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राहुल गाँधी के फिर विदेश निकलने की ‘हवा’, पार्टी की दिल्ली ईकाई ने कहा- अध्यक्ष बना दो

दिल्ली प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी ने रविवार (जनवरी 31, 2021) को वायनाड के सांसद राहुल गाँधी को पार्टी अध्यक्ष बनाने के लिए सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया।

कॉन्ग्रेस की दिल्ली इकाई का मानना है कि राहुल गाँधी की ‘भविष्यवाणियाँ’ सच साबित हो रही हैं। उन्होंने अपनी नेतृत्व क्षमता दिखाई है। लिहाजा उन्होंने उन्हें फिर से पार्टी अध्यक्ष बनाने के लिए प्रस्ताव पारित किया है।

बता दें कि राहुल गाँधी ने 2019 के आम चुनावों की हार के बाद अध्यक्ष पद छोड़ दिया। पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के बाद उनकी माँ सोनिया गाँधी को अंतरिम अध्यक्ष बनाया गया। राहुल गाँधी से पहले उन्होंने दो दशकों तक पार्टी अध्यक्ष के रूप में काम किया था।

पार्टी प्रमुख के पद से इस्तीफा देने के तुरंत बाद अटकलें लगाई जा रही थीं कि वह पार्टी अध्यक्ष के रूप में वापस आएँगी। ऐसी अटकलें पार्टी की नेतृत्व क्षमता में कमी और नेहरू-गाँधी परिवारवाद से परे न सोचने को लेकर लगाई गई। हालाँकि, शशि थरूर जैसे अन्य वरिष्ठ नेता पुरानी पार्टी में वंशवाद की राजनीति के प्रति घृणा व्यक्त करने के लिए काफी मुखर रहे हैं।

विभिन्न राज्य ईकाइयों ने भी उन्हें पार्टी अध्यक्ष बनाने के लिए इसी तरह के प्रस्ताव पारित किए हैं। इस सब के बीच, ऐसी अटकलें हैं कि राहुल गाँधी फिर से विदेश छुट्टी पर चले गए हैं। हालाँकि, कॉन्ग्रेस ने इन खबरों को खारिज कर दिया है।

गौरतलब है कि पिछले दिनों कॉन्ग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने ऐलान किया कि जून 2021 तक पार्टी अपने अध्यक्ष पद को लेकर निर्णय ले लेगी। कॉन्ग्रेस वर्किंग कमेटी की 22 जनवरी 2021 को हुई बैठक के बाद यह ऐलान किया गया था। पार्टी का कहना था कि इस साल कई राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी संगठन का चुनाव करेगी, जिसमें अध्यक्ष पद का चुनाव सबसे अहम है।

‘आदतन अपराधी है राजदीप सरदेसाई’: वह डॉक्टर जिसकी जिंदगी फर्जी स्टिंग से तबाह की थी

राजदीप सरदेसाई पत्रकारिता गिरोह के एक प्रमुख सदस्य हैं। यह गिरोह आपको यत्र-तत्र-सर्वत्र पत्रकारिता का पाठ पढ़ाता मिल जाएगा। लेकिन असल में इनकी अपनी पूरी पत्रकारिता प्रोपेगेंडा और फेक न्यूज के इर्द-गिर्द सिमटी रहती है।

राजदीप सरदेसाई ने मंगलवार (जनवरी 26, 2021) को ट्रैक्टर रैली के दौरान हुई हिंसा में किसान की मौत को लेकर झूठी खबर फैलाई। बाद में खबर गलत निकली और राजदीप सरदेसाई ने चुपके से ट्वीट डिलीट कर लिया।

इससे पहले उन्होंने 23 जनवरी को राष्ट्रपति भवन में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की पोट्रेट के अनावरण को लेकर ऐसा ही किया था। इसको लेकर राष्ट्रपति के प्रेस सचिव अजय कुमार सिंह ने भी ‘इंडिया टुडे’ ग्रुप के चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ अरुण पुरी को एक पत्र लिखा था। इंडिया टुडे ग्रुप ने किसान की मौत वाले दावे को लेकर राजदीप सरदेसाई पर कार्रवाई की। इसके बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया था।

नोएडा के सरकारी अस्पताल के डॉक्टर अजय अग्रवाल ने ऑपइंडिया से बात करते हुए इस पर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि राजदीप सरदेसाई तो आदतन अपराधी (Regular Offender) है। एक-न-एक दिन तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी ही थी।

बता दें कि डॉक्टर अजय अग्रवाल की जिंदगी राजदीप सरदेसाई के किए गए ‘कारनामे’ ने पूरी तरह से बर्बाद कर दी थी। यह मामला 2006 का है, जब नोएडा के सरकारी अस्पताल के डॉक्टर अजय अग्रवाल के खिलाफ IBN-7 और CNN-IBN चैनल ने ‘शैतान डॉक्टर’ नाम से एक ‘स्टिंग ऑपरेशन’ किया था। इस तथाकथित स्टिंग ऑपरेशन में दावा किया गया था कि डॉक्टर अग्रवाल भीख मँगवाने वाले गिरोहों के लिए बच्चों के हाथ-पैर काटने का काम करते हैं। इस स्टिंग ऑपरेशन के बाद डॉक्टर अग्रवाल की जिंदगी में तूफान आ गया। उनका घर से निकलना मुश्किल हो गया। जिंदगी नर्क बन गई। लोगों ने उनके घर पर पथराव भी किया।

हालाँकि, अभी तक की जाँचों में डॉक्टर अग्रवाल को निर्दोष पाया गया है। लेकिन इसके बावजूद इन लोगों ने डॉक्टर अग्रवाल से माफी नहीं माँगी है। बता दें कि इस फर्जी स्टिंग ऑपरेशन के कर्ता-धर्ता थे राजदीप सरदेसाई, जो कि उस समय IBN-7 के एडिटर इन चीफ थे और पत्रकार से नेता और फिर भाव न मिलने पर पत्रकार बने आशुतोष चैनल के एडिटर थे। 

टीवी पर बैठकर बड़ी-बड़ी बातें करने वाले ये तथाकथित पत्रकार किस कदर शातिर हैं, ये इसी बात से पता चलता है कि उन्होंने गलती पकड़े जाने के बावजूद कभी माफी नहीं माँगी। जब उन्हें कोर्ट का नोटिस आया, तो वो उसकी भी कई सालों तक अनदेखी करते रहे। आखिरकार जब अदालत ने उनके खिलाफ वारंट जारी किया, तब जाकर 12 साल बाद 2018 में राजदीप सरदेसाई, आशुतोष और अरुणोदय मुखर्जी ने सरेंडर किया। हालाँकि इन्हें बेल मिल गई।

कहाँ है ‘पत्रकार’ सैयद मोहम्मद अहमद काजमी, क्या कर रहा है? 2012 बम धमाके में हुआ था गिरफ्तार

दिल्ली स्थित इजरायली दूतावास के नज़दीक शुक्रवार (29 जनवरी 2021) को बम धमाका हुआ था। फॉरेंसिक जाँच में पता चला कि इजरायली दूतावास पर हमले के लिए ब्लैक पाउडर का इस्तेमाल किया गया था। 

जाँच के दौरान एक लिफ़ाफ़े में पत्र बरामद किया गया जो ‘इजरायली दूतावास के दूत’ के लिए लिखा गया था। पत्र में धमकी दी गई थी कि ये धमाका तो सिर्फ ‘ट्रेलर’ है। रिपोर्ट्स के मुताबिक़ इस धमकी भरे ख़त में मारे गए ईरानी क़ुद्स फ़ोर्स (Quds Force) के मुखिया जनरल कासिम सुलेमानी और परमाणु वैज्ञानिक (nuclear scientist) डॉ. मोहसिन फकरीज़देह का संदर्भ दिया हुआ था।  

कासिम सुलेमानी IRGC (इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉप्स) या क़ुद्स फ़ोर्स का ईरानी कमांडर था और बग़दाद में जनवरी 2020 के दौरान अमेरिकी सेना के अभियान में मारा गया था। वहीं ईरानी परमाणु वैज्ञानिक मोहसिन की हत्या तेहरान के बाहरी इलाके में 62 मेंबर स्क्वाड ने की थी। यह पहला ऐसा मौक़ा नहीं जब भारत में इजरायली दूतावास पर हमला हुआ है। 

13 फरवरी 2012 को दिल्ली में इजरायली राजनयिक की कार में धमाका किया गया था। दो बाइक सवार हमलावरों ने इजरायली राजनयिक की पत्नी (Tal Yehoshua Koren) की गाड़ी में बम चिपका दिया था। इस हमले में भी क़ुद्स फ़ोर्स जिसे IRGC के नाम से जाना जाता है, उसका नाम सामने आया था। इजरायली राजनयिक की कार में हुए बम धमाकों की घटना में 4 लोग घायल हुए थे।

ईरानी वैज्ञानिक की हत्या के ठीक बाद इजरायली राजनयिक की हत्या का प्रयास हुआ था। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान को इस धमाके के लिए जिम्मेदार ठहराया था। संयोग से यह हमला ईरान समर्थित शिया लेबनानी समूह और हिजबुल्ला नेता इमद मुगनियेह (Imad Mughniyeh) की हत्या की तिथि से भी मेल खाता था। 

भारतीय पत्रकार की हमले में अहम भूमिका?

इजरायली राजनयिक पर हुए हमले की जाँच में दिल्ली पुलिस ने पाया कि यह IRGC का काम है। दिल्ली पुलिस की जाँच में यह बात भी सामने आई थी कि IRGC के सदस्यों ने इस हमले की योजना पर भारतीय पत्रकार सैयद मोहम्मद अहमद काज़मी के साथ चर्चा की थी। खुलासे के मुताबिक़ अहमद काज़मी पिछले 10 सालों से IRGC सदस्यों के संपर्क में था। 

एक लंबी जाँच के बाद दिल्ली पुलिस ने ‘पत्रकार’ अहमद काज़मी को बाइक सवार हमलावरों की मदद करने के लिए गिरफ्तार किया था। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने अहमद काज़मी को साज़िश में शामिल होने के आरोप में गैर क़ानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम के अंतर्गत गिरफ्तार किया। इतना ही नहीं वह इजरायली राजनयिकों को निशाना बनाने के लिए साज़िश के तहत ख़ुफ़िया तरीके से काम कर रहा था। 

पूरे मामले में एक और रोचक बात ये है कि विवादित एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया की मुखिया सीमा मुस्तफ़ा काज़मी के समर्थन में उतर आई थीं। इनके मुताबिक़ इजरायली राजनयिक पर हुए हमले के मामले में अहमद काज़मी निर्दोष था। 

कौन है सैयद मोहम्मद अहमद काज़मी

उत्तर प्रदेश स्थित मेरठ के निवासी सैयद मोहम्मद अहमद काज़मी ने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत 1983 में ईरानी ब्रॉडकास्टर के अंतर्गत ईरान रिपब्लिक न्यूज़ एजेंसी (IRNA)  के दिल्ली कार्यालय से की थी। काज़मी की अरबी और फारसी भाषा पर मज़बूत पकड़ थी। नतीजतन उसे खाड़ी के देशों की ख़बरों का अनुवाद करने में कोई परेशानी नहीं होती थी। 

कुछ सालों बाद काज़मी की रूचि पश्चिमी एशिया में बढ़ी। ख़ासकर ईरान, ईराक और इजरायल। ईरानी मीडिया समूह में 7 साल लगातार काम करने के बाद ‘मीडिया स्टार’ नाम से अपना मीडिया समूह शुरू किया जो कि पश्चिमी एशिया की ख़बरों पर केन्द्रित था। एक छोटे कार्यकाल के बाद उसने 1993 दूरदर्शन में बतौर प्रस्तोता काम शुरू किया और वहाँ उर्दू ख़बरें पढ़ता था। 

दूरदर्शन के कार्यकाल के दौरान काज़मी ‘वर्ल्ड व्यू इंडिया’ (World View India) नाम के साप्ताहिक विदेश मामलों से जुड़े कार्यक्रम का हिस्सा था। सबा नकवी के पिता और पत्रकार सईद नकवी के मुताबिक़ काज़मी को उस क्षेत्र के बारे में अद्भुत जानकारी थी और उसके संपर्क भी काफी ज़्यादा थे। नकवी ने काज़मी के साथ मिल कर दूरदर्शन के इस कार्यक्रम को प्रोड्यूस किया था और दोनों साथ में कई विदेशी असाइनमेंट पर भी गए थे। 

पुलिस के मुताबिक़ काज़मी का ईरान में गहरा नेटवर्क था। तत्कालीन दिल्ली पुलिस कमिश्नर बीके गुप्ता ने इस मामले में एक बड़ा खुलासा किया था। उनका कहना था कि पूछताछ में काज़मी ने खुलासा किया था कि उसने इजरायली दूतावास की रेकी के लिए ईरानियों की भरपूर मदद की थी। काज़मी ईरानी मूल के सैयद अली सदर मेहँदी की मदद से हौशन अफशर से मिला था, जिसने इजरायली दूतावास के आस-पास रेकी की थी। इसके लिए इन लोगों ने स्कूटी का इस्तेमाल किया था। इस रेकी के दौरान उसने इजरायली राजनयिकों को निशाना बनाने का फैसला लिया था। हैरानी की बात है कि काज़मी के परिवार वालों ने भी उसके ईरान समर्थक स्टैंड को खारिज नहीं किया। 

सुप्रीम कोर्ट ने 2012 में अहमद काज़मी को जमानत पर रिहा कर दिया था, लेकिन विदेश जाने पर रोक लगाई थी। वह अभी तक जमानत पर आज़ाद घूम रहा है। फ़िलहाल ‘मीडिया स्टार वर्ल्ड‘ नाम का यूट्यूब चैनल चलाता है, जिसमें वह पश्चिमी एशिया के मुद्दों पर बात करता है। उसकी लिंक्डइन प्रोफाइल के मुताबिक़ वह ‘कौमी सलामती’ नाम के उर्दू अखबार का सम्पादक भी है। अक्टूबर 2012 में जमानत मिलने के बाद वह अखबार का सम्पादक बना था। कॉन्ग्रेस की वरिष्ठ नेता और दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व. शीला दीक्षित भी अखबार के लॉन्च पर मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद थीं।

दिल्ली स्थित इजरायली दूतावास पर बम धमाका

दिल्ली स्थित इजरायली दूतावास के पास शुक्रवार (जनवरी 29, 2021) शाम धमाका हुआ था। कम तीव्रता वाले इस धमाके में कोई हताहत नहीं हुआ था लेकिन कुछ गाड़ियों के शीशे टूट गए थे। इसके बाद पूरी राजधानी को अलर्ट पर रखा गया था। एयरपोर्ट, सरकारी इमारतों और अहम जगहों की सुरक्षा बढ़ा दी गई थी।

‘कितने में बेचा जमीर, चमचा, जूता चाटने वाला’: शाह फैसल ने की ‘मन की बात’ तो इस्लामी नाम वाले भड़के

भारत के कोरोनावायरस टीकाकरण अभियान की प्रशंसा करने के बाद पूर्व आईएएस अधिकारी और जम्मू-कश्मीर पीपुल्स मूवमेंट (JKPM) के संस्थापक शाह फैसल ने भारत एक बार फिर से मोदी सरकार द्वारा उठाए गए कदमों के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया है।

प्रधानमंत्री के संबोधन की सराहना करते हुए शाह फैसल ने ट्वीट किया, “ऐसा लगता है मानो की रविवार की सुबह 1.3 बिलियन लोगों का परिवार एक साथ इकट्ठा होता है और हर एक इंसान को सुना और उससे बात किया जाता है, हर किसी की भावनाओं को गिना जाता है।”

उन्होंने आगे कहा, “इस कार्यक्रम से मैंने यह समझा है कि संचार एकजुटता का निर्माण कर सकता है और एक राष्ट्र को एक परिवार की तरह बना सकता है।”

इस्लामवादियों ने शाह फैसल को किया ट्रोल

कभी इस्लामवादियों के उभरते पोस्टर बॉय रहे शाह फैसल द्वारा मोदी सरकार की लगातार दूसरी बार की जाने वाली प्रशंसा कुछ मुस्लिमों को फूटी आँख नहीं सुहा रही है। पीएम मोदी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम की तारीफ करने के चलते उन्हें सोशल मीडिया पर कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। ट्विटर ट्रोल मोहम्मद आसिफ खान ने तो उन पर अपनी आत्मा तक को बेचने का आरोप लगा दिया।

खान ने ट्वीट किया कि वह 2019 में एक महान क्रांतिकारी थे, लेकिन अब वे पीएम मोदी के तलवे चाट रहे हैं। वहीं उन्होंने पहले शाह फैसल को “सावरकर से भी बड़ा चमचा और जूते चाटने वाला’ बता दिया था।”

वहीं मुनीब खान नाम के एक यूजर ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया के एक लेख का स्क्रीनशॉट साझा किया, जिसमें शाह फैसल ने कहा था कि कोई केवल कश्मीर में एक चमचा या अलगाववादी हो सकता है। पूर्व आईएएस अधिकारी को कथित तौर पर कश्मीरियों को हताश करने के लिए फटकार लगाते हुए खान ने ट्वीट किया, उसे ट्रोल मत करो। उन्हें अपनी द्वारा कहीं बात की तरह चमचे रहना पसंद किया है।

एक अन्य यूजर हामिद हक्कानी ने लिखा, “आपके पिछले ट्वीट को देखकर मैंने सोचा था कि अब आप उनके कैडर में शामिल होने के लिए पात्रता और बेशर्मी के अपने मानदंडों को पार कर लिया है। लेकिन, अब मुझे गिरावट के निचले स्तर के बारे में पता चल गया है।”

साथ ही एक और यूजर ने लिखा, “इतना तो कश्मीर का टेम्परेचर नहीं गिरा, जितना आप गिर गए हो। वहीं एक ने पूछा,” और कितना चाटोगे।”

जब की थी टीकाकरण कार्यक्रम की प्रशंसा

पिछले बार जम्मू-कश्मीर के पूर्व IAS अधिकारी शाह फैसल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुरीद होते हुए दिखे थे और उन्होंने भारत को ‘जगत गुरु’ की संज्ञा दी थी। दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी के कुछ स्वास्थ्य कर्मचारियों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बातचीत की थी। इसी वीडियो पर प्रतिक्रिया देते हुए शाह फैसल ने लिखा था कि ये सिर्फ एक टीकाकरण अभियान ही नहीं है, बल्कि उससे कहीं ज्यादा है।

शाह फैसल ने आगे लिखा, “ये सुशासन, मानव संसाधन का संगठन, राष्ट्र निर्माण और भारत के जगत गुरु के रूप में वैश्विक नेता के रूप में सामने आने- इन सबका गठजोड़ है।” वहीं इस बयान पर भी कुछ मुस्लिमों ने उन्हें जमकर खरी-खोटी सुनाई थी।

शाह फैसल और उसकी नफरत भरी राजनीति

उल्लेखनीय है कि शाह फैसल पर लंबे समय से लोगों में नफरत भरने और उन्हें बरगलाने का आरोप लगाया जाता रहा है। इससे पहले, पूर्व आईएएस अधिकारी-राजनीतिज्ञ शाह फैसल ने हिंसा भड़काने का प्रयास किया था और 370 के निरस्त होने पर धमकी दी थी।

अनुच्छेद 370 का विरोध करते हुए शाह फैसल ने कहा था, “कैसी ईद। दुनिया भर के कश्मीरी अपनी जमीन पर अवैध कब्जे का शोक मना रहे हैं। तब तक कोई ईद नहीं मनेगी, जब तक 1947 से हमसे छीनी गई हर चीज वापस नहीं ले ली जाती। जब तक हर अपमान का बदला पूरा नहीं होता, ईद नहीं मनेगी।” उन्होंने कहा था कि वो तब तक ईद नहीं मनाएँगे जब तक जम्मू-कश्मीर को दो केन्द्रशासित प्रदेशों में बॉंटने के फैसले से हुई ‘पीड़ा’ का बदला नहीं ले लेते।

इससे पहले यह बताया गया था कि शाह फैसल को अधिकारियों द्वारा सूचित किया गया है कि उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया गया है। 2010 में सिविल सर्विसेज में टॉप करने के बाद उन्हें जम्मू-कश्मीर में IAS कैडर का हिस्सा बनाया गया था। 2018 में, वह आगे की पढ़ाई करने के लिए कथित तौर पर USA के लिए रवाना हो गए थे और अपनी वापसी के बाद उन्होंने JKPM की स्थापना की थी। पिछले साल अगस्त में शाह फैसल ने संगठन के अध्यक्ष के रूप में पार्टी से नाता तोड़ लिया था।

सियासी पिच पर स्मृति ईरानी की ‘बांग्ला’ पारी, कहा- दीदी को ‘जय श्री राम’ से बैर

पश्चिम बंगाल में इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर भाजपा एक-एक कर अपने हर सितारे को मैदान में उतार रही है। इसी क्रम में केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने रविवार (31 जनवरी 2021) को धारा प्रवाह बंगाली से सबका दिल जीत लिया।

उन्होंने हावड़ा में रैली कर ममता बनर्जी पर निशाना साधा। स्मृति ईरानी ने कहा कि दीदी को ‘जय श्री राम’ से बैर है। हावड़ा के डुमुरजला स्टेडियम में आयोजित इस रैली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से जुड़े।

शाह ने कहा कि चुनाव आने तक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपनी पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस में अकेली पड़ जाएँगी। शाह ने यह हमला तृणमूल कॉन्ग्रेसके पाँच नेताओं के बीजेपी में शामिल होने के एक दिन बाद किया। बता दें कि ममता बनर्जी को झटका देते हुए बीजेपी में शामिल हुए राजीब बनर्जी समेत 5 टीएमसी नेता भी स्मृति के साथ रैली में नजर आए।

शाह ने कहा कि ममता को इतने सारे नेता तृणमूल छोड़कर बीजेपी में जा रहे हैं, क्योंकि वह राज्य में जनता की इच्छाओं को पूरा करने में असफल रही हैं। ममता के कुशासन, भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के कारण ऐसा हो रहा है, लेकिन यह शुरुआत है, चुनाव की घड़ी नजदीक आने तक वह अलग-थलग पड़ जाएँगी।  

उन्होंने कहा कि केंद्र की मोदी सरकार ‘जन कल्याण’ के लिए काम कर रही है और ममता बनर्जी सरकार बंगाल में ‘भतीजा कल्याण’ की दिशा में काम कर रही हैं। ममता बनर्जी के शासनकाल में बंगाल में स्थिति लेफ्ट शासन से भी बदतर है। सीएम ममता बंगाल के लोगों की आकांक्षाओं पर खरा उतरने में विफल रही हैं, इसलिए तृणमूल के नेता बीजेपी में शामिल हो रहे हैं, उन्हें आत्मचिंतन करना चाहिए।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि उनका दस साल का कार्यकाल तानाशाही भरा रहा। अगर राज्य में बीजेपी की सरकार बनी तो पहली कैबिनेट की बैठक में आयुष्मान भारत योजना लागू करेंगे। अमित शाह ने कहा, “दीदी बंगाल की जनता को आयुष्मान भारत योजना का लाभ नहीं मिलने दे रही, क्योंकि ये योजना पीएम मोदी ने शुरू की। मैं बंगाल की जनता को विश्वास दिलाता हूँ कि बीजेपी सरकार आने के बाद हम पहली कैबिनेट में प्रस्ताव करेंगे कि राज्य में ये योजना लागू हो।”

वहीं रैली को संबोधित करते हुए स्मृति ईरानी ने ममता बनर्जी पर निशाना साधते हुए स्मृति ने कहा कि दीदी को ‘जय श्रीराम’ से बैर है। उन्होंने कहा कि दीदी की टीएमसी जाने वाली है और बीजेपी आने वाली है। उन्होंने कहा, “लोग ऐसी पार्टी का कतई समर्थन नहीं करेंगे जो आपसी में लड़ाती हो और अपने फायदे के लिए केंद्र सरकार से नफरत करती हो। कोई भी देश भक्त पार्टी में एक मिनट के लिए भी नहीं रह सकेगा जिसने ‘जय श्री राम’ के नारे का अपमान किया हो।”

स्मृति ईरानी लोगों को संबोधित करते हुए अचानक बांग्ला में बोलने लगीं। स्मृति ईरानी को धाराप्रवाह बंगाली में बोलते सुनकर लोग हैरान रह गए। उन्होंने ममता सरकार पर लॉकडाउन के दौरान भ्रष्‍टाचार करने का आरोप लगाया। उन्‍होंने कहा कि महामारी के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के 80 करोड़ लोगों को आठ महीने तक पाँच किलो चावल और एक किलो दाल देने की व्यवस्था की, लेकिन पश्चिम बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस ने लॉकडाउन के दौरान इसे लूट लिया। 

ईरानी ने कहा कि घर लौट रहे प्रवासी कामगारों के लिए गरीब रोजगार योजना के तहत देशभर में 50 करोड़ से अधिक श्रम दिवस सृजित किए गए, लेकिन बंगाल में यह नहीं हुआ। शहरों से अपने गाँवों को लौटे प्रवासी कामगारों के लिए प्रधानमंत्री ने पिछले वर्ष जून में रोजगार योजना की शुरुआत की थी। 

स्‍मृति ईरानी ने दावा किया कि केंद्र सरकार ने जो श्रमिक स्पेशल रेलगाड़ियाँ चलाई थीं, उन्हें ममता बनर्जी ने ‘कोरोना एक्सप्रेस’ नाम दिया था। ईरानी ने कहा, “मैं उनसे पूछना चाहती हूँ कि देश के विभिन्न हिस्सों में काम कर रहे बंगाल के बेटे-बेटियों को क्या वह वायरस मानती हैं।”

दंगा, भड़काऊ भाषण, फिसड्डी नेता, पलटीमार: बक्कल उखाड़ देने की बात करने वाले राकेश टिकैत की कुंडली

26 जनवरी 2021 को दिल्ली में हिंसा और बर्बरता की भयावह स्थिति देखने को मिली थी। प्रदर्शनकारियों के एक समूह ने पुलिस बैरिकेड तोड़कर भगदड़ मचाया, तोड़फोड़ की और सार्वजनिक संपत्तियों एवं वाहनों को नुकसान पहुँचाया। ऐतिहासिक इमारत लाल किले पर धार्मिक झंडा फहराकर तिरंगे का अपमान किया।

किसानों ने ‘शांतिपूर्ण’ मार्च निकालने की बात कह कर ट्रैक्टर रैली निकालने की अनुमति माँगी थी। मगर इस दौरान जिस तरह की क्रूरता और हिंसा को अंजाम दिया गया, वो सबने देखा। इसके बाद ‘प्रदर्शनकारियों’ का नेतृत्व करने वाले राकेश टिकैत और योगेंद्र यादव के निशाने पर आ गए।

हिंसक तत्वों के खिलाफ कार्रवाई करते हुए, दिल्ली पुलिस ने ट्रैक्टर रैली के पीछे एक बड़ी और आपराधिक साजिश की जाँच के लिए कठोर गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम और धारा 124 (ए) (राजद्रोह) के तहत प्राथमिकी दर्ज की। एफआईआर में भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) के नेता राकेश टिकैत का भी जिक्र है, जिन्होंने दिल्ली में कहर बरपाने और भीड़ को उकसाने का काम किया।

कौन हैं राकेश टिकैत?

राकेश टिकैत सितंबर 2020 में केंद्र द्वारा पारित तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के आंदोलन का नेतृत्व करने वाले प्रमुख नेताओं में से एक के रूप में उभरे हैं। वे भारतीय किसान यूनियन (BKU) के प्रवक्ता हैं। इस समय बीकेयू के प्रमुख उनके बड़े भाई नरेश टिकैत हैं। लेकिन, संगठन की बागडोर असल मायनों में राकेश टिकैत ने सँभाल रखी है।

राकेश को उनके पिता महेंद्र सिंह टिकैत की विरासत मिली, जो 1980 के दशक में सबसे अग्रणी किसान नेताओं में से एक थे। माना जाता है कि महेंद्र सिंह टिकैत को किसानों से व्यापक समर्थन था, जिसका इस्तेमाल उन्होंने दिल्ली के सत्ता गलियारों में कृषि और किसानों के बारे में सरकार की नीतियों को प्रभावित करने के लिए किया था। 

भारतीय किसान यूनियन 1987 में अस्तित्व में आई, जब महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में किसानों ने शामली जिले के करमूखेड़ी में एक बड़ा आंदोलन किया। इस आंदोलन के परिणामस्वरूप दो किसान जयपाल और अकबर की मृत्यु हो गई थी। यह घटना के बाद बीकेयू का गठन किया गया था और महेंद्र टिकैत को इसका अध्यक्ष बनाया गया था।

मेरठ विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी पूरा करने के बाद राकेश टिकैत 1985 में दिल्ली पुलिस में शामिल हुए। जल्द ही, 1990 के दशक में राकेश ने दिल्ली पुलिस से नौकरी छोड़ दी और अपने पिता और बड़े भाई के नक्शेकदम पर चलते हुए राजनीति में कदम रखा। यद्यपि नरेश टिकैत भारतीय किसान यूनियन (BKU) के वर्तमान अध्यक्ष हैं, लेकिन यह आरोप लगाया जाता है कि संगठन के कामकाज को राकेश टिकैत द्वारा काफी हद तक नियंत्रित किया जाता है।

राकेश टिकैत ने एक बार कृषि बिल का समर्थन किया था

राकेश टिकैत ने मोदी सरकार द्वारा पारित कृषि कानूनों का समर्थन किया था। बीकेयू ने लिखित में माँग की थी कि भारतीय किसान को एपीएमसी के अत्याचार से मुक्त किया जाए। हालाँकि जब विपक्ष ने मोदी सरकार को घेरने के लिए इसका मुद्दा बनाया तो राकेश टिकैत ने भी यूटर्न ले लिया।

बता दें कि 27 साल पहले जिन सुधारों को लेकर किसानों के अब तक के सबसे बड़े नेता महेंद्र सिंह टिकैत सरकार से लड़े थे, आज नए कृषि कानूनों में उन्हें पूरा किए जाने के खिलाफ ही उनके बेटे राकेश टिकैत ने केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है।

राकेश टिकैत न सिर्फ पिता का कहे भूले हैं, वे अपनी कही बातों से भी अब पीछे हट रहे हैं। वे आज उन्हीं सुधारों का विरोध कर रहे हैं जिसकी इस साल जून में उन्होंने प्रशंसा की थी। इतना ही नहीं 2019 के आम चुनावों के वक्त जब कॉन्ग्रेस ने इन्हें अपने घोषणा-पत्र में जगह दी थी, तब भी बीकेयू ने उसे सराहा था। जून 2020 में राकेश टिकैत ने ‘एक मंडी’ के तोहफे को सराहते हुए सरकार के कदम का स्वागत किया था।

आज यही BKU इन कृषि सुधारों का विरोध कर रही है। इसका कारण क्या है? यह कैसी किसान पॉलिटिक्स है? यह बेहतर राकेश टिकैत ही बता सकते हैं, क्योंकि AAP सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल के भी BKU के साथ लिंक सामने आए हैं।

राकेश टिकैत और 2013 मुजफ्फरनगर दंगे

टिकैत लगातार चल रहे किसानों के विरोध-प्रदर्शनों से राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रहे हैं। बता दें कि यह पहली बार नहीं है जब टिकैत पर अशांति फैलाने का आरोप लगाया गया है। 2013 में, टिकैत को उनके कथित भड़काऊ भाषणों के लिए नामजद किया गया था, जिनके कारण 2013 में मुजफ्फरनगर भड़क गया था। राकेश पर 7 सितंबर 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों में सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने का मामला दर्ज किया गया था।

मुजफ्फरनगर के निवासियों के अनुसार, राकेश टिकैत और उनके भाई नरेश टिकैत, दोनों शहर में भीषण सांप्रदायिक दंगा भड़काने के लिए ‘पहले अपराधी’ थे। राकेश टिकैत ने 7 सितंबर को महापंचायत में भाग लिया था और पुलिस ने उन्हें उनके भड़काऊ भाषणों के माध्यम से सांप्रदायिक जुनून को हवा देने के लिए नामजद किया था।

टिकैत ने तब स्वीकार किया था कि वह महापंचायत की बैठक में शामिल हुए थे, लेकिन इसके मद्देनजर हुई हिंसा से उन्होंने हाथ पीछे खींच लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि भीड़ नियंत्रण से बाहर थी और वे किसी नेता की बात नहीं सुन रही थी।

टिकैत ने तब कहा था, “वे हमारे लोग नहीं थे। वे किसी नेता की बात नहीं सुन रहे थे। वे किसी भी मंच से संबंधित नहीं थे। 27 अगस्त की घटना के बारे में प्रारंभिक एफआईआर में गलत तरीके से लोगों का नाम रखने के लिए वे पुलिस से नाराज थे।”

दंगों में 60 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी और हजारों लोग बेघर हो गए थे। दंगों के सिलसिले में 6 बलात्कार के मामले भी दर्ज किए गए। टिकैत ने तब दावा किया था कि ‘जाटों’ पर बलात्कार का झूठा आरोप लगाया गया था और उन्होंने नए सिरे से जाँच की माँग की थी।

गणतंत्र दिवस पर ट्रैक्टर रैली के दौरान हुई हिंसा की हालिया घटना में भी इसी तरह की चीजें देखने को मिली। यहाँ भी टिकैत ने उनके नेतृत्व में हिंसक हुए विरोध-प्रदर्शन से खुद का बचाव किया। जाहिर तौर पर, टिकैत उन नेताओं में से हैं, जो सार्वजनिक चकाचौंध में तो बने रहना चाहते हैं, लेकिन खुद के किए गए कृत्यों के नतीजों की जिम्मेदारी भी नहीं लेना चाहते हैं।

टिकैत का एक वीडियो भी सामने आया था, जिसमें उन्होंने प्रदर्शनकारियों को लाठी और झंडे लेकर चलने के लिए कहा। बक्कल उखाड़ने के धमकी दी थी। लेकिन ट्रैक्टर रैली के दौरान प्रदर्शनकारियों द्वारा अराजकता और अव्यवस्था फैलाने की जिम्मेदारी लेने से टिकैत ने इनकार कर दिया और इसके लिए केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को दोषी ठहराया।

राकेश टिकैत, एक असफल नेता

2004 में टिकैत ने बीकेयू का राजनीतिक विंग ‘बहुजन किसान दल’ बनाया। टिकैत ने खुद यह चुनाव नहीं लड़ा था, लेकिन उनकी पार्टी ने एक भी सीट नहीं जीती थी। 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में, बीकेडी ने कॉन्ग्रेस के साथ गठबंधन किया, जहाँ टिकैत ने खतौली सीट से चुनाव लड़ा था। वह ये चुनाव भी नहीं जीत पाए। वह फिर 2009 में राष्ट्रीय लोक दल (RLD) में शामिल हो गए, जो उस समय NDA गठबंधन का साथी था। हालाँकि, गठबंधन टूट गया और RLD, UPA में शामिल हो गया।

2014 में वे अमरोहा से आम चुनाव लड़े। इसे 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद जाट समुदाय को खुश करने के कदम के रूप में देखा गया था। वह फिर से जीतने में असफल रहे।

आज ‘लिबरल’ टिकैत को भारतीय राजनीति में होने वाली अगली बड़ी चीज़ के रूप में याद कर रहे हैं, जहाँ वे मुजफ्फरनगर के सांप्रदायिक दंगों को आसानी से भूल जाते हैं। दरअसल, मोदी के खिलाफ खड़े होने पर सभी उत्तेजक भाषणों, हिंसा के सभी आरोपों को माफ कर दिया जाता है।

NSUI महासचिव अखलाक अहमद को ग्रामीणों ने जूते-चप्पल से पीटा, ठगी कर खाते से निकालता था पैसे

छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में कॉन्ग्रेस की छात्र इकाई NSUI के महासचिव की जूते और चप्पलों से जमकर पिटाई की खबर सामने आई है। आरोप है एनएसयूआई महासचिव अखलाक अहमद ने गाँव की महिला को बेवकूफ बनाते हुए उसके खाते से 10 हजार रुपए निकल लिए थे। घटना के दौरान एनएसयूआई का एक और सदस्य गुड्डू भी उसके साथ था।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, एनएसयूआई महासचिव अपने एक कार्यकर्ता के साथ 22 जनवरी को गाँव की एक महिला के घर पहुँचा था। जहाँ उसने महिला से कहा कि वे बिना कमीशन लिए बैंक खाते से रुपए निकालते हैं। उसकी बातों पर विश्वास कर महिला अपना आधार कार्ड लेकर आई और बायोमैट्रिक मशीन में अँगूठा लगाकर दे दिया।

साभार: सुदर्शन न्यूज़

महिला के अँगूठा लगाने के बाद NSUI कार्यकर्ताओं ने कहा कि सर्वर फेल हो गया है और पैसा नहीं निकला है, हालाँकि जब महिला बैंक पहुँची तो उसे उसे इस ठगी का पता चला कि उसके बैंक से 10,000 निकाले जा चुके हैं। जिसके बाद महिला ने रोते हुए इस घटना की खबर पूरे गाँव को बताई।

घटना के 6 दिन बाद 28 जनवरी को दोनों आरोपित फिर उसी गाँव पहुँचे। इस बार उन्होंने पीएम आवास का बहाना बनाया। गाँव पहुँच कर उन्होंने एक महिला से कहा कि वे यह चेक करने आए हैं कि उसका पीएम आवास एलॉट हुआ है या नहीं। इसके बाद उन्होंने महिला का अँगूठा लगवाया और उसके खाते से 500 रुपए गबन कर लिया। अन्य महिलाओं को भी उन्होंने अपने इसी जाल में फँसाया।

इसी दौरान उस महिला ने उन्हें पहचान लिया जिसके खाते से दस हजार रुपए निकाले गए थे। पीड़ित महिला ने गाँववालों को इसकी सूचना दे दी। इसके बाद गाँव वालों ने उन्हें जमकर लात-मुक्के, जूते-चप्पलों से पीटा।

पिटाई के बाद ग्रामीणों ने उन्हें शंकरगढ़ थाने पुलिस को सुपुर्द कर दिया। महिला में थाने ने दोनों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करवाई। पूछताछ के दौरान एनएसयूआई कार्यकर्ताओं ने ठगी की बात स्वीकार कर ली।

‘हिंदू समाज पूरी तरीके से सड़ चुका है… मुसलमान हो मार देंगे’: एल्गार परिषद में जुटान छोटा, जहर पूरा

इस साल फिर से पुणे में एल्गार परिषद का कार्यक्रम हुआ और उसमें शर्जील उस्मानी, अरुंधति रॉय और प्रशांत कनौजिया सरीखे प्रोपेगेंडाधारी शामिल हुए। 2017 का एल्गार परिषद ‘अर्बन नक्सल’ और असामाजिक तत्वों की आड़ में हुई भीषण हिंसा का केंद्र बिंदु थी। लेकिन इस साल माहौल अलग था, सब कुछ बेहद गुपचुप तरीके से हुआ। 

कार्यक्रम में इस बार भीड़ भले नहीं मौजूद थी, लेकिन मजाल है कि जहर की मात्रा में रत्ती भर कमी आई हो। सामाजिक-धार्मिक जहर इतना ज़्यादा हो गया कि अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इंटरनेट पर ऐसे तमाम वीडियो मौजूद हैं जिसमें लिबरल जमात के सदस्य विवादित और हिन्दूफोबिक टिप्पणी करते हुए सुने जा सकते हैं। 

शर्जील उस्मानी, जिसे हाल ही में उत्तर प्रदेश पुलिस ने गिरफ्तार किया था और बाद में अदालत ने जमानत पर रिहा कर दिया था, ने कहा, “आज का हिंदू समाज पूरी तरीके से सड़ चुका है। अभी वजह नहीं चाहिए। मुसलमान हो मार देंगे…”। शर्जील ने उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के लिए कहा कि यूपी प्रशासन ने पिछले एक साल में प्रतिदिन 19 लोगों की हत्या की है। मरने वालों में सभी मुस्लिम या दलित थे। 

उस्मानी ने न्यूज़लौंड्री के लिए तमाम ख़बरें और लेख लिखे हैं लेकिन अपने दावों की पुष्टि करने के लिए साक्ष्य कभी नहीं पेश किए। इतनी बातों के बाद अरुंधति रॉय कैसे पीछे रहतीं, उन्होंने एनडीए सरकार को चुनने वाले भारतीय मतदाताओं की तुलना 6 जनवरी को कैपिटल हिल में उपद्रव करने वाली भीड़ से की।  

इसके बाद अरुंधति रॉय ने हिन्दुओं का अपमान करने के लिए ‘गौमूत्र’ पर छिछला कटाक्ष किया, वही कटाक्ष जो पुलावामा हमले के आतंकवादियों ने किया था।   

तमाम जहरीले वामपंथ ग्रसित चेहरों के बाद प्रशांत कनौजिया ने भाषण दिया/जहर उगला। उसने कहा, “जब तक ‘कश्मीरी भाइयों’ को न्याय नहीं मिलता, अख़लाक और पहलू खान को न्याय नहीं मिल जाता तब तक आंदोलन जारी रहेगा। जब तक 3 कृषि क़ानून वापस नहीं लिए जाते हैं तब तक आंदोलन चलेगा।” 

इसके बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए नफ़रत की नुमाइश करते हुए कनौजिया ने कहा कि जब तक वो RSS को जड़ से उखाड़ कर फेंक नहीं देते हैं तब उनका आंदोलन जारी रहेगा। अंत में उसने कहा कि ‘दबाव’ झेलने से बेहतर है कि दलित ‘सड़कों पर लड़ते हुए मर जाएँ’। 

यह आयोजन ऐसे संवेदनशील वक्त में किया गया जब देश की राजधानी में प्रदर्शननुमा उपद्रव जारी है और खालिस्तानी भीड़ ने गणतंत्र दिवस जैसे अहम मौके पर लाल किले पर सिख झंडा फहराया था। इस कार्यक्रम में महज़ 500 लोग शामिल हुए थे और सुरक्षा का पर्याप्त प्रबंध किया गया था।   

‘दिल्ली पुलिस की वर्दी पहन पहुँचे BJP विधायक, किसानों पर किया लाठीचार्ज’: वायरल वीडियो का फैक्टचेक

सोशल मीडिया में ‘किसान आंदोलन’ के समर्थन में तरह-तरह के दावे किए जा रहे हैं। गणतंत्र दिवस के दिन मंगलवार (जनवरी 26, 2021) को ट्रैक्टर रैली के नाम पर पूरी दिल्ली में जम कर हिंसा हुई और लाल किला पर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे का अपमान हुआ। अब सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि भाजपा विधायक ने दिल्ली पुलिस की वर्दी पहन कर किसानों पर जमकर लाठीचार्ज किया।

जो वीडियो और तस्वीरें वायरल की जा रही हैं, उनमें एक व्यक्ति को पुलिस की वर्दी में देखा जा सकता है। लेकिन पुलिस अधिकारी का कोई नाम या बैच नहीं दिखाई दे रहा है। वीडियो में एक व्यक्ति उससे पूछता है कि उसका बैच कहाँ है? जिसके जवाब में उक्त पुलिसकर्मी कहता है कि बैच कहीं गिर गया है। अब लोग दावा कर रहे हैं कि वो पुलिस अधिकारी नहीं, बल्कि भाजपा विधायक अशोक डोगरा हैं।

अशोक डोगरा राजस्थान के बूँदी विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। वो वहाँ से लगातार दूसरी बार चुने गए हैं। वायरल वीडियो में एक तरफ ये वीडियो चल रहा है, वहीं दूसरी तरफ अशोक डोगरा का एक पोस्टर है, जिसमें कमल निशान बना हुआ है और उनके साथ-साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूर्व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह व राजस्थान की पूर्व सीएम वसुंधरा राजे की भी तस्वीर लगी हुई है।

अब आपको बताते हैं कि भाजपा विधायक द्वारा दिल्ली पुलिस की वर्दी में किसानों पर लाठीचार्ज किए जाने के दावे का सच क्या है। ‘न्यूज़ इंडिया’ नामक वेबसाइट पर ये वीडियो उपलब्ध है, जिसमें बताया गया है कि दिल्ली पुलिस के इस अधिकारी का नाम विनोद नारंग हैं। वो कनॉट प्लेस थाने में बतौर SHO पदस्थापित हैं। ये वीडियो 2020 में CAA,NRC के खिलाफ आंदोलन के दौरान भी वायरल हुआ था। दोनों अलग-अलग व्यक्ति हैं।

बता दें कि दिल्ली पुलिस के सभी वर्तमान और रिटायर्ड जवानों के परिजनों ने हिंसा के खिलाफ 30 जनवरी को विरोध-प्रदर्शन किया था। हिंसा में 400 के करीब पुलिसकर्मी घायल हुए थे। विरोध-प्रदर्शन में इन सभी घायल जवानों के परिजन शामिल थे। उन्होंने बताया कि प्रदर्शनकारियों के हाथ में तलवारें और डंडे थे। परिजनों ने कहा कि प्रदर्शनकारी इस दौरान महिला पुलिसकर्मियों को भी नहीं छोड़ रहे थे। 

एक्सप्रेसवे पर लहराए हथियार, AIMIM सांसद ने वीडियो शेयर कर बताया ‘शिवसैनिक’

असद्दुदीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के सांसद इम्तियाज जलील ने शिवसेना पर गंभीर आरोप लगाते हुए एक वीडियो अपलोड किया। इसके बाद खोपोली पुलिस ने शनिवार (जनवरी 30, 2021) को दो लोगों को हिरासत में लिया

इम्तियाज जलील ने ट्विटर पर एक वीडियो डालकर शिवसेना पर गुंडागर्दी का आरोप लगाया। जलील का आरोप था कि पुणे-मुंबई एक्‍सप्रेसवे पर कार में बैठा शिवसैनिक रिवॉल्‍वर लहरा रहा था और वह आते-जाते लोगों को धमका रहा था। सांसद ने इसकी शिकायत महाराष्‍ट्र के गृहमंत्री और डीजीपी से करते हुए पूछा था कि क्‍या इनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

हालाँकि खोपोली पुलिस ने हिरासत में लिए गए दोनों शख्सों के शिवसैनिक होने की बात से इनकार किया है। उन्होंने बताया कि उनके पास से दो पिस्तौल बरामद किया है, जिसमें एक असली है और एक नकली। उन्होंने 15 साल पहले उत्तर प्रदेश में इसका लाइसेंस लिया था। 

अधिकारी ने कहा कि कार में चार आदमी थे और उनमें से कोई भी शिवसेना का सदस्य नहीं है। खोपोली पुलिस स्टेशन में आर्म्स एक्ट के तहत अपराध दर्ज किया गया है। इस बारे में शिवसेना प्रवक्‍ता और सांसद अरविंद सावंत ने बताया कि कानून सबके लिए बराबर है। पुलिस मामले की जाँच कर रही है और आगे जरूरी कदम उठाए जाएँगे। 

औरंगाबाद से एमपी इम्तियाज जलील ने वीडियो ट्वीट करते हुए लिखा था, “यह महाराष्‍ट्र का पुणे-मुंबई एक्‍सप्रेसवे है। गाड़ी में लगा लोगो सारी कहानी बयाँ कर रहा है। शुक्रवार रात को शिवसैनिक अपनी एसयूवी का रास्‍ता बनाने के लिए रिवॉल्‍वर लहरा रहे हैं। क्‍या महाराष्‍ट्र के गृहमंत्री और डीजीपी इस गुंडागर्दी पर कोई कार्रवाई करेंगे?” जलील ने इस ट्वीट को महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री ऑफिस, गृहमंत्री अनिल देशमुख और डीजीपी को भी टैग किया था।

बंदूक लहराने वाली घटना के लेकर एआईएमआईएम के साथ-साथ बीजेपी ने भी शिवसेना और महाराष्ट्र सरकार पर निशाना साधा है। बीजेपी का कहना है कि महाराष्ट्र में कानून-व्यवस्था बेहद खराब हो गई है। सरकार में होने के कारण शिवसैनिक कानून की जरा भी परवाह नहीं करते।

बीजेपी नेता राम कदम ने वीडियो ट्वीट करते हुए लिखा, “महाराष्ट्र में देखिए शिवसेना के लोग मुंबई-पुणे हाइवे रोड पर शुक्रवार देर रात हाथ में रिवॉल्वर लेकर लोगों को धमकाते हुए किस प्रकार से कानून-व्यवस्था की धज्जियाँ उडा रहे है। अतीत में भी देखा गया है, शिवसेना के लोग किस तरह से फौज के लोगों के घर जाकर पिटाई करते हैं।”