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बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से होएः दिल्ली में CM केजरीवाल के ‘मैं हूॅं ना’ पर मजदूरों की बेबस भीड़ क्यों भारी

देश के लगभग सभी राज्यों में कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर फैल रही है। हर राज्य अपनी आवश्यकता के अनुसार धारा 144, रात का कर्फ़्यू, लॉकडाउन या सीमित लॉकडाउन की घोषणा कर रहा है। महाराष्ट्र सरकार ने सबसे पहले इस तरह की घोषणा की और उसके बाद मध्य प्रदेश और दिल्ली ने भी सीमित कर्फ़्यू की घोषणा की। संक्रमण के फैलने की तेज़ी को देखते हुए नागरिक भी सचेत हो रहे हैं और संक्रमण से बचने के उपाय कर रहे हैं। यह अलग बात है कि बिना मास्क के बाहर निकलने वाले लोग अब भी दिखाई दे रहे हैं।

दिल्ली में लॉकडाउन की घोषणा के बाद लोग भारी मात्रा में बाहर आए और शराब की दुकानों पर भीड़ लग गई। ऐसी भीड़ के वीडियो भी वायरल हो रहे हैं। त्रासदी यह है कि इस कठिन समय में शराब की दुकानों पर होने वाली भीड़ और वहाँ बोली जाने वाली बातें ही नागरिकों के लिए थोड़ी देर के लिए ही सही, दुःख भूलने का कारण बन रही है। शराब ख़रीदने वालों में से कई लोग अपनी गंभीर बातों से लोगों को हँसा देते हैं।

दिल्ली की जनता इस मुश्किल समय से जूझने की कोशिश कर ही रही थी और जब लोगों को लग रहा था कि पिछले वर्ष की तरह इस वर्ष मज़दूरों का पलायन शायद देखने को न मिले तब तक दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने एक वीडियो जारी कर दिया, जिसमें उन्होंने मज़दूरों से अपील करते हुए ‘मैं हूँ ना’ के शाहरुख़ खान स्टाइल में कहा: सरकार आपका पूरा ख़याल रखेगी। मैं हूँ ना। मुझ पर भरोसा रखिए।

लगा उनकी इस अपील से जैसे जादू हो गया। शाम होते-होते लोगों ने आनंद बिहार बस अड्डे के फ़ोटो और वीडियो शेयर करने शुरू कर दिए जिसमें बस अड्डे पर दिल्ली से बाहर जाने की कोशिश करने वालों की भारी भीड़ दिखाई दे रही थी। समझ में नहीं आया कि जब सरकार द्वारा लगाया गया लॉकडाउन बहुत कम समय के लिए एक सामान्य कदम था तो यह वीडियो जारी करने की आवश्यकता क्यों आन पड़ी? क्या मुख्यमंत्री केजरीवाल को दिल्ली की जनता पर भरोसा नहीं है कि उन्हें सरकार द्वारा उठाया गया सामान्य कदम समझ में नहीं आएगा? या फिर पिछले साल उनके और उनकी सरकार द्वारा जो कुछ किया गया उसे जनता भुला नहीं पाई है?

हम यदि पिछले दस दिनों में मुख्यमंत्री केजरीवाल के बयान देखें तो उनकी वजह से कई विषय पर केवल भ्रम ही फैला है। उन्होंने बार-बार कहा कि दिल्ली के अस्पतालों में बेड की कमी नहीं है। उनकी यह बात उस ऐप के आँकड़ों पर आधारित है जो दिल्ली सरकार ने जारी किया है। पर यहाँ सच्चाई ऐप द्वारा दिखाए जा रहे आँकड़ों से भिन्न है। लोगों का कहना है कि सरकारी अस्पतालों में बेड वैसे ही नहीं हैं पर फ़ोन करने पर प्राइवेट अस्पताल भी बेड ख़ाली न होने का दावा कर रहे हैं। फिर केजरीवाल जी ने दिल्ली में ऑक्सीजन की उपलब्धता को लेकर तीन दिन के अंदर ही दो बार भ्रामक बातें की। उन्होंने पहले कहा कि दिल्ली में ऑक्सीजन का पूरा स्टॉक है और किसी तरह की दिक्कत होने नहीं दी जाएगी। फिर उन्होंने बताया कि ऑक्सीजन की कमी है।

भ्रामक बयान देना अरविंद केजरीवाल के लिए नई बात नहीं है। प्रवासी मज़दूरों में भ्रम की स्थिति पैदा करके उन्हें बसों में भरकर उत्तर प्रदेश के बॉर्डर पर छोड़ने वाली बात को अभी मात्र एक वर्ष ही हुए हैं। उन्हीं दिनों मज़दूरों के लिए भोजन उपलब्ध कराने के दिल्ली सरकार के दावों पर कई हलकों में बहस भी हुई थी और उन्हें झूठा भी बताया गया था। सबको याद है कि कैसे सरकार के परिवहन विभाग ने कथित तौर पर मैसेज वायरल करवा मज़दूरों को भागने के लिए विवश कर दिया था।

मुख्यमंत्री केजरीवाल के भ्रामक बयानों से बनने वाली अनिश्चित भविष्य की तस्वीर और सरकार द्वारा मज़दूरों के हितों की रक्षा के लिए ईमानदार कोशिश न करने की आशंका से प्रवासी मज़दूरों का पलायन पिछले वर्ष की तरह इस वर्ष भी होने का ख़तरा बना हुआ है। समस्या यह है कि एक राज्य से शुरू होने वाले ऐसे पलायन का असर अन्य राज्यों में रहने वाले प्रवासी मज़दूरों पर भी हो सकता है। ऐसे में आवश्यकता है उस विश्वसनीय बयान की जो मज़दूरों में विश्वास जगाए रखे और उन्हें पलायन से रोके।

‘भारत में कोरोना के डबल म्यूटेशन ने दुनिया को चिंता में डाला’: मीडिया द्वारा बनाए जा रहे ‘डर के माहौल’ का FactCheck

मीडिया के एक वर्ग में कहा जा रहा है कि भारत में कोरोना वायरस के डबल म्यूटेशन ने दुनिया को चिंता में डाल दिया है। ‘टाइम्स नाउ’ की खबर में हॉवर्ड मेडिकल स्कूल के पूर्व प्रोफेसर विलियम ए हसलटीन के हवाले से दावा किया गया कि कोरोना वायरस का B.1.617 वैरिएंट काफी खतरनाक है। ‘ब्लूमबर्ग’ की रिपोर्ट में दावा किया गया कि भारत के इस डबल म्यूटेशन ने दुनिया को चिंता में डाल दिया है।

कोरोना के डबल म्यूटेंट वायरस को लेकर भ्रामक हेडलाइन

रिपोर्ट के अनुसार, इस वैरिएंट के अध्ययन को लेकर वैज्ञानिकों और डॉक्टरों ने रुचि दिखाई है। साथ ही इसके कारण ही भारत अब ब्राजील को पीछे छोड़ते हुए दुनिया का दूसरा सबसे ज्यादा कोरोना प्रभावित देश बन गया है। WHO की कोरोना टेक्निकल लीड मरिया वेन कोरखोवै ने कहा कि कोरोना वायरस के इस वैरिएंट में डबल म्यूटेशन का होना चिंता का सबब है। इससे वैक्सीन की क्षमता भी कम हो रही है।

अब आपको बताते हैं कि सच्चाई क्या है। असल में कोरोना का डबल म्यूटेशन वायरस वैरिएंट ‘भारतीय’ नहीं है, बल्कि दुनिया भर के कई देशों में ये फ़ैल रहा है। इसलिए, इस खबर को प्रस्तुत करने का तरीका ही गलत है। कई देशों में डबल म्यूटेशन वायरस पाया गया है। डबल म्यूटेशन (2 म्यूटेशंस) एक अन्य वैरिएंट है जो ऑस्ट्रेलिया, बेल्जियम, जर्मनी, आयरलैंड, नामीबिया, न्यूजीलैंड, सिंगापुर, यूनाइटेड किंगडम, यूएसए जैसे कई देशों में पाया गया है।

NDTV ने भी बनाया ‘डर का माहौल’

इस वैरिएंट के ज्यादा फैलने की क्षमता अभी तक स्थापित नहीं हुई है। इन म्यूटेशंस के सामने आने से प्रबंधन की रणनीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है, जो जाँच, पता लगाने, नजर रखने और उपचार पर केन्द्रित बनी हुई है। कोविड-19 के प्रसार पर रोक के लिए मास्क का इस्तेमाल सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच बना हुआ है। साथ ही RTPCR टेस्ट से ये पकड़ में आ जाते हैं और इस टेस्ट की विश्वसनीयता बरकरार है।

INSACOG (Indian SARS-CoV-2 Genomics Consortium) के दिशा-निर्देश एक बार फिर से राज्यों के साथ साझा किए गए और राज्यों को पॉजिटिव लोगों के क्लीनिकल डाटा उपलब्ध कराकर जीनोम अनुक्रमण के लिए नमूने भेजने की सलाह दी गई थी। इससे विभिन्न स्थानों पर वैरिएंट्स में बढ़ोतरी से जुड़ी महामारी संबंधित व्यापक जानकारियाँ मिलेंगी। साथ ही INSACOG जनता में मौजूद अन्य खतरनाक वैरिएंट्स को खोजने में सक्षम हो जाएगा।

इस तरह से भारत सरकार भी इस दिशा में लगातार लगी हुई है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा समय-समय पर संवाददाता सम्मेलनों के माध्यम से खतरनाक वैरिएंट्स और नए म्यूटेंट्स की वर्तमान स्थिति से जुड़ी जानकारियाँ उपलब्ध कराई जाती हैं तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेप बढ़ाने और सख्ती पर भी जोर दिया जाता है। कोविड 19 वायरस अपना रूप बदल रहा है और भारत के साथ ही कई देश इससे परेशान हैं।

केरल: हिंदू युवक से शादी करने वाली मुस्लिम महिला पर बहन और जीजा ने धारदार हथियार से किया हमला

केरल में हिंदू युवक से शादी करने वाली एक मुस्लिम महिला के परिजनों ने उसकी जान लेने की कोशिश की। घटना राज्य के पथानमथिट्टा जिले के कलंजूर में तब हुई जब महिला अपने माता-पिता से मिलने मायके पहुँची। महिला पर उसकी बहन और जीजा ने हमला किया। दोनों कथित तौर पर उसके अंतरधार्मिक विवाह से नाराज थे। 

घटना में महिला के बाजुओं में चोट आई, जिसके बाद उसे रन्नी अस्पताल में भर्ती किया गया। पुलिस ने मामले में पीड़िता के बयान के आधार पर उसकी बहन और जीजा के ख़िलाफ़ मुकदमा दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है। पुलिस पता लगा रही है कि ये हमला जायदाद के लिए किया गया या फिर ऑनर किलिंग का प्रयास था।

पुलिस के अनुसार, पीड़िता ने हिंदू व्यक्ति से 8 माह पहले शादी की थी और अपने मायके से कुछ दूरी पर उसके साथ रह रही थी। घटना वाले दिन जब महिला अपने माता-पिता के घर आई, तब वहाँ उसकी बहन और जीजा भी मौजूद थे। यहीं उन दोनों की पीड़िता से किसी प्रॉपर्टी को लेकर झड़प हुई और उन्होंने पीड़िता पर हमला बोल दिया।

कथित तौर पर पीड़िता की बहन अपनी पैतृक संपत्ति उसके (पीड़िता) साथ साझा करने पर नाराज थी। इसलिए उसने अपनी बहन के साथ लड़ाई की और गुस्से में एक धारदार हथियार से उस पर हमला कर दिया। घटना में वह बुरी तरह घायल हो गई। पुलिस का कहना है कि महिला की शादी को लेकर खासी आपत्तियाँ नहीं थी, लेकिन फिर भी घटना में इसकी जाँच जरूरी है।

गौरतलब है कि कुछ दिन पहले ऐसे अंतरजातीय विवाह का मामला उत्तर प्रदेश के नोएडा से सामने आया था। यहाँ एक मुस्लिम महिला ने हिंदू प्रेमी से शादी करने के बाद पुलिस के सामने गुहार लगाई थी कि वह अपने पति के साथ रहना चाहती है न कि अपने माता-पिता के साथ।

इस केस में पुलिस ने बताया था कि 22 फरवरी को महिला के घरवालों ने उसके पति पर अपहरण का आरोप लगाते हुए शंका जताई थी कि उनकी बेटी की जान खतरे में है, लेकिन घटना के 2 माह बाद थाने पहुँच कर स्वयं महिला ने साफ किया कि वह अपने हिंदू प्रेमी से शादी कर चुकी है और अब उसे अपने घर वापस नहीं जाना। 

‘सरकार पर विश्वास नहीं’: मजदूरों ने केजरीवाल की नहीं सुनी, 5 लाख ने पकड़ी ट्रेन-बस टर्मिनल पर 50000; दिल्ली से घर लौटने की मारामारी

दिल्ली की आम आदमी पार्टी (AAP) की सरकार और उसके मुखिया अरविंद केजरीवाल की आम लोगों के नजर में साख की पोल सोमवार (19 अप्रैल 2020) की शाम होते-होते खुल गई। मुख्यमंत्री केजरीवाल ने 26 अप्रैल की सुबह 5 बजे तक लॉकडाउन का ऐलान करते हुए कहा था कि वे हाथ जोड़ कर प्रवासी मजदूरों से विनती करते हैं कि ये एक छोटा सा लॉकडाउन है जो मात्र 6 दिन ही चलेगा, इसलिए वे दिल्ली को छोड़ कर कहीं और न जाएँ।

लेकिन उनके इस ऐलान के साथ ही पहले दिल्ली के ठेकों पर भीड़ उमड़ी और फिर उसके कुछ ही घंटों बाद दिल्ली से घर लौटने की मजदूरों के बीच होड़ शुरू हो गई। ठीक उसी तरह जैसे पिछले साल लॉकडाउन के दौरान देखने को मिला था।

आनंद विहार बस टर्मिनल पर मजदूरों की भारी भीड़ जुटी हुई है। वहाँ हजारों की संख्या में प्रवासी मजदूर लॉकडाउन की घोषणा के साथ ही इकट्ठा होने शुरू हो गए थे। इनमें से अधिकतर यूपी, बिहार और झारखंड के हैं। सभी अपने घर वापस लौटना चाहते हैं।

प्रवासी मजदूरों ने कहा कि दिल्ली की AAP सरकार को कर्फ्यू की घोषणा से पहले उन्हें समय देना चाहिए था, ताकि वो अपने घर लौट सकें। मजदूरों ने कहा कि वो दिहाड़ी पर काम करने वाले लोग हैं, ऐसे में अब उनके जीवन-यापन पर संकट आ खड़ा हुआ है। उन्होंने बताया कि जहाँ बस से वापस जाने के लिए मात्र 200 रुपए लगते थे, वहाँ अब 3000-4000 रुपए लग रहे हैं। प्रवासियों ने पूछा कि अब वो वापस कैसे जाएँगे?

प्रवासी मजदूरों का कहना है कि अब वो किसी भी सरकार पर भरोसा नहीं कर सकते। आनंद विहार बस टर्मिनल पर तो भीड़ को नियंत्रित करने में पुलिस भी नाकाम रही है। प्रवासी मजदूर अपने परिवारों के साथ वहाँ पहुँचे हुए हैं। कोरोना के दिशा-निर्देशों की सरेआम धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं। एक 7 साल के बच्चे ने बताया कि लॉकडाउन में उसके पिता की नौकरी चली गई, जिसके बाद वह अवसाद में उसकी माँ को पीटा करता था।

मजदूरों का कहना है कि लॉकडाउन को आगे बढ़ाया जा सकता है, ऐसे में उनकी ज़िंदगी फिर से नरक हो जाएगी। उनका कहना है कि पिछले साल वो कई दिनों तक भूखे रहने को मजबूर हुए थे। कंस्ट्रक्शन कार्य में लहे मजदूरों को तो उनके मालिकों ने ही वापस जाने को कह दिया है। मजदूरों का कहना है कि दिल्ली छोड़ना ही अब एकमात्र उचित विकल्प है। ये वो मजदूर हैं, जिनकी आय कुछ दिनों पहले दोबारा शुरू ही हुई थी।

इस बार ट्रेनें भी चल रही हैं, ऐसे में कई प्रवासी मजदूर रेलगाड़ी से घर लौट रहे हैं। अधिकतर के पास कन्फर्म टिकट नहीं है। बसों में बैठने के लिए होड़ सी मची हुई है और लोग किसी तरह जगह लेकर जाने के लिए भी तैयार हैं। कौशांबी में भी भारी भीड़ है। पिछली बार जो पैदल लौटे थे, वो भी इस बार बस से जा रहे हैं। रविवार को दिल्ली से लगभग 5 लाख लोगों ने ट्रेन पकड़ी। आनंद विहार टर्मिनल पर जुटे लोगों की संख्या करीब 50,000 बताई गई है।

रेलवे के अधिकारियों का कहना है कि गेहूँ की कटाई और शादी-ब्याह के इस सीजन में लोग वैसे भी लौटते हैं, ऐसे में सिर्फ लॉकडाउन इसका कारण नहीं है। बस की छत पर बैठ कर भी लोग लौट रहे हैं। भीड़ में कुछ लोगों के मोबाइल फोन्स भी खो गए। सराय काले खाँ और कश्मीरी गेट पर भी यही स्थिति है।

पिछले 1 दिन की बात करें तो दिल्ली में कोरोना के 23,686 नए मामले सामने आए हैं, जिससे वहाँ सक्रिय संक्रमितों की संख्या बढ़ कर 76,887 हो गई है। 21,500 लोग ठीक भी हुए। वहीं पिछले 1 दिन में 240 लोगों को कोरोना के कारण अपनी जान गँवानी पड़ी। इसके साथ ही प्रदेश में मृतकों की संख्या अब 12,361 पर पहुँच गई है। पूरे भारत में कोरोना के 2,56,828 नए मामले सामने आए हैं।

केजरीवाल ने लॉकडाउन की घोषणा के साथ भरोसा दिलाया था कि सरकार प्रवासियों का ख्याल रखेगी। लेकिन, जिस तरह घर वापसी की होड़ लगी है वह देखकर तो लगता है कि मजदूर पिछले साल के अनुभवों को नहीं भूले हैं, जब आप पर ही अफवाह फैलाकर उन्हें घर से निकलने को मजबूर करने के आरोप लगे थे।

कोरोना से लड़ाई में मजबूत कदम बढ़ाती मोदी सरकार: फर्जी प्रश्नों के सहारे फिर बेपटरी करने निकली गिद्धों की पाँत

आम आदमी की तरह दिखने वाले जो लोग बात-बात पर चिंतित हो जाते हैं, अक्सर उन्हें बुद्धिजीवी या विशेषज्ञ मान लिया जाता है। देश, समाज और काल में किसी क्रिया या समस्या से भविष्य में होने वाले असर के प्रति अक्सर फ़र्ज़ी चिंता के प्रदर्शन का और उसे समझाने का महत्वपूर्ण काम ये बुद्धिजीवी और विशेषज्ञ अपने काँधे पर ले लेते हैं। इस तथाकथित ज़िम्मेदारी का एहसास ही उन्हें आम आदमी से अलग करता है।

अब कोरोना की ही बात ले लीजिए। जब एक वर्ष पहले यह भारत में घुसा तो चिंतित होने का सबसे महत्वपूर्ण काम ऐसे लोगों ने किया जो ख़ुद को भारतवर्ष के सामने विशेषज्ञ घोषित कर चुके थे। इन विशेषज्ञों ने अपने मन में चलने वाली अंक गणित का हिसाब लगाया और घोषणा की कि बस महीना दो महीना में करोड़ों पीड़ित होंगे और लाखों की संख्या में लोग मारे जाएँगे। इन तथाकथित विशेषज्ञों की भविष्यवाणी को मीडिया ने खूब जगह दी। जो बातें ढाई मिनट के वीडियो में बताई जा सकती थीं उन्हीं बातों को बताने के लिए साढ़े बारह मिनट के वीडियो बनाए गए। जो बातें ढाई सौ शब्दों में लिखी जा सकती थीं उन्हें लिखने के लिए पंद्रह सौ शब्दों का सहारा लिया गया ताकि भविष्यवाणियों पर लोगों का विश्वास पुख़्ता किया जा सके।

खान मार्केट मीडिया ने सवा महीने इन भविष्यवाणियों का सस्वर पाठ किया। विदेशी मीडिया ने इन्हें उछाला। विदेशी मीडिया का कोई मंच बचा नहीं था जहाँ ख़ुशी ज़ाहिर न की गई। सूत्रों के सहारे हतप्रभ कर देने वाले फ़र्ज़ी टेबल बनाकर फ़र्ज़ी बातों और परिकल्पनाओं की जलेबी काढ़ी गई। यह सोचकर सब बहुत खुश थे कि जल्द ही भारतवर्ष लाशों से पट जाएगा। चारों ओर हाहाकार मचेगा। सब तरफ़ तबाही फैल जाएगी। जिस तरह के कॉलम लिखे गए उन्हें पढ़कर साफ़ दिखाई दिया कि कैसे गिद्धों की एक पूरी टोली लाशें देखने के लिए पाँत लगाए बैठी हुई है कि कब लाशें गिरें और ये गिद्ध डान्स शुरू करें।

पर हाय, नियति को यह मंज़ूर न था। भारत ने लॉकडाउन करके, स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार करके, मेडिकल उपकरण बनाकर और डॉक्टर और स्वास्थ्य योद्धाओं के लगातार प्रयास से ऐसा होने नहीं दिया। जब काफ़ी दिनों की प्रतीक्षा के बाद भी ऐसा न हुआ तो निराश हुए इन लोगों ने भारत से निकल रहे आँकड़ों पर शंका ज़ाहिर करना शुरू किया।

प्रोपेगेंडा का प्रथम चरण था। प्रश्नवाचक चिन्ह लगाकर आँकड़ों के प्रति आम भारतीय के मन में शंका पैदा करने की कोशिश शुरू हुई। फिर भारत में बन रही वैक्सीन को लेकर शंका पैदा करने की कोशिश की गई। वैक्सीन बनाने वाली कम्पनियों के प्रयास और ट्रायल के आँकड़ों को झुठलाने की कोशिश की गई। गैंग मेम्बर, छुटभैय्ये राजनेता, हारे हुए कॉन्ग्रेसी और बेरोज़गार संपादकों के ईकोसिस्टम ने हर वह प्रयास किया जिससे कोरोना के विरुद्ध देश की लड़ाई को कमजोर किया जा सके।

तरह-तरह की आवाज़ें सुनाई दीं। “ये भाजपा की वैक्सीन है” से लेकर “पहले प्रधानमंत्री खुद लगवाएँ” तक का सफ़र महीने भर में तय हो गया। भारत के जिस वैक्सीन मैत्री को दुनियाँ ने सराहा उसी की बुराई करने के प्रयास में इस ईकोसिस्टम ने नए-नए कीर्तिमान गढ़े। “ये वैक्सीन दूसरों को क्यों दी जा रही है” से लेकर “इक्स्पाइअर्ड वैक्सीन दे दिया” तक कोई प्रॉपगैंडा बचा नहीं जिसे न फैलाया गया। बाद में जिस वैक्सीन को बेकार बताया गया उसी की कमी का शोर उन्हीं लोगों ने मचाया जिन्होंने उसे बेकार बताया था।

विपक्षी नेता सार्वजनिक तौर पर वैक्सीन के ख़िलाफ़ बोलते रहे और व्यक्तिगत तौर पर उसी वैक्सीन की सुई घोंपवाते रहे। देश में बनने वाली वैक्सीन के ख़िलाफ़ प्रॉपगैंडा फैलाने का काम कालांतर में छुटभैय्ये नेताओं से मुख्यमंत्रियों तक के हाथ में आ गया। जब इस सबसे बात नहीं बनी और वैक्सीन प्रोग्राम सफल होता दिखा तब उसकी कमी की बात उठाई गई। साथ ही यह सवाल उठाया गया कि वैक्सीन सबको क्यों नहीं लगाई जा रही? हर बार प्रश्न पूछकर यही साबित करने की कोशिश की गई जैसे कोरोना के ख़िलाफ़ सरकार की लड़ाई बिना किसी प्लान या नीति के कर रही है और उसमें विशेषज्ञों का कोई हाथ नहीं है।

जब सब कुछ करके थक गए तो डॉक्टर मनमोहन सिंह को आगे रखकर पत्र लिखने की राजनीति पर उतर आए। मनमोहन सिंह पत्र लिखकर सरकार को पारदर्शिता की नसीहत दे रहे हैं। पारदर्शिता से डॉक्टर सिंह का रिश्ता टू जी और कोलगेट के समय से रहा है। वे कहीं से भी चलते हैं पारदर्शिता पर ज़रूर पहुँचते हैं। डॉक्टर हर्षवर्धन के जवाबी पत्र ने उनके सवालों और सुझावों की कलई उतार दी है। ऐसा पहली बार हुआ जब केंद्र सरकार ने जवाब देते हुए किसी तरह की कोई कोताही नहीं बरती।

अब जबकि पंद्रह दिनों ने कोरोना की दूसरी लहर चली है और आम भारतीय उससे पीड़ित हुआ है, ईकोसिस्टम और उसके सहायक विदेशी मीडिया में फिर उसी उल्लास की आँधी चल रही है जो एक वर्ष पूर्व चली थी। गिद्धों की पाँत फिर से वैसे ही बैठ गई है। फिर से हेडलाइन के आगे प्रश्नवाचक चिन्ह के सहारे वक्तव्य दिए जा रहे हैं। फिर से श्मशान घाट की दो-ढाई वर्ष पुरानी तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही हैं। नेताओं द्वारा फ़र्ज़ी प्रश्न उठाए जा रहे हैं। शायद फिर उसी आकाँक्षा के साथ कि भारत कोरोना के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई हार जाएगा।

‘कॉन्ग्रेसी’ साकेत गोखले ने पूर्व CM के खिलाफ दर्ज कराई शिकायत, शिवसेना नेता कहा- ‘फडणवीस के मुँह में डाल देता कोरोना’

महाराष्‍ट्र में कोराना संक्रमण का प्रकोप और सियासी पारा बढ़ता ही जा रहा है। इसी बीच, शिवसेना के विधायक संजय गायकवाड़ ने पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को लेकर विवादित बयान दिया है। उन्‍होंने कहा है कि अगर उन्हें कहीं कोरोना वायरस मिल जाता, तो वह उसे भाजपा नेता देवेंद्र फडणवीस के मुँह में डाल देते।

बताया जा रहा है कि रेमडेसिविर का उत्पादन करने वाली एक दवा कंपनी के शीर्ष अधिकारी से दवा की कथित जमाखोरी को लेकर मुंबई पुलिस ने पूछताछ की है। इसे लेकर ठाकरे सरकार राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पर निशाना साध रही है। वहीं कॉन्‍ग्रेस समर्थक और बेबाकी से फेक न्यूज फैलाने में माहिर साकेत गोखले ने आज राज्य के गृह मंत्री दिलीप वालसे पाटिल के साथ मिलकर देवेंद्र फडणवीस के खिलाफ रेमडेसिविर स्टॉक की जमाखोरी को लेकर शिकायत दर्ज कराई है।

मीडिया से बातचीत में बुलडाना से विधायक गायकवाड से पूछा गया था कि कोराना महामारी के इस दौर में अगर फडणवीस मुख्यमंत्री होते तो वह क्या करते? इस पर गायकवाड भड़क गए और कहा , “राज्य के मंत्रियों का समर्थन करने के बजाय भाजपा नेता उनका मजाक बना रहे हैं। वे सोच रहे हैं कि किस तरह प्रदेश सरकार को विफल किया जा सकता है।” गायकवाड ने आगे कहा, “अगर मुझे कोरोना वायरस मिल जाता, तो मैं उसे देवेंद्र फडणवीस के मुँह में डाल देता।”

गायकवाड ने आरोप लगाया कि फडणवीस, भाजपा नेता प्रवीण दारेकर और चंद्रकांत पाटिल रेमडेसिविर इंजेक्शन के वितरण को लेकर तुच्छ राजनीति कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि केंद्र ने महाराष्ट्र की रेमडेसिविर निर्माता कंपनियों से कहा है कि वे राज्य में दवा की आपूर्ति नहीं करें। गायकवाड की टिप्पणी के विरोध में रविवार को बुलडाना में कई स्थानों पर भाजपा कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किए और विधायक के पुतले जलाए।

बता दें कि साकेत गोखले ने बेबुनियाद ट्वीट्स की सीरीज में आरोप लगाया था कि भाजपा ने महाराष्ट्र में अपने पार्टी कार्यालय में 4.75 करोड़ रुपए की रेमडेसिविर (Remdesivir) की जमाखोरी की है। गोखले ने यह आरोप मुंबई पुलिस द्वारा शनिवार को दमन स्थित ब्रुक फार्मा कंपनी के रेमडेसिविर सप्लायर को हिरासत में लेने और सवाल पूछे जाने के बाद लगाया था। बीजेपी की महाराष्ट्र इकाई ने कंपनी से रेमडेसिविर को महाराष्ट्र में लोगों को आपूर्ति करने का आदेश दिया था, लेकिन पुलिस ने कंपनी के डायरेक्टर को हिरासत में ले लिया था। हालाँकि, देवेंद्र फडणवीस द्वारा सवाल उठाए जाने के बाद उसे रिहा कर दिया गया। 

गोखले ने सवाल किया था कि कैसे देवेंद्र फडणवीस जैसे ‘निजी व्यक्ति’ गुजरात से रेमडेसिविर का स्टॉक खरीद सकते हैं, जब बिक्री केवल सरकार को करने की अनुमति है? वहीं, देवेंद्र फडणवीस ने मीडिया से बात करते हुए कहा था, “चार दिन पहले, हमने ब्रुक फार्मा को महाराष्ट्र में रेमडेसिविर इंजेक्शन के स्टॉक की आपूर्ति करने का अनुरोध किया था। उन्होंने कहा कि वे अनुमति नहीं दे सकते थे। मैंने केंद्रीय मंत्री मनसुख मंडाविया से बात की और खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) से रेमडेसिविर सप्लाई के लिए अनुमति ली, जिसके बाद अप्रैल 17, 2021 लगभग नौ बजे, पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।”

क्या है मामला

रेमडेसिविर का उत्पादन करने वाली एक दवा कंपनी के शीर्ष अधिकारी से दवा की कथित जमाखोरी को लेकर मुंबई पुलिस द्वारा पूछताछ करने के मामले में महाराष्ट्र की ठाकरे सरकार पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पर निशाना साध रही है। प्रदेश की महाविकास अघाड़ी सरकार में मंत्री नवाब मलिक के उस बयान पर भी हंगामा बरपा हुआ है, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि केंद्र की तरफ से कुछ रेमडेसिविर सप्लायर पर दवाब बनाया जा रहा है।

1 मई से अब 18 साल से अधिक उम्र वालों को भी लगेगी वैक्सीन: मोदी सरकार का तीसरे चरण में बड़ा फैसला

कोरोना वायरस के बिगड़ते हालात के बीच केंद्र सरकार ने बड़ा ऐलान किया है। देश में वैक्सीनेशन के तीसरे चरण के तहत सोमवार को सरकार ने 18 साल से अधिक आयु के सभी लोगों को टीकाकरण की इजाजत दे दी है। बता दें कि देश में 1 मई से वैक्सीनेशन के तीसरे चरण की शुरुआत हो रही है।

दरअसल, कोविड की सेकेंड वेव के कारण आश्चर्यजनक तरीके से संक्रमितों की संख्या में तेजी से उछाल आया है। इसके हालात को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज दवा कंपनियों और डॉक्टरों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए चर्चा की थी। इसके बाद ही केंद्र सरकार ने यह आदेश जारी किया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डॉक्टरों और कंपनियों के साथ चर्चा के दौरान कहा कि कोरोना महामारी तेजी से छोटे शहरों में भी अपने कदम फैला रही है। ऐसे में इन जगहों पर संसाधनों को उन्नत करने की कोशिश करने की जरूरत है। प्रधानमंत्री ने लोगों को कोरोना पर फैलाई जा रही अफवाहों से भी बचने की सलाह दी है।

सरकार ने कहा है कि वैक्सीनेशन के पहले चरण में फ्रंट लाइन वर्कर्स और दूसरे चरण में 40 साल से अधिक उम्र के लोगों का टीकाकरण हुआ था। अब तीसरे चरण में वैक्सीनेशन की पात्रता को और अधिक लचीला किया जा रहा है। केंद्र ने कहा है कि यह व्यवस्था ऐसे ही चलती रहेगी। बता दें कि भारत में विश्व का सबसे बड़ा वैक्सीनेशन अभियान चल रहा है।

केंद्र ने कहा है कि कोरोना वैक्सीनेशन के तीसरे चरण में वैक्सीन निर्माता अपनी मासिक सेंट्रल ड्रग्स लेबोरेटरी की 50 फीसदी खुराक भारत सरकार को जारी करेंगे और शेष 50 फीसदी खुराक राज्य सरकार और खुले बाजार में बेच सकेंगे।

भारत सरकार अपने हिस्से से टीकों को बढ़ने पर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को देगी। यह वैक्सीन सक्रिय मामलों की कोरोना के मामलों और प्रशासन के प्रदर्शन के आधार दी जाएगी। इसमें केंद्र सरकार वैक्सीन की बर्बादी को भी जोड़ेगा।

केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि टीकाकरण के तीसरे चरण में भी भारत सरकार के टीकाकरण केंद्रों में पहले की तरह टीकाकरण जारी रहेगा, जो पहले से लोगों को नि: शुल्क दिया जाता रहा है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 26 अप्रैल तक 5 शहरों में लगाए कड़े प्रतिबन्ध, योगी सरकार ने पूर्ण लॉकडाउन से किया इनकार

19 अप्रैल को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी के पाँच शहरों- प्रयागराज, लखनऊ, वाराणसी, कानपुर नगर, और गोरखपुर में 26 अप्रैल तक कड़े प्रतिबंधों की एक लिस्ट जारी की। हाई कोर्ट की जस्टिस अजीत कुमार और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा की खंडपीठ कोरोना के बढ़े मामलों से खुश नहीं थे। अदालत ने कहा कि राज्य के मुख्यमंत्री आईसोलेशन में हैं और यह राज्य के लिए कठिन समय है। कोर्ट के निर्देश पर एसीएस सूचना, नवनीत सहगल ने कहा, “यूपी सरकार शहरों में पूर्ण तालाबंदी नहीं करेगी बल्कि कड़े प्रतिबंध लगाएगी। यूपी सरकार अपनी टिप्पणियों पर न्यायालय के समक्ष अपना जवाब प्रस्तुत कर रही है।”

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने क्या कहा था

अपने आदेश में [PDF], अदालत ने कहा, “हम सरकारी अस्पतालों के हाल देख रहे हैं कि वहाँ आईसीयू में मरीजों को वीआईपी लोगों की सिफारिश पर लिया जा रहा है। यहाँ तक ​​की जीवनरक्षक एंटीवायरल दवा रेमेडिसिविर भी वीआईपी की सिफारिश पर ही दी जाती है। राज्य के मुख्यमंत्री लखनऊ में आईसोलेशन में हैं। ”

महामारी व्यवस्था को दिखा रही आँख- इलाहाबाद उच्च न्यायालय

अदालत ने कहा, “ऐसा लगता है कि महामारी सरकारी व्यवस्था को आँख दिखा रही है। लोगों को अस्पतालों में बेड नहीं मिल रहे हैं। उन्हें इधर-उधर दौड़ना पड़ रहा है, जिससे मरीजों की देखभाल करने वाले भी संक्रमित हो रहे हैं। इससे दूसरे लोग भी संक्रमित हो रहे हैं और एक पूरी चेन बन गई है।”

अदालत ने आगे कहा कि चिकित्सा के बुनियादी ढाँचे में विकास की कमी स्पष्ट दिखाई देती है, क्योंकि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्थाएँ चुनौतियों का सामना करने में सक्षम नहीं हैं, और लोग सही दवा के इंतजार में मर रहे हैं। अदालत ने कहा, “शासन के मामलों में उन लोगों को दोषी ठहराया जा सकता है, जो मौजूदा घटिया स्वास्थ्य समस्याओं के लिए दोषी हैं। जब यहाँ प्रजातंत्र है, तो इसका अर्थ यह है कि जनता की सरकार, जनता के द्वारा और जनता के लिए।”

अदालत ने कहा कि वह समझती है कि एक राजनीतिक मजबूरी है जो राज्य को संपूर्ण लॉकडाउन लगाने से रोक रही है। इसीलिए अदालत को कदम उठाना पड़ा। “हम कुछ लोगों की लापरवाही के कारण फैल रही महामारी से निर्दोष लोगों को बचाने के लिए अपने संवैधानिक कर्तव्य से दूर नहीं हो सकते।”

राज्य में बेड बढ़ रहे हैं, लेकिन वे पर्याप्त नहीं हो सकते हैं

अदालत ने नोटिस किया है कि राज्य सरकार आईसीयू बेड की संख्या बढ़ाने और मेक-शिफ्ट कोविड सेंटर्स की स्थापना के लिए बड़े पैमाने पर काम कर रही है। लेकिन, राज्य में जनसंख्या को देखते हुए अदालत ने आशंका जताई है कि ये बेड पर्याप्त नहीं हो सकते हैं, भले ही आबादी का केवल 10% संक्रमित हो।

कोर्ट के बिंदुवार निर्देश

  1. वित्तीय संस्थानों और वित्तीय विभागों, चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाओं, औद्योगिक और वैज्ञानिक प्रतिष्ठानों, नगर निगम के कार्यों और सार्वजनिक परिवहन सहित आवश्यक सेवाओं को छोड़कर सभी प्रतिष्ठान सरकारी या निजी हों, 26 अप्रैल, 2021 तक बंद रहेंगे। न्यायपालिका हालाँकि अपने स्वयं के विवेक पर कार्य करें।

2.सभी शॉपिंग कॉम्प्लेक्स और मॉल 26 अप्रैल, 2021 तक बंद रहेंगे।

3.सभी किराने की दुकानें और अन्य वाणिज्यिक दुकानें मेडिकल दुकानों को छोड़कर, 26 अप्रैल, 2021 तक बंद रहेंगे।

  1. सभी होटल, रेस्टोरेंट और यहाँ तक ​​की ठेले आदि पर खाने के छोटे प्वाइंट भी 26 अप्रैल, 2021 तक बंद रहेंगे।

5.सभी संस्थान जैसे कि अन्य विषयों और गतिविधियों से संबंधित शिक्षण संस्थान और अन्य संस्थाएँ यह सरकारी हों, अर्ध सरकारी या निजी उनके शिक्षकों और प्रशिक्षकों और अन्य कर्मचारियों के लिए 26 अप्रैल, 2021 तक बंद रहेंगे (यह दिशा निर्देश पूरे उत्तर प्रदेश के लिए है)

6. 26 अप्रैल, 2021 तक विवाह समारोहों सहित किसी भी सामाजिक समारोह और समारोहों की अनुमति नहीं होगी। हालाँकि, पहले से तय विवाह के मामले में संबंधित जिले के जिला मजिस्ट्रेट से आवश्यक अनुमति लेनी होगी। और अनुमति केवल 25 लोगों तक ही सीमित होगी और संबंधित जिला मजिस्ट्रेट कोविड 19 के प्रभाव की मौजूदा स्थिति पर गहन विचार करने के बाद निर्णय लेंगे, जिसमें उस क्षेत्र में नियंत्रण क्षेत्र की अधिसूचना भी शामिल है, जहाँ इस तरह की शादी होनी है।

7. किसी भी तरह की सार्वजनिक एवं धार्मिक गतिविधियों को 26 अप्रैल, 2021 तक निलंबित रखने का निर्देश दिया गया है।

8.सभी प्रकार के धार्मिक प्रतिष्ठानों को 26 अप्रैल, 2021 तक बंद रहने के लिए निर्देशित किया जाता है।

9.फल और सब्जी विक्रेताओं, दूध विक्रेताओं और रोटी विक्रेताओं सहित सभी फेरीवाले 26 अप्रैल, 2021 तक हर दिन सुबह 11 बजे तक सड़क पर उतरेंगे।

10.प्रयागराज, लखनऊ, वाराणसी, कानपुर नगर/देहात और गोरखपुर जिलों में व्यापक प्रसार वाले दो प्रमुख हिंदी और अंग्रेजी समाचार पत्रों में हर दिन कंटेनमेन्ट जोन अधिसूचित किए जाएंगे।

11.सड़कों पर सभी सार्वजनिक आवागमन को पूरी तरह से प्रतिबंधित रखा जाएगा, जो उपरोक्त निर्देशों के अधीन है। चिकित्सा सहायता और आपात स्थिति के मामले में आवागमन को अनुमति दी जाएगी।

12.उपरोक्त निर्देशों के अलावा कहा कि राज्य सरकार वर्तमान टीकाकरण कार्यक्रम को मजबूती से लागू करेगी।

अदालत ने आगे कहा, “इस आदेश में अगर हमने लॉकडाउन नहीं लगाया है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि हम इस पर विश्वास नहीं करते हैं। हम अभी भी देख रहे हैं कि यदि हम कोविड की चेन को तोड़ना चाहते हैं, तो कम से कम दो सप्ताह की अवधि के लिए लॉकडाउन एक आवश्यक है।” कोर्ट ने राज्य सरकार के दो सप्ताह में पूरे राज्य में पूर्ण लॉकडाउन लागू करने पर विचार करने को भी कहा है।

झारखंड में PM CARES फंड के तहत मिले 60 वेंटिलेटर बेकार पड़े, राज्य ने माँगे अतिरिक्त 1500 वेंटिलेटर

देशभर में कोरोना वायरस का कहर लगातार जारी है। इसी कड़ी में झारखंड कोरोना की दूसरी लहर से सबसे ज्यादा प्रभावित देश का छठा राज्य है। संक्रमण के हालात इतने बुरे हैं कि बीते 24 घंटे में ही राज्य में 4000 नए मामले सामने आए हैं और 50 लोगों की मौत हुई है। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक झारखंड में कोरोना के कारण स्थिति बेहद गंभीर है, लेकिन लापरवाही के चलते सात जिलों में पीएम केयर फंड के तहत मिले 60 वेंटिलेटर धूल फाँक रहे हैं।

बीते पाँच महीने से लातेहार सदर अस्पताल में 12 वेंटिलेटर धूल खा रहे हैं। जबकि, गुमला में मशीनों को चलाने के लिए टेक्नीशियन नहीं होने के कारण 21 वेंटिलेटर ऐसे ही बेकार हालत में पड़े हुए हैं। बोकारो में वेंटिलेटर होने के बाद भी यहाँ के जिला सदर अस्पताल के आईसीयू वार्ड में ताला लगा दिया गया। हालाँकि, गुरुवार को अस्पताल की उप अधीक्षक डॉ रेणु भारती ने एक मरीज को भर्ती किया।

इसी तरह से हजारीबाग जिले के पीएचसी और सीएचसी में 9 वेंटिलेटर लगाए गए हैं, लेकिन ये बेकार हैं। वहीं रामगढ़, चतरा और सिमडेगा में ट्रेंड टेक्नीशियन नहीं होने के कारण वेंटिलेटर का कोई उपयोग नहीं हो पा रहा है। एनटीपीसी, डीएमएफटी और एनएचआरएम फंड से मिले 28 अन्य वेंटिलेटर भी पैक रखे हुए हैं।

जानकारी मिली है कि लातेहार जिले में अक्टूबर 2020 में ये वेंटिलेटर लाए गए थे, लेकिन इन्हें पैक कर एक कमरे में बंद कर दिया गया। ऑक्सीजन पाइप कनेक्शन नहीं होने के कारण ये मशीनें धूल खा रही हैं। कोरोना की दूसरी लहर के कहर के बाद अब प्रशासन ने ऑक्सीजन कनेक्शन को ठीक करने का काम शुरू किया है।

बोकारो जिला सदर अस्पताल के उप अधीक्षक ने जानकारी दी कि सदर अस्पताल में 45 वेंटिलेटर थे, जिसमें से 20 को दूसरी जगहों पर भेजा गया है और अन्य 20 को लगा दिया गया है। वहीं गुमला के नोडल अधिकारी ने बताया कि टेक्नीशियन की कमी के कारण वेंटिलेटर नहीं लगाए गए हैं, लेकिन एक-दो दिन में उन्हें लगवा दिया जाएगा।

स्वास्थ्य विभाग ने माँगे 1500 वेंटिलेटर

पीएम केयर फंड से खरीदे गए वेंटिलेटर प्रशासनिक लापरवाही के कारण कमरों में पड़े धूल खा रहे हैं। वहीं राज्य के स्वास्थ्य विभाग ने केंद्र सरकार से कोविड से मरीजों के लिए अतिरिक्त 1,500 वेंटिलेटर की माँग की है।

इस मामले में झारखंड के स्वास्थ्य सचिव केके सोहन ने अतिरिक्त सचिव, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय वंदना गुरनानी को पत्र लिखकर कहा है कि मौजूदा समय में कोरोना तेजी से बढ़ा है। ऐसे में राज्य में लगभग 33,000 से 35,000 केस हैं। इस कारण राज्य को महीने के अंत तक अधिक वेंटिलेटर की जरूरत होगी।

केंद्र ने दिया मदद का आश्वासन

कोरोना के कहर से सबसे ज्यादा प्रभावित राज्यों को केंद्र सरकार ने मदद का आश्वासन दिया है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन सिंह जानकारी दी है कि 1,121 वेंटिलेटर महाराष्ट्र, 1,700 उत्तर प्रदेश, 1,500 झारखंड, 1,600 गुजरात, 152 मध्य प्रदेश और 230 छत्तीसगढ़ दिए जाएँगे।

केंद्रीय मंत्री ने 11 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के स्वास्थ्य मंत्रियों के साथ उच्च स्तरीय बैठक में कोरोना के बढ़ते मामलों को रोकने के लिए राज्यों को अग्रिम योजना तैयार करने को कहा है। कोरोना के मामलों में आई तेजी से निपटने के लिए कोविड अस्पतालों में ऑक्सीजन युक्त बेड समेत दूसरे बुनियादी ढाँचे सुविधाओं को बढ़ाने की सलाह केंद्रीय मंत्री ने दी है।

पंजाब में बेकार पड़े वेंटिलेटर

एक रिपोर्ट के मुताबिक, कोरोना वायरस की दूसरी लहर के कहर के बीच मार्च के अंत तक 250 से अधिक वेंटिलेटर पंजाब राज्य सरकार के गोदामों में बेकार ही पड़े हुए थे। बताया गया कि इन मशीनों को इंस्टाल करने के लिए टेक्नीशियनों की कमी थी।

ऐसा पहली बार नहीं है, जब राज्य के अस्पतालों में वेंटिलेटर ऐसे ही पड़े रहे हों। करीब 5 साल पहले 10 वेंटिलेटर को लुधियाना के सिविल अस्पताल में भेजा गया था, लेकिन जब तक महामारी का कहर नहीं बरपा ये ऐसे ही पड़े रहे। उस दौरान इसे एक स्थानीय अस्पताल को सौंपने की तैयारी थी।

गौरतलब है कि पंजाब में कॉन्ग्रेस की सरकार है और झारखंड में वह गठबंधन में है।

केरल में नहीं थम रहा नन के मरने का सिलसिला, सेंट जोसेफ कॉन्वेंट के कुएँ में मिला एक और शव: जाँच जारी

केरल में शुक्रवार (16 अप्रैल, 2021) को सेंट जोसेफ कॉन्वेंट के कुएँ में एक 42 वर्षीय कैथोलिक नन मृत पाई गई। यह घटना दक्षिण केरल के कुरीपुझा जिले की बताई जा रही है। बताया जा रहा है कि सुबह की प्रार्थना में नन मेबल जोसेफ के न दिखाई देने पर उनकी तलाश शुरू की गई। यहाँ करुणागप्पाली की निवासी और कॉन्वेंट में रहने वाली एक अन्य महिला ने सुबह परिसर के भीतर मौजूद कुएँ में जोसेफ का शव देखा, तो उन्होंने इसकी सूचना पुलिस को दी।

पुलिस ने बताया कि प्राथमिक जाँच में यह मामला आत्महत्या का लगता है। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और जाँच होने के बाद ही अन्य जानकारी मिल सकेगी। उन्होंने बताया कि नन के कमरे से एक सुसाइड नोट मिला है, जिसे हो सकता है उन्होंने ही लिखा हो। सुसाइड नोट के अनुसार नन की मौत के लिए कोई जिम्मेदार नहीं है।

उन्होंने स्वास्थ्य कारणों से चलते आत्महत्या जैसा कदम उठाया। पुलिस ने बताया, जाँच की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और शव को पोस्टमार्टम के लिए तिरुवनंतपुरम के सरकारी मेडिकल कॉलेज में भेज दिया गया है।

केरल में कॉन्वेंट के भीतर मौजूद कुओं के अंदर इससे पहले भी कई नन मृत पाई गई हैं। इस साल फरवरी में एक 45 वर्षीय नन, जो एर्नाकुलम जिले के वाझक्कल में एक कॉन्वेंट में रह रही थी। वह कॉन्वेंट के पास एक खदान के अंदर मृत पाई गई थी।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, साल 1989 से अब तक केरल में कम से कम 20 निर्दोष नन कुएँ में मृत पाई गई हैं। इस सनसनीखेज खुलासे में अभय मर्डर केस भी शामिल है, जो 1992 में हुआ था।

पिछले साल मई में नन बनने के लिए अध्ययन कर रही 21 वर्षीय दिव्या पी जॉनी को तिरुवल्ला में अपने कॉन्वेंट के एक कुएँ में मृत पाया गया था। सितंबर 2018 में पठानपुरम की एक अन्य नन को उसके कॉन्वेंट के पास एक कुएँ में मृत पाया गया था। यह 55 वर्षीय नन सुसान मैथ्यू पठानपुरम के सेंट स्टीफन स्कूल में शिक्षक थीं।