‘बिग बॉस-14’ से सुर्खियाँ बटोरने वाले एजाज खान और पवित्रा पुनिया ने इस बात की पुष्टि की है कि वो दोनों एक-दूसरे को डेट कर रहे हैं और रिलेशनशिप में हैं। पवित्रा ने कहा कि प्यार एक खूबसूरत एहसास है – इसका उन्हें शुरू से यकीन था। उन्होंने कहा कि बिग बॉस में दोनों के बीच लड़ाइयाँ होती थीं और अब एक-दूसरे के लिए फीलिंग्स हैं। उन्होंने बताया कि बाहर निकल कर दोनों ने एक-दूसरे से प्यार का इजहार किया।
वहीं एजाज खान ने कहा कि बिग बॉस के घर के अंदर वो खासे संशय में थे क्योंकि वहाँ सभी हरकतें और क्रियाकलाप खेल के हिसाब से होते हैं, पर पवित्रा की तरफ से जो भी होता था, वो वास्तविक था। उन्होंने कहा कि अब बाहर निकल कर वो दोनों के बीच झगड़े के क्लिप्स देखते हैं तो कहते हैं कि उन्हें पवित्रा पर गुस्सा क्यों नहीं आ रहा। उन्होंने कहा कि पवित्रा के लिए उनके मन में शुरू से फीलिंग्स थी और वो उन्हें अपने जीवन पर ‘टॉर्चर’ करने के लिए तैयार हैं।
एजाज ने कहा कि अभी शादी के लिए बहुत पापड़ बेलने हैं। उन्होंने कहा, “शादी इंशाअल्लाह होगी और बहुत सही वक़्त पर होगी। हम दोनों इस मामले में इंतजार कर रहे हैं और सब कुछ सही रहा तो इसी साल शादी भी हो जाएगी। अभी हमारे घर वाले बहुत फैले हुए हैं। पहले उन्हें समेट लें, फिर इस बारे में सोचेंगे।” वहीं पवित्रा ने कहा कि भविष्य के बारे में कोई नहीं बता सकता, लेकिन चीजें जल्द ही साकार होंगी।
‘एंटरटेनमेंट टाइम्स’ को दिए गए इंटरव्यू में एजाज ने बताया कि दोनों के भाई-बहन एक-दूसरे से मिल चुके हैं और अब माता-पिता व उनके जनरेशन के लोगों का मिलना बाकी है। पवित्रा ने कहा कि एक सच्चे रिलेशनशिप में लड़ाई-झगड़े होते रहते हैं। एजाज ने कहा कि पहले बिग बॉस में झूठ के मुद्दे पर बहस होती थी, अब वास्तविक चीजों पर होती है। एजाज ने कहा कि जब भी झगड़ा होता है, वो सॉरी बोलते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार (फ़रवरी 9, 2021) को राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष गुलाम नबी आज़ाद की विदाई में सम्बोधन दिया, जिनका कार्यकाल पूरा हो रहा है। उन्होंने आज़ाद सहित कार्यकाल पूरा कर रहे चार सांसदों को सदन की शोभा बढ़ाने वाला, सदन में जीवंतता लाने वाला और सदन के माध्यम से जनसेवा में रत नेता बताया। इनमें शमशेर सिंह, मीर मोहम्मद और नजीर अहमद का भी कार्यकाल पूरा हो रहा है।
प्रधानमंत्री ने चारों को अपने-अपने अनुभव और ज्ञान का सदन को लाभ देने व क्षेत्र की समस्याओं को रख कर देश के प्रति योगदान करने के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि मीर मोहम्मद और नजीर अहमद पर लोगों का बहुत कम ध्यान गया होगा, लेकिन सदन का कोई भी ऐसा सत्र नहीं है, जब इनके साथ अलग-अलग विषयों पर उन्हें मिल-बैठ कर चर्चा करने का अवसर न मिला हो। कश्मीर की बारीकियों के मुद्दे पर अक्सर चर्चा होती थी।
उन्होंने कहा कि ये दोनों कभी-कभी परिवार के साथ भी आते थे। पीएम मोदी ने कहा कि इन दोनों ने उन्हें कई जानकारियाँ दी, जिससे उनका उन सबके साथ व्यक्तिगत रिश्ते बन गए थे। उन्होंने कहा कि इन दोनों की प्रतिबद्धता और क्षमता देश व जम्मू-कश्मीर के काम आएगी। शमशेर सिंह के बारे में उन्होंने कहा कि उन्हें याद भी नहीं है कि कई वर्षों तक वो उनके साथ काम कर रहे हैं। उन्होंने शमशेर को अपना पुराना साथी बताया।
उन्होंने बताया कि दोनों पुराने दिनों में स्कूटर पर साथ घूमते थे और आपातकाल के दौरान साथ ही जेल गए थे। पीएम मोदी ने कहा कि सदन में उनकी उपस्थिति 96% है, जो बताती है कि मृदुभाषी और सरल शमशेर सिंह ने जनता के दिए दायित्व को शत प्रतिशत निभाया। उन्होंने विश्वास जताया कि जम्मू कश्मीर के ये चारों अपने जीवन के सबसे उत्तम कार्यकाल में रहे हैं, क्योंकि वो एक बड़े ऐतिहासिक बदलाव के साक्षी बने हैं।
उन्होंने चिंता जताई कि गुलाम नबी आज़ाद के बाद इस पद को जो भी नेता संभालेंगे, उन्हें उनसे मैच करने में काफी दिक्कत होगी। उन्होंने कहा कि आज़ाद अपने दल के साथ-साथ अपने देश और सदन की भी चिंता करते थे। उन्होंने कहा कि नेता प्रतिपक्ष के रूप में अपना दबदबा कायम रखने का मोह कइयों को होता है, लेकिन आज़ाद भी शरद पवार की तरह देश को प्राथमिकता देने वाले नेता हैं।
उन्होंने कहा कि गुलाम नबी आज़ाद ने हर काम को बखूबी निभाया है और कोरोना काल में जब वो नेताओं के साथ बैठक कर रहे थे, तभी आज़ाद ने उन्हें फोन कर के सर्वदलीय बैठक बुलाने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि उनकी बात मान कर बैठक हुई भी। पीएम मोदी ने कहा कि 28 वर्ष का कार्यकाल बहुत बड़ा होता है, जिसमें आज़ाद को सत्ता और विपक्ष, दोनों का हिस्सा बनने का अवसर मिला। उन्होंने कहा:
“ये बहुत पहले की बात है। मैं तब चुनावी राजनीति में नहीं था, संगठन का कार्य करता था। शायद अटल जी की सरकार रही होगी। तब मैं संसद में किसी कार्य से आया था तो गुलाम नबी आज़ाद के साथ खूब बातें हुई। पत्रकारों की नजर पड़ी तो वो सोचने लगे कि इन दोनों का मेल कैसे हो सकता है। पत्रकारों के पूछने पर आज़ाद ने जवाब दिया कि अख़बारों, टीवी और बैठकों में हमें भले ही आप लड़ते-झगड़ते देखते हो, लेकिन इस सदन की छत के नीचे हम परिवार हैं। यहाँ हम सब एक-दूसरे के सुख-दुःख बाँटते हैं।”
इस दौरान उन्होंने गुलाम नबी आज़ाद के एक शौक के बारे में बात की। उन्होंने कहा कि सरकारी बँगले में रहने वालों का दिमाग अंदर रखे सोफे सेट और दीवारों तक रहता है, लेकिन आज़ाद ने ऐसा बगीचा बनाया है, जो आपको कश्मीर की घाटी की याद दिला देगा। प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि आज़ाद को इसका गर्व है। वो नई-नई चीजें जोड़ते हैं और उनका बँगला हर साल प्रतिस्पर्धा में नंबर एक आता है।
नरेंद्र मोदी ने बताया कि जब गुलाम नबी आज़ाद जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री थे, तब वो गुजरात के सीएम हुआ करते हैं और दोनों में काफी निकटता भी थी। उन्होंने कहा कि हर घटना के समय दोनों के बीच संपर्क बना रहता था। उन्होंने एक वाकया सुनाते हुए कहा कि गुजरात के कई पर्यटक जम्मू कश्मीर जाते हैं और ऐसे ही एक पर्यटन दल पर आतंकियों ने हमला कर दिया था। उसमें 8 लोगों की मौत हो गई।
प्रधानमंत्री इस आतंकी वारदात को याद कर के भावुक हो उठे और बताया कि इस घटना के बाद उन्हें सबसे पहले गुलाम नबी आज़ाद का फोन कॉल आया। बकौल पीएम मोदी, वो फोन सिर्फ सूचना देने के लिए नहीं किया गया था बल्कि उनके आँसू भी रुक नहीं रहे थे फोन पर। उस समय प्रणव मुखर्जी देश के रक्षा मंत्री हुआ करते थे। पीएम मोदी ने बताया कि उन्होंने मुखर्जी को फोन कर के डेड बॉडीज को वापस लाने के लिए भारतीय वायुसेना के जहाज की मदद माँगी थी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुलाम नबी आज़ाद को राज्यसभा में दी विदाई
मुखर्जी ने उन्हें आश्वासन दिया कि व्यवस्था की जा रही है। लेकिन, रात में फिर आज़ाद का एयरपोर्ट से ही फोन आया और जैसे अपने परिवार के सदस्य की चिंता की जाती है, ठीक वैसी ही चिंता उन्हें भी थी। प्रधानमंत्री इस घटना के बारे में बताते-बताते अचानक से रो पड़े और उन्होंने ग्लास में रखा पानी पीकर फिर अपनी बात शुरू की। हालाँकि, इस दौरान सदन के सदस्यों ने मेज थपथपा कर उनका हौसला बढ़ाया।
पीएम मोदी ने आगे बताया कि पद और सत्ता जीवन में आते रहते हैं लेकिन उन्हें कैसे पचाना है, ये मायने रखता है। प्रधानमंत्री ने बताया कि इस घटना के दौरान जो कुछ भी हुआ, वो उनके लिए बड़ा भावुक था। उन्होंने बताया कि दूसरे दिन फिर फोन कॉल आया और आज़ाद ने पूछा कि सारे डेड बॉडीज पहुँच गए? पीएम ने कहा कि एक मित्र के रूप में वो घटनाओं और अनुभवों के आधार पर सभ्य और नम्र गुलाम नबी आज़ाद का आदर करते हैं और उन्हें विश्वास है कि देश के लिए कुछ कर गुजरने की इच्छा उन्हें चैन से बैठे नहीं देगी।
मुनव्वर फारूकी को जमानत मिली। वो जेल से छूट कर आजाद घूम रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार उसके साथ गिरफ्तार हुए 4 लोग अब भी इंदौर जेल में हैं। इनमें दो भाई भी हैं – एक MBA का छात्र है तो दूसरा स्कूल का।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार पुलिस ने पहले इस बात का खुलासा नहीं किया था कि आरोपितों में कोई नाबालिग भी है। लेकिन परिवार से बातचीत पर पता चला कि एक आरोपित नाबालिग था, जिसने एक हफ्ते जुवेनाइल जेल में सजा काटी।
रिपोर्ट के अनुसार, इस केस में 1 एमबीए छात्र समेत 4 लोग अब भी इंदौर जेल में बंद हैं। परिवार बताता है कि उनका बेटा सिर्फ़ स्टैंड अप कॉमिक आर्टिस्ट बनने के सपने को साकार करने के लिए उस दिन वहाँ गया था। लेकिन फारूकी के साथ उसे इसीलिए पकड़ा गया क्योंकि वह शो का हिस्सा था। छोटा भाई इसलिए हिरासत में लिया गया क्योंकि वह अपने भाई को परेशानी में देख कर उसी समय उसके पास भाग कर गया। नाबालिग को तो अब बेल मिल गई है। लेकिन उसका बड़ा भाई अब भी जेल में है।
परिवार ने TOI को बताया कि उन्हें मालूम था कि दोनों भाई मुनरो कैफे में 1 जनवरी को शो के लिए गए हैं। लेकिन उन्हें ये जानकारी नहीं थी कि वहाँ पर हिंदू देवी-देवताओं का अपमान किया जाएगा। परिवार का कहना है कि उनके बेटे ने दो साल पहले कॉमेडी शुरू की थी और उसे अन्य आरोपित (फारूकी) के बारे में पता भी नहीं था। उसकी भेंट केवल वेन्यू पर ही हुई थी।
नाबालिग बच्चे को जब जमानत मिली तो परिवार ने घबरा कर उसे अपने रिश्तेदारों के घर भेज दिया। अब उन्हें इंतजार है कि उनका बड़ा बेटा भी जेल से छूट जाए। परिवार के अनुसार, उनके बेटे के साथ दुर्वव्यहार नहीं हो रहा। लेकिन फिर भी वह पीड़ित है। उनकी उम्मीद है कि फारूकी की जमानत के बाद उनके बेटे को भी जमानत मिले।
गौरतलब है कि मुनव्वर फारूकी पर पुलिस कार्रवाई 1 जनवरी 2021 को हुई थी। इसके बाद ट्विटर पर एक पूरा गिरोह केवल इस बात को समझाने में लग गया कि कैसे भाजपा प्रशासन और पुलिस एक सीधे-साधे स्टैंड-अप कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी पर शिंकजा कस रही है। वो भी सिर्फ़ इसलिए क्योंकि उसने गृह मंत्री अमित शाह का मजाक उड़ाया, जबकि सच्चाई ये है कि उस पर कार्रवाई हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करने को लेकर हुई थी।
इस गिरोह की हिपोक्रेसी का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि पूरी घटना को 1 माह से अधिक बीत चुका है, लेकिन एक भी बार इनकी संवेदनाएँ उन अन्य चार लोगों के लिए बाहर नहीं आईं। एक भी बार हिरासत में लिए गए बाकी लोगों का जिक्र तक नहीं किया इन लोगों ने।
पहले विक्टिम कार्ड दिखा-दिखा कर इनकी प्रायॉरिटी केवल और केवल फारूकी को छुड़ाने की रही, जिसमें इन्हें शनिवार रात कामयाबी भी मिली। और, अब जैसे ही फारूकी छूटा, तब इन्हें याद आया कि उसके साथ और लोग भी गिरफ्तार हुए थे।
आज टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में एक परिवार अपने बच्चों की बेगुनाही की बात कह रहा है। लेकिन सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं कि आखिर कैसे हिंदू देवी-देवताओं को गाली देने वालों को जस्टिफाई किया जा सकता है, वो भी सिर्फ़ संवेदनाए बटोरने के लिए। मगर, गिरोह की चुप्पी फिर भी इस मुद्दे पर बनी हुई है।
मालूम हो कि 5 फरवरी को हिंदू देवी-देवताओं पर अपमानजनक टिप्पणी करने के आरोप में जेल में बंद स्टैंड-अप कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी को सुप्रीम कोर्ट ने राहत प्रदान करते हुए अंतरिम जमानत दी थी। सुप्रीम कोर्ट में मुनव्वर फारूकी ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उसे अंतरिम जमानत पर रिहा करने से मना कर दिया गया था।
पंजाब की जेल में बंद माफिया राजनेता मुख़्तार अंसारी के खिलाफ उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ की सरकार बिलकुल भी नरमी बरतने के मूड में नहीं है। मऊ से लगाकर 5वीं बार विधायक बने मुख़्तार अंसारी की बीवी और बेटों के पासपोर्ट भी जब्त कर लिए गए हैं। उसकी बीवी अफ़सा अंसारी पर भी कई मामले दर्ज हैं। मुख़्तार को पंजाब के रोपड़ जेल से यूपी लाने की कोशिशें जारी हैं। इसमें पंजाब सरकार अड़ंगा डाल रही है।
सुप्रीम कोर्ट में उसने दलील दी है कि कि वह डॉ मुख्तार अहमद अंसारी का पोता है, जो एक स्वतंत्रता सेनानी थे और 1927-28 तक कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष रहे थे। इसके अलावा वह जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के संस्थापक भी थे। अंसारी की बीवी और दोनों बेटों ने न्यायालय से अंतरिम जमानत मिलने के बाद गाजीपुर के पुलिस अधीक्षक डॉ. ओमप्रकाश सिंह के यहाँ अपने पासपोर्ट जमा करा दिए।
उस समय इस प्रकरण की जाँच कर रहे इंस्पेक्टर भी वहाँ मौजूद थे। परिवार के साथ मुख़्तार अंसारी के भाई और सांसद अफजल अंसारी भी थे। हाईकोर्ट के आदेश पर पासपोर्ट सरेंडर करने के बाद विधायक के परिजनों ने कहा कि जब तक केस समाप्त नहीं हो जाता, तब तक वो देश से बाहर नहीं जाएँगे। गजल होटल के लिए खरीदी गई जमीन और अवैध निर्माण को लेकर उसकी बीवी व बेटों पर अलग-अलग मामले दर्ज हैं।
बता दें कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुख़्तार अंसारी के दोनों बेटों को अंतरिम जमानत देते हुए फरवरी 9 तक उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा रखी है। जमानत के दौरान लगाई गई शर्तों में ही पासपोर्ट जब्त करना भी शामिल था। बेटे अब्बास और उमर ने भी अपने पासपोर्ट सरेंडर किए। उन्हें 50 हजार रुपए के निजी मुचलके पर जमानत दी गई है। उन्होंने लिखित में दिया कि वो इस मामले में गवाहों को प्रभावित नहीं करेंगे।
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में अंसारी की याचिका में कहा गया था, “प्रतिवादी ऐसे परिवार का हिस्सा है, जिसने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में बहुत बड़ा योगदान दिया है। भारत को हामिद अंसारी जैसा नेता दिया, जो उपराष्ट्रपति रहे। इसके अलावा बाबा शौकतुल्ला अंसारी ओडिशा के राज्यपाल थे। माननीय न्यायमूर्ति आसिफ अंसारी इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे।”
दिल्ली में ‘किसान आंदोलन’ के अंतर्गत आयोजित ट्रैक्टर रैली में गणतंत्र दिवस (जनवरी 26, 2021) के दिन जम कर हिंसा हुई थी, जिसमें 500 पुलिसकर्मी घायल हुए थे। अब गिरफ्तार ‘किसान नेता’ सुखदेव सिंह ने कबूल किया है कि उसने जुगराज को लाल किला पर खालिस्तानी झंडा फहराने को कहा था। लाल किले में ही वो पहली बार दीप सिद्धू और जुगराज से मिला था। सेवादार के रूप में काम करने वाले जुगराज को पोल पर चढ़ कर झंडा फहराने का पुराना अभ्यास था।
50 हजार रुपए के इनामी सुखदेव सिंह ने ये खुलासे किए हैं। दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने बताया कि करनाल निवासी 65 वर्षीय सुखदेव सिंह सिंघु सीमा पर ही छिपा हुआ था। उसने चक्का जाम आंदोलन में भी हिस्सा लिया। पुलिस को उसकी लोकेशन सिंघु सीमा से ही मिल रही थी। कुरुक्षेत्र के पास स्थित पीपली गाँव में उसकी बेटी का ससुराल है। इसके बाद वो चंडीगढ़ पहुँचा और अपने वकील से मुलाकात की।
‘अमर उजाला’ की खबर के अनुसार, वो चंडीगढ़ हाईकोर्ट में याचिका दायर कर ये आरोप लगाना चाहता था कि दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे किसानों का बिजली-पानी कनेक्शन काट दिया गया है। लेकिन, हाईकोर्ट पहुँचने से पहले ही दिल्ली पुलिस ने औद्योगिक क्षेत्र, सेक्टर-तीन, चंडीगढ़ में रेडलाइट से उसे पकड़ लिया। लाल किले पर उसने एक बड़ी भीड़ का नेतृत्व किया था और लोगों को उकसाया भी था।
उसने कहा था कि अगर तोड़फोड़ नहीं होगी तो सरकार झुकेगी कैसे? उसने दंगाइयों को जम कर तोड़फोड़, हिंसा और खालिस्तानी झंडा फहराने के लिए उकसाया था। पूछताछ में भी उसने इन आरोपों को स्वीकार किया है। तरनतारन निवासी जुगराज वहाँ के 5 गुरुद्वारों का सेवादार है। अपराध शाखा की चाणक्यपुरी में स्थित इंटरस्टेट सेल (आईएससी) में तैनात इंस्पेक्टर नीरज चौधरी ने सुखदेव सिंह को चंडीगढ़ से गिरफ्तार किया।
सुखदेव सिंह और दीप सिद्धू की गिरफ्तारी के साथ ही गणतंत्र दिवस की हिंसा में गिरफ्तारी की कुल संख्या 128 तक पहुँच गई थी। इससे पहले दिल्ली हिंसा के मामले में पुलिस ने हरप्रीत सिंह (32), हरजीत सिंह (48) और धर्मेद्र सिंह (55) नामक तीन लोगों को गिरफ्तार किया था। सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल रिकॉर्डिग और अन्य तकनीकों का प्रयोग करते हुए पुलिस हिंसा में शामिल अन्य आरोपितों का पता लगा रही है।
128वीं गिरफ़्तारी दीप सिद्धू की हुई। उस पर पुलिस ने 1 लाख रुपए का इनाम भी रखा हुआ था। दीप सिद्धू को दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बाद ‘किसान आंदोलन’ में हुई हिंसा को लेकर कई राज खुलने की संभावना जताई जा रही है। पता चला था कि पंजाबी एक्टर जो भी वीडियो फेसबुक या अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपलोड करता है, उसके पीछे सिद्धू की एक बेहद करीबी महिला मित्र है।
पूर्व पोर्न स्टार मिया खलीफा ने अब दिल्ली व उसके आसपास के इलाकों में चल रहे ‘किसान आंदोलन’ पर चुप्पी को लेकर प्रियंका चोपड़ा पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने प्रियंका को ‘मिस जोनास’ कह कर सम्बोधित किया और पूछा कि वो चुप क्यों हैं? मिया खलीफा ने आरोप लगाया है कि ये ठीक उसी तरह है, जैसे बेरूत की बर्बादी के समय गायिका शकीरा चुप थीं। उन्होंने कहा कि उन्हें इसे लेकर खासी उत्सुकता है।
हालाँकि, इसके बाद प्रियंका चोपड़ा के फैंस द्वारा उन्हें गुस्से का सामना करना पड़ा। फैंस ने उन्हें याद दिलाया कि ‘फैशन गर्ल’ ने दिसंबर 2020 में ही ‘किसान आंदोलन’ के सर्मथन में बयान जारी कर दिया था और यहाँ तक कि दिलजीत दोसाँझ के ट्वीट को रीट्वीट भी किया था। बता दें कि गणतंत्र दिवस के दिन हुई हिंसा पर चुप पंजाबी गायक दिलजीत ने खालिस्तानियों की निंदा करने से इनकार कर दिया। वो ट्विटर पर प्रोपेगंडा फैलाते रहते हैं।
मिया खलीफा लगातार ‘किसान आंदोलन’ पर ट्वीट कर रही हैं। उन्होंने पूछा था कि आखिर कोई ऐसा सोच भी कैसे सकता है कि सारे अंतरराष्ट्रीय सेलेब्रिटीज ने रुपए लेकर ही ‘अब तक के सबसे बड़े विरोध प्रदर्शन’ के पक्ष में ट्वीट किया है। साथ ही वो मीणा हैरिस के ट्वीट्स को भी रीट्वीट करने में लगी हुई हैं। उन्होंने भारतीय खाने के साथ तस्वीर शेयर कर के भी इस मामले में इमोशनल समर्थन लेना चाहा। हालाँकि इसके लिए उनका विरोध भी हो रहा है।
Is Mrs. Jonas going to chime in at any point? I’m just curious. This is very much giving me shakira during the Beirut devastation vibes. Silence.
किसान संगठनों द्वारा आंदोलन में किसानों के मरने की जो खबरें फैलाई जा रही हैं, उन्हें भी मिया खलीफा जम कर आगे बढ़ा रही हैं। उन्होंने कनाडा के खालिस्तान समर्थक सांसद जगमीत सिंह को भी धन्यवाद किया। वो रुपी कौर और जगमीत के साथ अक्सर ट्विटर टैग्स में दिखती हैं। उन्होंने पूछा कि क्या UN को भी ट्वीट करने से पैसे मिल रहे हैं? साथ ही कहा कि ये भारत का आंतरिक मुद्दा नहीं है, मानवता का है।
राज्यसभा में सम्बोधन देते समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ‘FDI (फॉरेन डिस्ट्रक्टिव आइडियोलॉजी)’ के खिलाफ एकजुट होने की अपील की थी। असम में भाषण देते समय भी उन्होंने ग्रेटा थनबर्ग द्वारा लीक किए गए टूलकिट की तरफ इशारा करते हुए कहा था कि उन्होंने भारत के योग के साथ-साथ चाय को नहीं छोड़ा।
दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने लाल किला परिसर में गणतंत्र दिवस (जनवरी 26, 2021) को हुई हिंसा और पुलिसकर्मियों पर हमले वाले भीड़ का नेतृत्व करने वाले दीप सिद्धू को गिरफ्तार कर लिया है। उस पर पुलिस ने 1 लाख रुपए का इनाम भी रखा हुआ था। दीप सिद्धू को दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बाद ‘किसान आंदोलन’ में हुई हिंसा को लेकर कई राज खुलने की संभावना जताई जा रही है।
Big breakthrough: Delhi Police’s special cell has arrested Punjab actor Deep Sidhu in Red Fort riots case. Operation by DCP Sanjeev Yadav. Tracked using advanced technical surveillance. pic.twitter.com/coKOtEKmut
इससे पहले वो लगातार वीडियो के माध्यम से बयान जारी कर रहा था। पता चला था कि पंजाबी एक्टर जो भी वीडियो फेसबुक या अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपलोड करता है, उसके पीछे सिद्धू की एक बेहद करीबी महिला मित्र है। ये महिला मित्र भारत से बाहर विदेश में बैठकर सिद्धू के वीडियो अपलोड करती थी। इसके पीछे सिद्धू की चाल जाँच एजेंसियों को भटकाने की थी। वो पेशेवर अपराधियों की तरह ‘खेल’ रहा था।
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं एवं पुरुषों के तलाक और शादी को लेकर अहम निर्णय दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जहाँ मुस्लिम महिलाएँ तलाक के बिना दूसरा निकाह नहीं कर सकतीं, वहीं मुस्लिम पुरुषों को तलाक के बिना दूसरा निकाह करने की अनुमति है। मुस्लिम पुरुष अपनी बीवी को तलाक दिए बिना ही एक से अधिक निकाह कर सकता है। मुस्लिम महिलाओं पर ये नियम लागू नहीं होता।
हाईकोर्ट ने कहा है कि अगर किसी मुस्लिम महिला को दूसरा निकाह करना है तो उसे मुस्लिम विवाह अधिनियम 1939 (Dissolution of Muslim Marriages Act, 1939) या मुस्लिम पर्सनल लॉ के हिसाब से सबसे पहले अपने मौजूदा शौहर से तलाक लेना पड़ेगा। ये फैसला अलका सरीन ने सुनाया। हरियाणा के मेवात स्थित नूँह के एक मुस्लिम प्रेमी जोड़े ने अदालत से सुरक्षा की माँग की थी, जिस पर ये निर्णय दिया गया।
उक्त प्रेमी जोड़े ने अदालत को बताया कि वो पहले से ही शादीशुदा हैं। मुस्लिम महिला ने आरोप लगाया कि उसका निकाह उसकी मर्जी के बिना ही कर दिया गया था, इसीलिए अब वो अपने प्रेमी से निकाह करने जा रही है। हाईकोर्ट ने कहा कि चूँकि महिला ने अपने प्रेमी के साथ निकाह से पहले अपने शौहर से तलाक नहीं लिया है, ऐसे में उसे कपल मान कर सुरक्षा नहीं दी जा सकती क्योंकि कानूनी रूप से निकाह के आधार पर सुरक्षा की माँग वैध नहीं है।
अजीबोगरीब बात है… मुस्लिम पुरुष तो बहुविवाह कर सकता है किंतु मुस्लिम महिला नहीं? महिलाओं को बराबरी का दर्जा व आदर का भाव आखिर कब देगा मुस्लिम समाज व उनका कानून। एक देश में दो कानून? ये धर्म है या अधर्म!! pic.twitter.com/dCr8qW8Qcr
दोनों के परिजनों ने उन्हें जान से मार डालने की धमकी दी थी, जिसके बाद हाईकोर्ट ने उनसे कहा कि वो सम्बंधित जिले के एसपी के पास याचिका लेकर जाएँ और पुलिस से सुरक्षा की माँग करें। अदालत ने कहा कि जीवन को खतरा हो तो पुलिस सुरक्षा देने को बाध्य है। दोनों के परिजनों ने उन्हें परिवार और संपत्ति से भी बेदखल करने की धमकी दी है। अदालत ने उनकी सुरक्षा के बाबत कोई आदेश जारी नहीं किया।
‘इच्छाधारी आन्दोलनजीवी’ योगेंद्र यादव आज दर्शन पाल और राकेश टिकैत जैसों के साथ मिल कर ‘किसान आंदोलन’ का चेहरा बने हुए हैं, लेकिन कभी उन्होंने इसी तरह के कृषि कानूनों को लाने की वकालत की थी, जिनका आज वो विरोध कर रहे हैं। ‘पॉलिटिकल कीड़ा’ ने एक पुराना वीडियो शेयर किया है, जिसमें ‘स्वराज अभियान’ के अध्यक्ष योगेंद्र यादव कह रहे हैं कि किसानों को सीधे बाजार तक पहुँच मिलनी चाहिए।
इस वीडियो में वो समझाते हुए कहते हैं कि बेचने वाले उत्पादक और खरीदने वाले ग्राहक के बीच फ़िलहाल 7 लेयर हैं, जिन्हें कम किया जाना चाहिए। तब उनकी माँग थी कि सरकार को बाजार को रेगुलेट करना पड़ेगा क्योंकि सारी चीजों की मार किसानों पर ही पड़ रही है। उन्होंने मौजूदा सिस्टम को ख़त्म करने की बात करते हुए बिचौलियों पर लगाम लगाने की बात कही थी। उन्होंने आशंका जताई थी कि बिचौलिए और सरकार मिले हुए हैं।
उन्होंने ये भी कहा था कि पूरा का पूरा बाजार आज उन लोगों के कब्जे में है, जो न तो उत्पादन कर रहे हैं और न ही उपयोग कर रहे हैं। उनका जोर था कि उपभोक्ता और उत्पादक दोनों को पीसने से रोका जाए।
योगेंद्र यादव ने मोदी सरकार पर ये तक आरोप लगाया था कि वो न तो उपभोक्ताओं का प्रतिनिधित्व करती है और न ही किसानों का। आज जब केंद्र सरकार ने इसी समस्या को ख़त्म करने के लिए 3 कृषि कानून लाए, तो योगेंद्र यादव उसके भी विरोध में हैं।
Yogendra Yadav in 2018 wanted Govt to link Farmers directly to market.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिना बात हर चीज का विरोध करने वालों के लिए राज्यसभा में सोमवार (फ़रवरी 8, 2021) को ‘आन्दोलनजीवी’ शब्द का प्रयोग किया था। इसी तरह प्रशांत भूषण ने एक वीडियो रीट्वीट किया जिसमें लिखा था, “चरखी दादरी पर आज किसान आंदोलन।” प्रशांत भूषण ने इसे रीट्वीट करते हुए लिखा, “बंगाल जीतने के चक्कर में शायद भाजपा उत्तर प्रदेश खो दिया है।” जबकि ये जगह हरियाणा में है।
भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस एक नया राजनीतिक पैंतरा लेकर आई है। कॉन्ग्रेस लगभग 5 लाख ‘सोशल मीडिया वॉरियर्स’ तैनात करेगी। लेकिन इस ख़बर के सामने आते ही मज़बूत सवाल खड़ा होता है, क्या राजनीतिक ज़मीन पर लड़खड़ाती कॉन्ग्रेस को ऐसे फैसलों की ज़रूरत है? हाल-फ़िलहाल की राजनीति का सबसे सरल सवाल है कि देश के कितने राज्यों में कॉन्ग्रेस की सरकार बची है। इसका जवाब कोई भी आम इंसान अपनी ऊँगलियों पर गिन सकता है। आखिर अस्तित्व के लिहाज़ से सबसे पुराना राजनीतिक दल नाकामी के इस पड़ाव पर पहुँचा कैसे?
इस समझने के लिए 2019 के आम चुनावों में कॉन्ग्रेस के ‘वोट शेयर’ पर गौर करिए। 2014 के आम चुनाव में कॉन्ग्रेस को 44 सीटें हासिल हुई थीं और 2019 के आम चुनाव में 52। 2014 की तुलना में 2019 के दौरान सीटों की संख्या में भले नाममात्र का इज़ाफा हुआ हो, लेकिन दोनों चुनावों के दौरान कॉन्ग्रेस का वोट शेयर लगभग 19 से 20 फ़ीसदी के बीच ही रहा। 2009 के आम चुनावों में कॉन्ग्रेस को 28 फ़ीसदी वोट मिले थे और इस आँकड़ें के आधार पर एक बात स्पष्ट हो जाती है। अगर आज की तारीख में भी चुनाव होते हैं और वोट शेयर 8-10 फ़ीसदी बढ़ता है (जिसकी कोई उम्मीद नहीं दिखती) फिर भी कॉन्ग्रेस के लिए स्थिति संतोषजनक नहीं होगी।
यह तो आम चुनावों की बात हो गई, कुछ विधानसभा चुनावों की ओर भी गौर कर लेते हैं, शुरुआत बिहार विधानसभा चुनाव 2020 से! यह चुनाव एक लिहाज़ से हर राजनीतिक दल के लिए नया था, महामारी के बाद होने वाला पहला चुनाव! रैलियों में सीमित भीड़, चुनाव आयोग के हिस्से की चुनौतियाँ, ऑनलाइन जनसभा और जनसंपर्क। यानी क्षेत्रीय दल से लेकर राष्ट्रीय दल तक, सभी के सामने कई चुनौतियों का स्वरूप एक जैसा था। जिस बिहार विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी 74 सीटें जीत कर दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी। ठीक उसी चुनाव में कॉन्ग्रेस महज़ 19 सीटों पर सिमट कर रह गई।
2019 में हुआ महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव का नज़ारा भी कॉन्ग्रेस के लिए कुछ अलग नहीं था। आज भले महाराष्ट्र में शिवसेना, एनसीपी और कॉन्ग्रेस की गठबंधन सरकार है, लेकिन इस चुनाव में भी कॉन्ग्रेस का प्रदर्शन औसत से भी बदतर था। जहाँ 100 से अधिक सीटें हासिल करके भाजपा राज्य की इकलौती सबसे बड़ी पार्टी साबित हुई थी, वहीं कॉन्ग्रेस सिर्फ 44 सीटों पर सिमट कर रह गई थी। ठीक यही स्थिति बनी झारखंड के विधानसभा चुनावों में जिसमें कॉन्ग्रेस को सिर्फ 16 सीटें हासिल हुई थीं।
इसके अलावा एक और ऐसा चुनाव है, जो फ़िलहाल लोगों के ज़ेहन में शायद उतना ताज़ा नहीं होगा लेकिन असल मायनों में इस विधानसभा चुनाव ने कॉन्ग्रेस की ज़मीन को कहीं ज़्यादा खोखला किया था। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 जब समाजवादी पार्टी और कॉन्ग्रेस के ‘युवा नरेश’ ने साथ चुनाव लड़ा और नतीजा ये रहा कि अखिलेश यादव से एक साल बड़े और राहुल गाँधी से एक साल छोटे आदित्यनाथ मुख्यमंत्री चुने गए। इस चुनाव में भाजपा को तीन चौथाई बहुमात हासिल हुआ था और सपा-कॉन्ग्रेस गठबंधन को सिर्फ 50 से अधिक सीटें हासिल हुई थीं।
यह तो फिर भी आँकड़ों के आधार पर पेश की गई दलीलें हैं। इसके बाद आती हैं वो दलीलें जो तार्किक हैं और प्रासंगिक भी हैं! जितना आसान कॉन्ग्रेस शासित राज्यों को ऊँगलियों पर गिनना है, ठीक उतना ही आसान इस दल की गलतियाँ पहचानना भी है। इसकी सबसे बड़ी दो मिसाल हैं, संगठन के भीतर ‘युवा बनाम बुजुर्ग’ और ‘अध्यक्ष एक खोज’। 2018 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद कमलनाथ मुख्यमंत्री चुने गए। एक साल तक सरकार किसी तरह चली, लेकिन फिर शुरू हुआ कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच बयानबाज़ी का दौर। सिंधिया बगावती हुए और कॉन्ग्रेस की सरकार गिर गई। भले सब कुछ सही होने के अनेक दावे किए गए हों, लेकिन इस राजनीतिक उलटफेर ने कॉन्ग्रेस की बड़े पैमाने पर किरकिरी कराई।
कुछ ही समय बाद ठीक ऐसी ही सूरत की राजनीतिक अदावत नज़र आई राजस्थान कॉन्ग्रेस में। अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच भी इतनी तीखी बयानबाज़ी हुई कि कोई सरकार के सत्ता में बने रहने को लेकर आशावादी नहीं था। कई दिनों तक चले इस सियासी खींचतान में भी कॉन्ग्रेस की बल भर किरकिरी हुई। कॉन्ग्रेस की चुनौतियाँ यहीं ख़त्म नहीं होती। वरिष्ठ और तजुर्बेकार नेताओं की सूची के बावजूद उसे पूर्णकालिक अध्यक्ष नहीं मिला है।
जमीन के साथ पहचान की संकट से जूझ रही कॉन्ग्रेस जब तक इन समस्याओं का समाधान नहीं तलाशती, सोशल मीडिया वॉरियर्स जैसे फैसलों से शायद ही उसका भला हो!