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मजहब देखकर मदद करने तक है जिनकी औकात, वो भारतीय सेना को ‘शराबी-बलात्कारी’ बताकर उठाते हैं सवाल: कौन हैं ये लोग?

भारत में रहकर इस्लामी मुल्कों के लिए अपनी ईमानदारी दिखाना और यहाँ की सरकार व सैनिकों का अपमान करना कट्टरपंथियों के लिए कोई नई बात नहीं है। पिछले 12 सालों में ऐसे कई मामले देखे गए जब ये लोग कैमरे पर देश के खिलाफ स्पष्ट रूप से जहर उगलते कैद हुए। इस बार इन्होंने ये काम ईरान के नाम पर किया है।

हाल में एक वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही है। इसमें बुर्काधारी महिला सैनिकों को ‘शराबी-कबाबी’ कहती नजर आ रही है। उसका कहना है कि वो लोग जो दान कर रहे हैं वह उनके अपने ‘रहबर’ शिया मुल्क ईरान के लिए है। उनके लिए अभी भारतीय सेना या कुछ और बिलकुल जरूरी नहीं है।

यह पहला मौका नहीं है जब ऐसा बयान सामने आया हों। ईरान से जुड़े तनाव या पश्चिम एशिया की घटनाओं के दौरान कई बार ऐसे वीडियो सामने आए हैं, जिनमें शिया समुदाय की भीड़ सड़कों पर उतरकर खुले तौर पर विदेशी ताकतों के समर्थन में नारे लगाती और हल्ला करते हुए दिखी।

लखनऊ में जहाँ बुर्काधारी महिला ने तो यहाँ तक कहा कि खामेनेई के लिए उनकी जान भी हाजिर है वही दिल्ली में प्रदर्शन करते हुए बुर्काधारी महिलाएँ बोलीं कि उनके लिए सबसे जरूरी ईरान ही है।

इस बीच कुछ मुल्ला-मौलाना के बयान भी गौर देने वाले थे। जैसे मौलाना साजिद राशीदी ने कैमरे पर ये कहा था कि अगर कभी ऐसा समय आया कि ईरान और भारत आमने-सामने हुए तो भारत के मुस्लिम ईरान का ही साथ देंगे।

वहीं कट्टरपंथ में सने बच्चे भी ये कहते नजर आए थे कि उन्हें भारत देश की सरकार से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन अगर मौका मिला तो वह ईरान का बदला लेकर इजरायल में घुसकर चाकूबाजी कर सकते हैं।

अभिव्यक्ति के नाम पर जहर उगलने का काम पुराना

लोकतांत्रिक भारत में यह एक बड़ी विडंबना है कि हम इन लोगों के विचारों से अवगत होते हुए भी अक्सर इनका खुलकर विरोध नहीं कर पाते। कारण वो सेकुलरिज्म का बोझ है जिसे ढोने की जिम्मेदारी सिर्फ हिंदुओं को दी गई है। देश का लेफ्ट-लिबरल इसी सहिष्णुता का फायदा उठाता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कभी देश की संप्रभुता-सुरक्षा-सद्भाव को ठेस पहुँचाई जाती है, कभी इसका इस्तेमाल सेना को गाली देने के लिए किया जाता है।

व्यक्तिगत राय और लोकतंत्र की मजबूती की बात करते-करते सेकुलर हिंदुओं को ये समझ नहीं आता कि जो लोग कट्टरपंथ के कारण अपनी मातृभूमि के नहीं हो पा रहे हैं वो उनके कैसे होंगे। क्या ये सोचने वाली बात नहीं है कि आखिर क्यों ईरान को अपना रहबर और देश भर के मुस्लिमों को अपना भाई बताने वाले इस्लामी कट्टरपंथी हिंदुओं को ‘काफिर’ क्यों कहते हैं।

खैर! ईरान से पहले फिलीस्तीन के लिए भी भारत के मुस्लिम ऐसा रोना रो चुके हैं। उस वक्त भी सेकुलर हिंदुओं का काम सिर्फ इनका ‘पिछलग्गू’ बने रहने का था। उन्हें न हमास आतंकियों के बारे में कोई बात करनी थी और न ही 7 अक्तूबर 2023 को क्या हुआ इसकी जानकारी थी। ये लोग उस समय भी घूम-फिराकर ये नैरेटिव आगे बढ़ाते रहे कि इजरायल बेवजह ही फिलीस्तीनियों को निशाना बना रहा है और गाजा के लिए रोना रोने वाले मुस्लिम ही इंसानियत के साथ खड़े हैं।

आपने कभी हमास-इजरायल युद्ध के दौरान में इस्लामी कट्टरपंथी जमात को हमास आतंकियों की हरकत पर बात करते नहीं सुना गया। उन्होंने न उस घटना की निंदा की थी और न ही विरोध।

मजहब देखकर दिखाते हैं मानवता

आज फिर मानवता का हवाला देकर ईरान के लिए भी वैसी सहानुभूति दिखाई जा रही है, लेकिन इन सब घटनाक्रमों के बीच विचार करने वाली बात ये है कि ईरान-फिलीस्तीन के लिए छाती पीटने वालों के मन में कभी भारत के लोगों के लिए ये दर्द नहीं उठा। तमाम मौके थे जब ये लोग मजहब से ऊपर उठकर गैर-मुस्लिमों के लिए इंसानियत दिखा सकते थे लेकिन इन्होंने कभी ऐसा नहीं किया।

चाहे 2001 में गुजरात के भुज में भूकंप की घटना हो या 2015 में नेपाल में भीषण त्रासदी ऐसी घटनाओं में हमेशा देशभर से मदद पहुँचीं लेकिन क्या वो दृश्य आपको देखने को मिले जो ईरान के वक्त कश्मीर में दिखे? क्या आपने जगह-जगह से मुस्लिमों को गैर-मुस्लिमों के लिए जकात काम काम करते देखा?

नहीं, ये कट्टरपंथी जमात मजहब देखकर सबाब का काम करती है और ये भूल जाती है कि जिस सेना को ये लोग ‘शराबी-बलात्कारी’ बताते हैं वही सेना हर मुश्किल घड़ी पर सबसे आगे मदद के लिए रहती है। वो समय चाहे प्राकृतिक आपदा के कारण आया हो या फिर विश्व में अलग-अलग चल रहे युद्ध की वजह से… भारतीय सेना अपने देश के नागरिकों की रक्षा में जान की परवाह किए बिना तैनात रहती है, तभी कश्मीर में कट्टरपंथियों से लेकर केरल के वामपंथी तक सुकून से सो पाते हैं। ।

फर्जी खबरें फैलाने से लेकर काटे-छाँटे गए वीडियो और फर्जी नैरेटिव तक: पढ़ें- भारत में बैन किए गए प्रोपेगेंडा अकाउंट्स की पड़ताल

हाल के दिनों में 4PM, मॉलिटिक्स (Molitics) और नेशनल दस्तक (National Dastak) जैसे कई सोशल मीडिया अकाउंट्स और कंटेंट प्लेटफॉर्म्स पर भारत में रोक लगाई गई है। जैसे ही ये पाबंदी लगी वामपंथियो ने इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बताया और कहा कि विरोध की आवाज दबाई जा रही है। यह दावा सोशल मीडिया पर तेजी से फैल भी गया। हालाँकि, इस तरह के दावे बड़ा सवाल खड़ा करते हैं कि क्या यह कार्रवाई मनमाने तरीके से हुई या इससे पहले ऐसा कंटेंट लगातार आ रहा था जिस पर सवाल उठना जरूरी था?

अगर इन प्लेटफॉर्म्स के कंटेंट को ध्यान से देखें तो मामला इतना सीधा नहीं लगता। कई बार इनके कंटेंट में सनसनीखेज अंदाज, तथ्यों को सुविधा के हिसाब से चुनने और ऐसे दावे देखने को मिलते हैं जो बाद में गलत साबित होते हैं या सही नहीं निकलते। कई बार ऐसी कहानियाँ भी सामने आईं जिन्हें बाद में भ्रामक माना गया और कई बार अनुमानों को ही पूरे भरोसे के साथ पेश किया गया। यह पैटर्न दिखाता है कि यहाँ असर पैदा करने को अक्सर सटीक जानकारी से ज्यादा महत्व दिया जाता है। ऐसे में मामला सिर्फ पाबंदी का नहीं बल्कि डिजिटल जानकारी देने वाले इकोसिस्टम की जवाबदेही का भी बन जाता है।

इकोसिस्टम: प्लेटफॉर्म, चेहरे और नैरेटिव

पहली नजर में 4PM, मॉलिटिक्स और नेशनल दस्तक जैसे प्लेटफॉर्म खुद को अलग आवाज बताते हैं। वे कहते हैं कि वे बेबाक हैं, स्वतंत्र हैं और बिना किसी रोक-टोक के सच दिखाते हैं। उनका कहना होता है कि वे मुख्यधारा की बातों को चुनौती देते हैं और ‘सत्ता के सामने सच बोलते हैं’। लेकिन असल में ये लोग सही जानकारी से ज्यादा ऐसी चीजें दिखाते हैं जो लोगों पर अधिक असर डालें।

इनके कंटेंट में अक्सर नाटकीय तस्वीरें (थंबनेल), आक्रामक और भड़काऊ हेडलाइन होती हैं जो लोगों को किसी भी मुद्दे के लिए भावनात्मक बना दें। मुश्किल मुद्दों को बहुत आसान करके दिखाया जाता है। कई बार अनुमानों को ही सच की तरह बताया जाता है जबकि सही जाँच या पक्के सबूत साफ नहीं होते या होते ही नहीं है।

इससे एक ऐसा माहौल बनता है जहाँ अनुमानों को सच जैसा दिखाया जाता है, छोटी-छोटी घटनाओं को पूरे सिस्टम की बड़ी समस्या की तरह पेश किया जाता है और राय को खबर की तरह बताया जाता है। यह सिर्फ सोच या विचार का फर्क नहीं है क्योंकि हर मीडिया के अपने विचार होते हैं। असली फर्क यह है कि क्या पहले सबूत होते हैं या पहले दावा किया जाता है।

इन प्लेटफॉर्म्स पर बार-बार पक्की जाँच की बजाय बातों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है। इससे उनके काम करने के तरीके और मकसद पर सवाल उठते हैं। यह सिर्फ एक पोस्ट की बात नहीं है बल्कि पूरे एक सिस्टम की बात है। इसी वजह से समझ आता है कि सरकार को इसमें दखल देने की जरूरत क्यों लगी।

पहला चरण: जब दिखाने का तरीका बदलता है सोच

एक मामले में नेशनल दस्तक ने एक पोस्ट में आरोपितों के नाम पूरे नहीं बताए सिर्फ ‘राजपूत’ और ‘राना’ जैसे शब्द इस्तेमाल किए। इससे ऐसा लगा कि आरोपी हिंदू हैं। लेकिन बाद में पूरी जानकारी सामने आई तो पता चला कि असली नाम ‘अजीम राना’ और ‘आजाद राजपूत’ थे। यानी दोनों आरोपित मुस्लिम थे लेकिन पोस्ट में इसे ऐसे दिखाया गया जैसे अपराध हिंदुओं ने किया हो।

इस पोस्ट पर एक कम्युनिटी नोट भी लगा जिसमें कहा गया कि अधूरे नाम जानबूझकर ऐसे इस्तेमाल किए गए जिससे गलत धारणा बने। ऐसे और भी कई मामले हैं जहाँ इन प्लेटफॉर्म्स की बातें बाद में अधूरी, भ्रामक या पूरी जानकारी आने पर गलत साबित हुईं।

एक बड़ा उदाहरण वह था जब दावा किया गया कि भारत के सोने के भंडार (₹1 लाख करोड़ से ज्यादा) का एक बड़ा हिस्सा RBI से ‘गायब’ हो गया है। इसे बहुत डराने वाले तरीके से दिखाया गया जैसे कोई बड़ा घोटाला या गड़बड़ी हुई हो। लेकिन बाद में PIB ने इसकी जाँच कर साफ किया कि यह दावा गलत है और आँकड़ों को गलत तरीके से फैलाया गया था।

फिर भी सच सामने आने के बाद भी यह बात कई जगह फैलती रही और ज्यादातर पोस्ट में सुधार की जानकारी नहीं दी गई। इससे पता चलता है कि इस तरह की बड़ी गलत खबरें, सच सामने आने के बाद भी लोगों की सोच पर असर डालती रहती हैं।

दूसरा चरण: वीडियो और तस्वीरों से अपनी कहानी गढ़ना

एक और तरीका बार-बार दिखता है कि छोटे वीडियो और चुनी हुई तस्वीरें। इन्हें पूरे संदर्भ के बिना दिखाया जाता है। एक मामले में एक वीडियो क्लिप शेयर की गई जिसमें नीतीश कुमार आरती की थाली पकड़े हुए दिख रहे थे। इसके साथ कैप्शन दिया गया- ‘सम्राट चौधरी ने नीतीश कुमार के हाथ से आरती की थाली छीन ली’। वीडियो को अकेले ऐसे दिखाया गया कि एक खास मैसेज जाए। लेकिन पूरी घटना या पूरा वीडियो देखे बिना ऐसी बात सिर्फ अधूरी ही रहती है।

आजकल सोशल मीडिया पर यही आम तरीका बन गया है। छोटे-छोटे वीडियो को उनके असली संदर्भ से अलग करके दिखाया जाता है ताकि वो किसी खास कहानी या सोच के हिसाब से फिट हो जाएँ। ऐसे में जो नहीं दिखाया जाता वो उतना ही जरूरी होता है जितना जो दिखाया जाता है। समस्या सिर्फ एक वीडियो की नहीं है, बल्कि उस पैटर्न की है जिसमें चीजों को पहले से बनी सोच के हिसाब से दिखाया जाता है। जब पूरा संदर्भ नहीं दिया जाता तो लोग अधूरी चीजों को ही पूरी सच्चाई मान लेते हैं। बार-बार ऐसा होने पर लोगों की सोच उसी दिशा में बनने लगती है चाहे पूरी सच्चाई कुछ और ही क्यों न हो।

तीसरा चरण: जब सनसनी ही बन जाए कंटेंट

सिर्फ क्या कहा जा रहा है या क्या दिखाया जा रहा है… ये ही नहीं बल्कि उसे कैसे दिखाया जा रहा है, ये भी बहुत मायने रखता है। Molitics जैसे प्लेटफॉर्म अक्सर ध्यान खींचने वाली भाषा का इस्तेमाल करते हैं। जैसे ‘घपलेबाजी पकड़ी गई’, ‘बड़ा खुलासा’, ‘तहलका मच गया’, ‘मोदी को बड़ा झटका’, ‘नफरती हिंदुत्व’, ‘आतंकी संगठन’। ये शब्द ऐसे अंदाज में लिखे जाते हैं जैसे बात पूरी तरह साबित हो चुकी हो जबकि कई बार मामला उतना साफ नहीं होता।

ये लाइनें ज्यादातर थंबनेल, कैप्शन और वीडियो के टाइटल में होती हैं जिससे देखने वाले को लगे कि मामला बहुत बड़ा और पक्का है, भले ही अंदर पूरा सबूत साफ न हो।

ये तरीका सोच-समझकर अपनाया जाता है। थंबनेल सबसे पहले दिखता है और वही तय करता है कि लोग चीज को कैसे समझेंगे। जब बार-बार ऐसी आक्रामक और नाटकीय भाषा इस्तेमाल होती है तो हर खबर एक बड़े घोटाले या संकट जैसी लगने लगती है। कई बार इनका फोकस खास तरह की सोच पर होता है जहाँ हिंदुत्व को गलत या दबाने वाला दिखाया जाता है और छोटी या कम अहम खबरों को भी बड़ा बनाकर पेश किया जाता है।

कई बार टाइटल या थंबनेल में जो बड़ा दावा किया जाता है, वह अंदर दिए गए सबूतों से मेल नहीं खाता। यानी दिखाने और असली जानकारी में फर्क होता है। जब ऐसा कंटेंट बहुत लोगों तक पहुँचता है तो यह फर्क और भी अहम हो जाता है। समय के साथ, बार-बार ऐसे कंटेंट देखने से लोगों को लगने लगता है कि हर जगह गड़बड़ी ही गड़बड़ी है, भले ही हर मामला सच में इतना बड़ा या साबित न हो।

चौथा चरण: जब कंटेंट आरोप, अनुमान और भड़काऊ बातों तक पहुँचे

सनसनी और आधी-अधूरी जानकारी से आगे बढ़कर मामलों में यह कंटेंट सीधे अनुमानों और गंभीर आरोपों तक पहुँच जाता है, जो कभी-कभी बदनाम करने वाले भी हो सकते हैं।

एक बार ‘Dr Nimo Yadav 2.0’ नाम के अकाउंट (जिसे Prateek Sharma चलाते हैं) से ऐसा कंटेंट पोस्ट किया जिसमें इशारा किया गया कि केंद्रीय मंत्रियों के दफ्तर किसी ऐसे व्यक्ति से जुड़े हो सकते हैं जिस पर आतंकी ट्रेनिंग से जुड़ा होने का आरोप है।

पोस्ट में इसे सवाल के रूप में रखा गया और जाँच की माँग की गई लेकिन ऐसा कोई पक्का सबूत नहीं दिया गया जो इतने गंभीर आरोप को साबित करे। भले ही इसे सवाल की तरह लिखा गया हो लेकिन जब ऐसी बातें बड़ी संख्या में लोगों तक पहुँचती हैं तो वे बिना सबूत के भी लोगों को प्रभावित कर सकती हैं।

एक और मामले में भारतीय सेना के अधिकारियों की तस्वीर के साथ की गई टिप्पणी में मजाक के जरिए उसे मिड-डे मील जैसी नीति से जोड़ दिया गया। हंसी-मजाक और व्यंग्य समाज का हिस्सा हैं लेकिन इस तरह की बातों को कुछ लोग उन संस्थाओं का मजाक उड़ाना मान सकते हैं, जिनका हम सम्मान करते हैं।

इसी तरह, भारत की विदेश नीति और ऊर्जा से जुड़े फैसलों पर भी ऐसे निष्कर्ष दिखाए गए जैसे सब कुछ असफल हो गया हो जबकि असल में मामला इतना सीधा नहीं था। उदाहरण के लिए, कई रिपोर्ट्स में दिखाया गया है कि भारत ने वैश्विक दबाव के बावजूद रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदा जो एक अलग तस्वीर पेश करता है।

कुछ पोस्ट में बिना पक्के सबूत के बड़े-बड़े कूटनीतिक दावे भी किए गए जिससे ऐसी कहानियाँ बनती हैं जो सुनने में सही लगती हैं लेकिन पूरी तरह साबित नहीं होतीं।

इसके अलावा, कुछ मामलों में बेहद भड़काऊ और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल भी किया गया। जैसे एक रिपोर्टिंग के दौरान नेशनल दस्तक के एक रिपोर्टर ने ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ आपत्तिजनक बातें कहीं कि ‘ब्राह्मण कलंक हैं, उन्हें जूतों से मारकर बाहर निकालो’। इस तरह की बातें दिखाती हैं कि सार्वजनिक चर्चा में भाषा का स्तर कितना नीचे जा सकता है और किसी खास समुदाय को निशाना बनाया जा सकता है।

ऐसे प्लेटफॉर्म अक्सर अभिव्यक्ति की आजादी की बात करते हैं लेकिन सवाल यह भी उठता है कि क्या वही आजादी उन समुदायों के लिए भी है जिनके खिलाफ इस तरह की बातें कही जाती हैं। जब इस तरह का कंटेंट बिना रोक-टोक फैलता है तो समाज में दूरी और तनाव बढ़ सकता है।

इन सभी उदाहरणों को मिलाकर देखें, तो एक पैटर्न सामने आता है जहाँ गंभीर आरोप सवाल के रूप में पेश किए जाते हैं, संवेदनशील संस्थाओं पर व्यंग्य का इस्तेमाल किया जाता है और जटिल मामलों को आसान और पक्के निष्कर्ष की तरह दिखाया जाता है। इसका असर यह होता है कि गलत जानकारी फैलती है और लोगों में डर या भ्रम का माहौल बन सकता है।

पाँचवाँ चरण: नैरेटिव को सच बनाकर दिखाना

एक और साफ पैटर्न यह है कि कुछ प्लेटफॉर्म, खासकर 4PM जैसे यूट्यूब चैनल, बार-बार राजनीतिक भविष्यवाणियाँ करते हैं। इनके वीडियो टाइटल, थंबनेल और कंटेंट में अक्सर यह दिखाया जाता है कि जल्द ही बड़ा राजनीतिक उलटफेर होने वाला है। इनके कंटेंट में डर पैदा करने वाला माहौल बनाया जाता है जैसे सरकार गिरने वाली है, कोई बड़ा बदलाव होने वाला है या नेतृत्व बदलने वाला है।

इन दावों को बहुत जल्दबाजी और बिल्कुल सच के रूप में दिखाया जाता है मानो यह कोई अंदर की खबर हो या अभी-अभी होने वाली घटना हो लेकिन समय के साथ देखें तो इनमें से कई बातें सच होती नहीं दिखतीं।

इससे एक पूरा सिस्टम बन जाता है कि पहले थंबनेल में चौंकाने वाली बात दिखाई जाती है, फिर बड़ा दावा किया जाता है, उसे जोर-शोर से फैलाया जाता है और कुछ समय बाद बिना पुराने दावे का हिसाब दिए एक नई भविष्यवाणी शुरू हो जाती है। इससे धीरे-धीरे लोगों को लगता है कि देश में हमेशा कुछ बड़ा गलत होने वाला है जबकि असल में ऐसा जरूरी नहीं होता।

यह समझना जरूरी है कि राजनीति पर राय देना या अनुमान लगाना गलत नहीं है लेकिन फर्क इस बात का है कि उसे कैसे दिखाया जाता है। जब बार-बार अंदाजों को ऐसे पेश किया जाए जैसे वे पक्का सच हों और बाद में उनकी कोई जिम्मेदारी न ली जाए तो इससे उनके काम करने के तरीके और भरोसे पर सवाल उठते हैं। असली समस्या एक गलत भविष्यवाणी नहीं बल्कि बार-बार अनुमानों को सच की तरह दिखाने की आदत है।

सामने आता छिपा हुआ पैटर्न

अलग-अलग देखें तो इन अकाउंट्स (जिन्हें भारत में रोका गया है) की हर बात को सिर्फ राय, एडिटोरियल फैसला या एक गलती माना जा सकता है। लेकिन जब सबको साथ में देखा जाता है तो एक साफ पैटर्न दिखता है। कभी गलत आर्थिक दावे, कभी पहचान को घुमा कर दिखाना, तो कभी वीडियो और तस्वीरों को अलग तरीके से पेश करना है कि इनमें कई चीजें बार-बार दोहराई जाती हैं। कई बार पूरी जानकारी नहीं दी जाती, दावे बिना पक्के सबूत के होते हैं और बातें हाल की सच्चाई से मेल नहीं खातीं।

यह ट्रेंड इस बात से और बढ़ता है कि कंटेंट को कैसे दिखाया और फैलाया जाता है। भड़काऊ हेडलाइन, भावनात्मक तस्वीरें और पक्के अंदाज़ में लिखी गई बातें ये सब मिलकर ऐसा असर देती हैं जैसे सब कुछ पूरी तरह सच हो जबकि असल में बात उतनी साफ नहीं होती।

समय के साथ, बार-बार ऐसी चीजें देखने से लोगों की सोच पर असर पड़ता है। जो बात पहले सिर्फ दावा या अंदाज़ा होती है, वही बार-बार दोहराने से सच जैसी लगने लगती है। एक मशहूर कहावत है कि ‘एक झूठ अगर बार-बार बोला जाए तो वह सच जैसा लगने लगता है’। इन प्लेटफॉर्म्स का पूरा नैरेटिव इसी तरह काम करता दिखता है।

शुरुआत में सरकार की आलोचना होती है जो धीरे-धीरे देश के खिलाफ सोच में बदलती दिखती है और वही उनके कंटेंट में भी नजर आता है। जैसे ऊपर लेयर 4 में देखा गया कि ‘नीमो यादव’ नाम के अकाउंट ने भारतीय सेना का मज़ाक उड़ाय जबकि सेना किसी भी राजनीतिक दल से ऊपर होती है। लेकिन ऐसे अकाउंट किसी सीमा पर जाकर रुकते नहीं हैं। इसलिए चिंता सिर्फ एक-दो पोस्ट की नहीं है बल्कि पूरे उस सिस्टम की है जहाँ कहानी बनाने और लोगों को जोड़ने पर ज्यादा ध्यान होता है जबकि सही जानकारी और पूरा संदर्भ पीछे छूट जाता है।

अभिव्यक्ति और जिम्मेदारी के बीच संतुलन

इन अकाउंट्स पर लगी पाबंदी की चर्चा अक्सर ‘अभिव्यक्ति की आजाादी बनाम सेंसरशिप’ के रूप में होती है लेकिन यह मामला इतना सीधा नहीं है। अभिव्यक्ति की आजादी किसी भी लोकतंत्र की बुनियाद है। सवाल उठाना, आलोचना करना और असहमति जताना बहुत जरूरी है। आज के डिजिटल दौर में जहाँ जानकारी बहुत तेजी से फैलती है, वहाँ नई चुनौतियाँ भी हैं जिससे खासकर तब, जब गलत या भ्रामक जानकारी बहुत बड़े स्तर पर फैल सकती है।

इसलिए असली सवाल विचारों को दबाने का नहीं है बल्कि यह देखने का है कि क्या बार-बार अधूरी जानकारी, बिना सबूत के दावे और पहले से तय कहानी के हिसाब से बनाया गया कंटेंट भरोसेमंद माना जा सकता है। दिल्ली हाईकोर्ट में दी गई जानकारी के अनुसार, सरकार की चिंता भ्रामक जानकारी, बदनाम करने वाले कंटेंट और कानून-व्यवस्था पर उसके असर को लेकर है।

वहीं, दूसरी तरफ प्लेटफॉर्म्स यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या कार्रवाई सही तरीके से और सही सीमा में की गई है। इससे साफ है कि यह मुद्दा आसान नहीं है। लेकिन एक बात साफ है कि जब कंटेंट बार-बार सही जानकारी से ज्यादा असर पैदा करने पर ध्यान देता है, तो उस पर सवाल उठना तय है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ा जा सकता है)

पहले थे ‘बंगाली गौरव’, अब बन गए ‘बाहरी’: लिएंडर पेस के पार्टी छोड़ते ही TMC के बदले सुर, क्या ‘युसूफ पठान’ पर भी पार्टी देगी ज्ञान?

पश्चिम बंगाल की राजनीति में ‘बाहरी और भीतरी’ का पुराना खेल एक बार फिर शुरू हो गया है, लेकिन इस बार दांव उल्टा पड़ता दिख रहा है। जैसे ही महान टेनिस खिलाड़ी और ओलंपिक मेडल विजेता लिएंडर पेस BJP में शामिल हुए, TMC ने उन्हें ‘बाहरी’ (बोहिरगातो) कहना शुरू कर दिया। सोमवार (30 मार्च 2026) को दिल्ली में बीजेपी का दामन थामने वाले पेस का TMC ने सोशल मीडिया पर खूब मजाक उड़ाया।

लेकिन इस हमले से खुद TMC की दोहरी सोच की पोल खुल गई है। जिस पेस को आज TMC ‘बाहरी‘ बता रही है, वे न केवल बंगाल की महान विरासत का हिस्सा हैं, बल्कि कुछ समय पहले तक TMC के खास ‘अपने’ भी थे। जब तक वे TMC में थे तब तक बंगाली और अपने थे, और अब BJP में जाते ही बाहरी और पराए हो गए।

जब TMC में थे तब ‘बंगाली बाबू’, अब भाजपा में ‘बाहरी’?

लिएंडर पेस राजनीति में कोई नए खिलाड़ी नहीं हैं। साल 2021 में खुद ममता बनर्जी ने उन्हें बड़े सम्मान के साथ TMC में शामिल किया था। उस वक्त TMC के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट से बड़े-बड़े ट्वीट करके उनका स्वागत किया गया और उन्हें ‘बंगाल का गौरव’ बताया गया था। यहाँ तक कि गोवा के चुनावों में TMC ने पेस को अपना सबसे बड़ा चेहरा बनाकर उनसे खूब प्रचार भी करवाया।

अब सोशल मीडिया पर लोग TMC के उन्हीं पुराने ट्वीट्स को निकालकर आज के ‘बाहरी’ वाले बयान से तुलना कर रहे हैं। लोग मजे लेते हुए पूछ रहे हैं कि क्या 2021 में लिएंडर पेस ‘पक्के बंगाली’ थे और 2026 में भाजपा चुनते ही अचानक ‘बाहरी’ हो गए? यह साफ दिखाता है कि टीएमसी इस वक्त कितनी घबराई हुई है और उनके पास पेस का कोई ठोस जवाब नहीं है।

यूसुफ पठान और शत्रुघ्न सिन्हा ‘भीतरी’ कैसे?

TMC का ‘बाहरी-बाहरी’ का राग तब पूरी तरह फेल हो जाता है, जब हम उनके अपने नेताओं की लिस्ट देखते हैं। सोशल मीडिया पर लोग पुराने और नए ट्वीट्स शेयर करके TMC से कड़े सवाल पूछ रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि जो पार्टी गुजरात के यूसुफ पठान, बिहार के शत्रुघ्न सिन्हा, कीर्ति आजाद और साकेत गोखले जैसे नेताओं को बाहर से लाकर बंगाल में चुनाव लड़ाती है, वो लिएंडर पेस को ‘बाहरी’ कैसे बोल सकती है?

यूसुफ पठान गुजरात के हैं और शत्रुघ्न सिन्हा बिहार के, उनका बंगाल के जन्म या संस्कृति से कोई पुराना रिश्ता नहीं है, फिर भी TMC उन्हें ‘अपना’ मानती है। यह साफ तौर पर पार्टी का दोहरा चेहरा है, वोट के लिए बाहर के लोग भी ‘अपने’ हो जाते हैं, लेकिन बंगाल की मिट्टी के बेटे ने जैसे ही भाजपा चुनी, उसे ‘पराया’ बना दिया गया। यह दोगलापन अब जनता को अच्छी तरह समझ आ गया है।

बंगाल की मिट्टी और साहित्य से पेस का अटूट नाता

लिएंडर पेस को ‘बाहरी’ कहना असल में बंगाल की संस्कृति और इतिहास का अपमान है। पेस बंगाल के सबसे महान कवियों में से एक, माइकल मधुसूदन दत्त के परिवार से ताल्लुक रखते हैं। लिएंडर पेस की माँ खुद बंगाल की ही रहने वाली थीं और पेस का जन्म भी कोलकाता में ही हुआ था।

अपनी जड़ों पर गर्व करते हुए पेस ने भाजपा मुख्यालय में साफ कहा, “मैं एक शानदार बंगाली विरासत में पैदा हुआ हूँ।” अब जिस इंसान की रगों में बंगाल के इतने बड़े साहित्यकार का खून दौड़ रहा हो, उसे TMC के कुछ लोग ‘बाहरी’ बता रहे हैं। यह दिखाता है कि TMC के पास अब कोई ठोस मुद्दा नहीं बचा है और वे बस राजनीति के लिए किसी का भी अपमान कर रहे हैं।

विकास बनाम विभाजन की राजनीति

लिएंडर पेस ने स्पष्ट किया है कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘खेलो इंडिया’ विजन और खेल शिक्षा के जरिए बंगाल के युवाओं को सशक्त बनाने आए हैं। जहाँ भाजपा पेस के जरिए बंगाल को मॉडर्न स्पोर्ट्स हब बनाने की बात कर रही है, वहीं TMC अभी भी ‘बाहरी-भीतरी’ के पुराने और खोखले मुद्दे में फँसी हुई है।

2026 के चुनाव से पहले पेस का BJP में आना एक बड़ा संदेश है कि अब बंगाल का युवा पहचान की संकुचित राजनीति के बजाय विकास और राष्ट्रीय गौरव को चुन रहा है। TMC का यह दोहरा चेहरा अब उनके लिए ही गले की हड्डी बन गया है।

डेडलाइन से पहले डेड हुआ नक्सलवाद: जानिए कैसे मोदी सरकार के ऑपरेशन्स ने ‘लाल आतंकियों’ पर किया प्रहार, बड़े-बड़े नक्सलियों को ढेर कर जन-जन तक पहुँचाई हर सुविधा

भारत अब नक्सल मुक्त हो गया है। देश के 12 राज्यों में फैला नक्सलवाद को खत्म करने का प्रण मोदी सरकार ने 2014 में लिया था। पिछले 12 साल में बेहतर रणनीति और नक्सलियों के खिलाफ एक के बाद एक ऑपरेशन ने नक्सलवाद को घुटने पर ला दिया। इस दौरान नक्सलियों को आत्मसमर्पण कर देश की मुख्य धारा में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया गया। कई कैडर सुरक्षाबलों के ऑपरेशन में मारे गए।

सीआरपीएफ, कोबरा, राज्यों की पुलिस, डीआरजी के जवान और स्थानीय जनजातीय लोगों की विकास के प्रति जागरुकता ने इस मिशन को अंजाम तक पहुँचाया।

‘सत्ता बंदूक की नली से निकलती है’, नक्सलियों की इस ध्रुव वाक्य ने भारत को करीब 55 सालों तक लहुलुहान कर रखा। 1970 के दशक में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गाँव से इसकी शुरुआत हुई थी। इसने एक साल के अंदर 3620 घटनाओं को अंजाम दिया।

यह वह दौर था जब वामपंथी अतिवादियों ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए जनजातीय समाज के भोले-भाले लोगों का इस्तेमाल किया। जिन हाथों में कलम होनी चाहिए थी, उन हाथों में बंदूकें और हथियार पकड़ा दिए। जिन किशोरों को किताबें देनी चाहिए थी, उन्हें उन्मादी इतिहास की भटकी कहानियों और भारत विरोधी दस्तावेज पकड़ा दिए, जिन आँखों में सुंदर भविष्य के सपने और साहस बोने थे, उनमें अपने ही लोगों के प्रति नफरत के काँटे बो दिए गए। दशकों तक इसकी वजह से हजारों जवान बलिदान हुए।

2014 से प्रधान मंत्री मोदी और गृह मंत्री शाह ने नक्सलवाद के खात्मे की रणनीति बनाई। नक्सल प्रभावित लोगों को उसके गर्त से निकाल कर देश की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए शिक्षा, रोजगार, विकास के संसाधनों से जोड़ना अहम था। दूरदराज के इलाकों में पुलिस चौकी बना कर, सड़कों से जोड़ कर जनजातीय लोगों को मुख्य धारा में जोड़ने के लिए निरंतर सार्थक संवाद किया गया।

गृह मंत्री खुद उन लोगों में विश्वास पैदा करने के लिए उनकी समस्या सुनने कई जगह पहुँचे और उनका समाधान निकाला। देश की सुरक्षा, सद्भावना और समन्वय की भावना को बनाए रखने में उनकी सहभागिता तय की।

नेपाल की सीमा से आंध्रप्रदेश तक नक्सलवाद फैला था

भारत की आतंरिक सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बन वामपंथी उग्रवाद का विस्तार नेपाल की सीमा से दक्षिण भारत के आंध्रप्रदेश तक अपनी जड़ें जमाए हुए था। छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, बिहार में इनकी गतिविधियाँ भारतीय जनमानस को आहत कर रही थीं।

गृह मंत्रालय के आँकड़े के अनुसार, 2004 से 2014 के बीच नक्सली हिंसा की 16,463 घटनाएँ दर्ज की गईं। इस दौरान नक्सल हमलों में 1851 सुरक्षाकर्मियों ने बलिदानी दी, जबकि 4766 आम लोगों की भी जानें गई। 2013 में 126 जिले नक्सलवाद से प्रभावित थे, इनमें 35 सबसे ज्यादा प्रभावित जिला था। लेकिन 2026 तक आते आते इनका खात्मा करीब-करीब हो चुका है।

गृहमंत्री शाह ने संसद में ऐलान किया है कि मात्र एक नक्सली कमांडर मिशिर बेसरा बच गया है, जिससे बातचीत चल रही है। वह करीब 55 साथियों के साथ झारखंड के सारंडा की जंगलों में छिपा हुआ है।

साल 2025 में अब तक 317 नक्सलियों को मार गिराया गया है, 862 को गिरफ्तार किया गया है और 1,973 ने आत्मसमर्पण किया है।अकेले 2024 में 290 नक्सलियों को मार गिराया गया, 1,090 को गिरफ्तार किया गया और 881 ने आत्मसमर्पण किया। कुल 28 शीर्ष नक्सली नेताओं को मार गिराया गया है, जिनमें 2024 में 1 केंद्रीय समिति सदस्य और 2025 में 5 केंद्रीय समिति सदस्य शामिल हैं। प्रमुख सफलताओं में ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट में 27 कट्टर नक्सलियों का मारा जाना, 23 मई 2025 को बीजापुर में 24 का आत्मसमर्पण और अक्टूबर 2025 में छत्तीसगढ़ (197) और महाराष्ट्र (61) में 258 का आत्मसमर्पण शामिल है, जिनमें आत्मसमर्पण करने वालों में 10 वरिष्ठ नक्सली शामिल हैं।

नक्सलियों के गिरफ्त में आई थी इंदिरा गाँधी

गृह मंत्री अमित शाह ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी पर आरोप लगाया कि 1970 से लेकर 1977 तक वह माओवादी विचारधारा की गिरफ्त में आ गई थीं।उन्होंने इसे पाला-पोसा। इसका परिणाम यह हुआ कि नक्सलवाद तेजी से बढ़ा और 12 राज्यों तक फैल गया। दरअसल कॉन्ग्रेस राज में इन इलाकों में कोई विकास कार्य नहीं हुआ। जनजातीय लोगों को अनपढ़ रखने की साजिश रची गई।

देश में आजादी के बाद करीब 60 सालों तक कॉन्ग्रेस सत्ता में थी, लेकिन इन इलाकों में न तो सड़कें पहुँची और न ही विकास हुआ। यहाँ तक कि पुलिस इन इलाकों में जाने से डरती थी, क्योंकि यहाँ जाने का मतलब मौत के मुँह में समाने जैसा था। नतीजा ये था कि नक्सली जनजातीय युवाओं को सरकारी तंत्र के खिलाफ भड़का कर देश विरोधी गतिविधियों में संलिप्त करते रहे। इन इलाकों में कानून का राज नहीं था, नक्सली जो बोलते थे वही कानून था। इस दौरान करीब 20 हजार लोग मारे गए।

2014 के बाद बदल गई रणनीति

2000 के दशक में नक्सलवाद अपने चरण पर था। 2004 में आंध्र प्रदेश के सीएम वाईएसआर ने नक्सलियों से शांति समझौते की कोशिश की, लेकिन विश्वास की कमी की वजह से ये नहीं चला और नक्सली हिंसा ने जोर पकड़ा। 2010 में दंतेवाड़ा वाली घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। इसमें सीआरपीएफ के 76 जवान बलिदान हुए थे। तत्कालीन मनमोहन सरकार ने कार्रवाई की बात भी कही, लेकिन ढिलमुल रवैये की वजह से कोई सार्थक पहल नहीं की जा सकी। नक्सलियों ने 2013 में मध्यप्रदेश कॉन्ग्रेस के बड़े बड़े नेताओं को एक साथ बस्तर जिले की झीरम घाटी में मौत के घाट उतार दिया। इसमें कॉन्ग्रेस के तत्कालीन प्रदेशाध्यक्ष नंद कुमार पटेल, पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा और पूर्व केंद्रीय मंत्री- विद्याचरण शुक्ल भी शामिल थे।

2014 में केन्द्र में आई मोदी सरकार ने एक एकीकृत और सार्थक रणनीति बनाई। पहले जंगलों में बड़े पैमाने पर तलाशी ली जाती थी, जिससे नक्सलियों के लिए सुरक्षाबलों पर हमला करना आसान होता था, लेकिन अब खुफिया जानकारी के आधार पर सटीक स्ट्राइक किया जाने लगा। इसमें ड्रोन और सैटेलाइट मैपिंग जैसे आधुनिक तकनीक की मदद ली गई।

स्थानीय पुलिस और अर्धसैनिक बलों को स्पेशल बटालियन बना कर बेहतरीन तालमेल के साथ ऑपरेशन को अंजाम दिया जाने लगा। इसकी निगरानी सीधे गृह मंत्रालय कर रही थी।

राज्यों को वित्तीय सहायता दी गई

केन्द्र सरकार ने राज्यों को वित्तीय सहायता दी, ताकि खुफिया तंत्र को मजबूत कर नक्सलियों पर लगाम लगाया जा सके। सरकार ने 2022 में स्पेशल इंफ्रास्ट्रक्चर स्कीम के तहत स्पेशल फोर्सेज और स्पेशल इंटेलिजेंस ब्रांच को भी मजबूत किया। पिछले 10 सालों में राज्य पुलिस के लिए नक्सल प्रभावित इलाकों में 586 किलेबंद पुलिस स्टेशन बनाए, जिससे पुलिस की पकड़ मजबूत हुई।

एनआईए ने नक्सलवाद विरोधी एक अलग विंग बनाया। ईडी और राज्य की एजेंसियों ने मिलकर नक्सलियों की करीब 92 करोड़ की संपत्तियाँ जब्त की। लोगों तक पहुँच बनाने के लिए 12000 किलोमीटर सड़कों का निर्माण किया। इंटरनेट और मोबाइल कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए टावर लगे, ताकि लोगों तक देश दुनिया की जानकारी पहुँच सके। पुलिस तैनात किए गए और चौकियाँ बनाई गई।

आत्मसमर्पण कर मुख्य धारा में शामिल होने का मौका

नक्सली कैडरों और ईनामी नक्सलियों को देश की मुख्य धारा में शामिल करने की पूरी कोशिश की गई। उन्हें हथियार डालने पर 5 लाख रुपए, निचले कैडरों को ढाई लाख रुपए दिए गए। व्यावसायिक परीक्षण के लिए पैसे दिए गए और जमीनें दी गई ताकि ये लोग बस जाए, यानी जीवन को व्यवस्थित करने की पूरी व्यवस्था सरकार ने की। इसका असर जमीन पर दिखाई दिया।

केंद्र सरकार ने नक्सल प्रभावित 48 जिलों में कौशल विकास पहल शुरू की है, जिसके तहत 495 करोड़ रुपए के निवेश से 48 आईटीआई केन्द्र खोले गए।  नक्सल प्रभावित जिलों में 1,804 बैंक शाखाएं, 1,321 एटीएम और 37,850 बैंकिंग संवाददाता स्थापित किए गए।

बड़े-बड़े नक्सली नेता मारे गए

सुरक्षा बलों के सफल ऑपरेशन में बड़े बड़े नक्सली मारे गए। इसका परिणाम यह हुआ कि नक्सलवाद नेताविहीन हो गया। युवाओं को आकर्षित करने की क्षमता विचारधारा में नहीं रही। 2025 में नक्सलियों के एक से बढ़कर एक नेता सुरक्षाबलों के हाथों मारे गए।

सबसे बड़े नेता नम्बाला केशव राव उर्फ बसवराजू छत्तीसगढ़ में मारा गया। संगठन का एकमात्र जनजातीय नक्सली नेता माडवी हिडमा भी नवंबर 2025 में मारा गया। उसने बड़े- बड़े नक्सली घटनाओं को अंजाम दिया था। प्रताप रेड्डी उर्फ चलपति को जनवरी 2025 में छत्तीसगढ़- ओडिशा सीमा पर मार गिराया गया था। इसके अलावा कट्टा रामचंद्र रेड्डी, कदारी सत्यनारायण रेड्डी, गजरला रवि, सहदेव सोरेन, बालकृष्ण, नरसिम्हा और चेलम जैसे केंद्रीय समिति के कई अन्य सदस्य भी हाल के अभियानों में मारे गए हैं।

फरवरी 2026 में हुए एक अन्य एनकाउंटर में प्रभाकर राव, पारकल वीर, स्वामी, पडकाला स्वामी और लोकेटी चंदर राव समेत सात नक्सली नेताओं को मार गिराया गया। पिछले एक साल में 28 नक्सली नेताओं को सुरक्षा बलों ने ढेर कर दिया, जिससे नक्सली आंदोलन दिशाविहीन हुई और इसका अंत हो पाया।

हॉर्मुज के बाद ‘बाब अल-मंदेब स्ट्रेट’ पर संकट: जानें- ऊर्जा और व्यापार के लिए कितना जरूरी है ‘आँसुओं का दरवाजा’ और इसे बंद करना क्यों है मुश्किल?

मिडिल ईस्ट में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच चल रही जंग अब केवल मिसाइलों और हवाई हमलों तक सीमित नहीं रहा है। इस युद्ध का असर वैश्विक राजनीति के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर व्यापार, ऊर्जा और समुद्री मार्गों पर भी पड़ रहा है। इस संघर्ष ने दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्ते ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ को लगभग बंद कर दिया है।

ईरान ने जहाँ हॉर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते को बंद कर दिया तो वहीं अब यमन के हूतियों के इस युद्ध में कूदने के चलते अब एक और महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग ‘बाब अल-मंदेब स्ट्रेट’ के बंद होने का खतरा भी मंडरा रहा है। हूतियों ने यहाँ से गुजरने वाले जहाजों पर मिसाइल मारने की चेतावनी दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यहाँ स्थिति बिगड़ती है तो यह वैश्विक अर्थव्यवस्था को एक और बड़े झटके की ओर धकेल सकता है।

बाब अल-मंदेब: इतिहास से लेकर भूगोल और रणनीतिक महत्व तक

बाब अल-मंदेब स्ट्रेट देखने में छोटा सा समुद्री रास्ता लगता है लेकिन रणनीतिक रूप से इसकी अहमियत बड़ी है। यह एशिया और अफ्रीका के बीच पड़ता है और यमन को जिबूती और इरिट्रिया से अलग करता है। यह रास्ता लाल सागर को अदन की खाड़ी और फिर हिंद महासागर से जोड़ता है। इसलिए यह यूरोप और एशिया के बीच सामान लाने-ले जाने का एक बहुत जरूरी रास्ता है।

यह समुद्री रास्ता लगभग 100 किलोमीटर लंबा है और सबसे संकरी जगह पर करीब 30 किलोमीटर चौड़ा रह जाता है। इसी वजह से यह दुनिया के व्यापार के लिए बहुत संवेदनशील जगह माना जाती है क्योंकि यहाँ अगर कोई दिक्कत हो जाए तो बड़े-बड़े जहाजों की आवाजाही रुक सकती है। इसके बीच में पेरिम नाम का एक द्वीप है जो इसे दो हिस्सों में बाँटता है। एक हिस्सा गहरा और चौड़ा है जहाँ से बड़े अंतरराष्ट्रीय जहाज गुजरते हैं जबकि दूसरा हिस्सा उथला है जिसका इस्तेमाल ज्यादातर स्थानीय नावें करती हैं।

इसका नाम ही ‘आँसुओं का दरवाजा’ भी है और यह नाम यूँ ही नहीं पड़ा है। इसके पीछे पुरानी कहानियाँ और खतरनाक समुद्री हालात जुड़े हुए हैं। पहले के समय में यहाँ कई जहाज हादसों का शिकार हो चुके हैं। एक कहानी यह भी कही जाती है कि बहुत पहले एक भूकंप आया था जिससे एशिया और अफ्रीका अलग हो गए और यह समुद्री रास्ता बन गया।

स्वेज नहर के बाद बढ़ी अहमियत

1869 में स्वेज नहर खुलने के बाद बाब अल-मंदेब की अहमियत बहुत ज्यादा बढ़ गई। पहले जहाजों को यूरोप से एशिया जाने के लिए पूरे अफ्रीका का लंबा चक्कर लगाना पड़ता था लेकिन स्वेज नहर बनने के बाद एक छोटा और सीधा रास्ता मिल गया। इस रास्ते में बाब अल-मंदेब भी आता है और यह इसलिए बहुत जरूरी बन गया।

आज यह समुद्री रास्ता दुनिया के सबसे अहम रास्तों में से एक है। इसी के जरिए कई देशों के बीच सामान आता-जाता है। यहाँ से गुजरने वाले जहाज सिर्फ माल ही नहीं ले जाते बल्कि दुनिया की अर्थव्यवस्था को चलाने में भी बड़ी भूमिका निभाते हैं।

वैश्विक तेल सप्लाई और बाब अल-मंदेब

तेल और ऊर्जा के मामले में बाब अल-मंदेब बहुत ही अहम रास्ता है। 2023 में हर दिन करीब 9.3 मिलियन बैरल तेल और पेट्रोलियम सामान इसी रास्ते से गुजरता था। यह दुनिया के समुद्री रास्तों से होने वाले कुल तेल व्यापार का करीब 12 प्रतिशत है। इससे समझ सकते हो कि यह सिर्फ एक इलाके के लिए नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए कितना जरूरी है।

2024 में हालात अचानक बदल गए। यमन के हूती विद्रोहियों ने यहाँ से गुजरने वाले जहाजों पर हमले शुरू कर दिए। इसके बाद इस रास्ते से गुजरने वाला तेल घटकर लगभग 4.1 मिलियन बैरल प्रति दिन रह गया यानी पहले के मुकाबले लगभग आधा हो गया। इसका असर सिर्फ तेल तक सीमित नहीं रहा बल्कि दुनिया भर में सप्लाई, कीमतों और व्यापार पर भी पड़ा।

इसका असर स्वेज नहर और उससे जुड़ी पाइपलाइन पर भी देखने को मिला और यहाँ तेल का आना-जाना काफी कम हो गया। इससे साफ है कि अगर बाब अल-मंदेब में थोड़ी भी गड़बड़ी होती है तो उसका असर पूरी दुनिया पर पड़ता है।

हॉर्मुज और बाब अल-मंदेब: दोहरे संकट का खतरा

अभी हालात इसलिए ज्यादा गंभीर माने जा रहे हैं क्योंकि परेशानी सिर्फ एक समुद्री रास्ते तक सीमित नहीं है। एक तरफ हॉर्मुज जलडमरूमध्य में पहले से ही तनाव है इस रास्ते से दुनिया का करीब 20 से 25 प्रतिशत तेल गुजरता है। अब बाब अल-मंदेब पर भी खतरा बढ़ता जा रहा है।

अगर ये दोनों रास्ते एक साथ प्रभावित होते हैं तो दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का करीब 30 से 35 प्रतिशत हिस्सा खतरे में आ सकता है। इसका सीधा असर तेल की कीमतों पर पड़ेगा और कई देशों की अर्थव्यवस्था हिल सकती है।

बाब अल-मंदेब में गड़बड़ी का असर शिपिंग पर भी साफ दिखेगा जब जहाज इस रास्ते से नहीं जा पाते तो उन्हें अफ्रीका के चारों ओर लंबा रास्ता लेना पड़ता है। इससे यात्रा का समय 27 दिनों से बढ़कर 40 से 50 दिन तक हो जाता है। जाहिर है कि इससे ईंधन ज्यादा लगता है और खर्च भी बढ़ जाता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस वजह से हर बैरल तेल को ले जाने में करीब 2 डॉलर ज्यादा खर्च आ रहा है। इसके अलावा बड़े तेल टैंकरों का किराया भी बहुत बढ़ गया है जो कुछ मामलों में 7 लाख डॉलर प्रति दिन तक पहुँच चुका है।

भारत पर पड़ सकता है क्या असर?

भारत के लिए यह स्थिति पूरी तरह खराब नहीं है लेकिन चिंता की बात जरूर है। ऐसा इसलिए क्योंकि भारत के तेल आयात का बड़ा हिस्सा बाब अल-मंदेब के रास्ते नहीं आता जिससे इसका सीधा असर थोड़ा कम पड़ता है। हालाँकि, दूसरी तरफ होर्मुज जलडमरूमध्य में पहले से तनाव चल रहा है और इसका असर साफ तौर पर भारत पर भी पड़ रहा है।

सरकार ने पहले ही किसी भी खतरे की स्थिति को सँभालने के लिए तेल खरीदने के स्रोत बढ़ा दिए हैं और रूस से भी आयात में तेजी आने की संभावना है। इससे फिलहाल स्थिति काबू में है लेकिन अगर लंबे समय तक तनाव बना रहा तो असर दिख सकता है। खासकर तब जब तेल और गैस को लाने-ले जाने की लागत बढ़ जाती है।

एक और बड़ी बात यह है कि बाब अल-मंदेब से सिर्फ तेल ही नहीं बल्कि बहुत सारा और सामान भी आता-जाता है। दुनिया के 15 से 20 प्रतिशत कंटेनर इसी रास्ते से गुजरते हैं जिनमें मशीनरी, खाने-पीने का सामान और दूसरी जरूरी चीजें शामिल होती हैं। अगर यह रास्ता प्रभावित होता है तो सामान देर से पहुँचेगा, खर्च बढ़ेगा और इसका असर आम लोगों पर महँगाई के रूप में दिख सकता है।

क्यों मुश्किल है बाब अल-मंदेब को बंद करना?

बाब अल-मंदेब को पूरी तरह बंद करना व्यावहारिक रूप से बेहद कठिन है और इसके पीछे कई भू-राजनीतिक, सैन्य और भौगोलिक कारण एक साथ काम करते हैं। सबसे पहले इसकी संरचना को समझना जरूरी है कि यह कोई संकरा ‘चोक पॉइंट’ नहीं है जहाँ एक-दो जहाज डुबोकर रास्ता रोका जा सके बल्कि लगभग 30 किलोमीटर चौड़ा एक खुला समुद्री मार्ग है जिसमें अलग-अलग चैनल और रास्ते मौजूद हैं, जिससे बड़े-बड़े तेल टैंकर और कंटेनर जहाज कई दिशाओं से गुजर सकते हैं।

इसी वजह से यहाँ ‘डेड-एंड ब्लॉकेज’ बनाना लगभग असंभव हो जाता है जबकि ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ जैसे स्थानों पर अपेक्षाकृत संकरी निकासी होने के कारण नियंत्रण करना सैद्धांतिक रूप से आसान माना जाता है।

दूसरा बड़ा कारण इस क्षेत्र की भारी अंतरराष्ट्रीय सैन्य मौजूदगी है। अफ्रीका के तट पर स्थित जिबूती भले ही छोटा देश है लेकिन यहाँ अमेरिका, फ्रांस, चीन और अन्य देशों के सैन्य अड्डे मौजूद हैं जो इस समुद्री मार्ग को सुरक्षित रखने के लिए हर समय निगरानी और त्वरित कार्रवाई की क्षमता रखते हैं। ऐसे में कोई भी देश या संगठन अगर इसे बलपूर्वक बंद करने की कोशिश करता है, तो वह सीधे वैश्विक सैन्य टकराव को न्योता देगा।

तीसरा पहलू हूती जैसे विद्रोही हैं जो मिसाइल, ड्रोन या समुद्री हमलों के जरिए जहाजों को निशाना बनाकर डर और अनिश्चितता जरूर पैदा कर सकते हैं लेकिन वे भी इस स्ट्रेट को भौतिक रूप से सील नहीं कर सकते क्योंकि इसके लिए लगातार और व्यापक सैन्य नियंत्रण चाहिए होता है जो उनके बस की बात नहीं है।

32 साल पहले कजाकिस्तान में जो क्लिंटन ने किया, क्या ईरान में वही दोहरा पाएँगे ट्रंप?: जानें- ईरान से 450 किलो यूरेनियम छीनना कितना मुश्किल

मिडिल ईस्ट के अखाड़े में एक बार फिर जबरदस्त ‘कुश्ती’ शुरू होने वाली है और इस बार दाँव पर है परमाणु बम का मसाला। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इशारा दे दिया है कि वो ईरान के खजाने से उसका ‘यूरेनियम’ (Enriched Uranium) उड़ाने के लिए एक खतरनाक ‘ग्राउंड ऑपरेशन’ यानी जमीनी धावा बोल सकते हैं। यह कोई छोटा-मोटा मिशन नहीं है, बल्कि इसे दुनिया का सबसे टेढ़ा और जोखिम भरा ऑपरेशन कहा जा रहा है।

अमेरिका का टारगेट है ईरान के पास मौजूद वो 450 किलो यूरेनियम, जिससे चुटकियों में 10 से 11 परमाणु बम तैयार किए जा सकते हैं। आसान भाषा में कहें तो ट्रंप अब ‘मिशन इम्पॉसिबल’ वाले अंदाज में ईरान के घर में घुसकर उसका सबसे खतरनाक सामान जब्त करने के मूड में हैं।

ट्रंप की रणनीति: ‘ऑयल’ और ‘यूरेनियम’ पर कब्जा

सीधे शब्दों में कहें तो ट्रंप अब ‘पहले तेल, फिर खेल’ वाली नीति पर उतर आए हैं। उनका सीधा हिसाब है ‘या तो ईरान शांति से मेज पर आकर बात मान ले, वरना अमेरिका उसके कमाई के सबसे बड़े अड्डे, यानी ‘खार्ग आइलैंड‘ के तेल पर ही कब्जा कर लेगा’। ट्रंप की नजर सिर्फ तेल पर नहीं, बल्कि ईरान की परमाणु ‘तिजोरी’ पर भी है। इसके लिए पेंटागन ने एक ऐसा प्लान तैयार किया है जिसे सुनकर किसी भी फिल्म की स्क्रिप्ट फीकी पड़ जाए। उनके स्पेशल कमांडो सीधे ईरान की सीमा फाँदकर वहाँ रखा परमाणु बारूद (यूरेनियम) उठा लाने की तैयारी में हैं।

जानकारों का मानना है कि ट्रंप फिलहाल अपनी सेना दिखाकर ईरान को डरा रहे हैं ताकि वह घुटने टेक दे। लेकिन अगर ईरान ने प्यार की भाषा नहीं समझी और अपना यूरेनियम नहीं सौंपा, तो अमेरिका ‘छीना-झपटी’ यानी जबरदस्ती कब्जा करने से भी पीछे नहीं हटेगा। इसके लिए खाड़ी के इलाके में अमेरिकी फौजियों का मेला लग गया है। 50,000 जवान पहले से तैनात हैं और खबर है कि 17,000 और ‘मैदानी लड़ाके’ वहाँ लैंड करने वाले हैं। यानी माहौल पूरी तरह गरम है।

पेंटागन की तैयारी: समंदर से आसमान तक घेराबंदी

अब जरा मंजर सोचिए, समंदर के रास्ते लोहे के बड़े-बड़े पहाड़ तैरते हुए ईरान की तरफ बढ़ रहे हैं। अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने पक्का कर दिया है कि USS Tripoli जैसा दैत्यनुमा युद्धपोत मिडिल ईस्ट के पानी में लंगर डाल चुका है। ये कोई मामूली जहाज नहीं है, बल्कि चलता-फिरता फौजी अड्डा है। इसके पीछे-पीछे यूएसएस बॉक्सर, यूएसएस कॉम्स्टॉक और यूएसएस पोर्टलैंड (USS Boxer, USS Comstock, USS Portland) जैसे खूंखार युद्धपोतों की पूरी फौज भी रास्ते में है।

इन जहाजों के पेट में हजारों की संख्या में ‘मरीन कमांडो’, आसमान चीरने वाले ‘फाइटर जेट’ और ऐसी मशीनें भरी हैं जो पलक झपकते ही ईरान के द्वीपों या परमाणु ठिकानों पर ‘आसमानी धावा’ बोल सकती हैं। खास बात ये है कि इन्हें हमला करने के लिए किसी जमीन या बेस की जरूरत नहीं, ये समंदर से ही सीधा ‘एक्शन’ शुरू कर सकते हैं।

जानकारों की मानें तो अमेरिका का इरादा कोई सालों साल चलने वाली महाभारत छेड़ने का नहीं है। उनका गेम प्लान एकदम ‘फटाफट’ वाला है। यानी ‘आओ, मारो और सामान लेकर निकलो’। इसे आप एक बड़े लेवल की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ समझ सकते हैं। इस काम के लिए अमेरिका ने अपनी सबसे घातक ‘82nd एयरबोर्न डिवीजन‘ के 4,000 जांबाज जवानों को ‘रैपिड एंट्री फोर्स’ के तौर पर बिल्कुल रेडी रखा है।

इनका काम होगा बिजली की फुर्ती से दुश्मन के इलाके में घुसना। पुराने नौसेना दिग्गजों का कहना है कि ईरान के टापुओं पर कब्जा करना तो मुमकिन है, लेकिन असली सिरदर्दी ये है कि इस ‘लूट’ को कितनी जल्दी अंजाम दिया जाए। क्योंकि जब तक ये हंगामा चलेगा, दुनिया का सबसे बिजी समुद्री रास्ता ‘होर्मुज’ बंद रहेगा, जिससे पूरी दुनिया के व्यापार का भट्ठा बैठ सकता है। इसलिए अमेरिका की कोशिश है कि काम भी हो जाए और देर भी न लगे।

ईरान का अभेद्य किला: इस्फहान और नतांज की सुरंगें

अब जरा सोचिए, ईरान का यह ‘परमाणु खजाना’ कोई ऐसी वैसी तिजोरी नहीं है जिसे मास्टर-की से खोल लिया जाए। यह तो समझ लीजिए कि पाताल लोक में छिपा कोई खजाना है। दुनिया की नजर रखने वाली संस्था (IAEA) कहती है कि ईरान ने अपना सारा यूरेनियम इस्फहान और नतांज जैसी जगहों पर जमीन के नीचे गहरी सुरंगों और बंकरों में ठूँस रखा है।

इन बंकरों के ऊपर कंक्रीट की इतनी मोटी परतें हैं कि बम भी शरमा जाएँ। अमेरिकी कमांडोज के लिए चुनौती सिर्फ अंदर घुसना नहीं है, बल्कि वहाँ बिछी बिछी ‘मौत की सुरंगों’ (लैंडमाइन्स) और जान देने को तैयार बैठे ईरानी सैनिकों के जबरदस्त घेरे को तोड़ना है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे किसी जलते हुए ज्वालामुखी के अंदर घुसकर हीरा निकालना हो!

ऊपर से मुसीबत ये कि यह यूरेनियम कोई छोटी-मोटी पुड़िया नहीं है। वॉल स्ट्रीट जर्नल की मानें तो यह बारूद 40 से 50 भारी-भरकम सिलेंडरों में भरा है, जो देखने में बिल्कुल गोताखोरों के ‘स्कूबा टैंक’ जैसे लगते हैं। अब इन भारी और रेडियोएक्टिव सिलेंडरों को कंधे पर लादकर तो भागा नहीं जा सकता। इन्हें सुरक्षित निकालने के लिए खास किस्म के ट्रकों का काफिला और एक पूरा तामझाम (लॉजिस्टिक सिस्टम) चाहिए होगा।

सबसे बड़ा सिरदर्द तो ये है कि इन सिलेंडरों को ईरान से बाहर ले जाने के लिए एक पूरे हवाई अड्डे पर कब्जा करना पड़ेगा, जिसमें घंटों नहीं बल्कि कई दिन लग सकते हैं। अब आप ही सोचिए, दुश्मन के घर में बैठकर आराम से ट्रक लोड करना और विमान का इंतजार करना किसी ‘सुसाइड मिशन’ से कम नहीं है। जरा सी चूक हुई नहीं कि पूरा मिशन धुआँ-धुआँ हो सकता है।

32 साल पहले का ‘प्रोजेक्ट सफायर’: जब कजाकिस्तान से निकला था यूरेनियम

ट्रंप के इस ‘सुपरमैन’ वाले प्लान के पीछे असल में 32 साल पुरानी एक फिल्मी कहानी छिपी है, जिसका नाम था ‘प्रोजेक्ट सफायर‘। बात 1994 की है, जब सोवियत संघ (रूस) ताश के पत्तों की तरह बिखर गया था। उस अफरा-तफरी में कजाकिस्तान के एक पुराने, कबाड़ जैसे गोदाम में 600 किलो हाई-क्वालिटी यूरेनियम लावारिस पड़ा मिला। यह कोई मामूली कूड़ा नहीं था, बल्कि इससे 20 परमाणु बम बन सकते थे। डर यह था कि अगर यह किसी आतंकी या स्मगलर के हाथ लग गया, तो दुनिया का नक्शा ही बदल जाएगा।

तभी मैदान में आए तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन। उन्होंने चुपके से एक जासूसी फिल्म जैसा मिशन शुरू किया। 31 लोगों की एक ‘स्पेशल टीम’ बनाई गई, जिसमें फौजी नहीं बल्कि चश्मा लगाने वाले वैज्ञानिक और टेक्नीशियन शामिल थे। ये लोग तीन भीमकाय C-5 Galaxy विमानों में बैठकर कजाकिस्तान के बर्फीले इलाके में उतरे। वहाँ का नजारा ऐसा था कि हड्डियाँ गला देने वाली ठंड, चारों तरफ बर्फ की मोटी चादर और ऊपर से जानलेवा रेडिएशन का खतरा।

इस टीम ने पूरे 4 हफ्तों तक चूहे की तरह छुप-छुपकर काम किया। दिन-रात एक करके उन्होंने उस ‘परमाणु बारूद’ को खास डिब्बों में पैक किया और दुनिया की नजरों से बचाकर अमेरिका के टेनेसी सुरक्षित पहुँचा दिया। जब सारा माल ठिकाने लग गया, तब कहीं जाकर 23 नवंबर 1994 को क्लिंटन ने दुनिया को बताया कि ‘भैया, हमने दुनिया को एक बड़ी तबाही से बचा लिया है।’ आज ट्रंप भी ठीक वैसी ही ‘लूट’ ईरान में करना चाहते हैं, बस फर्क ये है कि वहाँ कोई स्वागत करने के लिए खड़ा नहीं है।

कजाकिस्तान और ईरान: जमीन-आसमान का अंतर

ट्रंप 32 साल पुराने ‘प्रोजेक्ट सफायर’ वाली कामयाबी फिर से दोहराना तो चाहते हैं, लेकिन भाई साहब। कजाकिस्तान और ईरान की कहानी में जमीन-आसमान नहीं, बल्कि पाताल का अंतर है। इसे ऐसे समझिए कि एक तरफ किसी दोस्त के घर जाकर शांति से सामान पैक करना था, और दूसरी तरफ किसी गुस्सैल पहलवान के घर में सेंधमारी करनी है।

सबसे बड़ा पंगा तो ‘दोस्ती और दुश्मनी’ का है। कजाकिस्तान में तो वहाँ की सरकार ने खुद रेड कार्पेट बिछाकर अमेरिकियों को बुलाया था ‘आओ भाई, ये खतरनाक कूड़ा ले जाओ।’ वहाँ कोई गोली चलने का डर नहीं था। लेकिन ईरान? वहाँ तो पहले से ही बम-गोले बरस रहे हैं। यहाँ मिशन का मतलब है ‘हर मोड़ पर गोलियाँ, सिर के ऊपर मंडराती मिसाइलें और चारों तरफ बिछी बारूदी सुरंगे’। ये कोई ‘पिकनिक’ नहीं, बल्कि खूंखार ‘कॉम्बैट ऑपरेशन’ होगा, जहाँ पल-पल पर जान का खतरा है।

ऊपर से ईरान कोई कच्चा खिलाड़ी नहीं है। उसके पास खतरनाक ड्रोन्स, सटीक मिसाइलें और जान देने को तैयार बैठी एक ट्रेंड फौज है। अगर अमेरिका ने ईरान के ‘परमाणु खजाने’ को हाथ भी लगाया, तो तेहरान अपनी मिसाइलों की ऐसी बौछार करेगा कि पूरे मिडिल ईस्ट में आसमान काला पड़ जाएगा। कजाकिस्तान में तो बस ठंड और बर्फ से बचना था, लेकिन ईरान में तो ‘रेडियोएक्टिव’ सिलेंडरों को मलबे और आग के बीच से निकालना होगा। टूटी हुई न्यूक्लियर साइट्स से गैस से भरे टैंकों को ढोना किसी ‘सुसाइड मिशन’ से कम नहीं है। जरा सी गैस लीक हुई या किसी ने माचिस दिखाई, तो लेने के देने पड़ जाएँगे।

ट्रंप का ‘परमाणु जुआ’: जीत मिली तो इतिहास, चूके तो महाविनाश

ईरान से यूरेनियम झपट लेने का यह प्लान सिर्फ फौजियों की बहादुरी का टेस्ट नहीं है, बल्कि ट्रंप के लिए एक बहुत बड़ा ‘सियासी जुआ’ भी है। एक तरफ तो ट्रंप ने सीना ठोककर अपने देश के लोगों से वादा किया है कि वो अमेरिका को मिडिल ईस्ट की किसी भी ‘खूनी जंग’ के दलदल में नहीं फँसाएँगे। लेकिन दूसरी तरफ, ईरान की धरती पर अपने सैनिकों को उतारना सीधा-सीधा उसी दलदल में छलाँग लगाने जैसा है। अब मुसीबत ये है कि बिना जमीन पर पैर रखे यूरेनियम हाथ लगेगा नहीं और पैर रखा तो वादे का क्या होगा? यह तो वही बात हो गई कि ‘सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे’, जो कि इस मामले में लगभग नामुमकिन है।

जरा सोचिए, अगर यह मिशन कामयाब हो गया, तो यह दुनिया के इतिहास का सबसे तगड़ा और जांबाज सैन्य कारनामा माना जाएगा, बिल्कुल किसी ब्लॉकबस्टर फिल्म की तरह। लेकिन अगर कहीं भी एक छोटी सी चूक हो गई, तो अंजाम बहुत डरावना होगा। न केवल भारी संख्या में अमेरिकी जवानों की जान जाएगी, बल्कि पूरा का पूरा इलाका एक ऐसे परमाणु बारूद के ढेर पर बैठ जाएगा जहाँ से वापस लौटने का कोई रास्ता नहीं होगा।

सबसे बड़ा पंगा तो ‘दोस्त और दुश्मन’ का है। 32 साल पहले कजाकिस्तान में अमेरिका को एक मुस्कुराता हुआ ‘दोस्त’ मिला था, जिसने खुद अपनी तिजोरी की चाबियाँ थमा दी थीं। मगर यहाँ ईरान में उसका सामना एक ऐसे ‘जहरीले दुश्मन’ से है जो अपने परमाणु गौरव को बचाने के लिए आखिरी साँस तक लड़ने का दम रखता है। ऐसे में ट्रंप के लिए 1994 वाला इतिहास दोहराना, साल 2026 की कड़वी हकीकत में किसी ‘मिशन इम्पॉसिबल’ से कम नहीं लगता। अब देखना ये है कि ट्रंप इस जुए में बाजी मारते हैं या फिर ये मिशन उनके लिए ही सिरदर्द बन जाता है।

नितिन गडकरी मानहानि मामले में इन्फ्लुएंसर को मिला नोटिस, लेकिन ‘द कारवाँ’ को नहीं: जानिए कैसे सावधानी से की गई व्याख्या और दावे के बीच के अंतर ने मैगजीन को बचाया

केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने अंबेडकरवादी इन्फ्लुएंसर मुकेश मोहन पर ₹50 करोड़ का मानहानि ठोका है। वामपंथी विचारधारा वाले इन्फ्लुएंसरों और प्रोपेगेंडा करने वाले तुरंत इसके खिलाफ खड़े हो गए। इनलोगों ने सोशल मीडिया पर ‘लोकतंत्र के लिए खतरा’ और ‘अभिव्यक्ति की आजादी को दबाने का प्रयास’ जैसे दावे करने लगे। लेकिन किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले, एक बुनियादी सवाल की जाँच करना जरूरी है- वह यह है कि मूल रिपोर्ट में असल में क्या कहा गया था, और वायरल वीडियो ने उन दावों को किस हद तक बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया?

वायरल वीडियो में क्या दावा किया गया था?

मुकेश मोहन नाम के एक इंस्टाग्राम इन्फ्लुएंसर ने अपनी एक रील में दावा किया कि नितिन गडकरी गौवंश का माँस बेचते हैं। अपनी रील में उन्होंने कहा, “महाराष्ट्र पुलिस ने ‘रेम्बल एग्रो एंड फूड्स’ कंपनी के एक ट्रक को जब्त किया है, जो बीफ (गाय का माँस) ले जा रहा था। ‘द कारवाँ’ मैगजीन की रिपोर्ट के अनुसार, इस कंपनी के मालिक BJP नेता नितिन गडकरी हैं।”

वायरल वीडियो ने रिपोर्ट के नतीजों का सिर्फ विश्लेषण या उन पर सवाल ही नहीं उठाया, बल्कि उससे आगे बढ़ कर पूरे दावे को ‘सच’ की तरह पेश किया। उसने दावा किया कि केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का एक ऐसी कंपनी से संबंध है जो बीफ (beef) बेचने का काम करती है। इसे इंफ्लुएंसर मोहन ने ‘गाय का माँस’ बताया। ये दावे इतने यकीन के साथ किए गए कि इसमें कोई शक की गुंजाइश ही नहीं रही।

आरोप और साबित हो चुके सच के बीच का फर्क मिटा दिया गया। उसने पूरी कहानी बताते वक्त कहीं ये नहीं कहा कि मामले की जाँच चल रही है। इसे सत्यापित नहीं किया जा सकता आदि। असल में यही से समस्या शुरू हुई। किसी दावे की मजबूती इस बात पर निर्भर नहीं करती कि उसे कितनी जोर-शोर से किया गया है, बल्कि इस बात पर निर्भर करती है कि क्या उसके पीछे ऐसे सबूत हैं, जिनकी जाँच की जा सके।

ऐसा लगता है कि यह वीडियो, व्यापारिक संबंधों और तथ्यों को इस तरह उलझा कर पेश किया जैसे ये आरोप नहीं बल्कि सबूत के साथ पेश किया गया सच हो। ये सिर्फ मामले का विश्लेषण नहीं, सीधा-सीधा दावे की तरह कहा गया।

‘द कारवाँ’ (Caravan) की रिपोर्ट में क्या है?

असल में, मुद्दा यह नहीं है कि रिपोर्ट पर चर्चा, आलोचना या उस पर सवाल उठाया जा सकता है या नहीं। मुद्दा यह है कि लोगों ने उस रिपोर्ट को कैसे समझा और, इससे भी ज्यादा जरूरी बात यह है कि उसे जनता के सामने किस तरह पेश किया गया। मूल रिपोर्ट को ध्यान से पढ़ने पर एक ऐसी तस्वीर सामने आती है जो वायरल दावों से कहीं ज्यादा गहरी और सावधानी से कही गई है। सबसे अहम बात यह है कि रिपोर्ट गडकरी के खुद के मालिकाना हक या कामकाज पर सीधे तौर पर कोई दावा नहीं करती है।

इसमें ऐसे किसी भी संबंध को साबित करने वाला कोई भी आधिकारिक खुलासा नहीं किया गया है, भले ही यह सुझाव दिया गया हो कि ये संस्थाएँ असल में एक-दूसरे से काफी करीब हो सकती हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन सभी सबूतों के बावजूद जो यह दिखाते हैं कि ‘रेम्बल’ (Rembal) और ‘सियन एग्रो’ (Cian Agro) सिर्फ क्लाइंट और कस्टमर से कहीं ज़्यादा हैं, इन दोनों संस्थाओं के बीच के संबंध के बारे में कुछ और नहीं कहा गया है। दूसरे शब्दों में कहें तो, ‘ द कारवाँ’ ने कभी यह दावा नहीं किया कि नितिन गडकरी किसी बीफ बेचने वाली कंपनी के ‘मालिक’ हैं।

माँस के व्यापार का मुद्दा भी काफी सावधानी के साथ पेश किया गया है। इस पूरे मामले के मूल में गाय माँस का व्यापार ही है। संबंधित कंपनी का कहना है कि वह भैंस के माँस का व्यापार करती है, जिसकी कानूनी तौर पर इजाजत है। साथ ही, रिपोर्ट इस बात पर भी उंगलियाँ उठाती है कि उत्पादों का वर्णन कभी ‘भैंस का माँस’ के तौर पर किया जाता है, तो कभी ‘बीफ’ के तौर पर। इससे लेबलिंग में कुछ हद तक अस्पष्टता (ambiguity) आती है। खास बात यह है कि जब्त किए गए ट्रक के मामले में भी, अदालत ने यह पक्के तौर पर तय नहीं किया कि माँस गाय का था या भैंस का। अदालत ने पेश किए गए दस्तावेजों में कमियों की बात कही है।

कुल मिलाकर, यह रिपोर्ट कई सवाल और विसंगतियों की बात करती है। लेकिन, यह किसी ऐसे पक्के नतीजे पर नहीं पहुँचती कि गडकरी उस कंपनी के मालिक हैं, वह कारोबार चलाते हैं, या किसी भी गैर-कानूनी गतिविधि में सीधे तौर पर शामिल हैं।

तो, असली मुद्दा यह नहीं है कि क्या रिपोर्ट ने कुछ असहज सवाल उठाए हैं। उसने उठाए हैं। असली मुद्दा यह है कि क्या उन सवालों को बिना किसी ठोस सबूत के दावों की तरह पेश किया जा सकता है। कहा जा सकता है कि उसने लक्ष्मण रेखा पार कर दी।

‘कारवाँ’ का सावधानी बरतना बनाम इन्फ्लुएंसर का सीधे-सीधे आरोप लगाना

यह विवाद सिर्फ रिपोर्ट पर चर्चा करने से पैदा नहीं हुआ है, बल्कि इस बात से पैदा हुआ है कि रिपोर्ट की व्याख्या कैसे की गई और उसे कैसे पेश किया गया। असल में, मूल रिपोर्ट में आपसी जुड़ाव, एक जैसी बातों और विसंगतियों का ज़िक्र है, लेकिन इसमें कोई पक्का नतीजा नहीं निकाला गया है। यह कोई फैसले पर नहीं पहुँचती बल्कि सवाल उठाती है। जहाँ कहीं भी जुड़ाव काफ़ी ज़्यादा दिखते हैं, वहाँ भी रिपोर्ट यह मानती है कि केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का सीधा मालिकाना हक या नियंत्रण साबित करने वाला कोई भी औपचारिक रूप से घोषित रिश्ता मौजूद नहीं है।

यह सावधानी जान-बूझकर बरती गई है, जो खोजी पत्रकारिता की प्रकृति को दर्शाती है। यह अक्सर पक्के सबूतों के बजाय अनुमान और पैटर्न पर निर्भर करती है। हालाँकि, वायरल वीडियो इस दायरे से अलग हटता हुआ प्रतीत होता है। इस मुद्दे को व्यावसायिक संबंधों वाला मामला न बताते हुए यह सीधे तौर पर शामिल होने वाले मामले के रूप में दिखाता है। माँस की प्रकृति को लेकर भी वीडियो में ‘भैंस का माँस’ और ‘बीफ’ के बीच नहीं किया गया है। वीडियो में साफ तौर पर गाय के माँस का जिक्र है।

यह केवल ज़ोर देने का मामला नहीं है, बल्कि अर्थ का अनर्थ निकलने जैसा है। कानून और पत्रकारिता, दोनों में ही, किसी संभावना का सुझाव देने और किसी तथ्य का दावा करने के बीच एक स्पष्ट अंतर होता है। पहला (संभावना) जाँच-पड़ताल को आमंत्रित करता है; दूसरा (तथ्य) सबूत की माँग करता है। इस अंतर को मिटाकर, वीडियो एक खोजी पत्रकारिता की कहानी को एक स्पष्ट आरोप में बदल देता है। अनुमान और दावे के बीच के अंतर को मिटा दिया गया है। इस नजरिए से कहा जाए तो इसने सीमा का उल्लंघन किया है।

मानहानि किसे कहते हैं?

मूल रूप से, मानहानि उन बयानों से संबंधित है जो किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाते हैं। बगैर सबूत वाले, झूठे दावों को तथ्यों के रूप में प्रस्तुत करके ऐसा किया जाता है। मुख्य मुद्दा यह नहीं है कि कोई विषय विवादास्पद है या राजनीतिक रूप से संवेदनशील, बल्कि यह है कि आरोपों को साबित करने के लिए सबूत हैं या नहीं। जब किसी व्याख्या को बिना किसी ठोस आधार के तथ्य के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो उसके मानहानि के दायरे में आने का जोखिम होता है। यह भी ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि कानून आलोचना या जाँच को नहीं रोकता है। यह जिस चीज को नियंत्रित करना चाहता है, वह है अप्रमाणित आरोपों को सत्य के रूप में प्रस्तुत करना। इससे किसी की प्रतिष्ठा धुमिल होती है।

प्रकाशक के बजाय इन्फ्लुएंसर को क्यों टारगेट किया गया

ऑनलाइन उठाया जा रहा एक मुख्य तर्क यह है कि मूल प्रकाशक के बजाय इंफ्लुएंसर के खिलाफ कानूनी कार्रवाई क्यों शुरू की गई है। यहीं पर रिपोर्टिंग और पुनर्व्याख्या के बीच का अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। अपने आलोचनात्मक लहजे के बावजूद, मूल रिपोर्ट के शब्द बहुत सावधानी से चुने गए हैं। यह लगातार ऐसी भाषा का उपयोग करती है जो अनिश्चितता को दर्शाती है। प्रश्न उठाती है और स्पष्ट रूप से औपचारिक सबूतों की अनुपस्थिति का उल्लेख करती है। यह सीधे तौर पर यह दावा नहीं करता कि नितिन गडकरी किसी बीफ बेचने वाली कंपनी के मालिक हैं या उसे चलाते हैं।

जबकि यह वीडियो द कारवाँ की सतर्क कहानी को एक सीधे आरोप में बदल देता है। यहाँ तक कि वह पेश किए गए दावे की जिम्मेदारी लेता है। इसलिए, कानूनी दायित्व केवल रिपोर्ट पर चर्चा करने से उत्पन्न नहीं होता है। यह तब उत्पन्न होता है जब कोई व्यक्ति उस जानकारी को बिना पर्याप्त सबूत के एक निश्चित दावे के रूप में फिर से पेश करता है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम ज़िम्मेदारी: विकिमीडिया-ANI संदर्भ

इस विवाद के इर्द-गिर्द की व्यापक बहस ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कथित दमन के बारे में भी चिंताएँ पैदा की हैं। हालाँकि, कानूनी मिसालें एक अधिक सूक्ष्म स्थिति का सुझाव देती हैं। एशियन न्यूज़ इंटरनेशनल और विकिमीडिया फ़ाउंडेशन से जुड़े मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने ‘खुले न्याय’ के सिद्धांत को बरकरार रखा, यह पुष्टि करते हुए कि सार्वजनिक हित के मामलों और अदालती कार्यवाही पर जनता चर्चा कर सकती है।

यह घटना एक महत्वपूर्ण अंतर को रेखांकित करती है जो अक्सर वायरल युग में धुंधला होता जा रहा है। खोजी रिपोर्टों का उद्देश्य अंतिम उत्तर देना नहीं होता है; उनका उद्देश्य लोगों को सोचने पर मजबूर करना होता है। जबकि पूरा वामपंथी खेमा इसे लोकतंत्र के लिए खतरा बताता है, वे भावनात्मक भावनाओं को जोड़कर उसका समर्थन करते हैं। जब उन सवालों को बिना किसी सबूत के स्पष्ट दावों में बदल दिया जाता है, तो बातचीत का स्वरूप ही बदल जाता है।

तो समस्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सेंसरशिप के बीच नहीं है। यह व्याख्या बनाम आरोप का मामला है। सवाल उठाने, आलोचना करने और विश्लेषण करने का अधिकार अभी भी बहुत महत्वपूर्ण है। साथ ही, यह सुनिश्चित करने का कर्तव्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि जो कहा जा रहा है वह सत्य हो।

(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

भारत में बैन हुए चाइनीज CCTV कैमरे, पहले से देसी कंपनियाँ बना चुकी हैं 80% पर कब्जा: जानें- इजरायल की ईरान पर हमले के बाद कैसे ‘कनेक्टेड आँखें’ बनी नेशनल सिक्योरिटी का मुद्दा

भारत में निगरानी व्यवस्था यानी सर्विलांस सिस्टम में अब बड़ा बदलाव होने जा रहा है। 01 अप्रैल 2026 से सरकार नए सख्त नियम लागू करने जा रही है, जिसके बाद चीन की कई सीसीटीवी कंपनियाँ जैसे टीपी लिंक, हिकवीजन और दहुआ भारतीय बाजार से लगभग बाहर हो जाएँगी। सरकार ने साफ कर दिया है कि अब इंटरनेट से जुड़ी वही कैमरा डिवाइस भारत में बिक सकेंगी, जिनके पास जरूरी सुरक्षा सर्टिफिकेट होगा। यह सर्टिफिकेट STQC यानी सरकारी जाँच प्रक्रिया के तहत मिलता है। जिन कंपनियों ने यह सर्टिफिकेट नहीं लिया है, वे अब अपने प्रोडक्ट भारत में नहीं बेच पाएँगी।

इस फैसले के पीछे सबसे बड़ी वजह देश की सुरक्षा मानी जा रही है। सरकार चाहती है कि भारत में इस्तेमाल होने वाले सभी निगरानी उपकरण सुरक्षित हों और उनका डेटा देश के लिए खतरा न बने। इसके साथ ही सरकार भरोसेमंद सप्लाई चेन और डेटा की सुरक्षा यानी डेटा संप्रभुता पर भी जोर दे रही है।

बाजार में क्या हो रहा है?

नए सर्टिफिकेशन नियमों का असर भारत के सीसीटीवी बाजार में तुरंत दिखाई देने लगा है। जो चीनी ब्रांड कुछ समय पहले तक बाजार का लगभग एक तिहाई हिस्सा रखते थे, अब वे या तो बाहर हो रहे हैं या अपने काम करने का तरीका पूरी तरह बदल रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अब भारतीय कंपनियाँ जैसे सीपी प्लस, क्यूबो, प्रामा, मैट्रिक्स और स्पार्श मिलकर बाजार के 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्से पर कब्जा कर चुकी हैं। वहीं बॉश और हनीवेल जैसी विदेशी कंपनियों ने प्रीमियम सेगमेंट में अपनी पकड़ और मजबूत कर ली है। दूसरी तरफ चीनी और छोटे खिलाड़ी नियमों का पालन न कर पाने की वजह से बाजार से गायब होते जा रहे हैं।

जो कंपनियाँ ज्यादा हद तक चीनी चिपसेट और सॉफ्टवेयर पर निर्भर थीं, उन्हें नए नियमों को पूरा करने में काफी परेशानी हो रही है। हिकविजन जैसी बड़ी कंपनियों को अब भारतीय कंपनियों के साथ साझेदारी करने और चीनी सप्लाई चेन से दूर जाने के रास्ते तलाशने पड़ रहे हैं, क्योंकि भारत सरकार के नियम सख्त हो गए हैं। वहीं दहुआ की मौजूदगी बाजार में लगभग 80 प्रतिशत तक घट चुकी है।

चीन से जुड़ी कंपनियाँ जैसे शाओमी और रियलमी, जो स्मार्ट होम कैमरा सेगमेंट में काफी मजबूत मानी जाती थीं, उन्होंने भी नए नियमों को पूरा करने में दिक्कत के कारण इस बाजार से दूरी बना ली है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस बदलाव की वजह से लागत में करीब 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है, क्योंकि अब लोकल स्तर पर चीजें तैयार करनी पड़ रही हैं और दूसरे स्रोतों से सामान लेना पड़ रहा है। हालाँकि बाजार के बड़े खिलाड़ियों ने निचले सेगमेंट में कीमतों को काफी हद तक संतुलित रखा है।

यह पूरा बदलाव अप्रैल 2024 में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा लागू किए गए नए नियमों से शुरू हुआ था। इन नियमों के तहत किसी भी प्रोडक्ट को भारत में बेचने से पहले उसकी सुरक्षा जाँच, उसमें इस्तेमाल हाने वाले पार्ट्स का स्रोत बताना और उसकी कमजोरियों की जाँच करना जरूरी कर दिया गया है।

नई नीति की पूरी व्यवस्था को समझिए

04 फरवरी 2026 को भारत सरकार ने एक सर्कुलर जारी किया, जिसमें बाजार में हो रहे बदलावों के पीछे की नीति को साफ तौर पर समझाया गया। इस सर्कुलर में बताया गया कि अब सीसीटीवी कैमरों की सुरक्षा से जुड़ी जाँच एक ही तरीके से होगी और इसके लिए STQC यानी मानक परीक्षण औऱ गुणवत्ता सर्टिफिकेशन की जाँच को जरूरी बनाया गया है, जो आवश्यक आवश्यकताओं के ढाँचे के तहत होगी।

सरकार ने दो अहम नियमों को आपस में जोड़ दिया है। पहला है अनिवार्य पंजीकरण आदेश और दूसरा है मेक इन इंडिया के तहत सरकारी खरीद में प्राथमिकता देने वाला नियम। अब इन दोनों के लिए अलग-अलग प्रक्रिया की जरूरत नहीं होगी। एक ही STQC की सुरक्षा जाँच रिपोर्ट दोनों नियमों का पालन करने के लिए काफी होगी। इस फैसले से पहले जो भ्रम की स्थिति थी, वह अब खत्म हो जाएगी और नियमों को लागू करना भी ज्यादा सख्त और आसान हो जाएगा।

यह बात समझना बहुत जरूरी है कि इस सर्कुलर में साफ कर दिया गया है कि सुरक्षा सर्टिफिकेशन का संबंध मेक इन इंडिया के तहत होनो वाली वैल्यू एडिशन यानी स्थानीय हिस्सेदारी की शर्तों से अलग है। आसान शब्दों में कहें तो अगर कोई उत्पाद लोकलाइजेशन यानी देश में बनने के मानकों को पूरा भी करता है, तब भी यह सुरक्षा जाँच से बच नहीं सकता।

यहाँ इंटरनेट से जुड़े उपकरणों के लिए बनने वाली सर्टिफिकेशन योजना यानी IoT सिस्टम सर्टिफिकेशन स्कीम की अहम भूमिका होती है। सीसीटीवी कैमरे भी IoT डिवाइस माने जाते हैं, यानी ये इंटरनेट से जुड़े उपकरण हैं। इसलिए इनकी जाँच सिर्फ हार्डवेयर तक सीमित नहीं रहती, बल्कि साइबर सुरक्षा के लिए नजरिए से भी इनकी कड़ी जाँच होती है। इस व्यवस्था के तहत ऐसे उपकरणों को कई सख्त मानकों पर खरा उतरना होता है, जैसे संरक्षित संचार प्रणाली, डाटा को सुरक्षित रखने के लिए एन्क्रिप्शन, छेड़छाड़ से बचाव और हार्डवेयर तक पहुँच को नियंत्रित रखना।

IoT से जुड़े नियमों में यह भी साफ किया गया है कि SQTC सर्टिफिकेट सभी ऐसे उपकरणों पर एक समान तरीके से लागू होगा। इसका मतलब यह है कि कोई भी निर्माता अलग-अलग नियमों का फायदा उठाकर जाँच से बच नहीं सकता। इससे सरकार को भी अलग-अलग क्षेत्रों में जाँच की प्रक्रिया और सर्टिफिकेशन के तरीके को एक जैसा बनाने में मदद मिलेगी।

सरकार ने उन कंपनियों के नाम भी सार्वजनिक कर दिए हैं जिन्हें यह क्लियरेंस सर्टिफिकेट मिल चुका है। इसके साथ ही हर कंपनी का प्रमाणपत्र PDF के रूप में वेबसाइट पर भी जारी किया गया है, जिसे लोग आसानी से देख सकते हैं।

2025 में सरकार ने सर्टिफिकेशन की समय सीमा बढ़ाने से किया इनकार

साल 2025 में सरकार ने सर्टिफिकेशन की समय सीमा बढ़ाने से साफ इनकार कर दिया था और यहीं से बाजार में आ रहे मौजूदा बदलाव की नींव पड़ी। उसी समय सरकार ने सीसीटीवी कैमरों की जाँच का दायरा बढ़ाकर सिर्फ हार्डवेयर तक सीमित नहीं रखा, बल्कि सॉफ्टवेयर और यहाँ तक कि सोर्स कोड स्तर तक की जाँच को भी इसमें शामिल कर लिया।

जैसा कि मई 2025 में ऑपइंडिया की एक रिपोर्ट में बताया गया था, निर्माताओं को अपने उपकरणों को सरकारी लैब में गहनता से सुरक्षा जाँच के लिए जमा करना अनिवार्य कर दिया गया था। इस जाँच में फर्मवेयर का विश्लेषण, एन्क्रिप्शन यानी डाटा को सुरक्षित रखने के तरीके की पड़ताल और उन संभावित कमजोरियों की पहचान शामिल थी, जिनके जरिए कोई दूर से सिस्टम तक पहुँच बना सकता है या डाटा चोरी कर सकता है।

उस समय कई निर्माताओं ने इस फैसले पर आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि इससे प्रक्रिया में देरी होगी, जाँच का बोझ बढ़ेगा और उनके गोपनीय सोर्स कोड पर भी खतरा आ सकता है। उद्योग से जुड़े संगठनों ने यह भी चेतावनी दी थी कि इससे आर्थिक नुकसान हो सकता है और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर भी असर पड़ेगा। लेकिन सरकार ने इन नियमों में किसी तरह की ढील देने से साफ इनकार कर दिया और कहा कि यह कदम देश की सुरक्षा से जुड़े एक गंभीर मुद्दे को ध्यान में रखकर उठाया गया है।

इन नियमों के तहत अधिकारियों को यह अधिकार भी दिया गया कि वे जरूरत पड़ने पर भारत के बाहर स्थित निर्माण इकाइयों का भी निरीक्षण कर सकते हैं। साथ ही कंपनियों के लिए यह जरूरी कर दिया गया कि वे अपने उपकरणों में मजबूत सुरक्षा फीचर्स शामिल करें, जैसे डाटा को सुरक्षित रखने के लिए एन्क्रिप्शन, मालवेयर यानी हानिकार सॉफ्टवेयर की पहचान और उसे रोकने की व्यवस्था और सुरक्षित संचार प्रणाली।

सरकार ने सीसीटीवी इकोसिस्टम में मौजूद कमजोरियों को लेकर जताई चिंता

सीसीटीवी से जुड़े डाटा की सुरक्षा को लेकर चिंता कोई नई बात नहीं है। साल 2021 में लोकसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में सरकार ने पहले ही विदेशी कंपनियों के सर्विलांस सिस्टम से जुड़ी कमजोरियों की ओर इशारा किया था। इससे साफ होता है कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार लंबे समय से सीसीटीवी सिस्टम के जरिए होने वाले संभावित डाटा लीक को रोकने की कोशिश कर रही है।

सरकार ने यह भी बताया था कि सरकारी संस्थानों में लगे करीब 10 लाख सीसीटीवी कैमरे चीनी कंपनियों से खरीदे गए थे। सरकार ने माना कि इन उपकरणों के जरिए रिकॉर्ड किया गया वीडियो डाटा विदेशों में मौजूद सर्वर तक भेजा जा सकता है, जिससे सुरक्षा को लेकर गंभीर खतरे पैदा हो सकते हैं।

सरकार ने उस समय सिस्टम में मौजूद कमियों की ओर इशारा करते हुए कहा था कि जोखिम को कम करने के लिए कुछ कदम उठाए गए हैं, जैसे संदिग्ध URL और IP एड्रेस को फिल्टर करना। इसके अलावा मौजूदा कानूनों के तहत आयात को नियंत्रित करने और यह सुनिश्चित करने के लिए भी उपाय किए गए कि सभी उपकरण भारतीय सुरक्षा मानकों का पालन करें।

इन शुरुआती चेतावनियों ने आगे चलकर नियमों को सख्त बनाने की नींव रखी। इससे यह साफ संकेत मिला कि सरकार लंबे समय से ऐसी नीति पर काम कर रही है, जिसका मकसद निगरानी से जुड़े ढाँचे को ज्यादा सुरक्षित बनाना है।

गैजेट में जारी अधिसूचना, जिसने सीसीटीवी सिस्टम को हमेशा के लिए बदला

मौजूदा नियमों की पूरी व्यवस्था की कानूनी नींव 9 अप्रैल 2024 को जारी किए गए गैजेट के नोटिफिकेशन पर टिकी हुई है। इस नोटिफिकेशन के जरिए सरकार ने औपचारिक रूप से सीसीटीवी कैमरों को अनिवार्य पंजीकरण व्यवस्था के तहत शामिल कर लिया।

इस अधिसूचना में इलेक्ट्रॉनिक्स और IT उपकरणों से जुड़े आदेश में बदलाव किया गया और सीसीटीवी कैमरों को ऐसी श्रेणी में रखा गया, जिनकी बिक्री से पहले जरूरी सर्टिफिकेशन लेना अनिवार्य होगा। इसके तहत भारतीय सुरक्षा मानकों का पालन करना और नए लागू किए गए जरूरी सुरक्षा नियमों को मानना भी जरूरी कर दिया गया।

इसका मुख्य मकसद यह है कि सीसीटीवी सिस्टम हर स्तर पर सुरक्षित हों। इसमें हार्डवेयर, फर्मवेयर, नेटवर्क और सप्लाई चेन सभी शामिल हैं। ये नियम सिर्फ सामान्य गुणवत्ता जाँच तक सीमित नहीं हैं, बल्कि साइबर सुरक्षा को मजबूत बनाने पर खास ध्यान देते हैं।

निर्माताओं के लिए यह जरूरी कर दिया गया है कि वे अपने उपकरणों में मजबूत फिजिकल सुरक्षा सुनिश्चित करें। इसका मतलब है कि डिवाइस का ढाँचा ऐसा हो जो आसानी से खोला या छेड़ा न जा सके, ताकि कोई भी व्यक्ति अंदर के हिस्सों तक बिना अनुमति पहुँच न बना सके। सॉफ्टवेयर के स्तर पर भी सख्त नियम लागू किए गए हैं, जैसे मजबूत लॉगिन सिस्टम, अलग-अलग लोगों के लिए सीमित और तय पहुँच और समय-समय पर अपडेट देना।

सबसे अहम बात डाटा की सुरक्षा से जुड़ी है। कैमरों से भेजा जाने वाला वीडियो डाटा एन्क्रिप्शन यानी सुरक्षित तरीके से भेजा जाना जरूरी है, ताकि कोई बीच में उसे देख या बदल न सके। इसके अलावा डिवाइस को इस तरह तैयार करना होगा कि वह साइबर हमलों का सामना कर सके। इसके लिए पहले से जाँच की जाती है, जिसमें सिस्टम की कमजोरियों को परखा जाता है।

सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया में कंपनियों को अपने उत्पाद से जुड़ी पूरी तकनीकी जानकारी देनी होती है। इसमें सिस्टम का ढाँचा कैसे काम करता है, फर्मवेयर की जानकारी और सुरक्षा से जुड़े नियम शामिल होते हैं। साथ ही यह भी साबित करना होता है कि डिवाइस सुरक्षित तरीके से शुरू होता है, उसके सॉफ्टवेयर के साथ छेड़छाड़ नहीं हो सकती और किसी तरह का छिपा हुआ बैकडोर एक्सेस मौजूद नहीं है।

एक और अहम शर्त सप्लाई चेन की पारदर्शिता से जुड़ी है। निर्माताओं को यह बताना जरूरी है कि उनके उपकरणों में इस्तेमाल होने वाले जरूरी पुर्जे, जैसे चिपसेट, कहाँ से आए हैं और यह भी साबित करना होगा कि वे भरोसेमंद स्रोतों से लिए गए हैं। खासकर चीनी पुर्जों को लेकर उठ रही चिंताओं के बीच यह नियम और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

नोटिफिकेशन में डिवाइस की पूरी लाइफ साइकिल की सुरक्षा पर भी जोर दिया गया है। इसका मतलब है कि उपकरणों में सुरक्षित तरीके से फर्मवेयर अपडेट होने चाहिए, पुराने और कमजोर वर्जन पर वापस जाने की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए और सॉफ्टवेयर से जुड़ी सभी जानकारियों और कमजोरियों का रिकॉर्ड भी रखा जाना जरूरी है।

जाँच की प्रक्रिया उन मान्यता प्राप्त लैब में होती है, जिन्हें भारतीय मानक ब्यूरो ने मंजूरी दी होती है। किसी भी उत्पाद को तब तक सर्टिफिकेशन नहीं मिलता, जब तक वह इन सभी परीक्षणों में सफल नहीं हो जाता। इसके बाद ही उसे भारतीय बाजार में बेचने की अनुमति दी जाती है।

कुल मिलाकर, इस अधिसूचना ने सीसीटीवी कैमरों को सिर्फ निगरानी करने वाले साधारण उपकरण से आगे बढ़ाकर एक सख्त नियमों के तहत आने वाले डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का हिस्सा बना दिया है, जहाँ सुरक्षा, पारदर्शिता और पूरी जानकारी देना अनिवार्य हो गया है।

बिना निगरानी वाले सीसीटीवी नेटवर्क राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा क्यों पैदा करते हैं?

खतरे की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हाल ही में केंद्रीय एजेंसियों ने देशभर के बड़े शहरों में लगे सीसीटीवी नेटवर्क का ऑडिट कराने का आदेश दिया है। यह निर्देश उस समय जारी किया गया जब पाकिस्तान से जुड़े एक जासूसी गिरोह का पर्दाफाश हुआ। न्यूज 18 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं थी। जाँच में सामने आया कि इस जासूसी नेटवर्क ने सिर्फ पहले से लगे कैमरों का फायदा ही नहीं उठाया, बल्कि संवेदनशील जगहों पर अपने गुप्त कैमरे भी लगा दिए थे, जिनमें दिल्ली कैंट रेलवे स्टेशन और सोनीपत रेलवे स्टेशन जैसे इलाके शामिल हैं।

इनमें से कुछ कैमरों में सोलर पावर सिस्टम भी लगाया गया था. ताकि बिना रुके लगातार लाइव फुटेज मिलती रहे। जाँच एजेंसियों के मुताबिक, यह फुटेज सीमा पार बैठे ISI से जुड़े लोगों तक भेजी जा रही थी। इसके बाद केंद्रीय एजेंसियों ने पुलिस और अन्य सुरक्षा इकाइयों को निर्देश दिया है कि वे खुद मौके पर जाकर जाँच करें, बिना अनुमति लगे कैमरों की पहचान करें और यह भी देखें कि मौजूद सिस्टम में सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम हैं या नहीं।

दरअसल, सीसीटवी कैमरे सिर्फ अपराध रोकने के साधन नहीं होते। अगर इनसे समझौता हो जाए। तो यही कैमरे दुश्मन के लिए खुफिया जानकारी जुटा का जरिया बन सकते हैं। अलग-अलग एजेंसियों, ठेकेदारों और स्थानीय निकायों द्वारा बिना एक समान निगरानी व्यवस्था के लगाए गए कैमरों का बिखरा हुआ नेटवर्क कई ऐसी कमजोरियाँ पैदा करता है, जिनका फायदा दुश्मन देश, आतंकी संगठन या जासूसी करने वाले लोग उठा सकते हैं।

निगरानी से जुड़े ढाँचे में अगर सेंध लग जाए तो उसका खतरा सिर्फ कल्पना तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया में इसके खतरनाक उदाहरण सामने आ चुके हैं। ऑपइंडिया की पहले की रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायल ने कई सालों तक ईरान के ट्रैफिक कैमरा नेटवर्क और मोबाइल सिस्टम में घुसपैठ कर वहाँ के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई और उनकी सुरक्षा टीम की गतिविधियों पर नजर रखी थी, उस हमले से पहले जिसमें उनकी मौत हुई बताई जाती है।

बताया जाता है कि इस निगरानी के जरिए इजरायली एजेंसियों ने सुरक्षाकर्मियों, ड्राइवरों और बडे़ अधिकारियों की हरकतों को ट्रैक किया। उन्होंने यह भी समझ लिया कि सुरक्षित परिसर के अंदर गाड़ियाँ कहाँ और कैसे खड़ी होती हैं, लोग किन रास्तों से आते जाते हैं और सुरक्षा में लगे लोगों की दिनचर्या क्या है। इन सब जानकारियों को इकट्ठा करके एक तरह से पूरा डाटा तैयार किया गया।

रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि ट्रैफिक कैमरों से मिलने वाला डाटा सुरक्षित करके इजरायल के सर्वर तक भेजा गया, जबकि आसपास के मोबाइल नेटवर्क में भी दखल देकर किसी तरह की चेतावनी को देर से पहुँचाने या रोकने की कोशिश की गई।

यह उदाहरण दिखाता है कि अगर कैमरों में सेंध लग जाए, तो वे जंग के स्तर की खुफिया जानकारी जुटाने का साधन बन सकते हैं। इससे लोगों की आदतें, उनकी दिनचर्या, कमजोरियाँ और सही अहम बातें पता चल जाती हैं। जब इसे सिग्नल इंटरेस्पशन, डाटा एनालिसिस और मानव खुफिया जानकारी के साथ जोड़ा जाता है, तो दुश्मन के लिए निशाना तय करना और सटीक हमला करना आसान हो जाता है।

इसलिए भारत के लिए यह सिर्फ तकनीकी नियमों का पालन करने या कागजी प्रक्रिया भर का मामला नहीं है। यह देश की संप्रभुता, जासूसी के खिलाफ सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंबीर मुद्दा है। अगर निगरानी का नेटवर्क सुरक्षित नहीं है या उसकी सही तरीके से जाँच नहीं होती, तो यह सिर्फ एक छोटी सी चूक नहीं बल्कि दुश्मन के लिए एक बड़ा मौका बन सकता है।

सिर्फ बाजार में बदलाव नहीं, बल्कि पूरे ढाँचे में बड़ा परिवर्तन

पिछले कुछ सालों में सरकार द्वारा लिए गए फैसलों का असर अब साफ तौर पर दिखने लगा है और इसी वजह से भारत के निगरानी सिस्टम में एक बड़ा ढाँचागत बदलाव आ गया है। जो शुरुआत में सिर्फ डाटा सुरक्षा की चिंता से शुरू हुआ था, वह अब पूरे नियमों के मजबूत ढाँते में बदल चुका है। यह ढाँचा सप्लाई चेन को नया रूप दे रहा है, देश में निर्माण को बढ़ावा दे रहा है और बिना जाँची परखी विदेशी तकनीक पर रोक लगा रहा है।

हालाँकि, इस बदलाव के कारण शुरुआत में लागत बढ़ी है और कुछ समय के लिए दिक्कतें भी आई हैं, लेकिन इसके साथ ही भारतीय कंपनियों के लिए बड़े मौके भी पैदा हुए हैं। आने वाले सालों में इस बाजार के तेजी से बढ़ने की उम्मीद है, जिसमें घरेलू निर्माता मजबूत पकड़ बना सकते हैं।

(यह रिपोर्ट मूलरूप से अंग्रेजी में लिखा गया है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

असम में फिर ‘कमल’ की मजबूत आहट, HM अमित शाह के गुवाहाटी रोड शो ने दिए नतीजों के संकेत

असम की राजनीति में 2026 विधानसभा चुनाव से पहले गुवाहाटी में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का रोड शो एक साधारण राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि जनादेश की दिशा का संकेत बनकर उभरा है। सड़कों पर उमड़ा जनसैलाब यह स्पष्ट करता है कि असम की जनता विकास, सुरक्षा और सांस्कृतिक अस्मिता के उस मॉडल को पुनः स्वीकार करने के लिए तैयार है, जिसे मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने बीते सालों स्थापित किया है।

यह रोड शो केवल भीड़ का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि एक सशक्त राजनीतिक संदेश था असम में NDA की वापसी लगभग तय है। अमित शाह द्वारा 90 से अधिक सीटों का दावा किसी अतिशयोक्ति से अधिक एक जमीनी सच्चाई का प्रतिबिंब प्रतीत होता है।

हिमंता मॉडल: विकास और राष्ट्रवाद का संतुलन

असम में भाजपा की सफलता का सबसे बड़ा आधार ‘हिमंता मॉडल’ है। यह मॉडल केवल सड़कों, पुलों और बुनियादी ढाँचे के विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कानून-व्यवस्था की मजबूती, घुसपैठ के खिलाफ कठोर कार्रवाई और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा भी शामिल है।

हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में असम ने शिक्षा, स्वास्थ्य और निवेश के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। मेडिकल कॉलेजों की संख्या में वृद्धि, इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार और उद्योगों को आकर्षित करने की नीतियां राज्य को एक नई दिशा दे रही हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भाजपा सरकार ने वर्षों से चले आ रहे ‘अवैध घुसपैठ’ के मुद्दे को राजनीतिक साहस के साथ उठाया। यह वही मुद्दा था जिसे पूर्ववर्ती सरकारें वोट बैंक की राजनीति के कारण नजरअंदाज करती रहीं। आज NDA सरकार इस चुनौती का समाधान करने के लिए प्रतिबद्ध दिखती है।

अमित शाह का स्पष्ट संदेश: नेतृत्व में कोई भ्रम नहीं

भारतीय राजनीति में अक्सर यह देखा गया है कि चुनावों के समय पार्टियाँ मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर असमंजस में रहती हैं। लेकिन भाजपा ने इस मामले में स्पष्टता दिखाई है। अमित शाह ने साफ कहा कि हिमंता बिस्वा सरमा ही अगली बार भी मुख्यमंत्री होंगे।

यह स्पष्टता मतदाताओं में विश्वास पैदा करती है। जनता जानती है कि वह किसे चुन रही है और किसके नेतृत्व में राज्य आगे बढ़ेगा। यही भाजपा की चुनावी रणनीति की सबसे बड़ी ताकत है।

विपक्ष की कमजोर स्थिति

असम में विपक्ष विशेषकर कॉन्ग्रेस आज पूरी तरह दिशाहीन नजर आती है। न तो उनके पास कोई मजबूत नेतृत्व है और न ही कोई स्पष्ट एजेंडा। आंतरिक कलह और लगातार हो रहे दलबदल ने कॉन्ग्रेस को और कमजोर कर दिया है।

जहाँ भाजपा ‘विकास + सुरक्षा + अस्मिता’ का स्पष्ट नैरेटिव लेकर मैदान में है, वहीं विपक्ष केवल आलोचना तक सीमित है। जनता अब केवल आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि ठोस परिणाम चाहती है और यह परिणाम NDA सरकार ने देकर दिखाए हैं।

भीड़ नहीं, जनसमर्थन का संकेत

गुवाहाटी रोड शो में उमड़ी भीड़ को केवल ‘इवेंट मैनेजमेंट’ कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। असम जैसे राज्य में जहाँ राजनीतिक जागरूकता काफी गहरी है, वहाँ इस तरह की स्वतःस्फूर्त भागीदारी जनता के मनोभाव को दर्शाती है।

यह भीड़ उस विश्वास का प्रतीक है जो लोगों ने भाजपा और उसके नेतृत्व में जताया है। यह वही विश्वास है जो 2021 में सत्ता दिलाकर लाया था और अब 2026 में उसे और मजबूत करने की दिशा में अग्रसर है।

असम: NDA की पूर्वोत्तर रणनीति का केंद्र

असम केवल एक राज्य नहीं, बल्कि पूरे पूर्वोत्तर भारत की राजनीति का केंद्र है। यहां की जीत का सीधा असर अरुणाचल, मणिपुर, त्रिपुरा और मेघालय जैसे राज्यों पर पड़ता है।

अमित शाह का रोड शो इस व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जहाँ भाजपा पूर्वोत्तर को विकास और राष्ट्रीय मुख्यधारा से जोड़ने के अपने एजेंडे को आगे बढ़ा रही है। ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की अवधारणा को जमीन पर उतारने में असम की भूमिका निर्णायक है।

निष्कर्ष: जनता का झुकाव स्पष्ट

गुवाहाटी रोड शो ने यह स्पष्ट कर दिया है कि असम की जनता अब स्थिरता, विकास और मजबूत नेतृत्व के पक्ष में खड़ी है। भाजपा और NDA ने जो वादे किए थे, उन्हें काफी हद तक पूरा किया है और यही उनकी सबसे बड़ी पूँजी है।

अमित शाह का आत्मविश्वास, हिमंता बिस्वा सरमा की लोकप्रियता और संगठन की मजबूती इन तीनों का संयोजन भाजपा को एक बार फिर सत्ता तक पहुँचाने के लिए पर्याप्त दिखाई देता है।

यदि वर्तमान रुझान कायम रहता है, तो यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि 2026 में असम में फिर एक बार ‘कमल’ पूरी मजबूती के साथ खिलेगा और यह केवल राजनीतिक जीत नहीं, बल्कि विकास और राष्ट्रवाद के मॉडल की पुनः पुष्टि होगी।

इस्लामी कट्टरपंथियों के लिए हिंदू महिलाओं से रेप करना ‘जन्नत’ का रास्ता, दीन के नाम पर घटिया से घटिया अपराध करने को तैयार: MP के इस मामले से समझिए इनकी मानसिकता

हम को मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन
दिल के खुश रखने को ‘गालिब’ ये खयाल अच्छा है

याने भले ही जन्नत की सच्चाई कुछ भी हो, लेकिन इंसान को खुश रहने के लिए किसी न किसी उम्मीद की जरूरत होती है। मिर्जा गालिब का ये शेर ‘जन्नत’ के अस्तित्व का सच जाहिर कर रहा है। वह कहते हैं कि जन्नत का यह ‘खयाल’ एक सुंदर भ्रम है जो दिल को तसल्ली देता है।

लेकिन इस्लामी कट्टरपंथी ‘जन्नत’ शब्द को इस्लाम की दीन मानते हैं, जहाँ हर उस ‘अपराध’ को जगह मिली है जिससे जन्नत नसीब हो। इसी चाहत में इस्लामी कट्टरपंथी अलग-अलग ‘अपराधों’ में शामिल होने से नहीं कतराते। इसमें सबसे पहले हिंदू लड़कियों से रेप को सबाब माना गया, पकड़े गए मुस्लिम अपराधियों का कहना था कि ‘अगर हम हिंदू लड़कियों का बलात्कार करेंगे, तो अल्लाह हमें जन्नत देगा।’

तो इसी ‘जन्नत’ को नसीब करने के चक्कर में कोई अल्लाह के नाम पर, तो कोई कुरान के नाम पर, जिसमें हिंदुओं को ‘काफिर’ कहा गया है, लग जाता है ‘अपराध’ करने। अगर हिंदू लड़की से रेप करने वाले को जन्नत नसीब होगी, तो उसकी बहन और सहेली या फिर उसके अम्मी-अब्बू भी अपनी जन्नत के टिकट मिलने से पीछे नहीं हटेंगे, वो भी लग जाएँगे किसी न किसी तरीके से उसकी मदद करने में।

ताजे मामले में मध्य प्रदेश के गुना में ब्यूटी पार्लर चलाने वाली यास्मीन खान अपने शौहर शरीफ खान के लिए हिंदू लड़कियों का बंदोबस्त करती थी। कोर्स सिखाने के बहाने घर बुलाती थी, कोल्ड ड्रिंक में नशीली दवा मिलाकर खिलाती और सौंप देती अपने शौहर को, जो उनके साथ घंटों-घंटों तक बलात्कार करता।

जब शरीफ खान बलात्कार करता था, तो बीवी यास्मीन खान गेट पर पहरा देती थी, लड़कियों का इंतजाम भी वही करवाती थी। यहाँ तक कि शरीफ खान का भाई मुवीन खान भी इसमें शामिल था। सोशल मीडिया पर कहा जा रहा है कि यास्मीन खान और उसके शौहर ने ‘जन्नत’ नसीब करने के लिए हिंदू लड़कियों का बलात्कार किया।

‘जन्नत’ के लिए हिंदू लड़किया रेप करने वाले मुस्लिम

ऐसा कहने के पीछे वजह भी है। क्योंकि इससे पहले भी ऐसे ही मामलों में कई अपराधी कबूल चुके हैं कि उनकी इस्लामी दीन के मुताबिक, यह गलत नहीं है और ऐसा करने से उन्हें जन्नत नसीब होगी।

बैंगलोर में ताहा राजी ने हिंदू बनकर हिंदू युवती को फँसाया और उसका रेप किया। और इस अपराध को कुरान की कई आयतों का हवाला देकर सही ठहराया, जिसमें लिखा है, “अगर किसी मुस्लिम को किसी काफिर और मू्र्तिपूजक को सही रास्ते पर लाने और उसका धर्म परिवर्तन कराने के लिए उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी पड़े, तो इस तरह का दुर्व्यवहार या प्रताड़ना गलत नहीं माना जाएगा।”

साल 2022 में मध्य प्रदेश की एक हिंदू युवती का अफजल और उसके दोस्त प्रिंस रेप किया। जब युवती ने बताया कि वह 6 महीने की प्रेग्नेंट है, तब अफजल ने कहा कि उनके मजहब में चलता है और कहा कि ‘हिंदू महिलाओं संग यौन संबंध बनाने से उन्हें जन्नत नसीब’ होगी।

साल 2023 में इंदौर में तीन मुस्लिम युवकों ने 13 साल की नाबालिग लड़की का गैंगरेप किया। और जब पुलिस ने इसकी वजह पूछी तो, उनमें से एक आरोपित शेरूखान ने कहा, “अगर वह हिंदू लड़की के साथ संबंध बनाएगा तो उसे जन्नत नसीब होगी।”

पिछले साल 2025 में भी ऐसा ही एक मामला सामने आया। जहाँ मुरादाबाद में 14 साल की दलित बच्ची का अपहरण कर 2 महीने तक करने वाले मुस्लिमों ने कबूल किया कि उन्हें इस इस्लामी जिहाद के लिए पैसा मिलता था और इससे जन्नत मिलेगी।

अपराधियों को परिवार का संरक्षण, भाई-बहन-दोस्तों का साथ

इन अपराधियों को परिवार का भी पूरा संरक्षण मिलता है। कई मामले सामने आते हैं, जिसमें मुस्लिम युवक हिंदू लड़कियों को लव जिहाद में फँसाकर घर ले आता है और घर में उसके अम्मी-अब्बू और भाई-बहन उस हिंदू लड़की को जबरन गोमांस खिलाते हैं, उसके साथ मारपीट करते हैं और यहाँ तक कि रेप भी करते हैं। ऐसे कई मामलों में पीड़िता की कोई सहेली या परिचित भी अपराधियों से मिले होते हैं।

साल 2021 में सामने आए लव जिहाद और धर्मांतरण के मामले में आरोपित मोनिश कुरैशी ने एमए की छात्रा को अपने झाँसे में लेकर उसे किसी रिश्तेदार के घर ले गया। यहाँ मोनिश की तीन बहनों और बहनोई ने मिलकर हिंदू छात्रा का उत्पीड़न किया।

लखनऊ से सामने आए मामले में हिंदू पीड़िता की दोस्त शाकिबा ने उसका रेप करवाया। शाकिबा ने पीड़िता को किसी बहाने से अपने फ्लैट बुलाया और अपने लिव इन पार्टनर अली से रेप करवाया। इस दौरान दोस्त शाकिबा ने उसका वीडियो बनाया।

वहीं साल 2025 में लखनऊ में भी यही बात सामने आई। जहाँ हिंदू लड़की को उसकी मुस्लिम सहेली रीना बानो ने अपने जाल में फँसाया। दोस्ती गहरी करने के बाद रीना ने हिंदू लड़की को अपने घर बुलाया और ससुराल के रिश्तेदार हैदर नाम के आदमी को सौंप दिया। हैदर ने तमंचे की नोक पर हिंदू लड़की से रेप किया। फिर रीना बानो और हैदर ने पीड़ितो को जाने से मारने की धमकी दी।

ये कुछ गिने-चुने मामले हैं। जहाँ इस्लामी कट्टरपंथी ‘जन्नत’ की चाहत और कुरान का हवाला देकर हिंदू लड़कियों का रेप करते हैं और इस अपराध में उनके घरवाले और दोस्त उनका साथ देकर इसे सबाब का काम मानते हैं।

इस्लामी कट्टरपंथियों के लिए ‘जन्नत’ मिलने के मायने

इस्लामी कट्टरपंथियों के लिए ‘जन्नत’ का खयाल लाहिजा एक भ्रम जैसा ही है। उनका मानना है कि जन्नत सबसे अच्छी जगह है, जहाँ 72 हूरें मिलेंगी। मौलवी भी यही बताते हैं कि हूरें इतनी खूबसूरत होती हैं कि चमक के आगे सूरज भी फेल होता है। यह भी दावा किया जाता है कि हूर को शौच-पेशाब तक नहीं लगता। वे जन्नत पाने वालों के साथ हमबिस्तरी करती हैं।

जन्नत मिलने के इसी जुनून में वे सारे काम करने को तैयार होते हैं, जो उन्हें इन 72 हूरों से मिलवा सकता है। यानी लक्ष्य एक यही है- महिलाओं के साथ यौन संबंध बनाना। यहाँ जन्नत के ख्वाब देखते हुए भी वे हिंदू लड़कियों से रेप करते हैं और ख्वाब भी सिर्फ हूरों के साथ हमबिस्तर होने के देखते हैं।

‘जन्नत’ की हकीकत सामने रख दो, तो भी नहीं मानेंगे

दरअसल, इस्लाम की दीन में ही ‘जन्नत’ और ’72 हूरों’ का जिक्र होने का दावा किया जाता है। और यही दीन लेकर मुस्लिम जन्नत जाने का जुनून सवार कर लेते हैं। हिंदुओं को काफिर मानने लगते हैं और जन्नत जाने के लिए ये लोग घटिया से घटिया काम करने के लिए भी तैयार रहते हैं।

इन्हें नहीं परवाह क्राइम रेट की, न इन्हें परवाह इंसानियत की, इनके लिए मजहब से ऊपर कुछ नहीं है। जन्नत मिलेगी कहकर काफिरों के खिलाफ कुछ भी करो। हिंदुओं के खिलाफ बद से बदतर हिंसा भी इन्हें अपराध नहीं लगता है, उल्टा पकड़ने पर मजहब का हवाला देते हैं। फिर भी कुछ सेकुलर लोग मानने को तैयार नहीं कि दोष मजहब में है।

मिर्जा गालिब बहुत पहले ही समझ चुके हैं कि ये इस्लामी कट्टरपंथ भ्रम में जीते हैं। इनके लिए जन्नत की हकीकत सामने लाकर रख दो, तो भी ये नहीं मानेंगे। क्योंकि इनके लिए गैर मजहबी महिलाओं के खिलाफ हिंसा और हमबिस्तर होना जन्नत का रास्ता है।