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Pegasus मामले में पलटा एमनेस्टी, कहा- ‘लिस्ट NSO स्पाइवेयर से संबंधित थी ही नहीं’; पहले PM-प्रेजिडेंट तक को लपेटा था

कई भारतीय पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और नेताओं की फोन टैपिंग को लेकर इजराइल की साइबर सुरक्षा कंपनी पेगासस की भारत में आजकल खूब चर्चा हो रही है। कहा गया कि फ्रांस के एक नॉन प्रॉफिट संस्थान फॉरबिडेन स्टोरीज़ और एमनेस्टी इंटरनेशनल को NSO के फोन रिकॉर्ड का ‘सबूत’ हाथ लगा, जिसे उन्होंने भारत समेत दुनिया भर के कई मीडिया संगठनों के साथ साझा किया।

अब इस कहे गए में नाटकीय U-टर्न है। इज़राइली मीडिया आउटलेट कैलकलिस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, एमनेस्टी इंटरनेशनल ने अब स्पष्ट किया है कि उसने कभी दावा नहीं किया कि यह लिस्ट NSO से संबंधित थी। रिपोर्ट में कहा गया है, “एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कभी भी इस सूची को ‘NSO पेगासस स्पाइवेयर सूची’ के रूप में प्रस्तुत नहीं किया है। दुनिया के कुछ मीडिया ने ऐसा किया होगा। यह लिस्ट कंपनी के ग्राहकों के हितों की सूचक है।”

इसमें कहा गया, “एमनेस्टी, और जिन खोजी पत्रकारों और मीडिया आउटलेट्स के साथ वे काम करते हैं, उन्होंने शुरू से ही बहुत स्पष्ट भाषा में साफ कर दिया है कि यह एनएसओ की सूची ग्राहकों के हितों में है।” – जिसका अर्थ है कि वे लोग NSO क्लाइंट की तरह हो सकते हैं, जिन्हें जासूसी करना पसंद है।

पत्रकार किम जेटटर के अनुसार एमनेस्टी अब अनिवार्य रूप से कह रहा है कि सूची में ऐसे लोग शामिल हैं, जिनकी NSO के क्लाइंट आमतौर पर जासूसी करने में रुचि रखते हैं, न कि वो लोग जिन पर जासूसी की गई। एमनेस्टी का कहना है कि वे शुरू से ही बहुत स्पष्ट थे कि सूची NSO जासूसी टारगेट की सूची ‘नहीं’ थी। हालाँकि उनके ट्वीट इससे इतर कुछ और ही कह रहे थे।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले एमनेस्टी इंटरनेशनल ने दावा किया था कि उसकी सिक्योरिटी लैब ने दुनिया भर के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के कई मोबाइल उपकरणों का गहन फॉरेंसिक विश्लेषण किया। इस शोध में पाया गया कि NSO ग्रुप ने पेगासस स्पाइवेयर के जरिए मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों की लगातार, व्यापक स्तर पर और गैरकानूनी तरीके से निगरानी की है। 

एमनेस्टी इंटरनेशनल की सुरक्षा लैब ने 10 देशों के 17 मीडिया संगठनों के 80 से अधिक पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के समूह के फोन टैपिंग का फॉरेंसिक विश्लेषण का दावा किया था। इसमें उसे आधे से अधिक मामलों में पेगासस स्पायवेयर के निशान मिले थे। 

अब के दावों से उलट ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल’ ने कहा था कि फ्रांस के राष्ट्रपति एमैनुएल मैक्रों का नाम भी उन 14 वर्तमान या पूर्व राष्ट्राध्यक्षों की सूची में शामिल है, जिन्हें कुख्यात इजराइली ‘स्पाइवेयर’ कम्पनी ‘एनएसओ ग्रुप’ द्वारा हैकिंग के लिए टारगेट किया गया था। एमनेस्टी के महासचिव ऐग्नेस कालामार्ड ने कहा था, “इन अभूतपूर्व खुलासों से दुनिया भर के नेताओं को काँप जाना चाहिए।”

रिपोर्ट में कहा गया कि पत्रकारिता संबंधी पेरिस स्थित गैर-लाभकारी संस्था ‘फॉरबिडन स्टोरीज एवं मानवाधिकार समूह ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल द्वारा हासिल की गई और 16 समाचार संगठनों के साथ साझा की गई 50,000 से अधिक सेलफोन नंबरों की सूची से पत्रकारों ने 50 देशों में 1,000 से अधिक ऐसे व्यक्तियों की पहचान की है, जिन्हें एनएसओ के ग्राहकों ने संभावित निगरानी के लिए कथित तौर पर चुना।

‘द वाशिंगटन पोस्ट’ की खबर के अनुसार, ‘एमनेस्टी’ और पेरिस स्थित गैर-लाभकारी पत्रकारिता संस्था ‘फॉरबिडन स्टोरीज’ को लीक किए गए 50,000 फोन नंबरों की सूची में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान, दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा और इराक के राष्ट्रपति बरहम सालिह शामिल हैं। 

गौरतलब है कि एमनेस्टी की तरफ से यह बयान इजरायली कंपनी NSO द्वारा रिपोर्ट को खारिज करने के बाद आया है। NSO ने जाँच रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए कहा था कि एमनेस्टी इंटरनेशनल और फॉरबिडेन स्टोरीज का डाटा गुमराह करता है। यह डाटा उन नंबरों का नहीं हो सकता है, जिनकी सरकारों ने निगरानी की है। इसके अलावा एनएसओ अपने ग्राहकों की खुफिया निगरानी गतिविधियों से वाकिफ नहीं है।

जासूसी के दावे और इसके उलट दावों के बीच सॉफ्टवेयर बनाने और बेचने वाली इजरायली कंपनी NSO ग्रुप ने साफ कह दिया था कि जिन नंबरों की सूची बताकर कहा जा रहा है कि उनकी जासूसी करने के लिए पेगासस का इस्तेमाल हुआ, वह वास्तविक में उनकी न है और न कभी थी। कंपनी के एक प्रवक्ता ने कहा कि पेरिस के गैर लाभकारी समूह ‘फॉरबिडन स्टोरीज’ ने जो 50 हजार नंबरों का डेटा हासिल किया है, वो उनका है ही नहीं। 

प्रवक्ता के मुताबिक, वह NSO की लिस्ट न है और न कभी थी। ये केवल मनगढ़ंत जानकारी है। ये नंबर कभी भी NSO कस्टमरों के निशाने में थे ही नहीं। प्रवक्ता ने यह भी बताया कि बार-बार जो इस लिस्ट में शामिल नामों को लेकर कहा जा रहा है वह बिलकुल झूठ और फर्जी है। इसके साथ ही समूह ने ‘द वायर’ को संबंधित रिपोर्ट छापने पर मानहानि का मुकदमा दायर करने की धमकी दी।

अपडेट: शुरुआती यू-टर्न के बाद, एमनेस्टी ने एक बयान जारी करके रिवर्स यू-टर्न लेने की कोशिश की। बयान में गजब का खेला दिखाया है। एमनेस्टी ने दोहराया कि जासूसी हुई है। लेकिन जो मूल मुद्दा था, उसमें उलझ गए और मीडिया को भी उलझाया – वामपंथी तो लहालोट हो लिए… उलझाया क्योंकि एमनेस्टी ने बयान में यह नहीं बताया कि उनकी कथित सूची NSO से ही लीक हुई थी या नहीं… और यही पूरे फसाद की जड़ है।

‘श्री राम’ लिखे भगवा ध्वज को भीड़ के सामने राजस्थान के विधायक रामकेश मीणा ने फाड़ डाला: वीडियो वायरल

राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार में हिंदू भावनाओं को कुचलने की कोशिश करने का एक औऱ मामला सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश के आमागढ़ किले में निर्दलीय विधायक रामकेश मीणा ने ‘श्री राम’ लिखे हुए भगवा ध्वज को फाड़ कर फेंक दिया।

इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है कि लोगों की भारी भीड़ आमागढ़ किले पर लहरा रहे भगवा ध्वज को पहले उतारती है और उसके बाद उसे फाड़ दिया जाता है। इसको लेकर हिंदू संगठनों में आक्रोश है।

यह कोई पहली बार नहीं है जब कॉन्ग्रेस शासित राजस्थान में हिंदुओं की भावनाओं को पैरों तले रौंदने की कोशिश की गई। इससे पहले आमागढ़ के किले में ही कुछ दिन पहले भगवान शिव की मूर्तियों को भी तोड़ दिया गया था। हालाँकि, उस मामले में एफआईआर दर्ज होने के बाद आरोपितों को गिरफ्तार भी किया गया था।

इस घटना को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार के सूचना सलाहकार शलभमणि त्रिपाठी ने कॉन्ग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि राहुल और प्रियंका गाँधी की अगुवाई में उनके पार्टी के गुंडे पूरे राजस्थान में हिंदुओं को अपमानित कर रहे हैं। त्रिपाठी ने ट्वीट किया, “राहुल और प्रियंका जी आपके गुंडों की अगुवाई में समूचे राजस्थान में हो रहा हिंदुओं का ये महाअपमान ही कॉन्ग्रेस के ताबूत में आखिरी कील बनेगा, तुष्टीकरण में अंधी कॉन्ग्रेस की तरफ से भगवा ध्वज पर चली हर ईंट का जवाब पत्थर से मिलेगा इंतजार करिए, जय जय श्रीराम !!”

वहीं यूट्यूब चैनल ‘द अर्बन हिंदू’ ने भी इस वीडियो को अपलोड किया है।

वीडियो के बैकग्राउंड में लोगों को यह कहते देखा जा सकता है किभाई साहब ये तो गलत है, ये हिन्दुत्व के खिलाफ है। भीड़ में से एक कहता सुनाई दे रहा कि वो कितनी मेहनत करके इस भगवा ध्वज को यहाँ पर लगाया था और लोग इसे उखाड़ रहे हैं।

CID और ‘जाँच वाली फाइलों’ से कैप्टन करेंगे सिद्धू को ‘बोल्ड’: विधायकों को साधने के लिए रखवा रहे हैं नजर

पंजाब में सत्तारुढ़ कॉन्ग्रेस पार्टी में अंदरुनी खींचतान जारी है। नवजोत सिंह सिद्धू को पंजाब कॉन्ग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के बाद भी कैप्टन अमरिंदर सिंह के तेवर में कोई नरमी नहीं दिख रही है। सूत्रों का कहना है कि सिद्धू का खुलकर समर्थन कर रहे विधायकों के खिलाफ CM कैप्टन अमरिंदर सिंह एक्शन ले सकते हैं। 

नवजोत सिंह सिद्धू 23 जुलाई को कार्यभार सँभालने जा रहे हैं। वहीं सूत्रों का कहना है कि सिद्धू के साथ खुले तौर पर दिखाई दे रहे विधायकों के खिलाफ जाँच संबंधी खुली फाइलों को लेकर अब सीएम अमरिंदर सिंह एक बार फिर से कार्रवाई करने के मूड में हैं। बताया जा रहा है कि सिद्धू के साथ शक्ति प्रदर्शन में शामिल कुछ कॉन्ग्रेस विधायकों पर पंजाब सीआईडी की नजर है। 

इन पर आरोप हैं कि ये लोग प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से अवैध कामों में शामिल रहे हैं। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब सीआईडी की टीम सिद्धू के घर के बाहर सादे कपड़ों में मौजूद हैं। वो अमृतसर में सिद्धू के घर में इकट्ठे हुए विधायकों पर नजर रखे हुए हैं।

मोगा के कस्बा बाघापुराना के विधायक दर्शन बराड़ (Darshan Barar) पर आरोप है कि उन्होंने पंजाब के होशियारपुर में अवैध तरीके से सरकारी जमीन पर क्रैशर लगा रखा है और लगातार अवैध माइनिंग करके पंजाब सरकार को करोड़ों रुपए का चूना लगा चुके हैं। इस मामले में बराड़ को दिसंबर 2020 में ही खनन विभाग की तरफ से नोटिस भेजा गया था और उन पर 1.65 करोड़ रुपए का जुर्माना भी लगाया गया था।

कैप्टन से कर चुके हैं माफी की गुहार

तब से लेकर अब तक दर्शन बराड़ लगातार कैप्टन अमरिंदर सिंह पर इस जुर्माने को माफ करने और नोटिस वापस करवाने का दबाव बना रहे थे, लेकिन जब कैप्टन ने ऐसा नहीं किया तो दर्शन खुलकर नवजोत सिंह सिद्धू के समर्थन में आ गए।

अब एक बार फिर से कैप्टन अमरिंदर सिंह ने दर्शन बराड़ की यही जुर्माने वाली फाइल फिर से खोलने की तैयारी कर ली है। आने वाले दिनों में दर्शन बराड़ पर माइनिंग विभाग की तरफ से दबाव बनाया जा सकता है और कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है।

62 कॉन्ग्रेस विधायक पहुँचे सिद्धू के घर

बुधवार (जुलाई 21, 2021) को नवजोत सिंह सिद्धू ने पार्टी के विधायकों को अपने अमृतसर आवास पर नाश्ते के लिए बुलाया था। 62 कॉन्ग्रेस विधायक उनके आवास पर पहुँचे। इसके बाद मंत्रियों-विधायकों के साथ सिद्धू स्वर्ण मंदिर पहुँचे।

कहीं बिगड़ न जाए चुनावी माहौल

उल्लेखनीय है कि नवजोत सिंह सिद्धू को प्रदेश कॉन्ग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद भी कैप्टन अमरिंदर सिंह से कोई बातचीत नहीं हुई है। दोनों नेताओं के बीच इस टकराव ने पार्टी नेताओं की चिंता बढ़ा दी है। उनका मानना है कि दोनों के बीच तालमेल का अभाव रहा तो चुनाव में मुश्किलें बढ़ सकती हैं। विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और प्रदेश अध्यक्ष सिद्धू के बीच तालमेल जरूरी है। पर अभी तक दोनों गुट एक दूसरे से माफी मँगवाने की माँग पर अड़े हुए हैं।

कृष्णभक्त Vs रामभक्त और ओरछा में रामराजा मंदिर की स्थापना, जहाँ श्री राम को MP पुलिस देती है ‘गार्ड ऑफ ऑनर’

मध्य प्रदेश के निवाड़ी जिले में ओरछा तहसील में स्थित राजा राम का मंदिर। यह एक मात्र ऐसा मंदिर है जहाँ श्री राम, भगवान और राजा, दोनों ही रूपों में पूजे जाते हैं। कई मान्यताओं के अनुसार अयोध्या के रामलला का वास्तविक विग्रह (प्रतिमा) ओरछा में ही विराजमान है। यही कारण है कि भले ही ओरछा का महत्व, अयोध्या के समान न हो लेकिन कम भी नहीं है। ओरछा में राजा रामचन्द्र की स्थापना के पीछे प्रमुख कारण थीं बुन्देल शासक मधुकर शाह की महारानी कुंवरि गणेश, जो अनन्य राम भक्त थीं और अपने पति की चुनौती को स्वीकार करके भगवान राम को यहाँ लेकर आई थीं।

मंदिर का इतिहास

ओरछा में राजा रामचन्द्र के मंदिर की स्थापना का इतिहास दो भक्तों की ईश्वर भक्ति से जुड़ा हुआ है। बुंदेलखंड क्षेत्र के तत्कालीन शासक मधुकर शाह महान कृष्ण भक्त थे लेकिन दूसरी ओर उनकी पत्नी महारानी कुंवरि गणेश हमेशा ही श्री राम की भक्ति में लीन रहती थीं। दोनों के बीच अपने आराध्य को सर्वश्रेष्ठ साबित करने की होड़ लगी रहती थी। एक बार राजा ने महारानी से वृंदावन चलने के लिए कहा लेकिन महारानी ने प्रस्ताव ठुकराते हुए अयोध्या जाने की जिद कर ली। इस पर राजा ने व्यंग्य करते हुए कहा कि अगर महारानी राम की इतनी ही बड़ी भक्त हैं तो उन्हें अयोध्या से ओरछा लाकर दिखाएँ। महारानी ने चुनौती स्वीकार कर ली और निकल पड़ी अयोध्या के लिए।

ऐसा माना जाता है कि 21 दिनों तक महारानी कुंवरि गणेश ने अयोध्या में भगवान राम की तपस्या की लेकिन जब उन्हें भगवान राम का कोई संकेत नहीं प्राप्त हुआ तो उन्होंने सरयू नदी में छलाँग लगा दी। नदी में छलाँग लगाने के बाद उनकी गोद में भगवान श्री राम प्रकट हो गए। महारानी ने उनसे ओरछा चलने की प्रार्थना की। श्री राम इसके लिए तैयार हो गए लेकिन उन्होंने शर्त रखी कि वो पुष्य नक्षत्र के दिन ही चलेंगे और जहाँ उन्हें विराजमान कर दिया जाएगा, वहाँ से दोबारा उठेंगे नहीं। महारानी ने उनकी दोनों शर्तें मान लीं।

ओरछा के रामराजा मंदिर में जड़े शिलालेख के अनुसार महारानी, भगवान राम को विक्रम संवत 1631 (सन् 1574) में चैत्र शुक्ल की नवमी को ओरछा लेकर आईं। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार महारानी, भगवान राम को अयोध्या से लेकर ओरछा तक पुष्य नक्षत्र में कुल 8 माह 28 दिनों तक पैदल चलीं। इसके बाद उनकी योजना भगवान राम को सन् 875 में बने चतुर्भुज मंदिर में स्थापित करने की थी लेकिन उन्होंने भगवान राम के विग्रह को उस स्थान पर रख दिया, जहाँ आज रामराजा मंदिर का निर्माण किया गया है। भगवान राम अपनी शर्त के अनुसार वहीं स्थापित हो गए, जिसके कारण उसी स्थान पर मंदिर का निर्माण किया गया।

मंदिर के विषय में कुछ खास बातें

ऐसा कहा जाता है कि जब अयोध्या में इस्लामिक आक्रान्ताओं का आक्रमण हुआ और मंदिर को तोड़ गया तो साधु-संतों ने भगवान राम के वास्तविक विग्रह को सरयू नदी में बालू के नीचे दबा दिया था। बाद में भगवान राम का यही वास्तविक विग्रह महारानी कुंवरि गणेश की गोद में प्रकट हुआ। अकबर के शासनकाल में बुंदेलखंड के राजा मधुकर शाह ही ऐसे शासक थे, जिन्होंने अपनी हिन्दू पहचान को गर्व से धारण किया। इतिहास में इस बात का प्रमाण है कि जब अकबर ने अपने दरबार में तिलक लगाने को प्रतिबंधित किया था, तब मधुकर शाह ने इस निर्णय का पूरा विरोध किया था और मधुकर शाह के विरोध के कारण ही अकबर को निर्णय वापस लेना पड़ा। इसके बाद साधुओं को यह भरोसा हुआ कि मधुकर शाह भगवान राम के विग्रह को भली-भाँति सुरक्षित रख पाएँगे। इसी कारण अंततः भगवान राम ओरछा में विराजमान हुए।

ओरछा में श्री राम, भगवान और राजा, दोनों रूप में पूजे जाते हैं। कहा जाता है कि ओरछा में कोई भी वीआईपी नहीं है। अगर कोई वीआईपी है, तो वह राजा रामचन्द्र हैं। मध्य प्रदेश पुलिस के जवानों के द्वारा सूर्यास्त और सूर्योदय के समय राजा रामचन्द्र को बंदूकों की सलामी अर्थात गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता है। ओरछा में यह गार्ड ऑफ ऑनर बाकी किसी को भी नहीं दिया जाता। ऐसा माना जाता है कि त्रेतायुग में राजा दशरथ अपने पुत्र श्री राम का राज्याभिषेक नहीं कर सके, ऐसे में राजा मधुकर शाह ने अपना कर्त्तव्य निभाया और राजा रामचन्द्र का राज्याभिषेक किया एवं अपना राज्य राजा रामचन्द्र को सौंप दिया। यह परंपरा आज भी चली आ रही है।

ओरछा के रामराजा मंदिर में श्रीरामनवमी का त्यौहार बड़ी ही भव्यता के साथ मनाया जाता है। इसके अलावा विवाह पंचमी को उनके राज्याभिषेक की वर्षगाँठ भी बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। इसके अलावा दशहरा, दीपावली और नवरात्रि भी रामराजा मंदिर के प्रमुख त्यौहारों में से एक है। दीपावली के दिन मंदिर को इस प्रकार सजाया जाता है, जिसका वर्णन शब्दों में किया ही नहीं जा सकता है।

कैसे पहुँचें?

ओरछा का नजदीकी हवाईअड्डा खजुराहो में स्थित है, जो यहाँ से लगभग 163 किमी की दूरी पर स्थित है। खजुराहो हवाईअड्डे से दिल्ली, मुंबई, वाराणसी और बेंगलुरु जैसे शहरों के लिए उड़ानें उपलब्ध हैं।

रेलमार्ग से ओरछा पहुँचने के लिए नजदीकी रेल मुख्यालय झाँसी है। झाँसी से न केवल मध्य प्रदेश बल्कि देश के अन्य शहरों के लिए भी ट्रेनें उपलब्ध हैं। झाँसी से पैसेंजर ट्रेनों के माध्यम से ओरछा पहुँचा जा सकता है।

इसके अलावा ओरछा, झाँसी-खजुराहो सड़क मार्ग पर स्थित है। खजुराहो और झाँसी से ओरछा के लिए नियमित तौर पर बसें उपलब्ध हैं और साथ ही मध्य प्रदेश के अन्य शहरों से भी परिवहन के अन्य साधन ओरछा के लिए उपलब्ध हैं।

84 कोसी परिक्रमा मार्ग बनेगा नेशनल हाइवे, गडकरी के ऐलान के बाद बोले CM योगी- अयोध्या के पुरातन गौरव की पुनर्स्थापना में बड़ा कदम

मोदी सरकार ने उत्तर प्रदेश के ‘चौरासी कोसी परिक्रमा मार्ग’ को राष्ट्रीय राजमार्ग घोषित कर दिया है। इस संबंध में केंद्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने ट्वीट कर ऐलान किया। उन्होंने बताया कि उत्तरप्रदेश के अयोध्या के चौरासी कोसी परिक्रमा मार्ग को राष्ट्रीय राजमार्ग बनाया जाएगा और इस संबंध में वह बुधवार (जुलाई 21, 2021) को नोटिफिकेशन भी जारी कर चुके हैं।

केंद्रीय मंत्री के ट्वीट के बाद सीएम योगी आदित्यनाथ का ट्वीट आया, जिसमें उन्होंने पीएम मोदी और नितिन गडकरी का आभार जताया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लिखा,

“प्रधानमंत्री के मार्गदर्शन व आपके नेतृत्व में ‘चौरासी कोसी परिक्रमा मार्ग’ को राष्ट्रीय राजमार्ग घोषित करने हेतु अधिसूचना जारी होना अयोध्या के पुरातन गौरव की पुनर्स्थापना हेतु बढ़ाया गया बड़ा कदम है। यह आध्यात्मिक पर्यटन क्षेत्र को संबल प्रदान करेगा। हार्दिक आभार!”

बता दें कि केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के मुताबिक अयोध्या में करीब 80 किमी की रिंग रोड और 275 किमी की अयोध्या चौरासी कोसी परिक्रमा मार्ग नेशनल हाइवे बनेगा। गडकरी ने कहा इसका फायदा ये होगा कि पर्यटक जो 84 कोसी परिक्रमा करना चाहते हैं वे आसानी से राजमार्ग से यात्रा कर सकेंगे।

उल्लेखनीय है कि अयोध्या में हर साल पंचकोसी और चौदह कोसी परिक्रमा के लिए पूरे देश और विदेश से लोग आते हैं। लेकिन, यहाँ संत अयोध्या की चौरासी कोसी में परिक्रमा करते हैं। कुछ लोग इसे केवल अयोध्या से जोड़कर देखते हैं लेकिन यह चौरासी कोसी परिक्रमा मार्ग 5 जिलों में 275.35 किलोमीटर तक फैला है। इसमें अयोध्या, अंबेडकर नगर, बाराबंकी समेत गोंडा जिला भी आता है। अभी के हालातों में इस परिक्रमा को करने वाले काफी परेशानी झेलते हैं। लेकिन राजमार्ग बनने से यह परेशानी कम हो जाएगी और आसानी से परिक्रमा हो सकेगी। इसके अलावा पर्यटन को भी इससे बढ़ावा मिलेगा।

राज कुंद्रा के लिए पोर्न ही फ्यूचर, सेक्सुअल एक्ट्स की लाइव स्ट्रीमिंग का था प्लान, बॉलीवुड से बड़ा बाजार बनाने में लगे थे: रिपोर्ट्स

पोर्न कंटेंट मामले में कारोबारी राज कुंद्रा की गिरफ्तारी के बाद अब मुंबई पुलिस को अपनी पड़ताल में मालूम हुआ है कि कुंद्रा ने ऐसे काम क्यों किए। टाइम्स नाऊ के मुताबिक पुलिस द्वारा एक्सेस किए गए इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस इस बात की ओर इशारा करते हैं कि कुंद्रा पोर्न कंटेंट को ही आगे का भविष्य मानते थे। वह अपने इस बिजनेस को बॉलीवुड से भी बड़ा बनाने की चाह रखते थे।

मुंबई पुलिस के अनुसार, कुंद्रा इस रैकेट को बहुत सुनियोजित ढंग से चला रहे थे। इसमें मुनाफा कमाने के लिए उनके पास एक प्रॉपर स्ट्रैटेजी थी। एक्सेस किए गए सबूतों से यह पता चलता है कि राज कुंद्रा सेक्सुअल एक्ट्स की लाइव स्ट्रीमिंग को सबसे अच्छा विकल्प मान रहे थे और इसी में भविष्य देख रहे थे। उनका प्लॉन था कि वो इस बिजनेस को बॉलीवुड जितना बड़ा बनाएँगे।

बता दें कि मुंबई क्राइम ब्रांच ने ‘Hotshots’ एप के जरिए अश्लील वीडियो बनाने और उसको पब्लिश करने के मामले में राज कुंद्रा को ‘प्रमुख साजिशकर्ता’ के रूप में नामित किया है। मुंबई के संयुक्त पुलिस आयुक्त (अपराध) मिलिंद भारम्बे ने खुलासा किया है कि इस फ्री डाउनलोड एप को ऐप्पल और गूगल प्लेस्टोर दोनों ने इसकी सामग्री के लिए इसे अपने प्लेटफॉर्म से हटा दिया था। वहीं राज का कहना है कि उन्होंने इस एप को साल 2019 में 25000 डॉलर (₹1864628) में बेच दिया था।

रिपोर्ट्स की मानें तो राज कुंद्रा अपने जीजा प्रदीप बक्शी के साथ मिलकर अश्लील वीडियो का बिजनेस इस एप के जरिए ही करते थे। आईएएनएस की एक रिपोर्ट बताती है कि राज विआन इंडस्ट्री लिमिटेड के मालिक हैं और प्रदीप बक्शी ब्रिटिश सिटीजन हैं जिनकी शादी राज की बहन के साथ हुई है और केनरिन लिमिटेड के चेयरमैन हैं। दोनों कपंनियाँ मोबाइल एप हॉटशॉट डिजिटल एंटरटेनमेंट के लिए काम करते थे, जिसे केनरिन लिमिटेड ने डेवलप किया था। कहा जा रहा है कि राज कुंद्रा एडल्ट कंटेंट की सप्लाई इंडिया से यूके में करते थे।

उल्लेखनीय है कि पोर्न वीडियोज के मामले में कुंद्रा के विरुद्ध फरवरी 2021 में शिकायत हुई थी। कंप्लेन में कुंद्रा पर अश्लील सामग्री सोशल मीडिया पर पोस्ट करने का आरोप लगा था। बाद में मामला दर्ज करके जाँच शुरू हुई। प्रारंभिक जाँच में दोषी पाए जाने के बाद उनको 19 जुलाई को गिरफ्तार किया गया। अब तक इस मामले में 11 गिरफ्तारी हुई हैं। कुंद्रा को पर्याप्त सबूतों के आधार पर पकड़ा गया है। संभव है कि आगे केस में शिल्पा शेट्टी से भी पूछताछ हो। कहा जा रहा है कि मुंबई पुलिस उनको भी समन भेज सकती है। अभी तक पुलिस ने राज कुंद्रा के घर की तलाशी ली है।

दिल्ली सरकार ने किसानों को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की दी इजाजत, टिकैत बोले- मॉनसून सत्र खत्म होने तक वहीं रहेंगे

पिछले साल सितंबर में लाए गए तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का आंदोलन एक बार फिर से चर्चा में है। कानूनों को निरस्त करने की माँग को लेकर किसान बीते कई महीनों से दिल्ली की सीमाओं पर प्रदर्शन कर रहे हैं। उन्होंने कहा है कि वे गुरुवार (22 जुलाई 2021) से जंतर-मंतर पर किसान संसद आयोजित करेंगे। सिंघू बॉर्डर पर विरोध-प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे किसान संगठनों ने कहा कि गुरुवार से 200 प्रदर्शनकारी हर दिन जंतर-मंतर जाएँगे।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, दिल्ली पुलिस के अधिकारियों के साथ मंगलवार (20 जुलाई) को हुई बैठक में किसान नेता ने कहा कि हम अपनी माँगों को लेकर जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करेंगे। कोई भी प्रदर्शनकारी संसद नहीं जाएगा, जहाँ मॉनसून सत्र चल रहा है। भारतीय किसान यूनियन नेता राकेश टिकैत ने कहा, “हमारे 200 लोग गुरुवार कसे 4-5 बसों में सिंघू बॉर्डर से जाएँगे। हम विभिन्न प्रदर्शन स्थलों से सिंघू बॉर्डर पर जमा होकर जंतर-मंतर की ओर बढ़ेंगे। संसद का मॉनसून सत्र खत्म होने तक हम जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करेंगे।”

पीटीआई ने राष्ट्रीय किसान मजदूर महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिव कुमार कक्का के हवाले से बताया है कि 22 जुलाई से हर दिन 200 किसान पहचान पत्र लगाकर सिंघू बॉर्डर से सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे तक जंतर-मंतर पहुँचकर धरना प्रदर्शन करेंगे। उन्होंने कहा कि हमने दिल्ली पुलिस को आश्वसत किया है कि यह विरोध शांतिपूर्ण होगा।

दिल्ली पुलिस के अनुसार, संसद के पास विरोध-प्रदर्शन के लिए कोई लिखित अनुमति नहीं दी गई है। हालाँकि, स्पेशल सीपी (क्राइम) और ज्वाइंट सीपी ने जंतर-मंतर का दौरा किया है, जहाँ विरोध प्रदर्शन होना है। एएनआई ने सूत्रों के हवाले से कहा कि दिल्ली सरकार ने जंतर-मंतर पर कोविड-19 प्रोटोकॉल का पालन करते हुए किसानों को विरोध-प्रदर्शन की अनुमति दी है। गुरुवार को सिंघू बॉर्डर पर 3,000 अर्धसैनिक बलों के जवानों के साथ दिल्ली पुलिस के कम से कम 2,500 जवानों की तैनाती की जाएगी। इसके अलावा, असामाजिक तत्वों को दिल्ली में जबरदस्ती घुसने से रोकने के लिए दंगा विरोधी बल को वाटर कैनन और आँसू गैस के गोले के साथ तैयार रखा गया है।

इसके अलावा पुलिस ने आधिकारिक तौर पर किसानों को दिल्ली में प्रवेश करने और संसद भवन के पास एकजुट होने के लिए सख्त मना किया है। पुलिस ने उन्हें कोविड दिशा-निर्देशों के कारण अपनी विरोध योजना पर पुनर्विचार करने की भी सलाह दी है।

गौरतलब है कि 26 जनवरी को हजारों की संख्या में प्रदर्शनकारी किसान बैरिकेड्स तोड़कर राष्ट्रीय राजधानी में दाखिल हो गए थे और आईटीओ सहित अन्य स्थानों पर उनकी पुलिसकर्मियों से झड़पें हुई थीं। उन्होंने करोड़ों की संपत्ति का नुकसान पहुँचाया और 300 से अधिक पुलिसकर्मियों को घायल कर दिया था। कई प्रदर्शनकारी लाल किले पर पहुँच गए और ऐतिहासिक स्मारक में प्रवेश कर गए उसकी प्राचीर पर धार्मिक झंडा लगा दिया था। इस दौरान ऐसी कई रिपोर्ट्स भी आई थीं, जिनमें कहा गया था कि खालिस्तानी आतंकवादियों और नक्सलियों से सहानुभूति रखने वालों ने किसानों के विरोध प्रदर्शनों में घुसपैठ की थी।

बता दें कि किसान तीन नए कृषि कानूनों का विरोध करने का दावा करते हैं जो किसान उत्पाद व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम, 2020, मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा अधिनियम, 2020 पर किसान (सशक्तिकरण और संरक्षण) समझौता और आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम 2020 है। उनका दावा है कि ये कानून किसानों के खिलाफ हैं, लेकिन वास्तव में ये किसानों को मंडियों के एकाधिकार से बेहतर बाजार और स्वतंत्रता प्रदान करते हैं। अब तक सरकार की किसान यूनियनों के साथ दस दौर की बातचीत हो चुकी है, लेकिन दोनों पक्षों के बीच गतिरोध अभी भी बना हुआ है। वहीं, किसान नेताओं ने अब पंजाब में चुनाव लड़ने में दिलचस्पी दिखाई है।

16 अगस्त को ममता बनर्जी मना रहीं ‘खेला होबे दिवस’, 1946 की इसी तारीख को मुस्लिम लीग ने लॉन्च किया था ‘डायरेक्ट एक्शन डे’

पश्चिम बंगाल में चुनाव बाद हुई हिंसा के खौफनाक विवरण अब तक सामने आ रहे हैं। इस चुनाव में सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) का नारा था ‘खेला होबे’। TMC नेताओं ने इसे अपने राजनीतिक विरोधियों खासकर भाजपा के लिए धमकी के रूप में प्रयोग में लाया था। अब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस साल 16 अगस्त को ‘खेला होबे दिवस’ मनाने की घोषणा की है। सन् 1946 में इसी तारीख को पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग ने ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ की घोषणा की थी और इसके बाद 5 दिनों तक हिंदुओं का कत्लेआम चला था।

रिपोर्ट के अनुसार ममता बनर्जी ने 16 अगस्त को ‘खेला होबे दिवस’ के तौर पर मनाने की घोषणा करते हुए कहा है कि अब यह नारा राष्ट्रीय स्तर तब तक इस्तेमाल किया जाएगा जब तक देश से बीजेपी का सफाया नहीं होता। राजनीतिक विरोधी के लिए नारे और रणनीति नई बात नहीं है। लेकिन पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों की घोषणा के बाद से जिस तरह इस नारे का इस्तेमाल हिंसा और राजनीतिक विरोधियों को डराने के लिए हुआ उससे इसकी मंशा पर सवाल उठते हैं।

‘खेला होबे’ को डरावना बनाने के लिए अणुब्रत मंडल ने एक रैली में ‘भयंकर खेला होबे’ का नारा दिया था। एक तरह से ये भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए सीधी धमकी थी और यह धमकी सही साबित हुई। न केवल सामान्य भाजपा कार्यकर्ताओं बल्कि भाजपा के उच्च पदाधिकारियों और यहाँ तक कि केन्द्रीय मंत्रियों तक पर हमले हुए। हमलों का आरोप सीधे तौर पर टीएमसी के कार्यकर्ताओं पर लगा। इस दौरान कई भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या तक कर दी गई। 8 चरणों में बंगाल चुनाव सम्पन्न हुए और इन्हीं के साथ बंगाल में हिंसा भी 8 चरणों तक चली। लोगों को यह उम्मीद थी कि संभव है कि चुनाव परिणाम आने के बाद यह हिंसा खत्म होगी।

लेकिन 02 मई 2021 को विधानसभा चुनावों के परिणाम घोषित होने के बाद ‘खेला होबे’ का एक नया स्वरूप देखने को मिला। जो हिंसा अभी तक चुनावी मानी जा रही थी वह, बदले की कार्रवाई में बदल गई। राज्य में टीएमसी की जीत के बाद से ही भाजपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों के लिए कठिन समय शुरू हो चुका था क्योंकि जिस तरीके से भाजपा कार्यकर्ताओं को चुनकर मारा जा रहा था, उनके घरों और दुकानों को जलाया जा रहा था, वह एक बात की ओर इशारा कर रहा था कि इन सब को भाजपा का समर्थन करने की सजा दी जा रही है। कूच बिहार, बर्धमान, बीरभूम, उत्तरी 24 परगना और कोलकाता जैसे जिलों में कई भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या तक कर दी गई। इसके अलावा महिलाओं के साथ दुष्कर्म और छेड़खानी की घटनाएँ भी देखने को मिली। यहाँ तक कि नाबालिगों को भी नहीं बख्शा गया।

पश्चिम बंगाल में जो खेला शुरू हुआ था, उसका परिणाम यह हुआ कि सैकड़ों की संख्या में डर के कारण भाजपा कार्यकर्ताओं ने टीएमसी की सदस्यता ले ली। हजारों की संख्या में लोगों को बंगाल छोड़ना पड़ा और इन लोगों ने अंततः अपनी जान बचाने के लिए असम जैसे पड़ोसी राज्यों में शरण ली। कई भाजपा कार्यकर्ताओं ने अपनी आपबीती सुनाई थी कि उनके पीछे 50-60 लोगों की भीड़ दौड़ रही थी, पथराव कर रही थी और उन्हें मारने के लिए चिल्ला रही थी। इन कार्यकर्ताओं ने नदी में कूद कर अपनी जान बचाई और उन्हें असम में शरणार्थी कैंप में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा।

जाँच समितियाँ, सुनवाई और NHRC रिपोर्ट

मीडिया, बुद्धिजीवियों और टीएमसी जैसे ही राजनीतिक दलों की चुप्पी के बीच ममता सरकार ने भी राज्य में हिंसा के अस्तित्व को ही मानने से इनकार कर दिया। राज्यपाल के साथ कई बार इस मुद्दे पर ममता सरकार आमने सामने हुई। राज्यपाल ने पहले तो कई बार ममता सरकार से राज्य में लगातार हो रही हिंसाओं पर कार्रवाई करने के लिए कहा, लेकिन अंततः उन्होंने खुद हिंसाग्रस्त क्षेत्रों का दौरा करने के निर्णय लिया। इस दौरान महिलाओं ने उनके पैर तक पकड़ लिए थे। गृह मंत्रालय ने जाँच के लिए अपनी टीम भेजी। बंगाल में भाजपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों के खिलाफ हिंसा का मामला कलकत्ता हाईकोर्ट तक पहुँचा।

हाईकोर्ट के आदेश पर ही राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की एक जाँच कमेटी बंगाल में चुनाव बाद शुरू हुई हिंसा की जाँच करने के लिए गठित की गई। कमेटी ने कई दिनों तक हिंसाग्रस्त क्षेत्रों का दौरा किया। जाधवपुर में जाँच के लिए गई NHRC कमेटी पर ही हमला हो गया। NHRC की 7 सदस्यीय टीम ने 20 दिन में 311 से अधिक जगहों का मुआयना करने के बाद राज्य में चुनाव के बाद हुई हिंसा पर अपनी रिपोर्ट कलकत्ता हाईकोर्ट को सौंप दी। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि राज्य में ‘कानून का शासन’ नहीं बल्कि ‘शासक का कानून’ है।

रिपोर्ट के मुताबिक, जाँच के दौरान टीम को राज्य के 23 जिलों से 1979 शिकायतें मिलीं। इनमें ढेर सारे मामले गंभीर अपराध से संबंधित थे। कई मामले दुष्कर्म, छेड़खानी व आगजनी के भी थे और ये शिकायतें टीम के दौरे के वक्त लोगों ने करी थीं। रिपोर्ट में कहा गया कि NHRC को महिलाओं पर हुए अत्याचार की 57 शिकायतें राष्ट्रीय महिला आयोग से मिली हैं। आयोग ने बताया कि अधिकतर शिकायतें पुलिस ने दर्ज ही नहीं की हैं। रिपोर्ट के अनुसार 9,300 आरोपितों में से पश्चिम बंगाल पुलिस ने केवल 1,300 को गिरफ्तार किया और इनमें से भी 1,086 जमानत पर रिहा हो गए। रिपोर्ट में कहा गया कि कई मामलों में पीड़ितों को इंसाफ दिलाने की बजाय पुलिस ने उन्हीं पर गंभीर धाराओं में मुकदमा दायर कर दिया।

जाँच टीम ने यह भी पाया कि हिंसा में पीड़ित लोगों की सुनवाई करने की बजाय बंगाल पुलिस तमाशा देखती रही, जबकि टीएमसी के गुंडे एक जगह से दूसरी जगह हिंसा फैलाते रहे। रिपोर्ट में कहा गया है कि बंगाल पुलिस पर किसी प्रकार का दबाव था या फिर वह खुद इतनी लापरवाह थी कि उसने कार्रवाई नहीं की। इसके अलावा, टीम ने यह भी पाया कि बंगाल में हुई राजनीतिक हिंसा पर न तो किसी पुलिसकर्मी ने और न ही किसी राजनेता ने इन घटनाओं की निंदा की। टीम ने कहा कि चुनावी नतीजों के बाद हुई हिंसा किसी पॉलिटकल-ब्यूरोक्रेटिक-क्रिमिनल नेक्सस की ओर इशारा करती है।

इन सब के बावजूद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी 16 अगस्त को ‘खेला होबे दिवस’ मनाना चाहती हैं और इसके तहत राज्य में विभिन्न क्लबों और गरीब बच्चों को 50,000 फुटबॉल बाँटने की घोषणा की गई है। हालाँकि सत्य तो यह है कि पश्चिम बंगाल में ‘खेला होबे दिवस’ का स्पोर्ट्स से कोई लेना-देना नहीं है। असल में ये चुनाव में टीएमसी की जीत का जश्न मनाने से भी ज्यादा राज्य में मारे गए भाजपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों के परिजनों के साथ एक क्रूर मजाक है। उनके साथ, जिनके अपनों की हत्या का आरोप टीएमसी पर लगा है, उनके साथ, जो घर-बार छोड़ कर पड़ोसी राज्यों में शरणार्थी बन कर रहने को मजबूर हैं और उनके साथ, जिनके घरों को जला दिया गया और तहस-नहस कर दिया गया। ‘खेला होबे’ का नारा लगाने वाले इसी टीएमसी ने चुनाव के दौरान दिखाया था कि ममता बनर्जी फुटबॉल की जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सिर को मार रही हैं। यही बंगाल के असली ‘खेला होबे’ का संदेश था।

लेकिन ‘खेला होबे दिवस’ के लिए 16 अगस्त का दिन ही क्यों? 16 अगस्त तो आधुनिक भारतीय इतिहास का वो काला दिन है जब इस्लामिक कट्टरपंथ से ओतप्रोत होकर मुस्लिम लीग ने मात्र कुछ घंटों के भीतर ही तत्कालीन अविभाजित भारत के बंगाल प्रांत में हजारों हिंदुओं को मार डाला था। इस दिन शुरुआत हुई थी ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ की। यह डायरेक्ट एक्शन किसी और के खिलाफ नहीं बल्कि जिन्ना के ‘डायरेक्ट एक्शन प्लान’ के तहत हिंदुओं के खिलाफ था।

16 अगस्त 1946

भारत में अंग्रेजी हुकूमत अपने अंतिम दिन गिन रही थी लेकिन उसी दौरान मुस्लिम लीग और जिन्ना एक अलग मुस्लिम देश की इच्छा लिए सुलग रहे थे। 15 अगस्त 1946 को अलग मुस्लिम देश की यह इच्छा कट्टरपंथी व्यवहार में बदल गई और हिंदुओं के खिलाफ ‘डायरेक्ट एक्शन (सीधी कार्रवाई)’ का ऐलान कर दिया गया। 16 अगस्त को शुरुआत हुई ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ की। पूर्वी बंगाल के नोआखाली से शुरू हुआ हिंदुओं का कत्लेआम। कलकत्ता (कोलकाता) में भी हिंदुओं को निशाना बनाया गया। हिंदुओं को चुन-चुन कर मारा गया, हिन्दू महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया, हिंदुओं की संपत्तियों को जला दिया गया। कलकत्ता में ही 72 घंटों के भीतर 6,000 से अधिक हिन्दू मार दिए गए, 20,000 से अधिक घायल हुए और लगभग 100,000 हिंदुओं को अपना घर छोड़ना पड़ा। इसे ‘ग्रेट कलकत्ता किलिंग’ के नाम से जाना जाता है। हिंदुओं के खिलाफ यह हिंसा 16 अगस्त 1946 से 20 अगस्त 1946 तक चली।

हर बार की तरह मरने वाले हिंदुओं का आँकड़ा इतिहास के पन्नों में गुम होकर रह गया। अनुमानों के मुताबिक मरने वाले हिंदुओं की संख्या 10,000 से भी अधिक थी और पलायन करने वाले हिंदुओं की संख्या भी कई गुना थी, लेकिन आँकड़ों के साथ महत्वपूर्ण है वह विचारधारा जिसने हिंदुओं को अपना निशाना बनाया। इस नरसंहार के 75 सालों के बाद एक बार फिर 16 अगस्त हमारे सामने है। इस बार यह ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ से ज्यादा ‘खेला होबे दिवस’ के रूप में चर्चा में रहेगा। ममता बनर्जी सरकार कार्यक्रमों का आयोजन करेगी और इन कार्यक्रमों का प्रसारण भी किया जाएगा। लेकिन चुपचाप कहीं कोनों में दुबका हुआ एक बड़ा तबका चुनावी हिंसा के रूप में खुद के साथ हुए अत्याचार को याद करता, सिहरता हुआ ये सब देखेगा। ठीक वैसे ही जैसे ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के बाद बचे हुए हिन्दुओं ने निरीह अवस्था में अपने नरसंहार के मंजर को याद किया होगा।

फिरौती, फिक्सिंग, फ्रॉड, पोर्न: पहले मॉं-अब पति; शिल्पा शेट्टी को भी समन भेज सकती है मुंबई पुलिस

पोर्न वीडियोज बनाने और कुछ एप्स के जरिए उनको बेचने के आरोप में बिजनेसमैन राज कुंद्रा की गिरफ्तारी के बाद, हर जगह बॉलीवुड एक्ट्रेस शिल्पा शेट्टी को लेकर बातें हो रही हैं। कुछ लोग जानना चाहते हैं कि क्या कुंद्रा के कारनामों की जानकारी शिल्पा को पहले से थी और कुछ इस बात का दुख मना रहे हैं कि एक्ट्रेस के पति ने उनकी इज्जत मिट्टी में मिला दी है। इसके अलावा उनपर बन रहे मीम्स की भी भरमार है। लेकिन, बता दें कि यह पहला मौका नहीं है जब शिल्पा शेट्टी के अपनों के दामन पर दाग लगे हैं।

जब डॉन की मदद लेने के लगे आरोप

इससे पहले शिल्पा शेट्टी की माँ सुनंदा शेट्टी पर एक साड़ी के व्यापारी को धमकाने का आरोप लगा था। मामला 18 साल पुराना है। सूरत के प्रफुल्ल साड़ी ब्रांड ने शिल्पा शेट्टी को 4 लाख रुपए में अपनी साड़ियों की मॉडलिंग करने के लिए हायर किया था। लेकिन इस हायरिंग में कोई लिखित कॉन्ट्रैक्ट नहीं था। प्रफुल्ल साड़ी ब्रांड ने इसी के चलते शिल्पा के विज्ञापनों का इस्तेमाल 2003 तक जारी रखा। कुछ समय तक तो वह इसके लिए शिल्पा को पैसे देते रहे। लेकिन बाद में उन्होंने रकम देनी बंद कर दी। उस समय चूँकि इस मामले को शिल्पा शेट्टी की ओर से उनकी माँ सुनंदा और पिता सुरेंद्र शेट्टी हैंडल कर रहे थे तो उन्होंने प्रफुल्ल साड़ी के मालिक से पैसे लेने के लिए छुटभैये डॉन फजलुर रहमान की मदद ली और ब्रांड के मालिक शिवनारायण अग्रवाल को धमकाया गया। उस दौरान अग्रवाल से 2 करोड़ रुपए अतिरिक्त माँगे गए थे। पूरे मामले में शिल्पा की माँ पर अक्टूबर 2019 में आरोप तय हुए थे और उनके साथ 4 अन्य लोगों को आरोपित बनाया गया था।

आईपीएल सट्टेबाजी के भी दाग

साल 2013 में राज कुंद्रा पर आईपीएल सट्टेबाजी और स्पॉट फिक्सिंग के आरोप लगे थे। उस समय मामला इतना बड़ा हो गया था कि शिल्पा शेट्टी की टीम राजस्थान रॉयल्स को दो साल के लिए निलंबित करना पड़ा था। राजस्थान रॉयल्स से पूछताछ के दौरान तीन क्रिकेटर पकड़े गए थे और सबने सह मालिक राज कुंद्रा का नाम लिया था। इसके बाद BCCI ने राज कुंद्रा को पूरी जिंदगी आईपीएल से बैन करने का अपना निर्णय सुनाया था।

एक्टर-प्रोड्यूसर ने धोखाधड़ी में घेरा

पिछले साल एक धोखाधड़ी के मामले में शिल्पा शेट्टी और उनके पति राज कुंद्रा का नाम उछला था। एक्टर-प्रोड्यूसर सचिन जोशी ने शिल्पा शेट्टी और राज कुंद्रा के खिलाफ मुंबई के खार पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करवाई थी। उनका कहना था कि शिल्पा शेट्टी की सोना व्यापार करने वाली सतयुग गोल्ड प्राइवेट लिमिटेड कंपनी ने उनको प्रलोभन देते हुए धोखा दिया। अपनी शिकायत में उन्होंने सिर्फ राज कुंद्रा और शिल्पा शेट्टी ही नहीं बल्कि कुछ और लोगों के नाम भी लिए थे। जोशी का कहना था सतयुग गोल्ड स्कीम के तहत खरीददारों को कम दामों पर ‘सतयुग गोल्ड कार्ड’ दिया गया था, जिसके 5 साल बाद सोने की एक तय मात्रा की कीमत अदा करने का वादा किया गया था। वादे के चक्कर में जोशी ने 2014 में करीब 19 लाख रुपए में एक किलो सोना खरीदा। लेकिन अब जब उन्होंने अपने उस सोना का भुगतान चाहा तो पता लगा कि कंपनी के ऑफिस में ताला लगा है और कोई भी जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं है।

पोर्न की नई मुसीबत

उक्त मामले वो हैं जिन्हें लेकर शिल्पा शेट्टी पहले भी विवादों में आईं। अब वह राज कुंद्रा की गिरफ्तारी के कारण चर्चा में हैं। मुंबई पुलिस के ज्वाइंट कमिश्नर मिलिंद भरांभे ने राज कुंद्रा मामले में बताया कि फरवरी 2021 में मालवणी पुलिस ने पोर्नोग्राफी मामले में एक केस रजिस्टर्ड किया था। केस में जाँच हुई तो पता चला कि महिला को काम दिलाने व ब्रेक देने के नाम पर बोल्ड सीन करने के लिए कहा गया फिर बोल्ड सीन, सेमी न्यूड और आगे तक बढ़ता गया। मामले में अब तक 11 गिरफ्तारियाँ हुई हैं। कुछ प्रोड्यूसर हैं इसमें जो जबरन ऐसी फिल्में करवाते हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, आगे इस मामले में मुंबई पुलिस शिल्पा शेट्टी को भी समन भेज सकती है। सागरिका शोना नामक एक्ट्रेस ने दावा भी किया है कि राज के ऐसे कामों की शिल्पा को जानकारी थी।

हाईकोर्ट में कुछ, बाहर कुछ: दिल्ली में ऑक्सीजन की कमी से मौत पर केंद्र को घेरने चली थी AAP, खुद के झूठ की ही खोली पोल

अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली दिल्ली की आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार ने आखिरकार कोरोना की दूसरी लहर के दौरान राष्ट्रीय राजधानी में ऑक्सीजन की कमी से मौतों को स्वीकार कर लिया है। दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने बुधवार (21 जुलाई 2021) को केंद्र सरकार को घेरने के फेर में पूर्व में अपनी ही सरकार के बोले एक झूठ पर से पर्दा उठा दिया। जैन ने कहा कि दिल्ली और देश के अन्य जगहों पर ऑक्सीजन की कमी से मौतें हुई हैं। दिलचस्प यह है कि आप सरकार ने हाईकोर्ट को बताया था कि ऑक्सीजन से कोई मौत नहीं हुई है।

जैन ने कहा, ”ऑक्सीजन से हुई मौतों का सही आँकड़ा सामने न आए इसलिए केंद्र सरकार ने LG (उपराज्यपाल) द्वारा दिल्ली सरकार की बनाई समिति भंग करवाई, जिसका काम ही यही था ऑक्सीजन से हुई मौतों का सही आँकड़ा जमा करना और मुआवजा दिलाना।” उन्होंने कहा कहा कि केंद्र सरकार उन लोगों के जले पर नमक ना छिड़के जिनके घर ऑक्सीजन की कमी के कारण मौत हुई है। साथ ही कहा, “दिल्ली और देश के अन्य जगहों पर ऑक्सीजन की कमी के कारण कई मौतें हुई हैं। यह कहना पूरी तरह से गलत है कि ऑक्सीजन की कमी से किसी की मौत नहीं हुई।”

जैन के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए एबीपी न्यूज के पत्रकार विकास भदौरिया ने ट्ववीट किया, ”झूठ पकड़ा गया। केजरीवाल सरकार खुद हाईकोर्ट को लिखित में दे चुकी है कि उसके यहाँ ऑक्सीजन की कमी से कोई मौत नहीं हुई। मई 2021 में हाईकोर्ट में दाखिल जवाब में दिल्ली सरकार ने अपनी चार सदस्यीय कमिटी की रिपोर्ट कोर्ट में पेश की थी और बताया था कि ऑक्सीजन की कमी से कोई मौत से नहीं हुई है।”

गौरतलब है कि दिल्ली सरकार ने 28 अप्रैल को चार सदस्यीय समिति बनाई थी जिसका काम अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी से हुई मौतों के बारे में पता लगाना था। समिति ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में ऑक्सीजन की कमी से मौतों को खारिज करते हुए कहा था कि मरने वाले पहले से ही गंभीर स्थिति में थे। इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट की ओर से नियुक्त की गई ऑडिट टीम की रिपोर्ट से यह बात भी सामने आ चुकी है कि केजरीवाल सरकार ने ऑक्सीजन की डिमांड को बढ़ा चढ़ाकर दिखाया था।

दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार की तरह ही महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ की सरकारों ने भी इस मामले पर राजनीति के लिए कुछ और ही राग अलापा, लेकिन आँकड़े कुछ और दिए हैं। स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंह देव ने छत्तीसगढ़ को ‘ऑक्सीजन सरप्लस राज्य’ करार देते हुए कहा कि कोविड-19 आपदा की दूसरी लहर के दौरान राज्य में ऑक्सीजन की कमी से किसी की मौत ही नहीं हुई। हालाँकि, अपनी बात को पुख्ता करने के लिए उन्होंने आँकड़े पेश करना भी उचित नहीं समझा, बस ऐलान कर दिया कि मौतें हुई ही नहीं हैं। देव ने आगे कहा कि उन्होंने दिल्ली जैसे प्रदेशों के अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी के बारे में सुना, लेकिन यहाँ ऐसा नहीं था।

वहीं, बात करें महाराष्ट्र की तो इसकी कहानी भी जुदा नहीं है। मई 2021 में महाराष्ट्र सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ को स्पष्ट रूप से कहा कि ऑक्सीजन की कमी से राज्य में किसी भी मरीज की मौत नहीं हुई है।