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बत्रा अस्पताल में 12, कीर्ति में 6 की मौत: गौतम गंभीर दे रहे दिल्ली को 200 ऑक्सीजन कॉन्संट्रेटर तो AAP नेता ‘ट्विटरबाजी’ में व्यस्त

भाजपा सांसद और पूर्व क्रिकेटर गौतम गंभीर ने ऑक्सीजन की कमी से जूझ रहे मरीजों के लिए मुफ्त में ऑक्सीजन कॉन्संट्रेटर की व्यवस्था कराई। दिल्ली में बढ़ते कोरोना वायरस के संक्रमण के बीच ऑक्सीजन की कमी लगातार बनी हुई है। दिल्ली के ही बत्रा अस्पताल में शनिवार (01 मई) को ऑक्सीजन की कमी से 12 संक्रमितों की मृत्यु हो गई।

न्यूज एजेंसी ANI से बात करते हुए गौतम गंभीर ने कहा कि वर्तमान समय में दिल्ली में ऑक्सीजन की समस्या सबसे बड़ी है। उन्होंने कहा, “जिस प्रकार हमनें ऑक्सीजन सिलेंडर और फैबीफ्लू दवा मुफ्त में उपलब्ध कराई थी, ठीक उसी प्रकार हम 200 ऑक्सीजन कॉन्संट्रेटर भी मुफ्त में उपलब्ध करा रहे हैं। हमारी अपील है कि एक बार आवश्यकता पूरी होने पर ये ऑक्सीजन कॉन्संट्रेटर वापस लौटा दिए जाएँ जिससे बाकी जरूरतमंदों की मदद की जा सके।“

दिल्ली सरकार और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से प्रश्न करते हुए गंभीर ने कहा कि पिछले 6 सालों से जिस मोहल्ला क्लीनिक को दिल्ली सरकार बेहतरीन स्वास्थ्य मॉडल बता रही थी, आज वो मोहल्ला क्लीनिक कहाँ हैं और स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च करने के स्थान पर मुख्यमंत्री केजरीवाल विज्ञापनों में पैसा क्यों खर्च कर रहे थे?

वहीं दूसरी ओर ऑक्सीजन की कमी से दिल्ली के दो अस्पतालओं में कई मरीजों की मौत हो गई। दिल्ली के बत्रा अस्पताल में शनिवार को ऑक्सीजन की कमी से 12 कोरोना वायरस संक्रमित मरीजों की मौत हो गई। इनमें से गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. आर के हिमतानी भी शामिल हैं।

अस्पताल ने बताया कि जब सुबह 2500 लीटर ऑक्सीजन बची थी तब ही अधिकारियों को जानकारी दी थी। अस्पताल के चिकित्सा निदेशक एस सी अल गुप्ता ने कहा कि अधिकारियों ने साढ़े 12 बजे कहा कि ऑक्सीजन खत्म हो गई है और 1 बजकर 35 पर ऑक्सीजन का टैंकर आया।

इसके अलावा दिल्ली के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के गुरुग्राम में कीर्ति अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी के चलते Covid-19 संक्रमित 6 मरीजों की मौत हो गई। अस्पताल के अनुसार काफी प्रयास के बाद भी तय समय पर ऑक्सीजन नहीं मिल पाया।

जहाँ एक ओर दिल्ली में ऑक्सीजन की कमी लगातार बनी हुई है वहीं आम आदमी पार्टी (AAP) के नेता दूसरे राज्यों की ऑक्सीजन की व्यवस्थाओं को लेकर राजनीति कर रहे हैं। AAP के संस्थापक व नेता राजेश शर्मा ट्विटर पर असम के स्वास्थ्य मंत्री हेमंत बिस्वा सरमा से ऑक्सीजन के मुद्दे पर भिड़ गए जिस पर सरमा ने कह दिया कि दिल्ली सरकार टैंकर भिजवाए, असम से उन्हें 20 MT ऑक्सीजन रोज मिलेगी लेकिन इस पर AAP नेता राजेश शर्मा ने कह दिया कि दिल्ली औद्योगिक राज्य नहीं हैं और न ही उनके पास टैंकर की व्यवस्था है।

आपको बात दें कि Covid-19 के लगातार बढ़ते संक्रमण के चलते मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने लॉकडाउन को एक हफ्ते के लिए और बढ़ा दिया है। दिल्ली में पिछले 24 घंटों में 27,047 ने संक्रमित मरीज मिले हैं। इसके अलावा शुक्रवार को 375 मौतें हुई हैं। वर्तमान में दिल्ली में Covid-19 संक्रमण की दर बढ़कर 32.69% हो गई है।

TOI ने पब्लिश की पेड न्यूज, फैलाया मोदी विरोधी प्रोपगेंडा: पकड़े जाने पर चुपके से डिलीट की ‘खबर’

टाइम्स ऑफ इंडिया (Times of India) में 28 अप्रैल 2021 (बुधवार) को 10वें पेज पर न्यूज की तरह एक मोदी विरोधी प्रोपगेंडा विज्ञापन प्रकाशित हुआ। ये आर्टिकल रूपी विज्ञापन देवोलीना चक्रवर्ती ने लिखा। इसमें वह कोरोना के नाम पर मोदी विरोधी बातें करती दिखीं।

इसमें केंद्र सरकार की आलोचना व उनका क्रियान्वयन पर सवाल एक वाजिब बात थी, लेकिन जो गलत था वो इसे पाठकों को पेश करने का तरीका। टाइम्स ऑफ इंडिया ने इसे न्यूज आइटम की तरह पेश किया।

टाइम्स ऑफ इंडिया द्वारा प्रकाशित विज्ञापन

आमतौर पर अखबारों में AD के बारे में दूर से पता चल जाता है। उसमें अलग बॉर्डर होते हैं या कहीं कुछ ऐसा जरूर होता है जिससे पता चले कि विज्ञापन है न कि कोई ए़डिटोरियल पीस।

लेकिन, इस केस में पाठक के पास कोई अन्य रास्ता नहीं है कि वो पता लगा सके कि ये न्यूज स्टोरी है या विज्ञापन। कुछ लोगों को ये सामान्य लेख भी लग सकता है। लेकिन न्यूजब्रेड के आशीष शुक्ला जैसों को इसमें अंतर साफ दिखा।

उन्होंने आर्टिकल और विज्ञापन में फर्क दिखाते हुए समझाया कि सामान्य लेखों में इस्तेमाल किया गया फॉन्ट और इस लेख का फॉन्ट भिन्न है। आशीष ने इस बात पर ध्यान दिलाया कि ये आर्टिकल एक विज्ञापन है ताकि पीएम मोदी की छवि खराब की जा सके न कि ये कोई असली स्टोरी है।

आशीष ने इस संबंध में अपने पोर्टल पर भी लिखा। तस्वीर में देख सकते हैं कि ये दो कॉलम का है और आधे से ज्यादा पेज पर इसे खींचा गया है। आमतौर पर इतने बड़े ऐड की कीमत टाइम्स ऑफ इंडिया में 20-30 लाख रुपए होती है।

फॉन्ट के अलावा कई चीजें हैं जो बताती हैं कि ये न्यूज स्टोरी या ओपिनियन पीस सच में एक पेड विज्ञापन था। आर्टिकल में ‘यू और योर’ जैसे शब्द डबल इन्वर्टेड कॉमा में लिखे हैं। इसके अलावा इसमें लेखक की एक फोटो भी है जो ये दिखाने के लिए छापी जाती है कि लेख ओपिनियन पीस है।

अगर इतने प्रमाण भी काफी नहीं हैं तो बता दें कि यही आर्टिकल इसी लेखक के नाम से द वायर पर भी पब्लिश हुआ था। वहाँ भी आर्टिकल का एक-एक शब्द ऐसा था। इसलिए अगर कोई ये सोचे कि ये पहली बार टाइम्स पर ही पब्लिश हुआ है तो नहीं, टाइम्स ऑफ इंडिया से पहले 25 अप्रैल को ये द वायर पर भी पब्लिश हो चुका था। इससे जाहिर है ये न न्यूज स्टोरी है और न ओपिनियन पीस, क्योंकि अगर ऐसा होता तो नीचे बताया जाता कि ये आर्टिकल द वायर में पहले प्रकाशित हुआ या इसके लिए द वायर को साभार दिया जाता।

मालूम हो कि प्रिंट और डिजिटल मीडिया की कुछ मूल बातें होती हैं जो टाइम्स ऑफ इंडिया के लेख में नहीं थीं। अखबार में केवल एक न्यूज के तौर पर प्रोपगेंडा विज्ञापन चलाया जा रहा था। लेकिन जैसे ही इसका मालूम लोगों को चला अखबार के डिजिटल साइट से इसे हटा लिया गया।

भारत में पेड न्यूज

मीडिया जगत में पेड न्यूज का कॉन्सेप्ट 2009 के बाद आया। इसका मतलब होता है कि ऐसे विज्ञापन जो न्यूज की तरह हों। 2010 में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने पाया कि इनसे न केवल पत्रकार बल्कि मीडिया संस्थानों को भी फायदा पहुँचता है। इसे राजनेताओं, संस्थानों, ब्रांड, मूवी और सेलिब्रिटियों द्वारा दिया जाता है। विकीपीडिया के अनुसार इस तरीके का दुरुपयोग बेनेट, कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड समूह द्वारा किया गया। दिलचस्प यह है कि यही संस्थान टाइम्स ऑफ इंडिया के प्रकाशन का मालिक है।

बता दें कि कई ऐसे मामले हैं जब मीडिया संस्थानों ने पेड न्यूज चलाई। ये काम प्रमुखता से यूपीए शासन में हुआ। 2009 से 2013 के बीच 17 राज्यों में चुनाव हुए और निर्वाचन आयोग ने 1400 से ज्यादा पेड न्यूज के मामले इस बीच रिपोर्ट किए।

‘AAP’ टैंकर भेजिए, मैं 20 MT ऑक्सीजन रोज दिल्ली भेजूँगा: हेमंत बिस्वा सरमा ने केजरीवाल को दिया विशेष ऑफर

असम के स्वास्थ्य, शिक्षा, वित्त और पीडब्ल्यूडी मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि वह दिल्ली को प्रतिदिन 20 मीट्रिक टन (MT) ऑक्सीजन दे सकते हैं अगर दिल्ली सरकार इसे लेने के लिए टैंकर भेजती है। असम के मंत्री ने आम आदमी पार्टी (AAP) के संस्थापक और पार्टी के राष्ट्रीय परिषद के सदस्य राजेश शर्मा को ट्विटर पर जवाब दिया। राजेश शर्मा असम में मंत्री हेमंत बिस्वा सरमा द्वारा किए गए ऑक्सीजन उपलब्धता के दावों को झूठा साबित करने की कोशिश कर रहे थे।

ट्विटर पर यह बहस तब शुरू हुई जब असम के एक AAP नेता ने डॉ. भाबेन चौधरी ने कहा कि गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में वैक्सीन उपलब्ध नहीं है। चौधरी ने आरोग्य सेतु ऐप का स्क्रीनशॉट पोस्ट किया और कहा कि यहाँ कोई वैक्सीन स्लॉट उपलब्ध नहीं है जबकि हेमंत बिस्वा सरमा ने दावा किया है कि वैक्सीन की 5 लाख खुराकें उपलब्ध हैं।

यह ट्वीट AAP संस्थापक तक पहुँच गया और उन्होंने कहा कि जबकि हेमंत बिस्वा सरमा ने असम में 5 ऑक्सीजन संयंत्रों की स्थापना के बारे में दावा किया है, असम के लोग एक ऑक्सीजन संयंत्र के बारे में नहीं जानते हैं। उन्होंने वैक्सीन पर असम AAP के नेता चौधरी के दावों को भी दोहराया और सरमा के ट्विटर हैंडल को टैग किया।

इस पर असम के स्वास्थ्य मंत्री हेमंत बिस्वा सरमा ने राज्य में स्थापित नए ऑक्सीजन संयंत्रों का विवरण दिया। उन्होंने कहा कि गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में 3 ऑक्सीजन संयंत्र, डिब्रूगढ़ में असम मेडिकल कॉलेज अस्पताल में 2, जोरहट मेडिकल कॉलेज अस्पताल में 2, और दिफु, तेजपुर और बरपेटा में मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में एक-एक और महेंद्र मोहन चौधरी अस्पताल में 1 ऑक्सीजन संयंत्र स्थापित किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि समुगुरी, बोंगईगाँव और अमीनगाँव में 3 निजी क्षेत्र के ऑक्सीजन संयंत्र हैं।

सरमा ने शर्मा को चुनौती देते हुए कहा, “आप किस प्रकार का सबूत चाहते हैं? मुझे बताइए। कम से कम मैं अरविंद केजरीवाल नहीं हूँ।“

AAP नेता ने सोचा कि उन्हें असम के मंत्री के दावों को झूठा साबित करने का एक अवसर मिला है, क्योंकि सरमा केवल अस्पतालों में स्थापित PSA ऑक्सीजन जनरेटर के बारे में बात कर रहे थे। AAP नेता राजेश शर्मा ने कहा, “आप पिछले 20 वर्षों से असम के स्वास्थ्य मंत्री हैं। ये संयंत्र एंबुलेंस के ऑक्सीजन सिलेंडर को भी फिर से भरने में सक्षम नहीं हैं।“

हालाँकि,  राजेश शर्मा को गलत जानकारी दी गई थी क्योंकि भले ही भाजपा नेता ने असम में अस्पतालों में स्थापित नए PSA ऑक्सीजन संयंत्रों का उल्लेख किया था लेकिन तथ्य यह है कि असम में पहले से ही औद्योगिक ऑक्सीजन उत्पादक संयंत्र हैं जो लिक्विड ऑक्सीजन का उत्पादन करते हैं और कई अन्य संयंत्र अगले कुछ सप्ताह में स्थापित होने वाले हैं जिनसे सिलेंडरों में ऑक्सीजन को भरा जा सकता है। हेमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि राज्य में वर्तमान माँग की तुलना में 42 मीट्रिक टन अधिक उत्पादन करने वाले 4 ऑक्सीजन संयंत्र हैं और वह 20 मीट्रिक टन ऑक्सीजन प्रतिदिन दिल्ली भेज सकते हैं। सरमा ने कहा, “आप अपने टैंकर भेजिए और मैं टैंकरों को फिर से ऑक्सीजन से भर दूँगा। यह मेरा वादा है।”

इस प्रस्ताव के बाद राजेश शर्मा ने बात बदल दी और जवाब दिया कि दिल्ली में क्रायोजेनिक टैंकर नहीं हैं क्योंकि यह एक औद्योगिक राज्य नहीं है। इसलिए उन्होंने सरमा से ही टैंकरों की व्यवस्था करने का अनुरोध किया और कहा कि यह दिल्ली के लोगों के लिए एक बड़ी मदद होगी।

हेमंत बिस्वा सरमा ने जब कहा कि वह अरविंद केजरीवाल नहीं हैं तो राजेश शर्मा ने कहा कि वह केजरीवाल हो भी नहीं सकते हैं, जिन्होंने केवल 7 वर्षों में दिल्ली में पूरी शिक्षा और स्वास्थ्य प्रणाली बदल दी। हेमंत बिस्वा सरमा ने मौजूदा Covid-19 स्थिति का हवाला देते हुए कहा कि दिल्ली के सीएम ने दिल्ली में किस तरह की क्रांति की है। सरमा ने कहा, ”हम असम में ऐसी क्रांति नहीं चाहते।“ उन्होंने राजेश शर्मा से कहा कि यदि उनमें साहस है वो असम की यात्रा करें और प्लांट्स को देखें।

AAP नेता ऑक्सीजन की स्थिति पर अन्य राज्यों पर राजनीति करने की कोशिश करते हैं लेकिन दिल्ली में ही अपने शासन में ऑक्सीजन की सबसे गंभीर कमी का सामना कर रहे हैं। असम सरकार ने यह सुनिश्चित करने के लिए कई कदम उठाए हैं कि Covid-19 मामलों के उपचार में पर्याप्त ऑक्सीजन उपलब्ध हो। असम में निजी क्षेत्र में चार मौजूदा ऑक्सीजन उत्पादन संयंत्र हैं और हाल के हफ्तों में राज्य सरकार ने कई अन्य संयंत्रों से ऑक्सीजन की आपूर्ति की व्यवस्था की है। अस्पतालों में PSA प्लांट लगाने के अलावा कुछ और ऑक्सीजन संयंत्रों को पुनर्जीवित किया जा रहा है जो सालों से उपयोग में नहीं थे।

असम सरकार ने दीमापुर में एक संयंत्र के साथ ऑक्सीजन की आपूर्ति के लिए एक समझौता किया है जो नागालैंड में कम माँग के कारण सप्ताह में केवल 2 दिन चल रहा था। अब संयंत्र सप्ताह में 7 दिन चलेगा और असम को 5 दिनों का ऑक्सीजन मिलेगा। इसके अलावा असम को भूटान के एक संयंत्र से 40 मीट्रिक टन ऑक्सीजन भी मिलेगी जो असम और भूटान की दो निजी कंपनियों द्वारा स्थापित की जा रही है। भूटान में लॉकडाउन के कारण संयंत्र पर काम ठप था लेकिन असम सरकार के अनुरोध पर विदेश मंत्रालय के भूटान सरकार से बात करने के बाद यह संयंत्र फिर से शुरू कर दिया गया।

लाशों के सहारे पोस्ट लिखते रहने की फेसबुकी रवीश कुमार की उम्मीद!  

रवीश कुमार उम्मीद से हैं। उन्होंने अपने एक फेसबुक पोस्ट में लिखा; उम्मीद है आपमें से कोई आईपीएल नहीं देख रहा होगा। इस वक़्त इससे अश्लील और क्या हो सकता है। इतना तो भरोसा कर ही सकता हूँ आप लोगों पर।

उम्मीद और रवीश कुमार का साथ चोली दामन का रहा है। यह बता पाना बहुत मुश्किल है कि उम्मीद रवीश कुमार से चिपकी पड़ी है या रवीश कुमार उम्मीद से। कहने का अर्थ कि; इस साथ में रवीश कुमार चोली हैं या दामन, यह शोध का विषय है। उनके इस फेसबुक पोस्ट से यह भी पता चला कि वे अपने फॉलोअर्स पर विश्वास भी करते हैं और इस विश्वास के तहत मानते हैं कि उनकी तरह ही उनके फॉलोअर्स भी एक क्रिकेट लीग को अश्लील समझते होंगे। मतलब एक ऐसा समानांतर ब्रह्मांड है, जिसमें एक सेलिब्रिटी एडिटर किसी खेल और उसके प्रसारण को न केवल खुद अश्लील समझता है बल्कि अपने फॉलोअर्स द्वारा भी उसे अश्लील समझने का विश्वास करता है। 
 
यह विश्वास की पराकाष्ठा है।   

हिसाब लगाया जाए तो रवीश कुमार लगभग ढाई दशकों से उम्मीद से हैं। कभी इस उम्मीद से तो कभी उस उम्मीद से। हाल यह है कि प्रसिद्ध मुहावरा; उम्मीद पर तो दुनिया कायम है को अब; उम्मीद पर तो रवीश कुमार कायम हैं, ने रिप्लेस कर दिया है। यह बात अलग है कि इतने वर्षों तक उम्मीद से रहने के बावजूद उन्होंने कभी खुद को उम्मीदवार घोषित नहीं किया। शायद इसीलिए उम्मीदवार बनने के महत्वपूर्ण काम के लिए उन्होंने अपने भाई से उम्मीद लगाई।   

ढाई दशकों तक उम्मीद से रहने का परिणाम यह हुआ है कि उनके उम्मीदों की लिस्ट लगातार बड़ी होती जा रही है। एक उम्मीद से बोर हो लेते हैं तो दूसरी उम्मीद चुन लेते हैं। दूसरी से बोर होते हैं तो तीसरी चुन लेते हैं। कभी किसी पुरानी उम्मीद से बोर नहीं होते तो नई उम्मीद खुद ब खुद आकर सामने खड़ी हो जाती है। मानो कह रही हो; मैं नई उम्मीद हूँ, अब इस पुरानी को छोड़कर मुझसे चिपक लो। रवीश उसे अपना लेते हैं और कुछ दिनों तक उसी से रहते हैं।

उनकी उम्मीदों की कैटेगरी भी तरह-तरह की हैं जैसे राजनीतिक उम्मीद, सामाजिक उम्मीद, धार्मिक उम्मीद, व्यक्तिवादी उम्मीद, कम्युनल उम्मीद, सेक्युलर उम्मीद, जातिवादी उम्मीद, घातवादी , फलित उम्मीद वगैरह वगैरह। समय और ग्रहों के प्रभाव में इनमें से कुछ को रवीश कुमार ने चुना और कुछ ने उन्हें चुन लिया। ऐसे ही चुनावी नतीजों के फलस्वरूप उम्मीद पर तो रवीश कुमार कायम हैं नामक मुहावरे का जन्म हुआ।
     
रवीश कुमार की यह उम्मीद यात्रा साल 2007 में शुरू हुई और अभी तक जारी है। उनकी पहली उम्मीद उस वर्ष गुजरात विधानसभा चुनावों के परिणाम स्वरूप कान्ग्रेस की जीत थी। यह बात अलग है कि उनकी केवल यह उम्मीद नहीं बल्कि उसके अगले तीन एडिशन भी बेकार गए। अपने अनुभव का फायदा उठाते हुए वे खुद को समय-समय पर नई उम्मीदों के साथ बाँधते गए और उम्मीद ने भी उनका साथ नहीं छोड़ा। हर दो-चार महीने में नई उम्मीदें आती गईं और रवीश उन्हें गले से लगाते रहे।  

राजनीतिक उम्मीद कैटेगरी के अलावा व्यक्तिवादी कैटेगरी वाली उनकी उम्मीदें भी उनसे खूब चिपकीं। परिणाम स्वरुप उन्होंने अरविन्द केजरीवाल से लेकर कन्हैया कुमार और उमर खालिद से लेकर अखिलेश यादव तक, हर किसी से उम्मीद लगाई। आगे जाकर राहुल गाँधी के प्रधानमंत्री बनने की उम्मीद से लेकर नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री न बनने की उम्मीद के बीच वे दीवार घड़ी के पेंडुलम की तरह झूलते रहे। उम्मीदें कम नहीं हुईं और रवीश कुमार उम्मीद से रहते गए। 

वे जिन सामाजिक उम्मीदों से रहे उनमें नोटबंदी के कारण जनता में विद्रोह की उम्मीद से लेकर दर्शकों द्वारा ढाई महीने टीवी न देखने की उम्मीद बहुत प्रसिद्ध हुई। कभी किसी की ‘जात’ जान लेने की उम्मीद ने तो उन्हें उम्मीदी ब्रह्मांड का चक्रवर्ती सम्राट बना दिया। इतने वर्षों की उम्मीद का असर है कि आज वे उम्मीद में सफलता और असफलता को नहीं देखते। सफलता मिली तो इसी उम्मीद से रहो और असफलता मिले तो कोई नई उम्मीद चुन लो जैसे दर्शन ने उन्हें उम्मीद के इस धंधे में टिकाए रखा।   

आज वे फिर उम्मीद से हैं। उन्हें उम्मीद है कि कोरोना की जिस दूसरी लहर ने उन्हें लखनऊ को लाशनऊ लिखने के लिए प्रेरित किया वह लहर कभी भारत से जाएगी ही नहीं। और ऐसा हुआ तो न केवल जलती लाशों को आगे रखकर फेसबुक पोस्ट में क्रिएटिविटी दिखाने की उम्मीद बनी रहेगी बल्कि वे फॉलोअर्स द्वारा आईपीएल को न देखने टाइप उम्मीद से भी रह सकते हैं। 

‘Help India Breath’- बार-बार बदलता IMANA का कैम्पेन, हिजबुल मुजाहिद्दीन से संबंध: जानें कैसे ठगी के शिकार हुए लोग

भारत Covid-19 की दूसरी लहर से जूझ रहा है। संक्रमितों में अचानक हुई वृद्धि ने देश की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को झकझोर दिया है। अस्पताल में बेड, ऑक्सीजन और दवाओं की कमी के कारण समस्या उत्पन्न हो रही है। इस संकट के समय में कई संगठनों ने भारत की मदद के लिए कदम आगे बढ़ाया है।

ऐसे कई संगठन हैं जो जरूरत के समय में वास्तव में मदद करने के लिए आगे आ रहे हैं लेकिन कई ऐसे कई ऐसे संगठन भी हैं जो Covid-19 संक्रमण के नाम पर धोखाधड़ी कर रहे हैं। इस तरह के संगठन आम लोगों को गुमराह कर रहे हैं रहे हैं और Covid-19 राहत कार्य के नाम पर धोखाधड़ी कर रहे हैं। इसी तरह का एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) है जो अमेरिका में स्थित है। हम बात कर रहे हैं इस्लामिक मेडिकल एसोसिएशन ऑफ नॉर्थ अमेरिका (IMANA) केयर की।

IMANA का इंस्टाग्राम पेज

IMANA ने कुछ दिन पहले रातोंरात भारत में लोकप्रियता हासिल कर ली। कहा जा रहा है कि यह संगठन इंस्टाग्राम पर पेड विज्ञापन चलाकर और यहाँ तक ​​कि अपने पोस्ट को साझा करने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इंफ्लुएंसर्स को भुगतान भी कर रहे हैं। ऐसा करके देश के युवाओं को निशाना बना जा रहा है। बदले में भारतीय युवा एनजीओ के फंड इकट्ठा करने वाले अभियान ‘Help India Breath’ के लिए बिना सोचे-समझे दान कर रहे हैं।

दिलचस्प बात यह है कि IMANA एक ऐसा एनजीओ है जो अकेले मुस्लिम समाज की बेहतरी के लिए काम करता है। संगठन ने अपने परिचय में स्पष्ट रूप से लिखा है “यह उत्तरी अमेरिका में अमेरिकी-मुस्लिम स्वास्थ्य पेशेवरों के लिए एक प्रमुख संसाधन नेटवर्क है।“ यह बताता है कि इसका उद्देश्य अपने मुस्लिम रोगियों की सेवा करना ही है।

इस अमेरिकी एनजीओ ने ‘Help India Breath’ नामक एक कैम्पेन की शुरुआत की जो Covid-19 के संक्रमण के संकट से भारत की लड़ाई में मदद करेगा। थोड़े समय के भीतर ही IMANA ने कैम्पेन के जरिए करोड़ों की धनराशि एकत्र कर ली।

IMANA का कैम्पेन पेज

पहले तो इस अमेरिकी एनजीओ के इरादे बेहद नेक लग रहे थे। लेकिन कुछ ही समय के भीतर सोशल मीडिया यूजर्स ने इस एनजीओ की वास्तविकता और उसके कैम्पेन पर सवाल उठाना शुरू कर दिया।

एनजीओ और उसके बदलते कैम्पेन :

IMANA को एक बार नहीं बल्कि तीन बार इंस्टाग्राम पर अपने कैम्पेन को बदलते हुए पकड़ा गया है। एक सोशल मीडिया यूजर द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार एनजीओ ने शुरुआत में कुल 1.8 करोड़ रुपए की राशि दान में इकट्ठा करने का लक्ष्य रखा जिसे उसी दिन बढ़ाकर 3 करोड़ रुपए और बाद में 5.6 करोड़ रुपए कर दिया गया था।

दिलचस्प बात यह है कि हर बार कैम्पेन में लक्ष्य हासिल करने के बाद संगठन चुपचाप अपने लक्ष्य को बढ़ा देता। यह अपने आप में काफी संदिग्ध है क्योंकि आम तौर पर सभी कैम्पेन की विशिष्ट समय सीमा होती है और वो पूर्व निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने के बाद समाप्त हो जाते हैं।

Help India Breath और हिजबुल मुजाहिद्दीन से उसके संबंध :

IMANA ने अपनी अधिकारिक वेबसाइट पर उल्लेख किया है उसका संबंध इस्लामिक सोसाइटी ऑफ नॉर्दर्न अमेरिका (ISNA) नाम के एक अन्य NGO के साथ है।

IMANA का About Us पेज

IMANA ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर कहा गया है कि IMANA को पहले MSA की एक शाखा के रूप में स्थापित किया गया है जो बाद में ISNA के रूप में विकसित हुई। दिलचस्प बात यह है कि ISNA पर जम्मू-कश्मीर में इस्लामिक आतंकवादी समूहों को फंडिंग करने का आरोप है।

2017 की इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार Canadian Revenue Agency (CRA) ने 2011 में NGO का ऑडिट शुरू किया था। CRA ने हिजबुल मुजाहिद्दीन से संबंध होने और जम्मू-कश्मीर में इस्लामी आतंकवादी समूहों को फंडिंग करने के आरोप में ISNA का चैरिटी स्टेटस रद्द कर दिया था।

ISNA को लिखे एक पत्र में कनाडाई अधिकारियों ने लिखा था कि उन्होंने ISNA और जमात-ए-इस्लामी के बीच संबंधों को उजागर किया है जो कि एक पाकिस्तानी इस्लामिक कट्टरपंथी समूह है और हिजबुल मुजाहिद्दीन का पैरेंट ऑर्गनाइजेशन है।

ऑडिट के अनुसार, CRA ने पाया कि टोरंटो में एक जामी मस्जिद फंड इकट्ठा करने में शामिल थी जिसके लिए उसने ISNA इस्लामिक सेवा की टैक्स रसीदें जारी की थीं। इस फंड को तब ISNA डेवलपमेंट फाउंडेशन के माध्यम से रिलीफ ऑर्गनाइजेशन ऑफ कश्मीरी मुस्लिम्स (ROKM) को भेजा गया। CRA के अनुसार ROKM जमात-ए-इस्लामी की धर्मार्थ शाखा है जो हिजबुल मुजाहिद्दीन का पैरेंट ऑर्गनाइजेशन है।

CRA ने तब कहा था, “हमारे रिसर्च से यह बताते हैं कि ROKM, जमात-ए-इस्लामी की एक धर्मार्थ शाखा है जो जम्मू-कश्मीर में अपनी सशस्त्र शाखा हिजबुल मुजाहिद्दीन की गतिविधियों के माध्यम से भारत के शासन को चुनौती देता है।“ CRA ने अंदेशा जताया कि ROKM के द्वारा इकट्ठा किया गया फंड जमात-ए-इस्लामी और उसकी सशस्त्र शाखा हिजबुल मुजाहिद्दीन के कट्टरवादी और राजनैतिक उद्देश्यों की पूर्ति करता है।

इन तथ्यों से यह पता चलता है कि भारतीयों को ठगा गया और उनके द्वारा इस इस्लामिक एनजीओ को दिया गया दान मुख्यतः अमेरिका में मुस्लिमों के लिए उपयोग में लाया जाएगा।

‘रोहित सरदाना को दिया गया इंजेक्शन…’ : #justiceforrohitsardana पर BJP नेताओं सहित लोगों ने उठाई जाँच की माँग

आजतक के पत्रकार रोहित सरदाना के निधन के एक दिन बाद ट्विटर पर उनकी मृत्यु से आहत लोगों ने पूरे मामले में निष्पक्ष जाँच की माँग उठाई है। ट्विटर पर हैशटैग #justiceforrohitsardana चल रहा है। इस मामले में, ट्वीट कर कई लोगों का पूछना है कि आखिर सरदाना को सिर्फ़ कोविड के हल्के लक्षण थे तब हार्ट अटैक कैसे आ गया।

भाजपा प्रवक्ता तजिंदर पाल सिंह बग्गा ने ट्वीट किया, “रोहित सरदाना भाई को वो इंजेक्शन लगाया गया जो उनको सूट नहीं होता था, इलाज के वक्त कोई सीनियर भी नहीं था। ये लापरवाही है या कुछ और इसकी जाँच होनी चाहिए।”

Rohit Sardana
तजिन्द्र पाल सिंह बग्गा के ट्वीट कास्क्रीनशॉट

भाजपा नेता व डॉक्टर ऋचा राजपूत ने लिखा, “रोहित जैसे, मानसिक और शारीरिक तौर पर स्वस्थ व्यक्ति थे, को कोरोना के हल्के लक्षण थे। उन्हें कभी हार्ट अटैक नहीं आया था और न ही कोई दिल संबंधी बीमारी थी। वह सुपरस्पेशेलिटी अस्पताल के आईसीयू में कुछ घंटों में खत्म हो गए। ये सही नहीं है।”

Rohit Sardana
ऋचा राजपूत के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

अंकित जैन ने लिखा, “रोहित भैया राष्ट्र की अमानत थे। उन्हें दिया गया हर ट्रीटमेंट पब्लिक होना चाहिए। इस पूरे प्रकरण में कुछ चीजें बहुत संदेहास्पद हैं।”

Rohit Sardana
अंकित जैन के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

भाजपा सांसद संजू देवी ने मामले में उच्च स्तरीय जाँच की माँग की। उन्होंने लिखा, “मैं रोहित सरदाना की मृत्यु में स्वास्थ्य लापरवाही के लिए मेट्रो अस्पताल के ख़िलाफ उच्च स्तरीय जाँच की माँग उठाती हूँ।”

संजू देवी के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

वकील गौरव गोएल ने कहा, “जाँच मेडिकल लापरवाही को उजागर करेगी।”

गौरव गोएल के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

एक अन्य यूजर ने योगी आदित्यनाथ से मामले में डीजी के नेतृत्व में एसआईटी गठित करवाकर रोहित सरदाना की मृत्यु पर जाँच करवाने की माँग उठाई। साथ ही जरूरत पड़ने पर सीबीआई माँग करने की भी अपील की।

तनमय के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

कोरोना मरीज को हार्ट अटैक आने से मरने की संभावना अधिक: रिसर्च

रोहित सरदाना की मृत्यु मामले में संभवत: कोई अस्पताल की लापरवाही रही हो, लेकिन इस बात को भी नहीं नकारा जा सकता है कि कोरोना संक्रमण में मरीज की मृत्यु हार्ट अटैक से होने के चांस बहुत होते हैं।

यूरोपियन हार्ट जर्नल में प्रकाशित एक रिसर्च पेपर के मुताबिक, जिन लोगों को कोरोना नहीं हुआ उनकी तुलना में कोरोना संक्रमितों की मौत ज्यादातर हार्ट अटैक से होती है। इसमें डॉ पेदराम के हवाले से इसमें लिखा है, “हमारी स्टडी दिखाती है कि हार्ट अटैक और कोविड-19 बहुत घातक कॉम्बिनेशन हैं। कोरोना संक्रमित को बहुत सजगता से मॉनिटर किया जाना चाहिए और ऐसे कदम उठाने चाहिए कि उसे हार्ट अटैक न आए, हाई रिस्क मरीजों को लगातार देखरेख में रखा जाना चाहिए।”

एक आर्टिकल हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की ऑफिशियल वेबसाइट पर भी पब्लिश है। इसमें लिखा है कि कोरोना संक्रमण कई तरह से हार्ट को डैमेज करता है। जैसे वायरस सीधे हृदय की माँसपेशियों पर आक्रमण या वहाँ सूजन कर सकता है, और यह ऑक्सीजन की आपूर्ति और माँग के बीच संतुलन को बाधित करके अप्रत्यक्ष रूप से हृदय को नुकसान पहुँचा सकता है।

ET ने फैलाया झूठ- चेतावनी मिलने के बाद कोरोना की दूसरी लहर को केंद्र ने किया नजरअंदाज: IIT प्रोफेसर ने खोली पोल

IIT हैदराबाद के प्रोफेसर एम विद्यासागर ने शुक्रवार (अप्रैल 30, 2021) को इकोनॉमिक टाइम्स (ET) को उनका गलत बयान छापने पर जमकर लताड़ा। ET ने उनके हवाले से अपनी खबर में लिखा था कि केंद्र सरकार जानबूझकर कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर को इग्नोर करती रही।

इस आर्टिकल का शीर्षक, “Panel red-flagged onset of 2nd wave in March 1st week” है। इसे ईटी में शुक्रवार को प्रकाशित किया गया। इसमें नेशनल कोरोना वायरस सुपरमॉडल कमेटी प्रोफेसर एम विद्यासागर को कोट करते हुए कहा गया, “हमने मार्च के पहले सप्ताह में इस बात पर प्रकाश डाला था कि कोरोना की दूसरी लहर रास्ते में है और सरकार को तैयार रहना चाहिए। वह सरकार के लोगों के लिए चेतावनी थी।”

इकोनॉमिक टाइम्स से लिया गया स्क्रीनशॉट

इसमें आगे लिखा गया कि प्रोफेसर को लगता है कि लोग इस दूसरी लहर को नहीं मान रहे थे। विद्यासागर को कोट करते हुए कहा गया कि 8-9 मार्च को उन्हें पता चला था कि बीटा ‘कॉन्टैक्ट’ पैरामीटर तेजी से बढ़ रहा है और इसके बाद यह बात सरकार को बताई गई। महामारी की दूसरी लहर मार्च में आ गई थी। लेकिन लोग इससे इंकार करते रहे।

ET ने दावा किया कि सरकार दूसरी वेव को मानने से इंकार कर रही थी इसलिए वह इस स्थिति के लिए उत्तरदायी है। अपने इस दावे को सही साबित करने के लिए उन्होंने प्रोफेसर को कोट किया। शायद समाचार पत्र इस बात से अंजान था कि उन्हें इसका कितना बड़ा नुकसान हो सकता है या फिर कोई इसका विरोध कर सकता है।

IIT प्रोफेसर ने ET के दावों को किया खारिज

अखबार में खबर आने के कुछ घंटे बाद प्रोफेसर एम विद्यासागर ने इस रिपोर्ट की पोल खोल दी। उन्होंने खबर की तस्वीर लगाते हुए कहा, “चूँकि मुझे इस लेख में कोट किया गया है। मैं ये साफ कर देना चाहता हूँ कि मैंने कभी नहीं कहा कि कोई भी इससे ‘मना कर रहा था।’ भले ही ये एक पैराफ्रेस हो लेकिन ये एक आरोप जैसा लग रहा है, जिसे मैंने कभी नहीं लगाया। बाकी मेरी टिप्पणियाँ (सटीक तौर पर कोट की गई) इस बात को स्पष्ट करती हैं।”

खबर में विज्ञान एवं तकनीक विभाग के सचिव प्रोफेसर आशुतोष शर्मा को भी कोट किया गया। उन्होंने दूसरी वेव के अलर्ट और उसमें आने वाले कोरोना केसों में उछाल पर अपनी बात रखी थी। उनका कहना था कि कोई भी अंदाजा नहीं लगा सकता था कि कि दूसरी वेव में 3-10 गुना मामलों में उछाल होगा।

मगर, इकोनॉमिक टाइम्स ने इस बात को पूर्ण रूप से उल्टा कर दिया और प्रोफेसर विद्यासागर के बयान से विरोधाभासी बताया।  हालाँकि, अपने ट्वीट में प्रोफेसर ने बताया कि प्रोफेसर शर्मा बिलकुल सही बोल रहे थे। उन्होंने कहा, “हम दूसरी वेव में आने वाले केसों की संख्या का अंदाजा नहीं लगा सके, क्योंकि महामारी के आँकड़े लगातार बेतहाशा बदल रहे थे।”

उन्होंने कहा कि केवल कुछ ही समय पहले ऐसा हुआ कि कुछ मॉडल पैरामीटर्स स्थिर हुए और हम अंदाजे लगा पाए। इन्हें महिंद्रा अग्रवाल द्वारा शेयर भी किया गया। अब हम सोच सकते हैं कि इस महामारी का पीक करीब है। संभव है कि अगले हफ्ते 4 लाख प्लस या फिर 0.1 लाख माइनस।

अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा, “डीएसटी द्वारा अपॉइंट किए जाने के बाद सरकार ने हमसे इनपुट लेने के लिए तीन चार बार कॉन्टैक्ट किया। हर बार हमने वही बताया जो इनपुट हमारे पास था। आखिरी बार यह 2 अप्रैल को हुआ था।”

उनके अनुसार, भारत सरकार मॉडलिंग कम्युनिटी के लिए अच्छा काम कर रही है अगर वह पब्लिक डोमेन में डेटा रखें। वह बताते हैं कि इसमें सकारात्मक परीक्षणों के लिए अस्पतालों का अनुपात, रोगियों के अनुक्रम डेटा, वायरस के प्रकार, आदि शामिल हैं।

गौरतलब है कि कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर के लिए मोदी सरकार को जिम्मेदार बताने की इच्छा रखने वाले इकोनॉमिक टाइम्स ने कोरोना के बढ़ते मामलों का ठीकरा कुंभ मेले पर फोड़ने का प्रयास किया। हालाँकि, एम विद्यासागर ने ये साफ कहा कि ये केस कैसे बढ़े इसका स्पष्ट लिंक ढूँढना मुश्किल है।

वह कहते हैं कि कोरोना की दूसरी लहर उठी क्योंकि लोगों ने कोविड-19 प्रोटोकॉल्स को दरकिनार किया। लगातार शादियाँ हुईं, समारोह हुए। वह ध्यान दिलाते हैं कि कोरोना केसों में आया उछाल चुनावी रैली से पहले और कुंभ के शुरू होने से पहले से था।

टिकरी बॉर्डर पर कोरोना से पश्चिम बंगाल की 25 वर्षीय युवती की डेथ, राकेश टिकैत और गुरनाम सिं​ह पर भिवानी में केस दर्ज

दिल्ली की सीमाओं पर नए कृषि कानूनों के खिलाफ पाँच महीने से ज्यादा समय से किसानों का आंदोलन जारी है। इसी बीच आंदोलन में कई दिनों से सक्रिय पश्चिम बंगाल की 25 वर्षीय युवती ने शुक्रवार (30 अप्रैल) की सुबह दम तोड़ दिया। वह 27 अप्रैल से टिकरी बॉर्डर के एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती थी। इस घटना बाद से किसानों में भय का माहौल है।

वहीं, कोरोना के प्रकोप के बावजूद अलग-अलग जगहों पर पंचायतें करने पर किसान आंदोलन के नेतृत्व दल में शामिल किसान नेता राकेश टिकैत और गुरनाम सिं​ह के खिलाफ हरियाणा के भिवानी में मामला दर्ज किया गया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक मृतका मोमिता बसु पश्चिम बंगाल के हुगली की रहने वाली थीं। वह 11 अप्रैल को टीकरी बॉर्डर पर जारी किसान आंदोलन में शामिल होने आई थीं। वह अलग-अलग संगठनों के साथ यहाँ पर रहीं।

कीर्ति किसान यूनियन के एक नेता राजेंद्र सिंह दीप सिंह वाला ने कहा, “मोमिता प्रदर्शन में शामिल होने के लिए 11 अप्रैल को पश्चिम बंगाल से टिकरी आई थी। चार दिन पहले उसकी हालत बिगड़ने पर उसे एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहाँ डॉक्टरों ने उसके फेफड़ों में संक्रमण पाया था। उन्होंने शुक्रवार को अस्पताल में अंतिम साँस ली।”

हालाँकि, किसान यूनियन के सदस्य सार्वजनिक रूप से दावा कर रहे हैं कि बसु की मौत फेफड़ों में संक्रमण के कारण हुई थी, लेकिन संदीप सिंह नाम के एक पत्रकार ने ट्विटर पर इस बात की पुष्टि की है कि कोरोना से महिला की मौत हुई है।

उन्होंने कहा कि मोमिता बसु के फेफड़ों में संक्रमण था और वह कोरोना से भी संक्रमित थीं। पत्रकार ने पुष्टि की कि टिकरी बॉर्डर पर किसानों के प्रदर्शन स्थल पर COVID-19 के कारण मौत का यह पहला मामला है, जहाँ हजारों किसान मुख्य रूप से पंजाब और हरियाणा के विरोध कर रहे हैं। भारत में कोरोना की दूसरी लहर बेहद घातक साबित हो रही है।

बता दें कि पिछले साल सितंबर में मोदी सरकार द्वारा लाए गए तीन नए कृषि कानूनों के विरोध में किसान दिल्ली की सीमाओं पर प्रदर्शन कर रहे हैं। वे कोरोना जैसी विश्व व्यापी महामारी के दौरान भी प्रदर्शन स्थल से हटने को तैयार नहीं हो रहे हैं। भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने गुरुवार (29 अप्रैल) को कहा कि किसानों का प्रदर्शन जारी रहेगा। उन्होंने आगे जोर देकर कहा कि सीमा पर उनका आंदोलन कोरोना के मामलों में तेजी आने के बावजूद जारी रहेगा।

मालूम हो कि हरियाणा में कोरोना महामारी के कारण धारा 144 लागू है। इसी बीच गुरुवार को भिवानी के प्रेमनगर गाँव में किसान पंचायत का आयोजन करने के आरोप में राकेश टिकैत और गुरनाम सिंह के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है।

यूपी के इन 7 जिलों में 18-44 साल के लोगों का वैक्सीनेशन शुरू, CM योगी ने कहा- संक्रमण में कमी, रिकवरी रेट बेहतर होना सुखद

उत्तर प्रदेश में शनिवार से 18-44 आयु वर्ग के लोगों का कोविड वैक्सिनेशन शुरू हो गया। पहले चरण में सात जिलों को वैक्सिनेशन में शामिल किया गया है। यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ लखनऊ के अवंतीबाई अस्पताल पहुँचे और यहाँ उन्होंने वैक्सीनेशन अभियान की शुरुआत की।

सरकार के प्रवक्ता ने बताया कि फ्री टीका उपलब्ध कराने के अभियान की मुख्यमंत्री रात में निगरानी करते रहे और उन्होंने शुक्रवार देर शाम सरकारी विमान भेजकर हैदराबाद से टीके की खेप मँगवाई।

इसलिए चुने गए पहले ये 7 जिले

अधिकारिक जानकारी के मुताबिक जिन सात जिलों में टीकाकरण की शनिवार को शुरुआत हुई, उनमें लखनऊ, कानपुर, प्रयागराज, वाराणसी, गोरखपुर, मेरठ और बरेली शामिल हैं। उन्होंने कहा था कि पहले चरण में उन सात जिलों में टीकाकरण होगा जहाँ नौ हजार से अधिक एक्टिव केस हैं।

सात जिलों के बाद शामिल होंगे अन्य जिले

अवंतीबाई अस्पताल पहुँचे योगी ने कहा कि टीकाकरण के लिए जो सॉफ्टवेयर बना है, उसका परीक्षण भी इन जिलों में किया जाएगा और उसके पश्चात अन्य जिलों में भी इसे विस्तारित किया जाएगा।

1.01 करोड़ ने ली पहली खुराक

योगी ने कहा कि देश में कोविड रोधी टीकाकरण शुरू होने के बाद से राज्य में अब तक 1.23 करोड़ से अधिक खुराक दी जा चुकी हैं। इनमें 1.01 करोड़ वे लोग हैं जिन्होंने पहली खुराक ली है और 22.33 लाख से अधिक लोगों ने दूसरी खुराक ली है।

बनाए गए 85 अलग केंद्र

यूपी सीएम ने कहा कि राज्य में 45 वर्ष के लिए 2500 केंद्रों पर तीसरे चरण का वैक्सिनेशन शुरू हो चुका है। उन्होंने कहा कि 18 साल से अधिक उम्र के लोगों का वैक्सीनेशन शुरू किया है। पहले चरण में हमने उन 7 जनपदों को लिया है जिनमें पॉजिटिविटी रेट और सक्रिय मामले सर्वाधिक हैं। इन 7 जनपदों में 18 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के लिए अलग से 85 केंद्र बनाए हैं।

5 करोड़ वैक्सीन के लिए ग्लोबल टेंडर

योगी ने कहा कि हमें 18 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के लिए भी वैक्सीन उपलब्ध हो गई है, हमने सीधे कंपनियों से वैक्सीन खरीदी है। प्रदेश में हम 5 करोड़ वैक्सीन का ग्लोबल टेंडर भी प्रारंभ कर चुके हैं।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि राज्य में संक्रमण के नए मामलों में कमी और रिकवरी रेट बेहतर होना सुखद है। हालाँकि लोगों को कोविड बिहेवियर को जीवनशैली का हिस्सा बनाना चाहिए। सीएम योगी ने टीम-9 के साथ कोरोना की स्थिति की समीक्षा करते हुए शनिवार (मई 1, 2021) को कहा कि पिछले 24 घंटो में कोविड के 30317 नए केस आए जबकि 38826 लोग कोरोना से स्वस्थ हो चुके हैं। यह स्थिति सुखद है। प्रदेश में संक्रमण कम हो रहा है और रिकवरी बेहतर हो रही है। हमें इसी प्रकार टेस्ट, ट्रैक और ट्रीट की नीति को प्रभावी ढंग से लागू रखना होगा। यह बहुत जरूरी है कि प्रदेशवासी कोविड बिहेवियर को जीवनशैली का हिस्सा बनाएँ।

उन्होंने कहा कि बीते 24 घंटों में प्रदेश में 2,66,326 कोविड टेस्ट संपन्न हुए हैं। इसमें 1,14,172 टेस्ट केवल आरटीपीसीआर माध्यम से हुए हैं। अब तक उत्तर प्रदेश में 4.10 करोड़ टेस्ट हो चुके हैं। यह देश के सभी राज्यों में सर्वश्रेष्ठ है। सीएचसी और पीएचसी स्तर पर एंटीजन टेस्ट बढ़ाए जाने की जरूरत है।

इसी के साथ-साथ प्रदेश में 2500 केंद्रों पर 45 वर्ष से अधिक आयु के लोगों का टीकाकरण पूर्ववत जारी है। उन्होंने कहा कि कोविड से लड़ाई में टीकाकरण अहम है। देश मे सर्वाधिक टीकाकरण उत्तर प्रदेश में हुआ है। नि:शुल्क टीकाकरण की घोषणा करने वाला उत्तर प्रदेश प्रथम राज्य है। हम सभी नागरिकों के वैक्सीनेशन के लिए नियोजित भाव से कार्य कर रहे हैं।

वहीं उत्तर प्रदेश अपर मुख्य सचिव सूचना नवनीत सहगल ने बताया, “प्रदेश में रेमडेसिविर की उपलब्धता को बढ़ाया गया है पहले 20,000 डोज़ प्रतिदिन मिलते थे, कल से यह संख्या 50,000 कर दी जाएगी। ऑक्सीजन की उपलब्धता लगातार बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। कल प्रदेश में 631 मीट्रिक टन ऑक्सीजन प्राप्त हुई।”

रोहित सरदाना की मौत पर जश्न मनाने के बाद कट्टरपंथियों ने ट्रेंड कराया #StandWithSharjeelUsmani

पत्रकारिता जगत में शुक्रवार (मार्च 30, 2021) को रोहित सरदाना के निधन के बाद मातम पसरा रहा। हर कोई आजतक के वरिष्ठ पत्रकार के देहांत की खबर सुनकर उन्हें श्रद्धांजलि दे रहा था। इस बीच इस्लामी कट्टरपंथियों और वामपंथियों के संदेशों ने लोगों को बुरी तरह झकझोर दिया। इनमें से एक नाम न्यूजलॉन्ड्री के स्तंभकार शरजील उस्मानी का है। वही शरजील उस्मानी जिस पर दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों में कई तरह के इल्जाम लगे थे।

कल जैसे ही सरदाना के निधन की पुष्टि हुई, शरजील उस्मानी ट्विटर पर जश्न मनाने लगा। उसने सरदाना के सहकर्मी राजदीप सरदेसाई के ट्वीट पर नफरत से भरी प्रतिक्रिया दी।

रोहित सरदाना को बड़े अक्षरों में उस्मानी ने “मनोरोगी, झूठ बोलने वाला, नरसंहार करवाने वाला” कहा। इसके अलावा ये भी लिखा कि रोहित सरदाना को पत्रकार के तौर पर नहीं याद किया जाना चाहिए।

ये ट्वीट उस्मानी ने राजदीप सरदेसाई के ट्वीट पर किया था। लोगों ने इसे देखा तो उस्मानी को खूब खरी खोटी सुनाई। तभी कुछ इस्लामी कट्टरपंथी आए और देखते ही देखते ट्विटर पर #StandWithSharjeelUsmani ट्रेंड करने लगा।

एक शेख नाम के ट्विटर यूजर ने कहा कि शरजील ने वो किया जो उसे करना था। अगर देश को बचाना है, तो हर किसी को उसकी तरह ही बनना होगा।

सीएए प्रदर्शनों को भड़काने वालों में से एक आफरीन फातिमा ने कहा कि लिबरलों को न केवल सरदाना के कर्मों पर लीपा-पोती करने के लिए शर्म आनी चाहिए बल्कि मुस्लिम युवाओं को भड़काने के लिए भी शर्मिंदा होना चाहिए। आफरीन के मुताबिक जो लोग सरदाना के लिए लिख रहे हैं वो इस्लामोफोबिया फैला रहे हैं।

इसी प्रकार सैंकड़ों लोगों ने शरजील उस्मानी की भाषा में ट्वीट में किया और यहाँ तक कहा कि जब सरदाना को किसी समुदाय के ख़िलाफ़ नफरत फैलाने में शर्म नहीं आई तो उन्हें सच बोलने में क्यों आएगी।

अब इस बात को जानने के लिए कि आखिर ट्विटर पर एक हैशटैग के साथ तमाम कट्टरपंथी किसे समर्थन दे रहे हैं, तो हमें उस्मानी के एक ट्वीट थ्रेड को देखना होगा। इसे उसने ट्विटर पर अपनी आलोचना के बाद शेयर किया था।

इस थ्रेड में उस्मानी ने खुद को उत्पीड़ित समुदाय का कहते हुए उन लोगों पर अपना गुस्सा उतारा जो उसे मृत्यु का जश्न मनाने पर बुरा भला बोल रहे थे। उसने लिबरलों को निशाने पर लेते हुए कहा कि ये लोग चाहते हैं कि एक उत्पीड़ित समुदाय का व्यक्ति तय की गई सीमाओं में ही बात रखे। 

उसने कहा कि सरदाना मुस्लिमों के नरसंहार करवा रहा था और उसके सहकर्मी अब भी यही कर रहे हैं। वह कहता है कि वह सरदाना को याद करने की बजाय उन पीड़ितों को याद करेगा जिन्हें उसने (रोहित सरदाना ने) क्रिमिनल कहा और वह अब भी जेल में हैं।

यहाँ ध्यान रहे कि उस्मानी जिस पत्रकार के लिए घटिया बातें कर रहा है, उनका निधन कोविड-19 से संक्रमित होने के बाद हुआ। उससे पहले उन्होंने सिर्फ अपना काम किया बिना शरजील इमाम जैसे हिंदू विरोधी दंगों में शामिल लोगों का महिमामंडन किए।

उस्मानी कहता है कि अगली बार जब कोई फासीवादी मरे तो लोगों को उसपर उदास नहीं होना चाहिए। ये सबसे बड़ा मानवता का काम होगा।

गौरतलब है कि शरजील उस्मानी के एक-एक शब्द इस्लामी एजेंडा के वाहक हैं। इसी के तहत लोगों की मृत्यु का जश्न मनाया जाता है। उसका होना भी लिबरल मीडिया और बुद्धिजीवियों की देन है। यही लिबरल कुछ दिन पहले एल्गार परिषद 2021 में उसकी स्पीच पर तालियाँ पीट रहे थे।

वहाँ भी इस उस्मानी ने हिंदू समुदाय के विरुद्ध जहर उगला था। उसकी टिप्पणियों पर जब लोगों ने सवाल उठाए तो कई गिरोह के लोगों ने उसे जस्टिफाई किया। इसके अलावा इसी उस्मानी ने कश्मीरी पंडितों को ‘most pampered minority’ कहा था। तब भी लिबरलों ने इसके बयान का बचाव किया था।

मगर, अब ये उस्मानी पूरी तरह से अपनी हकीकत दिखा चुका है और अब चाहकर भी लोग इसके कुकर्मों पर पर्दा नहीं डाल सकते। लिबरलों ने इसे पाला-पोसा और इसका बचाव करके इतना बड़ा कर दिया कि ये खुलकर नफरत फैलाने लगा। ऐसे में हम हैरान कैसे हों कि ये अब खुलकर किसी की मृत्यु पर जश्न मनाता है।