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जब हिन्दू राजा हुआ ‘लव जिहाद’ का शिकार और श्रीविजय बन गया मलक्का सल्तनत, धोखे की आज भी वही कहानी

लव जिहाद कोई नई अवधारणा नहीं है। यह कई सदियों से चली आ रही है एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके चलते मुस्लिमों ने दुनिया भर के कई क्षेत्रों में अपना प्रभुत्व स्थापित किया। दक्षिण-पूर्वी एशिया भी उन क्षेत्रों में से एक है, जहाँ मुस्लिमों ने व्यापार के बहाने कदम रखा और स्थानीय समुदायों में शादियाँ की। 14वीं शताब्दी तक मुस्लिमों को दक्षिण-पूर्वी एशिया के इस्लामीकरण में उतनी सफलता प्राप्त नहीं मिल सकी जितनी वो चाहते थे, लेकिन उन्हें एक ऐसा अवसर प्राप्त हुआ जहाँ से दक्षिण-पूर्वी एशिया का भाग्य बदलने वाला था।

यह अवसर था एक हिन्दू राजा को मुस्लिम बनाने का। लव जिहाद की वर्तमान प्रक्रिया के विपरीत उस समय श्रीविजय (वर्तमान मलेशिया) का राजा परमेश्वर एक महिला के प्रेम जाल में फँस गया और विवाह के लिए उसके सामने मुस्लिम बन जाने की शर्त रखी गई थी। तत्कालीन परिस्थितियों में राजा के सामने दूसरा कोई रास्ता नहीं बचा था। अंततः राजा परमेश्वर बना सुल्तान इस्कंदर शाह और श्रीविजय साम्राज्य बदल गया मलक्का सल्तनत में।

दक्षिण-पूर्वी एशिया में इस्लाम का धीरे-धीरे विस्तार

13वीं से 15वीं शताब्दी के दौरान जब इस्लाम इंडोनेशिया और उसके आसपास के इलाकों में अपनी पैठ जमाने में लगा हुआ था, तब यहाँ तीन बड़े साम्राज्य थे, श्रीविजय (मलेशिया), मजापहित (इंडोनेशिया) और सियाम (थाईलैंड)। इन साम्राज्य के निवासी हिन्दू और बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। इस दौरान मुस्लिम व्यापारियों का इंडोनेशिया और उसके आसपास के द्वीपीय इलाकों में आना-जाना शुरू हो चुका था।

ये व्यापारी भारत होते हुए यहाँ पहुँच रहे थे। उस समय भारत के गुजरात, पश्चिम बंगाल और दक्षिणी इलाकों में अरब व्यापारियों की अच्छी-खासी संख्या थी। इन मुस्लिमों का व्यापार चीन से भी चलता था और इस दौरान रास्ते में पड़ने वाले दक्षिण-पूर्वी द्वीपों पर भी इनकी उपस्थिति बढ़ती गई।

इन मुस्लिम व्यापारियों ने श्रीविजय राज्य के तटीय शहरों मलक्का और पसई में अपनी रिहायश बनानी शुरू कर दी। हालाँकि, ये मुस्लिम व्यापारी केवल व्यापार के उद्देश्य से किसी स्थान पर रुकते ही नहीं थे। इन मुस्लिमों ने उत्तरी सुमात्रा के इन इलाकों में ‘काफिर’ (गैर-इस्लामी के लिए निम्न शब्द) महिलाओं से निकाह करके अपनी संख्या को बढ़ाना शुरू कर दिया। मुस्लिम व्यापारियों का शुरुआती मजहबी मकसद तब पूरा होता हुआ दिखाई दिया, जब उनकी संख्या इतनी बढ़ गई कि उन्होंने पसई और परलैक में 13वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में दो छोटे-छोटे राज्य बसा लिए।

इसके बाद संख्या में बढ़ते मुस्लिमों ने आसपास के इलाकों में भी ‘काफिर’ महिलाओं के खिलाफ एक सुनियोजित जिहाद शुरू कर दिया। ये मुस्लिम स्थानीय संस्कृति का विरोध करने लगे और उसे खत्म करने के लिए लगातार अलग-अलग इलाकों की महिलाओं के साथ निकाह करने लगे।

श्रीविजय राज्य का राजा परमेश्वर:

14वीं शताब्दी के उत्तरार्ध की बात है। श्रीविजय का तत्कालीन राजा परमेश्वर राजधानी पालेमबैंग से शासन करता था, लेकिन उस समय श्रीविजय साम्राज्य कमजोर हो रहा था और मजापहित उसी तेजी से मजबूत। श्रीविजय और मजापहित के संघर्ष के दौरान परमेश्वर को अपनी राजधानी छोड़नी पड़ी और वह तेमासेक आइलैंड आ गया, जिसे उसने अपनी राजधानी बनाई। मजापहित के साथ चल रहे संघर्ष में परमेश्वर के हाथों सियाम के राजकुमार तेमागी की मौत हो गई, जिसके बाद मजापहित के सहयोगी सियाम ने परमेश्वर के खिलाफ अपना संघर्ष और भी तीव्र कर दिया।

मजापहित और सियाम किसी भी हाल में परमेश्वर को पकड़ना और उसे मारना चाहते थे। यही कारण था कि परमेश्वर को तेमासेक आइलैंड भी छोड़ना पड़ा और अंत में वह सन् 1402 में मलक्का आ गया और उसे ही अपने राज्य की राजधानी बनानी पड़ी। मलक्का आने के बाद ही संभवतः अब परमेश्वर और उसके राज्य का भाग्य मुस्लिमों के हाथों में आ चुका था।

राज्य परमेश्वर के खिलाफ लव जिहाद

चूँकि मलक्का एक बड़ा व्यापारिक केंद्र बन चुका था और यहाँ मुस्लिम व्यापारियों का ही बोलबाला था। ये मुस्लिम धीरे-धीरे परमेश्वर के प्रशासन और उसके दरबार में अपनी पैठ बनाने लगे। अच्छी-खासी संख्या में मुस्लिम, सेना में भी शामिल हो गए। इन मुस्लिमों ने परमेश्वर के साथ राजनैतिक फैसलों में भी भाग लेना शुरू कर दिया। इसके बाद मुस्लिम सभासदों और प्रतनिधियों के द्वारा परमेश्वर को यह प्रस्ताव दिया गया कि यदि वह इस्लाम अपना ले तो मजापहित और सियाम के विरुद्ध लड़ने में और अधिक संख्या में मुस्लिम सैनिक उसकी सहायता करेंगे। हालाँकि, परमेश्वर ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया।

एमए खान के द्वारा इस्लामिक जिहाद पर लिखी गई पुस्तक का एक अंश

इसके बाद मुस्लिमों ने नया पैंतरा चला। अरब व्यापारियों ने परमेश्वर को पसई की एक खूबसूरत महिला भेंट की। यह महिला एक अरब मुस्लिम और इंडोनेशिया की स्थानीय महिला की संतान थी। परमेश्वर उस दासी के साथ प्रेम करने लगा। परमेश्वर निःसंतान था। इसी बात का फायदा मुस्लिम प्रतिनिधियों ने उठाया। समय के साथ परमेश्वर और उस दासी महिला के संबंधों के चलते वह महिला गर्भवती हुई।

इसके बाद जब परमेश्वर ने उस महिला को शादी का प्रस्ताव दिया तो पूर्व-नियोजित षड्यंत्र के तहत महिला ने परमेश्वर के सामने शर्त रख दी। शर्त यह थी कि परमेश्वर को इस्लाम कबूल करना पड़ेगा। निःसंतान परमेश्वर के सामने कमजोर हो रहा साम्राज्य था, जिसे मुस्लिम सैनिकों की सहायता की आवश्यकता थी और अपने साम्राज्य के लिए उत्तराधिकारी की भी। अंततः सन् 1410 में राजा परमेश्वर बन गया सुल्तान इस्कंदर शाह और श्रीविजय साम्राज्य के स्थान पर नींव पड़ी मलक्का सल्तनत की।

इस्कंदर शाह के इस सल्तनत की रानी बनी वही महिला दासी। इसके बाद उस महिला और दरबार के मुस्लिम प्रतिनिधियों ने इस्कंदर शाह बन चुके राजा परमेश्वर को एक कट्टर मुस्लिम में बदल दिया। इसके बाद से मलक्का सल्तनत इस्लामिक जिहाद का केंद्र बन गया। यहाँ से दूसरे पड़ोसी राज्यों के लिए भी मुस्लिम सैनिकों को जिहाद के लिए भेजा जाने लगा। इन मुस्लिम सैनिकों का एक ही उद्देश्य था अल्लाह के नाम पर इस्लामिक जिहाद करना और विभिन्न क्षेत्रों का राजनैतिक और सामाजिक इस्लामीकरण करना।

मुस्लिम राज्य के रूप में मलक्का ने न केवल मजापहित और सियाम को जीत लिया बल्कि सुमात्रा, बोर्नियो, वर्तमान सिंगापुर और मलेशिया के द्वीपों पर भी अधिकार कर लिया।

उस समय चीन के मुस्लिमों ने भी दक्षिण-पूर्वी एशिया में इस्लामीकरण की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालाँकि, चीन के मुस्लिम कभी भी सीधे तौर पर जिहाद में शामिल नहीं होते थे, लेकिन वो रणनीति के तहत राज्य सभाओं में और तत्कालीन राज्यों के राजनैतिक गलियारों में भरपूर हस्तक्षेप करते थे। इन चीनी मुस्लिमों की ताकत इनका व्यापार था, क्योंकि उस समय चीन का व्यापार भी भारत की तरह दुनिया के कई हिस्सों से हुआ करता था और खासकर अरब मुस्लिमों से इन चीनी व्यापारियों के संबंध भी बेहतर थे।

राजा परमेश्वर के साथ जो हुआ वो आज भी हो रहा है। आज भी मुस्लिम युवक अपनी पहचान छुपाकर गैर-इस्लामी महिलाओं (अधिकांशतः हिन्दू) महिलाओं को अपने प्रेम जाल में फँसाते हैं, उनके साथ संबंध बनाते हैं, उनका शारीरिक शोषण करते हैं और उनसे शादी करते हैं। इसके बाद कभी ब्लैकमेल करके तो कभी हिंसा के माध्यम से उन गैर-इस्लामी महिलाओं को उनका धर्म छोड़कर इस्लाम कबूल करने के लिए मजबूर करते हैं। महिलाओं से उनकी धार्मिक पहचान छीन ली जाती है।

हालाँकि मध्य प्रदेश, गुजरात और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में लव जिहाद को रोकने के लिए कानून बनाया गया है, जिसके तहत धोखे से धर्मांतरण करने और नाम बदलकर शादी करने जैसे अपराधों के लिए सख्त से सख्त सजा का प्रावधान किया गया है। इसके बावजूद, लव जिहाद के मामले सामने आ रहे हैं, क्योंकि यह एक ऐसी प्रवृत्ति है जो गैर-इस्लामी लोगों को हीन समझती है और उनके सांस्कृतिक एवं नृजातीय धर्मांतरण को जायज ठहराती है।

राजा परमेश्वर के धर्मांतरण की यह घटना एमए खान द्वारा लिखी गई Islamic Jihad: A Legacy of Forced Conversion, Imperialism and Slavery में सभी तथ्यों और जानकारियों के साथ दर्ज है।

चीन में विकसित सिनोवैक वैक्सीन की दोनों डोज ली, फिर भी थाईलैंड में सैकड़ों स्वास्थ्यकर्मी हो गए कोरोना संक्रमित

थाईलैंड के स्वास्थ्य मंत्रालय ने रविवार (11 जुलाई 2021) को बताया कि चीन में विकसित सिनोवैक वैक्सीन की दोनों खुराक लेने के बावजूद 618 चिकित्साकर्मी कोविड-19 संक्रमण के शिकार हो गए हैं। बताया जा रहा है कि एक नर्स की मौत भी हो गई है और एक अन्य चिकित्साकर्मी की हालत गंभीर बनी हुई है।

एक वरिष्ठ स्वास्थ्य अधिकारी सोपोन इमसिरिथवन ने रविवार को एक न्यूज ब्रीफिंग में बताया कि अप्रैल 2021 से जुलाई 2021 तक 6,77,348 चिकित्साकर्मियों को चीन द्वारा विकसित वैक्सीन लगाई गई थी, जिनमें 600 से अधिक कोविड-19 से संक्रमित हो चुके हैं।

इमसिरिथवन ने बताया कि विशेषज्ञ पैनल ने चीनी वैक्सीन की डोज लेने वाले 6,77,348 चिकित्साकर्मियों की इम्युनिटी बढ़ाने के लिए बूस्टर डोज देने की सिफारिश की है। देश का स्वास्थ्य मंत्रालय बूस्टर खुराक के लिए वायरल वेक्टर एस्ट्राजेनेका या एमआरएनए वैक्सीन का इस्तेमाल करेगा। उन्होंने बताया कि ये वायरल वेक्टर एस्ट्राजेनेका होगा या फिर एक एमआरएनए टीका होगा, जिसे थाईलैंड जल्द ही हासिल करेगा। सोपोन इमसिरिथवन ने कहा, “इस मुद्दे पर सोमवार को विचार किया जाएगा।”

यह घोषणा ऐसे समय में हुई है, जब थाईलैंड में कोरोना महामारी की शुरुआत से लेकर अब तक देश में कुल 3,36,371 कोरोना संक्रमण के मामले दर्ज किए गए हैं। वहीं, कुल 2,711 मौतें हुई हैं।

सिंगापुर ने भी जताया था संदेह

पिछले महीने चीन की सिनोवैक वैक्सीन को लेकर सिंगापुर के शीर्ष स्वास्थ्य अधिकारियों ने इसकी प्रभावशीलता पर संदेह जताया था। रिपोर्टों के अनुसार, देश में चीनी वैक्सीन की शुरुआती माँग मजबूत थी, लेकिन सिंगापुर सरकार इसे राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में जोड़ने से हिचकिचा रही थी। इसकी बजाय, देश ने अपने राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम के तहत Pfizer-BioNTech की वैक्सीन और मॉडर्ना द्वारा निर्मित टीके उपलब्ध कराए हैं।

सिंगापुर के चिकित्सा सेवाओं के निदेशक केनेथ माक ने कहा कि वह टीके की प्रभावशीलता से चिंतित थे, क्योंकि अन्य देशों से आने वाली रिपोर्टों से पता चलता है कि जिन लोगों को सिनोवैक शॉट मिला, वे अभी भी कोविड-19 से संक्रमित हो रहे थे। उन्होंने इंडोनेशिया के मामलों का उल्लेख किया, जहाँ चिकित्साकर्मियों और डॉक्टरों को सिनोवैक का टीका लगाया गया था, इसके बावजूद वे कोविड-19 से संक्रमित हुए थे।

इंडोनेशिया के अलावा, बहरीन, यूएई, मंगोलिया, सेशेल्स जैसे देश, जो चीन में विकसित कोविड-19 टीकों पर निर्भर थे, उन देशों में भी कोरोना संक्रमण में वृद्धि देखी गई है। दिलचस्प बात यह है कि अप्रैल 2021 में चीन के एक अधिकारी ने दावा किया था कि उनका वैक्सीन ज्यादा असरदार नहीं है। उन्होंने स्वीकार किया था कि देश में विकसित मौजूदा टीके का प्रभाव कम है। यह कोरोना वायरस संक्रमण में सुरक्षा प्रदान नहीं करता है। इसलिए चीनी विशेषज्ञ इसकी प्रभावशीलता को बढ़ाने के लिए विभिन्न टीकों को मिलाने पर विचार कर रहे थे। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय ट्रायलों और देश की कंपनियों के अनुसार, इन चीनी टीकों की प्रभावशीलता केवल 50% से 79% तक है।

अधिकांश चीनी टीके एक निजी कंपनी सिनोवैक और देश के स्वामित्व वाली फर्म सिनोफार्म द्वारा बनाए जाते हैं। ये टीके मेक्सिको, तुर्की, इंडोनेशिया, हंगरी, ब्राजील, पाकिस्तान और तुर्की सहित दुनिया भर के कई दर्जन देशों में वितरित किए गए हैं।

‘शेर बहादुर देउबा को 2 दिन के भीतर PM नियुक्त कीजिए’: नेपाल के सुप्रीम कोर्ट का राष्ट्रपति को आदेश, ओली को झटका

नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय ने कार्यवाहक प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को बड़ा झटका देते हुए शेर बहादुर देउबा को दो दिन के भीतर देश का प्रधानमंत्री बनाने का आदेश राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी को दिया है। शेर बहादुर देउबा ‘नेपाल कॉन्ग्रेस पार्टी’ के अध्यक्ष हैं। इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने संसद को भंग करने के फैसले को भी पलट दिया है। केपी शर्मा ओली की सरकार ने बीते 6 महीने में दूसरी बार संसद में बहुमत सिद्ध कर पाने में असफल रही है।

मामले की सुनवाई के लिए चीफ जस्टिस जबरा की अध्यक्षता में जस्टिस दीपक कुमार कार्की, मीरा खडका, ईश्वर प्रसाद खातीवाड़ा और डॉ आनंद मोहन भट्टाराई की 5 सदस्यों वाली संवैधानिक पीठ का गठन किया गया था। पीठ ने मंगलवार (13 जुलाई, 2021) शाम 5 बजे तक देउबा को नया प्रधानमंत्री बनाने का आदेश दिया है।

राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने पाँच महीने में दूसरी बार 22 मई, 2021 को 275 सदस्यों वाले निचले सदन को भंग कर दिया था। उन्होंने ये फैसला प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सिफारिश पर लिया था।

इससे पहले देश की राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने विपक्ष को बहुमत साबित नहीं कर पाने पर ओली को दोबारा से कार्यवाहक प्रधानमंत्री बना दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने संसद को भंग करने के लिए दायर याचिकाओं पर अंतिम फैसला सुनाते हुए उस फैसले को पलट दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने 18 जुलाई को संसद की बैठक बुलाने के लिए भी आदेश जारी कर दिया है। दरअसल, बहुमत हासिल करने के लिए वोटिंग हुई थी, लेकिन आपसी मतभेद के चलते विपक्षी फ्लोर टेस्ट पास नहीं कर पाए।

नेपाली प्रतिनिधि सभा के कुल 146 सांसदों ने प्रधानमंत्री की नियुक्ति के लिए देउबा के नाम का आदेश जारी करने की माँग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की थी। शेर बहादुर देउबा के पक्ष में बहुमत आने के बाद शीर्ष अदालत ने उन्हें देश का अगला प्रधानमंत्री बनाने का आदेश दिया।

अब संविधान के अनुच्छेद 76(5) के तहत देउबा को प्रधानमंत्री नियुक्त किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक राष्ट्रपति को मंगलवार को देउबा को प्रधान मंत्री के पद पर नियुक्त करना होगा। इसके बाद सात दिनों में शुरू होने वाले संसद सत्र के दौरान शेर बहादुर देउबा को फ्लोर टेस्ट पास करना होगा। उन्हें अपनी नियुक्ति के 30 दिन के भीतर इसे हर हाल में पास करना होगा।

अगर वो विश्वास मत हासिल कर लेते हैं तो शेष कार्यकाल के लिए वह सरकार को सुचारु रूप से चलाएँगे और उनके नेतृत्व में आगामी चुनाव भी होंगे।

बता दें कि पिछले साल दिसंबर में राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी द्वारा सदन को भंग करने के बाद से नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी में सत्ता संघर्ष चल रहा है।

‘सोशल मीडिया में इस्लामोफोबिक पोस्ट रोकिए’: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- नए IT नियम पढ़िए, होमवर्क कर एक हफ्ते बाद आइए

सर्वोच्च न्यायालय ने सोशल मीडिया में साम्प्रदायिक हैशटैग और इस्लामोफोबिक कंटेंट पर रोक लगाने के लिए दायर याचिका की सुनवाई को अगले सप्ताह के लिए टाल दिया है। मुख्य न्यायधीश एनवी रमणा की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ता को केंद्र सरकार के नए आईटी रूल्स को ठीक से पढ़ने के लिए कहा है। कोर्ट ने कहा है कि जिन मुद्दों को लोग भूल रहें हैं, आप उन्हें फिर से उठाना चाहते हैं। याचिकाकर्ता को नए आईटी एक्ट को पढ़कर होमवर्क करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया गया है।

इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायधीश जस्टिस एनवी रमणा और एएस बोपन्ना की पीठ ने की। वकील खाजा एजाजुद्दीन द्वारा दायर की गई याचिका में इस तरह के पोस्ट सोशल मीडिया पर डालने वालों के खिलाफ एनआईए या सीबीआई से जाँच कराने की माँग की गई है। पिछले साल निजामुद्दीन स्थित तबलीगी जमात से कोरोना संक्रमण के मामले सामने आने और गाइडलाइन उल्लंघन को लेकर जो आक्रोश देखा गया था याचिकाकर्ता को उससे आपत्ति है।

याचिका में कहा गया है, “भारत में चल रहे सभी सोशल मीडिया नेटवर्क को एक खास समुदाय की भावनाओं को आहत करने या अपमानित करने वाले इस्लामोफोबिक पोस्ट या संदेशों को फैलाने से रोकें। नफरत भरे संदेश को फैलाने वाले यूजर और ट्विटर के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने के लिए भारत सरकार को निर्देश दें।”

मामले की सुनवाई शुरू होते ही मुख्य न्यायधीश ने वकील खाजा से पूछा कि जब लोग पहले से ही इन मुद्दों को भूल रहे हैं तो फिर आप इसे फिर से क्यों उठाना चाहते हैं? क्या आपने नए आईटी नियमों को पढ़ा है? इसके जवाब में वकील खाजा ने दावा किया कि केंद्र सरकार द्वारा लाए गए नए आईटी नियम सांप्रदायिक प्रचार को संबोधित नहीं करता है। इस पर सीजेआई ने कहा कि याचिकाकर्ता नए नियमों को दिखाएँ और बताएँ कि उसमें इसके बारे में कुछ नहीं कहा गया है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता वकील को सही तरीके से होमवर्क करने की नसीहत दी है।

इसके साथ ही मुख्य न्यायधीश ने सुनवाई के दौरान कहा कि इसी तरह की एक याचिका जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने भी दायर की थी। बता दें कि इससे पहले याचिकाकर्ता ने तेलंगाना हाईकोर्ट में भी यही याचिका दायर की थी, लेकिन वहाँ याचिका खारिज कर दी गई।

हिन्दुओं के हत्यारे गाजी मियाँ के दर पर ओवैसी और ओमप्रकाश राजभर: राजा सुहेलदेव ने किया था अंत, चेले कहते थे ‘बालेमियाँ कृष्ण’

हाल ही में अपने उत्तर प्रदेश दौरे पर बहराइच पहुँचे AIMIM के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी ने गाजी सैयद सालार मसूद की मजार पर जाकर चादर चढ़ाई। इसे लेकर वहाँ की राजनीति में बवाल मचा हुआ है। उत्तर प्रदेश सरकार में पिछड़ा मामलों के कैबिनेट मंत्री अनिल राजभर ने इसे महाराजा सुहेलदेव का अपमान बताया है। बता दें कि असदुद्दीन ओवैसी ने यूपी में ओमप्रकाश राजभर को अपना साथी बनाया है।

राजभर समुदाय महाराजा सुहेलदेव को अपना पूर्वज मानता है और इस समाज में उनका विशेष सम्मान है। अनिल राजभर ने कहा कि देश के लुटेरों और आक्रांताओं का सम्मान और महापुरुषों के अपमान को इन लोगों ने एक फैशन बना लिया है। असल में जब असदुद्दीन ओवैसी गाजी सैयद सालार मसूद की मजार पर चादर चढ़ा रहे थे, तब ओमप्रकाश राजभर भी उनके साथ मौजूद थे। इससे उनके दोहरे रवैये पर सवाल उठ रहे हैं।

अनिल राजभर का कहना है कि राष्ट्रवीर महाराजा सुहेलदेव ने जिस विदेशी आक्रांता गाजी सैयद सालार मसूद को परास्त किया था, उसी की मजार पर चादर चढ़ाकर असदुद्दीन औवैसी और ओम प्रकाश राजभर ने राजभर समाज के स्वाभिमान पर चोट की है। वहीं उत्तर प्रदेश के पूर्व DGP व राज्यसभा सांसद ने कहा कि गाजी सैयद सालार मसूद ने हिन्दुओं का कत्लेआम किया था और धर्म ग्रंथों को तहस-नहस किया था।

उन्होंने बताया कि उसे महाराजा सुहेलदेव ने सन् 1034 के एक युद्ध में मार गिराया था। उन्होंने जानकारी कि गाजी भारत में कई बार आक्रमण करने वाले मौमूद गजनवी का भांजा था। उन्होंने पूछा कि वहीं पर सुहेलदेव की भी प्रतिमा है, लेकिन ओवैसी वहाँ क्यों नहीं गए? उन्होंने ओमप्रकाश राजभर की चुप्पी को दर्दनाक बताते हुए कहा कि इन्होंने तुष्टिकरण की हदें पार कर दी हैं। उन्होंने बताया कि इस्लामी आक्रांता फिरोजशाह तुगलक ने उसका मजार बनवाया था।

गाजी सैयद सालार मसूद का इतिहास: इस्लामी आक्रांता, जिसे दिखाया गया संत

जैसा कि हम अजमेर के ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के बारे में जान चुके हैं, उसने पृथ्वीराज चौहान के खिलाफ जिहाद के लिए भारत का रुख किया था। ठीक उसी तरह गाजी सैयद सालार मसूद का भी भारत में आना इसी तरह की साजिश का हिस्सा था। इस्लामी आक्रांताओं का गुणगान करने वाले वामपंथियों की मानें तो हिन्दू उसे प्यार से ‘बाले मियाँ’ और ‘हठीला’ कहते थे, बाल श्रीकृष्ण से उसकी तुलना करते थे।

उसने ज़ुहरा बीबी नाम की एक लड़की से शादी की थी। दावा किया जाता है कि उसने उस लड़की का अंधापन ठीक कर दिया था। हालाँकि, आपको भारत में आए सूफियों और फकीरों के बारे में कई ऐसी कहानियाँ मिलेंगी, जहाँ उन्होंने किसी लड़की या उसके परिवार पर इस तरह का ‘चमत्कार’ कर के उससे शादी की हो। इतिहासकार एना सुवोरोवा ने तो गाजी मियाँ की तुलना श्रीकृष्ण और श्रीराम तक से कर दी है और कहा है कि हिन्दू उसे इसी रूप में देखते थे।

बहराइच ही नहीं, बल्कि कई स्थानों पर उसके मजार बनवाए गए और साथ ही उसके मकबरे को सारे धर्मों के मेल वाला स्थल घोषित करने की माँग होती रही है। गाजी सैयद सालार मसूद बचपन से ही एक योद्धा के रूप में प्रशिक्षण ले रहा था और इस्लाम के प्रति कट्टरता का भाव उसके मन में भरता ही जा रहा था। मीरत-ए-मसूदी में उसका इतिहास मिलता है। इसमें बताया गया है कि महमूद गजनवी को सोमनाथ का मंदिर ध्वस्त करने की सलाह गाजी ने ही दी थी।

अपनी युद्धकला और इस्लाम के प्रचार-प्रसार की ललक के कारण महमूद गजनवी बचपन से ही उसकी बात मानता था। इसीलिए, जब उसने भारत पर आक्रमण की अनुमति माँगी और यहाँ इस्लाम को फैलाने की बात की तो उसे इजाजत दे दी गई। मात्र 16 वर्ष की उम्र में उसने सिंधु नदी को पार कर के मुल्तान पर अपना कब्ज़ा जमा लिया और 18 महीने बाद वो दिल्ली आ धमका। मामा गजनी की फ़ौज की सहायता से वो 6 महीने तक दिल्ली में रहा।

इसके बाद वो मेरठ के लिए निकल गया। शुरुआती दिक्कतों के बाद उसे वहाँ ही जीत नसीब हो गई। इसके बाद वो कन्नौज गया, जहाँ के राजा ने एक दोस्त की तरह उसका स्वागत किया। ‘Gazetteer of the Province of Oudh, Volume 1‘ पुस्तक के अनुसार, यहाँ कुछ दिन बिताने के बाद वो सतरिख पहुँचा। आज के बाराबंकी स्थित ये जगह उस समय देश के सबसे फूलते-फलते नगरों में से एक था, ऐसे में इसका आक्रांताओं की नजर इस पर लगनी ही थी।

हालाँकि, इतिहासकारों में इसे लेकर मतभेद है कि वो जगह सतरिख आज की बाराबंकी वाली है या फिर अयोध्या। जहाँ गाजी मसूद पहुँचा, वो हिन्दुओं के लिए के लिए एक पवित्र जगह हुआ करती थी। यहाँ आकर उसे चारों तरफ अपने आदमियों को भेज कर इस्लाम का प्रचार-प्रसार करने को कहा। बहराइच में अपने और अपनी फ़ौज के लिए वो सिद्धौर और अमेठी से सप्लाई मँगाता था। उसने वाराणसी से लेकर कई जगहों पर अपने दूत भेजे।

बहराइच और मानिकपुर के कुछ सरदारों ने जरूर उससे युद्ध किया, लेकिन तब तक उसका अब्बा सालार साहू अपनी फ़ौज लेकर वहाँ आ पहुँचा था और उसने बेटे की राह आसान कर दी। बहराइच के बगल में ही एक सूर्य मंदिर और कुंड हुआ करता था। हिन्दू वहाँ पूजा-पाठ करते थे। उसने वहाँ पर ‘काफिरों’ को सबक सिखाने के लिए एक मस्जिद बनवाने की घोषणा की, लेकिन तब तक विपक्षी सेना की कमान राजा सुहेलदेव के हाथ में आ चुकी थी।

भारत के गर्व राजा सुहेलदेव ने जैसे ही गाजी सैयद सालार मसूद के विरुद्ध मोर्चा संभाला, हिन्दू सेना एक हो गई और उनके भीतर नया जोश भर गया। 15 दिनों से भी अधिक के युद्ध के बाद राजा सुहेलदेव उसके कैम्प के पास पहुँचे और उसे उसके कई साथियों सहित मार गिराया। इसके बाद उसके अनुयायियों ने उसी सूर्य मंदिर वाली जगह या उसके आसपास में उसे दफना दिया। हालाँकि, इस्लामी इतिहासकारों ने इस बेइज्जती को अपने इतिहास में जगह ही नहीं दी।

मिरत-ए-मसूदी में महमूद गजनी द्वारा सोमनाथ पर हमले का महिमामंडन किया गया है। वामपंथी इतिहासकार कहते हैं कि राजा सुहेलदेव का गाजी मियाँ के साथ युद्ध हुआ ही नहीं। कुछ कहते हैं कि उसका इतिहास कई सालों बाद लिखे जाने के कारण स्पष्ट नहीं है तो कुछ ये दलील देते हैं कि महमूद गजनी के इतिहास में उसका जिक्र नहीं है। जबकि आमिर खुसरों जैसों ने भी अपनी लेखनी से इस्लाम के प्रचार के लिए उसका गुणगान किया है

ब्रिटिश काल में अंग्रेज अधिकारी भी ये देख कर हैरान थे कि जिस गाजी मियाँ ने हिन्दुओं पर अत्याचार किया, उसी की मजार पर हिन्दू जाते हैं। प्रोफेसर डीसी बेली का कहना है कि गाजी मियाँ को ‘भगवान’ बनाए जाने के लिए उस समय के पिछड़ों का धर्मांतरण किया गया होगा और उनके मन में गाजी के प्रति ये भाव भरा गया होगा। अंग्रेज विलियम स्लीमन ने कहा था कि हिन्दुओं को मौत के घाट उतारने वाले गाजी की मजार पर हिन्दू-मुस्लिम दोनों जाते हैं।

कम्युनिस्ट तानाशाही के खिलाफ क्यूबा में लोगों का फूटा गुस्सा: सड़कों पर उतर कर किए प्रदर्शन, आजादी के लगाए नारे

क्यूबा में रविवार (11 जुलाई 2021) को देश में कम्युनिस्ट तानाशाही का अंत, आजादी की माँग और देश में बिगड़ते आर्थिक हालातों को लेकर हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। रिपोर्ट्स के अनुसार, एक सप्ताह तक बिजली गुल रहने के कारण भी लोगों का गुस्सा फुट पड़ा। बड़ी संख्या में लोगों ने सुरक्षाबलों की भारी मौजूदगी के बीच शहर के कई हिस्सों में सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किए, जो पिछले कई दशकों में पहली बार हुआ है।

दरअसल, क्यूबा की जनता देश में वैक्सीन की कमी और कोरोना संकट पर सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रही है। बताया जा रहा है कि कोविड-19 की टीकाकरण की धीमी गति, खाने के लिए लंबी लाइनें, दवाओं की कमी और सरकार की कथित लापरवाही को लेकर यहाँ के लोगों में रोष व्याप्त है। यही कारण है कि हजारों लोग सड़कों पर निकलकर क्यूबा में कम्युनिस्ट शासन को समाप्त करने की माँग कर रहे हैं।

प्रदर्शनकारियों में शामिल मुख्य रूप से युवाओं ने राष्ट्रपति मिगेल डियाज कैनेल का अपमान किया, जो इस कार्यक्रम में आए थे। ऑनलाइन पोस्ट किए गए वीडियो में प्रदर्शनकारियों को सभी प्रोटोकॉल को धता बताते हुए ‘कोविड-19 वायरस से हम डरते नहीं हैं’ कहते हुए और ‘आजादी’ के नारे लगाते हुए सुना जा सकता है।

हवाना की सीमा से लगे आर्टेमिसा प्रांत में सैन एंटोनियो डी लॉस बानोस नगरपालिका में पहली बार विरोध प्रदर्शन की शुरुआत हुई। सोशल मीडिया पर शेयर किए गए वीडियो में लोगों को सरकार विरोधी नारे लगाते हुए और कोरोनो वायरस वैक्सीन की माँग से लेकर रोजाना बिजली कटौती बंद करने के लिए अपनी आवाज बुलंद करते देखा जा सकता है।एक स्थानीय निवासी ने कहा कि वे ब्लैकआउट का विरोध कर रहे हैं। दरअसल, वामपंथी तानाशाही वाला क्यूबा पिछले कई सालों से भारी आर्थिक संकट से गुजर रहा है।

इसके अतिरिक्त, हैशटैग #SOSCuba के तहत एक सोशल मीडिया कैंपन चलाया जा रहा है। यहाँ के नागरिकों और कुछ रैप सितारों के सहयोग से सोशल मीडिया पर ट्रेंड भी कर रहा है। इसमें सरकार से देश में जरूरी चीजों के लिए विदेशी दान लेने का अनुरोध किया गया है।

क्यूबा में प्रदर्शनकारी। फोटो: द डेली वायर

पहले से ही आर्थिक संकट से जूझ रहे क्यूबा की कोरोना महामारी ने कमर तोड़ दी है। इस दौरान देश की हालत और भी बदतर हो गई है। यहाँ की जनता कम्युनिस्ट शासन से त्रस्त है। रिपोर्ट्स के अनुसार, कम्युनिस्ट देश क्यूबा पिछले 30 वर्षों के सबसे खराब आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है।

अमेरिका पर आरोप

राष्ट्रपति डियाज कैनेल, जो कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुख भी हैं, उन्होंने राष्ट्र को संबोधित करते हुए इस अशांति के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका को दोषी ठहराया। क्यूबा के राष्ट्रपति ने दावा किया कि बहुत से प्रदर्शनकारी नेक नीयत थे, लेकिन वे अमेरिका द्वारा रचे गए सोशल मीडिया अभियानों और धरातल पर मौजूद भाड़े के सैनिकों के बहकावे में आ गए। उन्होंने चेतावनी दी कि भविष्य में ऐसे उकसावों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के एक रिपोर्टर, ने पुलिस को कुछ प्रदर्शनकारियों पर मिर्ची स्प्रे का छिड़काव करते और कुछ अन्य को लाठियों से पीटते देखा। प्रदर्शनकारियों ने ‘आजादी’ और ‘डियाज कैनेल पद छोड़ो’ जैसे नारे लगाए। हवाना शहर में हजारों लोगों के जमा होने पर कुछ की गिरफ्तारियाँ भी हुईं। क्यूबा में रविवार को कोरोना के 6900 नए नए मामले सामने आए और 47 मौतें दर्ज की गईं। देश में वर्तमान में दो टीके हैं और बड़े पैमाने पर टीकाकरण अभियान शुरू किया गया है।

बता दें कि क्यूबा की अर्थव्यवस्था अधिकांशत: पर्यटन पर निर्भर करती है। वहीं, खाद्य, ईंधन और कृषि व विनिर्माण के लिए उपकरण का बड़े पैमाने पर आयात किया जाता है।

शिवसेना ने सहकारिकता की कमान अमित शाह को देने का किया समर्थन, पवार ने कहा था- केंद्र को हस्तक्षेप का अधिकार नहीं

केंद्र सरकार ने हाल ही में सहकारिता मंत्रालय (Cooperation Ministry) का गठन किया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को इसकी जिम्मेदारी दी गई है। इस पर सोमवार (12 जुलाई 2021) को शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ में कहा गया कि अगर शाह इसके जरिए कुछ नया करना चाहते हैं तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। हालाँकि इससे एक दिन पहले महाराष्ट्र की महा विकास अघाड़ी (MVA) सरकार में साझीदार राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (NCP) के मुखिया शरद पवार ने बयान दिया था कि राज्य में सहकारिता विभाग में नियम-कानून महाराष्ट्र के कानून के हिसाब से चलेगा और केंद्र सरकार को इसमें हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है।

शिवसेना ने सामना में कहा है यदि कोई यह कहता है कि केंद्र सरकार ने भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए सहकारी संस्थाओं को अपने अधिकार में लिया है तो यह एक तरह से अपमान की बात है, क्योंकि शाह खुद गुजरात में सहकारिता आंदोलन से जुड़े रहे हैं और निश्चित तौर पर केंद्र के पास इन सहकारी संस्थाओं के माध्यम से राज्यों में विकास कार्यों को बढ़ाने की योजनाएँ हैं।

सामना में कहा गया, “ग्रामीण विकास और सहकारिता, ये दोनों जमीनी मंत्रालय हैं जिनके माध्यम से सीधे तौर पर लोगों का विकास किया जा सकता है और यह गुजरात एवं महाराष्ट्र में देखा भी गया है। हालाँकि शाह के पास गृह मंत्रालय है लेकिन वह संभवतः सहकारिता के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचना चाहते हैं। शाह पहले भी गुजरात की सहकारी संस्थाओं से जुड़े रह चुके हैं और यदि अब वो इसके माध्यम से कुछ नया करना चाहते हैं तो हमें इसका स्वागत करना चाहिए।”

ज्ञात हो कि मनमोहन सिंह की सरकार में देश के कृषि मंत्री रहे शरद पवार ने नए सहकारिता मंत्रालय पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि राज्य में सहकारिता विभाग में नियम-कानून महाराष्ट्र के कानून के हिसाब से चलते हैं और महाराष्ट्र विधानसभा द्वारा ड्राफ्ट किए गए कानून में हस्तक्षेप करने का केंद्र सरकार को कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा था कि केंद्र में नए सहकारिता मंत्रालय के गठन से समस्याएँ पैदा होने की आशंका नहीं है, क्योंकि ये तो राज्य का मुद्दा है।

हालाँकि महाराष्ट्र में सहकारिता आंदोलन भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुका है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने महाराष्ट्र स्टेट कोऑपरेटिव बैंक स्कैम (MSCB) में 25,000 करोड़ रुपए के घोटाले के मामले में अजीत पवार के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग के तहत केस दर्ज किया था। 2019 में खबर आई थी कि एक गवाह के बयान के बाद ED ने शरद पवार का नाम भी इस घोटाले के आरोपितों में शामिल किया था। उक्त गवाह ने अपने बयान में बताया था कि कैसे शरद पवार ने इस घोटाले में बड़ी भूमिका निभाई थी।

शिवसेना का बयान ऐसे समय आया है जब कॉन्ग्रेस समेत कई विपक्षी पार्टियाँ नया सहकारिता मंत्रालय बनाए जाने और विशेष रूप से इसकी जिम्मेदारी अमित शाह को दिए जाने का विरोध कर रही हैं। कॉन्ग्रेस का कहना है कि केरल, कर्नाटक और महाराष्ट्र से लेकर बंगाल तक की सहकारी संस्थाओं में भाजपा का प्रभाव बढ़ाने के लिए ऐसा किया गया है। कॉन्ग्रेस के अलावा CPI(M) के नेता और दो बार केरल के वित्त मंत्री रहे थॉमस इसाक भी चिंतित हैं। चार बार के विधायक ने कहा कि इसका कुछ गलत उद्देश्य है। उन्होंने आरोप लगाया कि अमित शाह ने गुजरात के सहकारी बैंकों पर ‘कब्ज़ा’ कर लिया था। दरअसल विपक्ष को डर इस बात का है कि सहकारिता से विकास का मंत्र पूरे भारत में लागू होने पर गरीब किसान और लघु व्यवसायी बड़ी संख्या में सशक्त होंगे, जिससे भाजपा और मजबूत होगी।

कम्युनिस्टों का केरल मॉडल महिलाओं का काल: लव जिहाद, चर्च में शोषण, वामपंथियों की घिनौनी नजर; खतरा चौतरफा

देश में वामपंथियों का बचा एकमात्र गढ़ केरल महिलाओं के खिलाफ बढ़ते खतरे को लेकर चर्चा में है। ट्विटर पर #JusticeforKeralagirls ट्रेंड कर रहा है। लोग एक 6 साल की बच्ची के साथ हुई बर्बरता से आहत हैं। अपनी बच्चियों को, घर की महिलाओं को को वामपंथ के घोले जहर और इस्लामी कट्टरता से बचाना चाहते हैं।

पिछले दिनों वेंदीपेरियार में एक 6 साल की मासूम की रेप के बाद हत्या कर दी गई। मामला खुला तो वर्तमान विधायक उसकी पोस्टमॉर्टम का विरोध करने लगे। तमाम अवरोध के बाद भी जब जाँच आगे बढ़ी तो पता चला घिनौने काम को अंजाम देने वाला कोई और नहीं, बल्कि माकपा का ही कार्यकर्ता था जिसने बच्ची का शोषण किया और बाद में उसे नरकीय प्रताड़ना देते हुए मारा। आज उसी बच्ची के साथ हुई निर्ममता का गुस्सा था कि ग्रामीणों ने पुलिस से भिड़कर आरोपित को पीटा।

यह हालिया घटना केवल एक मामला नहीं है जिसके आधार पर लोग वामपंथ के केरल मॉडल को कोस रहे हैं। इंटरनेट पर यदि सर्च करने जाएँ तो ऐसे तमाम मामले हैं जिनसे स्पष्ट है कि राज्य में महिलाएँ कई तरह के खतरों से जूझ रही हैं। केरल पुलिस की आधिकारिक साइट के अनुसार मई 2021 तक राज्य में 886 रेप के मामले, 1437 मोलेस्टेशन के केस, किडनैपिंग के 75, छेड़छाड़ के 149, घरेलू हिंसा के 1159, और अन्य अपराधों की सूची में 1502 मामले दर्ज हुए थे। कुल मिलाकर केवल 2021 के शुरुआती 5 महीनों में दर्ज हुए अपराधों की संख्या 5208 है। पिछले साल केरल में महिलाओं के ख़़िलाफ़ हुए अपराधों के 12,659 मामले प्रकाश में आए थे।

केरल में महिलाओं के खिलाफ क्राइम, साभार: केरल पुलिस

भाजपा के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने ट्वीट कर कहा है, “सीपीआईएम के केरल मॉडल ने महिलाओं और लड़कियों के लिए राज्य को असुरक्षित कर दिया है। संख्या आप को चौंका देगी।” उनके अनुसार वामपंथ के केरल मॉडल में दलित महिलाओं को निशाना बनाना आसान है।

बता दें कि 6 वर्ष की बच्ची के साथ हुआ दुष्कर्म पहला ऐसा मामला नहीं है जहाँ माकपा के कार्यकर्ता आरोपित मिले हों। अभी पिछले महीने ही केरल के कोझीकोड जिले में पुलिस ने सीपीएम के दो नेताओं के खिलाफ दुष्कर्म का मामला दर्ज किया गया था। आरोप लगाने वाली महिला पार्टी की ब्रांच कमिटी मेंबर थी। इस मामले में पहले आरोपित की पहचान पुलुल्ला परमबथ बाबुराज सीपीएम मुल्लियेरी ब्रांच के सचिव के तौर पर हुई थी, जबकि दूसरा आरोपित टीपी लिजीश पार्टी के यूथ विंग डीवाईएफआई (DYFI) का पथियाराक्कारा क्षेत्र का सचिव था। 

इसके अलावा साल 2019 में सत्तारूढ़ मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा/CPM) नेता कोदियेरी बालाकृष्णन के बड़े बेटे बिनॉय कोदियेरी के खिलाफ मुंबई की एक महिला ने बलात्कार का मामला दर्ज किया था। इसी तरह उसी साल एक  20 साल की लड़की ने बताया था कि केरल के पलक्कड़ जिले में माकपा के क्षेत्रीय समिति कार्यालय में उसके साथ बलात्कार किया गया था।

केरल से रिपोर्ट होने वाले ऐसे रेप, शोषण और अत्याचार के मामलों की सूची बहुत लंबी है। सिर्फ सीपीएम सदस्य ही नहीं बल्कि केरल से चर्च में महिलाओं के साथ शोषण के मामले लगातार आते रहे हैं। लव जिहाद की घटना भी धड़ल्ले से हो रही है। केरल के पूर्व कॉन्ग्रेसी नेता पीसी जॉर्ज का दावा है कि अकेले उनके निर्वाचन क्षेत्र में 47 लड़कियाँ लव जिहाद का शिकार हुईं थी। वलसाड जिले के भाजपा उपाध्यक्ष विवेक राय का कहना है कि केरल में 5 माह में 1513 रेप की घटनाएँ हुई है और 15 बच्चों ने अपनी जान गँवाई है।

सेनारी नरसंहार में सबको बरी करने के फैसले की सुनवाई करेगा सुप्रीम कोर्ट, 34 लोगों की गला रेत और पेट चीर कर दी गई थी हत्या

सेनारी नरसंहार (Senari Massacre) को लेकर बिहार सरकार की याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने मँजूर कर लिया है। बिहार सरकार ने सभी आरोपितो को बरी किए जाने के पटना हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।

सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार से सबसे पहले सभी 13 बरी आरोपितों को याचिका की कॉपी देने को कहा है। साथ ही सभी को नोटिस भेजने के निर्देश दिए हैं। बता दें कि पटना हाई कोर्ट ने 22 मई को निचली अदालत से दोषी ठहराए गए 13 आरोपितों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया था। साथ ही सभी को तुरंत जेल से रिहा करने का आदेश दिया था। 

जिला कोर्ट ने 10 दोषियों को फाँसी और तीन को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। जिला कोर्ट के फैसले को पटना हाई कोर्ट के जस्टिस अश्विनी कुमार और अरविंद श्रीवास्तव की पीठ ने रद्द कर दिया। इस केस में कुल 70 लोगों को आरोपित बनाया गया था, जिनमें से 4 की मौत हो चुकी है। बिहार सरकार ने हाई कोर्ट के आदेश पर रोक की माँग करते हुए कहा कि शीर्ष अदालत से मामले के निपटारे तक सभी 13 को आत्मसमर्पण करने का निर्देश देने की अपील की थी।

सेनारी में क्या हुआ था उस दिन

18 मार्च 1999 की रात प्रतिबंधित नक्सली संगठन माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) के उग्रवादियों ने सेनारी गाँव को घेर लिया। 500-600 उग्रवादी रात के वक्त गाँव में घुसे। घरों से मर्दों को खींचकर बाहर निकाला गया। उन्हें तीन ग्रुप में बाँटकर गाँव के बाहर ले जाया गया। रिपोर्टों के अनुसार लाइन में खड़ा कर बारी-बारी से सबका गला काटा गया और पेट चीरा गया था।

दैनिक भास्कर को 5 साल पहले इस हमले में बचे कुछ लोगों ने आपबीती बताई थी। राकेश शर्मा ने बताया था कि हमलावर धारदार हथियार से एक-एक कर सबको गर्दन रेतकर जमीन पर गिरा रहे थे। उन्होंने बताया था कि हमलावर नशे में थे जिसकी वजह से उनकी जान बच गई थी। पेट पर गहरे वार की वजह से राकेश की आँत का कुछ हिस्सा बाहर आ गया था। वहीं संजय ने बताया था कि एक हमलावर ने उन पर भी वार किया, लेकिन वे किसी तरह से बच गए। जल्दबाजी में हमलावरों ने उन्हें दूसरे झटके में बिना काटे शवों के ढेर में धकेल दिया था।

इस नरसंहार में मरने वाले लोग भूमिहार थे। 300 घर वाले इस गॉंव में 70 भूमिहार परिवार रहते थे। उस समय बिहार ने इस तरह के कई नरसंहार देखे थे। ऐसे ही एक नरसंहार के कारण 1998 में राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था। लेकिन कॉन्ग्रेस के विरोध के कारण 24 दिनों में ही दोबारा राबड़ी सरकार बहाल हो गई थी।

800 साल पुरानी परंपरा का अंत, रथ यात्रा से पहले पुरी के जगन्नाथ मंदिर की अंतिम देवदासी पारसमणि का निधन

ओडिशा में शनिवार (10 जुलाई 2021) को महरी पारसमणि के निधन के साथ ही पुरी के जगन्नाथ मंदिर में 800 साल से अधिक पुरानी देवदासी परंपरा का अंत हो गया। 92 वर्षीय देवदासी पारसमणि पुरी में भगवान जगन्नाथ की अंतिम जीवित सेविका थीं।

पारसमणि बीते आठ दशकों से अधिक समय से मंदिर की सेवा कर रही थीं। लगभग 80 साल तक सेवा करने के बाद वर्ष 2010 में उन्हें वृद्धावस्था के चलते भगवान जगन्नाथ के समक्ष गीतगोविंद का पाठ करने की सेवा बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ा। शनिवार को लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया। सोमवार (12 जुलाई 2021) को स्वर्गद्वार में उनका अंतिम संस्कार किया गया, जो कि बहुप्रतीक्षित रथ यात्रा का प्रतीक है। पारसमणि शहर के बलिसाही क्षेत्र में लोगों के सहयोग से किराए के मकान में रह रही थीं।

दरअसल, सदियों पुरानी इस परंपरा के अंत की शुरुआत राजशाही के हटने के साथ ही हो गई थी। ओडिशा सरकार ने 1955 में एक अधिनियम के जरिए पुरी के शाही परिवार से मंदिर का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया था। इसी के साथ ही पारसमणि को अंतिम जीवित सेवक बना दिया गया।

देवदासी या महरी प्रथा

देवदासी प्रथा के अनुसार, 12वीं सदी के जगन्नाथ पुरी मंदिर में महरी भगवान के लिए भजन गाती थीं या नृत्य करती थीं। इन देवदासियों का विवाह भगवान जगन्नाथ, जिन्हें नीलमाधव भी कहा जाता है, से हुआ था। इन देवदासियों ने भगवान को ‘दिव्य पति’ के रूप में स्वीकार किया और जीवन भर कुँवारी कन्या रहीं। इसलिए, महरी परंपरा को बरकरार रखने के लिए एक महरी को नाबालिग लड़की को गोद लेना पड़ता था और उसे सेवा में शामिल करने से पहले नृत्य, गायन और वाद्य यंत्र बजाने का प्रशिक्षण देना पड़ता था।

देवदासी प्रथा के बारे में बताते हुए एक लेख में कहा गया है, “भगवान के सोने जाने से पहले नृत्य व गायन प्रस्तुत किया जाता था। यह भगवान जगन्नाथ के प्रति विश्वास का सांस्कृतिक प्रतीक है, जो गायन और कला के विभिन्न रूपों का उच्चारण कर आत्मा को शुद्ध किया जाता है।” यह एक ऐसा अनुष्ठान है, जिसे केवल महिलाओं को ही करना होता है।

प्रथा का अंत

रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि मंदिर के रिकॉर्ड ऑफ राइट्स (ROR) के मुताबिक, करीब 100 साल पहले तक पुरी में 25 देवदासी थीं। 1956 के उड़ीसा राजपत्र में नौ देवदासियों और 11 गायकों को मंदिर में सूचीबद्ध किया गया था।

पारसमणि जब सात साल की थीं, तभी से उन्होंने देवदासी के तौर पर प्रशिक्षण शुरू कर दिया था। कुंडामणि देवदासी ने उन्हें गोद ले लिया था। 1980 में जगन्नाथ पुरी मंदिर में केवल चार देवदासी ही थीं। इनमें हरप्रिया, कोकिलाप्रव, परसमणि और शशिमणि शामिल थीं। भगवान जगन्नाथ की ‘मानव पत्नी’ और एक अकेली महिला सेविका मानी जाने वाली शशिमणि की 2015 में मृत्यु हो गई थी।