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कहीं आप भी तो नहीं DOOM SCROLLING के शिकार, UK से भारत तक दिखे खतरनाक परिणाम: यूट्यूब ने की चिंता समझने की कोशिश, बाकी SM प्लेटफॉर्म कब होंगे अलर्ट?

आज के डिजिटल दौर में मोबाइल फोन अब सिर्फ कॉल या मैसेज करने का साधन नहीं रह गया है, बल्कि यह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का केंद्र बन चुका है। सुबह उठते ही सबसे पहले फोन देखना, रात को सोने से पहले आखिरी बार स्क्रीन स्क्रॉल करना ये आदतें अब इतनी आम हो गई हैं कि हम इन्हें सामान्य मानने लगे हैं।

खासकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब ने हमारे समय, ध्यान और मानसिक ऊर्जा पर गहरा असर डाला है। यही वह जगह है जहाँ ‘डोपामाइन स्क्रॉलिंग’ और ‘डूम स्क्रॉलिंग’ जैसी अवधारणाएँ सामने आती हैं।

डोपामाइन स्क्रॉलिंग एक ऐसी स्थिति है, जब हम बार-बार फोन उठाकर ऐसे कंटेंट को देखते रहते हैं जो हमें तुरंत खुशी या मनोरंजन देता है। दरअसल, हमारे दिमाग में एक केमिकल होता हैडोपामाइन, जो हमें अच्छा महसूस कराता है और यही हमें लगातार स्क्रॉल करते रहने के लिए प्रेरित करता है।

वहीं दूसरी तरफ ‘डूम स्क्रॉलिंग’ एक अलग लेकिन उतनी ही खतरनाक आदत है। इसका मतलब होता है बार-बार मोबाइल या सोशल मीडिया पर नकारात्मक खबरें, डराने वाली जानकारी या बुरी घटनाओं से जुड़ा कंटेंट लगातार देखते रहना भले ही उससे हमें तनाव, डर या चिंता ही क्यों न हो रही हो।

क्या होता है डोपामाइन का असर?

डोपामाइन (Dopamine) मस्तिष्क में बनने वाला एक प्रमुख न्यूरोट्रांसमीटर (केमिकल मैसेंजर) है, जिसे ‘फील-गुड’ हार्मोन भी कहा जाता है। यह हमें खुशी, उत्साह और संतुष्टि का एहसास कराता है। जब हम कोई मजेदार वीडियो देखते हैं, कोई दिलचस्प पोस्ट पढ़ते हैं या कोई नोटिफिकेशन आता है, तो दिमाग में डोपामाइन रिलीज होता है। यही हमें बार-बार फोन उठाने और स्क्रॉल करते रहने के लिए प्रेरित करता है।

शुरुआत में यह सब बहुत सामान्य लगता है और हम सोचते है, “बस 5 मिनट के लिए इंस्टाग्राम खोलता हूँ” या “एक-दो वीडियो देखकर बंद कर दूँगा।” लेकिन धीरे-धीरे यह 5 मिनट 30 मिनट में और फिर कई घंटों में बदल जाता है।

बिना किसी खास मकसद के स्क्रीन पर अंगुली चलाते रहना, एक वीडियो से दूसरे वीडियो पर जाना और समय का पता ही न चलना यही डोपामाइन स्क्रॉलिंग की असली पहचान है।

सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें यूजर को लगता है कि वह कुछ कर रहा है, लेकिन वास्तव में वह सिर्फ कंटेंट को देख रहा होता है। न कोई सीख, न कोई ठोस फायदा बस दिमाग को बार-बार छोटी-छोटी खुशी की खुराक मिलती रहती है। यही वजह है कि इसे डिजिटल लत भी कहा जाने लगा है।

इस आदत का असर सिर्फ समय की बर्बादी तक सीमित नहीं है। धीरे-धीरे यह हमारे फोकस को कमजोर करता है। लंबे समय तक किसी काम पर ध्यान लगाना मुश्किल हो जाता है।

पढ़ाई, काम या यहाँ तक कि आम बातचीत में भी ध्यान भटकने लगता है। इसके अलावा, लगातार दूसरों की परफेक्ट लाइफ देखकर खुद की जिंदगी से असंतोष बढ़ सकता है, जिससे तनाव, चिंता और कभी-कभी डिप्रेशन जैसी समस्याएँ भी सामने आती हैं।

एक और दिलचस्प पहलू यह है कि यह आदत अक्सर तब बढ़ती है जब हम खाली होते हैं या मानसिक रूप से थके हुए होते हैं। दिमाग तुरंत आसान और त्वरित खुशी चाहता है और सोशल मीडिया उसे वही देता है। लेकिन यह खुशी अस्थायी होती है और इसके खत्म होते ही हम फिर उसी जगह फंस जाते हैं।

बच्चों और युवाओं पर गहरा असर

हालाँकि यह समस्या हर उम्र के लोगों को प्रभावित करती है, लेकिन बच्चों और बड़ों पर इसका असर सबसे ज्यादा गंभीर रूप में सामने आ रहा है। आज के समय में बच्चे बहुत कम उम्र में ही स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के संपर्क में आ जाते हैं। ऐसे में उनका दिमाग, जो अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुआ होता, इस तरह के डिजिटल रिलेशन से जल्दी प्रभावित हो जाता है।

लगातार स्क्रीन देखने की आदत बच्चों के फोकस को कमजोर कर सकता है। पढ़ाई के दौरान ध्यान भटकना, नींद का प्रभावित होना और परिवार के साथ समय कम बिताना जैसी समस्याएँ आम होती जा रही हैं।

इसके साथ ही मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है, जिसमें चिंता, तनाव और अकेलेपन की भावना शामिल हैं। कई बार बच्चे वास्तविक दुनिया से ज्यादा डिजिटल दुनिया में जुड़ाव महसूस करने लगते हैं, जो उनके सामाजिक विकास के लिए ठीक नहीं है।

मामला क्यों उठा और क्या बोले ब्रिटेन के प्रधानमंत्री

इस बढ़ती समस्या को लेकर अब सरकारें भी सतर्क हो गई हैं। हाल ही में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने इस मुद्दे को गंभीरता से उठाया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर सवाल खड़े किए। उनका कहना है कि ये प्लेटफॉर्म्स ऐसे एल्गोरिद्म का इस्तेमाल करते हैं, जो यूजर्स को लंबे समय तक स्क्रीन पर बनाए रखने के लिए डिजाइन किए गए हैं।

उन्होंने यह भी संकेत दिया कि 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने जैसे कदमों पर विचार किया जा रहा है। साथ ही उन्होंने एंडलेस स्क्रॉलिंग जैसे फीचर्स को हटाने की जरूरत पर जोर दिया, क्योंकि ये बच्चों को बिना सोचे-समझे घंटों तक स्क्रीन से चिपकाए रखते हैं। उनके अनुसार माता-पिता भी सरकार से इस दिशा में हस्तक्षेप की माँग कर रहे हैं।

दुनिया भर में बढ़ती सख्ती और बदलते नियम

यह मुद्दा अब केवल एक देश तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि दुनिया के कई देशों में इस पर सख्त कदम उठाए जा रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर बैन लागू कर दिया है। इसके अलावा ग्रीस और इंडोनेशिया जैसे देश भी बच्चों के सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर काबू पाने के लिए नियम लागू कर रहे हैं।

यूरोप के कई देशों जैसे फ्रांस, स्पेन और डेनमार्क में भी न्यूनतम उम्र तय करने और पैरेंटल कंट्रोल को मजबूत करने की दिशा में काम हो रहा है। चीन ने तो पहले ही माइनर मोड लागू कर दिया है, जिसके तहत बच्चों के स्क्रीन टाइम को सीमित किया जाता है।

भारत में भी इस दिशा में कदम उठने लगे हैं, जहाँ कर्नाटक जैसे राज्य ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लागू किया है, जबकि अन्य राज्य भी इस पर विचार कर रहे हैं।

यूट्यूब का नया फीचर

इस बढ़ती चिंता के बीच यूट्यूब ने एक नया फीचर पेश किया है, जो खासतौर पर उसके शॉर्ट वीडियो सेक्शन को लेकर है। इस फीचर के जरिए यूजर अपने शॉर्ट्स देखने के समय को सीमित कर सकता है और चाहें तो इसे पूरी तरह बंद करने जैसा अनुभव भी बना सकता है।

हालाँकि यह पूरी तरह से सख्त प्रतिबंध नहीं है। अगर यूजर चाहे, तो वह एक क्लिक में उस लिमिट को नजरअंदाज कर सकता है और फिर से वीडियो देखना शुरू कर सकता है। यानी यह फीचर ज्यादा एक रिमाइंडर की तरह काम करता है, न कि पक्के तौर पर कंट्रोल की तरह।

लेकिन बच्चों के लिए स्थिति थोड़ी अलग है। अगर उनका अकाउंट गूगल फैमिली लिंक से जुड़ा है, तो इस लिमिट को हटाया नहीं जा सकता। ऐसे में माता-पिता बच्चों के स्क्रीन टाइम पर ज्यादा प्रभावी नियंत्रण रख सकते हैं।

इसकी पूरी प्रक्रिया नीचे विस्तार से दी गई है।
सबसे पहले आप अपने फोन/टैबलेट/कंप्युटर में यूट्यूब को खोल लेंगे,

फिर अपने फोन में You पर क्लिक करें,

इसके बाद सेटिंग पर क्लिक करे।

सेटिंग ओपन होने के बाद चौथे ऑप्शन यानी टाइम मैनेजमेंट पर जाएँ।

उसमे लास्ट में डेली लिमिट का ऑप्शन होगा उसमे शॉर्ट्स फीड लिमिट पर क्लिक करे।

फिर आपको वह समय का ऑप्शन देगा, जिसे आप अपने हिसाब से फिक्स कर सकते हैं।

समाधान क्या हो सकता है?

इस पूरी समस्या का समाधान केवल टेक्नोलॉजी या कानून से संभव नहीं है। यह एक ऐसी स्थिति है। जहाँ समाज, परिवार और सरकार तीनों को मिलकर काम करना होगा। बच्चों को शुरू से ही डिजिटल दुनिया के सही उपयोग के बारे में सिखाना जरूरी है।

स्कूलों में भी इंटरनेट के इस्तेमाल का सही ढंग सीखना चाहिए , ताकि बच्चे यह समझ सकें कि सोशल मीडिया कैसे काम करता है और उसका उनके दिमाग पर क्या असर पड़ता है। वहीं कंपनियों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और ऐसे फीचर्स विकसित करने होंगे, जो यूजर की भलाई को ध्यान में रखें।

‘देश अब हिलना शुरू हुआ’: मोदी सरकार के खिलाफ Gen-Z को भड़काने में नाकाम कॉन्ग्रेस, अब नोएडा जैसी हिंसा से ‘क्रांति’ की उम्मीद

लगातार तीन लोकसभा चुनावों में हार झेलने के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी की बेचैनी अब साफ नजर आने लगी है। केंद्र की सत्ता से एक दशक से बाहर रहने के बाद पार्टी के नेताओं के बयानों में आक्रामकता और हताशा दोनों दिख रही हैं।

आरोप लग रहे हैं कि कॉन्ग्रेस अब आत्ममंथन की बजाय सड़क पर असंतोष खड़ा कर राजनीतिक जमीन तलाशने में जुटी है। यही वजह है कि नोएडा में मजदूरों के प्रदर्शन के नाम पर हुई हिंसा और आगजनी भी कॉन्ग्रेस को गलत नहीं लग रही। पार्टी प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत का रुख ही देख लीजिए।

उन्होंने उपद्रवियों की भूमिका पर सवाल उठाने के बजाय सीधे मोदी मॉडल को जिम्मेदार ठहरा दिया। यह तब है जब जाँच एजेंसियाँ साफ संकेत दे रही हैं कि हिंसा में मजदूरों के साथ-साथ बाहरी तत्व भी शामिल हो सकते हैं और बड़ी साजिश की आशंका से इनकार नहीं किया जा रहा।

सुप्रिया श्रीनेत का सरकार पर हमला

श्रीनेत ने कहा, “क्या यह सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था सिर्फ अरबपतियों के लिए है? क्या यही नरेंद्र मोदी का क्रूर अमृत काल है, जहाँ देश को लूटकर कुछ लोगों को अमीर बनाया जा रहा है और जो लोग देश बनाते हैं उन्हें बदहाल छोड़ा जा रहा है?”

उन्होंने आगे कहा, “मोदी सरकार ने नवंबर 2025 में 4 लेबर कोड बिना किसी चर्चा के लागू कर दिए, जिससे काम के घंटे 12 घंटे तक बढ़ गए। आज उसी आधार पर शोषण हो रहा है। सरकार जब भी कोई नीति लाती है, उसका नुकसान कर्मचारियों और मजदूरों को होता है, जबकि अडानी जैसे लोगों के लिए सब ठीक रहता है।”

उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, “अगर सरकार समय रहते ध्यान नहीं देगी तो आने वाले दिनों में हालात और खराब होंगे क्योंकि भाषण से पेट नहीं भरता और नारे से घर नहीं चलते।”

हैरानी की बात यह रही कि कॉन्ग्रेस ने इस पूरी घटना को एक सकारात्मक संकेत की तरह पेश किया। पार्टी की ओर से कहा गया कि “देश कम से कम अब हिलना शुरू हो गया है।”

श्रीनेत ने कहा, “लेकिन इस सबके बीच एक उम्मीद की किरण भी है। लोगों का सब्र टूट चुका है और अब वे अपने हक की माँग कर रहे हैं। आप कुछ भी कहिए, लेकिन देश अब हिलना शुरू हो गया है।”

जाँच एजेंसियों का दावा, साजिश की आशंका

दूसरी तरफ जाँच एजेंसियों का कहना है कि नोएडा हिंसा में बाहरी तत्वों की भूमिका है। मामले में संगठित दुष्प्रचार, अशांति फैलाने की साजिश, यहाँ तक कि पाकिस्तान और नक्सली कनेक्शन तक की जाँच की जा रही है।

लेकिन कॉन्ग्रेस ने इन दावों को खारिज करने की कोशिश की। श्रीनेत ने कहा, “सरकार समाधान ढूँढने की बजाय इसे अंतरराष्ट्रीय साजिश बता रही है। वे पाकिस्तान का हाथ बता रहे हैं। मतलब अपने हक के लिए आवाज उठाना भी अब साजिश हो गया है?”

हिंसा को आंदोलन की तरह पेश करने का आरोप

आलोचकों का कहना है कि कॉन्ग्रेस इस तरह की घटनाओं को एक बड़े जनआंदोलन या क्रांति की शुरुआत के रूप में पेश कर रही है। यानी सड़क पर हो रही हिंसा और तोड़फोड़ को एक राजनीतिक अवसर के रूप में देखा जा रहा है।

उदाहरण के लिए 2019 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ आंदोलन के दौरान सोनिया गाँधी ने ‘आर या पार की लड़ाई’ का नारा दिया था। उन्होंने लोगों से सड़कों पर उतरने और कुर्बानी देने तक की बात कही थी।

शुरुआती शांतिपूर्ण प्रदर्शन जल्द ही चक्का जाम और हिंसा में बदल गए। शरजील इमाम जैसे लोगों ने देश को बांटने और रास्ते जाम करने की बात कही, वहीं उमर खालिद जैसे लोगों पर दंगों के लिए गुप्त बैठकों के जरिए लोगों को भड़काने के आरोप लगे।

बाद में इन प्रदर्शनों ने कई जगह हिंसक रूप ले लिया था। वही 2025 में वक्फ संशोधन बिल के खिलाफ भी विरोध प्रदर्शन हुए, जिनमें कई जगह हिंसा देखने को मिली खासकर पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में उस समय भी कॉन्ग्रेस और अन्य विपक्षी दल सरकार के खिलाफ हमलावर थे।

राहुल गाँधी के चुनावी आरोप

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी पिछले कुछ समय से लगातार EVM, VVPAT, वोटर लिस्ट और फर्जी वोटरों को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। उन्होंने चुनाव आयोग पर भी आरोप लगाए, लेकिन इन दावों का अब तक कोई ठोस असर नहीं दिखा।

कॉन्ग्रेस ने ‘जितनी आबादी उतना हक’ जैसे नारे के जरिए जाति आधारित राजनीति को भी हवा देने की कोशिश की है। इसमें आरक्षण बढ़ाने और संपत्ति के बंटवारे जैसे मुद्दे शामिल हैं। अब कॉन्ग्रेस मजदूरों के वेतन और अधिकारों के मुद्दे के साथ-साथ लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने यानि डिलिमिटेशन जैसे मुद्दों को लेकर सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश कर रही है।

सड़क से सत्ता तक का रास्ता?

कॉन्ग्रेस का मौजूदा रुख यह संकेत देता है कि पार्टी सरकार के खिलाफ जन असंतोष को एक बड़े आंदोलन में बदलने की कोशिश कर रही है। ‘देश हिलना शुरू हो गया है’ जैसे बयान इसी रणनीति की तरफ इशारा करते हैं, जहाँ सड़क पर हो रही हलचल को राजनीतिक बदलाव के अवसर के रूप में देखा जा रहा है जैसा हुमए नेपाल और बांग्लादेश में देखने को मिला भले ही उसमें हिंसा और अराजकता के तत्व क्यों न शामिल हों।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

कहीं प्रोटीन में नशा देकर बलात्कार, कहीं ट्रेनिंग के नाम पर प्रेगनेंट करके गर्भपात: पढ़ें जिम जिहाद के 9 मामले, कैसे वर्कआउट के नाम पर हिंदू लड़कियों का हो रहा शिकार

हिंदू लड़कियों के साथ लगातार सामने आ रही लव जिहाद की खबरें थमने का नाम नहीं ले रही हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि कट्टरपंथी इसको अंजाम देने के लिए अब जिम जैसी जगहों का सहारा लेने लगे हैं, जहाँ शक की गुंजाइश कम हो और भोली-भाली हिंदू लड़कियों को फँसाया जा सके।

जाहिर सी बात है कि वर्कआउट के लिए जाने वाले लोग रेग्युलर भी होंगे तो ब्रेनवॉश करने और झूठे प्रेमजाल में फँसाने में मदद मिलेगी क्योंकि एक ही बात दिमाग में रोज डाली जाएगी, शोषण भी हर दिन होगा और कट्टरपंथियों के अपने घटिया उद्देश्य में सफल होने के चांसेज ज्यादा होंगे।

जिम जिहाद का ताजा मामला उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद से सामने आया है, जहाँ ग्लोबल जिम के संचालक सुहैल मलिक पर एक हिंदू युवती ने रेप, अश्लील वीडियो बनाने और चार लाख रुपए वसूलने का आरोप लगाया है। पुलिस ने सुहैल मलिक और उसके साथी सादान सैफी के खिलाफ दुष्कर्म, ब्लैकमेल कर वसूली, आईटी एक्ट एवं धमकी की धारा में FIR लिखी है।

UP के मुरादाबाद में जिम छोड़ने पर भी सुहेल ने नहीं छोड़ा पीछा, 4 साल तक किया प्रताड़ित

पीड़िता के अनुसार, उसने 4 मार्च 2022 से हिमगिरी स्थित एक जिम में जाना शुरू किया था। कुछ ही समय बाद जिम संचालक सुहैल मलिक ने उसका पीछा करना शुरू कर दिया। एक दिन जिम के अंदर ही उसे रोककर आरोपित ने डराया-धमकाया और उसके साथ दुष्कर्म किया। इस दौरान उसने अश्लील वीडियो भी बना लिया।

इसके बाद आरोपित ने उसी वीडियो के जरिए युवती को ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया। वीडियो वायरल करने की धमकी देकर उससे धीरे-धीरे चार लाख रुपए से अधिक की रकम वसूल ली गई। पीड़िता ने बताया कि विरोध करने पर आरोपित उसे इंटरनेट पर बदनाम करने की धमकी देता था, जिससे वह लगातार मानसिक दबाव में रही।

पीड़िता ने बताया कि आरोपित की हरकतें यहीं नहीं रुकीं। जिम में ट्रेनिंग के दौरान वह गलत तरीके से छूता था और विरोध करने पर धमकाता था। डर के कारण युवती लंबे समय तक चुप रही, लेकिन आरोपित लगातार उसे परेशान करता रहा।

यहाँ तक कि जब पीड़िता ने जिम जाना बंद कर दिया, तब भी आरोपित ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। रास्ते में रोककर उसे धमकाया जाता और ब्लैकमेल जारी रखा गया। करीब चार साल तक इस प्रताड़ना को झेलने के बाद जब स्थिति असहनीय हो गई, तब पीड़िता ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के पास जाकर पूरी घटना की जानकारी दी। पीड़िता ने पुलिस को यह भी बताया कि आरोपित इससे पहले भी कई हिंदू युवतियों को इसी तरह फँसा चुका है। जिम में पहले कई युवतियाँ आती थीं, लेकिन ब्लैकमेलिंग शुरू होने के बाद उन्होंने आना बंद कर दिया। इस खुलासे के बाद पुलिस ने इस एंगल से भी जाँच शुरू कर दी है कि कहीं यह एक संगठित गिरोह तो नहीं।

प्रारंभिक जाँच में यह भी सामने आया है कि जिम संचालक युवतियों से संपर्क बनाए रखने के लिए उन्हें लगातार मैसेज करते थे और धीरे-धीरे उनसे नजदीकियाँ बढ़ाते थे। इसके बाद योजनाबद्ध तरीके से उन्हें अपने जाल में फँसाकर ब्लैकमेल किया जाता था।

बता दें कि मुरादाबाद की तरह ही गुजरात से लेकर कर्नाटक से जिम जिहाद के केस सामने आए हैं। आगे इस रिपोर्ट में हम आपको उन्हीं के बारे में बताएँगे।

गुजरात में जिम ट्रेनर शब्बीर ने 7 साल से फँसा रखी थी अरबपति हिंदू की पत्नी

गुजरात के सूरत में जिम ट्रेनर शब्बीर असगर ट्रंकवाला ने हाई-प्रोफाइल हिंदू परिवार की महिला को अपने प्रेमजाल में फँसाया। सात साल तक बहला-फुसलाकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। फिर महिला की निजी तस्वीर ब्लैकमेल करने की धमकी दी और महिला के पति से ₹5 लाख ऐंठे।

दरअसल अरबपति परिवार से ताल्लुक रखने वाली महिला सिटीलाइट इलाके के ‘पूजा L1 जिम’ में जाती थी। वहाँ शब्बीर असगर नाम का एक जिम ट्रेनर था, जिसकी महिला के पैसों पर नजर थी। उसने महिला से दोस्ती करनी शुरू की, फिर धीरे-धीरे उसे अपने प्रेमजाल में फँसा लिया। यहाँ तक कि महिला को उसके पति से अलग करने की भी कोशिश की।

यह सिलसिला सात साल तक चला। महिला पूरे तरीके से जिम ट्रेनर की बातों में आ चुकी थी और अपने पति से दूरी बनाने लगी। वहीं उसका पति अपनी पत्नी के लिए चिंतित था। लेकिन जिम ट्रेनर यहाँ नहीं रुका। जिम ट्रेनर शब्बीर ब्लैकमेलिंग पर उतर आया। सात सालों में उसने महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाए और महिला की प्राइवेट तस्वीरें खींच ली। 

तस्वीरों के सहारे वह उसे लगातार ब्लकैमेल करता रहा। उसने महिला के पति को भी जान से मारने की धमकी दी थी। मामले में पुलिस ने आरोपित सब्बीर को गिरफ्तार कर लिया है।

कर्नाटक में जिम ट्रेनर समीर मुल्ला ने 10 बार कराया हिंदू युवती का गर्भपात, बहन की मदद से फँसाता था ‘काफिर’ लड़कियाँ

कर्नाटक के हुबली में जिम ट्रेनर समीर मुल्ला से जुड़ा लव जिहाद का मामला सामने आया था। समीर मुल्ला ने हिंदू पीड़िता का 10 बार गर्भपात करवाया था। इस मामले में पुलिस ने तीन अलग-अलग FIR दर्ज कर की। आरोप है कि जिम ट्रेनर समीर लड़कियों को प्यार और भरोसे के नाम पर अपने करीब लाता था।

इसके बाद उनके साथ दुष्कर्म करता और अश्लील वीडियो बनाकर उन्हें ब्लैकमेल करता था। एक पीड़िता का यह भी कहना है कि आरोपित ने उसे नशीला पदार्थ देकर अपने घर ले जाकर शोषण किया। साथ ही उसने यह आरोप भी लगाया कि उसे गर्भवती कर दिया गया और 10 बार जबरन गर्भपात की दवाइयाँ लेने के लिए मजबूर किया गया।

इतना ही नहीं इन प्रक्रियाओं के वीडियो रिकॉर्ड कर आरोपित को भेजने का दबाव भी बनाया गया। पीड़िता की शिकायत में यह भी कहा गया कि आरोपित की बहन और कुछ अन्य लोगों ने भी इस पूरे मामले में उसका साथ दिया। इन सभी आरोपों के बाद समीर को पुलिस के हवाले कर दिया गया था।

यूपी के सहारनपुर में जिम ट्रेनर शहजाद ने छात्रा के साथ किया रेप

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के थाना बिहारीगढ़ क्षेत्र में जिम ट्रेनर शहजाद पर एक छात्रा को नशीला पदार्थ देकर दुष्कर्म करने का गंभीर मामला सामने आया था। पुलिस ने पीड़िता की शिकायत पर त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपित शहजाद और उसके सहयोगी मुकर्रम उर्फ थाप्पुल को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था।

इटावा जिले की रहने वाली पीड़िता ने बताया था कि करीब एक साल पहले उसने बिहारीगढ़ के एक जिम में जाना शुरू किया था। इसी दौरान जिम ट्रेनर शहजाद ने उसे प्रोटीन ड्रिंक में नशीला पदार्थ मिलाकर पिला दिया और उसके साथ दुष्कर्म किया गया। पीड़िता का कहना है कि इस घटना के बाद आरोपित ने उसे धमकाकर लंबे समय तक उसका शोषण किया।

पीड़िता के अनुसार, इस पूरे मामले में मुकर्रम उर्फ थाप्पुल ने भी शहजाद का सहयोग किया। मानसिक रूप से परेशान छात्रा ने इस घटना की जानकारी हिंदू रक्षा दल के उत्तराखंड प्रदेश अध्यक्ष ललित शर्मा को दी। मामले की गंभीरता को देखते हुए ललित शर्मा ने पुलिस अधिकारियों को इसकी सूचना दी, जिसके बाद पीड़िता ने थाना बिहारीगढ़ में लिखित तहरीर दी।

यूपी के मिर्जापुर में जिम की आड़ में धर्मांतरण और ब्लैकमेलिंग का नेटवर्क

उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में धर्म परिवर्तन और नमाज पढ़ने का दबाव डालकर युवतियों के शोषण की घटना सामने आई थी, जहाँ जिम की आड़ में यह पूरा नेटवर्क चल रहा था। मामले में मो शेख अली आलम, फैजल खान, जहीर खान और शादाब को गिरफ्तार किया। बाद में पुलिस ने आरोपित जिम मालिक/ट्रेनर फरीद को एनकाउंटर के बाद गिरफ्तार किया।

पीड़ित युवतियों के अनुसार, शहर के अलग-अलग इलाकों में संचालित KGN और आयरन फायर नामक जिमों में वे व्यायाम के लिए जाती थीं। यहाँ जिम संचालक और ट्रेनर पहले उनसे दोस्ती करते, फिर प्रेम जाल में फँसाकर धीरे-धीरे धर्म परिवर्तन और नमाज पढ़ने का दबाव बनाने लगते थे।

आरोप है कि युवतियों के निजी फोटो और वीडियो बनाए गए, जिनके जरिए उन्हें ब्लैकमेल कर मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित किया गया। विरोध करने पर बदनाम करने और नुकसान पहुँचाने की धमकियाँ दी जाती थीं। पुलिस जाँच में सामने आया है कि आरोपित युवतियों से अलग-अलग मौकों पर पैसे भी वसूलते थे।

बरेली के एयू फिटनेस में ‘जिम जिहाद’ का मामला

बरेली में सामने आए जिम ट्रेनर से जुड़े मामले में महिला के भाई ने गंभीर और सनसनीखेज आरोप लगाए थे, जिनको लेकर इलाके में तनाव की स्थिति बनी थी। यह पूरा मामला उस समय उजागर हुआ था, जब एक विवाहित महिला अपने पति और पाँच साल के बेटे को छोड़कर जिम में काम के दौरान बने संबंधों के चलते जिम ट्रेनर शोएब के साथ रहने लगी थी।

महिला के भाई का आरोप था कि उसकी बहन को जिम ट्रेनर शोएब ने योजनाबद्ध तरीके से फँसाया था। भाई के अनुसार, एयू फिटनेस जिम में ‘जिम जिहाद’ चलाया जा रहा था, जहाँ मुस्लिम ट्रेनरों के जरिए हिंदू लड़कियों को प्रेम जाल में फँसाया जाता था और बाद में उन पर धर्मांतरण का दबाव बनाया जाता था।

MP के होटल में पकड़ा गया जिम ट्रेनर, पहचान छिपाने के आरोप

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में जिम ट्रेनर और युवती के होटल में पकड़े जाने का मामला सामने आया था। आरोप लगा कि युवक ने अपनी असली पहचान छिपाकर युवती से दोस्ती की थी। पकड़ा गया मजहर खान नाम का ये युवक जिम ट्रेनर था। अपनी पहचान छिपाकर हिंदू युवती को हबीबगंज इलाके के एक होटल में लेकर पहुँचा था।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, होटल में मजहर की जगह उसने अपना नाम बंटी बताया था। खबर हिंदू संगठनों को लगी तो बड़ी संख्या में कार्यकर्ता होटल पहुँच गए। युवक को पकड़कर उसकी पिटाई कर दी। इसी बीच सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुँची और युवक को पकड़कर अपने साथ थाने लेकर आई।

आरोपित मजहर, विशाल फिटनेस सेंटर में जिम ट्रेनर था। उसने अपना नाम बंटी बताकर युवती से दोस्ती बढ़ाई थी। दोनों की मुलाकात जिम में ही हुई थी। दोस्ती बढ़ने के बाद मजहर युवती को लेकर होटल गया था।

MP के जबलपुर में जिम ट्रेनर अमन खान करता था बैड टच

मध्य प्रदेश के जबलपुर की एक जिम में लव जिहाद और धर्मांतरण की कोशिश का मामला सामने आया। मामला आधारताल थाना क्षेत्र में स्थित साईं फिटनेस जिम का था। यहाँ रिसेप्शनिस्ट की जॉब करने वाली 21 वर्षीय युवती ने जिम के ट्रेनर के खिलाफ केस दर्ज करवाया।

युवती का आरोप था कि आरोपित जिम ट्रेनर अपना नाम अमन राज बताता था जबकि उसका असली नाम अमन खान था। शिकायत के अनुसार, अमन जिम में आने वाली युवतियों से बैड टच करता था और धर्मांतरण के लिए उनका ब्रेन वॉश करता था।

युवती ने आरोप लगाया कि आरोपित उसे भी बैड टच करते हुए टॉर्चर करता था, युवती हिन्दू टाईगर फोर्स नाम के संगठन के कार्यकर्ताओं के साथ आधारताल पहुँची थी जिसकी शिकायत पर पुलिस ने अमन खान पर FIR दर्ज की। पुलिस ने साईं फिटनेस जिम पहुँचकर भी जाँच की और जिम ट्रेनर अमन खान को गिरफ्तार कर लिया।

जिम ट्रेनर और युवती के साथ पकड़े जाने पर विवाद, हिंदू संगठनों ने लगाए गंभीर आरोप

मध्य प्रदेश के इंदौर के भंवरकुआँ इलाके में एक जिम ट्रेनर को युवती के साथ घूमते हुए बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने पकड़ा और उसकी पिटाई कर उसे थाने ले जाया गया। मामले में जिम ट्रेनर के खिलाफ प्रतिबंधात्मक धाराओं में कार्रवाई की और उसे जेल भी भेज दिया गया। आरोपित ट्रेनर का नाम शादाब मंसूरी था, जो पेशे से एक जिम ट्रेनर था।

बजरंग दल के जिला संयोजक विजय कलखोर ने दावा किया कि शादाब का पहले से निकाह हो चुका है और उसके दो बच्चे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि शादाब जिम में आने वाली हिंदू युवतियों से नजदीकियाँ बढ़ाकर उन्हें इस्तेमाल करता और बाद में धोखा देकर निकल लेता था।

लगातार सामने आ रहे ऐसे मामले चिंताजनक है। गौरतलब है कि ऐसे मामलों में बढ़ोतरी को देखते हुए कई अन्य राजनीतिक नेताओं के बयान भी सामने आए, जिनमें महिलाओं से सतर्क रहने और जिम चुनते समय ट्रेनरों की जानकारी रखने की अपील की गई। BJP के विधायक रामेश्वर शर्मा ने हिंदू महिलाओं से अपील की कि वे मुस्लिम ट्रेनर से सावधान रहें।

ये प्रेग्नेंट है से लेकर उसकी बीवी तो सुंदर है तक… जानिए नासिक TCS कांड में जिहादी गैंग के कुकर्मों को धो-पोंछने के लिए क्या तर्क दे रही ‘जमात’, अम्मी-बहन-मौलाना सबको किया एक्टिव

नासिक TCS कांड को लेकर पिछले दिनों पूरे देश में हल्ला मचा, लेकिन वामपंथियों की कान में जूं तक नहीं रेंगी। उन्होंने पहले इस मामले में लंबे समय तक चुप्पी साधे रखी और फिर जब बोले तो सीधा मुस्लिम आरोपितों के बचाव पर उतर आए। अब स्थिति ये है कि इस मामले को दबाने के लिए एक नई जमात को एक्टिव किया गया है जो इस खबर में नए-नए एंगल लाकर लोगों को भ्रमित कर रही है। कैसे आइए बताते हैं?

अभी तक मीडिया में आप हिंदू पीड़ितों के साथ हुए अत्याचार की खबरों को पढ़ रहे थे। मगर अब इस केस को ऐसा बनाया जा रहा है कि आपके मन में या तो मुस्लिमों आरोपितों की पीड़ित वाली छवि बने या फिर आपको ये लगे कि कहीं हिंदू ही इस मामले को बेवजगह तूल देकर किसी बेचारे को फँसा तो नहीं रहे है।

प्रेग्नेंसी और संवेदना का पुराना खेल: निदा खान और सफूरा जरगर का ‘विक्टिम’ कनेक्शन

नासिक कांड में कथित तौर पर निदा खान को HR हेड कहा जा रहा है, जिसकी भूमिका सबसे संदिग्ध मानी जा रही है। आरोप है कि निदा खान न केवल इस पूरे गिरोह की जानकारी रखती थी, बल्कि जब पीड़ित हिंदू महिलाओं ने उसके पास शिकायतें भेजीं, तो उसने कोई एक्शन लेने के बजाय उन्हें यह कहकर चुप करा दिया कि ‘ऑफिसों में यह सब चलता है।’ अब जब पुलिस का शिकंजा कसा, तो निदा खान फरार हो गई और अचानक कोर्ट में अग्रिम जमानत के लिए ‘प्रेग्नेंसी’ का तर्क सामने रख दिया। सोशल मीडिया पर एक विशेष जमात ने तुरंत यह शोर मचाना शुरू कर दिया कि एक ‘गर्भवती महिला’ को पुलिस और मीडिया परेशान कर रहा है।

यह ठीक वैसा ही नैरेटिव है जैसा 2020 के दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों के समय देखा गया था। उस वक्त मुख्य साजिशकर्ताओं में शामिल सफूरा जरगर ने भी जेल से बचने के लिए अपनी प्रेग्नेंसी का हवाला दिया था। तब भी लिबरल गिरोह ने छाती पीटते हुए सफूरा को ‘बेचारी छात्रा’ और ‘स्कॉलर’ बताया था, जबकि उस पर UAPA जैसी गंभीर धाराओं के तहत सांप्रदायिक हिंसा भड़काने का आरोप था। निदा खान हो या सफूरा, ये लोग जानते हैं कि भारतीय समाज में प्रेग्नेंसी एक संवेदनशील विषय है, इसलिए वे अपने अपराधों की गंभीरता को कम करने के लिए इसे ढाल की तरह इस्तेमाल करते हैं।

‘मेरी बहू सुंदर है तो बेटा क्यों भटकेगा?’: आरोपित की अम्मी का इमोशनल ड्रामा

नासिक TCS कांड के मुख्य आरोपित दानिश शेख की गिरफ्तारी के बाद उसकी अम्मी का एक इंटरव्यू वायरल हो रहा है जिसमें वह फूट-फूटकर रोते हुए अपने बेटे को ‘बेगुनाह’ साबित करने पर तूली है। आरोपित की अम्मी ने तर्क दिया कि उनका बेटा बहुत अच्छा इंसान है और उसका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है।

सबसे अजीबोगरीब दलील जो उन्होंने दी, वो यह थी कि ‘मेरी बहू इतनी सुंदर है, मेरा बेटा किसी और के पीछे क्यों जाएगा?’ यह तर्क देकर उन्होंने उन सभी महिलाओं के आरोपों को सिरे से खारिज करने की कोशिश की जिन्होंने दानिश पर गंभीर यौन शोषण और रेप के आरोप लगाए हैं।

आरोपित दानिश की अम्मी का कहना है कि उनका परिवार पूरी तरह टूट चुका है और उनकी बहू डिप्रेशन में है। वह धर्मांतरण के आरोपों पर कहती हैं कि ‘धर्मांतरण ऐसे नहीं होता, ये काम तो सिर्फ मौलवी करते हैं।’ लेकिन पुलिस की जाँच और दर्ज की गई 9 FIR कुछ और ही कहानी बयाँ करती हैं। जाँच में सामने आया है कि यह एक संगठित नेटवर्क था जहाँ हिंदू लड़कियों पर मानसिक दबाव बनाया गया, उन्हें बीफ खाने को मजबूर किया गया और धार्मिक टिप्पणियाँ की गईं। अम्मी के आँसू अपनी जगह हो सकते हैं, लेकिन वे उन पीड़ित लड़कियों के आँसुओं का जवाब नहीं हैं जिनका शोषण ऑफिस की आड़ में किया गया।

मौलाना और ‘स्क्रिप्टेड’ साजिश: जब कुछ न मिले तो बजरंग दल को कोस दो

इस मामले में एक और एंगल आरोपितों के रिश्तेदारों और मौलानाओं की तरफ से सामने आया। आरोपित रजा मेमन के चाचा रजाक काजी का दावा है कि यह सब कुछ एक ‘साजिश’ है और इसमें बजरंग दल शामिल है। उनका कहना है कि लड़कियों के परिवारों ने बजरंग दल को बुलाया और उनके दबाव में आकर पुलिस ने यह पूरा ‘स्क्रिप्ट’ तैयार किया।

यह एक जाना-पहचाना पैंतरा है, जब भी कोई मुस्लिम आरोपित पकड़ा जाता है, तो उसे ‘मुस्लिम होने की सजा’ या ‘दक्षिणपंथी संगठनों की साजिश’ करार देकर असल अपराध से ध्यान भटकाने की कोशिश की जाती है। काजी का कहना है कि पुलिस ने पहले एक व्यक्ति को छोड़ा और फिर दोबारा गिरफ्तार कर लिया, जिससे साबित होता है कि सबकुछ पहले से तय था।

लेकिन वे इस बात का जवाब नहीं देते कि अगर सबकुछ स्क्रिप्टेड था, तो मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज हुए उन बयानों का क्या, जिनमें महिलाओं ने आपबीती सुनाई है? नासिक पुलिस कमिश्नर संदीप कर्णिक के अनुसार, यह मामला एक संगठित नेटवर्क जैसा है जिसमें 18 से 25 साल की लड़कियों को निशाना बनाया गया। मौलानाओं और आरोपितों के रिश्तेदारों द्वारा बजरंग दल का नाम लेना केवल मामले को सांप्रदायिक मोड़ देने की कोशिश है ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘मुस्लिम उत्पीड़न’ का रोना रोया जा सके।

आरोपित की बीवी का हिंदू पीड़िता पर वार

TCS के गिरफ्तार कर्मचारियों में से एक की बीवी ने अब मीडिया के सामने आकर नया दावा किया है। उनका कहना है कि दानिश शेख और शिकायतकर्ता महिला के बीच पहले से ‘रिलेशनशिप’ था और सब कुछ आपसी सहमति से हो रहा था। आरोपित की बीवी के अनुसार, “ऑफिस में हर कोई जानता था कि वह महिला दानिश की दीवानी थी और वह घंटों उसके काम खत्म होने का इंतजार करती थी।”

आरोपित की बीवी का कहना है कि उस महिला ने दानिश के लिए रोजा रखना और उसकी पसंद के कपड़े पहनना भी शुरू कर दिया था। अब जब उनके रिश्ते में कड़वाहट आई, तो उसने रेप और धर्मांतरण का आरोप लगा दिया। इस तर्क के जरिए आरोपित की बीवी न केवल दानिश को बचाने की कोशिश कर रही है, बल्कि अन्य 7 गिरफ्तार पुरुषों को भी निर्दोष बता रही है।

आरोपित की बीवी का कहना है कि पुलिस ने अलग-अलग मामलों को जानबूझकर एक साथ जोड़ दिया है। बीवी यह भी सवाल उठाती है कि ‘अगर उसका शौहर घर से शाकाहारी खाना ले जाता था, तो वह किसी को मांसाहार के लिए कैसे मजबूर कर सकता है?’ लेकिन यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि पुलिस ने केवल एक नहीं, बल्कि कई महिलाओं के बयानों के आधार पर केस दर्ज किया है।

एक महिला के साथ ‘रिलेशनशिप’ का तर्क देकर उन अन्य पीड़ितों के यौन शोषण और धार्मिक उत्पीड़न के आरोपों को नहीं झुठलाया जा सकता जिन्होंने इस संगठित नेटवर्क के खिलाफ आवाज उठाई है।

वामपंथी-लिबरल इकोसिस्टम की निर्लज्जता: अपराधियों के लिए आँसू, पीड़ितों के लिए खामोशी

नासिक के इस कांड ने एक बार फिर ‘लिबरल और वामपंथी’ गिरोह के दोहरे चरित्र को नंगा कर दिया है। जब तक पीड़ित हिंदू महिलाएँ अपनी गरिमा के लिए लड़ रही थीं, तब तक इन लोगों को ‘साँप सूँघ’ गया था। लेकिन जैसे ही मुस्लिम आरोपितों की गिरफ्तारी हुई, राजदीप सरदेसाई से लेकर अरफा खानम शेरवानी तक, पूरा इकोसिस्टम सक्रिय हो गया। इनके लिए यह ‘यौन शोषण’ नहीं बल्कि ‘रिलेशनशिप में कड़वाहट’ है। इनके लिए यह ‘धर्मांतरण’ नहीं बल्कि ‘मुस्लिम युवाओं को टारगेट’ करने की साजिश है। अरफा खानम ने तो यहाँ तक कह दिया कि मुस्लिमों को जो गिने-चुने रोजगार मिले हैं, उन्हें भी छीना जा रहा है।

नसरीन खान जैसे लोग तो इसे ‘स्मार्ट मुस्लिम लड़कों से हिंदुओं की जलन’ का मामला बता रहे हैं। ये वही लोग हैं जो आतंकियों के मानवाधिकारों के लिए आधी रात को कोर्ट खुलवाते हैं, लेकिन जब हिंदू लड़कियों को ऑफिस के भीतर नमाज पढ़ने या बुर्का पहनने के लिए मजबूर किया जाता है, तो इनके मुँह से एक शब्द नहीं निकलता। यह गिरोह जानता है कि कब कहाँ रोना है, कब विक्टिम कार्ड खेलना है और कब पीड़ित महिला का ही चरित्र हनन करना है। इनकी यह ‘चुनिंदा संवेदनशीलता’ ही भारत के सामाजिक ताने-बाने के लिए सबसे बड़ा खतरा है।

अखिलेश यादव ने लोकसभा में उठाया जिस मेरठ के शास्त्री नगर सेंट्रल मार्केट का मुद्दा, वो सपा की भ्रष्ट सरकार की देन: जानें- योगी सरकार कैसे लगा रही जख्मों पर मरहम

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने गुरुवार (16 अप्रैल 2026) को लोकसभा में महिला आरक्षण संशोधन विधेयक (नारी वंदन अधिनियम) की चर्चा के दौरान मेरठ के शास्त्री नगर सेंट्रल मार्केट का मुद्दा उठाया। उन्होंने भावुक अंदाज में कहा, “महिलाओं का दर्द क्या होता है, ये मेरठ के दुकानदारों की महिलाओं से पूछो।” अखिलेश ने सुझाव दिया कि अगर यह बिल इतना सही है तो इसे मेरठ और नोएडा के परिवारों के बीच घोषित किया जाए।

अखिलेश यादव ने ये बयान लोकसभा में दिया, जोकि पूरी तरह से राजनीतिक स्टंट ही है। क्योंकि सच्चाई इससे कोसों दूर है। दरअसल, मेरठ शास्त्री नगर सेंट्रल मार्केट में जो ध्वस्तीकरण और सीलिंग चल रही है, वह सपा सरकार (2012-2017) की भ्रष्टाचार, लापरवाही और राजनीतिक संरक्षण की देन है। यह कोई अचानक संकट नहीं, बल्कि 2012-17 में बोए गए बीजों का वटवृक्ष है। जबकि योगी आदित्यनाथ सरकार सुप्रीम कोर्ट में आम व्यापारियों की रोजी-रोटी और आशियाने बचाने के लिए लगातार लड़ रही है। ऐसे में अखिलेश यादव का संसद में रोना-धोना बेशर्मी का चरम है, जिसमें सौ बिल्लियाँ खाकर चूहा हज को निकला है।

क्या है मामला? कैसे सपा सरकार ने दिया भ्रष्ट लोगों को संरक्षण

मेरठ के शास्त्री नगर सेंट्रल मार्केट में 859 आवासीय प्लॉट 1978 में उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद (AEVP) द्वारा आवंटित किए गए थे। मास्टर प्लान और बिल्डिंग बायलॉज के अनुसार, ये प्लॉट स्पष्ट रूप से आवासीय उपयोग के लिए थे। मास्टर प्लान और बिल्डिंग बायलॉज के अनुसार इन पर व्यावसायिक निर्माण या सेटबैक का अतिक्रमण अवैध था। दशकों तक इन प्लॉटों पर दुकानें, कॉम्प्लेक्स, स्कूल, अस्पताल और बैंक बनते गए। लेकिन असली समस्या 2012-2017 के सपा शासन में उभरी।

सपा सरकार के दौरान आवास विकास परिषद ने बार-बार शिकायतें कीं कि आवासीय प्लॉटों पर अवैध व्यावसायिक निर्माण हो रहे हैं। परिषद ने मास्टर प्लान उल्लंघन, बिना अनुमति के निर्माण और भ्रष्ट तरीके से कब्जे की रिपोर्ट भी दी। लेकिन सपा सरकार ने न केवल परिषद की नहीं सुनी, बल्कि भ्रष्टाचार और राजनीतिक दबाव के जरिए इन अतिक्रमणों को संरक्षण दिया। स्थानीय सपा नेताओं और अधिकारियों के बीच साँठ-गाँठ से पैसे लेकर अवैध निर्माणों को छूट मिली। जब परिषद ने कार्रवाई की कोशिश की तो धमकियाँ दी गईं और सरकार का दबाव डाला गया।

ये रहा 13-18 अगस्त 2013 का आधिकारिक दस्तावेजी सबूत

यह दस्तावेज उत्तर प्रदेश आवास एवँ विकास परिषद, निर्माण खंड-8, मेरठ का है (पत्रांक 1716/अधि0अभि0/नि0ख0-8/मेरठ/4-8, दिनांक 17-8-2013)। यह शास्त्री नगर, सो-661/6 (सेंट्रल मार्केट क्षेत्र) के आवासीय प्लॉट पर अवैध व्यावसायिक निर्माण की शिकायत है।

परिषद ने लिखा-

  • प्लॉट के फ्रंट भाग पर पूर्व से ही अवैध निर्माण हो रहा था।
  • 23.7.2013 को फील्ड स्टाफ को धमकी दी गई।
  • 29.7.2013 को नोटिस जारी किया गया।
  • 30.7.2013 को थाना नौचंदी में रिपोर्ट दर्ज की गई।
  • 6.8.2013 को निर्माणकर्ता विनोद अरोड़ा ने फिर अवैध निर्माण शुरू किया।
  • 7.8.2013 को वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और नगर मजिस्ट्रेट को लिखा गया।
  • 13.8.2013 को शाम 5 बजे 4-5 लड़के असिस्टेंट इंजीनियर के घर पहुँचे और उसे धमकाया। उन्होंने कहा कि हम देख लेंगे।
  • 17.8.2013 को फिर मोबाइल पर धमकी दी गई (नंबर 9997949798)।

इस मामले में परिषद ने जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक से सख्त कार्रवाई की माँग की और निर्माणकर्ता विनोद अरोड़ा को जिम्मेदार ठहराया। दस्तावेज़ पर अरबिंद कुमार (अधिशासी अभियंता) के हस्ताक्षर हैं।

यह पत्र सपा शासन (अखिलेश यादव सरकार) के बीच का है। परिषद ने कानून के अनुसार कार्रवाई की माँग की गई, लेकिन सपा सरकार ने परिषद की नहीं सुनी। अवैध निर्माण नहीं रुके। जो कि भ्रष्टाचार और लापरवाही का प्रमाण है। एक तरफ परिषद के अधिकारियों को धमकियाँ मिलती रही, तो दूसरी तरफ सपा सरकार ने मौन साधे रखा और अपराधियों को खुला संरक्षण दिया जाता रहा।

बता दें कि साल 2013 में ही इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इन अवैध निर्माणों पर ध्वस्तीकरण का आदेश दिया था, लेकिन सपा सरकार ने उसे लागू नहीं किया। परिणामस्वरूप 2017 तक सैकड़ों अवैध कॉम्प्लेक्स खड़े हो गए। सपा ने व्यापारियों को भ्रम में रखा कि सब ठीक है। उन पर कोई कार्रवाई नहीं होगी, क्योंकि सरकार उनके साथ है।

योगी सरकार ने साल 2025 में की सुधार की कोशिश

इन घटनाक्रमों के बाद साल 2017 में योगी सरकार सत्ता में आई। इसके बाद मेरठ में आवास विकास परिषद ने फिर से शिकायतें बढ़ाईं। इन शिकायतों को ध्यान में रखते हुए साल साल 2025 में यूपी सरकार ने मास्टर प्लान में संशोधन (बाय-लॉ) लाकर इन क्षेत्रों को नियमित करने का प्रयास किया। उद्देश्य था पुरानी गलतियों को सुधारते हुए आम लोगों का आशियाना बचाना।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया। दिसंबर 2024 और सितंबर 2025 के आदेशों में कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि आवासीय प्लॉटों पर व्यावसायिक उपयोग अवैध है। सुप्रीम कोर्ट ने AEVP को 859 संपत्तियों पर कार्रवाई के निर्देश दिए, जिसके बाद अक्टूबर 2025 में 22 दुकानों का कॉम्प्लेक्स ध्वस्त कर दिया गया। इसके अगले चरण में अप्रैल 2026 में 44 संपत्तियों को सील किया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व कमिश्नर हृषिकेश भास्कर यशोद को ‘पब्लिक ह्यू एंड क्राई’ का हवाला देकर ध्वस्तीकरण रोकने पर फटकार लगाई और अवमानना की कार्यवाही चलाई। कोर्ट का रुख था कि कानून का राज सर्वोपरि है, दशकों की अनदेखी अब नहीं चलेगी।

लेकिन योगी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में आम लोगों की लड़ाई लड़ी। सरकार ने कोर्ट से गुहार की कि सपा काल की लापरवाही से भ्रमित व्यापारियों को अचानक बर्बाद न किया जाए। वैकल्पिक व्यवस्था, मुआवजा और सीमित राहत की दलीलें दीं। कोर्ट ने स्कूलों को सामान निकालने का समय दिया। यूपी सरकार आज भी सुप्रीम कोर्ट में पीड़ितों की रोजी-रोटी बचाने के लिए लड़ रही है।

मेरठ में आज आज 1400+ दुकानें प्रभावित हैं, लेकिन जिम्मेदार सपा की 2012-17 की भ्रष्ट नीति है, न कि योगी सरकार। अखिलेश यादव संसद में BJP को दोषी ठहरा रहे हैं, जबकि उनकी सरकार ने ही बीज बोए।

योगी सरकार ने पीड़ितों की मदद के लिए किए मानवीय प्रयास

योगी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बार-बार कहा कि हम कानून का पालन करेंगे, लेकिन आम आदमी का आशियाना भी बचाना हमारा कर्तव्य है। इसके लिए व्यापारियों को वैकल्पिक बाजार, मुआवजा पैकेज और पुनर्वास की योजनाएँ शुरू की जा रही हैं। यह योगी सरकार का मानवीय चेहरा है। जो सपा की तरह दबाव या भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि कानून और जनहित का संतुलन बनाकर चल रही है।

मेरठ सेंट्रल मार्केट का मामला केस स्टडी है। यह दिखाता है कि भ्रष्टाचार कैसे दशकों बाद आम आदमी को संकट में डालता है। भले ही लोकसभा में अखिलेश यादव इस मामले में राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के लिए बयान दे रहे हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि मेरठ के व्यापारी सपा की देन से जूझ रहे हैं और योगी सरकार उन्हें बचाने की कोशिश कर रही है।

जो कॉन्ग्रेस विधायक विनय कुलकर्णी अब भाजपा नेता की हत्या मामले में हुआ दोषी करार, उसने ऑपइंडिया को धमकाने के लिए भेजे थे 12 ईमेल: पढ़िए डिटेल और जानिए क्या था पूरा मामला

बेंगलुरु की एक विशेष अदालत ने 15 अप्रैल 2026 को कॉन्ग्रेस विधायक विनय राजशेखरप्पा कुलकर्णी और उनके साथियों को बीजेपी नेता योगेश गौड़ा की हत्या का दोषी करार दिया है। यह हत्या साल 2016 में हुई थी। सीबीआई (CBI) की ओर से पेश हुए वकील ने दोषियों के लिए कड़ी से कड़ी सजा की माँग की है, जिस पर फैसला 17 अप्रैल 2026 को सुनाया जाएगा।

हैरानी की बात यह है कि पिछले कुछ महीनों से कुलकर्णी की एक ‘ब्रांड प्रोटेक्शन’ टीम मीडिया संस्थान ‘ऑपइंडिया’ पर दबाव बना रही थी। जून 2025 से अब तक करीब 12 ईमेल भेजकर ऑपइंडिया को धमकाया गया कि वे कुलकर्णी के आपराधिक मामलों से जुड़ी खबरें हटा लें। विधायक के प्रतिनिधियों ने उन खबरों को भी हटाने का दबाव बनाया जो अदालती फैसलों पर आधारित थीं।

हत्या की साजिश में कुलकर्णी दोषी करार

बेंगलुरु की विशेष अदालत ने कॉन्ग्रेस विधायक विनय कुलकर्णी और उनके साथियों को 2016 के हत्या मामले में आपराधिक साजिश का दोषी पाया है। कुलकर्णी, जो वर्तमान में कर्नाटक शहरी जल आपूर्ति बोर्ड के अध्यक्ष हैं, इस केस में 15वें आरोपित थे। साल 2020 में सीबीआई (CBI) द्वारा जाँच हाथ में लेने के बाद चली लंबी सुनवाई के बाद यह फैसला आया है।

पावर का गलत इस्तेमाल और बेरहमी

CBI के वकील ने कोर्ट में बताया कि यह एक ठंडे दिमाग से रची गई साजिश थी, जिसका मकसद राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी योगेश गौड़ा को खत्म करना था। उन्होंने आरोप लगाया कि कुलकर्णी ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए पुलिस मशीनरी का गलत इस्तेमाल किया, फर्जी दस्तावेज बनवाए और सबूत मिटाने की कोशिश की।

बेरहमी से ली गई जान

कोर्ट को बताया गया कि योगेश गौड़ा की हत्या बेहद बेरहमी से की गई थी। हमलावरों ने पहले उनकी आँखों में लाल मिर्च पाउडर फेंका और फिर उनकी जान ले ली। सरकारी वकील ने इस बात पर जोर दिया कि एक विधायक होने के नाते कुलकर्णी की भूमिका बेहद गंभीर है, क्योंकि उन्होंने कानून की रक्षा करने के बजाय खुद अपराध की साजिश रची।

सरकारी गवाह को सता रहा पछतावा

इस मामले में आरोपित से सरकारी गवाह बने बसवराज मुत्तगी ने मीडिया से बात करते हुए अपना दर्द साझा किया। उन्होंने कहा कि साजिश में अपनी भूमिका को लेकर वे ग्लानि और पछतावे में जी रहे हैं। मुत्तगी के मुताबिक, उनकी असली कानूनी लड़ाई और संघर्ष तो अब शुरू होगा।

17 आरोपित दोषी, कुछ को मिली राहत

सीबीआई ने इस लंबे समय से चल रहे केस में कुल 21 लोगों को आरोपित बनाया था, जिनमें से कोर्ट ने 17 को दोषी करार दिया है। दो आरोपित सरकारी गवाह बन गए थे, जबकि दो अन्य को कोर्ट ने रिहा करने का आदेश दिया है। वहीं, एक सरकारी गवाह के मुकर जाने पर CBI ने उसे फिर से आरोपित बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

खबरें हटवाने के लिए मीडिया को धमकी

जाँच में यह भी सामने आया कि कुलकर्णी की ‘ऑनलाइन साख’ बचाने के लिए एक ‘ब्रांड प्रोटेक्शन’ कंपनी ने मीडिया संस्थान ‘ऑपइंडिया’ को धमकाया था। जून 2025 में भेजे गए ईमेल में कंपनी ने कुलकर्णी का एक लेटर दिखाया, जिसमें विधायक ने दावा किया था कि कुछ लोग उनकी छवि खराब करने की कोशिश कर रहे हैं। इस कंपनी के जरिए कुलकर्णी अदालती फैसलों पर आधारित खबरों को भी इंटरनेट से हटवाने का दबाव बना रहे थे।

स्रोत: ऑपइंडिया

कुलकर्णी का दावा था कि उनके खिलाफ छप रही खबरों से उनके सालों के करियर और साख को नुकसान पहुँच रहा है। इसी वजह से उन्होंने एक कंपनी को अपनी ‘ऑनलाइन इमेज’ सुधारने की जिम्मेदारी दी। उन्होंने कंपनी को अधिकार दिया कि वह इंटरनेट पर उनके खिलाफ चल रही अफवाहों, फेक न्यूज और गलत बयानों को हटाए और कोर्ट के आदेशों को लागू करवाए।

इसी कंपनी ने ‘ऑपइंडिया’ को ईमेल भेजकर 24 घंटे के अंदर तीन लेख (Articles) हटाने की चेतावनी दी। साथ ही कोर्ट के कुछ आदेशों की कॉपी भी भेजी। जब ऑपइंडिया ने उन आदेशों की जाँच की, तो पाया कि उनका इस कानूनी मामले से कोई लेना-देना ही नहीं था। दिलचस्प बात यह है कि यह ईमेल किसी कानूनी फर्म के बजाय एक ‘ब्रांड प्रोटेक्शन’ कंपनी की तरफ से आया था, इसलिए संस्थान ने खबरें हटाने से इनकार कर दिया।

ईमेल में साफ तौर पर कहा गया था कि अगर खबरें नहीं हटाई गईं, तो उनके पास ऑपइंडिया के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा। विधायक की टीम इन खबरों को पूरी तरह मिटाना चाहती थी, ताकि कुलकर्णी की छवि पर कोई आँच न आए।

सोर्स: ऑपइंडिया

25 जून को कंपनी ने दोबारा ईमेल भेजकर 24 घंटे में खबरें हटाने को कहा। इसके बाद जुलाई और अगस्त के बीच लगातार 10 बार रिमाइंडर्स भेजे गए। गौर करने वाली बात यह है कि 22 जुलाई के बाद से कंपनी ने केवल एक ही लेख को हटाने पर जोर दिया, जबकि बाकी दो लेखों को लेकर उनकी आपत्ति अचानक खत्म होती दिखी।

खबरें हटाने की इस माँग का आधार कर्नाटक हाई कोर्ट का एक आदेश था। उस आदेश में कोर्ट ने यूट्यूब, फेसबुक और एक्स (X) जैसे प्लेटफॉर्म्स को कुलकर्णी के खिलाफ अपमानजनक सामग्री हटाने को कहा था। इस केस में गृह मंत्रालय और पुलिस को भी शामिल किया गया था। लेकिन जब ऑपइंडिया ने कानूनी कागजात देखे, तो पता चला कि कोर्ट ने उन्हें कोई आदेश नहीं दिया था। कंपनी उस अदालती आदेश का गलत इस्तेमाल करके एक ऐसे संस्थान से खबरें हटवाना चाहती थी, जिसका उस केस से कोई सीधा ताल्लुक ही नहीं था।

क्या था योगेश गौड़ा मर्डर केस?

योगेश गौड़ा धारवाड़ से बीजेपी नेता और जिला पंचायत सदस्य थे। 15 जून 2016 को उनकी जिम में घुसकर बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। शुरुआत में स्थानीय पुलिस ने जाँच की, लेकिन योगेश के भाई ने सीबीआई (CBI) जाँच की माँग की। राज्य में बीजेपी की सरकार आने के बाद यह केस 2019 में सीबीआई को सौंप दिया गया। जाँच के बाद सीबीआई ने इस मामले में कॉन्ग्रेस नेता विनय कुलकर्णी को मुख्य साजिशकर्ताओं में शामिल पाया और नवंबर 2020 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

सीबीआई के मुताबिक, इस हत्या के पीछे राजनीतिक दुश्मनी थी। कुलकर्णी ने योगेश को चुनाव न लड़ने की चेतावनी दी थी, जिसे योगेश ने नहीं माना। जाँच में सामने आया कि हत्या के वक्त अपनी मौजूदगी छिपाने के लिए कुलकर्णी ने दिल्ली की यात्रा का बहाना (Alibi) बनाया था। वे मर्डर से ठीक पहले और ठीक बाद में दिल्ली गए थे, जिसके टिकट उसी दिन बुक किए गए थे। कोर्ट में बताया गया कि यह सब सोची-समझी प्लानिंग का हिस्सा था।

कुलकर्णी को 2021 में जमानत मिली थी, लेकिन जून 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने उसे रद्द कर दिया। कोर्ट ने माना कि कुलकर्णी गवाहों को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे थे। सुनवाई के दौरान जस्टिस पीवी संजय कुमार ने बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि कुलकर्णी और केस के मुख्य आरोपित के बीच 5 महीनों में 57 बार फोन पर बातचीत हुई थी। कोर्ट ने यहाँ तक कहा कि आरोपित ने मृतक की विधवा को भी अपने पक्ष में ‘खरीद’ लिया था। जब कुलकर्णी के वकील ने केस खत्म करने की याचिका वापस लेनी चाही, तो जज ने नाराजगी जताते हुए कहा कि कोर्ट को ‘जुआघर’ बना दिया गया है।

(ये रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है। अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

राहुल गाँधी रो रहे जिस ‘गेरिमांडरिंग’ का रोना, भारत को सच में उसकी जरूरत: समझें- लोकतंत्र को बचाने के लिए डीलिमिटेशन क्यों है जरूरी

संसद सत्र के बीच राहुल गाँधी ने एक्स पर ट्वीट कर बीजेपी पर गंभीर आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए बीजेपी सभी सीटों को गेरिमांडरिंग (सीमा पुनर्निर्धारण) करके फायदा उठाना चाहती है। उन्होंने दावा किया कि प्रस्तावित बिल संवैधानिक सुरक्षा हटा रहे हैं, जिससे सरकार खुद डेलिमिटेशन कमीशन नियुक्त कर निर्देश दे सकेगी।

राहुल ने असम और जम्मू-कश्मीर के उदाहरण दिए जहाँ बीजेपी ने कथित तौर पर विरोधी क्षेत्रों को तोड़ा और वोटरों को बराबर नहीं रखा। कुछ सीटों पर 25 लाख वोटर तो कुछ पर सिर्फ 8 लाख… कुछ लोकसभा सीट में 12 विधानसभा सीटें, तो कुछ पर 6 राहुल का कहना है कि मोदी सरकार चुनाव आयोग पर कब्जा कर चुकी है, अब डेलिमिटेशन पर भी कब्जा करना चाहती है। कॉन्ग्रेस इसे नहीं होने देगी।

राहुल गाँधी की बातों में कितनी सच्चाई?

लेकिन सच्चाई यह है कि राहुल गाँधी फर्जी और भड़काऊ आरोप लगा रहे हैं। हकीकत में भारत को इस तरह के निष्पक्ष डेलिमिटेशन की सख्त जरूरत है। मुस्लिम आबादी वाले कुछ इलाकों में ‘मुस्लिम वीटो’ की वजह से लोकतंत्र की जड़ें हिल रही हैं। जहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक हैं, वहाँ गैर-मुस्लिम उम्मीदवार कभी नहीं जीत पाते। जीतना तो छोड़िए, राजनीतिक दल उन सीटों पर गैर-मुस्लिम उम्मीदवार तक नहीं उतारते। अकेले यूपी में ही ऐसी कई लोकसभा-विधानसभा सीटें हो चली हैं, जिसमें से एक रामपुर ही है।

मुस्लिम बाहुल सीटों होने की स्थिति में दूसरे समुदायों का अधिकार छिन जाता है, इलाके गेट्टो (घेट्टो) बन जाते हैं, हिंदू भगाए जाते हैं और तुष्टीकरण की राजनीति चलती है। आम जनता से पूछ लीजिए तो हर कोई कहेगा कि वोट का बराबर अधिकार चाहिए, किसी एक समुदाय का वीटो नहीं चलेगा। हालाँकि बीजेपी ऐसा कुछ गैरकानूनी नहीं कर रही है, लेकिन अगर निष्पक्ष तरीके से किया जाए तो यह लोकतंत्र को मजबूत ही करेगा।

क्या है मुस्लिम वीटो

मुस्लिम वीटो का मतलब समझिए। जहाँ मुस्लिम आबादी 40-50 प्रतिशत से ज्यादा है, वहाँ वे ब्लॉक वोटिंग करते हैं। सारे वोट एक तरफ जाते हैं। नतीजा? गैर-मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट ही नहीं मिलता या मिले तो हार जाता है। उदाहरण लीजिए केरल का मलप्पुरम लोकसभा क्षेत्र। यहाँ मुस्लिम आबादी 70 प्रतिशत से ज्यादा है।

आज से नहीं बल्कि आजादी के बाद यानी साल 1952 से ही इस सीट पर आज तक हमेशा मुस्लिम उम्मीदवार ही जीतता है। हिंदू या ईसाई उम्मीदवार का नामोनिशान नहीं होता। इसी तरह बिहार का किशनगंज, पश्चिम बंगाल के कई सीटें जहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक हैं, वहाँ हिंदू उम्मीदवार का जीतना लगभग नामुमकिन होता है।

बता दें कि असम में डेलिमिटेशन से पहले 35 विधानसभा सीटें मुस्लिम बहुसंख्यक थीं, जो अब घटकर 20 रह गई हैं। इससे साफ है कि पहले वीटो था इन इलाकों में।

समझिए कैसे पड़ता है फर्क, ये उदाहरण आँखें खोलने वाले हैं

इस वीटो का असर सड़क पर भी दिखता है। इलाके गेट्टो बन जाते हैं। हिंदू परिवार डर के मारे भाग जाते हैं। 2016 में उत्तर प्रदेश के कैराना में भाजपा सांसद हुकुम सिंह ने खुलासा किया था कि 346 हिंदू परिवार मुस्लिम अपराधी गिरोहों के डर से भाग गए। उनकी दुकानें लूटी गईं, महिलाओं पर हमले हुए, लेकिन पुलिस भी कुछ नहीं कर सकी। क्योंकि लखनऊ में मुस्लिम हितैषी सरकार मौजूद रही। जनप्रतिनिधि भी उसी समुदाय से।

इसी तरह दिल्ली के हौज काजी इलाके में 2019 में मंदिर तोड़ने की घटना हुई। तनाव बढ़ा तो हिंदू परिवारों ने सोचा कि सुरक्षित मुस्लिम-बहुल इलाकों में रहना ठीक नहीं। इसके आगे की कड़ी देखिए कि साल 2020 के हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों के बाद सीलमपुर-मुस्तफाबाद जैसे इलाकों में हिंदू और मुस्लिम दोनों गेट्टो में शिफ्ट हो गए। इसकी वजहसे हिंदू कमजोर पड़कर भागे और इसके नतीजे क्या होते हैं? ऐसी स्थिति में विकास रुक जाता है, अपराध बढ़ता है, हिंदू-मुस्लिम अलगाव गहराता है।

यह तुष्टीकरण की राजनीति का नतीजा है। ठीक वैसे जैसे 1932 का कम्यूनल अवॉर्ड। उस समय अंग्रेजों ने मुसलमानों को अलग इलेक्टोरेट दे दिया। इसका नतीजा क्या हुआ? इतिहास गवाह है कि अंग्रेजों के इस तरह से मुस्लिम लीग मजबूत होती चली गई और भारत देश का ही 3 टुकड़ों में विभाजन हो गया।

आज भी वही खेल चल रहा है। मुस्लिम वीटो वाली सीटों पर पार्टियाँ मस्जिद-मदरसे, ट्रिपल तलाक जैसे मुद्दों पर तुष्टीकरण करती हैं। विकास, शिक्षा, नौकरी सब पीछे छूट जाता है। हिंदू परिवारों का पलायन आम हो गया है। असम, पश्चिम बंगाल, केरल, यूपी के कुछ जिलों में यह सिलसिला चल रहा है।

राहुल गाँधी कहते हैं कि बीजेपी ने असम और जम्मू-कश्मीर में डेलिमिटेशन हाइजैक किया। लेकिन सच्चाई उलट है। असम में डेलिमिटेशन से मुस्लिम बहुसंख्यक सीटें घटीं क्योंकि आबादी के हिसाब से निष्पक्ष बंटवारा हुआ। जम्मू-कश्मीर में जम्मू (हिंदू बहुल) को ज्यादा सीटें मिलीं, कश्मीर (मुस्लिम बहुल) को कम। यह गेरिमांडरिंग नहीं, बल्कि लोकतंत्र की सच्चाई है, आबादी के हिसाब से प्रतिनिधित्व।

समझें- दक्षिण के राज्यों को होगा कितना फायदा

यहाँ ये समझना जरूरी है कि 1971 की जनगणना पर आधारित सीटें 1976 से फ्रीज हैं। तब से लेकर अब तक उत्तर भारत और मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों में आबादी तेजी से बढ़ी, जबकि दक्षिण के राज्य पीछे छूट गए। नया डेलिमिटेशन इसी असमानता को दूर करेगा।

गृह मंत्री अमित शाह ने दक्षिण के पाँचों राज्यों कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और केरल का नाम लेकर बताया कि परिसीमन के बाद किस राज्य की सीटें कितनी होंगी। कर्नाटक राज्य का लोकसभा के 543 में सदस्यों में 28 सांसद हैं। कर्नाटक का लोकसभा में प्रतिनिधित्व 5.15 प्रतिशत है। बिल पारित होने और संविधान संशोधन होने के बाद कर्नाटक के सांसदों की संख्या 28 से बढ़कर 42 हो जाएगी, और लोकसभा में कर्नाटक का प्रतिनिधित्व 5.14 प्रतिशत हो जाएगा। इस तरह से कर्नाटक को जरा भी नुकसान नहीं होगा।

गृह मंत्री ने कहा कि अभी लोकसभा में तमिलनाडु के 39 सांसद हैं और लोकसभा में तमिलनाडु का प्रतिनिधित्व 7.18 प्रतिशत है, परिसीमन के बाद तमिलनाडु के सांसदों की संख्या बढ़कर 59 हो जाएगी और तमिलनाडु की हिस्सेदारी 7.23 प्रतिशत हो जाएगी। गृह मंत्री ने कहा कि नए सदन में सांसदों की कुल संख्या 816 होगी।

दक्षिण भारत के आखिरी राज्य केरल का जिक्र करते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि केरल की अभी 20 सीटें हैं और यहाँ की हिस्सेदारी 3.68 प्रतिशत है, लेकिन परिसीमन लागू होने के बाद केरल की सीटें 30 हो जाएगी और हिस्सेदारी 3.67 प्रतिशत हो जाएगी।

राहुल गाँधी को वोटबैंक छिटकने का डर

हालाँकि राहुल गाँधी के आरोपों को देखें तो बीजेपी ऐसा कुछ कर भी नहीं रही बल्कि वो प्रस्तावित बिल पारदर्शी नीति और व्यापक चर्चा के बाद डेलिमिटेशन चाहती है, लेकिन राहुल गाँधी डर रहे हैं क्योंकि उनका वोट बैंक टूट सकता है। लेकिन आम जनता जानती है कि लोकतंत्र में हर वोट बराबर होना चाहिए। कोई समुदाय वीटो नहीं चला सकता। अगर सीटें आबादी के हिसाब से बंटेंगी तो मुस्लिम-बहुल गेट्टो टूटेंगे, हिंदू परिवार सुरक्षित रहेंगे, तुष्टीकरण बंद होगा और विकास सबके लिए होगा।

राहुल गाँधी का आरोप सिर्फ राजनीतिक चाल है। हकीकत यह है कि भारत को निष्पक्ष डेलिमिटेशन की जरूरत है। इससे सड़क पर शांति आएगी, चुनाव में सच्चा प्रतिनिधित्व होगा और लोकतंत्र मजबूत बनेगा। बीजेपी अगर यह करती है तो यह देश की भलाई के लिए करेगी। आम आदमी तो यही चाहता है। जिसमें न कोई वीटो हो, न कोई तुष्टीकरण हो, अगर कुछ हो तो वो है समान न्याय।

परिसीमन में किसी राज्य को नुकसान नहीं होगा, PM के वादे के बावजूद वामपंथी-लिबरल गैंग का प्रोपेगेंडा जारी: The Quint ने तो बता दिया ‘वोट चोरी’

प्रधानमंत्री मोदी ने लोकसभा में परिसीमन समेत 3 संविधान संशोधन बिल पर बोलते हुए राज्यों को भरोसा दिलाया है कि किसी भी राज्य को परिसीमन से घाटा नहीं होगा। इसके बावजूद प्रोपेगेंडा फैलाने में माहिर ‘द क्विंट’ ने दुष्प्रचार करते हुए इसे ‘3-चरणों वाली वोट चोरी’ करार दिया है।

पीएम मोदी ने परिसीमन को लेकर किया वादा

लोकसभा में पीएम मोदी ने कहा कि वह राज्यों से वादा करते हैं और गारंटी देते हैं कि किसी की राज्य के साथ भेदभाव नहीं होगा, अन्याय नहीं होगा। पहले के अनुपात को मेंटेन किया जाएगा। उन्होंने कहा कि अतीत में जो सरकारें रही, जिनके कालखंड में परिसीमन हुए जो उस समय अनुपात चल रहा है उसी अनुपात का पालन किया जाएगा।

इससे पहले गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि परिसीमन बिल को लेकर भ्रम फैलाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि दक्षिणी राज्यों को भी इससे फायदा होगा। उदाहरण देते हुए कहा कि कर्नाटक राज्य में 28 सीटें हैं। यह संविधान संशोधन होने के बाद कर्नाटक की सीटों की संख्या 28 से 42 हो जाएगी।

‘द क्विंट’ ने किया भ्रामक प्रचार

‘द क्विंट’ में एक लेख छपा है, जिसका शीर्षक ‘परिसीमन विधेयक विपक्ष के विरुद्ध 3-चरणों वाली वोट चोरी’ है। पत्रकार आदित्य मेनन ने प्रस्तावित परिसीमन को मोदी सरकार द्वारा की गई 3-चरणों वाली वोट चोरी करार दिया। उन्होंने दावा किया कि इसमें जनसंख्या के आँकड़ों का इस्तेमाल होगा। चुनावी क्षेत्रों की मनमानी सीमाबंदी होगी और उन क्षेत्रों की सीटों की संख्या में जानबूझकर कटौती की जाएगी, जहाँ विपक्ष मजबूत है। खासकर दक्षिणी राज्यों में।

इस्लाम कबूल करने वाले आदित्य मेनन ने असम और जम्मू-कश्मीर में हुए परिसीमन का उदाहरणों देते हुए दावा किया है कि किसी न किसी तरह परिसीमन की प्रक्रिया बीजेपी को फायदा पहुँचाने के लिए ही किया जाता है।

मेनन ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहते हैं कि उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 138 हो जाएँगी, बिहार की सीटें 40 से बढ़कर 72, तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर 50, और केरल की सीटें 20 से बढ़कर 23 हो जाएँगी। इसके आधार पर उनका दावा है कि प्रस्तावित परिसीमन के बाद न केवल दक्षिणी राज्यों में, बल्कि उन जगहों के सीटों के अनुपात में कमी आएगी, जहाँ BJP का प्रदर्शन कमजोर रहता है।

‘द क्विंट’ के लेख के मुताबिक, “उत्तर प्रदेश, जिसकी 543-सदस्यीय लोकसभा में अभी 80 सीटें हैं, नई 850-सदस्यीय लोकसभा में 125 सीटें होनी चाहिए थीं। ज़्यादा जनसंख्या वृद्धि दर के कारण अब इसकी सीटें 138 होंगी। बिहार, जिसकी 62 सीटें होनी चाहिए थीं, अब 72 होंगी। राजस्थान, जिसकी 39 सीटें होनी चाहिए थीं, अब 47 होंगी। इसके विपरीत, तमिलनाडु, जिसकी बढ़ी हुई लोकसभा में 61 सीटें होनी चाहिए थीं, अब 50 होंगी। केरल की 31 के बजाय 23 सीटें होंगी। आंध्र प्रदेश की 39 के बजाय 34 सीटें होंगी।”

यह प्रोपेगैंडा लेख मुस्लिमों को ‘पीड़ित’ दिखाने पर जोर देता है। इसमें कहा गया है कि अगर ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ के सिद्धांत का सच में सम्मान किया जाता, तो 2023 के परिसीमन के दौरान असम की मुस्लिम-बहुल धुबरी में बरपेटा से 10 लाख अतिरिक्त वोटरों को नहीं जोड़ा जाता। इसका मकसद धुबरी को ‘रातों-रात हिंदू-बहुल सीट’ बनाया गया।

आदित्य मेनन, इस्लामी-वामपंथी प्रोपेगैंडा करने वालों की आजमाई हुई तरकीब का इस्तेमाल करते हैं। वे चुनिंदा आँकड़े उठाते हैं और उन्हें ‘पीड़ित’ दिखा कर मोदी सरकार को खलनायक की तरह पेश करते हैं।

परिसीमन के दौरान चुनावी क्षेत्रों की मनमानी सीमाबंदी कह कर यह दिखा जा रहा है कि ‘मुस्लिम वोटरों को कमजोर’ करने की कोशिश की जा रही है। दरअसल यह लोगों में दहशत फैलाने के लिए किया गया है। असम में चुनाव आयोग ने 2001 की जनगणना के आँकड़ों के साथ-साथ जनसंख्या घनत्व के आधार पर जिलों को A/B/C श्रेणियों में बाँटा था, जिसमें राज्य के औसत से ±10% तक बदलाव की छूट दी गई थी।

(साभार- द क्विंट)

जम्मू और कश्मीर में 2022 के परिसीमन के दौरान आयोग ने जनसंख्या, सीमा से निकटता, प्रशासनिक कारक और भूगोल को ध्यान में रखा। अनंतनाग को पीर पंजाल के उस पार के राजौरी और पुंछ क्षेत्रों के साथ मिला दिया गया, जिससे अनंतनाग-राजौरी लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र बना। यह निर्वाचन क्षेत्र पीर पंजाल पर्वतमाला को जोड़ता है, और घाटी में स्थित अनंतनाग को जम्मू संभाग के सीमावर्ती जिलों राजौरी-पुंछ से मिलाता है।

हालाँकि परिसीमन प्रक्रिया में धार्मिक जनसांख्यिकी को शामिल नहीं किया जाता है, फिर भी इस विलय के बाद एक नया चुनावी परिदृश्य सामने आया। आदित्य मेनन की की सारी नाराजगी इसी को लेकर है।

The Quint सिर्फ मुसलमानों को पीड़ित दिखाने और ‘दक्षिण को सीटें गँवानी पड़ेंगी’ वाली अफवाहें फैलाने तक ही नहीं रुका। इसने तो ‘भाषाई अल्पसंख्यक’ का मुद्दा भी उठा दिया।

सरकार ने कहा है कि हर राज्य में सीटों की संख्या आनुपातिक आधार पर 50% बढ़ाई जाएगी, जिससे लोकसभा में उनकी मौजूदा आनुपातिक ताकत बनी रहेगी। न तो किसी दक्षिणी राज्य को, न पंजाब को, और न ही पश्चिम बंगाल को सीटों की कुल संख्या के मामले में एक भी सीट का नुकसान होगा।

यह बात तथ्यों के आधार पर सही है कि दक्षिणी राज्यों ने आबादी नियंत्रण के उपायों और आर्थिक मोर्चे पर अच्छा प्रदर्शन किया है। इस सराहनीय प्रदर्शन का इनाम उन्हें उनकी मौजूदा हिस्सेदारी के अनुपात में कुल सीटों में बढ़ोतरी के रूप में दिया जा रहा है। सीटों की कुल संख्या तो बढ़ने ही वाली है।

भले ही विपक्ष परिसीमन के प्रस्ताव को दक्षिण के लिए ‘सजा’ के तौर पर पेश कर रहा हो, लेकिन असल में उत्तरी राज्यों के मतदाताओं का प्रतिनिधित्व व्यवस्थित रूप से कम है। सच तो यह है कि दक्षिणी राज्यों के सीटें खोने के डर से कहीं ज़्यादा, भाजपा-विरोधी गुट परिसीमन का विरोध इसलिए कर रहा है क्योंकि देश के सबसे ज़्यादा आबादी वाले राज्यों को ज्यादा प्रतिनिधित्व मिलेगा। वे परिसीमन की प्रक्रिया और उसके नतीजों को देश भर में भाजपा-समर्थक और भाजपा-विरोधी के चश्मे से देख रहे हैं।

भले ही भाजपा पहले कर्नाटक में सत्ता में रह चुकी है और आंध्र प्रदेश में सत्ताधारी गठबंधन का हिस्सा है, फिर भी दक्षिणी राज्यों को ऐतिहासिक रूप से भाजपा-विरोधी के तौर पर दिखाया जाता है, जबकि उत्तरी राज्यों—जिनमें से कई में अभी भाजपा की सरकार है—को भाजपा-समर्थक राज्यों के तौर पर पेश किया जाता है। यह सारा हंगामा, आबादी के मापदंडों को नजरअंदाज करते हुए दक्षिणी राज्यों के लिए उत्तरी राज्यों के बराबर सीटें हासिल करने की एक कोशिश जैसा लगता है।

अगर हम हिसाब लगाएँ और प्रति सांसद आबादी की गणना करें, तो राजस्थान में एक सांसद लगभग 27.42 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि तमिलनाडु में एक सांसद 18.50 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है। उत्तर प्रदेश में एक सांसद मोटे तौर पर 24.98 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, और केरल में एक सांसद 16.70 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है।

इसका सीधा सा मतलब यह है कि केरल का एक सांसद, उत्तर प्रदेश के एक सांसद के मुकाबले लगभग आधे लोगों का प्रतिनिधित्व करता है। क्या इसका यह मतलब नहीं है कि केरल के एक वोटर का वोट, उत्तर प्रदेश के एक वोटर के वोट से 1.6 गुना ज़्यादा कीमती है? क्या यह ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ के सिद्धांत का मज़ाक नहीं है?

यह असमानता ‘सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना’ में भी देखी जा सकती है। हर सांसद को स्थानीय क्षेत्र के विकास के लिए 5 करोड़ रुपये मिलते हैं, चाहे उसके चुनाव क्षेत्र की आबादी कितनी भी हो। नतीजा? ज़्यादा आबादी वाले चुनाव क्षेत्रों के मुकाबले, कम आबादी वाले चुनाव क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति खर्च काफ़ी ज़्यादा होता है। प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया को इन्हीं असमानताओं को दूर करने के लिए बनाया गया है।

केंद्र सरकार ने भरोसा दिलाया है कि सीटों की संख्या आनुपातिक आधार पर बढ़ेगी। इसके लिए हाल ही में प्रकाशित जनगणना के आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाएगा। भले ही परिसीमन प्रक्रिया 2026 की जनगणना के बाद हो, लेकिन दक्षिणी और उत्तरी राज्यों की आबादी में जो अंतर होगा, वह 2011 की जनगणना के मुताबिक ही होगा।

आदित्य मेनन: फेक न्यूज और BJP-विरोधी प्रोपेगैंडा के माहिर

यह पहली बार नहीं है जब ‘द क्विंट’ के आदित्य मेनन ने BJP-विरोधी प्रोपेगैंडा और फेक न्यूज फैलाई हो। जनवरी 2022 में जब पंजाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा में चूक हुई थी, तब मेनन ने ‘द क्विंट’ के लिए एक लेख लिखा था और उस चूक को कम करने आँकने की कोशिश की। मेनन ने दावा किया था कि BJP-शासित उत्तर प्रदेश में PM मोदी 2 घंटे तक ट्रैफिक में फँसे रहे थे, लेकिन तब किसी को सुरक्षा में खामी नजर नहीं आई थी। उसने यहाँ तक दावा किया कि ये पंजाबियों के प्रति नफरत को दर्शाता है। यहाँ भी उसने गलत जानकारी दी, क्योंकि उत्तर प्रदेश में PM मोदी का काफिला ट्रैफिक में सिर्फ 2 मिनट के लिए फँसा था, न कि 2 घंटे के लिए, जैसा कि ‘द क्विंट’ ने दावा किया था।

2020 के हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगों में हिंसा के आरोपित शरजील इमाम का समर्थन करते हुए मेनन ने कहा था कि उसने तो बस ‘चक्का जाम’ और ‘असम की ओर जाने वाले हाईवे और रेल मार्गों की नाकाबंदी’ करने को कहा था। इमाम का बचाव करने के दौरान मेनन ने 2008 के अमरनाथ आंदोलन से दिल्ली दंगे की तुलना की। उस समय हिंदू संगठनों पर जम्मू-श्रीनगर हाईवे को कथित तौर पर ब्लॉक करने का आरोप लगा था। मेनन ने तर्क दिया था कि अगर उस घटना को राजद्रोह नहीं माना गया था, तो इमाम द्वारा असम की ओर जाने वाली सड़कों और रेल मार्गों को ब्लॉक करने के आह्वान को भी राजद्रोह नहीं माना जाना चाहिए।

आदित्य मेनन का यह डर फैलाने वाला नैरेटिव कि परिसीमन से किसी न किसी तरह BJP को चुनावी फायदा पहुँचाने की कोशिश होगी, दरअसल बीजेपी और उसके समर्थकों के प्रति उसके नफरत को दर्शाता है। भारत के मध्यम वर्ग का बड़ा तबका मोदी सरकार का समर्थक है। हालाँकि उनकी अपनी कुछ शिकायतें भी हैं, लेकिन वोट बीजेपी को देता है। आदित्य मेनन जैसे लोग इनसे नफरत करते हैं।

दिसंबर 2020 में, मेनन ने X पर एक पोस्ट लिखा, जिसमें दिल्ली के मध्यम वर्ग को CAA-विरोधी और किसानों के विरोध प्रदर्शन का समर्थन न करने के लिए ‘खलनायक’ की तरह पेश किया। प्रोपेगैंडा फैलाने में माहिर रोहिणी सिंह ने भी इसका समर्थन किया था।

हिंदू कार्यकर्ता कमलेश तिवारी की जब 2020 में मुस्लिम पैगंबर के खिलाफ उनकी टिप्पणियों के नाम पर जिहादियों ने बेरहमी से कत्ल कर दिया था, तब आदित्य मेनन ने अपने साथी इस्लामिस्टों के साथ मिलकर इस क्रूरता से ध्यान भटकाने की कोशिश की थी। जहाँ एक तरफ एक हिंदू व्यक्ति की हत्या हुई थी, वहीं मेनन ने ‘हिंदुत्व ब्रिगेड’ पर मुसलमानों के खिलाफ ‘नफरत’ फैलाने का आरोप लगाया।

2017 में, आदित्य मेनन ने “कॉमरेड नांबियार” के आक्रामक सोशल मीडिया ट्रोल का समर्थन किया। इसमें 26 CRPF जवानों की मौत का जश्न मनाया गया था, जिन्हें नक्सलियों ने मार दिया था।

इतना ही नहीं मेनन ने 2016 में ‘कैच न्यूज’ में पत्रकार के तौर पर काम करने के दौरान सीरिया की तस्वीर को कश्मीर की तस्वीर बता कर पोस्ट किया था। इस तस्वीर में एक छोटी बच्ची एक मृत व्यक्ति की आँखें बंद करती हुई दिखाई दे रही थी। यह तस्वीर 2012 की सीरिया में विध्वंस की थी।

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‘मुझे क्रेडिट नहीं चाहिए, आप ले लीजिए’: महिला आरक्षण बिल का विरोध करने वालों को PM मोदी का ऑफर, कहा- परिसीमन से किसी राज्य को नहीं होगा घाटा, मेरी गारंटी

संसद में महिला आरक्षण यानी नारी शक्ति वंदन अधिनियम और परिसीमन बिल समेत 3 संविधान संशोधन बिल सदन की पटल पर चर्चा के लिए रखे गए। चर्चा में हिस्सा लेते हुए पीएम मोदी ने कहा कि वह राज्यों से वादा करते हैं और गारंटी देते हैं कि किसी की राज्य के साथ भेदभाव नहीं होगा।

महिला आरक्षण बिल से जुड़े संशोधनों पर उन्होंने कहा कि देश में जब भी चुनाव हुए हैं, उसमें महिलाओं के अधिकारों का जिन लोगों ने विरोध किया है, उनका हाल बुरा हुआ है।

परिसीमन पर उत्तर-दक्षिण की राजनीति करने वालों को PM मोदी ने जवाब दिया। उन्होंने कहा कि किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा, अन्याय नहीं होगा। पहले के अनुपात को मेंटेन करने का आश्वासन और गारंटी भी दिया।

मुझे क्रेडिट नहीं चाहिए- पीएम

पीएम ने कहा कि अगर नारी शक्ति वंदन अधिनियम का विपक्ष विरोध करेगा, तो इसका राजनीतिक लाभ मुझे होगा। लेकिन अगर सभी साथ चले तो किसी का भी फायदा नहीं होगा। मुझे क्रेडिट नहीं चाहिए। ये पास हो गया, तो मैं सरकारी खर्चे से फोटो छपवाकर क्रेडिट दे दूँगा। सामने से क्रेडिट का ब्लैंक चेक आपको दे रहा हूँ।

संसदीय लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी सिर्फ आँकड़ों का खेल या लोकतांत्रिक व्यवस्था में सुधार तक सीमित नहीं है। बल्कि लोकतंत्र की जननी के रूप में ये निर्णय भारत का कमिटमेंट है। ये सांस्कृतिक कमिटमेंट है। इसी कमिटमेंट के कारण 20 से अधिक राज्यों की पंचायतों में 50% आरक्षण मिला है।

पीएम मोदी ने कहा, “मैं सदन के साथियों को कहना चाहता हूँ कि साथियों, हम भ्रम में न रहें। हम उस अहंकार में न रहे, कि देश की नारीशक्ति को हम कुछ दे रहे हैं। जी नहीं, ये नारीशक्ति का हक है। हमने कई दशकों से उसे रोका हुआ है, आज उसका प्रायाश्चित करके उसे पाप से मुक्ति पाना होगा।
हर बार कोई तकनीकी पेंच लगाकर महिला आरक्षण को रोका गया। हिम्मत नहीं है उसे रोकने के लिए, लेकिन रोकना भी है। ऐसे में टेक्निकल चीजें लगाई जाती रही। अब ये भाँति-भाँति की बहाने बाजी, टेक्निकल चीजों से नहीं रुकने वाली”

पीएम ने आगे कहा कि समय की माँग है कि अब हम ज्यादा विलंब न करें। इस दरमियान राजनीतिक दल के लोगों से, संविधान के जानकारों से, महिला अधिकार समूहों से जुड़े लोगों से लगातार बात की गई। उनके मुद्दों को समझा गया। इसके बाद ये रास्ता निकाला गया, ताकि माताओं-बहनों की शक्ति को जोड़ा जा सके। आज हमारे निर्णय ही नहीं, नीयत पर भी नारी शक्ति की नजर है। अगर किसी की नीयत सही नहीं रही, तो महिला शक्ति उसे स्वीकार नहीं करेगी।

मैं खुद अति पिछड़े समाज से आता हूँ- पीएम

सांसद के रूप में दायित्व की बात करते हुए उन्होंने कहा कि सदन में बैठकर हममें किसी को संविधान ने देश के टुकड़े के रूप में सोचने का विकल्प नहीं दिया। हमें पूरे देश के बारे में सोचना है। हम न टुकड़ों में सोच सकते हैं और न ही निर्णय कर सकते हैं। जम्मू-कश्मीर से कन्याकुमारी तक हमारे लिए समान सोच है।

सभी राज्यों को समान अवसर की बात कहते हुए उन्होंने कहा, “मैं जिम्मेदारी के साथ इस सदन में कहना चाहता हूँ कि दक्षिण हो या उत्तर, छोटे राज्य हों या बड़े राज्य। निर्णय प्रक्रिया में किसी के साथ भी भेदभाव-अन्याय नहीं होगा। ये बात मैं जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूँ। भूतकाल में जो प्रक्रिया जिस अनुपात में चल रही है, उसी अनुपात आगे भी प्रक्रिया चलेगी”

समाजवादी पार्टी के पिछड़ा कार्ड और सांसद धर्मेंद्र यादव को जवाब देते हुए उन्होंने
कहा- मैं तो अति पिछड़े समाज से आता हूँ, लेकिन मेरी जिम्मेदारी पूरे देश के प्रति है। मेरे लिए सभी लोग समान हैं। आज संविधान की वजह से मैं यहाँ हूँ। आज जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में हमारी माताएँ-बहनें कमाल कर रही हैं। इतना बड़ा सामर्थ्य, उन्हें क्यों रोक रहे हैं? उनके आने से सामर्थ्य बढ़ेगा। ये राष्ट्रहित का निर्णय है।

महिलाएँ अब ज्यादा जागरूक- पीएम

पुराने दिनों को याद करते हुए पीएम मोदी बोले कि 30 साल पहले महिलाएँ इतनी वोकल नहीं थी, लेकिन अब महिलाएँ जागरुक हैं। वो अब निर्णय प्रक्रिया में जुड़ने को तैयार हैं। ये प्रक्रिया संसद-विधानसभा में होती है।
जो भी राजनीतिक जीवन में सफलतापूर्वक आगे बढ़ना चाहते हैं, उन्हें ये मानकर चलना पड़ेगा कि बीते 25 साल में महिलाएँ राजनीतिक रूप से मजबूत हो चुकी हैं। जो विरोध करेगा, उसे नुकसान उठाना पड़ेगा।
ऐसे में समझने की जरूरत है कि ग्रास रूट पर महिलाओं की जो लीडरशिप खड़ी हुई है, उन्हें अब आगे बढ़ाना पड़ेगा।

महिला आरक्षण में पिछड़ों को आरक्षण देने की बात पर पीएम मोदी ने कहा, “एक बार 33% बहनों को यहाँ आने दें, फिर वो किसे कितना प्रतिशत आरक्षण देना है, वो खुद फैसला कर लेंगी। उन्हें आने तो दें।”

महिलाओं की भागीदारी की बात करते हुए उन्होंने कहा कि विकसित भारत का मतलब सिर्फ इन्फ्रा, अच्छी रेल, अच्छी सड़कें ही नहीं हैं, हम चाहते हैं कि विकसित भारत में सबका साथ सबका विकास का मंत्र समाहित हो। देश की 50% जनता देश की नीति-निर्धारण का हिस्सा बने, ये समय की माँग है। हम पहले ही देर कर चुके हैं, इस सच्चाई को हमें स्वीकार करना होगा

दलित बच्ची की आत्महत्या, अखिलेश यादव का ट्वीट और UP पुलिस का बयान: जानिए चित्रकूट केस में अब तक क्या-क्या हुआ

उत्तर प्रदेश के चित्रकूट से 16 वर्षीय दलित नाबालिग छात्रा के साथ दुष्कर्म और बाद में आत्महत्या का गंभीर मामला सामने आया है। मामले में पुलिस ने तीनों नाबालिग आरोपितों के खिलाफ गैंगरेप, पॉक्सो और SC/ST एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया है।

इस मामले में सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने ट्वीट कर भाजपा सरकार पर गंभीर आरोप लगाए और कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े किए। उन्होंने आरोप लगाया कि पीड़िता को न्याय नहीं मिला, इसलिए उसने फाँसी लगाई और भाजपा के राज में महिलाओं की सुरक्षा नहीं है।

अखिलेश के बयान में 6 मार्च 2026 को परिवार द्वारा पुलिस को दी गई उस लिखित अर्जी का जिक्र नहीं था, जिसमें उन्होंने खुद कार्रवाई न करने की बात कही थी। जाँच में सामने आया कि पहले परिवार ने खुद लिखित में केस दर्ज न करने की बात कही थी, लेकिन अखिलेश ने बिना पूरी जानकारी इस मामले में भ्रम पैदा करने की कोशिश की। उन्होंने बड़ी चालाकी से मामले को अगड़ा बनाम पिछड़ा, सवर्ण बनाव दलित बनाने की कोशिश की।

क्या है पूरा मामला? होली के दिन छेड़छाड़, 40 दिन बाद आत्महत्या

पीड़िता के पिता के अनुसार, 4 मार्च 2026 को होली के दिन उनकी बेटी कुएँ पर पानी भरने गई थी। रास्ते में गाँव के तीन लड़कों ने उसे पकड़ लिया। परिवार का आरोप है कि लड़कों ने उसे बंधक बना लिया, जबरन उसे रंग लगाया और खेत में ले जाकर मुंह में कपड़ा ठूंसकर उसके साथ दुष्कर्म किया।

जब बेटी काफी समय तक घर नहीं लौटी तो उसका छोटा भाई ढूँढने के लिए खेत की तरफ गया तो बेटे को आवाज सुनाई दी, जिसके बाद उसने मंदिर पर चढ़कर देखा तो 3 लड़के बेटी को बैठाए थे। बेटे को देखकर वे वहाँ से भाग गए। 6 मार्च 2026 को परिवार थाने पहुँचा, जहाँ पुलिस ने दोनों पक्षों को बुलाकर समझौता कराया।

पुलिस डायरी में दर्ज है कि उस समय परिवार ने लिखित रूप से मुकदमा न करने की बात कही थी। करीब 40 दिन बाद, 14 अप्रैल 2026 की रात, जब परिवार के अन्य सदस्य खेत पर काम करने गए थे, लड़की ने घर में फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली। चित्रकूट SP अरुण कुमार सिंह के अनुसार, युवती की माँ ने थाने में शिकायत दर्ज कराई थी।

इसमें आरोपितों पर जबरन रंग लगाने का आरोप लगाया गया था। मामले में माता-पिता ने लिखित रूप से कार्रवाई न करने की बात कही थी। यह मामला जीडी में दर्ज किया गया था।

मामले के खुलासे के बाद पीड़िता की माँ ने लगाए आरोप, अफेयर एंगल की भी जाँच कर रही पुलिस

मामले में एक्शन और कई खुलासों के बाद दैनिक भास्कर से पीड़िता की माँ ने बात की है। उन्होने पुलिस पर भी कई आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि पुलिस वालों ने कहा कि उनकी लड़की को कोई चोट नहीं है, कपड़े भी नहीं फटे है, तो कैसे मानें? उन्होंने आगे कहा कि ऐसे में इन सब आरोपों से उसकी शादी पर भी असर पड़ेगा।

पीड़िता की माँ का कहना है कि पुलिसवालों ने ये सब समझाते हुए उनसे पूछा कि वो केस लिखवाना चाहती हैं या नहीं तो उन्होंने मना कर दिया कि अगर बात बेटियों की शादी की है तो केस नहीं लिखवाना। माँ का आरोप है कि पुलिस ने आरोपितों को हिरासत में लिया, लेकिन फिर पैसे लेकर दो दिन बाद उन्हें छोड़ दिया गया।

परिवार ने बताया है कि आरोपित ब्राह्मण हैं और उनमें एक प्रधान का भतीजा है। पुलिस को छात्रा की एक डायरी मिली है, जिसमें उसने भावनात्मक और प्रेम से जुड़ी बातें लिखी थीं। इसके आधार पर पहाड़ी थाना पुलिस यह भी जाँच कर रही है कि मामला किसी निजी संबंध से जुड़ा था या नहीं।

चित्रकूट के पहाड़ी थाना प्रभारी ने ऑपइंडिया से क्या-क्या कहा?

इस मामले में ऑपइंडिया ने पहाड़ी थाना के प्रभारी प्रवीण सिंह से बातचीत की। उन्होंने पूरे घटनाक्रम को विस्तार से बताया। उन्होंने बताया कि होली के दिन रंग लगाने को लेकर विवाद हुआ था, जिसके बाद परिवार दो बार थाने पहुँचा था। हमने केस दर्ज कराने के लिए काउंसिलिंग भी कराई, लेकिन तब गैंगरेप का कोई जिक्र नहीं था। इस बारे में पीड़िता- पीड़िता के पिता और पीड़िता की माता का वीडियो टेस्टिमनी और उनकी शिकायत की दोनों- कॉपी जीडी में दर्ज है।

थाना प्रभारी ने कहा कि घटनाक्रम के 15 दिन के बाद मैंने खुद पीड़ित परिवार से फॉलोअप के लिए संपर्क किया था। तब भी पीड़ित परिवार ने किसी समस्या का कोई जिक्र नहीं किया। थाना प्रभारी ने कहा कि कार्रवाई न करने वाला दावा गलत है। हमने हर संभव कार्रवाई की है।

पीड़िता की बहन ने क्या कहा?

ऑपइंडिया ने पीड़िता की बहन से बात की। पीड़िता की बहन ने कहा कि फिलहाल पुलिस ने किसी भी आरोपित को नहीं पकड़ा है। पुलिस आती है और हमसे ही रोज पूछ ताछ करती है। मैं चाहती हूँ कि उन तीनों को भी फाँसी की सजा हो, जैसे मेरी बहन फाँसी पर लटकी मिली। फोन पर बात करते हुए वो भावुक हो जाती है।