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‘अब या तो गुस्ताख रहेंगे या हम, क्योंकि ये गर्दन नबी की अजमत के लिए है’: तहरीक फरोग-ए-इस्लाम की लिस्ट, नरसिंहानंद को बताया ‘वहशी’

देश भर में उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के डासना स्थित शिव-शक्ति धाम के महंत यति नरसिंहानंद सरस्वती के खिलाफ मुस्लिम कट्टरपंथियों का गुस्सा उबाल पर है। दिल्ली के AAP विधायक अमानतुल्लाह खान ने उन्हें धमकी दी। हरियाणा के पानीपत स्थित यमुनानगर में हिन्दू-मुस्लिम सामने आ गए थे। अब तहरीक फरोग-ए-इस्लाम ने एक बैठक कर महंत नरसिंहानंद को ‘साधुनुमा वहशी’ बताया।

दिल्ली में हुई इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में कई मौलवी शामिल हुए, जो इस संस्था से जुड़े हुए थे। उन्होंने कहा, “वो चाहते हैं कि वे गुस्ताखी करते रहें और हम बर्दाश्त करते रहेंगे, कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। हमने फैसला किया है कि हम अपने नबी की इज्जत और अजमत के लिए हर कुर्बानी देंगे। इसलिए, इस रमजान-ए-मुबारक में अपनी नबी की इज्जत को महफूज करने के लिए और उनके गुस्ताखों को सज़ा दिलाने के लिए जेल भरो आंदोलन चलाएँगे।”

बड़ी बात ये है कि इस मौलवियों ने कहा कि ऐसा कोई एक ‘गुस्ताख़’ नहीं है, बल्कि ‘गुस्ताखों’ की एक पूरी की पूरी सूची उनके पास है। इस दौरान उन्होंने उन ‘गुस्ताखों’ के बारे में कागजात भी दिखाए। मौलवियों ने कहा कि ये तो वो जेल में रहें, या फिर हम नहीं रहेंगे। कट्टरवादियों ने कहा कि उनके सिर पर जो गर्दनें हैं, वो उनके नबी की अजमत के लिए है। उन्होंने ऐलान किया कि देश भर के मुस्लिम इस ‘जेल भरो आंदोलन’ में हिस्सा लेंगे।

मौलवियों ने कहा कि मुल्क-ए-हिंदुस्तान में 2014 में भाजपा की सरकार आने के साथ ही पैगम्बर-ए-इस्लाम और अल्लाह के प्रति ‘गुस्ताखियों’ का दौर शुरू हुआ है। मौलवियों ने कहा कि वोटों के ध्रुवीकरण और हिन्दू-मुस्लिम को बाँटने के लिए ये सब हो रहा है। उन्होंने कहा कि वे सब कुछ बर्दाश्त कर सकते हैं, लेकिन नबी की इज्जत से खिलवाड़ नहीं। मौलवियों ने कहा, “अब या तो हम रहेंगे या फिर गुस्ताख।”

उन्होंने कहा कि अब मुस्लिमों का अंदाज कुछ भी हो, लेकिन सब साथ है। साथ ही कहा कि ‘जेल भरो आंदोलन’ के दौरान मुस्लिमों पर लाठी-गोलियाँ चलेंगी, लेकिन हिंदुस्तान की जेलें भर जाएगी। साथ ही कहा कि कोविड-19 का भी कोई ख्याल नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि जब बात नबी की हो तो किसका क्या फायदा-नुकसान है, ये नहीं देखा जाएगा। साथ ही NDA सरकार को ‘जंगलराज’ करार दिया।

‘हम ट्विटर पर तुम्हारी गालियाँ सुनने के लिए बैठे हुए हैं’: एजाज खान के साथ रिश्तों पर पवित्रा पुनिया ने ट्रोल्स को सुनाई

बिग बॉस 14 में एजाज खान के साथ अपने क्लोज रिलेशन को लेकर चर्चा बटोरने वाली पवित्रा पुनिया ने इंस्टाग्राम पर वीडियो जारी की है। वीडियो में उन्होंने भद्दे कमेंट करने वालों के लिए कहा कि उन्हें लोगों की बातों से कुछ फर्क नहीं पड़ता।

वीडियो में पवित्रा ने ट्रोलर्स को कहा, “नहीं, मतलब हमारी लाइफ में या किसी की लाइफ में क्या चल रहा है, क्या नहीं चल रहा है, कौन किस तकलीफ से गुजर रहा है। लोगों को क्या परेशानी हो सकती है। कुछ फर्क ही नहीं पड़ता यार। आओ, सीधा गालियाँ देना शुरू कर दो। मतलब सच में? हम ट्विटर पर तुम्हारी गालियाँ सुनने के लिए बैठे हुए हैं, ऐसा है क्या?”

https://www.instagram.com/reel/CNpDisDBQoP/?utm_source=ig_embed

टीवी अभिनेत्री पवित्रा पुनिया अपने सोशल मीडिया हैंडल्स पर काफी सक्रिय हैं और बात चाहे निजी जिंदगी को लेकर हो या फिर बिग बॉस पर एजाज खान से बने अपने रिश्ते के बारे में, वह हर मामले पर खुल कर बोलती हैं। उनकी इस वीडियो को लेकर भी यूजर्स उनकी तारीफ कर रहे हैं। अभी तक इसे 27 हजार से ज्यादा लोग लाइक कर चुके हैं।

मालूम हो कि कुछ महीने पहले भी पवित्रा ने इसी तरह ट्रोलर्स को उनके और एजाज के रिश्ते के बारे में कुछ न बोलने को कहा था। 27 फरवरी को पवित्रा ने ट्वीट किया, “प्यारे ट्रोलर्स…नफरत फैलाना बंद करो। मेरे और एजाज के रिश्ते पर ऐसी टिप्पणी किसी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है। हम एक-दूसरे को सच्चा प्यार करते हैं। इसलिए हमें नफरत फैलाने वालों के अप्रूवल की जरूरत नहीं। हमारे लिए दुआ करें।”

बता दें कि पवित्रा और एजाज ने कुछ समय पहले एक इंटरव्यू में अपने रिलेशन की पुष्टि की थी। पवित्रा ने कहा था कि वह दोनों एक-दूसरे को डेट कर रहे हैं और रिलेशनशिप में हैं। पवित्रा ने अपने और एजाज के रिश्ते को एक खूबसूरत एहसास कहा था। वहीं, एजाज ने कहा था कि अभी शादी के लिए बहुत पापड़ बेलने हैं। उन्होंने कहा, “शादी इंशाअल्लाह होगी और बहुत सही वक़्त पर होगी। हम दोनों इस मामले में इंतजार कर रहे हैं और सब कुछ सही रहा तो इसी साल शादी भी हो जाएगी। अभी हमारे घर वाले बहुत फैले हुए हैं। पहले उन्हें समेट लें, फिर इस बारे में सोचेंगे।” 

चीन के लिए बैटिंग या 4200 करोड़ रुपए पर ध्यान: CM ठाकरे क्यों चाहते हैं कोरोना घोषित हो प्राकृतिक आपदा?

कोरोना के लगातार बढ़ते संक्रमण के बीच महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में नागरिकों की सामान्य गतिविधियों पर एक मई तक प्रतिबंध लगा दिया। आदेश के अनुसार लोगों को बिना ठोस कारणों के सार्वजनिक स्थानों पर जाने पर प्रतिबंध रहेगा। आवश्यक सुविधाओं के अलावा लगभग सब कुछ बंद रहेगा। व्यावहारिकता की दृष्टि से ये प्रतिबंध भले ही कर्फ़्यू जैसे हैं पर सरकार इसे लॉकडाउन नहीं कहना चाहती।

सरकार ने केवल आवश्यक सुविधाओं को जारी रखने की अनुमति दी है। इसके अलावा धारा 144 का भी सहारा लिया है जिसे 15 अप्रैल की रात से लागू करके 1 मई तक रखा जाएगा। सरकार ने सार्वजनिक परिवहन के साधन जैसे रेल, बस के चलते रहने की घोषणा की पर साथ ही मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने लोगों से घर में रहकर काम करने की अपील की है। साथ ही मिल और फ़ैक्ट्रियों के लिए एक दिशा निर्देश भी जारी किया ताकि कोरोना संक्रमण पर क़ाबू करने में मदद मिले। इसके अलावा एक महत्वपूर्ण फ़ैसले में सरकार ने विभिन्न क्षेत्रों में संक्रमण से प्रभावित होने वाले नागरिकों के लिए 5476 करोड़ रुपए का एक राहत पैकेज की घोषणा की है।

राज्य सरकार के अचानक उठाए गए इन कदमों से लगा जैसे सरकार इस प्रतीक्षा में थी कि संक्रमण से आ रहे आँकड़े एक खास जगह तक चढ़ें तब वह जागे। इसके पहले इस महामारी को रोकने के सरकार के प्रयासों को पूरे भारत ने एक वर्ष तक देखा है। पिछले पूरे वर्ष भर कोरोना के रोज़ आने वाले नए केस में महाराष्ट्र का योगदान किसी से छिपा नहीं है। दूसरी लहर के शुरुआत में भी राज्य का योगदान प्रतिदिन आने वाले आँकड़ों में क़रीब 60% रहा। उसके अलावा महामारी की आड़ में खेली गई राजनीति और मुंबई पुलिस के कारनामे अब तक जग प्रसिद्ध हो चुके हैं। वैक्सीन की तथाकथित कमी की बात सरकार में शामिल दलों के नेताओं द्वारा सार्वजनिक तौर पर उठाई गई, ये बात अलग है कि केंद्र सरकार ने दो टूक जवाब दिया कि वैक्सीन की कोई कमी नहीं है।

पर इन सारी बातों के बीच जो सबसे महत्वपूर्ण बात सामने आई वह है मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की वह चिट्ठी जो उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखी है। लगभग 5500 करोड़ के इस राहत पैकेज की घोषणा के साथ ही उद्धव ठाकरे ने प्रधानमंत्री को लिखी अपनी चिट्ठी में उनसे अनुरोध किया कि केंद्र सरकार COVID19 को एक प्राकृतिक आपदा घोषित कर दे।

ऐसे किसी अनुरोध के पीछे उद्देश्य क्या हो सकता है? ऐसे अनुरोध के पीछे ऊपरी तौर पर तो एक ही उद्देश्य जान पड़ता है, और वो यह है कि यदि केंद्र सरकार COVID19 को प्राकृतिक आपदा घोषित कर दे तो राज्य सरकार के लिए एसडीआरएफ (स्टेट डिज़ैस्टर रिलीफ़ फंड) में इकट्ठा हुए क़रीब 4200 करोड़ रुपए को खर्च करने का रास्ता खुल जाएगा।

मुख्यमंत्री ठाकरे को पता है कि आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 (Disaster Management Act 2005) के अनुसार बनाए गए इस फंड में जमा हुए धन का इस्तेमाल केवल प्राकृतिक आपदा जैसे, बाढ़, सूखा, सुनामी, भूकंप, भूस्खलन, हिमस्खलन इत्यादि के समय ही किया जा सकता है। क़ानून के अनुसार इस फंड में केंद्र सरकार का योगदान 75% और राज्य सरकार का योगदान 25% रहता है। नियम के अनुसार जब तक केंद्र सरकार इस महामारी को प्राकृतिक आपदा नहीं बताएगी, तब तक राज्य सरकार फंड में जमा हुए राशि का इस्तेमाल नहीं कर सकेगी।

पर क्या यहाँ केवल फंड में रखे धन के उपयोग की बात है? प्रश्न यह है कि यदि केंद्र सरकार अपने किसी आदेश से COVID19 को एक प्राकृतिक आपदा घोषित कर दे तो उस अंतरराष्ट्रीय बयान पर क्या प्रभाव पड़ेगा जिसके तहत इस महामारी के लिए चीन को ज़िम्मेदारी ठहराया जाता रहा है? न केवल अमेरिका या यूरोपीय देश बल्कि तमाम एशियाई और अफ्रीकी देशों का मानना है कि इस महामारी के लिए चीन ज़िम्मेदार है। आस्ट्रेलियाई दृष्टिकोण भी जग ज़ाहिर है। दूसरी ओर भारत में भी इसे लेकर एक तीव्र धारणा रही है कि इसके पीछे चीन से निकले वाइरस का ही हाथ है। तमाम वैज्ञानिक, अंतरराष्ट्रीय मीडिया, बुद्धिजीवी और सरकारी प्रतिनिधि इस बात पर ज़ोर देते रहे हैं कि इसे वुहान वाइरस के नाम से ही जाना जाए।

ऐसे में क्या मुख्यमंत्री ठाकरे को अनुमान है कि उनकी बात मानकर यदि केंद्र सरकार इसे प्राकृतिक आपदा घोषित कर देती है तो उस अंतरराष्ट्रीय मान्यता को कितनी बड़ी ठेस लगेगी जो विश्व समुदाय ने पिछले एक वर्ष में स्थापित की है? न केवल भारतीयों को पर विश्व भर में रह रहे भारतीय मूल के लोगों के उस विश्वास का क्या होगा जिसे मन में लिए हुए वे रोज़ इस महामारी से लड़ रहे हैं? क्या ठाकरे की यह माँग उचित है जिसकी वजह से न केवल इतने बड़े अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बयान को ठेस पहुँचेगी बल्कि चीन उनकी इस बात को अपने प्रॉपगैंडा के लिए इस्तेमाल करेगा?

देश में राजनीतिक लड़ाई लड़ते हुए हम बार-बार क्यों भूल जाते हैं कि इन लड़ाई से उपजे बयानों का लाभ पाकिस्तान या चीन पहले भी उठाते रहे हैं? मुख्यमंत्री ठाकरे केंद्र सरकार से जो चाहते हैं, वह क्या केवल एक फंड में पड़े धन के इस्तेमाल की बात है या उससे आगे भी कुछ है? भारत की विदेश नीति पर उनकी इस माँग के असर का उन्हें रत्ती भर भी भान है? कहीं ऐसा तो नहीं कि उद्धव ठाकरे को अपनी इस माँग से न केवल उठने वाले प्रश्नों का पूर्वानुमान है बल्कि उसकी वजह से बनने वाले अंतरराष्ट्रीय बयान की भी समझ है और उनकी इस माँग के पीछे यही कारण है?

ऐसा क्यों है कि राज्य सरकारें पिछले पाँच वर्षों में केंद्र सरकार के प्रति ऐसा रवैया अपनाती रही हैं जिसके संभावित दूरगामी प्रभाव और परिणाम का उन्हें ज़रा भी भान नहीं रहता? जिसका हमारे संघीय ढाँचे पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है? वैसे तो ये वे साधारण प्रश्न हैं जिन्हें बीच-बीच में पूछा जाता रहा है पर उद्धव ठाकरे की इस चिट्ठी से जो प्रश्न उठता है वह गंभीर है और उसके संभावित गंभीर परिणामों पर बहस की आवश्यकता है।

कोरोना पर कुंभ और दूसरे राज्यों को कोसा, खुद रोड शो कर जुटाई भीड़: संजय राउत भी निकले ‘नॉटी’

शिवसेना के मुख्य प्रवक्ता और सांसद संजय राउत अक्सर अपने बयानों के कारण सुर्ख़ियों में रहते हैं। अब वे अपने कर्म से चर्चा में हैं। ज्यादा दिन नहीं हुए जब उन्होंने महाराष्ट्र में कोरोना के भयावह हालात के लिए दूसरे राज्यों को कोसा था। हरिद्वार में चल रहे कुंभ के मत्थे संक्रमण का दोष डाला था। लेकिन, अब वे खुद महामारी के इस हालात में रोड शो कर भीड़ जुटाते पकड़े गए हैं।

राउत ने रोड शो भी अपने राज्य में नहीं किया है। इसके लिए वे पड़ोस के कर्नाटक चले गए। वहाँ के बेलगाम में अपनी पार्टी द्वारा समर्थित प्रत्याशी के समर्थन में बड़ा रोड शो किया। यहाँ शिवसेना ने ‘महाराष्ट्र एकीकरण समिति (MES)’ के उम्मीदवार को समर्थन दे रखा है। इससे दोनों राज्यों में विवाद भी बढ़ रहा है।

राउत ने प्रत्याशी शुभम शेलके के लिए प्रचार किया और इसमें भारी भीड़ जुटी। शिवसेना मुखपत्र ‘सामना’ के एग्जीक्यूटिव एडिटर का कहना है कि जब वो रैली के लिए पहुँचे तो देखा कि उनका मंच क्षतिग्रस्त कर दिया गया था, इसलिए उन्होंने रोड शो निकाला। उन्होंने बुधवार (अप्रैल 14, 2021) को ये रोड शो निकाला। बेलगाम लोकसभा क्षेत्र में 17 अप्रैल को उपचुनाव होने हैं।

इस सीट पर भाजपा का कब्ज़ा था। लेकिन सांसद सुरेश अंगाड़ी की कोरोना के कारण हुई मौत के उपचुनाव हो रहे हैं। यहाँ मराठी भाषी लोगों की जनसंसख्या ज्यादा है। जनवरी में सीएम उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र-कर्नाटक के विवादित हिस्सों को केंद्रशासित प्रदेश घोषित करने की बात कर के पहले ही आग में घी डाल चुके हैं। राउत ने कहा कि वे पार्टी सुप्रीमो उद्धव के इशारे पर यहाँ आए हैं और प्रशासन के इशारे पर उनके मंच को तहस-नहस कर डाला गया।

सोशल मीडिया पर लोगों ने संजय राउत के दोहरे रवैये पर निशाना साधा है, क्योंकि उन्होंने हाल ही में कुंभ को लेकर विवादित बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि हरिद्वार के कुंभ से लौटने वाले श्रद्धालु कोरोना वायरस के कैरियर हो सकते हैं, जिससे बड़ी तबाही होने की आशंका है। उन्होंने दावा किया था कि हमारे पर्व-त्योहारों पर पाबंदियाँ लगाना शिवसेना के लिए दर्द भरा है, लेकिन लोगों की जान बचाने के लिए ऐसा किया गया।

लोगों ने संजय राउत से पूछा कि क्या उनकी रैली से कोरोना नहीं फैलेगा? एक तरफ वो कुंभ पर सवाल दाग रहे हैं, दूसरी तरफ खुद रैली कर रहे हैं। जबकि कुंभ में हिस्सा लेने के लिए कोरोना नेगेटिव सर्टिफिकेट ज़रूरी है और वहाँ सारे दिशा-निर्देशों के पालन के लिए पुलिस बल भी तैनात किया गया है। वहीं दूसरी तरफ महाराष्ट्र पूरे देश में कोरोना का हॉटस्पॉट बना हुआ है, लेकिन राउत दूसरों को ज्ञान बाँच रहे हैं।

राउत ने यह भी कहा था, ”महाराष्‍ट्र में कोरोना इसलिए बढ़ रहा है, क्‍योंकि और राज्‍यों से लोग यहाँ आते हैं। हमारे यहाँ आज गुड़ी पड़वा है, मुख्‍यमंत्री ने नियंत्रण लगाया है। हमें क्‍या आनंद मिलता है कि हमारे त्‍योहार पर इस तरह से नियंत्रण लगाया जाए? लोग भी गुस्‍सा करते हैं। लेकिन हमने किया है। ये हिम्‍मत है सरकार की।”

महाराष्ट्र के कैबिनेट मंत्री असलम शेख को भी यही राग अलापते हुए देखा गया था। एक वीडियो में बातचीत के दौरान उन्होंने कुंभ मेले में आने वाले तीर्थयात्रियों की तुलना तबलीगी जमात से की। कुंभ मेले से लौटने वाले श्रद्धालुओं को संभावित खतरे के रूप में बताते हुए उन्होंने कहा, ”आगामी त्योहारों के लिए सख्त एसओपी (केंद्र से मानक प्रचालन प्रक्रिया) होंगे। अन्यथा, आप देख सकते हैं कि हरिद्वार कुंभ के लिए सरकार द्वारा अनुमति देने के कारण COVID-19 मामलों में कैसे वृद्धि हुई है। ये वही लोग हैं जिन्होंने तब्लीगी जमात को बदनाम किया और उन पर कोरोना महामारी फैलाने का आरोप लगाया।”

‘ये अत्याचारी CM है… मरीज सीधे भर्ती नहीं हो सकते’: UP में कोरोना के नाम पर किए जा रहे झूठे दावे की खुली पोल

उत्तर प्रदेश में कोरोना की बढ़ती रफ्तार के बीच प्रशासन को लेकर झूठी खबरें फैलाने का काम तेजी से हो रहा है। हाल में सोशल मीडिया पर कई जगह दावा किया गया कि यूपी में कोविड-19 मरीजों को अस्पतालों में भर्ती होने के लिए संबंधित जिले के सीएमओ से अनुमति पत्र लेनी होगी।

इस दावे को भारत समाचार के एडिटर इन चीफ ब्रजेश मिश्रा समेत कई लोगों ने अपने ट्विटर हैंडल से शेयर किया गया।

ब्रजेश मिश्रा ने लिखा, “यूपी में कोरोना के किसी गंभीर मरीज को भर्ती होना है तो उसे सम्बंधित जिले के CMO से अनुमति पत्र लेना होगा। ऐसे लटकाने-अटकाने-भटकाने वाले आदेश जनता पर अत्याचार के समान है। कोरोना मरीज अस्पताल मे सीधे भर्ती नहीं हो सकते। सरकार को चाहिए की ऐसे आदेश वापस ले। पहले जीवन बचाना ज़रूरी है।”

वहीं वंशिका जनचेतना फाउंडेशन ने कहा, “ये अत्याचारी सीएम है जिसने शव के ढेर लगने के बाद अब यूपी में कोरोना के किसी गंभीर मरीज को भर्ती के लिए उत्पीड़न- करने वाले आदेश दिए, जिससे आम जनता इन्हें वोट दे पछता रही है। अत्याचारी योगी आदित्यनाथ राज में कोरोना मरीज सीधे भर्ती नहीं हो सकते, जिले के सीएमओ से अनुमति पत्र लेना होगा।”

एक अन्य यूजर ने योगी सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा, “अच्छी बात है ,पर इस आदेश के बारे में क्या बोलोगे कि यूपी में कोरोना के किसी गंभीर मरीज को भर्ती होना है तो उसे सम्बंधित जिले के CMO से अनुमति पत्र लेना होगा। क्या योगी सरकार मेडिकल माफिया के आगे असहाय है या पतन की पहली सीढ़ी पर कदम रख चुकी है ?”

सोशल मीडिया में हो रहे दावों की हकीकत

महामारी के समय में ऐसे दावों की सच्चाई बताने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार के आधिकारिक फैक्ट चेकिंग हैंडल ने स्वयं संज्ञान लिया। इन्फो यूपी फैक्ट चेक नाम के वेरिफाइड ट्विटर हैंडल से बताया गया है कि ये दावें फर्जी हैं। कोरोना संक्रमित मरीज को इंटिग्रेटेड कोविड एंड कमांड कंट्रोल रूम की मदद से एम्बुलेंस से लेकर टेस्ट और अस्पताल में भर्ती करने की व्यवस्था की जाती है। इसके लिए कहीं सीएमओ से अनुमति की आवश्यकता नहीं है।

मालूम हो कि उत्तर प्रदेश में पिछले 24 घंटे में कोरोना के 22 हजार 439 नए केस आए हैं। सिर्फ लखनऊ में 5183 केस आए हैं। प्रयागराज में 1888, वाराणसी में 1859 और कानपुर में 1263 मामले दर्ज हुए हैं। ऐसी स्थिति में महामारी को लेकर झूठी जानकारियाँ फैलाकर लोगों को भ्रम में रखना स्थिति को और चिंताजनक बना सकता है। ऐसे में कई सक्रिय यूजर्स सच्चाई को जानने के बाद, झूठ फैलाने वालों को फॉलो न करने की अपील कर रहे हैं।

‘वीडियो और तस्वीरों ने कोर्ट की अंतरात्मा को हिला दिया है…’: दिल्ली दंगों में पिस्टल लहराने वाले शाहरुख को जमानत नहीं

दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली दंगों के आरोपित शाहरुख पठान को जमानत देने से इनकार कर दिया है। शाहरुख पर फरवरी 2020 में दिल्ली के सीएए विरोधी दंगों के दौरान पिस्टल लहराते हुए पुलिसकर्मी पर फायरिंग का आरोप है। जाफराबाद में हेड कॉन्स्टेबल पर पिस्टल ताने शाहरुख की तस्वीरें भी सामने आई थी।

जस्टिस सुरेश कैत की एकल पीठ ने इस मामले में पेश किए गए वीडियो फुटेज को देखने के बाद उसे जमानत नहीं दी। कोर्ट ने कहा, “इस अदालत के सामने रखे गए वीडियो क्लिपिंग और तस्वीरों ने इस कोर्ट की अंतरात्मा को हिला दिया है कि याचिकाकर्ता कानून और व्यवस्था को अपने हाथों में कैसे ले सकता है।”

न्यायालय के आदेश में कहा गया है कि सरकारी पक्ष के अभियोजक (पब्लिक प्रोसिक्यूटर) ने सबूत के तौर पर जो वीडियो और फोटो कोर्ट में पेश किए, उनसे स्पष्ट है कि शाहरुख पठान के हाथ में पिस्टल था और वह वीडियो में गोली चलाते हुए देखा जा सकता है।  

दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद न्यायालय ने कहा कि यह मामला अत्यंत गंभीर है। न्यायालय ने यह भी कहा कि भले ही अपीलकर्ता (शाहरुख पठान) ने शिकायतकर्ता अथवा किसी अन्य व्यक्ति को मारने की मंशा से फायरिंग न की हो, लेकिन यह स्वीकार करना असंभव है कि अपीलकर्ता को यह ज्ञात नहीं था कि उसकी यह हरकत किसी को भी गंभीर नुकसान पहुँचा सकती है।  

पठान की जमानत याचिका खारिज करते हुए जस्टिस सुरेश कुमार कैत ने कहा, “न्यायालय में प्रस्तुत सबूतों से यह ज्ञात होता है कि आरोपित दंगों में संलिप्त था और इन सबूतों में उसके अपराध की गंभीरता स्पष्ट तौर पर दिखाई देती है। इस कारण न्यायालय द्वारा अपीलकर्ता को जमानत नहीं दी जा सकती है।“

शाहरुख पठान ने दिल्ली उच्च न्यायालय में जमानत के लिए याचिका दायर की थी। पठान का कहना था कि उसे दंगों का ‘पोस्टर बॉय’ बना दिया गया, जबकि उसकी किसी को जान से मारने की कोई मंशा नहीं थी। इससे पहले अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमिताभ रावत ने भी उसकी अंतरिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी। शाहरुख को पिछले साल 24 फरवरी को पकड़ा गया था।

बेटी के साथ रेप का बदला? पीड़ित पिता ने एक ही परिवार के 6 लोगों की लाश बिछा दी, 6 महीने के बच्चे को भी नहीं छोड़ा

फिल्मों में तो आपने रेप का बदला लेते कई किरदारों को देखा होगा। आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में असल जीवन में भी एक व्यक्ति ने कुछ ऐसा ही कर डाला। एक पिता के दिल में बेटी के साथ बलात्कार के बदले की आग इस तरह जल रही थी, कि उसने एक के बाद एक 6 लाशें बिछा दीं। सभी मृतक एक ही परिवार के हैं। इस परिवार के एक सदस्य ने कातिल की बेटी के साथ रेप किया था।

विशाखापत्तनम के जाट्टादा गाँव में गुरुवार (अप्रैल 15, 2021) को हुई इस घटना के बाद इलाके में सनसनी फ़ैल गई है और पुलिस तक के हाथ-पाँव फूल गए। पुलिस-प्रशासन भौंचक है कि इतना बड़ा कांड हुआ कैसे। पुलिस इस मामले की जाँच कर रही है। जिस व्यक्ति ने रेप किया था, वो अभी भी फरार है और उसे पुलिस पकड़ नहीं सकी है। पुलिस ने दोनों परिवारों के बीच पुरानी दुश्मनी होने की बात कही है।

इस घटना की जानकारी मिलते ही न सिर्फ पुलिस मौके पर पहुँची, बल्कि वहाँ ग्रामीणों की भारी भीड़ भी जमा हो गई। पुलिस ने हत्या आरोपित को हिरासत में ले लिया है और उससे पूछताछ की जा रही है। साथ ही इस सामूहिक हत्याकांड में प्रयुक्त हथियार भी बरामद करने में पुलिस को सफलता मिली है। मृतकों में 2 महिलाएँ, 2 बच्चे और 1 पुरुष शामिल हैं। रेप आरोपित की भी तलाश की जा रही है।

बच्चों में एक 2 साल का और एक मात्र 6 महीने का था। हत्या आरोपित की पहचान अप्पलराजू के रूप में हुई है। दोनों परिवार आस-पड़ोस में ही रहते थे। विशाखापत्तनम के ACP वी श्रीपद राव ने बताया कि ये हत्याएँ सुबह 6 बजे की गईं। पेंडुर्थी मंडल के जाट्टादा गाँव में मृतकों को अपने घर में खून से लथपथ पाया गया। 2018 से ही दोनों परिवारों में बातचीत बंद थी। रेप आरोपित की पहचान विजय के रूप में हुई है।

मृतकों में उसकी पत्नी, 2 बच्चे, पिता और 2 चाचियाँ हैं। पुलिस इस मामले को शुरुआती जाँच में संपत्ति विवाद का मान कर चल रही है। अगस्त 2020 में इसी इलाके में एक व्यक्ति ने संपत्ति विवाद में अपने बेटे की ही हथौड़े से मार-मार कर हत्या कर दी थी। ‘द हंस इंडिया’ की खबर के अनुसार, इसी परिवार के 4 अन्य लोगों की हत्या मधुरवाड़ा के आदित्य फार्च्यून टॉवर में हुई है। शक है कि हत्या के बाद इसे आत्महत्या का रूप दिया गया।

ESPN की क्रांति, धार्मिक-जातिगत पहचान खत्म: दिल्ली कैपिटल्स और राजस्थान रॉयल्स के मैच की कॉमेंट्री में रिकॉर्ड

15 अप्रैल को ESPN क्रिकइन्फो ने निर्णय लिया कि अब उसके द्वारा क्रिकेट कवरेज और मैच कॉमेंट्री में ‘लैंगिक असमानता’ को बढ़ावा देने वाले शब्दों का उपयोग नहीं किया जाएगा। उदाहरण के लिए ESPN के द्वारा ‘बैट्समैन’ के स्थान पर ‘बैटर’ और ‘मैन ऑफ द मैच’ के स्थान पर ‘प्लेयर ऑफ द मैच’ जैसे शब्दों का उपयोग होगा।

ESPN के इस ‘क्रांतिकारी’ निर्णय के पीछे उद्देश्य है कि क्रिकेट के क्षेत्र में भी ‘लैंगिक समानता’ स्थापित हो। ESPN क्रिकइन्फो के श्रेष्ठ शाह ने अन्य ‘संगठनों’ से यह अपील की है कि वे भी ESPN के साथ क्रांति की राह पर चल निकलें।    

अब प्रश्न यह उठता है कि क्या यह निर्णय कुछ दो-चार शब्दों को बदलने तक ही सीमित रहेगा अथवा यह ‘क्रांति की आग’ पूरे क्रिकेट समाज में व्याप्त असमानतावादी भावों को जला कर राख कर देगी। ऐसे में यह अंदाजा लगाया गया कि ‘बैट्समैन’ को ‘बैटर’ करने और ‘मैन ऑफ द मैच’ को ‘प्लेयर ऑफ द मैच’ करने के अतिरिक्त और क्या-क्या बदलाव संभव हैं जो ESPN इस समाज को उपहार स्वरूप दे सकता है।

दिल्ली कैपिटल्स और राजस्थान रॉयल्स के आज (15 अप्रैल 2021) के मैच के विषय में ESPN क्या बदलाव कर सकता है, इसके विषय में कुछ चर्चा की जा सकती है।

शुरुआत में ही ‘इंडियन प्रीमियर लीग’ के स्थान पर ‘ग्लोबल प्रीमियर लीग’ का उपयोग किया जा सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि आईपीएल में केवल भारतीय खिलाड़ी नहीं खेलते अपितु दुनिया भर के खिलाड़ी खेलते हैं। ‘इंडियन’ शब्द एक्सट्रीम राष्ट्रवाद का परिचायक न बन जाए, इसलिए ‘इंडियन’ शब्द की जगह ‘ग्लोबल’ शब्द का उपयोग ESPN द्वारा किया जाएगा।

ESPN ‘मा फलेषु कदाचन’ पर विश्वास करता है, अतः मैच का परिणाम मायने नहीं रखता। मैच में हर कोई विजेता ही है, भले ही मैच कोई भी जीते किन्तु पॉइंट टेबल में जो भेदभाव होगा, उसके विषय में ESPN की क्या राय है, यह अभी निश्चित नहीं है!  

‘कप्तान’ के स्थान पर ‘जन-प्रतिनिधि’ का उपयोग संभव है क्योंकि ‘कप्तान’ शब्द से ‘अधिनायकवाद’ अथवा ‘स्वघोषित नायकवाद’ की बदबू आती है। ‘कप्तान’ एक ऐसा शब्द लगता है, मानो कि टीम का कप्तान ही सब कुछ है और वर्तमान सरकार की भाँति वह भी निरंकुश हो गया है।

‘टॉस’ को भी बदल दिया जाएगा और कहा जाएगा कि ‘देखते हैं, सिक्का क्या चाहता है?’ भले ही सिक्का एक निर्जीव है लेकिन उसे ऊपर उछालना सही नहीं माना जा सकता है।  

‘जन-प्रतिनिधियों’ का केवल प्रारंभिक नाम ही लिया जाएगा। जैसे ऋषभ, संजू, आजिंक्य इत्यादि। ऐसा इसलिए क्योंकि सरनेम से ‘जातिगत’ और ‘धार्मिक’ पहचान को बढ़ावा मिल सकता है। अच्छा हुआ कि गौतम गंभीर क्रिकेट से रिटायर हो गए अन्यथा उनका तो पहला नाम ही ‘ब्राह्मणवादी’ है और सनातन धर्म के एक ऋषि से जुड़ा हुआ है। ऐसे में ESPN के समक्ष एक महान संकट आ खड़ा होता।  

हालाँकि ESPN के सामने कई और मुद्दे भी हैं। जैसे ‘सिक्का क्या चाहता है’ वाली परंपरा में भी सिक्का ही उपयोग किया जाता है, जो पूंजीवाद का प्रतीक है। उस पर जो ‘जन-प्रतिनिधि’ होता है, वह यदि ‘हेड्स’ कहता है तो इसका तात्पर्य यही हुआ कि वह ‘टेल’ जो कि ‘हेड’ की तुलना में नीचे होता है, उसे नकार रहा है और ‘हेड’ का चयन करके उच्च सत्तात्मक प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहा है। इस पर विचार मंथन किया जा रहा है और शीघ्र ही ‘सिक्का क्या चाहता है’ परंपरा को सकुशल बिना ऊँच-नीच के सम्पूर्ण करने के लिए नए शब्दों का आविष्कार किया जाएगा। 

हालाँकि राजस्थान रॉयल्स के जन-प्रतिनिधि संजू ने सिक्के की इच्छा जानने के लिए उसे यात्रा पर भेजा किन्तु दिल्ली कैपिटल्स के जन-प्रतिनिधि ने हेड्स ही चुना। सिक्के ने भी अपनी पूंजीवादी प्रवृत्ति के अनुसार हेड्स ही चुना। इस प्रकार संजू से पहले बल्लेबाजी करने का अवसर छीन लिया गया और यह अवसर ऋषभ को ही प्राप्त हुआ।

इसके बाद आगे की कॉमेंट्री मैच शुरू के बाद प्रारंभ की जाएगी।  

दिल्ली में वीकेंड कर्फ्यू: शुक्रवार 10 बजे से सोमवार सुबह 6 बजे तक होंगी पाबंदियाँ, जरूरी सेवा से जुड़े लोगों को मिलेगा पास

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में कोविड-19 के बढ़ते मामलों को देखते हुए आज (अप्रैल 15, 2021) मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपराज्यपाल अनिल बैजल ने बैठक कर कुछ बड़े फैसले लिए। बैठक के बाद सीएम केजरीवाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि दिल्ली की स्थिति को नियंत्रित करने के लिए शुक्रवार रात 10 बजे से सोमवार सुबह 6 बजे तक के लिए वीकेंड कर्फ्यू लगाया जाएगा। इस दौरान जरूरी सेवाओं से जुड़े लोगों और शादी-विवाह जैसे कार्यक्रमों के लिए लोगों को पास दिए जाएँगे।

समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार, केजरीवाल ने कहा, “दिल्ली सरकार ने वीकेंड कर्फ्यू लगाने का फैसला लिया है। हम जरूरी सेवाओं से जुड़े लोगों और शादियों के लिए लोगों को कर्फ्यू पास देंगे। मॉल, जिम, स्पा, ऑडिटोरियम को बंद करने के निर्देश दिए जा रहे हैं। सिनेमा हॉल 30 प्रतिशत क्षमता पर चल सकते हैं।”

प्रेस कॉन्फ्रेंस में केजरीवाल ने कहा, “दिल्ली में कोरोना वायरस तेजी से बढ़ रहा है। इसके बावजूद अस्पतालों में 5 हजार से ज्यादा बेड खाली हैं। कुछ अस्पतालों के अंदर अगर बेड भर गए हैं और अगर आप किसी खास अस्पताल में जाना हैं तो दिक्कत हो सकती है। बीमार व्यक्ति को को कहीं न कहीं बेड मिलना चाहिए, चाहे वो प्राइवेट हो या सरकारी अस्पताल हो।”

बता दें, इससे पहले कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामलों के मद्देनजर दिल्ली सरकार ने यहाँ नाइट कर्फ्यू का ऐलान किया था। सरकार ने कहा था कि नाइट कर्फ्यू दिल्ली में 6 अप्रैल से 30 अप्रैल तक रात 10 बजे से सुबह 5 बजे तक लागू रहेगा।

दिल्ली में 1 दिन में आए कोरोना के 17 हजार मामले

महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ की तरह दिल्ली में भी कोरोना भयावह रूप ले रहा है। बुधवार को यहाँ 17, 282 कोरोना मरीज सामने आए हैं, जबकि 9, 952 ठीक हुए और 104 की मौत हो गई। इन्हीं आँकड़ों के साथ यहाँ कुल मरीजों की संख्या 767438 हो गई है, जिनमें से 705162 ठीक हो गए हैं और 11540 की मौत हो गई है। फिलहाल राजधानी में 50736 सक्रिय मरीज हैं।

बंगाल में कॉन्ग्रेस प्रत्याशी रिजाउल हक की कोरोना से मौत: 1 दिन में 5892 केस, हाईकोर्ट ने DM-SP को दिया आदेश

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में कोरोना संक्रमण के कारण एक कॉन्ग्रेस प्रत्याशी की मौत हो गई। जिले के समशेरगंज विधानसभा सीट से कॉन्ग्रेस उम्मीदवार रिजाउल हक ने कोलकाता के एक निजी अस्पताल में इलाज के दौरान अपना दम तोड़ा। संक्रमित होने के बाद से रिजाउल का इलाज प्राइवेट अस्पताल में चल रहा था।

राज्य के कॉन्ग्रेस सचिव रोहन मित्रा ने स्वंय पार्टी के प्रत्याशी रिजाउल हक के निधन की जानकारी दी। रोहन ने ट्वीट कर बताया, “मुर्शिदाबाद जिले की समशेरगंज विधानसभा से कॉन्ग्रेस उम्मीदवार रिजाउल हक का निधन कल रात कोरोना की वजह से हो गया! हम जिस वास्तविकता का सामना कर रहे हैं, उसको समझिए, इस साल जिंदा बचिए।”

बता दें कि कोरोना काल में हो रहे बंगाल विधानसभा चुनाव के बीच रिजाउल हक की मौत मतदान के पाँचवे चरण से पहले हुई है। राज्य में लेफ्ट और कॉन्ग्रेस के गठबंधन के बावजूद समशेरगंज सीट पर दोनों आमने-सामने थे। लेफ्ट ने इस क्षेत्र से मोदस्सर हुसैन को टिकट दिया था, वहीं कॉन्ग्रेस ने रिजाउल हक को चुनावी मैदान में उतारा था।

उल्लेखनीय है कि देश के अन्य राज्यों की तरह बंगाल में भी कोरोना संक्रमण तेजी से फैल रहा है। बुधवार को वहाँ 5,892 नए मामले दर्ज किए गए जबकि 24 मौतें भी हुईं।

कोलकाता हाईकोर्ट ने जिलाधिकारियों से राजनीतिक कार्यक्रमों में कोरोना स्थिति पर नजर रखने को कहा है। अदालत ने कहा कि बंगाल में चुनावी कार्यक्रम के दौरान कोरोना नियमों का सख्ती से पालन कराने की जिम्मेदारी जिलाधिकारी और चुनाव अधिकारियों की है, सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कराने के लिए धारा 144 भी लागू कर दें।