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वामपंथियों के गढ़ जेएनयू में फैला कोरोना, 74 छात्र और स्टाफ संक्रमित: 4 की हालत गंभीर

कोरोना वायरस के कहर के बीच वामपंथियों के गढ़ माने जाने वाले जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली में भी कोविड ने एंट्री मार ली है। विश्वविद्यालय के स्वास्थ्य केंद्र से मिली जानकारी के मुताबिक 74 छात्र और स्टाफ संक्रमित पाए गए हैं।

संक्रमितों में 11 विश्वविद्यालय के स्टाफ हैं। 4 लोगों की हालत गंभीर बताई जा रही है। क्रिटिकल कंडीशन में दो को फोर्टिस तो एक को बीएल कपूर अस्पताल में भर्ती कराया गया है। बाकी सभी को झज्जर एम्स और सुल्तानपुरी के क्वारंटाइन सेंटर में रखा गया है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, विश्वविद्यालय के लिए एंबुलेंस की व्यवस्था करने वाले व्यक्ति ने बताया कि संक्रमण की हालत इतनी बुरी है कि 18 अप्रैल को एक छात्र की हालत खराब होने के बाद उसे 3 अस्पतालों में ले गए, लेकिन कहीं भी भर्ती नही किया जा सका। इसके बाद अंत में बीएल कपूर अस्पताल में उसे एडमिट कराया जा सका। ड्राइवर ने बताया कि छात्र का ऑक्सीजन लेवल 40 से भी नीचे पहुँच गया था। वहीं फोर्टिस में 3-4 घंटे लंबे इंतजार के बाद दो अन्य को एंट्री मिली।

एक स्वास्थ्यकर्मी के मुताबिक क्वारंटाइन सेंटर में रखे गए छात्रों में से एक दो को छोड़कर सभी को ऑक्सीजन के सपोर्ट पर रखा गया है। अधिकतर लोगों का ऑक्सीजन लेवल 40 से नीचे आ गया था और उनकी नाक से खून निकलने लगा था। हालाँकि, अभी सभी की हालात बेहतर है।

विश्वविद्यालय में हालात हुए बदतर

कोरोना की सेकेंड वेव से देश में सबसे ज्यादा प्रभावित राज्यों में दिल्ली भी शामिल हैं। यहाँ वामपंथ की पाठशाला जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में कोविड के चलते हालात बेहद बुरे हो गए हैं। विश्वविद्यालय में 3,000 छात्र, 1000 स्टाफ और 350 गार्ड समेत 4,350 कर्मचारी हैं। संक्रमण तेजी से फैलने के कारण बाकियों पर भी इसका खतरा मंडरा रहा है।

बदतर होते हालात को देखते हुए यूनिवर्सिटी ने कोविड-19 रिस्पांस कमेटी बना दी है। 9 सदस्यीय कमेटी में रजिस्ट्रार इसके अध्यक्ष हैं। कमेटी के सदस्य डॉ सौरभ शर्मा ने बताया है कि वो लोग लगातार छात्रों के संपर्क में बने हुए हैं।

‘वाजिद के हिबानामा में बच्चों को संपत्ति में हक़ नहीं’: साजिद और उनकी अम्मी के खिलाफ बॉम्बे HC पहुँची पारसी बीवी कमलरुख

दिवंगत संगीतकार वाजिद खान की पत्नी कमलरुख ने पारिवारिक संपत्ति के विवाद में बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया है। उन्होंने वाजिद के भाई साजिद खान और उनकी अम्मी के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाल ही में ये खबर भी आई थी कि पिछले साल जून में वाजिद खान के इलाज के दौरान साजिद की बीवी ने अपनी किडनी दी थी। खान परिवार वाजिद की मौत के बाद से ही विवादों में है।

वाजिद खान की पत्नी ने कहा है कि उनके शौहर ने अपने निधन से पहले अपनी संपत्ति को बीवी और बच्चों के नाम किया था। उन्होंने कोर्ट में दावा किया कि बीवी-बच्चों के अलावा उस संपत्ति में कोई और दावेदार नहीं है। वाजिद की मौत कोरोना की वजह से हुई थी। उन्होंने साजिद और उनकी अम्मी पर उन्हें अकेले करने से खिलाफ भी कार्रवाई की माँग की। साथ ही खुद की और बच्चों के हितों की रक्षा की माँग की।

बता दें कि पारसी कमलरुख धर्मांतरण के दबावों के कारण बाकी परिवार से अलग रहती थीं। वाजिद भी बीवी के साथ ही रहते थे। 2014 में विवाद इतना बढ़ गया था कि वाजिद ने तलाक की अर्जी भी बांद्रा कोर्ट में दायर कर दी थी। कमलरुख ने कहा कि वाजिद ने अपनी संपत्ति उस दौरान जिन शर्तों पर हस्ताक्षर किया था, उसमें अपनी संपत्ति के रखरखाव की जिम्मेदारी बीवी-बच्चों को दी थी और कुछ अचल संपत्ति उनके नाम भी की थी।

कमलरुख ने आरोप लगाया कि साजिद खान ने भाई की मौत के बाद वाजिद की संपत्ति जिन-जिन सोसाइटीज में थी, उन सब से संपर्क कर के अकाउंट मैनेजर्स को कमलरुख का फोन कॉल न उठाने को कहा। आरोप है कि साजिद ने संपत्ति हड़पने के लिए अपना नाम ‘साजिद वाजिद’ रखने की भी कोशिश की। जबकि साजिद और उनकी अम्मी का कहना है कि वाजिद के ‘हिबानामा’ के हिसाब से बच्चों को कुछ नहीं मिलने वाला है।

बता दें कि नवंबर 2020 में अपने शुरुआती रिश्ते की बातें बताते हुए कमलरुख ने कॉलेज दिनों को याद किया और बताया कि जब उन्होंने शादी करने का फैसला किया, उस समय मजहब परिवर्तन की बात उठी थी। कमलरुख के मुताबिक, वाजिद एक ऐसे परिवार से आते थे, जिनका मानना था कि यदि कमलरुख को उनके परिवार में शादी करनी है, तो धर्मांतरण जरूरी होगा। हालाँकि वह इस बात से नाखुश थीं और वाजिद को ये सब चीजें अपनी शादी में बाधा लग रही थी।

‘मंदिर वहीं बन रहा… बेड माँग शर्मिंदा न करें’: अब कोरोना की आड़ में मंदिर और मोदी के लिए स्वरा भास्कर ने दिखाई घृणा

मुद्दा कोई भी हो स्वरा भास्कर का एकमात्र एजेंडा है, हिंदूफोबिया। वह अक्सर राम मंदिर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर अपनी घृणा का प्रदर्शन सोशल मीडिया में करती रहती हैं। अब उन्होंने अपना यह एजेंडा कोरोना की आड़ लेकर बढ़ाया है।

स्वरा भास्कर ने इंस्टाग्राम स्टोरी में एक फोटो शेयर किया है। फोटो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की है। तस्वीर में पीएम मोदी हाथ जोड़े नजर आ रहे हैं। इसके साथ ही तस्वीर पर लिखा है, “मंदिर वहीं बन रहा है। अस्पताल में बेड माँग कर शर्मिंदा न करें। धन्यवाद।” फोटो के कोने में स्वरा ने ‘वाया वाट्सएप’ लिखा है। 

swara bhasker  prime minister narendra modi
स्वरा भास्कर के इंस्टाग्राम स्टोरी का स्क्रीनशॉट

बता दें कि कोरोना के बढ़ते प्रकोप को लेकर कोहराम मचा हुआ है। अस्पतालों में बेड, ऑक्सीजन, वेंटिलेटर, दवाई आदि की काफी किल्लत हो रही है। हालाँकि केंद्र सरकार हर राज्य की माँग की पूर्ति कर रही है, मगर फिलहाल स्थिति भयावह दिख रही है। ऐसे समय में देश के साथ खड़े होने के बजाय कुछ लोग प्रोपेगेंडा फैलाने से बाज नहीं आ रहे।

ऐसे लोगों में कॉमेडियन रोहन जोशी जैसे नाम भी शामिल हैं। खुद को कॉमेडियन बताने वाली यह जमात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ विपक्षी प्रोपेगेंडा को धार देती है। लेकिन सत्ता के खिलाफ बोलने का दंभ भरने वाले ये कॉमेडियन उद्धव ठाकरे के खिलाफ चूँ तक करने की हिम्मत नहीं रखते, क्योंकि इनमें से अधिकतर मुंबई में ही रहते हैं।

रोहन जोशी ने अपने इंस्टाग्राम स्टोरी में लिखा था, “वो सभी भक्त जिन्होंने इस महामारी के दौरान अपने किसी परिचित को खोया, आप मजबूत बने रहिए। आपके पापा और अक्षय कुमार मिल कर एक सुन्दर सा मंदिर बना रहे है, जहाँ जाकर आप अपने मृत परिजनों की आत्माओं की शांति के प्रार्थना कर सकते हैं।”

अव्वल तो ये कि रोहन जोशी ने अपनी अगली स्टोरी में इस बयान का खुल कर बचाव भी किया। उसने लिखा, “लोग मेरी पिछली इंस्टाग्राम स्टोरी को अभद्र बता रहे हैं। मुझे लगता है कि आप सब ने मेरे क्रोध और अपमान को कम कर आँका है। F@#k Bhakts! इस परिस्थिति के लिए सीधे वही जिम्मेदार हैं। मैं अब भी देख रहा हूँ कि उनमें से अधिकतर अभी भी उनका (पीएम मोदी) बचाव कर रहे हैं। मुझे उनके लिए जरा सी भी सहानुभूति नहीं है, बल्कि केवल अवमानना का भाव है।” आप इन शब्दों पर गौर कीजिए।

मेडिकल ऑक्सीजन की आपूर्ति, रेमेडेसिविर एवं अन्य दवाओं के पर्याप्त स्टॉक हों सुनिश्चित: CM योगी ने दिया सख्त आदेश

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने देश में कोरोना वायरस प्रकोप की दूसरी लहर के बीच मेडिकल ऑक्सीजन की बिना किसी रुकावट की आपूर्ति सुनिश्चित करने के प्रयासों को आगे बढ़ाया है। यूपी सरकार ने राज्य के सभी अस्पतालों में मेडिकल ऑक्सीजन की निर्बाध आपूर्ति के लिए 10 ऑक्सीजन प्लांट स्थापित करने का आदेश दिया है।

यूपी सरकार के सूत्रों के अनुसार, संयंत्र राज्य भर में विभिन्न स्थानों पर स्थापित किए जा रहे हैं और वे एक सप्ताह के भीतर पूरी तरह फंक्शन में आ जाएँगे। कोरोना वायरस के मामलों में लगातार वृद्धि के साथ, योगी आदित्यनाथ ने रविवार (अप्रैल 18, 2021) को अधिकारियों को राज्य के प्रत्येक अस्पताल में न्यूनतम 36 घंटे का ऑक्सीजन बैकअप सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को अस्पतालों में अग्नि सुरक्षा उपकरणों का निरीक्षण करने का भी निर्देश दिया।

सरकार ने पहले ही निर्देश जारी किए हैं कि उद्योग के काम के लिए आपूर्ति की जा रही सभी मेडिकल ऑक्सीजन को तुरंत रोक दिया जाना चाहिए, और पूरी आपूर्ति केवल अस्पतालों को उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से एक समीक्षा बैठक की अध्यक्षता करते हुए, योगी आदित्यनाथ ने अधिकारियों को COVID समर्पित अस्पतालों के लिए तेजी से ऑक्सीजन सिलेंडर खरीदने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य अधिकारियों को ऑक्सीजन की 15 दिनों की माँग का आकलन करने के बाद जल्दी से कार्य करना चाहिए। सीएम ने विशेष रूप से चिकित्सा शिक्षा मंत्री सुरेश खन्ना से कहा कि वे राज्य में ऑक्सीजन की आपूर्ति पर नज़र रखें।

रेमेडेसिविर इंजेक्शन और अन्य चिकित्सा सप्लाई सुनिश्चित हो

राज्य के अस्पतालों में ऑक्सीजन की आपूर्ति की निगरानी के अलावा, यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ ने संबंधित विभागों से कहा है कि वे राज्य में रेमेडेसिविर इंजेक्शन की उपलब्धता पर कड़ी निगरानी रखें, ताकि दवाओं की कोई कमी न हो।

मुख्यमंत्री ने खाद्य एवं औषधि प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा कि कोविड -19 के मरीजों को होम आइसोलेशन में दवाओं की कमी का सामना न करना पड़े। उन्होंने एफडी कंट्रोल रूम को रेमेडेसिविर स्टॉक की बारीकी से निगरानी करने का निर्देश दिया और चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री जय प्रताप सिंह से कहा कि वे रेमेडेसिविर की आपूर्ति शृंखला सुनिश्चित करें। इसके अलावा यूपी सरकार ने 24/7 कंट्रोल रूम भी स्थापित किया है जहाँ अधिकारी दैनिक आधार पर स्टॉक की उपलब्धता का मूल्यांकन करेंगे।

योगी आदित्यनाथ ने अधिकारियों को दिया सख्त निर्देश दिया

अपने वर्चुअल मीटिंग में, योगी आदित्यनाथ ने अधिकारियों को COVID-19 प्रकोप से प्रभावित क्षेत्रों में आईसीयू और आइसोलेशन बेड की क्षमता का विस्तार करने के लिए भी कहा। सीएम ने कहा कि कानपुर के जीएसवी मेडिकल कॉलेज, रामा मेडिकल कॉलेज और नारायण मेडिकल कॉलेज में सुविधाओं को अपग्रेड किया जाना चाहिए।

इसके अलावा, सीएम ने वीकेंड में लॉकडाउन और अन्य राज्यों से आने वाले यात्रियों की स्क्रीनिंग को सख्ती से अंजाम देने के दौरान स्वच्छता अभियान चलाने और फॉगिंग करने की भी सिफारिश की। उन्होंने कहा कि कोविड​​-19 से संक्रमित लोगों को पर्याप्त सुविधाओं से लैस किया जाना चाहिए। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से कहा कि वे जल्द से जल्द मामलों का पता लगाने और वायरस के प्रसार को रोकने के लिए RTPCR टेस्ट करें।

इसके अलावा, योगी आदित्यनाथ ने अधिकारियों को बड़ी संख्या में लोगों को इकट्ठा न रहने और अपने घरों से बाहर निकलने वाले लोगों के लिए मास्क लगाने के ड्राइव को तेज करने के लिए कहा। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करें, जैसे कि मास्क न पहनने पर 1000 रुपए का जुर्माना लगाएँ।

‘मई में दिखेगा कोरोना का सबसे भयंकर रूप’: IIT कानपुर की स्टडी में दावा- दूसरी लहर कुम्भ और रैलियों से नहीं

देश के सबसे बड़े शैक्षिक संस्थानों में से एक IIT कानपुर में कोरोना को लेकर किए गए एक अध्ययन में पाया है कि कुम्भ में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़ या चुनावी रैलियों में आए लोगों से इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। रिसर्च के अनुसार, मई 2021 कोरोना की दूसरी लहर का सबसे भयंकर रूप देखने को मिलेगा। कुछ राज्यों में यह अप्रैल के अंत में पीक पर होगा। IIT कानपुर के प्रोफेसर पद्मश्री मणिंद्र अग्रवाल ने इस अध्ययन में सभी राज्यों में अलग-अलग कोरोना के पीक टाइम और ग्राफ गिरने की तारीख का अनुमान लगाया है।

प्रोफेसर मणिन्द्र और उनकी टीम ने पूरे देश के डेटा का अध्ययन किया और अलग-अलग राज्यों में मिलने वाले कोरोना के साप्ताहिक आँकड़ों को भी देखा। एक कम्प्यूटर आधारित मॉडल पर ये सब कुछ किया गया। ‘दैनिक भास्कर’ ने उनसे बातचीत की, जिसमें उन्होंने बताया कि महाराष्ट्र में कोरोना का उच्चतम स्तर आ चुका है और राज्य में अब अगले कुछ दिनों में संक्रमितों की संख्या बढ़ने की बजाए घटने लगेगी। 

उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, दिल्ली और राजस्थान में 20 से 30 अप्रैल के बीच सबसे ज्यादा कोरोना के मरीज मिलेंगे। अध्ययन में जुटाए गए आँकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में एक दिन में सबसे ज्यादा 32,000 केस आने की आशंका है। इसके बाद दिल्ली में यह आँकड़ा 30,000, पश्चिम बंगाल में 11,000, राजस्थान में 10,000 और बिहार में 9,000 के आसपास रह सकता है।

इस रिसर्च में सबसे बड़ी बात कुम्भ और चुनावी रैलियों को लेकर पता चली। प्रोफेसर मणिंद्र अग्रवाल ने कहा कि इन दोनों आयोजनों से कोरोना के प्रसार पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उन्होंने बताया कि कुछ मामलों में जरूर बढ़ोतरी होगी, लेकिन कोई ऐसा असर नहीं दिखेगा जिससे देश की स्थिति बिगड़ जाए। साथ ही उन्होंने पूछा कि जो लोग बंगाल, केरल, तमिलनाडु में केस बढ़ने का कारण रैली और सभाओं को बता रहे हैं वो महाराष्ट्र और दिल्ली के लिए क्या कारण बताएँगे? 

कोरोना को लेकर IIT कानपुर का अध्ययन

उन्होंने कारण बताया कि खुली जगह में आयोजित इन कार्यक्रमों से कोरोना वायरस नहीं फैलेगा। उन्होंने पाया कि पहले चरण में सामान्य और गरीब लोगों को कोरोना ने ज्यादा निशाना बनाया था, क्योंकि एक तो वो बाहर रह कर काम कर रहे थे और दूसरा बचाव के लिए उनके पास संसाधन नहीं थे। अपार्टमेंट्स और बड़े घरों में रहने वाले लोग तो उसमें ही कैद हो गए थे। टीकाकरण शुरू हुआ तो ये लोग निकले। उन्होंने बताया कि इसी कारण दूसरे हमले में ज्यादा से ज्यादा लोग इसके शिकार हो रहे हैं।

उन्होंने जानकारी दी कि गुजरात, मध्य प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों का डेटा भी अभी साफ नहीं है, जबकि तमिलनाडु में 6 मई को सबसे ज्यादा मामले आने की आशंका है। अध्ययन में पाया गया कि कोरोना के मामले कम होने पर लोगों ने भी खूब लापरवाही की।

बता दें कि कोरोना के खिलाफ लड़ाई में स्वतः आगे कर अखाड़ों ने कुम्भ के समाप्ति की घोषणा की है और इसे अब प्रतीकात्मक ही रखा गया है। उत्तराखंड और हरिद्वार को कोरोना वायरस से सुरक्षित रखने और इसके लिए जारी सरकारी दिशा-निर्देशों का पालन ठीक से हो, इसीलिए अखाड़ों ने ये फैसला लिया है। निरंजनी अखाड़ा, आनंद अखाड़े और जूना अखाड़ा ने ये घोषणा की, जिसका अन्य साधुओं ने अनुमोदन किया।

‘कुम्भ में जाकर कोरोना+ हो गए CM योगी, CMO की अनुमति के बिना कोविड मरीजों को बेड नहीं’: प्रियंका व अलका के दावों का फैक्ट चेक

प्रियंका गाँधी और अलका लाम्बा ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर अलग-अलग दावे किए हैं। जहाँ कॉन्ग्रेस नेता प्रियंका गाँधी ने CMO की अनुमति के बिना मरीजों को अस्पताल में बेड्स नहीं मिल रहे हैं, वहीं अलका लाम्बा ने सीएम योगी आदित्यनाथ के कोरोना पॉजिटिव होने और कुम्भ को साथ में जोड़ा। आइए, यहाँ देखते हैं कि इन दोनों ही दावों की सच्चाई क्या है और इनके दावों में कितना दम है।

प्रियंका गाँधी ने सोशल मीडिया के माध्यम से दावा किया, “कई जगहों से सूचना आ रही है कि कई गंभीर मरीजों को CMO के पत्र के बिना एडमिट नहीं किया जा रहा। मुख्यमंत्री जी, CMO के पत्र के इंतजार में लोगों की जानें जा रही हैं। कृपया ये नियम बंद कराएँ, लोगों की जान बचाएँ। ऐसी व्यवस्था बनाएँ जिससे कि गंभीर मरीजों का अस्पताल में एडमिशन आसान हो सके।” ब्रजेश मिश्रा जैसे पत्रकारों ने भी इस दावे को आगे बढ़ाया।

उत्तर प्रदेश के ‘सूचना एवं जनसंपर्क विभाग’ ने इस दावे का खंडन किया है। विभाग ने ‘इन्फो उत्तर प्रदेश फैक्ट चेक’ के जरिए बताया, कोरोना संक्रमित मरीज को इंटीग्रेटेड कोविड एंड कमांड कंट्रोल रूम की मदद से एम्बुलेंस से लेकर टेस्ट और अस्पताल में भर्ती करने की व्यवस्था की जाती है। सरकार ने कहा कि ऐसा कोई नियम ही नहीं है कि कोविड-19 पॉजिटिव मरीज को भर्ती होने के लिए सम्बंधित जिले के ‘चीफ मेडिकल ऑफिसर (CMO) से अनुमति पत्र लेना होगा।

कॉन्ग्रेस की एक अन्य नेता अलका लाम्बा ने योगी योगी आदित्यनाथ की साधुओं के साथ नदी में स्नान करते हुए एक तस्वीर शेयर की और लिखा, “योगी आदित्यनाथ कोरोना पॉजिटिव हुए। ये कौन सी जमात में जाकर आए थे? पूछता है भारत।” उन्होंने कुम्भ की तबलीगी जमात से तुलना वाले नैरेटिव को आगे बढ़ाया। इसके बाद सोशल मीडिया पर कई अन्य लोगों ने भी इस तस्वीर को हरिद्वार कुम्भ 2021 की बताया।

अलका लाम्बा ने तस्वीर शेयर कर चलाया प्रोपेगंडा

साथ ही अमित शाह की भी ऐसी ही तस्वीर शेयर की गई। जबकि सच्चाई कुछ और ही है। ये तस्वीर फरवरी 2019 की है और स्थान है प्रयागराज। तब प्रयागराज संगम में लगे कुम्भ में इन दोनों ने डुबकी लगाई थी। यानी, ये तस्वीरें भारत में कोरोना का पहला मामला सामने आने के 1 साल पहले की है। फिर भी कॉन्ग्रेस नेता यूपी सीएम को बदनाम करने के लिए इस तरह के तिकड़म चल रहे हैं, जिसकी अब पोल खुल गई है।

पुलिस अधिकारियों को अगवा कर मस्जिद में ले गए, DSP को किया टॉर्चरः सरकार से मोलभाव के बाद पाकिस्तान में छोड़े गए बंधक

प्रतिंबंधित इस्लामी संगठन तहरीक-ए-लब्बैक (TLP) पाकिस्तान ने अगवा किए गए 11 पुलिसकर्मियों को रिहा कर दिया है। पाकिस्तान की पंजाब प्रांत की सरकार के साथ मोलभाव के बाद यह कदम उठाया गया है। इन पुलिसकर्मियों को लाहौर में हिंसक झड़पों के बाद रविवार (18 अप्रैल 2021) को बंधक बना लिया गया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, फ्रांस के राजदूत को देश से बाहर निकालने की शर्त पर पुलिस अधिकारियों को रिहा किया गया है।

सोमवार को पाकिस्तान के गृह मंत्री शेख राशिद अहमद ने 11 पुलिसकर्मियों की रिहाई की पुष्टि की। उन्होंने ट्विटर पर एक वीडियो शेयर कर कहा, ”टीएलपी के साथ बातचीत शुरू हो गई है। बातचीत का पहला दौर सफलतापूर्वक रहा और दूसरा दौर सेहरी के बाद होगा। उन्होंने उन 11 पुलिसकर्मियों को रिहा कर दिया है जिन्हें बंधक बनाकर रहमतुल लील अलमीन मस्जिद (यतीम खाना चौक) ले जाया गया था। पुलिस ने भी अपने कदम पीछे खींच लिए हैं।”

उन्होंने आगे कहा, ”हमें उम्मीद है कि सेहरी के बाद दूसरी बैठक भी बेहतर साबित होगी और टीएलपी के साथ इन मामलों पर बातचीत कर समाधान निकाला जाएगा।” मालूम हो कि पाकिस्तान ने कट्टरपंथी इस्लामी पार्टी तहरीक-ए-लब्बैक-पाकिस्तान (टीएलपी) पर आतंकवाद कानून के तहत गुरुवार को औपचारिक रूप से प्रतिबंध लगा दिया था। उस पर पुलिसकर्मियों के अपहरण करने का मामला भी दर्ज किया गया था। लाहौर CCPO (अतिरिक्त महानिरीक्षक) गुलाम महमूद डोगर ने भी बातचीत की प्रक्रिया में भाग लिया।

पंजाब पुलिस के प्रवक्ता राणा आरिफ ने बताया कि कि टीएलपी कट्टरपंथियों ने जिन पुलिस अधिकारियों बंधक बनाया था, उनमें एक पुलिस उपाधीक्षक (डीएसपी) भी थे। उन्होंने जोर देकर कहा कि DSP को प्रतिबंधित संगठन के समर्थकों द्वारा प्रताड़ित किया गया था।

रविवार को एक बयान में पंजाब पुलिस ने कहा था, ”आज सुबह बदमाशों ने नवाकोट पुलिस स्टेशन पर हमला कर दिया। इसके बाद वे डीएसपी का अपहरण कर उन्हें मरकज में ले गए। कट्टरपंथी एक तेल टैंकर के साथ करीब 50,000 लीटर पेट्रोल भी मरकज में लेकर गए थे।”

साथ ही यह भी कहा गया था, “बदमाश हथियारों से लैस थे। उन्होंने रेंजरों, पुलिस पर पेट्रोल बम से हमला किया। पुलिस ने मस्जिद या मदरसे के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। कार्रवाई केवल आत्मरक्षा में और सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा के लिए की गई थी।” हालाँकि, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान के सहयोगी डॉ. फिरदौर आशिक एवान ने ट्वीट कर 12 पुलिस अधिकारियों को अगवा किए जाने का दावा किया था।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में रिहा किए गए कुछ पुलिस अधिकारी खून से लथपथ और चोटिल नजर आ रहे हैं। उनके सिर के चारों ओर पट्टियाँ बँधी हुई हैं। पुलिस ने बाद में अनौपचारिक रूप से इस वीडियो के वास्तविक होने की पुष्टि की।

बता दें कि इमरान खान ने पिछले सप्ताह TLP को आतंकी संगठन बताते हुए बैन कर दिया था। वहीं, टीएलपी ने पाकिस्तान की इमरान सरकार को चेतावनी दी थी कि वे 20 अप्रैल तक फ्रांस के राजदूत को देश से बाहर निकाले। उनका कहना था कि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने विवादित पत्रिका शार्ली हेब्दो द्वारा पैगंबर मुहम्मद के बनाए गए कार्टून का बचाव किया था। इसके बाद से पाकिस्तान में फ्रांस विरोधी प्रदर्शनों की शुरुआत हुई, जिसकी अगुवाई कट्टरपंथी इस्लामी पार्टी तहरीक-ए-लब्बैक-पाकिस्तान ने की। इस दौरान देश के कई हिस्सों में हिंसा हो चुकी है।

कोरोना के चलते रैली नहीं करने की बात कह, बंगाल में बड़ी राजनीतिक रैलियाँ कर रही CPI(M): दोहरी नीति उजागर

कोरोना संकट के बीच सामाजिक जिम्मेदारी का दिखावा करते हुए एक सप्ताह पहले CPI (M) नेता और राज्यसभा के पूर्व सदस्य मोहम्मद सलीम ने ट्विटर पर ऐलान किया था कि संक्रमण को देखते हुए उनकी पार्टी अब कोई भी राजनीतिक रैली नहीं करेगी।

16 अप्रैल सलीम द्वारा किए गए ट्वीट में कहा गया था कि देश भर में वायरस फैल रहा है, इसलिए माकपा ने कोई बड़ा राजनीतिक कार्यक्रम आयोजित नहीं करने का फैसला किया है। अपने ट्वीट में उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता से अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने की अपील की।

मोहम्मद सलीम ने ट्वीट किया, “महत्वपूर्ण! कोरोना की सेकेंड वेव के चलते माकपा ने वायरस के प्रसार को रोकने के लिए कोई बड़ी रैली नहीं करने का फैसला किया है। कोरोना को ध्यान में रखते हुए हम डोर-टू-डोर और छोटे समूह की बैठकें करेंगे। हम सीएम और पीएम से आग्रह करते हैं कि वे जिम्मेदारी से काम करें और लोगों को पार्टी से ऊपर रखें।”

सोर्स: ट्विटर

हालाँकि, नैतिकता की ऊँची-ऊँची बातें करने के एक घंटे बाद ही मोहम्मद सलीम ने बंगाल के हेमटाबाद में CPI (M) द्वारा आयोजित संयुक्त मोर्चा के माकपा उम्मीदवार भूपेन बर्मन के समर्थन में बड़े रोड शो में भाग लिया।

इसको लेकर किसी और ने नहीं, बल्कि सीपीआई (एम) के उत्तर दिनाजपुर जिले के आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से जानकारी दी गई है। मोहम्मद सलीम के दावे के एक दिन बाद ही पार्टी ने बड़ा रोड शो किया। जहाँ रैली में शामिल किसी ने भी “मास्क” नहीं पहना था।

18 अप्रैल को मोहम्मद सलीम के दावों के एक दिन बाद कोरोना संकट को दरकिनार करते हुए सीपीआई (एम) ने बल्लीगंज विधानसभा क्षेत्र से उम्मीदवार फौद हलीम के समर्थन में भी विशाल रैली की।

सोर्स: ट्विटर

खास बात, यह है कि इससे पहले कॉमरेड सलीम ने ऐलान किया था कि माकपा देश में बड़े पैमाने पर कोरोनो वायरस प्रकोप के बीच बड़ी राजनीतिक रैलियों का आयोजन नहीं कर रही है। दूसरी ओर पार्टी की तरफ से बड़े पैमाने पर भीड़ को जुटाया जा रहा है। लेकिन, भीड़ जुटाने के बाद भी सीपीआईएम लोगों की भीड़ को वोटों में नहीं बदल पा रही है। बता दें कि पश्चिम बंगाल चुनाव में कॉन्ग्रेस और वामदलों के साथ गठबंधन में है।

सोर्स: ट्विटर
सोर्स: ट्विटर

राज्य में दोतरफा मुकाबला देख राहुल गाँधी ने कोरोना का हवाला दे रद्द की रैलियाँ

इससे पहले रविवार को कोरोना का राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश में कॉन्ग्रेंस नेता राहुल गाँधी सोशल मीडिया पर पश्चिम बंगाल में भविष्य में रैलियाँ नहीं करने को कहा था। खास बात यह है कि राहुल गाँधी ने यह घोषणा कई राजनीतिक रैलियाँ करने के बाद की।

उन्होंने दावा किया कि COVID की स्थिति को देखते हुए, वह पश्चिम बंगाल में तीन चरणों के मतदान के साथ सभी सार्वजनिक रैलियों को स्थगित कर रहे हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि राहुल गाँधी बढ़ते हुए COVID मामलों के बावजूद, अपनी बहन प्रियंका गाँधी वाड्रा द्वारा आयोजित बड़ी रैलियों में जाना जारी रखा है।

गौरतलब है कि बीते कुछ दिनों में पश्चिम बंगाल ने COVID-19 मामलों की संख्या तेजी से बढ़ी है। रविवार को राज्य में कोरोना के चलते 25 से अधिक मौतें हुईं, जबकि 8,000 से अधिक नए COVID-19 संक्रमण दर्ज किए। राज्य में आठ चरण का विधानसभा चुनाव चल रहा है। इस बीच पश्चिम बंगाल का COVID-19 केस रविवार को 6,59,927 पर पहुँच गया।

हेल्थ बुलेटिन के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में 8,419 नए संक्रमितों से साथ 28 मौतें हुई हैं। इसी के साथ राज्य में कोरोना से मरने वालों का आँकड़ा 10,568 पर पहुँच गया है।

जमातों के निजी हितों से पैदा हुई कोरोना की दूसरी लहर, हम फिर उसी जगह हैं जहाँ से एक साल पहले चले थे

हाल में एक ‘स्पीकिंग ट्रुथ टू पावर’ का जुमला खूब चला। ये जुमला क्यों था? क्योंकि इसका इस्तेमाल ही कुछ ऐसे तरीके से हो रहा था। सोशल मीडिया पर लिखे एक पोस्ट या 4-6 ट्वीट ‘सत्ता से सच पूछना’ तो नहीं हो सकता। उन्हें क्या जरूरत पड़ी है 4-6 ऐरे-गैरे नत्थू-खैरे की सोशल मीडिया पोस्ट देखने की?

आज ये सभी जानते हैं कि बड़े लोगों का सोशल मीडिया चलाने के लिए एक टीम होती है। मान लीजिए उनके लिए सोशल मीडिया चलाने वालों ने वो ट्वीट, वो पोस्ट या कमेंट देखा भी तो वो मंत्री या नेता को क्यों बताने जाएगा? उसका काम तो सोशल मीडिया पर नेताजी को प्रसिद्ध करना है! अपनी ही नाकामी वह काम और पैसे देने वाले को जाकर बता दे और काम हाथ से जाता रहे?

ये ‘स्पीकिंग ट्रुथ टू पावर’ तब होता जब विभागों को चिट्ठी लिखकर, आरटीआई के जरिए उनसे ये पूछा जाता कि जनता को बीमारी और इलाज के लिए जागरूक करने के लिए विभाग ने क्या किया? ये सवाल किसी आईएएस अफसर से होना चाहिए था। पूछा जाना था कि कितने अस्पतालों में नए वेंटिलेटर की सुविधा दी गई?

पूछा जाना था कि इस वेंटिलेटर को लगाने के लिए कितने कर्मचारियों को किसने प्रशिक्षण दिया? बिहार या दिल्ली में भी सवाल ये होना चाहिए था कि कोविड-19 के इलाज के लिए किन-किन इलाकों में कौन से अस्पताल तैयार कर दिए गए हैं? आज की तारीख में कम से कम बिहार में तो ये स्थिति है कि सरकारी अस्पतालों (एम्स, पीएमसीएच, एनएमसीएच किसी में भी) बेड खाली नहीं हैं।

इसके बाद मरीज और उसके परिजन क्या करेंगे? चूँकि अखबारों में लगातार ये सरकारी प्रचारों के जरिए नहीं बताया जा रहा कि किस अस्पताल में इसके इलाज की व्यवस्था है और कहाँ कितने बेड खाली हैं, इसलिए मरीज और उसके परिजन एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भटकते रहने को मजबूर हैं।

क्यों सरकारों से इतना भी नहीं हो पाया कि लाखों का प्रचार रोज देते रहने के बाद भी कोविड-19 के इलाज के लिए अस्पतालों की एक सूची छपवा देते? वेंटिलेटर लगाने के लिए मिलने वाले प्रशिक्षण की भी वही स्थिति है। नए लोगों को वेंटिलेटर लगाने, आँगनबाड़ी-आशा कर्मचारियों को इस बारे में प्रशिक्षित करने के लिए क्या किया गया है, ये भी पूछा जाना चाहिए।

एक सिद्धांत अक्सर ‘अवतारवाद’ का भी सुनाई देता है। इसमें माना जाता है कि बहुसंख्यक भारतीय अपनी समस्याओं के लिए किसी अवतार के आने और समस्या सुलझा देने का इंतजार करते हैं। शायद विदेशों के कोई ‘सुपरमैन’ आएगा वाली सोच से ये जन्मा होगा। यहाँ स्वास्थ्य व्यवस्था राज्य सरकार के हाथ में होती है।

उनसे कड़े सवाल पूछने के बदले लोग इंतजार कर रहे हैं कि कोई मोदी आएगा और जादू की छड़ी घुमा कर सब ठीक कर देगा? पिछले वर्ष जब इसी दौर में लॉकडाउन लगा था तो इससे अर्थव्यवस्था चौपट हो गई का शोर मचाने जो लोग आए थे वो सब इस स्थिति के लिए बराबर के जिम्मेदार हैं। आज जब दिल्ली के व्यावसायिक संगठन खुद ही बाजार बंद कर रहे हैं, उस समय उनकी बातें भी तो याद आएँगी ही!

चाहें या ना चाहें, ये स्वीकारना होगा कि इसकी शुरुआत तभी हो गई थी जब अक्टूबर-नवंबर के दौरान बिहार में चुनाव करवाए जा रहे थे। उस वक्त तेजस्वी यादव की रैलियों में भीड़ दिख रही थी और ‘स्पीकिंग ट्रुथ टू पावर’ वालों ने भीड़, मास्क की अवहेलना, आपसी दूरी जैसे नियमों से आँखें मूँद ली थीं। इन चुनावों में चुनाव आयोग ने वर्चुअल रैलियों की बात भी की थी। उस समय इस पर फैसला लेने के लिए बैठक हुई थी।

इस बैठक में कॉन्ग्रेस, राजद, सीपीआई (एमएल), आरएलएसपी, सीपीआई, सीपीआई (एम) के नेता मौजूद थे। उन्होंने इस कदम का पूरा विरोध किया था। उस वक्त तक कोरोना का कहर भी केंद्र सरकार के क़दमों से नियंत्रण में आने लगा था। ऊपर से तेजस्वी जीतते दिख रहे थे तो वर्चुअल रैलियों के बदले भीड़ लगाने की छूट मिली।

शायद लोगों को लगा था कि कोरोना का खतरा टल गया। बीमारियों से बचने के लिए खुद स्वच्छता रखनी होती है, परहेज कोई और नहीं कर देगा, ये बातें लोग भूल गए थे। फिर ‘स्पीकिंग ट्रुथ टू पावर’ जमातों के अपने निजी हित तो सधते ही थे! नतीजा ये हुआ कि एक के बाद एक चुनाव घोषित होते रहे और हम एक गोल चक्कर लगाने के बाद फिर से उसी जगह पर हैं, जहाँ से हम एक साल पहले चले थे। बल्कि पिछले वर्ष तक तो मौतों की खबर कहीं दूर-दराज से अख़बार-समाचार के जरिए आती थी। इस वर्ष तो वो रिश्तेदारों-दोस्तों के फ़ोन से आने लगी है। पिछले वर्ष से भी बुरी स्थिति से निपटने के लिए पहले से ज्यादा सख्त कदम तो उठाने ही होंगे।

महामारी या आपदा की स्थिति में सरकार या किसी और की सहायता कब आएगी, इसका बैठकर इंतजार तो नहीं किया जा सकता। हमारे हाथ में खुद के ऊपर प्रतिबन्ध लगाना तो है ही। अगर बहुत जरूरी ना हो तो घरों से ना निकलें। एक वर्ष में ज़ूम, गूगल मीट, जैसे दर्जनों ऐसे सॉफ्टवेयर हैं, जो मीटिंग को डिजिटल-वर्चुअल तरीके से निपटा सकते हैं।

उनका इस्तेमाल अधिकांश बड़ी निजी कंपनियाँ पहले से ही कर रही हैं। स्थानीय दुकानदारों को भी कोऑपरेटिव की तरह साथ मिलकर होम डिलीवरी जैसी व्यवस्थाएँ तैयार करनी होंगी। फिल्म थिएटर को खोला जाना एक मूर्खतापूर्ण फैसला था। ऐसी गैरजरूरी चीज़ों को फ़ौरन फिर से बंद किया ही जाना चाहिए।

विवाह जैसे आयोजनों में भीड़ की इजाजत ना होने के कारण शादियों और ऐसे दूसरे आयोजनों में दिखावे के लिए फिजूलखर्ची भी कम हो गई थी। थोड़ी ढील मिलते ही उसमें वही सब शुरू हो गया- ज्यादा से ज्यादा लोगों को बुलाना, सजावट से लेकर खाने की बर्बादी तक में फिजूलखर्ची।

जब कोरोना संक्रमण के फैलने के खतरों को देखते हुए कुंभ जैसे आयोजनों को साधु ही प्रतीकात्मक कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ केरल ने ‘थ्रिस्सुर पूरम’ मनाए जाने की इजाजत दे दी है। ये तब है जब केरल में टेस्ट के पॉजिटिव निकलने की दर 17% पर पहुँची हुई है। मगर फिर वहाँ तो एक सेक्युलर सरकार है, तो ‘स्पीकिंग ट्रुथ टू पावर’ का नियम वहाँ लागू नहीं होगा।

पूरे मामले को निष्पक्ष तरीके से देखा जाए तो बस एक बात नजर आती है। भारत में तंत्र कुछ इस तरह से चलता है, जिसमें अधिकार तो किन्हीं अधिकारियों के पास होते हैं, लेकिन जवाबदेही किसी के सर नहीं होती। हम सबने मिलकर अपनी-अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ा है। उसका नतीजा है कि अब हमें दोबारा कोरोना लहर का सामना करना पड़ रहा है। पूरे मामले में अच्छी बात ये है कि हमारे पास एक बार इस चुनौती को पीछे धकेलने का अनुभव है। कोशिश कीजिए, हम इसे दोबारा हरा सकते हैं!

‘दवाओं से नहीं, पैग से असर होगा’: दिल्ली में लॉकडाउन के ऐलान पर शराब लेने पहुँची महिला की बात सुन पकड़ लेंगे माथा

दिल्ली में कोरोना संक्रमण पर काबू पाने के लिए केजरीवाल सरकार ने आज (अप्रैल 19, 2021) से 26 अप्रैल तक लॉकडाउन का ऐलान किया है। इस दौरान जरूरी सेवाओं को छोड़कर बाकी सब बंद रहेगा। दिल्ली सरकार ने शराब की दुकानों पर भी प्रतिबंध लगाया। लॉकडाउन के ऐलान के बाद दिल्ली में शराब की दुकानों पर लंबी-लंबी लाइनें लग गईं। क्या महिला, क्या पुरुष, क्या वृद्ध सभी इन लाइनों में लगे नजर आए। यहाँँ एक महिला ने तो ये तक दावा कर दिया कि जो इंजेक्शन नहीं कर सकता, वह अल्कोहल कर देगा।

शिवपुरी गीता कॉलोनी स्थित एक दुकान के बाहर शराब खरीदने के लिए खड़ी महिला ने कहा कि उसे कोविड-19 का इंजेक्शन फायदा नहीं करेगा, अल्कोहल फायदा करेगा। महिला ने कहा कि उसे दवाओं से असर नहीं होगा, पैग से असर होगा।

महिला ने बताया कि अगले 6 दिन लॉकडाउन हैं, इसलिए वो एक बोतल और दो पव्वे लेने के लिए आई है। महिला ने जब सवाल किया गया कि आखिर उसे ऐसी क्या जरूरत आन पड़ी की वो कोरोना काल में भीड़ में दारू खरीदने के लिए आ गई, तो उसने कहा कि शराब में अल्कोहल होता है, उसे कोरोना का इंजेक्शन फायदा नहीं करेगा, अल्कोहल फायदा करेगा। महिला ने कहा कि जो भी लोग शराब पीएँगे, वो सभी सही रहेंगे।

महिला ने कहा कि लॉकडाउन से शराबियों को फर्क पड़ेगा, शराबियों को दवाइयों से कोई असर नहीं पड़ेगा, पैग से असर पड़ेगा। महिला ने आगे बताया कि उसे 35 साल हो गए पीते हुए, उसने कोई दूसरी डोज नहीं ली। उसने बताया कि हर रोज एक पैक लेती है, उसके बाद कुछ नहीं। महिला ने कहा कि दिल्ली में लॉकडाउन में शराब के ठेके खुलने चाहिएं। ठेके खुलने से वो डॉक्टरों के पास जाने से बच जाएँगे।

बता दें कि दिल्ली में अब तक कोरोना के 8,53,460 मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें से 74,941 अब भी सक्रिय हैं। पिछले 1 दिन में यहाँ 25,462 नए कोरोना मरीज सामने आए हैं और 161 की मौत हुई है। पिछले एक सप्ताह में कोरोना 2.4% की रफ़्तार से प्रतिदिन बढ़ा है। राज्य में मृत्यु दर 1.4% है। राज्य में अब तक 1.6 करोड़ लोगों की टेस्टिंग हो चुकी है। पिछले 1 सप्ताह में हालात ज्यादा बदतर हुए हैं। बावजूद इसके आम लोगों में भी सतर्कता का अभाव दिख रहा है। इधर केजरीवाल ने जैसे ही कर्फ्यू का ऐलान किया वैसे ही दिल्ली के ठेकों पर लंबी-लंबी कतारें देखने को मिली।