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बंगाल के उलट असम में सब शांत, मतदान केंद्रों पर भारी भीड़: गड़बड़ी के क्षेत्रों की पहचान कर ताबड़तोड़ गश्त

असम में 27 मार्च 2021 यानी आज सुबह 7 बजे से मतदान शुरू हो गया। वोटर अपने मत शाम 6 बजे तक डाल पाएँगे। चुनाव आयोग ने कोविड और सोशल डिस्टेंसिंग को देखते हुए इस बार वोट डालने का समय बढ़ा दिया है।

कोविड को देखते हुए वोटरों और मतदान कराने वाले अधिकारियों तक की सुरक्षा व स्वास्थ्य का ख्याल रखा गया है। इसके लिए मतदान केंद्रों पर मास्क, ग्लव्स और हैंड सैनिटाइजर आदि की व्यवस्था चुनाव आयोग ने की है। मतदाताओं ने भी सुबह-सुबह भारी संख्या में मतदान केंद्रों तक आकर अपनी मंशा स्पष्ट कर दी है।

असम चुनाव, पहला चरण: 47 विधानसभा, 264 उम्मीदवार, 8109815 वोटर्स

असम विधानसभा चुनाव के पहले चरण में 27 मार्च को जो वोटिंग हो रही है, उसमें ऊपरी असम क्षेत्र के 11 जिलों की 42 और मध्य असम के नागाँव जिले की 5 सीटें शामिल हैं। इन 47 विधानसभा के लिए 264 उम्मीदवार मैदान में हैं। इन 264 उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला 81,09,815 वोटर्स करेंगे।

असम विधानसभा चुनाव के पहले चरण में 11,537 मतदान केंद्रों पर लैंगिक आधार पर वोटरों की बात करें तो 40,77,210 पुरुषों और 40,32,481 महिलाओं सहित 81,09,815 मतदाता वोट डालेंगे।

असम में पहले चरण के VVIP सीट और उम्मीदवार

असम के वर्तमान मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल, असम कॉन्ग्रेस कमिटी के अध्यक्ष रिपुन बोरा, असोम गण परिषद (भाजपा की सहयोगी पार्टी) के अध्यक्ष अतुल बोरा, असम जनता परिषद के अध्यक्ष लुरिनज्योति गोगोई, असम के किसान नेता और राएजोर दल के अध्यक्ष अखिल गोगोई, असम सरकार के मंत्री रंजीत दत्ता, नाबा डोली, जोजन महान, संजय किशन जैसे दिग्गज लोगों के भाग्य का फैसला आज ही EVM में कैद हो जाएगा।

वर्तमान विधायकों की बात करें तो भाजपा, कॉन्ग्रेस और असोम गण परिषद के 28 विधायकों के नाम पहले चरण के मतदान में वोटरों द्वारा निर्धारित कर दिया जाएगा।

असम चुनाव के पहले चरण में सुरक्षा

असम में पहले चरण के चुनाव के दौरान केंद्र और राज्य सरकार की सुरक्षाबलों की 300 कंपनियाँ सक्रिय रहेंगी। इनमें केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CRPF) के अलावा अन्य राज्यों और असम के राज्य सशस्त्र पुलिस (SAP) शामिल हैं।

नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के बाद राज्य में यह पहला विधानसभा चुनाव है। ऐसे में सुरक्षा को लेकर खास ध्यान रखा गया है। पूरे राज्य में 3826 मतदान केंद्रों और 107 क्षेत्रों की पहचान की गई है, जिसमें व्यापक स्तर पर सुरक्षाबलों द्वारा गश्ती की जा रही है।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि असम में कुल 126 विधानसभा हैं। यहाँ तीन चरणों में वोटिंग होनी है। पहले चरण की वोटिंग 27 मार्च, दूसरे चरण की वोटिंग 1 अप्रैल जबकि तीसरे चरण की वोटिंग 6 अप्रैल को होगी।

पश्चिम बंगाल में 30 सीटों पर वोटिंग शुरू: EC की गाड़ी को जला डाला, TMC ऑफिस में बम विस्फोट

पश्चिम बंगाल में पहले चरण के मतदान में शनिवार (मार्च 27, 2021) सुबह 7 बजे से 30 विधानसभा सीटों के भाग्य का फैसला करने वोटर आने शुरू हो गए। राज्य में पहले चरण के चुनाव से पहले शुक्रवार (मार्च 26, 2021) को देर रात पुरुलिया जिले में हिंसा देखने को मिली। पुरुलिया के बंडोयान में गरु प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और सागा सुपुरुदी गाँव के बीच चुनाव आयोग के वाहन को आग लगा दी गई है। 

बताया जा रहा है कि वाहन निर्वाचन अधिकारियों को मतदान केन्द्र पर छोड़ने गई थी। न्यूज एजेंसी एएनआई के मुताबिक शुक्रवार रात पुरुलिया में मतदान कर्मियों को भोजन देने के बाद लौटते समय रहस्यमय परिस्थितियों में एक वाहन में आग लगा दी गई है। मामले की जाँच पुलिस ने शुरू कर दी है। ड्राइवर को पूछताछ के लिए ले जाया गया है।

जिस गाड़ी को आग लगाई गई वो टाटा मैजिक कार थी। आग जिस इलाके में लगाई गई वो नक्सल प्रभावित जंगलमहल क्षेत्र के तुलसिडी गाँव का हिस्सा है। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक जैसे ही गाड़ी जंगल से पार कर रही थी, अचानक कुछ लोग आए और वाहन को रोका और कथित रूप से उस पर पेट्रोलियम पदार्थ डालकर आग लगा दी।

घटना में किसी के घायल होने की कोई खबर नहीं है। स्थानीय लोगों ने फायर ब्रिगेड को आग लगने की सूचना दी। जब तक दमकलकर्मी आग को बुझाते, तब तक गाड़ी जलकर खाक हो गई थी। ऐसा माना जा रहा है कि चुनाव से पहले इलाके में दहशत फैलाने के लिए इस तरह की घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा है।

इसके अलावा पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा जिले में शुक्रवार (मार्च 26, 2021) को टीएमसी के एक दफ्तर में बम विस्फोट हुआ। बांकुड़ा में पहले फेज की वोटिंग आज होग। टीएमसी धमाके के पीछे लेफ्ट और कॉन्ग्रेस का हाथ बता रही है, वहीं बीजेपी ने टीएमसी पर आरोप लगाए हैं कि बम बनाने के दौरान टीएमसी ऑफिस में विस्फोट हुआ। धमाके में तीन लोग घायल हो गए।

जानकारी के अनुसार विस्फोट के बाद दो गुटों में झड़प भी हुई। टीएमसी कार्यकर्ताओं ने इंडियन सेकुलर फ्रंट के कार्यकर्ताओं पर विस्फोट का आरोप लगाया है। इस बात को लेकर दोनों गुटो में झड़प हुई। घटना में आईएसएफ के 4 कार्यकर्ता घायल हो गए हैं। घटना के बात इलाके में भारी पुलिस बल तैनात है।

वहीं भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी को नंदीग्राम में चुनाव प्रचार के दौरान प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। चुनाव प्रचार से रोके जाने के बाद अधिकारी ने कहा, “क्या यह कश्मीर है? या फिर पाकिस्तान?”

उन्होंने आरोप लगाया कि एक विशेष समुदाय के लोगों ने इलाके में चुनाव प्रचार के दौरान उन्हें रोका और उकसाया। हालाँकि बाद में अधिकारी अतिरिक्त पुलिस और केंद्रीय बल के कर्मियों के साथ क्षेत्र में गए। बता दें कि इससे पहले उन्होंने टीएमसी पर हमला बोलते हुए कहा था कि अगर वो दोबारा से सत्ता में लौटते हैं तो पश्चिम बंगाल कश्मीर बन जाएगा।

उल्लेखनीय है कि पश्चिम बंगाल में आज पहले चरण के चुनाव में वोटिंग हो रही है। आज बंगाल के पुरुलिया, झारग्राम, बाँकुड़ा, मेदिनीपुर और पूर्व मेदिनीपुर की 30 सीटों पर वोटिंग होगी। आईएसएफ इस बार कॉन्ग्रेस और लेफ्ट पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही है। आधिकारिक सीट बँटवारे के अनुसार वाम-कॉन्ग्रेस-आईएसएफ के गठबंधन की ओर से इस चरण की 30 सीटों में से 18 सीटों पर वाम दलों, 10 पर कॉन्ग्रेस और दो पर आईएसएफ ने उम्मीदवार उतारे हैं।

भाजपा भी 29 सीटों पर किस्मत आजमा रही है। पार्टी ने बाघमुंडी सीट पर झारखंड की उसकी सहयोगी पार्टी आजसू ने अपना उम्मीदवार उतारा है। पहले चरण में आज पूर्व मेदिनीपुर में भी वोट डाले जाएँगे। यह क्षेत्र टीएमसी से भाजपा में आए नेता शुभेंदु अधिकारी का गृहक्षेत्र है। चुनाव आयोग के एक अधिकारी ने बताया कि कड़ी सुरक्षा के बीच मतदान संपन्न होगा।

चुनाव आयोग ने केंद्रीय बलों की करीब 684 कंपनियों को तैनात किया है जो 7,061 मतदानस्थलों पर 10,288 मतदान बूथों पर पहरा देंगी। इस चरण की अधिकतर सीटें एक समय नक्सलवाद से प्रभावित रहे जंगलमहल क्षेत्र में पड़ती हैं। ऐसे में चुनाव अधिकारी ने बताया कि सुरक्षा बलों के अलावा रणनीतिक महत्व वाले स्थानों पर राज्य पुलिस को भी तैनात किया गया है।

बंगाल की 30 सीटों पर 27 मार्च को वोट: ‘मीडिया गिरोह’ बचा पाएगा प्रशांत किशोर का ‘करियर’ और ममता बनर्जी की ‘जमीन’?

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव 8 चरणों में होने हैं। पहले चरण की 30 सीटों पर शनिवार यानी 27 मार्च को वोट पड़ेंगे। जिन सीटों के लिए वोट डाले जाएँगे उनमें बांकुड़ा की चार, पुरुलिया की नौ, झाड़ग्राम की चार, पूर्व मेदिनीपुर की सात और पश्चिम मेदिनीपुर की छह सीटें शामिल हैं। साथ ही असम की 47 सीटों पर मतदान होगा।

राजनीतिक हिंसा के लिए कुख्यात बंगाल के इस चुनाव से कइयों का भविष्य और सपने दाव पर लगे हैं। एक ओर भाजपा 200 से ज्यादा सीटों के साथ ऐतिहासिक जीत दर्ज करने के दावे कर रही है। दूसरी ओर तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) ममता बनर्जी की राजनीति और ‘बाहरी’ प्रशांत किशोर के बल पर राज्य में बहुमत के साथ दोबारा आने का दावा कर रही है।

मगर, यदि टीएमसी नेताओं में होती हलचल, जमीनी बदलाव और लोकसभा चुनावों और राज्य की वर्तमान राजनीति में आए बदलावों को देखें, तो मालूम होता है कि बीजेपी का पलड़ा भारी है और ममता बनर्जी समेत मास्टरमाइंड प्रशांत किशोर जैसों के लिए चुनाव में स्थिति आर-पार की बनी हुई है।

प्रशांत किशोर का नाम साल 2014 के चुनावों के बाद मुख्यधारा में आया था, जब उन्होंने पीएम मोदी के लिए चुनाव ‘मैनेज’ किया था। मोदी लहर में किशोर ने खुद को एक पहचान दिलवा दी और मीडिया के जरिए अपने लिए एक माहौल बनाया कि वो चुनाव में बनते बिगड़ते समीकरण को पहचान लेते हैं। हालाँकि, बाद में उन्हें तमाम असफलताओं का सामना करना पड़ा। वह न राहुल गाँधी को जनता के बीच जगह दिला पाए न प्रियंका गाँधी को। उत्तर प्रदेश में भी उनकी भूमिका क्षीण रही। 

सारी चीजें देख लोगों को यह समझने में भी समय नहीं लगा कि प्रशांत किशोर का जलवा तभी तक चलता है जब उन्हें किसी ऐसे शख्स को मैनेज करना हो जो पहले ही जनता के बीच प्रसिद्ध हो। अगर उन्हें कोई बुरा ‘प्रोडक्ट’ सौंप दिया जाए तो वह उसे जनता के बीच बेच पाने में असफल रहते हैं। 

लेकिन, जब किसी का राजनीति करियर संदेह में घिरता है तो मीडिया ऐसे लोगों के लिए मित्र साबित होती है। प्रशांत किशोर के साथ भी यही हुआ है। पिछले दिनों मीडिया में दो लेख प्रकाशित हुए। दिलचस्प बात यह है कि दोनों एक समय पर प्रकाशित हुए थे और उनमें कई समानताएँ भी थीं। एक लेख हिंदुस्तान टाइम्स में बरखा दत्त ने लिखा और दूसरा इकोनॉमिक टाइम्स में प्रकाशित हुआ था।

ईटी में प्रकाशित लेख में बताया गया था कि कैसे भाजपा बंगाल में अपनी पिच बढ़ा रही है और टीएमसी 9 बड़े जिलों में अपने स्ट्रैटेजी पर काम कर रही है। दूसरा बरखा दत्त द्वारा का लेख था जिसमें लिखा गया था कि बंगाल में टीएमसी, भाजपा से लड़ाई लड़ रही है। 

ऑनलाइन कई लोगों ने इन दोनों लेखों में समानताएँ पाई और हैरानी जताई है कि क्या ये लेख ममता बनर्जी और किशोर के गिरते भविष्य को सँभालने के लिए लिखे गए हैं।

अब हो सकता है कि ये आरोप सही हो या हो सकता है गलत हों। लेकिन सवाल ये उठता है कि दो अलग-अलग आर्टिकल में इतनी समानता कैसे हो सकती है। इन दोनों आर्टिकल में समान-समान बिंदु दिए गए हैं जो साबित करने का प्रयास कर रहे हैं कि ममता बनर्जी बंगाल में अपनी पकड़ अब भी नहीं छोड़ी हैं और प्रशांत किशोर खेल में शीर्ष पर बने हुए है।

बरखा दत्त ने हिंदुस्तान टाइम्स में लिखा था कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने पिछले चुनावों में व्यक्तिगत और संगठनात्मक रूप से कई गलती की थी, लेकिन अब वह उन्हें नहीं दोहराएँगीं।

अब एक पत्रकार द्वारा इस तरह के दावे क्या साबित करते हैं और किन आधारों पर ये दावे किए जाते है? क्या इस बात के कोई सबूत हैं कि ममता बनर्जी ने नरमी बरती इसलिए भाजपा बंगाल में अपनी जगह बना पाई, न कि वास्तविकता में इसलिए क्योंकि वहाँ की जनता बदलाव चाहती थी।  

बरखा दत्त ऐसे दावों को करने के लिए कोई तथ्य पेश नहीं करती। उनकी जानकारी का स्रोत सिर्फ और सिर्फ प्रशांत किशोर होते हैं। तो ऐसे में तो सिर्फ दो बातें साफ होती हैं। पहली ये कि बरखा दत्त, बंगाल विधानसभा से पहले प्रशांत किशोर की इमेज बिल्डिंग का काम समांतर कर रही हैं। और ये बताना चाहती हैं कि ममता बनर्जी ने जो गलती की वो अब नहीं दोहराई जाएँगी क्योंकि प्रशांत किशोर उन्हें बचाने आ गए हैं। दूसरा ये कि भाजपा प्रदेश में जगह इसलिए बना पा रही थी क्योंकि ममता बनर्जी ने नरमी बरती, न कि इसलिए क्योंकि जनता बदलाव चाहती थी। 

साल 2019 के लोकसभा चुनावों को यदि याद किया जाए तो बरखा दत्त की इस थ्योरी पर अपने आप सवाल खड़ा हो जाता है। भाजपा ने नारा दिया था कि ‘चुप चाप कमल छाप’, जिसके कारण बीजेपी ने बंगाल में लगभग वादे के मुताबिक 20 के आसपास सीटों पर विजय पाई थी।

दोनों लेखों में मुस्लिम जनसंख्या और वोट शेयर प्रतिशत पर भी बहस

  1. इन लेखों में मुस्लिम जनसंख्या और वोट शेयर प्रतिशत पर भी बहस हुई। कमाल की बात है कि दोनों ने एक जैसे बिंदु पर इसे समझाने का प्रयास किया। बरखा दत्त ने अपने लेख में किशोर की तारीफ की। बंगाल में 30% मुस्लिम जनसंख्या का जिक्र करके 70% को सिर्फ भाजपा के लिए बताया और टीएमसी के लिए कहा कि वो 100% आधार पर चुनाव लड़ रहे हैं। उत्तर प्रदेश के चुनावों को याद दिलाते हुए कहा गया कि अल्पसंख्यक आबादी होने के बाद भी वह वहाँ जीत गए लेकिन यही जनमत उन्हें बंगाल में नहीं मिलने वाला।

इकोनॉमिक टाइम्स में भी बरखा दत्त की तरह ऐसे तर्क दिए गए। इसमें बताया गया कि भाजपा को चुनाव जीतने हैं तो अपने प्रदर्शन को सुधारना होगा। 24 परगना और मुर्शीदाबाद में कुल 80 विधानसभा हैं जो टीएमसी की जीत का मुआवजा भरने में उनकी मदद कर सकती है। इसके बाद इस आर्टिकल में भी मुस्लिम वोटरों का हवाला दिया गया और कहा गया कि यहाँ बिहार, उत्तर प्रदेश से ज्यादा मुस्लिम वोटर हैं जो टीएमसी को जीत दिलाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

अब इस स्थिति में पहले आइए यूपी और बंगाल की मुस्लिम जनसंख्या पर ही बात कर लेते हैं। टीएमसी नेता का कहना है कि बंगाल में मुस्लिम जनसंख्या 30% है जो यूपी की 18 % से अधिक है। यानी लेख के अनुसार बंगाल में भाजपा सिर्फ 70% पर चुनाव लड़ेगी और टीएमसी 100 % पर। दिलचस्प बात यह है कि 2019 के लोकसभा चुनाव को देखें तो टीएमसी 43.69% पर जीती थी और भाजपा 40.64% पर।

दोनों लेखों के तर्क हैं कि बंगाल में मुस्लिम बहुमत होने के कारण भाजपा की संभावनाएँ कम हैं। क्या 40.64% वोट देखने के बाद भी ऐसी थ्योरी पर भरोसा किया जा सकता है? रही बात इस बिंदु की कि यूपी में त्रिकोणीय जंग की तो भाजपा ने राज्य में 40% वोटों से विजय हासिल की थी। लेकिन बंगाल में ऐसा नहीं हो पाएगा। तो लगता है बरखा दत्त और ईटी बंगाल में AIMIM की उपस्थिति को नकार रहे हैं।

वहाँ निश्चित तौर पर AIMIM सपा और बसपा जितनी मजबूत नहीं है, मगर उसके पास कुछ निश्चित कारण जरूर हैं। अगर किसी को ममता बनर्जी का ओवैसी के ख़िलाफ़ बयान याद हो तो साफ पता चलता है कि ममता बनर्जी को AIMIM की एंट्री होने से डर है कि 30% मुस्लिम आबादी के वोट दोनों में बँट जाएँगे।

उसके बाद शुभेंदु अधिकारी जैसे नेता भाजपा में आ रहे हैं क्या ये सब साबित नहीं करता कि भाजपा जीत के करीब पहुँच रही है। ईटी ने 9 जिलों के नाम अपने आर्टिकल में दिए हैं। दक्षिण 24 परगना, उत्तर 24 परगना, मुर्शिदाबाद, नादिया, हावड़ा, बर्दवान, पूर्वी-पश्चिमी मेदिनापुर। इन सब में शुभेंदु की अच्छी पकड़ है। मुस्लिम इलाकों में शुभेंदु की अपील का अब भी महत्त्व है क्योंकि लोगों को नंदीग्राम में हुआ जन आंदोलन भुलाया नहीं है। वो टीएमसी के सबसे प्रसिद्ध नेता हैं। पूर्वी मिदनापुर जिले में उनके परिवार का भी खासा दबदबा है। तो इस बात में कोई दो राय नहीं है कि जिन मुस्लिम वोट पर टीएमसी के नेता इतरा रहे हैं। प्रशांत किशोर का बखान कर रहे हैं। वो वोट शुभेंदु अधिकारी के भाजपा में आते ही बीजेपी के पक्ष में आते दिख रहे हैं।

दोनों लेखों का दावा है कि भाजपा एक समुदाय के 100% समर्थन के बाद भी 45% वोट नहीं हासिल कर पाएगी।

इन लेखों में भाजपा को लेकर माना जा रहा है कि उन्हें सिर्फ एक समुदाय का समर्थन मिला और वह 40.64% वोट जुटा पाए। लेकिन अब टीएमसी का मानना है कि अगर यही राह अपनाई गई तो भाजपा के लिए 40.64% से 44-45% पहुँच पाना बहुत मुश्किल होगा। जबकि तथ्य यह है कि भाजपा इन चुनावों में एक ताकतवर प्रतिद्वंदी है और प्रशांत किशोर के लिए नुकसान ये है कि चुनावों में जाति मुख्य कारक नहीं है। अगर भाजपा किसी भी तरह इन चुनावों में हिंदू वोटों के अलावा कुछ और वोट जुटा पाने में सफल होती है, तो इस बात में कोई संदेह नहीं है कि टीएमसी का गेम जल्दी ओवर होगा।

दोनों लेख में एक समान तर्क दिया गया है कि पार्टी के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए किशोर द्वारा कई संगठनात्मक बदलाव किए गए हैं।

अब यह तर्क पढ़ कर आपको नहीं लग रहा है कि प्रशांत किशोर को बैटमैन की तरह पेश किया जा रहा है कि वो ममता बनर्जी को चुनाव में बचाने आए हैं? कमाल की बात है कि बड़ी संख्या में टीएमसी नेताओं के भाजपा में शामिल होने को भी इसी से जोड़कर देखा जा रहा है। लेकिन इसमें एक गड़बड़ है।

दरअसल, कई नेताओं ने प्रशांत किशोर के ख़िलाफ़ आवाज उठाई थी। मिहिर गोस्वामी ने लिखा था, “यह अब दीदी की पार्टी नहीं है। वह अलग है। इसीलिए दीदी के आदमियों की अब आवश्यकता नहीं है। अगर आपको रहना है, तो आपको जी हुजूरी करना होगा या यहाँ से जाना पड़ेगा।” दिलचस्प बात क्या है कि दोनों लेखों में प्रशांत किशोर के कारण जुड़े नए नेताओं की भूमिका को सकारात्मक बताया गया है जबकि हकीकत ये है कि पार्टी में विद्रोह इसी वजह से हो रहा है।

‘दीदी के बोलो’, ‘दुआरे सरकार’, ममता प्रो सेंटीमेंट और भाजपा के स्थानीय नेताओं की कमी

आर्टिकलों में टीएमसी के लिए ऐसे तर्क वास्तविकता में कोई मतलब नहीं रखते। इनका मत है कि ऐसे अभियान टीएमसी को वोट दिलाएँगे। लेकिन याद करें अगर तो मात्र ‘चुप चाप कमल छाप’ से लोकसभा चुनावों में भाजपा को जीत मिल गई थी।

तथ्यों को यदि देखें तो ममता बनर्जी के पक्ष में कैसा माहौल है, कुछ घटनाओं से मालूम पड़ता है। ममता सरकार ने राजनीति साधने के लिए केंद्र सरकार की नीतियों को राज्य में लागू नहीं होने दिया। इसके कारण बंगाल के किसान मुआवजे से भी वंचित हो गए थे। जबकि एक योजना में गड़बड़ करने के कारण उससे पहले जनता के क्रोध का असर टीएमसी नेताओं को झेलना पड़ा था। 

जून माह में एक टीएमसी नेता के बेटे को बनगाँव की धर्मपुकुरिया पंचायत में झाड़ू और लाठियों से मारा गया था। इन पर अम्फान तूफान में मिले मुआवजे के भ्रष्टाचार का आरोप लगा था। लोगों का कहना था या तो वह सारा मुआवजा दे दें या तो सरकार को सारा पैसा लौटाएँ।

इसी प्रकार साउथ 24 परगना के कैलाशपुर गाँव में टीएमसी नेता के घर का घेराव किया गया था और उन्हें बंधक बनाया गया था। इन पर आरोप था कि इन्होंने अम्फान तूफान के मुआवजे का गलत इस्तेमाल किया और अपने परिवार वालों को इसका लाभ पहुँचाया। बाद में नेता ने मीडिया के सामने अपनी गलती भी मानी थी।

बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार का ही परिणाम था कि जुलाई में, TMC को पूर्वी मिदनापुर जिले के नंदीग्राम में अपने 18 पंचायत सदस्यों को निलंबित करना पड़ा। इन सब पर चक्रवात अम्फान राहत कोषों के संवितरण में भ्रष्टाचार का आरोप था। इस बाबत 200 नेताओं को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए थे।

हालाँकि, ये सब बरखा दत्त के विश्लेषण का हिस्सा नहीं था और न ही इस पर ईटी ने संज्ञान लिया। ये तर्क देना कि राज्य में अब भी ममता का दबदबा है, बिलकुल गलत साबित होता है, क्योंकि अगर ऐसा होता तो भाजपा लोकसभा चुनावों में 40% वोटशेयर हासिल नहीं कर पाती।

आगे हो सकता है कि किसी स्थानीय चेहरे को लाने के बजाय बीजेपी इस चुनावी खेल को ममता बनर्जी और अमित शाह की लड़ाई बना दे और अगर ऐसा नहीं होता है तो भाजपा इतनी जल्दी उस नेता का नाम तो नहीं बताने वाली।

दोनों लेखों में किए गए हर दावे के पीछे कोई तर्क नहीं है। ये लेख जमीनी हकीकत से अवगत कराने की बजाय प्रशांत किशोर को मसीहे की तरह पेश करते हैं। अब यही लेखों का प्रमुख उद्देश्य था, ये सिर्फ इसके लेखक ही बता सकते हैं।

नोट: यह लेख ऑपइंडिया अंग्रेजी की संपादक नुपुर शर्मा के अंग्रेजी लेख के कुछ अंशों पर आधारित है। उनका मूल लेख पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।

19 साल की लड़की को अगवा कर जबरन धर्मांतरण: जानिए, जस्टिस फैज अहमद ने किस आधार पर चाँद बीवी को दी बेल

19 साल की लड़की को अगवा कर जबरन धर्मांतरण के मामले की आरोपित चाँद बीवी को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जमानत दे दी है। यूपी पुलिस ने लव जिहाद विरोधी कानून के तहत उसे आरोपित बनाया था।

यह मामला सीतापुर के तंबौर थाना क्षेत्र का है। लड़की के पिता ने इस संबंध में गाँव के ही जुबराईल और अन्य लोगों के खिलाफ नामजद शिकायत की थी। यह बात भी सामने आई थी कि लड़की के घर से पैसे और जेवरात भी गायब थे। लड़की को अगवा करने की यह घटना 29 नवंबर 2020 की है।

लड़की के पिता ने आरोप लगाया था कि जुबराईल अपने साथियों के सहयोग से उनकी बेटी को बहला-फुसलाकर अपहरण कर ले गया है। उन्होंने उसका जबरन धर्मांतरण कराने के आरोप भी लगाए थे।

चाँद बीवी ने यह दावा करते हुए जमानत माँगी थी कि उसका नाम एफआईआर में नहीं था और उसे झूठे तरीके से इसमें फँसाया गया है। उसने यह भी कहा कि पीड़िता उसके पास से बरामद नहीं हुई थी। पीड़िता अपहरण के तुरंत बाद अपने पिता के साथ थाने में हाजिर हुई थी। उसने कहा कि जब सीआरपीसी की धारा 161 के तहत पीड़िता का बयान जाँच अधिकारी के सामने दर्ज किया गया, तब भी उसके खिलाफ कोई आरोप नहीं लगाए गए थे।

अतिरिक्त सरकारी अभियोजक ने यह कहते हुए उसे जमानत दिए जाने का विरोध किया कि पीड़ित पक्ष के अतिरिक्त बयान में यह बात विशेष रूप से कही गई है कि धर्मांतरण के लिए जिनलोगों ने दबाव बनाया, उनमें एक याचिकाकर्ता भी थी।

जस्टिस मोहम्मद फैज आलम की एकल पीठ ने माना कि धारा 164 के तहत दिए बयान में याचिकाकर्ता पर कोई आरोप नहीं लगाया गया था। पीठ को बताया गया है कि धारा 164 के तहत अपने बयान में अभियोजक ने उसके खिलाफ कोई आरोप नहीं लगाया। वास्तव में, उसने स्पष्ट रूप से कहा था कि वह जिबराईल के साथ अपनी मर्जी से गई थी। वह उससे प्यार करती है और उसने अपनी इच्छा से धर्म परिवर्तन किया।

पीठ ने कहा कि तथ्यों को ध्यान में रखते हुए और चार्जशीट दायर होने की वजह से वह याचिकाकर्ता को जमानत दिए जाने के उपयुक्त मानते हैं। चाँद बीवी को अदालत ने स्थानीय पुलिस को सूचना दिए बिना अपना इलाका नहीं छोड़ने, ट्रायल में सहयोग करने, पीड़ित पक्ष या चश्मदीद पर कोई दबाव नहीं बनाने और किसी तरह के अपराध में संलिप्त नहीं रहने की शर्त पर जमानत दे दी।

जिस जहर से दुश्मनों को मारता था सद्दाम हुसैन, उसी से दिल्ली में दामाद ने सास-साली को मारा: मछली में मिला खिला दिया थैलियम

इराकी तानाशाह सद्दाम हुसैन अपने विरोधियों का खात्मा करने के लिए थैलियम का इस्तेमाल करने को कुख्यात था। अब दिल्ली में एक दामाद ने इसी जहर से अपनी सास और साली की हत्या कर दी है। उसकी पत्नी कोमा में है।

वरुण अरोड़ा नाम के किस कातिल दामाद को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। देवेंद्र मोहन शर्मा ने पुलिस को बताया कि उनके दामाद ने ही उन्हें और उनके पूरे परिवार को ‘स्पेशल फिश’ में थैलियम मिलाकर खिलाई थी। इससे उनकी पत्नी और एक बेटी की मौत हो चुकी है। एक बेटी जो वरुण की पत्नी है वह अभी कोमा में है।

उन्होंने बताया कि उनका वरुण काफी गुस्सैल स्वभाव का है। वह शादी के कुछ महीने बाद से ही उनकी बेटी दिव्या के साथ गाली-गलौच करने लगा था। उसके 5 साल के करीब दो जुड़वा बच्चे हैं। पिछले साल दिव्या दोबारा गर्भवती हो गई थी, लेकिन डॉक्टर ने उसकी जान को खतरा बताते हुए गर्भपात की सलाह दी। लेकिन वरुण उस पर बच्चे को जन्म देने का दबाव डाल रहा था। दिव्या के अबॉर्शन करवाने के बाद वरुण और उसका परिवार उसे प्रताड़ित करने लगा।

इसके बाद दिव्या इंद्रपुरी स्थित अपने मायके आ गई। देवेंद्र मोहन का अनुसार जनवरी में एक दिन वरुण ने दिव्या को कॉल कर बताया कि वह आ रहा है और सबको अपने हाथों से बनी मछली खिलाएगा। वह दोपहर के वक्त उनके घर आया और अपने बच्चों और खुद को छोड़कर उनके परिवार के सभी लोगों को मछली खिलाई। इसके बाद देवेंद्र मोहन की छोटी बेटी प्रियंका शर्मा (आयु 27 वर्ष) की 15 फरवरी को मौत हो गई। 21 मार्च को उनकी पत्नी अनीता शर्मा की भी मौत हो गई। बड़ी बेटी दिव्या 4 मार्च से कोमा में है। पुलिस ने जब अनीता शर्मा का पोस्टमार्टम कराया तो उनके शरीर में थैलियम की भारी मात्रा मिली। दिव्या की जॉंच किए जाने पर उसके खून में भी थैलियम की अत्यधिक मात्रा मिली।

इस मामले पर डीसीपी (वेस्ट) उर्जिवा गोयल ने कहा, ”हत्या और हत्या के प्रयास का मामला दर्ज किये जाने के बाद अरोड़ा से पूछताछ की गई। इसमें उसने थैलियम खरीदने और अपनी सास अनीता, पत्नी दिव्या, ससुर देवेन्द्र मोहन और साली प्रियंका से बदला लेने के लिए उन्हें जहर खिलाने की बात स्वीकार की है। अरोड़ा ने कहा कि उसके ससुराल वाले उसका अपमान करते थे।”

डीसीपी ने बताया कि ग्रेटर कैलाश में उसके घर से थैलियम मिला है। पुलिस ने आरोपित के लैपटॉप को कब्जे में लेकर उसकी इंटरनेट हिस्ट्री देखी तो दंग रह गई। हिस्ट्री में इराक के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन से संबंधित कंटेंट मिला। माना जा रहा है माना जा रहा है कि इसी से उसने ससुराल में सबको थैलियम देकर मारने की सोची।

क्या होता है थैलियम

थैलियम एक धीमा जहर है। थैलियम के संपर्क में आने के शुरुआती 48 घंटों में उल्टी, डायरिया, चक्कर आना जैसे लक्षण महसूस होते हैं। कुछ दिन में यह नर्वस सिस्‍टम को डैमेज करना शुरू कर देता है। धीरे-धीरे माँसपेशियां बेकार हो जाती हैं, याद्दाश्‍त चली जाती है और आखिर में इंसान कोमा में चला जाता है। थैलियम के जहर से मौत होने में तीन हफ्तों का समय लग सकता है।

बांदा की जेल में रहेगा मुख्तार अंसारी: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- 2 हफ्ते में यूपी पुलिस को सौंप दे पंजाब

गैंगस्टर मुख्तार अंसारी दो सप्ताह के भीतर उत्तर प्रदेश की बांदा जेल में शिफ्ट किया जाएगा। फिलहाल वह पंजाब के रोपड़ जेल में बंद है। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उसे यूपी पुलिस को सौंपने के निर्देश दिए।

विधायक मुख्तार अंसारी की हिरासत को लेकर यूपी सरकार ने शीर्ष अदालत में रिट याचिका दाखिल कर रखी थी। जस्टिस अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली खंडपीठ इस पर सुनवाई की। पीठ ने कहा, “यह निर्देश दिया जाता है कि मुख्तार अंसारी को 2 सप्ताह के भीतर यूपी पुलिस की हिरासत में सौंप दिया जाए। वह बांदा जेल में रहेंगे। बांदा जेल के अधीक्षक चिकित्सा सुविधाओं की देखरेख करेंगे।” पीठ ने अंसारी की वह याचिका भी खारिज कर दी है जिसमें उसने अपने खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों की सुनवाई उत्तर प्रदेश से बाहर स्थानांतरित करने की माँग की थी।

मऊ से विधायक माफिया मुख़्तार अंसारी की हिरासत सौंपने से पंजाब सरकार लगातार आनाकानी कर रही थी। सुप्रीम कोर्ट में भी पंजाब सरकार की तरफ से बताया गया था कि किसी राज्य को इस प्रकार के स्थानांतरण का कोई मौलिक अधिकार नहीं है। वहीं, यूपी का कहना था कि अंसारी के खिलाफ राज्य में कई गंभीर आपराधिक मामले चल रहे हैं। इनकी सुनवाई होनी है। लेकिन, पंजाब ने चिकित्सा आधार पर उसे रोपड़ जेल में भेज दिया। यूपी सरकार की ओर से दलील रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी पंजाब पर अंसारी के बचाव का आरोप लगाया।

गौरतलब है कि मुख़्तार अंसारी उगाही के एक कथित मामले में जनवरी 2019 से ही पंजाब के जेल में बंद है। योगी सरकार द्वारा बार बार आग्रह के बावजूद पंजाब सरकार उसकी हिरासत देने से अब तक इनकार करती रही है। माफिया मुख्तार अंसारी और उसके करीबियों के खिलाफ यूपी की योगी सरकार लगातार कार्रवाई कर रही है।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुख्तार अंसारी ने पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी का भी हवाला देकर यूपी की जेल में शिफ्ट किए जाने से बचने की कोशिश की थी। 8 फरवरी को हुई सुनवाई में उसने अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि का हवाला देते हुए कहा कि वह एक ऐसे परिवार से है, जिसके सदस्य भारत के स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा थे। उसकी याचिका में कहा गया था, “प्रतिवादी ऐसे परिवार का हिस्सा है, जिसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में बहुत बड़ा योगदान दिया है। भारत को हामिद अंसारी जैसा नेता दिया जो उपराष्ट्रपति रहे। इसके अलावा बाबा शौकतुल्ला अंसारी ओडिशा के राज्यपाल थे। माननीय न्यायमूर्ति आसिफ अंसारी इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे।”

बांग्लादेश की जमीन से PM मोदी ने मुक्तियुद्ध के नायकों को किया नमन, शेख हसीना ने भारत को सबसे अच्छा भागीदार बताया

दो दिवसीय दौरे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार (26 मार्च 2021) को बांग्लादेश पहुँचे। ढाका के नेशनल परेड ग्राउंड में उन्होंने अपनी बांग्लादेशी समकक्ष शेख हसीना के साथ राष्ट्रीय दिवस कार्यक्रम में हिस्सा लिया। समारोह को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने बांग्लादेश की मुक्ति युद्ध के नायकों को नमन किया। वहीं शेख हसीना ने भारत को अपने देश के विकास का सबसे अच्छा भागीदार बताया।

पीएम मोदी ने कहा, “मैं सभी भारतीयों की तरफ से आप सभी को बांग्लादेश के सभी नागरिकों को हार्दिक बधाई देता हूँ। मैं बंगबंधु शेख मुजिबुर रहमान को श्रद्धांजलि देता हूँ, जिन्होंने बांग्लादेश और यहाँ के लोगों के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया।” बांग्लादेश की आजादी को लेकर भारतीयों की भूमिका का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “मेरी उम्र 20-22 साल रही होगी जब मैंने और मेरे कई साथियों ने बांग्लादेश के लोगों की आजादी के लिए सत्याग्रह किया था। बांग्लादेश की आजादी के लिए संघर्ष में शामिल होना, मेरे जीवन के भी पहले आंदोलनों में से एक था।”

उन्होंने कहा कि यह एक सुखद संयोग है कि बांग्लादेश के आजादी के 50 वर्ष और भारत की आजादी के 75 वर्ष का पड़ाव, एक साथ ही आया है। हम दोनों ही देशों के लिए, 21वीं सदी में अगले 25 वर्षों की यात्रा बहुत ही महत्वपूर्ण है। हमारी विरासत भी साझी है, हमारा विकास भी साझा है। पीएम मोदी ने कहा कि आज भारत और बांग्लादेश दोनों ही देशों की सरकारें इस संवेदनशीलता को समझकर, इस दिशा में सार्थक प्रयास कर रही हैं। हमने दिखा दिया है कि आपसी विश्वास और सहयोग से हर एक समाधान हो सकता है। हमारी भूमि सीमा समझौता भी इसी का गवाह है।

बांग्लादेश की मुक्ति में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के प्रयासों और भारतीय सेना की भूमिका को याद करते हुए पीएम मोदी ने कहा, “यहाँ के लोगों पर पाकिस्तानी सेना के अत्याचार हमें व्यथित कर देता था, कई दिनों तक इन तस्वीरों ने हमें सोने नहीं दिया।”

इस दौरान पीएम मोदी ने बांग्लादेश के राष्ट्रपिता शेख मुजीबुर रहमान की छोटी बेटी शेख रेहाना को गाँधी शांति पुरस्कार 2020 प्रदान किया। यह पुरस्कार मरणोपरांत शेख मुजीबुर रहमान को दिया गया है। पीएम मोदी ने कहा कि यह भारतीयों के लिए गर्व की बात है कि हमें शेख मुजीबुर रहमान को गाँधी शांति पुरस्कार से सम्मानित करने का अवसर मिला है। उन्होंने बांग्लादेश के युवाओं के लिए स्वर्ण जयंती स्कॉलरशिप की भी घोषणा की।

बंगाल की 30 सीटों पर 27 मार्च को डाले जाएँगे वोट, मेदिनीपुर में पेड़ से लटके मिले BJP बूथ सेक्रेट्री

पश्चिम बंगाल की 30 विधानसभा सीटों पर 27 मार्च को वोट डलेंगे। पहले चरण के मतदान से पहले बीजेपी ने 72 घंटों के भीतर अपने 4 कार्यकर्ताओं की हत्या का दावा किया है। ताजा मामला मेदिनीपुर का है। 30 वर्षीय लालमोहन सोरेन की लाश सुबह पेड़ से लटकी मिली। सोरेन पार्टी के बूथ सेक्रेट्री थे।

बीजेपी की बंगाल ईकाई ने ट्वीट कर घटना के बारे में बताया है। वीडियो के साथ किए गए ट्वीट में कहा गया है, “मेदिनीपुर विधानसभा के बूथ सेक्रेट्री 30 वर्षीय लालमोहन सोरेन आज सुबह लटके मिले। 72 घंटे में 4 हत्याएँ हुई हैं। ये समय है कि बंगाल एक साथ आए और इस राजनीतिक हिंसा वाले दौर को खत्म करे।”

बता दें कि इससे पहले कूचबिहार जिले के दिनहाटा टाउन मंडल के अध्यक्ष अमित सरकार का शव मिलने के बाद इलाके में सनसनी फैली थी। मंडल अध्यक्ष का शव दिनहाटा में वेटनरी हॉस्पिटल के परिसर से बरामद हुआ था।

इसके अलावा नादिया के शांतिपुर में भाजपा कार्यकर्ता प्रताप बरमन और दिपांकर बिस्वास की बेहरहमी से हत्या की घटना सामने आई थी। भाजपा ने उनकी मौत का आरोप तृणमूल कॉन्ग्रेस पर लगाया था। 18 मार्च को भी एक भाजपा कार्यकर्ता विकास नस्कर की लाश पेड़ से झूलती मिली थी। वह दक्षिण 24 परगना जिले के सोनारपुर दक्षिण के निवासी थे।

बता दें कि पश्चिम बंगाल में कुल आठ चरणों में चुनाव होने हैं। पहले चरण में 30 सीटों पर 27 मार्च को वोटिंग होगी। वहीं, दूसरे चरण में 30 सीटों पर एक अप्रैल को, तीसरे चरण में 31 सीटों पर 6 अप्रैल को, चौथे चरण में 44 सीटों पर 10 अप्रैल को, पाँचवें चरण में 45 सीटों पर 17 अप्रैल को, छठे चरण में 43 सीटों पर 22 अप्रैल को, सातवें चरण में 36 सीटों पर 26 अप्रैल को और आठवें और अंतिम चरण में 35 सीटों पर 29 अप्रैल को वोट डाले जाएँगे। नतीजे 2 मई को घोषित किए जाएँगे।

मुंबई के मॉल में ‘अस्थायी’ अस्पताल, आग लगने से 10 मौतें: CM उद्धव बोले- ज्यादातर कोरोना से मरे

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने शुक्रवार (26 मार्च 2021) को ड्रीम्स मॉल का निरीक्षण किया। इस मॉल में गुरुवार रात आग लग गई थी। मॉल में सनराइज हॉस्पिटल चल रहा था। आग लगने से कम से कम 10 लोगों के मरने की बात कही जा रही है। लेकिन, सीएम उद्धव और अस्पताल दोनों ने कहा है कि मौतें कोरोना से हुई है, न कि आग से।

एक बयान में उद्धव ठाकरे ने कहा, “मृतकों के परिजनों को मुआवजा दिया जाएगा। ज्यादातर मरीज जिनकी मौत हुई है, वह वेंटिलेटर पर थे। मैं पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त करता हूँ।” मुख्यमंत्री ने यह भी बताया है कि कोरोना के कारण पैदा हुए हालात की वजह से मॉल में अस्पताल चलाने की अस्थायी इजाजत दी गई थी।

उन्होंने कहा कि पिछले साल कई जगहों पर हमने हालात की वजह से इस तरह की अनुमति दी थी। ड्रीम्स मॉल में चल रहा अस्पताल उनमें से एक है। उनके मुताबिक आगजनी के दौरान सभी लोगों को बचाने के प्रयास किए गए, लेकिन कुछ मरीजों के वेंटिलेटर पर होने की वजह से उन्हें बचा पाना संभव नहीं हो पाया। उन्होंने हादसे के लिए पीड़ित परिवारों से खेद जताते हुए कहा है कि यदि किसी तरह की कोताही सामने आई तो जाँच कर जिम्मेदारों पर कार्रवाई की जाएगी।

वहीं अस्पताल ने अपने बयान में कहा है कि पिछले साल विशेष परिस्थितियों में उन्होंने काम शुरू किया और कोरोना की वजह से कई लोगों को मरने से बचाया। फायर, नर्सिंग लाइसेंस सहित अन्य जरूरी औपचारिकताओं को पूरा कर ही अस्पताल शुरू किया गया था। बयान में दावा किया गया है कि अस्पताल के कर्मचारियों ने मरीजों को बचाने की भरपूर कोशिश की। इससे पहले शुक्रवार की सुबह जब दो शव निकाले गए थे तो सनराइज हॉस्पिटल ने कहा था कि इन मरीजों को भी सुरक्षित निकाल लिया गया था। लेकिन कोरोना से उनकी मौत हो गई।

बताया जा रहा है कि अस्पताल में 76 कोरोना संक्रमित इलाज के लिए भर्ती थे। आग लगने पर आनन-फानन में उन्हें शिफ्ट ​किया गया।

इस हादसे को लेकर भाजपा नेता और पूर्व सांसद किरीट सोमैया ने कहा कि कोविड-19 अस्पताल चलाने के लिए एनओसी नहीं ली गई थी। यह मॉल भ्रष्टाचार का साक्षात उदाहरण है।

उन्होंने कहा, ”मैं बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) के खिलाफ आपराधिक लापरवाही की शिकायत दर्ज कराने जा रहा हूँ। इस मॉल के खिलाफ कई शिकायतें की गई, लेकिन उसके मालिकों के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की गई।”

वहीं, पुलिस उपायुक्त (डीसीपी) प्रशांत कदम का कहना है कि आग की लपटों को बुझाने के लिए करीब 22 फायर टेंडर अस्पताल पहुँचे थे। मुंबई की मेयर किशोरी पेडनेकर ने कहा है कि यह पहली बार है जब उन्होंने किसी मॉल में अस्पताल देखा है। यह बहुत गंभीर स्थिति है। सात मरीज वेंटिलेटर पर थे। 70 मरीजों को दूसरे अस्पताल में ले जाया गया है। आग के कारणों का पता लगाने के लिए जाँच होगी।

सीएनएन न्यूज 18 ने भी ऐसे दस्तावेज हासिल करने का दावा किया है जिससे पता चलता है कि अस्पताल में फायर सेफ्टी के मानकों का पालन नहीं किया गया था।

निकिता तोमर हत्याकांड: तौसीफ और रेहान को उम्रकैद की सजा, सिर्फ 5 महीने में आया फैसला

हरियाणा के फरीदाबाद की फास्ट ट्रैक अदालत ने निकिता तोमर हत्याकांड में दोषी पाए गए तौसीफ और रेहान को आज (मार्च 26, 2021) उम्रकैद की सजा सुनाई है। अदालत ने सजा के साथ दोनों पर 20-20 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया है।

24 मार्च को इस मामले में फास्ट ट्रैक कोर्ट ने रेहान और तौसीफ को दोषी करार दिया था। वहीं, मामले के एक अन्य आरोपित अजरुद्दीन को बरी कर दिया था। उस पर तौसीफ को हथियार मुहैया कराने का आरोप था। तौसीफ और रेहान को आईपीसी की धाराओं 302, 366 और 120-बी / 34 के तहत दोषी ठहराया गया था। तौसीफ को हथियार कानून के तहत भी दोषी पाया गया था।

फरीदाबाद के बल्लभगढ़ में अग्रवाल कॉलेज के बाहर 21 वर्षीय छात्रा निकिता तोमर की 26 अक्टूबर 2020 को गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। तौसीफ (Tauseef) ने उसे गाड़ी में खींचने की कोशिश की। असफल रहने पर उसे गोली मार दी थी। पूरी घटना CCTV में भी कैद हो गई थी, जो बाद में सोशल मीडिया पर वायरल हो गई।

हत्या से एक महीने पहले भी निकिता ने तौसीफ के खिलाफ छेड़खानी और उत्पीड़न की शिकायत दर्ज करवाई थी। बाद में परिवार ने मामला वापस ले लिया था। इसके बाद तौसीफ ने उसे फिर से परेशान करना शुरू कर दिया था और उस पर इस्लाम अपनाने का दबाव डालने लगा था।