गुरुवार (17 अप्रैल 2025) को दाऊदी बोहरा समुदाय के एक प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की और उन्हें 2025 के नए वक्फ (संशोधन) कानून के लिए धन्यवाद दिया। दाऊदी बोहरा के प्रतिनिधिमंडल से एक सदस्य ने कहा कि समुदाय की यह माँग लंबे समय से लंबित थी, जिसे पीएम मोदी ने नए वक्फ कानून के साथ पूरा किया।
Thank you Hon’ble Prime Minister Shri @Narendramodi ji for your warm welcome and continued support. The Dawoodi Bohra community is grateful for your leadership especially with regard to the recent Waqf amendment, which reaffirmed our place in the fabric of this great nation.… pic.twitter.com/dXRa0GLGNo
दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय ने प्रधानमंत्री के ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ के सिद्धांत पर भरोसा भी जताया। बैठक के दौरान पीएम मोदी के साथ केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्री किरेन रिजिजू भी शामिल थे।
#WATCH दाऊदी बोहरा समुदाय के एक प्रतिनिधिमंडल ने आज प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की और वक्फ संशोधन अधिनियम के लिए उनका आभार व्यक्त किया।
उन्होंने कहा कि यह समुदाय की लंबे समय से लंबित मांग थी। उन्होंने प्रधानमंत्री के 'सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास' के दृष्टिकोण पर भरोसा… pic.twitter.com/ulJFBP7ODq
बैठक के दौरान पीएम मोदी ने कहा कि यह वक्फ कानून रातों-रात नहीं बना। वक्फ कानून की बारीकियों को समझने के लिए 5 साल दिए गए। वक्फ को लेकर 1700 से ज्यादा शिकायत करने वालों में अधिकतर मुस्लिम महिलाएँ शामिल थी। वक्फ के नाम पर मजबूर और लाचार गरीबों की संपत्तियों पर कब्जा किया जा रहा था।
40 से अधिक देशों में दाऊदी बोहरा की वैश्विक उपस्थिति
दाऊदी बोहरा एक मुस्लिम समुदाय है, जो पश्चिम भारत में रहते हैं। दाऊदी बोहरा की वैश्विक उपस्थिति 40 से अधिक देशों में है। दाऊदी बोहरा का ऐतिहासिक संबंध मिस्र के फातिमी इमामों से माना जाता है, जो मिस्र से हैं। यह अहल-अल-बैत यानी पैगंबर मुहम्मद के वंशज माने जाते हैं।
वक्फ कानून की कई धाराओं पर 7 दिन की रोक
आपको बता दें, कि गुरुवार (17 अप्रैल 2025) को सुप्रीम कोर्ट ने अगली सुनवाई तक नए वक्फ कानून की कई धाराओं पर सात दिनों तक के लिए रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ में CJI संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार और केवी विश्वनाथन शामिल थे। पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की प्रतिबद्धता को नोट किया। अब अगली सुनवाई 5 मई 2025 को होनी है।
अधिवक्ता विष्णु जैन ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को दोहरा रवैया बताया
हिंदुओं का पक्ष रखने वाले अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को दोहरा रवैया बताया है। विष्णु जैन ने ये तर्क भी दिया कि आखिर AIMIM, अमानतुल्लाह ख़ान, जमीयत और कई विपक्षी राजनीतिक दलों की याचिकाएँ सीधे सुप्रीम कोर्ट में कैसे स्वीकार कर ली जाती हैं? जबकि हिन्दुओं को अयोध्या से लेकर काशी-मथुरा तक के लिए जिले की कचहरी से होकर गुजरना पड़ता है और सदियों लग जाते हैं।
ओडिशा के क्योंझार जेल से मिशनरी ग्राहम स्टेंस की हत्या के दोषी हिन्दू कार्यकर्ता महेन्द्र हेम्ब्रम रिहा कर दिए गए हैं। महेंद्र हेम्ब्रम को अच्छे आचरण के चलते 25 वर्ष की सजा काटने के बाद रिहा किया गया है। महेंद्र हेम्ब्रम स्टेंस की हत्या मामले में दारा सिंह के साथ आजीवन कारावास की सजा काट रहे थे। उनके रिहा होने के साथ ही मिशनरी ग्राहम स्टेंस की मारे जाने से पहले की हरकतें एक बार फिर सामने आ रही हैं। ग्राहम स्टेंस पर ईसाई धर्मांतरण करवाने के साथ ही महिलाओं का यौन शोषण करने के आरोप भी लगे थे।
जंगल के कैम्प में किया था शोषण
ग्राहम स्टेंस की हत्या के बाद उसके कुकर्मों के विषय में कोर्ट की सुनवाई में जानकारी सामने आई थी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 2003 में इस मामले की सुनवाई के दौरान एक महिला ने गवाही देते हुए बताया था कि ग्राहम स्टेंस ने कैसे उसका जंगल में यौन उत्पीड़न किया।
ग्राहम स्टेंस ने पीड़िता ने बताया था कि अगर वह उससे शारीरिक संबंध बनाएगी तो उसे फायदा होगा। पीड़िता ने बताया था कि ग्राहम स्टेंस ने उसे मनोहरपुर के पास जंगलों में बनाए गए एक कैम्प में बुलाया था। यह कैम्प ईसाई धर्मांतरण के लिए ही स्थापित किया गया था। यहाँ वह अपने पति के साथ पहुँची थी।
ग्राहम स्टेंस ने कैम्प में बुलाने के बाद उसके पति को एक अलग झोपड़ी में सोने का आदेश दिया था और उसे दूसरी झोपड़ी में अकेले सोने को कहा था। महिला ने बताया था कि उसने यह बात मान ली और अलग जगह पर आराम करने चली गई।
पीड़िता के बयान के अनुसार, ग्राहम स्टेंस रात में महिला की झोपड़ी में घुस आया और उससे आँखे बंद करके ध्यान लगाने को कहा। पीड़िता ने कोर्ट को बताया था कि इसके बाद ग्राहम उसके शरीर पर हाथ चलाने लगा और छेड़खानी करने लगा।
ग्राहम ने महिला से संबंध बनाने को कहा और इसके एवज में फायदा होने की बात कही। पीड़िता ने बताया था कि उसने ग्राहम स्टेंस की इस हरकत पर शोर मचा दिया था जिससे वह चला गया था। पीड़िता ने इस विषय में अपने पति और बाकी ग्रामीणों से भी बताया था।
पीड़िता के अनुसार, यह घटना 21 जनवरी, 1999 को हुई थी। पीड़िता और उसका पति इसके बाद यह कैम्प और मनोहरपुर इलाका छोड़ कर चले गए थे। इस घटना के एक दिन बाद ही रहस्यमयी तरीके से गाड़ी में आग लगने के चलते ग्राहम स्टेंस की मौत हो गई थी।
गोमांस खिलाने का किया था प्रयास
ग्राहम स्टेंस सिर्फ यौन उत्पीड़न ही नहीं करता था बल्कि वह हिन्दू मान्यताओं पर भी प्रहार करता था। यौन उत्पीड़न की ही पीड़ित महिला ने बताया था कि मनोहरपुर के जंगल में उसका यौन उत्पीड़न करने से पहले पति के साथ गोमांस खाने के लिए भी दबाव डाला गया था।
पीड़िता ने बताया था कि ग्राहम स्टेंस गोमांस खाने को ईसाइयत में धर्मांतरण के लिए जरूरी बताता था। कोर्ट में महिला के लगाए गए आरोपों को लेकर मामले की जाँच कर रही CBI ने कई सवाल पूछे थे। CBI के वकील ने पीड़िता के आरोप नकार भी दिए थे।
गाड़ी में जल कर मरा था ग्राहम स्टेंस
ग्राहम स्टेंस एक ईसाई मिशनरी था जो ऑस्ट्रेलिया से आया था। ग्राहम स्टेंस ओडिशा के क्योंझर और आसपास के जनजातीय इलाके में हिन्दुओं का धर्मांतरण करवाता था। ग्राहम स्टेंस का इस इलाके में काफी विरोध था। बताया जाता है कि 23 जनवरी की रात को ग्राहम स्टेंस एक चर्च के बाहर एक गाड़ी में अपने 2 नाबालिग बेटों के साथ सो रहा था।
आरोप है कि हिंदूवादी नेता दारा सिंह और महेंद्र हेम्ब्रम ने इस दौरान भीड़ को भड़का दिया था। इसी के बाद ग्राहम स्टेंस की गाड़ी में आग लग थी और उसकी बेटों के साथ जलकर मौत हो गई थी। यह भी आरोप है कि इस दौरान भीड़ ने ग्राहम को गाड़ी से भागने का मौका नहीं दिया।
इस मामले में 51 लोग आरोपित बनाए गए थे। लेकिन एक-एक करके 49 लोग बरी हो गए जबकि दारा सिंह और महेन्द्र हेम्ब्रम को दोषी करार दिया गया था। उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। महेन्द्र हेम्ब्रम ने खुद को जल्द रिहा किए जाने की याचिका डाली थी। उनका अच्छा आचरण देते हुए उन्हें 25 वर्ष बाद जेल से छोड़ दिया गया है।
दारा सिंह की ऐसी ही याचिका अभी लंबित है। इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 6 जनवरी 2024 को दोषी दारा सिंह की रिहाई को लेकर दायर याचिका पर ओडिशा सरकार और CBI से जवाब माँगा था। हालाँकि, इस पर अभी कोई निर्णय हुआ है।
इस्लामी कट्टरपंथियों के डर से पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में मारे गए हिन्दू पिता-पुत्र के अंतिम संस्कार में धार्मिक कर्मकांड में नाई और पुरोहित तक शामिल नहीं हुए। इस्लामी कट्टरपंथियों की हिंसा के चलते उन्होंने कोई ना कोई कारण बता कर मृतक चंदन दास (40) और हरगोबिन्द दास (70) का क्रियाकर्म करवाने से इनकार कर दिया।
कोई पुरोहित-नाई आने को तैयार नहीं
दैनिक जागरण में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, बुधवार (16 अप्रैल, 2025) को दोनों का अंतिम संस्कार के बाद श्राद्ध कर्म आयोजित किया जाना था। इसके लिए परिजन शमशेरगंज के ही एक पुरोहितों (ब्राह्मण) के पास गए। उन्होंने मृतकों के परिजनों से कहा कि यह मामला पुलिस के पास है, इसलिए वह किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहते।
परिजनों ने बताया कि ब्राह्मणों के मना करने के पीछे की असली वजह डर है। इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए चंदन और हरगोबिन्द के एक सम्बन्धी चित्रदीप दास ने बताया, “आज हमारे यहाँ श्राद्धकर्म था। हमने एक पुरोहित से आने के लिए कहा था। लेकिन उसने यह कहते हुए आने से इनकार कर दिया कि यह सुरक्षा जुड़ा मामला है।”
हिन्दुओं के क्रियाकर्म में ब्राह्मण-पुरोहित के ना आने को लेकर नईदुनिया में प्रकाशित खबर
हरगोबिन्द दास के भतीजे बापोन दास ने बताया, “हमने एक और पुरोहित की व्यवस्था की। लेकिन वह बसुदेवपुर में रहता है, जो 5 किलोमीटर दूर है। उसने कहा कि वह नहीं आ सकता क्योंकि यहाँ कोई सुरक्षा नहीं है। मैं उसके घर गया और गंगाजल लेकर आया। हमने तय किया है कि जब हम सुरक्षित महसूस करेंगे, तभी श्राद्ध कर्म करेंगे।”
श्राद्धकर्म के लिए ब्राह्मणों के अलावा नाइयों ने भी हरगोबिन्द दास के घर आने से मना कर दिया। जागरण को उनके ही एक परिजन ने बताया कि वह अपने इलाके के 2 नाइयों के पास गए थे लेकिन उन्होंने जरूरी सामान ना होने की बात कह कर टाल दिया। उनके इस बहाने के पीछे भी इस्लामी कट्टरपंथियों का खौफ बताया गया है।
परिवार ने ठुकराया ममता सरकार का मुआवजा
गौरतलब है कि 11 अप्रैल, 2025 को मुर्शिदाबाद के शमशेरगंज और सूती इलाकों में इस्लामी कट्टरपंथियों ने हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा की थी। यह हिंसा कई दिनों तक चली थी। इस्लामी कट्टरपंथियों ने यह हिंसा वक्फ कानून के विरोध के नाम पर की थी।
उन्होंने इसी दौरान मूर्तिकार चंदन दास और उनके पिता हरगोबिन्द दास की घर से खींच कर हत्या कर दी थी। दोनों को चाकुओं से गोदा गया था और उनके शव को सड़क पर फेंक दिया गया था। चंदन दास की पत्नी ने बताया कि इस्लामी कट्टरपंथी उनके घर में घुस कर दोनों को खींच ले गए और मार दिया। उन्होंने बताया कि घंटों तक पुलिस लगातार फोन करने के बावजूद नहीं आई।
चंदन दास और हरगोबिन्द दास के परिजनों ने राज्य की ममता बनर्जी सरकार से मुआवजा लेने से भी इनकार कर दिया है। ममता बनर्जी ने उनके परिवार को ₹10 लाख देने का ऐलान किया। उन्होंने कहा कि उन्हें पैसा नहीं बल्कि न्याय चाहिए। मृतक चंदन और हरगोबिन्द के कई परिजन हिंसा के बाद झारखंड भी चले गए थे।
डर कर झारखंड चले गए थे परिजन
हरगोबिन्द दास के भतीजे हृदय दास भी झारखंड के पाकुड़ चले गए थे। उन्होंने बताया था कि वह लोग अपनी माँ को बीमार बना कर एक एम्बुलेंस में छुपते हुए आए हैं। वह झारखंड में एक रिश्तेदार के यहाँ रुके हुए थे। उनके साथ और भी परिजन जान बचा कर भागे थे।
पश्चिम बंगाल पुलिस इस बीच दोनों के हत्यारों को पकड़ने के लिए प्रयास करने का दावा कर रही है। अब तक इस मामले में तीन लोग गिरफ्तार किए गए हैं। पुलिस ने पहले कालू नदाब और दिलदार को गिरफ्तार किया था। इनमें से एक बांग्लादेश सीमा से गिरफ्तार किया गया था।
पश्चिम बंगाल पुलिस ने बताया है कि अब उसने इस मामले में तीसरा आरोपित इंजमाम उल हक़ गिरफ्तार किया है। पुलिस ने बताया है कि इंजमाम अपराध में शामिल तो था ही, उसने CCTV कैमरे तोड़ कर सबूत मिटाने के प्रयास भी किए थे।
मुर्शिदाबाद में अभी तैनात रहेंगे केन्द्रीय सुरक्षाबल
मुर्शिदाबाद में हिंसा के बाद कलकत्ता हाई कोर्ट ने केन्द्रीय सुरक्षाबल तैनात करने का आदेश दिया था। उनके आने के बाद यहाँ हिंसा रुक सकी थी। मुर्शिदाबाद में हिंसा रोकने के लिए BSF भी तैनात की गई थी। हाई कोर्ट ने गुरुवार (17 अप्रैल, 2025) को कहा है कि केन्द्रीय सुरक्षाबल कुछ दिन और मुर्शिदाबाद में रहेंगे। वहीं यहाँ के स्थानीय हिन्दुओं ने कहा है कि इस्लामी कट्टरपंथियों से सुरक्षा के लिए उन्हें स्थायी रूप से केन्द्रीय बलों की तैनाती चाहिए।
चंडीगढ़ ग्रेनेड हमला समेत 14 आतंकी हमलों का मास्टर माइंड हैप्पी पासिया उर्फ हरप्रीत सिंह को अमेरिका में हिरासत में लिया गया है। हैप्पी पासिया पर 5 लाख का इनाम था। भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक अमेरिका में उसे आईसीई यानी इमिग्रेशन एंड कस्टम्स इंफोर्समेंट विभाग ने हिरासत में लिया है। अब भारत उसके प्रत्यर्पण की कोशिश कर सकता है।
पंजाब में पिछले 7 महीने में ग्रेनेड हमले की 16 घटनाएँ हुई हैं। इस दौरान पुलिस थाने, धार्मिक स्थल, बीजेपी नेता मनोरंजन कालिया पर हमला शामिल है। इनमें से कम से कम 14 हमलों में उसका नाम सामने आया है।
14 ग्रेनेड हमलों का मास्टर माइंड
एनआईए ने चंडीगढ़ ग्रेनेड हमले में आतंकी संगठन बब्बर खालसा इंटरनेशनल के 4 लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया था। इनमें हैप्पी पासिया और रिंदा का नाम शामिल था। जालंधर के पूर्व एसपी जसकीरत सिंह चहल और उनके परिवार पर ग्रेनेड हमले की जिम्मेदारी पासिया ने सोशल मीडिया पर ली थी। अमृतसर के मजीठा पुलिस स्टेशन पर ग्रेनेड हमले में भी उसका हाथ था। उसने एक यूट्यूबर के घर पर भी ग्रेनेड हमला करवाया।
पासिया आतंकी संगठन बब्बर खालसा यानी बीकेआई के लिए काम कर चुका है। पासिया लगातार पंजाब में आतंकवाद को एक बार फिर जीवित करने की कोशिशों में लगा था।
चंडीगढ़ हमले के बाद एनआईए ने चंडीगढ़ जिला कोर्ट में अर्जी दायर कर पासिया के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी करने की माँग की थी। एनआईए को पता चला था कि पासिया अमेरिका में छिपा बैठा है जिसके बाद अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों से संपर्क किया गया।
अवैध तरीके से अमेरिका में घुसा पासिया
एनआईए को जाँच के दौरान ये भी पता चला कि पासिया 2023 में अवैध तरीके से अमेरिका पहुँचा था। आतंकी रिंदा के साथ मिलकर पासिया पंजाब में आतंक का नेटवर्क तैयार कर रहा था जिसमें पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई भी उसे आर्थिक मदद कर रही थी।
हैप्पी अमृतसर के रामदास पुलिस थाने के पासिया गाँव का रहने वाला है। वो अलग-अलग देश के कोड वाले फोन का इस्तेमाल करता है जिसको ट्रेस नहीं किया जा सके। अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी जैसे देशों में उसका ठिकाना है। मैक्सिको बॉर्डर होते हुए वह अमेरिका में सबसे पहले घुसा था।
बिहार के लखीसराय से हाल ही में लव जिहाद का एक मामला सामने आया है। एक हिन्दू युवती ने सरकारी क्लर्क कमाल अशरफ पर हिन्दू बन कर उसे फँसाने, यौन संबंध बनाने और नमाज पढ़ने के साथ गौमांस खाने के लिए मजबूर करने का आरोप लगाया है। इस मामले में दर्ज की गई FIR की कॉपी से और भी चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। कमाल अशरफ बताता था कि हिन्दू लड़कियों को फँसाना और उन्हें सम्भोग का वस्तु बना कर रखना उन लोग (मुस्लिम) का शौक है।
16 वर्ष की आयु में बनाया निशाना
ऑपइंडिया के पास लखीसराय के सूर्यगढ़ा थाने में इस मामले में दर्ज की गई FIR की कॉपी मौजूद है। FIR में हिन्दू पीड़िता ने बताया है कि आरोपित कमाल अशरफ उसे 2012 में भगा ले गया था, तब वह 16 वर्ष की थी। हिन्दू पीड़िता को उस समय कमाल अशरफ ने अपने आप को राजस्थान का रहने वाला सुमित बताया था। अशरफ एक सरकारी स्कूल में क्लर्क के तौर पर तैनात है। हिन्दू पीड़िता ने बताया कि उसे इसके बाद अशरफ ने आसनसोल और जमुई में रखा।
कमाल अशरफ इस दौरान सुमित बन कर ही हिन्दू लड़की का यौन शोषण करता रहा। FIR में बताया गया है कि कमाल अशरफ हिन्दू पीड़िता को इसके बाद दबाव डाल कर एक बार कोर्ट ले गया और जबरदस्ती शादी करने बयान दिलवा दिया। कमाल अशरफ ने इस दौरान पीड़िता से शादी भी नहीं की। कुछ दिनों बाद पीड़िता ने एक बच्चे को भी जन्म दे दिया, इसके बाद अशरफ उसे धर्मांतरण करने के लिए प्रताड़ित करने लगा।
हिन्दू लड़की फँसाना शौक
FIR में पीड़िता ने बताया है कि बच्चे के जन्म के बाद उसे पता चला कि आरोपित का असल नाम सुमित नहीं बल्कि कमाल अशरफ है और वह राजस्थान नहीं बल्कि लखीसराय का ही रहने वाला है। इसके बाद लगातार कमाल अशरफ हिन्दू युवती पर धर्मांतरण के लिए दबाव बनाने लगा और बिना इस्लाम कबूल किए उससे शादी करने से भी मना कर दिया।
हिन्दू पीड़िता ने बताया, “उनके (कमाल अशरफ) द्वारा कहा गया कि बिना धर्म परिवर्तन तुमसे हमारी शादी नहीं हो सकती है, और हम लोगों का शौक है, कि हिन्दू लड़की को अपने प्रेम जाल में फँसा कर उसे सम्भोग का वस्तु बना कर रखना है और हमसे कभी शादी भी नहीं किया।”
पीड़िता ने बताया कि इस बीच वह भी शिक्षा विभाग में सरकारी कर्मचारी के तौर पर काम करने लगी। इसके बाद भी कमाल अशरफ ने उससे ₹50 हजार भी ले लिए। पीड़िता ने बताया कि पैसे ना देने पर कमाल अशरफ उसे नग्न कर पीटता था और यातनाएँ देता था।
नमाज ना पढ़ने पर हाथ-पैर तोड़े
हिन्दू युवती की यातनाएँ लगातार बढ़ती ही गईं। FIR में बताया गया है कि जब उसने मंदिर जाने और पूजा करने की इच्छा जताई तो कमाल अशरफ उस पर नमाज के लिए दबाव बनाने लगा। जब हिन्दू युवती ने नमाज पढ़ने का विरोध किया तो उसकी पिटाई कर उसका हाथ पैर तोड़ दिया।
कमाल अशरफ ने पूजा के लिए युवती ने जो देवी-देवताओं की मूर्तियाँ रखी थीं, उन्हें भी फेंक दिया और गौमांस खा कर इस्लाम अपनाने का दबाव डालने लगा। कमाल अशरफ हिन्दू युवती ही नहीं बल्कि उसके बच्चे को भी मुस्लिम बनाने के लिए दबाव बनाता था।
दूसरों से संबंध बनाने का डाला दबाव
हिन्दू पीड़िता ने बताया है कि कमाल अशरफ उसके साथ यातनाएँ देने के साथ ही उस पर एक और मुस्लिम इब्राहिम अहमद के साथ संबंध बनाने के लिए दबाव डाल रहा था। पीड़िता ने कहा कि इससे मना करने पर दोनों ने मिलकर उसे बर्बरता से पीटा और उसके गुप्तांगों को नुकसान पहुँचाने का प्रयास किया।
इब्राहिम अहमद ने हिन्दू युवती से खा किअगर वह दोनों के साथ संबंध बनाएगी तो कमाल अशरफ उसके साथ निकाह कर लेगा और उसे बीवी का दर्जा देगा। पीड़िता किसी तरह भाग कर एक रिश्तेदार के घर पहुँची और कमाल अशरफ के विरुद्ध FIR दर्ज करवाई।
मुर्शिदाबाद में इस्लामी हिंसा के कारण 400 से भी अधिक हिन्दुओं को पलायन करना पड़ा। अब राज्यपाल CV आनंद बोस हिंसा पीड़ित इलाक़े का दौरा करेंगे और पीड़ित हिन्दुओं से भी मुलाक़ात करेंगे। गुरुवार (17 अप्रैल, 2025) को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्यपाल से कहा कि वो अपना मुर्शिदाबाद दौरा स्थगित कर दें, लेकिन बोस ने इससे इनकार कर दिया है। बता दें कि नए वक़्फ़ क़ानून का बहाना बनाकर मुर्शिदाबाद में मुस्लिम भीड़ ने हिन्दुओं पर हमले किए थे और वाहनों में आग लगाई थी।
देवी-देवताओं की मूर्तियाँ गढ़ने वाले हरगोविंद दास और उनके बेटे चंदन दास की घर में घुसकर हत्या कर दी गई। राज्य सचिवालय नबान्न से बोलते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि वहाँ विश्वास बनाने की मुहिम चल रही है, ऐसे में गवर्नर को वहाँ नहीं जाना चाहिए। ममता बनर्जी ने इस दौरान उदाहरण दिया कि वो ख़ुद भी उन इलाक़ों में नहीं गईं। राज्यपाल बोस ने कहा है कि ग्राउंड पर जाकर वास्तविकता का विश्लेषण करने के लिए वो मुर्शिदाबाद ज़रूर जाएँगे। उन्होंने कहा कि स्थानीय लोगों ने वहाँ BSF कैम्प स्थापित करने की माँग की है, हमें इसके प्रयास करने होंगे कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
उधर कलकत्ता हाईकोर्ट में मुर्शिदाबाद हिंसा को लेकर सुनवाई हुई। अधिवक्ता प्रियंका टिबरेवाल ने कहा कि उच्च न्यायलय ने पीड़ितों को वापस बसाने पर जोर दिया है, साथ ही राज्य सरकार को योजना बनाने के लिए कहा गया है कि पीड़ितों को कैसे बसाया जाएगा और तबतक के लिए उनके रहने-खाने की व्यवस्था करने के लिए कहा गया है। साथ ही एक समिति बनाने के लिए कहा गया है, जिसमें राज्य व केंद्रीय मानवाधिकार आयोग के लोग होंगे। वो पीड़ितों से बात करके सारी शिकायतें दर्ज करेंगे।
#WATCH | Kolkata | On Kolkata High Court hears plea on Bengal Violence, Advocate Priyanka Tibrewal says, "Court took cognizance of the matter and pressed on 4 issues… The state government has to manage their housing till they (violence victims) get their homes. It has been… pic.twitter.com/C2D5HShdtW
अधिवक्ता को पीड़ितों से मिलने व बात करने की भी अनुमति मिली है। प्रियंका टिबरेवाल ने बताया कि हाईकोर्ट जाँच की निगरानी करेगा। साथ ही केंद्रीय बलों को वहाँ फ़िलहाल तैनात रखने के लिए कहा गया है। उधर कलकत्ता हाईकोर्ट ने BJYM (भारतीय जनता युवा मोर्चा) को ‘सेव बंगाली हिंदूज’ रैली निकालने की अनुमति दे दी। शनिवार (19 अप्रैल, 2025) को नेताजी सुभाष चंद्र बोस के घर और भवानीपुर स्थित श्यामा प्रसाद मुखर्जी के घर तक रैली निकाली जाएगी।
दिल्ली में यमुना नदी की सफाई और कायाकल्प के लिए गुरुवार (17 अप्रैल 2025) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक महत्वपूर्ण समीक्षा बैठक की। इस बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। बैठक का उद्देश्य यमुना नदी की मौजूदा स्थिति का आकलन करना और इसके सफाई कार्यों की चल रही व भविष्य की योजनाओं पर चर्चा करना था।
दिल्ली के मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) ने बताया कि बैठक में विभिन्न एजेंसियों के कार्य योजना की समीक्षा की गई, जिसमें यमुना को प्रदूषण मुक्त करने के लिए समयबद्ध रणनीति बनाई गई।
इस कार्य योजना को तीन हिस्सों में बाँटा गया है: अल्पकालिक (3 महीने), मध्यमकालिक (3 महीने से 1.5 साल) और दीर्घकालिक (1.5 से 3 साल)। इनमें नालों का प्रबंधन, ठोस कचरा प्रबंधन, सीवेज प्रबंधन, सेप्टेज और डेयरी कचरा प्रबंधन, औद्योगिक कचरा प्रबंधन, अपशिष्ट जल उपचार संरचना में कमियों की पहचान, निगरानी उपाय, यमुना में जल प्रवाह सुधार, बाढ़ क्षेत्र संरक्षण, ग्रीन रिवर फ्रंट विकास और जन जागरूकता जैसे कार्य शामिल हैं। प्रत्येक कार्य के लिए स्पष्ट समय सीमा निर्धारित की गई।
यमुना की सफाई बीजेपी का प्रमुख चुनावी वादा रहा है। फरवरी 2025 में दिल्ली विधानसभा चुनाव जीतने के बाद, उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने ट्रैश स्किमर, वीड हार्वेस्टर और ड्रेजर जैसे उपकरणों के साथ सफाई शुरू कर दी थी। जल शक्ति मंत्रालय ने ‘यमुना मास्टर प्लान’ तैयार किया है, जिसे पीएम मोदी की मंजूरी के लिए प्रस्तुत किया जाएगा। इस प्लान में गुजरात के साबरमती रिवर फ्रंट की तर्ज पर यमुना रिवर फ्रंट विकसित करने की योजना है।
बैठक में नालों की सफाई, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स की निगरानी और नए प्लांट्स के निर्माण पर जोर दिया गया। दिल्ली में 400 मिलियन गैलन प्रतिदिन सीवेज के उपचार में कमी को पूरा करने के लिए समयबद्ध योजना बनाई गई।
Delhi | Prime Minister Narendra Modi chaired a comprehensive review meeting earlier today to assess the current status of the Yamuna River and discuss ongoing and future plans for its cleaning and rejuvenation. The meeting was attended by the Union Home Minister Amit Shah, the… pic.twitter.com/E1HGuwxmLV
इसके अलावा, औद्योगिक इकाइयों से प्रदूषित पानी को नालों में बहने से रोकने के लिए दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति को सख्त निर्देश दिए गए। यमुना की सफाई के लिए दिल्ली जल बोर्ड, सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण विभाग, दिल्ली नगर निगम, पर्यावरण विभाग, लोक निर्माण विभाग और दिल्ली विकास प्राधिकरण जैसे कई विभागों के बीच समन्वय पर बल दिया गया। यह प्रयास 2027 तक यमुना को स्वच्छ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने न्यायपालिका की गिरती हुई साख की बात करते हुए कहा है कि वो ‘सुपर संसद’ बनकर क़ानून नहीं बना सकता, ये काम उस संसद का है जो जनता के प्रति जवाबदेह है। हाल ही में संसद के दोनों सदनों से पारित होकर और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद वक़्फ़ संशोधन अधिनियम क़ानून बना। अब सुप्रीम कोर्ट में इसके ख़िलाफ़ कई याचिकाएँ पहुँच गईं। सब इसपर भी सुनवाई चल रही है, क़ानून के कई प्रावधानों पर अगली सुनवाई तक रोक लग गई है। सरकार को सुप्रीम कोर्ट में तमाम सवालों के जवाब देने पड़ रहे हैं।
हालाँकि, मोदी सरकार में ये एक चलन बन गया है जहाँ कुछ NGO, वकील और याचिकाकर्ता तय होते हैं। चाहे अनुच्छेद-370 और 35A निरस्त किए जाने का मामला हो या फिर चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया – ऐसा बार-बार हो रहा है जब मोदी सरकार के फैसलों को सुप्रीम कोर्ट की थकाऊ न्यायिक प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। ख़ासकर के वक़्फ़ संशोधन क़ानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हैरान करनी वाली है। इसका कारण ये है कि इस बिल को पास कराया जाना लोकतंत्र में एक उदाहरण होना चाहिए था।
‘हमारी याचिका पर कहा – HC जानिए, उनकी याचिकाएँ स्वीकार’
इसे संसद में पेश किए जाने के बाद ‘संयुक्त संसदीय समिति’ (JPC) को भेजा गया। इसमें शामिल पक्ष-विपक्ष के 21 लोकसभा व 10 राज्यसभा सांसदों 36 बैठकें कीं। इतना ही नहीं, 10 शहरों में जाकर ग्राउंड की भी स्थिति देखी। कुल 284 हितधारकों से उनके सुझाव लिए गए। 25 राज्यों के वक़्फ़ बोर्ड्स के प्रतिनिधियों से सुझाव लिए गए। लोकसभा में 12 घंटे की चर्चा के बाद रात के 2 बजे बिल पारित कराया गया। जिसे एक उदाहरण के रूप में लिया जाना चाहिए था, न्यायपालिका उसकी स्क्रूटनी करने में लग गया है।
काशी-मथुरा से लेकर हिन्दुओं से जुड़े तमाम विषयों पर विभिन्न अदालतों में हिन्दुओं का पक्ष रखने वाले अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने सुप्रीम कोर्ट के इस दोहरे रवैये पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने बताया है कि वक़्फ़ बोर्ड को लेकर जब वो सुप्रीम कोर्ट में याचिका लेकर गए थे तब उनसे पूछा गया था कि सीधे सुप्रीम कोर्ट क्यों आ गए, हाईकोर्ट्स में जाना चाहिए था। उन्होंने बताया कि 7 साल से समाज 140 से अधिक याचिकाओं के साथ अलग-अलग अदालतों में संघर्ष कर रहा है, आज तक कोई अंतरिम राहत नहीं मिली।
विष्णु शंकर जैन ने पूछा कि आखिर क्या कारण है कि एक पक्ष सुप्रीम कोर्ट जाता है तो तुरंत उसकी याचिका स्वीकार कर ली जाती है और अंतरिम राहत देने की बात भी की जाती है, जबकि दूसरे पक्ष के लिए ये क़ानून लागू नहीं होता। अधिवक्ता ने कहा कि पिछले 13 वर्षों से 4 राज्यों में एंडोमेंट एक्ट के जरिए मंदिरों पर कब्ज़ा किए जाने के विरुद्ध सुनवाई चल रही है, हाल ही में फ़ैसला भी आया है जिसमें सारे मुद्दों को हाईकोर्ट में भेज दिया गया है। विष्णु शंकर जैन ने कहा कि ये सारे सवाल इस मामले में क्यों नहीं किए जा रहे हैं?
जब हमने वक्फ बोर्ड को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी, तो कोर्ट ने हमसे पूछा था कि हम सीधे सुप्रीम कोर्ट क्यों आए और सुझाव दिया था कि हमें हाई कोर्ट जाना चाहिए, और हमें कोई अंतरिम राहत नहीं मिली, जबकि अलग-अलग हाई कोर्ट में 140 से ज्यादा याचिकाएं दायर की गई हैं। अब क्या… pic.twitter.com/771skMh5Zn
गुरुवार (17 अप्रैल, 2025) को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू होने से पहले विष्णु शंकर जैन ने मीडिया के समक्ष ये तर्क दिए थे। उन्होंने सलाह दी कि सारे मामलों को एक हाईकोर्ट में भेजकर एक संवैधानिक पीठ बनाई जाए और इसकी सुनवाई हो जाए। उनका सवाल जायज है – आख़िर AIMIM, अमानतुल्लाह ख़ान, जमीयत और कई विपक्षी राजनीतिक दलों की याचिकाएँ सीधे सुप्रीम कोर्ट में कैसे स्वीकार कर ली जाती हैं, जबकि हिन्दुओं को अयोध्या से लेकर काशी-मथुरा तक के लिए जिले की कचहरी से होकर गुजरना पड़ता है और सदियों लग जाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट में गिड़गिड़ाते रहे SG, खुद ही प्रावधानों पर लगा दिया स्टे
इससे पहले कि सुप्रीम कोर्ट नए वक़्फ़ क़ानून पर रोक लगाता, केंद्र सरकार की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया तुषार मेहता ने ख़ुद ही कह दिया कि अगली सुनवाई तक हम सेन्ट्रल वक़्फ़ काउंसिल और राज्यों के वक़्फ़ बोर्ड्स में नई नियुक्तियाँ नहीं करेंगे। नए क़ानून में इनमें ग़ैर-मुस्लिमों की नियुक्तियों का भी प्रावधान है, जिसपर स्वतः ही स्टे लग गया। साथ ही ‘वक़्फ़ बाय यूजर’ सहित अन्य वक़्फ़ संपत्तियों को भी अगली सुनवाई तक नहीं छुआ जाएगा। अब केंद्र सरकार एक सप्ताह बाद रिपोर्ट दाखिल करेगी।
अबतक इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने लगातार 2 दिन सुनवाई की है। आप देखिए, काशी में ज्ञानवापी के सर्वे में भी निकला कि ये हिन्दू मंदिर था। उसकी दीवारें चीख-चीख कर कहती हैं कि ये मंदिर है। क्या वहाँ किसी प्रकार की रोक लगाई गई? क्या मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर को ध्वस्त करके बने शाही ईदगाह मस्जिद के संबंध में ऐसा कोई निर्णय आया? मध्य प्रदेश स्थित भोजशाला मंदिर को लेकर कोई स्टे आया? मुस्लिमों को नहीं भी नहीं रोका गया, फिर बार-बार मोदी सरकार के क़ानूनों पर स्टे क्यों?
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चीख-चीख कर बताया है कि लाखों सुझावों के बाद ये प्रावधान तय किए गए हैं, ऐसे में इन्हें सिर्फ़ ऊपर-ऊपर से पढ़कर इनके बारे में राय नहीं बनाई जा सकती। कई गाँवों को वक़्फ़ संपत्ति बताकर छीन लिया गया। सोचिए, तमिलनाडु में तिरुचेंदुराई नामक एक गाँव में 1500 वर्ष पुराने मंदिर को वक़्फ़ ने अपना बता दिया। डेढ़ हजार वर्ष पूर्व इस्लाम था ही नहीं। हाल ही में तमिलनाडु के वेल्लोर स्थित कट्टुकोल्लै गाँव में 150 परिवारों की कृषि वाली भूमि को दरगाह की जमीन बताकर वक़्फ़ ने नोटिस थमा दिया।
तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट के जजों से कहा कि वो प्रावधानों पर रोक लगाकर बहुत ही कठिन क़दम उठा रहे हैं। CJI संजीव खन्ना ने कहा कि सुनवाई तक इन प्रावधानों के अनुसार फ़ैसले नहीं होने चाहिए, ताकि लोगों के अधिकारों का उल्लंघन न हो। विडम्बना देखिए कि इधर दाउदी बोहरा समाज के मुस्लिम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलकर इस क़ानून के लिए उन्हें धन्यवाद दे रहे थे, इधर सुप्रीम कोर्ट ‘अधिकारों के उल्लंघन’ की बात कर रहा था। अब 5 मई को सुप्रीम कोर्ट अगली सुनवाई करेगा।
सुप्रीम कोर्ट के ये तर्क हिन्दुओं के मामले में कहाँ चले जाते हैं?
अब देखिए, वक़्फ़ के मामले में CJI संजीव खन्ना कहते हैं कि कई ऐसी मस्जिदें हैं जो 14वीं-15वीं शताब्दी में बनी हुई हैं, ऐसे में वो दस्तावेज कहाँ से दिखाएँगे क्योंकि अंग्रेजी राज से पहले रजिस्ट्रेशन की कोई प्रक्रिया ही नहीं थी। विडम्बना देखिए, अयोध्या में श्रीराम की जन्मभूमि पर एक अदद मंदिर के लिए हिन्दुओं को 134 वर्षों तक कोर्ट में लड़ाई लड़नी पड़ी। काग़ज़ दिखाने की ही तो लड़ाई थी, स्वामित्व साबित करने की। क्या अब काशी, मथुरा, भद्रकाली, भोजशाला और अटाला पर भी सुप्रीम कोर्ट काग़ज़ नहीं माँगेगा क्योंकि उस समय रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था नहीं थी?
याद कीजिए, ये वही सुप्रीम कोर्ट है जिसने कृषि क़ानूनों पर सुनवाई के बिना ही अंतरिम रोक लगा दी थी। इससे दिल्ली को घेरे अराजक प्रदर्शनकारियों के बीच ये सन्देश गया था कि भीड़तंत्र का डर दिखाकर वो अपनी कोई भी बात मनवा सकते हैं। गनीमत है कि इस बार बिना सुने रोक नहीं लगाई गई और केंद्र सरकार ने ख़ुद क़दम पीछे खींच लिए। ‘वक़्फ़ बाय यूजर’ वैसे भी एक विवादित प्रावधान है, जहाँ कोई संपत्ति सिर्फ़ इसीलिए वक़्फ़ की हो जाती है क्योंकि उसका इस्तेमाल इस्लाम के लिए हो रहा है।
एक तरफ आप राम मंदिर के लिए कहेंगे कि सबूत लाओ और दूसरी तरफ वक़्फ़ के लिए ये कहेंगे कि ये बेचारे काग़ज़ कहाँ से दिखाएँगे – ये दोहरा रवैया कैसे चल सकता है? और हाँ, अगर ‘वक़्फ़ बाय यूजर’ नामक कोई प्रावधान हो सकता है, फिर ‘मंदिर बाय यूजर’ और ‘गुरुद्वारा बाय यूजर’ जैसा कोई प्रावधान क्यों नहीं हो सकता? कल को गाँव के गाँव ‘वक़्फ़ बाय यूजर’ हो जाएँगे, क्योंकि कश्मीर में तो हिन्दुओं को पलायन के लिए मजबूर किया गया तो वहाँ कौन देखने गया किसकी संपत्ति का क्या इस्तेमाल हुआ? पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में भी आज वही हो रहा है।
बड़ी अजीब बात है कि एक तरफ एक गिरोह को सड़क पर दंगे करने से लेकर किसी भी संपत्ति को अपना बताने तक के अधिकार हैं, वहीं दूसरी तरफ अपने आराध्यों के मंदिर में पूजा के अधिकार के लिए एक वर्ग दशकों तक कोर्ट में दौड़ता है। एक तरफ फंडिंग और रसूख है, दूसरी तरफ इस देश को अपना मानने वाले लोग हैं जो संविधान से ऊपर शरीयत को नहीं रखते। अब समय आ गया है कि सुप्रीम कोर्ट हिन्दुओं की भी सुने, उन्हें हाईकोर्ट जाने न बोले और मंदिरों से काग़ज़ माँगना बंद करे।
अमेरिका में पढ़ाई का सपना देखने वाले भारतीय छात्रों के लिए हाल के महीने किसी बुरे सपने से कम नहीं रहे। ट्रंप सरकार के विदेश विभाग ने फुलब्राइट, गिलमैन और क्रिटिकल लैंग्वेज जैसे स्कॉलरशिप प्रोग्रामों को अचानक बंद कर दिया, जो भारतीय छात्रों को अमेरिका के नामी विश्वविद्यालयों में पढ़ाई और रिसर्च का सुनहरा मौका देते थे। इसके साथ ही अप्रैल 2025 में हजारों भारतीय छात्रों के F-1 और J-1 वीजा बिना स्पष्ट कारण रद्द कर दिए गए।
इन फैसलों ने लाखों भारतीय छात्रों के सपनों को चकनाचूर कर दिया, उनकी पढ़ाई को अधर में लटका दिया और उन्हें आर्थिक संकट में धकेल दिया। उन्हें यह समझ नहीं आ रहा कि आखिर ऐसा क्यों हुआ। न तो उन्होंने कोई गलती की और न ही किसी नियम का उल्लंघन किया। अब वे इमेग्रेशन वकीलों से मदद माँग रहे हैं। अमेरिका के वकीलों के पास ऐसी परेशानियों से जुड़े कई फोन रोजाना आ रहे हैं।
इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल एजुकेशन की 2024 ओपन डोर्स रिपोर्ट के मुताबिक, 2023-24 में अमेरिका में 3,31,602 भारतीय छात्र पढ़ रहे थे, जो किसी भी देश के छात्रों की सबसे बड़ी संख्या थी। इनमें से ज्यादातर छात्र स्कॉलरशिप्स और स्टाइपेंड पर निर्भर थे, क्योंकि अमेरिका में पढ़ाई और रहने का खर्च सालाना 40 से 50 लाख रुपये तक होता है। अब स्कॉलरशिप्स बंद होने और वीजा रद्द होने से कई छात्रों को पढ़ाई छोड़ने की नौबत आ गई है। कुछ छात्र बड़े स्टूडेंट लोन लेने को मजबूर हैं, जिससे वे लंबे समय तक कर्ज के बोझ तले दब सकते हैं।
भारतीय छात्र वीज़ा रद्द होने से परेशान
रिपोर्ट के अनुसार, “अमेरिका में भारतीय छात्रों की संख्या बढ़ रही है। लेकिन F-1 छात्र वीज़ा मिलने में कमी आई है। कुछ रिपोर्ट्स से पता चलता है कि 2024 के पहले नौ महीनों में भारतीय छात्रोंं को मिलने वाले वीज़ा में 2023 की तुलना में 38% तक की गिरावट आई है।” बता दें कि F-1 और J-1 वीज़ा अमेरिका में पढ़ने वाले छात्रों के लिए जरूरी होते हैं।
(फोटो साभार : NBC News)
बोस्टन के एक इमिग्रेशन वकील मैथ्यू मैओना ने बताया कि उन्हें हर दिन करीब छह छात्रों के फोन जरूर आते हैं। जो घबराए हुए होते हैं। छात्र बताते हैं कि उन्होंने अपना कानूनी दर्जा खो दिया है और उन्हें इस संबंध में सहायता की ज़रूरत है। वकील ने कहा, “हमें लगा कि यह असामान्य होने वाला है। लेकिन अब ऐसा लगता है कि यह बहुत तेज़ी और उग्र रूप से आ रहा है।”
दिल्ली के 24 साल के रोहन शर्मा (बदला हुआ नाम) जैसे कई भारतीय छात्रों की कहानी दिल दहला देने वाली है। रोहन ने फुलब्राइट स्कॉलरशिप के जरिए न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में पीएचडी प्रोग्राम में दाखिला लिया था। लेकिन स्कॉलरशिप बंद होने और वीजा रद्द होने की खबर ने उनके सारे सपनों पर पानी फेर दिया। रोहन ने बताया, “मैंने दिन-रात मेहनत करके यह स्कॉलरशिप हासिल की थी। अब मेरे पास न फंडिंग है, न वीजा, और न ही घर वापस जाने के पैसे।” रोहन जैसे हजारों छात्र इस समय अनिश्चितता के भंवर में फँसे हैं।
मुंबई की 22 साल की प्रिया मेहता (बदला हुआ नाम) ने गिलमैन स्कॉलरशिप के जरिए कैलिफोर्निया में ग्रेजुएट प्रोग्राम में दाखिला लिया था। प्रिया ने बताया, “मेरे परिवार ने मेरी पढ़ाई के लिए कर्ज लिया था, क्योंकि स्कॉलरशिप से ज्यादातर खर्चे पूरे हो रहे थे। अब स्कॉलरशिप बंद हो गई और मेरा वीजा भी रद्द कर दिया गया। मैं अपने परिवार को क्या जवाब दूँ?” प्रिया जैसे कई छात्र अब इमिग्रेशन वकीलों से मदद माँग रहे हैं, लेकिन कानूनी प्रक्रिया महँगी और जटिल है।
अमेरिकी सरकार का कहना है कि यह कार्रवाई राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए जरूरी थी। विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने घोषणा की कि ‘Catch and Revoke’ अभियान के तहत उन विदेशी नागरिकों के वीजा रद्द किए जा रहे हैं, जो अमेरिका के हितों के खिलाफ काम कर रहे हैं, जैसे गाजा युद्ध में इजराइल का विरोध करने वाले। 27 मार्च 2025 तक 300 से अधिक छात्रों के वीजा रद्द किए गए, जिनमें भारतीय छात्रों की संख्या काफी थी। लेकिन सरकार ने इन रद्दीकरणों के पीछे स्पष्ट कारण नहीं बताए, जिससे छात्रों में गुस्सा और निराशा बढ़ रही है।
Associated Press की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ हफ्तों में 90 से अधिक कॉलेजों के 600 से ज्यादा छात्रों का वीजा रद्द हुआ, जिनमें भारतीय और चीनी छात्र सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। मिशिगन के दो संस्थानों के चार भारतीय छात्रों ने ट्रंप प्रशासन के खिलाफ मुकदमा दायर किया है। उनके वकील रामिस वदूद ने कहा, “छात्रों को कोई ठोस कारण नहीं बताया गया। यह अनिश्चितता उन्हें डरा रही है।”
इस संकट का असर भारतीय छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है। बेंगलुरु की 26 साल की अनन्या राव (बदला हुआ नाम) ने बताया, “मैं हर रात सो नहीं पाती, क्योंकि मुझे नहीं पता कि कल क्या होगा। मेरे पास नौकरी नहीं है, न फंडिंग है, और मेरा वीजा भी खतरे में है।” कई छात्र अपनी पर्सनल सेविंग्स से खर्च चला रहे हैं, जबकि कुछ यूनिवर्सिटी से अस्थायी मदद की उम्मीद कर रहे हैं। लेकिन बढ़ती महंगाई में यह लंबे समय तक संभव नहीं है।
वीज़ा रद्द होने के फैसले पर विशेषज्ञ क्या बोले ?
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति भारतीय छात्रों के लिए वैकल्पिक रास्ते खोल सकती है। Eduabroad Consulting की प्रतिभा जैन ने कहा, “अगर स्कॉलरशिप्स बंद रहती हैं, तो छात्र जर्मनी, नीदरलैंड, ब्रिटेन या ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों का रुख कर सकते हैं, जहाँ 50% तक स्कॉलरशिप मिलती है।” वनस्टेप ग्लोबल की अरित्रा घोषाल ने सुझाव दिया कि भारतीय छात्रों को वीजा नीतियों की जानकारी रखनी चाहिए और उसी हिसाब से निर्णय लेने चाहिए।
कुछ अमेरिकी यूनिवर्सिटीज ने आपातकालीन ग्रांट्स और प्राइवेट स्कॉलरशिप्स की पेशकश शुरू की है, लेकिन ये सभी छात्रों की जरूरतें पूरी नहीं कर सकते। Career Mosaic की मनीषा ज़ावेरी ने सलाह दी, “छात्रों को वीजा नियमों की जानकारी रखनी चाहिए, अपने वित्तीय दस्तावेज तैयार रखने चाहिए और यूनिवर्सिटी सलाहकारों से संपर्क में रहना चाहिए।”
बहरहाल, इस बदलाव का असर केवल छात्रों पर नहीं पड़ा है बल्कि उन मिड-कैरियर प्रोफेशनल्स, रिसर्च साइंटिस्ट्स और सोशल साइँस के छात्रों पर भी पड़ा है जो अमेरिका में अकादमिक एक्सपोजर की उम्मीद लेकर आए थे। अब उन्हें अपने लिए दूसरे विकल्प तलाशने पड़ रहे हैं।
इस बीच, ट्रंप प्रशासन ने विश्वविद्यालयों पर भी दबाव बढ़ाया है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी को अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग ने चेतावनी दी कि अगर वह कुछ वीजा धारकों की जानकारी नहीं देता, तो उसे अंतरराष्ट्रीय छात्रों को स्वीकार करने का अधिकार खोना पड़ सकता है। कोलंबिया और जॉन्स हॉपकिन्स जैसे विश्वविद्यालयों की संघीय फंडिंग में भी कटौती हुई है।
यह संकट भारतीय छात्रों के लिए सिर्फ आर्थिक या शैक्षणिक नहीं, बल्कि भावनात्मक भी है। ForeignAdmits के निखेल जैन ने कहा, “ये स्कॉलरशिप्स भारतीय छात्रों के लिए सिर्फ फंडिंग नहीं थीं, बल्कि उनके समर्पण और सपनों की पुष्टि थीं। अब वे अपने भविष्य को एक धागे से लटकता देख रहे हैं।” iSchoolConnect के वैभव गुप्ता ने चेतावनी दी कि यह कटौती अमेरिका की सॉफ्ट पावर और इनोवेशन क्षमता को भी नुकसान पहुँचाएगी।
IIT-IIM जैसों संस्थानों के लिए बदलाव का सही समय
Collegify के आदर्श खंडेलवाल ने सुझाव दिया कि यह भारतीय संस्थानों के लिए मौका है। “IIT और IIM जैसे संस्थान अपनी रिसर्च सुविधाएँ बढ़ाएँ, स्कॉलरशिप्स शुरू करें और इंडस्ट्री के साथ साझेदारी करें ताकि होनहार छात्र देश में ही पढ़ाई करें।” लेकिन अभी के लिए, हजारों भारतीय छात्र अनिश्चितता, आर्थिक संकट और टूटे सपनों से जूझ रहे हैं। उनके लिए यह सिर्फ एक नीतिगत बदलाव नहीं, बल्कि जिंदगी का सबसे बड़ा झटका है।
प्रवासन नीति संस्थान के अनुसार, 1949-50 में अमेरिकी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में लगभग 26 हज़ार विदेशी छात्र थे। जबकि 2019-20 तक यह संख्या बढ़कर 1.1 मिलियन हो गई। इसी दौरान अमेरिका के उच्च शिक्षा संस्थानों में अंतरराष्ट्रीय छात्रों की भागीदारी 1% से बढ़कर 6% तक पहुँच गई। हालाँकि ट्रंप सरकार के फैसलों के बाद इसमें क्या बदलाव होगा, ये देखने वाली बात होगी।
मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित की गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
मलयालम अभिनेत्री विंसी अलोशियस ने अभिनेता शाइन टॉम चाको पर ड्रग्स लेने के बाद उनके साथ दुर्व्यवहार करने का आरोप लगाया है। इस बात का खुलासा अभिनेत्री ने गुरुवार (17 अप्रैल, 2025) को किया। अभिनेत्री ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो के माध्यम से इस घटना का उल्लेख किया था, कि फिल्म सेट पर उनके साथ एक प्रसिद्ध अभिनेता ने ड्रग्स लेकर दुर्व्यवहार किया।
Kochi, Kerala: Malayalam film actress Vincy Aloysius has filed a complaint with Film Chamber, against actor Shine Tom Chacko after he allegedly misbehaved on the set while under the influence of alcohol. Vincy filed the complaint with the Film Chamber and the film industry's…
इसी बीच अभिनेत्री विंसी द्वारा अभिनेता टॉम चाको पर ड्रग्स लेने वाले आरोप में भी खुलासा हुआ है। बुधवार (16 अप्रैल, 2025) रात शाइन टॉम को ड्रग्स रेड के दौरान कोच्चि के एक होटल से भागते हुए देखा गया था। ‘जिला मादक पदार्थ निरोधक विशेष कार्रवाई बल’ (DANSAF) को अभिनेता के कमरे में ड्रग्स इस्तेमाल होने की सूचना प्राप्त हुई थी, जिसके बाद टीम मौके पर पहुँची थी।
DANSAF की टीम के आने की भनक जब अभिनेता शाइन टॉम को हुई, तो वे होटल की तीसरी मंजिल से भाग निकले। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि अभिनेता टॉम चाको के भागने की वजह ये बताई जा रही है कि उनके हाथ में ड्रग्स था।
अभिनेत्री विंसी ने कहा कि उनके साथ ‘सूत्रवाक्यम’ फिल्म की सेट पर दुर्व्यवहार किया गया था, जिसकी शिकायत उन्होंने फिल्म चैंबर में दर्ज कराई है। अभिनेत्री की शिकायत पर ‘चैंबर निगरानी समिति’ सोमवार (21 अप्रैल, 2025) को आपात बैठक बुलाएगी।
विंसी अलोशियस के खुलासे के आधार पर आबकारी विभाग जल्द सबूत इकट्ठा करेगा। आबकारी विभाग ने बताया कि यदि अभिनेत्री कोई सुराग देती है तो वे आगे की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। ‘एसोसिएशन ऑफ मलयालम मूवी आर्टिस्ट्स’ (AMMA) ने बताया था कि अभिनेत्री विंसी जल्द ही उस व्यक्ति का नाम उजागर कर देगी, जिसने फिल्म के सेट पर ड्रग्स लिया था। यदि नाम सामने आता है, तो तुरंत उसके खिलाफ कार्रवाई होगी। अब इसी मामले में अभिनेता शाइन टॉम चाको का नाम सामने आ गया है।
सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर करते समय अभिनेत्री विंसी अलोशियस ने स्पष्ट किया था कि वो ड्रग्स लेने वाले अभिनेताओं के साथ काम नहीं करेंगी। विंसी ने यह भी कहा कि वे अपने जीवन में ड्रग्स, सिगरेट जैसी किसी भी नशीली पदार्थों का हिस्सा कभी नहीं होंगी, जो उनके दिमाग या स्वास्थ्य को प्रभावित करे।