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2 जिलों में 600 से ज्यादा बच्चे संक्रमित: क्या राजस्थान में कोरोना की तीसरी लहर ने दे दी दस्तक?

कोरोना की दूसरी लहर में गिरावट के साथ ही तीसरी लहर से लोग सशंकित हैं। माना जा रहा है कि तीसरी लहर का सबसे ज्यादा प्रभाव बच्चों पर होगा। ऐसे में राजस्थान से एक चिंताजनक खबर आ रही है। राज्य के दो जिलों में 600 से ज्यादा बच्चों के संक्रमित होने की खबर के बाद आशंका जताई जा रही है कि कहीं संक्रमण की तीसरी लहर ने दस्तक तो नहीं दे दी है। ये जिले हैं दौसा और डूंगरपुर।

पिता की मौत, दो बच्चियाँ संक्रमित

दौसा में सिकराय उपखंड के एक गाँव की दो बच्चियों (एक की उम्र 9 साल है, दूसरे की उम्र 10 साल है) को कोरोना ने अपनी जद में ले लिया है। इन दोनों के पिता कोविड पॉजिटिव थे। उनका निधन हो चुका है। इसी तरह दौसा में एक दो साल का बच्चा कोरोना पॉजिटिव हो गया है।

दो जिले में करीब 600 बच्चे संक्रमित

स्वास्थ्य विभाग की मानें तो अकेले दौसा में 1 मई से 21 मई के बीच 18 साल से कम के 341 बच्चे कोविड पॉजिटिव हुए हैं। यही हाल डूंगरपुर का है। डूंगरपुर में 12 मई से लेकर 22 मई तक 18 साल से कम के 255 बच्चे संक्रमित हुए हैं।

कलेक्टर ने नकारा, सीएमओ ने स्वीकारा

डूंगरपुर के कलेक्टर सुरेश कुमार ओला कह रहे हैं कि उनके जिले में बच्चों में कोरोना का संक्रमण बिल्कुल सामान्य है। माता-पिता कोरोना पॉजिटिव हो रहे हैं इसलिए बच्चे भी कोरोना संक्रमित हुए हैं। हालाँकि उनकी संख्या कम है। लेकिन कलेक्टर की बातों को खुद सीएमओ ही खारिज कर देते हैं। डूंगरपुर के सीएमओ राजेश शर्मा बताते हैं कि पिछले 10 दिन में ढाई सौ से ज्यादा बच्चे कोरोना संक्रमित हुए हैं। अच्छी बात सिर्फ इतनी है कि कोविड के चलते किसी बच्चे की मौत की खबर नहीं है।

बाराबंकी में अवैध मस्जिद ढहाने पर अशरफ गनी ने एसडीएम को दी धमकी: यूपी पुलिस ने किया गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के दरियाबाद में 100 साल पुरानी मस्जिद को ढहाए जाने पर एसडीएम दिव्यांशु पटेल को धमकी देने के आरोपित अशरफ अली को पुलिस ने शनिवार (22 मई 2021) को गिरफ्तार कर लिया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, आरोपित ने मस्जिद को ढहाए जाने की घटना का जिक्र करते हुए एसडीएम पर पक्षपाती होने का आरोप लगाते हुए उन्हें इसका परिणाम भुगतने की चेतावनी दी थी।

बीते 17 मई, 2021 को एसडीएम के निर्देश पर अवैध निर्माण का को ढहा दिया गया था। अधिकारियों के मुताबिक, बाराबंकी के राम सनेही घाट क्षेत्र में ‘तहसील’ परिसर के अंदर स्थित एक अवैध आवासीय ढाँचे को ध्वस्त कर दिया है। खास बात यह है कि मुस्लिम समुदाय इसके मस्जिद होने का दावा करता है। विपक्ष भी उसके साथ सुर में सुर मिलाकर उसे मस्जिद बता रहा है। (एसडीएम) कोर्ट राम सनेही घाट के मुताबिक, वहाँ रहने वाले लोगों को अपने दावे को साबित करने के लिए दस्तावेज पेश करने के लिए कहा गया था, लेकिन वे नोटिस के बाद भाग गए।

अधिकारियों के अनुसार इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने 2 अप्रैल को इस संबंध में दायर एक याचिका का निपटारा किया था, जिससे यह साबित हुआ था कि वहाँ पर अवैध निर्माण ही था। अधीकारियों ने आगे कहा, राम सनेही घाट के एसडीएम की कोर्ट में मामला दर्ज किया गया था, इस मामले में 17 मई, 2021 को एसडीएम के आदेशों का पालन किया गया। ज्वाइंट मजिस्ट्रेट दिव्यांशु पटेल ने भी निर्माण को अवैध करार दिया था और अदालत के आदेश पर इमारत को ढहा दिया गया।

पुलिस ने एसडीएम को धमकी देने के आरोपित अशरफ अली के खिलाफ सांप्रदायिक शांति और सौहार्द बिगाड़ने का मामला दर्ज किया है। फिलहाल आरोपित को कोर्ट में पेश कर उसे जेल भेज दिया गया है। वहीं इसी मामले में शुक्रवार ( 21 मई 2021) को सांप्रदायिक अशांति पैदा करने के मामले में संदेह में पाँच लोगों को हिरासत में लिया गया था। मोहम्मद मतीन खान, मोहम्मद साद, सुलेमान, फारूक अहमद खान और मोहम्मद कामिल को गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया गया। इसके बाद उन्हें जेल भी भेज दिया गया है।

‘जिहादियों की भीड़ में रोहिंग्या भी’: पूर्णिया में महादलित बस्ती आग के हवाले, जाँच के लिए पहुँची SC/ST आयोग की टीम

बिहार के पूर्णिया में रिजवी, शाकिद और इलियास ने अपने गुर्गों के साथ एक महादलित बस्ती में आग लगा दी। साथ ही एक रिटायर्ड चौकीदार की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। अब ये मामला तूल पकड़ता जा रहा है। बायसी थाना के मझुआ गाँव 19-20, 2021 की रात को हुई इस घटना की जाँच के लिए अनुसूचित जाति आयोग एक एक टीम घटना की जाँच के लिए पहुँची है। इस घटना में 150 से भी अधिक की भीड़ ने महादलित बस्ती में एक दर्जन से भी अधिक घरों को जला डाला।

महादलित बस्ती आग के हवाले: पूर्णिया पहुँची SC-ST आयोग की टीम

अनुसूचित जाति आयोग के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की अध्यक्षता में पहुँची टीम ने दोषियों की त्वरित गिरफ़्तारी की माँग की है। जमीन को लेकर 2015 में भी वहाँ इसी तरह की हिंसा के वारदात हुई थी, लेकिन बाद लगे पुलिस कैम्प को 2018 में हटा दिया गया था। इस साल अप्रैल 24 को भी एक घर को आग के हवाले कर दिया गया था और महादलितों की पिटाई की गई थी। पीड़ितों का कहना है कि FIR के बावजूद पुलिस की निष्क्रियता के कारण मुस्लिमों ने आज इस घटना को अंजाम दिया है।

SC-ST आयोग के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और बनमनखी विधायक कृष्ण कुमार ऋषि, भाजपा MLC दिलीप जायसवाल और AIMIM के बायसी के विधायक सैय्यद रुकनुद्दीन ने घटना स्थल पर पहुँच कर पीड़ितों से मुलाकात की। कृष्ण कुमार ऋषि ने कहा, “यह बहुत दुःखद, अमानवीय और क्रूर वारदात है। प्रशासन ने अभी तक सिर्फ 2 लोगों को गिरफ्तार कर खानापूर्ति की है। जबकि इस मामले में दो अलग-अलग FIR में 60 नामजद और 100 अज्ञात आरोपित हैं।”

उन्होंने कहा कि रिपोर्ट आयोग को भेजे जाने के बाद सरकार को पीड़ितों को मुआवजा देने के लिए कहा जाएगा। MLC दिलीप जायसवाल ने अपनी ही पार्टी की सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि प्रशासन की नाकामी के कारण ही इतनी बड़ी वारदात अंजाम दी गई। AIMIM विधायक सैय्यद रुकनुद्दीन ने गंगा-जमुनी तहजीब की बात करते हुए कहा कि यहाँ शुरू से हिन्दू-मुस्लिम साथ रहते हैं लेकिन अपराधियों ने इसमें खलल डालने का कार्य किया है।

उप-मुख्यमंत्री तारकिशोर प्रसाद ने स्थिति की समीक्षा की

उन्होंने माना कि महादलित महिलाओं के साथ घृणित करतूत की गई है और इसे शर्मसार करने वाला बताया, लेकिन साथ ही पुलिस को दोष देना भी नहीं भूले। बिहार के उप-मुख्यमंत्री तारकिशोर प्रसाद ने राज्य के DGP, पूर्णिया के IG, DM और SP से बात कर के स्थिति की समीक्षा की। उन्होंने बताया कि उन 13 पीड़ित परिवारों को सूखा राशन और अनुग्रह अनुदान की राशि मुहैया कराई गई गई, जिनके घर जला डाले गए थे।

मृतक रिटायर्ड चौकीदार मेवालाल राय के परिजनों को 4.125 लाख रुपए के मुआवजे की पहली क़िस्त जारी कर दी गई है। डिप्टी सीएम ने बताया कि 13 परिवारों में से 7 परिवारों को पहले भी आवास के लिए जमीन भी उपलब्ध कराई गई थी और अब बाकी के 6 परिवारों को भू भूमि मिलेगी। उन्होंने आरोपितों के स्पीडी ट्रायल के साथ-साथ पीड़ित परिवारों की पुख्ता सुरक्षा इंतजाम करने के निर्देश दिए। राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी घटना का संज्ञान लिया है।

बता दें कि पीड़ितों ने बताया कि उनके साथ छुआछूत किया जाता है और उन्हें वहाँ से हट जाने के लिए कहा जाता है। उनका कहना है कि महादलितों के पीडब्ल्यूडी में बसने के आक्रोश में भीड़ ने ऐसा किया है। महादलित यहाँ पर लगभग 30 सालों से रह रहे हैं। उभीड़ को भड़का कर लाया गया था। इसके बाद एक मीटिंग की गई और हमले को अंजाम दिया गया। दिनेश राय नामक व्यक्ति ने भागने की कोशिश की, लेकिन भीड़ ने उन्हें खींच लिया और फरसा से वार कर उनका सिर फाड़ दिया।

VHP ने भी की पूर्णिया की घटना की निंदा

बिहार के पूर्णिया में ‘इस्लामिक जिहादियों’ द्वारा हिंसक हमले पर चिंता व्यक्त करते हुए विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) ने पीड़ित महादलित परिवारों को शीघ्र न्याय दिलाने की माँग की है। विहिप के केन्द्रीय महामंत्री मिलिंद परांडे ने कहा, “बुधवार की आधी रात को सैकड़ों मुस्लिमों की हथियारों से लैस भीड़ ने हमला कर लगभग दो दर्जन घरों को आग के हवाले किया और मेवा लाल राय नामक हिन्दू महा-दलित की नृशंस हत्या कर दी।”

उन्होंने घटना का ब्यौरा देते हुए कहा कि गर्भवती महिला का सिर फोड़ दिया गया, अन्य बहन-बेटियों, बच्चों व बुजुर्गों तक पर अमानवीय अत्याचार तथा धारदार हथियारों से हमले किए। संगठन ने आशंका जताई है कि इन हमलावरों में बांग्लादेशी व रोहिंग्या मुस्लिम घुसपैठिए भी शामिल थे। संगठन ने कहा कि घटना के तीन दिन बीतने पर भी ना तो अपराधी पकड़े गए हैं और ना ही पीड़ितों की सुरक्षा, सहायता या पुनर्वास के विषय में कुछ हुआ है।

परांडे ने माँग की कि हमलावरों पर संगत धाराओं में FIR दर्ज कर गिरफ़्तारी हो तथा पीड़ित परिवारों की सुरक्षा, आर्थिक सहायता व पुनर्वास हेतु स्थानीय प्रशासन द्वारा सार्थक कदम अबिलंब उठाए जाएँ। मिलिंद परांडे ने कहा कि पश्चिम बंगाल में इसी माह हुए क्रूर हिंसक हमलों को दोहरा कर, हिन्दू समाज के धैर्य की परीक्षा लेने का पुन: दुस्साहस किया है। हमले, मारपीट, लूटपाट, हिंसा व आगजनी की इन जघन्य घटनाओं पर स्थानीय पुलिस, प्रशासन व शासन की उदासीनता को भी उन्होंने बेहद चिंतनीय बताया।

VHP के अनुसार, लोगों के मन में यह शंका है कि स्थानीय जन-प्रतिनिधियों के दबाव के कारण ही ऐसा हो रहा है। संगठन ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, राष्ट्रीय महिला आयोग, राष्ट्रीय बाल आयोग तथा राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग को भी मामले में स्वत: संज्ञान लेकर तत्काल उचित कार्यवाही करने की माँग की है। विहिप महामंत्री ने यह भी कहा कि इस जघन्य हमले ने “मीम-भीम” के नारे की भी पुन: पोल खोल दी है।

उन्होंने कहा, “छुद्र राजनैतिक लाभ के लिए, ऐसे झूठे नारों कि आड़ में ही हिन्दू समाज के इस पराक्रमी दलित समुदाय को हिंसा का शिकार बनाया जाता रहा है। हमारे अनुसूचित जाति व जन-जाति के बंधु-भगिनियों को इनसे भ्रमित ना होकर, अत्यंत सावधान रहने की आवश्यकता है। जिहादियों द्वारा हमलों पर उनके सेक्युलर व दलितों के कथित मसीहाओं के मुँह में दही क्यों जाम जाता है।
सभी पीड़ित महा-दलित परिवारों की सुरक्षा, क्षतिपूर्ति व पुनर्वास के साथ आक्रमणकारियों के विरुद्ध कठोरतम कार्यवाही सुनिश्चित होने तक हिन्दू समाज चुप नहीं बैठेगा।”

कोरोना केस सामने आने से पहले ही ‘वुहान लैब के शोधकर्ता पड़ गए थे बीमार’, अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट के खुलासे से फिर घिरा चीन

एक हालिया अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि चीन में कोरोना वायरस के पहले मामले की पुष्टि से हफ्तों पहले ही ‘वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी’ के कई शोधकर्ता बीमार पड़ गए थे और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। चीन ने कहा था कि वुहान में कोरोना का पहला मामला 8 दिसंबर 2020 को सामने आया था। लेकिन इस अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक वुहान लैब के तीन शोधकर्ता उससे पहले ही नवंबर 2019 में बीमार पड़ गए थे और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था। इस रिपोर्ट से मिली जानकारी से कोरोना वायरस की उत्पत्ति को लेकर जारी बहस तेज हो सकती है।

हालाँकि, खुफिया विभाग को अभी तक यह पता नहीं चल सका है कि हकीकत में शोधकर्ता किस कारण से बीमार हुए थे। नेशनल इंटेलिजेंस के डायरेक्टर के निदेशक ने कहा, “खुफिया समुदाय को ठीक से पता नहीं है कि कोविड -19 वायरस कहाँ से कब या कैसे फैला था।”

सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार, कोरोना महामारी का पता लगाने के लिए की जा रही जाँच में शीर्ष पर रही हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी के सदस्य को इस मामले में पिछले सप्ताह एक ब्रीफिंग मिली थी। कई वर्तमान और पूर्व खुफिया अधिकारी इस बात को मानते हैं कि कोरोना वायरस गलती से वुहान की लैब से निकला था। हालाँकि इसके पुख्ता सबूत नहीं मिले हैं।

ट्रंप ने भी किया था चीनी लैब में शोधकर्ताओं के बीमार पड़ने का दावा

खास बात यह है कि जनवरी, 2021 में ट्रम्प प्रशासन ने भी कहा था कि वुहान लैब के शोधकर्ता 2019 में सर्दियों से पहले बीमार हो गए थे। हालाँकि, उनके अस्पताल में भर्ती होने की बात नहीं कही गई थी। लेकिन, चीन इस तरह की किसी भी प्रकार की रिपोर्ट का विरोध करता रहा है। लेटेस्ट रिपोर्ट में बताया गया है कि कोरोना के लक्षणों वाला पहला मरीज 8 दिसंबर, 2019 को ही वुहान में रजिस्टर किया गया था।

ट्रम्प के प्रशासन के समाप्त होने से ठीक पहले, पूर्व विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ ने वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी से वायरस के लीक होने की संभावना जताई थी।

एक फैक्ट शीट दिखाते हुए पोम्पिओ ने दावा किया था कि अमेरिका के पास वुहान लैब के शोधकर्ताओं के 2019 में कोरोना के लक्षणों के साथ बीमार पड़ने के पुख्ता सबूत थे और लैब में मिलिट्री रिसर्च के भी सबूत थे।

वुहान लैब के डायरेक्टर ने अमेरिकी रिपोर्ट का किया खंडन

चीन के वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी में कर्मचारियों के बीमार होने की अमेरिकी रिपोर्ट का वुहान वायरोलॉजी लैब के डायरेक्टर ने युआन झिमिंग ने खंडन किया है। ग्लोबल टाइम्स को झिमिंग ने बताया, “मैंने इसे पढ़ा है, यह पूरी तरह से झूठा है।” युआन ने ग्लोबल टाइम्स को बताया, “वे दावे निराधार हैं। लैब को इस स्थिति के बारे में पता नहीं है कि 2019 की शरद ऋतु उसके रिसर्चर बीमार पड़े थे। मुझे यह भी नहीं पता कि ऐसी जानकारी कहाँ से आई है।”

डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट का निष्कर्ष

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पिछले महीने SARS-CoV-2 वायरस की उत्पत्ति को लेकर एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें इस बात को असंभव बताया गया था कि वायरस लैब में पैदा हुआ था। रिपोर्ट के मुताबिक, इसकी एक और संभावना है कि यह वायरस जानवरों के तालाबों से फैला हो और उसके बाद इंसानों में इसका संक्रमण शुरू हुआ हो।

ध्यान देने वाली बात ये है कि चीन ने रॉ डेटा नहीं दिया था जिसे खुद डब्ल्यूएचओ प्रमुख ने स्वीकार किया था। उन्होंने कहा था, “टीम के साथ मेरी चर्चा में, उन्होंने रॉ डेटा तक पहुँचने में आने वाली कठिनाइयों को व्यक्त किया। मुझे उम्मीद है कि भविष्य के सहयोगी अध्ययनों में समय पर और अधिक व्यापक डेटा साझाकरण शामिल होगा।”

हालाँकि, कम से कम 14 देशों ने WHO के अध्ययन की अवहेलना करते हुए कोरोना की उत्पत्ति का पता लगाने के लिए निर्णायक तौर पर वैज्ञानिक और सहयोगात्मक दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया है।

वुहान लैब में सैन्य अनुसंधान

इससे पहले ऑप इंडिया ने ये खबर प्रकाशित की थी कि किस तरह से सरकार के इशारे पर चीन में 9 साल पहले नए वायरस को पैदा करने और उसकी जाँच करने और बीमारी फैलाने के लिए जिम्मेदार जीव विज्ञान के “डार्क मैटर” का खुलासा करने की योजना शुरू की गई थी।

चीन की इस परियोजना की अध्यक्षता पाँच नेताओं ने की थी, जिनमें एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी काओ वुचुन भी शामिल थे, जो जैव आतंकवाद पर सरकारी सलाहकार भी थे। वुचुन पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के मिलिट्री मेडिकल साइंस एकेडमी के रिसर्चर्स में से एक हैं। वह मिलिट्री साइंटिस्ट के साथ मिलकर काम करते थे। इसके अलावा वुचुन मिलिट्री बायोसेफ्टी विशेषज्ञ कमेटी के निदेशक भी हैं।

गौरतलब है कि बीते कुछ सालों में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी सेना ने वैश्विक स्तक पर दबदबा कायम करने के लिए वैज्ञानिकों की भर्तियाँ की हैं।

‘बाइबिल ठीक करेगा कोरोना’: वैक्सीन के खिलाफ मिशनरी प्रोपेगंडा पर चुप्पी, मदद करने वाले मंदिर ही बन रहे निशाना

देश भर में कोरोना वायरस की वैक्सीन को लेकर जहाँ केंद्र सरकार जागरूकता फैलाने में लगी हुई है और रोज ज्यादा से ज्यादा टीकाकरण का लक्ष्य लेकर चल रही है, वहीं कुछ मजहबी ताकतें ऐसी हैं जो कोरोना के खिलाफ इस लड़ाई को कमजोर कर के कट्टरता के सहारे लोगों को बरगलाने में लगी हुई है। हाल ही में हमने बताया था कि कैसे ‘इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA)’ के अध्यक्ष JA जयलाल देश के अस्पतालों में ईसाई धर्मांतरण की साज़िश रच रहे थे।

भारत के स्वास्थ्य प्रोफेशनल्स के सबसे बड़े परिषद ‘इंडिया मेडिकल एसोसिएशन (IMA)’ के अध्यक्ष JA जयलाल ‘सेक्युलर संस्थाओं’ के ईसाई धर्मांतरण की इच्छा रखते हैं और चाहते हैं कि अस्पतालों का इस्तेमाल भी ईसाई धर्मांतरण के लिए हो। उन्होंने कहा था कि वे चाहते हैं कि IMA ‘जीसस क्राइस्ट के प्यार’ को साझा करे और सभी को भरोसा दिलाए कि जीसस ही व्यक्तिगत रूप से रक्षा करने वाले हैं। उनका मानना है कि चर्चों और ईसाई दयाभाव के कारण ही विश्व में पिछली कई महामारियों और रोगों का इलाज आया।

अब आप सोचिए, एक इतने बड़े पद पर बैठा व्यक्ति जब इस तरह की बातें करता है तो मीडिया उसकी आलोचना क्यों नहीं करती? आपको मीडिया में उसकी आलोचना तो दूर की बात, कहीं उसकी मंशा को लेकर एक खबर तक नहीं मिलेगी। जिस व्यक्ति को एक वैज्ञानिक और मेडिकल प्रोफेशनल्स की संस्था का मुखिया चुना गया है, वो इसके इस्तेमाल मजहबी गतिविधियों के लिए करता है और मीडिया में कहीं कोई सवाल नहीं।

इन चीजों का अब दुष्प्रभाव भी देखने को मिल रहा है। उत्तर-पूर्वी राज्यों में ईसाई संगठनों ने कोरोना वैक्सीन को लेकर इतनी अफवाहें फैलाई हैं कि वहाँ लोग इसे ‘शैतानी ताकत’ बताते हुए इसकी डोज लेने से इनकार कर रहे हैं। ‘प्रेयर वॉरियर्स’ जैसी संस्थाएँ इसके पीछे हैं। एक ईसाई संगठन ने टीकाकरण को ‘ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध’ बताते हुए इससे दूर रहने की अपील की थी। बरगलाया गया कि कोरोना का टीका लेने वाले ईसाई साम्राज्य में प्रवेश नहीं कर पाएँगे।

इसके पीछे JA जयलाल किस्म के लोग ही हैं। ये लोग मेडिकल संस्थाओं से लेकर चर्चों तक में बैठे हुए हैं। ऐसा नहीं है कि अन्य मजहबों में ये समस्या नहीं है। महाराष्ट्र और गुजरात में मुस्लिमों को कोरोना वैक्सीनेशन के प्रति जागरूक करने के लिए मस्जिदों से अजान के वक़्त इसके बारे में बताया गया, लेकिन असर ढाक के तीन पात ही रहा। कुछ मुस्लिम बहुल इलाकों में अफवाह फैली कि कोरोना वैक्सीन से लोग नपुंसक हो जाएँगे।

लेकिन, ईसाई मिशनरियों द्वारा इस तरह के अफवाह फैलाने के दुष्परिणाम दूरगामी होते हैं। भारत में ईसाईयों में अधिकतर वो लोग हैं, जो पहले हिन्दू थे और गरीबी के कारण उन्हें लालच देकर ईसाई बनाया गया। धर्मांतरण का ये खेल केरल से लेकर झारखंड और उत्तर-पूर्व तक चल रहा है। गरीबों पर इस महामारी की सबसे ज्यादा मार पड़ी है और उन्हें ही टीके से दूर किया जा रहा है। मणिपुर के ईसाईयों का मानना है कि उन्हें वैक्सीन नहीं, बाइबिल बचाएगी।

इसी तरह मध्य प्रदेश के रतलाम में एक महिला डॉक्टर मरीजों से ये कहते हुए पाई गई कि वो ठीक होने के लिए जीसस से प्रार्थना करें। बाजना गाँव में अनुबंध पर बहाल ये डॉक्टर ‘कोरोना को मारने के लिए’ ईसाई मजहबी गतिविधियों का प्रचार कर रही थी। भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा ने इस घटना के बारे में ट्वीट करते हुए कहा भी कि दवाई की जगह धर्म परिवर्तन की घुट्टी पिलाने वालों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

आज अगर ये सब हो रहा है तो इसके पीछे वो नेतागण भी जिम्मेदार हैं, जो विपक्ष में बैठे हुए हैं। राहुल गाँधी से लेकर अखिलेश यादव तक ने कोरोना वैक्सीन को लेकर जम कर अफवाहों का बाजार गर्म किया। विपक्षी दलों व इनके नेताओं ने कभी वैक्सीन के ट्रायल को लेकर तो कभी इसके ‘साइड इफेक्ट्स’ को लेकर अफवाहें फैलाईं। आज यही नेता टीकाकरण के आँकड़े दिखा कर इसके धीमे होने का आरोप लगा रहे हैं।

इनके लिए वैक्सीन पहले अच्छा था और अब बुरा हो गया है। इन नेताओं ने जम कर विदेशी वैक्सीन्स की पैरवी की। इसके लिए पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह से पत्र भी लिखवाया गया। वो अलग बात है कि उन्होंने और उनकी पत्नी ने स्वदेशी वैक्सीन की दोनों डोज ले ली थी। इसके बाद दोनों कोरोना संक्रमित हुए लेकिन अस्पताल से सकुशल वापस आए। वैक्सीन की दूसरी डोज लेने के बाद एंटीबॉडी बनने में दो हफ्ते का वक़्त लगता है।

इन सबके बावजूद सवाल किस से पूछे जा रहे हैं? हिन्दुओं से। निशाना किस पर साधा जा रहा है? मंदिरों पर। उन मंदिरों पर जो लंदन से लेकर अयोध्या तक जनहित के कार्यों में लगे हुए हैं। UK की सरकार ने कोरोना के खिलाफ जागरूकता के लिए वहाँ के स्वामीनारायण मंदिर की मदद ली। अयोध्या में राम मंदिर ने अपने निर्माण से पहले ही ऑक्सीजन प्लांट्स लगवाने का फैसला लिया। कई मंदिरों ने राज्यों और केंद्र के आपदा कोष में धन दान किए।

मुंबई में जैन मंदिरों ने खुद को कोविड केयर सेंटर्स में तब्दील कर लिया। काशी विश्वनाथ मंदिर ने गरीबों के भोजन का बीड़ा उठाया। तिरुपति बालाजी मंदिर के कर्मचारियों ने अपना 1 दिन का वेतन दान किया। पटना के महावीर मंदिर, गुजरात के सोमनाथ मंदिर और बनासकांठा के अम्बाजी मंदिर ने एक-एक करोड़ रुपए सरकार को दान में दिए। इस तरह हर छोटे बड़े मंदिरों, मठों व साधुओं ने अपना-अपना योगदान दिया।

क्या आपने कभी किसी खबर में सुना कि इन्होंने दान के बदले में धर्मांतरण को आगे बढ़ाया हो? ये काम तो वो लोग कर रहे हैं, जिन्हें दवाओं और मेडिकल गाइडलाइंस के प्रति लोगों में जागरूकता फैलानी चाहिए। पर IMA के JA जयलाल जैसे लोग उलटे बाबा रामदेव पर आरोप लगा रहे हैं कि जीवन को खतरे में डालने और एलोपैथी दवाओं को लेकर झूठी अफवाह फैलाने के लिए उन पर मुकदमा चलाया जाना चाहिए।

लोगों की मदद करने वाले मंदिरों से सवाल पूछने वाले मीडिया क्या कर रहा है? वामपंथी मीडिया पोर्टल द वायर, द स्क्रॉल में बतौर लेखक योगदान देने वाले किरण कुंभार ने IMA अध्यक्ष डॉ. जेए जयलाल के समर्थन में आवाज उठाई थी। यानी, मीडिया जनता के मददगारों को बचा रहा है और उन्हें बरगलाने वालों को सिर चढ़ा रहा है। ईसाई धर्मांतरण और इस्लामी कट्टरता से कोरोना के खिलाफ लड़ाई को हो रहे नुकसान पर बात ही नहीं की जा रही।

‘ये संविधान का कसाई है… इसे उसी प्रेसिडेंसी जेल में डाला जाएगा’: बंगाल के गवर्नर पर TMC बौखलाई

पश्चिम बंगाल में चुनाव बाद हिंसा को लेकर सवाल उठाने और नारदा केस में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के मंत्रियों-विधायक पर सीबीआई की कार्रवाई के बाद सत्ताधारी दल ने राज्यपाल जगदीप धनखड़ के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। इसी क्रम में टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी ने एक बार फिर गवर्नर के लिए अमर्यादित शब्दों का इस्तेमाल किया है। पार्टी कार्यकर्ताओं को राज्यपाल के खिलाफ एफआईआर करने के लिए उकसाते हुए बनर्जी ने उन्हें संविधान का कसाई बताया है।

बनर्जी ने कहा, “इस राज्यपाल ने जो भी किया है वो असंवैधानिक ही नहीं है, बल्कि ऐसा है जो पहले कभी नहीं हुआ। ये राज्यपाल भारतीय संविधान के लिए कसाई है। मुझे पता है राज्यपाल के विरुद्ध किसी भी तरह का आपराधिक मुकदमा नहीं हो सकता, लेकिन फिर भी सबसे कहूँगा कि हर थाना में इसके खिलाफ डायरी करके रखें। जिस दिन वो राज्यपाल नहीं रहेगा, उसी दिन से केस शुरू किया जाएगा और इसे उसी प्रेसीडेंसी जेल में डाला जाएगा।”

टीएमसी सांसद ने आगे कहा, “मैं बंगाल के हर व्यक्ति से अनुरोध करूँगा कि इस राज्यपाल ने जिस तरह का काम किया है, आप लोग हर थाना में डायरी करके रखें। मुझे पता है आज केस नहीं शुरू किया जा सकता पर जिस दिन ये राज्यपाल से भूतपूर्व राज्यपाल होगा, माने जब केवल जगदीप धनखड़ रहेगा, तब इसे प्रेसीडेंसी जेल में डाला जा सकेगा”

राज्यपाल धनखड़ ने ट्वीट कर कहा है कि वे इस बयान से ‘स्तब्ध’ हैं। एक वरिष्ठ सांसद, वकील और तृणमूल कॉन्ग्रेस के नेता के इस तरह के बयान ने उन्हें अचंभित कर दिया है।

इससे पहले बनर्जी ने राज्यपाल पर राज्य सरकार से सलाह लिए बिना ही बदले की भावना से कार्रवाई की अनुमति सीबीआई को देने का आरोप लगाया था। उन्होंने राज्यपाल धनखड़ को ‘रक्तपिपासु’ करार देते हुए कहा था कि वे 2024 लोकसभा चुनाव में बीजेपी से टिकट के लिए जुगाड़ लगा रहे हैं। उन्होंने कहा था, “उस सनकी राज्यपाल को अब एक मिनट भी यहाँ नहीं रुकना चाहिए। वो एक पागल कुत्ते की तरह घूम रहा है।”

बता दें कि 64 वर्षीय कल्याण बनर्जी खुद कलकत्ता हाई कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं। 2019 में पश्चिम बंगाल के श्रीरामपुर लोकसभा क्षेत्र से लगातार तीसरी बार चुनाव जीते थे। 2001 में वो आसनसोल उत्तर से विधायक भी बने थे। कॉमर्स से स्नातक के बाद LLB की डिग्री प्राप्त करने वाले बनर्जी ने TMC के लिए कोर्ट में कई केस लड़े हैं। वो 1981 से ही कलकत्ता हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करते रहे हैं। अक्टूबर 2009 में वो एक संसदीय प्रतिनिधिमंडल के साथ UK और USA भी गए थे। बावजूद उनकी भाषा नारदा केस में कार्रवाई के बाद टीएमसी की बौखलाहट को बयाँ करती है।

गौरतलब है कि ममता बनर्जी की मौजूदा सरकार में मंत्री फिरहाद हाकिम, सुब्रत मुखर्जी, टीएमसी विधायक मदन मित्रा और पूर्व मेयर शोभन चटर्जी को CBI द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बाद खुद मुख्यमंत्री जाँच एजेंसी के दफ्तर पहुँच गई थी। पिछले दिनों कलकत्ता हाई कोर्ट ने चारों नेताओं को हाउस अरेस्ट में भेजने के निर्देश दिए थे। अब इनकी जमानत पर हाई कोर्ट की बड़ी बेंच सुनवाई करेगी।

‘आप मीडिया वाले लाशें दिखाते हो, डर फैलाते हो’: ₹32000 करोड़ के मालिक ने मोदी सरकार को दिए 10 में से 9 अंक

भारत के सबसे बड़े निवेशक राकेश झुनझुनवाला ने कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई और इकॉनमी प्रबंधन के मामले में मोदी सरकार को 10 में से 9 अंक देने की बात कही है। पत्रकार प्रभु चावला ने ‘इंडिया टुडे’ के शो ‘सीधी बात’ में उनसे ये सवाल पूछा था। राकेश झुनझुनवाला ने कहा कि भारत में अधिकतर बीमारियाँ गंदे पानी के कारण फैलती है, लेकिन अब ‘हर घर नल योजना’ से लोगों को स्वच्छ पानी मिल रहा है।

4.4 बिलियन डॉलर (32,120 करोड़ रुपए) की संपत्ति के मालिक राकेश झुनझुनवाला ने उदाहरण देते हुए कहा कि पुणे के लोनावला में उनका एक घर है, वहाँ बोरिंग और पाइप के जरिए वो इसी योजना के जल का प्रयोग करते हैं। उन्होंने पूछा कि जब हर घर में शौचालय और स्वच्छ पानी हो जाएगा तो इसका अच्छा प्रभाव क्या होगा, क्या इस बारे में कोई पत्रकार लिखता है या फिर किसी ने अध्ययन किया है?

उन्होंने प्रभु चावला को सलाह दी कि वो ‘इंडिया टुडे’ में इस चीज का अध्ययन कराएँ। मारवाड़ी परिवार में पले-बढ़े 61 वर्षीय राकेश झुनझुनवाला ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के उस बयान को याद दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि सरकार जब 100 देती है तो उसमें से 85 ही गरीब के पास पहुँचता है। उन्होंने कहा कि आज स्थिति बदल गई है और सरकार जब 100 रुपए भेजती है तो गरीब के पास 85 पहुँचते हैं और मात्र 15 गुल होते हैं।

इस पर प्रभु चावला ने उनसे पूछा कि क्या अर्थव्यवस्था के प्रबंधन के मामले में मोदी सरकार अच्छा कार्य कर रही है? राकेश झुनझुनवाला ने इसके जवाब में कहा, “बिलकुल! मैं खुद एक कैपिटलिस्ट हूँ लेकिन मानता हूँ कि देश में विकास आएगा, तभी अर्थव्यवस्था बेहतर होगी। मैं पीएम मोदी को सोशलिस्ट कहता हूँ। आप पत्रकार लोग वैसे भी मोदी सरकार के खिलाफ रहते हैं। अगर वो चुनावी रैली करें तो बुरा है लेकिन ममता बनर्जी करें तो सही है।”

उन्होंने मीडिया पर नकारात्मकता फैलाने का आरोप लगाते हुए कहा कि वो डर फैला रहा है, लाशों को दिखा रहा है। उन्होंने कहा कि एक वैश्विक महामारी से लड़ाई की बजाए मीडिया ‘ये हो जाएगा, वो हो जाएगा’ करती रहती है, जिससे बच्चे तक घबरा जाते हैं। जब प्रभु चावला ने मजदूरों के घर लौटने की बात की तो झुनझुनवाला ने कहा कि मुंबई में उनका घर बन रहा है, वहाँ कई मजदूर काम कर रहे हैं।

‘गलवान में भारत-चीन के बीच टकराव’: सेना ने ‘द हिंदू’ को पढ़ाया पत्रकारिता का पाठ

अंग्रेजी समाचार पत्र ‘द हिंदू’ में रविवार (23 मई 2021) को प्रकाशित “गलवान घाटी में चीनी सैनिकों के साथ मामूली टकराव” शीर्षक से छापे गए लेख पर भारतीय सेना ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। सेना ने इस मामले में संज्ञान लेते हुए कहा कि मई 2021 के पहले सप्ताह में पूर्वी लद्दाख स्थित गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच ऐसी कोई ‘मामूली टकराव’ नहीं हुआ है।

सेना ने द हिंदू के आर्टिकल को लेकर कहा, ”यह स्पष्ट किया जाता है कि मई 2021 के पहले सप्ताह में पूर्वी लद्दाख में #गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच ऐसी कोई मामूली झड़प नहीं हुई है।”

‘द हिंदू’ के लेख पर सेना नाराज, दी नसीहत

सेना ने ‘द हिंदू’ के आर्टिकल पर कड़ा ऐतराज जताते हुए कहा कि यह लेख जिस सोर्स के जरिए लिखा गया है, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि वे पूर्वी लद्दाख में विवादित मुद्दों के समाधान के लिए चल रही कोशिशों को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। सेना ने कहा, ”लेख उन स्रोतों से प्रेरित प्रतीत होता है जो पूर्वी लद्दाख में मुद्दों के शीघ्र समाधान के लिए चल रही प्रक्रिया को पटरी से उतारने की कोशिश कर रहे हैं।”

इसके साथ ही आर्मी ने मीडिया के लोगों से भी अनुरोध किया है कि अगर वे भारतीय सेना के बारे में कुछ लिख रहे हैं तो सेना के ही अधिकृत सोर्स के जरिए स्थितियों को स्पष्ट करें, न कि किसी तीसरे पक्ष से मिले गैर प्रमाणित इनपुट के आधार पर खबर बनाएँ। सेना ने कहा, ”मीडिया पेशेवरों से अनुरोध किया जाता है कि वे भारतीय सेना से जुड़ी घटनाओं पर वास्तविक संकोस्करण/स्थिति को वे भारतीय सेना के अधिकृत स्रोतों से ही स्पष्ट करें न कि तीसरे पक्ष से अप्रमाणित इनपुट पर रिपोर्ट को आधार बनाकर।”

क्या लिखा था द हिंदू ने

अंग्रेजी अखबार ‘द हिंदू’ ने रविवार (23 मई 2021) को एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के हवाले से आर्टिकल छापा था कि इसी साल (2021) मई के पहले सप्ताह में पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी स्थित नो-पेट्रोलिंग जोन में भारतीय और चीनी सैनिकों आमना-सामना हुआ था। हालाँकि, दोनों पक्ष जल्दी ही अलग हो गए थे।

‘द हिंदू’ के मुताबिक अधिकारी ने उसे जानकारी दी, “पिछले साल नो-पेट्रोलिंग जोन बनाए जाने के बाद, दोनों पक्ष कभी-कभी इसकी जाँच करते हैं कि क्या दूसरे पक्ष ने सीमा पार की है। गश्ती दल अलग-अलग समय पर भेजे जाते हैं। एक दिन भारतीय और चीनी गश्ती दल एक साथ ही एक स्थान पर पहुँचे। उस दौरान दोनों के बीच मामूली टकराव हुआ, लेकिन वे जल्दी ही वापस लौट गए।”

बता दें कि भारत और चीन के बीच अप्रैल-मई, 2020 को लद्दाख की गलवान घाटी में 15-16 जून की रात को हिंसक झड़प हुई थी, जिसमें भारत के 20 सैनिक वीरगति को प्राप्त हो गए थे, जबकि कई चीनी सैनिकों की भी मौत हो गई थी।

अजीबोगरीब कल्पनाओं वाली नेहरू की विदेश नीति: मुस्लिम राष्ट्रों ने ठुकराया, इजरायल को भारत से कर दिया था दूर

भारत की संविधान सभा में 4 दिसंबर 1947 को भारत की विदेश नीति पर बोलते हुए जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि अरब और यहूदियों के मामले का समाधान फिलिस्तीन कमेटी की माइनॉरिटी रिपोर्ट है, जिस पर भारत सरकार ने हस्ताक्षर किए थे। हालाँकि, कमेटी की रिपोर्ट को संयुक्त राष्ट्र संघ के अधिकतर देशों ने स्वीकार नहीं किया था। इसके अनुसार यहूदियों को फिलिस्तीन के अंतर्गत स्थानीय स्वायित्व दिए जाने का प्रस्ताव था। यानी, यहूदियों के लिए एक स्वतंत्र देश की माँग को बाधित करने की दिशा में यह एक कदम था, जिसमें प्रधानमंत्री नेहरू भी शामिल हो गए थे।

भारत संयुक्त राष्ट्र संघ की फिलिस्तीन पर विशेष समिति का सदस्य था, जिसने फिलिस्तीन की 55 प्रतिशत जमीन इजरायल को देने का एक प्रस्ताव रखा था। समिति में भारत की तरफ से सदस्य अब्दुल रहमान ने इस विभाजन को एकदम नकार दिया और प्रधानमंत्री नेहरू के द्वारा मध्यस्ता का एक नया प्रस्ताव रखा गया। भारत ने अरब देशों को सुझाव दिया कि फिलिस्तीन को मुसलमान और यहूदियों का एक महासंघ बना दिया जाए जिसे सभी मुस्लिम देशों विशेषकर इजिप्ट ने सिरे से ख़ारिज कर दिया।

एक तरफ प्रधानमंत्री नेहरू की अजीबोगरीब कल्पनाओं को मध्य एशिया के मुस्लिम देशों ने कोई खास महत्व नहीं दिया तो दूसरी तरफ वे खुद ही इजरायल से दूरी बनाकर पश्चिम जगत के देशों से सम्बन्ध लचीले बना रहे थे।

इसी बीच, अरब-इजरायल युद्ध के बाद इजरायल ने फिलिस्तीन के कब्जे से लगभग 77 प्रतिशत जमीन को वापस ले लिया। यहूदियों ने 14 मई 1948 को स्वतंत्र इजरायल देश की स्थापना की जिसे 15 मई को अमेरिका और 17 मई को सोवियत यूनियन के अपनी मान्यता दे दी। कुछ दिन बाद 20 मई को जब प्रधानमंत्री नेहरू शिमला के पास मशोबरा में छुट्टियाँ बिताने में व्यस्त थे, वहाँ से उन्होंने इजरायल के सम्बन्ध में एक पत्र लिखते हुए कहा, “भारत सरकार को नए देश इजरायल की मान्यता के लिए अनुरोध प्राप्त हुआ है। अभी हमने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं करने का सोचा है।”

कुछ महीनों बाद, 29 जनवरी 1949 को यूनाइटेड किंगडम ने भी इजरायल को स्वीकार्यता दे दी। अब भारत सरकार पर दवाब बन गया था कि वह भी अपनी स्वीकार्यता जल्दी ही दे। हालाँकि, नेहरू ने अपनी मुस्लिम देशों को समर्थन देने की नीति को जारी रखा और 1 फरवरी को ब्रिटिश सरकार को पत्र लिखकर बताया कि वे इजरायल को मान्यता नहीं दे रहे हैं।

प्रधानमंत्री नेहरू पर सिर्फ बाहरी नहीं बल्कि आतंरिक यानी मंत्रिमंडल के सहयोगियों का भी दवाब था। एनवी गाडगील ने 29 जनवरी को उन्हें एक पत्र लिखकर इजरायल को मान्यता देने की पेशकश की। अगले दिन नेहरू ने पत्र का जवाब देते हुए कहा कि “अगर आप चाहते हैं तो मंत्रिमंडल में इस पर अनौपचारिक चर्चा की जा सकती है। लेकिन अभी हमें शांत रहना चाहिए।”

दरअसल, प्रधानमंत्री नेहरू की यह कोई विदेश नीति नहीं, बल्कि भारत के मुसलमानों को साधने की एक कोशिश थी। इसका खुलासा सरदार पटेल ने 28 मार्च 1950 को नेहरू को ही लिखे एक पत्र किया था। उनका स्पष्ट मानना था कि ‘भारतीय मुसलमानों के कारण ही इजरायल को मान्यता देने में देरी की गई, जबकि कुछ मुस्लिम देशों ने भी उसे मान्यता दे दी है’। यही नहीं, खुद प्रधानमंत्री ने 5 फरवरी, 1949 को वीके कृष्णा मेनन को लिखे एक पत्र में यही बात दोहरा चुके थे। उन्होंने मेनन को बताया कि ‘अगर इजरायल को मान्यता दी गई तो मुसलमानों के बीच इसका गलत सन्देश जाएगा’।

आखिरकार, एक लंबी उठापटक के बाद भारत ने इजरायल को सितम्बर, 1950 में अपनी स्वीकार्यता दे दी। दिल्ली से 1,400 किलोमीटर दूर बम्बई में उसे एक वाणिज्य दूतावास खोलने की अनुमति दी गई। लेकिन दिल्ली द्वारा तेल अवीव के साथ द्विपक्षीय संबंधों की स्थापना को लेकर कोई रूचि नहीं दिखाई गई।

इस उम्मीद की एक किरण का इजरायल ने स्वागत किया और बेहतर कूटनीतिक संबंधों की स्थापना के लिए वहाँ के प्रधानमंत्री बेन गुरिओं एवं विदेश मंत्री ने अगले साल भारत आने की पेशकश की। यह एक मौक़ा भारत के वैश्विक कूटनीतिक इतिहास में एक सुनहरा अध्याय हो सकता था, लेकिन इसे तत्कालीन सरकार ने जानबूझकर गँवा दिया।

यह बात प्रधानमन्त्री नेहरू भी समझते थे कि इस दौरे से भारत और इजरायल के संबंधों की एक शुरुआत होगी। फिर भी इसके विपरीत वे उनकी इस भारत यात्रा को लेकर बिलकुल भी खुश नहीं थे। ऐसा उन्होंने बीवी केसकर को 9 अक्टूबर को लिखे एक पत्र कहा था। आखिरकार यह दौरा कभी अस्तिव में ही नहीं आया और भारत की इजरायल से दूरियाँ बढ़ती चली गई।

कुछ सालों बाद, 1959 में जब बेन गुरिओं प्रधानमंत्री नहीं रहे तो उन्होंने इस सन्दर्भ में खुलकर चर्चा की। उनकी द टाइम्स (लन्दन) में प्रकाशित टिप्पणी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि वे एक समय में भारत को लेकर कितने सकारात्मक थे, लेकिन नेहरू के रवैए के कारण उनके आलोचक बन गए थे। उन्होंने कहा, “श्रीमान नेहरू खुद को गाँधी का सबसे बड़ा शिष्य मानते हैं। मुझे समझ नहीं आता कि गाँधी जी के वैश्विक मैत्री के विचारों के साथ-साथ इजरायल के सम्बन्ध में श्रीमान नेहरू का रवैया अलग क्यों रहता है। आठ साल पहले उन्होंने हमारे विदेश मंत्रालय के डायरेक्टर-जनरल को जल्दी ही सामान्य कूटनीतिक सम्बन्ध स्थापित करने का वादा किया था, लेकिन आजतक उन्होंने अपने शब्दों का मान नहीं रखा।”

राजनैतिक विज्ञान के कुछ जानकार इजरायल को दरकिनार करने के पीछे का एक बड़ा कारण मौलाना आजाद को मानते हैं। साल 1958 में अपनी मृत्यु तक, एक मुसलमान होने के नाते उन्होंने ही भारत को मुस्लिम देशों के पक्ष में खड़ा करने का नेहरू पर दवाब बनाया था। मौलाना ही इस बात के प्रवक्ता थे कि इजरायल को समर्थन देने से भारत के अल्पसंख्यक मुसलमान नाराज़ हो जाएँगे और पाकिस्तान इसका फायदा उठाकर सांप्रदायिक तनाव पैदा कर सकता है।

इसे दुर्भाग्य के अलावा क्या ही कहा जाएगा कि एक लोकतान्त्रिक संप्रभु देश की विदेश नीति को तुष्टिकरण के द्वारा तय किया जाता था। हमारे देश के नेतृत्व पर ‘वोट बैंक’ का डर इस कदर हावी था कि देश के हित में कोई ठोस निर्णय ही नहीं लिए जाते थे। सिर्फ इजरायल ही नहीं तिब्बत को लेकर भी तत्कालीन भारत सरकार ने एक के बाद एक कई गलत निर्णय लिए थे, जिसका खामियाजा आज तक हमें भुगतना पड़ रहा है।    

तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर: नींव नहीं फिर भी सब कुछ भव्य-विशाल, 200 फुट की ऊँचाई और 81000 किलो का पत्थर

तमिलनाडु के तंजावुर में स्थित बृहदीश्वर/बृहदेश्वर मंदिर अपने आप में एक अद्भुत और रहस्यमयी संरचना है। चोल साम्राज्य के ‘द ग्रेट लिविंग टेंपल्स’ में से एक भगवान शिव को समर्पित बृहदीश्वर मंदिर को महान चोल शासक राजराज चोल प्रथम ने बनवाया था। इसे पेरिया कोविल, राजराजेश्वर मंदिर या राजराजेश्वरम के नाम से भी जाना जाता है। द्रविड़ वास्तुकला का बेहतरीन उदाहरण है बृहदीश्वर मंदिर जो कि भारत के कुछ विशाल मंदिरों में से एक है।

बृहदीश्वर मंदिर की पेंटिंग (फोटो : ब्रिटिश लाइब्रेरी)

कांचीपुरम स्थित पल्लव राजसिम्हा मंदिर को देखकर राजराज चोल के मन में भगवान शिव के लिए एक विशालकाय मंदिर के निर्माण की इच्छा जागृत हुई। इसके बाद सम्राट ने सन् 1002 में इस मंदिर की नींव रखी गई। आश्चर्य की बात है कि आज से हजारों साल पहले इतना विशाल मंदिर मात्र 5-6 सालों में बनकर तैयार हो गया था। मंदिर में उत्कीर्णित लेखों से यह प्रमाण मिलता है कि राजराज चोल ने अपने जीवन के 19वें साल (सन् 1004) में इस मंदिर का निर्माण शुरू करवाया और सम्राट के 25वें साल (सन् 1010) के 275वें दिन इस मंदिर का निर्माण समाप्त हुआ। 

बृहदीश्वर मंदिर की वास्तुकला और ज्यामिति

वैसे तो भारत के सभी मंदिरों की वास्तुकला अपने आप में सर्वश्रेष्ठ है। लेकिन बृहदीश्वर मंदिर की वास्तुकला न केवल विज्ञान और ज्यामिति के नियमों का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है, बल्कि इसकी संरचना कई रहस्य भी उत्पन्न करती है। मंदिर का निर्माण द्रविड़ वास्तुशैली के आधार पर हुआ है।

बृहदीश्वर मंदिर की वास्तुकला (फोटो : BYJU’s)

इस मंदिर के निर्माण में ‘ग्रेनाइट’ के चौकोर पत्थर के ब्लॉक्स को (आकार में घटते क्रम में) एक-दूसरे के ऊपर इस प्रकार जमाया गया कि वो आपस में फँसे रहें। इसे साधारण भाषा में ‘पजल टेक्निक (Puzzle Technique) कहा गया। मंदिर का मुख्य भाग (जो श्रीविमान कहलाता है) लगभग 216 फुट (66 मीटर) ऊँचा है। इसका मतलब हुआ कि पत्थर के ब्लॉक 216 फुट तक जमाए गए। ध्यान रखें कि यह सभी पत्थर मात्र एक-दूसरे के ऊपर रखे गए हैं न कि इन्हें किसी सीमेंट जैसे पदार्थ से (जैसा कि आजकल होता है) आपस में जोड़ा गया है। बृहदीश्वर मंदिर की सबसे खास बात यह है कि इसे बिना नींव के बनाया गया है।

फोटो साभार : हिस्ट्री टीवी

बृहदीश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है जो 8.7 मीटर ऊँचा है। इसके अलावा मंदिर में गणेश, सूर्य, दुर्गा, हरिहर, भगवान शिव के अर्धनारीश्वर स्वरूप और अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियाँ हैं। 

फोटो साभार : thanjavur.info

मंदिर में श्रीविमान के अलावा अर्धमंडप, मुखमंडप, महामंडप और नंदीमंडप है। मंदिर परिसर में दो गोपुरम भी हैं। नंदीमंडप में भगवान शिव की सवारी नंदी की प्रतिमा है। इस प्रतिमा की खास बात यह है इसे भी एक ही पत्थर से बनाया गया है और यह लगभग 25 टन वजनी है।

फोटो साभार : thrillingtravel.in

मंदिर से जुड़ी रोचक बातें

इस मंदिर से जुड़े कुछ रोचक तथ्य भी हैं। पहली बात तो यह है कि मंदिर के 50 किमी के दायरे में भी ग्रेनाइट उपलब्ध नहीं है तो इतनी मात्रा में ग्रेनाइट जहाँ से भी लाया गया होगा, निश्चित रूप से उस प्रक्रिया में खर्च हुई मेहनत और लागत की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

बृहदीश्वर मंदिर के श्रीविमान के ऊपर स्थित ‘कुंभम्’ किसी आश्चर्य से कम नहीं है। आश्चर्य इसलिए कि कुंभम् भी एक ही पत्थर से निर्मित है और उसका वजन है 81 टन अर्थात 81,000 किग्रा। अंदाजा लगाइए कि इतना वजनी पत्थर लगभग 200 फुट की ऊँचाई तक पहुँचा कैसे?

फोटो साभार : तमिलनाडु पर्यटन (सोशल मीडिया)

इसके लिए भी एक 6 किमी लंबा ‘रैम्प’ (जैसा कि नीचे फोटो में दिखाया गया है) बनाया गया था जिसकी सहायता से हजारों हाथी और घोड़ों ने कुंभम् को श्रीविमान के ऊपर स्थापित किया था। इस कुंभम् के ऊपर भी एक स्वर्ण कलश स्थापित किया गया है।

फोटो साभार : हिस्ट्री टीवी

कैसे पहुँचे?

तंजावुर स्थित बृहदीश्वर मंदिर तक पहुँचना बड़ा ही आसान है। सबसे नजदीकी हवाई अड्डा तिरुचिरापल्ली है, जो मंदिर से लगभग 60 किमी की दूरी पर है। इसके अलावा ट्रेन से पहुँचना सबसे आसान है, क्योंकि तंजावुर रेलवे स्टेशन से बृहदीश्वर मंदिर की दूरी मात्र 1.9 किमी है। तंजावुर में दो बस स्टैन्ड हैं- एक पुराना और एक नया। पुराने बस स्टैन्ड से मंदिर की दूरी 1 किमी है और नए बस स्टैन्ड से लगभग 5 किमी। त्रिची के सेंट्रल बस स्टैन्ड से भी बृहदीश्वर मंदिर जा सकते हैं, जिसकी दूरी मंदिर से लगभग 60 किमी है।