Home Blog Page 3555

तालिबान ने कंधारी कॉमेडियन की हत्या से पहले थप्पड़ मारने का वीडियो किया शेयर, जमीन पर कटा मिला था सिर

तालिबानी आतंकियों ने लोकप्रिय कॉमेडियन नजर मोहम्मद उर्फ खाशा का अपहरण कर उनकी हत्या कर दी है। आतंकियों ने उनकी हत्या करने से पहले उन्हें थप्पड़ मारने वाला वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया है, जो तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो को ईरान इंटरनेशनल के एक वरिष्ठ संवाददाता तजुदेन सोरौश (Tajuden Soroush) ने अपने ट्विटर हैंडल पर साझा किया है। वीडियो में बंदूक लिए तालिबानी आतंकवादियों को खाशा को कई बार थप्पड़ मारते हुए देखा जा सकता है।

सोरौश लिखते हैं, “इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि कंधारी कॉमेडियन खाशा का पहले तालिबानी आतंकियों ने अपहरण किया। फिर इसके बाद आतंकियों ने उन्हें कार के अंदर कई बार थप्पड़ मारे और अंत में उनकी जान ले ली।”

कंधार प्रांत से ताल्लुक रखने वाले कॉमेडियन को आतंकी पिछले हफ्ते उनके घर से घसीटते हुए बाहर लाए और फिर पेड़ से बाँधकर उनकी हत्या कर दी। खबरों के मुताबिक, आतंकी सूबे में सरकारी कर्मचारियों की तलाश में घर-घर जा रहे थे। गुरुवार (22 जुलाई) को उन्होंने खाशा को पकड़कर एक पेड़ पर बाँध दिया और उनका गला काट दिया। स्थानीय पुलिस के रूप में काम करने वाले कॉमेडियन का कटा हुआ गला जमीन पर पड़ा हुआ मिला।

मारे जाने से पहले पेड़ से बंधे खाशा की तस्वीर। फोटो: the sun

हमेशा की तरह तालिबान ने हत्या की जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया, लेकिन खाशा के परिवार वालों ने आतंकवादियों पर हत्या करने का आरोप लगाया है।

तालिबान ने 100 नागरिकों की हत्या की

अमेरिकी सैनिकों के पीछे हटने के बाद तालिबान ने सैकड़ों अफगानी नागरिकों को मार डाला। खासकर उन्हें जो सरकार या अमेरिकी सेना के लिए काम करते थे। स्थानीय लोगों के अनुसार, पिछले दो हफ्तों में कम से कम 100 लोग मारे गए हैं और प्रांत से 300 अन्य लोग लापता हैं। अधिकारियों का अनुमान है कि दक्षिणी कंधार में 1,50,000 से अधिक नागरिक विस्थापित हुए हैं, जिसे 1990 के दशक में तालिबान का जन्मस्थान कहा जाता है।

कंधार की तीन बच्चों की माँ ज़ैनब ने कहा, “इस जंग ने हजारों लोगों को प्रभावित किया है। कुछ भागने में सफल रहे, लेकिन कई अभी भी लड़ाई में फँसे हुए हैं। हम सिटी सेंटर में रहते थे, लेकिन काबुल भाग गए।” उन्होंने कहा कि मैं अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से संपर्क नहीं कर सकती हूँ, क्योंकि मुझे नहीं पता कि वे जीवित हैं या मर चुके हैं।

गौरतलब है कि इससे पहले कंधार प्रांत में स्पिन बोल्डक जिले में तालिबानी आतंकियों द्वारा निर्दोष लोगों को गालियों से छलनी करने का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ था। तालिबानी आतंकियों ने अल्लाह-हू-अकबर चिल्लाते हुए उन लोगों को गोलियों से छलनी कर डाला था, जिन्होंने अफगान सरकार का समर्थन किया था।

इसके अलावा अफगानिस्तान के कंधार प्रांत के स्पिन बोल्डक जिले में तालिबान ने कई लोगों की बर्बरतापूर्ण तरीके से हत्या कर दी थी। तालिबान ने घरों को लूटने और लोगों की हत्याएँ करने के बाद वहाँ पर अपने झंडे भी फहरा दिए थे। अफगान गृह मंत्रालय इस हिंसा और मासूमों की हत्याओं के लिए तालिबान को जिम्मेदार ठहरा रहा है।

तालिबान की हिट लिस्ट में अफगानी अनुवादक

ईद से ठीक पहले एक अफगानी अनुवादक सोहेल पारदीस का तालिबान ने सिर कलम कर दिया था। उन्हें आतंकियों से जान से मारने की धमकी मिल रही थी। सोहेल के दोस्त और सहकर्मी अब्दुलहक अयूबी ने सीएनएन को बताया, “आतंकियों ने उससे कहा था कि तुम अमेरिका के जासूस हो, अमेरिकियों की आँखे हो, तुम काफिर हो और हम तुम्हें और तुम्हारे परिवार को मार डालेंगे।”

समर्थन ले लो… सस्ता, टिकाऊ समर्थन: हर व्यक्ति, संस्था, आंदोलन और गुट के लिए है राहुल गाँधी के पास झऊआ भर समर्थन!

अच्छे ज़माने और खराब ज़माने में सबसे बड़ा फर्क यह होता है कि अच्छे ज़माने में लोग अच्छा सोचते हैं और खराब ज़माने में खराब। खराब ज़माने में लोग अच्छा सोच ही नहीं सकते। राहुल गाँधी की ही बात ले लीजिए। जब ज़माना अच्छा था तब लगभग पूरा भारत मानता था कि राहुल गाँधी प्रधानमंत्री होने के लिए ही नेता बने हैं। अब ज़माना खराब है तो वही पूरा भारत यह मानता है कि वे प्रधानमंत्री बनने के लिए नहीं बल्कि समर्थन देने के लिए नेता बने हैं। वैसे गुणी लोग अब भी उनका बचाव करते हुए कहते हैं कि समर्थन लेकर प्रधानमंत्री बनना मुश्किल हो जाए तो समर्थन देकर बनने की कोशिश करने में कोई हर्ज़ नहीं है।  

औसत नेता समर्थन लेकर प्रधानमंत्री बनता है, बड़ा नेता बिना समर्थन के बनता है पर राहुल गाँधी समर्थन देकर बनना चाहते हैं। हाल यह है कि उनकी नेतागीरी अब समर्थन देने पर टिकी है। समर्थन देने की बात पर वे हमेशा मिशन मोड में दिखते हैं। व्यक्ति को चाहिए तो उसे देंगे, संस्था को चाहिए तो उसे देंगे और किसी को न चाहिए तो भी उसे देंगे। कभी-कभी तो लगता है कि समर्थन देने के लिए वे गुटों की तलाश में उसी तरह से रहते हैं जैसे सारे बैंक क्रेडिट कार्ड देने के लिए ग्राहक की तलाश करते हैं। 

कुछ विद्वानों का तो यहाँ तक मानना है कि इनके पास एक टीम है जो ऐसे लोगों की तलाश में रहती है जिन्हें राहुल अपना समर्थन दे सकें। इसी तलाश में टेली कॉलिंग भी होती होगी। इधर से तत्पर टीम का सदस्य फ़ोन करके कहता होगा, “हेलो, मैं राहुल गाँधी की टीम से बोल रहा हूँ। आपको बताते हुए ख़ुशी हो रही है कि उन्होंने आपको समर्थन देने का फैसला किया है।” 

दूसरी तरफ बैठा व्यक्ति भौचक्का होकर पूछता होगा, “लेकिन वे हमें क्यों समर्थन देना चाहते हैं?”

इधर से बताया जाता होगा, “अरे वो आपने कल सरकार की आलोचना की थी न। हमें पता चला तो हमें लगा कि आपको समर्थन दिया जा सकता है। बस आप बताएँ कि आपको कितना समर्थन चाहिए? एक किलो, दो किलो, ढाई किलो?”  

इनकी तत्परता देखकर तो यहाँ तक लगता है कि यदि किसी को इनके समर्थन की जरूरत न भी रहती होगी तो ये और इनकी टीम ऐसी परिस्थितियाँ पैदा करती होगी जिससे व्यक्ति समर्थन लेने के लिए बाध्य हो जाए। हाल यह है कि आते-जाते कहीं कोई मिल गया तो राहुल यह सोचते हुए व्यस्त हो जाते होंगे कि; बाकी बातें अपनी जगह पर पहले ये देखो कि इसे समर्थन दिया जा सकता है या नहीं। जरा भी सम्भावना दिखने पर समर्थन पकड़ा देते होंगे। आपने भारत की आलोचना कर दी है? ये लीजिए मेरा समर्थन। अच्छा, तुमने मोदी को गाली दे दिया है? वाह, वेल डन, ये लो मेरा समर्थन। 

कुछ विद्वानों का मानना है कि किसी दिन इनके किसी इंटरव्यू में सुनने को मिलेगा कि; मेरा समर्थन लेकर लाखों लोगों ने कहा कि मज़ा आया और अब ये जो समर्थन है वो मैं पूरे भारत को देना चाहता हूँ। देखेंगे किसी दिन वे सिर पर दौरी धरे कहीं चिल्ला रहे हैं; समर्थन ले लो। सस्ता समर्थन। टिकाऊ समर्थन।  

कभी-कभी तो लगता है कि उनके और उनके सेक्रेटरी के बीच सुबह कुछ ऐसी बातें होती होंगी; 

राहुल गाँधी: “हाँ भाई, आज का क्या प्रोग्राम है?” 

सेक्रेटरी: “सर, आज पहले बॉर्डर जाना है। वहाँ किसानों को समर्थन देकर फिर आपको ढाई बजे जंतर मंतर पहुँच कर पत्रकारों को समर्थन देना है। कुछ पत्रकारों का कहना है कि देश में डेमोक्रेसी कम हो गई है तो हमने आपका समर्थन देने का प्लान बना लिया। फिर शाम साढ़े पाँच बजे आपको वो भीमा कोरेगाँव वाले मानवाधिकार ग्रुप का समर्थन करना है।”  

राहुल गाँधी: “अच्छा ये बताओ कि हमने जेएनयू में किसी को बड़े दिनों से समर्थन क्यों नहीं दिया?”

सेक्रेटरी: “सर, वो क्या है कि कोरोना की वजह से सब कुछ बंद चल रहा है न। इसलिए आजकल जेएनयू भी बंद चल रहा है। अब आप तो जानते ही हैं कि जेएनयू बंद रहे तो डफली बजाना और नारा लगाना असंभव हो जाता है। और नारे वगैरह न लगे तो समर्थन देना मुश्किल तो हो ही जाता है।”

राहुल गाँधी: “ये कोरोना ने समर्थन का बाजार ही मंदा कर दिया है। MOU में मेंशन किए बिना फैला दिया बेवकूफों ने।”               

सेक्रेटरी: “वैसे सर, एक बात कहनी थी।” 

राहुल गाँधी: “हाँ, हाँ बोलिए। आपको भी समर्थन चाहिए क्या?”

सेक्रेटरी: “नहीं सर, आपके साथ रह कर मैं खुद समर्थन देने लायक हो गया हूँ और छोटा मोटा समर्थन तो खुद ही दे देता हूँ। मैं तो यह कहना चाहता था कि वो लखनऊ में योगी सरकार ने एक गैंगस्टर की प्रॉपर्टी कुर्क करवा दी है। उसको अगर थोड़ा समर्थन मिल जाता तो…” 

राहुल गाँधी: “हाँ, हाँ क्यों नहीं। जब बोलिए दे देंगे। वैसे किस केटेगरी में चाहिए उसे?”

सेक्रेटरी: “सर, गैंगस्टर है तो मेरे विचार से मानवाधिकार केटेगरी में देना सही रहेगा।”
      
समर्थन की कला को राहुल गाँधी ने नए आयाम दिए हैं। दक्षिण भारत में रहते हैं तो उसके समर्थक बन जाते हैं। महाराष्ट्र में रहते हैं तो उसके समर्थक बन जाते हैं। चीन में रहते हैं तो उसके समर्थक बन जाते हैं। वे जगह के हिसाब से समर्थन बाँटते हैं। विदेशी एनजीओ भारत के खिलाफ बोलता है तो उसके समर्थन में उतर आते हैं। कोई विदेशी यह कह देता है कि भारत में सब गलत ही गलत हो रहा है तो उसके समर्थन में आ जाते हैं। नक्सल मोदी को गाली देते हैं तो उनके समर्थन में आ जाते हैं। अब उनके जीवन का ध्येय केवल समर्थन देना रह गया है।    

समर्थन की ताज़ा वारदात में वे किसानों के समर्थन में ट्रैक्टर चलाकर संसद पहुँच गए। विद्वान कहेंगे कि किसानों को समर्थन का यही सबसे अच्छा तरीका है। ये विद्वान नहीं बताएँगे कि भारत का औसत किसान हल चलाता है। ऐसे में किसानों के लिए राहुल जी के उच्च कोटि का समर्थन तो तब होता जब वे कंधे पर हल लिए संसद पहुँचते। एक कंधे पर हल धरते और दूसरे पर गमछा। उनके दाएँ-बाएँ चल रहे युवा कॉन्ग्रेसी भी कंधे पर एक एक हल लेकर चलते। क्या बढ़िया समर्थन होता। पसीने से लथपथ राहुल गमछे से पसीना पोंछ रहे होते। उधर यू-ट्यूबर लाइव रिपोर्ट कर रहे होते; देखिए, ऐसा होता है किसान। वही किसान जो धान उगाता है। वही धान जिसमें से गेहूँ निकलता है। 

कुल मिलाकर अद्भुत फोटोजेनिक माहौल बनता। समर्थन देकर प्रधानमंत्री बनने दिशा में राहुल गाँधी एक और कदम चल लेते।

हड़प्पा काल का धोलावीरा शहर विश्व धरोहर में हुआ शामिल, बतौर CM नरेंद्र मोदी ने तैयार करवाया था इन्फ्रास्ट्रक्चर

गुजरात के हड़प्पा काल के शहर धोलावीरा को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया है। संयुक्त राष्ट्र के संगठन ने मंगलवार (जुलाई 27, 2021) को इसकी जानकारी ट्विटर पर दी। वर्ल्ड हेरीटेज कमेटी ने ऑनलाइन आयोजित अपने 44 वें सत्र के दौरान UNESCO की विश्व धरोहर स्थल सूची में गुजरात के धोलावीरा को अंकित किया। यह शहर कच्छ के रण के खादिर द्वीप में स्थित है।

ट्विटर पर यूनेस्को ने लिखा, “ब्रेकिंग! धोलावीरा: हरप्पन शहर अभी-अभी वर्ल्ड हेरीटेज लिस्ट में शामिल किया गया है। मुबारक हो।” इससे पहले काकतीय रुद्रेश्वर (रामप्पा) मंदिर, तेलंगाना को भी यूनेस्को की सूची में अंकित किया गया था। इन दो विरासत स्थलों के शामिल होने से भारत के विश्व धरोहर स्थलों की संख्या बढ़कर 40 हो गई है।

इस बाबत संस्कृति मंत्री जी किशन रेड्डी ने भी ट्वीट किया। उन्होंने कहा ‘‘अपने साथी भारतीयों के साथ यह साझा करते हुए बहुत गर्व हो रहा है कि धोलावीरा अब भारत का 40वाँ खजाना है, जिसे यूनेस्को के विश्व विरासत स्थल शिलालेख की सूची में शामिल किया गया है।’’ अपने ट्वीट में रेड्डी ने पीएम मोदी का भी आभार जताया कि वह निरंतर भारतीय संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं।

साल 2014 के बाद से, इस लिस्ट में भारत ने 10 नए विश्व धरोहर स्थलों को जोड़ा है, जो लिस्ट में शामिल कुल साइटों का एक चौथाई है। इस खबर के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपनी खुशी जाहिर की है। उन्होंने कहा, “इस खबर को सुनकर बेहद खुश हूँ। धोलावीरा एक महत्वपूर्ण शहरी केंद्र था और अतीत से हमारा लिंक है। यहाँ जरूर जाना चाहिए, खासकर इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व में दिलचस्पी रखने वालों को।”

आगे पीएम ने इसकी जानकारी देते हुए कहा, “मैं अपने छात्र जीवन में धोलावीरा घूमने गया था और इस जगह को देखकर मंत्रमुग्ध हो गया था। बतौर मुख्यमंत्री मुझे इस धरोहर के संरक्षण और जीर्णोद्धार से जुड़े कामों के अवसर मिले। हमारी टीम ने यहाँ पर्यटन को बढ़ाना देने वाला इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार किया था।”

बता दें कि धोलावीरा शहर की खुदाई 1985 में आरएस बिष्ट द्वारा की गई थी, यहाँ पूर्ण अनुपात, सड़क-पैटर्न और एक कुशल जल संरक्षण प्रणाली के साथ नगर नियोजन की एक उच्च संगठित प्रणाली को देखा जा सकता है। इस जगह को लेकर दावा है कि यहाँ 1200 वर्ष तक जीवन रहा। यहाँ की संरचना इसे सिंधु घाटी सभ्यता के अन्य महानगरों से अलग करती है।

उल्लेखनीय है कि धोलावीरा के अलावा गुजरात में तीन अन्य वर्ल्ड हेरीटेज साइट्स हैं। इनमें एक अहमदाबाद का ऐतिहासिक नगर है जिसकी खोज 1411 में गुजरात की राजधानी के तौर पर हुई थी। इसे पहले आशा भील की आशाल के नाम से जाना जाता था। इसके बाद दूसरी जगह रानी की वाव है। साल 2014 में ये जगह यूनेस्को की सूची में अंकित हुई थी। इसके बाद चंपानेर-पावागढ़ पुरातत्व उद्यान है, जो लिस्ट में 2004 से मौजूद है।

CAA के लिए नियम बनाने के लिए गृह मंत्रालय ने माँगा 6 महीने का समय: 9 जनवरी, 2022 तक तय होंगे नियम

देश में नागरिक (संशोधन) अधिनियम (CAA)-2019 के नियम बनाने के लिए मंगलवार 26 जुलाई 2021 को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने छह महीने के समय की माँग की। इस मामले में कॉन्ग्रेस सांसद गौरव गोगोई के एक सवाल का जवाब देते हुए केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने संसद में बताया कि गृह मंत्रालय ने लोकसभा और राज्यसभा दोनों में अधीनस्थ कानूनों पर समितियों को 9 जनवरी, 2022 तक के लिए नियम बनाने के लिए कहा था।

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की सहमति के बाद सीएए को लेकर 12 दिसंबर 2019 को नोटिस जारी कर दिया गया था। इसके बाद इसे 10 जनवरी, 2020 को लागू किया गया था। सीएए के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई समुदायों के पीड़ित अल्पसंख्यकों को भारत में नागरिकता मिल सकेगी।

धार्मिक प्रताड़ना से तंग आकर 31 दिसंबर 2014 तक भारत आने वाले लोगों पर सीएए का कानून लागू होगा। शुरुआती तौर पर उन्हें अवैध अप्रवासी के रूप में माना जाएगा और सरकार उन्हें कानून में उल्लिखित नियमों के अनुसार भारतीय नागरिकता देगी। सीएए कानून में शामिल किए गए धर्म औऱ देशों से धार्मिक उत्पीड़न के शिकार व्यक्ति भारत की नागरिकता के लिए आवेदन कर सकेंगे।

सीएए और दिल्ली दंगा

केंद्र सरकार ने जब देश में सीएए कानून लेकर आई तो विपक्षी दलों समेत कई लोगों ने इसका बड़े पैमाने पर विरोध किया। इन लोगों ने नागरिकता अधिनियम में संशोधन का विरोध किया। विरोधियों ने यह प्रचार करने की कोशिश की थी कि सीएए को राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के साथ मिलकर भारत में रहने वाले अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय को टारगेट करने की कोशिश की जा रही है। दिसंबर 2019 में इसके लागू होने के बाद से पूरे देश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे। शाहीन बाग में धरना-प्रदर्शनों ने सभी का ध्यान खींचा। खास तौर पर शाहीन बाग में प्रदर्शन के दौरान यहाँ पर बोलने वाले वक्ताओं के देश विरोधी भाषण चर्चित रहे।

शाहीन बाग के इन विरोधों के बैकग्राउंड में देखें तो देश में शांति व्यवस्था को भंग करने की साजिश रची गई थी। इसी कारण फरवरी 2020 में दिल्ली में दंगे हुए थे। इस मामले में जाँच एजेंसियों ने कई गिरफ्तारियाँ की थी। जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया था उनमें उमर खालिद, शरजील इमाम और ताहिर हुसैन समेत कई अन्य लोग शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली पुलिस ने दंगों से जुड़े 700 से अधिक मामले दर्ज किए थे। इस मामले में मार्च 2020 के अंत तक 3,400 लोगों को हिरासत में लिया या गिरफ्तार किया था। दिल्ली के हिंदू-विरोधी दंगों को लेकर ऑपइंडिया की रिपोर्ट यहाँ पढ़ सकते हैं।

अल्लाह-हू-अकबर बोल…बोल तेरा भगवान ब&^*%द है: अब्दुल ने कॉलर पकड़ कर हिंदू लड़के को धमकाया, दिलवाई हिंदू भगवानों को गाली

सोशल मीडिया पर एक बेहद चौंकाने वाली वीडियो सामने आई है। वीडियो में एक पाकिस्तानी मुस्लिम हिंदू लड़के से अल्लाह-हू-अकबर बुलवा रहा है और साथ में उसे हिंदू देवी-देवताओं को गाली देने के लिए मजबूर कर रहा है।

वीडियो को फेसबुक यूजर प्रकाश हिरानी ने अपलोड किया। आरोपित की पहचान अब्दुल सलाम अबु दाऊद के रूप में हुई है। देख सकते हैं कि उसने कैसे एक हिंदू लड़के को पकड़ा हुआ है और उससे अल्लाह-हू-अकबर बुलवा रहा है। इसके बाद वीडियो में दिखता है कि जब लड़के ने यह बोल दिया तो वो उससे कहता है कि वो हिंदू देवी देवताओं को भी गाली दे।

अब्दुल को कहते सुना जा सकता है, “दे गाली अपने भगवान को दे गाली…चिल्ला अल्लाह- हू-अकबर, चिल्ला अल्लाह-हू-अकबर। भगवान को गाली दे। बहन की माँ की गाली दे। बोल तेरा भगवान बह%$& है। बह*&^% पाकिस्तान में गंद डाल रखा है तुम लोगों ने।”

रहीम यार खान का निवासी अब्दुल सलाम ने यह वीडियो अपने यूट्यूब चैनल पर अपलोड की थी। कैप्शन में लिखा था, “पाकिस्तान में मुस्लिमों द्वारा हिंदुओं पर अत्याचार।” सोशल मीडिया पर तमाम गाली पड़ने के बाद अब्दुल ने इस वीडियो को यूट्यूब से डिलीट कर दिया है लेकिन फेसबुक व अन्य जगह ये वीडियो तेजी से शेयर हो रही है।

यूट्यूब के कमेंट सेक्शन में भी अब्दुल हिंदू भगवानों के लिए गंदी गंदी गाली देता देखा जा सकता है। वह हिंदू भगवानों को समलैंगिक बताकर, देवियों को रेप पीड़िता आदि कह रहा है।

एक वीडियो और थी जिसमें दाऊद को हिंदुओं के नरसंहार की धमकी देते भी सुना गया। यह वीडियो अप्रैल में पोस्ट की गई थी। इसमें उसने कहा, “अगर हम पाकिस्तान में हिंदुओं को मारना शुरू करते हैं तो इसमें केवल 30 मिनट लगेंगे … हम हिंदू पुरुषों को मारेंगे और हिंदू महिलाओं को ले जाएँगे। हम इन महिलाओं से बच्चे पैदा करेंगे और उन्हें ‘मुजाहिद’ (लड़ाकू/इस्लामी आतंकवादी) बना देंगे। हमारे साथ खिलवाड़ मत करो हमारे भारत में बहुत सारे लोग (मुसलमान) हैं जो तुमको (हिंदुओं को) मारने में समय नहीं लेंगे।”

फरवरी 2019 में पोस्ट किए गए एक वीडियो में, उसे राजू कृष्णन नाम के एक हिंदू बच्चे को डराते हुए देखा गया था। वीडियो में देखते हुए उसने कहा था, “यह बच्चा एक हिंदू है। मैं चाहूँ तो इस बच्चे के साथ बहुत कुछ कर सकता हूँ। लेकिन अगर मैं इसे पीटूँ या मारूँ, तो क्या फायदा होगा?” इसके बाद दाऊद ने बच्चे के साथ मारपीट न करने के अपने फैसले के बारे में शेखी बघारते हुए कहा कि उसके इस रवैये से यह साबित हुआ कि वह एक नेक इंसान है और भारत बेगैरत है।

दाऊद के फेसबुक प्रोफाइल के मुताबिक, वह फिलहाल पाकिस्तान के सिंध प्रांत के हैदराबाद में रहता है और थार-कोयला परियोजनाओं में कार्यरत हैं। माइक्रोब्लॉगिंग प्लेटफॉर्म के नियमों और शर्तों का उल्लंघन करने के लिए उसके ट्विटर प्रोफाइल को निलंबित किया जा चुका है। लेकिन हमारी रिपोर्ट लिखने तक उसका इंस्टा अकॉउंट एक्टिव है। 

सिंध में 60 हिंदुओं का एक साथ धर्मांतरण

गौरतलब है कि अभी पिछले दिनों ही खबर आई थी कि पाकिस्तान के सिंध प्रांत में 7 जुलाई 2021 को 60 से अधिक हिंदुओं को सामूहिक रूप से इस्लाम में परिवर्तित किया गया। इस मामले में अब्दुल रऊफ़ निज़ामनी नाम का एक व्यक्ति, जन धर्मांतरण प्रक्रिया का सूत्रधार रहा। एक फेसबुक पोस्ट में, आरोपित ने खुशी जाहिर करते हुए लिखा था, “अल्हम्दुलिल्लाह आज मेरी निगरानी में 60 लोग मुसलमान हुए हैं, इनके लिए दुआ करें।”

अब्दुल रऊफ निजामनी के फेसबुक प्रोफाइल के मुताबिक, वह पाकिस्तान के सिंध में मतली में नगर समिति का अध्यक्ष है। आरपित के निजी प्रोफाइल पर 4275 फॉलोअर्स हैं। उसके द्वारा पोस्ट किए गए एक वीडियो में, एक इस्लामी मौलवी को 60 हिंदुओं को कलमा (इस्लामी शपथ) पढ़ते हुए और उनका धर्मांतरण सुनिश्चित करते हुए देखा जा सकता है।

वीडियो में, उक्त इस्लामी मौलवी को यह दावा करते हुए देखा गया था कि यह उनकी पहली नमाज़ का पाठ था। मौलवी नए धर्मांतरित लोगों से बात करते हुए कहता है, “एक मुसलमान के जीवन का एकमात्र उद्देश्य अल्लाह को खुश करना है। तभी जीवन का उद्देश्य पूरा होगा। केवल उन्हीं का जीवन आगे बढ़ता है, जिन्हें अल्लाह पसंद करते हैं। जिसने अल्लाह को खुश कर लिया, उसकी जिंदगी कामयाब हो जाती है।”

अनाथ बच्चों की सूची में गड़बड़ी: सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब-बंगाल को फटकारा, कहा – ‘हमें आपके आँकड़ों पर भरोसा नहीं’

सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब और पश्चिम बंगाल सहित कुछ राज्यों की सरकारों को फटकार लगाई है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (27 जुलाई, 2021) को इन राज्यों को फटकार लगाते हुए पूछा कि वो कोरोना काल में अनाथ हुए बच्चों की सूची व विवरण क्यों नहीं साझा कर रहे हैं? इन दोनों राज्यों के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू कश्मीर प्रशासन को भी डाँटा। इन राज्यों को अनाथ हुए बच्चों के डिटेल्स ‘बाल स्वराज’ की वेबसाइट पर डालने को कहा गया है।

वहीं पश्चिम बंगाल के अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनाथ बच्चों की सूची व उनका विवरण तैयार कर लिया गया है। वकील के अनुसार, इन डिटेल्स को ‘राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग (NCPCR)’ को भेज भी दिया गया है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल से पूछा कि क्या पूरे राज्य में कोरोना काल के दौरान सिर्फ 27 बच्चे ही अनाथ हुए? सुप्रीम कोर्ट ने इस संदेह जताया कि ये आँकड़े सही स्थिति को बयाँ करते हैं। इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए बंगाल सरकार को फटकारा था।

सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार के रवैये की आलोचना करते हुए कहा, “आप बाकी राज्यों के आँकड़े देखिए। ऐसा तो नहीं है कि आपके राज्य में कोरोना था ही नहीं। आप ये मत समझिए कि आँकड़ों पर विश्वास कर लेंगे। हमें ये समझ में नहीं आ रहा है कि आप क्यों नहीं समझ पा रहे हैं कि क्या किया जाना चाहिए।” इसके साथ ही ‘डायरेक्ट्रेट ऑफ चाइल्ड राइट्स एंड ट्रैफिकिंग’ के सचिव को नोटिस भी जारी किया।

पश्चिम बंगाल के अधिवक्ता की ये दलील थी कि वेरिफिकेशन की प्रक्रिया अब भी चल रही है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह के गैर-जिम्मेदाराना बयान नहीं दीजिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आप सिर्फ वेरिफिकेशन में कई साल लगा दोगे और बच्चे ऐसे ही मजबूर रह जाएँगे? वहीं सुप्रीम कोर्ट को पंजाब सरकार द्वारा दिए गए आँकड़े में भी गड़बड़ी नजर आई। पंजाब सरकार को जमीनी आँकड़े जुटाने के लिए कहा गया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक उन बच्चों के बारे में नहीं जानेंगे जिन्होंने कोरोना काल में अपने माता-पिता को खो दिया है, तब तक हम उनकी मदद कैसे कर पाएँगे? पंजाब सरकार ने 73 बच्चों के डेटा दिए हैं, जिनमें से 33 के माता-पिता की मौत कोरोना के कारण हुई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न सिर्फ जिला स्तर, बल्कि जमीनी लेवल पर जाकर डेटा जुटाइए। वहीं जम्मू कश्मीर को भी सुप्रीम कोर्ट ने डेटा अपडेट करने का निर्देश दिया।

नाम: नूर मुहम्मद, काम: रोहिंग्या-बांग्लादेशी महिलाओं और बच्चों को बेचना; 36 घंटे चला UP पुलिस का ऑपरेशन, पकड़ा गया गिरोह

उत्तर प्रदेश पुलिस ने बड़े पैमाने पर चलाए जा रहे मानव तस्करी के बड़े और सुसंगठित गिरोह का पर्दाफाश किया है। यूपी एटीएस के 30 से अधिक अधिकारियों द्वारा 36 घंटे से भी अधिक लंबा ऑपरेशन चलाकर तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया है।

इस अभियान के तहत एटीएस ने कुल 6 लोगों से पूछताछ की है। 3 लोगों को गिरफ्तार किया गया है औऱ एक की तलाश की जा रही है। गिरफ्तार किए गए मानव तस्करों के पास से मोबाइल, आधार कार्ड, पैन कार्ड, बांग्लादेश की नागरिकता, रेलवे के टिकट और UNHCR के कार्ड की फोटोकॉपी मिली है। इसके अलावा 5 बांग्लादेशी टका औऱ 24,480 रुपए भी बरामद किए गए हैं।

उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक, एटीएस को लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानव तस्करी के इनपुट मिल रहे थे कि ये लोग बांग्लादेश और म्याँमार के लोगों को अवैध तरीके से भारत लाकर उन्हें दिल्ली, गाजियाबाद, नोएडा जैसी जगहों पर बसाते थे। इतना ही नहीं आरोपित इन लोगों के फर्जी पहचान प्रमाणपत्र भी तैयार करवाते थे।

उत्तर प्रदेश पुलिस की प्रेस विज्ञप्ति (साभार: उत्तर प्रदेश पुलिस)

इस मामले में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर उत्तर प्रदेश के डीजी (कानून व्यवस्था) ने बताया, “एटीएस की निगरानी के दौरान यह पता चला कि मानव तस्करी के इस गिरोह का सरगना नूर मोहम्मद उर्फ नूर इस्लाम कुछ रोहिंग्या और बांग्लादेशी नागरिकों को लेकर ब्रम्हपुत्र मेल से दिल्ली आ रहा है। इसके बाद गाजियाबाद रेलवे स्टेशन पर एटीएस की टीम ने पाँच व्यक्तियों को उतारकर उनसे पूछताछ की। वह इन लोगों को शादी, नौकरी और बेहतर जिंदगी का लालच देकर लाता था औऱ य़हाँ बेच देता था। इसके बदले उसे बड़ी मात्रा में फंडिंग हो रही थी।”

डीजी ने आगे कहा, “पूछताछ के दौरान नूर मोहम्मद ने बताया कि उसका एक अन्य साथी उसे दिल्ली रेलवे स्टेशन पर लेने के लिए आएगा। इसके बाद हमने उसे भी हिरासत में लिया। दो लड़कियों को रेस्क्यू किया गया, जो नाबालिग हैं। इनमें से एक 16 साल औऱ दूसरी 18 साल की है। दोनों ही म्याँमार की रहने वाली है। इनको लखनऊ के आशा ज्योति केंद्र भेज दिया गया है।”

इसके अलावा इनमें से एक व्यक्ति की तस्करी की जा रही थी, उसे बचा लिया गया था। एटीएस की टीम ने तीन लोगों को गिरफ्तार कर लिया है। इसमें नूर मुहम्मद उर्फ नूर इस्लाम इस गिरोह का सरगना है। ये मूलत: बांग्लादेश का रहने वाला है औऱ वर्तमान में त्रिपुरा में रहता है। दूसरा रहमत उल्ला है, जो कि म्याँमार का रहने वाला है औऱ वर्तमान में जम्मू-कश्मीर में रोहिंग्या शरणार्थी शिविर में रह रहा है। इसके अलावा तीसरा आरोपित शबीउर्रहमान उर्फ शफीउल्लाह है, जो म्याँमार का नागरिक है।

इन सभी के खिलाफ एटीएस के थाने में आईपीसी की धारा 420, 467, 468, 471, 370 औऱ 120 B के तहत केस दर्ज किया गया है। एटीएस की टीम अब इन तीनों को कोर्ट में पेश करने की तैयारी कर रही है।

इंतजार खत्म, अगस्त तक बच्चों के लिए आ सकती है कोरोना वैक्सीन: स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मंडाविया ने पीएम मोदी के साथ बैठक में दी जानकारी

केंद्र की मोदी सरकार कोरोना महामारी से निपटने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। इसी बीच मंगलवार (27 जुलाई 2021) को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मंडाविया ने संसदीय दल की बैठक में कहा, “अगस्त तक बच्चों के लिए कोविड-19 की वैक्सीन आ सकती है।” ऐसे में केंद्र सरकार द्वारा कोरोना संक्रमण को कमजोर करने और देश भर में स्कूलों को फिर से खोलने की दिशा में बच्चों के लिए वैक्सीन लाना एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भाजपा की संसदीय दल की बैठक में स्वास्थ्य मंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बच्चों की वैक्सीन के बारे में अवगत कराया। बताया जा रहा है कि मंडाविया ने बैठक में कहा कि सरकार अगले महीने तक बच्चों का टीकाकरण शुरू कर सकती है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, देश में जाइडस कैडिला (Zydus Cadila) की बच्चों के लिए वैक्सीन ट्रायल अंतिम चरण में है। दरअसल, इससे पहले केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने मॉनसून सत्र के दौरान राज्यसभा में कहा था, ”भारत बॉयोटेक और जाइडस कैडिला ने बच्चों पर टीकों का ट्रायल शुरू कर दिया है। उम्मीद है कि इसमें सफलता मिलेगी और बच्चों के लिए भी वैक्सीन उपलब्ध हो जाएगी।”

बता दें कि हाल ही में एम्स के निदेशक रणदीप गुलेरिया ने बताया था कि जाइडस कैडिला ने बच्‍चों की वैक्‍सीन का ट्रायल पूरा कर लिया है और उन्‍हें आपातकालीन इस्‍तेमाल के लिए मंजूरी का इंतजार है। डॉ. गुलेरिया ने जानकारी दी थी कि भारत बॉयोटेक की ओर से बच्‍चों के लिए तैयार की गई कोवैक्सीन का ट्रायल भी अगस्त या सितंबर तक पूरा कर लिया जाएगा। उन्‍होंने कहा था कि कोरोना की तीसरी लहर को देखते हुए ट्रायल के तुरंत बाद ही वैक्‍सीन को हरी झंडी दिखा दी जाएगी।

‘राजीव गाँधी थे PM, उत्तर-पूर्व में गिरी थी 41 लाशें’: मोदी सरकार पर तंज कसने के फेर में ‘इतिहासकार’ इरफ़ान हबीब भूले 1985

आसाम और मिजोरम के बीच चल रहे सीमा-विवाद के दौरान सोमवार (26 जुलाई, 2021) को अचानक से हिंसा भड़क गई, जिसमें असम के 6 पुलिसकर्मी बलिदान हो गए। अब इस मुद्दे को लेकर वामपंथियों ने भी भ्रामक दावे करने शुरू कर दिए हैं। इतिहासकार व ‘बुद्धिजीवी’ इरफ़ान हबीब ने भी सोशल मीडिया पर कुछ इसी तरह का दावा किया, जिसके बाद लोगों ने उन्हें सही इतिहास की याद दिलाई।

इरफ़ान हबीब ने ट्विटर पर लिखा कि आज तक उन्होंने ऐसा कभी नहीं सुना कि दो राज्यों के सशस्त्र बल आपस में लड़ रहे हों और खूनी संघर्ष में एक-दूसरे की हत्या कर रहे हों। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज कसते हुए कहा कि यही हमारा ‘नया भारत’ है। हालाँकि, ‘Earshot’ नामक पोर्टल के संस्थापक एवं मुख्य संपादक अभिजीत मजूमदार ने उन्हें आईना दिखाने में ज्यादा देर नहीं लगाई। इसके बाद इरफ़ान हबीब की किरकिरी हुई।

अभिजीत मजूमदार ने इरफ़ान हबीब के इतिहास का ज्ञान बढ़ाते हुए बताया कि 1985 असम और नागालैंड के बीच संघर्ष हुआ था। उन्होंने बताया कि उस घटना में 41 लोग मारे गए थे, जिनमें से 28 पुलिस के जवान थे। साथ ही इस हिंसा के कारण 27,000 लोग बेघर हो गए थे। उस समय राजीव गाँधी भारत के प्रधानमंत्री थे और असम में कॉन्ग्रेस की सरकार थी। मणिपुर में भी पहले UDF-P और फिर कॉन्ग्रेस की सरकार थी।

उन्होंने तथाकथित इतिहासकार पर तंज कसते हुए कहा कि ये सब कुछ भारत के ‘गोल्डन एज’ में हुआ। बता दें कि ऐसे इतिहासकारों और वामपंथी ‘बुद्धिजीवियों’ के लिए नेहरू-गाँधी परिवार ने जब तक देश पर राज तक, वही अवधि भारत का ‘स्वर्ण युग’ है। बता दें कि जून 1985 में ये हिंसा मेरपानी और गोलाघाट में दोनों राज्यों के बीच हिंसा भड़की थी। असम ने तब दावा किया था कि हमलावर नागालैंड के थे।

नागालैंड में तो 1963 से ही हिंसा शुरू हो गई थी, जब इसे अलग राज्य का दर्ज मिल था। उससे पहले 1960 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सरकार और ‘नागा पीपल्स कन्वेन्शन’ के बीच 1960 में एक 16 बिंदुओं वाले समझौते पर सहमति बनी थी। अपर असम के सिवसागर, जोरहाट और गोलाघाट में नागा लोग घुस गए थे और जमीन कब्जा लिए थे। आरोप था कि असम की 60,000 हेक्टेयर भूमि में बसे जंगल को नागालैंड ने कब्जा लिया था। तभी से ये विवाद चल रहा है।

वहीं ताज़ा हिंसा की बात करें तो मिजोरम की सिविल सोसाइटी के लोग इस विवाद के लिए बांग्लादेश के अवैध घुसपैठियों को जिम्मेदार ठहराते हैं। उनका कहना है कि ये घुसपैठिए उनके क्षेत्र में घुस कर उनकी झोंपड़ियों को तोड़ डालते हैं, खेती बर्बाद कर देते हैं और उन्होंने ही पुलिसकर्मियों पर पत्थरबाजी की थी। इस विवाद की जड़ें अंग्रेजों के काल में हैं। 1875 में एक अधिसूचना जारी कर के लुशाई की पहाड़ियों को कछार के मैदानों से अलग हिस्सा घोषित किया गया था।

असम-मिजोरम सीमा संघर्ष में गई जिन पुलिसकर्मियों की जान, उनके परिवार को ₹50 लाख: CM हिमंत सरमा का ऐलान

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने मंगलवार (27 जुलाई 2021) को सीमा विवाद में अपनी जान गँवाने वाले पुलिसकर्मियों के परिवारवालों को मुआवजा देने का ऐलान किया। मुख्यमंत्री ने कहा, ”असम सरकार सोमवार (26 जुलाई) को मिजोरम के साथ सीमा पर संघर्ष में बलिदान हुए पुलिसकर्मियों के परिवारों को 50-50 लाख रुपए की वित्तीय सहायता प्रदान करेगी।” समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक, CM ने कहा कि घायलों को एक-एक लाख रुपए दिए जाएँगे। बताया जा रहा है कि असम सरकार ने घायल एसपी को इलाज के लिए मुंबई भेजा है।

असम-मिजोरम सीमा पर हिंसक झड़पों को लेकर असम के सीएम ने कहा, ”हमारी पुलिस मामले की जाँच करेगी। साथ ही इसकी भी जाँच की जाएगी कि नागरिकों को हथियार कहाँ से मिले।” उन्होंने बताया कि बॉर्डर पर संघर्ष के चलते 5 पुलिसकर्मियों की जान चली गई।

सीएम ने आगे कहा, ”यह कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं है। यह दो राज्यों के बीच सीमा विवाद है, जो लंबे समय से चला आ रहा है। यह सीमा विवाद उस समय भी था, जब दोनों राज्यों में कॉन्ग्रेस की सरकार थी। यह दो राज्यों के बीच का विवाद है, दो राजनीतिक दलों के बीच नहीं।”

उन्होंने कहा कि यह एक आरक्षित वन है। क्या आरक्षित वन का उपयोग बंदोबस्त के लिए किया जा सकता है? विवाद जमीन का नहीं, जंगल का है। असम जंगल की रक्षा करना चाहता है। वन क्षेत्र में कोई समझौता नहीं कर रहा है, हम वहाँ कोई समझौता नहीं चाहते हैं।

दरअसल, सोमवार को असम और मिजोरम के बीच सीमा विवाद के अचानक खूनी संघर्ष में तब्दील हो जाने से असम पुलिस के कम से कम 5 जवानों की मौत हो गई और एक पुलिस अधीक्षक समेत 50 अन्य घायल हो गए थे।

गौरतलब है कि 26 जुलाई को मिजोरम के सीएम जोरमथांगा और असम के सीएम हिमंत बिस्वा सरमा ने गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री कार्यालय को टैग करते हुए पुलिस और नागरिकों के बीच झड़प का एक वीड‍ियो अपने ट्विटर अकाउंट पर शेयर किया था। दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने गृहमंत्री से इस मामले पर तुरंत कार्रवाई करने की माँग की थी।