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हॉरर फिल्मों के ‘सरताज’ कुमार रामसे का निधन: 85 साल की उम्र में पड़ा दिल का दौरा

बॉलीवुड के सुपरस्टार दिलीप कुमार के इंतकाल के बाद गुरुवार (8 जुलाई 2021) को बॉलीवुड इंडस्ट्री के मशहूर निर्माता-निर्देशक कुमार रामसे का निधन हो गया। दिल का दौरा पड़ने के कारण 85 वर्षीय कुमार ने आज सुबह आखिरी साँस ली। कुमार रामसे के भतीजे अमित रामसे के मुताबिक, “उनको गुरुवार सुबह करीब 5:30 बजे दिल का तेज दौरा पड़ा और उन्होंने हीरानंदानी स्थित अपने घर पर ही अंतिम साँस ली।”

बता दें कि 70 और 80 के दशक में हॉरर फिल्मों का सरताज रामसे ब्रदर्स (कुमार, तुलसी, श्याम, केशू, किरण, गंगू और अर्जुन) को माना जाता था। सात भाइयों में कुमार सबसे बड़े थे। वे अधिकांशत: फिल्मों की स्क्रिप्टिंग का काम करते थे। पुराना मंदिर, साया, खोज जैसी फिल्मों में उनका काम देखते बनता है। 

कुमार के दो छोटे भाइयों, तुलसी का 2018 में और श्याम रामसे का 2019 में देहांत हो गया था। इसके बाद तीसरे भाई अर्जुन, जिनके जिम्मे पोस्ट प्रोडक्शन का काम और एडिटिंग का जिम्मा आता था उनकी मृत्यु भी 2019 में हो गई थी। किरण रामसे जो साउंड डिपार्टमेंट देखते थे उनका निधन 2017 में हुआ था, जबकि केशू रामसे ने अपनी आखिरी साँस 2010 में ली थी।

जानकारी के मुताबिक, जीवन के आखिरी दिनों में कुमार अपने बीवी बच्चों के साथ रह रहे थे। उनके साथ उनकी पत्नी शीला और तीन लड़के राज, गोपाल, सुनील थे। बतौर निर्देशक और निर्माता उन्होंने कई फिल्में लिखीं, साथ ही उनका निर्देशन भी किया। अंधेरा, दरवाजा, और कौन, सबूत, गेस्ट हाउस, दहशत, पुराना मंदिर, टेलीफोन, सामरी, डाक बंगला, साया और खोज फिल्मों की स्क्रिप्ट उन्होंने ही लिखी थी।

रामसे ब्रदर्स की जीवनी ‘डोंट डिस्टर्ब द डेड: द स्टोरी ऑफ़ द रामसे ब्रदर्स’ के अनुसार, 1947 में विभाजन के बाद उनका परिवार मुंबई आया था। मुंबई आने के बाद उनके पिता एफयू रामसे ने एक इलेक्ट्रॉनिक दुकान खोली थी, लेकिन बाद में वह फिल्मों की ओर मुड़ गए। सिनेमा जगत में सातों भाइयों ने अपने पिता के नक्शे-कदम पर चलते हुए फिल्में बनाना शुरू किया और एक दौर ऐसा आया जब कम बजट में कल्ट और उस समय के मुताबिक जबरदस्त हॉरर फिल्में रामसे भाइयों ने बॉलीवुड को दीं।

आज कुमार रामसे के जाने से बॉलावुड में एक बार फिर शोक पसर गया है। अभी कल ही दिलीप कुमार का लंबे समय तक बीमार रहने के बाद निधन हुआ था। दिलीप कुमार को पिछले 1 महीने में 2 बार अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 5 जुलाई 2021 को उनके आधिकारिक ट्विटर हैंडल से जारी किए गए अपडेट में उनकी पत्नी सायरा बानो ने बताया था कि उनकी हालत में सुधार हो रहा है, लेकिन कल मालूम चला कि हिंदुजा अस्पताल में उनका निधन हो गया।

लालू पाठ के बाद अब IIM में शैलजा मॉडल: केरल में न कोरोना पर पाया जा सका काबू-न बची कुर्सी, फिर भी शोर भरपूर

केरल की भूतपूर्व स्वास्थ्य मंत्री केके शैलजा आगामी 10 जुलाई को कोरोना संक्रमण की रोकथाम पर भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM) बेंगलुरु के छात्रों के सामने एक लेक्चर देंगी। एक ट्वीट में आईआईएम बेंगलुरु ने बताया है कि संस्था की ओर से सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी ने फाउंडेशन डे लेक्चर सीरीज में केके शैलजा को छात्रों के सामने सफलतापूर्वक कोविड नियंत्रण के उनके तरीके और अनुभव की बात करने के लिए चुना है। यह चुनाव तब हुआ है जब केरल में कोरोना संक्रमण रुकने का नाम नहीं ले रहा और राज्य पिछले एक वर्ष में कोरोना से बुरी तरह प्रभावित राज्यों की सूची में महाराष्ट्र के साथ सबसे ऊपर है और यह अव्यवस्था राज्य के लिए महँगी पड़ती दिखाई दे रही है।

कोरोना की पहली लहर के समय से ही केके शैलजा की तथाकथित सफलता को लेफ्ट लिबरल ग्रुपों द्वारा खूब फैलाया गया। इसका यह असर हुआ कि उनकी चर्चा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हुई और उन्हें कुछ पुरस्कारों के लिए भी चुना गया। पर आश्चर्य की बात यह रही कि इतनी सफल स्वास्थ्य मंत्री को राज्य के मंत्रियों की नई सूची में जगह नहीं मिली। यहाँ कई प्रश्न उठते हैं पर उनमें से दो महत्वपूर्ण प्रश्न यह हैं कि यदि कोरोना संक्रमण पर काबू पाने का उनका मॉडल सचमुच सफल था तो केरल कोरोना की पहली लहर पर भी काबू क्यों नहीं कर सका और दूसरा प्रश्न यह है कि यदि उनका यह मॉडल कारगर था तो फिर स्वास्थ्य मंत्री के रूप में उन्हें मंत्रिमंडल में बरकरार क्यों नहीं रखा गया?

ऐसा नहीं है कि कोरोना संक्रमण पर नियंत्रण की केके शैलजा की ‘सफलता’ पर प्रश्न पहले नहीं उठाए गए हैं पर तब ये प्रश्न मूलतः ऐसे लोगों द्वारा उठाए गए थे जिनके हर सवाल को ‘संघी है’ कहकर टाल दिया जाता है। मजे की बात यह कि इधर केरल में फैलते संक्रमण को लेकर सवाल उठते रहे और उधर शैलजा की ‘सफलता’ का प्रोपेगेंडा जोर पकड़ता गया। इस चर्चा का आलम यह था कि लोगों के प्रश्नों को नजरअंदाज कर ब्रिटेन की एक पत्रिका ने उन्हें साल 2020 के Top Thinkers की सूची में जगह दी। इसी तरह हाल में ही जॉर्ज सोरोस फंडेड एक विश्वविद्यालय ने शैलजा को सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति समर्पण के लिए पुरस्कृत किया।

प्रश्न यह है कि शैलजा का ऐसा कौन सा मॉडल है जो सफल भी रहा और संक्रमण भी नहीं रोक सका? मॉडल में ऐसा क्या है जिसे उस पर प्रश्न उठाने वाले समझ नहीं सकते? प्रश्न यह भी उठता है कि संक्रमण रोकने के जिस मॉडल को सफल बताया जा रहा है और जिसके लिए शैलजा को पुरस्कृत किया जा रहा है, उस मॉडल को और किसी राज्य ने क्यों नहीं अपनाया? शैलजा के मौलिक मॉडल की सफलता आखिर में इसी बात से आँकी जाएगी कि उसका प्रयोग और कितने राज्यों की सरकारों ने किया? यदि यह मॉडल इतना ही कारगर था तो वह जिस राज्य में सबसे पहले प्रयोग में लाया गया उसमें संक्रमण क्यों नहीं रुका और जिन राज्यों ने इसे नहीं अपनाया, वहाँ संक्रमण पर काबू कैसे पाया गया? ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर मिलना चाहिए।

आईआईएम जैसी संस्थाओं में ‘सफलता’ के ऐसे लेक्चर की डिलीवरी की बात नई नहीं है। भूतपूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद द्वारा रेलवे की क्षमता को बढ़ाने और उसे घाटे से उबारने की भी एक गाथा लिखी गई थी, जिसका पाठ करने लालू आईआईएम अहमदाबाद गए थे। इस बात की चर्चा भी देश-विदेश में हुई थी। साथ ही लालू अपने प्रबंधन क्षमता के साथ अपने आईआईएम लेक्चर की बात जगह-जगह करते पाए गए थे। यह अलग बात है कि उनकी इस तथाकथित सफलता की सच्चाई उभरते देर नहीं लगी।

देश में विचारधारा केंद्रित विमर्श का यह हाल है कि जब वाम के विरोधी विचारधारा का कोई विद्वान कुछ कहता या करता है तो उसके काम को बिना किसी मूल्यांकन के सीधा ठुकरा दिया जाता है। दूसरी तरफ वाम बुद्धिजीवियों, नेताओं, मंत्रियों या अर्थशास्त्रियों के प्रबंधन का कोई मॉडल हो, आर्थिक मॉडल हो या व्यक्तिगत सफलता की कहानी, इन पर उठने वाले हर प्रश्न को नकार कर उसे सेलिब्रेट करने की लेफ्ट लिबरल मीडिया और इकोसिस्टम की संस्कृति पुरानी हो चुकी है।

पर आईआईएम जैसे विश्व प्रसिद्ध संस्थान की क्या मजबूरी है कि वे ‘सफलता’ की इस कहानी को एक तरह की वैधता प्रदान करें? इतने बड़े संस्थान के लिए यह देखना आवश्यक क्यों नहीं कि केके शैलजा के इस मॉडल पर उठने वाले प्रश्नों को बिना किसी तर्क या बिना किसी उत्तर के नकार दिया जाता रहा है? यह ऐसा प्रश्न है जिस पर केवल आईआईएम ही नहीं, बल्कि देश के संस्थानों और प्रबुद्ध नागरिकों को विचार करने की आवश्यकता है।

घर में गोहत्या कर हो रही थी बीफ बेचने की तैयारी, पुलिस पहुँची तो मिला सवा क्विंटल गोमाँस: इनाम और इसरान समेत 6 पर केस दर्ज

हरियाणा के जाटोवाला गाँव के एक घर से बुधवार (7 जुलाई 2021) को छछलौली पुलिस ने सवा क्विंटल गोमाँस बरामद किया। घर में तीन भाई गोवंश की हत्या कर उसका माँस बेचने का काम कर रहे थे। जब छानबीन के लिए पुलिस पहुँची उस समय भी एक गाय को काटकर उसे बेचने की तैयारी चल रही थी।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस टीम ने गोरक्षा दल के प्रधान राजीव कुमार और मोनू को साथ लेकर इनाम नाम के युवक के घर पर छापा मारा। पुलिस के पहुँचने से पहले ही सारे आरोपित मौके से फरार हो गए, लेकिन माँस घटनास्थल पर ही छोड़ गए।

पुलिस ने मौके से गोमाँस के छोटे-छोटे टुकड़े बरामद किए, जिन्हें प्लास्टिक की थैलियों में पैक किया गया था। पुलिस द्वारा बरामद गोमाँस का वजन 1 क्विंटल 16 किलोग्राम है। पुलिस ने पुष्टि की है कि घटनास्थल से बरामद माँस गाय का ही है। इस कार्रवाई में पुलिस ने इनाम और उसकी बीवी नईमा, इसरान, गालिब, रज्जाक और कुर्बान के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है।

इसके अलावा, उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के सांखन नहर नाम के गाँव से कुछ दूरी पर स्थित एक नहर की पटरी से भी पुलिस ने भारी मात्रा में गोमाँस लिए दो लोगों को गिरफ्तार किया है। इस दौरान तीन आरोपितों के फरार होने की भी खबर है।

पुलिस ने बताया कि उसे सूचना मिली थी कि सांखन नहर की पटरी के पास गोहत्या की जा रही है। पुलिस ने छापेमारी के बाद मौके से 200 किलोग्राम गोमाँस बरामद किया। इसके अलावा, पुलिस ने गाँव बंहेड़ा निवासी दो लोगों को भी गिरफ्तार किया है। इन लोगों के पास से गोहत्या करने वाले दो उपकरण भी बरामद किए गए।

पुलिस का कहना है कि छापेमारी के दौरान बंहेड़ा निवासी शहजाद और साजिद को गिरफ्तार किया गया है। वहीं, इसी गाँव के निवासी अहसान, राजू और गाँव गंझेडी निवासी मनव्वर मौके से फरार हो गए। पुलिस ने गिरफ्त में आए दोनों आरोपितों पर गोवंश अधिनियम के तहत कार्रवाई करते हुए जेल भेज दिया है। बाकी आरोपितों की तलाश की जा रही है।

Twitter ने फिर माँगे 8 हफ्ते: दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकार को दी कार्रवाई की छूट, नए IT मंत्री ने कमान सँभालते ही चेताया

देश के नए आईटी कानूनों के अंतर्गत शिकायत अधिकारी की नियुक्ति को लेकर माइक्रो ब्लॉगिंग साइट ट्विटर अभी भी सिर्फ तारीखें ही दे रहा है। अब एक बार फिर ट्विटर ने दिल्ली हाईकोर्ट में शिकायत अधिकारी की नियुक्ति के लिए 8 हफ्तों का समय माँगा है। वहीं नए आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने ट्विटर को चेतावनी देते हुए कहा है कि देश का कानून सबसे ऊपर है और हर किसी को इसे मानना ही पड़ेगा।

ट्विटर ने कोर्ट को बताया है कि उसके द्वारा 6 जुलाई 2021 को थर्ड पार्टी कॉन्ट्रैक्टर के जरिए एक अंतरिम मुख्य शिकायत अधिकारी की नियुक्ति की गई है और इसके लिए इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय से भी चर्चा कर ली गई है। हालाँकि ट्विटर ने दिल्ली हाईकोर्ट से यह कहते हुए 8 हफ्तों का समय माँगा है कि मुख्य शिकायत अधिकारी के पद के लिए उपयुक्त उम्मीदवार की नियुक्ति की प्रक्रिया जारी है और 8 हफ्तों के अंदर शिकायत अधिकारी की नियुक्ति कर ली जाएगी।

दिल्ली हाई कोर्ट ने भी सुनवाई को 28 जुलाई तक टालते हुए यह आदेशित किया कि अगर केंद्र सरकार को लगता है कि ट्विटर आईटी कानूनों के अनुपालन में असमर्थ है तो सरकार उसके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र है।

ट्विटर के लगातार समय माँगने के बीच आज ही में कार्यभार सँभालने वाले नए IT मंत्री अश्विनी वैष्णव ने ट्विटर को चेतावनी दी है। पत्रकारों से चर्चा करते हुए वैष्णव ने कहा कि देश का कानून सर्वोच्च है और जो भी इस देश में रहता है, काम करता है वह देश के कानून को मानने के लिए प्रतिबद्ध है। वैष्णव ने यह साफ कर दिया कि देश का कानून सबके लिए बराबर है और सभी को इसे मानना ही होगा।

हाल ही में शिकायत अधिकारी की नियुक्ति न करने पर दिल्ली हाईकोर्ट ने भी ट्विटर को फटकार लगाई थी। जस्टिस रेखा पल्ली ने ट्विटर से पूछा था कि आपकी प्रक्रिया कितना समय लेती है? उन्होंने कहा था, “अगर ट्विटर को लगता है कि हमारे देश में वो जितना समय चाहे उतना समय ले सकता है, तो हम इसकी अनुमति नहीं दे सकते।”

दिल्ली हाईकोर्ट के द्वारा ट्विटर को आज (8 जुलाई, 2021) तक का समय दिया गया था। उसे बताना था कि शिकायत अधिकारी के रूप में किसी भारतीय की नियुक्ति कब तक होगी। नए आईटी नियमों के अनुपालन की समयसीमा ख़त्म हो चुकी है, लेकिन कई हफ्ते बीतने के बावजूद ट्विटर इसे मानने में आनाकानी कर रहा है। हालाँकि भारत के नए आईटी कानूनों के अनुपालन में असफल रहने और शिकायत अधिकारी की नियुक्ति न कर पाने के कारण ट्विटर अपना ‘इंटरमिडियरी’ स्टेटस पहले ही खो चुका है।

‘बलिदानी रामभक्त मार्ग’: मुलायम सिंह के आदेश पर हुई फायरिंग में जिन कारसेवकों के गए प्राण, उनके नाम पर सड़क बनाएगी योगी सरकार

शायद ही कोई ऐसा हो जिन्हें वे रामभक्त याद न हों, जिन्होंने श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान अपने प्राणों का बलिदान दिया। 2 नवंबर 1990 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी की सरकार में उत्तर प्रदेश पुलिस ने अयोध्या में भव्य राम मंदिर की माँग कर रहे हजारों कारसेवकों पर गोलियाँ चलाई थीं। अब योगी आदित्यनाथ की सरकार ने घोषणा की है कि पुलिस की गोलीबारी में वीरगति प्राप्त हुए कारसेवकों के नाम पर यूपी में सड़कों का निर्माण किया जाएगा।

यूपी के उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने मंगलवार (06 जुलाई 2021) को अयोध्या की यात्रा के दौरान कहा, “1990 में कारसेवक अयोध्या आए थे और रामलला के दर्शन करना चाहते थे, लेकिन तत्कालीन सपा सरकार ने निहत्थे रामभक्तों पर गोलियाँ चलवा दी थीं। इनमें कई लोगों की मृत्यु हो गई थी।” डेप्युटी सीएम मौर्य ने कहा कि यूपी सरकार ने इन सभी कारसेवकों के नाम पर उत्तर प्रदेश की सड़कों के नामकरण का निर्णय लिया है। योगी सरकार इसके पहले कोठारी बंधुओं के नाम पर अयोध्या में सड़क के नामकरण की घोषणा कर चुकी है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, योगी सरकार द्वारा इन कारसेवकों के सम्मान में सड़कों का नाम ‘बलिदानी रामभक्त मार्ग’ रखा जाएगा और ये सड़कें वीरगति प्राप्त करने वाले कारसेवकों के घर की ओर जाएँगी। शिलान्यास पट्टिका पर उन कारसेवकों का नाम और उनकी तस्वीर भी लगाई जाएगी। इसके अलावा, डेप्युटी सीएम मौर्य ने यह भी बताया कि देश के दुश्मनों से लड़ते हुए अपने जीवन का बलिदान करने वाले सेना के जवानों और पुलिसकर्मियों के सम्मान में राज्य में जय हिन्द वीर पथ का निर्माण किया जाएगा।

2 नवंबर 1990, रामभक्तों का नरसंहार

2 नवंबर 1990 को हजारों की संख्या में कारसेवक अयोध्या में इकट्ठा हुए थे। एक समूह का नेतृत्व बजरंग दल के तत्कालीन नेता विनय कटियार कर रहे थे। इन कारसेवकों में कोठारी बंधु भी शामिल थे। इससे पहले कि ये कारसेवक आगे बढ़ते, पुलिस ने उन्हें रोक लिया। इसके बाद कारसेवक विरोध प्रदर्शन करते हुए हनुमानगढ़ी के पास बैठ गए और भजन-कीर्तन करने लगे।

यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के आदेश के बाद यूपी पुलिस ने शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे इन कारसेवकों पर गोलियाँ चलानी शुरू कर दी। पुलिस की गोली लगने से कई कारसेवक उसी समय वीरगति को प्राप्त हुए। पुलिस कार्रवाई के बाद मची भगदड़ में सरयू ब्रिज पर भी कई लोगों की जान चली गई। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार कोठारी बंधु, जिन्होंने विवादित बाबरी ढाँचे पर भगवा लहराया था, पुलिस की वीभत्स बर्बरता का शिकार हुए थे। कोठारी बंधुओं के सिर और गले में गोलियाँ मारी गई थीं।

हालाँकि, सरकार के आँकड़ों के अनुसार पुलिस की इस कार्रवाई में 16 कारसेवकों की मौत हुई थी लेकिन वास्तविक संख्या इससे कहीं ज्यादा थी। कई रिपोर्ट में बताया गया था कि उस दौरान कई कारसेवकों की लाशों को अनजान जगहों पर जला दिया गया था और कई लाशें सरयू नदी में फेंक दी गई थीं। 2019 में रिपब्लिक टीवी के स्टिंग में यह खुलासा किया गया था कि कई हिंदुओं को अंतिम संस्कार भी नसीब नहीं हुआ था, क्योंकि जलाने के स्थान पर इन कारसेवकों के शवों को दफना दिया गया था।

महाराष्ट्र में 281 डॉक्टरों ने CM उद्धव ठाकरे को पत्र लिखकर माँगी खुदकुशी की इजाजत: जानें क्या है मामला

कोरोना से भयंकर रूप से जूझ रहे महाराष्ट्र में 280 से अधिक डॉक्टरों ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को पत्र लिखकर आत्महत्या करने की अनुमति माँगी है।

टीवी9 मराठी की रिपोर्ट के अनुसार, 281 आयुर्वेदिक डॉक्टरों ने महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे को पत्र लिखकर वादाखिलाफी और महाराष्ट्र सरकार द्वारा उनके साथ किए गए अपमानजनक व्यवहार के कारण अपना खुदखुशी करने की इजाजत माँगी है।

पत्र में, डॉक्टरों ने राज्य सरकार द्वारा विशेष रूप से कोविड -19 महामारी के दौरान आयुर्वेदिक डॉक्टरों के साथ दुर्व्यवहार के बारे में खेद व्यक्त किया है। साथ ही पिछड़े आदिवासी क्षेत्रों में लंबे समय तक तैनाती पर निराशा व्यक्त करते हुए, बीएएमएस डॉक्टरों ने कहा कि वे पिछले दो दशकों से 18 आदिवासी जिलों में लोगों की सेवा कर रहे हैं, अक्सर दूर-दराज के ऐसे गाँवों में जाते हैं, जहाँ बुनियादी सुविधाएँ भी नहीं हैं। लेकिन सरकार उनके साथ भेदभाव कर रही है।

बीएएमएस के डॉक्टरों के मुताबिक, वे इन पिछड़े इलाकों में स्थानीय लोगों के छोटी-मोटी बीमारियों, साँप-बिच्छू के काटने, कुपोषित बच्चों का इलाज आदि सहित विभिन्न बीमारियों का इलाज करते हैं।

साभार-TV 9 भारतवर्ष मराठी

गौरतलब है कि आयुर्वेदिक डॉक्टरों द्वारा लिखा गया पत्र एक आयुर्वेदिक चिकित्सक स्वप्निल लोंकर (Swapnil Lonkar ) द्वारा अपना जीवन समाप्त करने के कुछ दिनों बाद आया है जब उन्हें एमपीएससी (महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग) की परीक्षा पास करने के बावजूद पोस्टिंग से वंचित कर दिया गया था।

अपने जीवन को समाप्त करने के लिए इजाजत माँगने वाले पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में से एक डॉ शेषराव सूर्यवंशी ने कहा कि राज्य सरकार इन नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सेवा करने वाले पुलिस और सरकारी अधिकारियों को विशेष प्रोत्साहन भत्ता देती है, जबकि डॉक्टरों को समान लाभ से वंचित किया जाता है और वेतन के रूप में सिर्फ 24,000 रुपए का भुगतान किया जा रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार, पिछले साल, डॉक्टरों और महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम अजीत पवार, स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे और जनजातीय मंत्रालय के बीच एक बैठक के बाद, यह निर्णय लिया गया था कि आदिवासी क्षेत्रों में काम करने वाले इन 281 आयुर्वेदिक डॉक्टरों को मौजूदा वेतन 24000 रुपए के बजाय 40,000 रुपए दिए जाएँगे। हालाँकि इतना समय बीत जाने के बाद भी अभी तक इस फैसले पर अमल होना बाकी है। जो निश्चित रूप से फ्रंटलाइन वर्कर के लिए चिंता का विषय है।

महाविकास अघाड़ी सरकार के प्रति निराशा व्यक्त करते हुए, डॉ सूर्यवंशी ने कहा कि उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली सरकार ने राज्य के सबसे दूरस्थ कोनों में प्रतिकूल परिस्थितियों में कड़ी मेहनत करने के बाद भी, विशेष रूप से कोविड -19 महामारी के दौरान उनके प्रति कोई मानवता नहीं दिखाई है।

‘5 साल में मुझ से मन भर गया, अब करना चाहता है तीसरा निकाह’: समीर अब्बू की शिकायत ले थाने पहुँची दूसरी बीवी

राजस्थान के उदरपुर में एक महिला ने अपने ‘इंजीनियर’ शौहर के ख़िलाफ़ थाने जाकर शिकायत लिखाई है। महिला का कहना है कि उसे छोड़ अब शौहर तीसरा निकाह करना चाहता है। उसने ऐसा करने से रोका तो उसके साथ मारपीट कर घर से निकाल दिया गया। मामला उदयपुर के महिला थाने में दर्ज किया गया है।

महिला की पहचान समीरा के तौर पर हुई है। समीर ने अपनी पहली बीवी के इंतकाल के बाद उससे निकाह किया था। महिला के मुताबिक 5 साल में ही समीर का मन उससे भर गया है और वह तीसरी शादी करना चाहता है। उसने जबलपुर की एक लड़की को पसंद भी कर लिया है, जिससे वह जल्द ही निकाह करने वाला है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, पीड़िता ने रिपोर्ट दर्ज कराते हुए कहा, “मैं फिलहाल तलाक नहीं लेना चाहती और अपने बच्चों के साथ रहना चाहती हूँ। लेकिन मेरा पति ऐसा नहीं करने दे रहा है।” वह कहती है, “कुछ वक्त पहले पति ने मेरे साथ मारपीट कर मुझे पीहर भेज दिया था। लेकिन इसके बाद उसका कुछ पता नहीं चला और न खबर मिली।”

महिला बताती है कि जब उसको समीर की तीसरी शादी का पता चला तो उसने अपने घर जाने का प्रयास किया, लेकिन शौहर ने उसे धक्के मार कर बाहर निकाल दिया। अब वह दर-दर की ठोकर खाने को मजबूर हैं। महिला के अनुसार उसके पति का चाल चरित्र ठीक नहीं है। इन्हीं कारणों से पहली पत्नी ने सुसाइड कर ली थी और उसने दूसरी शादी कर ली। पति की हरकतें अब भी न सुधरने के कारण दूसरी शादी में भी उससे लड़ाइयाँ होती हैं।

जानकारी के मुताबिक, समीरा का पति समीर अब्बू पेशे से इंजीनियर है और जावर माइंस में ठेकेदारी का काम करता है। पिछले साल नवंबर में दोनों के बीच झगड़ा हुआ था। थानाधिकारी नरेन्द्र जैन ने बताया कि महिला की शिकायत पर अब पति-पत्नी की काउंसलिंग करवाई जाएगी। इसके बाद भी बात नहीं बनी ताे मुकदमा दर्ज कर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

‘4 हिंदू महिलाओं का कराओ धर्मांतरण

उल्लेखनीय है कि लखनऊ में भी एक महिला ने अपने शौहर से तंग आकर हाल में थाने में रिपोर्ट लिखाई है। उसने शिकायत में बताया कि उसका शौहर और सास गैर मुस्लिम महिलाओं को अपने जाल में फँसाकर उनका धर्म परिवर्तन करवा रहे हैं। उसने बताया कि हसनैन बेंगलुरु में एक दरगाह का सज्जादानशीन (दरगाह का बड़ा फकीर) है। उसको धर्मांतरण के लिए विदेशों से फंडिंग हो रही है। इस काम में उनके रिश्तेदार भी शामिल हैं।

इंस्पेक्टर अजय प्रकाश त्रिपाठी के मुताबिक, महिला ने बताया है कि शौहर ने उसे जान से मारने की धमकी दी है। हसनैन ने उससे कहा है कि चार हिंदू महिलाओं का धर्मांतरण करवाओ। अगर उसने ऐसा नहीं किया तो वह उसके लंदन में रहने वाले भाई समेत पूरे परिवार को खत्म कर देगा। जब महिला ने उसकी बात मानने से इनकार कर दिया, तो उसके शौहर ने उसे पीट-पीटकर घर से निकाल दिया।

‘कोई भी टॉम, डिक और हैरी कुछ भी लिख सकता है?’: साकेत गोखले से HC, पुरी की पत्नी से जुड़ा है मानहानि का मामला

दिल्ली हाईकोर्ट में गुरुवार (08 जुलाई 2021) को संयुक्त राष्ट्र में पूर्व सहायक महासचिव और वर्तमान मोदी सरकार में केन्द्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी की पत्नी लक्ष्मी पुरी की याचिका पर सुनवाई हुई। लक्ष्मी ने यह याचिका कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गाँधी के करीबी और कॉन्ग्रेस आईटी सेल से जुड़े ‘एक्टिविस्ट’ साकेत गोखले के खिलाफ दायर की थी। गोखले ने लक्ष्मी पुरी और उनके पति हरदीप सिंह पुरी के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाते हुए कई ट्वीट किए थे, जिसके खिलाफ लक्ष्मी ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। कोर्ट ने इस मामले में अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया है।

कोर्ट में लक्ष्मी पुरी की ओर से सीनियर एडवोकेट मनिंदर सिंह पेश हुए। उन्होंने कोर्ट में लक्ष्मी और उनके पति की संपत्तियों का ब्यौरा पेश किया और कहा कि यह ‘उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे’ वाला मामला है, क्योंकि जब गोखले को ट्वीट करके भ्रष्टाचार के आरोप लगाने के संबंध में नोटिस भेजा गया तब गोखले ने उल्टा यह आरोप लगा दिया कि उन्हें धमकाया जा रहा है।

लक्ष्मी की ओर से दलीलें पेश करते हुए सिंह ने कहा कि पहली बात तो यह कि वह कोई सरकारी मुलाजिम नहीं हैं और उन्हें जो भी करना था, वह कर चुकी हैं। इसके अलावा सिंह ने यह भी कहा कि गोखले होते कौन हैं सवाल उठाने वाले और यदि गोखले, लक्ष्मी के बारे में कुछ लिख रहे हैं तो यह उनका पहला कर्त्तव्य होना चाहिए कि कम से कम वो लक्ष्मी से इस बारे में बात करें और उनका रूख जानने की कोशिश करें।

एडवोकेट सिंह ने कहा कि लक्ष्मी को चोर और लुटेरा कहा गया और अब यह कोर्ट की जिम्मेदारी है कि कोर्ट एक व्यक्ति के सम्मान और चरित्र की रक्षा करे। सिंह ने यह भी कहा कि कोर्ट को एक गैर-जिम्मेदार व्यक्ति के द्वारा लगाए गए बेहूदा आरोपों पर भी ध्यान देना चाहिए।

एडवोकेट सिंह के तर्कों के जवाब में साकेत गोखले की ओर पेश हुए एडवोकेट सरीम नावेद ने कहा कि किसी सरकारी नौकर और उसके परिवार की संपत्तियों के विषय में सार्वजनिक तौर पर प्रश्न उठाया जा सकता है। नावेद ने यह भी कहा कि कानून के मुताबिक किसी सरकारी नौकर और उसकी पत्नी की संपत्ति की जानकारी सार्वजनिक विषय है। इस पर कोर्ट ने फटकार लगाते हुए कहा कि इसकी एक सीमा होती है। कोर्ट ने नावेद से कहा, “इसका मतलब यह हुआ कि कोई भी टॉम, डिक एण्ड हैरी किसी की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाने के लिए इंटरनेट पर किसी भी समय कुछ भी लिख सकता है और कानून के पास उसे रोकने के लिए कोई अधिकार नहीं है?”

इस पूरे मामले पर कोर्ट का यह कहना था कि किसी भी सरकारी कर्मचारी या उसके परिवार की संपत्ति के बारे में किसी भी प्रकार का दावा तब किया जाना चाहिए जब पहले उसका वैरिफिकेशन कर लिया गया हो। कोर्ट ने साकेत गोखले के वकील से कहा कि यदि मुद्दा उठाना ही है तो पहले चुनाव आयोग जाना चाहिए और संतुष्ट होना चाहिए और पूरी प्रक्रिया का पालन करना चाहिए। कोर्ट ने (गोखले के वकील नावेद से) यह भी कहा कि क्या एक नागरिक होने के नाते भारत का संविधान उनके मुवक्किल को यह अधिकार दे देता है कि वह किसी की भी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने का काम करें।

सुनवाई के बाद कोर्ट ने अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया और कोर्ट के द्वारा इस मामले में अब सोमवार (12 जुलाई 2021) को निर्णय सुनाया जाएगा। लक्ष्मी पुरी की याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस सी. हरि शंकर के द्वारा सुनवाई की गई।

ज्ञात हो कि अपने ट्विटर एकाउंट पर लिखे गए थ्रेड के माध्यम से साकेत गोखले ने लक्ष्मी पुरी और उनके पति हरदीप सिंह पुरी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था। गोखले ने आरोप लगाया था कि पुरी ने स्विटजरलैंड में 2.5 मिलियन डॉलर (लगभग 18.6 करोड़ रुपए) की कीमत का एक बंगला खरीदा है। साथ ही गोखले ने यह भी दावा किया कि इस बंगले की कीमत अदा करने के लिए पुरी दंपति के पास वैध आय के स्तोत्र नहीं हैं। इसके बाद लक्ष्मी ने गोखले को कानूनी नोटिस भेजा था और दिल्ली हाई कोर्ट में इस संबंध में याचिका भी दायर की थी।

‘गरीबों का राशन, चोरी कर खुले बाजार में बेचते रंगे हाथ पकड़े गए AAP कार्यकर्ता’: BJP ने की सख्त कार्रवाई की माँग

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी/BJP) की दिल्ली ईकाई ने बुधवार (जुलाई 7, 2021) को आम आदमी पार्टी (AAP) और उसके नेताओं के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया। भाजपा का आरोप है कि महामारी के समय में दिल्ली की जनता के लिए आया राशन AAP के कार्यकर्ता चुरा कर खुले बाजार में बेच रहे हैं।

विरोध-प्रदर्शन की तस्वीरें दिल्ली विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रामवीर सिंह बिधूड़ी के ट्विटर अकाउंट पर देखी जा सकती है। त्रिलोकपुरी में भाजपा द्वारा आयोजित प्रदर्शन में वह कार्यकर्ताओं को संबोधित करते दिख रहे हैं। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा है, “गरीबों का राशन चोरी करते हुए आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता रंगे हाथों पकड़े गए। आधा राशन बेच दिया और पकड़े जाने पर आधा राशन वापस स्कूल में पहुँचाया।”

पूरे मामले में भाजपा नेताओं का दावा है कि उन्होंने त्रिलोकपुरी के गवर्नमेंट बॉयज सीनियर सेकेंडरी स्कूल में एक स्टोरेज यूनिट से चोरी हुआ राशन बाजार में बेचते हुए आम आदमी कार्यकर्ता को रंगे हाथों पकड़ा है। बिधूड़ी कहते हैं, “गरीबों के लिए राशन न्यू अशोक नगर के गवर्नमेंट बॉयज सीनियर सेकेंड्री स्कूल में रखा गया था। आप कार्यकर्ताओं ने उस राशन को स्कूल प्रबंधन की मिलीभगत से चुरा लिया और खुले बाजार में बेचना शुरू कर दिया।”

वह बताते हैं, “चावल और गेहूँ वाली 516 राशन किट पहले ही चोरी हो चुकी थी और यह दूसरी बार था जब AAP कार्यकर्ता खुले बाजार में बेचने के लिए किट उठाने आए थे, लेकिन हमने उन्हें रंगे हाथों पकड़ा।”

गिरफ्तारी की माँग

भाजपा ने राशन चोरी के इस मामले में AAP कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ कार्रवाई की माँग की है। बिधूड़ी कहते हैं, “हम माँग करते हैं कि आप विधायक के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की जाए और उन्हें तत्काल गिरफ्तार किया जाए। दिल्ली के खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्री को भी इस्तीफा दे देना चाहिए।”

उल्लेखनीय है कि 2 जुलाई को कथित तौर पर दूसरी बार आप कार्यकर्ता राशन किट चोरी करने के लिए आए थे, लेकिन राशन को बेचते समय रंगे हाथों पकड़े गए। आप पार्टी के एक कार्यकर्ता के घर से बरामद हुआ राशन स्कूल को लौटा दिया गया है।

भाजपा नेता बिधूड़ी ने आरोप लगाते हुए कहा, “सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि इस मामले में स्कूल के प्रिंसिपल के खिलाफ कार्रवाई की गई थी, लेकिन आप विधायक या पार्टी कार्यकर्ताओं के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई, जो इन खाद्य राशन किटों की कालाबाजारी में शामिल थे।” बिधूड़ी ने यह भी कहा कि उनके पास घटना की वीडियो क्लिप है और सभी सबूत उपराज्यपाल अनिल बैजल को उचित कार्रवाई के लिए भेज दिए गए हैं।

वाजपेयी के ‘वैष्णव’ कैसे बने मोदी की पसंद, ‘दादा’ की कुर्सी पर 20 साल बाद ज्योतिरादित्य विराजमान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूसरे कार्यकाल के पहले कैबिनेट विस्तार में शपथ लेने वाले मंत्रियों को उनके विभागों का बँटवारा कर दिया गया है। कैबिनेट विस्तार के बाद कई मंत्रियों के विभाग भी बदले गए हैं। बुधवार (07 जुलाई 2021) को राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल में कुल 43 मंत्रियों ने शपथ ग्रहण की थी। उससे पहले 12 मंत्रियों ने इस्तीफा दिया था। मोदी सरकार के इस बहुप्रतीक्षित विस्तार के बाद सर्वाधिक चर्चा में देश के नए रेल और आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव और कॉन्ग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया की है। सिंधिया को वही नागरिक उड्डयन मंत्रालय दिया गया, जो 30 साल पहले उनके दिवंगत पिता माधवराव सिंधिया को मिला था।

वाजपेयी के भी थे चहेते

भारत की लाइफलाइन कही जाने वाली भारतीय रेल और सूचना प्रौद्योगिकी एवं संचार मंत्रालय की कमान अश्विनी वैष्णव को दी गई है। 1970 में राजस्थान के जोधपुर में जन्मे अश्विनी वैष्णव इलेक्ट्रॉनिक एण्ड कम्युनिकेशन्स में गोल्ड मेडलिस्ट हैं। इसके अलावा उन्होंने IIT कानपुर से M.Tech और अमेरिका की वॉर्टन यूनिवर्सिटी से MBA भी किया है। वैष्णव 1994 बैच के आईएएस अधिकारी हैं। वैष्णव ने देश की सबसे प्रतिष्ठित सिविल सेवा परीक्षा ऑल इंडिया 27वीं रैंक हासिल करते हुए उत्तीर्ण की थी। हालाँकि 2008 में उन्होंने सिविल सेवा से त्यागपत्र दे दिया था और कॉर्पोरेट जगत का रुख कर लिया था। अमेरिका से MBA करने के बाद वैष्णव ने न केवल की नामी-गिरामी कंपनियों में शीर्ष पदों पर काम किया बल्कि गुजरात में एक मैन्युफैक्चरिंग यूनिट भी खोली।

2003 तक वैष्णव ने ओडिशा में अपनी सेवाएँ दी। उसके बाद उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में प्रधानमंत्री कार्यालय में उपसचिव नियुक्त किया गया था। पद से हटने के बाद वैष्णव, वाजपेयी के सचिव बनाए गए। जून 2019 को वैष्णव भाजपा में शामिल हुए। भाजपा में शामिल होने के बाद भी वैष्णव को ओडिशा की प्रमुख पार्टी बीजू जनता दल का समर्थन प्राप्त हुआ और वे वैष्णव राज्यसभा सांसद चुने गए। वैष्णव एक आंत्रप्रेन्योर रह चुके हैं, ऐसे में भारतीय रेल की कमान उन्हें सौंपना यह बताता है कि मोदी सरकार रेलवे की कमाई बढ़ाने और निजी सार्वजनिक भागीदारी (PPP) के तहत रेलवे के विकास को लेकर प्रतिबद्ध है। यही कारण है कि भारतीय रेल की कमान एक ऐसे व्यक्ति को दी गई है जो न केवल ब्यूरोक्रैट रह चुका है, बल्कि कार्पोरेट जगत की बारीकियों से भी परिचित है।

पिता के मंत्रालय में बेटे की एंट्री

कभी कॉन्ग्रेस के महत्वपूर्ण (लेकिन हाशिए पर रहने वाले) नेताओं में गिने जाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया को सिविल एविएशन मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई है। कॉन्ग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामने वाले सिंधिया ने मध्य प्रदेश में सरकार बनाने में भाजपा की सहायता की। इसका ईनाम भी उन्हें राज्यसभा के रूप में मिला जब मध्य प्रदेश से ही वो राज्यसभा सांसद चुने गए। बुधवार (07 जुलाई) को सिंधिया ने कैबिनेट मंत्री के रूप में शपथ ली और शपथ लेने के बाद उन्हें मोदी सरकार में सिविल एविएशन मंत्रालय का प्रभार सौंप दिया गया।

यह वही मंत्रालय है जिसकी जिम्मेदारी 30 साल पहले उनके पिता माधवराव सिंधिया को मिली थी। माधवराव सिंधिया 1991-93 के दौरान पीवी नरसिम्हा राव सरकार में सिविल एविएशन और पर्यटन मंत्री रहे थे। माधवराव, राजीव गांधी सरकार में रेल मंत्री के पद भी रहे। इसी तरह उनके बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया भी मनमोहन सरकार में सूचना प्रौद्योगिकी और संचार मंत्री रह चुके हैं।

मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान हुए कैबिनेट विस्तार में विविधता के साथ सामंजस्य भी देखने को मिला। मंत्रिमंडल विस्तार में पूर्वोत्तर भारत के जन-प्रतिनिधियों को भी महत्वपूर्ण पद दिए गए हैं। पूर्वोत्तर क्षेत्र की 25 में से 14 सीटें जीतने वाली भाजपा की सरकार में अब पूर्वोत्तर से कुल 5 मंत्री हो गए हैं। इनमें से 2 कैबिनेट मंत्री हैं जबकि 3 नेताओं को कैबिनेट राज्य मंत्री बनाया गया है। असम के पूर्व मुख्यमंत्री सर्वानन्द सोनोवाल और किरेन रिजूजू जहाँ कैबिनेट मंत्री बनाए गए हैं वहीं त्रिपुरा से लोकसभा सांसद प्रतिमा भौमिक और मणिपुर से लोकसभा सांसद राजकुमार रंजन सिंह कैबिनेट राज्यमंत्री बने। असम से रामेश्वर तेली पहले ही मोदी सरकार में मंत्री हैं।