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जैन समुदाय ने 5000 गज में खोली ‘बकराशाला’, ₹44 लाख देकर ‘कुर्बानी’ वाले 400 बकरे बचाए: कहा- हम अहिंसक, जीवों को भी अपनी पूरी उम्र जीने का हक

बकरीद के मौके पर एक तरफ मुस्लिम समुदाय ‘कुर्बानी’ देने के लिए कई हजार देकर बड़े से बड़ा बकरा खरीद रहा है, और दूसरी तरफ जैन समुदाय के लोग हैं जो इन बकरों को बचाने के लिए इनपर लाखों खर्च भी कर रहे हैं। इस काम के लिए उन्होंने एक बकराशाला भी खोली हुई है जो कि बागपत के अमीननगर सराय में है। इसका नाम ‘जीव दया संस्था’ है।

दैनिक जागरण की रिपोर्ट बताती है कि इस बार इस संस्था ने कुर्बानी के लिए बिकने आए 400 से अधिक बकरों की जान बचाई है। इन्होंने बकरीद के लिए जामा मस्जिद, सीलमपुर व गाजीपुर जैसे इलाकों तथा उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर स्थित गुलावठी बकरा मंडी से इन बकरों की खरीद में करीब 44 लाख रुपए खर्च किए हैं। आगे कुछ दिनों में और 15 लाख रुपए खर्च होने का अनुमान है क्योंकि कुर्बानी सोमवार तक दी जानी है।

जानकारी के अनुसार, जीव दया संस्थान नाम के इस संस्थान के पास इस बकराशाला के लिए अच्छी खासी जमीन है, जो कि 5000 गज में बनी है। इसमें एक साथ अधिकतम 1800 बकरे रखे जाने की क्षमता है। वर्तमान में यहाँ 650 से अधिक बकरे हैं। इन बकरों की इस बकराशाला में खास देखरेख की जाती है। बकराशाला को संचालित करने वाले लोग जैन समाज के हैं। जो भगवान महावीर के जीयो और जीने दो संदेश के प्रति समर्पित हैं। उनका मानना है कि बकरे की अपनी एक उम्र होती है और उन्हें अपनी पूरी उम्र जीने का अधिकार होना चाहिए।

गौरतलब है कि इस संस्थान की वजह से दिल्ली से लेकर यूपी तक से ऐसे बकरे बचाए गए जिनके गले पर धागा बँधा था यानी कि वे कुर्बानी के लिए तैयार थे। बकराशाला से जुड़े दिनेश जैन बताते हैं कि ये बकराशाला 10 वर्ष पूर्व शुरू की गई थी। इसे लेकर राजेंद्र मुनि ने जन समाज को प्रेरणा दी थी।

उन्होंने कहा कि देश में गौशाला बहुत है। आप लोग बकराशाला बनाएँ। दिनेश ने कहा कि पहले ये बकराशाला 800 गज की जगह में शुरू हुई थी। बाद में सहयोग मिला तो ये बकराशाला 5000 गज की जमीन में खोली गई। अभी तक संस्था द्वारा हजारों बकरों की जानें बचाई जा चुकी हैं। वर्तमान में 650 बकरे हैं।

कहीं सड़क पर बवाल, तो कहीं सोशल मीडिया पर घृणा: बकरीद पर भारत को ‘इस्लामी मुल्क’ लिखने वाला सैयद हुसैन छपरा में गिरफ्तार, राजस्थान में ‘कुर्बानी’ के विरोध में उतरे हिंदू संगठन

बकरीद के दिन भारत के कुछ हिस्सों से शांति भंग करने और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने की कोशिशों की खबरें सामने आई हैं। यह कोई पहला मौका नहीं है जब बकरीद पर इस तरह के विवाद देखने को मिले हों। पिछले वर्ष 2024 में भी बकरीद के दौरान कुछ समूहों द्वारा हंगामा और शांति भंग की घटनाएँ सामने आई थीं। साल 2025 में भी बिहार और राजस्थान जैसे राज्यों से अशांति और विवाद की खबरें मिली हैं। कहीं फेसबुक पोस्ट पर भारत को ‘इस्लामिक देश’ कहकर विवाद खड़ा किया गया, तो कहीं सड़कों पर नमाज पढ़ने और जानवरों की कुर्बानी को लेकर प्रदर्शन देखने को मिले।

बिहार के छपरा में ‘इस्लामी देश’ विवाद

बकरीद से ठीक पहले बिहार के छपरा में एक फेसबुक पोस्ट को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया। सैयद हुसैन नामक एक युवक ने अपने फेसबुक अकाउंट पर भारत को ‘इस्लामी देश’ बताते हुए लिखा, “कल इस्लामिक देश भारत मे ईद-उल-अजहा मनाई जाएगी।” इसके बाद उसने लोगों को बधाई दी। यह पोस्ट सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गई, जिससे विभिन्न समुदायों में आक्रोश फैल गया और बड़े पैमाने पर हंगामा हुआ।

छपरा के SSP ने तुरंत इस मामले का संज्ञान लिया और साइबर सेल को जाँच के आदेश दिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसे किसी भी भड़काऊ पोस्ट को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। पुलिस ने आरोपित सैयद हुसैन को गिरफ्तार कर लिया है और मामले की गहनता से जाँच की जा रही है। छपरा में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती की गई है।

राजस्थान में सड़कों पर नमाज से यातायात भंग

इसी तरह राजस्थान में भी, यहाँ हिंदुओं ने बकरीद के मौके पर माँग की थी कि जानवरों की कुर्बानी पर रोक लगे और ऐसे काम सार्वजनिक जगहों पर न किए जाएँ। इसके अलावा नमाज के नाम पर भी आवाजाही बाधित न हो क्योंकि इससे आम लोगों को दिक्कत होती है।

हालाँकि मुस्लिम समुदाय ने इस पर क्या गौर किया क्या नहीं, ये नहीं सामने आया। मगर नाराज हिंदू संगठन ने ऐसी स्थिति से निपटने के लिए योगी मॉडल अपनाने की वकालत की है।

पहले भी बकरीद पर हुए कई हंगामे

साल 2024, कुशीनगर में बकरीद के दिन सरकारी जमीन पर जबरन नमाज पढ़ने का मामला सामने आया था। आरोप था कि ग्राम प्रधान के पति की साजिश से बरात घर की आड़ में मस्जिद निर्माण की कोशिश की जा रही थी। एक हिन्दू पंच की शिकायत पर FIR दर्ज की गई थी और 11 आरोपितों को गिरफ्तार किया गया था। इस मामले में कार्यवाही में ढिलाई बरतने के आरोप में भी 3 पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर कर उन पर जाँच बिठाई गई है।

वहीं बरेली में बकरीद के मौके पर एक गाँव में मंदिर के सामने भैंस की कुर्बानी दी गई थी। हिन्दू पक्ष की शिकायत पर FIR दर्ज कर इस्लाम, शफी, अखलाक और इसरार के बेटों सहित कई अन्य लोगों को गिरफ्तार किया गया था।

एक मामला शामली से भी देखने को मिला था। बकरीद के समय पशु हत्या की वीभत्स तस्वीर सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के आरोप में पुलिस ने जावेद को गिरफ्तार किया था। यह तस्वीर आरोपित जावेद ने व्हाट्सएप स्टेटस पर लगाई थी।

BBC ने अपने न्यूजनाइट शो में जनता को बनाया ‘पप्पू’ : जानें – कैसे गलत आँकड़ों से पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग्स को बचाया, ‘गोरों’ के मत्थे जड़ा ‘रेपिस्ट’ का तमगा

ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन (बीबीसी) अक्सर आतंकवादियों को बढ़ावा देने या उन लोकतांत्रिक सरकारों के खिलाफ प्रचार करने में व्यस्त रहता है, जो उसकी ‘संकुचित’ विचारधारा से मेल नहीं खाती। जब वह इन कामों में नहीं लगी होती, तो वह ब्रिटिश जनता को धोखा देने में जुट जाती है। खासकर पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग्स द्वारा किए गए ग्रूमिंग जिहाद के भयानक यौन शोषण जैसे अपराधों को छिपाने में।

इस सप्ताह बीबीसी के न्यूज़नाइट प्रोग्राम ने शायद सबसे शर्मनाक तरीके से ब्रिटिश जनता को गुमराह करने की कोशिश की। यह प्रोग्राम ग्रूमिंग गैंग्स जैसे गंभीर मुद्दे पर ‘गंभीर बातचीत’ के लिए था, जिसे सुनकर शर्मिंदगी, आत्ममंथन और जवाबदेही की उम्मीद की जानी चाहिए थी। लेकिन इसके बजाय बीबीसी ने वही किया जो ब्रिटेन की वामपंथी संस्थाएँ पिछले दो दशकों से करती आई हैं – पीड़ितों से ध्यान हटाने पर, असहज सच्चाई से भटकाकर गलत आँकड़ों पर और जिम्मेदारी से बचकर बहाने बनाने पर।

इस पूरे ड्रामे के केंद्र में था एक ग्राफ, जिसे राष्ट्रीय टेलीविजन पर बड़े गर्व से दिखाया गया। इस ग्राफ में कहा गया कि 55% ग्रूमिंग गैंग के संदिग्ध ‘व्हाइट ब्रिटिश’ थे, जबकि सिर्फ 12.9% पाकिस्तानी थे।

यह एक गंभीर चर्चा का मौका था, लेकिन बीबीसी और शो में आए एक पुलिस अधिकारी ने इसे अपनी छवि चमकाने का मौका बना लिया। उस पुलिस अधिकारी का विभाग वही था, जिसने सालों तक पीड़ितों की अनदेखी की और अपराधियों को नजरअंदाज किया। उसने पूर्व आव्रजन मंत्री रॉबर्ट जेनरिक के इस दावे को ‘गलत’ बताया कि ग्रूमिंग गैंग ‘मुख्य रूप से पाकिस्तानी’ हैं।

यह वही पुलिस विभाग है, जिसने रॉदरहम की एक पीड़िता से कहा था कि वह बाल यौन शोषण पर अपनी सोशल मीडिया पोस्ट डिलीट कर दे। ऐसे विभाग के अधिकारी से, जो ऑनलाइन चर्चा से डरता हो, क्या आप राष्ट्रीय टेलीविजन पर सच बोलने की उम्मीद करेंगे?

लेकिन बीबीसी नहीं चाहता था कि दर्शक यह नोटिस करें कि उनके दिखाए गए ग्राफ में सिर्फ 31% संदिग्धों की जानकारी थी। बाकी 69% मामलों में? कोई नस्लीय पहचान/जातीयता दर्ज ही नहीं थी। यानी दस में से सात संदिग्धों का डेटा ही नहीं था – फिर भी बीबीसी ने इस अधूरे डेटा के आधार पर पूर्व आव्रजन मंत्री रॉबर्ट जेनरिक को गलत और राजनीति से प्रेरित ठहरा दिया।

यह पत्रकारिता नहीं है। यह एक कहानी को गढ़ने की कोशिश है, ताकि पाकिस्तानी मूल के उन ग्रूमिंग गैंग्स को बचाया जा सके, जिन्होंने सालों तक ब्रिटिश नागरिकों का यौन शोषण बिना किसी सजा के किया।

अगर हम उनके गलत आँकड़ों को ही सच मान लें – 12.9% पाकिस्तानी संदिग्ध, जबकि ब्रिटेन में पाकिस्तानी आबादी सिर्फ 2-3% है – तो भी यह 4 से 6 गुना ज्यादा हिस्सेदारी दिखाता है। यह कोई छोटी-मोटी बात नहीं है। यह एक बड़ा सामाजिक संकेत है – वही संकेत, जिसे ब्रिटिश सरकार पिछले दो दशकों से नजरअंदाज, छिपाने और भूलने की कोशिश कर रही है।

लेकिन बीबीसी यहीं नहीं रुका। उसने डेटा का समय भी चुनिंदा तरीके से लिया। दिखाए गए आंकड़े सिर्फ 2024 के थे – यानी एक साल के। जैसे कि ग्रूमिंग गैंग के अपराध कोई कोविड-19 हों, जो हाल ही में शुरू हुए हों। ये अपराध सालों, बल्कि दशकों से चल रहे हैं, जहाँ पुलिस और सामाजिक सेवाओं ने एक गिरजाघर बनाने जितना समय लिया, लेकिन कार्रवाई नहीं की। रॉदरहम में ही आधिकारिक अनुमान है कि 16 साल में 1,400 लड़कियों का शोषण हुआ। इतने बड़े पैमाने को एक साल के ग्राफ में नहीं समेटा जा सकता – इसलिए बीबीसी ने ऐसा दिखाया जैसे यह हुआ ही नहीं।

अपराधों की परिभाषा की बात करें तो, ‘ग्रूमिंग गैंग’ ब्रिटेन में कोई आधिकारिक अपराध श्रेणी नहीं है। इस साल कंजर्वेटिव्स ने इसे शामिल करने की कोशिश की, लेकिन इसे रोक दिया गया। इसका मतलब है कि कोई भी ‘विश्लेषण’ आसानी से ऑनलाइन अकेले शिकारियों, पारिवारिक शोषण, या आपसी सहमति से बने नाबालिग रिश्तों को मिलाकर ग्रूमिंग गैंग के विशिष्ट और सिद्ध पैटर्न को कमजोर कर सकता है – जो लगभग हमेशा पाकिस्तानी मुस्लिम पुरुषों द्वारा कमजोर व्हाइट ब्रिटिश लड़कियों का शोषण करता है। यही पैटर्न रॉदरहम, रोचडेल, टेलफोर्ड, कीगली और ऑक्सफोर्ड में देखा गया है।

लेकिन बीबीसी नहीं चाहता कि आप इस पैटर्न पर ध्यान दें। वे चाहते हैं कि आप ‘राजनीतिक शुद्धता’ पर ध्यान दें, कि ‘पाकिस्तानी पुरुष’ कहना ‘समुदायिक संबंधों’ को नुकसान पहुँचा सकता है। क्योंकि ‘दक्षिणपंथी’ समूह सच का गलत इस्तेमाल कर सकते हैं – जैसे कि असली समस्या बलात्कारी नहीं, बल्कि उनकी नस्लीय पहचान/जातीयता बताने वाले हैं।

इसके अलावा बीबीसी ने पुलिस के अपराध डेटा पर भरोसा किया, जिसे ब्रिटेन की अपनी सांख्यिकी निगरानी संस्था ने 2014 में कहा था कि यह राष्ट्रीय सांख्यिकी के मानकों को पूरा नहीं करता, क्योंकि यह असंगत और अविश्वसनीय है। लेकिन जब मकसद कहानी गढ़ना हो, तो विश्वसनीयता की परवाह कौन करता है?

बात यहीं खत्म नहीं होती। न्यूज़नाइट में पुलिस अधिकारी, जिसके सामने पीड़ित बैठे थे – जिनमें से कुछ ने दशकों तक न्याय का इंतजार किया… उसने समय बिताया एक कंजर्वेटिव सांसद को गलत ठहराने में, न कि अपनी पुलिस फोर्स की विफलता को स्वीकार करने में। यह उन महिलाओं के सामने हुआ, जिनका तस्करी की गई, बलात्कार हुआ और जिन्हें फेंक दिया गया। ऐसा किया उन पाकिस्तानी पुरुषों ने, जिन्हें सांस्कृतिक संवेदनशीलता और राजनीतिक कायरता ने बचाया।

यह सिर्फ मीडिया की विफलता नहीं है। यह संस्थागत विश्वासघात का सबसे बड़ा रूप है।
बीबीसी पर यकीन करने के लिए आपको मानना होगा कि–

  1. हर ग्रूमिंग गैंग का संदिग्ध पकड़ा जाता है।
  2. हर संदिग्ध अपनी जातीयता सही बताता है, भले ही वह अंग्रेजी न बोलता हो।
  3. हर अपराध को ईमानदारी से दर्ज किया जाता है, बिना ‘विविधता विभागों’ के दबाव के।

जो कोई भी इन मामलों को जानता है, वह समझता है कि ये मान्यताएँ हास्यास्पद हैं। पुलिस ने कई बार दस्तावेजों में दर्ज मामलों में पाकिस्तानी अपराधियों को इसलिए नजरअंदाज किया क्योंकि वे नस्लवादी कहलाने से डरती थी। काउंसिल अधिकारियों ने चुप्पी साधी, ताकि ‘नस्लवादी’ का ठप्पा न लगे। पीड़ितों को झूठा कहा गया। सच बोलने वालों को नौकरी से निकाला गया।

और अब भी साल 2025 तक में बीबीसी ने कुछ नहीं सीखा। न्यूज़नाइट का यह एपिसोड चर्चा नहीं था। यह एक बचाव था – एक नाकाम नौकरशाही का, गलत डेटा का और उस सांस्कृतिक अभिजात वर्ग का, जो बच्चों की सुरक्षा से ज्यादा सोशल इंजीनियरिंग में रुचि रखता है।

रॉबर्ट जेनरिक ने कहा कि ग्रूमिंग गैंग मुख्य रूप से पाकिस्तानी हैं। वह डेटा और भावना दोनों में सही हैं। इससे वह बीबीसी के लिए असुविधाजनक हो सकते हैं, लेकिन वह ईमानदार हैं।

वहीं, बीबीसी ने एक बार फिर दिखाया कि ब्रिटेन की सत्ता के लिए सच वैकल्पिक है। कहानी जरूरी है।

और यही सबसे खतरनाक ग्रूमिंग है।

कंजर्वेटिव सांसद क्रिस फिल्प (क्रॉयडन साउथ) ने हाल ही में बताया, “20 साल के अध्ययन से पता चलता है कि बलात्कार गैंग के ज्यादातर अभियोजन -83% पाकिस्तानी मूल के अपराधियों से संबंधित थे।” फिर भी बीबीसी के न्यूज़नाइट ने हाल के प्रसारण में इन तथ्यों को गलत तरीके से पेश किया और राजनीतिक शुद्धता के नाम पर भ्रामक एडिटिंग की अपनी लंबी परंपरा को जारी रखा।

फिल्प ने सही कहा, “इस ढकने-छिपाने को खत्म करना होगा। हमें एक उचित राष्ट्रीय जाँच की जरूरत है।” लेकिन ग्रूमिंग अपराधों और अधिकारियों की लंबे समय से चली आ रही अनिच्छा की जाँच करने के बजाय, बीबीसी ने बार-बार पीड़ितों को गुमराह करने, जनता को भटकाने और उन अपराधियों की छवि बचाने का रास्ता चुना, जो उनकी ‘संरक्षित पहचान’ की श्रेणी में आते हैं।

जब ब्रिटिश मीडिया संस्थाएँ अपने दर्शकों को गुमराह करने में व्यस्त थीं, तब ऑपइंडिया जैसी कुछ न्यूज़ साइट्स ने सालों से यूके के ग्रूमिंग गैंग कांड की सच्चाई को लगातार सामने लाया। रॉदरहम और रोचडेल की विस्तृत रिपोर्टों से लेकर बीबीसी की भ्रामक मशीनरी की कड़ी आलोचना तक, ऑपइंडिया ने ब्रिटिश अधिकारियों की व्यवस्थित विफलताओं को उजागर किया – यह नहीं कि उन्हें पता नहीं था, बल्कि इसलिए कि वे दिखावे से डरते थे।

ऑपइंडिया की कवरेज ने न सिर्फ इन अपराधों की भयावहता और पैमाने को दर्ज किया, बल्कि बीबीसी की उस प्रवृत्ति को भी उजागर किया, जो दूसरों के देशों के मामलों में पक्षपाती रिपोर्टिंग करती है, लेकिन यूके को परेशान करने वाली सांस्कृतिक, धार्मिक और वैचारिक समस्याओं को नजरअंदाज करती है। चाहे वह राजनीतिक नेताओं की कायरता हो, कानून प्रवर्तन की मिलीभगत हो, बीबीसी ने या तो इन सब को अनदेखा किया या जनता की राय को गलत दिशा देने के लिए उन्हें तोड़-मरोड़कर पेश किया।

G7 की बैठक में शामिल होंगे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कनाडा के PM कार्नी ने खुद फोन कर किया आमंत्रित: महीने के आखिर में होगा शिखर सम्मेलन, कॉन्ग्रेस के हाथ से फिसला मुद्दा

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस महीने कनाडा के कनानसकीस में होने वाले G7 शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। 15 से 17 जून तक चलने वाले इस सम्मेलन के लिए कनाडा के नए प्रधानमंत्री मार्क जे. कार्नी ने पीएम मोदी को फोन पर न्योता दिया। दोनों नेताओं के बीच बातचीत बेहद गर्मजोशी भरी रही।

पीएम मोदी ने कार्नी को उनकी हालिया चुनावी जीत की बधाई दी और सम्मेलन में बुलाने के लिए धन्यवाद दिया। इस बातचीत में भारत-कनाडा संबंधों को मजबूत करने पर जोर दिया गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत और कनाडा दोनों ही जीवंत लोकतंत्र हैं, जिनके बीच गहरे जन-जन के रिश्ते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि दोनों देश आपसी सम्मान और साझा हितों के आधार पर एक नई ऊर्जा के साथ काम करेंगे। इस बातचीत में वैश्विक मुद्दों के साथ-साथ द्विपक्षीय सहयोग पर भी चर्चा हुई। मोदी ने कार्नी से मुलाकात की उत्सुकता जताई और इसे दोनों देशों के रिश्तों में नया मोड़ बताया।

बता दें कि कॉन्ग्रेस पार्टी बीते कुछ समय से जी7 की बैठक में पीएम मोदी को न बुलाने के मुद्दे को राजनीतिक बना दिया था। कॉन्ग्रेस ने भारत की विदेश नीति पर भी सवाल उठाए थे। हालाँकि अब कॉन्ग्रेस के हाथ से ये मुद्दा भी निकल गया है।

गौरतलब है कि पिछले कुछ सालों में भारत और कनाडा के रिश्तों में तनाव देखा गया था, खासकर पूर्व कनाडाई पीएम जस्टिन ट्रूडो के समय। ट्रूडो ने 2023 में खालिस्तानी अलगाववादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारत पर बेबुनियाद आरोप लगाए थे, जिसे भारत ने ‘बेतुका’ और ‘राजनीति से प्रेरित’ बताया। इस विवाद से दोनों देशों ने एक-दूसरे के राजनयिकों को निष्कासित कर रिश्तों को निचले स्तर पर पहुँचा दिया था। लेकिन, कार्नी के नेतृत्व में कनाडा अब रिश्तों को सुधारने की दिशा में कदम उठा रहा है।

कार्नी ने चुनाव प्रचार के दौरान भारत के साथ रिश्तों को ‘बेहद महत्वपूर्ण’ बताया था और व्यापार के जरिए संबंधों को बेहतर करने की बात कही थी। भारत भी चाहता है कि कनाडा उसके राजनयिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे और उग्रवादी गतिविधियों पर रोक लगाए। G7 सम्मेलन में मोदी की मौजूदगी दोनों देशों के लिए एक मौका है, जहाँ वे आपसी भरोसा और सहयोग बढ़ाने की दिशा में काम कर सकते हैं। ये कदम भारत-कनाडा संबंधों में सकारात्मक बदलाव का संकेत है।

मुगल काल में हिंदुओं से उठवाए जाते थे गोवंश के अवशेष, अब बकरीद पर नहीं करेंगे ‘बड़े’ पशुओं की ‘कुर्बानी’ की सफाई : शाहजहाँपुर में हिंदू कर्मचारियों की माँग, पत्र लेकर DM के पास पहुँचे

उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर जिले में हिंदू सफाई कर्मचारियों ने साफ कर दिया है कि वो बकरीद के दौरान ‘बड़े पशुओं’ की कुर्बानी के अवशेषों को नहीं उठाएँगे। सफाई कर्मचारियों ने इसे लेकर जिलाधिकारी को पत्र भी लिखा है। पत्र में नगर निगम और नगर पंचायतों में कार्यरत हिंदू सफाई कर्मचारियों ने इस बार कुर्बानी के पशुओं के अवशेषों की सफाई कार्य में भाग नहीं लेने की बात कही है। उनका कहना है कि मुगलिया दौर से चल रहा ये काम उनकी धार्मिक आस्थाओं और परंपराओं के खिलाफ है और अब वह इस परंपरा को आगे नहीं बढ़ाना चाहते।

मुगलिया दौर बीता तो उस दौर की व्यवस्था भी हो खत्म

सफाई कर्मचारी संघ के प्रदेश महामंत्री प्रदीप कुमार बाल्मीकि ने कहा कि जिस समुदाय द्वारा कुर्बानी की जाती है, उसी समुदाय के लोगों को उस कचरे और बचे हुए अवशेषों की सफाई करनी चाहिए। उनके अनुसार यह एक मजहबी उत्सव है, जिसमें वों हिस्सा नहीं लेना चाहते, क्योंकि यह उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाता है।

उनके अनुसार मुगल काल से यह कार्य हिंदू समुदाय के लोग करते आए हैं, लेकिन अब वे इसे अपनी धार्मिक आस्था के खिलाफ मानते है और इसी कारण से वो अब यह कार्य नहीं करना चाहते है। उनका कहना है कि 80% कर्मचारी हिंदू ऐसे कामों को नहीं करना चाहते है।

कर्मचारियों ने चेतावनी दी है कि यदि उन पर ये काम करने का दबाव डाला गया, तो वे सामूहिक रूप से हड़ताल पर चले जाएँगे। इसकी पूरी जिम्मेदारी जिला प्रशासन की होगी। बाल्मीकि समाज ने यह भी कहा है कि मुगल काल से लेकर अब तक यह काम हमेशा से ही हिंदू सफाई कर्मचारियों द्वारा किया जाता रहा है, लेकिन अब देश आजाद हो चुका है उन्हें भी अपने धर्म और आस्था के साथ जीने का संवैधानिक अधिकार है।

कर्मचारियों का कहना है कि उन्हें कुर्बानी के अवशेषों की सफाई के दौरान स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। गंदगी और बदबू की वजह से उन्हें अक्सर उल्टियाँ, सिर दर्द और मानसिक तनाव जैसी समस्याएँ होती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यह कार्य सफाई कर्मचारियों के लिए एक प्रकार की मानसिक प्रताड़ना बन जाता है। जो न केवल उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, बल्कि उनके आत्म-सम्मान को भी ठेस पहुँचाता है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए जिलाधिकारी और नगर निगम अधिकारी कर्मचारियों से बातचीत कर रहे हैं। प्रशासन स्थिति को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने का प्रयास कर रहा है, लेकिन अभी तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।

आँकड़े सच बोलते हैं, लेकिन राहुल गाँधी झूठ बोलते हैं… ‘कार की बिक्री’ पर कॉन्ग्रेस सांसद फैला रहे थे फर्जी खबर, FADA के डेटा से सारी पोल खोली

अपने बयानों को लेकर नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी अक्सर विवादों में घिरे रहते हैं। एक बार फिर राहुल गाँधी ने आम आदमी के लिए गाड़ियों की बिक्री में गिरावट को लेकर एक पोस्ट साझा किया जिस पर उन्हीं की आलोचना हो रही है।

कॉन्ग्रेस सांसद राहुल गाँधी ने वाहनों और मोबाइल की बिक्री में कमी होने के आँकड़े बताकर सरकार पर निशाना साधने की कोशिश की थी, लेकिन आधिकारिक आँकड़ों ने उनके बयान को झूठा करार दे दिया। इसके बाद सोशल मीडिया पर एक बार फिर लोगों के बीच वे हँसी के पात्र बन गए हैं।

राहुल गाँधी ने गुरुवार (5 जून 2025) को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट साझा की। उन्होंने लिखा कि आँकड़े सच बोलते हैं और दावा किया कि देश में बीते एक साल में दोपहिया वाहनों की बिक्री में 17%, कार की बिक्री में 8.6% की गिरावट हुई है। वहीं मोबाइल मार्केट 7% गिर गया है।

राहुल ने पोस्ट में लिखा, “खर्च और कर्ज़ – दोनों लगातार बढ़ रहे हैं: मकान का किराया, घरेलू महँगाई, शिक्षा का खर्च, लगभग हर चीज महँगी होती जा रही है। ये सिर्फ आँकड़े नहीं हैं, ये उस आर्थिक दबाव की हकीकत है जिसके नीचे हर आम भारतीय पिस रहा है।” हालाँकि ये आँकड़े उन्होंने कहाँ से लिए हैं, इसके बारे में उन्होंने जानकारी नहीं दी।

राहुल ने बात वहीं पर खत्म नहीं की बल्कि अपनी बात को पूँजीपतियों के साथ जोड़ने की कोशिश की। उन्होंने आगे लिखा, “हमें ऐसी राजनीति चाहिए जो इवेंट्स की चमक से नहीं, आम जिंदगी की सच्चाई से जुड़ी हो – जो सही सवाल पूछे, हालात को समझे और जिम्मेदारी से जवाब दे। हमें ऐसी अर्थव्यवस्था चाहिए जो हर भारतीय के लिए काम करे, न कि सिर्फ कुछ गिने-चुने पूँजीपतियों के लिए।”

राहुल के इस पोस्ट के बाद से ही उनकी जमकर आलोचना हो रही है। कुछ यूजर्स ने तो उनके पोस्ट में आधिकारिक आँकड़ों के स्क्रीनशॉट भी लगा दिए और बताया कि उनके आँकड़े उससे बिल्कुल मेल नहीं खाते।

असल में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने जो आँकड़े दिए हैं, वे इस इंडस्ट्री के आधिकारिक संगठनों के डेटा से बिल्कुल उल्टी कहानी कह रहे हैं।

फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (FADA) की रिपोर्ट में राहुल गाँधी के बताए हुए आँकड़े से बिल्कुल उलट जानकारी शामिल है। राहुल ने कहा कि वाहनों की बिक्री घटी है लेकिन FADA के अनुसार पैसेंजर व्हीकल में 4.87% की बढ़ोतरी हुई है। वहीं दो पहिया वाहनों में 7.71% तक की बढ़ोतरी हुई है।

यही कहानी सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM) की भी है। SIAM की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, देश की ऑटो इंडस्ट्री ने वित्त वर्ष 25 में रिकॉर्ड 43 लाख पैसेंजर वाहनों की बिक्री की है। उनके अनुसार ये एक मील का पत्थर है। यह पिछले वर्ष की तुलना में 2 प्रतिशत की वृद्धि थी।

लोगों ने राहुल को ये आधिकारिक आँकड़ें उनके पोस्ट में कमेंट करके पूछा है कि उनके आँकड़ें कहाँ से आए हैं। कुल मिलाकर, आम लोगों का मसीहा बनने के चक्कर में राहुल गाँधी ने एक बार फिर अपनी ही भद्द पिटवा ली।

बिहार के ‘पॉलिटिकल टूर’ पर राहुल गाँधी, दशरथ माँझी की मूर्ति को 2 बार पहनाई ‘एक हाथ’ से माला और देखा तक नहीं: माउंटेन मैन के परिवार से मिलना दलित प्रेम या सियासी मजबूरी?

राहुल गाँधी इन दिनों बिहार के राजनीतिक पर्यटन पर निकले हैं। गया पहुँचे, दशरथ माँझी के गाँव गए, उनकी मूर्ति पर माला चढ़ाई, परिवार से मिले और पूरे तामझाम के साथ दलित प्रेम का ढोंग रचाया। इस पूरे तामझाम का मकसद था – ‘दलित प्रेम’ का प्रदर्शन। लेकिन जो हुआ, उसने सियासत की पोल खोल दी।

दशरथ माँझी को पहनाई माला, लेकिन ढंग से देखा तक नहीं

दरअसल, गयाजी जिले के गहलौर गाँव में राहुल गाँधी दशरथ माँझी मेमोरियल पहुँचे। वहाँ माउंटेन मैन की मूर्ति पर माला चढ़ाई। लेकिन जिस तरह से उन्होंने ये किया, वो देखकर किसी का भी मन खट्टा हो जाए। दो बार माला चढ़ाई, लेकिन नजरें मूर्ति की तरफ उठी तक नहीं।

राहुल गाँधी ने एक हाथ से, तिरछे होकर जैसे जबरदस्ती कोई काम कर रहा हो, इसी तरह से इस ‘काम’ को निपटाया। चेहरे के हाव-भाव, मूर्ति की ओर नजरें और माला पहनाने का अंदाज – सब कुछ साफ बता रहा था कि राहुल गाँधी के लिए यह श्रद्धा नहीं, मजबूरी थी। एक हाथ से तिरछी माला, बिना नजरें मिलाए जल्दी-जल्दी दो बार माला चढ़ाना और आगे बढ़ जाना।

लोग भी तंज कस रहे हैं कि राहुल बाबा को माला चढ़ाने में भी मेहनत नहीं करनी। शायद सोच रहे होंगे कि बस फोटो खिंच जाए, बाकी तो जनता वैसे ही वोट दे देगी।

कौन थे दशरथ माँझी, जिनके घर सियासत चमकाने पहुँचे राहुल गाँधी

दशरथ माँझी, जिन्हें माउंटेन मैन कहा जाता है, उन्होंने 22 साल तक पहाड़ काटकर रास्ता बनाया। आज दशरथ माँझी का नाम है, तो वो राहुल गाँधी के ही परिवार, खानदान, पार्टी की वजह से। क्योंकि दशरथ माँझी की पत्नी फाल्गुनी की मौत जिस अव्यवस्था के कारण 1959 में हुई, वो उस समय की कॉन्ग्रेस सरकार की देन थी। 1960 से 1982 तक माँझी ने अकेले दम पर पहाड़ काटा, लेकिन कॉन्ग्रेस की सरकारें सोती रहीं।

इससे पहले भी भारत देश और बिहार की राजनीति पर कॉन्ग्रेस का ही वर्चस्व था और उसके बाद भी कॉन्ग्रेस का लंबे समय तक राज रहा, लेकिन विकास कार्यों की जगह कॉन्ग्रेस पार्टी ने आम जनता की तकलीफों और परेशानियों के प्रति मुँह मोड़े रखा। न कोई सड़क बनी, न अस्पताल, न कोई मदद मिली। माँझी ने अपनी मेहनत से जो रास्ता बनाया, उसकी सुध लेने में कॉन्ग्रेस को 22 साल लगे नहीं, बल्कि कभी सुध ली ही नहीं। आज राहुल गाँधी उन्हीं दशरथ माँझी के परिवार से मिल रहे हैं और महानता का बखान कर रहे हैं।

दलितों की अनदेखी का लंबा इतिहास

कॉन्ग्रेस का इतिहास देखें तो दलितों और गरीबों की अनदेखी की कहानियाँ भरी पड़ी हैं। दशरथ माँझी के समय से लेकर बाद तक, कॉन्ग्रेस ने बिहार में लंबा राज किया। लेकिन क्या बदला? गाँवों में सड़कें नहीं, अस्पताल नहीं, स्कूल नहीं। माँझी जैसे लोग अपनी जान जोखिम में डालकर पहाड़ काटते रहे और कॉन्ग्रेस की सरकारें कुर्सी की राजनीति में मस्त रहीं। बाद में जब लालू यादव और राबड़ी देवी की सरकारें आईं, जो कॉन्ग्रेस की सहयोगी थीं, तब भी माँझी की कोई सुध नहीं ली गई। 15 साल तक लालू-राबड़ी ने बिहार को जंगलराज में धकेला, लेकिन माँझी जैसे लोगों के लिए कुछ नहीं किया।

वो तो भला हो नीतीश कुमार और बीजेपी की जोड़ी का, जिन्होंने माँझी के बनाए रास्ते को पक्का करवाया। नीतीश ने माँझी को सम्मान दिया, उनके नाम पर सड़क बनवाई और पद्मश्री के लिए उनका नाम भेजा। यही नहीं, मृत्यु के बाद राजकीय सम्मान के साथ विदाई भी दी। लेकिन राहुल गाँधी आज माँझी के गाँव में जाकर उनकी महानता का बखान कर रहे हैं। अरे भाई, अगर तुम्हारी पार्टी ने उस समय थोड़ा सा ध्यान दिया होता, तो शायद माँझी को 22 साल तक हथौड़े-छेनी से पहाड़ तोड़ने की जरूरत ही न पड़ती।

माँझी का परिवार और कॉन्ग्रेस की टिकट की सियासत

अब बात करते हैं माँझी के परिवार की। दशरथ माँझी के बेटे भगीरथ माँझी कॉन्ग्रेस में शामिल हो चुके हैं। परिवार अब कॉन्ग्रेस से विधानसभा चुनाव का टिकट माँग रहा है। ये वही परिवार है, जिसे कॉन्ग्रेस ने दशरथ माँझी के जीते-जी कभी पूछा तक नहीं। माँझी 2007 तक जिंदा रहे, लेकिन कॉन्ग्रेस ने उनकी सुध लेने की जहमत नहीं उठाई। अब जब बिहार में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, राहुल गाँधी को माँझी का गाँव याद आ गया। भगीरथ माँझी का हाथ पकड़कर फोटो खिंचवाए, वीडियो बनवाए और सोशल मीडिया पर वायरल करवाया। लेकिन सवाल ये है कि क्या ये सब दलितों के लिए सच्चा प्रेम है, या फिर वोटों की खातिर किया गया नाटक?

कॉन्ग्रेस की चाल समझने की जरूरत है। दरअसल, कॉन्ग्रेस ने बिहार में पूरी लीडरशिप ही दलितों के इर्द-गिर्द रखी है। प्रदेश में पार्टी की कमान राजेश राम को सौंपी है। वो दरभंगा पहुँचे, तो भी बिना अनुमति ही आँबेडकर हॉस्टल में घुस गए और दलित छात्रों से संवाद करने लगे। पटना पहुँचे तो फुले फिल्म देखने लगे। राजगीर पहुँचे, तो दलितों-आदिवासियों के साथ संवाद कार्यक्रम किया।

और अब माउंटेन मैन के घर जाकर, माला चढ़ाकर वो इसी कड़ी को आगे बढ़ा रहे हैं। शायद, वो माँझी के परिवार को विधानसभा चुनाव का टिकट भी दे दें, ताकि खुद को दलितों का मसीहा साबित कर सकें… लेकिन जनता सब समझती है। अगर कॉन्ग्रेस को दलितों की इतनी ही फिक्र थी, तो 22 साल तक माँझी को क्यों भूल गए? 27 साल बाद उनकी मौत के बाद भी क्यों नहीं सुध ली? अब जब वोटों की जरूरत पड़ी, तो माला चढ़ाने और फोटो खिंचवाने का ड्रामा शुरू हो गया।

गाँधी परिवार का दलित विरोधी इतिहास

गाँधी परिवार का दलितों के प्रति रवैया हमेशा से सवालों के घेरे में रहा है। इंदिरा गाँधी के समय बाबू जगजीवन राम को प्रधानमंत्री बनने से रोका गया, सिर्फ इसलिए क्योंकि वो दलित थे। इतना ही नहीं, उनके बेटे का सेक्स स्कैंडल इंदिरा ने अपनी बहू के अखबार में छपवाया, ताकि जगजीवन राम की छवि खराब हो। ये है गाँधी परिवार का दलित प्रेम? आज राहुल गाँधी बिहार में दलितों के घर जा रहे हैं, लेकिन उनका मन वहाँ है ही नहीं। माला चढ़ाते वक्त उनका चेहरा देख लीजिए, लगता है जैसे कोई जबरदस्ती करवा रहा हो।

राहुल गाँधी का ये बिहार दौरा उनका पाँचवाँ दौरा है पिछले पाँच महीनों में। पहले दरभंगा, पटना, समस्तीपुर, पश्चिम चंपारण और अब गया, राजगीर, बोधगया। हर जगह वही ड्रामा – माला चढ़ाओ, फोटो खिंचवाओ और सोशल मीडिया पर वायरल करवाओ। राजगीर में जरासंध स्मारक गए, बाबासाहेब आंबेडकर की मूर्ति पर माला चढ़ाई और फिर अति पिछड़े समाज के लोगों से मुलाकात की। लेकिन ये सब कितना सच्चा है? अगर दलितों और पिछड़ों की इतनी ही चिंता थी, तो कॉन्ग्रेस ने अपने 60 साल के शासन में उनके लिए क्या किया? बीजेपी भी यही आरोप लगा रही है।

राहुल गाँधी का बिहार दौरा और दशरथ माँझी के गाँव जाना, एक सोचा-समझा सियासी ड्रामा है। माला चढ़ाने का ढोंग, परिवार से मिलने का नाटक और सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो – ये सब वोटों की खातिर है। कॉन्ग्रेस का इतिहास रहा है दलितों और गरीबों की अनदेखी का। दशरथ माँझी ने 22 साल तक पहाड़ काटा, लेकिन कॉन्ग्रेस की सरकारों ने उनकी सुध नहीं ली क्योंकि कॉन्ग्रेस का इतिहास रहा है वादे करने का, नारे देने का… लेकिन काम करने का नहीं। आज राहुल गाँधी माँझी के गाँव जाकर उनकी महानता का बखान कर रहे हैं, लेकिन सच्चाई ये है कि माँझी को वो सम्मान नहीं मिला, जो उन्हें कॉन्ग्रेस के राज में मिलना चाहिए था।

अब कोई संकट आए, तो पहले नरेंद्र मोदी से होगा सामना: J&K के कटरा में प्रधानमंत्री ने रेल कनेक्टिविटी का दिया उपहार, पाकिस्तान को फिर औकात दिखाई

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कश्मीर में चेनाब रेलवे ब्रिज का उद्घाटन करने के बाद कटरा रेलवे स्टेशन से कटरा और श्रीनगर को जोड़ने वाली वंदे भारत एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इसके बाद उन्होंने कटरा में जनता को भी संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने लोगों को ‘ऑपरेशन सिंदूर’, पाकिस्तान को सख्त संदेश दिया और ये बताया कि चाहे कुछ भी हो जाए जम्मू-कश्मीर का विकास नहीं रुकने देंगे।

पीएम मोदी बोले कि यहाँ कई पीढ़ियाँ रेल कनेक्टिविटी का सपना देखते-देखते गुजर गईं। आज कई लोगों का सपना पूरा हुआ है। विकास के इस नए दौर के लिए सभी को बहुत-बहुत बधाई। उन्होंने बताया कि चेनाब ब्रिज एफिल टावर से भी ऊँचा है। उन्होंन सीएम उमर अब्दुल्लाह का भी जिक्र किया कि कैसे ये प्रोजेक्ट तब से बन रहा था जब वह 7वीं-8वीं में पढ़ते थे। पीएम बोले कि शायद ये अच्छा काम उनके हाथों ही होना था।

आगे उन्होंने पाकिस्तान पर हमला बोला। पीएम मोदी ने कहा कि पाकिस्तान ने कश्मीरियत पर हमला किया। पहलगाम में इंसानियत पर वार किया गया। जम्मू कश्मीर का युवा अब आतंकवाद को मुँहतोड़ जवाब देने के लिए तैयार हो चुका है।

पीएम मोदी ने कहा कि एक महीने पहले 6 मई की रात पाकिस्तान पर कयामत बरसी थी। पाकिस्तान कभी ‘ऑपरेशन सिंदूर’ सोचेगा तो उसे अपनी हार याद आएगी। उसने कभी नहीं सोचा होगा कि भारत उनके यहाँ अंदर जाकर आतंक के ठिकानों पर हमला करेगा। पाकिस्तान में आतंक की इमारतें खंडहर बन गई हैं।

पीएम मोदी ने कहा कि 3 तारीख से अमरनाथ यात्रा शुरू हो रही है और इस बीच ईद का भी माहौल है। नरेंद्र मोदी का वादा है कि विकास नहीं रुकेगा। कोई बाधा आएगी तो उसे मोदी का सामना करना पड़ेगा। पीएम मोदी ने वादा किया कि सरकार किसी भी हालत में जम्मू-कश्मीर के विकास को बाधित नहीं होने देगी। पाकिस्तान हमले का जिक्र करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि गोलीबारी में जिनके घरों का नुकसान हुआ है, उन्हें दो लाख रुपए दिए जाएँगे।

राजभवन में ‘भारत माता’ का पोस्टर देख भड़के केरल के 2 कम्युनिस्ट मंत्री, कार्यक्रम का किया बहिष्कार: राज्यपाल बोले- तस्वीर नहीं हटेगी, आपको जाना है तो जाओ

केरल में विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर राजभवन में आयोजित एक सरकारी कार्यक्रम में ‘भारत माता’ की तस्वीर वाम मोर्चा (LDF) सरकार की आँखों में चुभ गई और सरकार ने तस्वीर हटाने को लेकर अड़ियल रवैया अपनाया। इसके अलावा कृषि मंत्री पी प्रसाद और शिक्षा मंत्री वी शिवनकुट्टी ने शर्मनाक तरीके से कार्यक्रम का बहिष्कार कर दिया।

पिनाराई विजयन की सरकार में दो मंत्रियों ने मंच पर लगी ‘भारत माता‘ की तस्वीर को हटाने के लिए जोर दिया, जिसको राज्यपाल ने नहीं माना। इस पर कृषि मंत्री पी प्रसाद ने कहा कि RSS से जुड़ी ‘आईकोनोग्राफी’ वाली यह तस्वीर मानी नहीं जाएगी।

सरकार ने अपनी मानसिकता का परिचय देते हुए राजभवन के कार्यक्रम को छोड़कर अपना आधिकारिक समारोह सचिवालय के दरबार हॉल में शिफ्ट कर लिया। दूसरी ओर, राज्यपाल ने अकेले ही ‘भारत माता’ की तस्वीर के सामने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम की गरिमा को बनाए रखा। यह मामला केरल सरकार की राष्ट्रीय एकता और संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

सरकार का गैर-जिम्मेदाराना रुख

विश्व पर्यावरण दिवस जैसे महत्वपूर्ण अवसर पर, जब देश और समाज को एक साथ आना चाहिए था, केरल सरकार ने एक तस्वीर पर आपत्ति जताकर राजनीतिक द्वेष को प्राथमिकता दी। कृषि मंत्री पी प्रसाद ने खुले तौर पर कहा कि RSS से जुड़ी ‘आइकॉनोग्राफी’ वाली यह तस्वीर स्वीकार्य नहीं है। यह बयान दर्शाता है कि केरल सरकार एक राष्ट्रीय प्रतीक को भी अपनी राजनीतिक विचारधारा के चश्मे से देखती है।

मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने भले ही सीधे तौर पर बयान न दिया हो, लेकिन यह जानकारी सामने आई है कि कृषि मंत्री ने उनकी सहमति से ही राजभवन के कार्यक्रम का बहिष्कार किया। यह मुख्यमंत्री की मौन स्वीकृति को दर्शाता है, जिससे सरकार की मंशा पर संदेह गहराता है।

राज्यपाल ने क्या कहा?

राज्यपाल राजेंद्र आर्लेकर इस बात से खुश नहीं थे कि मंत्री ने ‘भारत माता’ की तस्वीर हटाने को कहा। राज्यपाल ने बताया कि उन्हें मंत्री के दफ्तर से कहा गया था कि ‘भारत माता’ की तस्वीर हटा दी जाए, लेकिन उन्होंने मना कर दिया।

राज्यपाल का कहना था कि ‘भारत माता’ उनके लिए बहुत अहम हैं, एक आदर्श हैं, और वे उन्हें हटा नहीं सकते। राज्यपाल ने यह भी बताया कि राजभवन में ‘भारत माता’ की तस्वीर लगाने का ये चलन उनके राज्यपाल बनने के बाद ही शुरू हुआ है।

यह पूरा विवाद ‘भारत माता’ की तस्वीर के इस्तेमाल को लेकर है, जिसे लेफ्ट सरकार RSS की विचारधारा से जोड़कर देख रही है, जबकि राज्यपाल इसे राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक बता रहे हैं. इस घटना से राज्य सरकार और राज्यपाल के बीच के रिश्ते फिर से तनावपूर्ण हो गए हैं।

दुनिया का सबसे ऊँचा रेलवे पुल कश्मीर में बनकर तैयार, पीएम मोदी ने किया उद्घाटन: 22 साल में तैयार हुआ चिनाब रेलवे आर्च ब्रिज, कई मायनों में है खास

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार (6 जून 2025) को कश्मीर में दुनिया के सबसे ऊँचे पुल का उद्घाटन किया। चेनाब नदी पर बने इस पुल का उद्घाटन करते हुए पीएम मोदी ने तिरंगा लहराया। पुल पर चहलकदमी की और इसे तैयार करने वाले श्रमिकों से बात भी की।

रेल मंत्री अश्विन वैष्णव और सीएम उमर अब्दुल्ला के साथ पीएम मोदी हेलीकॉप्टर से रेलवे ब्रिज पहुँचे। इस पुल को तैयार होने में लगभग 22 साल लगे हैं क्योंकि इसके निर्माण के दौरान सुरक्षा और स्थिरता संबंधी कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा।

कई मायनों में खास है ये आर्च ब्रिज

कश्मीर के सलाल बाँध के पास चेनाब नदी के ऊपर बनाया गया ये रेल ब्रिज दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे आर्च ब्रिज है। नदी से 359 मीटर की ऊंचाई पर स्थित स्टील से निर्मित ये पुल 1315 मीटर लंबा है। इस पुल को बनाने में लगभग 14,86 करोड़ रुपए की लागत आई है।

भूकंप जोन-5 क्षेत्र में स्थित होने के बाद भी इस पुल को हवा के थपेड़ों और भूकंप जैसी आपदाओं से निपटने के लिए खास तकनीक के साथ तैयार किया गया है। साथ ही इसे ब्लास्ट प्रूफ भी बनाया गया है। इसके अलावा जंग से बचने के लिए विशेष पेंट का इस्तेमाल किया गया है।

उद्धमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक, यानी यूएसबीआरएल, आजाद भारत का सबसे बड़ा और सबसे मुश्किल रेलवे प्रोजेक्ट है। यह 272 किलोमीटर लंबा रास्ता हिमालय की जंगली और मुश्किल भरी जमीन पर बना है। इस पूरे प्रोजेक्ट को बनाने में 43,780 करोड़ रुपये की लागत आई है।

यह रेल लाइन घाटियों, पहाड़ों और दर्रों को जोड़ती है, जो अपने आप में एक बहुत बड़ा काम है।ये पुल उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेलवे लिंक (USBRL) प्रोजेक्ट का हिस्सा है। इस पुल से जम्मू और श्रीनगर के बीच की दूरी को कम कर बेहतर कनेक्विटी स्थापित होगी।

इसकी ऊँचाई की खासियत की बात की जाए तो यह पुल एफिल टावर से भी बड़ा है और समुद्र तल से रेल की पटरी तक कुतुब मीनार से भी लगभग पाँच गुना ऊँचा है। इसके निर्माण में लगभग 30,000 मैट्रिक टन स्टील का उपयोग किया गया है।

पुल समेत पूरे क्षेत्र को CCTV लैस किया गया है। इस प्रोजेक्ट में बिना बैलास्ट (पटरियों के बीच-सीमेंट के खंबे) की पटरियाँ बिछाई गई हैं, जो 943 पुलों और 36 बड़े टनलों से होकर गुजरती हैं। इन टनलों की कुल लंबाई 119 किलोमीटर है। इनमें से सबसे खास है टी-50 टनल, जो भारत की सबसे लंबी रेलवे टनल है और इसकी लंबाई 12.7 किलोमीटर से भी ज्यादा है।