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जहीन की चारों बेटियाँ शिक्षक तो 18 से कम उम्र में ही अरमान की बहाली: आज़मगढ़ के मदरसों में भर्ती घोटाला, SIT करेगी जाँच

उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ में सारे नियम-कानूनों को ताक पर रख कर नियुक्तियों का खेल चल रहा था। इसमें अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों के अलावा मदरसा के संचालक भी शामिल थे। तीसरे दर्जे से पास लोगों को भी शिक्षक बना दिया गया। एक मदरसे के अध्यक्ष ने तो अपनी चारों बेटियों को बतौर शिक्षक बहाल कर दिया। कई ऐसे शिक्षक भी हैं, जिनके पास किसी मान्यताप्राप्त संस्थान का प्रमाण पत्र तक नहीं है।

अब इस मामले की जाँच SIT को सौंपी गई है, जो 1974 से वर्ष 2013 के बीच आज़मगढ़ में अल्पसंख्यक कल्याण विभाग में तैनात रहे अधिकारियों और कर्मचारियों का ब्यौरा खँगालेगी। SIT ने आज़मगढ़ के 20 मदरसों का निरीक्षण किया है। जब्त किए गए दस्तावेजों, दर्ज किए गए बयानों और जुटाए गए तथ्यों से खुलासा हुआ है कि कई शिक्षकों के प्रमाण पत्र ऐसे संस्थान के हैं, जिन्हें तो तो केंद्र और न ही राज्य सरकार की मान्यता प्राप्त है।

नियम के अनुसार जो पूरी तरह अपात्र थे, उन्हें भी मदरसों में शिक्षक बना कर बिठा दिया गया। नियमानुसार ‘अध्यापक आलिया’ के लिए ‘फाजिल’ शैक्षिक योग्यता 55% अंक के साथ उत्तीर्ण होनी चाहिए, लेकिन अधिकतर शिक्षकों के मार्क्स इससे कम ही थे। एक शिक्षक को तो तीसरे दर्जे से भी उत्तीर्ण होने के लिए 1 अंक के ग्रेस मार्क की ज़रूरत पड़ी थी। ये घोटाला कई वर्षों से यूँ ही चला आ रहा था।

उदाहरण के लिए, एक शिक्षक ने मऊ के चिरैयाकोट के सेराजनगर स्थित सेराजुल ओलुम मदरसा से वर्ष फरवरी 28, 2004 में फाजिल का तीन वर्ष का शिक्षण अनुभव दिखाया जबकि इस मदरसा को तब तक मान्यता मिली ही नहीं थी। इसी तरह नवंबर 6, 1981 को अरमान अहमद नामक शिक्षक की नियुक्ति हुई। 18 वर्ष से कम की उम्र में ही उसे सहायक शिक्षक के रूप में बहाल कर दिया गया। नियमों का खुला उल्लंघन किया गया।

मोहम्मद मेहंदी नामक प्रधानाचार्य ‘सहायक अध्यापक आलिया’ की नियुक्ति जनवरी 9, 1996 को हुई जबकि उनका अनुभव प्रमाण पत्र मार्च 21, 1996 का था। इसी तरह मुबारकपुर का मदरसा जामिया नुरूल ओलुम अंजुमन सिद्दीकीया जामिया नुरूल ओलुम सोसायटी द्वारा चलाया जाता है। सोसाइटी व चयन समिति के अध्यक्ष जहीन अहमद ने अपनी चारों बेटियों को प्रधानाचार्य सहित अन्य पदों पर बिठा दिया।

जिले के जिन मदरसों की जाँच हुई है उनमें मुबारकपुर के मदरसा जामिया नुरुल उलूम, मदरसा अशरफिया सिराजुल उलूम नेवादा अमिलो, अरबिया दारूतालीम सोफीपुरा, बाबुल ईल्म निस्वाँ, जफरपुर का मदरसा अरबिया जियाउल उलूम मंदे, बम्हौर का मदरसा मदरसतुल आलिया शेख रज्जब अली, जामिया अरबिया तनवीर उल उलूम नौशहरा, अरबिया कासिमुल मगराँवा, इस्लामिया जमीअतुल कुरैश जालंधरी समेत कुल 20 मदरसे शामिल है।

सवाल: 60 साल में कॉन्ग्रेस ने क्या किया, जवाब: AIIMS की ‘चोरी’

स्वास्थ्य का क्षेत्र हो या शिक्षा का या फिर कोई अन्य क्षेत्र। हमारी पीढ़ी के लोग बार-बार एक सवाल खुद से पूछते हैं कि कई दशकों तक सत्ता में रही कॉन्ग्रेस ने क्या किया? कोरोना महामारी के कारण उपजे हालात से चरमराई स्वास्थ्य व्यवस्था ने फिर से यह सवाल खड़ा किया है।

दिलचस्प यह है कि यह सवाल पूर्व केंद्रीय मंत्री और कभी राहुल गाँधी के करीबी माने जाने वाले कॉन्ग्रेस नेता मिलिंद देवरा ने भी खुद से ट्विटर पर पूछा है और जवाब दिया है। लेकिन, हकीकत बयां करने, ईमानदार स्वीकारोक्ति की जगह उन्होंने जानकारी देने के नाम पर गुमराह करने का काम किया है। वैसे यह एक ऐसी चीज है, जिसकी अपेक्षा हर कॉन्ग्रेसी से की भी जाती है।

देवरा ने ​ट्वीट कर सवाल किया है कि 60 सालों में कॉन्ग्रेस ने क्या किया? फिर खुद जवाब देते हुए कुछ सरकारी अस्पतालों और कुछ निजी क्षेत्र की कंपनियों के नाम का उल्लेख किया है। जिन अस्पतालों का उन्होंने जिक्र किया है, उनमें दिल्ली एम्स के अलावा 6 और एम्स के नाम हैं। ये हैं: एम्स भोपाल, रायपुर, ऋषिकेश, पटना, जोधपुर और भुवनेश्वर। इन एम्स के नाम के आगे देवरा ने साल 2012 का उल्लेख किया है, जिस वक्त मनमोहन सिंह के नेतृत्व में केंद्र में यूपीए की सरकार चल रही थी।

देवरा ने जो कुछ कहा वह सच से मुँह मोड़ने जैसा है। 1956 में दिल्ली में पहले एम्स की स्थापना के बाद देश में कई सरकारें आईं। इंदिरा और राजीव की भी हुकूमत रही। लेकिन एम्स जैसे और संस्थानों को लेकर गहरी खामोशी ही छाई रही। यह 47 साल बाद 2003 में टूटी जब केंद्र में बीजेपी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार चल रही थी।

पहले एम्स की स्थापना ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट मेडिकल साइंस एक्ट, 1956 के तहत अमृत कौर के स्वास्थ्य मंत्री रहते दिल्ली में हुई थी। वे देश की पहली स्वास्थ्य मंत्री थीं और इस उत्कृष्ट संस्थान के खड़े होने के पीछे उनकी व्यक्तिगत रूचि और दृष्टिकोण को महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके बाद 47 साल तक इस पर गहरी खामोशी रही। यह 2003 में टूटी जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने ‘प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना (PMSSY)’ की घोषणा की। इसका प्राथमिक उद्देश्य स्वास्थ्य क्षेत्र में मौजूद क्षेत्रीय असमानता को दूर करना था।

2003 के 15 अगस्त को लाल किले से देश को संबोधित करते हुए वाजपेयी ने कहा था, “मैं जानता हूँ कि पिछड़े राज्यों के लोगों को अच्छे अस्पताल की कमी के कारण क्या नुकसान उठाना पड़ता है। इसलिए प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के तहत अगले तीन वर्षों में पिछड़े राज्यों में दिल्ली के एम्स जैसी आधुनिक सुविधाओं से युक्त छह नए अस्पताल स्थापित किए जाएँगे।”

जैसा कि हम जानते हैं कि इसके बाद वाजपेयी सरकार करीब 9 महीने ही सत्ता में रही और 2004 में कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार आई। उस सरकार के दौरान उन छह एम्स का कार्य आगे बढ़ा जिनकी नींव वाजपेयी सरकार में डल गई थी। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में चुनावों के बाद सत्ता में बदलाव के बाद ऐसा होना सामान्य बात है। इन 6 एम्स के गठन का गजट नोटिफिकेशन 2 जुलाई 2013 में जारी किया गया था। दिलचस्प यह है कि PMSSY योजना पर आगे बढ़ने का फैसला करने के बावजूद 10 साल सत्ता में रही यूपीए की सरकार ने इन छह एम्स के अलावा नए एम्स की स्थापना के लिए कोई उल्लेखनीय पहल नहीं किया। करीब-करीब उसने वैसी ही खामोशी अख्तियार कर रखी थी, जैसा दिल्ली एम्स की स्थापना के बाद दशकों तक जारी रहा था।

2014 में जब केंद्र में मोदी के नेतृत्व में सरकार बनी तो युद्धस्तर पर इस योजना को आगे बढ़ाया गया। इसी साल 12 मार्च को लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर में केंद्र सरकार की ओर से बताया गया था कि 2014 के बाद से इस योजना के तहत 15 नए एम्स को मँजूरी मिली है। साथ ही यह भी बताया गया था कि अरुणाचल, गोवा, कर्नाटक, केरल, त्रिपुरा, सिक्किम, मिजोरम जैसे राज्यों से भी एम्स जैसे संस्थान की स्थापना को लेकर प्रस्ताव मिले हैं। चरणबद्ध तरीके से देश के विभिन्न हिस्सों में बढ़ रहे इन 15 एम्स के कार्य को लेकर सरकार ने पूरा ब्यौरा पटल पर रखा था।

पिछले साल एम्स ऋषिकेश के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने कहा था कि देश के दूसरों हिस्सों में भी एम्स का सपना अटल बिहारी वाजपेयी का था। इस सरकार का लक्ष्य है कि कम से कम हर राज्य में एक एम्स हो। जाहिर है कि एम्स जैसे संस्थान रातोंरात तैयार नहीं होते। यहाँ तक कि जिन एम्स का श्रेय देवरा ने कॉन्ग्रेस को दिया है यूपीए सरकार के जाने के बाद भी वे संसाधनों की कमी से जूझ रहे थे। लेकिन अपने ट्वीट से उन्होंने यह जरूर बतला दिया है कि कॉन्ग्रेस कितनी क्रेडिटखोर है और क्यों इस देश के हर शहर में नेहरू से लेकर राजीव तक के नाम पर कोई न कोई सरकारी दुकान मिल ही जाती है। यह ऐसा काम है जिसमें कॉन्ग्रेस का कोई सानी नहीं।

‘कसाई’ नौशाद ने चाकू से भाई-भाभी को मौत के घाट उतारा, एक साल के भतीजे का हाथ-पैर काट डाला

उत्तर प्रदेश के भदोही जिले में रविवार (23 मई, 2021) को नौशाद नाम के एक व्यक्ति ने कसाई चाकू से अपने भाई और भाभी की हत्या कर दी और अपने भतीजे का भी एक हाथ और पैर काट दिया। इस बात की जानकारी पुलिस ने दी है।

जिले के पुलिस अधीक्षक (एसपी) राम बदन सिंह ने बताया कि कजियाना के रहने वाले पेशे से कसाई नौशाद ने रविवार की शाम को घर में झगड़ा होने के बाद अपने भाई और भाभी (42 वर्षीय जमील और 38 वर्षीय रूबी) की कसाई के कार्य में इस्तेमाल होने वाले चाकू से हत्या कर दी। उन्हें भदोही के अस्पताल ले जाया गया था, जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया था। वहीं, बुरी तरह से घायल बच्चा अस्पताल में जिंदगी की जंग लड़ रहा है।

कसाई वाले चाकू से भाई-भाभी को उतारा मौत के घाट

एसपी ने कहा कि नौशाद ने परिवारिक विवाद के बाद अपने भाई और भाभी पर माँस काटने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले तेज धार वाले चाकू से हमला किया और दंपति को मौत के घाट उतारने के बाद अपने एक साल के भतीजे का भी एक हाथ और पैर काट दिया।

एसपी ने जानकारी दी कि अपने घर में जघन्य अपराध करने के बाद नौशाद अपनी माँ के साथ फरार हो गया। उन्होंने कहा, “यह घरेलू विवाद का मामला है, जो कि पहले से किसी के भी संज्ञान में नहीं था। इस केस में कार्रवाई की जा रही है। जल्द ही सभी आरोपितों को पकड़ लिया जाएगा। मृतक के परिजनों में ऐसा कोई नहीं बचा है जो इसके बारे में कुछ जानकारी दे सके।

जमील का साला, जो कि बनारस से आया था, उसने पुलिस को यह बताया है कि नौशाद जमील से घर छोड़ने को कहता था।” एसपी रामबदन सिंह ने कहा, “जमील के साले के मुताबिक इसी को लेकर दोनों के बीच झगड़ा हुआ होगा।” वहीं डॉक्टरों ने बताया है कि नौशाद के हमले में बुरी तरह से घायल बच्चे की हालत बेहद गंभीर बनी हुई है।”

पंजाब में ‘ कोरोना सुपर स्प्रेडर’, देश में ‘किसान’: गिड़गिड़ाए अमरिंदर, कहा- पटियाला में मत करिए प्रदर्शन

जिस ‘किसान आंदोलन’ का समर्थन कर-कर के कॉन्ग्रेस पूरे देश में मोदी सरकार के खिलाफ नकारात्मक माहौल बनाने में लगी हुई थी, अब वही उसके ही गले की फाँस बनता जा रहा है। एक तो पश्चिम बंगाल में जाकर किसान नेताओं ने ममता बनर्जी के लिए चुनाव प्रचार किया और वामदलों व कॉन्ग्रेस के गठबंधन को धता बताया, वहीं अब पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह की अपील का भी उन पर कोई असर नहीं हो रहा है।

पंजाब सीएम ने रविवार (मई 23, 2021) को ‘भारतीय किसान यूनियन (BKU उग्रहण)’ से अपील की कि वो अपने प्रस्तावित 3 दिन के धरना प्रदर्शन को रोक दे, नहीं तो ये कोरोना का ‘सुपर स्प्रेडर’ बन सकता है। बता दें कि किसान संगठन पंजाब सरकार द्वारा कोरोना के प्रबंधन में विफल रहने के विरोध में रैली निकालना चाहता है। शुक्रवार से शुरू होने वाला ये विरोध प्रदर्शन दक्षिण-पूर्वी पंजाब के पटियाला से आरम्भ होगा।

ये मुख्यमंत्री के लिए इसीलिए प्रतिष्ठा का विषय बन गया है क्योंकि पटियाला न सिर्फ उनका चुनावी क्षेत्र है, बल्कि वो पिछले 51 वर्षों से यहाँ के मानद ‘महाराजा’ भी हैं। ये इलाका उनके पुरखों का गढ़ रहा है। सीएम अमरिंदर ने इस आरोप को भी नकार दिया कि वो कोरोना के प्रबंधन में विफल रहे हैं। उन्होंने कहा कि पंजाब का हाल दिल्ली, महाराष्ट्र और यहाँ तक कि उत्तर प्रदेश जैसा न हो, इसके लिए उन्होंने पूरी कोशिश की है।

उन्होंने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश में गंगा नदी में लाशें तैर रही हैं, जिसने भाजपा सरकार के कोरोना कुप्रबंधन को उजागर किया है। उन्होंने अपनी अपील में कहा कि किसानों को गैर-जिम्मेदाराना हरकतें कर के अपने जीवन को खतरे में नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि इससे महामारी के खिलाफ लड़ाई में पंजाब सरकार के प्रयासों को ठेस पहुँचेगी। राज्य में किसी भी प्रकार के कार्यक्रम पर पाबंदी लगी हुई है, जिसमें लोगों के जुटने की आशंका हो।

कैप्टेन अमरिंदर सिंह ने कहा कि जब किसान विरोध प्रदर्शन शुरू करेंगे तो ज्यादातर लोग गाँवों से ही आएँगे, जो पहले से ही इस महामारी से पीड़ित हैं और उनका जीवन बेहाल है। उन्होंने याद दिलाया कि ऐसे कॉन्ग्रेस पार्टी ने दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे ‘किसान आंदोलन’ का समर्थन किया था। इस समर्थन की दुहाई देते हुए उन्होंने किसानों के प्रस्तावित धरना प्रदर्शन को अनुचित बताया। उन्होंने ध्यान दिलाया कि कैसे सबसे पहले पंजाब सरकार ने ही विधानसभा में केंद्र सरकार के तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया था।

उन्होंने कहा कि तब पंजाब सरकार ने किसानों का समर्थन किया था, अब किसान वापस राज्य सरकार का समर्थन करें। उन्होंने दावा किया कि कोरोना वायरस संक्रमण की दूसरी लहर में पंजाब में चीजें नियंत्रण से बाहर नहीं गईं, जैसा कई अन्य राज्यों में हुआ है। उन्होंने ये तक दावा कर डाला कि कोरोना के खिलाफ लड़ाई में जिन राज्यों का प्रदर्शन सबसे शानदार रहा, पंजाब उनमें से एक है। सीरम अमरिंदर ने कहा कि इन चीजों को ध्यान में रखते हुए अभी किसी प्रकार का धरना या रैली अस्वीकार्य है।

मई 2021 के पहले हफ्ते में ही पंजाब में किसानों ने वहाँ लगे वीकेंड लॉकडाउन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था। किसानों ने दुकानदारों पर दबाव बनाया कि वो अपनी दुकाने खोलें और सरकार का आदेश नहीं मानें। संगठन के कार्यकर्ताओं ने नेचर पार्क में एकत्रित होकर राज्य व केंद्र सरकार के खिलाफ जम कर नारेबाजी की थी। किसान नेताओं ने अपने भाषण में कहा था कि हम लॉकडाउन को नहीं मानेंगे।

उइगर मुस्लिमों पर चीन के अत्याचार को अब लिथुआनिया ने बताया ‘नरसंहार’: संयुक्त राष्ट्र से जाँच की माँग, छोड़ा ’17+1′ ग्रुप

अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन के बाद अब लिथुआनिया की संसद ने गुरुवार (20 मई 2021) को चीन में उइगर मुसलमानों पर हो रहे अत्याचार को ‘नरसंहार’ बताया है। इसके साथ ही यहाँ की संसद ने संयुक्त राष्ट्र से चीन द्वारा उइगर मुसलमानों को जबरन डिटेंशन सेंटर में बंदी बनाए जाने की जाँच कराने और यूरोपीय यूनियन से चीन के साथ उसके संबंधों की समीक्षा करने की माँग की है।

यह सर्वविदित है कि चीन हमेशा से ही अपने देश में अल्पसंख्यक उइगर मुसलमानों के उत्पीड़न की बात से इनकार करता रहा है और दूसरे देशों को भी इस मामले पर आँखें दिखाता रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, लिथुआनिया (यूरोप महाद्वीप के उत्तरी भाग में बाल्टिक सागर के किनारे स्थित एक देश है) की संसद में उइगर मुसलमानों को लेकर पास किए गए प्रस्ताव का 5 में से 3 सांसदों ने समर्थन किया। संसद ने चीन से राष्ट्रीय सुरक्षा कानून को समाप्त करने का आह्वान किया है। इसके साथ ही संसद पर्यवेक्षकों को तिब्बत में जाने और अपने आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा के साथ बातचीत शुरू करने की माँग की।

खास बात यह है कि जिस वक्त संसद में इस प्रस्ताव पर वोटिंग हो रही थी, उसी दौरान लिथुआनियाई प्रधानमंत्री इंग्रिडा सिमोनीटे (Ingrida Šimonytė) और विदेश मंत्री गेब्रियलियस लैंड्सबर्गिस (Gabrielius Landsbergis) भी संसद में मौजूद थे, लेकिन उन्होंने वोट नहीं किया।

चीन द्वारा ब्लैकलिस्ट किए गए एक सांसद डोविले सकलीन ने कहा, “हम लोकतंत्र का समर्थन करते हैं, क्योंकि हम 50 वर्षों तक कम्युनिस्ट शासन में रहे हैं, जो हमारे लिए काफी पीड़ादायक है।”

लिथुआनिया के इस कदम का चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियन ने शुक्रवार (21 मई 2021) को कड़ा विरोध किया। उन्होंने लिथुआनिया को अपनी गलतियों को सुधारने की नसीहत दी है।

लिथुआनिया ने छोड़ा चीन का 17+1 सहयोग मंच

उइगर मुसलमानों के मुद्दे पर संसद में प्रस्ताव पारित करने के साथ ही लिथुआनिया ने चीन के 17+1 सहयोग मंच को विभाजनकारी बताते हुए उसे छोड़ दिया। इसके साथ ही उसने दूसरे देशों से भी 27 देशों के इस समूह को छोड़ने की अपील की। वहाँ के विदेश मंत्री गेब्रियलियस लैंड्सबर्गिस (Gabrielius Landsbergis) ने एएफपी को बताया, “लिथुआनिया अब खुद को 17 + 1 प्रारूप का सदस्य नहीं मानता है और वो इसमें भाग नहीं लेता है।”

उन्होंने कहा, “हमारी नजर में यूरोपीय यूनियन के लिए अब समय आ गया है कि विभाजनकारी 16+1 प्रारूप से अधिक एकजुट होने के लिए और इससे सक्षम 27+1 की ओर बढ़ने का समय आ गया है। अगर यूरोपीय यूनियन के सभी देश मिलकर काम करें तो यह सबसे मजबूत है।”

लिथुआनिया का ये कदम बीते महीनों में देश द्वारा उठाए गए कई अहम फैसलों का हिस्सा है, जो चीन के साथ उसके संबंधों में खटास पैदा होने की ओर इशारा करता है। इससे पहले, इस देश ने चीनी निवेश को प्रतिबंधित करते हुए ताइवान के साथ व्यापार खोलने का ऐलान किया था।

सोवियत संघ के अंतर्गत था लिथुआनिया

रिपोर्ट के मुताबिक, 1940-1991 तक सोवियत संघ के शासन के दौरान लिथुआनिया का काफी दमन किया गया था। हालाँकि, लिथुआनिया अब यूरोपीय संघ और नाटो का सदस्य है। साथ ही वह रूस और चीन जैसे कम्युनिस्ट देशों का सख्त विरोधी है।

उइगर हिरासत शिविर

चीन का झिंजियांग क्षेत्र सबसे अधिक सांस्कृतिक और जातीय नरसंहार का सामना कर रहा है। यहाँ के स्थानीय उइगर समुदाय का चीनी अधिकारियों के साथ विवाद का लंबा इतिहास रहा है, लेकिन चीनी सरकार उइगरों को चीन का हिस्सा मानने की बजाय उन्हें क्षेत्रीय अल्पसंख्यक के रूप में मानती है।

उइगर मुसलमानों पर अत्याचार करने के मामले में चीन दुनिया भर में कड़ी आलोचनाओं का सामना कर रहा है। उइगर-कज़ाख नागरिक, गुलबहार जेलिलोवा ने चीनी डिटेंसन कैंप की हकीकत बयाँ करते हुए कहा कि हिरासत में उसे बेरहमी से पीटा गया और उसके साथ बलात्कार किया गया। अलजज़ीरा के साथ काम करने वाले एक पत्रकार स्टू चाओ ने बताया कि उइगर लेखक, एक्टिविस्ट और उइगर भाषा के लिए काम करने वाले अब्दुवेली अयूप-प्रमुख को चीन ने डिटेंसन सेंटर में बंद कर बेरहमी से प्रताड़ित किया गया।

चीन द्वारा उइगर मुस्लिमों को टारगेट करने के कई सबूत हैं, जो बताते हैं कि चीन उइगर मुसलमानों को सुनियोजित तरीके से प्रताड़ित कर रहा है। चीनी डिटेंसन कैंप से आजाद हुई जुमरत दावत और कलबिनूर सिदिक ने खुलासा किया है कि तीन से अधिक बच्चों का गर्भ धारण करने वाली उइगर महिलाओं की जबरन नसबंदी करा दी जाती है। इन शिविरों से बचकर निकली महिलाओं ने अपनी आपबीती बताते हुए कहा कि उन्हें पीटा गया, बलात्कार किया गया और इंजेक्शन दिए गए।

चीन के शिविरों में बंद उइगर मुस्लिमों को उनके इस्लामिक मूल्यों की आलोचना करने के लिए मजबूर किया जाता है। इसके साथ ही डिटेंसन कैंप में बंद लोगों को कम्यूनिस्ट पार्टी का प्रचार करने के लिए मजबूर किया जाता है।

पहले पाकिस्तान जैसी थी कश्मीर के दलित-हिंदुओं की स्थिति, 370 का छला हिन्दू समाज पीढ़ियों से उठा रहा था कचरा

पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की हालत किसी से छिपी नहीं है। आए दिन ऐसी रिपोर्ट आती रहती हैं कि वहाँ के हिंदू और अन्य धर्म के लोगों पर भयानक जुल्म और भेदभाव हो रहा है। एक बार फिर पाकिस्तान के एक विज्ञापन ने देश में अल्पसंख्यकों की बदतर जिंदगी की पोल खोल दी।

पाकिस्तान में निकाले गए विज्ञापन में साफ लिखा है कि सफाई कर्मचारियों की जरूरत है। इसके साथ ही विज्ञापन में एक शर्त लिख दी गई है कि ये सारे पद सिर्फ गैर मुस्लिमों के लिए हैं। इनमें टेलर, नाई, बढ़ई, पेंटर, वाटर करियर, जूता बनाने वाला और सफाई कर्मी जैसे पद शामिल हैं। 

जाहिर है कि देश के मुस्लिमों को सफाई कर्मचारी के पद पर नहीं, सेना में तैनात किया जाएगा जबकि अल्पसंख्यकों को ही सफाई कर्मचारी के पद के काबिल समझा जाता है। तो पाकिस्‍तान में सफाईकर्मी की नौकरी पाने के लिए आपका गैर मुस्लिम होना ही जरूरी है। इसका मतलब है कि मुसलमान सिर्फ देश में गंदगी फैलाए और अल्पसंख्यक उसकी सफाई करें। वहाँ अल्पसंख्यकों का काम केवल सफाई करना ही रह गया है।

बता दें कि नाले-पेशाब-पखाना साफ करते हिंदू दलितों की जो हालत आज पाकिस्तान में है, वही हालत अनुच्छेद 370 के उन्मूलन से पहले भारत के जम्मू-कश्मीर में थी। इस दौरान किसी पार्टी के किसी नेता ने कोई आवाज नहीं उठाई और न ही किसी भी तरह से उनकी मदद की, लेकिन जैसे ही जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटा कर उन्हें मुख्य धारा में शामिल किया गया, उन्हें उनका हक दिया गया तो ये नेता अपना विरोध दर्ज कराने जरूर आए। कई पार्टियों ने तो अपने मर चुके राजनीतिक अस्तित्व पर विरोध की राजनीति के छींटे मार कर उसे होश में लाने की कोशिश की।

जम्मू-कश्मीर में धारा 370 हटाने का फैसला देश के बड़े ऐतिहासिक फैसलों में एक था। जिस धारा 370 को हटाने की बात पर चर्चा से भी कुछ राजनीतिक दल घबराते थे, उसे खत्म करना आसान काम नहीं था। लेकिन केंद्र की मौजूदा सरकार ने अपने चुनावी वादे और कश्मीर के भविष्य का हवाला देते हुए इसे खत्म करने का फैसला किया। राज्यसभा और लोकसभा में इस पर जमकर बहस हुई और अंतत: दोनों सदनों से यह बहुमत के साथ पास हुआ। सरकार के इस फैसले को कुछ ऐसे राजनीतिक दलों का भी साथ मिला जो धुर विरोधी रहे। वहीं कॉन्ग्रेस समेत कुछ अन्य राजनीतिक दलों ने इसका जमकर विरोध भी किया।

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने जब राज्यसभा और लोकसभा में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल के पेश किया था तब कॉन्ग्रेस पार्टी ने दोनों सदनों में सरकार के इस पहल का पुरजोर विरोध किया था। राज्यसभा में कॉन्ग्रेस के नेता गुलाम नबी आजाद ने तो इसे लोकतंत्र का काला दिन करार दिया था। हालाँकि इस मुद्दे पर भी कॉन्ग्रेस की सहमति नहीं बन पाई थी। आलम यह हुआ कि अनुच्छेद 370 पर पार्टी दो गुटों में बँट गई।

जम्मू-कश्मीर में दलितों की स्थिति बहुत चिंताजनक थी। धारा-370 के कारण जम्मू और कश्मीर राज्य में अनुसूचित जाति और जनजाति को भारतीय संविधान की ओर से उनके आर्थिक एवं शैक्षणिक उत्थान के लिए किए गए प्रावधान एवं आरक्षण का उन्हें कोई लाभ नहीं दिया जा रहा था। जम्मू-कश्मीर राज्य में धारा-370 के कारण राज्य की विधानसभा के बनाए नियम राज्य में लागू नहीं होते थे। ऐसे में समझा जा सकता है कि 1950 में पंडित नेहरू और शेख अब्दुल्ला के मन में दलितों के लिए क्या सोच रही होगी? और यही कारण भी रहा कि जम्मू-कश्मीर विधानसभा में दलितों के उत्थान एवं सशक्तिकरण के बारे में कभी सोचा ही नहीं गया।

जम्मू-कश्मीर राज्य के दलितों की स्थिति की तुलना वहाँ की महिलाओं एवं युवकों से भी की जा सकती है। जिस प्रकार महिलाओं के उत्थान एवं उनके सशक्तिकरण के लिए केंद्र सरकार की अनेकों योजनाएँ चल रही है, किन्तु धारा-370 के कारण उन्हें केंद्र सरकार की इन योजनाओं का लाभ न तो मिल रहा था और न ही उन लाभों को वह ले सकते थे।

उदाहरण के लिए केंद्र की मोदी सरकार द्वारा जारी शासनादेश के अनुसार देश के प्रत्येक बैंक प्रत्येक वर्ष एक महिला एवं एक अनुसूचित जाति या जनजाति के व्यक्ति को कम ब्याज की योजना वाला ऋण देकर उद्यमी बनाएँगे। देश के प्रत्येक राज्य में यह योजना बड़ी सफलता के साथ चल रही हैं, किन्तु जम्मू-कश्मीर में इस योजना का कोई प्रभावी और सफल परिणाम सामने नहीं आया था। इसी तरह युवाओं के लिए उनके सशक्तिकरण एवं रोजगार की दृष्टि से अनेकों योजनाएँ, जो धारा 370 के कारण जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं होती थी।

1957 में जम्मू-कश्मीर राज्य ने राज्य विधानसभा के शासनादेश से सफाई कर्मी के नाम पर वाल्मीकि समाज के लोगों को पंजाब के पठानकोट, अमृतसर, जालंधर, होशियारपुर इत्यादि से लाकर जम्मू-कश्मीर राज्य के भिन्न-भिन्न स्थानों पर उनकी कॉलोनी बना कर बसाया गया। परन्तु धारा-370 का यह भी एक शर्मनाक रूप रहा कि उन्हें जातिगत आधार पर सरकारी दस्तावेजों में नौकरी को ‘भंगी पेशा’ नाम से जाना जाता है और उन्हें इस सफाई-कर्म के अलावा कोई भी अन्य नौकरी करना आधिकारिक रूप से प्रतिबंधित था। यह मानवता और मानवाधिकार के नाम पर कलंक था। इतना ही नहीं, उन्हें जम्मू-कश्मीर की पूर्ण नागरिकता भी नहीं दी गई थी। 

देश-विदेश से उच्च शिक्षा प्राप्त भी जम्मू-कश्मीर के वाल्मीकि लोग अपने राज्य में सफाई कर्मी के अलावा कोई नौकरी नहीं कर सकते थे। जम्मू कश्मीर के वाल्मीकि समुदाय के सफाई कर्मचारी जो सबकी गंदगी साफ करते थे, वे खुद सालों तक कानूनी गंदगी का शिकार रहे। लगभग शरणार्थियों जैसा जीवन जीने को मजबूर वाल्मीकि समुदाय के लोग, जिनको सरकार द्वारा पंजाब से 1957 में जम्मू कश्मीर में बुलाया गया था, 60 साल के बाद भी मूलभूत स्थानीय अधिकारों से वंचित रहे। इनके बच्चे उच्च स्तर तक शिक्षा प्राप्त तो कर सकते थे, परन्तु अनुच्छेद 35A की आड़ में बनाए गए नियमों की वजह से उनके पास सफाई कर्मचारी बनने के अलावा और कोई चारा नहीं था।

गाँधी और अंबेडकर के इस देश में, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में आज भी एक सफाई कर्मी का बेटा चाहे कितना भी पढ़ ले, जम्मू कश्मीर राज्य में उसको सरकार सिर्फ झाड़ू उठाकर जम्मू की सड़कें और गन्दगी साफ़ करने की नौकरी ही दे रही थीl बाकी नौकरियों के लिए उनके दरवाज़े बंद थे। ये लोग न तो सरकारी नौकरी कर सकते थे, न ही किसी सरकारी उच्च शिक्षा या प्रोफेशनल कोर्स, जैसे मेडिकल या इंजीनियरिंग कोर्स में एडमिशन ले सकते थे, न ही विधान सभा में चुनाव लड़ सकते थे और वोट भी नहीं डाल सकते थे।

आज भी महबूबा मुफ्ती, अब्दुल्ला परिवार समेत कश्मीरी राजनीतिक पार्टियाँ जम्मू कश्मीर में घोर अलगाववादी प्रचार करते नज़र आते हैं कि धारा 370 ही वो पुल था जिसके सहारे जम्मू कश्मीर और भारत का रिश्ता टिका हुआ था। जो कि सिर्फ सरासर गलतबयानी और भारत के संविधान का मजाक से ज्यादा कुछ नहीं था। दरअसल, जम्मू कश्मीर के भारत में विलय के बाद भारत का संविधान वहाँ पूरी तरह से लागू होना चाहिए था। यही संविधान निर्माता डॉ अंबेडकर की भी इच्छा थी, इसलिए अनुच्छेद 370 को अस्थायी प्रावधान कहा गया था। इतना अस्थायी कि उसे समाप्त करने के लिए संसद में जाने की आवश्यकता भी ना पड़े। भारत का संविधान लागू होने के बाद केवल राष्ट्रपति के आदेश से ही इसे हटाने का प्रावधान किया गया था।

5 अगस्त वो ऐतिहासिक दिन था जब जम्मू कश्मीर में अलगाववाद को बढ़ाने वाला, विकास विरोधी अनुच्छेद 370 को समाप्त किया गया और बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के सपनों को पूरा किया गया। आज जम्मू कश्मीर में भारत का पूरा संविधान लागू हो चुका है, तिरंगा पूरे सम्मान से वहाँ लहरा रहा है, भारत की संसद और संविधान यहाँ सर्वोपरि है।

बांग्लादेश ने हटाया इजरायल की यात्रा पर लगा बैन, ईरान ने कहा- मुस्लिम देश फिलिस्तीनियों को दें सैन्य और आर्थिक सहायता

इजरायल और फिलिस्तीनियों के बीच 11 दिनों तक चले संघर्ष के बाद अब विभिन्न देशों की प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं। जहाँ एक ओर मुस्लिम बहुल देश ईरान ने दूसरे मुस्लिम देशों से अपील की है कि सभी मुस्लिम देश फिलिस्तीनियों को आर्थिक और सैन्य सहायता देने के अलावा गाजा पट्टी में उनके पुनर्निर्माण के लिए भी आगे आएँ। वहीं दूसरी ओर एक अन्य मुस्लिम देश बांग्लादेश ने अपने नागरिकों पर इजरायल यात्रा के लिए लगाए दशकों पुराने बैन को समाप्त कर दिया।  

पहले बात करते हैं बांग्लादेश की। शनिवार (22 मई) को बांग्लादेश ने यहूदी देश इजरायल की यात्रा के लिए बांग्लादेशी लोगों पर लगाए बैन को हटा दिया है। पहले बांग्लादेश के पासपोर्ट पर लिखा हुआ था, “This passport is valid for all countries of the world except Israel” अर्थात यह पासपोर्ट सभी देशों के लिए वैध है सिवाय इजरायल के, लेकिन अब यह बाध्यता समाप्त कर दी गई है।

एशिया-प्रशांत क्षेत्र के डेप्युटी डायरेक्टर जनरल गिलाड कोहेन ने ट्वीट करके बांग्लादेश की सरकार के इस निर्णय पर खुशी जताते हुए कहा कि बांग्लादेश की सरकार द्वारा देश के नागरिकों पर लगे इजरायल की यात्रा के बैन को हटाने का निर्णय स्वागत योग्य है। उन्होंने यह भी कहा कि अब बांग्लादेश को इजरायल के साथ कूटनीतिक संबंध भी स्थापित करने चाहिए जिससे दोनों देशों के नागरिक एक दूसरे से जुड़ सकें।

हालाँकि, बांग्लादेश के इजरायल के साथ किसी प्रकार के कूटनीतिक संबंध नहीं है। यहाँ तक कि बांग्लादेश ने अभी तक इजरायल को मान्यता भी नहीं दी है। लेकिन फिलिस्तीन का दूतावास बांग्लादेश की राजधानी ढाका में स्थित है। ऐसे में बांग्लादेश द्वारा इजरायल की यात्रा पर लगाए गए बैन को हटाया जाना इस बात की संभावना प्रकट करता है कि आगामी भविष्य में बांग्लादेश भी इजरायल के साथ कूटनीतिक और राजनैतिक संबंध स्थापित करेगा।

बांग्लादेश के अलावा ब्रुनेई, इराक, ईरान और पाकिस्तान जैसे देशों में भी इजरायल की यात्रा पर बैन लगा हुआ है। इन्हीं मुस्लिम देशों में से एक ईरान कई मौकों पर इजरायल के प्रति काफी मुखर रहा है।

हाल ही में ईरान के शीर्ष नेता अयातुल्लाह खामनेई ने सभी मुस्लिम देशों से अपील की कि ये देश फिलिस्तीनियों का आर्थिक और सैन्य सहयोग करें। खामनेई ने कहा कि सभी मुस्लिम देशों को गाजा को फिर से बनाने के लिए आगे आना चाहिए। अयातुल्लाह ख़ामनेई ने दुनिया के सभी मुसलमानों से यह माँग की है कि वो अपनी-अपनी सरकारों से फिलिस्तीनियों का समर्थन करने की अपील करें।

इसके पहले भी ईरान के शीर्ष नेता अयातुल्लाह खामनेई इजरायल के बारे में कट्टरपंथी बयान दे चुके हैं। कुछ दिनों पहले खामनेई ने कहा था कि इजरायल कोई देश नहीं बल्कि मुसलमानों के लिए एक आतंकी अड्डा है। उन्होंने मुस्लिम देशों से इजरायल को हराने के लिए एकजुट होने की अपील की थी।

ईरान ने अभी तक इजरायल को मान्यता नहीं दी है। ईरान के शीर्ष नेता अभी भी इजरायल के विरोध में कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन हमास और इस्लामिक जिहाद को समर्थन देते हैं।  

सुशील कुमार 6 दिनों की पुलिस रिमांड पर, सागर के पिता ने कहा- ऐसी सजा दी जाए, जो सबके लिए बने नजीर

जूनियर रेसलर सागर धनखड़ की हत्या के मामले में फरार चल रहे ओलंपिक विजेता सुशील कुमार को उसके साथी अजय के साथ दिल्ली पुलिस ने 19वें दिन गिरफ्तार कर लिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पहलवान सुशील और कॉन्ग्रेस के नगर निगम पार्षद सुरेश बक्करवाला के बेटे अजय बक्करवाला को दिल्ली की रोहिणी कोर्ट ने 6 दिनों की पुलिस कस्टडी में भेज दिया है।

पुलिस के अनुसार, सागर की पिटाई करते हुए वीडियो इसलिए बनाई गई थी, ताकि सुशील का अपने सर्किल में वर्चस्व बना रहे और कोई भी उसका विरोध न करे। सुशील ने ही प्रिंस को वीडियो बनाने को कहा था, लेकिन जब सागर की मौत हो गई तो सभी आरोपित भाग गए।

वहीं, सागर के पिता अशोक का कहना है कि सुशील ने गुरु-शिष्य की परंपरा को कलंकित किया है। उससे सभी अवॉर्ड वापस लिए जाने चाहिए। साथ ही ऐसी सजा दी जाए, जो सबके लिए नजीर बने।

समाचार एजेंसी एएनआई से उन्होंने कहा कि हत्यारोपित सुशील की गिरफ्तारी से परिवार का खाकी पर विश्वास बढ़ा है। सुशील के खिलाफ काफी सारे सुबूत हैं। हम सब यही माँग करते हैं कि उसे सख्त से सख्त सजा दी जाए। हमें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है। इससे लोगों का न्याय व्यवस्था में विश्वास बढ़ेगा।

सागर के पिता अशोक ने आगे कहा कि उनके बेटे की हत्या हुई है। किसी तरह के अनावश्यक दबाव डालने की बात कोई सोच भी नहीं सकता। कहीं से कोई दबाव नहीं है और न ही वह अब झुकेंगे। न्याय मिलने तक उनकी लड़ाई जारी रहेगी। उन्होंने माँग की है कि सुशील कुमार से कड़ाई से पूछताछ होनी चाहिए। सच सबके सामने आना चाहिए कि सुशील किन-किन गैंगस्टर्स के संपर्क में था। वहीं, सागर के मामा आनंद का कहना है कि वो न्याय के लिए अंतिम साँस तक लड़ेंगे। पूरा समाज और परिवार न्याय के लिए एकजुट है।

चार मई की रात की गई थी सागर पहलवान की हत्या

दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम में चार मई की रात सागर पहलवान की हत्या हुई थी। हत्या का आरोप सुशील कुमार और उसके साथियों पर लगा था। इसके बाद से सुशील कुमार अपने साथी अजय के साथ फरार चल रहा था। दिल्ली पुलिस ने सुशील कुमार पर एक लाख व उसके साथी अजय पर 50 हजार रुपए का इनाम घोषित किया था। रविवार (23 मई 2021) को दोनों को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।

डॉ हर्षवर्धन का बाबा रामदेव को पत्र, कहा- एलोपैथ पर आपके बयान ने किया कोरोना योद्धाओं का अपमान, वापस लें

चिकित्सा पद्धति एलोपैथी के विषय में योग गुरु बाबा रामदेव के द्वारा दिए गए बयान पर अब केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने भी आपत्ति जताई है और बाबा रामदेव से अपना बयान वापस लेने की माँग की है। स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन से पहले इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) भी बाबा रामदेव के बयान पर आपत्ति दर्ज करा चुका है।

हाल ही में बाबा रामदेव का एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें वह एलोपैथी की निंदा करते हुए सुने गए। उन्होंने कहा कि एलोपैथी दवाओं के कारण ही कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों की जान गई है। इस पर बाबा रामदेव को चिट्ठी लिखते हुए डॉ. हर्षवर्धन ने कहा कि सम्पूर्ण देशवासियों के लिए Covid-19 से युद्धरत डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी देवतुल्य हैं। ऐसे में बाबा रामदेव के आपत्तिजनक बयान ने देशभर की भावनाओं को ठेस पहुँचाई है। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने चिट्ठी ट्वीट करते हुए योगगुरु रामदेव से अपना बयान वापस लेने की माँग की है।

अपनी चिट्ठी में डॉ. हर्षवर्धन ने कहा कि आज यदि देश में कोरोना वायरस संक्रमण की मृत्यु दर सिर्फ 1.13% और रिकवरी रेट 88% है तो उसके पीछे एलोपैथी और उसके डॉक्टरों का बड़ा योगदान है। ऐसे में कोरोना वायरस के इलाज में एलोपैथी को तमाशा, बेकार और दिवालिया बताया जाना दुर्भावनापूर्ण है।

उन्होंने यह भी कहा कि बाबा रामदेव सार्वजनिक जीवन में हैं। ऐसे में उनका बयान बहुत मायने रखता है। इसलिए यह आवश्यक है कि उन्हें कोई भी बयान समय, काल व परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए देना चाहिए।

ज्ञात हो कि डॉ. हर्षवर्धन से पहले IMA ने बाबा रामदेव पर एलोपैथी पर दिए गए बयान पर कार्रवाई करने की माँग की थी। IMA द्वारा जारी किए गए माँग पत्र पर IMA के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. जे ए जयलाल और मानद महासचिव डॉ. जयेश एम लेले के हस्ताक्षर थे। ये वही डॉ. जयलाल हैं जो चाहते थे कि IMA ‘जीसस क्राइस्ट के प्यार’ को साझा करे और सभी को भरोसा दिलाए कि जीसस ही व्यक्तिगत रूप से रक्षा करने वाले हैं। उन्होंने कहा था कि चर्चों और ईसाई दयाभाव के कारण ही विश्व में पिछली कई महामारियों और रोगों का इलाज आया।

ज्ञात हो कि हाल ही में बाबा रामदेव का एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें उन्होंने कहा कि एलोपैथी ऐसी बेकार साइंस है कि पहले इनकी हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन फेल हो गई, फिर रेमडेसिविर फेल हो गई। फिर एंटीबायोटिक्स इनके फेल हो गए, स्टेरॉयड फेल हो गए। प्लाज्मा थेरेपी के ऊपर भी बैन लग गया। आइवरमेक्टिन भी फेल हो गई। बुखार के लिए फैबिफ्लू दे रहे हैं, वो भी फेल है।

कॉन्ग्रेस समेत 12 विपक्षी पार्टियाँ किसानों के साथ 26 मई को मनाएँगी ‘काला दिवस’: SKM को दिया समर्थन, कोरोना में जुटेगी भीड़

संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने कृषि कानूनों के विरोध में 26 मई को देशव्यापी काला दिवस मनाने का फैसला किया है। रविवार (23 मई 2021) को कॉन्ग्रेस समेत 12 बड़ी विपक्षी पार्टियों ने संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) के आह्वान का समर्थन किया है। इसमें पाँच मौजूदा मुख्यमंत्री भी शामिल हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, कोरोना संकट के बीच संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) 26 मई को देशव्यापी काला दिवस मनाने की बात कह रही है। इस दिन किसान आंदोलन को शुरू हुए 6 महीने पूरे हो जाएँगे।

12 विपक्षी दलों की तरफ से संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) के समर्थन में जारी किए गए ताजा बयान में 23 मई को लिखे गए पत्र का भी जिक्र किया गया है, जिसमें नए कृषि कानूनों को वापस लेने की माँग की गई थी। इसमें कहा गया था कि कृषि कानूनों को वापस लिया जाना चाहिए। इससे आंदोलन कर रहे किसान सीमाओं से लौट जाएँगे और लाखों अन्नदाताओं को महामारी का शिकार होने से बचाया जा सकता है। कृषि कानूनों को तत्काल निरस्त करने के अलावा विपक्षी नेताओं ने स्वामीनाथन आयोग द्वारा अनुशंसित न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) C2+50 प्रतिशत के कानूनी अधिकार की माँग भी की।

कॉन्ग्रेस समेत 12 विपक्षी पार्टियों ने किया संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) का समर्थन किया

संयुक्त बयान पर कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी, पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा, एनसीपी प्रमुख शरद पवार, पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी (टीएमसी), महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे (शिवसेना), तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन (डीएमके), फारूक अब्दुल्ला (जेकेपीए), अखिलेश यादव (समाजवादी पार्टी), तेजस्वी यादव (आरजेडी), डी राजा (सीपीआई), सीताराम येचुरी (सीपीआई-एम) और झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन (झामुमो) ने हस्ताक्षर किए हैं।

दिल्ली के लिए रवाना हुए किसान

वहीं, बताया जा रहा है कि लॉकडाउन के बीच भी हजारों किसान रविवार (23 मई 2021) को हरियाणा के करनाल से दिल्ली के लिए रवाना हुए। यहाँ वे 26 मई को ‘काला दिवस’ के रूप में मनाने की योजना बना रहे हैं। इसके अलावा ये भी खबरें सामने आई हैं कि पंजाब के संगरूर से भी कई लोग दिल्ली के लिए रवाना हुए हैं। मालूम हो कि पिछले साल सितंबर में तीन कृषि बिल संसद में पारित किए गए थे और बाद में राष्ट्रपति की सहमति के बाद इसे कानून बनाया गया था।

बता दें कि 40 किसान संगठनों के संघ (SKM) ने केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे छह महीने के आंदोलन को चिह्नित करने के लिए 26 मई को ‘ब्लैक डे’ का आह्वान किया था।