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अकलू खान ने की ‘सेक्सुअल डिमांड्स’, महिला ने इनकार किया तो गोद से 3 महीने की बच्ची को उठा आग में फेंका

बिहार के मुजफ्फरपुर से एक चौंकाने वाली वारदात सामने आई है। यहाँ एक व्यक्ति ने अपने पड़ोसी की ही बेटी को आग में झोंक डाला। उस मासूम की कोई गलती भी नहीं थी। आरोपित अकलू खान बच्ची की माँ के साथ छेड़खानी कर रहा था और उससे अपने लिए ‘सेक्सुअल डिमांड्स’ रख रहा था। जब पीड़िता ने उसका कहा नहीं मना, तो उसने उसकी बेटी को निशाना बना लिया। बच्ची के पाँव बुरी तरह जल गए हैं।

मुजफ्फरपुर के ही सदर अस्पताल में उसका इलाज करवाया जा रहा है। ये घटना बोचहाँ थाना क्षेत्र की है, जहाँ शुक्रवार (जनवरी 29, 2021) को ये घटना हुई। महिला ठंड के कारण अपने घर के ही बाहर आग जला कर हाथ सेंक रही थी। तभी उसका नशेड़ी पड़ोसी वहाँ पर आ धमका। उसने नशे की हालत में ही महिला के साथ बलात्कार की कोशिश की। जब पीड़िता ने विरोध किया तो उसने उसके गोद से उसकी 3 महीने की बच्ची को झपट लिया।

इसके बाद आरोपित अकलू खान ने बच्ची को आग में फेंक दिया। इसकी वजह से बच्ची बुरी तरह जल गई। जल्दी-जल्दी में बच्ची के परिजनों ने किसी तरह मासूम को आग से निकाला और फिर उसे अस्पताल लेकर गए, जहाँ अभी भी उसका इलाज जारी है। पीड़ित परिवार ने थाने पहुँच कर आपबीती सुनाई है। महिला ने शनिवार को एसएसपी के समक्ष भी न्याय के लिए गुहार लगाई। परिजनों ने आरोप लगाया कि थानेदार ने आपसी विवाद बता कर मामला दर्ज करने से इनकार कर दिया।

हालाँकि, एसएसपी के हस्तक्षेप के बाद FIR दर्ज कर के पीड़ित परिवार का बयान भी ले लिया गया है। आरोपित का नाम अकलू खान है, जिसे बलात्कार का प्रयास किया था। पीड़िता का पति मिठनपुरा इलाके का रहने वाला है। वो साइकिल से फेरी का समान बेच कर अपने परिवार का लालन-पालन करता है। शुक्रवार को जब ये घटना हुई, तब वो काम के सिलसिले में बाहर ही था। शाम को ही अकलू ने मौके देखा और आ धमका।

म्यांमार में 1 साल के लिए आपातकाल: सेना का तख्तापलट, राष्ट्रपति समेत आंग सान सू की हिरासत में

म्यांमार में एक बार फिर तख्तापलट की खबरें सामने आ रही हैं। रिपोर्ट्स बताती हैं कि वहाँ की सबसे बड़ी नेताओं में शुमार आंग सान सू की (Aung San Suu Kyi) को सेना ने हिरासत में लेकर 1 साल के लिए देश की बागडोर अपने हाथों में ले ली है।

आंग सान सू की के अलावा राष्ट्रपति विन मिंट और सत्तारूढ़ पार्टी के अन्य वरिष्ठ लोगों को आज सुबह की छापेमारी के दौरान हिरासत में लिया गया। नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (National League for Democracy/ NLD) के एक प्रवक्ता म्यो न्यूंत ( Myo Nyunt) ने सोमवार (फरवरी 1, 2021) को जानकारी देते हुए कहा कि ये कदम सरकार और शक्तिशाली सेना के बीच बढ़ते तनाव के बाद उठाया गया है, जो चुनाव के बाद भड़की हुई है।

उन्‍होंने कहा कि देश में जो हालात हैं, उससे यह साफ है कि सेना तख्‍तापटल कर रही है। म्‍यांमार के राजनीतिक संकट पर भारत की पैनी नजर है। हालाँकि, भारत ने इस पर अपनी प्रति‍क्रिया नहीं दी है, लेकिन वह घटना पर नजर बनाए हुए है। उन्होंने अपने लोगों से अपील की कि वे जल्दबाजी में जवाब न दें व कानून के अनुसार काम करें।

जानकारी के मुताबिक, देश में राज्य टीवी ऑफ एयर हो गया और इंटरनेट आदि भी प्रभावित हुए हैं। सेना ने मुख्य प्रदेशों में अपनी पोजीशन ले ली है। NLD नेता ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि जिन्हें सेना ने हिरासत में लिया, उनमें हन थार माइंट भी शामिल हैं, जो कि पार्टी की केंद्रीय कार्य समिति के सदस्य हैं।

इधर, कारेन राज्य के मुख्यमंत्री व अन्य स्थानीय नेताओं को भी पकड़ा गया है। 75 साल की नोबेल प्राइज विजेता सू की भी इन्हीं नामों में शामिल हैं, जिन्होंने दशकों तक देश में लोकतंत्र के लिए लड़ाई लड़ी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छवि स्थापित की।

सू की वैश्विक छवि पर साल 2017 के बाद रोहिंग्याओं के कारण असर पड़ा था, मगर उनके देश में उनकी लोकप्रियता बराबर बनी रही। हालाँकि पिछले हफ्ते सेना से बढ़े तनाव ने उन्हें एक बार फिर चर्चा में ला दिया।

मालूम हो कि म्यांमार में नवंबर में हुए चुनावों से सेना काफी समय से अंतुष्ट थी, जिसके नतीजों में आंग सान सू की भारी बहुमत से जीती थीं। सेना ने चुनाव में धांधली का आरोप लगाया था। इसी के बाद से सरकार और सेना के बीच विवाद जारी था।

इससे पहले सेना ने शनिवार को इस बात से इनकार किया था कि उसके सेना प्रमुख ने चुनाव में धोखाधड़ी की शिकायतों के बाद तख्‍तापटल की धमकी दी थी। उनका मत था कि मीडिया ने उनकी बात का गलत अर्थ निकाला है। लेकिन आज सुबह-सुबह होते-होते सभी झूठ से पर्दा उठ गया।

बता दें कि पिछले हफ्ते भी म्‍यांमार में तनाव के हालात हुए थे। उस समय सेना के प्रवक्‍ता ने कहा था कि नवंबर में बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी की उसकी शिकायतों पर ध्‍यान नहीं दिया गया तो तख्‍तापलट की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

गौरतलब है कि म्यांमार ने 1948 में ब्रिटेन से आजादी के बाद से दो – 1962 में एक और 1988 में एक के बाद एक दो तख्तापलट देखे हैं। एक दशक पहले तक म्यांमार में सैनिक शासन ही था और चूँकि ये सैनिक शासन लगभग 50 साल तक था, इसलिए म्यांमार का लोकतंत्र अभी जड़ें नहीं जमा सका है। जब हालिया चुनावों में एनएलडी ने बड़ी जीत हासिल की तो उसको संदेह की नजरों से देखा जाने लगा। बाद में नवनिर्वाचित संसद की पहली बैठक से ठीक पूर्व ये तख्तापलट किया गया ।

कंपनी अगर पानी खर्च करेगी तो लगेगा पैसा, घर-किसानी के लिए FREE: पूरे UP में ‘अटल भूजल योजना’ लागू

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पूरे राज्य में ‘अटल भूजल योजना’ लागू करने का ऐलान किया है। इसके तहत न सिर्फ पानी के संरक्षण पर जोर दिया जाएगा, बल्कि उद्योगों को अब जल के उपयोग के लिए शुल्क देना पड़ेगा। राज्य के 10 जिलों में ये योजना पहले से ही लागू है और वहाँ अच्छे परिणाम मिले हैं। इसका ड्राफ्ट (DPR) तैयार किया जा चुका है। सीएम योगी ने बूँद-बूँद पानी सहेजने की तुलना रुपयों की बचत से की।

उन्होंने कहा कि ये बचत न सिर्फ हमारा आत्मविश्वास बनाए रखती है, बल्कि गाढ़े समय में हमारे काम भी आती है। राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में 278 चेकडैम और तालाबों के लोकार्पण के अवसर पर मुख्यमंत्री ने ये ऐलान किया। इस दौरान भूगर्भ जल विभाग द्वारा विकसित वेब पोर्टल ‘upgwdonline.in‘ (Ground Water Department) का भी लोकार्पण किया। इस पोर्टल से एक साथ कई कार्य होंगे।

जैसे, प्रत्येक ब्लॉक में कूप पंजीयन, अनापत्ति प्रमाण पत्र निर्गमन, ड्रिलिंग एजेंसी के पंजीयन और विभिन्न विभागीय समस्याओं के निदान के लिए ये एक एकीकृत ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की तरह कार्य करेगा। अब तक इन्हीं कार्यों के लिए केंद्रीय एजेंसियों के चक्कर काटने पड़ते थे, लेकिन अब घर बैठे आवेदन के जरिए इन्हें निपटाया जा सकेगा। वहीं घरेलू और कृषि कार्यों में कूप के प्रयोग पर किसी प्रकार का कोई शुल्क नहीं लगेगा, ये बिलकुल मुफ्त होगा।

इसके लिए सर्वे आज से 27 वर्ष पहले 1994 में ही हुआ था, जिसके बाद राज्य सरकार ने नया अधिनियम तैयार किया और सभी शासकीय भवनों को रेन वाटर हार्वेस्टिंग से जोड़ने का फैसला लिया गया। हर नदी-नाले के पानी को बचाने, वर्षा जल के संचयन और तालाबों के पुनरुद्धार को प्राथमिकता दी गई। मिशन की तरह इस कार्य को लिया गया। स्थिति दिन-प्रतिदिन सुधर रही है। सेमी-क्रिटिकल और क्रिटिकल क्षेत्रों की संख्या कम होती जा रही है।

कई ऐसी समितियाँ भी हैं, जो भूगर्भ जल के संरक्षण में लगी हुई हैं। सीएम योगी ने उन संस्थाओं के प्रतिनिधियों से भी मुलाकात किया। उनकी बात सुनी। संयुक्त प्रयासों के कारण भूगर्भ जल का स्तर फिर से बढ़ रहा है। ‘लाइव हिंदुस्तान’ की खबर के अनुसार, औरैया के शिवनाथ सिंह ने कहा कि उनकी ग्राम पंचायत में चेकडैम के निर्माण के बाद जलस्तर में सुधार हुआ है। जलशक्ति मंत्री डॉक्टर महेंद्र सिंह ने बताया कि नवलोकर्पित चेकडैम और तालाबों की जियो टैगिंग कराई गई है।

इससे इसकी मॉनिटरिंग करने में सुगमता आएगी। नई योजना से जल संचयन और प्रबंधन के कार्य होंगे। बाँध, चेक डैम, तालाब, छोटे जलाशय और छोटी-छोटी बंधियों का निर्माण किया जाएगा। 10 जिलों की तरह राज्य भर में उद्योगों को भूगर्भ जल के उपयोग के लिए शुल्क देना होगा। कृषि एवं घरेलू कार्यों में दुरूपयोग पर भी दंड का प्रावधान नहीं है। स्प्रिंकलर एवं ड्रिप एरिगेशन के उपयोग से पानी की बर्बादी रुकेगी। पंचायत स्तर पर कार्य होंगे। कम पानी वाली फसलों के प्रति जागरूकता फैलाई जाएगी।

बता दें कि यूपी में स्वतंत्रता के बाद से लेकर अब तक 398 गाँव ही पाइप वॉटर की सप्लाई से जुड़े हुए थे, लेकिन अब जल जीवन मिशन के तहत 2995 गाँवों को ये सुविधा मिलने जा रही है। मिर्जापुर के 21,87,980 और सोनभद्र के 19,53,458 लोगों तक पीने का पानी पहुँचेगा। जल शक्ति मंत्रालय इस पूरे कार्य की निगरानी कर रहा है। देश में 2 करोड़ 60 लाख से ज्यादा परिवारों को उनके घरों में नल से शुद्ध पीने का पानी पहुँचाने का इंतजाम किया गया है।

‘हर परिवार से 1 आदमी किसान आंदोलन में चलो’ – पंजाब की पंचायतों का तुगलकी फरमान, नहीं तो ₹2100 जुर्माना

दिल्ली और आस-पास के कई राज्यों में चल रहे ‘किसान आंदोलन’ के रविवार (जनवरी 31, 2021) को 4 महीने पूरे हो गए हैं। इसके बावजूद इसमें और ईंधन झोंकने की कवायद जारी है। पंजाब में अब पंचायतों ने फरमान जारी करना शुरू कर दिया है। कई पंचायतें अपने-अपने गाँव के प्रत्येक परिवारों को कम से कम एक सदस्य आंदोलन में दिल्ली भेजने का फरमान सुना रही है। पंजाब में ऐसी कई पंचायतें हैं।

सबसे बड़ी बात तो ये है कि ऐसे फरमान पंचायतों के आधिकारिक लेटर हेड पर जारी किए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि जिस परिवार का कोई सदस्य दिल्ली में चल रहे ‘किसान आंदोलन’ में नहीं गया तो उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। साथ ही जुर्माना भी भरना पड़ेगा। इससे पहले किसान एक्टिविस्ट्स को टास्क सौंपा गया था कि वो भीड़ जुटाएँ और लोगों को दिल्ली लेकर जाएँ। पंजाब में अक्टूबर 1, 2020 को ऐसे प्रदर्शन शुरू हुए थे।

तब रेलवे ट्रैक्टर्स, टोल प्लाजा और मॉल्स जैसे कारोबारी स्थलों को निशाना बनाया गया था। कुछ भाजपा नेताओं और कारोबारियों के आवासों तक को भी नहीं बख्शा गया था। अब स्थिति ये है कि पूरे पंजाब में लगभग 80 ऐसे स्थल हैं, जहाँ आंदोलन चल रहा है। दिल्ली की सीमाओं पर तो ये जारी है ही। मालवा में 5 पंचायतों ने ऐसा फरमान जारी किया। प्रस्ताव पारित कर के सभी परिवारों को आदेश सुनाया गया।

भठिंडा जिले के करारवाला गाँव के सरपंच अवतार सिंह ने कहा कि पूरे गाँव ने आश्वासन दिया है कि वो इस अभियान में उनका समर्थन करेंगे। पंचायत ने यहाँ फरमान सुनाया है कि अगर आदेश का उल्लंघन किया जाता है तो 2100 रुपए का जुर्माना भरना पड़ेगा। फरीदकोट के कोटकपूरा स्थित सिवियन गाँव के सरपंच करनैल सिंह ने कहा कि जिस परिवार का व्यक्ति दिल्ली आंदोलन में नहीं जाएगा, उसे 500 रुपए जुर्माना भरना पड़ेगा।

बरनाला जिले के ठीकरीवाल गाँव में भी ऐसा प्रस्ताव पारित किया गया। ये गाँव स्वतंत्रता सेनानी सेवा सिंह ठीकरीवाल के लिए जाना जाता है। इस पंचायत ने भी निर्णय लिया है कि गाँव से 25 लोगों का जत्था नियमित रूप से दिल्ली जाता रहेगा। मनसा के बुढलाडा स्थित बारे गाँव और भठिंडा के नाथेला गाँव ने भी इसी तरह का निर्णय लिया। दिल्ली में प्रदर्शनकारियों की संख्या बढ़ाने के लिए ऐसे ही तरीके आजमाए जा रहे हैं।

हिंसा के तुरंत बाद सोशल मीडिया पर एक वीडियो भी सामने आई थी। जिसमें तथाकथित किसानों की एक ट्रॉली विदेशी दारू और उसके साथ खाने-पीने के अन्य समानों से भरी देखी गई थी। वहीं जब पुलिस अधिकारियों ने उन्हें रोकने की कोशिश की, तो उन्होंने पुलिस अधिकारियों पर ही लाठी और पत्थरों से हमला बोल दिया। किसान को कहते हुए सुना जा सकता है, “हम तो आ गए थे घूमने। मज़ा आ रहा है पूरा। यहीं खाना, यहीं पीना, यहीं रहना है।”

एक पागल, भारत के बारे में उसका पढ़ना… और Oxford का बनना: आखिर क्यों काट लिया था उसने अपना लिंग?

हर किताब को पढ़ते समय हर अनजान शब्द का अर्थ समझना बहुत जरूरी होता है। तभी किताब पढ़ने से हमें पूरा ज्ञान मिल पाता है। मान लीजिए ‘माँ’ शब्द है। यह तो हम अच्छी तरह जानते हैं कि माँ क्या होती है। अम्मा, मम्मी, मैया, माता लिखा है तो भी कोई मुश्किल नहीं होती।

ये शब्द हम बचपन से ही जानते हैं। लेकिन कहीं ‘जननी’ लिखा होगा तो हम में से शायद कुछ को उस के मायने पता नहीं होते। तब हम ‘जननी’ शब्द किसी कोश में खोजते हैं। वहाँ लिखा होता है- जन्म देने वाली, माँ, माता। इसे ही शब्दकोश कहा जाता है। जिसे अंग्रेजी में हम ‘डिक्शनरी’ कहते हैं।

डिक्शनरी में सबसे अधिक प्रचलित है- ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी (Oxford English Dictionary)। जब भी हम किसी शब्द में उलझते हैं तो इसकी सहायता लेते हैं और उस शब्द के बारे में सारी जानकारी हासिल करते हैं। डिक्शनरी में हर शब्द के बाद बताया जाता है कि वह शब्द संज्ञा है या सर्वनाम या क्रिया आदि।

इस जानकारी के बाद उस का अर्थ लिखा जाता है। शब्द का अर्थ समझाने के लिए उस की परिभाषा भी होती है। कई बार यह भी बताया जाता है कि वह शब्द कैसे बना। हमारी अपनी भाषा का शब्द है या किसी और भाषा से आया है।

ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी का पहला वॉल्यूम 1 फरवरी 1884 में पब्लिश हुआ था। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के पहले संस्करण को संकलित करने में लगभग 70 साल लग गए और उन वर्षों में दो लोगों में काफी समानता देखी गई। हालाँकि वो देखने में एक जैसे थे, लेकिन दोनों की जिंदगी एक-दूसरे से काफी अलग थी।

ये दो नाम हैं- सर जेम्स ऑगस्टस हेनरी मुरे (Sir James Augustus Henry Murray) और डॉ. विलियम चेस्टर माइनर (Dr. William Chester Minor)। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के इतिहास में इन दोनों की कहानी काफी दिलचस्प और रोचक है। ऑक्सफोर्ड का इतिहास इनकी स्कॉलरशिप, हिंसा, पागलपन, गरीबी और शब्दों के लिए समर्पण की दमदार कहानी को दर्शाता है।

ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी (OED) में जिस तरह से शब्द के हर रुप को सुसज्जित और व्यवस्थित किया गया है, उसे देखकर क्या कोई यह सोच भी सकता है कि इसे तैयार करने में एक पागल व्यक्ति का अहम योगदान हो सकता है! भले ही सर जेम्स ऑगस्टस हेनरी मुरे ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के लेखक हैं, लेकिन इसके सबसे उल्लेखनीय और शानदार योगदानकर्ता थे- डॉ. विलियम चेस्टर माइनर नामक एक अमेरिकी सर्जन। उन्होंने ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी को 10,000 से ज्यादा शब्द दिए।

डॉ. विलियम चेस्टर माइनर

अमेरिकी गृह युद्ध में लड़ने वाले माइनर सेना में सर्जन थे। लेकिन सेना में रहने के दौरान उन्हें एक आयरिश सैनिक के चेहरे पर ‘Deserter’ के लिए ‘D’ अक्षर आग में गर्म करके दागना था। इस घटना ने उन्हें काफी प्रभावित किया। उन्होंने इससे उबरने के लिए युद्ध खत्म होने के बाद लंदन का रुख किया, लेकिन वहाँ उनकी किस्मत ने उन्हें पागलखाने पहुँचा दिया। दरअसल यहाँ पर उन्होंने राह चलते एक राहगीर पर गोली चला दी थी। जिसके बाद कोर्ट ने मानसिक रुप से विक्षिप्त होने के कारण उन्हें सजा न देकर पागलखाने में रखने का आदेश दिया।

अपने स्टाफ के साथ सर जेम्स ऑगस्टस हेनरी मुरे

यहीं पर माइनर को मुरे द्वारा दिए गए विज्ञापन के बारे में पता चला। इसके बाद उन्होंने किताबें मँगवाई और हजारों शब्दों का पूर्ण विवरण लिख कर मुरे को भेजने लगे। हर किताब पढ़ने के बाद उनके दिमाग में एक कोटेशन आता था। जिसे माइनर ने पर्ची पर नोट कर वर्णमाला के क्रम (Alphabetical Order) में व्यवस्थित किया। इस तरह की पर्ची माइनर 20 साल तक हर हफ्ते जेम्स मुरे को भेजते रहे।

सर जेम्स ऑगस्टस हेनरी मुरे की फैमिली

इस बीच मुरे को इसका तनिक भी भान नहीं था कि माइनर मानसिक रुप से विक्षिप्त हैं और शरणार्थी सेल में हैं। जब मुरे 1891 में माइनर से उनके शरणार्थी सेल में मिले तो उन्हें एहसास हुआ कि माइनर के योगदान के बिना, ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी को अपने रोस्टर से गायब हुए शब्द-उत्पत्ति के चार शताब्दियों से अधिक का समय हो चुका होता।

माइनर ने जो शब्द दिए, उसमें से अधिकतर शब्द उनके पढ़ने की सनकपन की वजह से आया। राजनीतिक दर्शन की किताबों से उन्होंने ‘countenance’ जैसे शब्दों की व्युत्पत्ति की, जिसका आज हम धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं। यात्रा साहित्य को पढ़ने से, विशेष रूप से भारत के बारे में पढ़ने पर उन्होंने ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी को ‘guz’ (गज) जैसा शब्द दिया, जो मूल रूप से भारत में लंबाई का एक मापक ईकाई है।

माइनर के अच्छे आचरण के बावजूद, अधिकारियों ने माइनर को ब्रॉडमूर से बाहर जाने से मना कर दिया। 1800 के दशक के दौरान जेम्स मुरे ने सरकार को दर्जनों पत्र भेजे और व्यक्तिगत रूप से कानून के प्रमुख अधिकारियों को माइनर को जाने देने के लिए याचिका दी।

1900 की शुरुआत में, माइनर की हालत खराब हो गई। उन्हें बुरे सपने आने लगे। उन्हें पुराने दृश्य याद आने लगे, जिसने उन्हें विचलित कर दिया। उन्हें खुद से घृणा होने लगी और फिर उन्होंने अपना लिंग काट कर खुद को घायल कर लिया। 1910 में मुरे की याचिकाएँ सफल हुईं, जब विंस्टन चर्चिल नाम का एक युवा गृह सचिव के पास पहुँचा। इसके बाद माइनर को वहाँ से जाने दिया गया और 1922 में उनके घर पर उनकी मृत्यु हो गई।

ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के पीछे की यह दिलचस्प कहानी ब्रिटिश लेखक सिमॉन विनचेस्टर (Simon Winchester) की किताब The Surgeon of Crowthorne: A Tale of Murder, Madness and the Love of Words में प्रकाशित हुई। यह गैर-फिक्शन हिस्ट्री बुक पहली बार इंग्लैंड में 1998 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा में The Professor and the Madman: A Tale of Murder, Insanity, and the Making of the Oxford English Dictionary टाइटल से पब्लिश हुई। 

जब हम ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी के पन्नों को पलटते हैं, जो कि हमारे घरों में और इंटरनेट पर अब आम है, तो इतिहास के उन विभिन्न धागों पर ध्यान देना असंभव सा होता है, जो एक साथ बँधे हुए प्रतीत होते हैं। और इन्हीं पन्नों के बीच में कहीं अभी भी इन दो उल्लेखनीय पुरुषों, एक प्रोफेसर और एक पागल व्यक्ति की गूँज बसती है।

पंजाब में पुजारी पर ताबड़तोड़ फायरिंग, बचाने दौड़ी नाबालिग लड़की की हालत भी गंभीर

पंजाब के जालंधर जिले के फल्लौर गाँव में एक पुजारी पर अंधाधुंध फायरिंग की घटना सामने आई है। मिली जानकारी मुताबिक पुजारी संत ज्ञान को तीन गोलियाँ लगी हैं। एक नाबालिग लड़की भी इस हमले का शिकार हुई है। दोनों को गंभीर हालत में लुधियाना के डीएमसी में दाखिल करवाया गया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना आज (31 जनवरी, 2021) सुबह की है। अचानक से आए अज्ञात बदमाशोंं ने गाँव के मंदिर के पुजारी संत ज्ञान पर गोलियों की बौछार कर दी। इस दौरान पुजारी को बचने का कोई भी मौका नहीं मिला। पुजारी को बचाने की कोशिश में 16 साल की लड़की सिमरन भी गोलियों की चपेट में आ गई। उसे हमलावरों की दो गोलियाँ लगी है।

वारदात के बाद हमलावर मौके से फरार हो गए। घटना की सूचना मिलते ही मौके पर पहुँची पुलिस ने घटनास्थल का जायजा लिया और अज्ञात हमलावरों के खिलाफ मामला दर्ज कर उनकी तलाश में जुट गई है।

कुछ साल पहले ही पुजारी ने मंदिर की स्थापना की थी। बताया जा रहा है कि इस मंदिर के स्थापना वाले दिन भी कुछ लोगों ने विरोध किया था। पुलिस मामले की अलग-अलग एंगल से जाँच कर रही है। आसपास के सीसीटीवी फुटेज भी खंगाले जा रहे हैं। घटना के बाद से ही इलाके में हड़कंप मचा हुआ है।

मनदीप पुनिया की रिहाई के लिए ‘पत्रकारों’ का पुलिस मुख्यालय पर जेएनयू टाइप स्टंट

शनिवार (जनवरी 30, 2021) रात सिंघू बॉर्डर पर स्टेशन हाउस ऑफिसर (SHO) के साथ दुर्व्यवहार करने के बाद हिरासत में लिए गए मनदीप पुनिया की रिहाई की माँग को लेकर ‘पत्रकारों’ ने रविवार (जनवरी 31, 2021) को दिल्ली पुलिस मुख्यालय पर प्रदर्शन किया। वह कथित तौर पर बैरिकेड हटाने की कोशिश कर रहा था और उसने पुलिस के साथ दुर्व्यवहार किया, जिसके कारण उसे हिरासत में लिया गया था।

गिरफ्तारी के बारे में बताते हुए एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा कि पुनिया प्रदर्शनकारियों के साथ खड़ा था और उसके पास प्रेस आईडी कार्ड नहीं था। वह उन बैरिकेड के माध्यम से जाने की कोशिश कर रहा था जो सुरक्षा के लिहाज से लगाए गए थे। इस दौरान पुलिसकर्मियों और उनके बीच विवाद शुरू हो गया।

पुलिस ने कहा कि कारवाँ के पत्रकार ने पुलिस के साथ दुर्व्यवहार किया, जिसके बाद उसे हिरासत में लिया गया। बावजूद उसके समर्थन में ‘पत्रकारों’ को रविवार को दिल्ली पुलिस मुख्यालय में नारेबाजी करते हुए देखा जा सकता है। वो लोग ‘तानाशाही नहीं चलेगी’ के नारे लगा रहे थे।

स्क्रॉल के विजयता लालवानी द्वारा शेयर किए गए एक वीडियो में, प्रदर्शनकारियों में से एक को ‘बीजेपी के गुंडों’ के बारे में बात करते हुए देखा जा सकता है। वह बताता है कि पिछले दो महीनों से मनदीप प्रदर्शनकारी किसानों के साथ रहता था, उसके साथ खाता-पीता था।

पत्रकार जिस तरह से नारे लगा रहे थे, उसे देख कर जेएनयू में वामपंथी द्वारा लगाए जाने वाले नारों का दृश्य याद आता है।

गणतंत्र दिवस के दौरान दिल्ली की हिंसा के दौरान एक प्रदर्शनकारी की मौत के मामले में गलत सूचना साझा करके हिंसा भड़काने की कोशिश के लिए कारवाँ के पत्रकारों पर भी देशद्रोह के आरोप में मामला दर्ज किया गया है। मनदीप पुनिया भी कथित तौर पर इस वामपंथी मीडिया पोर्टल से जुड़ा हुआ है।

रवीश कुमार ने भी इस पर अपनी व्यथा प्रकट करते हुए टिप्पणी की। रवीश कुमार ने अपनी टिप्पणी पत्रनुमा लिखी है जिसे जेलर साहब को संबोधित किया है। इस पोस्ट में उन्होंने लिखा है, “जेल की दीवारें आज़ाद आवाज़ों से ऊँची नहीं हो सकती हैं। जो अभिव्यक्ति की आज़ादी पर पहरा लगाना चाहते है वो देश को जेल में बदलना चाहते हैं।”

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद नेताजी को जहर दिया? उन पर किताब लिखने वाले अनुज धर का संदेह

पूर्व पत्रकार अनुज धर ने शनिवार (31 जनवरी, 2021) को एक ट्वीट कर सोशल मीडिया पर विवाद खड़ा कर दिया। धर ने नेताजी पर ‘कुन्ड्रम: सुभाष बोस लाइफ आफ्टर डेथ (Conundrum: Subhas Bose’s Life after Death)’ नाम से किताब लिखी है।

ट्विटर पर उन्होंने लिखा, “1939 में इसी दिन सुभाष चंद्र बोस कॉन्ग्रेस अध्यक्ष चुने गए थे। सीआईए के डिक्लासीफाइड रिकार्ड के मुताबिक बाद में ब्रिटिश दबाव के कारण उन्हें पद से हटा दिया गया।” धर ने आगे कहा, “उस समय, बोस अचानक बीमार पड़ गए थे। शायद उन्हें जहर दिया गया था।”

उनके इस पोस्ट ने सोशल मीडिया पर सनसनी फैला दी है। लोग बोस के रहस्यमय मौत पर नाराजगी व्यक्त कर रहे हैं। लोगों ने बोस के रहस्यमय तरीके से गायब होने में तत्कालीन कॉन्ग्रेस आलाकमान की भूमिका को लेकर सवाल खड़े किए हैं।

बता दें 1938 में कॉन्ग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन में बोस को अध्यक्ष के रूप में चुना गया था। बोस भारत सरकार अधिनियम 1935 के अनुसार ब्रिटिश सरकार की संघीय योजना के विरोध की वकालत कर रहे थे।

उन्होंने पूर्ण स्वराज के लिए जनांदोलन के पक्ष में थे, जबकि पार्टी के भीतर कुछ लोग ब्रिटिशों की नई रियायतों को स्वीकार करने के पक्ष में थे। लेकिन, ओल्ड गार्ड जिनमें महात्मा गाँधी भी थे, ने उनकी बातों पर ध्यान देने से इनकार कर दिया। इसलिए उन्होंने त्रिपुरी में होने वाले अगले वार्षिक कॉन्ग्रेस सत्र के अध्यक्ष पद के लिए फिर से चुनाव लड़ा था।

गौरतलब है कि आज की कॉन्ग्रेस पार्टी के विपरीत, उस समय अध्यक्ष पद के लिए वास्तविक चुनाव हुआ करते थे। उन्होंने गाँधी के उम्मीदवार पट्टाभि सीतारमैय्या (1,575 से 1,376 वोट) के खिलाफ जीत दर्ज की थी। इसके विरोध पूरे सीडब्ल्यूसी (कॉन्ग्रेस कार्यसमिति) ने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उन्हें कॉन्ग्रेस पार्टी से बाहर कर दिया गया था, क्योंकि उनके पास प्रतिभा और महात्मा गाँधी की इच्छा के खिलाफ चुनाव जीतने की क्षमता थी।

आम बजट से पहले बजट की पूरी कहानी, क्यों इतना गोपनीय रखा जाता है पिटारा?

सोमवार (1 फरवरी 2021) को देश का आम बजट आएगा। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इसे पेश करेंगी। इस पिटारे में क्या होगा, क्या नहीं, यह यकीनी तौर पर बताना फिलहाल मुश्किल है। क्योंकि ये पिटारा काफी गोपनीयता के साथ रखा जाता है। हालाँकि अर्थशास्त्र और राजनीति के विशेषज्ञ अपने-अपने हिसाब से कयास लगा रहे हैं। लेकिन किसका तुक्का कितना सही लगेगा ये तो कल (फरवरी 1, 2021) ही पता चलेगा।

लेकिन पिटारे को इतनी गोपनीयता के साथ क्यों रखा जाता है?

दरअसल 1947 में यूनाइटेड किंगडम में बजट पेश होने वाले दिन वहाँ के तत्कालीन वित्त मंत्री (British Chancellor of the Exchequer) हुघ डाल्टन ने बजट स्पीच देने से पहले एक पत्रकार से बात करने के दौरान कुछ ऐसे टैक्स के बारे में जानकारी दी, जो उन्होंने बजट में शामिल किया था। यह खबर बाहर आई और डाल्टन को इस्तीफा देना पड़ा। तब से इंगलैंड तो छोड़िए, हमारे यहाँ भी आरके षणमुखम चेट्टी ने सोचा कि बजट का पिटारा बंद ही अच्छा।

अब ये आरके षणमुखम चेट्टी कौन हैं? वे स्वतंत्र भारत के पहले वित्त मंत्री थे। लेकिन कॉन्ग्रेस पार्टी से जुड़े हुए नहीं थे। पहली कैबिनेट में कई सदस्य गैर-कॉन्ग्रेस पार्टी से थे, जिनमें से बीआर अंबेडकर और आरके षणमुखम चेट्टी भी थे। वे एक उद्योगपति थे साथ ही, कोच्चि राज्य के दीवान और चैंबर ऑफ प्रिंसेस के संवैधानिक सलाहकार भी थे।

स्वतंत्र भारत के वे भले पहले वित्त मंत्री थे लेकिन भारत का पहला बजट उन्होंने पेश नहीं किया था। भारत का पहला केंद्रीय बजट ‘जेम्स विल्सन’ ने 18 फरवरी, 1869 को पेश किया था। जेम्स विल्सन भारतीय काउंसिल के वित्त मामलों को सँभालने वाले सदस्य थे। साथ ही, ‘द इकोनॉमिस्ट’ के संस्थापक भी थे। 1869 के बाद बजट हर साल पेश किया जाता रहा है और स्वतंत्र भारत के संविधान में ‘अनुच्छेद 112’ के तहत सरकार को हर साल अपने खर्चों और आमदनी का ब्यौरा देना जरूरी है।

अब आते हैं बजट की प्रक्रिया पर। बजट पेश होने से कुछ महीने पहले ही तैयार होना शुरू हो जाता है। अमूमन अगस्त-सितम्बर से बजट बनना शुरू हो जाता है। पेश होने से कुछ दिन पहले प्रिंट होता है। इसी प्रिंटिंग की प्रक्रिया में जाने से पहले ‘कुछ मीठा हो जाए’ के तर्ज पर ‘हलवा सेरेमनी’ होता है। लेकिन इस साल का बजट प्रिंट नहीं होगा, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक फॉर्म में प्रेजेंट किया जाएगा।

चूँकि बजट वर्तमान वित्तीय वर्ष के खत्म होने से पहले ही बनना शुरू होता है तो आय और व्यय सही-सही बता पाना संभव नहीं है। इसलिए बजट तीन भाग में प्रस्तुत किया जाता है। पहले भाग में पिछले वित्तीय वर्ष (2019-20) का वास्तविक आय-व्यय का लेखा-जोखा, दूसरे भाग में वर्तमान वित्तीय वर्ष (2020-2021) का रिवाइज्ड बजट, और तीसरे भाग में आने वाले साल (2021-2022) का बजट।

वित्त मंत्री के बजट पर भाषण देने के बाद बजट को संसद से स्वीकृति मिलना जरूरी होता है वरना माना जाता है कि सरकार ने अपना बहुमत खो दिया है। इस प्रक्रिया में दो विधेयकों पर संसद की स्वीकृति जरूरी होती है। पहला, वित्त विधेयक और दूसरा विनियोग विधेयक। विनियोग विधेयक के तहत ही सरकार को अपने खर्चों के लिए राजकोष से धन प्राप्त होता है।

  • अब जानते है भारत के कुछ ऐसे बजट के बारे में, जिसमें कुछ अलग तरह के फैसले लिए गए या जो किसी वजह से आम बजट की तुलना में खास रहा:
  • 1947-48 में स्वतंत्र भारत का पहला बजट पेश हुआ।
  • 1948-49 के बजट में पहली बार चुनाव से पहले पेश किया जाने वाला बजट अंतरिम बजट कहलाया।
  • 1950-51 के बजट में योजना आयोग बनने की घोषणा हुई।
  • 1955-56 के बजट में पहली बार परिवार को ध्यान में रखते हुए विवाहित और अविवाहित लोगों के लिए टैक्स में अलग-अलग तरह से छूट दी गई।
  • 1957-58 में पहली बार ‘वेल्थ टैक्स’ के रूप में पहली बार नया प्रत्यक्ष कर लागू हुआ।
  • 1965-66 में काले धन से निपटने के लिए पहली बार ‘वॉलंटरी डिस्क्लोजर ऑफ अनेकांउटेड वेल्थ’ योजना लाई गई।
  • 1970-71 में पहली बार बजट किसी महिला प्रधानमंत्री सह वित्तमंत्री के द्वारा पेश किया गया।
  • 1985-86 में पहली बार वित्त मंत्री वीपी सिंह ने ‘वित्तीय और औद्योगिक पुनर्निर्माण बोर्ड’ के गठन का प्रस्ताव रखा जो वर्तमान में इनसॉलवेन्सी कोड की नींव बनी।
  • 1987-88 में मिनिमम अल्टरनेट टैक्स की अवधारणा लाई गई।
  • 1993-94 के बजट में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज बनाने की घोषणा हुई।
  • 1994-95 में पहली बार सर्विस टैक्स लागू किया गया।
  • 1997-98 के बजट को ‘ड्रीम बजट’ कहा गया। इसमें इनकम टैक्स, कॉरपोरेट टैक्स रेट को कम करने से लेकर कई दूसरे आर्थिक सुधार लागू किए गए।
  • 1998-99 में तत्कालीन वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने एनआरआई निवेश को आकर्षित करने के लिए दो योजनाओं की घोषणा किया। पहला, UTI इंडिया मिलेनियम स्कीम और दूसरा, SBI का रेसर्जेंट इंडिया बॉन्ड्स।
  • 2006-07 के बजट में पहली बार ‘एक देश एक टैक्स’ के लिए GST का जिक्र किया गया, जिसके सात साल बाद एनडीए सरकार के नेतृत्व में या अस्तित्व में आया।
  • 2009-10 में UIDAI की घोषणा की गई और आधार प्रोजेक्ट शुरू हुआ।
  • 2015-16 में देश की आधारभूत सुविधाओं को मजबूत बनाने के लिए नेशनल इन्वेस्टमेंट एंड इंफ्रास्ट्रक्चर फंड की घोषणा की गई। गाँव में रोजगार को बढ़ावा देने के लिए दीन दयाल ग्रामीण कौशल योजना की घोषणा की गई। 
  • 2017-18 में अंत्योदय योजना की शुरुआत की गई।
  • 2019-20 में पहली बार भारत की महिला वित्त मंत्री ने बजट पेश किया। इस बजट में एक अलग मंत्रालय ‘जल शक्ति मंत्रालय’ के गठन की बात कही गई।
  • 2020-21 में नई शिक्षा नीति आने की बात कही गई।

उत्तर प्रदेश: गोरखपुर के टॉप 10 हिस्ट्रीशीटर में डॉ. कफील खान भी

उत्तर प्रदेश पुलिस ने गोरखपुर जिले में 81 लोगों की हिस्ट्रीशीट खोली है। इस लिस्ट में साल 2017 में गोरखपुर BRD मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन कांड (जिसमें कई बच्चों की मौत हुई थी) के बाद सुर्खियों में आए मुख्य आरोपित के रूप में नामित डॉक्टर कफील खान का नाम टॉप 10 में शामिल है। हिस्ट्रीशीटरों में शामिल होने के बाद से ही खान पुलिस की रडार पर है।

आपको बता दें कि हिस्ट्रीशीटर वे लोग होते हैं जिनका आपराधिक रिकॉर्ड होता है। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक जोगेंद्र कुमार ने 81 लोगों के खिलाफ हिस्ट्रीशीट खोलने के निर्देश दिए। अभी तक पूरे गोरखपुर में 1,543 हिस्ट्रीशीटर थे।

कफील खान के भाई अदील खान ने दावा किया कि डॉ. कफील खान के खिलाफ हिस्ट्रीशीट जून 2020 में ही खोली गई थी। लेकिन मीडिया को इसके बारे में शुक्रवार (29 जनवरी, 2020) को पता चला। कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी द्वारा उन्हें कॉन्ग्रेस शासित राज्य में ‘सुरक्षित रहने’ का आश्वासन दिए जाने के बाद वे राजस्थान चले गए हैं।

2017 में ऑक्सीजन की आपूर्ति में कमी के कारण गोरखपुर के BRD मेडिकल कॉलेज में 72 नवजात बच्चों की मौत के बाद डॉ. खान को लापरवाही के आरोप में सस्पेंड किया गया था। उसे बाद में गिरफ्तार भी किया गया था।

डॉक्टर कफील पर यूपी पुलिस द्वारा 2 साल जाँच के बाद लापरवाही और भ्रष्टाचार के आरोप हटा दिए गए थे। हालाँकि उस पर अभी भी निजी प्रैक्टिस चलाने और दो अन्य आरोप लगे हुए हैं। 9 महीने जेल में बिताने के बाद उसे 2018 में रिहा कर दिया गया था। लेकिन अभी भी वो अपनी नौकरी से सस्पेंड है।

उसे 10 दिसंबर 2019 को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में सीएए विरोध-प्रदर्शनों के दौरान दिए गए भाषण के लिए जनवरी 2020 में गिरफ्तार किया गया था। खान ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में सीएए विरोध प्रदर्शन के दौरान दिए गए अपने भाषण में कुछ भड़काऊ टिप्पणियाँ की थीं। उसने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ कथित तौर पर टिप्पणी की थी कि वह एक हत्यारे हैं, जिनके कपड़े खून से सने हैं।

उसने यह भी कहा था कि सीएए ने मुसलमानों को दूसरे दर्जे का नागरिक बना दिया है। उसने आरोप लगाया कि आरएसएस संचालित स्कूलों में छात्रों को सिखाया जाता है कि दाढ़ी वाले लोग आतंकवादी हैं और सीएए के साथ सरकार ने हमें बताया है कि भारत हमारा देश नहीं था। खान ने लोगों से अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने का आग्रह किया था।

जिसके बाद में खान के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया था। फिर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सितंबर 2020 में उसकी हिरासत को रद्द करते हुए तत्काल रिहाई का आदेश दिया था।