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ट्विटर इंडिया के MD पर बुलंदशहर में केस: जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तानी तो लद्दाख को दिखाया था चीनी इलाका

अमेरिकी माइक्रो ब्लॉगिंग साइट ट्विटर ने जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान और लद्दाख को चीन का हिस्सा दिखाने के बाद भारत के गलत नक्शे को हटा लिया। लेकिन इससे उसकी मुश्किलें कम नहीं हुई। उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में बजरंग दल के एक नेता की शिकायत पर ट्विटर इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर (MD) मनीष माहेश्वरी के खिलाफ केस दर्ज किया गया है।

ट्विटर के एमडी के खिलाफ आईपीसी की धारा 505 (2) और आईटी (संशोधन) अधिनियम 2008 की धारा 74 के तहत केस दर्ज किया गया है। समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक भारत का गलत नक्शा दिखाने के आरोप में उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है।

सोमवार (28 जून, 2021) को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को भारत के नक़्शे से अलग दिखाया था। माइक्रो ब्लॉगिंग साइट की इस हरकत के बाद ही सरकार ने इसका खामियाजा भुगतने का इशारा कर दिया था। हालाँकि, मामला गरमाते ही ट्विटर ने वेबसाइट के कैरियर सेक्शन में दिख रहे नक्शे को बिना किसी स्पष्टीकरण के हटा लिया था।

बीजेपी की आईटी सेल के प्रभारी अमित मालवीय ने भी ट्विटर को उसकी गैर जिम्मेदाराना हरकत के लिए आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा, “यह पहली बार नहीं है कि ट्विटर ने भारत का गलत नक्शा दिखाया हो। शायद यही कारण है कि दिशा-निर्देशों में कहा गया है कि सोशल मीडिया और टेक कंपनी के कर्मचारियों को क्षेत्रीय मुद्दों में स्थानीय सांस्कृतिक संवेदनशीलता को समझना चाहिए। मुझे लगता है कि यही वो समय है कि हमें महसूस करना चाहिए कि लैंड लॉ का पालन सही तरीके से नहीं किया जा रहा है।”

पहले भी की थी ऐसी हरकत

ऐसा नहीं है कि ट्विटर ने पहली बार इस तरह की हरकत की हो। पिछले साल 22 अक्टूबर 2020 को उसने लेह को चीन का हिस्सा बताया था, जिसके बाद सरकार ने पत्र लिखकर कड़ी चेतावनी दी थी। भारत सरकार ने ट्विटर को भारत की संप्रभुता का सम्मान करने की नसीहत देते हुए स्पष्ट किया था कि लेह केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख का मुख्यालय है और जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है।

इससे पहले गाजियाबाद में बुजुर्ग की दाढ़ी काटने के मामले से जुड़े वीडियो को ट्विटर वायरल होने दिया था, जबकि, उत्तर प्रदेश पुलिस ने प्लेटफॉर्म से इसे रोकने को कहा था। पुलिस ने आगाह किया था कि इससे सामाजिक माहौल बिगड़ने की आशंका है। इस मामले में भी ट्विटर के खिलाफ पुलिस ने केस दर्ज किया था।

चर्च में 993 बच्चों का यौन शोषण, 628 पादरी शामिल: रिपोर्ट से पोलैंड शर्मसार, आर्कबिशप बोले– क्षमा करें

पोलैंड के एक कैथोलिक चर्च में 300 बच्चों के यौन शोषण का मामला सामने आया है। सोमवार (जून 28, 2021) को नाबालिगों के शोषण को लेकर जारी की गई एक रिपोर्ट के अनुसार, 1958 से लेकर 2020 तक करीब 292 पादरियों ने 300 बच्चों का यौन शोषण किया। इनमें लड़के और लड़कियाँ, दोनों ही शामिल थे। 2018 के मध्य से लेकर 2020 तक इनमें से कई हालिया मामलों की शिकायत चर्च प्रशासन से भी की गई।

कई पीड़ितों, उनके परिवारों और पादरियों के अलावा मीडिया और सूत्रों के हवाले से ये रिपोर्ट तैयार की गई है। हाल ही में वॉरसॉ में पोलैंड के कैथोलिक चर्च के मुखिया आर्कबिशप वोजसिक पोलाक ने पीड़ितों से माफ़ी माँगते हुए कहा कि आशा है कि वो पादरियों को क्षमा कर देंगे। उन्होंने बताया कि वो पहले भी माफ़ी माँग चुके हैं। कुल मिला कर चर्च को 368 बच्चों के यौन शोषण की रिपोर्ट सौंपी गई है।

इनमें से 144 मामलों को तो वेटिकन के ‘कॉन्ग्रिगेशन ऑफ डॉक्ट्रिन ऑफ फेथ’ ने भी शुरुआती जाँच में पुष्ट माना है। 368 में से 186 की अभी भी जाँच की जा रही है। हालाँकि, वेटिकन ने इनमें से से 38 मामलों को फर्जी मान कर उन्हें नकार दिया है। यौन प्रताड़ना के इन मामलों की जाँच कर रहे अधिकारी ने बताया कि उनके पास कई रिपोर्ट्स आई हैं। इस तरह की पिछली रिपोर्ट मार्च 2019 में जारी की गई थी।

इससे पहले चर्च की जो पहली रिपोर्ट आई थी, उसमें 1990-2018 के बीच के मामलों के बारे में बताया गया था। इस दौरान करीब 382 पादरियों द्वारा 625 नाबालिग बच्चों का यौन शोषण किया गया। ताज़ा रिपोर्ट में केवल उसके बाद खुलासा हुए मामलों को ही शामिल किया गया है। इनमें से 42 यौन शोषक पादरी ऐसे हैं, जिनके नाम पहली रिपोर्ट में भी दर्ज थे और उनके नाम दूसरी रिपोर्ट में भी मौजूद हैं।

पोलैंड एक कैथोलिक राष्ट्र है, जहाँ पादरियों को विशेष छूट एवं सुविधाएँ मिलती हैं। ऐसे में वेटिकन वहाँ आए इस तरह के मामलों की जाँच कर रहा है। वेटिकन ने इस मामले में लापरवाही बरतने के लिए अपने कुछ पदाधिकारियों को आधिकारिक समारोहों से दूर कर दिया है और उन पर कार्रवाई की है। दक्षिण-पश्चिमी पोलैंड के एक पादरी ने इस्तीफा भी दिया है, जिसे पोप फ्रांसिस ने स्वीकार कर लिया है।

पोलैंड में विदेशी शासन के दौरान कैथोलिक चर्च ने वहाँ राष्ट्रवाद की अलख जगाए रखी थी, ऐसा लोगों का मानना है। इसीलिए, वहाँ की सरकार और समाज के मन में उसके लिए खास प्रतिष्ठा का भाव है। 1989 में वहाँ कम्युनिस्ट शासन ख़त्म हुआ था। उससे पहले भी चर्च कम्युनिस्ट विरोधी गतिविधियों में सक्रिय था। हालाँकि, हाल के दिनों में चर्च का झुकाव ईसाई कट्टरपंथी ताकतों की ओर बढ़ा है, जिससे युवा उससे दूर हुए हैं।

A फॉर Apple, I फॉर iPhone: तब 2MP का ही था रियर कैमरा, फ्रंट कैमरा था ही नहीं; पर बदल दी दुनिया

नई-नई मशीनें इजाद कर वैसे तो इंसान ने बहुत पहले से तमाम उपलब्धियों पर अपने हस्ताक्षर करने शुरू कर दिए थे, लेकिन 29 जून 2007 इतिहास की उन तारीखों में से है जिसने तकनीक की दुनिया को नए आयाम दिए। यह वह तारीख है जब पहली बार एप्पल का आईफोन (iPhone) बिक्री के लिए उपलब्ध था। हालाँकि इसे लाने की घोषणा स्टीव जॉब्स ने 9 जनवरी 2007 को ही कर दी थी।

कहने को यह फोन बस कंपनी का एक डिवाइस था। लेकिन उसे अपना बनाने की होड़ कुछ ऐसी थी कि बिक्री शुरू होने के कुछ देर में ही वह आउट ऑफ स्टॉक हो गया। मोबाइल प्रेमियों ने लंबी-लंबी लाइन लगाकर उस फोन को खरीदा था। जो खाली हाथ रह गए उन्होंने अगला स्टॉक आने तक बेचैनी से इंतजार भी किया।

जैसा कि हम पहले ही बता चुके हैं यह कहानी है एप्पल आईफोन की बिक्री के पहले दिन की। 29 जून 2007 ही वह तारीख थी जब एप्पल कंपनी ने अपने पहले फोन की बिक्री को ऑफिशियली शुरू किया। शुरुआत में किसे मालूम था कि 1976 में पर्सनल कम्प्यूटर बनाने के लिहाज से शुरू हुई ये कंपनी एक दिन ऐसा फोन उतारेगी जिसमें बिन कोई बटन दबाए कम्प्यूटर और मोबाइल के हर फीचर काम करेंगे। उससे पहले ये मुमकिन नहीं लगता था। लेकिन एप्पल के साल 2005 में शुरू हुए ‘पर्पल प्रोजेक्ट’ ने इसे सच कर दिखाया। 

आज के समय में जो आईफोन नौजवानों के लिए ड्रीम डिवाइस जैसा है वो कभी स्टीव जॉब्स का ड्रीम प्रोजेक्ट था। एक ऐसा प्रोजेक्ट जिसने बाजार में उतरते ही तस्वीर बदल दी। इस सपने को साकार होने में जिस पर्पल प्रोजेक्ट ने काम किया उसकी सोच यही थी कि फिजिकल कीबोर्ड या नेविगेशन की (key) जैसे माउस या कंप्यूटर पर ट्रैकपैड की जरूरत पूरी तरह से खत्म हो और लोग ऊँगली के टच से इनपुट दे पाएँ। 

साल 2007 में जब आईफोन के तौर पर इस प्रोजेक्ट को एक आकार मिला तो दुनिया ने इसे क्रांतिकारी बदलाव माना, क्योंकि बाजार में इसका विकल्प मौजूद नहीं था। कहते हैं कि जॉब्स और उनकी टीम ने मात्र 30 महीनों की अवधि में रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर 150 मिलियन डॉलर के अधिक के खर्च से इसे संभव बनाया था। इसके बाद 21 अक्टूबर 2008 को गूगल ने भी अपना एंड्रॉयड ऑपरेटिंग सिस्टम इंट्रोड्यूस किया, लेकिन समय के साथ बाजार में उसका जलवा इतना नहीं चल पाया जितना लोगों ने iphone को याद रखा।

वैसे तो आज की तरह उस समय भी आईफोन अधिकांश लोगों की जेब से बाहर की बात हुआ करता था। लेकिन इसका क्रेज लोगों पर ऐसा था कि मात्र 15 महीनों में एप्पल ने 61 लाख आईफोन बेच दिए थे। एप्पल ने अपने पहले फोन को लेकर सबसे पहली घोषणा 9 जनवरी 2007 को की थी। लेकिन बिक्री 29 जून 2007 को होनी शुरू हुईउस समय स्टीव जॉब्स ने मंच पर चढ़ कर भीड़ को बताया था, “एक आई पॉड, एक फोन, एक इंटरनेट कम्‍युनिकेटर। आप समझ रहे हैं न? ये तीनों अलग-अलग चीजें नहीं हैं। यह एक ही डिवाइस है।”

एप्पल का पहला आईफोन

मात्र 3.5 इंच के डिस्प्ले के साथ इसमें सिर्फ 2 मेगा पिक्चल का रियर कैमरा कैमरा था। फ्रंट कैमरा था ही नहीं। कनेक्टिविटी में ब्लूटूथ, वाई-फाई और क्वाड बैंड जीएसएम/ जीपीआरएस/ एज की सुविधा दी गई थी। बैटरी 1400 एमएएच ली आयन थी और स्टोरेज के लिहाज से तीन विकल्प थे- 4जीबी, 8 जीबी और 16 जीबी। एप्पल के फोन की खास बात ये थी कि एंड्रॉयड से बिलकुल अलग था और इसमें एप्स के लिए कंपनी ने अपना ही एक ऑपरेटिंग सिस्टम बनाया था।

तब और अब में फर्क

अब देखिए आज समय बदल गया। 14 साल के सफर में अब एप्पल का आईफोन अपनी 13वीं जेनरेशन यानी iPhone13 तक पहुँच गया है और साथ ही iPhone14 को लेकर अभी से अटकले लगनी शुरू हो गई हैं कि ये एप्पल मार्केट शेयर के लिए एक गेम चेंजर साबित हो सकती है।

भारत में लाखों लोग बेसब्री से Apple iPhone13 के रिलीज का इंतजार कर रहे हैं। इसके प्रो मैक्स की कीमत भारत में 1 लाख 30 हजार तक जा सकती है। पहले आईफोन से तुलना करके देखें तो बेहतर होने के क्रम में आईफोन 2 मेगापिक्सल से ऊपर उठते उठते अब डीएसएलआर कैमरे जैसे फीचर से लैस हो गया है। नई जेनरेशन के फोन में हमें क्वाड रियर कैमरा देखने को मिलेगा। इसके अलावा प्रोसेसर की बात करें तो अपकमिंग आईफोन 13 सीरीज को कंपनी अपने लेटेस्ट A15 Bionic प्रोसेसर के साथ लॉन्च कर सकती है, जो कि 4nm process पर बने होंगे। एप्पल के इस प्रोसेसर की मैन्युफैक्चरिंग शुरू हो गई है। आने वाला iPhone13 में यूजर्स मास्क पहनकर फेस अनलॉक फीचर से अपने फोन को अनलॉक कर सकेंगे। इसके अलावा, स्मार्टफोन एक फिंगरप्रिंट सेंसर के साथ आएगा जो फेस आईडी फीचर के साथ मौजूद रहेगा।

Iphone बनाना एप्पल की उपलब्धि

बता दें कि आईफोन बनाना एप्पल की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। इस प्रोडक्ट ने न केवल कंपनी के प्रतिद्वंदियों को चुनौती दी थी, बल्कि बाजार का रुख भी अपनी ओर कर लिया था। 29 जून 2007 का दिन ढलते हुए एप्पल का स्टॉक प्राइस जो $122.04 प्रति शेयर (आज के हिसाब से ₹9054.90) था। वो कुछ ही साल बाद $335.26 (₹24911.49) पहुँचा गया। वहीं नोकिया और एचटीसी जैसी नामी कंपनियों के स्टॉक प्राइस कम हो गए। साल 2011 की यही रिपोर्ट ये भी बताती है कि एप्पल ने वर्ष की पहली तिमाही में अपना लगभग 50% रेवेन्यू सिर्फ आईफोन से जेनरेट किया। वहीं उस साल मार्च तक 10 करोड़ 80 लाख फोन बेचे जबकि आईपॉड केवल 6 करोड़ बिक पाए थे।

आज कम कीमत में उपलब्ध होने के कारण हर दूसरे शख्स के पास एंड्रॉयड फोन हैं, जिसके चलते (साल 2020 की रिपोर्ट के मुताबिक) इनका मार्केट शेयर भी 72% रहा, जबकि एप्पल का मार्केट शेयर 27% रहा और इसे कायम रखने में iphone ने एक बड़ी भूमिका निभाई है। ये फोन एलीट क्लास की पहली पंसद में आता है। बाजार में बची 1% हिस्सेदारी अन्य मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम, जिसमें ब्लैकबेरी ओएस, विंडोज फोन, टिज़ेन और अमेज़ॅन फायर ओएस जैसे ऑपरेटिंग सिस्टम आते हैं।

उल्लेखनीय है कि तकनीक की दुनिया में क्रांति लाने वाली एप्पल कंपनी आज न केवल मोबाइल जगत में बल्कि अन्य उपकरणों के मामले में भी नए आयाम हासिल कर रही है। कंपनी के दूसरे प्रोडक्ट्स  आईपैड, मैक-मिनी, आई-पॉड, आई-ट्यून्स, स्मार्टवॉच और आईओएस हैं। साल 2015 में इसने 233 अरब डॉलर की कमाई करके अपना नाम दुनिया की सबसे बड़ी सूचना प्रौद्योगिकी कंपनी में शामिल किया था। आज स्थिति ये है कि ये है बाजार में तमाम विकल्प मौजूद होने के बाद भी एप्पल कंपनी और इसके प्रोडक्ट्स का कोई तोड़ नहीं है। बात चाहे स्कूल कॉलेज में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं की हो या फिर नौकरी और बिजनेस करने वाले युवक-युवतियों की… हाथ में आईफोन होना स्टेटस का सबब बन गया है। हाल ये भी है कि बच्चे एप्पल का अर्थ सेब से ज्यादा आईफोन या उसके अन्य प्रोडक्ट्स से समझते हैं। 

विष्णुपद मंदिर: जहाँ हैं भगवान के पदचिह्नों वाली धर्मशिला, जाने क्यों गया में पिंडदान से पितरों को मिलती है मुक्ति

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार पृथ्वी पर तीन ऐसे क्षेत्र हैं जिन्हें पिंडदान के लिए सबसे उत्तम माना गया है। ये हैं: बद्रीनाथ का ब्रह्मकपाल क्षेत्र, हरिद्वार का नारायणी शिला क्षेत्र और बिहार का गया क्षेत्र। तीनों स्थान ही पितरों की मुक्ति के लिए महत्वपूर्ण स्थान हैं। लेकिन इनमें गया क्षेत्र का विशेष महत्व है। ऐसा इसलिए क्योंकि यहाँ स्थित हैं कुछ ऐसे दिव्य स्थान जहाँ पिंडदान करने से पूर्वजों को साक्षात भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है और उन्हें मुक्ति मिलती है। इसी गया क्षेत्र में स्थित है अतिप्राचीन विष्णुपद मंदिर जो सनातन के अनुयायियों में सबसे पवित्र माना गया है। इस मंदिर में स्थित हैं भगवान विष्णु के चरणचिह्न जिनके स्पर्श मात्र से ही मनुष्य के सभी पापों का नाश होता है।

सतयुग काल से ही अंकित हैं पदचिह्न

मंदिर के गर्भगृह में स्थापित जिस शिला (पत्थर) पर भगवान शिव के पदचिह्न अंकित हैं, उसे धर्मशिला कहा जाता है। गया महात्म्य के अनुसार इसे स्वर्ग से लाया गया था। पुराणों के अनुसार गयासुर नामक एक असुर ने तपस्या कर भगवान से आशीर्वाद प्राप्त किया। लेकिन इसका दुरुपयोग करते हुए उसने देवताओं को ही तंग करना शुरू कर दिया। इससे त्रस्त होकर देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। भगवान विष्णु ने अपनी गदा से गयासुर का वध कर दिया।

बाद में भगवान विष्णु ने गयासुर के सिर पर एक पत्थर रखकर उसे अपने पैरों से दबा दिया। यह पत्थर वही धर्मशिला थी जिसे स्वर्ग से लाया गया था। पैरों से इस पत्थर को दबाने के कारण उस पर भगवान विष्णु के चरण के निशान अंकित हो गए और गयासुर को मोक्ष की प्राप्ति हुई। गयासुर ने भी भगवान से यह वरदान माँगा कि जितनी भूमि पर गयासुर का शरीर है वह स्थान अत्यंत पवित्र माना जाए और यहाँ पिंडदान करने से पूर्वजों को मोक्ष की प्राप्ति हो। तब से ही गया क्षेत्र पितरों की मुक्ति के लिए पवित्रतम पिंडदान क्षेत्र माना जाने लगा।

मंदिर इसलिए भी विशेष हो जाता है क्योंकि यहाँ भगवान श्री राम और माता सीता भी यहाँ आए थे। यह वही स्थान है, जहाँ माता सीता ने महाराज दशरथ को पवित्र फल्गु नदी के किनारे बालू से बना पिंड अर्पित किया था। इसके बाद से इस स्थान पर बालू के पिंडदान की प्रथा है।

18वीं शताब्दी में हुआ था जीर्णोद्धार

हालाँकि मंदिर में कई युगों से भगवान विष्णु के चरणचिह्न अंकित हैं और पौराणिक काल से ही यहाँ तर्पण एवं पिंडदान का कार्य होता आ रहा है। लेकिन मंदिर का वर्तमान स्वरूप इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा दिया गया है। इस मंदिर का निर्माण जयपुर के कारीगरों ने काले ग्रेनाइट पत्थर को तराश कर किया है। मंदिर के गुंबद की जमीन से ऊँचाई लगभग 100 फुट है। इसके अलावा मंदिर का प्रवेश और निकास द्वार भी चाँदी का ही है।

विष्णुपद मंदिर के शिखर पर 50 किलोग्राम सोने का कलश स्थापित किया गया है। इसके अलावा मंदिर में 50 किग्रा सोने से बनी ध्वजा भी स्थापित है। इसके अलावा मंदिर के गर्भगृह में 50 किग्रा चाँदी का छत्र और 50 किग्रा चाँदी का अष्टपहल है।   

मंदिर के गर्भगृह में स्थापित भगवान विष्णु के चरणचिह्नों में गदा, शंख और चक्र अंकित है। प्रतिदिन इन पदचिह्नों का श्रृंगार रक्त चंदन से किया जाता है। गया क्षेत्र में स्थित 54 वेदियों में से 19 वेदियाँ विष्णुपद मंदिर में ही स्थित हैं जहाँ पूर्वजों की मुक्ति के लिए पिंडदान किया जाता है। इन 19 वेदियों में से 16 वेदियाँ अलग हैं और तीन वेदियाँ रुद्रपद, ब्रह्मपद और विष्णुपद हैं जहाँ खीर से पिंडदान का विधान है।

कैसे पहुँचे?

गया में अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डा स्थित है। चूँकि गया एक बौद्ध क्षेत्र भी है इसलिए यहाँ श्रीलंका, थाईलैंड, सिंगापुर और भूटान जैसे देशों से भी फ्लाइट आती रहती हैं। इसके अलावा बिहार का दूसरा सबसे व्यस्त हवाईअड्डा गया, दिल्ली, वाराणसी और कोलकाता जैसे शहरों से भी जुड़ा हुआ है। गया जंक्शन दिल्ली और हावड़ा रेललाइन पर स्थित है। यहाँ से कई बड़े शहरों के लिए ट्रेनें चलती हैं। यहाँ तक कि बिहार और झारखंड में गया ही एकमात्र उन 66 रेलवे स्टेशनों में शामिल है जिन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बनाए जाने की योजना है। इसके अलावा सड़क मार्ग से भी गया, बिहार और देश के अन्य शहरों से जुड़ा हुआ है। कोलकाता से दिल्ली तक जाने वाली ग्रैंड ट्रंक रोड गया से 30 किमी दूर स्थित दोभी से गुजरती है। गया से पटना 105 किमी, वाराणसी 252 किमी और कोलकाता 495 किमी की दूरी पर स्थित है।

‘हिन्दू हूँ, पुनर्जन्म लेकर स्वतंत्र भारत में फिर आऊँगा’: गीता पाठ कर फाँसी के फंदे पर झूलने वाला ‘काकोरी’ का नायक

भारत में एक से बढ़ कर एक क्रांतिकारी हुए हैं। इनमें बंगाल के स्वतंत्रता सेनानियों का एक अलग ही स्थान है। बंगाल, यानी ब्रिटिश काल का बंगाल प्रेसिडेंसी। इसमें आज के पश्चिम बंगाल के साथ-साथ बांग्लादेश भी आ जाता है। आज के इसी बांग्लादेश के पबना जिले में राजेंद्र नाथ लाहिड़ी का जन्म हुआ था। उनका नाम ‘काकोरी कांड’ के कारण लोकप्रिय हुआ। इसमें शामिल अन्य क्रांतिकारी थे- अशफाकुल्लाह खान, ठाकुर रोशन सिंह और राम प्रसाद बिस्मिल।

इन तीनों का नाम तो आपने सुना ही होगा, खासकर बिस्मिल और अशफाकुल्लाह खान का। लेकिन, राजेंद्र लाहिड़ी का नाम अक्सर दब जाता है। दिसंबर 19, 1927 – ये वही तारीख़ है, जब इन चारों को फाँसी की सज़ा होनी थी। लेकिन, लाहिड़ी को 2 दिन पहले ही मौत को गले लगाना पड़ा। 1920 का वो दशक था, जब भारत में ब्रिटिश आक्रांताओं के विरुद्ध क्रांति भी बदलाव के दौर से गुजर रही थी। ये सभी 1924 में स्थापित ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ के सदस्य थे।

ये वो समय था, जब भगत सिंह और बिस्मिल जैसे क्रांतिकारी न सिर्फ ब्रिटिश के दाँत खट्टे करते थे, बल्कि अपने विचारों से समाज को झकझोरते थे और आगे का समाज कैसा हो, इस बारे में लेखन और चिंतन का कार्य करते थे। राजनीति और धर्म से लेकर जातिवाद तक पर वो बहस करते थे। HRA का भी यही स्वप्न था कि आज़ाद भारत में एक ऐसे समाज का निर्माण हो, जहाँ कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति का शोषण न कर सके।

राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी इस नई तरह की क्रांति के अगुआ समूह में थे। उनका जन्म जून 29, 1901 को एक ब्राह्मण जमींदार परिवार में हुआ था। राजेंद्र लाहिड़ी के बारे में कहा जाता है कि वो एक शांत स्वभाव के व्यक्ति थे और अक्सर मुस्कराते रहते थे, लेकिन उनके भीतर क्रांति की आग जलती रहती थी। उन्हें पढ़ाई के लिए वाराणसी भेजा गया था, जहाँ वो सचिन्द्रनाथ सान्याल के संपर्क में आए। सान्याल HRA के सह-संस्थापक थे।

अर्थशास्त्र और इतिहास जैसे विषयों में स्नातक की डिग्री हासिल कर चुके राजेंद्र नाथ लाहिड़ी का क्रांतिकारी जीवन भी यहीं से शुरू होता है। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) में उन्हें ‘बंगाल साहित्य परिषद’ का मानद सचिव चुना गया था। साथ ही साथ ही वे वहाँ के हेल्थ यूनियन के सचिव भी थे। वे ‘बंगबानी’ जैसे समाचार पत्र और ‘शंका’ जैसी पत्रिका में लेखन कार्य भी करते थे। ‘शंका’ के तो वे संपादक भी थे।

इसी से राजेंद्र नाथ लाहिड़ी के बौद्धिक स्तर का पता लगाया जा सकता है। वे क्रांतिकारी तो थे ही, लेकिन साथ ही एक बुद्धिजीवी, एक चिंतक भी थे। ‘अग्रदूत’ नाम की एक मासिक पत्रिका भी उस समय आती थी, जिसे हाथ से ही लिखा जाता था। वो उसमें भी लेख लिखा करते थे। ये भी ध्यान देने वाली बात है कि जब उन्होंने भारत माता के लिए मौत को गले लगाया था, तब वे इतिहास विषय में MA की पढ़ाई कर रहे थे।

HRA ने उन्हें वाराणसी में ही बड़ी जिम्मेदारी दे दी थी। उन्हें वहाँ का ‘डिस्ट्रिक्ट ऑर्गेनाइजर’ और प्रांतीय परिषद का सदस्य का पद दिया गया था। इस दौरान वो कभी चारु, कभी जवाहर तो कभी जुगल किशोर बन कर क्रांति की ज्वाला को जगाए रखते थे, ताकि अंग्रेजों से बच कर उन्हें धूल चटा सकें। ‘काकोरी कांड’ के दौरान उन्होंने ही दूसरे दर्जे के डब्बे की चेन खींच कर ट्रेन रोकी थी। उस ट्रेन को क्रांतिकारियों ने लूट कर अंग्रेजों को बड़ा झटका दिया था।

इससे पहले भी HRA के लिए फंड्स जुटाने हो या फिर कोई दुष्कर कार्य करना हो, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी हमेशा अग्रिम पंक्ति में रहते थे। HRA को क्रांतिकारी पोस्टर्स बनाने, हथियार खरीदने और अंग्रेजों से लड़ाई के लिए वित्त की ज़रूरत होती थी। इसके लिए वो उन अमीर जमींदारों को लूटते थे, जो अंग्रेजों के साथ मिल कर भारत की गरीब जनता का लहू चूस रहे थे। बाद में उन्होंने अंग्रेजों का ही माल लूटने की योजना बनाई।

वैसे भी अंग्रेज भारत की संपत्ति को विदेश भेज रहे थे या बर्बाद कर रहे थे, इसलिए अंग्रेजों को लूटना भारत की जनता का भला करने का ही कार्य था। इसी दौरान उन्होंने अगस्त 9, 1925 को राजस्व का माल लेकर जा रहे अंग्रेजों की ट्रेन को काकोरी में लूटा। इसके बाद अंग्रेजों की नज़र टेढ़ी हो गई थी, इसलिए क्रांतिकारियों को अलग-अलग जगहों पर छिप कर रहना पड़ा। साहित्य की समझ के धनी लाहिड़ी ने ये समय साहित्यिक चर्चा और चिंतन में बिताया।

आखिरकार नवंबर 10, 1925 को राजेंद्र नाथ लाहिड़ी को अंग्रेजों ने पकड़ लिया। उन्हें कोलकाता से गिरफ्तार किया गया। दक्षिणेश्वर में उन्हें उनके कई अन्य साथियों के साथ एक बम की फैक्ट्री से गिरफ्तार किया गया। इसे ‘दक्षिणेश्वर बम केस’ भी कहा जाता है। उन्हें पहले तो 10 साल की सज़ा सुना कर अंडमान भेजने का हुक्म दिया गया, लेकिन बाद में अंग्रेजों को पता चला कि ‘काकोरी कांड’ के पीछे असल दिमाग राजेंद्र नाथ लाहिड़ी का ही था।

उन्हें लखनऊ सेन्ट्रल जेल में ट्रांसफर कर दिया गया। सबसे गौर करने वाली बात ये है कि राजेंद्र लाहिड़ी को फाँसी देने के लिए जो तारीख़ तय की गई थी, उससे 2 दिन पहले ही उन्हें फंदे से लटका दिया गया। ये अपने-आप में एक दुर्लभ मामला है, जब किसी को तय तारीख़ से पहले ही फाँसी दे दी गई हो। कहा जाता है कि जब वे गोंडा जेल में बंद थे, तो बाहर उनके साथियों ने उन्हें जेल से निकालने का पूरा इंतजाम कर लिया था, इसलिए ऐसा किया गया।

गोंडा जेल अंग्रेजों के लिए तुरंत पहुँचना आसान नहीं था या अगर वहाँ क्रांतिकारियों का आक्रमण होता तो अंग्रेज तुरंत दल-बल नहीं भेज पाते, इसलिए उन्होंने राजेंद्र लाहिड़ी को खतरा मान कर उन्हें फाँसी पर लटका दिया। राजेंद्र लाहिड़ी ने अपने अंतिम दिन ईश्वर की भक्ति में भी बिताए। दक्षिणेश्वर प्रवास के दौरान उन्हें कुछ आध्यात्मिक अनुभव हुए थे, जिससे माँ काली के प्रति उनकी श्रद्धा बढ़ी। वहीं से उन्हें गिरफ्तार भी किया गया था।

राजेंद्र नाथ लाहिड़ी एक क्रांतिकारी थे, जिनके जिंदा रहने के दौरान ही नहीं, बल्कि मृत्यु के बाद भी दुश्मन भयभीत थे। अंग्रेजों को लगता था कि उनकी मौत की खबर सुन कर जेल में विद्रोह हो सकता है, इसलिए उन्होंने टेढ़ी नदी के किनारे गुपचुप तरीके से उनका अंतिम संस्कार कर दिया था। फाँसी पर झूलने के समय भी उनके मुँह से ‘वंदे मातरम्’ ही निकल रहा था। आज तक किसी को नहीं पता कि उनका अंतिम संस्कार कहाँ किया गया था।

कहते हैं, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी के साथी उनके अंतिम संस्कार के स्थल पर एक स्मारक बनवाना चाहते थे, लेकिन अंग्रेजों की सरकार ने इसकी अनुमति ही नहीं दी। इस दौरान मनमथनाथ गुप्त, लाल बिहारी टंडन और ईश्वरशरण जैसे उनके साथियों ने उस स्थल को चिह्नित कर वहाँ एक बोतल गाड़ दी, ताकि बाद में स्मारक बनवाया जा सके। लेकिन, दुर्भाग्य से ये क्रांतिकारी भी अन्य मामलों में गिरफ्तार कर लिए गए।

राजेंद्र नाथ लाहिड़ी मात्र 8 वर्ष की आयु में ही वाराणसी अपने मामा के यहाँ पढ़ने आ गए थे। उसी दौरान क्रांतिकारियों की ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिवोल्यूशन आर्मी’ के वाराणसी की जिम्मेदारी उनके कँधों पर आ गई। काकोरी कांड के लिए बिस्मिल और राजेंद्र नाथ लाहिड़ी की जो बैठक हुई थी, उसमें चंद्रशेखर आजाद भी मौजूद थे। इस मिशन का सारा दायित्व उन्हें ही सौंपा गया था। उनके खिलाफ सरकारी खजाना लूटने और सरकार के खिलाफ सशस्त्र युद्ध छेड़ने का मुकदमा चलाया गया।

जिस दिन उन्हें फाँसी होनी थी, उस दिन भी उन्होंने भगवद्गीता का पाठ और व्यायाम किया। उन्होंने कहा था कि वो मृत्यु के लिए फाँसी के फंदे पर झूलने नहीं जा रहे हैं, बल्कि इससे उन्हें स्वतंत्र भारत में पुनर्जन्म का सौभाग्य प्राप्त होने वाला है। उन्होंने खुद को हिन्दू बताते हुए पुनर्जन्म में अटूट आस्था की बात की थी और कहा था कि अगले जन्म में वो एक स्वस्थ शरीर में जन्म लेना चाहते हैं, ताकि भारत माता के लिए फिर कार्य कर सकें।

इस घटना के बाद किसी को भी गोंडा जेल में फाँसी नहीं हुई है। जहाँ उन्हें फाँसी हुई थी, उस कमरे को मंदिर का रूप दिया गया है। काल कोठरी को भी वैसे ही रखा गया है। प्रत्येक वर्ष दिसंबर में उनके बलिदान दिवस के दिन इस कोठरी को खोला जाता है, जहाँ लोग इस अमर बलिदानी को याद करने आते हैं। मोहनपुर गाँव में जन्मे राजेंद्र नाथ लाहिड़ी ने गोंडा के जेल रोड पर स्थित कारगार में अंतिम साँसें लीं।

‘काकोरी कांड’ के मामले में अंग्रेजों ने 40 क्रांतिकारियों को गिरफ्तार किया था। एक यात्री की उस दौरान गलती से गोली लगने से मौत हो गई थी, इसलिए अंग्रेजों ने मुक़दमे में हत्या की धाराएँ भी लगाई थीं। फाँसी के वक़्त राजेंद्र नाथ लाहिड़ी की उम्र मात्र 26 वर्ष ही थी। दिसंबर 17, 1927 की वही तारीख़ थी, जब भगत सिंह और राजगुरु ने ब्रिटिश पुलिस में ASP जॉन सॉन्डर्स को मार गिराया था। उन्होंने लाला लाजपत राय पर लाठी चलवाने वाले अंग्रेज अधिकारी से बदला लेने के लिए ये कार्रवाई की थी।

हालाँकि, इस दौरान SP जेम्स स्कॉट बच निकला था, क्योंकि सॉन्डर्स को ही क्रांतिकारियों ने एसपी समझ लिया था। अप्रैल 6, 1927 वो तारीख़ ‘काकोरी कांड’ के बलिदानियों को फाँसी की सज़ा सुनाई गई थी। एक और जानने लायक बात ये है कि क्रांति उन्हें विरासत में मिली थी। जब उनका जन्म हुआ था, तब उनके पिता व बड़े भाई ‘अनुशीलन दल’ की गुप्त गतिविधियों में संलिप्त होने के आरोप में जेल में बंद थे।

उनके पिता का नाम क्षितिज मोहन लाहिड़ी खुद एक स्वतंत्रता सेनानी थे। पबना में कई विकास कार्य भी उनकी ही देन हैं। 1915 में उनके कुछ कारीबियों की मदद से उनके नाम पर उनके बेटे राजेन्द्र ने लाहिड़ी मोहनपुर में केएम इंस्टीटूशन नामक स्कूल भी खोल था। इस स्कूल के लिए उनकी ही दान की गई जमीन का इस्तेमाल किया गया था। उन्होंने सिराजगंज में रेलवे स्टेशन भी बनवाया। 1909 में उनका परिवार वाराणसी शिफ्ट हो गया था।

इसी तरह ‘काकोरी कांड’ के नायक राजेंद्र नाथ लाहिड़ी ने अपनी माँ बसंत कुमारी के नाम पर एक पारिवारिक पुस्तकालय की स्थापना की थी। दरअसल, वो दक्षिणेश्वर में बम बनाने प्रशिक्षण लेने गए थे, लेकिन गलती से उनके साथियों से एक बम फट गया। इसी का बहाना बना कर अंग्रेज सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था। उन्होंने बम बनाने के सारे सामान भी जुटा लिए थे। फाँसी के समय वो मुस्कुरा रहे थे और फंदे को उन्होंने चूमा भी था।

सिख लड़कियों का ‘जबरन’ धर्मांतरण: एक लड़की ने वापस लौटने से किया इनकार, कोर्ट में कहा- पति के साथ रहना चाहती ​हूँ

जम्मू-कश्मीर में दो सिख लड़कियों के कथित अपहरण और जबरन धर्मांतरण का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। इस घटना के बाद से सिख समुदाय में व्यापक आक्रोश है। उन्होंने आरोप लगाया है कि श्रीनगर में सिख समुदाय की दो लड़कियों को बंदूक की नोंक पर अगवा किया गया और फिर ज्यादा उम्र के लोगों के साथ उनका निकाह करवा दिया गया। सोमवार (28 जून 2021) को इसको लेकर जमकर विरोध प्रदर्शन किया गया।

शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) की अध्यक्ष बीबी जागीर कौर ने मीडिया को बताया कि दो में से एक ने इस्लाम मजहब कबूल कर लिया है और मुस्लिम शख्स से निकाह कर लिया है। वह फिर से सिख धर्म नहीं अपनाना चा​हती और परिवार के पास भी नहीं लौटना चा​हती है।

द ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट के अनुसार, एसजीपीसी अध्यक्ष ने पटियाला में मीडिया को संबोधित करते हुए कहा, ”सिख समुदाय से आने वाले हर परिवार का कर्तव्य है कि वे बच्चों को अपने धर्म का पालन करना सिखाएँ। इसके लिए उन्हें शिक्षित करें और प्रोत्साहित करें। हम, एसजीपीसी के रूप में केवल अपने धर्म का प्रचार कर सकते हैं, लेकिन किसी पर अपना धर्म नहीं थोप सकते हैं।”

जागीर कौर ने आगे बताया कि लड़की के परिवार और रिश्तेदारों ने एसजीपीसी (SGPC) से संपर्क किया था। उन्होंने हमसे अनुरोध किया था कि हम उनकी बेटी को फिर से सिख धर्म अपनाने के लिए कहें और उसे घर वापस लाने की कोशिश करें। कौर ने कहा, “लड़की इसके लिए नहीं मानी, ऐसे में हम उस पर कोई दबाव नहीं बना सकते हैं।” जानकारी के मुताबिक, एक लड़की को सिख समुदाय के हवाले कर दिया गया है, लेकिन दूसरी अभी भी धर्म परिवर्तन करवाने वालों के पास है।

बताया जा रहा है कि सिख लड़कियों के जबरन धर्मांतरण मामले में एक युवती 18 साल की है। कथित तौर पर उसका 40 साल के अधेड़ के साथ निकाह करवाया गया, जो कि पहले से शादीशुदा है। परिवार के विरोध के बाद लड़की को उसके माता-पिता को सौंप दिया गया है। वहीं, दूसरे मामले में भी बालिग लड़की का निकाह मुस्लिम शख्स से हुआ है, लेकिन इस लड़की ने कोर्ट में अपने पति के साथ रहने की इच्छा जताई है।

गौरतलब है कि वर्ष 2012 में पंजाब की पूर्व मंत्री और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की अध्यक्ष बीबी जागीर कौर को अपनी बेटी की हत्या के मामले में गिरफ्तार किया गया था। उन्हें 20 अप्रैल, 2000 में मृत पाई गई उनकी बेटी हरप्रीत कौर की हत्या की साजिश रचने का दोषी ठहराया गया था। सीबीआई की अदालत ने बीबी जागीर कौर को हत्या के आरोप से दोषमुक्त कर दिया था और उन्हें सिर्फ अपहरण और जबरन गर्भपात का दोषी ठहराया था। सीबीआई अदालत ने कौर को 5 साल कैद की सजा सुनाई थी। बाद में मामला हाईकोर्ट पहुँचा था। प्रकाश सिंह बादल सरकार में कैबिनेट मंत्री रहीं बीबी को इसके चलते इस्तीफा देना पड़ा था। 7 महीने जेल में बिताने के बाद जागीर को जमानत मिली थी। बाद में कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया था।

बता दें कि इस मामले में दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी के अध्यक्ष और अकाली दल के राष्ट्रीय प्रवक्ता मनजिंदर सिंह सिरसा सक्रिय रूप से अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं और लगातार यह माँग कर रहे हैं कि जम्मू-कश्मीर में इस प्रकार के धर्मांतरण और निकाह को रोकने के लिए सख्त कानून बनाया जाए। उनकी यह माँग बिल्कुल जायज है, लेकिन सिरसा ने ही लव जिहाद पर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार द्वारा कानून बनाए जाने पर हिन्दू धर्म को यह कहते हुए एक ‘कमजोर धर्म’ कहा था कि अगर किसी धर्म को अपनी रक्षा करने के लिए कानून की जरूरत पड़े तो वह धर्म पाप है।

मनजिंदर सिंह सिरसा ने ट्वीट करके गृह मंत्री अमित शाह से माँग की है कि जम्मू-कश्मीर में सिख नाबालिग लड़कियों के जबरन निकाह को रोकने के लिए ‘उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश’ की तरह कानून लागू किया जाए, जिसके तहत अंतरधार्मिक विवाह के लिए अभिभावक की मंजूरी आवश्यक हो।

उत्तरी बंगाल में दार्जिलिंग के दौरे पर राज्यपाल, तिलमिलाई ममता ने धनखड़ को कहा- ‘भ्रष्ट आदमी’

केंद्र सरकार और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ के खिलाफ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तल्खी किसी से छुपी नहीं है। इसी क्रम में सोमवार (28 जून) को ममता ने राज्यपाल धनखड़ को एक ‘भ्रष्ट आदमी’ कह दिया और आरोप लगाया कि धनखड़ का नाम 1996 के जैन हवाला मामले में शामिल है।

सोमवार को राज्य सचिवालय में पत्रकारों से चर्चा करते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि राज्यपाल का नाम जैन हवाला केस में सामने आया था, तब उन्हें कोर्ट जाना पड़ा था लेकिन उन्होंने अपना नाम हटवा लिया था। ममता ने बताया कि अब एक बार फिर याचिका दाखिल की गई है जो पेंडिंग है। ममता ने कहा, “यह कहने के लिए मुझे माफ करें, लेकिन वह (जगदीप धनखड़) एक भ्रष्ट आदमी हैं।“

ममता ने केंद्र को भी निशाने पर लिया और कहा कि यदि केंद्र को इस बारे में नहीं पता तो वह बताती हैं कि चार्जशीट निकाली जाए, जिसमें धनखड़ का भी नाम शामिल है। ममता ने कहा कि केंद्र सरकार ऐसे आदमी को राज्यपाल के पद पर क्यों बने रहने देना चाहती है? ममता ने यह भी दावा किया कि एक पत्रकार ने उन्हें जैन हवाला मामले में धनखड़ के शामिल होने के बारे में पूरी डिटेल भेजी है।

हालाँकि, राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने ममता बनर्जी के आरोपों का पूरी तरह से खंडन करते हुए कहा कि यह जानकारी पूरी तरह गलत है और उन्हें किसी वरिष्ठ नेता से ऐसी उम्मीद बिल्कुल भी नहीं है। धनखड़ ने कहा कि उनका नाम किसी चार्जशीट में नहीं है और न ही ऐसा ही कोई दस्तावेज है। ममता बनर्जी के खिलाफ कार्रवाई करने के प्रश्न पर राज्यपाल धनखड़ ने कहा कि भारत के इतिहास में किसी ने भी अपनी छोटी बहन के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है और वह भी नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि वह बंगाल के लोगों के लिए जो भी कर सकते हैं वही करेंगे।

जैन हवाला कांड, नब्बे के दशक का एक राजनैतिक घोटाला था। जाँचकर्ता जब हिजबुल मुजाहिद्दीन के सदस्यों से मिले 23 डिमांड ड्राफ्ट की जाँच कर रहे थे तब उन्हें हवाला ऑपरेटर्स की एक डायरी मिली थी। इस हस्तलिखित डायरी में लगभग 65 करोड़ रुपए के भुगतान का उल्लेख था। डायरी में उन व्यक्तियों के नाम कोड वर्ड में लिखे गए थे। कोड वर्ड में लिखे गए ये नाम कई बड़े नेताओं के नाम के अक्षरों से मेल खाते थे।

हालाँकि, इस मामले में केन्द्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) ने दो दर्जन से अधिक चार्जशीट दाखिल की थी, लेकिन यह मामला निष्कर्ष तक नहीं पहुँच सका क्योंकि सीबीआई इस रिश्वत कांड में कोई पुख्ता सबूत नहीं दे पाई थी।

हालाँकि ममता बनर्जी ने राज्यपाल के विरुद्ध भ्रष्टाचार का आरोप ऐसे समय लगाया है, जब राज्यपाल धनखड़ उत्तरी बंगाल में दार्जिलिंग के दौरे पर हैं और उन्होंने गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (GTA) में गड़बड़ी का आरोप लगाया है। GTA एक सेमी-ऑटोनॉमस बॉडी है, जो उत्तरी बंगाल में दार्जिलिंग और कलिमपोंग के प्रशासन के लिए जिम्मेदार है।

50 साल के इस्माइल ने 35 का बता युवती को निकाह के लिए बुलाया होटल, रेप के बाद भागा मुंबई: शिकायत दर्ज

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक व्यक्ति द्वारा निकाह के नाम पर दुष्कर्म करने का मामला सामने आया है। एक मेट्रोमोनियल साइट से माध्यम से हुई इस मुलाकात के बाद 50 वर्षीय व्यक्ति ने निकाह के नाम पर लड़की का रेप किया। इसके बाद भी लड़की उस व्यक्ति से निकाह के लिए लगातार कहती रही और इस तरह 9 महीने बीत गए। जब व्यक्ति निकाह के लिए तैयार नहीं हुआ तो लड़की ने सोमवार (28 जून 2021) को कोहेफिजा थाने में मुंबई निवासी इस व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज कराया।

पूछताछ में लड़की ने बताया कि पिछले साल अगस्त में मेट्रोमोनियल साइट पर इस्माइल सैय्यद से दोस्ती हुई। लड़की ने बताया कि दोनों के बीच बातचीत होने लगी और उसके बाद 15 सितंबर को दोनों का निकाह होना तय हुआ। लड़की के अनुसार, मुंबई के मलाड का रहने वाला इस्माइल खुद को बिजनेसमैन बताता था और अपनी प्रोफाइल पर उम्र 35 साल लिखा था। लड़की ने बताया कि वह भी 31 साल की है और विदिशा में जॉब करती है।

लड़की ने आगे बताया कि दोनों के बीच निकाह का दिन तय हो जाने के बाद उसका होने वाला शौहर इस्माइल 15 सितंबर को मुंबई से भोपाल आया। लड़की ने आगे बताया, “मैं उसके बुलाने पर होटल नूर-उस-सबाह पहुँच गई। जब उससे निकाह के लिए पूछा तो वह बार-बार कहता रहा कि काजी यहीं आएँगे और इस बीच रात हो गई। इसके बाद जब रात काफी हो गई और काजी नहीं आए तो उसने मुझे कहा यहीं रुक जाओ।”

लड़की ने पुलिस को बताया कि आरोपी इस्माइल ने उसके साथ जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाए और बिना निकाह किए मुंबई चला गया। उसके मुंबई जाने के बाद पता चला कि उसकी असली उम्र 50 साल है। इसके बावजूद लड़की उससे निकाह करने को तैयार थी, लेकिन इस्माइल ने मना कर दिया। लड़की ने बताया कि वह 9 महीने से उससे निकाह की मिन्नतें कर रही है, लेकिन वह नहीं मान रहा। परेशान होकर लड़की कोहेफिजा थाने पहुंची और शिकायत की।

कोहेफिजा पुलिस थाने के थानाध्यक्ष अनिल बाजपेयी का कहना है कि लड़की की शिकायत दर्ज कर ली गई है। पुलिस के मुताबिक, “आरोपी के खिलाफ छेड़छाड़, धमकी देने और ज्यादती करने का मामला दर्ज किया गया है। आरोपी के मुंबई में होने का पता चल गया है। जल्द ही उसे गिरफ्तार कर लिया जाएगा।”

बीबीसी की रिपोर्टिंग में आतंकवादी को चरमपंथी कहा जाएगा तो क्या होगा आतंक के विरुद्ध वैश्विक लड़ाई का?

जम्मू कश्मीर के पुलवामा जिले में आतंकवादियों ने एक स्पेशल पुलिस अफसर के घर पर हमला कर दिया। हमले में एस पी ओ फ़याज़ अहमद के घर में घुसकर आतंकवादियों ने ताबड़तोड़ फायरिंग की जिसके परिणाम स्वरुप वे, उनकी पत्नी और बेटी गंभीर रूप से घायल हो गए। तीनों को अस्पताल ले जाया गया जहाँ पुलिस अफसर और उनकी पत्नी को मृत घोषित कर दिया गया। बेटी को श्रीनगर के एक अस्पताल में भर्ती करवाया गया है। इस खबर की रिपोर्टिंग करते हुए बीबीसी ने आतंकवादियों को चरमपंथी बताते हुए निम्नलिखित ट्वीट लिखा ;

कई बार आतंकवादियों को चरमपंथी, मिलिटेंट्स या बंदूकधारी बताना बीबीसी के लिए नई बात नहीं है। इसे देखते हुए बीबीसी द्वारा आज फिर ऐसा करना जरा भी आश्चर्यचकित नहीं करता। पर जो बात हर बार आश्चर्यचकित करती है वह यह है बीबीसी ने यह नीति कश्मीर में हुई आतंकवादी घटनाओं की रिपोर्टिंग के लिए खास तौर पर दशकों से अपना रखी है। कश्मीरी आतंकवादियों को बीबीसी कभी चरमपंथी तो कभी गनमेन बताता रहा है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि बीबीसी जैसी वैश्विक समाचार संस्था के लिए आतंकवादियों को चरमपंथी बताना आवश्यक क्यों है? क्यों इन्हें आतंकवादी नहीं कहा जा सकता? बीबीसी की यह नीति किस हद तक न्यायसंगत है?

यदि बीबीसी को लगता है कि यह न्यायसंगत है तो फिर वैश्विक आतंकवाद के विरुद्ध दुनियाँ की लड़ाई का क्या होगा? क्या यह प्रश्न नहीं पूछा जाना चाहिए? वैसे देखा जाए तो कश्मीर में आतंकवादियों के पक्ष में बोलना या उनका अपोलॉजिस्ट बनने का काम केवल बीबीसी नहीं करता। आतंकवादियों और सेना, अर्ध सैनिक बल या पुलिस के बीच मुठभेड़ की रिपोर्टिंग में देशी मीडिया आतंकवादियों को चरमपंथी भले न कहे पर यह रिपोर्टिंग देशी पत्रकार और संपादकों के लिए भी अवसर लेकर आती है। वे ऐसे अवसरों पर अपने तरीके से अपोलॉजिस्ट बनने का काम करते हैं।

कई बार तो लगता है जैसे ये लोग इस बात की प्रतीक्षा में रहते हैं कि एक मुठभेड़ हो जाती तो आतंकवाद के लिए अपोलॉजिस्ट बनने का मौका मिल जाता। जब तक मुठभेड़ नहीं होती और रिपोर्टिंग का मौका न मिले तो किस बहाने आतंकवादियों के लिए अपोलॉजिस्ट बना जाए या किस बहाने उनके कर्मों पर चूना पोता जाए? दरअसल देशी मीडिया मुठभेड़ की रिपोर्टिंग में अपने अलग ही खेल रचता है। जैसे कोई आतंकवादी मारा जाए तो उसके प्रिय खेल, प्रिय गाने, प्रिय पहनावे वगैरह पर लिखा जा सके।

यह बताया जा सके कि; वो गणित के समीकरण हल करना चाहता था पर एक दिन अपने मोहल्ले में उसने देखा कि एक पुलिस वाला कुत्ते को पत्थर मार रहा था। बस वह गणित के समीकरण छोड़ ‘चरमपंथी’ बन गया। या फिर उसके पिता हेड मास्टर थे और वह खुद मास्टर बनना चाहता था पर उसके पास मास्टरी का फॉर्म भरने के लिए कलम नहीं थी और उसने निश्चय किया कि वह आतंकवादी बने…. सॉरी, चरमपंथी बनेगा। या यह कि मरने वाला नौजवान धोनी का फैन था और वह विकेट कीपर बनना चाहता था। एक दिन सेना के एक जवान ने उसका दस्ताना छीन लिया और इसलिए यह नौजवान चरमपंथी बन गया।

यदि मीडिया के ऐसे ही खेल रहे तो फिर आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक नैरेटिव का क्या होगा? रिपोर्टिंग को लेकर हर मीडिया हाउस की अपनी नीति हो सकती है पर कुछ बातें तो ऐसी होनी चाहिए जिन्हें लेकर कोई समझौता न हो। भारत द्वारा 370 हटाए जाने के बाद वैश्विक मीडिया संस्थानों की नीति में बदलाव आए दिन भारत के नक़्शे को गलत ढंग से दिखाए जाने से लेकर कश्मीरी आतंकवाद पर पर्दा डालने तक में दिखाई देता है। कई बार ऐसा लगता है जैसे ये संस्थान जानबूझकर भारत सरकार को चिढ़ा रहे हों।

पर एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि बीबीसी जैसी न्यूज़ संस्था क्या हर आतंकवादी को चरमपंथी कहता है? या यह नीति केवल कश्मीरी आतंकवादियों तक सीमित है? महत्वपूर्ण बात यह है कि बीबीसी ने अपनी रिपोर्टिंग में आतंकवादी शब्द का इस्तेमाल न करने का फैसला एक नीति के तौर पर भले ही 2019 में अपनाया हो पर कश्मीरी आतंकवाद के मामले में उसने यह नीति कई वर्षों से अपना रखी है। पर एक प्रश्न यह है कि क्या बीबीसी IRA के आतंकियों को भी पहले से ही चरमपंथी बताता रहा है? भारत में होने वाली आतंकवाद की घटनाओं को लेकर बीबीसी की रिपोर्टिंग पर सवाल हमेशा से उठते रहे हैं। प्रश्न यह है कि बीबीसी इस विषय पर भारत सरकार या भारतीयों की भावना को लेकर कभी गंभीर होगा?

निर्मला सीतारमण ने अर्थव्यवस्था को दिया ₹6.29 लाख करोड़ का बूस्टर डोज: पर्यटन सहित इन 8 सेक्टर्स के लिए खास ऐलान

केंद्रीय वित्‍त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार (28 जून 2021) को कोरोना प्रभावित क्षेत्रों के लिए राहत पैकेज की घोषणा की। इस पैकेज में स्वास्थ्य, पर्यटन, एमएसएमई, कृषि, पर्यटन और अन्य कई क्षेत्र शामिल हैं। उन्होंने प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में बताया कि सरकार 8 तरह के राहत का ऐलान करने वाली है। इसमें स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए 50000 करोड़ रुपए, जबकि मेडिकल इंफ्रा में सुधार के लिए सहायता दी जाएगी। वहीं जनस्‍वास्‍थ्‍य पर एक साल में 23220 करोड़ रुपए खर्च किए जाएँगे। वित्‍त मंत्री ने घोषणा की है कि क्रेडिट गारंटी स्कीम के तहत कोविड-19 से प्रभावित 25 लाख से ज्‍यादा लोगों को 3 साल के लिए 1.25 लाख रुपए का लोन दिया जाएगा। इस लोन पर लगने वाला ब्‍याज बैंकों के लिए तय एमसीएलआर (MCLR) से 2 फीसदी अधिक होगा।

इस राहत पैकेज में बच्‍चों और पेडियाट्रिक केयर पर फोकस रहेगा, जबकि पर्यटन क्षेत्र (Tourism Sector) को बढ़ावा देने के लिए सरकार की बड़ी योजना है। इसके तहत पर्यटन क्षेत्र से जुड़े लोगों को कई तरह की रियायतें दी जा रही है। वित्त मंत्री ने कहा कि गरीब कल्याण योजना पर 93869 रुपए का करोड़ का खर्च आएगा।

पर्यटन क्षेत्र को ऊँचाइयों पर ले जाने की योजना

निर्मला सीतारमण ने पर्यटन क्षेत्र को ऊँचाइयों पर ले जाने के लिए एक विशेष पैकेज की घोषणा की है। इस योजना के तहत 11000 से अधिक रजिस्टर्ड टूरिस्ट गाइड्स, ट्रेवल और टूरिज्म सेक्टर के स्टेकहोल्डर्स को वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी। इस योजना में पर्यटन मंत्रालय द्वारा मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय स्तर के पर्यटक गाइड, राज्य सरकारों द्वारा मान्यता प्राप्त पर्यटक गाइड और पर्यटन मंत्रालय द्वारा मान्यता प्राप्त यात्रा और पर्यटन हितधारक (टीटीएस) शामिल होंगे।

पर्यटन पुनरुद्धार पैकेज (साभार: निर्मला सीतारमण सोशल मीडिया अकाउंट )

विदेशी पर्यटकों को मुफ्त पर्यटक वीजा

सरकार ने 31 मार्च 2022 तक भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों के लिए 5 लाख मुफ्त पर्यटक वीजा की भी घोषणा की है। वहीं, लाइसेंस प्राप्त गाइड्स को 1 लाख रुपए तक और मान्यता प्राप्त ट्रैवल एंड टूरिज्म के स्टेकहोल्डर्स को 10 लाख रुपए तक का 100 फीसदी गारंटीड लोन मिलेगा।

वित्‍त मंत्री ने बताया कि आत्‍मनिर्भर भारत रोजगार योजना (Aatmanirbhar Bharat Rojgar Yojana) के तहत कर्मचारियों और नियोक्ता कंपनियों को मिलने वाला ईपीएफ (EPF) सपोर्ट अब 31 मार्च 2022 तक मिलेगा। इसके साथ ही सरकार नए नौकरीपेशा के PF contribution में कंपनी का हिस्‍सा भी देगी।

1.1 लाख करोड़ की लोन गारंटी स्कीम मिलेगी

निर्मला सीतारमण ने कहा कि कोरोना से ठप पड़े उद्योगों को कुल मिलाकर 1.1 लाख करोड़ की लोन गारंटी स्कीम मिलेगी। वित्त मंत्री ने कोविड प्रभावित क्षेत्रों के लिए 1.1 लाख करोड़ रुपए की ऋण गारंटी योजना की घोषणा की। इसमें से 50000 करोड़ रुपए चिकित्सा के क्षेत्र में खर्च किए गए। 8 महानगरों के अलावा अन्य शहरों में स्वास्थ्य और चिकित्सा की बुनियादी सुविधाओं का विस्तार किया गया। इसका उद्देश्य वंचित क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधाओं में सुधार करना है। इसके लिए सरकार 50% और नई परियोजनाओं के लिए 75% का गारंटी कवर देगी।

प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) की अवधि बढ़ाई

उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY ) को नवंबर 2021 तक बढ़ा दिया गया है। इसके तहत 133972 करोड़ का खर्च आएगा, जिसमें गरीब और असहाय लोगों को शामिल किया जाएगा। योजना के तहत एनबीए के लाभार्थियों को मई से नवंबर 2021 तक 5 किलो अनाज मुफ्त दिया जाएगा। वहीं, आत्मनिर्भर भारत रोजगार योजना को नौकरी के मौके बढ़ाने के लिए लॉन्‍च किया गया था। इसे भी 1 मार्च 2022 तक बढ़ाया गया है। इससे 80 हजार कंपनियों के 21.4 लाख लोगों को इससे फायदा हुआ है।

निर्मला सीतारमण ने कहा कि कृषि के क्षेत्र में किसानों को अतिरिक्‍त सब्सिडी दी जाएगी। उन्‍हें 14775 करोड़ रुपए की अतिरिक्‍त रकम दी जाएगी। किसानों को अब तक 85413 करोड़ रुपए का भुगतान किया जा चुका है।