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तीन बीघा कॉरिडोर: बांग्लादेशियों को आने-जाने के लिए भारत ने दी जमीन… लेकिन स्थानीय भारतीय मनाते हैं शहीद दिवस

‘तीन बीघा गलियारा या कॉरिडोर’, सुनने में भले ही जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा ही लगे लेकिन भारत और बांग्लादेश के संबंधों में इसका बड़ा ही महत्वपूर्ण योगदान है। यह गलियारा (कॉरिडोर) दो पड़ोसी देशों के बीच उस सीमाई सामंजस्य की कहानी कहता है, जिसके लिए सालों तक दोनों ही देशों की सरकारों के बीच बैठकें हुईं, समझौते हुए और उसके बाद कहीं अंतरराष्ट्रीय सीमा के उलझे हुए दाँव-पेंच सुलझ पाए।

26 जून 1992, यह वही तारीख थी जब भारत ने बांग्लादेश के लोगों को सहूलियत देने और कई सालों से चले आ रहे सीमा संकट को समाप्त करने की पहल की। इसी दिन भारत ने बांग्लादेश को 178 मीटर लंबा और 85 मीटर चौड़ा भूखंड 99 सालों की लीज पर दे दिया था, जिससे बांग्लादेश के नागरिक बिना किसी प्रशासनिक समस्या के अपने देश में आवागमन कर सकें। लेकिन यह ‘तीन बीघा गलियारा या कॉरिडोर’ है क्या और भारत द्वारा बांग्लादेश को इसे लीज पर देने की आवश्यकता ही क्यों पड़ी? क्या है इस छोटे से भूखंड का इतिहास? आगे ऐसे ही कुछ प्रश्नों के उत्तर ढूँढते हैं।

तीन बीघा गलियारे के अस्तित्व में आने की यात्रा

यह तब शुरू हुआ, जब भारत का विभाजन हुआ। भारत और पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) की सीमा का निर्धारण रैडक्लिफ अवॉर्ड (सर सिरिल रैडक्लिफ) के द्वारा किया गया। इसके तहत दोनों देशों के बीच लगभग 4,096 किलोमीटर की सीमा का निर्धारण हुआ। हालाँकि सीमा निर्धारण के बाद भी विवाद की स्थिति बनी रही। दोनों ही देशों के बीच कई ऐसे क्षेत्र थे, जो एक देश में स्थित थे लेकिन उन तक पहुँचने के लिए दूसरे देश के प्रशासनिक क्षेत्र से होकर जाना पड़ता था। इसके कारण दोनों ही देशों के नागरिकों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ा।

इसे देखते हुए 16 मई 1974 को भारत और बांग्लादेश (तब बांग्लादेश, पाकिस्तान से आजाद हो चुका था और एक नया देश बन चुका था) के बीच एक समझौता हुआ। इस समझौते को ‘लैंड बाउंड्री एग्रीमेंट’ कहा गया। इस समझौते के तहत यह तय हुआ कि भारत आधा बेरुबाड़ी संघ अपने पास रखेगा और बदले में बांग्लादेश को दहग्राम-अंगरपोटा का अधिकार क्षेत्र प्राप्त हुआ। यही वह समझौता था, जब पहली बार ‘तीन बीघा गलियारे की अवधारणा सामने आई। लैंड बाउंड्री एग्रीमेंट में यह सुनिश्चित किया गया कि भारत, बांग्लादेश को तीन बीघा जमीन भी देगा, जिससे बांग्लादेश के निवासी सरलता से आवागमन कर सकें। हालाँकि तब संवैधानिक सीमाओं के चलते ‘तीन बीघा गलियारा’ अस्तित्व में नहीं आ सका।

फोटो सोर्स : coochbehar.nic.in

इसके बाद 1982 में एक बार फिर इसके लिए प्रयास किया गया लेकिन तब भी कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सका। हालाँकि दोनों देशों की सरकारों के प्रयास के बाद अंततः 26 जून 1992 को बांग्लादेश के लोगों के आवागमन के लिए ‘तीन बीघा गलियारा’ प्रतिदिन 6 घंटे के लिए खोला गया। 1996 में 6 घंटे के इस समय को बढ़ाकर 12 घंटे कर दिया गया। हालाँकि क्षेत्र पर पूरा नियंत्रण भारत का ही बना रहा।

‘तीन बीघा गलियारा या कॉरिडोर’ को लेकर सबसे बड़ा समझौता सितंबर 2011 में ढाका में हुआ। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के बीच एक समझौता संपन्न हुआ। इस समझौते के तहत यह निर्णय लिया गया कि भारत के द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र में पड़ने वाला 178 x 85 वर्ग मीटर का भूखंड बांग्लादेश को 99 सालों की लीज पर दिया जाता है। अंततः दोनों देशों के बीच इस समझौते के बाद ‘तीन बीघा गलियारा’ अस्तित्व में आया।

2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के सत्ता में आने के बाद भारत और बांग्लादेश के बीच सीमा पर स्थित एन्क्लेव्स के हस्तांतरण की प्रक्रिया को तेजी से पूरा करने की प्रतिबद्धता जाहिर की गई। इसके लिए जून 2015 में 100वाँ संविधान संशोधन किया गया और इसके तहत बांग्लादेश को भारत की जमीन पर स्थित 111 एन्क्लेव्स हस्तांतरित कर दिए गए। साथ ही बांग्लादेश के अधिकार क्षेत्र में स्थित 51 बांग्लादेशी एन्क्लेव्स भारत को प्राप्त हुए।

एन्क्लेव्स को समझने के लिए: भारत की जमीन में बांग्लादेश का टुकड़ा, उसी बांग्लादेशी टुकड़े के अंदर भारत की जमीन (मैप साभार: जिन थॉर्प, वॉशिंगटन पोस्ट)

दोनों देशों के बीच सीमाओं के स्पष्ट निर्धारण के क्षेत्र में यह सबसे बड़ा कदम माना गया। हालाँकि इस संविधान संशोधन के माध्यम से एन्क्लेव्स के हस्तांतरण के बाद भी दहग्राम-अंगरपोटा एन्क्लेव अभी भी उसी स्थिति में है और ‘तीन बीघा गलियारा’ ही वह जमीन का एक भाग है, जो बांग्लादेश को अपने इन एन्क्लेव्स से जोड़ता है।

भौगोलिक स्थिति :

तीन बीघा भारत में पश्चिम बंगाल राज्य के कूचबिहार जिले के मेखलीगंज ब्लॉक के दक्षिण-पूर्व में स्थित भूमि की एक लंबी पट्टी है। भौगोलिक रूप से यह भूभाग फुलकदबरी ग्राम पंचायत (उत्तर में) और कुचलीबाड़ी ग्राम पंचायत (दक्षिण में) [दोनों भारत से संबंधित हैं] और दहग्राम (पश्चिम में) और पनबारी मौजा (पूर्व में) [दोनों बांग्लादेश से संबंधित हैं] से घिरा हुआ है।

फोटो सोर्स : coochbehar.nic.in

जमीन की तीन बीघा पट्टी, मेखलीगंज के 10 किमी दक्षिण पूर्व में है। यह रणनीतिक रूप से पश्चिम में दहग्राम और अंगरपोटा के बांग्लादेश परिक्षेत्रों और पूर्व में बांग्लादेश के पनबारी मौजा के बीच स्थित है। दोनों एन्क्लेव बांग्लादेश के पटग्राम पुलिस स्टेशन के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।  

तीन बीघा गलियारे पर आंदोलन

हालाँकि क्षेत्र के भारतीय लोग बिना किसी प्रतिबंध के ‘तीन बीघा कॉरिडोर’ के माध्यम से बांग्लादेशी लोगों के आवागमन को लेकर संतुष्ट नहीं है। विशेष तौर पर कुचलीबाड़ी क्षेत्र में रहने वाले लोगों को तीन बीघा गलियारे से बांग्लादेशी लोगों के आवागमन के दौरान अधिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। भारतीयों द्वारा हर साल 26 जून को तीन बीघा आंदोलन में मारे गए दो आंदोलनकारियों की याद में शहीद दिवस मनाया जाता है।

AR रहमान का माँ तुझे सलाम और ट्विटर की कॉपीराइट पॉलिसी: आखिर क्यों ब्लॉक हुआ रविशंकर प्रसाद का ट्विटर एकाउंट

संयुक्त राज्य अमेरिका के कॉपीराइट अधिनियम का कथित रूप से उल्लंघन करने पर केंद्रीय कानून और न्याय एवं इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद के एकाउंट को ब्लॉक करने के लिए माइक्रो-ब्लॉगिंग साइट ट्विटर एक बार फिर से जाँच के दायरे में आ गया।

केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने एक ट्वीट करते हुए कहा कि उनके एकाउंट के साथ कुछ बहुत ही अजीबोगरीब घटना हुई है। मंत्री ने कहा कि ट्विटर ने संयुक्त राज्य अमेरिका के डिजिटल मिलेनियम कॉपीराइट एक्ट का उल्लंघन होने के कथित आधार पर लगभग एक घंटे तक उनके अकाउंट को ब्लॉक कर दिया था।

हालाँकि मंत्री का ट्विटर अकाउंट सार्वजनिक तौर पर दिखाई दे रहा था लेकिन रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्विटर ने किसी भी अधिकृत व्यक्ति को लॉग इन करने या कोई पोस्ट करने की अनुमति नहीं दी।

जब मंत्री रविशंकर प्रसाद ने ट्विटर अकाउंट @rsprasad को एक्सेस करने की कोशिश की तो ट्विटर ने उन्हें यह कहते हुए एक संदेश भेजा, “आपका अकाउंट लॉक कर दिया गया है क्योंकि ट्विटर को आपके अकाउंट पर पोस्ट की गई सामग्री के लिए डिजिटल मिलेनियम कॉपीराइट एक्ट (DMCA) के तहत नोटिस मिला है। DMCA के तहत कॉपीराइट का वास्तविक मालिक ट्विटर को यह दावा करते हुए सूचित कर सकते हैं कि किसी उपयोगकर्ता ने उनके कॉपीराइट कार्यों का उल्लंघन किया है। एक लीगल नोटिस प्राप्त होने पर ट्विटर उस सामग्री को हटा देगा। ट्विटर कॉपीराइट उल्लंघन की नीति बनाए रखता है, जिसके तहत बार-बार उल्लंघन करने वाले एकाउंट्स को निलंबित भी किया जा सकता है।“ यह सूचना मिली है कि 2017 में किए गए पोस्ट के कारण रविशंकर प्रसाद के ट्विटर अकाउंट को ब्लॉक कर दिया गया था।

16 दिसंबर 2017 को जब भारत विजय दिवस मना रहा था तब रविशंकर प्रसाद ने एक वीडियो पोस्ट किया था जो 1971 के दौरान अपने प्राणों की आहुति देने वालों के लिए एक श्रद्धांजलि थी। इस युद्ध में भारत ने पाकिस्तान को हराया और बांग्लादेश एक स्वतंत्र देश के रूप में अस्तित्व में आया था। उस वीडियो के बैकग्राउंड म्यूजिक में ‘माँ तुझे सलाम’ था जिसे एआर रहमान ने गाया था और सोनी म्यूजिक ने प्रोड्यूस किया था।

रविशंकर प्रसाद द्वारा किया गया ट्वीट

यह जानकारी तब सामने आई जब ट्विटर ने लुमेन डेटा प्रकाशित किया जहाँ यह स्पष्ट रूप से बताया गया कि इसी पोस्ट के कारण रविशंकर प्रसाद के ट्विटर हैंडल को ब्लॉक कर दिया गया था।

ट्विटर द्वारा प्रकाशित लुमेन का डाटा

डिजिटल मिलेनियम कॉपीराइट एक्ट (DMCA) 1998 का ​​संयुक्त राज्य अमेरिका का कॉपीराइट कानून है जो विश्व बौद्धिक संपदा संगठन की 1996 की दो संधियों को लागू करता है।

रविशंकर प्रसाद की पोस्ट, जिसमें बैकग्राउंड म्यूजिक के रूप में माँ तुझे सलाम का इस्तेमाल किया गया था, को इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ फोनोग्राफिक इंडस्ट्री (आईएफपीआई) द्वारा कॉपीराइट उल्लंघन के रूप में चिह्नित किया गया था, जैसा कि डीएमसीए नोटिस पर ‘सेंडर’ की जानकारी से देखा जा सकता है।

सोनी म्यूजिक एंटरटेनमेंट द्वारा पोस्ट को रिपोर्ट किया गया था हालांकि यह ध्यान रखना उचित है कि DMCA का कई तत्वों द्वारा दुरुपयोग किया जा सकता है। कई YouTube ग्राहकों को भी कानून के कारण नुकसान उठाना पड़ा है खासकर जब से DMCA कोई समय सीमा नहीं देता है, जिसके भीतर कथित कॉपीराइट उल्लंघन की रिपोर्ट की जानी है।

इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ द फोनोग्राफिक इंडस्ट्री एक ऐसा संगठन है जो दुनिया भर में रिकॉर्डिंग उद्योग के हितों का प्रतिनिधित्व करता है। यह एक गैर-लाभकारी सदस्यों का संगठन है जो स्विट्जरलैंड में पंजीकृत है और 1933 में इटली में स्थापित किया गया था।

नवंबर 2020 में ट्विटर ने केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह के एकाउंट का डिस्प्ले पिक्चर यह कहते हुए हटा दिया था कि डिस्प्ले पिक्चर की कॉपीराइट होल्डर द्वारा रिपोर्ट की गई है। ट्विटर ने शाह के एकाउंट को लॉक भी कर दिया था। हालाँकि बाद में ट्विटर ने अपनी इस एकपक्षीय कार्रवाई की सफाई देते हुए इसे एक गलती बताया था।

आरक्षण किसे और कब तक: समान नागरिक संहिता पर बात क्यों नहीं? – कुछ फैसले जो अभी बाकी हैं

दो शताब्दियों तक औपनिवेशिक ब्रिटिश सरकार के झंडे तले रहने के बाद भारत की आजादी की पृष्ठभूमि में इसके संविधान निर्माण का कार्य भी शुरू हो चुका था। आज भारतीय संविधान के 71 वर्ष पूरे हो चुके हैं। अक्टूबर 25, 1951 से फरवरी 21, 1952 तक आयोजित भारतीय आम चुनाव भारत की स्वतंत्रता के बाद लोकसभा का पहला चुनाव था। यह भारतीय संविधान के प्रावधानों के तहत आयोजित किया गया, जिसे नवंबर 26, 1949 को अपनाया गया था।

भारत का सर्वोच्च विधान संविधान सभा ने नवम्बर 26, 1949 को पारित किया लेकिन लागू हुआ जनवरी 26, 1950 से! आज के दिन को देश भर में संविधान दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। संविधान के मूल्य और इसकी पवित्रता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कई स्वतन्त्रता सेनानियों के खून, क्रांतिकारियों के बलिदान और भारत की जनता के शताब्दियों के संघर्ष के बाद भारत देश अपना विधान बनाने में सफल हुआ था। यह संविधान हमारे देश का आईना होने के साथ ही हमारे लोकतान्त्रिक मूल्यों की अभिव्यक्ति भी बना।

संविधान को अंतिम रूप देने की घटना नाटकीय थी और यह कई प्रकार की चर्चा, मनमुटाव और वाद-विवाद के पलों से गुजरा।

यूँ तो यह एक संविधान के तौर पर सम्पूर्ण दस्तावेज ही था मगर फिर भी तत्कालीन भारतीय राजनीति के प्रतिनिधि राजनीतिक पूर्वग्रहों के चलते देश के एक धड़े को संतुष्ट करने के लिए तो अहम फैसले लेते रहे लेकिन इसमें कुछ ऐसी कसर रखते गए, जिन्होंने कालांतर में भारत को गहरे जख्म दिए। इसका नतीजा दंगे, पलायन, कट्टरपंथ के उदय के रूप में सामने आता रहा।

ऐसे एक नहीं बल्कि अनेकों प्रमाण हैं, जो यह साबित करने के लिए काफी हैं कि आजादी के बाद भारत जिस नेहरूवियन मॉडल को लेकर आगे बढ़ रहा था, उसकी मंशा पूर्ण रूप से हिंदुओं को अपने ही देश में दोयम दर्जे का नागरिक बना देने की ही थी।

इसके लिए कुछ बड़े नासूर छोड़ दिए गए। सबसे बड़ी भूल भारत के मस्तक कहे जाने वाले जम्मू कश्मीर राज्य के लिए अलग संविधान को मंजूरी देना था। यह अनुच्छेद 370 और 35 A ही थे, जिन्होंने कश्मीर घाटी में आतंकवाद और कट्टरपंथ को बढ़ावा देने के साथ ही एक ऐसे विचार को सींचने का काम किया, जिसके तहत जम्मू कश्मीर को भारत का हिस्सा बताना ही फासीवादी विचार हो गया। हालाँकि, उनके लिए मजहबी कट्टरपंथ, घाटी के हिंदुओं के साथ हो रही बर्बरता, लोगों के अधिकार कोई बड़ा विषय नहीं रहे।

आखिरकार कई दशकों बाद जब केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त करने का फैसला लिया तो जम्मू कश्मीर को अपनी बपौती समझने वाले राजनीतिक दलों की छटपटाहट देखते ही बन रही है। यह संविधान के सबसे आवश्यक सुधारों में से एक और सबसे अहम था, जिसे केंद्र सरकार की इच्छाशक्ति ने कर दिखाया।

भीमराव अंबेडकर भी इस अनुच्छेद और राज्य के अलग संविधान के खिलाफ थे। वास्तव में यह तथ्य वर्तमान की केंद्र सरकार के फैसले का विरोध करने वाले लोगों के लिए जानना आवश्यक है कि यह अनुच्छेद संविधान में भीमराव अंबेडकर की इच्छा के खिलाफ रखा गया था। इस अनुच्छेद को लेकर बाबा अंबेडकर ने कश्मीरी नेता शेख अब्दुल्ला को स्पष्ट रूप से कहा:

“आप चाहते हैं कि भारत को आपकी सीमाओं की रक्षा करनी चाहिए, उसे आपके क्षेत्र में सड़कों का निर्माण करना चाहिए, उसे आपको अनाज की आपूर्ति करनी चाहिए, और कश्मीर को भारत के समान दर्जा देना चाहिए। लेकिन भारत सरकार के पास केवल सीमित शक्तियाँ होनी चाहिए और भारतीय लोगों को कश्मीर में कोई अधिकार नहीं होना चाहिए। इस प्रस्ताव को सहमति देने के लिए, भारत के कानून मंत्री के रूप में भारत के हितों के खिलाफ एक विश्वासघाती बात होगी।”

अनुच्छेद 370 के अलावा समान नागरिक संहिता (UCC), आरक्षण का विषय, श्रीराम मंदिर जन्मभूमि, NRC, CAA आदि कुछ ऐसे अहम विषय थे, जिन पर यदि आजादी के तुरन्त बाद कोई फैसला लिया जाता तो देश समय-समय पर कई किस्म की त्रासदियों से गुजरने से बच सकता था।

आरक्षण

भारत में आरक्षण आज एक भावनात्मक और राजनीतिक मुद्दा है। अल्प समय के लिए रखे गए इस अस्थायी प्रावधान ने राजनीतिक इच्छाशक्ति और तुष्टिकरण का रूप ले लिया। आज हालात ये हैं कि जिनके पास आरक्षण है, वो इसे छोड़ना नहीं चाहते, और जिनके पास नहीं है वो सूची में नाम जुड़वाना चाहते हैं।

आजादी के संघर्ष के दौरान सबसे मशहूर घटनाक्रमों में से एक पूना पैक्ट आरक्षण की नींव माना जाता है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि आरक्षण कोई मूलभूत अधिकार नहीं है। लेकिन इस पर कोई स्थिर और गंभीर फैसला आना सम्भव नजर नहीं आता।

स्वतन्त्रता के सात दशक बाद आरक्षण के विरोध में बोलना राजनीतिक आत्महत्या के बराबर हो चुका है। कोई भी दल, कोई भी नेता आरक्षण के विरोध में जाने की सोचना तो दूर, इसके खिलाफ बोलने की हिमाकत नहीं कर सकता। नतीजा यह है कि आरक्षण का विषय सामाजिक न्याय और वंचितों को मिलने वाले न्याय के बीच ही एक बड़ी दीवार और राजनीतिक हथकंडा बन कर खड़ा है।

समान नागरिक संहिता

समान नागरिक संहिता की आवश्यकता इस देश में आज के समय मे शायद सबसे अधिक है। इसका बड़ा कारण कथित धर्म निरपेक्ष राजनीतिक दलों की समुदाय विशेष के अधिकारों की आड़ में अपनी राजनीति को दिशा देने की कोशिश करना है।

इस देश को यदि धर्म की विभिन्न धूरियों में पिसते रहने के बजाय अन्य जरूरी मामलों में प्रगति करने के बारे में विचार करना है तो उसके लिए समय की माँग समान नागरिकता संहिता ही है। आखिर एक ही देश में एक मजहब अपनी शरीयत को ही हर बड़े-छोटे फैसले का आधार बनाकर और दूसरा धर्म अपने मंदिरों से लेकर अपने राजनीतिक फैसलों के लिए सत्ता और संविधान पर कैसे निर्भर रह सकता है? ऐसे में, संविधान की प्रस्तावना में धर्म निरपेक्षता शब्द का अर्थ क्या सिर्फ एक मजहब विशेष का समर्थन नहीं हो जाता?

संविधान में शरुआत से ही तीन तलाक पर कानून, NRC, CAA जैसे प्रावधानों के लिए जगह होनी चाहिए थी, लेकिन हिंदुओं के अधिकारों की जगह धर्म निरपेक्षता और समाजवाद जैसे शब्दों ने ली। आज भी भारत नागरिकता कानून पर बहस कर रहा है, हिंदुओं को नागरिकता देने की बात को आश्चर्यजनक रूप से मुस्लिम विरोधी साबित करने के प्रयास किए गए।

यह भारत की धर्म निरपेक्षता के खोखलेपन का ही सबूत है कि हिंदुओं के पास आज अपनी एक ‘होम लैंड’ नहीं है जबकि कथित अल्पसंख्यक, जो संविधान को शरीयत के नीचे ही रखते आए हैं, वो हिंदुओं के अधिकारों पर बहस के बजाय देश जला देने की क्षमता रखते हैं। और उन्होंने इसके लिए जम्मू कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक ऐसा किया भी है।

संविधान की सम्पूर्णता तक पहुँचने के लिए भारत जैसे देश को अभी बहुत लम्बी दूरी तय करनी है। कुछ अहम फैसले हैं, जिनके लिए वर्तमान केंद्र सरकार जितनी ही मजबूत इच्छाशक्ति और राजनीतिक स्थिरता की आवश्यकता होगी। फिलहाल, समय संविधान दिवस का गौरव मनाने का है, क्योंकि नागरिकों के अधिकारों का पहला और आखिरी स्तम्भ हर हाल में यही है। क्योंकि जब संविधान है, तभी हम अधिकारों की भी आशा कर पाते हैं।

ISI ने रची दरभंगा में बम ब्लास्ट की साजिश, करोड़ों की फंडिंग: जिस कैराना से हुआ था हिन्दुओं का पलायन, वहाँ से 2 आतंकी गिरफ्तार

बिहार के दरभंगा में हुए बम ब्लास्ट के तार पाकिस्तान से जुड़ रहे हैं और इसके पीछे वहाँ की ख़ुफ़िया एजेंसी ISI की साजिश भी सामने आ रही है। इस मामले में STF ने उत्तर प्रदेश के शामली स्थित कैराना से दो संदिग्धों को गिरफ्तार किया है, जिनसे पूछताछ जारी है। बिहार में हुए इस बम ब्लास्ट में पश्चिमी यूपी के सलीम और कासिम की भूमिका बताई जा रही है। इस ब्लास्ट के लिए करोड़ों रुपयों की फंडिंग हुई है।

तेलंगाना के एक आतंकी को इस बम ब्लास्ट का ठेका दिया गया था। NIA (राष्ट्रीय जाँच एजेंसी) और ATS (आतंकरोधी दस्ता) इस मामले की जाँच कर रही है। कफील के पिता ने मीडिया के सामने आकर कहा है कि उनके बेटे को बेवजह फँसाया जा रहा है। सलीम ने एक पाकिस्तानी युवक की मदद से ISI से संपर्क किया था। ISI एजेंट ने पश्चिमी यूपी में धमाके के लिए उससे बात की। सलीम ने अपने दोस्त कासिम उर्फ़ कफील को इस वारदात में शामिल किया।

फिर दोनों ने तेलंगाना के सिकंदराबाद के कुछ युवकों के साथ मिल कर धमाके की साजिश रची। सुरक्षा एजेंसियाँ दोनों का पुराना रिकॉर्ड खँगाल रही है। ISI की फंडिंग के नेटवर्क की तह तक जाने के लिए कई बैंक खातों के भी डिटेल्स खँगाले जा रहे हैं। ISI की आगे भी ऐसी कोई साजिश हो सकती है। कैराना से हिन्दुओं के पलायन की बात भी सामने आई थी, वहीं अब वहाँ ISI कनेक्शन की खबर मिली है।

पश्चिमी यूपी में धमाके की साजिश दरभंगा कैसे पहुँच गई, इसका भी पता लगाया जा रहा है। जून 17, 2021 को दरभंगा रेलवे जंक्शन पर हुए ब्लास्ट का बम एक कपड़े की गठरी में रखा हुआ था। पार्सल भेजने वाले का नाम-पता ‘सूफियाना, निवासी सिकंदराबाद’ लिखा हुआ था। उस पर लिखा मोबाइल नंबर कैराना के ही एक व्यक्ति का था। NIA की लखनऊ यूनिट ने इस ब्लास्ट को लेकर FIR दर्ज की है।

NIA की 6 सदस्यीय टीम मामले की जाँच के लिए बिहार पहुँची है। कपड़े की गाँठ में ही रह जाने के कारण इस केमिकल बम का उतना बड़ा असर नहीं हुआ था। पार्सल बुक करने वाले नंबर से जिस नंबर की बात हो रही थी, वो भी दरभंगा रेलवे स्टेशन पर सक्रिय था। फ़िलहाल ये नंबर नेपाल से सटे इलाकों में सक्रिय आ रहा है। जल्द ही इस मामले में कई अन्य आतंकियों की गिरफ्तारी हो सकती है, जिससे सारे राज़ खुल सकेंगे।

महाराष्ट्र के पूर्व गृहमंत्री अनिल देशमुख के आवास पर छापा, ₹4 करोड़ की उगाही के मामले में ED ने की कार्रवाई, 2 गिरफ्तार

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने शनिवार (जून 26, 2021) को महाराष्ट्र के पूर्व गृह मंत्री और एनसीपी नेता अनिल देशमुख के दो करीबी सहयोगियों को 100 करोड़ रुपए की रंगदारी और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तार किया

रिपोर्ट्स के मुताबिक, दो सहयोगियों- संजीव पलांडे, देशमुख के निजी सचिव और निजी सहायक कुंदन शिंदे को लगभग नौ घंटे की गहन पूछताछ के बाद धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के प्रावधानों के तहत गिरफ्तार किया गया था।

प्रवर्तन निदेशालय ने कहा कि दो लोगों को गिरफ्तार किया गया क्योंकि वे मनी लॉन्ड्रिंग मामले में अनिल देशमुख के खिलाफ चल रही जाँच में जाँच एजेंसी के साथ सहयोग करने में विफल रहे। केंद्रीय जाँच एजेंसी द्वारा शुक्रवार (जून 25, 2021) को नागपुर और मुंबई में अनिल देशमुख के आवास पर छापेमारी के बाद गिरफ्तारियाँ हुईं। ईडी के मुताबिक पाँच जगहों पर छापेमारी की गई। कथित तौर पर, अधिकारियों ने देशमुख के कार्यालयों, एक मुंबई में और दूसरा नागपुर में छापा मारा था।

ED ने 4 करोड़ रुपए की रंगदारी का पता लगाकर छापेमारी की

ईडी के करीब आठ अधिकारी शुक्रवार शाम 7.30 बजे केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवानों की एक टीम के साथ देशमुख के आवास पर पहुँचे और तलाशी शुरू की। ईडी अधिकारियों ने अपनी तलाशी जारी रखते हुए किसी को भी आवास में प्रवेश करने या बाहर निकलने से रोक दिया।

ईडी ने मुंबई में लगभग 10 बार मालिकों द्वारा तत्कालीन गृह मंत्री देशमुख को तीन महीने में कथित रूप से भुगतान किए गए 4 करोड़ रुपए की मनी ट्रेल स्थापित करने के बाद अनिल देशमुख के आवास पर छापा मारा था। नए सबूतों के आधार पर, ईडी ने देशमुख के आवास और उनके निजी सहायक कुंदन शिंदे और निजी सचिव संजीव पलांडे के परिसरों सहित इन स्थानों पर तलाशी ली थी।

इससे पहले 11 मई को प्रवर्तन निदेशालय ने महाराष्ट्र के पूर्व गृह मंत्री अनिल देशमुख के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज किया था। बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा एनसीपी नेता के खिलाफ मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त परम बीर सिंह द्वारा लगाए गए 100 करोड़ रुपए के रिश्वत के आरोपों की सीबीआई जाँच के आदेश के बाद अनिल देशमुख ने अप्रैल में महाराष्ट्र के गृह मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था।

अजहर ने अंकित मिश्रा बनकर युवती को फँसाया: प्रतापगढ़ में शादी के नाम पर दुष्कर्म, ₹3 लाख भी ऐंठे

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ की एक युवती ने एक युवक पर धर्म छुपा कर प्रेमजाल में फँसाकर दुष्कर्म और तीन लाख रुपए ऐंठने का आरोप लगाते हुए मुकदमा दर्ज कराया है। युवती का आरोप है कि इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग करने के दौरान चार साल पहले 2017 में आरोपित अजहर ने अंकित मिश्रा बनकर उसे प्यार के जाल में फँसाया। उससे करीब तीन लाख रुपए भी ले लिए। अब युवती को उसकी असलियत का पता चला। पुलिस मामले की छानबीन कर रही है।

नगर कोतवाली क्षेत्र की रहने वाली युवती ने पुलिस को दी गई तहरीर में बताया है कि 2017 में वह इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग कर रही थी। उस समय कटरा निवासी अजहर उर्फ गुड्डू ने अंकित मिश्र बनकर और इसी नाम से फेसबुक आईडी बनाकर उसे अपने प्रेमजाल में फँसा लिया था। शहर के बाबागंज स्थित एक रेस्टोरेंट व उससे सटे होटल में उसे बुलाकर यौन शोषण करता रहा। इस दौरान अजहर ने उससे 3 लाख रुपए भी बहाने से ले लिए।

शादी का दबाव बनाने पर 14 मई 2021 को उसने बताया कि वह पहले से शादीशुदा है। युवती उसके घर पहुँची तो अंकित मिश्र बने अजहर की असलियत का पता चला। युवती का आरोप है कि अजहर ने अपने भाई व पिता के साथ मिलकर उसे जान से मारने और अश्लील वीडियो वायरल करने की धमकी दी। शिकायत के बाद पुलिस ने अजहर, उसके भाई व पिता के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया। नगर कोतवाल ने बताया कि मुकदमा दर्ज कर मामले की छानबीन की जा रही है।

प्रयागराज के महानिरीक्षक (आईजी) केपी सिंह ने कहा कि 23 जून को आरोपित ने अदालत में आत्मसमर्पण किया, जिसके बाद उसे जेल भेज दिया गया। आईजी ने कहा कि मामले की जाँच की जा रही है।

गौरतलब है कि हाल ही में उत्तर प्रदेश के रामपुर में लव जिहाद का मामला सामने आया। फेसबुक पर मुहम्मद अयान ने राहुल का नाम रख कर फेक आईडी बनाई और खुद को हिन्दू बताया। पहले लड़की को फाँसा और फिर 6 महीने तक बंधक बना कर उसका रेप किया। इस मामले में मुख्य आरोपित सहित 3 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कर अयान और उसके भाई को पुलिस ने धर-दबोचा।

आरोप है कि मुहम्मद अयान ने अपने दोस्तों के साथ मिल कर युवती का गैंगरेप भी किया। युवती ने बताया कि उक्त व्यक्ति ने अपना नाम राहुल बताया था और धीरे-धीरे उनकी बातचीत दोस्ती और फिर प्यार में बदल गई। मुरादाबाद के आईजी को सौंपे गए शिकायत-पत्र में पीड़िता ने आरोप लगाया कि उसे 6 माह तक घर में बंधक बना कर रखा गया। उसी दौरान उसे पता चला कि युवक का नाम राहुल नहीं है और वो मुस्लिम है। जब वो उससे पीछा छुड़ाना चाहती थी और निकाह से इनकार कर रही थी तो उसे प्रताड़ित किया गया। पीड़िता ने बताया कि राहुल ने तो उसका रेप किया ही, साथ ही अपने दो दोस्तों को बुला कर भी रेप करवाया।

‘तुम्हारे शरीर का इंच-इंच देखना चाहता हूँ’: जब निर्देशक ने ‘सेक्रेड गेम्स’ की अभिनेत्री से की थी क्लीवेज दिखाने की डिमांड

बॉलीवुड अभिनेत्री सुरवीन चावला ने कास्टिंग काउच को लेकर अपने अनुभव शेयर किए हैं। टीवी शो, फिल्मों और डिजिटल दुनिया में काम कर चुकीं सुरवीन चावला को अपने करियर में कई बार बुरे अनुभव हुए, जिसके बारे में उन्होंने साझा किया था। ‘सेक्रेड गेम्स’ की अभिनेत्री ने 2019 में पिंकविला को दिए गए एक इंटरव्यू में अपने तब का अनुभव साझा किया था, जब उन्हें एक निर्देशक के साथ एक सेट लोकेशन पर प्री-फिल्मिंग के लिए भेजा गया था।

सुरवीन ने बताया था, “मैं दक्षिण की फिल्मों में काम कर रही थीं। इसी दौरान उस निर्देशक ने मुझसे कहा कि मैं तुम्हारे शरीर का इंच-इंच देखना चाहता हूँ। मैंने उसके फोन कॉल्स को रिसीव करना बंद कर दिया था। इसके बाद एक राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित निर्देशक ने मुझे परेशान किया। वो मेरे करीब आना चाहता था।” सुरवीन ने बताया कि वो निर्देशक दक्षिण भारत में एक बड़ा नाम है। उन्होंने बताया कि उनका काफी लंबा ऑडिशन लिया गया था, जिसमें एक पूरा शिफ्ट बीत गया।

सुरवीन ने आगे बताया था, “मुझे ऑडिशन में दो चीजें करनी थीं। या तो मुझे एक बड़ा सा डायलॉग बोलना था, या बिना तैयारी के कोई एक्ट करना था। मुझे अच्छा महसूस नहीं हो रहा था और मैं ऑडिशन के बाद घर चली गई। इसके बाद उस निर्देशक ने इच्छा जाहिर की कि तुम्हारी तबीयत खराब है तो मैं मुंबई आ सकता हूँ। मुझे ये अच्छा नहीं लगा। उस निर्देशक को तमिल के अलावा कोई और भाषा आती नहीं थी और मैं तमिल जानती नहीं थीं। इसीलिए कॉल पर एक व्यक्ति हमारी बातों को एक-दूसरे के सामने अनुवाद करता था।”

वो व्यक्ति उस निर्देशक का ही दोस्त था। सुरवीन ने बताया कि उसे अंग्रेजी का हिंदी नहीं आती थी। उस व्यक्ति ने सुरवीन को बताया, “सर (निर्देशक) आपको अच्छी तरह से समझना चाहते हैं। चूँकि आपको उनकी फिल्म में काम करना है, इसीलिए वो आपको जानना चाहते हैं क्योंकि फिल्म की शूटिंग लंबे समय तक चलेगी।” सुरलीन के अनुसार, उस अनुवादक ने आगे कहा, “फिल्म की शूटिंग ख़त्म होने पर आपलोग ये सब ‘रोक’ सकते हैं।”

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कास्टिंग काउच को लेकर सुरवीन चावला ने बताया कि बॉलीवुड में भी उन्हें इस तरह के अनुभव हुए हैं। एक फिल्म निर्माता उनके शरीर को देखना चाहता था। उन्होंने बताया कि ये कुछ ही महीनों पहले हुआ था। एक निर्देशक उनकी जाँघों को देखना चाहता था तो एक ने माँग रखी थी कि वो उनके क्लीवेज को देखना चाहता है। सुरवीन चावला ने कहा कि फिल्म इंडस्ट्री में ये सब होता है और ऐसी घटनाओं के कारण एक बार उन्हें एक निर्देशक के दफ्तर से निकलना पड़ा था।

बता दें कि सुरवीन चावला ‘हेट स्टोरी 2 (2014)’ और ‘Ugly (2013)’ जैसी फिल्मों में काम कर चुकी हैं। 2015 में उन्होंने इटली में अक्षय ठक्कर के साथ शादी की थी, लेकिन 2 साल बाद ट्विटर पर इसकी जानकारी दी। साथ ही वो ‘सावन आया है’, ‘तुत्ती बोले मैरिज दी’ और ‘धोखा धोखा’ जैसे गानों में नृत्य कर चुकी हैं। सुरवीन ऑल्ट बालाजी के शो हक से’ में भी दिखी थीं। उन्होंने कई रियलिटी शोज में भी हिस्सा लिया था।

मुस्लिम लड़की, हिंदू लड़का… शादी करके सुरक्षा माँगने गए, राजस्थान पुलिस ने उल्टे गिरफ्तार कर लिया

राजस्थान का एक अंतरधार्मिक जोड़ा 20 जून को आर्य समाज मंदिर में एक-दूसरे से शादी करने के बाद सुरक्षा माँगने के लिए 23 जून को अजमेर में कलेक्ट्रेट गया। लड़की के माता-पिता, जो कि मुस्लिम समुदाय से हैं, मकराना पुलिस के अधिकारियों के साथ अजमेर कलेक्ट्रेट पहुँचे और जबरदस्ती दंपति को अलग कर दिया।

18 जून को लड़की के कथित तौर पर लापता होने के बाद यह घटना सामने आई। माता-पिता ने दावा किया कि उनकी बेटी नाबालिग थी और राजस्थान के अजमेर जिले के किशनगढ़ नगरपालिका में सफाई कर्मचारी के रूप में काम करने वाले दलित हिंदू लड़के ने उसे शादी का लालच दिया था।

दूसरी ओर, राजस्थान के नागौर जिले के मकराना कस्बे की रहने वाली लड़की ने दावा किया कि वह एक वयस्क है और उसने अपनी मर्जी से शादी की थी। उसने दावा किया कि उसके परिवार के सदस्य उसकी शादी के खिलाफ हैं और उसके पति के परिवार को हिंसा की धमकी देने की कोशिश कर रहे हैं। उसे डर था कि अंतरधार्मिक विवाह से नाराज उसके परिवार के सदस्य उसे और उसके पति को मार डालेंगे।

इस जोड़े ने जान के खतरे के डर से बुधवार (जून 23, 2021) को अजमेर में कलेक्ट्रेट के अंदर शरण ली थी। मगर लड़की के माता-पिता को उसके ठिकाने के बारे में पता चल गया। वे मकराना पुलिस अधिकारियों के साथ कलेक्ट्रेट पहुँचे और जिला कार्यालय के अंदर हँगामा करने लगे। पुलिस और लड़की के परिवार ने दावा किया कि उनके पास ऐसे दस्तावेज हैं, जो साबित करते हैं कि लड़की नाबालिग है। उन्होंने युवक पर नाबालिग लड़की को शादी के लिए फुसलाने का आरोप लगाया।

राजस्थान पुलिस ने दंपति को किया गिरफ्तार

दूसरी ओर, लड़की ने दावा किया कि वह नाबालिग नहीं है और उसने अपनी मर्जी से दलित युवक से शादी की थी। इसके बाद लड़की और उसके माता-पिता के बीच कहासुनी मारपीट में बदल गई। इसके बाद लड़की के परिवार वालों ने मकराना पुलिस अधिकारियों की मदद से लड़की को अपनी ओर खींचना शुरू कर दिया, जबकि लड़की मना करती रही। उसने चिल्लाना शुरू कर दिया और अपने माता-पिता के साथ जाने पर आपत्ति जताई। हालाँकि मकराना पुलिस ने दंपति पर काबू पाने में कामयाबी हासिल की। उन्हें कलेक्ट्रेट से बाहर खींच कर गिरफ्तार कर लिया, जबकि अजमेर के कलेक्टर कार्यालय के अंदर से अधिकारी ड्रामा देखते रहे।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, मुस्लिम लड़की को उसके पति से अलग होने के बाद बाल कल्याण समिति के सामने पेश किया गया, जिसने उसे नागौर के सावित्री बाई फुले गर्ल्स हॉस्टल भेज दिया। दलित युवक को गिरफ्तार कर एक दिन के रिमांड पर लिया गया। बाल कल्याण समिति 28 जून को मामले की सुनवाई करेगी।

अनुराग पोद्दार की हत्या के 240 दिन बाद पिता को मिला ₹10 लाख का मुआवजा, मुंगेर दुर्गा पूजा विसर्जन पर बरपा था पुलिसिया कहर

आपको अनुराग पोद्दार याद है? मुंगेर में दुर्गा पूजा विसर्जन पर पुलिस ने गोलीबारी की और लाठियाँ चटकाई थीं, जिसमें अनुराग पोद्दार की मौत हो गई थी। सोशल मीडिया पर वो तस्वीर भी वायरल हुई थी, जिसमें अनुराग पोद्दार की माँ अपने बेटे को गोद में लिटा कर बैठी हुई हैं और अनुराग के दिमाग का कुछ हिस्सा अलग पड़ा हुआ है। अक्टूबर 26, 2020 को हुए इस वीभत्स हत्याकांड के पीड़ित परिजनों को अब जाकर 10 लाख रुपए का मुआवजा मिला है।

इस हत्याकांड के ठीक 8 महीने (240 दिन) बाद अनुराग पोद्दार के पिता को 10 लाख रुपए का मुआवजा दिया गया। पिछले शुक्रवार (जून 25, 2021) को राज्य के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में हुई बैठक के बाद गृह विभाग ने इसकी स्वीकृति जारी की थी। मुंगेर के जिलाधिकारी ने इस राशि का भुगतान मृतक के पिता को किया। डीएम नवीन कुमार ने बताया कि बुधवार (जून 23, 2021) को अनुराग के पिता उनके दफ्तर आए थे।

वहाँ उनके बैंक अकाउंट में मुआवजे की राशि ट्रांसफर की गई और मुआवजा पत्र दिया गया। अनुराग पोद्दार के पिता अमरनाथ हार्डवेयर की दुकान चलाते हैं। डीएम ने उन्हें कारोबार के विस्तार के लिए प्राथमिकता के आधार पर ऋण दिलाने का भी वादा किया, लेकिन अमरनाथ ने कहा कि उन्हें लोन की ज़रूरत नहीं है। पटना हाईकोर्ट ने मृतक के परिजनों को 10 लाख रुपए का मुआवजा देने के लिए राज्य सरकार से कहा था।

बिहार सरकार ने ‘स्पेशल लीव पेटिशन’ डाल कर पटना हाईकोर्ट के निर्णय को चुनौती दी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। वकील अलोक अलख श्रीवास्तव ने सुप्रीम कोर्ट में अनुराग पोद्दार के परिजनों की तरफ से पैरवी की। उन्होंने कहा कि CID इस मामले की जाँच कर रहा है और उसे भी जल्द ही रिपोर्ट सौंपनी है। इस पूरे प्रकरण में मुंगेर की तत्कालीन एसपी लिपि सिंह का नाम भी सामने आया था।

8 सदस्यों वाली SIT की जाँच पटना हाईकोर्ट की निगरानी में चल रही है। इस गोलीकांड के बाद अनुराग पोद्दार के पिता ने स्पष्ट कहा था कि पुलिस की चलाई गोली से उनके बेटे की हत्या हुई। मुंगेर में पूरब सराय सहित 3 थानों में आक्रोशित लोगों द्वारा आगजनी के बाद चुनाव आयोग ने डीएम राजेश मीणा और एसपी लिपि सिंह को हटा दिया था। आरोप था कि विसर्जन में शामिल कई लड़कों को एसपी लिपि सिंह के सामने लाकर और उन्हें जम कर पीटा गया।

महबूबा मुफ्ती संतुष्ट नहीं फारूक अब्दुल्ला से, PM मोदी की बैठक में आर्टिकल 370 का मुद्दा नहीं उठाने पर हैं खफा: रिपोर्ट्स

कश्मीरी नेताओं के साथ पीएम मोदी की सर्वदलीय बैठक के बाद सूत्रों ने शनिवार (जून 26, 2021) को बताया कि बैठक के दौरान अनुच्छेद 370 को बहाल करने पर महबूबा मुफ्ती का समर्थन नहीं करने के लिए पीडीपी, नेशनल कॉन्ग्रेस से नाखुश है। बताया जा रहा है कि पीडीपी को लगता है कि जब मुफ्ती ने बैठक में अनुच्छेद 370 का मुद्दा लाया तो नेशनल कॉन्ग्रेस ने बैठक में गुपकार गठबंधन को नीचा दिखाया। पीडीपी को कथित तौर पर नेशनल कॉन्ग्रेस के संरक्षक फारूक अब्दुल्ला से बैठक में अनुच्छेद 370 की बहाली का मुद्दा उठाने की उम्मीद की थी क्योंकि यह सभी कश्मीरी पार्टियों का एक साझा एजेंडा है।

पीडीपी नेशनल कॉन्ग्रेस से खफा?

इसके अलावा, पीडीपी प्रवक्ता फिरदौस टाक ने गुलाम नबी आजाद पर कटाक्ष करते हुए यह भी सवाल किया कि क्या कॉन्ग्रेस खुद का या प्रधानमंत्री और गृह मंत्री का प्रतिनिधित्व कर रही थी। सूत्रों के अनुसार, मुफ्ती ने केंद्र से पाकिस्तान के साथ बातचीत फिर से शुरू करने और दोनों देशों के बीच ट्रेन सेवाओं को फिर से शुरू करने का आग्रह किया था। उन्होंने बैठक में अनुच्छेद 370 का मामला भी उठाया था, जिसमें कहा गया था कि जम्मू-कश्मीर के लोग ‘असंवैधानिक, अवैध और अनैतिक’ तरीके से इसके निरस्त होने से नाराज और परेशान हैं।

दूसरी ओर, कॉन्ग्रेस, नेकां और जेकेपीसी ने बैठक में अनुच्छेद 370 की बहाली का मामला नहीं उठाया क्योंकि मामला विचाराधीन था। बैठक में गुलाम बनी आजाद ने केंद्र के सामने कॉन्ग्रेस की 5 माँगें रखीं- राज्य की बहाली, चुनाव, अधिवास कानून बहाल करना, कश्मीरी पंडितों की घाटी में वापसी और सभी राजनीतिक बंदियों की रिहाई।

बता दें कि बैठक से पहले मीडिया से बात करते हुए फारूक अब्दुल्ला ने महबूबा मुफ्ती के बयान से किनारा करते हुए कहा था कि हमें पाकिस्तान के बारे में बात नहीं करनी है बल्कि अपने वतन के बारे में चर्चा करनी है। उन्होंने कहा कि महबूबा मुफ्ती का पाकिस्तान पर बयान निजी है। इससे उन्हें कोई लेना देना नहीं है। 

गौरतलब है कि पिछले दिनों गुपकार गठबंधन की बैठक हुई थी। उसके बाद पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने कहा था कि कश्मीर के मसले पर केंद्र सरकार को पाकिस्तान से भी बात करनी चाहिए। महबूबा ने आगे  कहा था, “यदि सरकार अफगानिस्तान में तालिबान से बात कर सकती है तो फिर कश्मीर के मसले पर पाकिस्तान से बात क्यों नहीं हो सकती।” उनके इस बयान का कई नेताओं ने समर्थन किया तो कई नेताओं ने इसका विरोध भी किया।

हालाँकि, बैठक से पहले फारूक अब्दुल्ला ने उनके बयान से खुद को अलग कर लिया। फारूक ने साफ तौर से कहा कि वह पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से जम्मू-कश्मीर में अमन लाने की बात करेंगे। डोगरा फ्रंट नाम के संगठन की अगुवाई में लोग सड़कों पर उतरे और महबूबा मुफ्ती को जेल भेजने की माँग की।