2021 विधानसभा चुनावी नतीजों के मद्देनजर मतगणना शुरू हो गई है। शुरुआती रुझानों में असम में लगातार NDA गठबंधन ने बढ़त बनाई हुई है। वहीं यूपीए बहुमत से बहुत पीछे चल रही है। ताजा अपडेट्स में एनडीए 67 सीटों पर आगे हैं वहीं यूपीए 39 सीट तक बढ़त बना पाई है।
दिलचस्प बात यह है कि असम वह राज्य है जहाँ कॉन्ग्रेस की महासचिव प्रियंका गाँधी ने 2 दिवसीय दौरे पर 6 रैलियाँ बैक टू बैक कीं। प्रियंका गाँधी ने दौरे के पहले दिन जोरहाट, नजीरा और खुमतई में रैली की। फिर अगले दिन उन्होंने गोलाघाट जिले के सरूपथार और नागाँव के कलियाबोर में रैली की। उनकी अंतिम रैली श्रीमंत शंकरदेवा की जन्मस्थली बाताद्रव में हुई।
मालूम हो कि केवल यही 6 रैलियाँ प्रियंका गाँधी ने चुनाव के मद्देनजर नहीं की थी, बल्कि 1-2 मार्च को भी प्रियंका गाँधी असम में बैठकें कर चुकी थीं। 2 मार्च को तेजपुर पहुँच उन्होंने राज्य की जनता को 200 यूनिट मुफ्त बिजली देना का वादा किया था।
उन्होंने ये भी कहा था कि इस कदम से जनता के 1400 रुपए बचेंगे। प्रियंका ने कहा कि यदि उनकी सरकार आई तो राज्य में सीएए लागू नहीं होने दिया जाएगा और कम से कम 5 लाख सरकारी नौकरियाँ निकाली जाएँगी।
राज्य की महिलाओं को रिझाने के लिए प्रियंका गाँधी ने 2000 रुपए हर महीने गृहणियों को भी देने का ऐलान किया। वहीं चाय के बागान में काम करने वालों के लिए ऐलान किया कि उन्हें 365 रुपए वेतन दिया जाएगा।
इन वादों के अलावा प्रियंका गाँधी ने अपनी छाप छोड़ने के लिए चाय काे बागान में मजदूरों के साथ टोकरी माथे पर लगाकार चाय की पत्तियाँ भी तोड़ीं। सोशल मीडिया पर उनकी ये तस्वीरें बहुत वायरल हुईं।
लेकिन, बाद में रॉबर्ट वाड्रा के कोविड पॉजिटिव पाए जाने के बाद 3 अप्रैल को प्रियंका गाँधी ने ऐलान कर दिया कि स्थिति के मद्देनजर असम, तमिलनाडु और केरल में अपनी रैलियाँ कैंसिल कर रही हैं।
उन्होंने अपने पति के कोविड पॉजिटिव होने की जानकारी देते हुए सबसे माफी माँगी और अपने पार्टी प्रत्याशियों को शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि उन्हें उम्मीद है कि सभी प्रत्याशी राज्य में अच्छा प्रदर्शन करेंगे और कॉन्ग्रेस विजयी होगी।
असम चुनाव
उल्लेखनीय है कि असम की 126 विधानसभा सीटों पर तीन चरणों में 82.04 फीसद वोट किए गए। कॉन्ग्रेस ने जहाँ नए-नए वादों पर इन चुनावों को लड़ा। वहीं भाजपा ने अपने कामों को गिना कर वोट माँगे। बता दें कि बीजेपी इस बार असम गण परिषद, UPPL, GSP के साथ गठबंधन में है, जबकि कॉन्ग्रेस के साथ AIUDF, BPF, CPI (M), CPI, CPI (ML) जैसी पार्टियाँ हैं।
कोरोना संक्रमित समाजवादी पार्टी सांसद आजम खान ने इलाज के लिए लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) जाने से इनकार कर दिया। सीतपुर जेल में बंद आजम खान और उनके बेटे अब्दुल्ला को शुक्रवार (29 अप्रैल) को कोरोना पॉजिटिव पाया गया था, जिसके बाद उन्हें जेल के अंदर ही एक अलग बैरक में आइसोलेट कर दिया गया था।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिला कारागार में बंद कोरोना संक्रमित पाए गए अखिलेश सरकार के पूर्व मंत्री आजम खान को इलाज के लिए जब लखनऊ के केजीएमयू ले जाने के लिए पुलिस अधिकारियों के साथ एंबुलेंस जेल के गेट पर पहुंची थी लेकिन आजम खान ने जाने से साफ इनकार कर दिया।
कोरोना संक्रमित आजम खान ने लखनऊ जाने से किया इनकार
रविवार रात को कोरोना संक्रमित आजम खान को बेहतर इलाज के लिए लखनऊ के मेडिकल कॉलेज में शिफ्ट किया जाना था। इसके लिए रात करीब 9 बजे जेल के मुख्य गेट पर एंबुलेंस सहित उनकी सुरक्षा में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया था।
लेकिन रात करीब 1 बजे आजम खान ने अपनी तबीयत में सुधार बताते हुए लखनऊ जाने से मना कर दिया। इसके बाद जेल के बाहर खड़ी एंबुलेंस पुलिस बल समेत वापस लौट गई।
आजम खान को बेहतर इलाज के लिए लखनऊ ले जाने के वास्ते पुलिस अधिकारी उन्हें काफी देर तक समझाते रहे। लेकिन आखिरकार आजम खान ने सड़क के रास्ते लखनऊ जाने से इनकार कर दिया।
इसके बाद आजम खान को सीतापुर जेल में ही आइसोलेशन में दोबारा रखा गया। सपा सांसद ने लिखित में दिया कि वह ठीक हैं और अस्पताल में नहीं भर्ती होना चाहते हैं।
आजम खान को पिछले साल फरवरी में जेल भेजा गया था। उनके साथ उनका बेटा अब्दुल्ला आजम भी जेल में बंद है। दरअसल, 27 फरवरी 2020 को सांसद को उसके परिवार (पत्नी और बेटे) के साथ सीतापुर की जेल में शिफ्ट किया गया था।
बीते दिनों आजम की पत्नी व रामपुर सदर सीट से विधायक तंजीन फातिमा को जमानत मिल गई थी। वहीं, 80 से अधिक मुकदमों में दोषी पाए गए आजम और उसके बेटे को जमानत नहीं मिल पाई है।
कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर के बीच 5 राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों के लिए मतगणना शुरू हो गई है। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरी और असम में आज (मई 2, 2021) शाम तक फैसला हो जाएगा कि किसकी सरकार सत्ता में आएगी और किसे शिकस्त का मुँह देखना पड़ेगा।
शुरुआती रुझानों से हालाँकि कुछ भी कहना सही नहीं है। लेकिन इनसे एक तस्वीर साफ हो जाती है कि किस राज्य में कौन सी पार्टी का पलड़ा भारी है। सुबह 8 बजे से आज वोट की गिनती शुरू हुई है और तबसे आँकड़े लगातार बदल रहे हैं।
पश्चिम बंगाल में अब तक यही रुझान आए हैं कि इस समय भारतीय जनता पार्टी और टीएमसी में कड़ी टक्कर है। खबर लिखने तक बंगाल की 294 विधानसभा सीट में 172 सीटों को लेकर रुझान आ चुके हैं।
भाजपा यहाँ 79 सीटों पर लीड कर रही है वहीं टीएमसी भी 93 सीटों पर आगे है। यहाँ लेफ्ट अभी केवल 2 सीटों पर आगे हैं। रिपब्लिक टीवी के अनुसार सुबह के 9 बजकर 26 बजे तक नंदीग्राम में ममता बनर्जी 1400 वोट से शुभेंदु अधिकारी से पीछे थीं।
बात करें तमिलनाडु की तो 234 में से 172 सीटों पर रुझान आए हैं। ताजा आँकड़े बताते हैं कि यहाँ डीएमके 99 सीटों पर आगे है और AIADMK 72 सीटों पर लीड कर रही है।
असम की 126 विधानसभा सीटों में से 79 सीट को लेकर तस्वीर बताई जा रही है। जानकारी के मुताबिक यहाँ 50 सीट पर एनडीए आगे है जबकि यूपीए 25 सीटों पर लीड कर रही है। अन्य के खाते में 4 सीट आई है।
केरल की 140 में से 140 सीटों के रुझान आ गए हैं। इनमें एलडीएफ 86 और यूडीएफ 50 सीटों पर आगे चल रही है। बीजेपी 1 सीट पर आगे है। पुडुचेरी की 30 विधानसभा सीटों पर हुए चुनावों की मतगणना के शुरुआती रुझान आने लगे हैं। इनमें एनडीए 9 और यूपीए 5 सीटों पर आगे चल रहे हैं।
कोरोना के कहर से परेशान दिल्ली को रविवार तब एक और खबर से झटका लगा जब महरौली स्थित बत्रा अस्पताल में 12 मरीजों की जान चली गई। अस्पताल प्रशासन के मुताबिक, इन सभी मरीजों की मौत अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी की वजह से हुई।
ध्यान देने वाली बात ये है कि बत्रा अस्पताल ने शनिवार सुबह से ही ऑक्सीजन की कमी के बारे में जानकारी देना शुरू कर दिया था, लेकिन अस्पताल में ऑक्सीजन कमी की खबर सामने आने के बाद भी कुछ नहीं किया गया और अंत में 12 मरीजों की जान चली गई।
बत्रा हॉस्पिटल के एक्जिक्युटिव डायरेक्टर ने एक वीडियो जारी किया, जिसे एनडीटीवी ने रविवार दोपहर 1:00 बजे रिपोर्ट किया। इस वीडियो में बत्रा हॉस्पिटल के एक्जिक्युटिव डायरेक्टर ये कहते सुनाई दिए कि उनके यहाँ ऑक्सीजन खत्म हो रहा है और महज कुछ सिलेंडर ही बचे हैं। उन्होंने कहा कि दिल्ली सरकार उनकी मदद करने की कोशिश कर रही थी, लेकिन ऑक्सीजन टैंकर दूर था। उन्होंने कहा कि उनके अस्पताल के पास केवल 10 मिनट का ऑक्सीजन बचा था।
जैसे ही एनडीटीवी ने ट्वीट किया, लगभग उसी समय आप एमएलए राघव चड्ढा ने ट्वीट किया कि अस्पताल में अगले 5 मिनट में ऑक्सीजन पहुँच रहा है। राघव चड्ढा ने दोपहर में 1 बजकर 16 मिनट पर ट्वीट किया था। हालाँकि राघव चड्ढा का यह वादा कि 5 मिनट में ऑक्सीजन अस्पताल पहुँच रहा है केवल झूठा वादा साबित हुआ। अगले दो घंटे में ऑक्सीजन अस्पताल नहीं पहुँचा, इसके बाद खबर आई कि अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी से 12 मरीजों ने दम तोड़ दिया।
Our SOS cryogenic tanker carrying Liquid Medical Oxygen is reaching Batra Hospital within 5 minutes. Their regular supplier of oxygen has defaulted yet again due to alleged ‘lack of oxygen supplies’ and is being pulled up. https://t.co/3olhhKq9iU
जैसे ही मरीजों की मौत की खबर आई, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 12 लोगों की मौत पर राजनीति खेलते हुए तुरंत ही एक ट्वीट किया। उन्होंने दिल्ली को ऑक्सीजन न मुहैया कराने का दोष केंद्र के सिर पर डाल दिया।
ये खबर बहुत ही ज़्यादा पीड़ादायी है। इनकी जान बच सकती थी -समय पर ऑक्सिजन देकर
दिल्ली को उसके कोटे की ऑक्सिजन दी जाए। अपने लोगों की इस तरह होती मौतें अब और नहीं देखी जाती। दिल्ली को 976 टन ऑक्सिजन चाहिए और कल केवल 312 टन ऑक्सिजन दी गयी। इतनी कम ऑक्सिजन में दिल्ली कैसे साँस ले? https://t.co/h7C5bcFtD6
एक तरफ जहाँ ‘आप’ ने सारा दोष मोदी सरकार पर डाल दिया तो वहीं बत्रा हॉस्पिटल के एक डॉक्टर का वीडियो सामने आया जिसमें न्यूज 24 से बातचीत करते हुए उन्होंने मरीजों की मौतों और ऑक्सीजन की कमी के लिए पूरी तरह से अरविंद केजरीवाल सरकार को दोषी बताया।
वीडियो में, डॉक्टर ने खुलासा किया कि शनिवार को सुबह 7 बजे से नोडल अधिकारियों को अस्पताल में ऑक्सीजन के लिए SOS कॉल किए जा रहे थे। जब उनसे पूछा गया कि वह किस सरकारी अधिकारी के बारे में बात कर रहे हैं और अस्पताल दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार या फिर केंद्र सरकार के संपर्क था, तो डॉक्टर ने कहा कि अस्पताल का केंद्र सरकार से कोई संपर्क नहीं है और वे अरविंद केजरीवाल सरकार के अधिकारियों के संपर्क में थे।
डॉक्टर ने कहा कि स्वास्थ्य दिल्ली सरकार का राज्य का विषय है दिल्ली में निजी अस्पतालों का संचालन और नेतृत्व अरविंद केजरीवाल सरकार राज्य स्तर पर करती है न कि केंद्र सरकार। डॉक्टर ने कहा कि कोविड-19 महामारी शुरू हुए 14 महीने हो गए हैं और शुरुआत से ही, यह ज्ञात था कि कोविड-19 के उपचार के लिए ऑक्सीजन की आवश्यकता है।
डॉक्टर ने केजरीवाल सरकार से सवाल किया कि पिछले 14 महीनों में दिल्ली सरकार ने ऑक्सीजन का उत्पादन बढ़ाने की कितनी कोशिश की है। डॉक्टर ने कहा कि जो भी ऑक्सीजन दिल्ली सरकार को उपलब्ध कराई गई थी, यह सुनिश्चित करना उनकी जिम्मेदारी थी कि जिन अस्पतालों को जरूरत है वहाँ ऑक्सीजन को प्रभावी ढंग से पहुँचाया जाए, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।
उन्होंने फिर सरकार से अपील की लड़ना बंद करें और दिल्ली को “आत्मनिर्भर” बनने और उन प्लांट्स का निर्माण करने की जरूरत है, जो दिल्ली के लिए ऑक्सीजन का उत्पादन कर सकें।
बत्रा हॉस्पिटल में ऑक्सीजन की कमी से 12 मरीजों की मौत के मामले में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल समेत दिल्ली सरकार ने जहाँ मोदी सरकार को दोषी ठहराने की पूरी कोशिश की है, वहीं बत्रा अस्पताल के अधिकारी मरीजों की मौत के लिए पूरी तरह दिल्ली सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।
देश भर में कोरोना संक्रमण के कारण हाहाकार मचा है। जिन मरीजों को दवाई की जरूरत है उन्हें दवाई नहीं मिल रही और जिन्हें ऑक्सीजन चाहिए उनके पास ऑक्सीजन का इंतजाम नहीं हो पा रहा। ऐसी विकट स्थिति में गाजियाबाद पुलिस ने समीर उर्फ सलीम नाम के व्यक्ति को कालाबाजारी करते पकड़ा है। इस आदमी के पास से पुलिस को 638 ऑक्सीजन सिलेंडर बरामद हुए।
यूपी पुलिस ने इस संबंध में अपने ट्विटर पर ट्वीट कर बताया। इसमें कहा गया, “गाजियाबाद पुलिस द्वारा 638 ऑक्सीजन सिलेंडर बरामद किए गए और आरोपित समीर उर्फ सलीम की गिरफ्तारी भी हुई जो इसे अत्यधिक कीमतों पर बेच रहा था। हम राज्यभर में जमाखोरों और जालसाजों के विरुद्ध कार्रवाई कर रहे हैं। इन्हें गैंगस्टर व एनएसए के तहत हिरासत में लिया जाएगा।”
A huge haul of 683 oxygen cylinders by @ghaziabadpolice & arrest of accused Samir @ Salim who was selling them at exorbitant price ! We have launched a statewide crackdown against hoarders & black marketeers & they shall be booked under Gangster & NSA. #UPPCares#UPPolicepic.twitter.com/gsIXYvvaG9
वहीं एसपी सिटी प्रथम निपुण अग्रवाल ने मीडिया को जानकारी देते हुए बताया कि तेजी से बढ़ते कोरोना संक्रमण के कारण ऑक्सिजन की माँग बढ़ गई। इस दौरान कुछ लोगों ने ऑक्सिजन की कालाबाजारी शुरू कर दी है। इस पर अंकुश लगाए जाने के मकसद से एसएसपी अमित पाठक के निर्देश पर एक विशेष अभियान चलाया जा रहा है।
इसी कड़ी में पुलिस को सूचना मिली कि थाना लिंक रोड क्षेत्र अंतर्गत साइट 4, बी-30 औद्योगिक क्षेत्र में एक फैक्ट्री है। वहाँ पर भारी मात्रा में कालाबाजारी के लिए छोटे-बड़े ऑक्सीजन सिलेंडर जमा किए जा रहे हैं और यहीं से ऑक्सीजन की कालाबाजारी की जाती है।
सूचना के आधार पर पुलिस ने जब छापेमारी की, तो मौके पर समीर उर्फ सलीम मौजूद मिला। वहीं फैक्ट्री में 638 छोटे-बड़े खाली ऑक्सीजन सिलेंडर भी बरामद हुए। एसपी सिटी ने बताया कि गिरफ्तार किए गए समीर उर्फ सलीम ने पूछताछ में कहा कि वह जय गोपाल इंटरप्राइजेज का कर्मचारी है और अपने मालिक जय गोपाल मेहता के कहने पर छोटा सिलेंडर 10000 रुपए में और बड़ा सिलेंडर 30000 रुपए में बेचता था।
पुलिस के मुताबिक सलीम का मालिक अभी फरार है। उसकी तलाश जारी है। जल्द ही उसे भी गिरफ्तार कर लिया जाएगा और दोनों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है।
बता दें कि इससे पूर्व प्रयागराज से कालाबाजारी करते 3 लोगों को गिरफ्तार किया था। पुलिस ने इनके पास से 5 सिलेंडर बरामद किए थे। इनमें 1 भरा हुआ जबकि 4 सिलेंडर खाली थे। प्रारंभिक पूछताछ में पता चला कि वह लोग 20 से 35 हजार रुपए एक सिलेंडर के लिए लोगों से वसूलते थे।
कल नोएडा में भी दो लोगों को इसी आरोप में पकड़ा गया। ये दोनों स्थिति का फायदा उठाकर मनमानी कीमतों पर सिलेंडर बेच रहे थे। नोएडा पुलिस ने बताया कि इनके कब्जे से चार ऑक्सीजन सिलेंडर के अलावा एक ट्रांसफर लाइन रिफिंग पाइप और चाबी समेत स्पेनर व 780 रुपए मिले हैं।
10 साल के यूपीए कुशासन और मनमोहन सिंह सरकार की ‘पॉलिसी पैरालिसिस’ से उपजी निराशा में डूबे भारतीय मतदाताओं ने नरेंद्र मोदी में तारणहार देखा। यही वजह है कि 2014 के आम चुनावों ने भारतीय राजनीति की दशा और दिशा बदल दी। मोदी लहर के साथ कई चीजें उफनाती हुईं राष्ट्रीय परिदृश्य पर उभर आईं। इनमें से एक प्रशांत किशोर (PK) का नाम भी था। ज्यादातर जींस-टीशर्ट में नजर आने वाला यह शख्स उनके चुनावी कैंपेन से जुड़ा था।
आम चुनावों के कुछ महीनों बाद ही यह स्पष्ट हो गया कि प्रशांत किशोर किसी वैचारिक या राजनीतिक प्रतिबद्धता की वजह से मोदी के कैंपेन से नहीं जुड़े थे। न ही वे उन ‘मल्टीनेशनल युवाओं’ जैसे थे जो अन्ना हजारे की आभा में कैद हो भारत बदलने के सपने लिए राजनीति से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर जुड़े और बाद में अरविंद केजरीवाल नाम का उत्पाद पाकर खुद को छला हुआ महसूस करते हुए गहरे अवसाद में चले गए।
असल में वह तकनीक और आने वाले वक्त को देखने की मोदी की दृष्टि थी, जिसने प्रशांत किशोर को उनके साथ जुड़कर काम करने का मौका दिया। इस मौके से पीके के बॉयोडाटा में मोदी के नाम और चेहरे से पैदा हुई सफलता बेचने के लिए जुड़ गई थी। इसे उन्होंने बेचा, जो कि किसी भी पेशेवर को करना चाहिए।
नरेंद्र मोदी के साथ प्रशांत किशोर (साभार: आउटलुक)
फिर आया 2015 का बिहार विधानसभा चुनाव। मूल रूप से बिहार के ही बक्सर के रहने वाले प्रशांत किशोर अब नीतीश कुमार की जदयू (JDU) के लिए चुनावी रणनीति तैयार कर रहे थे। उस समय नीतीश की राहें बीजेपी (BJP) से अलग हो चुकी थी और जंगलराज के सरपरस्त लालू यादव की राजद (RJD) उनकी हमसफर थी। ऐसे गठबंधन के चुनावी कैंपेन से पीके के जुड़ने से यह भी स्पष्ट हो गया कि उनके लिए न केवल विचारधारा महत्वहीन है, बल्कि आम आदमी की सुरक्षा भी मायने नहीं रखती। उनके लिए करियर, आर्थिक हित ज्यादा जरूरी हैं।
इस समय एक और बदलाव उनमें आया, जिसकी चर्चा न के बराबर हुई। उस समय प्रशांत किशोर पटना में अक्सर जींस-टीशर्ट की जगह सफेद कुर्ता-पायजामा में दिखने लगे। यह संकेत था कि चुनावी रणनीतियों को तैयार करने वाले इस आदमी की अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ भी हैं।
बाद के समय में प्रशांत किशोर ने उत्तर प्रदेश और पंजाब में कॉन्ग्रेस, दिल्ली में आम आदमी पार्टी (AAP) आंध प्रदेश में जगनमोहन रेड्डी वगैरह को भी अपनी सेवा दी। कुछ सफलताएँ मिली, कुछ असफलताएँ। इस दौरान उनका पहनावा कई बार बदला। वे कुछ समय के लिए बतौर जदयू उपाध्यक्ष सक्रिय तौर पर राजनीति की पिच पर भी उतरे।
उनकी इस यात्रा से लोगों को भी यह समझ आने लगा कि प्रशांत किशोर की कथित रणनीतियों का जलवा तभी चलता है, जब उन्हें किसी ऐसे शख्स का कैपेंन करना हो जिसके लिए जनता पहले से ही अपना मूड बना चुकी होती है। यदि उन्हें कोई बुरा ‘प्रोडक्ट’ सौंप दिया जाए तो उनकी रणनीति उसे जनता के बीच बेच नहीं पाती है।
बतौर जदयू उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर का करियर संक्षिप्त और विवादित रहा (साभार: द स्टेट्समैन)
अपने हुनर पर उठते सवालों के बीच ही प्रशांत किशोर पश्चिम बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस के साथ जुड़े थे। आज (2 मई 2021) यदि इस रिपोर्ट को आप पढ़ रहे हैं तो इसका सीधा सा मतलब है कि आपकी नजरें पश्चिम बंगाल के जनादेश पर टिकी हैं। बंगाल का यह असाइनमेंट प्रशांत किशोर के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। इतना कि बीते साल जब कोरोना संक्रमण की वजह से जब पूरे देश में लॉकडाउन लगा था, प्रशांत किशोर कार्गो विमान से कोलकाता चले गए थे।
बाद के समय में वे तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) में मची भगदड़ को लेकर चर्चा में रहे। पार्टी को छोड़कर गए ज्यादातर नेताओं ने उनकी कार्यशैली पर सवाल उठाए। बावजूद वे कभी राष्ट्रीय सुर्खियों में नहीं रहे।
बंगाल चुनाव को लेकर पहली राष्ट्रीय सुर्खी उन्हें अपने एक ट्वीट से नसीब हुई। 21 दिसंबर 2020 को किए गए इस ट्वीट में उन्होंने दावा किया कि बंगाल में बीजेपी की सीट डबल डिजिट में होंगी। ट्रिपल डिजिट में सीटें आने पर उन्होंने इस काम से तौबा करने की बात कही। उनका दावा हवा-हवाई न लगे, इसके लिए उन्होंने इस ट्वीट को सहेजकर रखने की चुनौती भी दे डाली।
जब यह ट्वीट आया था तब बंगाल के चुनावी तारीखों का ऐलान नहीं हुआ था। लेकिन, इसने उन्हें टीएमसी के भीतर खुद पर उठते सवालों से छुटकारा पाने का मौका जरूर दे दिया। इससे उन्होंने यह भी निश्चित कर लिया कि किसी भी परिस्थिति में तृणमूल उनकी छुट्टी न करें, क्योंकि ऐसा होने पर यह संदेश जाता कि प्रशांत किशोर और उनके दावे पर खुद ममता बनर्जी को भी भरोसा नहीं है। जब चुनाव कुछ ही महीने दूर हो तो राजनेता इस तरह के नाकारात्मक संदेश देने वाले कदम उठाने से अमूमन बचने की ही जुगत भिड़ाते रहते हैं। राजनीतिक दुकानों में काम करते-करते यह बात प्रशांत किशोर भी भली-भाँति समझते होंगे। सो, पहली नजर में उनका यह ट्वीट सोच-समझकर उठाया गया कदम था।
फिर आया 10 अप्रैल 2021, एक बार फिर प्रशांत किशोर राष्ट्रीय सुर्खियों में थे। इस बार वजह बनी कुछ पत्रकारों के साथ ‘क्लबहाउस‘ पर हुई उनकी बातचीत के लीक अंश। इसमें प्रशांत किशोर बंगाल में मोदी की लोकप्रियता, मटुआ-दलित मतदाताओं के बीजेपी के प्रति झुकाव और मुस्लिम तुष्टिकरण से उपजे हिंदू ध्रुवीकरण का बीजेपी को मिल रहे फायदे को लेकर बात करते सुने गए। इन बातों का लब्बोलुआब यह था कि भाजपा बंगाल के चुनावी मैदान में भारी पड़ रही है। ध्यान देने की बात यह है कि प्रशांत किशोर की ये बातें जब सार्वजनिक पटल पर सामने आईं थी, तब तक बंगाल में केवल चार चरण के चुनाव हुए थे। चार चरण शेष थे।
हालाँकि इसको लेकर प्रशांत किशोर का कहना था कि उनकी बातों को गलत तरीके से पेश किया गया। लेकिन यह भी सच है कि इसके बाद के साक्षात्कारों में वे यह कोशिश करते भी दिखे कि बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस की संभावित हार की छाया उनके बॉयोडाटा पर न पड़े।
ऐसे ही एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि राजनीतिक दल अपनी आंतरिक मजबूती, नेतृत्व और अपने द्वारा किए और न किए गए कार्यों के कारण हारती तथा जीतती हैं। उनके जैसे लोग सिर्फ हार या जीत के अंतर पर फर्क डालने के लिए होते हैं। यह पूछे जाने पर कि क्या वो किसी हारती हुई लड़ाई को जीत में बदल सकते हैं, प्रशांत किशोर का जवाब था- एकदम नहीं।
यह सच है कि चुनावी रणनीतिकार कोई जादूगर नहीं होता। प्रशांत किशोर ने सच ही कहा है कि उनके जैसे लोग केवल अंतर में फर्क डाल सकते हैं। लेकिन 21 दिसंबर 2020 को खुद को इतना महत्वपूर्ण साबित करने पर जुटा शख्स, अप्रैल के साक्षात्कारों में इस तरह की बातें करने लगे तो संदेह तो उठते ही हैं। लेकिन, अब तक की हर बातचीत में उन्होंने यह कहा है कि वे 21 दिसंबर के अपने ट्वीट पर आज भी कायम हैं।
‘खाट पर चर्चा ‘ जैसे तमाशों से भी यूपी में 2016 में कॉन्ग्रेसी प्रोडक्ट नहीं बेच पाए थे पीके (साभार: इंडियन एक्सप्रेस)
यह भी दिलचस्प है कि हाल के साक्षात्कारों में प्रशांत किशोर उसी तरह जींस-टीशर्ट में नजर आए हैं, जैसे वे 2014 में राष्ट्रीय पटल पर मोदी के उदय के वक्त दिखते थे। आगे उनका पहनावा कैसा होगा? यह तय होने में कुछ ही घंटे बचे हैं। नया करियर या पुराना धंधा ही नए दरवाजे से?
जो भी हो उम्मीद की जानी चाहिए कि इतनी राजनीतिक दुकान घुमने के बावजूद प्रशांत किशोर ने नेताओं से अपने कहे से ही पलट जाने का हुनर नहीं सीखा होगा। वैसे भी यह हुनर नेताओं के लिए ही सही है, जिन्हें लोकतंत्र में हर पाँच साल पर परीक्षा देनी होती है। पेशेवरों को गलाकाट प्रतिस्पर्धा के इस दौर में हर सेकेंड एक इम्तिहान से गुजरना होता है। वायरस के साए में हुए चुनावों के नतीजे वाले दिन प्रशांत किशोर उसी इम्तिहान से गुजर रहे होंगे। टीवी स्क्रीन पर सीटों के बदलते नंबर के साथ ही उनका रक्तचाप भी उतराता रहेगा। दो मई का यह दिन जैसे-जैसे ढलेगा, प्रशांत किशोर का भविष्य लिखता जाएगा।
कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर के बीच साल 2021 में 1 माह के भीतर 5 राज्यों में विधानसभा चुनावों के लिए मतदान करवाए गए। इनमें से केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी में 1 चरण में मतदान पूरे हुए, जबकि असम के लिए 3 चरणों में वोट डाले गए और बंगाल में 8 चरणों में मतदान प्रक्रिया संपन्न हुई। अब कल यानी 2 मई को सभी राज्यों के नतीजे आने वाले हैं।
EXIT POLL क्या कहता है?
29 अप्रैल 2021 को बंगाल में आखिरी चरण की वोटिंग के बाद कई मीडिया चैनल्स पर अलग-अलग एग्जिट पोल दिखाए गए। अपने-अपने अनुमान के मुताबिक सबने 5 राज्यों में हुए चुनावों के नतीजों की तस्वीर बताई। बंगाल को लेकर अधिकांश एग्जिट पोल्स ने कहा कि बंगाल में टीएमसी और बीजेपी के बीच कड़ी टक्कर है। असम और पुडुचेरी में बीजेपी का बोलाबाला बताया गया। वहीं केरल में लेफ्ट की सरकार दोबारा बनती दिखाई गई है और तमिलनाडु में डीएमके को सत्ता में आता दिखाया गया।
पश्चिम बंगाल:
बंगाल की 294 विधानसभा सीट पर 8 चरणों में मतदान संपन्न कराए गए। ये चरण क्रमश: 27 मार्च, 1 अप्रैल, 6 अप्रैल, 10 अप्रैल, 17 अप्रैल, 22 अप्रैल, 26 अप्रैल, 29 अप्रैल कराए गए।
वर्तमान में बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) सत्ता में है। ममता बनर्जी के नेतृत्व में पार्टी 2011 से राज्य की कुर्सी पर है। 2011 में टीएमसी ने कॉन्ग्रेस के साथ चुनाव लड़ा और अकेले 184 सीट पाईं। इसके बाद 2016 में 211 सीटें टीएमसी के खाते में आईं।
हालाँकि, इस बार बंगाल की बयार अलग है। कुछ एग्जिट पोल्स में ममता सरकार को जीतते दिखा रहे हैं। लेकिन ज्यादातर का कहना यही है कि या तो भाजपा सभी रिकॉर्ड तोड़ सत्ता में आएगी वरना टीएमसी को कड़ी टक्कर देगी।
असम:
असम की 126 विधानसभा सीटों पर 3 चरणों में चुनाव हुए। पहले चरण के लिए मतदान 27 मार्च को हुआ। वहीं दूसरे तीसरे चरण के लिए मतदान 1 अप्रैल और 6 अप्रैल को हुआ।
राज्य में इस समय बीजेपी के गठबंधन वाली एनडीए सरकार है। भाजपा नेता सर्बानंद सोनोवाल के नेतृत्व में यहाँ एनडीए ने 2016 में सरकार बनाई थी। उससे पहले राज्य में लगातार 3 बार विधानसभा चुनाव में जीत के बाद कॉन्ग्रेस नेता तरुण गोगोई सीएम की कुर्सी पर थे।
एग्जिट पोल कहते हैं कि राज्य में लगातार दूसरी बार भाजपा लौटने वाली है। संभव है यहाँ भाजपा अधिकतम 85 सीट भी मिलें। वहीं कॉन्ग्रेस गठबंधन 65 के आसपास सीटें पा सकता है।
तमिलनाडु:
तमिलनाडु में इस बार 234 विधानसभा सीट के लिए 6 अप्रैल 2021 को एक चरण में मतदान हुआ।
यहाँ पिछले एक दशक से लगातार ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK) सत्ता में है। वर्तमान में पार्टी के मुख्यमंत्री के पलानिस्वामी हैं।
हालाँकि, एग्जिट पोल कहते हैं कि इस बार राज्य में डीएमके-कॉन्ग्रेस की सरकार आएगी। वहीं AIADMK को इस बार सत्ता से हाथ धोना पड़ेगा। DMK गठबंधन को इंडिया टुडे के एकिसस माय सर्वे में 175-195 सीटें मिलती दिखाई गई हैं। वहीं AIADMK को 38-54 सीट।
केरल:
वामपंथ का गढ़ माने जाने वाले केरल की 140 विधानसभा सीटों पर 6 अप्रैल को 1 चरण में मतदान हुआ था। पिनराई विजयन की अगुवाई में कन्युनिस्ट पार्टी ने यहाँ 2016 में सरकार बनाई थी। उससे पहले कॉन्ग्रेस ने भी यहाँ 2011-2016 का समय बिताया।
एक्जिट पोल बताते हैं कि इस बार केरल में CPI (M) के नेतृत्व वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) की सरकार बनेगी। पोल में एलडीएफ को पूर्ण बहुमत मिलता दर्शाया गया है। वहीं यूडीएफ के 50-60 सीटों पर सिमटने का अनुमान लगाया गया है।
पुडुचेरी:
30 विधानसभा सीटों वाले केंद्र शासित प्रदेश में केरल और तमिलनाडु की तरह 6 अप्रैल को 1 चरण में चुनाव पूरे हुए। 22 फरवरी से पहले वहाँ कॉन्ग्रेस सरकार थी। लेकिन सियासी उथल पुथल में सत्ता कॉन्ग्रेस के हाथ से चली गई। अभी इस समय वहाँ राष्ट्रपति शासन लगा हुआ है।
कल निर्धारित होगा कि कौन सी सरकार पुडुचेरी में सत्ता पर आएगी। एग्जिट पोल्स में तो यहाँ भाजपा की सरकार बनते दिखाया जा रहा है। रिपब्लिक सीएनएक्स का अनुमान है कि भाजपा यहाँ 19-23 सीटें भी पा सकती है जबकि कॉन्ग्रेस को 6-10 सीट हाथ लग सकती हैं। ये आँकड़े हर पोल पर अलग-अलग हैं।
जीत के बाद नहीं है जुलूस निकालने की अनुमति
गौरतलब है कि कोरोना महामारी के बढ़ते प्रकोप के बीच कल (2 मई) मतगणना के बाद नतीजे घोषित किए जाएँगे। ऐसे में चुनाव आयोग ने स्थिति को देखते हुए कुछ दिन पहले निर्णय लिया था कि कहीं भी किसी भी प्रकार का कोई जीत का जुलूस नहीं निकाला जाएगा। केवल दो लोग अपनी जीत का सर्टिफिकेट लेने जा पाएँगे।
आयोग के इस फैसले से पहले मद्रास हाईकोर्ट ने कहा था कि यदि आयोग 2 मई को होने वाले मतगणना के दौरान कोरोना के दिशा-निर्देशों का पालन कराने की योजना का खाका नहीं पेश कर पाया तो वह इस पर रोक लगा देंगे।
देश भर में कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर ने कोहराम मचाया हुआ है। वैक्सीन आने के बावजूद देश में 32 लाख से ज्यादा एक्टिव केस हैं। सरकारें अपनी-अपनी तरफ से हर प्रकार की सख्ती बरतने का प्रयास कर रही हैं। लेकिन कुछ राज्य ऐसे हैं जहाँ कोई सुधार आना तो दूर हालात और बिगड़ते जा रहे हैं।
महाराष्ट्र, केरल, कर्नाटक, दिल्ली, उत्तर प्रदेश इस समय संक्रमित केसों की सूची में टॉप 5 नाम हैं। एक ओर महाराष्ट्र की स्थिति में जहाँ पिछले साल से अब तक कोई सुधार दिखा ही नहीं, वहीं केरल का वह मॉडल भी विफल होता दिख रहा है, जिससे सीखने की सलाह हर राज्य को दी जा रही थी। दिल्ली के सीएम ने तो स्थिति देखते हुए प्रदेश में 1 हफ्ते का लॉकडाउन बढ़ाया है। वहीं यूपी में आज से वैक्सीन की प्रक्रिया चालू कर दी गई है ताकि बढ़ते केसों को रोका जा सके।
इन पाँचों राज्य के आँकड़े क्या कहते हैं आइए जानें:
कोरोना संक्रमितों की सबसे ज्यादा तादाद महाराष्ट्र में है। वहाँ आज भी बीते 24 घंटे में 63, 282 नए मामले सामने आए हैं, वहीं अकेले महाराष्ट्र में 802 मरीजों की कोरोना से मौत हुई है। 30 अप्रैल तक के डेटा के मुताबिक महाराष्ट्र में कुल संक्रमित की गिनती 46 लाख से ऊपर जा चुकी है। वहीं मौत का आँकड़ा 68813 हो गया है।
सबसे ज्यादा संक्रमित केसों की सूची में दूसरा नाम केरल का है। केरल में कुल संक्रमितों की गिनती कल तक 15,71184 थी। लेकिन 24 घंटे में यहाँ से 35, 493 नए मामले आए हैं। राज्य में कुल मृतकों की संख्या भी 5, 356 है।
कर्नाटक कुल संक्रमितों (15,64,132 ) की संख्या में फिलहाल केरल से नीचे हैं। लेकिन हाल में आए आँकड़ों ने सबको हैरान कर दिया है। वहाँ पिछले 24 घंटे में 40 हजार 990 मामले दर्ज किए गए हैं। इस दौरान मौतें भी 271 हुई। फिलहाल राज्य में 4 लाख से अधिक सक्रिय केस हैं।
उत्तर प्रदेश में भी कोरोना ने अपना हाहाकार मचाया हुआ है। पिछले 1 दिन में वहाँ से 30317 हजार नए मामले आए हैं और 38826 लोग डिस्चार्ज होकर घर भी भेजे गए।
संक्रमण की रफ्तार दिल्ली में भी कुछ कम नहीं हुई है। यहाँ 24 घंटे में एक बार दोबारा 27 हजार मामले दर्ज किए गए हैं। इस दौरान 375 लोगों की मौत भी हुई। दिल्ली सीएम ने हालातों को देखते हुए आज एक हफ्ते का लॉकडाउन और बढ़ा दिया है। वहीं वैक्सीन के लिए कुछ समय इंतजार करने को कहा है।
भारत में कोरोना वायरस का संक्रमण लगातार बढ़ता जा रहा है। कई राज्यों में यह संक्रमण गंभीर होता जा रहा है। स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ गया है और चिकित्सा सुविधाओं में भी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। इस बीच भारत ने दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण कार्यक्रम शुरू किया है। कई चरणों में शुरू हुए इस टीकाकरण कार्यक्रम में विभिन्न स्तरों पर लोगों को टीका लगाया गया। अभी तक 45 वर्ष से अधिक आयु के लोगों को कोरोना वायरस संक्रमण का टीका लगाया जा रहा था लेकिन 1 मई 2021 से 18 वर्ष से अधिक आयु के सभी वयस्कों के लिए टीकाकरण कार्यक्रम को चालू कर दिया गया।
इन सब के बीच उन लोगों पर भी ध्यान दिए जाने की जरूरत है जिन्होंने संक्रमण की इस गंभीर समस्या में भी अपना प्रोपेगंडा चलाए रखा। इनमें नेता, पत्रकार और कई अन्य ऐसे प्रतिनिधि शामिल हैं जिन्हें बड़ी संख्या में लोग फॉलो करते हैं। इन्होंने वैक्सीन को लेकर लोगों में डर फैलाया, उन्हें गुमराह किया, वैक्सीन की दक्षता पर प्रश्न खड़े किए और जब टीकाकरण शुरू हुआ तो इन लोगों ने वैक्सीन का डोज लिया और फ्री में वैक्सीन उपलब्ध कराने की माँग करने लगे। ट्विटर यूजर @moronhumor के ट्विटर थ्रेड में इन प्रोपेगंडाबाजों की पूरी जानकारी दी गई है।
इन्होंने तो वैक्सीन की खुराक ली लेकिन पीछे छोड़ दिए कई प्रश्न जो आज भी वैक्सीन को लेकर लोगों के मन में शंका पैदा करते हैं।
समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव ने 3 जनवरी 2021 को कहा था, “यह भाजपा की वैक्सीन है, हम नहीं लेंगे। जब अपनी सरकार आएगी तब अपनी वैक्सीन भी ली जाएगी।“ अखिलेश यादव जो कि मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं, उन्होंने वैक्सीन पर सवाल उठाए और उसे भाजपा की वैक्सीन कहा। बाद में आलोचना होने पर उन्होंने अपने सुर बदले और कहा कि सरकार जल्दी तय करे टीकाकरण की तारीख।
पत्रकार संदीप चौधरी ने 6 जनवरी 2021 को कहा कि जब तक तीसरे चरण का ट्रायल पूरा नहीं होता और वैक्सीन की दक्षता साबित नहीं होती तब तक वह वैक्सीन की खुराक नहीं लेंगे। लेकिन उन्हीं संदीप चौधरी ने 28 अप्रैल 2021 को कहा कि टीका उनका अधिकार है और उन्हें यह मुफ्त में मिलना चाहिए।
[2/n] – Sandeep Chaudhary (News24)
“Main toh (covaxin) nahi lagwaunga, jab tak efficacy prove nahi, phase-3 trial nahi poore honge.. main toh nahi lagwaunga” (Jan 6, 2021) #VaccineNaysayerspic.twitter.com/Vy4l1eeNXZ
कार्टूनिस्ट सतीश आचार्य ने वैक्सीन की सुरक्षा और अन्य मुद्दों पर तंज कसते, मजाक उड़ाते कई कार्टून बनाए। उन्होंने अपने कार्टूनों के माध्यम से वैक्सीन की सुरक्षा और दक्षता पर कटाक्ष किया लेकिन अंततः 18 अप्रैल 2021 को वैक्सीन की पहली खुराक ली।
वैक्सीन पर सतीश आचार्य द्वारा बनाए गए कार्टून सतीश आचार्य की ट्विटर पोस्ट का स्क्रीनशॉट
बजाज ऑटोमोबाइल के मैनेजिंग डायरेक्टर राजीव बजाज ने कहा कि वह वैक्सीन के विरोधी नहीं हैं लेकिन एक नई वैक्सीन पर उनके विचार बीच के हैं अर्थात वो वैक्सीन से उत्पन्न होने वाले खतरे पर नजर रखेंगे। बजाज ने तो कोरोनावायरस के संक्रमण के लक्षणों को भी वैक्सीन पर प्राथमिकता दे दी और उसकी तुलना भारतीय सड़कों से की जहाँ दुर्घटना की दर भी बहुत ज्यादा है।
[4/n] Rajiv Bajaj (MD, Bajaj Autos)
“..between being for or against the vaccine, a middle path – do the risks outweigh the benefits? For someone like me, I believe they do”. (05 Feb 2021) #VaccineNaysayers
छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री टी एस सिंह देव ने 10 जनवरी 2021 को कहा था कि छत्तीसगढ़ में टीकाकरण के लिए कोवैक्सीन के उपयोग को वह समर्थन नहीं देते हैं। उन्होंने कहा कि वैक्सीन की दक्षता और सुरक्षा साबित होने तक वैक्सीन का उपयोग असुरक्षित है।
We do not support the use of #COVAXIN in the vaccination process in Chhattisgarh for one simple reason – It is NOT SAFE to use any vaccine unless it has completed the recommended testing process with absolute authentication and success. (1/3) pic.twitter.com/Y2yN3sS953
कॉन्ग्रेस के रणदीप सुरजेवाला ने वैक्सीन की दक्षता और सुरक्षा पर प्रश्न उठाए। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री, उनके स्वास्थ्य मंत्री, उनके कैबिनेट मंत्री और उनके मुख्यमंत्री पहले क्यों वैक्सीन की खुराक नहीं ले रहे हैं।
जबकि यह सबको पता था कि टीकाकरण का एक प्रोटोकॉल बनाया गया है जिसके तहत पहले फ्रंटलाइन स्वास्थ्य कर्मी, वृद्ध और बीमार लोगों को वैक्सीन लगाई जाएगी। उसके बाद बाकी लोगों के लिए वैक्सीन की खुराक उपलब्ध हो पाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं इस प्रोटोकॉल का पालन किया और अपना नंबर आने पर वैक्सीन की खुराक ली। लेकिन रणदीप सुरजेवाला जैसे लोगों ने अपना प्रोपेगंडा फैला दिया था।
[7/n] Randeep Surjewala (Congress)
There shall be doubts on efficacy and side effects on #COVIDVaccines .. Why isn’t the Prime Minister, his health minister his central ministers and his CMs not getting the vaccines themselves first ?” #VaccineNaysayerspic.twitter.com/yWh3Mm4vlF
कॉन्ग्रेस के ही मनीष तिवारी ने 5 जनवरी 2021 को भाजपा सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा था कि सरकार कुछ राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते 130 करोड़ भारतीयों के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकती। वैक्सीन पर उन्होंने कहा था कि जिस पर लगातार प्रश्न उठ रहे हैं उस वैक्सीन को स्वेच्छा से कौन लगवाएगा।
जहाँ एक ओर भारत के वैज्ञानिक और शोधकर्ता लगातार मेहनत करके एक वैक्सीन बनाते हैं वहाँ शशि थरूर जैसे नेता प्रोपेगंडा के तहत स्वदेशी वैक्सीन पर सवाल उठाते हैं। 3 जनवरी 2021 की अपने ट्वीट में शशि थरूर ने कहा था कि कोवैक्सीन को अप्रूवल देना खतरनाक है। उन्होंने केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन से इस विषय पर स्पष्टीकरण माँगा था।
The Covaxin has not yet had Phase 3 trials. Approval was premature and could be dangerous. @drharshvardhan should please clarify. Its use should be avoided till full trials are over. India can start with the AstraZeneca vaccine in the meantime. https://t.co/H7Gis9UTQb
पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी उन चुनिंदा लोगों में थीं जिन्होंने भारत बायोटेक की कोवैक्सीन पर सीधे-सीधे प्रश्न उठाए थे। चतुर्वेदी ने सीधे तौर पर कहा था कि उन्हें भारत बायोटेक पर कोई भरोसा नहीं है और वह कोवैक्सीन नहीं लेंगी। लेकिन 8 अप्रैल 2021 को इन्हीं पत्रकार महोदया ने मोदी सरकार से वैक्सीन की माँग की।
पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी के ट्वीट का स्क्रीनशॉट चतुर्वेदी ने ट्वीट में कहा कि वह कोवैक्सीन की खुराक नहीं लेंगी
वकील और एक्टिविस्ट प्रशांत भूषण ने तो यहाँ तक कह दिया था कि प्राकृतिक रूप से ही खत्म हो रहे कोरोना वायरस संक्रमण के बाद भी निजी वैक्सीन कंपनियों को 35,000 करोड़ रुपए दिए जा रहे हैं। भूषण ने यह कहा कि यह पैसे निजी कंपनियों को दिए जा सकते हैं लेकिन गरीब मजदूरों और किसानों को नहीं।
प्रशांत भूषण के ट्वीट का स्क्रीनशॉट
एनसीपी नेता नवाब मालिक ने कहा था कि फ्रंटलाइन स्वास्थ्यकर्मियों और पुलिसकर्मियों के लिए टीकाकरण कार्यक्रम शुरू हो गया है लेकिन लोगों के मन में अभी भी शंका है। इसलिए प्रधानमंत्री को आगे आकार पहले वैक्सीन लेनी चाहिए। हालाँकि यह शंका उनकी खुद की थी जिसे उन्होंने लोगों का नाम देकर अपना प्रोपेगंडा चलाया।
नवाब मलिक का बयान
AIMIM के असदुद्दीन ओवैसी ने वैक्सीन पर राजनीति करने वालों और प्रोपेगंडा फैलाने वालों के क्लब में शामिल होने के लिए एक मध्यम मार्ग अपनाया। उन्होंने सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की कोविशील्ड पर प्रश्न उठाए और प्रधानमंत्री से यह प्रश्न किया कि उन्होंने कोवैक्सीन की खुराक क्यों ली? मतलब प्रधानमंत्री पहले टीका न लगवाएं तो समस्या और टीका लगवा लें तो यह समस्या कि दूसरा वाला टीका क्यों नहीं लिया।
असदुद्दीन ओवैसी की मध्यमार्गी राजनीति
कुल मिलाकर यही वो लोग थे जिनके कारण देश में वैक्सीन को लेकर दुष्प्रचार हुआ। कॉन्ग्रेस की मशीनरी ने इस दुष्प्रचार में बड़ा योगदान दिया। ये लोगों के बीच घुले-मिले रहे और चर्चाओं में ही वैक्सीन पर दुष्प्रचार करते रहे। यही कारण है कि आज भी वैक्सीन पर लोगों की राय स्पष्ट नहीं है लेकिन अब जब करोड़ों लोग वैक्सीन की खुराक ले रहे हैं तो लोगों में अपने आप वैक्सीन से जुड़ा हुआ भ्रम दूर हो रहा है और लोग बड़ी सँख्या में स्वयं आगे आकर वैक्सीन की खुराक ले रहे हैं।
ऑल्ट न्यूज़ के सह-संस्थापक प्रतीक सिन्हा ने शनिवार को अपने ट्विटर अकाउंट के माध्यम से साझा किए गए एक नोट में रोहित सरदाना की मौत का जश्न मनाने वाले शरजील उस्मानी का बचाव किया और उसे उचित ठहराया। प्रतीक सिन्हा ने कहा कि उस्मानी की आलोचना करने वाले लोग ‘विशेषाधिकार’ की स्थिति से ऐसा कर रहे थे।
शरजील उस्मानी आजतक के एंकर रोहित सरदाना की मौत की खबर के तुरंत बाद उन्हें ‘Sociopath’ ‘genocide enabler’ और ‘pathological liar’ कहा था।
प्रतीक सिन्हा ने कहा, “उस्मानी पर हमला करने वाले ट्वीट उन्हें तथ्यों पर काउंटर नहीं कर रहे थे बल्कि उसे एक बेहद घटिया मनुष्य बता रहे थे। कुछ यूजर्स ने यह भी दावा किया कि उस्मानी सरदाना की मौत का जश्न मना रहा था। अंग्रेजी की मेरी जितनी समझ है उसके आधार पर उस्मानी, सरदाना की मृत्यु का जश्न नहीं मना रहा था बल्कि वह रोहित सरदाना के कार्य की समीक्षा कर रहा था।“
प्रतीक सिन्हा की ट्विटर पोस्ट
ऑल्ट न्यूज के सह संस्थापक प्रतीक सिन्हा ने रोहित सरदाना पर अपनी रिपोर्टिंग के माध्यम से एक खतरनाक नैरेटिव चलाने का आरोप लगाया। सिन्हा ने सरदाना पर मीडिया ट्रायल का आरोप भी लगाया और सिर्फ इसलिए क्योंकि वो लिबरल एजेंडा के सामने कभी झुके नहीं।
शरजील उस्मानी के घृणा से सने हुए वक्तव्य का बचाव करते हुए प्रतीक सिन्हा ने कहा कि जिन लोगों ने उस्मानी की आलोचना की उन्होंने यह सब विशेषाधिकार की स्थिति से ऐसा किया है।
शरजील उस्मानी शुक्रवार को रोहित सरदाना की मौत का जश्न मनाने वाला एकमात्र व्यक्ति नहीं था। The Print की स्तंभकार ज़ैनाब सिकंदर, टाइम्स ऑफ इंडिया और द इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार और कई इस्लामवादियों ने इस अवसर पर घृणा से भरे बयान दिए। अब हमारे पास उदारवादी बुद्धिजीवियों की एक जमात है जो इस घृणा को सही ठहराती है।