचाई पर सटीक हमले करने के लिए किया गया।
5 से 10 किलोग्राम तक के बम ले जाने में सक्षम इन ड्रोन ने उन परिस्थितियों में भी विशिष्ट सामरिक लक्ष्यों पर सफलतापूर्वक हमला किया, जहाँ GPS सिग्नल बाधित थे।
बराक-8 मिसाइल रक्षा प्रणाली (Barak 8 Missile Defence System): भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और इजरायल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज (IAI) द्वारा संयुक्त रूप से विकसित बराक-8 लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली ने देश की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जब पाकिस्तान ने जवाबी कार्रवाई के तहत दिल्ली को निशाना बनाते हुए फतह-II बैलिस्टिक मिसाइल दागी, तब बराक-8 प्रणाली ने हरियाणा के सिरसा के ऊपर ही उस आने वाली मिसाइल को सफलतापूर्वक रोककर नष्ट कर दिया।
स्पाइस-2000 प्रिसिजन बम किट्स: भारतीय लड़ाकू विमानों ने इजरायल द्वारा विकसित स्पाइस-2000 गाइडेंस किट्स का इस्तेमाल कर सामान्य जनरल-पर्पज़ बमों को स्मार्ट, फायर-एंड-फॉरगेट (दागो और भूल जाओ) क्षमता वाले अत्यधिक सटीक स्टैंड-ऑफ हथियारों में बदल दिया।
उन्नत सीन-मैचिंग एल्गोरिदम की मदद से इन बमों ने आतंकी ठिकानों की इमारतों की छतों को बेहद सटीकता से भेदते हुए निशाना बनाया, जबकि आसपास के नागरिक इलाकों को होने वाले नुकसान को न्यूनतम रखा गया।
टेवर X95 असॉल्ट राइफल्स : जमीनी अभियानों के दौरान मरीन कमांडो (MARCOS) और गरुड़ कमांडो सहित भारतीय विशेष बलों की चुनिंदा इकाइयों को भारत में लाइसेंस के तहत निर्मित कॉम्पैक्ट, बुलपप डिजाइन वाली टेवर X95 असॉल्ट राइफलों से लैस किया गया था।
इन राइफलों ने नजदीकी दूरी पर चलाए गए सुरक्षा अभियानों (क्लोज-क्वार्टर्स ऑपरेशंस) के दौरान उच्च विश्वसनीयता और बेहतर गतिशीलता (मैन्युवरेबिलिटी) प्रदान की।
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान मिली निर्णायक सफलता, जिसमें लगभग 100 आतंकवादी मारे गए थे, जिनमें जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर के करीबी रिश्तेदार और शीर्ष कमांडर तथा लश्कर-ए-तैयबा के रणनीतिकार अबू जुंदाल भी शामिल थे, इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि इज़रायली रक्षा तकनीक भारत की सैन्य तैयारियों और परिचालन क्षमता का कितना महत्वपूर्ण और गहराई से जुड़ा हिस्सा बन चुकी है।
भारत की द्वि-राष्ट्र नीति और राष्ट्रीय हित
भारत आधिकारिक रूप से दो-राष्ट्र समाधान (टू-स्टेट सॉल्यूशन) का समर्थन करता है, जिसमें इजरायल और फिलिस्तीन दोनों को मान्यता देने तथा संवाद और कूटनीति के माध्यम से शांतिपूर्ण समाधान का पक्ष लिया जाता है।
इस दृष्टिकोण से भारतीय राज्य का प्राथमिक दायित्व अपने नागरिकों की सुरक्षा करना, अपनी सीमाओं की रक्षा करना और अपने आर्थिक हितों को सुरक्षित रखना है। दूरस्थ वैचारिक विवादों में गहराई से शामिल होने से कोई स्पष्ट रणनीतिक लाभ नहीं मिलता और इससे महत्वपूर्ण रक्षा आपूर्ति श्रृंखलाओं को रोकने का जोखिम भी पैदा हो सकता है।
भारत की लंबे समय से चली आ रही आधिकारिक कूटनीतिक नीति एक स्पष्ट और संतुलित दो-राष्ट्र नीति (Two-State Policy) रही है, जिसके तहत एक स्वतंत्र और व्यवहार्य फिलिस्तीन के साथ-साथ एक सुरक्षित और मान्यता प्राप्त इजरायल को औपचारिक मान्यता देने का समर्थन किया जाता है।
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस संतुलित कूटनीतिक रुख को बनाए रखने से आगे बढ़कर, क्षेत्र की आंतरिक राजनीतिक परिस्थितियाँ या सैन्य संघर्ष बाहरी मामले हैं। ऐसे में भारत पर इजरायल जैसे महत्वपूर्ण रक्षा साझेदार के खिलाफ आक्रामक और एकतरफा रुख अपनाने का दबाव बनाना देश की व्यावहारिक राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति और हितों को कमजोर करने वाला कदम माना जाता है।
कॉन्ग्रेस का मुस्लिम तुष्टीकरण का इतिहास रहा है जो देश के हितों को नजरअंदाज करता है
कॉन्ग्रेस का गाज़ा जैसे अंतरराष्ट्रीय संघर्षों पर अत्यधिक ध्यान वैश्विक रणनीति से अधिक उसकी लंबे समय से चली आ रही अल्पसंख्यक वोट-बैंक की राजनीति का परिणाम माना जाता है। आलोचकों का तर्क है कि इस राजनीतिक सोच के कारण पार्टी अक्सर राष्ट्रीय हितों के बजाय घरेलू चुनावी समीकरणों को प्राथमिकता देती है। यह आरोप स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों से ही कॉन्ग्रेस पर लगता रहा है।
आलोचकों के अनुसार, समान न्याय के बजाय राजनीतिक प्रभावों को प्राथमिकता देने की यह प्रवृत्ति स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के शासनकाल में भी दिखाई देती है। दिसंबर 1948 के ऐतिहासिक अभिलेख बताते हैं कि नेहरू ने 1946 के डायरेक्ट एक्शन डे के दौरान कलकत्ता में हुई सांप्रदायिक हिंसा के प्रमुख जिम्मेदार नेताओं में गिने जाने वाले हुसैन शहीद सुहरावर्दी के विरुद्ध चल रहे 50 लाख रुपए के आयकर चोरी के मामले में व्यक्तिगत हस्तक्षेप किया था।
12 दिसंबर 1948 को तत्कालीन वित्त मंत्री जॉन मथाई को लिखे अपने आधिकारिक पत्र में नेहरू ने आयकर कार्रवाई को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि यदि सुहरावर्दी के खिलाफ कठोर वित्तीय कार्रवाई की गई, तो इसका भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के मुस्लिम नेताओं पर राजनीतिक प्रभाव पड़ सकता है। पत्र में उन्होंने लिखा:
“सुहरावर्दी के संबंध में जो भी कार्रवाई की जाएगी, उसके कुछ सार्वजनिक परिणाम होंगे। ऐसी हर कार्रवाई की प्रतिक्रिया भारत और पाकिस्तान दोनों में होगी।”
इसके बाद उन्होंने वित्त मंत्रालय से सुहरावर्दी की संपत्तियों की कुर्की की कार्रवाई रोकने का आग्रह किया।
आलोचकों के अनुसार, इस हस्तक्षेप के परिणामस्वरूप सुहरावर्दी भारत में अपनी व्यावसायिक संपत्तियाँ बेचने, बड़ी कर देनदारी से बचने और सुरक्षित रूप से पाकिस्तान जाने में सफल रहे, जहाँ बाद में वे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भी बने।
उनके आलोचक यह भी कहते हैं कि यह निर्णय उन लोगों के प्रति नरमी का उदाहरण था जिन्हें 1946 की सांप्रदायिक हिंसा में हजारों हिंदुओं की मौत के लिए जिम्मेदार माना जाता है।
UPA की विरासत और आधुनिक चुनावी माहौल
कॉन्ग्रेस का गाज़ा जैसे अंतरराष्ट्रीय संघर्षों पर अत्यधिक ध्यान वैश्विक रणनीति से अधिक उसकी लंबे समय से चली आ रही अल्पसंख्यक वोट-बैंक की राजनीति का परिणाम माना जाता है। आलोचकों का तर्क है कि इस राजनीतिक सोच के कारण पार्टी अक्सर राष्ट्रीय हितों के बजाय घरेलू चुनावी समीकरणों को प्राथमिकता देती है। यह आरोप स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों से ही कॉन्ग्रेस पर लगता रहा है।
आलोचकों के अनुसार, समान न्याय के बजाय राजनीतिक प्रभावों को प्राथमिकता देने की यह प्रवृत्ति स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के शासनकाल में भी दिखाई देती है।
दिसंबर 1948 के ऐतिहासिक अभिलेख बताते हैं कि नेहरू ने 1946 के डायरेक्ट एक्शन डे के दौरान कलकत्ता में हुई सांप्रदायिक हिंसा के प्रमुख जिम्मेदार नेताओं में गिने जाने वाले हुसैन शहीद सुहरावर्दी के विरुद्ध चल रहे 50 लाख रुपए के आयकर चोरी के मामले में व्यक्तिगत हस्तक्षेप किया था।
12 दिसंबर 1948 को तत्कालीन वित्त मंत्री जॉन मथाई को लिखे अपने आधिकारिक पत्र में नेहरू ने आयकर कार्रवाई को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि यदि सुहरावर्दी के खिलाफ कठोर वित्तीय कार्रवाई की गई, तो इसका भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के मुस्लिम नेताओं पर राजनीतिक प्रभाव पड़ सकता है। पत्र में उन्होंने लिखा:
“सुहरावर्दी के संबंध में जो भी कार्रवाई की जाएगी, उसके कुछ सार्वजनिक परिणाम होंगे। ऐसी हर कार्रवाई की प्रतिक्रिया भारत और पाकिस्तान दोनों में होगी।”
इसके बाद उन्होंने वित्त मंत्रालय से सुहरावर्दी की संपत्तियों की कुर्की की कार्रवाई रोकने का आग्रह किया।
आलोचकों के अनुसार, इस हस्तक्षेप के परिणामस्वरूप सुहरावर्दी भारत में अपनी व्यावसायिक संपत्तियाँ बेचने, बड़ी कर देनदारी से बचने और सुरक्षित रूप से पाकिस्तान जाने में सफल रहे, जहाँ बाद में वे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भी बने।
उनके आलोचक यह भी कहते हैं कि यह निर्णय उन लोगों के प्रति नरमी का उदाहरण था जिन्हें 1946 की सांप्रदायिक हिंसा में हजारों हिंदुओं की मौत के लिए जिम्मेदार माना जाता है।
सोनिया गाँधी के फॉर्मूलों पर बीजेपी का पलटवार
सोनिया गाँधी के लेख के जवाब में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने तीखा पलटवार करते हुए कॉन्ग्रेस नेतृत्व पर आरोप लगाया कि वह अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों में भी घरेलू वोट-बैंक की राजनीति घुसाने का प्रयास कर रही है।
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने कॉन्ग्रेस पर मानवीय संवेदनाओं को चुनिंदा तरीके से अपनाने का आरोप लगाया। मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा,
“सोनिया गाँधी गाजा के मुसलमानों के लिए आवाज उठाती हैं, रफाह पर ट्वीट करती हैं, लेकिन ढाका में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों पर पूरी तरह चुप रहती हैं। इससे साफ पता चलता है कि उनके लिए विदेश नीति भी वोट-बैंक की राजनीति के हिसाब से तय होती है।”
भाजपा का कहना है कि कॉन्ग्रेस और विपक्ष के ऐसे सार्वजनिक बयान राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित हैं। पार्टी के अनुसार, इन बयानों का मकसद जनता को गुमराह करना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को कमजोर करना है। भाजपा का आरोप है कि विपक्ष देश के दीर्घकालिक रक्षा सहयोग, रणनीतिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय हितों से ऊपर अल्पकालिक चुनावी लाभ को प्राथमिकता देता है।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
दुनिया के अधिकांश पंथों और धार्मिक परंपराओं में ईश्वर को सर्वशक्तिमान, अलिप्त, अचल और मानवीय सीमाओं से परे माना जाता है। वहाँ ईश्वर पूजा का केंद्र तो होता है लेकिन वह मनुष्य जैसा जीवन नहीं जीता। उसे भूख नहीं लगती, वह बीमार नहीं पड़ता, उसे विश्राम की आवश्यकता नहीं होती। लेकिन सनातन परंपरा इस दृष्टि से अलग खड़ी दिखाई देती है।
यहाँ भगवान केवल पूजे नहीं जाते, उन्हें जिया जाता है। वे जन्म लेते हैं, बाल्यकाल बिताते हैं, मित्र बनते हैं, प्रेम करते हैं, विवाह करते हैं, युद्ध करते हैं, शोक करते हैं, विश्राम करते हैं और कुछ परंपराओं में तो वे बीमार भी पड़ते हैं। यही कारण है कि सनातन में मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं बल्कि भगवान का निवास माने जाते हैं और उनकी सेवा किसी मूर्ति की नहीं बल्कि एक जीवंत सत्ता की तरह की जाती है।
इसी जीवंत परंपरा का सबसे अद्भुत उदाहरण ओडिशा के पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा से पहले आने वाला वह 15 दिन का काल है, जब करोड़ों भक्तों के आराध्य भगवान जगन्नाथ स्वयं दर्शन देना बंद कर देते हैं। मंदिर के द्वार बंद हो जाते हैं और माना जाता है कि भगवान बीमार हैं।
लेकिन सवाल उठता है कि आखिर इन 15 दिनों में भगवान रहते कहाँ हैं और उनके साथ क्या होता है? इस प्रश्न का उत्तर हमें स्नानयात्रा, अनसर और जगन्नाथ परंपरा की उस अनूठी दुनिया में लेकर जाता है जहाँ भगवान और भक्त के बीच दूरी नहीं, बल्कि आत्मीयता है।
देव स्नान पूर्णिमा: जब भगवान स्वयं स्नान करने आते हैं बाहर
सनातन परंपरा में प्रत्येक मास की पूर्णिमा का महत्व माना गया है, लेकिन ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को विशेष रूप से देव स्नान पूर्णिमा कहा जाता है। पुरी में इसी दिन भगवान जगन्नाथ की प्रसिद्ध स्नान यात्रा आयोजित होती है। यह वह अवसर होता है जब भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को गर्भगृह से बाहर लाकर स्नान मंडप पर विराजमान किया जाता है।
स्नान मंडप पर विराजमान भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा (फोटो साभार: shreekhetra.com)
इस पूरे अनुष्ठान को ‘पहंडी विजय’ कहा जाता है। ढोल, मृदंग, शंखध्वनि और वैदिक मंत्रों के बीच देव विग्रहों को बाहर लाने का दृश्य लाखों श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत भावुक और दुर्लभ माना जाता है। इसके बाद शुरू होता है महास्नान। परंपरा के अनुसार, मंदिर परिसर के स्वर्णकूप से जल लाया जाता है और 108 कलशों से भगवानों का अभिषेक किया जाता है।
मान्यता के अनुसार, इनमें से 35 कलश भगवान जगन्नाथ, 33 बलभद्र, 22 देवी सुभद्रा और शेष 18 कलश सुदर्शन चक्र के लिए होते हैं। जल में चंदन, पुष्प, कपूर, केसर और सुगंधित द्रव्य मिलाकर उसे विशेष मंत्रों से अभिमंत्रित किया जाता है।
क्या है कथा और मान्यता?
भगवान जगन्नाथ के बीमार होने की परंपरा से जुड़ी एक अत्यंत रोचक और भावनात्मक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि पुरी में माधव दास नाम के एक महान भक्त रहते थे। उनका पूरा जीवन भगवान जगन्नाथ की भक्ति में समर्पित था और वे मंदिर के प्रसाद से ही अपना निर्वाह करते थे। एक बार माधव दास को तेज बुखार हो गया।
शरीर कमजोर होता गया, लेकिन उनकी भक्ति में कोई कमी नहीं आई। लोग उन्हें बार-बार वैद्य के पास जाकर इलाज कराने की सलाह देते, लेकिन उनका उत्तर हमेशा एक ही होता, “जब स्वयं मेरे प्रभु मेरा ध्यान रख रहे हैं, तो मुझे किसी और सहारे की आवश्यकता नहीं है।” धीरे-धीरे बीमारी इतनी बढ़ गई कि एक दिन वे अचेत होकर गिर पड़े।
मान्यता है कि उसी समय स्वयं भगवान जगन्नाथ उनके पास पहुँचे और उनकी सेवा करने लगे। उन्होंने उनकी देखभाल की, उन्हें संभाला और उनके कष्ट को कम किया। कुछ समय बाद जब माधव दास को होश आया और उन्होंने देखा कि उनकी सेवा कोई और नहीं बल्कि स्वयं भगवान कर रहे हैं, तो वे भावुक हो उठे।
प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार: AI)
उन्होंने विनम्रता से पूछा, “प्रभु, आप मेरे लिए इतना कष्ट क्यों उठा रहे हैं?” तब भगवान जगन्नाथ ने कहा, “मैं अपने भक्तों का साथ कभी नहीं छोड़ता। लेकिन संसार का नियम है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्मों का फल भोगना पड़ता है। तुम्हारी बीमारी अभी पंद्रह दिन और चलने वाली थी, इसलिए तुम्हारा दुख कम करने के लिए मैं उसे अपने ऊपर ले रहा हूँ।”
कहा जाता है कि यह घटना ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन हुई थी। तभी से यह मान्यता चली आ रही है कि इस दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को विशेष स्नान कराया जाता है, जिसके बाद वे अस्वस्थ हो जाते हैं। इसके बाद भगवान लगभग पंद्रह दिनों तक भक्तों को दर्शन नहीं देते और एकांत में विश्राम करते हैं।
हाथी बेश: जब भगवान धारण करते हैं गणेश स्वरूप
महास्नान के तुरंत बाद भगवानों का श्रृंगार किया जाता है। पहले उन्हें सादा बेश पहनाया जाता है और उसके बाद प्रसिद्ध ‘हाथी बेश’ या ‘गज वेश’ होता है। लोकमान्यता के अनुसार, महाराष्ट्र से आए गणपति उपासक विनायक भट्ट ने भगवान जगन्नाथ के गणेश स्वरूप के दर्शन की इच्छा व्यक्त की थी।
कहा जाता है कि उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने पुजारियों को स्वप्न में संकेत दिया और तब से महास्नान के बाद भगवान को गजानन स्वरूप में सजाने की परंपरा शुरू हुई। यह केवल श्रृंगार नहीं बल्कि सनातन की उस व्यापक दृष्टि का प्रतीक माना जाता है जिसमें विभिन्न देव रूप एक-दूसरे से अलग नहीं बल्कि एक ही दिव्य चेतना के विस्तार माने जाते हैं।
स्नान के बाद बीमार पड़ जाते हैं भगवान
यहीं से शुरू होता है जगन्नाथ परंपरा का सबसे रहस्यमय और भावनात्मक अध्याय। मान्यता है कि 108 कलशों से शीतल जल के महास्नान के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा को ज्वर हो जाता है। इसके बाद वे सार्वजनिक दर्शन देना बंद कर देते हैं। इसे ‘अनसर’ या ‘अनवसर’ काल कहा जाता है।
यह सुनने में आधुनिक संवेदनाओं से प्रतीकात्मक लग सकता है, लेकिन सनातन दर्शन में इसका गहरा अर्थ है। यहाँ भगवान सर्वशक्तिमान होते हुए भी अपने भक्तों के जीवन से अलग नहीं हैं। वे मनुष्य के अनुभवों को स्वीकार करते हैं। वे बताते हैं कि दिव्यता दूरी नहीं, निकटता का नाम है।
अनसर घर: आखिर इन 15 दिनों में भगवान रहते कहाँ हैं?
स्नान यात्रा के बाद तीनों देव विग्रहों को मंदिर परिसर के भीतर स्थित विशेष कक्ष में ले जाया जाता है जिसे ‘अनसर घर’ कहा जाता है। यहीं भगवान अगले लगभग 15 दिनों तक विश्राम करते हैं। इस दौरान मंदिर के सामान्य दर्शन बंद रहते हैं और केवल चुनिंदा सेवायतों को ही प्रवेश की अनुमति होती है।
विशेष रूप से दैतापति सेवक इस अवधि में भगवान की सेवा करते हैं। इस सेवा को ‘गुप्त सेवा’ या ‘गुप्त रीति’ भी कहा जाता है। इन दिनों भगवान को औषधीय पेय, जड़ी-बूटियों से बने विशेष भोग, दशमूल मोदक और फुलुरी तेल अर्पित किया जाता है। मान्यता यह है कि जैसे घर में कोई सदस्य बीमार हो तो उसकी देखभाल होती है, वैसे ही भगवान की भी होती है।
बंद दरवाजों के पीछे क्या होता है?
अनसर काल केवल विश्राम नहीं है, यह मंदिर की सबसे गोपनीय सेवाओं में से एक माना जाता है। इस दौरान भगवान के विग्रहों पर विशेष उपचारात्मक और सौंदर्य संबंधी सेवाएँ की जाती हैं। पारंपरिक रूप से देव विग्रहों के रंगों और स्वरूप की भी देखभाल की जाती है।
कुछ परंपराओं के अनुसार, इस अवधि में भगवान के विग्रहों का पुनः अलंकरण और नवीनीकरण भी किया जाता है, क्योंकि इस दौरान भगवान दर्शन नहीं देते, इसलिए मंदिर में उनके स्थान पर विशेष पटचित्र रूपों की पूजा होती है जिन्हें ‘अनसर पट्टी’ कहा जाता है। इसमें भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के चित्र स्वरूप को पूजित किया जाता है।
यह व्यवस्था केवल धार्मिक नहीं बल्कि एक गहरे दार्शनिक विचार को भी व्यक्त करती है कि रूप बदल सकता है, उपस्थिति नहीं।
नवयौवन दर्शन: जब भगवान फिर लौटते हैं भक्तों के बीच
लगभग पंद्रह दिनों के विश्राम और उपचार के बाद भगवान पहली बार फिर दर्शन देते हैं। इस अवसर को ‘नवयौवन दर्शन’ कहा जाता है। मान्यता है कि अब भगवान पूर्णतः स्वस्थ होकर नए यौवन और नई ऊर्जा के साथ भक्तों के सामने आते हैं।
इसके अगले दिन भव्य रथयात्रा निकलती है, जिसमें भगवान स्वयं मंदिर से बाहर आकर जनता के बीच पहुँचते हैं। यह शायद दुनिया की उन दुर्लभ धार्मिक परंपराओं में से एक है जहाँ भक्त भगवान तक नहीं पहुँचते बल्कि भगवान स्वयं भक्तों तक आते हैं।
ओडिशा रथयात्रा (फोटो साभार: Brittanica)
सनातन की जीवंत ईश्वर परंपरा: ईश्वर और भक्त के रिश्ते का सबसे अनोखा दर्शन
जगन्नाथ की यह पूरी परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि सनातन के दर्शन को समझने की कुंजी है। सनातन में मूर्ति केवल प्रतीक नहीं है। ‘अर्चावतार’ की अवधारणा कहती है कि भगवान भक्त के प्रेम के लिए स्वयं को सुलभ बना लेते हैं।
इसलिए मंदिरों में भगवान को जगाया जाता है, स्नान कराया जाता है, वस्त्र पहनाए जाते हैं, भोजन कराया जाता है, विश्राम कराया जाता है और कभी-कभी उनकी चिकित्सा भी की जाती है। यह विचार कहता है कि ईश्वर दूर बैठा हुआ राजा नहीं, जीवन के हर अनुभव में सहभागी है।
शायद इसी वजह से जगन्नाथ परंपरा करोड़ों लोगों को यह अनुभव कराती है कि भगवान सर्वशक्तिमान होने के बावजूद इतने अपने हो सकते हैं कि साल में एक बार बीमार भी पड़ जाएँ और भक्त उनके ठीक होने का इंतजार करें।
दुनिया की अधिकांश धार्मिक परंपराओं और पंथों में ईश्वर को एक ऐसी सत्ता के रूप में देखा जाता है जो सर्वशक्तिमान है, पूर्ण है, समय और प्रकृति के नियमों से परे है। वह सृष्टि का निर्माता है लेकिन सृष्टि की सीमाओं से बंधा नहीं है। वह जन्म नहीं लेता, उसे भूख नहीं लगती, वह थकता नहीं, उसे विश्राम या उपचार की आवश्यकता नहीं होती।
वह मनुष्य को देखता है, उसका मार्गदर्शन करता है, लेकिन स्वयं मनुष्य के अनुभवों का हिस्सा नहीं बनता। इस दृष्टि में ईश्वर और मनुष्य के बीच एक निश्चित दूरी बनी रहती है। यानी कि श्रद्धा होती है, समर्पण होता है, लेकिन निकटता सीमित होती है। इसके विपरीत सनातन परंपरा ईश्वर के साथ संबंध की एक बिल्कुल अलग कल्पना प्रस्तुत करती है।
यहाँ भगवान केवल पूजे जाने वाले देव नहीं हैं, बल्कि जीवन के सहभागी हैं। वे इतने दूर नहीं हैं कि केवल ध्यान में महसूस किए जाएँ और इतने छोटे भी नहीं कि केवल एक प्रतिमा तक सीमित हो जाएँ। सनातन में भगवान स्वयं भक्त के संसार में उतरते हैं।
जगन्नाथ का संदेश: दिव्यता दूरी नहीं, अपनापन भी है
वे अवतार लेते हैं, जन्म लेते हैं, बचपन जीते हैं, माता-पिता का स्नेह पाते हैं, मित्र बनाते हैं, प्रेम करते हैं, विवाह करते हैं, युद्ध लड़ते हैं, वनवास जाते हैं, वियोग सहते हैं, शोक करते हैं और कभी-कभी तो मनुष्य की तरह थकते और विश्राम भी करते हैं।
इसीलिए श्रीराम केवल ईश्वर नहीं हैं, वे पुत्र भी हैं, शिष्य भी हैं, पति भी हैं और राजा भी। श्रीकृष्ण केवल विष्णु के अवतार नहीं हैं, वे यशोदा के लाडले बालक हैं, सुदामा के मित्र हैं, अर्जुन के सारथी हैं और गोपियों के प्रिय भी हैं। भगवान शिव केवल संहारक नहीं हैं, वे पिता हैं, पति हैं, तपस्वी हैं और परिवार के साथ कैलाश पर रहने वाले देव भी हैं।
यही वह भाव है जो सनातन को केवल दर्शन नहीं बल्कि संबंध का धर्म बनाता है। इसी परंपरा का शायद सबसे जीवंत और अद्भुत उदाहरण भगवान जगन्नाथ हैं। पुरी में भगवान को केवल प्रतिमा मानकर पूजा नहीं जाती, बल्कि उन्हें एक जीवित राजा, परिवार के सदस्य और स्वयं भगवान के रूप में सेवा दी जाती है।
उनका जागरण होता है, उन्हें स्नान कराया जाता है, भोजन कराया जाता है, वस्त्र बदले जाते हैं, विश्राम कराया जाता है और वर्ष में एक समय ऐसा भी आता है जब माना जाता है कि भगवान अस्वस्थ हो गए हैं। ज्येष्ठ पूर्णिमा पर होने वाले महास्नान के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को ज्वर हो जाता है।
इसके बाद वे सार्वजनिक दर्शन बंद कर देते हैं और लगभग पंद्रह दिनों तक अनसर गृह में विश्राम करते हैं। उन्हें औषधि दी जाती है, विशेष आहार दिया जाता है और सीमित सेवायत उनकी सेवा करते हैं। पहली नजर में यह एक धार्मिक कथा या अनुष्ठान लग सकता है, लेकिन इसके भीतर सनातन का बहुत गहरा दार्शनिक संदेश छिपा है।
यह परंपरा मानती है कि यदि भगवान केवल सर्वशक्तिमान रह जाएँ और मनुष्य के अनुभवों से कभी न गुजरें, तो भक्त उनके प्रति श्रद्धा तो रख सकता है, लेकिन अपनापन नहीं महसूस कर पाएगा। इसलिए भगवान स्वयं अपने भक्त के संसार में आते हैं। वे यह दिखाते हैं कि दिव्यता का अर्थ दूरी नहीं, निकटता भी हो सकता है।
जगन्नाथ का बीमार पड़ना वास्तव में भगवान की कमजोरी का नहीं, बल्कि भक्त के प्रति उनके स्नेह का प्रतीक माना जाता है। यह संदेश है कि जो ईश्वर पूरे जगत का पालन करता है, वही भक्त के प्रेम के लिए अपने आपको इतना सहज और मानवीय बना सकता है कि उसकी सेवा भी की जा सके।
शायद यही कारण है कि सनातन में भक्त केवल भगवान से प्रार्थना नहीं करता, वह उनकी देखभाल भी करता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सेशेल्स यात्रा के दौरान भारत और इस द्वीपीय देश के बीच कई महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। इनमें सबसे ज्यादा चर्चा यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) को लेकर हुए समझौते की रही।
इस समझौते के बाद सेशेल्स भी उन देशों की सूची में शामिल हो गया है, जहाँ भारत का डिजिटल भुगतान सिस्टम पहुँच रहा है और सेशेल्स दशवाँ ऐसा देश बन गया है जहाँ ये डिजिटल पेमेंट की सविधा पहुँच गई है।
इसे पहले नौ और देश है जहाँ UPI का इस्तेमाल हो रहा है जिनमें सिंगापुर, UAE, फ्रांस, मॉरीशस, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, कतर, कंबोडिया जैसे देश शामिल है। यह समझौता ऐसे समय हुआ है, जब यूपीआई ने अपने 10 साल पूरे किए हैं।
अप्रैल 2016 में शुरू हुआ यह प्लेटफॉर्म आज दुनिया का सबसे बड़ा रियल-टाइम डिजिटल पेमेंट सिस्टम बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) भी यूपीआई को ट्रांजैक्शन के लिहाज से दुनिया का सबसे बड़ा रियल-टाइम पेमेंट प्लेटफॉर्म मान चुका है। यह केवल एक पेमेंट सिस्टम का विस्तार नहीं, बल्कि भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को दुनिया तक पहुँचाने की बड़ी रणनीति का हिस्सा है।
भारत पहले ही आधार, डिजिलॉकर और UPI जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म कई देशों के साथ साझा करने के लिए सहयोग समझौते कर चुका है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर UPI क्या है, यह कैसे काम करता है, दुनिया के किन देशों तक पहुँच चुका है और भारत को इससे क्या फायदा होगा?
UPI क्या है और यह कैसे काम करता है?
यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) एक रियल-टाइम डिजिटल भुगतान प्रणाली है, जिसे नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ने विकसित किया है। इसकी शुरुआत अप्रैल 2016 में हुई थी। इसका मकसद लोगों को मोबाइल के जरिए सीधे बैंक खाते से तुरंत पैसे भेजने और प्राप्त करने की सुविधा देना था।
UPI को 11 अप्रैल 2016 को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की निगरानी में नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ने लॉन्च किया था। इसका उद्देश्य अलग-अलग बैंकों के खातों के बीच रियल टाइम डिजिटल भुगतान को आसान बनाना था।
UPI की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें बैंक खाते का नंबर या IFSC कोड याद रखने की जरूरत नहीं होती। उपयोगकर्ता केवल मोबाइल नंबर, क्यूआर कोड या वर्चुअल पेमेंट एड्रेस (VPA) के जरिए भुगतान कर सकता है।
पैसा कुछ ही सेकंड में एक बैंक खाते से दूसरे बैंक खाते में पहुँच जाता है। यही वजह है कि आज छोटे दुकानदार से लेकर बड़े कारोबारी तक UPI का इस्तेमाल कर रहे हैं।
2016 से अब तक कैसे बदला UPI का सफर?
UPI की शुरुआत अप्रैल 2016 में हुई थी, लेकिन आज जिस रूप में यह दिखाई देता है, वहाँ तक पहुँचने के लिए इसे कई चरणों में विकसित किया गया।
पहला चरण (2016): शुरुआत और बुनियाद तैयार करना
अप्रैल 2016 में जब UPI लॉन्च हुआ था, तब केवल 21 बैंक इससे जुड़े थे। पहले महीने पूरे नेटवर्क पर सिर्फ 373 ट्रांजैक्शन हुए थे। वित्त वर्ष 2016-17 में कुल करीब 2 करोड़ ट्रांजैक्शन हुए जिनकी कुल कीमत केवल 0.07 लाख करोड़ रुपए थी।
शुरुआत में इससे जुड़े कुछ ही बैंक थे और लोगों के लिए यह बिल्कुल नया सिस्टम था। उसी साल दिसंबर में BHIM ऐप लॉन्च किया गया, जिससे सरकार ने डिजिटल भुगतान को बढ़ावा दिया।
दूसरा चरण (2017-2019): बड़े ऐप्स की एंट्री और तेज विस्तार
इस दौरान फोनपे, गूगल पे और पेटीएम जैसे ऐप तेजी से लोकप्रिय हुए। लगभग सभी बड़े बैंक UPI नेटवर्क से जुड़ गए। क्यूआर कोड के जरिए भुगतान आसान हुआ और दुकानों, बाजारों व छोटे कारोबारियों तक UPI पहुँचने लगा।
तीसरा चरण (2020-2022): गाँवों और हर वर्ग तक पहुँच
कोरोना महामारी के दौरान संपर्क रहित भुगतान की माँग बढ़ी, जिससे UPI का इस्तेमाल रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया। गाँवों और छोटे शहरों में भी डिजिटल भुगतान तेजी से बढ़ा। फीचर फोन उपयोगकर्ताओं के लिए UPI 123PAY और छोटे ऑफलाइन भुगतान के लिए UPI Lite जैसी सुविधाएँ शुरू की गईं।
चौथा चरण (2022-2024): नई सेवाएँ और क्रेडिट सुविधा
इस दौरान UPI, ऑटोपे, UPI पर रुपे क्रेडिट कार्ड और UPI पर क्रेडिट लाइन जैसी सुविधाएँ शुरू हुईं। इससे लोग केवल भुगतान ही नहीं, बल्कि सब्सक्रिप्शन, ऑटोमैटिक पेमेंट और डिजिटल क्रेडिट जैसी सेवाओं का भी लाभ लेने लगे।
आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। मार्च 2026 तक यूपीआई नेटवर्क से 703 बैंक जुड़ चुके हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में यूपीआई के जरिए 24,162 करोड़ से अधिक ट्रांजैक्शन हुए, जिनकी कुल कीमत करीब 314 लाख करोड़ रुपये रही।
यानी 10 वर्षों में ट्रांजैक्शन की संख्या लगभग 12,000 गुना और कुल लेनदेन मूल्य 4,000 गुना से ज्यादा बढ़ चुका है। आज भारत के करीब 85 प्रतिशत डिजिटल भुगतान यूपीआई के जरिए होते हैं और रोजाना औसतन 66 करोड़ डिजिटल ट्रांजैक्शन इसी प्लेटफॉर्म पर किए जाते हैं।
पाँचवाँ चरण (2024 से आगे): दुनिया तक पहुँच और AI का दौर
अब UPI केवल भारत तक सीमित नहीं है। सिंगापुर, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मॉरीशस, UAE, कतर, फ्रांस, कंबोडिया और अब सेशेल्स जैसे देशों तक इसका विस्तार हो रहा है।
NPCI अब AI आधारित वॉयस पेमेंट, बहुभाषी समर्थन, धोखाधड़ी का पता लगाना और डिजिटल क्रेडिट पर काम कर रहा है। वर्तमान में UPI प्रतिदिन 75 करोड़ से अधिक ट्रांजैक्शन संभालता है और लक्ष्य इसे 1 अरब रुपए ट्रांजैक्शन तक पहुँचाने का है।
किन-किन देशों तक पहुँच चुका है भारत का UPI?
पिछले कुछ सालों में UPI भारत की सीमाओं से निकलकर वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना रहा है। भारतीय पर्यटक और व्यापारी अब सिंगापुर, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मॉरीशस, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर, फ्रांस और कंबोडिया जैसे देशों में UPI के जरिए मर्चेंट पेमेंट कर सकते हैं। अब इस सूची में सेशेल्स भी जुड़ने जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अनुसार, दुनिया में होने वाले लगभग 49 प्रतिशत रियल-टाइम डिजिटल पेमेंट अब UPI नेटवर्क के जरिए होते हैं। यही वजह है कि कई देश भारत के डिजिटल भुगतान मॉडल में रुचि दिखा रहे हैं और कई अन्य देशों के साथ भी यूपीआई कनेक्टिविटी को लेकर बातचीत जारी है।
प्रधानमंत्री मोदी की सेशेल्स यात्रा के दौरान नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया इंटरनेशनल पेमेंट्स लिमिटेड (NIPL) और सेशेल्स के केंद्रीय बैंक के बीच समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर हुए। इसका उद्देश्य सेशेल्स में UPI आधारित डिजिटल भुगतान व्यवस्था लागू करना और दोनों देशों के बीच डिजिटल भुगतान एवं फिनटेक सहयोग को मजबूत करना है।
भारत सरकार 20 से अधिक देशों के साथ आधार, डिजिलॉकर और UPI जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म साझा करने के लिए सहयोग समझौते कर चुकी है। इससे भारत का इंडिया स्टैक मॉडल दुनिया में तेजी से पहचान बना रहा है।
विदेशों में UPI पहुँचने से भारत और लोगों को क्या फायदा होगा?
UPI का वैश्विक विस्तार सबसे पहले भारतीय पर्यटकों के लिए बड़ी राहत लेकर आएगा। विदेश यात्रा के दौरान उन्हें स्थानीय मुद्रा बदलने या अंतरराष्ट्रीय कार्ड पर निर्भर रहने की जरूरत कम होगी। अपने मोबाइल में मौजूद उसी UPI ऐप से भुगतान करना आसान हो जाएगा।
विदेशों में रहने वाले भारतीयों और कारोबारियों के लिए भी भुगतान और लेनदेन अधिक सरल और तेज होगा। इससे दोनों देशों के बीच व्यापार, पर्यटन और फिनटेक क्षेत्र में सहयोग बढ़ेगा। डिजिटल भुगतान की लागत कम होगी और छोटे व्यवसायों के लिए भी अंतरराष्ट्रीय भुगतान पहले से अधिक आसान बन सकता है।
I annan rezilta konkret dan sa vizit Sesel.
Bann lakor kle in ganny sinyen.
Sa i enkli en lakor pour enplimantasyon UPI (en form peyman nimerik) dan Sesel, lakor lo Jan Aushadhi e lezot ankor.
Nou pou kontinyen travay dan bann sekter inovan parey aksyon klimatik, Idrozenn… https://t.co/moEuVd05At
सेशेल्स जैसे पर्यटन आधारित देश के लिए भी यह समझौता महत्वपूर्ण है। हर साल करीब 15 हजार भारतीय वहाँ घूमने जाते हैं। भारतीयों को सेशेल्स जाने के लिए पहले से वीजा लेने की जरूरत नहीं होती, हालाँकि आगमन पर विजिटर परमिट लेना पड़ता है। ऐसे में UPI लागू होने से भारतीय पर्यटक वहाँ आसानी से डिजिटल भुगतान कर सकेंगे।
भारत पहले से सेशेल्स को दवाएँ, चावल, कपड़े, वाहन, मशीनरी और अन्य सामान निर्यात करता है। डिजिटल भुगतान व्यवस्था मजबूत होने से व्यापारिक संबंधों को भी नई गति मिल सकती है।
यही वजह है कि मोदी की यात्रा के दौरान UPI के अलावा स्वास्थ्य, कृषि, अंतरिक्ष, समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और 1250 करोड़ रुपए की लाइन ऑफ क्रेडिट सहित कई समझौते किए गए।
UPI का अंतरराष्ट्रीय विस्तार केवल भुगतान तक सीमित नहीं है। इससे भारत की डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को वैश्विक पहचान मिल रही है। भारतीय फिनटेक कंपनियों के लिए नए बाजार खुलेंगे, सीमा पार भुगतान आसान होगा और डिजिटल अर्थव्यवस्था में भारत की सॉफ्ट पावर भी मजबूत होगी।
AI के साथ UPI की अगली उड़ान कैसी होगी?
NPCI अब UPI के अगले चरण में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को बड़ी भूमिका देना चाहता है। NPCI के मुख्य कार्यकारी अधिकारी दिलीप अस्बे के अनुसार AI की मदद से नए उपयोगकर्ताओं को जोड़ना आसान होगा।
NPCI का लक्ष्य अगले चरण में और अधिक लोगों तथा व्यापारियों को UPI नेटवर्क से जोड़ना है। इसके लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित वॉयस पेमेंट, बहुभाषी सुविधा, धोखाधड़ी की पहचान और डिजिटल क्रेडिट जैसे फीचर्स पर काम चल रहा है। NPCI का लक्ष्य आने वाले वर्षों में यूपीआई को प्रतिदिन एक अरब ट्रांजैक्शन तक पहुँचाना है।
खासतौर पर वॉयस असिस्टेंट और बहुभाषी सुविधाओं के जरिए ऐसे लोग भी डिजिटल भुगतान से जुड़ सकेंगे जिन्हें अंग्रेजी या स्मार्टफोन का अधिक अनुभव नहीं है।
NPCI ने 2023 में वॉयस असिस्टेंट आधारित इंटरैक्टिव सिस्टम भी शुरू किया था। भविष्य में AI की मदद से डिजिटल लेनदेन में धोखाधड़ी की पहचान, फर्जी खातों पर नजर रखने और सुरक्षा को मजबूत करने की योजना है।
इतना ही नहीं, डिजिटल फुटप्रिंट के आधार पर AI भविष्य में छोटे कारोबारियों और ग्राहकों को डिजिटल क्रेडिट या लोन मंजूर करने में भी मदद कर सकता है।
NPCI का मानना है कि भारतीय बैंक और फिनटेक कंपनियाँ अपने डेटा के आधार पर छोटे और सटीक AI भाषा मॉडल विकसित कर सकती हैं। विवाद समाधान प्रणाली FIMI भी पहले से लाखों उपयोगकर्ताओं की मदद कर रही है। इन सभी पहलों का लक्ष्य UPI को अधिक सुरक्षित, आसान और दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल भुगतान नेटवर्क बनाना है।
सेशेल्स में UPI लागू करने का समझौता सिर्फ एक नए देश में भुगतान सुविधा शुरू करने तक सीमित नहीं है। यह भारत की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसके जरिए वह अपने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर को वैश्विक स्तर पर स्थापित करना चाहता है।
जिस प्लेटफॉर्म ने 10 साल पहले केवल 21 बैंकों और कुछ सौ ट्रांजैक्शन के साथ शुरुआत की थी, वही आज दुनिया के लगभग आधे रियल-टाइम डिजिटल भुगतान का हिस्सा बन चुका है। यही वजह है कि अब भारत केवल डिजिटल भुगतान का उपभोक्ता नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध कराने वाला देश बनकर उभर रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी के सेशेल्स दौरे के दौरान उन्हें सर्वोच्च पर्यावरण सम्मान ‘Guardian of the Blue Horizon’ से नवाजा गया। इसको लेकर जबरदस्ती विवाद खड़े किए जा रहे हैं। दरअसल ये अवॉर्ड पहली बार सेशेल्स ने किसी राष्ट्राध्यक्ष को दिया है, लेकिन इसके पीछे की वजह उनकी घरेलू राजनीति है, न की पीएम मोदी।
ऑपइंडिया की पड़ताल में सामने आया है कि सेशल्स की राष्ट्रीय सम्मान देने के सिस्टम में बड़े बदलाव किए गए और वर्तमान सरकार ने पुरानी प्रणाली को निरस्त कर दिया। वहाँ की संसद में नया कानून पास हुआ। नए कानून के तहत पहली बार पर्यावरण से जुड़ा सबसे बड़ा सम्मान पीएम मोदी को दिया गया। भारत में लिबरल गैंग सोशल मीडिया पर प्रोपेगेंडा फैलाने में लगे हुए हैं।
पीएम मोदी को क्यों दिया सम्मान, सेशेल्स ने बताया
प्रधानमंत्री मोदी के सेशेल्स दौरे के दौरान उन्हें सर्वोच्च पर्यावरण सम्मान दिया गया। ये सम्मान प्राप्त करने वाले वे दुनिया के पहले व्यक्ति हैं, साथ ही यह भारतीय प्रधानमंत्री को दिया गया 34वाँ अंतरराष्ट्रीय सम्मान है।
सेशेल्स सरकार ने इस मौके पर कहा कि यह उपाधि पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता, सतत विकास, नीली अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने और छोटे द्वीप वाले देशों (एसआईडीएस) की आकांक्षाओं के लिए प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व को मान्यता देती है।
पीएम मोदी ने सेशेल्स के लोगों और सरकार को इसके लिए आभार जताया और जलवायु परिवर्तन की चुनौती से जूझ रहे सभी देशों को यह सम्मान समर्पित किया।
Grateful to the people and Government of Seychelles as well as President Herminie for conferring upon me the ‘Guardian of the Blue Horizon.’
I humbly accept this honour and dedicate it to all those countries that are fighting the challenge of climate change and consider… pic.twitter.com/iI4c7BjnFq
प्रधानमंत्री ने पर्यावरण संरक्षण के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दोहराते हुए कहा कि देश पृथ्वी को अधिक हरित और टिकाऊ बनाने के लिए हर संभव प्रयास करने को तैयार है। उन्होंने मिशन लाइफ, एक पेड़ माँ के नाम, अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन, आपदा प्रतिरोधी अवसंरचना गठबंधन और अंतर्राष्ट्रीय बिग कैट गठबंधन जैसी पहलों को भारत के वैश्विक पर्यावरण प्रयासों का उदाहरण बताया।
भारत में पुरस्कार को ‘विवादित’ बनाने की कोशिश हुई
पीएम मोदी को मिले इस इंटरनेशनल सम्मान को लेकर भी भारत में जश्न मनाने के बजाए राजनीति की जा रही है। कई आलोचकों ने दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के दौरान उन्हें सम्मानित करने के लिए यह सम्मान ‘विशेष तौर पर बनाया गया’ था, जिसका अर्थ है कि सेशेल्स सरकार ने भारतीय प्रधानमंत्री के लिए जल्दबाजी में एक नया पुरस्कार घोषित कर दिया।
खुद को ‘खोजी पत्रकार’ कहने वाले और प्रचार आउटलेट ऑल्ट न्यूज के संस्थापक मोहम्मद जुबैर ने X पर अपने ही देश के प्रधानमंत्री को मिले सम्मान की आलोचना की। उन्होंने एक पोस्ट को दोबारा शेयर किया, जिसमें कहा गया था कि ‘नया पुरस्कार’ एक घुमंतू अहंकारी व्यक्ति के अहंकार को संतुष्ट करने के लिए जल्दबाजी में बनाया गया था।
जुबैर ने कई पोस्ट साझा किए हैं जिनमें कथित प्रशस्ति पत्र दस्तावेज का उपयोग करते हुए प्रधानमंत्री मोदी को दिए गए राष्ट्रीय सम्मान की प्रामाणिकता पर सवाल उठाया गया है।
It's OPVS and not OPUS. It's Republic and not Repubblic. It's Seychelles and not Seycheeles. pic.twitter.com/qX13eYhpBn
द हिंदू की राजनयिक मामलों की संपादक ने भी इस आलोचना का समर्थन करते हुए सवाल उठाया कि गलतियों वाले कथित प्रशस्ति पत्र को किसने तैयार किया था। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट भी साझा किया, जिसमें दावा किया गया था कि सेशेल्स ने प्रधानमंत्री मोदी के लिए राजकीय सम्मान बनाने के लिए चैटजीपीटी का इस्तेमाल किया था।
सोशल मीडिया पर ये प्रोपेगेंडा जल्दी ही फैल गया। कई लोगों ने कहा कि ये पुरस्कार पीएम मोदी की यात्रा को देखते हुए सेशेल्स ने शुरू किया है।
यह पुरस्कार हाल ही में क्यों शुरू किया गया?
यह सच है कि ‘गार्जियन ऑफ द ब्लू होराइजन’ का सम्मान हाल ही में स्थापित किया गया है, लेकिन इसके ‘सृजन’ का कारण पीएम मोदी नहीं हैं। दरअसल सेशल्स के राष्ट्रीय सम्मान की प्रक्रिया में बदलाव किया गया है।
सेशेल्स ने देश में असाधारण योगदान देने वाले लोगों को सम्मानित करने के लिए 2022 में राष्ट्रीय पुरस्कार अधिनियम लागू किया। इस कानून के तहत तीन राष्ट्रीय सम्मान शुरू किए गए। गणतंत्र पदक, सम्मान पदक और योग्यता पदक।
कानून लागू होने के बाद 2023 में पहला राष्ट्रीय पुरस्कार समारोह आयोजित किया गया, जिसमें सार्वजनिक सेवा, पर्यावरण कार्य, स्वास्थ्य सेवा, संस्कृति, शासन और वीरता के कार्यों के लिए जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े व्यक्तियों को सम्मानित किया गया ।
पुरस्कार प्राप्त करने वालों में राष्ट्रपति वेवेल रामकलवान शामिल थे, जिन्हें अधिनियम के प्रावधानों के तहत गणतंत्र पदक प्राप्त हुआ, पूर्व राष्ट्रपति सर जेम्स मैनचम, सेंट्रल बैंक की गवर्नर कैरोलिन एबेल, पर्यावरणविद् एंटोनियो कॉन्स्टेंस, गायक जो सैमी और कई अन्य लोग शामिल थे, जिन्होंने सेशेल्स में महत्वपूर्ण योगदान दिया था।
उस समय राष्ट्रपति रामकलवान ने कहा था कि देश विदेशों में सम्मानित सेशेल्स वासियों को तो मान्यता देता रहा है, लेकिन अपने नागरिकों को सम्मानित करने के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी। इसलिए, इस कमी को पूरा करने और राष्ट्रीय उपलब्धियों को औपचारिक रूप से मनाने के लिए राष्ट्रीय पुरस्कारों की शुरुआत की गई।
राजनीतिक परिवर्तन के कारण पुरानी सम्मान प्रणाली को निरस्त कर दिया गया
दरअसल नई सम्मान प्रणाली घरेलू राजनीति में उलझ गई। सरकार में बदलाव के बाद, राष्ट्रपति पैट्रिक हर्मिनी मंत्रिमंडल ने फरवरी में राष्ट्रीय पुरस्कार (निरसन) विधेयक, 2026 को मंजूरी दी । इसमें पहले से प्रदान किए गए सभी सम्मानों की वैधता को बरकरार रखते हुए राष्ट्रीय पुरस्कार अधिनियम को समाप्त करने का प्रस्ताव है।
सेशेल्स की राष्ट्रीय सभा ने गरमागरम बहस के बाद निरसन विधेयक पारित कर दिया। इस विधेयक को यूनाइटेड सेशेल्स (यूएस) पार्टी का समर्थन मिला, जबकि लिन्योन डेमोक्रेटिक सेशेल्वा (एलडीएस) ने इसका विरोध किया। इसके साथ ही राष्ट्रीय पुरस्कार समिति को भी भंग कर दिया गया, हालाँकि पहले से दिए गए सम्मान कानूनी रूप से वैध बने रहे। हालाँकि पूर्ववर्ती पुरस्कार व्यवस्था समाप्त हो गई और एक नई सम्मान प्रणाली का मार्ग प्रशस्त हुआ।
इसी के तहत ‘गार्जियन ऑफ द ब्लू होराइजन’ की शुरुआत की गई और प्रधानमंत्री मोदी को पर्यावरण संरक्षण में उनके योगदान और जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील द्वीपीय देशों के समर्थन के लिए यह सम्मान प्रदान किया गया।
पुरस्कार से कहीं बढ़कर, एक नई शुरुआत
इसलिए ये नहीं कहा जा सकता कि प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा को देखते हुए, उन्हें खुश करने के लिए सेशेल्स सरकार ने यह सम्मान अचानक ‘सृजित’ किया।
सेशेल्स में पहले से मौजूद नागरिक सम्मान प्रणाली राजनीतिक विवाद का विषय बन चुकी थी और बाद में इसे कानून के माध्यम से निरस्त कर दिया गया था। वर्तमान सरकार पुराने कानून के तहत दिए गए पुरस्कारों की वैधता को बरकरार रखते हुए देश की सम्मान प्रणाली का पुनर्गठन कर रही है।
‘गार्जियन ऑफ द ब्लू होराइजन’ सम्मान भी सेशेल्स के नए सम्मान प्रणाली का हिस्सा है।