Home Blog Page 3899

कोविड फैसिलिटी, भोजन, दान: देशभर में कोरोना की दूसरी लहर के बीच एक बार फिर मदद को आगे आए मंदिर

देश कोरोना वायरस की दूसरी लहर के साथ संघर्ष कर रहा है। इस बीच देश भर के कई मंदिर इस लड़ाई को लड़ने में सहयोग करने के लिए आगे आए हैं। गुजरात में कोविड-19 के बढ़ते मामलों के बीच वडोदरा के बीएपीएस स्वामीनारायण मंदिर ने यग्नपुरुष सभागुरु को कोविड-19 फैसिलिटी में बदल दिया। 

कोविड-19 केयर सेंटर में 500 बेड, ऑक्सीजन सुविधाओं जैसे तरल ऑक्सीजन टैंक और पाइप्ड ऑक्सीजन लाइन, आईसीयू बेड और वेंटिलेटर उपलब्ध है। यह सुविधा 13 अप्रैल से शुरू हुई है और अब तक इसमें 45 कोविड-19 मरीजों को आगे के इलाज के लिए भर्ती कराया गया है।

BAPS वडोदरा में कोविद -19 फैसिलिटी (साभार: Desh Gujarat on Twitter)

श्री स्वामीनारायण मंदिर के ज्ञान वत्सल स्वामी ने बताया, “हम रोगियों के लिए सभी गैर-चिकित्सा सुविधाएँ प्रदान कर रहे हैं। हमने ऑक्सीजन और वेंटिलेटर की व्यवस्था की है जिसमें ICU कमरों के अलावा पंखे और एयर-कूलर भी शामिल हैं। वर्तमान में, 300 बेड चालू हैं और 200 जल्द ही जोड़े जाएँगे।”

TV9 गुजराती की नवनिर्मित कोविड केयर फैसिलिटी का कवरेज

पुरी का श्री जगन्नाथ मंदिर

पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन ने अपने नीलाचल भक्त निवास को कोविड -19 केयर सेंटर में परिवर्तित करने का निर्णय लिया है। 120 बिस्तरों वाली यह सुविधा कोरोना वायरस से संक्रमित मंदिर से जुड़े अधिकारियों के लिए एक समर्पित केंद्र के रूप में भी काम करेगी।

इसके अलावा, इस लड़ाई में सरकार की सहायता के लिए मंदिर ने मुख्यमंत्री राहत कोष में 1.51 करोड़ रुपए का दान दिया था। मंदिर के पंजीकरण के पत्र में कहा गया, “श्री जगन्नाथ मंदिर, पुरी की प्रबंध समिति के निर्णय के अनुसार, मंदिर प्रशासन की ओर से COVID-19 के लिए मुख्यमंत्री राहत कोष में ₹15,51.00.000 / – (एक करोड़ इक्यावन लाख) की राशि का योगदान दिया है।” जगन्नाथ मंदिर के अलावा उड़ीसा के 62 अन्य छोटे मंदिरों ने मुख्यमंत्री राहत कोष में योगदान दिया है।

पवन धाम अपनी 4 मंजिला इमारत को कोविड सेंटर में बदला

मुंबई के कांदिवली के पवन धाम मंदिर ने एक बार फिर अपनी चार मंजिला इमारत को 100 बेड से सुसज्जित कोविड -19 क्वारंटाइन सेंटर में बदल दिया है। 100 में से, 50 बेड एक ऑक्सीजन कंसंट्रेटर यूनिट, ऑक्सीमीटर, पल्स मीटर, पोर्टेबल बीपी उपकरण, मॉनिटर मशीन से लैस हैं। इसके अतिरिक्त, 10 डॉक्टरों सहित 50 से अधिक चिकित्सा कर्मचारी सुविधा में तैनात हैं।

पवन धाम में निर्मित कोविद -19 फैसिलिटी का इंडिया टीवी का कवरेज

मंदिर के एक प्रबंध समिति के सदस्य संतोष सिंह कहते हैं, “हमने अब तक 50 बिस्तर तैयार किए हैं, हमने डॉक्टरों, चिकित्सा कर्मचारियों की तरह स्वास्थ्य सेवा के लिए एपेक्स अस्पताल के साथ करार किया है। हम ऑक्सीजन के सप्लाई की प्रतीक्षा करते हैं, उससे पहले हम शुरू नहीं कर सकते हैं। कुछ सप्लायर ने आश्वासन दिया गया है, लेकिन देखते हैं कि क्या होता है।” मंदिर को पिछले साल भी एक कोविड सेंटर में परिवर्तित किया गया था, जिसमें 2000 से अधिक मरीजों का इलाज किया गया था।

अन्य मंदिर

हिंदुओं के सबसे पवित्र मंदिरों में से एक काशी विश्वनाथ मंदिर में कोविड-10 मरीजों को खाना खिलाया गया था।

गुजरात के बोटाद जिले में प्रसिद्ध सारंगपुर हनुमान मंदिर ने पिछले साल कोरोना वायरस मरीजों के लिए अपनी धर्मशाला को 100 बिस्तरों वाले अस्पताल में बदल दिया था।

पिछले साल भी, जब महामारी की पहली लहर ने देश को हिला दिया था, कई हिंदू मंदिरों ने दान में करोड़ों रुपए खर्च किए थे, जरूरतमंदों के लिए भोजन और आश्रय प्रदान किया था और संकट के समय राष्ट्र का समर्थन करने के लिए खड़े हुए थे।

खलीफा बनने की चाल में फँस गए इमरान खान, TLP के सामने घुटने टेके: फ्रांस के राजदूत को निकालने पर संसद में होगी वोटिंग

पाकिस्तान में तहरीक-ए-लब्बैक (TLP) के उदय के साथ ही स्थिति दिन पर दिन खराब होती जा रही है। अब वहाँ की सरकार मंगलवार (अप्रैल 20, 2021) को संसद में वोट करा कर इस बात का निर्णय लेगी कि मुल्क से फ्रांस के राजदूत को निकाला जाए या नहीं। फ्रांस के एम्बेसडर को निकाल बाहर करने के लिए कई दिनों से इस्लामी कट्टरवादियों का प्रदर्शन जारी है। ये TLP की 4 माँगों में से एक है।

पाकिस्तान की सरकार ने इस समूह के साथ सोमवार से बातचीत भी शुरू कर दी है। वहाँ के इंटीरियर मिनिस्टर शेख रशीद अहमद ने कहा कि लंबी बातचीत के बाद संसद में प्रस्ताव रखने पर सहमति बनी। इससे पहले इमरान खान को उम्मीद थी कि पैगम्बर मुहम्मद के कार्टून का मुद्दा उठा कर वो मुल्क में अपने विरोधियों को शांत कर देंगे और दुनिया भर में इस्लाम के पैरोकार कहलाएँगे, लेकिन दाँव उलटा पड़ गया।

पिछले एक सप्ताह से पाकिस्तान में दंगे हो रहे हैं। पुलिस अधिकारियों की हत्या हो रही है। उन्हें बंधक बनाया जा रहा है। फ्रांस ने अपने नागरिकों से पाकिस्तान तत्काल छोड़ देने और वहाँ की यात्रा न करने को कहा है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल मैक्रों ने शार्ली हेब्दो के कार्टून का बचाव किया था, जिसका जवाब देकर पाक पीएम ने मसीहा बनने की कोशिश की थी। अब वो खुद के मुल्क में कानून-व्यवस्था संभालने में नाकामयाब रहे हैं।

इमरान खान ने पश्चिमी जगत की आलोचना करते हुए UN के अपने सम्बोधन में पैगंबर मुहम्मद के कार्टून का मुद्दा उठाया था। लेकिन, TLP इस मामले में कूद पड़ा और पैगम्बर मुहम्मद की सेवा करने का दावा करने वाली इस कट्टरवादी इस्लामी संस्था ने फ्रांस से सारे रिश्ते तोड़ने की माँग रख दी। सुरक्षा विशेषज्ञ अमीर राना ने कहा कि इन कट्टरवादी ताकतों को बढ़ावा देने का मतलब है कि उनकी माँगें नियंत्रण से बाहर होती चली जाएँगी शायद इमरान को अब ये समझ आ गया होगा।

अभी तक वो संतुलन बिठाने में असफल रहे हैं। पाकिस्तान का कोई भी नेता, तानाशाह या फिर सैन्य अधिकारी इस्लाम या पैगम्बर मुहम्मद के मुद्दे पर विरोध में कुछ भी बर्दाश्त नहीं कर सकता, कम से कम खुले में। इमरान खान ने पाकिस्तानी समाज की ही कट्टरवादी विचारधारा को आगे बढ़ाया था। लेकिन, फ्रांस के बॉयकॉट ने हिंसा का रूप ले लिया। आपको याद होगा जब सितंबर 2020 में एक पाकिस्तानी ने शार्ली हेब्दो के पेरिस स्थित पूर्व दफ्तर के सामने दो लोगों की हत्या कर दी थी।

इसके कुछ ही दिन पहले इमरान ने UN में इस्लामोफोबिया का मुद्दा उठाया था। बाद में पता चला कि वो आतंकी TLP के नेता खादिम रिजवी से प्रेरित है, जो मर चुका है। नवंबर 2020 में इस समूह ने राजधानी इस्लामाबाद की सड़कों पर जम कर हिंसा की। TLP के साद रिजवी ने सरकार पर वादे से मुकरने का आरोप लगा कर फिर से रैली बुलाई। जब उसकी गिरफ़्तारी हुई और TLP को आतंकी संगठन घोषित कर प्रतिबंधित किया गया, लोग उसके समर्थन में आ गए।

पैगम्बर मुहम्मद और इस्लाम की बातें करने वाले इमरान खान अब कह रहे हैं कि कानून-व्यवस्था से ऊपर कोई नहीं है। मुल्क की मजहबी संगठनों ने TLP को समर्थन दे दिया है। अब इस समूह के खिलाफ इमरान जितनी कार्रवाई करेंगे, उनका ‘इस्लाम का नया खलीफा’ बनने का सपना उतना ही टूटता जाएगा। पाकिस्तान के सम्बन्ध यूरोप सहित अन्य देशों से खराब हो ही रहे हैं, साथ ही देश में भी सिविल वार सा छिड़ गया है।

इमरान खान ने मुल्क की जनता को सम्बोधित करते हुए कहा है कि TLP और पाकिस्तान की सरकार का लक्ष्य एक है, लेकिन तरीके अलग हैं। उन्होंने कहा कि 100 सड़कें जाम करने के कारण कोरोना के मरीजों तक ऑक्सीजन सिलिंडर्स नहीं पहुँच सके, जिससे कइयों की मौत हुई। उन्होंने कहा कि 4 लाख ट्वीट्स में से 70% फेक निकले हैं, जो पाकिस्तान के ‘विदेशी दुश्मनों’ की साजिश है। अपने सैन्य अधिकारियों का नाम लेने से डरने वाले इमरान ने भारत पर दोष मढ़ दिया।

इससे पहले उनके मंत्री कह रहे थे कि TLP को मिटा दिया जाएगा और उसके साथ कोई बातचीत नहीं हो रही, लेकिन अब उसके दबाव में संसद में प्रस्ताव तक लाया जा रहा। सवाल ये है कि 2-3 साल पहले राजनीति में आई TLP इतनी प्रभावशाली कैसे हो गई कि उसने पूरे मुल्क में तबाही फैलाई और पुलिसकर्मियों का अपहरण कर लिए। क्या बरेलवी समुदाय के इस संगठन के उभार के पीछे रावलपिंडी है? लाहौर में 24 घंटों से जो स्थिति है, उससे लगता है कि पुलिस के बदले अब वहाँ पाक सरकार को पैरा-मिलिट्री लगानी पड़ेगी।

‘पूर्ण लॉकडाउन हल नहीं, जान के साथ आजीविका बचाने की भी जरुरत’: SC ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर लगाई रोक

उत्तर प्रदेश के 5 जिलों में कोरोना के मद्देनजर लॉकडाउन लगाने वाले इलाहाबाद कोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने आज (अप्रैल 20, 2021) रोक लगा दी। इस मामले में योगी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हुए अपनी अपील में कहा था कि हाईकोर्ट को ऐसे फैसले लेने का अधिकार नहीं है। 

सुप्रीम कोर्ट में सरकार की तरफ से इस केस को सॉलिस्टर जनरल तुषार मेहता ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया एस ए बोबड़े के समक्ष पेश किया। उन्होंने कहा कि हमने कोरोना कंट्रोल करने के लिए कई कदम उठाए हैं, अभी कुछ और कदम उठाने हैं, लेकिन लॉकडाउन इसका हल नहीं है। लोगों की जान बचाने के साथ गरीबों की आजीविका को भी बचाना है। इसलिए शहरों में पूर्ण लॉकडाउन नहीं हो।

इलाहाबाद कोर्ट ने दिए थे लॉकडाउन के निर्देश

बता दें कि इलाहाबाद कोर्ट ने 19 अप्रैल को यूपी के पाँच शहरों- प्रयागराज, लखनऊ, वाराणसी, कानपुर नगर, और गोरखपुर में 26 अप्रैल तक कड़े प्रतिबंधों के साथ लॉकडाउन लगाने की निर्देश दिए थे। 

इस दौरान हाई कोर्ट की जस्टिस अजीत कुमार और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा की खंडपीठ कोरोना के बढ़े मामलों से खुश नहीं थे। अदालत ने कहा था कि राज्य के मुख्यमंत्री आईसोलेशन में हैं और यह राज्य के लिए कठिन समय है।

अपने आदेश में [PDF], अदालत ने कहा, “हम सरकारी अस्पतालों के हाल देख रहे हैं कि वहाँ आईसीयू में मरीजों को वीआईपी लोगों की सिफारिश पर लिया जा रहा है। यहाँ तक ​​की जीवनरक्षक एंटीवायरल दवा रेमेडिसिविर भी वीआईपी की सिफारिश पर ही दी जाती है। राज्य के मुख्यमंत्री लखनऊ में आईसोलेशन में हैं। ”

अदालत ने आगे ये भी कहा कि चिकित्सा के बुनियादी ढाँचे में विकास की कमी स्पष्ट दिखाई देती है, क्योंकि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्थाएँ चुनौतियों का सामना करने में सक्षम नहीं हैं, और लोग सही दवा के इंतजार में मर रहे हैं। 

अपने आदेश में कोर्ट की तरफ से यूपी के मुख्य सचिव को खुद निगरानी करने के लिए निर्देश दिए थे, जिसे आज रात से लागू करना था। इस दौरान इन शहरों में जरूरी सेवाओं वाली दुकानों को छोड़कर कोई भी दुकान, होटल, ऑफिस और सार्वजनिक स्थल नहीं खुलने की बात कही गई थी। हालाँकि यूपी सरकार ने फैसले को मानने से मना कर दिया और सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

‘सुअर के बच्चे BJP, सुअर के बच्चे CISF’: TMC नेता फिरहाद हाकिम ने समर्थकों को हिंसा के लिए उकसाया, Video वायरल

तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के नेता फिरहाद हाकिम का एक वीडियो सोशल मीडिया में वायरल है। इसमें वह बीजेपी (BJP) और केंद्रीय सुरक्षा बल CISF को ‘सुअर’ बता रहे हैं। यह वीडियो कब का है यह स्पष्ट नहीं है। हाकिम कोलकाता के पूर्व मेयर और ममता बनर्जी की सरकार में मंत्री हैं। 

इस वीडियो को बीजेपी के प्रवक्ता तजिंदर सिंह बग्गा ने भी ट्विटर पर शेयर किया है। इसमें एक रोड शो को संबोधित करते हुए हाकिम को कहते हुए सुना जा सकता है, “भाजपा सुअर का बच्चा है।” आगे धमकी देते हुए कहते हैं, “यदि बीजेपी, सुअर का बच्चा आता है तो पहले उनको मारो। आगे कहते हैं, “कहाँ जाएँगे? उनको पीटो। सुअर के बच्चों को मारो।”

बीजेपी कार्यकर्ताओं के खिलाफ हिंसा के लिए उकसाने के बाद टीएमसी समर्थक हाकिम को बताते हैं कि जब भाजपा के लोग उनके इलाके में आए तो उन्होंने खदेड़ दिया। इसके बाद टीएमसी मंत्री को कहते हुए सुना जा सकता है, “वे सीआईएसएफ, रेल पुलिस को लेकर आए। एक बार चुनाव खत्म होने दो तब हमारी सीआईडी ‘सुअर के बच्चे’ सीआईएसएफ पर कार्रवाई करेगी।”

बता दें कि ये पहली बार नहीं है जब फिरहाद इस प्रकार के कारणों से चर्चा में आए हों। इससे पहले हाकिम ने कोलकाता के मुस्लिम बहुल इलाके को ‘मिनी पाकिस्तान’ कह दिया था और इस साल फरवरी में भी उन्हें मस्जिद में एक राजनीतिक भाषण देते सुना गया था, जबकि मॉडल ऑफ कंडक्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया था, 

“वोट हासिल करने के लिए जाति या सांप्रदायिक भावनाओं के लिए कोई अपील नहीं होगी। मस्जिदों, चर्चों, मंदिरों या अन्य पूजा स्थलों को चुनाव प्रचार के लिए मंच के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।”

इसके अलावा, हाकिम ने सीएए विरोध में भड़के दंगों के दौरान मुस्लिम दंगाइयों को ‘भाई’ कहकर संबोधित किया था। साथ ही ये भी दावा किया था कि इस प्रकार की हरकत भाजपा को राज्य में लेकर आ सकती है।

आपके शहर में कब और कितना कहर बरपाएगा कोरोना, कब दम तोड़ेगी संक्रमण की दूसरी लहर: जानें सब कुछ

IIT कानपुर के एक प्रोफेसर हैं मणिन्द्र अग्रवाल, जिन्हें भारत सरकार पद्मश्री से भी नवाज चुकी है। उन्होंने देश के अलग-अलग इलाकों में कोरोना वायरस की दूसरी लहर के आँकड़ों का अध्ययन करते हुए ग्राफ के माध्यम से बताया है कि किस इलाके में कोरोना का पीक कब आएगा। यानी, संक्रमण की दूसरी लहर कब चरम पर होगी। इसके लिए उन्होंने ग्राफिक्स तकनीक और गणित का सहारा लिया है। लगभग एक दर्जन बड़े पुरस्कारों से सम्मानित अग्रवाल ने अपने अध्ययन के निष्कर्षों को अपने ट्विटर हैंडल से शेयर किया है।

सबसे पहले बात वाराणसी की। मणिन्द्र अग्रवाल के हिसाब से वाराणसी के कर्व अब मुड़ गया है। इस हिसाब से वहाँ कोरोना का पीक टाइम चल रहा है। इसी तरह प्रयागराज में भी कोरोना का पीक आ चुका है।

उत्तर प्रदेश के नोएडा का कर्व एक सप्ताह बाद नीचे आना चालू होगा। इसका अर्थ है कि वहाँ एक हफ्ते बाद कोरोना का उच्चतम स्तर आ सकता है। कानपुर की भी यही स्थिति है। वहाँ भी 1800 मामले के साथ ही कोरोना का पीक एक हफ्ते में बीत जाएगा।

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की बात करें तो यहाँ कोरोना के लिए जो प्रोजेक्ट किया गया था, उससे पहले ही पीक आ सकता है। मणिन्द्र ने अपने अध्ययन में यहाँ अप्रैल महीने के अंत में कोरोना की सबसे बड़ी लहर आने का अनुमान लगाया था, लेकिन वहाँ उससे पहले ही पीक आ रहा है। चेन्नई में भी प्रतिदिन 4500 मामलों के साथ अप्रैल के अंत में कोरोना का उच्चतम स्तर आएगा।

झारखंड की राजधानी राँची में अप्रैल 22 तक कोरोना का पीक आने की आशंका है, जिसके बाद मामले घटने लगेंगे। यहाँ प्रतिदिन 1200 कोरोना केसेज के साथ संक्रमण का उच्चतम स्तर आएगा। छत्तीसगढ़ के कोरबा में अप्रैल के अंतिम हफ्ते में कोरोना का पीक आएगा।

वहीं छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के लोग अभी कोरोना की उच्चतम लहर का सामना कर रहे हैं और इसके बाद उन्हें राहत मिलने की उम्मीद है। इसी तरह नागपुर का पीक भी बीत चुका है और वहाँ कोरोना के मामले घटने की संभावना है।

IIT कानपुर के प्रोफेसर के अध्ययन की मानें तो बिहार की राजधानी पटना में भी अप्रैल 23 तक कोरोना का पीक आने की आशंका है। वहाँ अभी भी कोरोना के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। ठाणे में अप्रैल 16 को कोरोना का पीक आने की आशंका थी, लेकिन इससे पहले ही वहाँ कोरोना के मामले घटने शुरू हो गए हैं।

कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में स्थिति भयावह है और कोरोना के मामले अभी बढ़ते रहेंगे। वहाँ आधा मई बीत जाने के बाद ही राहत मिलने की उम्मीद है। वहीं कोरोना से बेहाल महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में अप्रैल 30 के बाद राहत मिलनी चालू हो जाएगी, क्योंकि केस घटने लगेंगे। मुंबई का कर्व फ़्लैट होना चालू हो गया है।

इस अध्ययन के हिसाब से पुणे में अप्रैल मध्य का महीना बीत जाने के साथ ही कोरोना का पीक आना था, जिसके बाद ग्राफ फ़्लैट होता। लेकिन, वहाँ ग्राफ पहले से ही अनिश्चित ऊपर-नीचे हो रहा है। इस तरह पूरे भारत की बात करें तो अप्रैल महीना ख़त्म होने से लेकर मई मध्य तक ग्राफ फ़्लैट होने लगेगा। साथ ही कोरोना का प्रकोप भी कम होने लगेगा। ध्यान रखिए, ये अध्ययन कम्प्यूटर आधारित मॉडल पर लगाया गया एक अनुमान है।

ये अध्ययन करने वाले प्रोफेसर मणिन्द्र अग्रवाल IIT कानपुर के कम्प्यूटर साइंस एंड टेक्नोलॉजी विभाग में कार्यरत हैं। उन्होंने वहीं से 1986 में बीटेक किया था, जिसके बाद उसी संस्थान से Ph.D की डिग्री ली। मणिन्द्र ने फरवरी में ही आशंका जताई थी कि अगले कुछ हफ़्तों में मामले 5 लाख हो सकते हैं, लेकिन साथ ही कहा था कि ये उतना घातक नहीं होगा। उन्होंने कहा था कि 60% जनसंख्या पहले ही किसी न किसी तरीके से इस वायरस के प्रभाव में आ चुकी है।

बता दें कि इस रिसर्च के बाद प्रोफेसर मणिंद्र अग्रवाल ने कहा कि कुम्भ और चुनावी रैलियों से कोरोना के प्रसार पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उन्होंने बताया कि कुछ मामलों में जरूर बढ़ोतरी होगी, लेकिन कोई ऐसा असर नहीं दिखेगा जिससे देश की स्थिति बिगड़ जाए। साथ ही उन्होंने पूछा कि जो लोग बंगाल, केरल, तमिलनाडु में केस बढ़ने का कारण रैली और सभाओं को बता रहे हैं वो महाराष्ट्र और दिल्ली के लिए क्या कारण बताएँगे? 

प्रोफेसर मणींद्र अग्रवाल का अध्ययन कहता है कि उत्तर प्रदेश में प्रतिदिन 10 हजार संक्रमित मरीजों के औसत से 20 से 25 अप्रैल तक कोरोना वायरस का संक्रमण अपने पीक पर रहने वाला है। इसके बाद से ग्राफ फिर से गिरना शुरू हो सकता है। वायरस का प्रसार सात दिनों तक सर्वाधिक रहेगा और फिर धीरे-धीरे केस की संख्या कम होनी शुरू हो सकती है। फ़िलहाल यूपी में 2,08,523 एक्टिव केस हैं।

प्रदेश में लखनऊ, वाराणसी, प्रयागराज, कानपुर, गोरखपुर, झांसी, गाजियाबाद, मेरठ, लखीमपुर खीरी और जौनपुर में कोरोना संक्रमण के सर्वाधिक मामले हैं। पंजाब में कोरोना वायरस का खतरा चरम पर मँडराता रहा, लेकिन नियंत्रण करने के उपायों के चलते ग्राफ जल्दी गिरा है। चुनावी राज्य पश्चिम बंगाल में कोरोना संक्रमण अभी प्रारंभिक अवस्था में है और 1-5 मई के दौरान चरम पर पहुँचने की संभावना है।

क्या राजनीतिक हिंसा के दंश से बंगाल को मिलेगी मुक्ति, दशकों पुराना है विरोधियों की लाश गिराने का चलन

पश्चिम बंगाल में चुनाव समाप्ति की ओर बढ़ रहे हैं, पर चुनाव में होने वाली हिंसा का अंत निकट नहीं जान पड़ता। पिछले चुनावों से तुलना की जाए तो इस विधानसभा चुनावों में पाँचवें चरण तक चुनावी हिंसा में बहुत कमी आई है। लेकिन हिंसा पूरी तरह से रुकती हुई दिखाई नहीं दे रही। हिंसा रोकने के लिए विभिन्न चरणों के लिए मतदान की योजना और पर्याप्त केंद्रीय सुरक्षा बलों की उपस्थिति का प्रभाव साफ़ दिखाई दे रहा है। पर राजनीतिक दलों की ओर से हिंसा रोकने के लिए किए गए प्रयास पर्याप्त नहीं हैं।

चुनावी हिंसा के इसी क्रम में भाजपा प्रत्याशी प्रिया साहा के प्रचार क़ाफ़िले पर 17 अप्रैल को हमला हुआ। उसके पहले मालदा में भाजपा प्रत्याशी गोपाल चंद्र साहा पर जानलेवा हमला हुआ था, जिसमें भाजपा के अनुसार तृणमूल कॉन्ग्रेस के लोगों ने साहा को गोली मारी थी। ऐसे में इस विधानसभा चुनाव के भी लगभग हर चरण में हिंसा हुई और भाजपा प्रत्याशियों पर हमले होते रहे।

पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा का इतिहास पुराना रहा है। 1970 के दशक में शुरू हुई राजनीतिक हिंसा में 1980 और 1990 के दशक की चुनावी हिंसा जुड़ती गई और राजनीतिक संस्कृति का लगभग अभिन्न अंग बन गई। पुराने अख़बारों के आर्काइव खँगाले जाएँ तो चुनाव के समय और उसके बाद हुई राजनीतिक हिंसा के कहानियों का एक पूरा भंडार मिलेगा। हिंसा के साथ-साथ मतदान सम्बंधित अनियमितता, बूथ जाम करने की संस्कृति और मतदान सूची से लोगों के नाम ग़ायब कर देने की बातें आम थीं।

ऐसा नहीं कि चुनावी राजनीति के ये तत्व केवल पश्चिम बंगाल में ही मिलते थे। पर एक प्रश्न अवश्य उठता है कि 1990 के दशक में शुरू हुए चुनाव सुधारों का व्यापक असर पश्चिम बंगाल की राजनीतिक पर क्यों नहीं पड़ा? ऐसा क्यों हुआ कि चुनावी हिंसा रुकने के बजाए और बढ़ती गई और एक समय ऐसा आया जब लगातार बढ़ती इस हिंसा को राजनीति का एक स्थायी तत्व मान लिया गया? ऐसा क्यों हुआ कि चुनाव से महीनों पूर्व गाँवों तक में बमों का निर्माण होने लगा? क्यों हर चुनाव से पूर्व राजनीतिक दलों के बीच हिंसा बढ़ती गई?

बाक़ी के राज्यों से तुलना की जाए तो पश्चिम बंगाल के राजनीतिक विमर्श में लगातार बढ़ती हिंसा को लेकर कभी बहस ही नहीं हुई। कभी इसे लेकर बुद्धिजीवियों ने आवाज़ नहीं उठाई। कारण शायद यह था कि विचारधारा से वामपंथी ये बुद्धिजीवी दशकों से सत्ता में टिके वाम दलों को किसी असमंजस की स्थिति में नहीं डालना चाहते थे। वैसे इस मुद्दे पर कभी मीडिया में भी बहस नहीं की गई और उसका कारण भी शायद यही था कि अधिकतर पत्रकारों, संपादकों और कॉलम्निस्ट का झुकाव वामपन्थ की ओर था और ये लोग भी विचारधारा पर नैतिकता सम्बंधित प्रश्न उठाए जाने के पक्षधर नहीं थे। ऐसी बातों का असर यह हुआ है कि अब लगभग दो दशकों से राष्ट्रीय मीडिया भी भीषण हिंसा को पश्चिम बंगाल की राजनीति का एक अभिन्न अंग मानने लगा है।

जब वामदल सत्ता में थे तब पंचायत और म्यूनिसिपल चुनावों के दौरान हिंसा आम बात थी। वाम दलों की इस हिंसात्मक राजनीति को तृणमूल कॉन्ग्रेस के रूप में एक काबिल उत्तराधिकारी मिल गया। तृणमूल ने भी अपनी क़ाबिलियत दिखाई और हिंसा की इस राजनीति में कभी गिरावट नहीं आने दी। अधिक पीछे न जाकर यदि पिछले 10-15 वर्षों में देखें तो वामपंथी दलों के समय में 2008 के पंचायत चुनावों के दौरान बरहमपुर में भीषण हिंसा हुई थी, जिसमें डेढ़ दर्जन से अधिक लोग मारे गए थे। वामपंथियों की इस संस्कृति को आगे बढ़ाते हुए 2018 के पंचायत चुनावों में तृणमूल कॉन्ग्रेस ने भी भीषण हिंसा का सहारा लिया जिस पर दल को हाईकोर्ट से भी फटकार मिली थी।

दरअसल, देखा जाए तो वर्तमान चुनावों में दल के विरुद्ध असंतोष का एक कारण 2018 के पंचायत चुनावों में की गई हिंसा भी है। पिछले तीन वर्षों में प्रदेश की राजनीति देखें तो भाजपा के लगभग डेढ़ सौ सदस्यों, समर्थकों और नेताओं की हत्या हो चुकी है। इस मामले में पश्चिम बंगाल का मुक़ाबला केवल केरल ही कर सकता है।

यदि वर्तमान विधानसभा चुनाव को देखें तो प्रत्याशियों पर समय-समय पर होनेवाले हमलों के अलावा नेताओं द्वारा दिए गए वक्तव्य पर भी चुनाव आयोग ने नज़र बनाए रखी। ममता बनर्जी द्वारा केंद्रीय सुरक्षा बलों के घेराव वाला बयान और अल्पसंख्यकों से वोट बँटने न देने की अपील इसी तरह के वक्तव्य थे, जिन पर चुनाव आयोग ने उनके प्रचार पर प्रतिबंध भी लगाया। इसी तरह भाजपा के कुछ प्रत्याशियों के वक्तव्य को लेकर भी चुनाव आयोग सख़्त रहा जो स्वागत योग्य कदम है।

इस बार के चुनाव के सभी चरण यदि बिना और हिंसा के हो जाते हैं तो चुनाव आयोग निश्चित तौर पर बधाई का पात्र होगा। साथ ही नागरिकों के मन में यह आशा भी जगेगी कि पश्चिम बंगाल में शायद आगे एक ऐसी राजनीतिक संस्कृति की शुरुआत हो जिसमें हिंसा के लिए जगह न रहे। लगभग चार दशकों से राजनीतिक हिंसा का दंश झेल रहे पश्चिम बंगाल के लोगों के लिए यह न केवल राहत की बात होगी, बल्कि राजनीतिक कार्यकर्ता और नेता अपनी ऊर्जा सकारात्मक कामों पर खर्च कर सकेंगे।

30 साल का ताहेर 25 साल के लिए चीनी जेल में कैद, ऑस्ट्रेलिया में राह देख रही 26 साल की बीवीः उइगर होने की सजा

साल 2016 में मेह्रे मेज़ेन्सोफ़ (Mehray Mezensof) नाम की ऑस्ट्रेलियाई युवती पहली बार चीन के शिनजियांग गई। उसे मीरजात ताहेर (Mirzat Taher) नाम के उइगर युवक से प्रेम हो गया। कुछ समय बाद दोनों ने शादी कर ली। मेज़ेन्सोफ़ की पैदाइश ऑस्ट्रेलिया में हुई थी। उसके माता-पिता 35 साल पहले ऑस्ट्रेलिया चले गए थे। लिहाजा वह ऑस्ट्रेलिया की स्थायी निवासी थी। उससे शादी के बाद ताहेर भी ऑस्ट्रेलिया की नागरिकता पाने के लिए योग्य था।

एबीसी न्यूज रिपोर्ट के मुताबिक दोनों ने शिनजियांग की राजधानी उरुमकी (Urumqi) में शादी की और कुछ समय बाद यानी 1 अप्रैल 2017 में युवक का ऑस्ट्रेलिया जाने का वीजा लग गया। ये वही समय था जब चीन प्रशासन ने उइगर मुस्लिमों पर अपना अत्याचार शुरू किया था।

12 अप्रैल 2017 की तारीख में इस जोड़े ने मेलबर्न के लिए अपनी फ्लाइट बुक की। लेकिन इससे पहले ये ऑस्ट्रेलिया के लिए निकलते, 10 अप्रैल 2017 को ही पुलिस इनके घर आ गई। पुलिस ने ताहेर से पूछा कि क्या उसने कोई विदेशी यात्रा की है? चूँकि ताहेर एक साल तुर्की रहकर आया था, तो पुलिस ने फौरन उसे अपनी हिरासत में लिया और पूछताछ के लिए साथ ले गई।

डिटेंशन कैंप में ताहेर को भेजा

पूछताछ के बाद ताहेर डिटेंशन कैम्प में भेज दिया गया। 10 माह वहाँ गुजारने के बाद वह 22 मई 2019 को छोड़ा गया। कुछ हफ्ते बाद उसकी मुलाकात अपनी पत्नी से उरुकमी एयरपोर्ट पर हुई। ताहेर ने बताया कि कॉन्सनट्रेशन कैंप में उसका ब्रेनवॉश किया गया। उसे चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के बारे में पढ़ाया गया और उनके कई भाषण याद करवाए गए। इतना ही नहीं, जब उसे रिहा किया गया तब वह कड़ी निगरानी में था।

मेज़ेन्सोफ़ का वीजा एक्सपायर हो रहा था और चीनी प्रशासन ताहेर का पासपोर्ट देने को तैयार नहीं थी। इसी दौरान मेज़ेन्सोफ़ का वीजा एक्सटेंड करने का एप्लीकेशन भी निरस्त कर दिया गया और उसे बिना पति के ऑस्ट्रेलिया लौटना पड़ा। 

मेज़ेन्सोफ़ जब ऑस्ट्रेलिया वापस तब चीन में कोरोना दस्तक दे चुका था। नतीजन वह दोबारा नहीं लौट सकी। लेकिन पति-पत्नी एक-दूसरे से बात करते रहते थे। 19 मई 2020 को अचानक ताहेर ने पत्नी के संदेशों का रिप्लाई देना बंद कर दिया। पूछताछ में पता चला कि पुलिस ने दोबारा उसके पति को उठाकर कैंप में भेज दिया है।

अभी कुछ समय पहले जब ताहेर को ऑस्ट्रेलिया ने स्थायी निवासी का प्रमाण दिया, तब पता चला कि उसे कुछ हफ्ते पहले ही चीनी प्रशासन दोबारा कब्जे में ले चुकी थी। 23 अक्टूबर 2020 को हामी पुलिस ने ताहेर को आतंकी संगठनों के साथ संबंध होने के आरोप में पकड़ा।

ताहेर को चीनी प्रशासन ने दी 25 साल की सजा

साल 2021 के जनवरी में ताहेर के केस पर हामी की कोर्ट ने सुनवाई की और 2 हफ्ते पहले उसे 25 साल जेल की सजा सुना दी गई। मेज़ेन्सोफ़ का कहना है कि उसके पति को इसलिए जेल भेजा गया क्योंकि वह तुर्की में एक साल रहकर लौटा था। उस पर वहाँ की पुलिस अलगाववाद का आरोप लगा रही है। साथ ही ये भी कह रही है वह ऐसी राजनीतिक गतिविधियों में लिप्त था जिनका मकसद अलग देश बनाना था।

महिला अपने पति पर लगे सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहती है कि उसका पति तुर्की सिर्फ छुट्टियों पर गया था, लेकिन वहाँ उसे चीजें पसंद आईं और वह एक साल रुक कर वहाँ काम करने लगा। महिला के मुताबिक चीनी कोर्ट ने न तो उसे या फिर न ही ताहेर के किसी परिवार सदस्य को सजा से जुड़ा कोई दस्तावेज दिया है।

एबीसी के मुताबिक, मामला संज्ञान में आते ही उन्होंने चीनी अधिकारियों से बात करने की कोशिश की, मगर अधिकारियों ने कोई जवाब नहीं दिया। वहीं चीन के ज्यूडिशियल प्रोसेस इन्फॉर्मेशन वेबसाइट पर ताहेर के केस का उल्लेख नहीं है, जबकि 2017 में तुर्की प्रशासन ने बताया था कि ताहेर का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है।

बता दें कि चीन के पास 26 ऐसे संवेदनशील देशों की सूची है जो उनकी रडार पर हमेशा रहते हैं। तुर्की इन्हीं देशों में से एक है। अब 30 साल का ताहेर चीन में 25 साल की सजा के लिए जेल में बंद है जबकि ऑस्ट्रेलिया में उसकी 26 साल की बीवी उसकी राह देख रही है।

काशी की 400 साल पुरानी परंपरा: बाबा मसाननाथ मंदिर में मोक्ष की आकांक्षा में धधकती चिताओं के बीच नृत्य करती हैं नगरवधुएँ

बनारस के बारे में जब भी बात होती है तो शुरुआत इस सारभूत उक्ति से होती है कि यह बना हुआ रस है। एक ऐसा रस जिसके रसास्वादन के लिए काशी के उन तमाम रहस्यों और परम्पराओं से गुजरना होगा जो अपने आप में अनूठी होने के साथ ही सैकड़ों, हजारों से लेकर युगों का इतिहास अपने आँचल में समेटे हुई है। काशी की महाशिवरात्रि, रंगभरी एकादशी, चिता भस्म की होली के बारे में आपने अब तक ठीक-ठाक सुन रखा है। अब एक और बात, एक और ऐसी परंपरा जो अपने आप में अनूठी है वह है मणिकर्णिका घाट महाश्मशान में बाबा मसाननाथ के दर पर नगरवधुओं का नृत्य।

अपने इस जीवन के नारकीय दंश से जन्मों-जन्मों की मुक्ति स्वरुप मोक्ष की कामना लिए देश भर से हर वर्ष चैत्र नवरात्रि की सप्तमी के दिन यहाँ नगरवधुएँ चारो-तरफ धधकती चिताओं के बीच बाबा मसान नाथ के दरबार में नृत्य और संगीत की सुर-लहरियाँ बहाती हैं। जिससे तरंगित हो उठती हैं स्वयं शिव प्रिया माँ गंगा। काशी में महादेव शिव बाबा मसाननाथ के रूप में भी विराजमान हैं, जिन्हें महाश्मशान का देवता कहा जाता है।

मणिकर्णिका घाट पर नगरवधुओं का नृत्य (फाइल फोटो)

प्राचीन काल में कब यह परंपरा शुरू हुई? कैसे महादेव से मोक्ष की कामना के साथ इसे जोड़ा गया उस पर बहुत कम ही पढ़ने-जानने को मिला है? मैं जब तक बनारस में था तो कई बार इस आयोजन में गया लेकिन तब इस पर और जानने का भाव नहीं था पर अब खुद पिछले दो सालों से सोच रहा हूँ कि बनारस जाकर इस आयोजन में शामिल होऊं, शायद वहाँ इत्तेफाकन कोई मिल जाए जो इस आयोजन के पीछे की रहस्य कथा के बारे में विस्तार से बताए लेकिन कोरोना की वजह से इस वर्ष भी अयोजन सांकेतिक होने पर टालना पड़ा।

फिलहाल, जो एक कथा ऐतिहासिक रूप से इस आयोजन से जुड़ती है वह है राजा मानसिंह की, वही अकबर के समकालीन 16वीं शताब्दी में आमेर के राजा मानसिंह, जिन्होंने अपनी बहन जोधा बाई का विवाह अकबर के साथ करके स्वयं उनकी दासता स्वीकार कर दरबारी बन गए थे।

ऐतिहासिक रूप से कहा जाता है 16वीं सदी में, जब काशी प्रवास के दौरान राजा मानसिंह ने बाबा मसाननाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया तो वहाँ की परंपरा के अनुसार पूर्णाहुति के रूप में उनकी इच्छा भजन-कीर्तन, नृत्य-संगीत के कार्यक्रम रखने की हुई। एक तो महाश्मशान और दूसरा मानसिंह के साथ यह अपयश भी जुड़ा था कि उन्होंने मुगलों से डरकर अपनी बहन जोधा बाई को एक यवन अकबर को सौंप दिया था। काशी वासियों के साथ ही उस समय का जो भी कुलीन वर्ग था वह इसे उचित नहीं मानता था।

फिर वही हुआ जब कोई नामचीन कलाकार महाश्मशान मणिकर्णिका पर स्वर लहरियाँ बिखेरने को तैयार न हुआ तो यह जिम्मेदारी संभाली काशी की गणिकाओं ने, वही नगरवधुएँ; यह सब सभ्य नाम है जो आम प्रचलित नाम है वह है ‘वेश्या’- देह, नृत्य और संगीत को आधार बनाकर अपनी आजीविका चलाने वालीं। जब उन्होंने वहाँ आने का निमंत्रण स्वीकार कर लिया तब कहीं जाकर राजा मानसिंह के बचे-खुचे मान सम्मान की लाज बच पाई थी।

कहते हैं कि तय समय पर राजा मानसिंह के आमंत्रण पर तब नगर बधुएँ नाव से बैठकर गंगा की गोद में अठखेलियाँ करते हुए श्मशान घाट पहुँची थी और पहली बार महिलाओं ने मसाननाथ मंदिर में स्वरांजलि के साथ अपनी मुक्ति के लिए पूजा-अर्चना की थी।

मणिकर्णिका घाट पर नगरवधुओं का नृत्य (फाइल फोटो)

कालांतर में यह परंपरा बन गई जो अब लगभग 400 साल से भी अधिक पुरानी है। जिसे पीढ़ी दर पीढ़ी नगरवधुएँ आज भी निभाती आ रही हैं। कहा जाता है, देश भर में जिस भी गणिका ने खुद को इस दलदल में झोंक दिया है वह साल भर इंतजार करती है इस कामना के साथ की बाबा दरबार में नृत्यांजलि अर्पित कर वह इस जीवन में जो भी विकार, संस्कार या नारकीय भोग लिखा था वह उसे या किसी अन्य स्त्री को कभी दोबारा न भोगना पड़े।

कहा जाता है तभी से मणिकर्णिका पर नगरवधुओं के नृत्य की परम्परा शुरू हुई। शिव को समर्पित गणिकाओं की यह भाव पूर्ण नृत्यांजली मोक्ष की कामना से युक्त होती है। जहाँ उन्हें यह एहसास होता है कि देह से परे भी उनका कोई अस्तित्व है जो बेहद भावपूर्ण है। जहाँ न कोई ग्राहक होगा न खरीदार, बस चारो तरफ चिताओं से उठती प्रचंड अग्नि होगी और देह मुक्त हुई वह राख जो जीवन की नश्वरता का पाठ पढ़ा रहा होगा। पहली बार काया से परे उनके अपने अस्तित्व से उनका साक्षात्कार करा रहा होगा।

इस वर्ष चैत्र सप्तमी को कल हुए आयोजन की बात करें तो वह कोरोना की वजह से पिछले साल की तरह प्रतीकात्मक ही था। कार्यक्रम के बारे में मसाननाथ मंदिर के व्यवस्थापक गुलशन कपूर ने ऑपइंडिया को बताया कि चैत्र नवरात्र के सप्तमी तिथि को बाबा के वार्षिक शृंगार समारोह की आखरी निशा होती है। इस दिन बाबा को तांत्रिक रूप में सजाया जाता है और इसी दिन सैंकड़ों वर्षों की परम्परा का निर्वहन करने नगर वधुएँ बाबा मसाननाथ के दरबार में स्वरांजलि लगाने पहुँचती हैं।

मणिकर्णिका घाट पर नगरवधुओं का नृत्य (फाइल फोटो)

सोमवार को भी नगर वधुएँ यहाँ हाज़री लगाने आईं पर इस वर्ष यह आयोजन कोविड गाइडलाइंस के अनुरूप सांकेतिक रूप से ही संपन्न हुआ। नगर वधुओं ने मंदिर में ही नृत्यांजलि पेश की जिसमें किसी बाहरी व्यक्ति को प्रवेश नहीं दिया गया। बहुत ही सीमित संख्या में मंदिर व्यवस्था से जुड़े और आस-पास के लोग ही वहाँ मौजूद रहे।

आपको बता दें कि यहाँ आने वाली कोई भी नगर वधु कभी पैसा नहीं लेती बल्कि स्वयं अपनी मन्नत का चढ़ावा अर्पित करके जाती है। कलकत्ता, बिहार, मऊ, दिल्ली, मुंबई समेत भारत के कई स्थानों से मुक्ति की आकांक्षी, किसी दैवीय प्रेरणा से आभूत होकर वह बरबस यहाँ खींची चली आती हैं।

यह सब लिख देना जितना आसान है, उसे वहाँ जाकर आप अनुभूत करेंगे तो पढ़ पाएँगे उन बेबस सुनी आँखों में घुंघरूओं का वह शोर भी जिसे वह बाबा को अर्पित कर सदा के लिए इस देह दंश से मुक्त हो जाना चाहती हैं। उनसे बातें कर आप देह से ऊपर उठकर उस शाश्वत अस्तित्व से मुलाकात कर पाएँगे जो इस नश्वर शरीर से परे है।

फिलहाल, इस वर्ष तो बीत गया बस यह तिथि याद रहे चैत्र नवरात्र की सप्तमी, इस दिन चुपचाप पहुँच जाइए बनारस के महाश्मशान मणिकर्णिका जहाँ महादेव की कृपा से आपको देहबोध से मुक्ति का एहसास होगा। इससे परे जो है, जो दिन भर कहता है मेरा यह, मेरा वह, पर कभी खुद के बारे में बात नहीं करता, शायद उससे भी आपकी मुलाकात हो जाए!

सुबह का ‘प्रोपेगेंडाबाज’ शाम को ‘पलटी मारे’ तो उसे शेखर गुप्ता कहते हैं: कोरोना वैक्सीन में ‘दाल-भात मूसलचंद’ का क्या काम

अगर कोई व्यक्ति अपनी पूरी मशीनरी के साथ किसी चीज के खिलाफप्रोपेगेंडा फैलाने में लगा हो और कुछ ही दिनों बाद फिर से उसके पक्ष में बातें करने लगे तो ज़रूर दाल में कुछ काला है। शेखर गुप्ता का ‘द प्रिंट’ कोरोना के स्वदेशी टीकों के खिलाफ अफवाहें फैलाने में सबसे अगली पंक्ति में था। अब यही गुप्ता सभी के टीकाकरण का स्वागत कर रहे हैं। साथ ही वो केंद्र सरकार द्वारा ‘भूल सुधारने’ की बातें भी कर रहे हैं।

दरअसल, ये सब कुछ भारत सरकार के एक फैसले के बाद शुरू हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार (अप्रैल 19, 2021) को कई मैराथन बैठकें की, जिसके बाद शाम को खबर आई कि मई 1 से 18 वर्ष की उम्र के लोग कोरोना वैक्सीन ले सकेंगे। इसके बाद इसका क्रेडिट लेने की होड़ मच गई। कॉन्ग्रेस नेताओं ने कहा कि ‘दूरदर्शी’ राहुल गाँधी के कहने पर ऐसा हुआ। TMC नेता कहने लगे कि देश की एकमात्र महिला मुख्यमंत्री की सलाह केंद्र ने सुनी।

ऐसे में मीडिया के गिरोह विशेष का प्रतिनिधित्व करने वाले शेखर गुप्ता कैसे पीछे रहते। उन्होंने एक कहावत शेयर की, “सुबह का भूला अगर शाम को घर लौट आए तो वो भूला नहीं कहलाता।” उन्होंने दावा किया कि पहले ही काफी समय जाया हो चुका है, कई लोग मर चुके हैं और कामकाज के कितने ही दिन बर्बाद हो गए हैं। साथ ही उन्होंने भारत सरकार के आदेश वाली प्रेस रिलीज शेयर की।

असल में भारत सरकार ने पहले ही टीकाकरण को कई चरणों में कराने का फैसला लिया था और इसके तहत सबसे पहले स्वास्थ्यकर्मियों और कोरोना वॉरियर्स को प्राथमिकता दी गई। ये वो समय था, जब भाजपा विरोधी पूरा तंत्र वैक्सीन को लेकर इतनी अफवाहें फ़ैलाने में व्यस्त था कि कई लोग डर से भी इसे नहीं ले रहे थे। स्वाथ्यकर्मियों के बाद बुजुर्गों और फिर 45 वर्ष की उम्र के ऊपर के लोगो को वैक्सीन दी गई।

ध्यान देने वाली बात ये है कि अब तक इन सभी को स्वदेशी वैक्सीन ही दी गई है। अब अंतिम चरण में तो 18 वर्ष के ऊपर के ही व्यस्क बच जाते हैं न? तो फिर वैक्सीन उन्हें मिलनी ही थी। इसमें ‘भूल’ कहाँ हुई? क्या कोरोना वॉरियर्स को पहले वैक्सीन देना भूल थी? क्या वरिष्ठ नागरिकों को प्राथमिकता देना भूल थी? ऐसा तो है नहीं कि गुप्ता जी जैसों को लगता हो कि वैक्सीन की खेप PMO में रखी हुई थी और उसे बस रिलीज करना था।

इसके लिए सरकार को वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों को पैसे देने होते हैं। अब केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कोवैक्सीन और कोविशील्ड बनाने वाली कंपनियों को 4500 करोड़ से भी अधिक रुपए 100% एडवांस पेमेंट के रूप में जारी किए हैं, तब जाकर टीकाकरण के लिए 18 वर्ष के सभी योग्य लोगों के लिए सुलभ हो सकेगा। सरकार टीकाकरण का पूरा खर्च उठा रही है। अब तक जनता से एक पाई भी नहीं लिया गया है।

भारत इस मामले में डायनेमिक मैपिंग मॉडल पर कार्य कर रहा है, जिसके तहत जिन्हें कोरोना से ज्यादा खतरा है उन्हें पहले वैक्सीन दी गई। इसका पहला फेज जनवरी 16, 2021 को ही शुरू कर दिया गया था। पीएम मोदी ने कल की बैठक में भी कहा कि सरकार देश में सभी पात्र लोगों के टीकाकरण के लिए एक वृहद योजना लेकर चल रही है।

क्या आपको पता है कि जब वैक्सीन को लेकर जागरूकता फैलाने की बारी थी, तब शेखर गुप्ता का ‘द प्रिंट’ क्या कर रहा था? फरवरी 3, 2021 को आई एक खबर में बताया गया था कि कैसे भारत बायोटेक और सीरम (SII) विवादों में घिरा हुआ है। उससे पहले जनवरी में दोनों वैक्सीन को वैज्ञानिक रूप से संदेहास्पद बताया गया। मार्च 13 की खबर में बताया गया कि सरकार को कोवैक्सीन पर विश्वास नहीं है और इसकी वजह हैं 43 कोरोना केसेज।

इतना ही नहीं, शेखर गुप्ता के पोर्टल की और भी कारस्तानियाँ सुनिए। जनवरी 2021 की ही एक अन्य खबर में दावा किया कि भारत बायोटेक ने एक ही दिन में एक्सपर्ट पैनल के दिमाग को बदल दिया। जनवरी 22 को कहा गया कि कोवैक्सीन WHO के मानकों पर खड़ा नहीं उतरता है। जनवरी की शुरुआत में कहा गया कि वैक्सीन का फेज 3 ट्रायल अपूर्ण है। जनवरी 16 को कहा गया कि कोवैक्सीन को लेकर लोगों में सकुचाहट है।

जनवरी 8 को एक खबर में दावा कर दिया गया कि भारतीय नियामकों में इतने छेद हैं कि दोनों वैक्सीन को मँजूरी मिल गई। DCGI ने जब वैक्सीन को अप्रूव किया तो इसे राजनीतिक जुमला बताया गया। कॉन्ग्रेस ने भी वैक्सीन को लेकर गड़बड़ दावे किए थे, जिन्हें शेखर गुप्ता ने आगे बढ़ाया। अब आप बताइए, वैक्सीन को लेकर लोगों को डराने वाले आज क्यों पूछ रहे हैं कि सभी को वैक्सीन क्यों नहीं दिया?

वैक्सीन पर अफवाह फैलाने वाली कॉन्ग्रेस भी ऐसी ही बातें करती रही है। इसलिए, इनके लिए ‘सौ चूहे खा कर बिल्ली चली हज को’ वाली कहावत फिट बैठती है। सरकार ने 1 मई से टीकाकरण को लेकर जिस तरह पूरे प्लान के साथ आदेश जारी किया है, स्पष्ट है कि वो अचानक से नहीं हुआ। शेखर गुप्ता को अपने पुराने ट्वीट्स और खबरें देखनी चाहिए, जिसमें उन्होंने इन्हीं स्वदेशी टीकाओं को लेकर डर का माहौल बनाया था।

एक 15 साल का-दूसरा 21 काः घर से उठाकर जंगल ले गए नक्सली, हत्या कर कहा- पुलिस के मुखबिर थे

छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में नक्सलियों ने रविवार (अप्रैल 18, 2021) को 2 युवकों की जंगल में ले जाकर हत्या कर दी। मृतकों में एक की उम्र 21 साल थी और दूसरा 15 साल का नाबालिग था। नक्सलियों ने दोनों को मुखबिरी के आरोप में रविवार को जगरमुंडा थाना क्षेत्र में मिलमपल्ली इलाके में मारा।

सुकमा के एसपी के एल ध्रुव ने हत्या की पुष्टि करते हुए बताया कि नक्सलियों द्वारा मिलमपल्ली गाँव में मारे गए दोनों युवकों के शवों को बरामद कर लिया गया है। बॉडी के पास पड़े नोट में नक्सलियों ने आरोप लगाया कि दोनों लड़के पुलिस के मुखबिर थे।

जानकारी के अनुसार, नक्सली इस इलाके के लोगों को नौकरी छोड़ने की धमकी देते थे। रविवार को नक्सलियों ने जिन दो युवकों को मारा इनमें 21 वर्षीय युवक का भाई बस्तर बटालियन का जवान है, जबकि 15 वर्षीय स्कूली छात्र के पिता सहायक आरक्षक थे, जिन्होंने नक्सलियों की धमकी के बाद पुलिस की नौकरी छोड़ दी थी।

दोनों युवकों का शव मिलने के बाद इलाके में दहशत का माहौल है। पुलिस मामले की जाँच में जुटी है। मृतकों के परिजनों का कहना है कि नक्सली दोनों युवकों को रात में घर से उठाकर जंगल की ओर ले गए थे और उसके बाद उनका शव मिला।

मालूम हो कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि जब नक्सलियों ने किसी बच्चे की हत्या की। यहाँ अमूमन नक्सली छात्रों का, बच्चों का उपयोग अपने लाभ के लिए करते हैं। कथित तौर पर पहले यहाँ बच्चों का ब्रेन वाश कर उन्हें अपने संगठन में भर्ती करते हैं, फिर उनसे सूचनाएँ, सामान लेने-देने का काम कराते हैं। 

पुलिस सूत्रों का कहना है कि लगातार फोर्स नक्सलियों पर दबाव बना रही है। गाँवों में उनके सूचना तंत्र को तोड़ रही है। इसलिए नक्सली बौखलाए हैं और लगातार ग्रामीणों को मार रहे हैं। इसके पीछे उनकी मंशा गाँवों में दहशत फैलाना है, जिससे कोई उनके खिलाफ आवाज ना उठाए।

बता दें कि इससे पहले शनिवार को भी सुकमा के दोरनापाल-जगरगुंडा इलाके में ही नक्सलियों ने एक शख्स की हत्या कर दी थी। मृतक इस इलाके में सड़क निर्माण के काम में लगा कर्मचारी था। उस दौरान नक्सलियों ने दो गाड़ियों को भी आग के हवाले कर दिया था। इसी तरह जिले के ही भेज्जी थाने से सिर्फ आधा किलोमीटर दूर पर पुलिस के दो जवानों की हत्या कर दी गई थी। वहीं 3 अप्रैल को नक्सलियों ने बीजापुर जिले में सुरक्षाबलों पर हमला किया था। इसमें सुरक्षाबल के 23 जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे।