उत्तर प्रदेश के बरेली में झाड़-फूंक के नाम पर झाँसा देने, ठगी और धर्मान्तरण का एक और मामला सामने आया है। ताजा मामले में तथाकथित आरोपित ने खुद को ‘तांत्रिक’ बताते हुए अपने दोस्त के साथ मिलकर एक विधवा महिला से लाखों रुपए हड़प लिए हैं। साथ ही महिला के साथ दुष्कर्म का भी मामला सामने आया है। देनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, अब आरोपित महिला पर इस्लाम कबूलने और निकाह के लिए दबाव बना रहा है। इसके लिए आरोपितों द्वारा विधवा महिला को निकाह के लिए जबरन नेपाल ले जाने की बात भी सामने आई है।
रिपोर्ट के अनुसार, पीड़ित महिला ने शनिवार (28 अगस्त, 2021) को आइजी कार्यालय पहुँचकर और अपनी आपबीती सुनाई। पीड़िता ने बरेली के बारादरी थाने में मामले की तहरीर दी। मामले में इंस्पेक्टर बारादरी नीरज मलिक ने बताया कि पीड़िता की तहरीर मिली है। जाँच कर मामले में रिपोर्ट दर्ज की जाएगी।
पीड़िता ने पुलिस को बताया कि उसके पति की मौत हो चुकी है। इकलौते बेटे की तबियत खराब रहती है। काफी दिन पहले मंदिर में उसकी मुलाकात उसी क्षेत्र के रहने वाले एक युवक से हुई। हमदर्दी दिखाकर उसने विधवा महिला के घर आना-जाना शुरू कर दिया। हालात से वाकिफ होते ही घर की दिक्कतों को दूर करने का हवाला देते हुए एक तथाकथित ‘तांत्रिक’ से मुलाकात कराई। झाड़-फूंक करने वाले ने घर में किसी के साये होने की बात कह कर इलाज के नाम पर झाँसा देकर लाखों रुपए हड़प लिए।
पीड़िता ने आरोपितों द्वारा झाँसा देकर करीब 16 लाख रुपए हड़पने की बात कही। रिपोर्ट के अनुसार, 24 अगस्त की देर रात आरोपित दो अन्य लोगों के साथ महिला के घर पहुँचा और धर्म परिवर्तन कर निकाह का दबाव बनाने लगा। साथ ही जबरन नेपाल ले जाने का प्रयास करने लगा। पीड़िता के अनुसार, शोर मचाने पर जान से मारने की धमकी देकर आरोपित भाग निकले।
गौरतलब है कि इससे पहले भी उत्तर प्रदेश पुलिस ने बदायूँ जिले से एक ग्रूमिंग जिहाद गिरोह के मास्टरमाइंड सैय्यद निजाम को गिरफ्तार किया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुलिस ने बरेली जिले के जगतपुर निवासी सैय्यद निजाम को पकड़ा है, जो खुद को तांत्रिक बताकर हिंदू लड़कियों का धर्मांतरण करवाता था।
सैय्यद निजाम पर आरोप है कि उसने इस्लाम मजहब कबूल करवाने के लिए हिंदू लड़कियों को अपने जाल में फँसाया। वह जादू-टोना का इस्तेमाल करके एक चुटकी में उनकी समस्याओं का समाधान करने का दावा करता था। बाद में वह उन युवतियों को अपने घर पर बुलाता और उनके साथ दुष्कर्म करता। फिर वह जबरन उनका धर्म परिवर्तन करा देता।
जाँच के दौरान पता चला कि आरोपित ने एक दर्जन से अधिक लड़कियों को हिंदू से मुस्लिम बना दिया है। साथ ही निजाम ने यह भी कबूल किया है कि उसने पीड़ितों को झूठ बोलकर और धमकाकर उनसे कम से कम 25 लाख रुपए लूटे हैं। निजाम का अपना जुर्म कबूल करने का वीडियो भी सामने आया है, जिसमें वह कबूल करता दिख रहा है कि उसने युवतियों का जबरन धर्म परिवर्तन कराया है।
इस मामले में गिरोह के मास्टरमाइंड सैय्यद निजाम ने यह भी कबूल किया है कि वो महिलाओं और लड़कियों के साथ शारीरिक संबंध बनाता था। ग्रूमिंग जिहाद गिरोह में निजाम के अलावा 12 और आरोपित शामिल हैं।
छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले के एक गाँव में धर्मांतरण कराने को लेकर पादरी को पीटने का मामला सामने आया है। रविवार (29 अगस्त) को 100 से अधिक लोगों की भीड़ ने पादरी के घर में घुसकर कथित तौर पर उसे और उसके परिवार को पीटा। एक पुलिस अधिकारी के अनुसार, भीड़ ने इस दौरान आदिवासी क्षेत्रों में ईसाई मिशनरियों के धर्मांतरण के खिलाफ नारे भी लगाए।
यह घटना रविवार सुबह करीब 11 बजे की है। बताया जा रहा है कि भीड़ धर्मांतरण के खिलाफ नारे लगाते हुए पादरी कवलसिंह परस्ते (25 साल) के घर में घुस गई। उस समय उनके घर में प्रार्थना चल रही थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, परस्ते के घर में तोड़फोड़ की गई और उनके परिवार के साथ मारपीट भी की गई।
कबीरधाम के पुलिस अधीक्षक मोहित गर्ग ने बताया, “प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, 100 से अधिक लोगों की भीड़ उनके घर में घुस गई और कथित तौर पर पूजा करने की वस्तुओं, घरेलू सामानों को क्षतिग्रस्त कर दिया और उनकी पवित्र पुस्तक को भी फाड़ दिया।” गर्ग ने यह भी बताया कि हमले की सूचना मिलते ही पुलिस की एक टीम मौके पर पहुँची। उन्होंने कहा कि मामला दर्ज कर लिया गया है और जल्द ही आगे की कार्रवाई की जाएगी।
इस बीच छत्तीसगढ़ के क्रिश्चियन फोरम के अध्यक्ष अरुण पन्नालाल ने पुलिस और राज्य सरकार पर ईसाई प्रार्थना स्थलों पर हमले के मामलों में उचित कार्रवाई नहीं करने का आरोप लगाया है। अरुण पन्नालाल ने कहा, “यह एक बहुत ही खतरनाक प्रवृत्ति है, जो राज्य में प्रचलित हो गई है और सरकार इसे रोकने में विफल रही है। हम इस सरकार के सुस्त रवैये से बेहद आहत हैं।”
पन्नालाल ने आरोप लगाया, “पिछले 15 दिनों में राज्य भर में हमारे धार्मिक स्थलों पर कथित तौर पर कम से कम 10 ऐसे हमले हुए, लेकिन किसी भी मामले में पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। हम सिर्फ न्याय चाहते हैं। हालाँकि, ऐसी घटनाओं के बार-बार होने से पता चलता है कि सरकार उन लोगों का साथ दे रही है, जो ऐसे बर्बरतापूर्ण हमले में शामिल हैं।”
पन्नालाल ने चर्चों में की गई तोड़फोड़ के सभी सबूत पेश करते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर करने की भी धमकी दी है। उन्होंने यह भी कहा कि जनहित याचिका में ऐसे मामलों में पुलिस की कथित निष्क्रियता का स्पष्ट उल्लेख होगा।
गौरतलब है कि हाल ही में पंजाब से एक वीडियो सामने आया था, जिसमें पादरी बजिंदर को एक बच्चे का इस्तेमाल अंधविश्वास फैलाने और लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए करते हुए देखा गया था। एनसीपीसीआर ने चंडीगढ़ के डिप्टी कमिश्नर मनदीप सिंह बराड़ को ‘पादरी बजिंदर सिंह‘ के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए कहा है, जो एक नाबालिग लड़के को अपने अंधविश्वासी धर्मांतरण प्रचार के लिए इस्तेमाल करता है। बजिंदर ने बच्चे को लोगों से यह कहने के लिए मजबूर किया था कि उसकी मूक बहन अचानक यशु के ‘चमत्कार’ के कारण बोलने लगी थी।
केरल में सिरो-मालाबार चर्च के पाला डायसस के बिशप ने अपने डायसस के पादरियों को एक पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने आगाह किया है कि डायसस से जुड़े ईसाई परिवारों की युवतियों को फँसाने की साजिश रची जा रही है, इसीलिए उन्हें सतर्क रहना चाहिए। हालाँकि, इस पत्र में बिशप मार जोसेफ कल्लारंगट ने ये जिक्र नहीं किया है कि कौन सा समूह इस तरह की हरकतें कर रहा है और किस इरादे से वो ऐसा कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि कुछ ठग ईसाई परिवार की युवा महिलाओं को निशाना बना रहे हैं और इसके लिए वो जाल भी बिछा रहे हैं। उन्होंने शनिवार (28 अगस्त, 2021) को इस सम्बन्ध में सर्कुलर भी जारी किया। उन्होंने आगाह किया कि कैसे कुछ लोग फोन कॉल के माध्यम से ईसाई युवतियों को फँसाने का काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि कई हथकंडे अपना कर हमारी बच्चियों को ‘कुछ समूह के लोग’ निशाना बना रहे हैं।
उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों का निशाना ऐसी ईसाई महिलाएँ हैं, जो युवा हैं और जो जाना-पहचाना नाम हैं। उन्होंने कहा कि कॉल करने वाला अपने को पूर्व पादरी या फिर जूनियर पादरी बताता है, जिसके बाद किसी अकादमिक काम का बहाना बना कर ईसाई प्रतिनिधियों को कॉल कर के युवतियों के फोन नंबर्स लेने की कोशिश करता है। उन्होंने ईसाई प्रतिनिधियों को भी सचेत रहने के लिए आगाह किया है।
इस पत्र में उन्होंने लिखा है, “अगर कॉल करने वाले ठग पर शक हो जाएगा तो वो ये बहाना बनाएगा कि वो हाल ही में विदेश से लौटा है विदेशी देश में अलग मौसम के कारण उसकी आवाज़ पहचान में नहीं आ रही होगी। सबसे पहले तो ये लोग ईमानदारी और फिर माँ-बेटी के रिश्ते पर बातचीत शुरू करेंगे। इसके बाद वो बातचीत की दिशा और मुद्दों को बदल देंगे, ताकि वो अपनी मनचाही सूचना प्राप्त कर सकें।”
इस सर्कुलर में कहा गया है कि अब इस प्रकार की जालसाजी आम बात हो गई है। उन्होंने पादरियों को सलाह दी है कि न सिर्फ वो सतर्क रहें, बल्कि अपने-अपने क्षेत्रों के ईसाई परिवारों को भी इस बारे में आगाह करें। ऐसे दो मामलों के सामने आने के बाद ये सर्कुलर जारी किया गया है। हालाँकि, ये पहली बार नहीं है जब अपनी महिलाओं को निशाना बनाए जाने को लेकर सिरो-मालाबार चर्च ने चेतावनी जारी की हो।
Kerala: In a circular, Bishop Joseph Kallangarat of Syro Malabar Catholic Church, Pala diocese has warned Cristian families against 'various sections & groups' aiming to trap young girls and women of the community
पत्र लिखने वाले बिशप ने कहा कि यह निश्चित नहीं है कि इस तरह के फोन कॉल धार्मिक, ड्रग्स या सेक्स या किस इरादे से किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि चर्च अपने सदस्यों को ऐसी समस्या से अवगत कराना चाहता है और इसके बावजूद अगर समस्या मौजूद ही रहती है, तो फिर इसके लिए जाँच की माँग की जाएगी। उन्होंने कहा कि पिछले 3-4 महीनों में ऐसी कुछ घटनाएँ सामने आई हैं, जिसमें 16-22 आयु वर्ग की युवतियों को निशाना बनाया गया।
बिशप ने कहा कि ऐसे में इन महिलाओं को मानसिक आघात भी पहुँचा है। इससे पहले जनवरी 2020 में केरल के सबसे बड़े चर्च साइरो मालाबार ने राज्य में ‘लव जिहाद’ की बढ़ती घटनाओं पर गहरी चिंता जताई थी। सिरो-मालाबार मीडिया कमीशन की रिपोर्ट में कहा गया था कि ‘लव जिहाद’ के नाम पर ईसाई लड़कियों को निशाना बनाया जा रहा है। उनकी हत्या हो रही है। इससे केरल में धर्मनिरपेक्ष सद्भाव और सामाजिक शांति को खतरा भी बताया गया था।
पश्चिम बंगाल राज्य के गृह मंत्रालय ने कोलकाता के सूरज सिंह की शिकायत पर तमाल भट्टाचार्या के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज (स्वीकार) कर ली है। मामला देशद्रोह की धाराओं के तहत दर्ज हुआ है। तमाल भट्टाचार्या को कुछ समय पहले ही अफगान से बचा कर भारत लाया गया था, लेकिन उसने यहाँ पहुँचते ही तालिबान का गुणगान करना शुरू कर दिया।
अपनी शिकायत में सूरज ने गृह मंत्रालय से अनुरोध किया था कि वह इस शिकायत पर कार्रवाई करें। शिकायत में कहा गया था कि पश्चिम बंगाल के उत्तरी दम दम इलाके के निमटा निवासी 34 वर्षीय तमाल भट्टाचार्या को भारतीय प्रशासन ने देश में चल रही अशांति के कारण अफगानिस्तान से बाहर निकाला। वह अफगानिस्तान के एक स्कूल में कार्यरत था और तालिबान के आने के बाद अपनी निकासी के लिए भारत सरकार से गुहार लगाई थी।
अपनी शिकायत में उन्होंने बताया कि कैसे तालिबान के चंगुल से लौटकर भट्टाचार्या ने उन्हीं के पक्ष में बयान दिया। सूरज ने कहा, “वापसी के बाद उसकी टिप्पणी बदली और ये बदलाव परेशान करने वाला है। यह हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरनाक हो सकता है। कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय न्यूज चैनल्स को इंटरव्यू देते हुए उसने तालिबान को सराहा और न केवल ऐसे दिखाया जैसे कि वह कितने दयावान हों बल्कि यह भी दिखाया कि तालिबान ने उसकी मदद की, उसे खाना खिलाया , उसका मनोरंजन किया और एयरपोर्ट पर क्रिकेट भी खेले।”
ऑपइंडिया से बात करते हुए सूरज ने कहा, “तालिबान के लिए इस तरह का सॉफ्ट कॉर्नर तालिबान के साथ उसके जुड़ने होने पर सवाल उठाता है। यह संभव है कि तमाल जैसे कम्युनिस्ट के पास तालिबान के लिए एक सॉफ्ट कॉर्नर हो, लेकिन तालिबानियों की इतनी अधिक प्रशंसा करना अत्यधिक समस्याग्रस्त है और मेरा मानना है कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हो सकता है।”
अपनी शिकायत में सूरज ने कहा, “मुश्किल समय में, जहाँ पूरी दुनिया आतंकवाद से निपटने के लिए संघर्ष कर रही है, और उसके ऊपर तमाल भट्टाचार्या जैसे लोग ‘सबसे घातक जिहादी आतंकवादी तालिबानी समूह में से एक’ का ऐसे चित्रण कर रहे हैं जैसे वो दयालु और मददगार हों। तालिबानी आतंकवादियों की उदारता के बारे में भट्टाचार्या की इस तरह की टिप्पणी और दावे को देखना वास्तव में बहुत अजीब लगता है। ”
सूरज मानते हैं कि तमाल के विचार एक खतरनाक स्थिति की ओर इशारा करते हैं और आरोप लगाया कि उसका संबंध कट्टरपंथी संगठन से भी हो सकता है। सूरज ने कहा, इस तरह के कनेक्शन “हमारी घरेलू सुरक्षा के लिए खतरा” हैं। उन्होंने कहा, “अफगानिस्तान (तालिबान) द्वारा हमारे महान राष्ट्र के सद्भाव और शांति को बिगाड़ने की साजिश की प्रबल संभावना है।”
सूरज ने गृह मंत्रालय से इस बाबत अनुरोध किया था कि आधिकारिक गुप्त अधिनियम 1923 और भारतीय दंड संहिता की धारा 121, 121ए और 124ए के तहत मामला दर्ज हो। मंत्रालय ने अब उनकी शिकायत को स्वीकार कर लिया है।
तमाल भट्टाचार्या से जुड़ा पूरा मामला
उल्लेखनीय है कि अफगानिस्तान में तालिबान के आने के बाद 21 अगस्त की रात तमाल को बचा कर भारत लाया गया था। वह वहाँ काबुल के आर्मी स्कूल में फिजिक्स और केमेस्ट्री टीचर के तौर पर काम कर रहा था। उसे वहाँ स्टॉफ क्वार्टर मिला था हालाँकि, पूरे देश पर तालिबान के कब्जे के बाद वह प्रिंसिपल के आवास में बंद हो गया। उसने इंडियन एंबेसी को कॉन्टैक्ट करना शुरू किया और किसी तरह हामिद करजई पहुँचा। इसके बाद भारत सरकार से खुद को निकालने की अपील भी की। बाद में आईएएफ ही उसे 10 अन्य बंगालियों के साथ भारत लेकर आया। 22 अगस्त को वह दिल्ली उतरा और इसके बाद उसने टीवी9 को दिए इंटरव्यू में तालिबान की तारीफों के पुल बाँध दिए।
तमाल ने कहा था, ”हमने सोचा था कि वे (तालिबानी) हमें पकड़ लेंगे और मार डालेंगे। यह डर मेरे साथ 5-6 घंटे तक बना रहा, जब तक कि हमें कर्दन इंटरनेशनल स्कूल से सुरक्षित बाहर नहीं निकाला गया। हमने स्कूल के मालिक और वहाँ मौजूद तालिबानियों से बातचीत की। उन्होंने हमें आश्वासन दिया कि डरने की कोई बात नहीं है। उन्होंने कहा कि वे हमारी रक्षा करेंगे। तालिबानियों ने मुझे और अन्य सभी शिक्षकों की रक्षा करने का वादा किया और सच्चाई भी यही है कि तालिबान ने अपना वादा निभाया।”
तमाल के विवादास्पद दावों को कट्टरपंथी इस्लामवादियों का भारी समर्थन मिला था, जो तालिबान द्वारा किए जा रहे अत्याचारों को उचित ठहराने के अवसरों की तलाश कर रहे थे। ट्विटर पर मोजम्मल हक सोहेल ने लिखा था, “तमाल भट्टाचार्या एक भारतीय शिक्षक हैं, जो कल (रविवार) रात भारत लौटे। उन्होंने तालिबान की तारीफ की। उन्होंने कहा कि तालिबान के खिलाफ मीडिया में जो कुछ हो रहा है वह सब दुष्प्रचार है, यह बेहद घटिया मीडिया है।”
अफगानिस्तान में एक न्यूज़ एंकर को लाइव शो में तालिबान की प्रशंसा करने के लिए बाध्य किया गया। इस दौरान दो हथियारबंद तालिबानी उसके पीछे खड़े थे। तालिबान ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर के तो मीडिया की आज़ादी की बड़ी-बड़ी बातें कर दी, लेकिन इस वीडियो के सामने आने के बाद उसकी मंशा पर सवाल खड़े हो रहे हैं। 15 अगस्त, 2021 को काबुल पर तालिबान के कब्जे के बाद अफगानिस्तान में पत्रकारों पर हमले की कई घटनाएँ सामने आई हैं।
कुछ दिनों पहले ‘Tolo News’ के एक पत्रकार की पिटाई की गई थी। अब नया वीडियो सामने आया है, जिसमें बंदूक की नोंक पर न्यूज़ एंकर से कहवाया जा रहा है कि अफगानिस्तान में किसी भी व्यक्ति को तालिबान से डरने की ज़रूरत नहीं है। उससे घोषणा करवाई जा रही है कि लोग तालिबान से डरें नहीं। अर्थात, मीडिया को डरा कर तालिबान लोगों के मन में अपनी छवि सुधारने की कोशिश कर रहा है।
This is surreal. Taliban militants are posing behind this visibly petrified TV host with guns and making him to say that people of #Afghanistan shouldn’t be scared of the Islamic Emirate. Taliban itself is synonymous with fear in the minds of millions. This is just another proof. pic.twitter.com/3lIAdhWC4Q
इस वीडियो को ईरान की पत्रकार व एक्टिविस्ट मसीह अलीनेजाद ने सोशल मीडिया पर शेयर किया है। इस शो में न्यूज़ एंकर काफी डरा हुआ भी दिख रहा है और डरी हुई आवाज़ में बात कर रहा है। उन्होंने इसे विचित्र बताते हुए कहा कि आज लाखों लोगों के मन में तालिबान ‘डर’ का दूसरा नाम बना हुआ है।
लोकजीवन में ‘धर्म’ शब्द जितना अधिक सुपरिचित है उसका अर्थ-बोध उतना ही अधिक व्यापक एवं गूढ़ है। अर्थ-विस्तार की दृष्टि से धर्म मानव-जीवन के उन समस्त पक्षों का सम्यक संवहन करता है, जो जीवन को रचनात्मकता एवं सुंदरता की ओर ले जाते हैं। किंतु, अर्थ-संकोच की दृष्टि से धर्म विशिष्ट विश्वास-प्रेरित पूजा-पद्धति के अर्थ में रूढ़ हो गया है। जनसामान्य धर्म को इसी रूढ़ अर्थ में ग्रहण करता है।
धर्म लोक-व्यवहार, सदाचार और मानवीय-गरिमा की संरक्षक मर्यादाओं के निर्देशन एवं पालन की संज्ञा है। धर्म का मूल-तत्व लोकमंगल है। प्रायः विश्व के सभी धर्मों के मूल में लोकमंगल की प्रेरणा ही सक्रिय रही है, किंतु मानव-सभ्यता के इतिहास में जब-जब व्यापक लोकमंगल की उपेक्षा कर मनुष्य ने निजी स्वार्थों और अपनी सहज दुर्बलताओं के तटबंधों में बँधकर धर्म की निर्मल जलधारा को रूढ़ियों के बंधन में बाँधा है, तब-तब धर्म अपनी सार्थकता खोकर समाज के पतन का कारण बना है और इतिहास के पृष्ठ कलंकित हुए हैं।
भीष्म एवं द्रोण आदि महारथियों की रूढ़िबद्ध धार्मिकता ने द्रौपदी के चीर-हरण को चुपचाप सहकर समाज को महाभारत युद्ध की ओर धकेला। निहित स्वार्थों के लिए समर्पित धृतराष्ट्र की अँधी राज्य-लिप्सा और अपरिमित पुत्रमोह को बल भीष्म की प्रतिज्ञा-पालन की रूढ़ि को धर्म समझने और द्रोण के ‘नमक का मूल्य चुकाने की’ धार्मिक रूढ़ियुक्त अविवेकपूर्ण राजभक्ति’ से मिला। भागते हुए शत्रु पर प्रहार न करने को ही बिना विचार किए धर्म मान लेने की मूर्खतापूर्ण धर्मरूढ़ि आक्रांता मोहम्मद गोरी को प्राणदान दिलाकर अंततः विजेता पृथ्वीराज के ही नाश का कारण नहीं बनी, अपितु उसने समस्त भारतीय समाज के राजनीतिक-सांस्कृतिक जीवन को काँटों के पथ पर धकेल दिया। ‘हमारे विश्वास ही सर्वश्रेष्ठ हैं और समस्त विश्व के मानव समुदाय को हम अपने ही विश्वासों के रंग में रंग लेंगे’ – इस कथित धर्मप्रियता के कारण आज के वैज्ञानिक दृष्टि संपन्न समाज में भी आतंकवाद और धर्मांतरण के काले कुचक्र चल रहे हैं और धर्म का मूल तत्व लोकमंगल घायल है।
जब-जब जीवन के धरातल पर धर्म अपने लोक मंगलकारी स्वरूप को खोकर मूर्खतापूर्ण अंधी-रूढ़ियों के मकड़जाल में जकड़ कर अपनी शक्ति खोने लगता है, तब-तब समाज में कोई राम, कोई कृष्ण, कोइ शंकराचार्य, कोई गोविंद सिंह अथवा विवेकानंद जन्म लेकर धर्म के मर्म को पुनर्व्याख्यायित करता है, समाज को दिशा देता है। यही ‘यदा यदा ही धर्मस्य…’ का शाश्वत रहस्य है। जो व्यक्ति विवेक की कसौटी पर कसकर कर्तव्य-अकर्तव्य का विचार करके कर्म को लोक-कल्याण की दिशा में नियोजित करता है, वही सच्चा धार्मिक है, महापुरुष है; अवतार है, पूज्य है।
श्रीकृष्ण भी ऐसे ही लोकवन्द्य महापुरुष हैं। उन्होंने अपने युग में धर्म के नाम पर पल्लवित रूढ़ियों से संरक्षित शोषक-शक्तियों का विनाश कर मानवीय-गौरव को प्रतिष्ठित किया। उनके द्वारा उपदेशित गीता का ज्ञान मनुष्य के धार्मिक तत्व-चिंतन का वह उज्ज्वल आलोक है जिसका स्पर्श पाकर जटिल और गूढ़ धर्मतत्व से उत्पन्न भ्रांतियाँ स्वतः नष्ट हो जाती हैं तथा जीवन नैतिक-मानमूल्यों के अनुरूप भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त कर लेता है।
श्रीकृष्ण ने बाल्यकाल से ही धार्मिक रूढ़ियों पर प्रहार कर लोकजीवन को प्राकृतिक सहज पथ की ओर निर्देशित किया। इंद्र पूजा से गोवर्धन पूजन की परम्परा का प्रारंभ जीवन के पोषक प्राकृतिक तत्वों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन का पुनर्प्रतिष्ठापन है। सामाजिक जीवन में श्रीकृष्ण पग-पग पर नए लोकमंगलकारी धर्म के असंख्य अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। जन-सामान्य की दृष्टि में अपने से बड़े पद पर आसीन व्यक्ति अथवा संबंधी पर प्रहार अधर्म हो सकता है, किन्तु कृष्ण की दृष्टि में यदि ऐसा व्यक्ति अपने धर्म का पालन नहीं करता और समाज के लिए संकट उत्पन्न करता है तो सर्वथा वध्य है।
कंस ने अपने पिता महाराजा उग्रसेन को बंदी बनाकर पुत्रधर्म के विरुद्ध आचरण किया। बहिन देवकी और बहनोई वसुदेव को त्रास देते हुए अपने भानजों का वध कर सामाजिक सम्बंधों की मर्यादा तार-तार कर दी और मथुरा की प्रजा को आतंकित कर राजधर्म का अनादर किया। ऐसा कंस, कृष्ण की धर्म-दृष्टि के अनुसार सर्वथा वध्य बन गया, जबकि राजा और मामा होने के कारण वह कृष्ण के लिए धर्मरूढ़ि से सर्वथा अवध्य और सेव्य सिद्ध होता है। श्रीकृष्ण की क्रांतिकारिणी लोकमंगलमुखी धर्मदृष्टि विवेकानुसार निर्णय कर उनके द्वारा कंस का वध कराती है और लोकहित को रक्त सम्बंधों पर वरीयता देती है।
प्रचलित सामाजिक मान्यता के अनुसार युद्ध में पीठ दिखाना अधर्म है, कायरता है और निन्दनीय कृत्य है। स्वयं श्रीकृष्ण भी युद्ध से पलायन को अधर्म और अनुचित कार्य कहते हैं- ‘क्लैव्यं मा स्मगमः पार्थ’। हे अर्जुन ! क्लीवता (नपुंसकता) को प्राप्त मत हो। यह तुम्हारे लिए उचित नहीं है । इस प्रकार वे युद्ध से विरत अर्जुन को युद्ध में नियोजित करते हैं, किन्तु स्वयं युद्ध से पलायन कर एक नई धर्म-दृष्टि प्रस्तुत करते हैं। युद्ध को यशरूप स्वर्ग का खुला द्वार बताने वाले श्रीकृष्ण मथुरा पर जरासंध के बार-बार होने वाले आक्रमणों के निवारण के लिए स्वयं ‘रणछोड़’ बन जाते हैं। युद्ध कहाँ करना है और कहाँ टालना है, युद्ध कब अपरिहार्य-अनिवार्य है और कहाँ परिहार्य, वह कब धर्म है और कब अधर्म, इसका निर्णय कृष्ण की सतर्क और सचेत धर्मबुद्धि मानवीय-अस्मिता तथा व्यापक लोकहित की दृष्टि से करती है।
व्यक्तिगत स्वार्थों और निजी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए युद्ध अधर्म है, पाप है किन्तु यदि नैतिक-मूल्यों की रक्षा के लिए, शोषक-शक्तियों के विनाश के लिए युद्ध करना पड़े तो वह निश्चय ही धर्म बन जाता है। कृष्ण की यह धर्म दृष्टि सर्वथा अभिनव है, स्तुत्य है, क्योंकि उसमें मनुष्य का व्यापक हित सन्निहित है।
शोषक एवं अत्याचारी सत्ता द्वारा प्रताड़ित पीड़ित की रक्षा करना समर्थ मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है। सर्वथा असहाय द्रोपदी की अप्रत्यक्ष रूप से रक्षा कर श्रीकृष्ण धर्म का यह पक्ष प्रतिष्ठित करते हैं। कुरुराज सभा के बड़े-बड़े धर्मज्ञ जब दुर्योधन की निरंकुश दुरभिलाषाओं और निर्बाध इर्ष्या की पुष्टि में मौनधारण को ही धर्म मान लेते हैं, तब श्रीकृष्ण की अप्रत्यक्ष सहायता धर्म की सर्वोत्तम परिभाषा ‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई’ को सशक्त आधार प्रदान करती हुई निर्दोष पीड़ित पक्ष को संरक्षण देती है।
धर्म की रूढ़ियाँ धृतराष्ट्र और दुर्योधन आदि के लिए दृढ़-कवच प्रदान करती हैं; ढाल बनती हैं। वे यह भली-भाँति जानते हैं कि धर्मपालन की स्वनिर्मित रूढ़ियों में बंधे भीष्म और द्रोण जैसे महारथी प्रत्येक परिस्थिति में उनका ही साथ देंगे और इन महावीरों के रहते प्रतिपक्षी पाण्डवों की विजय के लिए कोई संभावना शेष नहीं रह जाती। कदाचित उन्हें यह भी विश्वास था कि धर्म-पालन के रुढ़ फंदे में फँसे पाण्डव विशेषतः युधिष्ठिर कथित एवं प्रचलित युद्धनीति से अलग हटकर कभी युद्ध नहीं करेंगे; वे गुरुजनों पर शस्त्र कभी नहीं उठाएँगे और युद्ध कभी होगा ही नहीं।
शकुनि के प्रपंचों से उन्हें अनन्तकाल तक अधिकार-वंचित और अपमानित जीवन जीने को विवश बनाया जा सकता है। कौरव और उनके हितैषी यह अनुमान लगाने में विफल रहे कि युगपुरुष महामानव श्रीकृष्ण युद्ध की प्रचलित तथाकथित धर्मनीतियों से अलग हटकर भी धर्म के नए प्रतिमान रच सकते हैं। श्रीकृष्ण ने भीष्म-द्रोण-कर्ण और दुर्योधन के संदर्भ में युद्ध के धर्म को नई दिशा दी, क्योंकि उसके बिना अधर्म, अन्याय और अपराध का अंत असंभव था।
महाकवि दिनकर ने ‘रश्मिरथी’ में कर्ण-वध के अवसर पर कृष्ण-अर्जुन संवाद में धर्म के इस नए रूप को सशक्त स्वर दिया है। धरती में धँसे रथ-चक्र को निकालने में व्यस्त निशस्त्र कर्ण पर वाण-संधान करने का निर्देश पाकर अर्जुन हिचक जाते हैं और कृष्ण से पूछते हैं;
‘‘नरोचित किन्तु क्या यह कर्म होगा ? नहीं इससे मलिन क्या धर्म होगा ?’’
अर्जुन की इस जिज्ञासा पर कृष्ण का उत्तर विस्मयजनक है; अद्भुत है-
‘‘हँसे केशव, वृथा हठ ठानता है, अभी तू धर्म को क्या जानता है? कहूँ जो पाल उसको धर्म है यह। हनन कर शत्रु का सदधर्म है यह।। क्रिया को छोड़, चिंतन में फँसेगा, उलटकर काल तुझको ही ग्रसेगा।।’’
श्रीकृष्ण की यह नई धर्मनीति ही महाभारत में पाण्डवों की विजय का कारण बनती है। जीवन गतिशील है, इसलिए जीवन से जुड़े सभी पक्ष धर्म, राजनीति, दर्शन आदि निरंतर पुनर्व्याख्या और संशोधन की अपेक्षा करते हैं। मानवीय मूल्य दया, क्षमा आदि अपरिवर्तित होने योग्य हैं, किंतु यदि कहीं वे मनुष्यता के प्रतिपक्ष में उपस्थित होकर मानवमंगल का पथ अवरुद्ध करने लगें तो उनको यथोचित पुनर्व्याख्यायित कर ग्रहण किया जाना ही उचित है। रूढ़ि कभी धर्म नहीं हो सकती और धर्म कभी रूढ़ नहीं होना चाहिए। धर्म को लोकमंगल की धुरी पर ही घूमना होगा। जहाँ वह लोकमंगल को परिधि पर धकेल कर निजी स्वार्थों को केंद्र में प्रतिष्ठित करेगा वहाँ वह धर्म नहीं रह जाएगा, वहाँ वह धर्म का शव मात्र होगा, जिसकी दुर्गंध मनुष्यता के स्वास्थ्य के लिए सर्वथा घातक होगी। लोकमंगल के निर्मल-जल में ही धर्म का कमल खिल सकता है। कृष्ण की धर्मदृष्टि इसी दर्शन से अनुप्राणित है।
(लेखक डॉ. कृष्णगोपाल मिश्र, शासकीय नर्मदा स्नातकोत्तर महाविद्यालय (होशंगाबाद, मप्र) में हिन्दी के विभागाध्यक्ष हैं)
आगरा के ताजमहल में भगवान श्रीकृष्ण की वेशभूषा में आए एक व्यक्ति को एंट्री नहीं दी गई। जन्माष्टमी के त्योहार से 2 दिन पहले शनिवार (29 अगस्त, 2021) को उक्त पर्यटक ताजमहल स्मारक में पहुँचा था, लेकिन उसे अंदर जाने की अनुमति नहीं मिली। पश्चिमी दरवाजे से उसे वापस लौटा दिया गया। उक्त पर्यटक भगवान श्रीकृष्ण की वेशभूषा में अपने परिवार के साथ ताजमहल घूमने पहुँचा था।
लेकिन, उसे ताजमहल पर तैनात सुरक्षाकर्मियों व भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के कर्मचारियों ने उसे रोक दिया। वहीं पर मौजूद एक गाइड ने उस पर्यटक की तस्वीर ले ली और वीडियो बना कर भी वायरल कर दिया। वायरल वीडियो में पर्यटक एंट्री न मिलने पर कहता नज़र आ रहा है कि कोई बात नहीं है. अब हमें ताजमहल नहीं देखना है। अधीक्षण पुरातत्वविद् डॉक्टर वसंत कुमार स्वर्णकार ने इस मामले पर बयान दिया है।
उन्होंने कहा कि ताजमहल समेत ASI द्वारा संरक्षित किसी भी स्मारक में प्रमोशन सम्बन्धी गतिविधियों की अनुमति नहीं है। उन्होंने कहा कि उक्त व्यक्ति श्रीकृष्ण की वेशभूषा में ताजमहल में प्रवेश कर के अपना प्रमोशन न करे, इसीलिए उसे रोका गया हो सकता है। उन्होंने कहा कि किसी अन्य के स्वरूप की वेशभूषा में किसी को ऐसे स्मारकों में एंट्री नहीं दी जाती। उन्होंने कहा कि ASI एक्ट के अनुसार ये परंपरा चल रही है और इसीलिए नई परंपरा शुरू नहीं की जा सकती।
ताजमहल में घूमने आए पर्यटकों की संख्या अब बढ़ रही है। कोरोना काल में पर्यटन ठप्प रहा था लेकिन शनिवार के दिन सैलानियों की बड़ी संख्या यहाँ पहुँची। 14,000 की पिछली संख्या को तोड़ते हुए इस बार 20,000 लोग इसके देखने के लिए पहुँचे। दिल्ली NCR और लखनऊ के लोग भी यहाँ पहुँचे। आगरा किले पर भी 4105 पर्यटक आए। दोपहर 12 बजे से शाम 6 बजे के बीच पर्यटकों की संख्या बढ़ी हुई नज़र आई।
बाइबल ओपन यूनिवर्सिटी इंटरनेशनल के उप निदेशक पादरी उपेंद्र राव की एक वीडियो वायरल हुई है। इस वीडियो में उन्हें भारत को दो हिस्सों में विभाजित करने की माँग करते हुए सुना जा सकता है।
‘Divide India into two and give one part to Christians,’ says Pastor Upendra in Andhra Pradeshhttps://t.co/iqE0fUkTnA
वीडियो में वह कहते हैं, “हम प्रिय नेता पीडी सुंदर राव के नेतृत्व में ऑल इंडिया ट्रू क्रिश्चियन काउंसिल की ओर से माँग करते हैं कि भारत को दो हिस्सों में विभाजित किया जाना चाहिए और ईसाइयों को एक अलग देश के तौर पर एक आधा हिस्सा दिया जाना चाहिए।”
"Divide India into two and handover one to Christians": Andhra Christian pastor says https://t.co/LvM3tNGFYJ
— Legal Rights Protection Forum (@lawinforce) August 29, 2021
हैरान करने वाली इस वीडियो को एससी/एसटी राइट्स फोरम ने अपने ट्विटर पर साझा किया है। इसमें पादरी आगे कहता है, “इसके बाद (विभाजन के बाद) हम आपको परेशानी नहीं देंगे।” ये वीडियो 24 अगस्त को शेयर की गई थी।
"Under the leadership of our beloved leader Mr PD Sundara Rao, we, on behalf of All India True Christian Council demand that India should be split into 2 and 1 half given to Christians as a separate country. We'll not bother you": -K Upendra, Bible Open University International pic.twitter.com/BzVHtGkbno
पादरी के उपेंद्र राव कथित तौर पर तेलंगाना और महाराष्ट्र के लिए अखिल भारतीय सच्चे ईसाई परिषद के राज्य अध्यक्ष भी हैं। उनकी वीडियो वायरल होने के बाद जब AITCC का फेसबुक खंगाला गया तो मालूम हुआ कि पेज 2019 से लगभग बंद पड़ा हुआ है, मगर, उससे पहले के पोस्ट देखें तो पता चलता है कि संगठन ने कुछ कार्यक्रमों की तस्वीर साझा की हुई हैं। इसमें एक में दिखाया है कि कैसे AITCC ने “GOD’s servant” को बाइक स्पॉन्सर की।
बता दें कि धर्मांतरण और ईसाईकरण का कारोबार भारत के कई हिस्सों में फैला हुआ है। आंध्र प्रदेश, तमिल नाडु, तेलंगाना इसके उदाहरण हैं। कई मिशनरी तमाम तरह के हथकंडे अपना कर गरीबों को इसका शिकार बना रहे हैं। हमने पहले की रिपोर्टस में बताया भी था कि पुलिस ने ऐसे ही मामले में तीन पादरियों पर मुकदमा दर्ज किया था। ये पादरी सोशल मीडिया पर बच्चों की तस्वीर पोस्ट करके उन्हें अनाथ बताकर धन इकट्ठा करने की कोशिश कर रहे थे। रैकेट का खुलासा पिछले माह कृष्ण जिले के थुक्कुलुर के ग्रामीणों ने किया था। कार्रवाई में एक पादरी को हिरासत में लिया गया था जबकि बाकी दो फरार होने में सफल हो गए थे।
जापान की राजधानी टोक्यो में चल रहे पैरालंपिक्स में स्वर्ण पदक जीत कर शूटर अवनि लखेरा ने इतिहास रच दिया है। उन्होंने महिलाओं के 10 मीटर एयर राइफल ‘स्टैन्डींग SH1’ ईवेंट में गोल्ड मेडल अपने नाम किया। इस पैरालंपिक्स में ये भारत का पहला गोल्ड मेडल है। वहीं ‘डिस्कस थ्रो’ के ‘F56 कैटेगरी’ में भारत के योगेश कथुनिया ने रजत पदक अपने नाम किया। योगेश ने 44.38 मीटर के थ्रो के साथ दूसरा स्थान प्राप्त किया।
वहीं 19 वर्षीय अवनी लखेरा ने फाइनल मैच में 249.6 के स्कोर के साथ सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। उन्होंने वर्ल्ड रेकॉर्ड की भी बराबरी की। वहीं क्वालिफ़िकेशन राउन्ड में वो 621.7 के स्कोर के साथ सातवें स्थान पर रही थीं। फाइलन के लिए उनकी शुरुआत धीमी हुई थी, लेकिन फिर उनका प्रदर्शन बेहतर होता चल गया। अवनी लखेरा राजस्थान की राजधानी जयपुर की रहने वाली हैं और वहाँ के JDA शूटिंग रेंज में उनका प्रशिक्षण हुआ है। पैरालंपिक्स में गोल्ड जीतने वाली वो पहली भारतीय महिला हैं।
2012 में एक दुर्घटना के कारण उन्हें पक्षाघात का सामना करना पड़ा था, जिसके बाद उन्हें व्हीलचेयर का सहारा लेना पड़ता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनके शानदार प्रदर्शन के बाद उन्हें बधाई दी है। उन्होंने अवनि लखेरा से फोन पर भी बात की। उन्होंने कहा कि भारतीय खेल के लिए ये सचमुच एक विशेष क्षण है। इंडिविजुअल गेम में भारत के लिए पहला ओलंपिक स्वर्ण पदक जीतने वाले शूटर अभिनव बिंद्रा ने भी उन्हें शुभकामनाएँ दी हैं।
Phenomenal performance @AvaniLekhara! Congratulations on winning a hard-earned and well-deserved Gold, made possible due to your industrious nature and passion towards shooting. This is truly a special moment for Indian sports. Best wishes for your future endeavours.
वहीं नई दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज से बीकॉम कर चुके 24 वर्षीय योगेश कथुनिया स्वर्ण पदक से तो चूक गए, लेकिन उन्होंने अपने छठे प्रयास में 44.38 मीटर डिस्कस फेंक कर दूसरा स्थान हासिल किया। रविवार (29 अगस्त, 2021) को भारत ने हाई जंप में रजत पदक और डिस्कस थ्रो में कांस्य पदक अपने नाम किया। कांस्य पदक की अभी घोषणा नहीं हुई है, क्योंकि एक शिकायत के बाद इसकी जाँच चल रही है।
एक फौजी के बेटे योगेश कथुनिया को 8 वर्ष की उम्र में ही पैरालिटिक अटैक का सामना करना पड़ा था, जिसके बाद उनके दोनों फेंफड़े खराब हो गए थे। ब्राजील ने इस खेल में स्वर्ण पदक जीता है। वहीं महिला वर्ग के सिंगल टेबल टेनिस खेल में भावनीबेन पटेल ने रजत पदक अपने नाम किया। चीन की खिलाड़ी के हाथों फाइनल में उन्हें 0-3 से हार मिली थी। बता दें कि भारतीय पैरालंपिक कमिटी की अध्यक्ष दीपा मलिक हैं।
वहीं निषाद कुमार ने पुरुषों की टी47 ऊँची कूद स्पर्धा में रजत पदक अपने नाम किया था। डिस्कस थ्रो खिलाड़ी विनोद कुमार ने रविवार को टोक्यो पैरालंपिक में एशियाई रिकॉर्ड के साथ पुरुषों की एफ52 स्पर्धा में कांस्य पदक जीता, लेकिन उनके क्लासिफिकेशन पर विरोध जताए जाने के कारण वो जीत का जश्न मनाने से चूक गए। 30 अगस्त की शाम तक ये समारोह स्थगित है, जिसके बाद फैसला लिया जाएगा।
भगवान विष्णु के दशावतारों में से आठवें और चौबीस अवतारों में से बाईसवें अवतार श्रीकृष्ण के जन्म का जश्न कृष्ण जन्माष्टमी, जिसे जन्माष्टमी या गोकुलाष्टमी के रूप में भी जाना और मनाया जाता है। यदि हिंदू चंद्र कैलेंडर के तिथि के अनुसार बात करें तो कृष्ण पक्ष (अंधेरे पखवाड़े) के आठवें दिन अर्थात अष्टमी को भाद्रपद में मनाया जाता है। वैसे तो कृष्ण सनातन संस्कृति में न सिर्फ जन-जन के आराध्य हैं बल्कि हर परिस्थिति और दौर में एक सच्चे मार्गदर्शक भी, इसके पीछे है उनका अनूठा व्यक्तित्व जो उनके जीवन के उतार-चढ़ाओं, संघर्षों का वह केन्द्रविन्दु है जो मानव रूप में जन्म लेकर भी उन्हें भगवत्ता के शीर्ष पर बैठाती है।
कृष्ण का व्यक्तित्व कई आयामों में अनूठा है। बचपन से लेकर जीवन के अंत तक निरंतर संघर्षों और कर्मठता की आग पर तपा एक ऐसा महामानव जो जिया तो लगातार खतरों के साए में लेकिन कोई भी अंततः उनसे जीत नहीं पाया, जब जो जरुरी लगा, बिना रूढ़िबद्ध सामाजिक नियमों की परवाह किए धर्म की स्थापना हेतु उन्होंने नया आदर्श खड़ा किया जो आज भी हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत है। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के अनूठेपन की सबसे खास बात यही है कि कृष्ण हुए तो अतीत में हैं, लेकिन हैं भविष्य के, आज भी यदि नजर दौड़ाएँ तो मनुष्य अभी भी इस योग्य नहीं दिखाई पड़ता कि कृष्ण का समसामयिक हो सके। उन पर न जाने कितने शास्त्र, कितनी टीकाएँ लिखी गईं, न जाने कितने लम्बे-लम्बे व्याख्यान और आख्यान दिए गए फिर भी कृष्ण आज भी आम मनुष्य की समझ से बाहर हैं।
शायद यह भविष्य में ही यह संभव हो पाए कि कृष्ण को हम समझ पाएँ। इसके कुछ बुनियादी कारण हैं। कारणों पर बात इसलिए भी जरुरी है कि आज सनातन धर्म, जो सदैव नित नवीन अविष्कार, अन्वेषण अर्थात खोज और स्वतन्त्र विचारणा को बढ़ावा देने वाला रहा आज उसे मात्र हिंदुत्व के नाम पर कुछ संकीर्ण लोग खारिज कर देने की कुत्सित सोच से भरे हैं। घृणा के इसी आवेश में वह एक पूरी परम्परा को विकृत और खारिज कर देना चाहते हैं बिना कुछ भी जाने या अनुभव किए। यह कहीं न कहीं उस विराट चेतना का अपमान है जिसका अंश हर सनातनी की शिराओं में रक्त बनकर, या चेतना के रूप में प्रवाहमान है।
इस धरा पर रहने वाले हर किसी के कहीं न कहीं तार यहाँ की सनातन बागडोर से जुड़े हैं जिससे कोई अनजान भले हो सकता है लेकिन उसे झुठलाया नहीं जा सकता। ऐसे में जब बात आदर्श चुनने की होगी तो इस संस्कृति के एकमान्य आदर्श राम और कृष्ण ही होंगे, दोनों के व्यक्तित्वों में वह सूत्र छिपे हैं जो मानवता के सम्पूर्ण विकास और स्वयं भगवान हो जाने की संभावना से भरे हैं। और इनमे में भी कोई एक चुनना हो तो कृष्ण सम्पूर्ण है, तभी तो उन्हें पूर्ण अवतार माना गया है।
जिसका सबसे बड़ा कारण तो यही है कि कृष्ण अकेले ही ऐसे व्यक्ति हैं, जो धर्म की परम गहराइयों और ऊँचाइयों के शिखर पुरुष होकर भी गुरु-गंभीर नहीं हैं, उदास-निराश या रोते हुए नहीं हैं। उनका सम्पूर्ण जीवनवृत्त एक खेल है, बिना किसी परिणाम की चिंता किए अपनी पूर्णता में, पूरी तल्लीनता से किया गया एक कर्म।
साधारणत: जब किसी महापुरुष, किसी संत की जिस अवधारणा को आगे बढ़ाया जाता रहा है उसका लक्षण ही रोता हुआ होना नजर आता है। जिंदगी से उदास, पीड़ित, हारा और भागा हुआ। लेकिन सनातन संस्कृति के पूरे कालखंड में देखें तो कृष्ण अकेले ही एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में नजर आते हैं जो नृत्य करते हुए, रास रचाते हुए, क्रीड़ा करते हुए, हँसते हुए, गीत गाते हुए, युद्ध में भी सदैव मंद स्फीति मुस्कान के साथ आभा बिखेरते नजर आते हैं।
एक नजर दौड़ाइए तो अतीत का सारा धर्म दुखवादी नजर आएगा। कृष्ण को छोड़ दें तो अतीत का कोई भी धर्म हो उदास आँसुओं से भरा हुआ, पीड़ा प्रधान नजर आता है। हँसता हुआ धर्म, जीवन को उसकी सम्पूर्ण समग्रता में स्वीकार करने वाला धर्म, वास्तव में अभी पैदा होने को है। जो कृष्ण की राह पर चलकर ही प्राप्त किया सकता है। जहाँ जीवन हर क्षण, हर परिस्थति में नृत्य है, आनंद है, रास है, महासमर में भी विनाश के साथ नवनिर्माण की प्रस्थानबिंदु है।
आज सनातन धर्म जो अब हिन्दू धर्म के रूप में जाना जा रहा है चौथे स्थान पर है, पहले पर ईसाई, दूसरे पर इस्लाम, तीसरे पर वे लोग हैं जो किसी भी धर्म या मजहब को नहीं मानते, इसके बाद आता है हिन्दू धर्म लेकिन यदि आनंद, खोज, अध्यात्म और चेतना के शिखरविन्दु के रूप में देखें तो सनातन अर्थात हिन्दू धर्म सर्वश्रेष्ठ है। यह बात मैं यूँ ही नहीं कह रहा हूँ अभी तक का जो अनुभव और अपनी आध्यात्मिक चेतना रही है उसका निष्कर्ष यही है और आप भी इससे सहमत होंगे, न भी हों तो भी इस सत्य को झूठलाया नहीं जा सकता।
क्योंकि, जिस ईसाइयत से विश्व का एक बड़ा हिस्सा उसकी विस्तारवादी, प्रलोभन आधारित नीतियों के कारण प्रभावित जान पड़ता है, उसके मसीहा जीसस के संबंध में ओशो जैसे तत्वदर्शियों ने कहा है कि वह कभी हँसे नहीं। आपको शायद ऐसी कोई छवि या वचन ध्यान नहीं आ रहा होगा जब जीसस आपको मुस्कराते हुए नजर आते हों! कहते हैं जीसस का यह उदास व्यक्तित्व और सूली पर लटका हुआ उनका शरीर ही कालांतर में तमाम दुखी चित्त लोगों के बीच आकर्षण का कारण बन गया क्योंकि इन मजहबों की आधारशिला ही रक्तरंजित रही है।
बहुत व्यापक अर्थों में देखा जाए तो महावीर या बुद्ध बहुत गहरे अर्थों में जीवन के विरोधी नजर आते हैं। क्योंकि वे कोई और जीवन है परलोक में, इस लोक से परे, कोई मोक्ष है, उसके पक्षपाती हैं। उनके हिसाब से यह जीवन आनंद नहीं बल्कि सर्वं दुखम-दुखम अर्थात दुःख ही है जबकि कृष्ण का सम्पूर्ण व्यक्तित्व ही आनंदमय है और वे जीवन के हर क्षण में भयमुक्त होकर, फल की चिंता छोड़कर उपयुक्त कर्म की बात करते हैं।
इस तरह से देखा जाए तो अब तक व्याप्त सभी धर्म-मजहबों ने जीवन को दो हिस्सों में बाँट रखा है- एक वह, जो स्वीकार करने योग्य है और एक वह, जो इनकार करने योग्य है। कृष्ण अकेले ही इस समग्र जीवन को उसकी सम्पूर्णता में स्वीकारते हैं। जीवन की समग्रता की स्वीकृति उनके व्यक्तित्व में स्वयं फलित हुई है। इसलिए इस देश ने और सभी अवतारों को आंशिक अवतार कहा है, लेकिन कृष्ण को पूर्ण अवतार कहा। कहते हैं राम भी अंश ही हैं परमात्मा के, लेकिन कृष्ण पूरे ही परमात्मा हैं। और यह कहने का, यह सोचने का, ऐसा समझने का प्रासंगिक कारण है। वह कारण यह है कि कृष्ण ने सब कुछ आत्मसात कर लिया बिना किसी दुराग्रह के, जिसका प्रमाण उनका सम्पूर्ण जीवन है।
भगवान कृष्ण का न सिर्फ व्यक्तित्व अनूठा है और वे सम्पूर्ण अवतार के रूप में स्वीकार किया गए हैं बल्कि कृष्ण शब्द भी गहरे बोध का परिचायक है। ओशो कहते हैं कि कृष्ण का अर्थ है, केंद्र- कृष्ण अर्थात जो आकृष्ट करे, जो आकर्षित करे, सेंटर ऑफ ग्रेविटेशन, एक तरह से कशिश का एक केंद्र। कृष्ण शब्द का अर्थ होता है जिस ओर सारी चीजें खिंचती हों। जो केंद्रीय चुंबक का काम करे।
सनातन धर्म की ऐसी महिमा है कि यदि आध्यात्मिक रूप में गौर से देखा जाए तो प्रत्येक व्यक्ति का जन्म एक अर्थ में कृष्ण का जन्म है, क्योंकि हमारे भीतर जो आत्मा है, वह कशिश का केंद्र है, सेंटर ऑफ ग्रेविटेशन है जिस पर सब चीजें केंद्रित हैं, खिंचती है, आकृष्ट होती हैं। शरीर आकृष्ट होकर उसके आसपास निर्मित होता है, परिवार उसके आसपास निर्मित होता है, समाज उसके आसपास निर्मित होता है, व्यापक अर्थों में देखा जाए तो ये सम्पूर्ण जगत आकृष्ट होकर उसके आसपास निर्मित होता है। वह जो हमारे भीतर कृष्ण का केंद्र है, आकर्षण का जो गहरा बिंदु है, उसके आसपास सम्पूर्ण जीवन घटित होता है।
जब भी कोई व्यक्ति जन्मता है, तो एक अर्थ में कृष्ण का ही जन्म है वह जो बिंदु है आत्मा का, आकर्षण का, वह जन्मता है, और उसके बाद सब चीजें उसके आसपास निर्मित होनी शुरू हो जाती हैं। उस कृष्ण बिंदु के आसपास क्रिस्टलाइजेशन शुरू होता है और व्यक्तित्व का निर्माण होता है। इसलिए व्यापक अर्थों में कृष्ण का जन्म एक व्यक्ति विशेष का जन्म मात्र नहीं है, बल्कि व्यक्ति मात्र का जन्म है।
ऐसे में जब कृष्ण जैसा व्यक्ति हमें उपलब्ध हो गया तो हमने कृष्ण के व्यक्तित्व के साथ वह सब समाहित कर दिया है जो प्रत्येक आत्मा के जन्म के साथ समाहित है। उम्मीद है पहेली सी नहीं लग रही होगी क्योंकि सही मायने में महापुरुषों की जिंदगी कभी भी ऐतिहासिक नहीं हो पाती है, सदा काव्यात्मक हो जाती है, पौराणिक होती है जो बार-बार पीछे लौटकर निर्मित होती है।
हर बार जब हम चिंतन में डूबे होते हैं, पीछे लौटकर जब हम देखते हैं तो अतीत की हर गौरवशाली चीज प्रतीक हो जाती है और दूसरे अर्थ ले लेती है। जो अर्थ हो सकता है घटते हुए क्षण में कभी न भी रहे होंगे। लेकिन चेतना में जीवंत हो उठती है और ऐसा आखिर हो भी क्यों न, क्योंकि कृष्ण जैसे व्यक्तियों, महामानवों, भगवत्ता के शीर्ष पर खड़े महापुरुषों का जीवनवृत्त एक बार नहीं लिखी जाती, हर सदी अपने हिसाब से बार-बार लिखती है।
हजारों-लाखों लोग लिखते हैं। जब इतने लोग लिखते हैं तो हजार व्याख्याएँ होना भी स्वाभाविक हैं। इतने शास्त्र, टीकाएँ, व्याख्याएँ भी संभव है। इस प्रकार धीरे-धीरे कृष्ण की जिंदगी किसी एक व्यक्ति की जिंदगी नहीं रह जाती। कृष्ण कहीं न कहीं एक संस्था हो जाते हैं, एक इंस्टीट्यूट हो जाते हैं। फिर वे समस्त जन्मों के सारभूत तत्व हो जाते हैं। मनुष्य मात्र के जन्म की कथा उनके जन्म की कथा हो जाती है। इसलिए व्यक्तिवाची अर्थों में कोई मूल्य नहीं है। वास्तव में कृष्ण जैसे व्यक्ति व्यक्ति रह ही नहीं जाते। वे हमारे मानस के, हमारे चेतना के, हमारे कलेक्टिव माइंड के एक व्यापक प्रतीक हो जाते हैं। और कही न कहीं हमारे चित्त ने जितने भी जन्म देखे हैं, वे सब उनमें समाहित हो जाते हैं।