जंगलराज। यह शब्द सुनते ही हमारी स्मृतियों में बिहार का नाम कौंधता है। दुर्भाग्य से पश्चिम बंगाल को परिभाषित करता ऐसा कोई शब्द नहीं गढ़ा गया है, जबकि वहाँ की स्थिति ‘जंगलराज’ से भी भयावह है। मालदा में न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाने की घटना इसी भयावहता का विस्तार है।
यह ऐसा संकेत है जो बताता है कि अब भय केवल राजनीतिक हिंसा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संस्थाओं की स्वायत्तता को भी भयाक्रांत करने को आतुर है। इस स्थिति में अपनी चौखट तक लपटें देखकर न्यायपालिका की सक्रियता उम्मीद तो बाँधती है, पर यह भी बताती है कि चुनाव आयोग (ECI) ने आचार संहिता लागू होने के बाद भले थोक के भाव में प्रशासनिक स्तर पर बदलाव किए है, लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था को राजनीतिक भय से मुक्त नहीं कर पाई है।
स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मालदा में जो संकट दिन के करीब 3:30 बजे पैदा हुआ, उसमें रात के 8:30 बजे तक स्पष्ट तौर पर प्रशासनिक निष्क्रियता देखने को मिली। राज्य के मुख्य सचिव संपर्क से बाहर थे। शीर्ष अदालत ने पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव, गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक, कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक सहित अन्य वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों के आचरण को ‘अत्यंत निंदनीय’ बताया है। यह निष्क्रियता तब थी, जब मालदा जिले के कालियाचक इलाके के प्रखंड विकास अधिकारी (BDO) कार्यालय में 1 अप्रैल 2026 को जिन सात न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाया गया था, उनमें तीन महिला थीं।
जिन शीर्ष अधिकारियों की सक्रियता प्रश्नों के घेरे में है, वह सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की सरकार द्वारा नियुक्त नहीं किए गए हैं। भारत निर्वाचन आयोग ने 16 मार्च 2026 को ही पश्चिम बंगाल के शीर्ष अधिकारी बदल दिए थे। इनमें मुख्य सचिव और गृह सचिव भी शामिल थे। बाद में DGP भी बदले गए और फिर करीब 500 अधिकारी और बदले गए। मालदा की घटना से पहले ही कलकत्ता हाई कोर्ट ने वह याचिका खारिज भी कर दी थी, जिसमें इन बदलावों को चुनौती दी गई थी।
फिर प्रश्न उठता है कि इसके बाद भी प्रशासनिक अधिकारियों ने वह सक्रियता क्यों नहीं दिखाई जो अपेक्षित था? जवाब सीधा और सरल है। भय। यह भय कि यदि चुनावों के बाद फिर से ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) ही सत्ता में लौटी तो शायद प्रताड़ना झेलनी पड़े। शायद परिवार के सदस्यों और रिश्तेदारों को प्रताड़ित किया जाए।
पश्चिम बंगाल में यह भय एक दिन में नहीं बना है। पहले जनता के भीतर भय पैदा किया गया। फिर उद्योगपतियों-कारोबारियों को आतंकित किया गया। धीरे-धीरे इस भय का विस्तार पूरी व्यवस्था में किया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि बंगाल बर्बाद होता गया और भय की राजनीति आबाद।
पश्चिम बंगाल में भय की इस राजनीति की शुरुआत वामपंथियों ने 1970 में बर्दवान में सेन भाइयों की हत्या कर उनके खून से सने चावल खाने के लिए उनकी माँ को मजबूर कर किया था। इससे भय का जो विस्तार हुआ उसने 1977 में वामपंथियों को बंगाल की सत्ता में स्थापित कर दिया और यह 2011 तक लगातार चलता रहा। इस दौरान जितने नरसंहार बंगाल में हुए, उतने शायद ही देश के किसी दूसरे राज्य में हुए हों।
कभी भय की इस संस्कृति की पीड़ित रहीं ममता बनर्जी ने भी वामपंथियों से सत्ता छीनने के बाद इसे पुरजोर तरीके से आगे बढ़ाया। इसका ही परिणाम था कि 2021 में विधानसभा चुनाव के नतीजे आते ही सिलसिलेवार तरीके से भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों को प्रताड़ित किया गया। इससे मतदाताओं को यह संदेश दिया गया कि यदि अपनी मर्जी से मत डालोगे तो उसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।
5 साल बाद भी आम मतदाताओं के मन से यह भय मिटा नहीं है। केवल अधिकारी बदलने से यह भय मिट भी नहीं सकता। चुनाव आयोग द्वारा लाए गए अधिकारी भी जानते हैं कि चुनाव के बाद उन्हें फिर से उसी बंगाल में काम करना है। उनके परिवार के सदस्य और रिश्तेदार उसी बंगाल में रहते हैं। ऐसे में यदि फिर 4 मई 2026 को तृणमूल कॉन्ग्रेस ही लौट आई तो क्या होगा?
पश्चिम बंगाल की जो स्थिति है उसे देखते हुए राष्ट्रपति शासन लगाने की माँग कई बार उठी है। लेकिन अब चुनावों के समय इसे दोहरा देना बेतुका है। ऐसे में चुनाव आयोग का दायित्व सबसे अधिक हो जाता है।
लोकतंत्र का मतलब केवल चुनाव कराना नहीं है। उसे निष्पक्ष और भय मुक्त रखना भी है। यह सत्य है कि नई सरकार के गठन के बाद 2021 जैसी कोई स्थिति उत्पन्न होने पर सुरक्षा उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की नहीं होगी। लेकिन आज वह ऐसा वातावरण अवश्य बना सकती है, जिसमें मतदाताओं के पास अपने मन के हिसाब से मत देने की और अधिकारियों को बिना किसी आशंका के कानून सम्मत फैसले लेने की स्वतंत्रता हो।
पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में निष्पक्ष चुनाव के लिए केवल संवैधानिक प्रावधान पर्याप्त नहीं हैं। सख्त और विशेष प्रशासनिक हस्तक्षेप भी आवश्यक हैं। चुनाव से पहले अधिकारियों को बदल देना या पर्याप्त अर्धसैनिक बल राज्य में भेज देना इसकी कड़ी मात्र हैं। पूरी समस्या का समाधान नहीं।
समाधान के लिए चुनाव आयोग को उस मॉडल की तरफ देखना होगा, जिसके जरिए उसने बिहार में 90 के दशक में चरम पर पहुँच गए चुनावी हिंसा और बूथ कैप्चरिंग को समाप्त कर मन मुताबिक मत देने का मौका जनता को प्रदान किया था। उस समय बिहार में केजे राव जैसे अधिकारियों को आयोग ने विशेष रूप से तैनात किया था।
राव ने स्थानीय प्रशासन से स्वतंत्र निर्णय लिए थे। सुरक्षा बलों की रणनीतिक तैनाती की थी। संवेदनशील बूथों की पहचान कर उनकी कड़ी निगरानी सुनिश्चित की थी। साथ ही हर राजनीतिक दबाव को नजरअंदाज किया था।
किसी भी प्रशासनिक अधिकारी के लिए राव के ये निर्णय सामान्य से लग सकते हैं। पर इनका प्रभाव व्यापक था। इन निर्णयों ने न केवल बिहार में चुनावी हिंसा को समाप्त किया, बल्कि वहाँ की चुनावी प्रक्रिया को अधिक विश्वसनीय भी बना दिया।
सामान्य से लगने वाले ये कदम भी कोई अधिकारी तभी उठा सकता है, जब वह भय मुक्त हो। यदि उसका या उसके परिवार का भविष्य 4 मई के चुनाव परिणाम पर निर्भर होगा तो वह कभी भी ऐसे निर्णय नहीं ले पाएगा।
वैसे भी पश्चिम बंगाल में राजनीतिक ध्रुवीकरण इतना हिंसक हो चुका है कि अब हिंसा की घटनाएँ सामान्य सी लगती हैं। सत्तारूढ़ तंत्र के नियंत्रण में स्थानीय प्रशासन का होना साधारण सी बात लगती है।
इस स्थिति में बाहरी, निष्पक्ष और सख्त अधिकारियों की तैनाती जरूरी है। ठीक वैसे ही जैसे बिहार में हुआ था। चुनाव आयोग को सुनिश्चित करना होगा कि;
- संवेदनशील क्षेत्रों में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की मौजूदगी अधिक हो।
- राज्य से बाहर के वरिष्ठ अधिकारी चुनाव पर्यवेक्षक के तौर पर तैनात रहें।
- हर संवेदनशील बूथ पर CCTV और वेबकास्टिंग अनिवार्य रहे।
- आचार संहिता के उल्लंघन पर त्वरित और कड़े एक्शन हों।
- लोगों को यह विश्वास दिलाया जाए कि उनका वोट सुरक्षित और गुप्त है।
ध्यान रहे यदि मतदाता डर के माहौल में वोट डालते हैं तो परिणाम वास्तविक जनमत को प्रतिबिंबित नहीं करते। ऐसे में आवश्यक है कि 23 और 29 अप्रैल को जब बंगाल के लोग मतदान करने के लिए अपने घरों से निकलें तो यह दिखना चाहिए कि लोकतंत्र केवल कागजों पर ही नहीं, जमीन पर भी जीवित और मजबूत है।
क्या चुनाव आयोग ऐसा कर पाएगा?















