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कश्मीरी लड़कियों का शोषण, जेब में कंडोम और ‘लव लेटर’: पूर्व आतंकी मुश्ताक ने खोली पाकिस्तान की पोल, बताया- जन्नत-हूर का ख्वाब दिखा फँसाते हैं

पूर्व कश्मीरी आतंकी और बाद में भारतीय सेना के लिए अंडरकवर ऑपरेटिव के तौर पर काम कर चुके मुश्ताक अहमद भट ने यूट्यूबर प्रखर गुप्ता के लोकप्रिय पॉडकास्ट (‘PGX: Raw & Real’) पर एक इंटरव्यू में 90 के दशक से लेकर 2016 तक के आतंक की उस काली सच्चाई को खोलकर रख दिया, जिसे पाकिस्तान हमेशा दुनिया से छिपाना चाहता है।

उन्होंने बताया कि सरहद पार से आने वाले आतंकी ‘मुजाहिद’ होने का दावा कर घाटी में केवल अपनी हवस मिटाने और कश्मीरी लड़कियों की जिंदगी बर्बाद करने आते थे।

कश्मीर में पिछले तीन दशकों से पाकिस्तान जिस ‘जिहाद’, ‘मजहब की लड़ाई’ और ‘आजादी की लड़ाई’ का नैरेटिव दुनिया के सामने पेश करता रहा है, उसकी हकीकत क्या है? क्या सचमुच हजारों कश्मीरी युवा किसी मकसद के लिए हथियार उठाकर सीमा पार गए थे या फिर वे एक ऐसे खेल का हिस्सा बन गए थे जिसमें मजहब, राजनीति, प्रोपेगेंडा और विदेशी एजेंसियों के हित सबसे ऊपर थे और युवाओं की जिंदगी का कोई मोल नहीं था?

इन सवालों का जवाब उस व्यक्ति ने दिया है, जिसने इस काली दुनिया को भीतर से देखा। उसने कश्मीर में बंदूक संस्कृति का उदय देखा, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) के कैंपों में समय बिताया, अफगानिस्तान में सैन्य प्रशिक्षण लिया, ‘जिहाद’ की विचारधारा के नाम पर होने वाली ब्रेनवॉशिंग को करीब से देखा और बाद में उस रास्ते को छोड़कर भारतीय सेना के साथ तीन दशक से अधिक समय तक काम किया। यह व्यक्ति है मुश्ताक अहमद भट, जिन्हें कभी ‘अशफाक’ और ‘रोमियो’ जैसे कोड नेम से जाना जाता था।

प्रखर के पॉडकास्ट में मुश्ताक अहमद भट ने ऐसे कई खुलासे किए, जो पाकिस्तान के दशकों पुराने दावों को चुनौती देते हैं। उन्होंने बताया कि कई बार मुठभेड़ों में मारे गए पाकिस्तानी आतंकियों की तलाशी के दौरान उनकी जेबों से जिहाद और शहादत के संदेश नहीं, बल्कि कश्मीरी लड़कियों को लिखे गए प्रेम पत्र निकलते थे। कई मामलों में कंडोम भी बरामद हुए।

मुश्ताक के अनुसार, जब पकड़े गए आतंकियों से पूछा जाता था कि अगर वे इस्लाम और जिहाद के नाम पर लड़ने आए हैं तो उनके पास ऐसी चीजें क्यों हैं?, तो उनके पास कोई ठोस जवाब नहीं होता था। वे बहस से बचते थे या गुस्से में जवाब देते थे। यह वह पहला सच था जो उस छवि से बिल्कुल अलग था, जो पाकिस्तान और उसके समर्थक संगठनों द्वारा ‘मुजाहिदीन’ के बारे में बनाई जाती रही है।

मुश्ताक बताते हैं कि कई विदेशी और पाकिस्तानी आतंकी स्थानीय लड़कियों को प्रेम और शादी के झूठे वादों में फँसाते थे। दक्षिण कश्मीर के कई इलाकों में ऐसे मामले सामने आए जहाँ आतंकियों ने स्थानीय परिवारों में शरण ली, परिवार की लड़कियों के साथ रात बिताई और बाद में मुठभेड़ों में मारे गए। वैसी लड़कियाँ और उनके होने वाले बच्चों की जिंदगी बदल गई। यह कहानी केवल आतंकियों की निजी हरकतों की नहीं है, बल्कि यह कहानी उस पूरे तंत्र की है, जिसने हजारों युवाओं को ‘आजादी’ और ‘जिहाद’ के नाम पर इस्तेमाल किया।

एक संपन्न और राजनीतिक परिवार से आने वाला युवक

मुश्ताक अहमद भट किसी आर्थिक मजबूरी या सामाजिक उपेक्षा के कारण उस रास्ते पर नहीं गए थे। वे कश्मीर के एक प्रभावशाली और राजनीतिक परिवार से आते थे। उनके दादा गाँव के मुखिया थे और परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा थी। जमीन-जायदाद की कमी नहीं थी। पढ़ाई सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में हुई। सामान्य जीवन चल रहा था।

लेकिन 1980 के दशक के अंत तक कश्मीर तेजी से बदल रहा था। 1987 के चुनावों के बाद राजनीतिक असंतोष बढ़ा। चुनावी धांधली के आरोप लगे। अलगाववादी भावनाओं को हवा मिली। पाकिस्तान ने इस असंतोष को अवसर के रूप में देखा। घाटी में धीरे-धीरे एक नया माहौल बनने लगा।

मुश्ताक बताते हैं कि उस दौर में बंदूक केवल हथियार नहीं थी, बल्कि प्रतिष्ठा का प्रतीक बन चुकी थी। कॉलेजों और युवाओं के बीच पिस्तौल और AK-47 आकर्षण का केंद्र बन गए थे। जिसके पास हथियार होता था, उसे अलग नजर से देखा जाता था।

मुश्ताक ने स्वीकार किया कि वे भी इसी माहौल से प्रभावित हुए। उन्हें लगा कि बंदूक शक्ति का प्रतीक है। युवाओं के मन में यह धारणा बैठाई जा रही थी कि हथियार उठाना ही सम्मान पाने का रास्ता है। यही वह दौर था जब कश्मीर का एक बड़ा वर्ग धीरे-धीरे कट्टरपंथी विचारधारा की ओर बढ़ रहा था।

‘आजादी’ और ‘जिहाद’ के नारों से शुरू हुई यात्रा

मुश्ताक बताते हैं कि शुरुआत में उन्हें भी यही बताया गया कि वे एक बड़े और पवित्र मिशन का हिस्सा बनने जा रहे हैं। ‘आजादी’ जुल्म के खिलाफ संघर्ष’ और ‘जिहाद’ जैसे शब्द लगातार सुनाई देते थे। रैलियाँ निकलती थीं। भाषण होते थे। युवाओं को बताया जाता था कि वे इतिहास बदलने जा रहे हैं।

धीरे-धीरे ऐसे युवाओं की पहचान की जाती थी, जो भावनात्मक रूप से प्रभावित हो चुके हों। मुश्ताक भी उन्हीं युवाओं में शामिल हो गए। कुछ समय बाद उन्हें बताया गया कि वे सीमा पार जाने के लिए तैयार रहें। उन्हें यह विश्वास दिलाया गया कि सीमा पार जाकर वे किसी महान उद्देश्य के लिए काम करेंगे।

कुपवाड़ा से सीमा पार और मुजफ्फराबाद तक

1990 के आसपास मुश्ताक और उनके साथियों को कुपवाड़ा के रास्ते सीमा पार कराया गया। यह यात्रा आसान नहीं थी। जंगलों, पहाड़ों और कठिन रास्तों से गुजरते हुए वे पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर पहुँचे। रात में चलना, दिन में छिपना और लगातार सतर्क रहना इस यात्रा का हिस्सा था।

आखिरकार वे मुजफ्फराबाद पहुँचे, जहाँ उनका स्वागत किया गया। उन्हें बताया गया कि अब वे जिहाद के रास्ते पर आगे बढ़ेंगे। यहीं से शुरू हुई वह प्रक्रिया, जिसे मुश्ताक बाद में ‘ब्रेनवॉशिंग’ के रूप में याद करते हैं। मुजफ्फराबाद के कैंपों में हर तरफ एक ही बात सुनाई देती थी- जिहाद, शहादत और जन्नत।

युवाओं को बताया जाता था कि यह दुनिया अस्थायी है और असली सफलता शहादत में है। मजहबी भाषणों, भावनात्मक कहानियों और प्रचार सामग्री के जरिए उनके भीतर एक विशेष मानसिकता विकसित की जाती थी, लेकिन कुछ ही समय बाद मुश्ताक को कई बातें खटकने लगीं।

उन्होंने देखा कि जिन युवाओं के नाम पर पैसा आता था, वह उन तक नहीं पहुँचता था। कैंपों के वरिष्ठ लोग बेहतर सुविधाओं में रहते थे, जबकि युवा साधारण और कठिन परिस्थितियों में रहते थे। यहीं से उनके मन में पहला बड़ा सवाल पैदा हुआ। अगर यह सचमुच मजहब और सिद्धांतों की लड़ाई है, तो फिर भ्रष्टाचार क्यों?

विदेशी प्रतिनिधियों के सामने तैयार किया गया नैरेटिव

मुश्ताक के अनुसार, एक समय उन्हें ऐसे कार्यक्रमों में भी शामिल किया गया जहाँ विदेशी प्रतिनिधियों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के लोगों के सामने कश्मीर की एक विशेष तस्वीर पेश की जाती थी। उन्हें बताया जाता था कि क्या कहना है और कैसे कहना है। भारतीय सेना के खिलाफ कथित अत्याचारों की कहानियाँ सुनाई जाती थीं।

लोगों को भावनात्मक तरीके से प्रस्तुत किया जाता था ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहानुभूति हासिल की जा सके। मुश्ताक के अनुसार, यहीं से उन्हें एहसास होने लगा कि केवल हथियारों का ही नहीं, बल्कि नैरेटिव और प्रोपेगेंडा का भी एक बड़ा खेल चल रहा है।

मुजफ्फराबाद में कुछ समय बिताने के बाद मुश्ताक अहमद भट और उनके साथ मौजूद कई अन्य युवाओं को अफगानिस्तान भेजे जाने की तैयारी शुरू हुई। उन्हें बताया गया कि अब वे असली ट्रेनिंग लेने जा रहे हैं। वहाँ से लौटकर वे ‘बड़े मिशन’ का हिस्सा बनेंगे।

उस समय तक मुश्ताक के मन में कई सवाल पैदा हो चुके थे, लेकिन वे उस मशीनरी के भीतर थे जहाँ सवाल पूछना आसान नहीं था। जो व्यक्ति सवाल पूछता था, उस पर शक किया जाता था। जो संगठन की लाइन से अलग सोचता था, उसे पसंद नहीं किया जाता था। ऐसे माहौल में अधिकांश युवा चुप रहना ही बेहतर समझते थे।

पाकिस्तान से अफगानिस्तान तक का सफर, हिज्ब-ए-इस्लामी के कैंप में मिली ट्रेनिंग

मुश्ताक बताते हैं कि उन्हें और उनके साथियों को पहले पेशावर की ओर ले जाया गया। वहाँ से उन्हें अफगानिस्तान पहुँचाया गया। उस समय अफगानिस्तान युद्ध और अस्थिरता का केंद्र था। सोवियत संघ के खिलाफ लड़ाई के बाद भी वहाँ हथियारबंद गुट सक्रिय थे और अलग-अलग संगठनों के कैंप चल रहे थे।

यहीं पर मुश्ताक को पहली बार एहसास हुआ कि कश्मीर का मुद्दा केवल कश्मीर तक सीमित नहीं है। यह एक बड़े अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का हिस्सा है, जहाँ अलग-अलग देशों, संगठनों और विचारधाराओं के लोग मौजूद थे। अफगानिस्तान में मुश्ताक को हिज्ब-ए-इस्लामी से जुड़े कैंपों में प्रशिक्षण दिया गया।

यहाँ उन्हें हथियार चलाने, विस्फोटक इस्तेमाल करने, घात लगाकर हमला करने और कठिन इलाकों में लड़ने की ट्रेनिंग दी गई। AK-47 से लेकर दूसरे हथियारों तक, हर चीज सिखाई जाती थी। युवाओं को यह विश्वास दिलाया जाता था कि वे किसी पाक युद्ध का हिस्सा हैं।

लेकिन मुश्ताक कहते हैं कि ट्रेनिंग के दौरान भी उन्हें बार-बार यह महसूस होता था कि जो बातें मंचों पर कही जाती हैं और जो जमीन पर दिखाई देता है, दोनों में बहुत अंतर है। मुश्ताक बताते हैं कि अफगानिस्तान पहुँचने के बाद उन्होंने पहली बार युद्ध को वास्तविक रूप में देखा।

फिल्मों और भाषणों में युद्ध को रोमांचक दिखाया जाता है, लेकिन जमीन पर वह केवल मौत, तबाही और दर्द छोड़ता है। उन्होंने टूटे हुए घर देखे, घायल लोगों को देखा, ऐसे परिवार देखे जिनके कई सदस्य मारे जा चुके थे। ऐसे बच्चे देखे जिन्होंने अपने माता-पिता खो दिए थे। यही वह समय था जब उनके भीतर ‘जिहाद’ की चमक फीकी पड़ने लगी।

जन्नत के सपने और मौत की सच्चाई

मुश्ताक बताते हैं कि कैंपों में युवाओं को बार-बार बताया जाता था कि शहादत सबसे बड़ी सफलता है। उन्हें जन्नत और हूरों की कहानियाँ सुनाई जाती थीं, लेकिन अफगानिस्तान में उन्होंने देखा कि मरने वाले ज्यादातर गरीब लोग थे। वे युवा थे जिन्हें भावनाओं में बहाकर यहाँ तक लाया गया था। जो लोग फैसले लेते थे, वे सुरक्षित जगहों पर बैठे रहते थे।

यहीं से उनके मन में यह सवाल और गहरा हो गया कि आखिर इस पूरी व्यवस्था का फायदा किसे हो रहा है? मुश्ताक बताते हैं कि धीरे-धीरे उन्हें एहसास हुआ कि ‘जिहाद’ केवल विचारधारा नहीं, बल्कि एक कारोबार भी बन चुका है।

फंड जुटाए जाते थे, दान लिया जाता था, विदेशों में अभियान चलाए जाते थे, युवाओं के नाम पर पैसा आता था, लेकिन उस पैसे का बड़ा हिस्सा ऊपर बैठे लोगों तक ही सीमित रहता था। जिन युवाओं को मैदान में भेजा जाता था, उनके हिस्से में केवल खतरा और मौत आती थी।

अफगानिस्तान और पाकिस्तान में बिताए समय के दौरान मुश्ताक को यह समझ आने लगा कि कश्मीर का मुद्दा कई लोगों के लिए राजनीतिक साधन बन चुका है। कश्मीर में जितना तनाव रहेगा, उतना ही यह मुद्दा जिंदा रहेगा। जितने ज्यादा युवा हथियार उठाएँगे, उतना ही यह नेटवर्क मजबूत रहेगा। इसलिए युवाओं को लगातार भावनात्मक रूप से प्रभावित किया जाता था।

उन्हें बताया जाता था कि वे किसी महान मिशन का हिस्सा हैं, लेकिन असलियत में वे एक ऐसे खेल का हिस्सा थे जिसमें उनका इस्तेमाल हो रहा था।

युवाओं का शोषण

मुश्ताक की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यही है, वे बार-बार कहते हैं कि सबसे ज्यादा नुकसान कश्मीरी युवाओं का हुआ। कई युवा पढ़ाई छोड़कर चले गए, कई कभी वापस नहीं लौटे, कई मारे गए, कई जेलों में पहुँचे और कई ऐसे थे जिन्हें यह तक समझ नहीं आया कि वे आखिर किसके लिए लड़ रहे हैं।

मुश्ताक मानते हैं कि वे खुद भी उसी दौर में बहक गए थे, लेकिन बाद में उन्होंने महसूस किया कि जिस रास्ते पर वे चल पड़े थे, उसका अंत केवल विनाश था। अफगानिस्तान के अनुभवों, कैंपों में देखे गए भ्रष्टाचार और लगातार दिखाई दे रहे विरोधाभासों ने मुश्ताक की सोच पूरी तरह बदल दी।

अब उन्हें समझ आने लगा था कि जिहाद के नाम पर बहुत कुछ ऐसा किया जा रहा है जिसका मजहब या इंसाफ से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने महसूस किया कि युवाओं को इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्हें मरने के लिए तैयार किया जा रहा है। और जो लोग उन्हें भेज रहे हैं, वे खुद कभी मैदान में नहीं उतरते।

यहीं से उन्होंने तय किया कि उन्हें इस रास्ते से बाहर निकलना है। मुश्ताक बताते हैं कि वापसी का फैसला आसान नहीं था, जो संगठन छोड़ना चाहता था, उस पर नजर रखी जाती थी। उसकी निष्ठा पर सवाल उठाए जाते थे, लेकिन उन्होंने तय कर लिया था कि वे अपनी बाकी जिंदगी इसी रास्ते पर नहीं बिताएँगे।

भारतीय सेना के साथ नई शुरुआत

वापसी के बाद उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा बदलाव आया, उन्होंने भारतीय सेना के साथ काम करना शुरू किया। यह एक असाधारण परिवर्तन था, जो व्यक्ति कभी सीमा पार जाकर प्रशिक्षण ले चुका था, वही बाद में आतंकवाद के खिलाफ अभियानों का हिस्सा बना। मुश्ताक बताते हैं कि भारतीय सेना ने उन पर भरोसा किया, उन्हें मौका दिया।

मुश्ताक के अनुसार, “जो मेरी आर्मी है इंडियन आर्मी यह पूरी वर्ल्ड की ऐसी आर्मी है जिसने कल के दहशतगर्द को अपनाया और इसको अपना बेस्ट दे दिया और उसने भी अपना बेस्ट दे दिया। यह बहुत बड़ी बात है मेरी आर्मी की, इंडियन आर्मी की कि दुनिया में कहीं भी आपको मिसाल नहीं मिलेगी।”

मुश्ताक ने करीब 31 वर्षों तक भारतीय सेना के साथ काम किया। उनका अनुभव उपयोगी साबित हुआ क्योंकि वे उस दुनिया को भीतर से जानते थे। उन्होंने देखा था कि आतंकवादी नेटवर्क कैसे काम करता है, कैसे युवाओं को फँसाया जाता है, कैसे प्रोपेगेंडा फैलाया जाता है और कैसे सीमा पार बैठे लोग कश्मीर को अपने हितों के लिए इस्तेमाल करते हैं।

प्रेम पत्र, कंडोम, हूरों के नाम पर कश्मीरी लड़कियों का शोषण

मुश्ताक के खुलासों में सबसे ज्यादा चर्चा उन घटनाओं की हुई जिनमें मारे गए आतंकियों की जेबों से प्रेम पत्र और कंडोम मिले। उनके अनुसार, यह उस नैरेटिव को चुनौती देता है जिसमें आतंकियों को केवल मजहबी योद्धा के रूप में पेश किया जाता है। उन्होंने दावा किया कि कई विदेशी आतंकी स्थानीय लड़कियों को प्रेम और शादी के झूठे वादों में फँसाते थे।

पॉडकास्ट में मुश्ताक ने कैमरे के सामने उन पुराने ‘लव लेटर्स’ के बंडल भी दिखाए, जो अलग-अलग ऑपरेशनों में मारे गए पाकिस्तानी आतंकियों की जेबों से निकले। अंग्रेजी, हिंदी और उर्दू में लिखे गए इन खतों में कहीं भी जिहाद या किसी मजहबी मकसद की बात नहीं दिखी, बल्कि उनमें कश्मीरी लड़कियों को प्रेम जाल में फँसाने और शादी के सपने दिखा कर प्रभाव में लेने वाली बातें होती थी।

कई खतों में लिखा था, “पापी से नहीं, पाप से नफरत करो…”, “मैं तुम्हारे अच्छे कैरेक्टर से प्यार करता हूँ…”। मुश्ताक का दावा था कि विदेशी आतंकी इसी तरह के झूठे प्रेम और भरोसे का माहौल बनाकर मासूम लड़कियों को अपने करीब लाने की कोशिश करते थे। मामला सिर्फ इन खतों तक सीमित नहीं था।

पूर्व कमांडर ने दावा किया कि कई मुठभेड़ों के दौरान मारे गए या पकड़े गए पाकिस्तानी आतंकियों के पास से कंडोम भी बरामद हुईं। जब उनसे पूछा जाता था कि अगर वे इस्लाम के नाम पर लड़ाई लड़ने आए हैं तो ऐसी चीजों की जरूरत क्यों पड़ी, तब वे जवाब देने के बजाय भड़क जाते थे। वे हूरों का ख्वाब लेकर आते थे और कश्मीरी लड़कियों का शोषण करते थे।

मुश्ताक के मुताबिक, दक्षिण कश्मीर के कुछ गाँवों में आज भी ऐसे परिवार मौजूद हैं जिनकी जिंदगी पाकिस्तानी आतंकियों के आने-जाने के बाद बदल गई। उनका कहना था कि कई विदेशी आतंकी स्थानीय घरों में शरण लेते थे और अस्थायी या छद्म शादियों के जरिए लड़कियों से रिश्ते बनाते थे।

यमरश और उरपोरा नागबल गाँवों का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि साजिद और आदिल पठान जैसे पाकिस्तानी आतंकियों ने स्थानीय लड़कियों से संबंध बनाए और बाद में मुठभेड़ों में मारे गए। पीछे रह गए बच्चे और वे महिलाएँ, जिन्हें समाज की नजरों और मुश्किलों के साथ आगे बढ़ना पड़ा।

सालों तक ‘शहादत’ और ‘जिहाद’ के नाम पर कश्मीर में हिंसा फैलाने वाले आतंकियों की वास्तविकता अब धीरे-धीरे सामने आ रही है।

कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद कोई मजहबी लड़ाई नहीं था, बल्कि एक ऐसा खेल था जिसमें युवाओं के हाथों में पत्थर और बंदूकें देकर बड़े कमांडरों और पाकिस्तानी आतंकियों ने अपने स्वार्थ पूरे किए। यह सच घाटी के उन युवाओं के लिए एक आईना है, जो आज भी पाकिस्तान के प्रभाव में आकर अपनी जिंदगी दांव पर लगा रहे हैं।

CCP के प्रोपेगेंडा को भारतीयों का जवाब, खोल दी चीनी ‘जाति व्यवस्था’ की पोल: जानें- कौन हैं ‘शि-नोंग-गोंग-शांग’ और हुकौ सिस्टम?

वर्षों तक चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने अपनी सामाजिक वास्तविकताओं को एक ‘सुरक्षा कवच’ के अंदर छिपा कर रखा था और भारत की सामाजिक संरचना और जाति व्यवस्था के बारे में नफरत फैलाता रहा। हालाँकि अब सोशल मीडिया पर भारतीय यूजर्स ने मीम्स के जरिए सीसीपी की चूलें हिला दी है। बहस मजेदार है और वह चीनी जातिवादी व्यवस्था को बताता है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स, इंस्टाग्राम हो या दूसरा प्लेटफॉर्म, सब पर भारतीय यूजर्स चीन के जमीनी हकीकत बता रहे हैं। कहीं मीम्स है तो कहीं वीडियो या व्यंग्यात्मक टिप्पणियाँ। इसके माध्यम से चीनी जाति व्यवस्था की पोल खोल रहे हैं। दरअसल भारतीय यूजर्स चीन के हाउसहोल्ड रजिस्ट्रेशन सिस्टम ‘हुकौ’ को जातिवाद से जोड़ रहे हैं।

भारत में विद्वानों के बीच चीनी जाति व्यवस्था और उसके आधुनिक ‘हुकौ’ स्वरूप पर चर्चा होती रहती है, लेकिन वास्तव में भारतीय लोग चीन की जाति व्यवस्था के केवल संशोधित रूप से ही परिचित हैं। लेकिन भारतीय सोशल मीडिया यूजर्स ने चीन की इस छुपी हुई सामाजिक सच्चाई को वैश्विक स्तर पर उजागर कर दिया है।

यह अभियान 11 जून 2026 के जोर पकड़ा। इसमें चीन के प्राचीन चार व्यवसायों यानी शि-नोंग-गोंग-शांग को एक वंशानुगत पदानुक्रम के रूप में और आधुनिक हुकोउ घरेलू पंजीकरण प्रणाली के भीतर संस्थागत भेदभाव को उजागर करने वाली पोस्ट शामिल थीं।

इससे पहले कि हम यह जानें कि भारतीय चीन की सामाजिक वास्तविकताओं को जानने के लिए उत्सुक क्यों हैं, चीन की जाति व्यवस्था के बारे में, ऐतिहासिक और आधुनिक दोनों पहलुओं को जानना महत्वपूर्ण है।

कई भारतीय यूजर्स चीन के सामाजिक ताने बाने की तुलना भारत की जाति व्यवस्था से करने लगे। उनका तर्क है कि चीन में एक ऐसा सिस्टम है, जो तय करता है कि आप किस घर में पैदा हुए हैं, उसी हिसाब से अवसर मिलेंगे।

‘चार व्यवसायों’ से लेकर ‘हुकौ’ सिस्टम तक

‘चार व्यवसायों’ की व्यवस्था झोऊ राजवंश से चली आ रही है, हालांकि इसे बाद के कालखंडों में औपचारिक रूप दिया गया। यह सम्राट के अधीन एक आदर्श सामाजिक पदानुक्रम था। इस व्यवस्था के तहत लोगों को चार श्रेणियों में विभाजित किया गया था।

सबसे ऊपर शि (士) जाति थी। इसमें विद्वान, कुलीन वर्ग, अधिकारी और समग्र शासक वर्ग शामिल थे।

शि के बाद नोंग (农) आते थे, जो किसान, कृषि उत्पादक और खाद्य उत्पादन करने वाले लोग थे। सैद्धांतिक रूप से सम्मानित होने के बावजूद, व्यवहार में उन्हें निम्न श्रेणी का माना जाता था।

तीसरे स्थान पर गोंग (工) था। इस श्रेणी में कारीगर और शिल्पकार शामिल थे।

सामाजिक पदानुक्रम में सबसे निचला स्तर शांग (商) समूह का था। इसमें व्यापारी और सौदागर शामिल थे। इन्हें लाभ-उन्मुख और कम महत्वपूर्ण माना जाता था।

कुछ काल में, जियानमिन या निम्न वर्ग की एक निचली श्रेणी होती थी। सम्राट इन सभी श्रेणियों से ऊपर होता था।

चीन के बाहर कई चीन समर्थक तत्वों और चीनी विद्वानों का तर्क है कि यह व्यवस्था भारत की वर्ण या जाति व्यवस्था के समान नहीं थी। उनका कहना है कि वर्ण व्यवस्था पूरी तरह से वंशानुगत या शुद्धता पर आधारित थी, जबकि ‘चार व्यवसाय’ व्यवस्था वंशानुगत होने की तुलना में अधिक व्यावसायिक थी।

हालाँकि वर्ण व्यवस्था भी अपने मूल वैदिक रूप में वंशानुगत या जन्म-निर्धारित नहीं थी। जहाँ चीन की ‘शि-नोंग-गोंग-शांग’ पदानुक्रम व्यवसाय पर आधारित थी, वहीं भारत की वर्ण व्यवस्था गुणों और कर्मों पर आधारित थी।

ब्राह्मणों में वैदिक पुजारी, विद्वान और शिक्षक शामिल थे, क्षत्रिय शासक वर्ग और योद्धा थे, वैश्य व्यापारी, किसान और सौदागर थे, और अंत में शूद्र सेवा प्रदाता थे। यह व्यवस्था मूलतः श्रम विभाजन और एक सामाजिक संगठन पर आधारित थी जिसमें व्यक्ति की योग्यता, गुण, कर्तव्य और रुचियां उनके वर्ण का निर्धारण करती थीं। ऐसा नहीं है कि इसे जन्मजात ही माना जाता था।

वर्ण व्यवस्था सैद्धांतिक रूप से लचीली थी और मूलतः व्यक्तिगत आचरण और योग्यता पर आधारित थी। कई प्रख्यात व्यक्ति योग्यता और आचरण के बल पर ब्राह्मण बने, जबकि कई मामलों में बुरे आचरण के कारण जाति और प्रतिष्ठा का नुकसान होता था। इनमें से कोई भी जन्म पर आधारित नहीं था।

यह निर्विवाद रूप से सत्य है कि बाद के कालखंडों में जाति व्यवस्था वंशानुगत हो गई। मूल व्यवस्था जन्म पर आधारित नहीं थी, चीन के चार व्यवसायों की तरह ही थी । सामाजिक पदानुक्रम केवल भारत तक ही सीमित नहीं हैं। कई देशों में धर्म या व्यवसाय पर आधारित पदानुक्रम हैं,जो या तो मूल रूप से कठोर और भेदभावपूर्ण थे या समय के साथ भ्रष्टाचार के कारण विकृत हो गए। हालाँकि केवल भारत के संदर्भ में ही सामाजिक पदानुक्रम और अपवर्जन को हिंदू संस्कृति और धर्म का सार बताने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

यह जानबूझकर हिंदू धर्म को बदनाम करने और यह धारणा स्थापित करने के लिए किया जाता है कि केवल हिंदू धर्म और संस्कृति ही भारतीय समाज और संस्कृति को परिभाषित करती है, जबकि भारत विविध धर्मों और संस्कृतियों का घर है, जिनकी अपनी अलग-अलग पदानुक्रम हैं।

इसके बावजूद, चीनी प्रचार का कारखाना भारतीय जाति व्यवस्था की सुविधाजनक नकारात्मक बातों को चुन-चुनकर पेश करता है, उन्हें अपने अतिरंजित आख्यानों के साथ मिलाकर भारत को एक सामंती, विभाजित और यहाँ तक ​​कि ‘हीन’ देश के रूप में चित्रित करता है। जबकि भारत काल्पनिक प्राचीन चीन और वर्तमान कम्युनिस्ट चीनी दोनों आदर्श लोक से बिल्कुल अलग है। यहाँ हर कोई ‘समान’ है।

हुकौं प्रणाली: चीन की वास्तविक जाति व्यवस्था

स्वतंत्र भारत ने कानूनों और सामाजिक सुधारों के माध्यम से जातिगत भेदभाव को समाप्त करने में काफी हद तक सफलता हासिल की है, जबकि कम्युनिस्ट चीन ने काफी सख्त हुकौं प्रणाली को अपनाया है।

हुकौं प्रणाली की उत्पत्ति युद्धरत राज्यों के काल (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व) से मानी जाती है। यह व्यवस्था भारत की वर्ण व्यवस्था और प्राचीन चीन की चार व्यवसायों की व्यवस्था से अलग है। हुकौं प्रणाली लोगों को जन्म-आधारित विशेषाधिकारों के आधार पर विभाजित करती है।

हुकौं एक पारिवारिक पंजीकरण व्यवस्था है, जिसे चीनी कम्युनिस्ट क्रांति के बाद 1958 में कड़ाई से लागू किया गया। इसके तहत सीसीपी ने हर चीनी नागरिक के लिए जन्म से ही हुकौं का दर्जा प्राप्त करना अनिवार्य कर दिया था।

यह लोगों को दो समूहों में विभाजित करता है: कृषि प्रधान (ग्रामीण) बनाम गैर-कृषि प्रधान या शहरी। यह एक विशिष्ट स्थान से भी जुड़ा हुआ है, जैसे स्थानीय या बाहरी। शहरी हुकौं को बेहतर सरकारी स्कूलों और कॉलेजों, रियायती स्वास्थ्य सेवाओं और आवास, पेंशन और सामाजिक कल्याण के साथ साथ सरकारी और स्थाई नौकरियाँ मिलती है। वे मूल रूप से एक विशेषाधिकार प्राप्त अल्पसंख्यक की तरह हैं।

बहुसंख्यक ग्रामीण हुकौं के सामने कई तरह की दिक्कतें आती हैं। कई मीडिया रिपोर्टों और अध्ययनों के अनुसार, जब ग्रामीण हुकू धारक काम के लिए शहरों में पलायन करते हैं, तो उन्हें आमतौर पर केवल अस्थायी निवास परमिट ही मिलते हैं। इन ग्रामीण हुकौं धारकों के बच्चे गाँवों में ही उपेक्षित रह जाते हैं और शहरी स्कूलों में अतिरिक्त फीस की समस्या का सामना करते हैं।

दरअसल, चीन जनवादी गणराज्य (सीसीपी) जिस सरकारी शिक्षा प्रणाली को चलाती है, वहाँ शहरी हुकौं को ही प्रवेश मिलता है। ग्रामीण हुकौं सामाजिक और आर्थिक रूप से अलग-थलग हैं। सार्वजनिक संसाधनों तक उनकी पहुँच बहुत कम है। इनके बच्चे जिन स्कूलों में पढ़ते हैं, वे ट्यूशन फीस पर निर्भर हैं, इनकी इमारतें जर्जर हैं और सुविधाओं और शिक्षा की गुणवत्ता के मामले में ये सरकारी स्कूलों के मुकाबले कहीं नहीं ठहरते।

पलायन करने के बाद शहरी विद्यालयों में भी प्रवेश न मिलने के कारण श्रमिक कभी-कभी अपने बच्चों को शिक्षा के लिए अकेले ही अपने ग्रामीण इलाके में वापस भेजने के लिए मजबूर हो जाते हैं। इससे पीढ़ी दर पीढ़ी शिक्षा का पिछड़ापन बना रहता है, जबकि शहरी हुकौं के शैक्षिक स्तर में पीढ़ी दर पीढ़ी सुधार हुआ है, चाहे वह स्कूली शिक्षा हो या उच्चस्तरीय शिक्षा।

चीन की राजधानी बीजिंग में पिछले एक दशक में कई ग्रामीण स्कूलों को बंद कर दिया गया या ध्वस्त कर दिया गया है। इससे ग्रामीण हुकौं शिक्षा में और भी पिछड़ गए।

प्रवासी ग्रामीण श्रमिकों के बच्चों के लिए मुख्यधारा के सरकारी स्कूलों में प्रवेश पाने का एकमात्र तरीका ‘5 परमिट’ प्रस्तुत करना है। इनमें श्रम अनुबंध और स्थानीय आवास का प्रमाण शामिल है। हालाँकि प्रवासी कामगारों के लिए शहरी हुकौं प्राप्त करना लगभग असंभव है। चूँकि अधिकांश प्रवासी कामगार अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में कार्यरत हैं और अनौपचारिक अपार्टमेंट में रहते हैं, इसलिए वे शहरी हुकू प्राप्त करने की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकते।

अपनी उल्लेखनीय पुस्तक ‘द अर्बनाइजेशन ऑफ पीपल’ में समाजशास्त्री एली फ्रीडमैन ने उल्लेख किया है कि अन्य क्षेत्रों में भेदभावपूर्ण प्रथाओं और सामाजिक स्थितियों के विपरीत चीनी हुकौं प्रणाली ‘पूरी तरह से राज्य द्वारा बनाई गई है, जो व्यवस्थित तरीके से लोगों के बीच विभाजन करती है।’

“हुकौं और शहरी ग्रामीण शैक्षिक असमानता: कौन पीछे छूट गए हैं?” शीर्षक वाले एक अध्ययन में जेयु झाओ ने शिक्षा क्षेत्र में ग्रामीण हुकौं द्वारा सामना की जाने वाली असमानताओं का विस्तार से वर्णन किया है।

अध्ययन में कहा गया है कि चीन की शिक्षा प्रणाली में शहरी-ग्रामीण असमानताएँ व्याप्त हैं, जिसका कारण हुकौं का शैक्षिक संसाधनों और अवसरों पर पड़ने वाला भेदभावपूर्ण प्रभाव है। कई शहरों में, स्थानीय हुकौं के बिना प्रवासी छात्रों को नौ वर्षीय अनिवार्य निःशुल्क शिक्षा से वंचित कर दिया जाता है। अधिकांश सरकारी स्कूलों को प्रवासी छात्रों के लिए कोई सरकारी निधि प्राप्त नहीं होती है। परिणामस्वरूप, प्रवासी छात्रों को या तो निजी संस्थानों में जाना पड़ता है या अपने हुकौं की स्थिति से जुड़े गाँव लौटना पड़ता है, जहाँ उन्हें निःशुल्क लेकिन बुनियादी स्तर की शिक्षा मिल सकती है।

प्रवासी श्रमिक कारखानों और निर्माण कार्यों में सबसे खतरनाक, गंदे और कम वेतन वाले काम करते हैं, इसलिए उन्हें समाज में निम्नतम दर्जे का माना जाता है। शहरी हुकू धारकों की तुलना में उन्हें समान काम के लिए कम वेतन मिलता है। नौकरी देने में भेदभाव का सामना करना पड़ता है और शहरी सुविधाओं तक उनकी पहुँच सीमित होती है। किसानों (नोंगमिन) और अन्य ग्रामीण हुकौं धारकों की भी यही स्थिति है।

चीन की हुकौं प्रणाली जन्म आधारित भेदभावपूर्ण जाति व्यवस्था के समान है, क्योंकि शहरी और ग्रामीण हुकू धारकों की आर्थिक स्थिति, सामाजिक प्रतिष्ठा और सार्वजनिक संसाधनों तक पहुँच में जन्म के आधार पर असमानता पाई जाती है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) ने एक ऐसी व्यवस्था बनाई है जिसने जनसंख्या के एक बड़े हिस्से को जन्म के आधार पर स्थायी गरीबी में धकेल दिया है।

स्पष्ट रूप से, चीन का समाजवाद-साम्यवाद केवल दिखावटी बातों तक ही सीमित है और सीसीपी ने न केवल माओ-पूर्व हुकोउ (हुजी) प्रणाली को अपनाया, जो मूल रूप से किसी व्यक्ति के निवास स्थान पर आधारित थी, बल्कि इसे जन्म-आधारित बनाकर और भी कठोर और भेदभावपूर्ण बना दिया, जिससे निवास की स्थिति वंशानुगत हो गई।

आर्थिक दृष्टि से, हुकू प्रणाली ने चीन को एक दोहरी अर्थव्यवस्था बनाने में मदद की, जिसमें अकुशल श्रमिकों का एक बड़ा हिस्सा शामिल था। जन्म-आधारित और संस्थागत रूप से स्थापित बहिष्करणकारी हुकू व्यवस्था के माध्यम से, सीसीपी ने सस्ते श्रम की प्रचुरता के बल पर सामाजिक स्थिरता और आर्थिक विकास हासिल किया, जिसकी उसे अपने सत्तावादी शासन को कायम रखने के लिए आवश्यकता थी।

दरअसल, शुरुआत में हुकू की विरासत पितृसत्तात्मक नहीं बल्कि मातृसत्तात्मक थी। नहीं, यह कोई प्रगतिशील कदम नहीं था; बल्कि, इतिहासकार प्रोफेसर ग्लेन पीटरसन ने इसे आर्थिक रूप से संपन्न पिताओं द्वारा अपनी संतानों को शहरी हुकू का दर्जा विरासत में देने के अवसर का उन्मूलन बताया।

पीटरसन ने अपनी पुस्तक ‘ द पावर ऑफ वर्ड्स: लिटरेसी एंड रिवोल्यूशन इन साउथ चाइना, 1949-95’ में लिखा है कि माता के माध्यम से हुकू का दर्जा प्रदान करके, आर्थिक रूप से संपन्न पिताओं को छुटकारा दिलाया गया। उन्हें अपनी संतानों को शहरी हुकू का दर्जा विरासत में देने का अवसर समाप्त कर दिया गया था। … हुकू पर नियंत्रण से राज्य की और से दी जाने वाली सेवाओं – शिक्षा, भोजन, आवास, रोजगार, उपभोक्ता उत्पाद और दूसरे लाभों को कुछ लोगों तक सीमित कर दिया गया है। इसके अलावा, 1959-61 के भीषण अकाल के बाद चीन ने भूमि से कानूनी और स्थायी रूप से बंधे किसानों को देश की अनिश्चित खाद्य आपूर्ति की गारंटी के लिए भी एक साधन की तरह इस्तेमाल किया।

हुकौं वंशानुक्रम को पितृवंशीय बनाने का निर्णय 1998 में लिया गया था।

सैम नन स्कूल ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स के प्रोफेसर डॉ. फी-लिंग वांग ने अपनी चर्चित कृति, ऑर्गेनाइजिंग थ्रू डिवीजन एंड एक्सक्लूजन: चाइनाज हुको सिस्टम (2005) में हुको को ‘जनसंख्या को छोटे-छोटे खंडों में विभाजित कर उसपर नियंत्रण उपाय’ के रूप में वर्णित किया है।

वांग ने लिखा है कि चीन की शाही हुकू प्रणाली एक तरह से संस्थागत बहिष्कार का काम करती थी। स्थान-आधारित जनसंख्या की गतिहीनता के अलावा, विभिन्न कुलीन कुलों, आम लोगों (मुख्य रूप से किसानों) और विभिन्न निम्न-वर्गीय कुलों (दास, खानाबदोश, अछूत जैसे कि कंगाल या वेश्याएं) का वंशानुगत हुकू वर्गीकरण हमेशा बना रहा। अंतिम दो राजवंशों (मिंग और किंग) में, कानूनी रूप से समान आम लोगों को चार वंशानुगत हुकू श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया था।

सैनिक, किसान, व्यापारी और हस्तशिल्प श्रमिक- ये चार भाग थे। उनकी कानूनी स्थिति समान थी, लेकिन कर भार और शाही परीक्षाओं में भाग लेने के अधिकार के साथ-साथ आवागमन के अधिकार के संबंध में उनके साथ अक्सर अलग-अलग व्यवहार किया जाता था। निम्न-वर्गीय कुलों की कई श्रेणियों को और भी बहिष्कृत किया गया था। … हालांकि, वर्तमान पीआरसी हुकू प्रणाली के विपरीत, शाही हुकू प्रणाली ने औपचारिक रूप से अधिकांश आबादी को नहीं, बल्कि मुख्य रूप से सामाजिक रूप से अवांछनीय अल्पसंख्यक या हाशिए के समूहों को बहिष्कृत किया था।”

चीन जनवादी गणराज्य ने जिस जन्म आधारित हुकू प्रणाली को अपनाना और उसे कायम रखा, वह पारंपरिक चीनी विद्वान गुओ टिंगलिन की सलाह पर आधारित है। उन्होंने कहा था, “जब जनता गाँवों में रहती है, तो व्यवस्था बनी रहती है; जब जनता शहरों में उमड़ती है, तो अव्यवस्था फैल जाती है।”

पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना में हुकू शासन व्यवस्था असल में एक जातिगत या रंगभेद जैसी व्यवस्था है, जो ‘दो चीन’ का निर्माण करती है।

हुकौं प्रणाली आज भी चीन में प्रचलित है और इसमें कई सुधार हुए हैं। हालाँकि सुधारों के बावजूद मूलभूत विभाजन अभी भी बना हुआ है। आय, शिक्षा और अवसरों में शहरी-ग्रामीण अंतर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। श्रम बाजारों में भेदभाव और पूर्वाग्रही सामाजिक दृष्टिकोण अभी भी सर्वविदित है।

कई अध्ययनों से पता चलता है कि माओ युग की हुकौं नीति ने किसानों को शहरों की जरूरतों को पूरा करने और चीन के औद्योगीकरण के लिए धन जुटाने के लिए एक ही स्थान पर बाँधकर रखा था। ग्रेट लीप फॉरवर्ड और सामूहिकीकरण ने ग्रामीण चीन को और भी अधिक तबाह कर दिया।

दरअसल, सांस्कृतिक क्रांति (1966-76) के दौरान, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने ‘वर्ग प्रणाली’ के माध्यम से वंशानुगत भेदभाव को संस्थागत रूप दिया। परिवारों को उनकी क्रांति-पूर्व संपत्ति या राजनीतिक स्थिति के आधार पर वर्गीकृत किया गया था। जिन्हें ‘वर्ग शत्रु’ घोषित किया गया था, उनका सामाजिक और राजनीतिक महत्व खत्म होने का असर उनके बच्चों पर पड़ा।

चाहे वह सांस्कृतिक क्रांति के दौरान कलंकित “पांच काली श्रेणियां” और सीसीपी-समर्थित “पांच लाल श्रेणियां” हों या हुकू प्रणाली, चीन का अपने ही लोगों के खिलाफ भेदभाव का एक निंदनीय इतिहास रहा है, चाहे वह राजनीतिक विचारों के आधार पर हो या जन्म के आधार पर।

यदि जाति शब्द का प्रयोग चीन की जन्म आधारित भेदभावपूर्ण व्यवस्था के संदर्भ में न किया जाए तो यह बौद्धिक बेईमानी होगी। जाति कोई भारतीय शब्द नहीं है; इसकी उत्पत्ति स्पेनिश और पुर्तगाली शब्द ‘कास्टा’ से हुई है, जिसका अर्थ है ‘नस्ल, वंश, प्रजाति या प्रकार’। स्वयं ‘कास्टा’ शब्द लैटिन शब्द ‘कास्टस’ से आया है, जिसका अर्थ है ‘शुद्ध’। इस शब्द की यूरोपीय उत्पत्ति और जन्म/वंश आधारित शुद्धता यह दर्शाती है कि जाति व्यवस्था किसी न किसी रूप में यूरोप में भी विद्यमान थी। हालाँकि, आधुनिक काल में ‘जाति’ शब्द का इस्तेमाल विशेष रूप से हिंदुओं की जाति व्यवस्था के संदर्भ में ही किया गया है।

भारतीयों ने व्यंग्यात्मक लहजे में ‘चीनी जाति व्यवस्था’ की आलोचना की, वहीं सीसीपी ने इसके काट के लिए अपने मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स का इस्तेमाल किया।

पिछले कुछ दिनों में, भारतीय नेटिजन्स ने चीन के ऐतिहासिक और प्रचलित सामाजिक पदानुक्रमों और संबंधित भेदभाव पर वीडियो, मीम्स और व्यंग्यात्मक टिप्पणियों के साथ सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर टाइमलाइन पर अपना दबदबा बनाए रखा है।

जैसे ही भारतीयों ने चीन में जन्म के आधार पर मौजूद शहरी-ग्रामीण खाई को उजागर किया, भारत विरोधी दुष्प्रचार फैलाने के लिए कुख्यात सीसीपी के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने ‘भारतीय नेटिजन्स का आरोप है कि चीन में ‘जाति व्यवस्था’ है’ शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया।

ग्लोबल टाइम्स ने भारतीय प्रतिक्रिया को ‘हास्यास्पद’, ‘चीनी ऐतिहासिक संस्कृति को नहीं जाननेवाले, जैसे आरोप लगाते हुए चीनी ‘विशेषज्ञों’ का हवाला देकर खारिज करने की कोशिश की।

ऐसा लगता है कि अब चीन की सत्ताधारी एजेंसियों के साथ-साथ आम भारतीयों ने भी चीन की उस सुनियोजित वैश्विक छवि को धूमिल कर दिया है, जिसमें चीन को एक सामंजस्यपूर्ण और योग्यता-आधारित साम्यवादी समाज दिखलाया जाता था। भारतीय नेटिजन्स ने ‘चीनी जाति व्यवस्था’ पर कई पोस्ट डाली। इसमें चीन की जन्म-आधारित पदानुक्रम प्रणाली को उजागर किया गया, लेकिन ग्लोबल टाइम्स भारतीय व्यंग्य को समझने में विफल रहा।

कई वर्षों तक, चीनी सरकारी मीडिया बॉट्स और इन्फ्लुएंसर्स ने भारत, भारतीयों और भारतीय समाज के बारे में अधूरी सच्चाई, झूठा दुष्प्रचार किया। बांग्लादेश और पाकिस्तान के अनहेल्दी स्ट्रीट फूड के वीडियो को X, फेसबुक, इंस्टाग्राम और टिकटॉक पर भारतीय बताकर प्रसारित किया, जाति व्यवस्था को अपने तरीके से उठाया। यहाँ तक कि सीसीपी बॉट्स ने ऑनलाइन भारतीयों के खिलाफ नफरत फैलाई।

हालाँकि भारतीय सोशल मीडिया यूजर्स ने स्थिति को पूरी तरह पलट दिया। जहाँ एक ओर जाति व्यवस्था को लेकर लगाए गए आरोपों का खंडन करने के लिए चीन की मुखपत्र और सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रही है, वहीं दूसरी ओर चीन में ऐतिहासिक मुद्दों को उठाकर उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का खेल खेला जा रहा है।

भारत में चल रहे सोशल मीडिया अभियान और चीन की प्रतिक्रिया में ‘जाति’ एक प्रमुख शब्द बन गया है, लेकिन यह सिर्फ जाति या भेदभाव तक सीमित नहीं है। भारतीय सोशल मीडिया यूजर्स ने ‘फायरवॉल’ को तोड़ते हुए ऐसे फोटो या वीडियो शेयर किए, जिससे समाज के विभाजन का पता चलता है। चाहे वह गरीबी से जुड़ी वीडियो हों, प्रवासियों की कहानियाँ हों या इसी तरह की जमीनी कहानियाँ हों। यह हास्यास्पद है कि चीन की सरकार भारतीय इंटरनेट यूजर्स से घबरा रही हैं, जो चीन के दुष्प्रचार का जवाब दे रहे हैं। प्रतिदिन 2.5 जीबी इंटरनेट का उपयोग करने वाले भारतीय इंटरनेट यूजर्स दुनिया को चीन की चाल, चरित्र और चेहरे से अवगत करा रही है।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

‘शांति की रक्षा के लिए सामर्थ्य भी जरूरी’: PM मोदी ने कोलकाता में नौसेना को सौंपे 3 ‘मेड इन इंडिया’ युद्धपोत, पढ़ें- कैसे गेमचेंजर होंगे ‘INS अग्रय, दूनागिरी और संशोधक’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार (21 जून 2026)  को कोलकाता में आयोजित एक विशेष समारोह में भारतीय नौसेना को तीन अत्याधुनिक स्वदेशी जंगी जहाज INS दुनागिरी, INS अग्रय और INS संशोधक समर्पित किए हैं। ये तीनों पोत पूरी तरह भारत में डिजाइन और निर्मित किए गए हैं और इन्हें नौसेना के बेड़े में शामिल किया जाना ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान की एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

इन जंगी जहाजों की खास बात यह है कि तीनों अलग-अलग भूमिकाओं के लिए तैयार किए गए हैं। एक समुद्री युद्ध के लिए, दूसरा पनडुब्बियों से मुकाबले के लिए और तीसरा समुद्र की गहराई तथा समुद्री क्षेत्रों के सर्वेक्षण के लिए बनाया गया है। ऐसे में इनका एक साथ नौसेना में शामिल होना भारतीय नौसेना की ऑपरेशनल क्षमता को कई गुना बढ़ाने वाला कदम माना जा रहा है।

पीएम मोदी ने क्या कहा?

कार्यक्रम के दौरान PM मोदी ने कहा, “दुनिया गवाह है कि मैरीटाइम क्षमता के बिना कोई भी राष्ट्र बड़ी शक्ति नहीं बन सकता। समुद्र से विकास जुड़ा है, सुरक्षा जुड़ी है, समृद्धि जुड़ी है।” साथ ही उन्होंने कहा कि आने वाले समय में, क्रिटिकल मिनरल्स, डीप-सी रिसोर्सेज और नई ऊर्जा के स्रोत भी समुद्र से ही जुड़ेंगे।

उन्होंने कहा, “जिस देश का समुद्री सामर्थ्य मजबूत होगा, उसका आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव भी उतना ही मजबूत होगा। और भारत इस वास्तविकता को अच्छी तरह से समझता है। भारत इसके लिए स्वयं को तैयार कर रहा है।”

पीएम मोदी ने कहा, “आज INS अग्रय, INS दूनागिरी और INS संशोधक उसी यात्रा को नई गति दे रहे हैं। ये तीनों पोत, भारत के तीन महत्वपूर्ण संकल्पों के भी प्रतीक हैं। इनका निर्माण भारत में हुआ है। इनकी डिजाइन भारत में तैयार हुई है। इनके निर्माण में भारतीय उद्योगों की प्रतिभा लगी है। भारतीय इंजीनियरों का कौशल लगा है। भारतीय श्रमिकों का परिश्रम लगा है। और यही नए भारत की सबसे बड़ी ताकत है।”

उन्होंने कहा, “भारत निर्माता बनना चाहता है और जिस दिन निर्माता होंगे ना, उस दिन हम निर्णायक भी होंगे। बीते वर्षों में 40 से अधिक ‘मेड इन इंडिया’ युद्धपोत और पनडुब्बियाँ नौसेना में शामिल हुई हैं। यानी लगभग हर कुछ सप्ताह में भारतीय नौसेना को एक नई शक्ति मिली है। वर्तमान में भी 45 बड़े नौसैनिक प्लेटफॉर्म निर्माणाधीन हैं। यह केवल संख्या नहीं है।”

साथ ही उन्होंने कहा, “अब समय आ गया है कि भारत समुद्री शक्ति के अगले चरण में प्रवेश करे। इसलिए भारत ने शिपबिल्डिंग के क्षेत्र के लिए एक नई दृष्टि के साथ आगे बढ़ना शुरू किया है। हाल के वर्षों में अनेक पॉलिसी रिफॉर्म्स किए गए हैं। घरेलू निर्माण क्षमता बढ़ाने के लिए विशेष कदम उठाए गए हैं। शिपिंग सेक्टर के लिए 70 हजार करोड़ रुपए का प्रोत्साहन पैकेज घोषित किया गया है।”

PM मोदी ने कहा, “भारत ने हमेशा से समुद्र को सहयोग का माध्यम माना है। लेकिन भारत ये भी जानता है कि शांति की रक्षा के लिए सामर्थ्य भी उतना ही आवश्यक है। समृद्धि की रक्षा के लिए सुरक्षा आवश्यक है। और भविष्य के निर्माण के लिए आत्मनिर्भरता अनिवार्य है।”

उन्होंने कहा, “आज INS अग्रय, INS दूनागिरी और INS संशोधक इसी भावना के प्रतीक बनकर भारतीय नौसेना में शामिल हुए हैं। ये उस भारत के प्रतीक हैं जो 21वीं सदी में अपने सामर्थ्य को पहचान रहा है, जो अपनी क्षमताओं पर विश्वास कर रहा है, और जो दुनिया के सामने नए आत्मविश्वास के साथ तेज गति से ऊर्जा से भरे हुए संकल्प के साथ निरंतर आगे बढ़ रहा है।”

क्या है इस कमीशनिंग समारोह का महत्व?

कार्यक्रम का आयोजन कोलकाता के श्यामा प्रसाद मुखर्जी पोर्ट पर किया गया। भारतीय नौसेना के अनुसार यह केवल तीन जहाजों की कमीशनिंग नहीं, बल्कि भारत के बढ़ते स्वदेशी रक्षा निर्माण और नौ सैनिक आधुनिकीकरण का प्रतीक है।

इन जहाजों को भारतीय नौसेना के वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो ने डिजाइन किया है, जबकि इनका निर्माण गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE), कोलकाता ने किया है। तीनों पोतों में 75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी मटेरियल का इस्तेमाल किया गया है, जिससे भारत की रक्षा उत्पादन क्षमता का प्रदर्शन भी होता है।

INS दुनागिरी: दुश्मन को चकमा देने वाला स्टील्थ जंगी जहाज

INS दुनागिरी प्रोजेक्ट-17A के तहत तैयार किया गया पाँचवाँ स्टील्थ फ्रिगेट है। स्टील्थ तकनीक के कारण इसे दुश्मन के रडार पर पहचानना बेहद मुश्किल होता है। यही वजह है कि इसे भारतीय नौसेना के सबसे आधुनिक जंगी जहाजों में गिना जा रहा है।

इस जंगी जहाज में कई उन्नत हथियार और सेंसर लगाए गए हैं। इसकी सबसे बड़ी ताकत ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है, जो दुनिया की सबसे तेज ऑपरेशनल मिसाइलों में शामिल है। इसके अलावा इसमें मध्यम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली भी लगी है।

दुनागिरी सतही युद्ध, वायु रक्षा और पनडुब्बी रोधी अभियानों को एक साथ अंजाम देने में सक्षम है। नौसेना को उम्मीद है कि इसके शामिल होने से समुद्र में भारत की मारक क्षमता और रणनीतिक बढ़त और मजबूत होगी।

INS अग्रय: पनडुब्बियों का काल बनेगा यह जंगी जहाज

INS अग्रय अर्नाला श्रेणी का एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट है। इसका मुख्य उद्देश्य दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाना, उनकी निगरानी करना और जरूरत पड़ने पर उन्हें नष्ट करना है।

आज के दौर में पनडुब्बियाँ किसी भी देश की नौसेना के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक मानी जाती हैं। ऐसे में अग्रय भारतीय तटीय सुरक्षा को नई मजबूती देगा।

इस जंगी जहाज में हल्के टॉरपीडो, स्वदेशी रॉकेट लॉन्चर और आधुनिक सोनार प्रणाली लगाई गई है। सोनार तकनीक समुद्र के भीतर छिपी पनडुब्बियों का पता लगाने में मदद करती है। उथले (shallow) समुद्री इलाकों में यह जहाज विशेष रूप से प्रभावी माना जाता है।

भारतीय नौसेना के लिए यह जहाज इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह तटीय क्षेत्रों, बंदरगाहों और रणनीतिक समुद्री मार्गों को सुरक्षित रखने में बड़ी भूमिका निभाएगा।

INS संशोधक: समुद्र की गहराइयों का वैज्ञानिक प्रहरी

INS संशोधक एक बड़ा सर्वेक्षण पोत है, जिसे समुद्र की गहराई, समुद्री मार्गों और समुद्र के नीचे की भौगोलिक संरचना का अध्ययन करने के लिए बनाया गया है।

यह जहाज तटीय क्षेत्रों के साथ-साथ गहरे समुद्र में भी सर्वेक्षण करने में सक्षम है। नौसेना के लिए ऐसे सर्वेक्षण बेहद महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि इनके आधार पर समुद्री नक्शे तैयार किए जाते हैं और नौसैनिक अभियानों की योजना बनाई जाती है।

संशोधक में ऑटोनॉमस अंडरवाटर व्हीकल (AUV) और रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल (ROV) जैसी आधुनिक तकनीकें मौजूद हैं। इनकी मदद से समुद्र के भीतर जाकर विस्तृत जानकारी जुटाई जा सकती है।

यह जहाज केवल रक्षा क्षेत्र ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक अनुसंधान, बंदरगाह विकास और नागरिक परियोजनाओं में भी महत्वपूर्ण योगदान देगा।

तीनों जहाज क्यों हैं भारत के लिए खास?

INS दुनागिरी, अग्रय और संशोधक तीन अलग-अलग जरूरतों को पूरा करते हैं। दुनागिरी युद्धक क्षमता बढ़ाएगा, अग्रय पनडुब्बी खतरों से सुरक्षा देगा और संशोधक समुद्री जानकारी जुटाने का काम करेगा। यानी एक ही दिन भारतीय नौसेना को युद्ध, सुरक्षा और सर्वेक्षण तीनों क्षेत्रों में नई ताकत मिलने जा रही है। यही कारण है कि इसे भारतीय नौसेना के आधुनिकीकरण का बड़ा कदम मान रहे हैं।

200 से ज्यादा MSME ने निभाई भूमिका

INS दुनागिरी, अग्रय और संशोधक के निर्माण में देशभर के 200 से अधिक छोटे से छोटे और मध्यम उद्यमों (MSME) ने योगदान दिया है। इससे हजारों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिला।

रक्षा उत्पादन में निजी कंपनियों और छोटे उद्योगों की भागीदारी बढ़ने से भारत का रक्षा क्षेत्र पहले की तुलना में अधिक आत्मनिर्भर बन रहा है। यही वजह है कि इन जंगी जहाजों को केवल सैन्य उपलब्धि नहीं बल्कि औद्योगिक सफलता के रूप में भी देखा जा रहा है।

हिंद महासागर में और मजबूत होगी भारत की मौजूदगी

पिछले कुछ सालों में भारत लगातार अपनी समुद्री शक्ति बढ़ाने पर जोर दे रहा है। हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती रणनीतिक चुनौतियों और जियोपॉलिटिकल कॉम्पिटिशन को देखते हुए नौसेना आधुनिक जहाजों और हथियार प्रणालियों को तेजी से अपने बेड़े में शामिल कर रही है।

INS दुनागिरी, INS अग्रय और INS संशोधक की कमीशनिंग इसी रणनीति का हिस्सा है। इनके शामिल होने से भारतीय नौसेना की ऑपरेशनल क्षमता बढ़ेगी, समुद्री निगरानी बेहतर होगी और तटीय सुरक्षा को नई मजबूती मिलेगी।

आत्मनिर्भर भारत की बड़ी सफलता

इन तीनों युद्धपोतों का नौसेना में शामिल होना ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान की एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। 75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री, भारतीय डिजाइन और भारतीय शिपयार्ड में निर्माण यह साबित करता है कि भारत अब रक्षा क्षेत्र में केवल खरीदार नहीं बल्कि निर्माता के रूप में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है।

नौसेना, सरकार, सार्वजनिक क्षेत्र के शिपयार्ड, निजी उद्योग और MSME के संयुक्त प्रयासों से तैयार ये तीनों जंगी जहाज भारत की बढ़ती तकनीकी क्षमता और समुद्री शक्ति का प्रतीक बन चुके हैं। आने वाले सालों में ये जहाज भारतीय नौसेना को और अधिक सक्षम, आधुनिक और आत्मनिर्भर बनाने में अहम भूमिका निभाएँगे।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026: केवल आसन नहीं, आधुनिक जीवन की बिखरती कड़ियों को जोड़ने का भारतीय सूत्र है योग

दिनचर्या के स्तर पर आए बदलाव, भोजन में परिवर्तन, शारीरिक गतिविधियों में बदलाव और जीवन में स्क्रीन टाइम का बढ़ता प्रभाव, ये कुछ ऐसे परिवर्तन हैं, जो पिछले एक दशक में बहुत तेजी से सामने आए हैं। इससे जहाँ मनुष्य को अनेक क्षेत्रों में लाभ हुआ है, वहीं जीवन में अनेक विकृतियाँ भी उत्पन्न हुई हैं।

एक तरफ तकनीकी प्रगति हुई है, आर्थिक अवसरों में वृद्धि हुई है, कौशल विकास, वैश्विक संपर्क, उद्यमिता और अनेक क्षेत्रों में विकास हुआ है। वहीं दूसरी ओर शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव, सामाजिक संबंधों में दूरी, कार्य और जीवन के संतुलन का बिगड़ना, कई बार पहचान का संकट, मोटापा (Obesity), एंग्जायटी (Anxiety) और डिप्रेशन (Depression) जैसी समस्याएँ भी तेजी से बढ़ी हैं। आज ये सब लगभग सामान्य बातें बनती जा रही हैं।

एक तरफ सब कुछ प्राप्त करने की दौड़ है, तो दूसरी तरफ उसी दौड़ में शामिल होने के दुष्परिणाम भी हैं। ऐसे युग में कुछ तो ऐसा चाहिए, जहाँ मनुष्य अपने मूल से जुड़ा रहे, अपनी जड़ों से स्वयं को जोड़े रखे। ऐसा संतुलन चाहिए, जिससे जीवन में ऊर्जा और समय का सुंदर समन्वय बना रहे।

ऐसी खोज में जब हम निकलते हैं, तो हमें इसका उत्तर अपनी ही परंपरा में मिलता है। वर्षों पहले हमारे ही हिंदू संतों, ऋषियों और मुनियों ने हमें योग का अमूल्य उपहार दिया। यही योग हर प्रश्न का उत्तर है और यही योग हर समस्या का समाधान है।

योग, जिसकी परंपरा वैदिक काल, सिंधु सभ्यता के प्रोटो-शिव (सिंधु सभ्यता की पशुपति मुहर), श्रीमद्भगवद्गीता, बौद्ध एवं जैन परंपराओं से होती हुई महर्षि पतंजलि तथा अनेक योग परंपराओं और पद्धतियों तक विकसित हुई, आज भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ मानव जीवन का मार्गदर्शन कर रहा है। 

जहाँ एक ओर स्वामी विवेकानन्द ने 19वीं शताब्दी में इस परंपरा का विश्व से परिचय कराया, वहीं 21वीं शताब्दी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का प्रस्ताव रखकर योग को विश्व के हर कोने तक पहुँचाने का प्रयास किया। आज 21 जून मात्र एक साधारण तिथि नहीं रह गई है, बल्कि वह दिन बन गया है जब सनातन धर्म रूपी वटवृक्ष से निकले अद्भुत फल योग को सम्पूर्ण विश्व हर्षोल्लास के साथ अपनाता और मनाता है।

इस वर्ष विश्व 12वाँ अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाएगा। भारत ने इस वर्ष की थीम “Yoga for Healthy Ageing” रखी है। वैसे भी योग प्रत्येक आयु वर्ग के लिए समान रूप से लाभदायक है। इस वर्ष का मुख्य कार्यक्रम भी कोलकाता शहर में आयोजित होगा। लंबे समय तक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का केंद्र रहे बंगाल की धरती से योग का यह शंखनाद भारत के साथ-साथ सम्पूर्ण विश्व में भारतीयता की इस महान परंपरा का संदेश देगा।

श्री रामकृष्ण परमहंस, माँ शारदा, स्वामी विवेकानन्द, महर्षि अरविन्द, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस तथा अनेक योगियों, संतों, क्रांतिकारियों और महर्षियों की यह पावन भूमि इस ऐतिहासिक अवसर की साक्षी बनेगी।

स्वामी विवेकानन्द का वह उद्घोष, “उठो भारत! अपनी आध्यात्मिकता के बल पर सम्पूर्ण विश्व को जीत लो।”,आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। 

विवेकानन्द केन्द्र, कन्याकुमारी ने भी योग को एक नवीन आयाम से देखते हुए उसके मूल अर्थ जोड़ने पर विशेष बल दिया है, जहाँ व्यक्ति को समाज से जोड़ने की बात कही जाती है। आज के समय में इसकी प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। एक ओर भागदौड़ भरी जीवनशैली, शहरीकरण, गाँवों और छोटे शहरों से महानगरों की ओर पलायन, संकरे फ्लैटों का जीवन और अनजान वातावरण, इन सबने व्यक्ति को भीड़ के बीच भी अकेला कर दिया है। लोग लाखों की संख्या में साथ रहते हैं, फिर भी अपनापन कहीं खो रहा है।

ऐसे वातावरण में व्यक्ति मानसिक शांति, आत्मीय संबंधों और अपनेपन की तलाश में जुटा है। ऐसे समय में व्यक्ति को समाज से जोड़ने का प्रयास अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। योग के माध्यम से जहाँ आसन, प्राणायाम, सूर्यनमस्कार और विभिन्न क्रियाओं से शारीरिक एवं मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं, वहीं उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि व्यक्ति समाज से जुड़ता है। योग से जुड़ना केवल अपने शरीर या स्वास्थ्य से जुड़ना नहीं है, बल्कि अपने आप से, अपने परिवार से, अपने समाज से, अपने राष्ट्र से और अंततः सम्पूर्ण विश्व के कल्याण से जुड़ना है। यही वह संदेश है, जिसे भारत सदियों से सम्पूर्ण विश्व को देता आया है।

गौ सेवा से वन संरक्षण तक: भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल्यों को कानून के सहारे समझने की कोशिश

भारत में कानूनों को लेकर अक्सर यह धारणा रही है कि वे लोगों पर नियंत्रण और दंड के लिए बनाए जाते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में शासन में एक नया दृष्टिकोण उभरा है जिसमें कानून का मकसद केवल अपराधियों को सजा देना नहीं बल्कि आम नागरिकों के जीवन को अधिक आसान, न्यायपूर्ण और गरिमामय बनाना भी है।

इसी सोच का एक उदाहरण जन विश्वास (प्रावधानों का संशोधन) अधिनियम है, जिसे 2023 में लागू किया गया था। उस समय इस कानून को मुख्य रूप से व्यापार और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल बनाने वाले सुधार के रूप में देखा गया था लेकिन इसके प्रभावों को देखने पर साफ नजर आता है कि यह केवल आर्थिक सुधार तक सीमित नहीं था। इसने शासन और न्याय की उस सोच को भी बदलने का प्रयास किया है।

जन विश्वास (प्रावधानों का संशोधन) विधेयक, 42 केंद्रीय अधिनियमों के 183 प्रावधानों को अपराध की श्रेणी से बाहर करके भारत की विधिक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक बदलाव प्रदर्शित करता है। यह कानून में महज तकनीकी संशोधन भर नहीं बल्कि शासन व्यवस्था को अधिक मानवीय और व्यवहारिक बनाने की दिशा में उठाया गया एक सार्थक कदम भी था। इन संशोधनों में विशेष रूप से भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 26(1)(D) से जुड़ा परिवर्तन उल्लेखनीय है, जो वन भूमि में पशुओं को चराने से संबंधित है।

यह सुधार इस बात का उदाहरण है कि आधुनिक कानून किस प्रकार समाज की वास्तविक परिस्थितियों को समझते हुए निर्मित किए जा सकते हैं। यह उन प्राचीन भारतीय मूल्यों और सिद्धांतों की भी झलक देता है, जो भारतीय शास्त्रों में वर्णित हैं और जिनमें प्रकृति, पशु और मानव के बीच संतुलित संबंध पर बल दिया गया है।

अपराधीकरण के बजाय करुणा मूलक दृष्टिकोण 

जन विश्वास अधिनियम के तहत वन भूमि में अनजाने में पशु चराने वाले आदिवासियों और ग्रामीणों के लिए पहले से मौजूद जेल की सजा के प्रावधान को हटा दिया गया है और उसकी जगह ₹500 का एक साधारण जुर्माना रखा गया है। यह बदलाव इस समझ पर आधारित है कि ऐसे मामले अधिकतर जानबूझकर नहीं होते, बल्कि लोगों की पारंपरिक आजीविका और रोजमर्रा की जीवन-शैली से जुड़े होते हैं, जिनमें आपराधिक मंशा नहीं होती।

यह विधायी परिवर्तन एक मानवीय दृष्टिकोण को भी दर्शाता है। इसमें यह माना गया है कि समाज के हाशिए पर रहने वाले समुदायों, विशेषकर आदिवासियों और ग्रामीण परिवारों को छोटे और अनजाने में हुए कार्यों के लिए जेल भेजना उचित नहीं है। ऐसे मामलों में कठोर सजा देने के बजाय परिस्थिति को समझते हुए संतुलित और न्यायसंगत दंड देना ही अधिक न्यायपूर्ण और संवेदनशील व्यवस्था का संकेत है।

भारतीय संस्कृति का मूल: गौ सेवा और अहिंसा

यह सुधार भारतीय ज्ञान परंपरा में उद्धृत उन मूल्यों के साथ स्वाभाविक रूप से जुड़ा हुआ दिखाई देता है, जो मनुष्य, पशु और प्रकृति के बीच संतुलन और करुणा पर बल देते हैं। भगवद्गीता (18.44) में गौ-रक्षा (गो-रक्ष्य) और कृषि को वैश्य वर्ण का स्वाभाविक कर्तव्य बताया गया है। इसका आशय यह है कि समाज में पशुओं, विशेषकर गौ की देखभाल और पृथ्वी के साथ संतुलित जीवन को एक महत्वपूर्ण दायित्व माना गया है।

ऋग्वेद (6.28.1–8) में गौ को समृद्धि, पोषण और ईश्वरीय कृपा का प्रतीक बताया गया है, और उन्हें अघ्न्या अर्थात् ‘जिन्हें हानि नहीं पहुँचानी चाहिए’ कहा गया है। ऋग्वेद के अनुसार, ‘गौ का नाम पृथ्वी के समानार्थी है, क्योंकि वह दूर-दूर तक फैली हुई है और असंख्य जीव उस पर विचरण करते हैं।’ ऋग्वेद (1.154.6) यह विचार इस बात को भी स्पष्ट करता है कि गौ की रक्षा केवल एक पशु की रक्षा नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण प्रकृति और जीवन-व्यवस्था की रक्षा के समान मानी गई है।

जब पशुओं को चराने जैसे कार्य, जो अनेक जनजातीय और ग्रामीण परिवारों की आजीविका का मुख्य आधार है, को अपराध की श्रेणी से बाहर किया जाता है, तो यह सिर्फ कानून मे बदलाव मात्र न होकर करुणा और अहिंसा की भावना को व्यवहार में उतारने जैसा व्यावहारिक कदम है। जन विश्वास अधिनियम इस अर्थ में अहिंसा के सिद्धांत को केवल पशुओं तक सीमित नहीं रखता बल्कि मनुष्यों के प्रति भी लागू करता है। यह उन लोगों को अनावश्यक जेल जैसी कठोर सजा से बचाता है, जो पीढ़ियों से प्रकृति के साथ तालमेल रखते हुए अपनी पारंपरिक पशुपालन आधारित जीवन शैली का पालन करते आए हैं।

वन संरक्षण: हमारी पवित्र प्राकृतिक विरासत

भारतीय ज्ञान परंपरा में वनों को केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि अरण्यानी अर्थात् पवित्र और जीवनदायी स्थल के रूप में देखा गया है। तैत्तिरीय आरण्यक में वनों को ऋषियों और तपस्वियों का निवास स्थान बताया गया है, जहाँ लोग प्रकृति के बीच रहकर साधना करते थे और धर्म का पालन अपने सबसे शुद्ध रूप में करते थे। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारतीय परंपरा में वन केवल उपयोग की वस्तु नहीं, बल्कि सम्मान और संरक्षण के योग्य धरोहर हैं। इसी प्रकार अथर्ववेद (12.1.11–12) पृथ्वी को माता के रूप में वर्णित करता है और यह संदेश देता है कि उसके वनों और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करना मनुष्य का कर्तव्य है। यह दृष्टिकोण हमें प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी और संवेदनशीलता का भाव भी सिखाता है।

जन विश्वास संशोधन वन संरक्षण को कमजोर नहीं करता बल्कि उसे अधिक संतुलित और व्यवहारिक बनाता है। इसमें कठोर आपराधिक सजा के स्थान पर अनुपातिक दंड (उचित जुर्माना) की व्यवस्था की गई है, जिससे नियमों का पालन सुनिश्चित होता है, लेकिन छोटी और अनजानी गलतियों के लिए जेल जैसी कठोर सजा से बचा जा सकता है। यह दृष्टिकोण धर्म में वर्णित ‘दंड’ की उस अवधारणा से मेल खाता है, जिसमें सजा अपराध के अनुरूप और न्यायसंगत होनी चाहिए। इसी विचार को अर्थशास्त्र (3.1.39–40) में भी रेखांकित किया गया है, जहाँ कहा गया है कि दंड का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि व्यक्ति को सुधार की दिशा में ले जाना होना चाहिए।

धर्म सम्मत मूल्यों के साथ सरल और गरिमामय जीवन 

इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य ‘जीवन की सहजता’ (Ease of Living) और ‘व्यवसाय करने में सुगमता’ (Ease of Doing Business) को बढ़ावा देना है। इसका भाव उस वैदिक आदर्श सर्वलोक – हित से जुड़ा हुआ है, जिसका अर्थ है – सभी प्राणियों का कल्याण। जब छोटे और प्रक्रियात्मक उल्लंघनों के लिए जेल की सजा हटा दी जाती है, तो इससे न केवल न्याय प्रणाली पर बोझ कम होता है, बल्कि आम नागरिकों, विशेषकर कमजोर और ग्रामीण वर्गों, को बिना भय के जीवन जीने का अवसर भी मिलता है।

ईशोपनिषद के प्रथम मंत्र में ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा’ का संदेश दिया गया है, जिसका अर्थ है- ‘जो उपलब्ध है, उसका संयम और संतोष के साथ उपयोग करो।’ यह शिक्षा हमें संतुलित और संपोष्य जीवन जीने की प्रेरणा देती है, जहाँ प्रकृति के संसाधनों का उपयोग जिम्मेदारी के साथ किया जाता है। यह अधिनियम एक ऐसी व्यवस्था निर्मित करता है जो परंपरा, आजीविका और पर्यावरण संरक्षण – इन तीनों के मध्य एक संतुलित और व्यावहारिक दृष्टि स्थापति करती है।

निष्कर्ष: आधुनिक कानून में भारतीय मूल्यों की पुनर्प्रतिष्ठा 

जन विश्वास अधिनियम का संशोधन यह दर्शाता है कि आधुनिक शासन केवल नियम बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह समाज की परंपराओं, मूल्यों और वास्तविक जरूरतों को समझते हुए भी आगे बढ़ सकता है। अनजाने में होने वाले पशुपालन से जुड़े छोटे उल्लंघनों को अपराध की श्रेणी से बाहर करना, और साथ ही पर्यावरण की सुरक्षा को बनाए रखना, इस बात का संकेत है कि कानून संवेदनशील और संतुलित दोनों हो सकता है। यह परिवर्तन गौ सेवा, अहिंसा और न्याय जैसे भारतीय परंपरा के मूल सिद्धांतों के प्रति सम्मान को भी प्रकट करता है।

यह महज कानून की भाषा में बदलाव नहीं, बल्कि उन जनजातीय और ग्रामीण समुदायों के सम्मान और गरिमा को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिनका जीवन प्रकृति और पशुपालन से गहराई से जुड़ा रहा है। प्राचीन भारतीय मूल्यों और आज की आवश्यकताओं के बीच यह संतुलन ही वास्तविक अर्थों में ‘जन विश्वास’ को मजबूत करता है। एक ऐसी व्यवस्था जो परंपरा का सम्मान करते हुए प्रगति की दिशा में आगे बढ़ती है, वही भारत के विकास की वास्तविक मार्गदर्शिका हो सकती है।  

तुमसे ना हो पाएगा दिपके… तुम्हारे ‘लक्षण’ बिलकुल ठीक नहीं लग रहे ‘तिलचट्टों’

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के तिलचट्टों ने शनिवार (20 जून 2026) को राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक बार फिर धरना दिया। इस प्रदर्शन को लेकर CJP की तरफ से खूब माहौल बनाया गया था, पर सब बेअसर रहा। धरना स्थल पर जितने तिलचट्टे जुटे उससे ज्यादा तो पत्रकार और सुरक्षाकर्मी मौजूद थे। यानी CJP के फाउंडर अभिजीत दिपके, प्रदर्शन के नाम पर जो पटाखा फोड़ना चाहते थे, वो दूसरी बार भी फुस्स ही रहा।

अब भई, मरता क्या ना करता, तो अभिजीत दिपके भाई धमकी देने पर उतर आए हैं, लोगों को भड़काने पर उतर आएँ हैं। जिस दिल्ली पुलिस को शायद इस प्रदर्शन में शामिल लोगों की संख्या से अब फर्क भी ना पड़ रहा हो उसके नाम पर दिपके माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। बाकायदा वीडियो जारी कर रहे हैं कि दिल्ली पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने वाली है।

दिपके यहीं नहीं रुके, खुद को बड़का क्रांतिकारी समझ रहे दिपके लोगों से बोले की जेल भरो। अब भई तुम कोई गाँधी-जयप्रकाश-लोहिया थोड़े हो जो लोग तुम्हारी बात पर जेल भर देंगे। जो युवा तुम्हारे कहने पर घर से जंतर-मंतर तक नहीं आ रहे, तुम्हें लगता है कि वो तुम्हारे कहने पर जेल भर देंगे।

दिपके ने कहा, “मैं अभी जंतर-मंतर पर हूँ। पुलिस मुझे गिरफ्तार करने आ रही है। जितने भी इस देश के युवा इस वीडियो को देख रहे हैं। वो अपने-अपने जिलों में जेल भरो आंदोलन शुरू कर दीजिए। चाहे कुछ भी हो जाए, हमारा आंदोलन रुकना नहीं चाहिए। वो भी प्रदर्शन करेगा, वो शांतिपूर्ण तरीके से करेगा। मेरी आपसे गुजारिश हैं कि आप अब इस आंदोलन को आगे बढ़ाइए और शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ाइए।”

दो बार में प्रदर्शन में यह साफ नजर आ गया है कि अभिजीत दिपके का यह सारा आंदोलन बस सोशल मीडिया के उस 22 मिलियन नंबर तक ही सीमित है, जो केवल एक तुक्का लगता है। पहली बार के प्रदर्शन में कुछ लोग मजमा समझकर आ गए थे कि भई देखें क्या हो रहा है। लेकिन उनके हाथ भी कुछ नहीं आया, हाँ बस कुछ लोगों को सोशल मीडिया का कॉन्टेंट मिल गया।

शुरुआत खराब होने के बाद, दूसरी बार तुम्हें लगा होगा कि अब शायद कुछ हो जाए लेकिन इस बार तो लोगों ने पूरी तरह ही साफ कर दिया कि भाई तुम जाओ वापस अमेरिका। वहीं, अपनी धंधा-पानी कुछ हो तो देखो। यहाँ नेता गिरी के चक्कर में पड़ोगे तो कुछ समय बाद यही गाते मिलोगे कि ‘न खुदा ही मिला न विसाल-ए-सनम न इधर के हुए न उधर के हुए‘।

जितना तुम लोगों को भड़का रहे तो ये ध्यान रखना कि तुम्हारे आंदोलन की अर्थी को कंधा देने के लिए बेशक 4 लोग लगें लेकिन तुम्हें टाँगकर ले जाने के लिए दिल्ली पुलिस का एक जवान ही काफी होगा। और हाँ, अब जिन लोगों के दम पर तुम कूद रहे हो ना, वो तब केवल रीलबाजी ही करते रहेंगे और तुम अपना जीवन उनके चक्कर में बर्बाद कर लोगे।

अब दिपके भाई को शायद कोई यह भी बता दे कि सोशल मीडिया पर वायरल होना और जमीन पर राजनीतिक आंदोलन खड़ा करना दो बिल्कुल अलग चीजें हैं। मोबाइल स्क्रीन पर लाइक, शेयर और कमेंट जुटाना आसान है लेकिन तपती धूप में घंटों खड़े होकर किसी आंदोलन का हिस्सा बनना उतना आसान नहीं होता।

यही वजह है कि जिन लाखों-करोड़ों लोगों का समर्थन सोशल मीडिया पर दिखाई देता है, उनमें से मुट्ठीभर लोग भी जंतर-मंतर तक नहीं पहुँच पाए। यह अगर ऐसा ही चलता रहा है कि वो दिन दूर नहीं जब 2-4 लोग ढूँढे से ही तुम्हारे इस कथित आंदोलन के लिए नहीं मिलेंगे।

7 लोगों को उम्रकैद, लेकिन क्या सच में ‘गोरक्षा’ ही था मकसद? अदालत ने कहा- उद्देश्य नहीं हुआ साबित, मीडिया ने बनाई मनगढ़ंत कहानियाँ

मध्य प्रदेश की एक अतिरिक्त जिला एवं सत्र अदालत ने अगस्त 2022 में मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम जिले में हुई दंगा और हत्या की एक घटना में 7 लोगों को दोषी ठहराया। इस घटना में नजीर अहमद नाम के एक व्यक्ति की मौत हो गई थी जबकि कई अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।

12 जून 2026 को दिए गए फैसले में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश तबस्सुम खान ने 7 आरोपितों दीपक उर्फ बाबा केवट, अजय उर्फ अज्जू राठौर, प्रकाश कौशल, पवन बठाव, अमर उर्फ भोला बठाव, कन्हैया बठाव और बल्लू उर्फ अनुज रघुवंशी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302, 307, 148 सहपठित 149 के तहत दोषी ठहराया। कोर्ट ने सभी दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई।

हालाँकि, दोषियों को हत्या, हत्या के प्रयास और दंगा करने से जुड़े प्रावधानों के तहत सजा दी गई, लेकिन कुछ मीडिया संस्थानों ने केवल इसलिए इस मामले को ‘गौ-रक्षक हिंसा’ या ‘काउ विजिलेंटिज्म’ से जोड़कर पेश करना शुरू कर दिया क्योंकि घटना में शामिल ट्रक मवेशियों को लेकर जा रहा था।

कई मीडिया रिपोर्टों में दोषियों को ‘गौ रक्षक’ बताया गया जबकि कोर्ट के फैसले में कहीं भी इस शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है।

कुछ मीडिया रिपोर्टों में यह भी गलत दावा किया गया कि कोर्ट ने 14 लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई जबकि सत्र अदालत ने 7 लोगों को दोषी ठहराकर सजा दी थी।

कोर्ट की टिप्पणियों और फैसले पर आगे बढ़ने से पहले उस घटना को समझना जरूरी है, जिसके आधार पर यह मामला दर्ज किया गया था। फैसले में दर्ज जानकारी के अनुसार, यह घटना 3 अगस्त 2022 की आधी रात के आसपास मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम जिले के सिवनी मालवा थाना क्षेत्र के बराखड़ गाँव स्थित नंदरवाड़ा रोड पर हुई थी।

शिकायतकर्ता शेख लाला (ट्रक चालक) अपने साथियों नजीर अहमद और शेख मुश्ताक के साथ एक ट्रक में मवेशियों को लेकर यात्रा कर रहा था। यह ट्रक नंदरवाड़ा से निकलकर महाराष्ट्र के अमरावती की ओर जा रहा था।

घटना वाले दिन आधी रात के समय जब ट्रक बराखड़ गाँव के पास पहुँचा, तब उसमें सवार लोगों पर लाठियाँ लेकर आए 10 से 12 ग्रामीणों ने हमला कर दिया। हमलावरों ने शेख लाला, नजीर अहमद और शेख मुश्ताक की पिटाई की।

पुलिस मौके पर पहुँची और घायलों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) सिवनी मालवा पहुँचाया। शेख लाला और शेख मुश्ताक गंभीर रूप से घायल थे जबकि नजीर अहमद की अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई।

इसके बाद सिवनी मालवा थाने में 10-12 लोगों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 147, 148, 341, 307 और 302 के तहत FIR दर्ज की गई। बाद में 7 आरोपितों पर मुकदमा चला और उन्हें FIR में दर्ज कुछ अपराधों में दोषी ठहराया गया।

FIR में लगाए गए आरोपों के आधार पर कोर्ट ने अपराध तय करने के लिए कुल सात मुद्दे निर्धारित किए। इन सात मुद्दों में तीसरा मुद्दा खास था, जिसमें यह तय करना था कि क्या आरोपित ने हमला करने से पहले जानबूझकर पीड़ितों के ट्रक को रोका था। यह इस बात को समझने के लिए महत्वपूर्ण था कि क्या आरोपितों के पीछे कोई विशेष उद्देश्य या मकसद था।

फैसले का स्क्रीनशॉट

कोर्ट द्वारा तय किया गया प्रश्न था, “क्या उक्त दिनांक, समय और स्थान पर आरोपितों ने ट्रक नंबर MH-40-CD-8751 में यात्रा कर रहे शिकायतकर्ता शेख लाला, नजीर अहमद और शेख मुश्ताक का रास्ता रोककर उन्हें गलत तरीके से रोका था?”

दोनों पक्षों के तर्कों और प्रस्तुत साक्ष्यों की जाँच के बाद कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुँची कि आरोपितों के खिलाफ गलत तरीके से रास्ता रोकने का आरोप साबित नहीं किया जा सका।

दूसरे शब्दों में, कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि आरोपितों ने हमला करने से पहले जानबूझकर पीड़ितों के ट्रक को रोका था। ऐसे में किसी विशेष मकसद के अभाव में कुछ मीडिया संस्थानों द्वारा इस घटना को गौ-रक्षक हिंसा से जोड़कर पेश करने के दावे कोर्ट के निष्कर्षों से मेल नहीं खाते।

फैसले का स्क्रीनशॉट

फैसले के पैरा नंबर 96 में कोर्ट ने कहा कि आरोपितों के खिलाफ घायल व्यक्तियों और मृतक का रास्ता रोकने का आरोप सिद्ध नहीं हुआ। कोर्ट ने कहा कि प्रत्यक्षदर्शी शेख लाला और सैयद मुश्ताक ने कोर्ट में ऐसा कोई बयान नहीं दिया कि भीड़ में शामिल किसी व्यक्ति ने उनके सामने वाहन खड़ा कर रास्ता रोका था।

कोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस को दिए गए उनके बयानों में भी ट्रक का रास्ता रोके जाने का कोई जिक्र नहीं था। इसके अलावा कोर्ट के सामने ऐसा कोई अन्य साक्ष्य भी पेश नहीं किया गया जिससे यह साबित हो सके कि आरोपित ने ट्रक का रास्ता रोका था।

फैसले को सामान्य रूप से पढ़ने से यह स्पष्ट होता है कि कुछ मीडिया संस्थानों द्वारा इस मामले को गौ-रक्षक हिंसा बताने का दावा कोर्ट के निष्कर्षों से समर्थित नहीं है। अदालत के निष्कर्षों के अनुसार यह मामला हत्या, हत्या के प्रयास और दंगा से जुड़ा था, न कि गौ-रक्षक हिंसा से।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

फिंगरप्रिंट से लेकर DNA मैचिंग तक, अब अपराधियों की खैर नहीं… शाह ने लॉन्च किया ‘NCRB-अभिज्ञान’ ऐप: जानिए FIR से सजा तक कैसे बदल जाएगी पुलिसिंग

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने नई दिल्ली में ’26वें अखिल भारतीय फिंगरप्रिंट सम्मेलन 2026′ का उद्घाटन किया। यह सम्मेलन भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में एक बड़े डिजिटल बदलाव का गवाह बना। गृह मंत्री ने ‘NCRB-अभिज्ञान’ के 4 अत्याधुनिक मोबाइल ऐप्स और प्लेटफॉर्म लॉन्च किए हैं। ये ऐप्स पुलिसिंग को ‘स्मार्ट’ और जाँच को पूरी तरह ‘वैज्ञानिक’ बनाएँगे। इस बदलाव का मुख्य उद्देश्य अपराधियों को सजा दिलाना और समयबद्ध न्याय सुनिश्चित करना है।

क्या हैं ये 4 जादुई ऐप्स?

गृह मंत्री ने 4 नई डिजिटल सुविधाएँ लॉन्च की हैं। ‘NCRB-अभिज्ञान’ एक मोबाइल एप्लिकेशन है। यह पुलिस को कहीं भी और कभी भी फिंगरप्रिंट स्कैन करने की ताकत देता है। पुलिसकर्मी मौके पर ही संदिग्धों के फिंगरप्रिंट नेशनल डेटाबेस से मिला सकते हैं। दूसरा है ‘CrPI’ एप्लीकेशन। इसमें चेहरा, आँखों की पुतली और DNA मैचिंग का मिलन है। यह रिपीट ऑफेंडर्स को पकड़ने के लिए सबसे सटीक टूल है।

तीसरा है ‘ई-फ़ॉरेंसिक्स 2.0’। यह लैब और जाँच एजेंसियों को डिजिटल रूप से जोड़ता है। इसमें नमूनों के पंजीकरण से लेकर रिपोर्ट तक सब कुछ ऑनलाइन ट्रैक होगा। चौथा है ‘ई-प्रॉसिक्यूशन 2.0’। यह पुलिस, वकीलों और अदालतों को जोड़ता है। इससे केस की फाइलिंग से लेकर सजा तक का सफर तेज होगा। ये चारों ऐप्स मिलकर एक ‘इंटीग्रेटेड क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम’ (ICJS) बनाते हैं।

FIR से सजा तक: 3 साल में न्याय का लक्ष्य

मोदी सरकार का लक्ष्य बहुत साफ है। FIR से कन्विक्शन तक का सफर 3 साल के भीतर पूरा होना चाहिए। गृह मंत्रालय इसके लिए सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के साथ मिलकर काम कर रहा है। लंबित (पेंडिंग) मामलों को कम करने के लिए एक ठोस ब्लूप्रिंट तैयार किया जा रहा है। गृह मंत्री ने कहा कि अपराधी कितना भी चतुर हो, वह विज्ञान और कानून की शक्ति से नहीं बच सकता।

पुलिसिंग अब ‘रिकॉर्ड-कीपिंग’ नहीं, ‘इंटेलिजेंस-ड्रिवन’ होगी

अब तक NCRB जैसी संस्थाएँ सिर्फ रिकॉर्ड रखने का काम करती थीं। अब यह ‘इंटेलिजेंस-ड्रिवन’ संस्था में बदल रही है। गृह मंत्री ने साफ किया कि सिर्फ अपराधी को पकड़ना काफी नहीं है। अपराध को होने से पहले ही रोकना असली सफलता है। पुलिस अब ‘प्रेडिक्टिव पुलिसिंग’ की तरफ बढ़ रही है। यानी अपराध होने के बाद कार्रवाई करने से आगे बढ़कर, अब अपराध को होने से पहले ही रोकने की तैयारी है।

डेटा बना ‘हथियार’: AI और मशीन लर्निंग का कमाल

गृह मंत्री ने बताया कि डेटा का अंबार किसी काम का नहीं है। अगर डेटा का विश्लेषण न हो, तो वह एक अलमारी में रखे बोझ जैसा है। अब इस डेटा को ‘एक्शन योग्य इंटेलिजेंस’ में बदला जा रहा है। सरकार के पास 1 करोड़ 29 लाख फिंगरप्रिंट रिकॉर्ड मौजूद हैं। इसके अलावा 9 लाख 91 हजार नार्को अपराधियों का डेटा है। साथ ही 3 लाख 65 हजार मानव तस्करी के मामलों का रिकॉर्ड भी उपलब्ध है।

अब AI और मशीन लर्निंग का उपयोग करके इन डेटाबेस को जोड़ा जा रहा है। इससे अपराध के पैटर्न को समझा जाएगा। रिपीट ऑफेंडर्स और अंतरराज्यीय अपराधी नेटवर्क को पहले ही पहचाना जा सकेगा। राज्यों को विशेष टीमें बनाने को कहा गया है। ये टीमें AI की मदद से अपराधियों की प्रोफाइलिंग करेंगी।

CCTNS का विस्तार और डेटा का विशाल नेटवर्क

आज देश का हर कोना तकनीक से जुड़ चुका है। देश के 17,840 पुलिस थानों में CCTNS की पहुँच शत-प्रतिशत हो गई है। आज पुलिस के पास 37 करोड़ 68 लाख ऑनलाइन रिकॉर्ड उपलब्ध हैं। इनमें पुरानी FIR का डेटा भी शामिल है। वहीं, 22,000 अदालतें ई-कोर्ट से जुड़ चुकी हैं। ई-प्रिजन में 2 करोड़ 29 लाख कैदियों का डेटा सुरक्षित है। ई-फॉरेंसिक में 34 लाख 48 हजार केसों का फॉरेंसिक डेटा है। 43 लाख 16 हजार का अलर्ट डेटा भी सिस्टम में मौजूद है। ये सारे आँकड़े अब मिलकर एक शक्तिशाली डिजिटल सुरक्षा कवच बना रहे हैं।

राज्यों को गृह मंत्री की दो-टूक नसीहत

गृह मंत्री अमित शाह ने सभी राज्यों के पुलिस प्रमुखों को कड़ा संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि डेटा की सुरक्षा और गुणवत्ता राज्यों की जिम्मेदारी है। डेटा के कपबोर्ड में रखे रहने से किसी का भला नहीं होता। उन्होंने पुलिस अधिकारियों से हर हफ्ते कम से कम एक दिन ट्रेनिंग के लिए निकालने को कहा। यह ट्रेनिंग कम से कम एक साल तक चलनी चाहिए।

चार्जशीट को छोटा रखने और केवल उपयोगी साक्ष्यों को शामिल करने की कला सिखाई जानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि NAFIS का उपयोग केवल पुराने केस सुलझाने के लिए न करें। हर अपराध स्थल से फिंगरप्रिंट लेकर डेटाबेस को लगातार समृद्ध करें। यह एक दो-तरफा रास्ता है। डेटा जितना बढ़ेगा, अपराधी के बचने के चांस उतने ही कम होंगे।

क्यों महत्वपूर्ण है यह बदलाव?

पुराने समय में पुलिसिंग सिर्फ फोर्स के भरोसे होती थी। अब वैज्ञानिक साक्ष्य सबसे बड़ा हथियार है। नए आपराधिक कानूनों के तहत 90 दिनों के अंदर उम्र कैद की सजा दिलाने के मामले सामने आए हैं। गृह मंत्री का मानना है कि जब समाज में यह संदेश जाएगा कि अपराध करने के बाद दंड निश्चित है, तो लोग अपराध करने से डरेंगे।

इस सम्मेलन और नई टेक्नोलॉजी के लॉन्च से देश की आपराधिक न्याय व्यवस्था में बड़ा बदलाव आएगा। यह व्यवस्था अब अधिक पारदर्शी, सटीक और समयबद्ध हो गई है। पुलिस, अभियोजन, फॉरेंसिक और न्यायपालिका अब एक ही डिजिटल कड़ी में जुड़ गए हैं। अपराधियों के लिए अब छिपने की जगह नहीं बची है। विज्ञान और तकनीक की इस नई लहर से भारत में अपराध नियंत्रण का एक नया अध्याय लिखा जा रहा है।

UP में नासिर ने आनंद को तलवार से काटा… नई नहीं दलितों पर इस्लामी कट्टरपंथियों की बर्बरता, आँकड़े देते हैं अत्याचार की गवाही: ऐसी हर घटना के बाद ‘भीम-मीम’ वाले साध लेते हैं चुप्पी

उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर में गुरुवार को नासिर अली नामक शख्स ने बीच बाजार एक दलित युवक आनंद की तलवार से गला काटकर बेरहमी से हत्या कर दी। दलित-मुस्लिम एकता और भीम-मीम के नारे लगाने वालों को इस हत्या के बाद साँप सूँघ गया है। दलितों के नाम पर वोट माँगने वाले दल खामोश हैं क्योंकि मारने वाला मुस्लिम है। यह मामला इस्लामी कट्टरता के साथ-साथ यह भी दिखाता है कि दलितों के नाम पर की जाने वाली राजनीति किस हद तक सुविधाजनक हो गई है।

क्या है आनंद की हत्या का पूरा मामला?

जिस आनंद को सरे राह काटा गया उस बेचारे का ‘कसूर’ उस जिहादी की नजर में ये था कि आनंद ने अपनी भांजी के साथ छेड़छाड़ को लेकर नासिर को थप्पड़ जड़ दिया था। यह थप्पड़ नासिर को इतना नागवार गुजरा कि देर रात आनंद के बाजार से लौटते समय नासिर ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर उन्हें घेर लिया और धारदार हथियार से गला रेत दिया। यह पूरा कत्लेआम इतनी भयावहता के साथ हुआ कि आनंद ने मौके पर ही दम तोड़ दिया।

इसके बाद गुस्साए ग्रामीणों ने सड़क जमकर दिया और नासिर के गिरफ्तारी और एनकाउंटर की माँग पर अड़ गए।मामले के बाद संत कबीर नगर में एडीजी, डीआईजी, एसपी समेत पूरा पुलिस महकमा तैनात है और नासिर और उसके साथियों की तलाश की जा रही है।

आनंद की हत्या कोई पहली घटना नहीं है। इस तरह की कई घटनाएँ बीते महीनों में सामने आ चुकी हैं जिसमें दलितों का उत्पीड़न और उनकी हत्या करने में आरोपित मुस्लिम रहे हैं।

मुस्लिमों से सर्वाधिक पीड़ित हैं दलित

मीडिया रिपोर्ट्स को मानें तो जनवरी से अप्रैल 2026 के बीच में एससी/एसटी एक्ट के आँकड़ों में पता चला कि दलितों के उत्पीड़न पर मुस्लिमों के खिलाफ 1,983 मामले दर्ज हो चुके हैं। यह आँकड़े राज्य के सभी जिलों और जून से मिली पुलिस रिपोर्ट, FIR और जाँच रिपोर्ट के आधार पर तैयार किए गए हैं।

इन आँकड़ों के सामने आने के बाद से सियासी महकमे में हलचल तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी लगातार PDA नैरेटिव पर लोगों को बरगलाने की कोशिश कर रही है लेकिन NCRB के आँकड़े और रुझान कहते हैं कि मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव की सरकारों के दौरान दलितों पर अत्याचार के मामले काफी बढ़े थे।

एनसीआरबी और अन्य रिपोर्ट्स के अनुसार, 2012 से 2017 के बीच में यूपी में दलितों पर अपराधों के 15000 से भी अधिक मामले दर्ज हुए। सपा सरकार में ही 2014 में बदायूं में दो दलित बहनों के साथ हुई बर्बरता ने भी देश को तो झकझोरा ही, पर यह भी बता दिया कि सपा राज में कानून व्यवस्था दलितों के लिए अराजक हो चुकी है।

2012-13 में उत्तर प्रदेश में दलितों पर दर्ज अपराध की संख्या 2800 से 3000 के बीच रही। इसके बाद 2014-15 में ये संख्या 3200 से 3400 हो गई। इनमें बलात्कार, हत्या और सामाजिक बहिष्कार के मामलों में बढ़ोतरी देखी गई।

वहीं अखिलेश के आखिरी वर्षों 2016-17 में एनसीआरबी के रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश दलितों के अपराध के मामले में पहले नंबर पर रहा। इस वर्ष में उत्तर प्रदेश में दलितों पर दर्ज अपराधों की संख्या 3500 से 3700 तक पहुँच गई। कुल मिलाकर अखिलेश के कार्यकाल में 15130 मामले दर्ज हुए जो देश में सबसे अधिक थे।

मुलायम की सत्ता में भी दलितों का हुआ शोषण

1993 से 1995 और 2003 से 2007 के बीच रही मुलायम सिंह यादव की सरकार की बात की जाए तो दलितों पर अत्याचार की स्थिति ऐसी थी कि उन्हें विपक्षी मतदाता मानकर उनकी लगातार उपेक्षा की जाती थी, थानों में न्याय नहीं मिलता था और ग्रामीण क्षेत्रों में हिंसा हद से अधिक देखने को मिलती थी।

आम जनता को तो छोड़ दीजिए, 1995 का कुख्यात गेस्ट हाउस कांड भी मुलायम सरकार के दौरान ही हुआ जिसने दलितों के प्रति समाजवादी पार्टी का चेहरा और विचार सबके सामने रख दिया। इस घटना ने बताया कि सपा दलित समाज की आवाज को दबाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है।

अपने परिवार के सत्ता में रहने के दौरान दिलों के रुख को जानने के बावजूद समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव पीड़ित, दलित और अल्पसंख्यक (PDA) का नारा देकर सत्ता की रोटियाँ सेंकने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं।

यह तो योगी सरकार है जिसकी वजह से न केवल कानून व्यवस्था सुदृढ़ हुई पर साथ ही दलितों पर अत्याचार और उनके उत्पीड़न में भी काफी उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि यदि 2027 के चुनाव में अखिलेश यादव सत्ता संभालते हैं तो दलितों के लिए उनका शासन काल किसी डरावने सपने से भी बदतर हो जाएगा।

भीम-मीम राजनीति की भी पोल खोलते हैं ऐसे मामले

सपा जैसे दल ‘भीम-मीम’ राजनीति के सबसे बड़े स्वघोषित मसीहा हैं। ‘भीम-मीम’ के नारे के सहारे दलितों और मुस्लिमों की सामाजिक-राजनीतिक एकता बताने वाले अखिलेश यादव जैसे लोगों का दिल असल में दलितों के नाम पर कम ही पसीजता है। यह कोई इस घटना की बात नहीं है, घटना दर घटना आपको इसके प्रमाण नजर आएँगे। इन दलों द्वारा इस राजनीति में दलितों के मुद्दों से ज्यादा महत्व केवल वोटों की गणित को दिया जाता रहा है। दलित उत्पीड़न के मुद्दों पर सबसे अधिक मुखर होने का दावा करने वाले ये लोग मुस्लिम आरोपित होने पर मुँह बंद कर लेते हैं।

भीम-मीम के नाम पर राजनीति करने वाले लोग सिद्धांत की नही बल्कि सुविधा की राजनीति करते हैं। दलितों पर अत्याचार किसी विशेष राजनीतिक नैरेटिव में फिट बैठता है तो उस पर प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है, धरना होता है, सोशल मीडिया अभियान चलाया जाता है लेकिन यदि आरोपित मुस्लिम समुदाय से हो तो वही राजनीतिक ऊर्जा अचानक गायब हो जाती है।

फीफा विश्व कप 2026: कनाडा की पहली जीत से अमेरिका की अग्निपरीक्षा तक

एक दफा फिर सूर्य उदय हुआ। यह एक और नया दिन था। आज मेक्सिको, अमेरिका व कनाडा की भूमि में फीफा विश्व कप के ग्रुप स्टेज के कई मैच खेले जाने थे।

सर्वप्रथम, चेक रिपब्लिक का सामना दक्षिण अफ्रीका से होने जा रहा था। इस मैच में कुछ भी हो सकता था। मैच शुरू होते ही छठे मिनट में चेक रिपब्लिक के लिए 27 वर्षीय मिडफील्डर मिखाल सादिलेक गोल कर टीम को बढ़त दिला देते हैं। खैर, खेल आगे बढ़ता है। पहले हाफ की समाप्ति पर स्कोर 1-0 ही रहता है। दोनों टीमें गोल करने के प्रयास में लगी रहती हैं, परंतु धीरे-धीरे समय बीतता जाता है। अचानक, मैच के 82वें मिनट में अपने ही गोलपोस्ट के समीप एक फाउल कर चेक रिपब्लिक की टीम दक्षिण अफ्रीका को पेनाल्टी का सुनहरा अवसर दे देती है। इस मौके को भुनाने में मोकोएना कोई गलती नहीं करते और पेनाल्टी को सफलतापूर्वक गोल में तब्दील कर अंतिम क्षणों में दक्षिण अफ्रीका की मैच में वापसी करा देते हैं। गौरतलब है कि उम्मीदों के विपरीत इस मैच में 61 प्रतिशत समय गेंद दक्षिण अफ्रीका के पास रही। साथ ही उन्होंने विरोधी गोलपोस्ट पर 17 दफा हमले किए। परंतु मैच 1-1 की बराबरी पर समाप्त हो जाता है। एक दफा फिर इस टूर्नामेंट में एक और मैच ड्रॉ रहता है।

आगे, लॉस एंजेलिस स्टेडियम में स्विट्जरलैंड का मुकाबला बोस्निया एवं हर्ज़ेगोविना की टीम से था। बोस्निया की टीम उम्रदराज एडिन जेको के नेतृत्व में इस टूर्नामेंट में उतरी है। वहीं, कोबेल, अकांजी, झाका व एम्बोलो जैसे खिलाड़ियों से लैस स्विस खेमा जीत के लिए भूखा नजर आ रहा था। मैच के पहले हाफ में दोनों टीमें कोई गोल करने में नाकाम रहती हैं।

दोनों टीमें, खासकर स्विट्जरलैंड, प्रयास तो कर रही थीं, परंतु स्कोर अब भी 0-0 ही था। फिर, स्विस कोच मैच के 71वें मिनट में एक साथ तीन बदलाव करते हैं। यह देखकर कि बोस्निया के खिलाड़ी थक चुके हैं, वे 20 वर्षीय मनजाम्बी को भी मैदान में भेजते हैं। उनका यह फैसला मैच को बदलकर रख देता है। 74वें मिनट में ही मनजाम्बी विरोधी गोलपोस्ट से लगभग 15 मीटर की दूरी से पोस्ट की दाईं ओर निशाना लगाते हैं। वे गोल करने में सफल हो जाते हैं और इस गोल के साथ स्विट्जरलैंड को 1-0 की अहम बढ़त दिला देते हैं। थोड़ी देर बाद बोस्निया के मुहारेमोविक को फाउल करने पर रेफरी रेड कार्ड दिखा देते हैं। इसका लाभ स्विट्जरलैंड को मिलता है। एक अन्य स्थानापन्न खिलाड़ी वारगास, साथी खिलाड़ी एम्बोलो से असिस्ट पाकर, अपनी टीम के लिए गोल करने में सफल हो जाते हैं। स्कोर 2-0 हो जाता है।

फिर, 90वें मिनट में इस बार वारगास गेंद को गोलपोस्ट के समीप मनजाम्बी के लिए परोसते हैं, जो गोल करने में कोई गलती नहीं करते। स्कोर 3-0 हो जाता है। स्विस टीम अंतिम क्षणों में भी गोलों की बौछार कर रही थी। इसके बाद बोस्निया के कोच अरमिन माहमिक को मैदान में भेजते हैं, जो मैदान में उतरते ही बोस्निया के लिए एक गोल कर देते हैं। स्कोर 3-1 हो जाता है। मैच के 90+6वें मिनट में स्विस स्थानापन्न खिलाड़ी जिब्रिल सौ को विरोधी गोलपोस्ट के पास फाउल कर दिया जाता है। टीम को पेनाल्टी मिलती है, जिसे अनुभवी कप्तान ग्रानित झाका गोल में तब्दील कर स्कोर 4-1 कर देते हैं। मैच इसी स्कोरलाइन पर समाप्त हो जाता है।

फिर, कनाडा के खिलाड़ी अपने घरेलू दर्शकों के सामने वैंकूवर में कतर की टीम से मुकाबला करते नजर आए। इस मैच में अपनी टीम को खेलते देखने के लिए लगभग साढ़े बावन हजार दर्शक स्टेडियम में मौजूद थे। यह मैच शुरुआत से ही एकतरफा रहा। कनाडा के खिलाड़ियों ने मैच की शुरुआत से ही कतर को संभलने का मौका नहीं दिया। अपने स्टार स्ट्राइकर जोनाथन डेविड की हैट्रिक की बदौलत कनाडा यह मैच 6-0 से जीतकर अपने ग्रुप में शीर्ष स्थान पर रहने की मजबूत दावेदारी पेश कर चुका है।

यह मात्र तीसरी बार है जब कनाडा फीफा विश्व कप का हिस्सा है और यह विश्व कप में उसकी पहली जीत भी है। अब लगभग निश्चित है कि पहली बार कनाडा ग्रुप स्टेज से आगे का सफर तय करेगा। यह निश्चित ही जश्न का समय होना चाहिए था। हालांकि, ऐसा हुआ नहीं।

24 वर्षीय स्टार कनाडाई मिडफील्डर इस्माइल कोने को दूसरे हाफ की शुरुआत में विपक्षी खिलाड़ी के फाउल के चलते गंभीर चोट लग जाती है। उनकी टांग में मल्टिपल फ्रैक्चर हो जाते हैं। वे दर्द से कराह रहे थे।

रेफरी तुरंत खेल रोककर मेडिकल टीम को बुलाते हैं। टीम के इस अहम खिलाड़ी पर हुए गंभीर फाउल के चलते दोनों टीमों के खिलाड़ियों के बीच झड़प हो जाती है। कोने को स्ट्रेचर पर मैदान से बाहर ले जाया जाता है। यह चोट इतनी गंभीर है कि अब उनका विश्व कप अभियान समाप्त हो गया है। दर्द से कराहते हुए भी इस्माइल कोने स्ट्रेचर से ही हाथ हिलाकर दर्शकों का अभिवादन स्वीकार करते हैं और जाते-जाते सभी को सांत्वना भी देते हैं। यह दृश्य सभी दर्शकों को भावुक कर देता है। नाथन सलीबा घायल इस्माइल कोने की जगह मैदान में आते हैं। और जैसे ही नाथन सलीबा मैच के 64वें मिनट में गोल दागकर घायल साथी खिलाड़ी इस्माइल कोने की जर्सी हाथों में लेकर हवा में लहराते हैं, कोच जेसी मार्श की आंखें भीग जाती हैं। यही तो इस खेल का जादू है, जिसकी हम अक्सर बात करते हैं। कहते हैं, फुटबॉल कमजोर दिल वालों के लिए नहीं है। यह एक पल आपको हंसाता है और अगले ही पल आपको रोने पर मजबूर कर देता है।

आगे, आज सुबह साढ़े छह बजे मेक्सिको की टीम अपने ही घर में दक्षिण कोरिया से दो-दो हाथ करती नजर आई। अपने घरेलू दर्शकों के अपार समर्थन के चलते मेक्सिको यह मैच 1-0 से जीतने में सफल रही और इस जीत के साथ ही वह ग्रुप ए की विजेता के तौर पर टूर्नामेंट के अगले दौर में जगह बनाने वाली पहली टीम बन गई है। क्योंकि दक्षिण कोरिया अपना पिछला मैच जीत चुकी थी, इसलिए उसके पास अभी भी अगले दौर में जगह बनाने का मौका है।

अब आगे, भारतीय समयानुसार आज रात साढ़े बारह बजे सिएटल स्टेडियम में घरेलू समर्थकों की सेना के साथ क्रिश्चियन पुलिसिक की अमेरिकी टीम का सामना होगा ऑस्ट्रेलिया से, जिसने इस टूर्नामेंट का एक बड़ा उलटफेर किया है। ऑस्ट्रेलिया अपने पिछले मैच में तुर्की की अनुभवी टीम को 2-0 से हरा चुकी है। वहीं, अमेरिका ने पैराग्वे को 4-1 से परास्त किया था। ऐसे में एक जोरदार मुकाबले की पूरी संभावना है।

वहीं, बोस्टन स्टेडियम में ग्रुप सी के मुकाबले में स्कॉटलैंड को मजबूत इरादों वाली मोरक्को की टीम से भिड़ना होगा। यह मैच आप दोनों टीमों के जज्बे और जिद के लिए देख सकते हैं।

और कल सुबह, भारतीय समयानुसार साढ़े छह बजे, फिलाडेल्फिया में ब्राजील अपेक्षाकृत कमजोर हैती की टीम के खिलाफ मैदान में उतरेगी। अगले दौर में जगह बनाने के लिए उसे यह मैच अच्छे अंतर से जीतना ही होगा। जहां तक खबर है, चोटिल नेमार एक बार फिर टीम का हिस्सा नहीं होंगे। एक दफा फिर ब्राजील को जिताने की जिम्मेदारी विनीसियस जूनियर के कंधों पर होगी। कोच कार्लो एंसेलोटी के विश्व कप दल में मेहनती युवा सेंटर फॉरवर्ड जाओ पेड्रो के स्थान पर चोटिल नेमार को तरजीह देने के फैसले की चारों ओर आलोचना हो रही है, क्योंकि पिछले मैच में हमने देखा कि इगोर थियागो पूरी तरह असफल रहे थे। इस मैच से पहले आज की रात निश्चित ही कोच कार्लो के लिए एक बड़ी रात होगी।

फिर, कल सुबह साढ़े आठ बजे, अपना पिछला मैच हार चुकी ग्रुप डी की दो टीमें, तुर्की और पैराग्वे, सांता क्लारा के सैन फ्रांसिस्को स्टेडियम में आमने-सामने होंगी। दोनों ही जीत के लिए लालायित रहेंगी। तुर्की के लिए युवा अर्दा गुलेर अहम भूमिका निभाएंगे।

आगे, जापान के विरुद्ध अपना पिछला मैच ड्रॉ खेलने वाली रोनाल्ड कोमान की नीदरलैंड्स का सामना होगा ट्यूनीशिया को 5-1 से रौंद चुकी स्वीडन की आक्रामक टीम से। एक दफा फिर ग्योकेरेस, इसाक और अयारी जैसे अटैकर्स से लैस स्वीडन मैच जीतकर अगले दौर में जगह बनाना चाहेगी। पिछला मैच ड्रॉ रहने के चलते नीदरलैंड्स पर निश्चित रूप से अतिरिक्त दबाव रहेगा। यह भी एक बेहतरीन मुकाबला होगा।

यूं ही कई महत्वपूर्ण मैच हमारा इंतजार कर रहे हैं। कई खूबसूरत कहानियां सदैव के लिए अमर होने का इंतजार कर रही हैं। बने रहिए साथ। फुटबॉल का सिलसिला जारी रहेगा।