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सुशांत ड्रग एडिक्ट था, सुसाइड से मोदी सरकार ने बॉलीवुड को ठिकाने लगाया: आतिश तासीर की नई स्क्रिप्ट, ‘खान’ के घटते स्टारडम पर भी रोया

ओवरसीज सिटिजनशिप ऑफ इंडिया (OCI) कार्ड रद्द होने के साल भर बाद आतिश तासीर ने मोदी सरकार पर अपना गुस्सा निकाला है। पाकिस्तान के दिवंगत नेता सलमान तासीर के बेटे आतिश ने मोदी सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुशांत सिंह राजपूत की मौत का इस्तेमाल बॉलीवुड के भाईचारे पर हमले करने के लिए किया।

तासीर ने अपने नए आर्टिकल में कहा है कि नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार ने बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु को बॉलीवुड को ‘चुप’ कराने के लिए किया। आर्टिकल में तासीर ने बताया कि सुशांत की आत्महत्या ने सरकार को मौका दिया कि वह बॉलीवुड पर हमला करें। आर्टिकल में कहा गया है, “सुशांत सिंह राजपूत मानसिक तौर पर बीमार और ड्रग एडिक्ट था।” इस आर्टिकल के अनुसार राजपूत की मौत एक शोकपूर्ण घटना थी। लेकिन मोदी सरकार ने प्रेस की मदद से (उन्होंने ‘गोदी मीडिया’ कहा है) पूरे बॉलीवुड को ट्रॉयल पर रखा।

तासीर ने दावा किया कि भाजपा ने ये सब बिहार चुनाव में नैरेटिव बनाने के लिए किया। पत्रकार ने अपने लेख में घोषणा की कि सुशांत ने आत्महत्या ही की थी, लेकिन भाजपा ने उसे एक हत्या की तरह पेश किया। उसने लिखा, “राजपूत की तस्वीर के साथ दिखे पोस्टरों के शब्दों को हम न भूले है और न भूलने देंगे। रिया चक्रवर्ती को जेल में डाल दिया गया कि उन्होंने सुशांत को आत्महत्या के लिए उकसाया था। इसके बाद एनसीबी ने उसके घर की और मूवी इंडस्ट्री के बड़ी-बड़ी हस्तियों के घर रेड मारी, न केवल ड्रग की सर्च में बल्कि उन्हें बदनाम करने के लिए।”

बॉलीवुड में दरार बढ़ाने के लिए इस्तेमाल

मोदी विरोधी प्रोपेगेंडा चलाने के लिए मशहूर तासीर ने दावा किया कि मोदी गवर्मेंट ने राजपूत की सुसाइड से बॉलीवुड की अंदरुनी दरारों का फायदा उठाकर कल्चर वार छेड़ा और इस वार का नेतृत्व कंगना रनौत ने किया। तासीर यहीं नहीं रुके। उन्होंने मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि उन्होंने एक्टर की सुसाइड का फायदा उठाकर उन कलाकारों के घर पर रेड पड़वाई जो उनकी आलोचना करते थे।

बता दें कि सुशांत सिंह राजपूत 14 जून 2020 को संदिग्ध परिस्थितियों में मुंबई में अपने घर में मृत मिले थे। पुलिस ने उनकी मौत को शुरू में आत्महत्या बताया, लेकिन बाद में परिजनों द्वारा सवाल खड़ा करने के बाद पूरे मामले में हत्या का एंगल जुड़ गया। सुशांत के लिए कई सोशल मीडिया कैंपेन चले। बाद में सीबीआई ने इस मामले को सँभाला। 

इसके बाद ड्रग एंगल से इसमें एनसीबी की एंट्री हुई और रिया चक्रवर्ती, दीपिका पादुकोण, श्रद्धा कपूर, सारा अली खान समेत कई हस्तियों से ड्रग लिंक, फेवरटिज्म और नेपोटिज्म पर पूछताछ हुई। ये सभी एंगल सुशांत की मौत के पीछे मुख्य कारण कहे जा रहे थे।

हालाँकि, आतिश तासीर ने इस मामले में सोशल मीडिया अभियानों का ठीकरा पूरी तरह से मोदी सरकार पर फोड़ दिया। तासीर ने आरोप लगाया कि नरेंद्र मोदी सरकार ने इसका इस्तेमाल बॉलीवुड की क्रिएटिव फ्रीडम को छीनने के लिए किया। खासकर, मुस्लिमों का प्रभाव जिनकी उपस्थिति इंडस्ट्री में है। 

लेख में ये भी आरोप लगाए गए कि पीएम मोदी और उनकी पार्टी भारत को एक समग्र संस्कृति के रूप में नहीं देखते हैं, जिसमें हिंदुओं, मुसलमानों, सिखों और ईसाइयों ने योगदान दिया है, बल्कि वह इसे अनिवार्य रूप से एक हिंदू इकाई के रूप में देखते हैं, जिसकी नियति हिंदू सांस्कृतिक पुनर्जागरण लाने में निहित है। तासीर के अनुसार बॉलीवुड के तीनों खान-सलमान, शाहरुख और आमिर के पतन के पीछे भी मोदी सरकार का हाथ है।

‘मदरसे में बम कैसे आया, ​कौन और क्यों लाया’: बांका ब्लास्ट पर BJP टाइट, VHP ने कहा- रिपोर्ट सार्वजनिक करें नीतीश कुमार

बांका जिले के एक मदरसे में ब्लास्ट के बाद से बिहार की राजनीति गरम है। इस घटना में मदरसा के मौलाना की मौत हो गई थी और 4 अन्य घायल हो गए थे। धमाका इतना जोरदार था कि मदरसे की दीवारें और छत तक गिर गई थी। भाजपा और विश्व हिन्दू परिषद (VHP) ने इस बम विस्फोट की विस्तृत जाँच की माँग की है। VHP ने जाँच रिपोर्ट सार्वजनिक करने के लिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पत्र भी लिखा है।

भाजपा ने बयान जारी कर कहा है कि यह एक प्रशासनिक असफलता है। इतना शक्तिशाली विस्फोटक लाने की भनक तक प्रशासनिक तंत्र को नहीं लगती। बयान में कहा गया है कि इस मामले की उच्च स्तरीय जाँच होनी चाहिए, क्योंकि मस्जिद इबादत की जगह है और यह पता लगाना चाहिए कि आखिर इस स्थान पर बम आया कैसे? जागरण की रिपोर्ट के अनुसार बिहार भाजपा के प्रवक्ता अरविन्द सिंह ने कहा कि यह पता लगाना चाहिए कि मदरसा के अंदर विस्फोटक आया कैसे, उसे किसने स्टोर किया था और यह विस्फोटक क्यों स्टोर किया गया था?

इसके अलावा मधुबनी जिले के विस्फी से भाजपा विधायक हरि भूषण ठाकुर ने कहा है कि पूरे राज्य में ऐसे शिक्षा केंद्रों को बैन करना चाहिए। ठाकुर ने कहा कि बिहार के मदरसा और मस्जिदों में आतंक की शिक्षा दी जा रही है, बच्चों को हिंसा और बम बनाने की ट्रेनिंग दी जा रही है। उन्होंने कहा कि मदरसों से बच्चों को निकाल कर उन्हें सामान्य शिक्षा देनी चाहिए। ठाकुर ने यह भी कहा कि बिहार में अल्पसंख्यक समुदाय दलितों के ऊपर अत्याचार कर रहा है। जमुई, पूर्णिया और गोपालगंज में हुई घटनाएँ इसका उदाहरण हैं।

घटना के संबंध मीडिया रिपोर्टों में डीएम और एसपी के हवाले से बताया गया था कि यह मदरसा अवैध था। धमाका कंटेनर में रखे एक देसी बम के फटने से हुआ था। मौलाना के मौत की वजह दम घुटना बताया गया था। प्रभात खबर की रिपोर्ट में बताया गया था कि कई टीम अलग-अलग बिंदुओं पर जाँच कर रही हैं। इसमें मुख्य रूप से सेंट्रल आईबी, एटीएस और एसआईटी शामिल हैं। 

कई मीडिया रिपोर्ट्स में कुछ स्थानीय लोगों के हवाले से यह भी बताया गया था कि मौलाना बम बनाता था और 3 युवक उसका सहयोग करते थे। क्षेत्र में छोटी-छोटी बात पर बमबारी होती थी। भागलपुर से बारूद लाकर काम किया जाता था। यह बात भी कही जा रही थी कि इस धमाके के तार बांग्लादेश से जुड़ सकते हैं और इसकी जाँच एनआईए (NIA) को सौंपी जा सकती है। ज्ञात हो कि बांका जिले के नवटोलिया क्षेत्र में नूरी मस्जिद के परिसर में स्थित मदरसे में 7 जून को ब्लास्ट हुआ था।

‘कोरोना गाँव में प्रवेश नहीं कर पाएगा, आ गया तो मार नहीं पाएगा’: दरगाह वाले गाँव में वैक्सीन से भाग रहे ग्रामीण

भारत में जहाँ एक ओर सरकार जल्द से जल्द नागरिकों को Covid-19 के संक्रमण से सुरक्षित रखने के लिए टीका लगाना चाहती है, वहीं दूसरी ओर कर्नाटक के गडग जिले से एक चिंतित करने वाली खबर आई है। जिले के दावल मलिक गाँव के निवासी कोरोना वैक्सीन लगवाने से यह कहते हुए इनकार कर रहे हैं कि बाबा दावल मलिक की आत्मा उनकी रक्षा कर रही है। गाँव का नाम बाबा दावल मलिक के नाम पर ही रखा गया है और गाँव में ही बाबा दावल मलिक की दरगाह भी है। गुजरात के जुहापुर में भी स्थानीय मुस्लिम अल्लाह के नाम पर टीका लगाने से कतरा रहे हैं।

स्वास्थ्यकर्मी लगातार गाँव के निवासियों को समझाने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन स्थानीय निवासियों का मानना है कि जिन बाबा दावल मलिक के नाम पर गाँव का नाम पड़ा है उन्हीं की आत्मा गाँव के लोगों को किसी भी बुराई या नुकसान से बचाएगी। गाँव के पास ही बाबा दावल मलिक की दरगाह है जहाँ स्थानीय निवासी लगातार जाते रहते हैं।

मुलगुंड प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की चिकित्सा अधिकारी डॉ. प्रीत खोना बताती हैं कि ग्रामीणों को टीका लगाने में बहुत कठिनाई हो रही है। उन्होंने बताया कि स्वास्थ्यकर्मी पिछले चार दिनों से ग्रामीणों को समझने के लिए अवेयरनेस कार्यक्रम चला रहे हैं, लेकिन ग्रामीण सुनने को तैयार ही नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि टीका लगवाने में ग्रामीण बहाने बना रहे हैं, लेकिन जब स्वास्थ्य विभाग द्वारा जोर दिया जाता है तब ग्रामीण कहते हैं कि उन्हें Covid-19 संक्रमण नहीं हो सकता क्योंकि बाबा दावल मलिक उनकी रक्षा कर रहे हैं।

न्यू इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक गाँव के एक निवासी ने कहा, “कोरोना वायरस हमारे गाँव में प्रवेश ही नहीं कर पाएगा और यदि आ गया तो हमें मार नहीं पाएगा। ऐसा इसलिए क्योंकि हम उसके पास रहते हैं जिसके हजारों की संख्या में अनुयायी हैं और वही हमारी रक्षा करेगा। इसलिए हम टीका नहीं लगवा रहे हैं और सरकार को भी हमारी चिंता करने की जरूरत नहीं है।“

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक स्थानीय निवासी तर्क देते हैं कि बाबा दावल मलिक के कारण गाँव में दरवाजे भी नहीं हैं, लेकिन आज तक यहाँ चोरी नहीं हुई। स्थानीय निवासी यह भरोसा करते हैं कि बाबा दावल मलिक की आत्मा ही उन्हें बीमारियों और तमाम परेशानियों से बचाती है। हालाँकि स्वास्थ्य अधिकारियों का यह भी कहना है कि गाँव वाले टीके लगवाने के एवज में 25,000 हजार रुपए का बीमा या बॉन्ड चाहते हैं।

ऐसा ही एक मामला गुजरात के जुहापुर से आया जहाँ स्थानीय मुस्लिम निवासी कोरोना वायरस के टीका न लगवाने के लिए तरह-तरह के दावे कर रहे हैं। जुहापुर की एक स्थानीय महिला ने दावा किया कि हमारा अल्लाह साथ है और अल्लाह ही उन्हें बचा लेगा। एक दूसरे शख्स ने कहा कि उसे कोरोना हुआ था तब वह ठीक हो गया था, लेकिन यदि वह वैक्सीन लगवाएगा तो उसकी मृत्यु ही हो जाएगी।

कोरोना वायरस को लेकर अक्सर ही उलटे-सीधे बयान आते रहते हैं। हाल ही में समाजवादी पार्टी के सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने कहा था कि कोरोना कोई बीमारी है ही नहीं। यह एक आसमानी आफत है जो अल्लाह के सामने गिड़गिड़ाने के बाद ही जाएगी। सपा के ही सांसद एसटी हसन ने भी कहा था कि मोदी सरकार द्वारा मुस्लिमों पर किए गए जुल्म के कारण ही कोरोना बीमारी आई है। ऐसे ही गलतबयानी का असर सामान्य लोगों पर होता है जिसके परिणामस्वरूप दावल मलिक गाँव और जुहापुर जैसे इलाकों से लगातार चिंतित करने वाली खबरें आती रहती हैं।

‘TMC के गुंडों ने मुझ पर बाँस और डंडे से हमला किया’: बंगाल में अब बीजेपी MP जयन्त रॉय बने निशाना

पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी में भाजपा सांसद डॉ. जयन्त कुमार रॉय पर हमला हुआ है। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है। घटना के समय वह भाजपा कार्यकर्ताओं से मिलकर लौट रह थे। 

टीवी9 के अनुसार, जलपाईगुड़ी जिले के राजगंज प्रखंड में डॉ. जयन्त पर हमला शाम 5 बजे हुआ। हमले में 2 लोगों के घायल होने की खबर है। दोनों को अस्पताल में भर्ती किया गया है। भाजपा सांसद रॉय ने इस हमले के लिए TMC पर आरोप मढ़ा है।  

समाचार एजेंसी एएनआई से बात करते हुए जयन्त रॉय ने बताया, “करीब 5 बजे TMC के गुंडों ने मुझ पर हमला किया। उन्होंने मुझ पर बाँस और डंडे से हमला किया। मेरे हाथ में और सर में चोट लगी है। मेरे साथ अन्य कार्यकर्ताओं पर भी हमला हुआ है। पश्चिम बंगाल में कोई कानून-व्यवस्था नहीं बची है।”

एएनआई को नॉर्थ बंगाल मेडिकल कॉलेज के डॉ. ए एन सरकार ने बताया कि भाजपा सांसद के सिर और पेट में चोट है। फिलहाल उनकी हालत स्थिर है।

वहीं, तृणमूल कॉन्ग्रेस जलपाईगुड़ी जिला अध्यक्ष कृष्ण कुमार कल्याणी ने बीजेपी सांसदों पर तृणमूल के हमले के सभी आरोपों को खारिज करके इसे बीजेपी की गुटबाजी का नतीजा कहा है।

टीवी9 भारतवर्ष द्वारा शेयर की गई वीडियो में देख सकते हैं कि सांसद की गाड़ी के शीशे पूरी तरह से चकनाचूर हो गए हैं और गाड़ी में अंदर घायल पड़े हुए हैं।

दक्षिणपंथ मतलब भाजपा नहीं: क्यों इसकी लड़ाई अपने समर्थकों से ही है? ‘कॉन्ग्रेस’ होने से बचने की क्या है वजह?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 17वीं लोकसभा की शुरुआत होते ही सोशल मीडिया पर एक जबरदस्त टकराव देखने को मिला। यह टकराव था भाजपा समर्थकों और दक्षिणपंथियों के बीच। यह सुनने में अटपटा लगता है लेकिन दक्षिणपंथ को ‘उदारवादी वामपंथियों’ ने बहुत ही चालाकी से इस तरह से परिभाषित किया है कि हमें भाजपा और दक्षिणपंथ में अंतर जैसे वाक्य अटपटे लगने लगते हैं।

प्रोपेगैंडा का मुख्य उद्देश्य यह होता है कि अन्य किसी भी विचाधारा के अस्तित्व को ही समाप्त कर दिया जाए या फिर किसी भी तरह से उसकी विश्वसनीयता पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया जाए। इस देश में एक लम्बे समय तक राज करती आ रही वामपंथी विचारधारा ने दक्षिणपंथ के अस्तित्व को ही एक प्रश्न बनाकर इसे एकदम सही साबित भी किया है। और लोगों को यह जानने का अवसर नहीं दिया कि लोकतंत्र में किसी भी ‘-ism’ (वाद) का पहला लक्ष्य समेकित विकास ही होना चाहिए, क्रांति अब प्रासंगिक नहीं रही।

विगत कुछ समय की समकालीन राजनीति पर यदि नजर डालें, तो हम देखते हैं कि राष्ट्रवाद और दक्षिणपंथ ने विश्व के मानचित्र के एक बड़े हिस्से पर अपनी सत्ता कायम की है। इटली के नेता और उप प्रधानमंत्री मैतियो साल्विनी की लोकप्रियता से लेकर स्पेन, जर्मनी और फ्रांस, यहाँ तक कि स्लोवेनिया तक, यूरोप के तमाम देशों में घोर दक्षिणपंथी पार्टियों की लोकप्रियता बहुत तेजी से बढ़ी है। दक्षिणपंथ की इस तीव्र गति से बढ़ती हुई लोकप्रियता इतनी विराट है कि एक बेहद लंबे समय से स्थापित पार्टियों के सलाहकार और बड़े से बड़े धुरंधर राजनीति के विचारकों के माथे पर बल पड़ रहा है। प्रश्न यह है कि दक्षिणपंथ की ओर जनता का झुकाव और वामपंथ एवं उदारवादियों से जनता का भरोसा आखिर किन कारणों से उठता जा रहा है? क्या उदारवादियों और वामपंथियों के कारण व्यवस्थाएँ बेलगाम हुई हैं?

यूरोप के लिए राष्ट्रवाद आज का विषय नहीं है। वहाँ पर मौजूद कोई भी दल हो, उसने राष्ट्रवाद को खूब विषय बनाकर हमेशा प्रासंगिक रखा। लेकिन यूरोप और पश्चिम के हर कूड़े-करकट को ‘मार्क्स-वाक्य‘ मान लेने वाले भारत में बैठे विचारकों को भारत की जनता के राष्ट्रवाद शब्द से ही क्यों विशेष आपत्ति है?

देश ने पूरे 5 साल देखा कि विरोधी दलों ने मोदी सरकार को अलोकप्रिय साबित करने के लिए हर प्रकार के हथकंडे अपनाए। लेकिन नतीजा ये रहा कि जनता ने लोकसभा में भाजपा को 300 का आँकड़ा पार कराने में मदद की। यह हर हाल में चमत्कारिक आँकड़ा है। जब तमाम दल एकजुट होकर, मीडिया से लेकर संस्थाओं तक में छुपे अपने समस्त दल-बल के जरिए सिर्फ एक व्यक्ति को हराने का प्रण ले चुका था, ऐसे में वह और भी भीषण रूप में जनता द्वारा अपना लिया गया, तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं है।

क्या प्रत्येक भाजपा समर्थक दक्षिणपंथी है?

विपक्ष ने सारी ऊर्जा मोदी समर्थक जनता को मूर्ख, राष्ट्रवाद को कोसने और दक्षिणपंथियों को अनपढ़ साबित करने में ही गँवा दी। यहाँ तक कि चुनाव नतीजों के बाद भी जनादेश कुछ चुनिंदा लोगों और संस्थानों के लिए अपाच्य बना हुआ है। यह स्पष्ट है कि नरेंद्र मोदी को अपना प्रधानमंत्री बनता देखने के लिए देश के एक बड़े वर्ग ने प्रयास किए। भाजपा को वोट देने वालों में समाज का हर वर्ग था, इसे आप शिक्षित-अशिक्षित से लेकर कुलीन से लेकर वंचित, पूंजीवादी से लेकर समाजवादी, हर प्रकार के लोगों ने जोर लगाया। क्या इससे यह निष्कर्ष निकल जाता है कि ये सभी दक्षिणपंथी थे?

दक्षिणपंथ को इस देश में बहुत ही गलत तरीके से परिभाषित किया जाता रहा है। या यह कहें कि समाज में उदारवादी विचारक नजर आने वाले कुछ लोगों ने अपनी कुटिल बुद्धि के द्वारा दक्षिणपंथ को समेटने का प्रयास किया। आज भी जब दक्षिणपंथ शब्द का प्रयोग किया जाता है तो हम तुरंत एक ऐसी छवि बनाते हैं, जिसने आवश्यक रूप से धोती-कुर्ता पहना हुआ हो, त्रिपुण्ड धारण किया हुआ हो। उसने जनेऊ धारण किया हुआ हो, और हो सके तो वह अशिक्षित हो। यह मेरे द्वारा गढ़ी गई परिभाषा नहीं है, बल्कि समाज में अपने विषैली विचारधारा के माध्यम से किसी भी प्रकार के प्रोपगैंडा को समाज और सूचना के माध्यमों के बीच स्थापित करना है।

दक्षिणपंथ की पहली लड़ाई अपने समर्थकों से ही है

भारत के संदर्भ में भाजपा समर्थकों को सीधे-सीधे दक्षिणपंथ से जोड़ दिया जाता है। लेकिन क्या यह निष्कर्ष तार्किक रूप से सही है? यह भी सच है कि एक उग्र वर्ग भाजपा के समर्थन में जरूर रहता है। हम देख सकते हैं कि कई बार लोगों को वन्दे मातरम कहने पर मजबूर किया जाता है। राष्ट्रवाद के नाम पर अक्सर कुछ अनावश्यक तथ्यों के माध्यम से सूचनाओं से छेड़छाड़ करने के प्रयास किए जाते हैं। जवाहरलाल नेहरू के साथ गयासुद्दीन गाजी जैसी थ्योरी डेवलप करने वालों की भी कमी नहीं है। हालाँकि इस तथ्य को भी नकारना बेवकूफी होगी कि यह उग्रता मात्र एक प्रतिक्रियात्मक परिणाम है, जो असंतोष और शोषण की तपस में जन्म लेता है। 

हालाँकि, इस देश में कॉन्ग्रेस ने ही सिखाया है कि किस प्रकार से अपनी सुविधानुसार तथ्यों को इतिहासकारों के द्वारा एक विशेष दिशा में पढ़वाया और छपवाया जा सकता है। कॉन्ग्रेस ने ही आवश्यकतानुसार कभी गाय को अपना प्रतीक चिन्ह बनाया तो कभी उसे सड़क पर काट दिया। लेकिन इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता है कि दक्षिणपंथ को इस प्रकार की बेवकूफियों से बचना होगा, जो कॉन्ग्रेस ने सत्तापरस्ती में बहुत ही सावधानी से की।

गाय के नाम पर हिंसक होना और इतिहास से बचकाना छेड़खानियों से हमें बचना सीखना होगा। दक्षिणपंथ को मात्र भाजपा से जोड़कर परिभाषित करना एक अतार्किक निर्णय है। कोई व्यक्ति दक्षिणपंथी भी हो सकता है और वह अपनी सरकार से आवश्यक मुद्दों पर सवाल भी कर सकता है। दक्षिणपंथ होने का मतलब यह बिल्कुल भी नहीं है कि वह किसी सकारात्मक परिवर्तन का विरोधी हो। दक्षिणपंथी होने की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि एक दक्षिणपंथी बिना नारीवाद जैसे शब्दों को अपमानित किए ही महिलाओं के अधिकारों का समर्थक हो सकता है।

मसलन, वामपंथी चरमपंथियों में किसी भी विषय को क्रांति के स्तर पर मुद्दा बनाकर किसी भी प्रकार से उसे एक सनसनी बना देने तक सीमित होता है। वामपंथी उदारवादी और नारीवादी ब्रा उतारने और ऑर्गज़्म से लेकर सड़क पर कपड़ा-फाड़ प्रतियोगिता के जरिए महिलाओं के सशक्तिकरण की बात करते हैं। जबकि दक्षिणपंथी महिलाओं को शिक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता के जरिए महिलाओं के अधिकारों पर जोर देते हैं। यदि दुराग्रही वामपंथियों के प्रपंच में उलझे बिना देखें, तो दक्षिणपंथ कहीं ज्यादा तार्किक और समाधान का हिस्सा है, लेकिन ‘नेहरु घाटी सभ्यता’ के दौरान पैदा हुए विचारकों ने कभी किसी को यह सोचने का मौका ही नहीं दिया कि उनके अलावा भी कोई दूसरी विचारधारा इस पृथ्वी पर हो सकती है और उनसे कहीं ज्यादा बेहतर हो सकती है।

इस देश का वामपंथी, उदारवादी, समाजवादी कहीं ना कहीं कॉन्ग्रेस को अपनाकर चलता है। लेकिन, उन्होंने यह खेल इतनी चतुराई के साथ खेला कि किसी को कभी इसकी भनक नहीं लगने दी और इसकी आड़ लेकर अपने हर झूठ को समाज का सच बनाकर एक कड़ी के रूप में स्थापित करते गए।

‘भीड़’ का राजनीतिक दल और विचारधारा AC कमरों से तय नहीं होती है

इन्हीं सब कड़ियों का नतीजा है कि आज भाजपा के साथ खड़े वर्ग का एक बड़ा वर्ग जहाँ उदारवादियों का है, तो दूसरी ओर एक उग्र समूह भी भाजपा में अपनी आस्था जता रहा है। देखा जाए तो यह वर्ग उग्र एक ही दिन में नहीं हुआ, ‘उदार वामपंथियों’ ने धीरे-धीरे कर के देश में अपनी विचारधारा का बीज इस तरह से बोया कि हर दूसरी विचारधारा बहुत छोटी खुद ही नजर आने लगी। जिसे आज का अवार्ड वापसी गैंग और कथित विचारक भाजपा का उग्र चेहरा बताती है, इन्हीं विचारकों ने उन्हें समय-समय पर अपनी कुलीनता के सामने लज्जित करने का प्रयास किया है।

यही वो ‘उदार विचारक’ हैं, जो अपने AC कमरों में बैठकर पर्यावरण पर चिंता व्यक्त करते हैं, भीड़ को ‘भक्त’ ठहरा देते हैं। जबकि, भीड़ के बीच उतरने पर इन्हें पता चला कि जिन लोगों से ये मार खा रहे थे, वो कॉन्ग्रेस समर्थक थे। ये अपने मालिकों द्वारा दिए जा रहे फ्री के इंटरनेट से जब मर्जी, जिसे मर्जी अनपढ़ और मूर्ख साबित करते हैं। यह बहुत आसान होता है कि विपरीत मत रखने वालों को घृणा की दृष्टि से उसे अशिक्षित और उग्र भीड़ ठहरा दिया जाए, लेकिन वास्तविकता उस भीड़ का हिस्सा होने पर ही सामने आती है। यह उग्र समूह सिर्फ बंद AC कमरों से भाजपा समर्थक या दक्षिणपंथी ठहराए जा सकते थे, भीड़ का हिस्सा होने पर ये उनके अन्नदाता निकल आते हैं।

दक्षिणपंथ और वामपंथ

देखा जाए तो वामपंथ का उदय राज परिवारों और पूंजीवादी व्यवस्थाओं के शोषण एवं अत्याचारों के विरुद्ध एक प्रतिक्रियात्मक विचारधारा के कारण हुआ था। धुर वामपंथी विचारधारा में वामपंथ के आड़े आ रहे प्रत्येक व्यक्ति, वस्तु और विचारधारा का विनाश करना जायज है। 20वीं सदी में माओ त्से तुंग ने चीन में पूरी ताकत से इस विचारधारा पर एक क्रूर शासन स्थापित किया था और करोड़ों लोगों को मौत के घाट उतारा। रूस में लेनिन और बाद में जोसेफ स्टालिन ने वामपंथ के नाम पर भीषण नरसंहार किया।

दूसरी ओर दक्षिणपंथी विचारधारा को हमेशा से ही जातिगत, सामाजिक मतभेद, कट्टर और रूढ़िवाद पर आधारित बताया गया है। क्रांति के नाम पर नरसंहार करने वाले वामपंथियों को देखकर कुछ सामाजिक चिंतकों के हाथ-पाँव फूल गए थे। शायद कार्ल मार्क्स को भी यह अंदाजा नहीं था कि क्रांति हथियारों में तब्दील हो जाएगी। बावजूद इसके, क्रांति के इस मसीहा के जन्म को ही 200 साल बाद भी कुछ नव-विचारकों द्वारा पूजनीय माना जाना तय हुआ है।

इस प्रचंड नरसंहार और हिंसा के बाद वामपंथ ने चतुराई से एक नकाब ओढ़ा। इसने खुद को समाजवाद के साँचे में ढालने का प्रयत्न किया, ये वही नकाब हैं जिन्हें हम अक्सर टीवी और अन्य जगहों पर ‘अच्छी बातें’ करते हुए देखते हैं और हम स्वतः ही उनकी वास्तविकता जाने बिना आकर्षित हो जाते हैं। हालाँकि, समाजवाद के इस नरम चेहरे के कुछ अंश हमें भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के वक़्त भी नजर आए। लेकिन भारतीय जनमानस कभी भी वामपंथी गंदगी की वास्तविकता को पूर्णरूप से वहन कर पाने में सक्षम नहीं रहा।

वाम और दक्षिण शब्दों का इतिहास यह है कि फ़्रांस में क्रान्ति से पूर्व की एस्तात झ़ेनेराल नामक संसद में सम्राट को हटाकर गणतंत्र की माँग करने वाले और धर्मनिरपेक्षता चाहने वाले अक्सर सम्राट की बाईं ओर बैठा करते थे, जबकि सम्राट का समर्थन करने वाले लोग उनकी दाईं ओर बैठते थे। इसलिए सत्ता और शासन से निराश लोग अक्सर वामपंथी कहलाए जाते हैं। वर्तमान समय में पूँजीवाद, रूढ़िवादिता आदि से सम्बंधित विचारधाराओं को अक्सर दक्षिणपंथ कहा जाने लगा है। हालाँकि, एक समय ऐसा भी था जब वामपंथ को मानने वालों में सिर्फ बुद्धिजीवी लोग ही हुआ करते थे।

मशहूर दार्शनिक एवं आलोचक नोम चोम्स्की (Noam Chomsky) ने प्रोपगैंडा को सबसे सही तरह से परिभाषित किया है। उनका कहना था – “That’s the whole point of good propaganda. You want to create a slogan that nobody’s going to be against, and everybody’s going to be for. Nobody knows what it means, because it doesn’t mean anything.” यानी, “प्रोपगैंडा का प्रमुख उद्देश्य यही है। आप एक ऐसा नारा बना देना चाहते हैं जिसके विरुद्ध कोई न हो और जिसका सब समर्थन करेंगे। कोई नहीं जानता उस नारे का क्या मतलब है, क्योंकि उसका कोई मतलब है ही नहीं।”

दक्षिणपंथ को ‘कॉन्ग्रेस’ होने से बचने के लिए तथ्य को स्वीकार करना सीखना होगा

इन उदारवादी विचारकों को लगता आया है कि सूचना से लेकर शिक्षा इनकी बपौती है और यही असल वजह है कि दूसरे वर्ग के प्रति इनकी हे दृष्टि ने एकबार फिर नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बना दिया। इसलिए दक्षिणपंथ को यदि अपनी पवित्रता बनाए रखनी है, तो उसे अपने ही एक बड़े वर्ग से संघर्ष करना होगा। यह भी सच है कि यह संघर्ष बहुत लम्बे समय तक चलेगा, लेकिन यह फासला रखना जरूरी है, ताकि हम भाजपा को कॉन्ग्रेस की तरह ही जमीन की धूल खाते हुए ना देखें। हमारा वर्तमान कर्तव्य सूचनाओं को सही दिशा देना होना चाहिए ताकि कुछ सृजन हो सके। इतिहास से हम सबक अवश्य ले सकते हैं लेकिन हम इतिहास में ही इतने मुग्ध न हो जाएँ कि हमें वर्तमान में ही अपनी जड़ों को स्थापित करने का ध्यान ना रहे।

दक्षिणपंथ के पास हर प्रकार के उदाहरण मौजूद हैं। यहाँ सरदार पटेल से लेकर अटल बिहारी वाजपयी और राम मनोहर लोहिया से लेकर जॉर्ज फर्नांडिस तक के उदाहरण मौजूद हैं। जबकि कॉन्ग्रेस की हर शाख पर राहुल गाँधी बैठा है। हमें इसे बेहतर तरीके से समझने के लिए प्रसिद्ध अमरीकी राजनीतिशास्त्री डेविड नोलान के नोलान चार्ट को जरूर पढ़ना चाहिए। नोलन ने वर्ष 1969 में किसी भी पंथ और विचारधारा के लिए एक बेहद स्पष्ट ग्राफ बनाया था। जिससे हम किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का राजनैतिक झुकाव और उसके प्रोपगैंडा के सामर्थ्य को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं और अपनी परिभाषा तय कर सकते हैं।

नोलान चार्ट

नोलान ने इस चार्ट के माध्यम से हमारे राजनीतिक झुकाव को लेफ्ट लिबरल, राइट कंज़र्वेटिव, लिबेरटेरियन, ऑथोरिटेरियन या तानाशाही और सेंट्रिस्ट में परिभाषित किया है। इस चार्ट के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आज तक के अपने हर उस नेता को जरूर आजमाइए, जिस पर आप आँख मूँदकर यकीन करते आए हैं।

बायसेक्सुअल हैं विकास गुप्ता, प्रत्युषा बनर्जी को कर रहे थे डेट: अभिनेत्री के ‘सुसाइड’ के 5 साल बाद किया खुलासा

टीवी रिएलिटी शो ‘बिग बॉस’ के एक्स कंटेस्टेंट विकास गुप्ता अपनी पर्सनल लाइफ को लेकर सुर्खियों में बने रहते हैं। बिग बॉस के घर में भी विकास गुप्ता की पर्सनल लाइफ और सेक्सुअलिटी से जुड़ी कई चीजें सामने आई थीं। अब विकास ने प्रत्युषा बनर्जी की मौत के 5 साल बाद खुलासा किया है कि वह एक्ट्रेस को डेट कर चुके हैं। उन्होंने बताया कि वह कुछ वक्त प्रत्युषा के साथ रिलेशनशिप में रहे हैं। दोनों का ब्रेकअप होने के बाद प्रत्युषा को पता चला था कि वह बायसेक्सुअल हैं।

ईटाइम्स टीवी को दिए इंटरव्यू में विकास ने खुलासा किया कि उन्होंने दो महिलाओं को डेट किया है। दोनों उनके बायसेक्सुअल होने के बारे में जानती थीं। इनमें से एक प्रत्युषा बनर्जी थीं और दूसरी महिला का नाम उन्होंने नहीं बताया।

कुछ लोगों ने मेरा रिलेशन बिगाड़ दिया

उन्होंने बताया कि वह प्रत्युषा बनर्जी को डेट कर रहे थे, लेकिन कुछ लोगों ने उनका रिलेशन बिगाड़ दिया। ब्रेकअप का कारण था कि कुछ लोगों ने उससे मेरी बुराई की थी, लेकिन मैं इसकी डिटेल में नहीं जाना चाहता हूँ, क्योंकि अब वह इस दुनिया में नहीं है। ब्रेकअप के बाद मैं उनसे बेहद नाराज था। एक बार प्रत्युषा को रोड पर देखकर मैंने अनदेखा कर दिया था। उन्होंने मुझे फोन करके पूछा कि वह ऐसा कैसे कर सकते हैं। मैं प्रत्युषा को पसंद करता था और उनके साथ एक बड़ा प्रोजेक्ट करना चाहता था।

बता दें कि टीवी शो ‘बालिका वधू’ में आनंदी का किरदार निभाकर मशहूर हुईं प्रत्युषा बनर्जी की 1 अप्रैल 2016 को मौत हो गई थी। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन्होंने आत्महत्या कर ली थी। उस समय प्रत्युषा एक्टर राहुल राज सिंह को डेट कर रही थीं। प्रत्युषा की मौत के बाद उनके बॉयफ्रेंड राहुल राज सिंह को जिम्मेदार ठहराया गया था। एक्ट्रेस के घर वालों ने राहुल के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाते हुए मामला दर्ज करवाया था। इस बारे में विकास ने बताया, राहुल सिंह के बारे में जो सीन मुझे याद हैं, वह हॉस्पिटल के बाहर चिप्स खा रहा था (जब प्रत्युषा की मौत हुई)। मैं घुसा तो देखा कि मकरंद मल्होत्रा भी वहीं थे और लोगों को बुला रहे थे। राहुल से पहले प्रत्युषा ने मकरंद को डेट किया था।

महबूबा मुफ्ती का ‘खास’, आतंकियों का ‘मोहरा’: पत्थरबाजी गैंग चलाने वाला PDP नेता पारा 13 साल से राष्ट्रद्रोह में लगा था

जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के करीबी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) नेता वहीद-उर-रहमान पारा के ख़िलाफ़ हाल ही में दायर हुई चार्जशीट से कई चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। चार्जशीट में पीडीपी नेता को राष्ट्रद्रोह की गतिविधियों में आरोपित बनाया गया है।

इस आरोप पत्र में बताया गया है कि पारा आतंकी संगठनों का खास मोहरा था। उसका छात्र जीवन से पत्रकारिता और सियासत का 13 साल (2007-2020) का सफर केवल छल, प्रपंच, अवसरवादिता और दोगलेपन की कहानी है।

जम्मू-कश्मीर पुलिस के सीआईडी ​​विभाग की एक शाखा, काउंटर इंटेलिजेंस कश्मीर (CIK) द्वारा दायर 19-पृष्ठ के आरोप-पत्र में, पारा पर यह इल्जाम भी है कि पाकिस्तान के नापाक मंसूबों को आगे बढ़ाने के लिए वह आतंकियों से हाथ मिला रहा था और उनके जरिए ये भी सुनिश्चित कर रहा था कि उसके राजनीतिक प्रतिद्वंदियों का खात्मा हो।

आतंकी संगठनों से मेलजोल

चार्जशीट में बताया गया है कि पारा पुलवामा में एक स्थानीय मीडिया केबल नेटवर्क चलाता था और शुरुआती समय में उसका एंकर भी था। 2013 में वह पीडीपी से जुड़ा और बहुत तेजी से राजनीति में आगे बढ़ते हुए उसने पार्टी के यूथ विंग में अध्यक्ष पद हासिल कर लिया। ऐसा करके उसने खुद को पूरी तरह सुरक्षित करने का काम किया।

बता दें कि वहीद उर रहमान पारा भले ही पीडीपी से 2013 में जुड़ा, लेकिन उसके आतंकियों से संबंध उससे पहले से थे। पुलिस ने अपनी छानबीन में बड़ी गहनता से पड़ताल की है और ये पता लगाया है कि शायद उसका आतंकियों से मेल-जोल 2007 से ही था।

ये वही साल था जब 2007 में पाक जाकर पारा ने हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर सैयद सलाहुद्दीन का साक्षात्कार लिया और पुलवामा लौटने पर इस साक्षात्कार को स्थानीय केबल नेटवर्क पर प्रसारित किया।  आरोप पत्र में बताया गया है कि उसका पाकिस्तानी आतंकियों अबु दुजाना और अबु कासिम से संबंध था। वह उनसे निजी तौर पर मिलता था और कई बार ओवरग्राउंड वर्करों के जरिए। दोनों ही सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ में मारे जा चुके हैं। अबु दुजाना का विवाह स्थानीय लड़की से करवाने में भी पारा का ही हाथ था।

हिंसा जारी रखने के लिए दिए 5 करोड़

इतना ही नहीं इससे पहले एनआईए द्वारा विशेष अदालत में दायर चार्जशीट में ये खुलासा हुआ था कि वहीद ने बुरहान वानी को मार गिराए जाने के बाद कश्मीर घाटी में हिंसा जारी रखने के लिए हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेता सैयद अली शाह गिलानी के दामाद अल्ताफ अहमद शाह उर्फ अल्ताफ फंटूश को पाँच करोड़ रुपए दिए गए थे

मालूम हो कि वहीद पारा को राष्ट्रीय जाच एजेंसी (एनआइए) ने बीते साल नवंबर में गिरफ्तार किया था। एनआइए ने उसे आतंकी-पुलिस गठजोड़ में पकड़े गए जम्मू कश्मीर पुलिस के तत्कालीन डीएसपी (अब सेवामुक्त) देविंदर सिंह और उसके साथ पकड़े गए आतंकी नवीद मुश्ताक से मिले सुरागों के आधार पर गिरफ्तार किया था। सके बाद एनआइए की विशेष अदालत में 10 जनवरी, 2021 को पारा को जमानत मिल गई थी, लेकिन अगले ही दिन जम्मू-कश्मीर पुलिस के काउंटर इंटेलिजेंस विंग ने उसे गिरफ्तार कर लिया। पारा ने पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बाद एक बार फिर अदालत में जमानत याचिका दायर की, लेकिन पुलिस ने जाँच का हवाला देते हुए जो तथ्य अदालत में पेश किए, उनके आधार पर याचिका खारिज हो गई थी। 

पत्थरबाजों का चलाता था गैंग

गौरतलब है कि इससे पहले एनआईए की चार्जशीट से यह बात सामने आई थी कि पारा कश्मीर में पत्थरबाजों का गैंग चलाता था। आतंकियों के लिए हथियारों का भी इंतजाम करता था। वहीद उर रहमान सहित 3 लोगों के खिलाफ दायर एक चार्जशीट में बताया गया था कि पीडीपी नेता ‘पत्थरबाजी’ का रैकेट चलाता था और दक्षिण कश्मीर में हथियार की तस्करी का काम भी करता था।

चार्जशीट के अनुसार, पारा ने दक्षिण कश्मीर में पत्थरबाजी का रैकेट चलाया, जिसे उसने साल 2010-11 में संगठित किया था। उसने पॉलिटिकल माइलेज पाने के लिए पुलवामा में ऐसे 20-25 लड़कों को इकट्ठा किया था जो पत्थरबाजी में शामिल थे। इसके अलावा चार्जशीट में बताया गया है पारा ने पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैय्यबा के आतंकी कमांडर अबू दुजाना को 10 लाख रुपए की फंडिंग उपलब्ध कराई थी। वह नियमित रूप से आतंकियों और अलगाववादियों कि फंडिंग कर रहा था, ताकि घाटी में स्थिति खराब बनी रहे। साथ ही चार्जशीट में PDP द्वारा आतंकियों और अलगगववादियों के तुष्टीकरण की नीति के बारे में भी खुलासा किया गया है।

यदि सिद्धू रहा, जड़ से उखाड़ देगा इन्हें, जब चाहेगा कुर्ते की तरह झाड़ देगा इन्हें…

राजनीतिक दल के नेताओं को अधिकार है कि वे मंत्री, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, कोआपरेटिव वगैरह के चेयरमैन वगैरह नहीं हो सकते तो असंतुष्ट हो सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि लोकतंत्र में संतोष के लिए भले ही कोई स्थान न हो पर असंतोष के लिए बहुत स्थान है। जो संतुष्ट रहता है, वह किसी स्थान पर दिखाई नहीं देता। इसलिए नेता समय काल देखकर कर असंतुष्ट हो लेते हैं। उनके निवास स्थान पर आने जाने वालों की संख्या बढ़ जाती है तो आईबी का सिपाही मुख्यमंत्री कार्यालय को बताता है कि; आज फलाने विधायक आए थे निवास स्थान पर। परसों तो फलाने अपने साथ फलाने को लेकर आए थे। मुख्यमंत्री हाईकमान को रिपोर्ट भेजते हैं।

उधर से हाईकमान फोन करके पूछता है; आजकल आप कुछ बोल नहीं रहे? कारण क्या है? 

नेताजी नायक फिल्म के अमरीश पुरी की तरह मुँह पर अंगुली रख लेते हैं। उनका सहायक बोल पड़ता है; भैया जी असंतुष्ट हैं। 

हाईकमान पूछता है; क्यों? 

सहायक बोलता है; चुनाव आ रहे हैं। अब असंतुष्ट न होंगे तो कब होंगे? 

हाईकमान कहता है; चुनाव में तो अभी देर है। 

सहायक; पहले से इसलिए असंतुष्ट हैं ताकि दुख व्यक्त करने के लिए बता सकें कि राज्य में लोकतंत्र की हत्या हो रही है। कि मुख्यमंत्री विधायकों की नहीं सुनते।   

हाईकमान; अच्छा तो विधायक जी लोकतंत्र की हत्या से दुखी हैं?

सहायक; नहीं, दुखी तो मुख्यमंत्री से ही हैं पर अपने दुख जताने का काम वाया लोकतंत्र की हत्या के करते हैं। 

इसी मॉडल के सहारे नवजोत सिंह सिद्धू भी नाराज हुए हैं। नाराजगी की पिच पर ओपनिंग किए हुए उन्हें तीन बरस हो गए और अभी तक एक के एवरेज से खेले जा रहे थे। अब जाकर रन रेट बढ़ा है जब परगट सिंह के साथ पार्टनरशिप शुरू हुई है। परगट खुद भी कैप्टन रह चुके हैं इसलिए कैप्टन साहब के लिए अब मुश्किल हो गई है। इसी मुश्किल से निकलने के लिए दशकों पुराने राजनीतिक दर्शन के अनुसार हाईकमान ने कमेटी गठित कर दी और रिपोर्ट करने को कहा। तीन सदस्यीय कमेटी ने नवजोत सिद्धू से मुलाक़ात की। सिद्धू सही समय पर उपस्थित हुए। हाथ में मुहावरा समग्र नामक पुस्तक थी।     

मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा; सिद्धू साहब आपको कैप्टन साब से क्या प्रॉब्लम ऐ? आप अबी इतना बिजी काए हो गया ऐ?

सिद्धू;ओये गुरु, मिट्टी का ढेला गुलाबों की क्यारी में आ गया है, आज ये सिद्धू खरगे साहब की अँकवारी में आ गया है। और जब भी बात होगी नक्कार-ए-खुदा की, तो यही लगेगा कि कैप्टन बँसवारी में आ गया है, बँसवारी में आ गया है। ठोको ताली! 

खरगे; बट्ट, सिद्धू साब, अमको सोनिया जी ने बोला ऐ, सबसे बात करके उनको रिपोर्ट देना। अबी आप अइसा बासा बोल्येगा तो हमको क्या समज में आएगा?

हरीश रावत; अरे खरगे जी, इनके कहने का अर्थ है कि ये कैप्टन साहब से नाराज होकर आपके पास आए हैं और जब तक हाईकमान कैप्टन साहब को गुलाब की क्यारी से बँसवारी में नहीं भेजेगा, मतलब सीएम हाउस से किसी महत्वहीन जगह नहीं भेजेगा, तब तक ये शांत नहीं होंगे।

खरगे; आ! अइसा बोले ऐ सिद्धू साब। लेकिन ये आपने कइसे समजा?

रावत; अरे मुझे पता है खरगे जी। मैं भी बहुगुणा के राज में असंतुष्ट रह चुका हूँ। 

खरगे; फिर तो सही है। ये जो बी बोलेंगे, आप ट्रांसलेट करना। अच्छा, सिद्धू साहब, आपको कौन सा पद चाइए? कौन सा मिनिस्ट्री चाइए वो बताना।

सिद्धू; देखिए खरगे साहब, आप मेरा मेसेज सोनिया जी तक पहुँचाइए और उनसे कहिए कि आकाश की कोई सीमा नहीं, और पृथ्वी का कोई मोल नहीं, साधु की कोई जात नहीं और पारस और सोनिया जी का कोई मोल नहीं, कोई मोल नहीं। ठोको। 

खरगे; ये पारस कौन ऐ?

रावत; अरे पारस से सिद्धू साहब का मतलब राहुल जी से है। 

खरगे; पारस तो कुच ओता ऐ न जिसके चूने से सबी चीज सोना बन जाता ऐ? 

रावत; हाँ, खरगे साहब, पारस एक पत्थर होता है जो किसी भी चीज को छू ले तो वो चीज सोना बन जाती है। कोई भी चीज। धूल, मिट्टी, लोहा, तांबा आलू सब कुछ उसके छूने से सोना बन जाता है। दरअसल सिद्धू साहब कहना चाहते हैं कि इनकी माँग बहुत बड़ी है और उस माँग की आकाश के जैसे कोई सीमा नहीं है और पृथ्वी के जैसा ही कोई मोल नहीं है। साधु की कोई जाति नहीं होती से सिद्धू साहब का तात्पर्य है कि ये प्रदेश अध्यक्ष बनना चाहते हैं पर कैप्टन साहब किसी जाट को प्रदेश अध्यक्ष नहीं बनाना चाहते। कैप्टन साहब चाहते हैं कि कोई दलित प्रदेश अध्यक्ष बने। इसीलिए सिद्धू साहब कह रहे हैं कि साधु की कोई जात नहीं होती क्योंकि सिद्धू साहब का मानना है कि साधु शब्द की उत्पत्ति सिद्धू शब्द से हुई है। 

खरगे; ओ! ये तो मैं जानता नही ता कि साधु वर्ड सिद्धू वर्ड से बना ऐ। 

सिद्धू; ये सत्य है। ये सत्य है। और सिद्धू सत्य बोलता है। जैसे अणु के बिना परमाणु नहीं बनता, व्यक्ति के बिना समाज नहीं बनता, वैसे ही कार्यकर्ता बिना पार्टी नहीं बनती, और सिद्धू के बिना माल नहीं छनता, माल नहीं छनता गुरु। सिकंदर हूँ मैं, सिकंदर, और सिकंदर हालात के आगे कभी नहीं झुकता, तारा टूट भी जाए तो जमीन पर नहीं गिरता, अरे मैं तो फ़कीर की वेश में बादशाह हूँ, सिद्धू कभी जंगल-जंगल नहीं फिरता। गिरते हैं हज़ारों दरया समंदर में, पर कोई समंदर दरया में नहीं गिरता। ठोको ताली।

खरगे ने रावत की ओर देखा। इससे पहले कि कुछ कहते, रावत जी बोल पड़े; सिद्धू साहब के कहने का तात्पर्य यह है कि इनके साथ इस समय दो दर्जन विधायक हैं पर ये असंतुष्ट राजनीति के सिद्धांत के अनुसार खुद को पार्टी का कार्यकर्त्ता बता रहे हैं। इनका कहना है कि ये चमकते हुए तारे हैं और टूट भी जाएँगे तो भी जमीन पर गिरेंगे नहीं। ये दरिया हैं और नदी में नहीं गिरेंगे। विधायक वगैरह चमका कर हाईकमान से बार्गेनिंग कर ही लेंगे। 

खरगे; ठीक ऐ ये दरिया ऐ और कैप्टन नदी ऐ पर अबी ये यिलेक्शन यीयर ऐ सिद्धू साब। अइसा करने से तो पार्टी का बहुत लॉस। ये सुना ऐ कि सीएम के पास यम-यल-ए लोगों के करप्शन का डोज्जियर ऐ। क्या ये सच ऐ? अइसा क्यों हुआ?

सिद्धू; खरगे साहब, स्वाभिमान वो सात्विक सुगन्धित फूल है जिसके इर्द गिर्द गुणों के भँवरे गुन्चित रहते हैं। मैं तो कहूँगा कि ओये गुरु, है अँधेरा बहुत, अब सूरज निकलना चाहिए, जैसे भी हो, ये मौसम बदलना चाहिए, जो चेहरे रोज बदलते हैं नक़ाबों की तरह, अब जनाजा धूम से उनका निकलना चाहिए। खटैक! यदि सिद्धू रहा, जड़ से उखाड़ देगा इन्हें, जब चाहेगा कुर्ते की तरह झाड़ देगा इन्हें, ख़लक-ए-खुदा खड़ा है आज मेरे साथ, चावल खुद खाएगा और माड़ देगा इन्हें। ठोको ताली!

जेपी अग्रवाल बोले; मुझे समझ में तो नहीं आया पर जिस लहजे में आप बोल रहे हैं, उसे सुनकर लगा कि आपकी माँगें बहुत बड़ी हैं। रावत जी, आपकी समझ में आया?

रावत बोले; हाँ, समझ में आया। इनके कहने का अर्थ है कि अँधेरा बहुत मतलब कप्तान साहब ने अंधेर मचा रखा है और सूरज निकलना चाहिए से मतलब है अब ये अंधेर बंद होना चाहिए और मौसम बदलना चाहिए से इनका मतलब है कप्तान साहब सीएम पद छोड़ें और सिद्धू साहब सीएम बनें। ऐसा न हुआ तो ये कप्तान साहब को जड़ से उखाड़ देंगे। सिद्धू साहब, मैं सही समझ रहा हूँ?

सिद्धू बोले; रावत जी, आप शत प्रतिशत सच समझ रहे हैं। मैं कहना चाहूँगा कि; गन्ने में फूल नहीं होता, राजा दीर्घजीवी नहीं होता, पहाड़ ऊँचा होता है, समंदर गहरा होता है, चिड़िया आसमान में उड़ती है और आदमी जमीन पर चलता है, आया है सो जाएगा राजा रंक फ़कीर, कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता, कभी जमीं तो कभी आसमां नहीं मिलता। 

खरगे; यई यई जो लास्ट में आप बोला, मुकम्मल जहां वाला बात। सिद्धू साब हमने आपकी बात सुनी और हम सोनिया जी तक अपनी रिपोर्ट पहुचा देंगे और जो बी करेंगे पार्टी का इत में करेंगे। आप रेस्ट एश्योर्ड रहे।

सिद्धू साहब ने अपनी पुस्तक मुहावरा समग्र को उठाया और चले गए। 

अचानक खरगे ने रावत से पुछा; आप जब असंतुष्ट उआ था तब क्या उआ था? सीएम बन गया था?

दोनों ने एक दूसरे को देखा और फिर मिलकर अग्रवाल जी को देखा और तीनों हँस पड़े। रिपोर्ट हाईकमान तक पहुँच चुकी है।

₹1064 करोड़ का बैंक फ्रॉड: टीआरएस सांसद नागेश्वर राव के घर-दफ्तर पर ED ने मारा छापा

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने शुक्रवार (11 जून 2021) को 1,064 करोड़ रुपए के बैंक फ्रॉड के मामले में तेलंगाना के खम्मम से टीआरएस के सांसद नामा नागेश्वर राव और ‘राँची एक्सप्रेस वे लिमिटेड’ के निदेशकों के घर और दफ्तर पर छापेमारी की।

तलाशी अभियान सुबह 7 बजे शुरू हुआ। इस दौरान ईडी ने 6 स्थानों पर सर्च अभियान चलाया, जिसमें सांसद नामा नागेश्वर राव के आवास व दफ्तर, हैदराबाद के जुबली हिल्स स्थित मधुकॉन इंफ्रा के ऑफिस, ‘राँची एक्सप्रेस वे’ के सीएमडी के. श्रीनिवास राव एवं इस कंपनी के दो अन्य निदेशकों – एन. सीतैया व पृथ्वी तेजा के आवास पर छापेमारी की। रिपोर्ट के मुताबिक, बैंक से लोन दिलाने के मामले में नामा नागेश्वर राव पर्सनल गारंटर बने थे और पृथ्वी तेजा उनके बेटे हैं।

2019 में सीबीआई ने दर्ज की थी एफआईआर

साल 2019 में सीबीआई ने राँची एक्सप्रेस वे लिमिटेड के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। इसके बाद केंद्रीय जाँच एजेंसी ने इस मामले में कंपनी और इसके निदेशकों के खिलाफ 2020 में चार्जशीट दाखिल की थी। सीबीआई की एफआईआर में उस दौरान मधुकॉन प्रोजेक्ट, मधुकॉन इंफ्रा, मधुकॉन टॉली हाईवे, ऑडिटर्स और बैंकों के एक कंसोर्टियम के अधिकारियों के भी नाम शामिल थे।

अब इस मामले में प्रवर्तन निदेशालय मनी लॉन्ड्रिंग की जाँच कर रहा है। दरअसल, केनरा बैंक के नेतृत्व में बैंक्स प्रमोटरों के 503 करोड़ रुपए के सहयोग से 1,151 करोड़ की फंडिंग के लिए सहमत हुए थे।

इस केस में गंभीर धोखाधड़ी जाँच कार्यालय (एसएफआईओ) ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि प्रमोटरों ने 50 करोड़ रुपए में हेराफेरी कर रख-रखाव के रूप में 98 करोड़ रुपए का दावा किया और 94 करोड़ जुटाने के लिए एडवांस का इस्तेमाल कर लिया। इसके बाद 22 करोड़ रुपए को डायवर्ट कर दिया। इस तरह से कंपनी ने कुल 264 करोड़ रुपए का घालमेल किया।

सीबीआई ने कहा है कि अभी तक परियोजना में कोई प्रगति नहीं हुई है और आरोपितों ने 1,029 करोड़ रुपए का कर्ज हासिल करने के लिए धोखाधड़ी की है। 2018 में इस लोन को नॉन परफॉर्मिंग एसेट यानी एनपीए में डाल दिया गया था।

कंपनी को राँची से जमशेदपुर को जोड़ने वाले एनएच-33 पर 163 किलोमीटर लंबी फोर लेन सड़क का ठेका मिला था। मार्च 2011 में ही नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने मधुकॉन प्रोजेक्ट लिमिटेड को इसका ठेका दिया था। इसके बाद मधुकॉन लिमिटेड ने इस विशेष परियोजना के लिए राँची एक्सप्रेस वे लिमिटेड शुरू किया था।

हालाँकि, जनवरी 2019 में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने अपने एग्रीमेंट को खत्म कर दिया था और कंपनी के 73 करोड़ रुपये को जब्त कर लिया था।

हिंदू पड़ोसी की पूजा में सिंगापुर की महिला ने तेज-तेज घंटा बजाकर डाला विघ्न, देखें Video

एक हिंदू व्यक्ति की पूजा पाठ में विघ्न डालने के मामले में सिंगापुर पुलिस 48 साल की एक महिला से पूछताछ कर रही है। महिला पर आरोप है कि उसका पड़ोसी जब अपने फ्लैट के बाहर पूजा कर रहा था, तभी महिला उसे तंग करने के लिए घंटा बजाने लगी। ऐसा करते महिला का एक वीडियो भी सामने आया है।

पुलिस ने बताया है कि शिकायत दर्ज होने के बाद महिला पूछताछ में सहयोग कर रही है। द स्ट्रेट्स टाइम्स के मुताबिक, 19 सेकंड के इस वीडियो को लिवानेश रामू ने बुधवार को फेसबुक पर पोस्ट किया था। वीडियो में दिख रहा है कि चश्मा पहना हुआ एक व्यक्ति अपने अपार्टमेंट यूनिट से बाहर आकर घण्टी बजा रहा है। यह हिन्दू पूजा-पाठ के दौरान बेहद आम है। लेकिन, कुछ देर बाद एक महिला अगले फ्लैट से बाहर निकलती है और करीब 15 सेकेंड तक घंटे को पीटती रहती है। 

इसके बाद आदमी जब नीचे बैठता है और घंटी बजाना बंद कर देता है, उस समय भी वह महिला लगातार घंटा पीटती रहती है। लिवानेश अपने फेसबुक पोस्ट में कहते हैं, “कई अन्य हिंदुओं की तरह हमारा परिवार हफ्ते में दो बार पाँच मिनट के लिए प्रार्थना करते हुए घंटी बजाता है। इस घर में हम 20 से अधिक वर्षों से रह रहे हैं, लेकिन कभी कोई परेशानी हुई। मुझे लगता है कि कोविड-19 के कारण चीजें बदल गई हैं।’’ लिवनेश कहते हैं कि वह पुलिस की जाँच का इंतजार कर रहे हैं। वह अपनी पड़ोसी की हरकत पर पहले से कुछ नहीं कहना चाहते। इस असहिष्णुता पर सिंगापुर के लोगों का साथ पाकर उन्होंने खुशी जताई है।

इस बीच, गृह मामलों और कानून मंत्री के. षणमुगम ने कहा, “आपको नस्लवाद के ख़िलाफ आवाज उठानी चाहिए। इसका विरोध करना चाहिए और यदि कोई कानून का उल्लंघन करता है तो आपको कदम उठाना चाहिए। ये कैंसर है, विभाजनकारी है, जो हमारे सामाजिक मूल्यों को कम करता है।”

गौरतलब है कि इससे पहले पिछले शनिवार को 60 वर्षीय पॉलिटेक्निक लेक्चरर टैन बून ली ने सार्वजनिक रूप से एक अंतरजातीय जोड़े को फटकार लगाई थी। उनका कहना था कि भारतीय पुरुषों को चीनी लड़कियों का शिकार नहीं करना चाहिए। 26 वर्षीय बिजनेस ओनर दवे प्रकाश और 27 वर्षीया उनकी प्रेमिका जैकलीन हो पर यह टिप्पणी की गई थी। बाद में इसे रिकॉर्ड करके फेसबुक पर डाल दिया गया था।