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जंगलराज से भी भयावह: मालदा, भय और पश्चिम बंगाल में निष्पक्ष चुनाव की चुनौती

जंगलराज। यह शब्द सुनते ही हमारी स्मृतियों में बिहार का नाम कौंधता है। दुर्भाग्य से पश्चिम बंगाल को परिभाषित करता ऐसा कोई शब्द नहीं गढ़ा गया है, जबकि वहाँ की स्थिति ‘जंगलराज’ से भी भयावह है। मालदा में न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाने की घटना इसी भयावहता का विस्तार है।

यह ऐसा संकेत है जो बताता है कि अब भय केवल राजनीतिक हिंसा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संस्थाओं की स्वायत्तता को भी भयाक्रांत करने को आतुर है। इस स्थिति में अपनी चौखट तक लपटें देखकर न्यायपालिका की सक्रियता उम्मीद तो बाँधती है, पर यह भी बताती है कि चुनाव आयोग (ECI) ने आचार संहिता लागू होने के बाद भले थोक के भाव में प्रशासनिक स्तर पर बदलाव किए है, लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था को राजनीतिक भय से मुक्त नहीं कर पाई है।

स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मालदा में जो संकट दिन के करीब 3:30 बजे पैदा हुआ, उसमें रात के 8:30 बजे तक स्पष्ट तौर पर प्रशासनिक निष्क्रियता देखने को मिली। राज्य के मुख्य सचिव संपर्क से बाहर थे। शीर्ष अदालत ने पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव, गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक, कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक सहित अन्य वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों के आचरण को ‘अत्यंत निंदनीय’ बताया है। यह निष्क्रियता तब थी, जब मालदा जिले के कालियाचक इलाके के प्रखंड विकास अधिकारी (BDO) कार्यालय में 1 अप्रैल 2026 को जिन सात न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाया गया था, उनमें तीन महिला थीं।

जिन शीर्ष अधिकारियों की सक्रियता प्रश्नों के घेरे में है, वह सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की सरकार द्वारा नियुक्त नहीं किए गए हैं। भारत निर्वाचन आयोग ने 16 मार्च 2026 को ही पश्चिम बंगाल के शीर्ष अधिकारी बदल दिए थे। इनमें मुख्य सचिव और गृह सचिव भी शामिल थे। बाद में DGP भी बदले गए और फिर करीब 500 अधिकारी और बदले गए। मालदा की घटना से पहले ही कलकत्ता हाई कोर्ट ने वह याचिका खारिज भी कर दी थी, जिसमें इन बदलावों को चुनौती दी गई थी।

फिर प्रश्न उठता है कि इसके बाद भी प्रशासनिक अधिकारियों ने वह सक्रियता क्यों नहीं दिखाई जो अपेक्षित था? जवाब सीधा और सरल है। भय। यह भय कि यदि चुनावों के बाद फिर से ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) ही सत्ता में लौटी तो शायद प्रताड़ना झेलनी पड़े। शायद परिवार के सदस्यों और रिश्तेदारों को प्रताड़ित किया जाए।

पश्चिम बंगाल में यह भय एक दिन में नहीं बना है। पहले जनता के भीतर भय पैदा किया गया। फिर उद्योगपतियों-कारोबारियों को आतंकित किया गया। धीरे-धीरे इस भय का विस्तार पूरी व्यवस्था में किया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि बंगाल बर्बाद होता गया और भय की राजनीति आबाद।

पश्चिम बंगाल में भय की इस राजनीति की शुरुआत वामपंथियों ने 1970 में बर्दवान में सेन भाइयों की हत्या कर उनके खून से सने चावल खाने के लिए उनकी माँ को मजबूर कर किया था। इससे भय का जो विस्तार हुआ उसने 1977 में वामपंथियों को बंगाल की सत्ता में स्थापित कर दिया और यह 2011 तक लगातार चलता रहा। इस दौरान जितने नरसंहार बंगाल में हुए, उतने शायद ही देश के किसी दूसरे राज्य में हुए हों।

कभी भय की इस संस्कृति की पीड़ित रहीं ममता बनर्जी ने भी वामपंथियों से सत्ता छीनने के बाद इसे पुरजोर तरीके से आगे बढ़ाया। इसका ही परिणाम था कि 2021 में विधानसभा चुनाव के नतीजे आते ही सिलसिलेवार तरीके से भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों को प्रताड़ित किया गया। इससे मतदाताओं को यह संदेश दिया गया कि यदि अपनी मर्जी से मत डालोगे तो उसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।

5 साल बाद भी आम मतदाताओं के मन से यह भय मिटा नहीं है। केवल अधिकारी बदलने से यह भय मिट भी नहीं सकता। चुनाव आयोग द्वारा लाए गए अधिकारी भी जानते हैं कि चुनाव के बाद उन्हें फिर से उसी बंगाल में काम करना है। उनके परिवार के सदस्य और रिश्तेदार उसी बंगाल में रहते हैं। ऐसे में यदि फिर 4 मई 2026 को तृणमूल कॉन्ग्रेस ही लौट आई तो क्या होगा?

पश्चिम बंगाल की जो स्थिति है उसे देखते हुए राष्ट्रपति शासन लगाने की माँग कई बार उठी है। लेकिन अब चुनावों के समय इसे दोहरा देना बेतुका है। ऐसे में चुनाव आयोग का दायित्व सबसे अधिक हो जाता है।

लोकतंत्र का मतलब केवल चुनाव कराना नहीं है। उसे निष्पक्ष और भय मुक्त रखना भी है। यह सत्य है कि नई सरकार के गठन के बाद 2021 जैसी कोई स्थिति उत्पन्न होने पर सुरक्षा उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की नहीं होगी। लेकिन आज वह ऐसा वातावरण अवश्य बना सकती है, जिसमें मतदाताओं के पास अपने मन के हिसाब से मत देने की और अधिकारियों को बिना किसी आशंका के कानून सम्मत फैसले लेने की स्वतंत्रता हो।

पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में निष्पक्ष चुनाव के लिए केवल संवैधानिक प्रावधान पर्याप्त नहीं हैं। सख्त और विशेष प्रशासनिक हस्तक्षेप भी आवश्यक हैं। चुनाव से पहले अधिकारियों को बदल देना या पर्याप्त अर्धसैनिक बल राज्य में भेज देना इसकी कड़ी मात्र हैं। पूरी समस्या का समाधान नहीं।

समाधान के लिए चुनाव आयोग को उस मॉडल की तरफ देखना होगा, जिसके जरिए उसने बिहार में 90 के दशक में चरम पर पहुँच गए चुनावी हिंसा और बूथ कैप्चरिंग को समाप्त कर मन मुताबिक मत देने का मौका जनता को प्रदान किया था। उस समय बिहार में केजे राव जैसे अधिकारियों को आयोग ने विशेष रूप से तैनात किया था।

राव ने स्थानीय प्रशासन से स्वतंत्र निर्णय लिए थे। सुरक्षा बलों की रणनीतिक तैनाती की थी। संवेदनशील बूथों की पहचान कर उनकी कड़ी निगरानी सुनिश्चित की थी। साथ ही ​हर राजनीतिक दबाव को नजरअंदाज किया था।

किसी भी प्रशासनिक अधिकारी के लिए राव के ये निर्णय सामान्य से लग सकते हैं। पर इनका प्रभाव व्यापक था। इन निर्णयों ने न केवल बिहार में चुनावी हिंसा को समाप्त किया, बल्कि वहाँ की चुनावी प्रक्रिया को अधिक विश्वसनीय भी बना दिया।

सामान्य से लगने वाले ये कदम भी कोई अधिकारी तभी उठा सकता है, जब वह भय मुक्त हो। यदि उसका या उसके परिवार का भविष्य 4 मई के चुनाव परिणाम पर निर्भर होगा तो वह कभी भी ऐसे निर्णय नहीं ले पाएगा।

वैसे भी पश्चिम बंगाल में राजनीतिक ध्रुवीकरण इतना हिंसक हो चुका है कि अब हिंसा की घटनाएँ सामान्य सी लगती हैं। सत्तारूढ़ तंत्र के नियंत्रण में स्थानीय प्रशासन का होना साधारण सी बात लगती है।

इस स्थिति में बाहरी, निष्पक्ष और सख्त अधिकारियों की तैनाती जरूरी है। ठीक वैसे ही जैसे बिहार में हुआ था। चुनाव आयोग को सुनिश्चित करना होगा कि;

  • संवेदनशील क्षेत्रों में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की मौजूदगी अधिक हो।
  • राज्य से बाहर के वरिष्ठ अधिकारी चुनाव पर्यवेक्षक के तौर पर तैनात रहें।
  • हर संवेदनशील बूथ पर CCTV और वेबकास्टिंग अनिवार्य रहे।
  • आचार संहिता के उल्लंघन पर त्वरित और कड़े एक्शन हों।
  • लोगों को यह विश्वास दिलाया जाए कि उनका वोट सुरक्षित और गुप्त है।

ध्यान रहे यदि मतदाता डर के माहौल में वोट डालते हैं तो परिणाम वास्तविक जनमत को प्रतिबिंबित नहीं करते। ऐसे में आवश्यक है कि 23 और 29 अप्रैल को जब बंगाल के लोग मतदान करने के लिए अपने घरों से निकलें तो यह दिखना चाहिए कि लोकतंत्र केवल कागजों पर ही नहीं, जमीन पर भी जीवित और मजबूत है।

क्या चुनाव आयोग ऐसा कर पाएगा?

S-400 के आधे दाम में भारत ने बनाया खुद का एयर डिफेंस सिस्टम, प्रोजेक्ट कुशा की 5 यूनिट्स का ऑर्डर भी दिया: जानें क्यों है ये सबसे खास, जिसे देख दुनिया हैरान

भारत अपने एयर डिफेंस को मजबूत बनाने के लिए स्वदेशी लंबी दूरी का एयर डिफेंस सिस्टम प्रोजेक्ट कुशा तेजी से आगे बढ़ा रहा है। DRDO द्वारा विकसित इस सिस्टम के 5 स्क्वाड्रन खरीदने को भारतीय वायु सेना ने मंजूरी दे दी है, जिसकी कुल लागत करीब 21700 करोड़ रुपए बताई जा रही है।

इसका मुख्य उद्देश्य भारत को विदेशी सिस्टम पर निर्भरता से मुक्त करना और अपनी जरूरतों के हिसाब से एक मजबूत एयर शील्ड तैयार करना है। यह सिस्टम ड्रोन, फाइटर जेट, क्रूज मिसाइल और बड़े हवाई प्लेटफॉर्म तक को निशाना बना सकता है।

खास बात यह है कि इसकी टेस्टिंग और प्रोडक्शन साथ-साथ चल रहे हैं, जिससे साफ है कि इसे तेजी से तैनात करने की योजना है और इसकी जरूरत तत्काल महसूस की जा रही है।

क्षमता और अभेद्य एयर डिफेंस: कैसे करेगा काम?

प्रोजेक्ट कुशा को तीन लेयर में डिजाइन किया गया है ताकि हर तरह के हवाई खतरे को अलग-अलग स्तर पर रोका जा सके। इसमें M1 मिसाइल (150 किमी) ड्रोन, फाइटर जेट और क्रूज मिसाइल जैसे टारगेट के लिए है, M2 (250 किमी) स्टेल्थ एयरक्राफ्ट और तेज खतरों के लिए बनाई जा रही है।

जबकि M3 (350-400 किमी) AWACS और बड़े एयरबोर्न टारगेट को मार गिराने के लिए होगी। इसकी सिंगल शॉट किल क्षमता 80% से ज्यादा बताई जा रही है, यानी एक ही मिसाइल से लक्ष्य खत्म करने की संभावना काफी अधिक है।

M1 इंटरसेप्टर में डुअल-पल्स सॉलिड रॉकेट मोटर का इस्तेमाल किया गया है, जिससे यह अंतिम चरण में तेज और सटीक हमला कर सकता है। इसके साथ मल्टी-फंक्शन कंट्रोल रडार और बैटल मैनेजमेंट सिस्टम मिलकर इसे एक स्मार्ट नेटवर्क आधारित एयर डिफेंस बनाते हैं, जो ड्रोन स्वॉर्म, स्टेल्थ टेक्नोलॉजी और एक साथ कई मिसाइल हमलों जैसे आधुनिक खतरों से निपटने में सक्षम है।

S-400 से कितना अलग और बेहतर?

रूस का S-400 दुनिया के सबसे एडवांस एयर डिफेंस सिस्टम में गिना जाता है, लेकिन प्रोजेक्ट कुशा कई मामलों में उससे अलग और किफायती विकल्प बनकर उभर रहा है। सबसे बड़ा फर्क इसकी लागत में है।

जहाँ S-400 के 5 स्क्वाड्रन की कीमत करीब 45000 करोड़ रुपए रही, वहीं कुशा के 5 स्क्वाड्रन सिर्फ 21700 करोड़ रुपए में तैयार हो रहे हैं। यानी यह लगभग आधी लागत में उपलब्ध होगा।

मिसाइल की कीमत में भी बड़ा अंतर है। जहाँ S-400 की एक मिसाइल करीब 100 करोड़ रुपए की होती है, जबकि कुशा की मिसाइल 40-50 करोड़ रुपए में तैयार हो रही है। इसके अलावा कुशा पूरी तरह भारतीय जरूरतों के हिसाब से डिजाइन किया गया है, जबकि S-400 एक जनरल सिस्टम है।

ऑपरेशनल आजादी और सॉफ्टवेयर कंट्रोल

प्रोजेक्ट कुशा की सबसे बड़ी ताकत इसकी ऑपरेशनल आजादी है। विदेशी सिस्टम जैसे S-400 में सॉफ्टवेयर और सोर्स कोड पर पूरा नियंत्रण नहीं होता, जिससे कई बार अपडेट या बदलाव के लिए सप्लायर पर निर्भर रहना पड़ता है।

लेकिन कुशा पूरी तरह स्वदेशी है, जिसमें एयरफोर्स को मिशन एल्गोरिदम और कोर सॉफ्टवेयर पर पूरा नियंत्रण मिलेगा। इससे किसी भी तरह के किल स्विच का खतरा नहीं रहेगा और युद्ध के समय किसी बाहरी देश पर निर्भरता खत्म हो जाएगी।

अगर दुश्मन नई स्टेल्थ तकनीक या इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर का इस्तेमाल करता है, तो भारत तुरंत अपने रडार और ट्रैकिंग सिस्टम को अपडेट कर सकता है, जिससे प्रतिक्रिया और भी तेज और प्रभावी हो जाती है।

इंटीग्रेशन, मेंटेनेंस और लंबी अवधि का फायदा

प्रोजेक्ट कुशा को भारत के IACCS नेटवर्क के साथ आसानी से जोड़ा जाएगा, जिससे यह AWACS, तेजस Mk-2 जैसे फाइटर जेट और ग्राउंड रडार के साथ रियल टाइम डेटा शेयर कर सकेगा।

इसका मतलब है कि किसी भी खतरे पर तेजी से फैसला लेकर तुरंत कार्रवाई की जा सकेगी। मेंटेनेंस के मामले में भी यह सिस्टम बड़ा फायदा देता है, क्योंकि इसके सभी स्पेयर पार्ट्स और सर्विस भारत में ही उपलब्ध होंगे।

इससे विदेशी सप्लाई चेन पर निर्भरता खत्म होगी और सिस्टम के बंद पड़ने की संभावना बेहद कम हो जाएगी। चूँकि ऐसे एयर डिफेंस सिस्टम 25-30 साल तक चलते हैं, इसलिए लंबे समय में कुशा की लागत काफी कम साबित होगी, जबकि विदेशी सिस्टम में मेंटेनेंस और अपग्रेड पर भारी खर्च आता है।

इस्लामिक देश ईरान में नहीं मिटी हिंदू आस्था, पढ़ें- बंदर अब्बास के 134 साल पुराने भगवान विष्णु के मंदिर की दास्ताँ

एक इस्लामिक राष्ट्र ईरान के बंदर अब्बास में समुद्र किनारे हिंदुओं की जीवंत संस्कृति विरासत 130 से भी ज्यादा वर्षों से खड़ी है। बंदर अब्बास का यह अनोखा हिंदू मंदिर सिर्फ पत्थरों की संरचना नहीं बल्कि उन भारतीय व्यापारियों की जीवटता की कहानी है जिन्होंने समुद्र पार जाकर भी अपनी संस्कृति को मिटने नहीं दिया। यह मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि प्रवास, व्यापार, आस्था और सांस्कृतिक मेल-जोल का जीवंत प्रतीक है जो यह दिखाता है कि किस तरह हिंदू अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं, चाहे वे दुनिया के किसी भी कोने में क्यों न बस जाएँ।

समुद्री व्यापार से जन्मी आस्था की कहानी

बंदर अब्बास ऐतिहासिक रूप से एक महत्वपूर्ण समुद्री बंदरगाह रहा है, जो फारस की खाड़ी के व्यापारिक नेटवर्क का प्रमुख केंद्र था। पुराने समय में भारत और ईरान के बीच समुद्री व्यापार काफी विकसित था और इसी वजह से भारतीय व्यापारी बड़ी संख्या में यहाँ आते-जाते थे।

खासतौर पर गुजरात, कच्छ और सिंध के व्यापारी इस इलाके में सक्रिय थे। व्यापार के सिलसिले में उनका यहाँ लंबे समय तक ठहराव होने लगा और धीरे-धीरे कई लोग यहीं बस गए। विदेशी जमीन पर रहने के बावजूद उन्होंने अपनी संस्कृति, भाषा और धार्मिक परंपराओं को जीवित रखा। इसी जरूरत ने उन्हें एक ऐसे स्थान के निर्माण के लिए प्रेरित किया, जहाँ वे पूजा-पाठ कर सकें और अपने सामुदायिक जीवन को बनाए रख सकें।

130 साल पुराना इतिहास आज भी जिंदा

इस मंदिर का निर्माण 19वीं सदी के अंतिम वर्षों में लगभग 1892 के आसपास हुआ था जो उस समय के हिसाब से एक बड़ा सांस्कृतिक कदम था। यह वह दौर था जब बंदर अब्बास व्यापारिक गतिविधियों के कारण तेजी से विकसित हो रहा था और भारतीय समुदाय भी यहाँ मजबूत स्थिति में था।

(फोटो साभार: sindhrenaissance)

लगभग 130 से 134 साल पुराना यह मंदिर आज भी अपनी मूल संरचना के साथ खड़ा है और उस समय की सामाजिक और धार्मिक जीवनशैली की झलक दिखाता है। इसके निर्माण में उस दौर के स्थानीय शासक मोहम्मद हसन खान साद-ओल-मलेक के शासनकाल का भी जिक्र मिलता है, जो इस क्षेत्र के प्रशासनिक प्रमुख थे।

भारतीय व्यापारियों की आस्था और सामूहिक प्रयास

इस मंदिर के निर्माण के पीछे भारतीय व्यापारियों की सामूहिक आस्था और एकजुटता की कहानी छिपी है। उस समय भारत से आए व्यापारी आर्थिक रूप से संपन्न थे और उन्होंने मिलकर चंदा इकट्ठा कर इस मंदिर का निर्माण कराया। माना जाता है कि यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित था, जो हिंदू धर्म में पालनकर्ता और रक्षक के रूप में पूजे जाते हैं।

इस मंदिर ने वहाँ बसे भारतीयों को एक आध्यात्मिक आधार दिया, जहाँ वे अपने धार्मिक अनुष्ठान कर सकते थे और अपने त्योहार मना सकते थे। यह स्थान उनके लिए घर से दूर एक ‘छोटा भारत’ बन गया था।

वास्तुकला में भारत-ईरान का अद्भुत संगम

इस मंदिर की संरचना इसे विशेष बनाती है। इसका मुख्य कक्ष चौकोर आकार में है, जिसके ऊपर एक बड़ा और आकर्षक गुंबद बना हुआ है। यह गुंबद पारंपरिक भारतीय मंदिरों से अलग है और इसमें फारसी एवं इस्लामी स्थापत्य शैली का प्रभाव दिखाई देता है, जो इसे एक अनोखा रूप देता है।

निर्माण में मूंगा पत्थर, मिट्टी, गारा और चूने का इस्तेमाल किया गया, जो स्थानीय संसाधनों को दर्शाता है। मंदिर के गुंबद पर छोटे-छोटे अलंकरण और मीनारनुमा संरचनाएँ भी बताई जाती हैं, जो भारतीय शैली की याद दिलाती हैं। अंदर की दीवारों पर कभी रंगीन चित्रकारी और धार्मिक प्रतीकों की सजावट हुआ करती थी।

मरम्मत के दौरान यहाँ भगवान कृष्ण की एक चित्रकारी भी सामने आई, जो इस बात का प्रमाण है कि यहाँ केवल पूजा ही नहीं, बल्कि धार्मिक कला और परंपराओं को भी संजोया गया था।

पूजा से विरासत बनने तक का सफर

एक समय यह मंदिर धार्मिक गतिविधियों का केंद्र हुआ करता था। यहाँ नियमित रूप से पूजा, आरती और धार्मिक अनुष्ठान होते थे। जन्माष्टमी, दीवाली जैसे त्योहारों पर भारतीय समुदाय बड़ी संख्या में यहाँ इकट्ठा होता था और मंदिर का वातावरण पूरी तरह उत्सवमय हो जाता था।

इसके अलावा यह स्थान सामाजिक मेल-जोल का भी केंद्र था, जहाँ लोग एक-दूसरे से मिलते, अपनी समस्याएँ साझा करते और सामुदायिक जीवन को मजबूत बनाते थे। लेकिन 20वीं सदी के मध्य में परिस्थितियाँ बदलने लगीं। व्यापार के स्वरूप में बदलाव आया और कई भारतीय व्यापारी वापस अपने देश लौट गए।

इसके बाद मंदिर की गतिविधियाँ धीरे-धीरे कम होती गईं और अंततः यह एक शांत ऐतिहासिक स्थल बनकर रह गया। आज यह मंदिर सक्रिय पूजा स्थल नहीं है लेकिन इसे ईरान की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में संरक्षित किया गया है और राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा भी मिला हुआ है। अब यह पर्यटकों और इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए एक महत्वपूर्ण आकर्षण है।

ईरान में हिंदू समुदाय की मौजूदगी

ईरान की कुल आबादी लगभग 9 करोड़ के आसपास मानी जाती है, जिसमें करीब 99.40 प्रतिशत लोग इस्लामी मजहब का पालन करते हैं। इनमें लगभग 89.46 प्रतिशत शिया और करीब 9.94 प्रतिशत सुन्नी मुस्लिम शामिल हैं। ईसाई, यहूदी और अन्य छोटे समुदायों के साथ-साथ हिंदू समुदाय भी यहाँ रहता है।

Pew Research Center की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2010 में ईरान में करीब 20 हजार हिंदू रहते थे और 2020 तक भी यह संख्या लगभग स्थिर बनी रही। इनमें अधिकतर भारतीय मूल के व्यापारी, कामगार और उनके परिवार शामिल हैं। भले ही संख्या कम हो लेकिन इनकी सांस्कृतिक उपस्थिति ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण रही है, जिसका प्रमाण बंदर अब्बास का यह मंदिर है।

बंदर अब्बास का यह हिंदू मंदिर यह बताता है कि धर्म और संस्कृति की कोई सीमाएँ नहीं होतीं और हिंदू जहाँ भी जाते हैं वो अपनी पहचान को साथ लेकर चलते हैं।

बर्तन के बदले तो नहीं बेच रहे पुराना फोन, इस्तार की गिरफ्तारी से खुला ‘मदरबोर्ड स्कैम’: जानें- कैसे साइबर अपराधियों का हथियार बन सकती है लापरवाही

जब आप अपना पुराना, टूटा या बेकार हो चुका मोबाइल फोन किसी फेरीवाले को चंद बर्तनों के बदले दे देते हैं, तो आपको लगता है कि आपने कबाड़ का सही सौदा किया। लेकिन उत्तर प्रदेश और बिहार पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में एक ऐसा खुलासा हुआ है, जो आपकी रातों की नींद उड़ा सकता है।

कटिहार का एक मामूली सा मोबाइल दुकानदार इस्तार आलम, इंटरनेशनल साइबर अपराधियों का ‘हथियार सप्लायर’ निकला है। यह गिरोह आपके पुराने फोन के मदरबोर्ड को चीन और बांग्लादेश के साइबर ठगों तक पहुँचा रहा था, ताकि आपका पर्सनल डेटा चोरी कर बैंक खाते साफ किए जा सकें।

क्या है पूरा मामला? कैसे हुई गिरफ्तारी?

इस पूरे खेल का पर्दाफाश तब हुआ जब उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले की लालगंज पुलिस ने 16 मार्च की रात एक ट्रक को पकड़ा। इस ट्रक में 11,605 पुराने मोबाइल फोन भरे हुए थे, जिनकी कीमत करीब 1 करोड़ रुपए आँकी गई। पुलिस ने जब ट्रक में सवार 8 लोगों को गिरफ्तार किया, तो उन्होंने बिहार के कटिहार जिले के रहने वाले इस्तार आलम का नाम उगला।

इसके बाद बिहार STF और यूपी पुलिस ने संयुक्त छापेमारी कर कटिहार के रौतारा इलाके से इस्तार को धर दबोचा। इस्तार कहने को तो एक छोटी सी मोबाइल दुकान चलाता था, लेकिन असल में वह एक इंटरनेशनल सिंडिकेट का सरगना था।

गली का ‘बर्तन वाला’ और पुराना मोबाइल: गिरोह का मॉडल

इस गिरोह के काम करने का तरीका इतना व्यवस्थित और शातिर है कि आम इंसान को इसकी भनक तक नहीं लगती। गिरोह के सरगना इस्तार आलम ने देश के कई बड़े राज्यों जैसे बिहार, झारखंड, दिल्ली, तमिलनाडु और हैदराबाद में अपना एक बड़ा जाल बिछा रखा था। इस काम के लिए उसने बड़ी संख्या में ‘फेरीवालों’ को काम पर रखा था। ये लोग साधारण कबाड़ वाले बनकर गली-मोहल्लों में घूमते हैं ताकि किसी को शक न हो।

इन फेरीवालों का मुख्य काम लोगों को लालच देना होता है। ये खासतौर पर घरों की महिलाओं को अपना निशाना बनाते हैं और उन्हें नए चमचमाते स्टील के बर्तन या प्लास्टिक के डिब्बों का लालच देते हैं। इसके बदले में वे लोगों से उनके घर में पड़े पुराने, खराब या टूटे हुए स्मार्टफोन माँगते हैं। अधिकतर लोग यह सोचकर अपना पुराना फोन उन्हें दे देते हैं कि ‘यह तो कचरा है, इसके बदले नया बर्तन मिलना फायदे का सौदा है’, लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता कि वे अपना कीमती डेटा अपराधियों को सौंप रहे हैं।

जब ये फेरीवाले अलग-अलग शहरों से हजारों की संख्या में मोबाइल इकट्ठा कर लेते हैं, तो इन्हें बड़े ट्रकों में भरकर बिहार के कटिहार भेजा जाता है। कटिहार इस्तार आलम का मुख्य केंद्र है। एक बार में करीब 10 से 20 हजार मोबाइल वहाँ पहुँचते हैं। वहाँ पहुँचने के बाद इस्तार अपनी दुकान में इन सभी फोनों को बेरहमी से तोड़ देता है और उनके अंदर से ‘मदरबोर्ड’ निकाल लेता है।

मदरबोर्ड मोबाइल का वह सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है जिसे फोन का ‘दिमाग’ कहा जाता है। फोन भले ही ऊपर से टूटा हो या बंद हो, लेकिन उसकी याददाश्त यानी सारा पर्सनल डेटा (फोटो, पासवर्ड, बैंक डिटेल्स) इसी मदरबोर्ड में सुरक्षित रहता है। इस्तार का असली मकसद इसी चिप या बोर्ड को निकालकर अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराधियों तक पहुँचाना होता है, ताकि वे आपके डेटा का गलत इस्तेमाल कर सकें।

चीन और बांग्लादेश से कनेक्शन: डेटा की तस्करी

पुलिस की जाँच में यह बेहद चौंकाने वाली बात सामने आई है कि इस्तार आलम महज एक कबाड़ का कारोबारी नहीं था, बल्कि वह पिछले एक साल से अंतरराष्ट्रीय स्तर के खतरनाक साइबर अपराधियों के साथ मिलकर काम कर रहा था। वह अपने द्वारा निकाले गए मोबाइल के मदरबोर्ड्स को चीन और बांग्लादेश के उन साइबर ठगों तक पहुँचाता था, जो कंबोडिया, मलेशिया और म्यांमार जैसे देशों में बैठकर बड़े-बड़े ‘साइबर स्कैम कंपाउंड’ यानी ठगी के केंद्र चला रहे हैं। यह एक बहुत बड़ा नेटवर्क है जो दुनियाभर के लोगों को अपना शिकार बनाता है।

इन मदरबोर्ड्स का विदेशी हैकर्स के पास जाने का मतलब है आपकी निजी जानकारी का खतरे में पड़ना। दरअसल, ये विदेशी हैकर्स इतने शातिर होते हैं कि वे आधुनिक सॉफ्टवेयर और मशीनों के जरिए आपके उन पुराने मदरबोर्ड से भी डेटा रिकवर कर लेते हैं। भले ही आपने अपना फोटो, वीडियो, कॉन्टैक्ट लिस्ट या बैंक से जुड़ी जानकारी डिलीट कर दी हो, लेकिन ये हैकर्स उन्हें वापस निकालकर आपकी पहचान चोरी कर सकते हैं और आपके बैंक खातों में सेंध लगा सकते हैं।

हैरानी की बात यह भी है कि इस्तार का यह धँधा सिर्फ विदेशों तक ही सीमित नहीं था। उसने भारत के भीतर भी साइबर अपराधियों को यह ‘कच्चा माल’ उपलब्ध कराया। वह इन मदरबोर्ड्स को भारत के सबसे कुख्यात साइबर अपराध केंद्र ‘जामताड़ा’ और बिहार के स्थानीय छोटे-बड़े ठगों को भी बेचता था। यानी एक छोटा सा मोबाइल बोर्ड कटिहार से निकलकर जामताड़ा के ठगों से लेकर चीन और कंबोडिया के बड़े हैकर्स तक के पास पहुँच रहा था, जो डिजिटल इंडिया के दौर में देश की सुरक्षा और आम लोगों की गाढ़ी कमाई के लिए एक बड़ा खतरा बन गया है।

करोड़ों का ट्रांजेक्शन: दिहाड़ी मजदूर के खाते में लाखों

यह पूरा गिरोह कबाड़ के काम की आड़ में असल में करोड़ों रुपयों का काला कारोबार कर रहा था। बाहर से देखने पर भले ही यह पुराने मोबाइल का साधारण लेने-देन लगता हो, लेकिन इसके पीछे की कमाई चौंकाने वाली है। इस गिरोह के लोग इतने शातिर हैं कि वे खुद को गरीब दिखाने की कोशिश करते हैं ताकि किसी को संदेह न हो। पुलिस की जाँच में एक ऐसा मामला सामने आया जिसने सबके होश उड़ा दिए। गिरोह का एक सदस्य, जो खुद को एक मामूली दिहाड़ी मजदूर बताता था और कहता था कि वह सिर्फ इस्तार के लिए मजदूरी करता है, जब पुलिस ने उसका बैंक खाता खंगाला तो उसमें पिछले दो साल के भीतर 45 लाख रुपए का बड़ा लेन-देने मिला।

एक मजदूर के खाते में इतनी बड़ी रकम मिलना इस बात का सबूत है कि पुराने मोबाइल के इस खेल में कितना ज्यादा पैसा शामिल है। गिरोह के सरगना इस्तार आलम ने तो इस धँधे के जरिए काली कमाई का एक विशाल साम्राज्य खड़ा कर लिया है। उसने मोबाइल के मदरबोर्ड बेच-बेचकर अवैध तरीके से अकूत संपत्ति जमा की है। मामले की गंभीरता और करोड़ों के इस संदिग्ध लेनदेन को देखते हुए, अब पुलिस के साथ-साथ आर्थिक अपराध इकाई (EOU) भी इस गिरोह की संपत्तियों की गहराई से जाँच कर सकती है। जाँच का मुख्य मकसद यह पता लगाना है कि इस अंतरराष्ट्रीय गिरोह ने अब तक कुल कितनी संपत्ति बनाई है और इस पैसे का इस्तेमाल कहीं देश विरोधी गतिविधियों में तो नहीं किया जा रहा था।

आप कैसे सुरक्षित रहें?

आजकल के डिजिटल दौर में आपका एक पुराना और बेकार समझा जाने वाला फोन आपको बहुत बड़ी कानूनी मुसीबत में डाल सकता है। पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों ने इस खतरे को देखते हुए आम जनता के लिए कुछ बेहद जरूरी सावधानियाँ जारी की हैं। सबसे पहली और जरूरी बात यह है कि कभी भी किसी गली-मोहल्ले में घूमने वाले अनजान फेरीवाले को नए बर्तनों या किसी सस्ते सामान के लालच में अपना पुराना स्मार्टफोन न दें। ये लोग आपके डेटा की कीमत जानते हैं, जबकि आप सिर्फ एक बर्तन के फायदे को देख रहे होते हैं।

अगर आप अपना फोन किसी व्यक्ति को बेच भी रहे हैं, तो सुरक्षा के लिहाज से यह बेहद जरूरी है कि आप खरीदार का आधार कार्ड या कोई भी सरकारी पहचान पत्र जरूर माँगें। सिर्फ पहचान पत्र देखना काफी नहीं है, बल्कि उसके स्थाई पते की जानकारी भी अपने पास नोट करके रखें। भविष्य में अगर उस फोन का इस्तेमाल किसी गलत काम या अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी के लिए होता है, तो आपके पास यह सबूत होगा कि आपने वह फोन किसे सौंपा था।

इसके अलावा, फोन बेचते समय हमेशा एक लिखित रसीद जरूर बनवाएँ। इस रसीद पर फोन बेचने की तारीख और मोबाइल का सबसे खास पहचान नंबर यानी IMEI नंबर साफ-साफ लिखा होना चाहिए। यह कानूनी तौर पर आपको सुरक्षित रखने का सबसे मजबूत दस्तावेज होता है। इससे यह साबित होता है कि एक निश्चित तारीख के बाद उस फोन की जिम्मेदारी आपकी नहीं, बल्कि खरीदार की है।

अंत में, फोन किसी को भी सौंपने से पहले उसे पूरी तरह ‘फैक्ट्री रिसेट’ जरूर करें ताकि आपकी फोटो और फाइल्स मिट जाएँ। हालाँकि, यह याद रखना भी जरूरी है कि प्रोफेशनल हैकर्स आधुनिक तकनीक से रिसेट किया गया डेटा भी वापस निकाल सकते हैं। इसलिए, जोखिम कम करने के लिए हमेशा जाने-माने और विश्वसनीय प्लेटफॉर्म या अधिकृत स्टोर पर ही अपना पुराना फोन बेचें। आपकी एक छोटी सी सावधानी आपको और आपके बैंक खाते को सुरक्षित रख सकती है।

तकनीकी कबाड़ और राष्ट्रीय सुरक्षा

यह मामला केवल मोबाइल चोरी या ठगी का नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है। भारत के नागरिकों का डेटा सरहद पार चीन और बांग्लादेश के अपराधियों के हाथ लग रहा है। एक छोटा सा ‘मदरबोर्ड’ विदेशी ताकतों के लिए जासूसी या आर्थिक हमले का जरिया बन सकता है।

पुलिस की यह कार्रवाई सराहनीय है, लेकिन यह इस बात की ओर भी इशारा करती है कि हमारे देश में E-Waste (इलेक्ट्रॉनिक कचरा) के निपटारे के लिए कोई ठोस जागरूकता नहीं है। जब तक लोग ‘कबाड़ से जुगाड़’ के चक्कर में अपना डेटा सस्ते में बेचते रहेंगे, इस्तार आलम जैसे अपराधी फलते-फूलते रहेंगे। डिजिटल इंडिया के दौर में अपनी प्राइवेसी के प्रति जागरूक होना ही सबसे बड़ा बचाव है।

चुनाव आयोग ने NIA को सौंपी मालदा हिंसा की जाँच: DM-गृह सचिव ने बनाई दूरी, बंधक बनाए गए अधिकारिकों को खाना-पानी तक नहीं मिला; समझें- SC ने क्या कहा

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कॉन्ग्रेस की सरकार में लोकतंत्र का मजाक बनना अब आम बात हो गई है। बुधवार (1 अप्रैल 2026) को चुनावी ड्यूटी पर तैनात सात न्यायिक अधिकारियों जिनमें तीन महिलाएँ भी शामिल थीं, उनको मालदा जिले के एक BDO कार्यालय में घेर लिया गया।

ये अधिकारी SIR के तहत मतदाता सूची से जुड़े काम में लगे थे। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से यह सामने आया कि इन अधिकारियों को लगभग 9 घंटे तक भयावह स्थिति का सामना करना पड़ा, जो राज्य प्रशासन की लापरवाही को दिखाता है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपिन पंचोली की पीठ ने इस मामले का संज्ञान लिया। यह मामला कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा जानकारी दिए जाने के बाद सामने आया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस घटना पर पश्चिम बंगाल सरकार और मालदा जिला प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई।

सोची-समझी और सोची-समझी चाल

कोर्ट ने कहा कि यह कोई सामान्य घटना नहीं थी, बल्कि एक सोची-समझी और प्रेरित कोशिश थी, जिसका मकसद न्यायिक अधिकारियों का मनोबल गिराना और लंबित मामलों में आपत्तियों के निपटारे की प्रक्रिया को रोकना था। कोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम को अपनी अधिकारिता के लिए सीधी चुनौती बताया।

इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि न्यायिक अधिकारियों को निशाना बनाना, जो असल में इस अदालत का विस्तार हैं, एक खुली और दुस्साहसिक कोशिश है। यह न सिर्फ न्यायिक अधिकारियों को डराने-धमकाने का प्रयास है, बल्कि यह सीधे तौर पर इस अदालत की सत्ता को चुनौती देने जैसा है।

अदालत के मुताबिक, यह घटना किसी भी तरह से सामान्य नहीं मानी जा सकती और पहली नजर में यह एक सुनियोजित, सोची-समझी और जानबूझकर की गई कार्रवाई लगती है, जिसका उद्देश्य न्यायिक अधिकारियों का मनोबल तोड़ना और बाकी मामलों में चल रही सुनवाई की प्रक्रिया में बाधा डालना था।

पीठ ने आगे कहा कि न्यायिक अधिकारियों के मन में डर का माहौल बनाने की ऐसी कोशिशें, ताकि वे अपने कर्तव्यों का पालन न कर सकें और कानून-व्यवस्था को बिगाड़ा जा सके, किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं की जाएँगी। अदालत ने मालदा में न्यायिक अधिकारियों के घेराव और उत्पीड़न को आपराधिक अवमानना का मामला बताया।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा, “हमें यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि हम किसी भी व्यक्ति को कानून अपने हाथ में लेने की अनुमति नहीं देंगे, ताकि न्यायिक अधिकारियों के मन में मनोवैज्ञानिक डर का माहौल बनाया जा सके, जो अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे हैं। ऐसा व्यवहार निस्संदेह कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट एक्ट, 1971 की धारा 2(सी) के तहत आपराधिक अवमानना की श्रेणी में आता है।”

अदालत ने आगे कहा कि मालदा की यह घटना नागरिक और पुलिस प्रशासन की पूरी तरह विफलता को दिखाती है, खासकर कानून-व्यवस्था बनाए रखने के मामले में। पीठ ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि न्यायिक अधिकारियों को जानबूझकर खाने-पीने जैसी बुनियादी सुविधाओं से भी वंचित रखा गया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “हमें जानकारी दी गई है कि स्थिति इतनी गंभीर थी कि न्यायिक अधिकारियों तक भोजन और पानी भी पहुँचने नहीं दिया गया। माननीय मुख्य न्यायाधीश ने यह भी बताया कि न तो जिला मजिस्ट्रेट और न ही पुलिस अधीक्षक उस बीडीओ कार्यालय पहुँचे, जहाँ अधिकारियों को घेरकर रखा गया था।”

प्रशासन का आचरण बेहद निंदनीय: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्टीकरण माँगा

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि मुख्य सचिव, गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक, कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक ने समय पर प्रभावी कदम नहीं उठाए, जबकि उन्हें घटना की पूरी जानकारी थी और न्यायिक अधिकारियों को सुरक्षित निकालना उनकी जिम्मेदारी थी।

अदालत ने कहा, “यह देखकर हमें दुख होता है कि मुख्य सचिव, गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक, कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक का रवैया बेहद निंदनीय रहा। उन्हें इस अदालत को यह बताना होगा कि जब उन्हें दोपहर करीब 3:30 बजे न्यायिक अधिकारियों के घेराव की सूचना मिल गई थी, तब भी उनकी सुरक्षित निकासी के लिए कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाए गए।”

अदालत ने आगे कहा कि राज्य प्रशासन की जिम्मेदारी थी कि वह तुरंत भारतीय निर्वाचन आयोग को सूचना देता और जरूरत पड़ने पर केंद्रीय बलों की तैनाती की माँग करता, ताकि न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

मौखिक टिप्पणी में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि पश्चिम बंगाल सबसे ज्यादा ध्रुवीकृत राज्य बन गया है, जहाँ हर कोई राजनीतिक भाषा में बात करता है। अदालत ने यह भी अफसोस जताया कि जिन न्यायिक अधिकारियों को निष्पक्ष एजेंट के रूप में स्वागत किया जाना चाहिए था, उन्हें भी हमलों से नहीं बख्शा गया।

सुप्रीम कोर्ट ने कई निर्देश जारी किए

मालदा की इस घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कई निर्देश जारी किए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि SIR की प्रक्रिया में कोई रुकावट न आए और ड्यूटी पर तैनात न्यायिक अधिकारियों के जीवन, स्वतंत्रता, संपत्ति और उनके परिवारों की सुरक्षा पूरी तरह से सुनिश्चित की जा सके।

अदालत ने भारतीय निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया कि वह पर्याप्त केंद्रीय बलों की माँग करे और उन्हें उन सभी स्थानों पर तैनात किया जाए, जहाँ न्यायिक अधिकारी SIR प्रक्रिया के तहत आपत्तियों के निपटारे के लिए भेजे गए हैं।

इसके अलावा, अदालत ने आदेश दिया कि जिन होटलों और सरकारी गेस्ट हाउसों में न्यायिक अधिकारी और उनके परिवार रह रहे हैं, वहाँ पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था की जाए। साथ ही पुलिस प्रशासन को यह भी निर्देश दिया गया कि ड्यूटी पर तैनात न्यायिक अधिकारियों द्वारा बताए गए खतरे के स्तर का आकलन करे और तुरंत जरूरी कदम उठाए।

अदालत ने आगे भारतीय निर्वाचन आयोग और पश्चिम बंगाल सरकार को यह भी निर्देश दिया कि वे सभी जरूरी सुधारात्मक कदम उठाएँ, ताकि न्यायिक अधिकारियों को सौंपी गई जिम्मेदारियों का सुरक्षित और सुचारु रूप से पालन हो सके।

सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य सचिव, गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक, सभी जिला मजिस्ट्रेट, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और अन्य पुलिस अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि किसी भी समय आपत्तियाँ दाखिल करने या उनकी सुनवाई के दौरान परिसर में 5 से ज्यादा लोग प्रवेश न करें। इन अधिकारियों को अदालत में अनुपालन रिपोर्ट भी जमा करने का आदेश दिया गया है।

गौरतलब है कि शीर्ष अदालत ने मुख्य सचिव, मालदा के DGP, DM और SP को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए पूछा है कि उनके खिलाफ उचित कार्रवाई क्यों न की जाए।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण निर्देश भारतीय निर्वाचन आयोग को दिया गया है। अदालत ने कहा है कि मालदा में न्यायिक अधिकारियों के घेराव की घटना की जाँच किसी स्वतंत्र एजेंसी, जैसे केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो या राष्ट्रीय जाँच एजेंसी को सौंपी जाए।

अदालत ने भारतीय निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया कि वह इस संबंध में अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करे, जबकि जाँच करने वाली एजेंसी को जाँच पूरी करने के बाद अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया गया है।

CEC ज्ञानेश कुमार ने मालदा हिंसा का मामला NIA को सौंपा

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का पालन करते हुए, मालदा हिंसा मामले की जाँच एक स्वतंत्र एजेंसी को सौंपने के क्रम में, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने राष्ट्रीय जाँच एजेंसी को एक पत्र लिखा, जिसमें इस मामले की जाँच करने की जिम्मेदारी NIA को सौंपी गई।

पत्र में लिखा गया है, “मुझे माननीय सुप्रीम कोर्ट के गुरुवार (2 अप्रैल 2026) के आदेश (स्वतः संज्ञान रिट याचिका (सिविल) संख्या 3/2026, प्रति संलग्न) के संदर्भ में यह बताने का निर्देश दिया गया है। यह मामला मालदा जिले के कालियाचक क्षेत्र के BDO कार्यालय में SIR के तहत काम कर रहे सात न्यायिक अधिकारियों को असामाजिक तत्वों द्वारा घेरने से जुड़ा है। इस संबंध में आपसे अनुरोध है कि इस मामले की आवश्यक जाँच/पड़ताल की जाए और माननीय अदालत के निर्देशों के अनुसार अपनी प्रारंभिक जाँच रिपोर्ट सीधे अदालत में प्रस्तुत की जाए।” यह पत्र भारतीय निर्वाचन आयोग के सचिव सुजीत कुमार मिश्रा द्वारा हस्ताक्षरित है।

मालदा हिंसा मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला पश्चिम बंगाल के मालदा जिले की एक घटना से जुड़ा है, जहाँ बुधवार (1 अप्रैल 2026) की शाम को सात न्यायिक अधिकारियों जिनमें तीन महिला जज भी शामिल थीं उनको एक बड़ी भीड़ ने 9 घंटे से ज्यादा समय तक घेरकर रखा। ये अधिकारी कालियाचक के BDO कार्यालय में SIR के तहत मतदाता सूची से जुड़े काम कर रहे थे।

घटना की शुरुआत दोपहर करीब 3:30 बजे हुई, जब बड़ी संख्या में लोग कार्यालय के बाहर इकट्ठा हो गए और मतदाता सूची से अपने नाम हटाए जाने के खिलाफ विरोध करने लगे। भीड़ ने पूरे परिसर को घेर लिया, जिससे न्यायिक अधिकारी कई घंटों तक बाहर नहीं निकल सके।

अदालत के अनुसार, यह स्थिति देर रात तक तनावपूर्ण बनी रही और स्थानीय प्रशासन की तरफ से तुरंत कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं दिखी। आखिरकार पुलिस महानिदेशक और गृह सचिव जैसे वरिष्ठ अधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद ही आधी रात के बाद न्यायिक अधिकारियों को सुरक्षित बाहर निकाला जा सका।

हालाँकि, रिहा होने के बाद भी उनकी सुरक्षा पूरी तरह सुनिश्चित नहीं थी। जब वे अपने ठहरने के स्थानों की ओर लौट रहे थे, तब उनके गाड़ियों पर पत्थरों और डंडों से हमला किया गया, जिससे उनकी सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “चौंकाने वाली बात यह है कि जब न्यायिक अधिकारियों को आधी रात के आसपास छोड़ा गया और वे अपने-अपने ठिकानों की ओर लौट रहे थे, तब उनके गाड़ियों पर पत्थर फेंके गए और बांस की लाठियों व ईंटों से हमला किया गया।”

अदालत ने यह भी कहा कि मालदा हिंसा की यह घटना उन न्यायिक अधिकारियों पर नकारात्मक प्रभाव डालेगी, जो बिना छुट्टी लिए लगातार अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे हैं।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

‘नास्तिक’ प्रकाश राज को माँ के सम्मान में ईसाइयत कबूल, पर हिंदुओं का अपमान करते नहीं आती शर्म: ट्रोल करने वालों को बताने लगे नफरती ‘राक्षस’

साउथ फिल्म इंडस्ट्री के एक्टर प्रकाश राज की माँ स्वर्णलता का 29 मार्च 2026 को 86 की उम्र में निधन हो गया। एक्टर ने ईसाई तौर-तरीकों से माँ का अंतिम संस्कार पूरा किया और खुद भी चर्च में प्रार्थना सभा में शामिल हुए। ऐसे में प्रकाश राज की सोशल मीडिया पर तस्वीरें भी सामने आईं। जाहिर है खुद को ‘नास्तिक’ बताने वाले प्रकाश राज को चर्च में देख हर कोई हैरान रह गया।

नेटिजन्स ने सवाल किए कि आखिर क्यों किसी भी धर्म को न मानने वाले प्रकाश राज को अपनी माँ का अंतिम संस्कार ईसाई तौर-तरीकों से करना पड़ा? लोगों ने यह भी पूछा कि अगर वह नास्तिक हैं तो चर्च में उनका क्या काम है? और अगर वह नास्तिक होते हुए भी ईसाई तौर-तरीकों का सम्मान कर रहे हैं तो हिंदुओं के खिलाफ जहर क्यों उगलते हैं?

खुद को घिरता देख प्रकाश राज सफाई देने उतर जाते हैं और कहते हैं कि उन्होंने ऐसा अपनी माँ के सम्मान के लिए किया, क्योंकि उनकी माँ ईश्वर में विश्वास करती थीं। प्रकाश राज ‘एक्स’ पर लिखते हैं, “हाँ, मैं भगवान में विश्वास नहीं करता। लेकिन मेरी माँ अपने भगवान में विश्वास करती थीं। मैं कौन होता हूँ उनका यह हक छीनने वाला कि उनका अंतिम संस्कार उनके विश्वास के अनुसार हो। यही तो बुनियादी सम्मान होता है जो हम एक-दूसरे को देते हैं। क्या नफरत फैलाने वाले राक्षस ये बात समझ पाओगे?

ये वही प्रकाश राज हैं, जो हिंदुओं के अपमान में कोई कसर नहीं छोड़ते। खुद को नास्तिक बताते हुए सनातन धर्म के खिलाफ जहर उगलते हैं, लेकिन ईसाई धर्म के सारे तौर-तरीकों में भाग लेते हैं। और ट्रोल होने पर फिर बुनियादी सम्मान की बात कर खुद को विद्वान दिखाने की कोशिश करते हैं। परेशानी यहाँ प्रकाश राज के ईसाई धर्म मानने को लेकर नहीं है, बल्कि उनका हिंदुओं के अपमान का इतिहास यहाँ बड़ी समस्या है। यही वजह है कि प्रकाश राज को घेरा जा रहा है, क्योंकि लोग प्रकाश राज के वो भद्दे बयान भूले नहीं हैं, जो उन्होंने सनातन के अपमान में कहे हैं।

सनातन डेंगू की तरह है, इसका खात्मा जरूरी है। रामलीला ‘बच्चों की ब्लू फिल्म‘ है, जो खतरनाक और मुस्लिमों को डराने वाली है। ये कुछ गिने-चुने बयान हैं जो प्रकाश राज ने चौड़ी-छाती के साथ सार्वजनिक मंचों से दिए हैं। और तो और यह अपने आसपास हिंदी बोलने वाले को तक देखना पसंद नहीं करते, इसीलिए फिल्मों में उनके खिलाफ हिंसा के सीन करते नजर आते हैं।

ये शख्स सिर्फ खुद जहर नहीं उगलता, बल्कि सनातन के खिलाफ जहर उगलने वालों को बढ़ावा भी देता है। चाहे ब्राह्मण महिलाओं और बच्चों का ‘सर तन से जुदा‘ करने का ख्वाब रखने वाला कोई व्यक्ति हो, या कश्मीरी पंडितों के नरसंहार को गौतस्करों पर हमले से जोड़ने वाली कोई एक्ट्रेस हो। प्रकाश राज इन सभी का हौसला बढ़ाने पहुँच जाते हैं।

कटाक्ष यह है कि इतने नफरती और भड़काऊ बयान देने के बाद भी वह ‘राक्षस’ उनसे सवाल करने वालों को बता रहे हैं। सवाल क्यों न किया जाए? जब एक ओर आप हिंदू धर्म के खिलाफ जहर उगलते हैं और दूसरी तरफ ईसाइयत कबूल कर लेते हैं। और अंत में खुद को ‘नास्तिक’ बताने का ढोंग कर देते हैं। तो क्या यह किसी एक धर्म के लिए चुनी हुई घृणा नहीं है?

जब खुद की बात आती है तो दूसरे धर्म में दिलचस्पी दिखाने के लिए माँ का हवाला देते हैं और बुनियादी सम्मान की बात करते हैं। तो ये चीज तो हिंदुओं पर भी लागू होती है, तब आपके लिए सम्मान क्यों नहीं जागता। जैसे आप अपनी माँ के लिए दो दिन के ईसाई बन गए, तो हिंदू धर्म को मानने वाला समाज तो युगों-युगों से अपने रीति-रिवाज को मानता आ रहा है, तब उनके खिलाफ इतनी घृणा क्यों? अगर आप इतना सम्मान करना जानते हैं, तो हिंदू घृणा के बयान देते वक्त भी सम्मान झलका दीजिए। सोचिएगा जरूर प्रकाश राज!

केजरीवाल ने गुजरात में AAP अध्यक्ष समेत कई नेताओं पर दर्ज FIR को बताया राजनीतिक लेकिन हकीकत छिपाई: मिस्टर अरविंद, ये मामले वसूली-मारपीट-किडनैपिंग के हैं

द्वारका में अप्रैल महीने के पहले ही दिन आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेताओं ने ऐसा हंगामा काटा कि वो जेल पहुँच गए। जानकारी के मुताबिक, जाम खंभालिया पुलिस स्टेशन में हंगामा करने के आरोप में आम आदमी पार्टी के गुजरात प्रदेश अध्यक्ष येसुदान गढ़वी और उनके 17 समर्थकों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।

इस घटना के बाद आम आदमी पार्टी के गुजरात और केंद्रीय नेतृत्व ने इसे लेकर राजनीतिक बयानबाजी शुरू कर दी है। बिना पूरी सच्चाई सामने लाए सिर्फ आरोप लगाकर माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। इसी बीच AAP सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने भी इस मामले पर बयान दिया और दावा किया कि गुजरात में भाजपा सरकार राजनीतिक बदले की भावना से काम कर रही है।

अरविंद केजरीवाल ने कहा कि पिछले तीन महीनों में आम आदमी पार्टी के नेताओं के खिलाफ 145 FIR दर्ज की गई हैं और 160 से ज्यादा कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया है। केजरीवाल ने खास तौर पर येसुदान गढ़वी की गिरफ्तारी का जिक्र करते हुए इसे तानाशाही बताया, हालाँकि उनके ये दावे वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाते।

अरविंद केजरीवाल का यह दावा काफी बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया लगता है। उन्होंने यह साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया कि 145 FIR दर्ज हुई हैं और 160 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। आम आदमी पार्टी की ओर से भी ऐसी कोई आधिकारिक सूची सामने नहीं आई है, जिससे इन आंकड़ों की पुष्टि हो सके।

केजरीवाल यह भी दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि गुजरात में आम आदमी पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ राजनीतिक वजहों से केस दर्ज किए जा रहे हैं। हालाँकि, हकीकत यह है कि गुजरात में समय-समय पर AAP नेताओं के खिलाफ मामले दर्ज होते रहे हैं, लेकिन वे सीधे तौर पर राजनीति से जुड़े नहीं हैं।

कुछ मामलों में नेताओं पर शराब से जुड़े आरोप लगे हैं, जबकि कुछ अपहरण जैसे गंभीर मामलों में जेल भी जा चुके हैं। इसके अलावा, आम आदमी पार्टी के कुछ कार्यकर्ता मारपीट और जबरन वसूली जैसे मामलों में भी फंसे हैं।

येसुदास गढ़वी का मामला: आखिर हुआ क्या था?

अरविंद केजरीवाल द्वारा जिस मामले का जिक्र किया गया है, वह देवभूमि द्वारका जिले के जाम खंभालिया पुलिस स्टेशन से जुड़ा है। बुधवार (1 अप्रैल 2026) को आम आदमी पार्टी (AAP) के गुजरात प्रदेश अध्यक्ष येसुदान गढ़वी समेत 30 से ज्यादा कार्यकर्ता वहाँ पहुँचे और थाने में हंगामा किया।

यह पूरा मामला AAP कार्यकर्ता दीपक के खिलाफ दर्ज चेन छीनने के केस को लेकर था। पुलिस के मुताबिक, दीपक जो मूल रूप से बिहार का रहने वाला है, उसके खिलाफ मंगलवार (31 मार्च 2026) को लूट का मामला दर्ज किया गया था।

AAP नेताओं का कहना था कि यह केस झूठा है, इसलिए येसुदान गढ़वी, द्वारका जिला अध्यक्ष रामजी परमार और अन्य कार्यकर्ता सुबह पुलिस स्टेशन पहुँचे और माँग करने लगे कि दीपक पर दर्ज केस हटाया जाए और किसी अन्य व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज किया जाए।

जब पुलिस ने उनकी माँग मानने से इनकार कर दिया, तो कार्यकर्ताओं ने थाने के अंदर हंगामा शुरू कर दिया। उन्होंने पुलिस के काम में बाधा डाली, पुलिसकर्मियों से धक्का-मुक्की की, बहस की और वहाँ की लाइव रिकॉर्डिंग भी की। इतना ही नहीं, उन्होंने पुलिस रजिस्टर देखने की भी माँग की जिससे माहौल और ज्यादा तनावपूर्ण हो गया।

स्थिति बिगड़ने पर पुलिस को कार्रवाई करनी पड़ी। पुलिस ने येसुदान गढ़वी समेत 18 लोगों को हिरासत में लिया और कुल 30 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया, जिनमें 18 नामजद और बाकी अज्ञात शामिल हैं।

इन पर दंगा करने, सरकारी काम में बाधा डालने, गैरकानूनी तरीके से भीड़ इकट्ठा करने जैसे आरोप लगाए गए हैं। पुलिस उपाधीक्षक विस्मय मनसेटा के अनुसार, आरोपियों ने पुलिस पर दबाव बनाने और लोक सेवकों को धमकाने की भी कोशिश की।

घटना सामने आने के बाद अरविंद केजरीवाल समेत आम आदमी पार्टी के कई नेताओं ने पुलिस कार्रवाई को राजनीतिक बदले की भावना और भाजपा की साजिश बताया। केजरीवाल ने कहा कि गुजरात में AAP कार्यकर्ताओं पर राजनीतिक दबाव बढ़ाया जा रहा है।

वहीं AAP नेता गोपाल इटालिया और चैतर वासावा ने भी विरोध जताते हुए इस कार्रवाई को धमकी और दमन करार दिया। पार्टी कार्यकर्ताओं का कहना था कि वे सिर्फ अपने साथी से मिलने और कथित झूठे मामले के खिलाफ अपनी बात रखने के लिए थाने गए थे।

वहीं पुलिस ने साफ किया कि यह कोई सामान्य या शांतिपूर्ण विरोध नहीं था, बल्कि उनके काम में सीधा हस्तक्षेप किया गया। पुलिस के अनुसार, कार्यकर्ताओं ने थाने में हंगामा किया और कानून-व्यवस्था को बिगाड़ा। हालात को संभालने के लिए DSP, LCB और SOG की टीमें भी मौके पर पहुँचीं।

इसके बाद येसुदान गढ़वी समेत अन्य लोगों को हिरासत में लिया गया। बाद में सभी को जमानत मिल गई, लेकिन मामला अभी भी जारी है और जाँच चल रही है।

आप नेताओं का पहले भी रहा है आपराधिक इतिहास

युवराज सिंह घोटाला : आम आदमी पार्टी के नेता युवराज सिंह जडेजा को प्रतियोगी परीक्षाओं में हुए ‘डमी घोटाले’ के मामले में गिरफ्तार किया गया था। उन पर आरोप है कि उन्होंने फर्जी छात्रों के नाम उजागर करने की धमकी देकर दो लोगों से करीब 1 करोड़ रुपए की उगाही की।

जाँच के दौरान सबूतों में सहयोग न करने के कारण उन्हें जेल भेज दिया गया था। हालाँकि बाद में अदालत ने उनकी जमानत याचिका मंजूर कर ली। जमानत मिलने के बाद उन्हें कुछ सख्त शर्तों का पालन करना होगा, जैसे अपना पासपोर्ट जमा करना, जाँच एजेंसी के साथ पूरा सहयोग करना, किसी गवाह को धमकाना नहीं और कोर्ट की अनुमति के बिना गुजरात से बाहर नहीं जाना।

स्कूल में नाबालिग लड़की से छेड़छाड़ के आरोपी AAP नेता : राजकोट के कोठारिया रोड स्थित सरस्वती एजुकेशनल कॉम्प्लेक्स स्कूल में 2024 में प्रिंसिपल राकेश  सोरथिया के साथ उनके ही स्कूल में पढ़ने वाली 11 से 14 साल की चार नाबालिग लड़कियों से छेड़छाड़ का मामला सामने आया।

अभिभावकों द्वारा शिकायत दर्ज कराने के बाद, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि आरोपित ने छात्राओं को अपने कार्यालय में बुलाया और उनसे शारीरिक संपर्क और अश्लील माँगें रखीं, भक्तिनगर पुलिस ने आरोपित को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने पहले ही छेड़छाड़ के आरोपों में शामिल इस नेता के खिलाफ IPC और POCSO के तहत मामला दर्ज किया गया था।

आम आदमी पार्टी के पार्षद पर जबरन वसूली का मामला दर्ज : सूरत के मोटा वराछा इलाके में एक स्टेशनरी दुकानदार को धमकाकर उससे 1 लाख रुपए की फिरौती माँगने के मामले में आम आदमी पार्टी के पार्षद राजेश मोर्डिया और उनके साथी पंकज पटेल को उतरन पुलिस ने गिरफ्तार किया।

आरोप है कि दोनों ने दुकानदार को काम बंद कराने की धमकी दी और उसे डराने-धमकाने के लिए हथियार (पैडल) भी दिखाया। इसके अलावा, इन पर एक किसान से 50000 रुपए की जबरन वसूली करने का भी आरोप लगा है।

इस मामले के सामने आने के बाद विरोध बढ़ा, जिसके चलते आम आदमी पार्टी ने कार्रवाई करते हुए राजेश मोर्डिया का इस्तीफा स्वीकार कर लिया।

महिला कर्मचारी का अपहरण और जान से मारने की धमकी : हाल ही में गाँधीनगर के सेक्टर-25 GIDC में स्थित HBC लाइफ साइंसेज कंपनी से जुड़ा एक गंभीर मामला सामने आया। कंपनी के मालिक और आम आदमी पार्टी के राज्य उपाध्यक्ष हसमुख पटेल को एक महिला लेखाकार के अपहरण और मारपीट के आरोप में गिरफ्तार किया गया।

बताया गया कि कंपनी में 80 से 85 लाख रुपए के संदिग्ध लेनदेन और गुमनाम खातों का पता लगाने के बाद इस महिला कर्मचारी को निशाना बनाया गया। आरोप है कि हसमुख पटेल के इशारे पर उसे जबरन अगवा किया गया और चलती गाड़ी में उसके साथ मारपीट की गई, साथ ही जान से मारने की धमकी भी दी गई।

जब पीड़िता ने मदद माँगने की कोशिश की, तो उस पर पुलिस में शिकायत न करने का दबाव भी बनाया गया। हालाँकि, बाद में सेक्टर-21 पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज किया गया और हसमुख पटेल के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई।

अहमदाबाद में आम आदमी पार्टी के अध्यक्ष पर धोखाधड़ी और धमकी का आरोप : घाटलोडिया पुलिस ने आम आदमी पार्टी के शहर उपाध्यक्ष और साबरमती विधानसभा प्रभारी अमित पंचाल और उनके पिता को गिरफ्तार किया है। उन पर एक राजमिस्त्री का 43 लाख रुपए का बकाया मजदूरी भुगतान न करने और जान से मारने की धमकी देने का आरोप है।

मेमनगर निवासी धनपाल यादव की शिकायत के अनुसार, अमित पंचाल ने उनके घर के प्लास्टर के काम के बदले करीब 5 लाख रुपए का सीमेंट का सामान भी ले लिया था। जब राजमिस्त्री अपने पैसे लेने गया, तो उसे नहर में फेंकने की धमकी दी गई।

इस मामले में पुलिस ने पहले ही धमकी और अन्य आरोपों को लेकर अलग-अलग धाराओं में केस दर्ज किया था और अब कानूनी कार्रवाई करते हुए दोनों को गिरफ्तार कर लिया है।

चैतर वासवा पर महिला पंचायत अध्यक्ष के साथ अभद्र व्यवहार का आरोप : डेडियापाड़ा पुलिस ने आम आदमी पार्टी के शहर उपाध्यक्ष और साबरमती विधानसभा प्रभारी अमित पंचाल और उनके पिता को गिरफ्तार किया है। उन पर एक राजमिस्त्री का 43 लाख रुपए का बकाया मजदूरी भुगतान न करने और जान से मारने की धमकी देने का आरोप है।

जब महिला ने उन्हें रोकने की कोशिश की, तो उन्होंने भाजपा नेता पर मोबाइल फोन और पानी का गिलास फेंककर हमला कर दिया ।

मेमनगर निवासी धनपाल यादव की शिकायत के अनुसार, अमित पंचाल ने उनके घर के प्लास्टर के काम के बदले करीब 5 लाख रुपए का सीमेंट का सामान भी ले लिया था। जब राजमिस्त्री अपने पैसे लेने गया, तो उसे नहर में फेंकने की धमकी दी गई।

इसके अलावा, वासवा पर वन विभाग के एक कर्मचारी को अपने घर बुलाकर धमकाने और उसकी पिटाई करने का भी आरोप है। इस मामले में पुलिस ने पहले ही धमकी और अन्य आरोपों को लेकर अलग-अलग धाराओं में केस दर्ज किया था और अब कानूनी कार्रवाई करते हुए दोनों को गिरफ्तार कर लिया है।

इसके अलावा, जूनागढ़ पुलिस ने महिला PSI एस एन सोनारा पर अश्लील टिप्पणी करने के आरोप में पाँच AAP समर्थकों को गिरफ्तार किया। महिसागर जिले में AAP अध्यक्ष बाबू दामोर को सरकारी जमीन पर मकान बनाने के आरोप में पकड़ा गया। वहीं सूरत के पार्षद जीतू कछड़िया पर पार्किंग ठेकेदार से 10 लाख रुपए की रिश्वत माँगने का आरोप लगा।

अस्पताल कर्मचारी ने जान से मारने की धमकी दी : सूरत के स्मेर अस्पताल में आयुष्मान कार्ड विभाग के एक कर्मचारी को गाली देने और थप्पड़ मारने के आरोप में आम आदमी पार्टी के पार्षद विपुल सुहागिया को वराछा पुलिस ने गिरफ्तार किया।

शिकायत के अनुसार, जब खिड़की पर भीड़ थी, तब वह केबिन में घुस आए और फोन क्यों नहीं उठा रहे हो? कहते हुए झगड़ा शुरू कर दिया। गुस्से में उन्होंने कर्मचारी को थप्पड़ मारा और जान से मारने की धमकी दी। इसके बाद पुलिस ने सरकारी काम में बाधा डालने और मारपीट जैसी धाराओं में केस दर्ज किया।

इन घटनाओं को देखने पर अरविंद केजरीवाल के उस दावे पर सवाल खड़े होते हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि गुजरात में AAP नेताओं पर कार्रवाई राजनीतिक बदले की भावना से हो रही है। 145 Fir वाले उनके दावे की जाँच करने पर यह सामने आता है कि कई मामले व्यक्तिगत और गंभीर अपराधों से जुड़े हैं, न कि किसी जन आंदोलन या राजनीतिक विरोध से।

द्वारका में येसुदान गढ़वी और अन्य कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी भी इसी बात की ओर इशारा करती है कि पुलिस थाने जैसे संवेदनशील स्थानों पर दबाव बनाने और कानूनी प्रक्रिया में दखल देने की कोशिश की गई। थाने में हंगामा करना और अपराध में पकड़े गए लोगों को छुड़ाने के लिए दबाव बनाना लोकतांत्रिक विरोध नहीं, बल्कि अराजकता फैलाने जैसा है।

केजरीवाल जिस तानाशाही की बात करते हैं, उसमें सामने आए मामलों में जबरन वसूली, अपहरण, मारपीट और रिश्वत जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं। युवराज सिंह जडेजा का मामला हो या सूरत के पार्षदों पर लगे आरोप ये सभी सीधे आम लोगों से जुड़े अपराध हैं।

अस्पताल कर्मचारियों या सरकारी कर्मचारियों के साथ मारपीट और धमकी की घटनाएँ भी सामने आई हैं। सूरत के आम आदमी पार्टी पार्षद जीतू कछड़िया पर पार्किंग ठेकेदार से 10 लाख रुपये की रिश्वत मांगने का आरोप भी लगा ।

पुलिस के अनुसार, इन मामलों में शिकायतकर्ताओं के बयान और सबूत मौजूद हैं। अगर ये मामले पूरी तरह झूठे होते, तो अदालतें इन्हें खारिज कर देतीं। लेकिन कई मामलों में जमानत सख्त शर्तों के साथ मिली या शुरुआती स्तर पर आरोप गंभीर पाए गए, जिससे यह संकेत मिलता है कि इन मामलों में पहली नजर में आरोप बनते हैं।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।



जन विश्वास विधेयक 2026 पास, छोटे अपराधों के लिए जेल नहीं बल्कि जुर्माना: समझें आम लोगों-कारोबारियों की जिंदगी को कैसे आसान बना रही मोदी सरकार

भारत की संसद ने हाल ही में एक ऐसा विधेयक पारित किया है, जिसे देश के कानूनी ढाँचे में बड़े बदलाव की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह है जन विश्वास (प्रावधानों में संशोधन) विधेयक, 2026। यह विधेयक गजट नोटिफिकेशन के बाद कानून का रूप ले लेगा और इसके लागू होते ही आम नागरिकों और व्यवसायों से जुड़े कई पुराने, कठोर और अप्रासंगिक प्रावधानों में बदलाव आ जाएगा।

सरकार का कहना है कि इस कानून का उद्देश्य लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को आसान बनाना और व्यापारिक गतिविधियों को सरल करना है। इस विधेयक के जरिए छोटे और तकनीकी अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने की कोशिश की गई है, ताकि अनजाने में हुई गलतियों के लिए लोगों को आपराधिक सजा का सामना न करना पड़े।

इसे एक ऐसे बदलाव के रूप में देखा जा रहा है, जो ‘भय आधारित शासन’ से ‘विश्वास आधारित शासन’ की ओर देश को ले जाने की कोशिश करता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने X पर इस विधेयक के पास होने पर खुशी जताते हुए लिखा,” ‘ईज ऑफ लिविंग’ और ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ को बड़ा बढ़ावा। यह बहुत खुशी की बात है कि संसद ने जन विश्वास (संशोधन प्रावधान) विधेयक 2026 को पारित कर दिया है। यह विधेयक भरोसे पर आधारित व्यवस्था को मजबूत करता है, जो नागरिकों को सशक्त बनाती है।”

विधेयक की मूल सोच: डर नहीं, भरोसे पर आधारित व्यवस्था

इस विधेयक की सबसे अहम बात इसकी सोच है। अब तक भारतीय कानूनों में कई ऐसे प्रावधान थे, जिनमें मामूली या तकनीकी गलती पर भी आपराधिक सजा का प्रावधान था। इससे आम लोगों और छोटे व्यवसायों में एक तरह का डर बना रहता था कि कहीं छोटी सी चूक उन्हें कानूनी मुसीबत में न डाल दे।

इस विधेयक के जरिए सरकार ने यह संकेत दिया है कि हर गलती को अपराध मानना जरूरी नहीं है। नई व्यवस्था में यह माना गया है कि यदि कोई व्यक्ति पहली बार गलती करता है, तो उसे सुधार का मौका मिलना चाहिए। इसीलिए कई जगहों पर सलाह, चेतावनी और फिर जुर्माने का क्रम तय किया गया है।

यह पूरी व्यवस्था इस विचार पर आधारित है कि नागरिकों को भरोसे के साथ काम करने दिया जाए और केवल गंभीर या जानबूझकर किए गए उल्लंघनों पर ही सख्ती की जाए।

बड़े पैमाने पर संशोधन: कितने कानून और प्रावधान बदले?

यह विधेयक केवल एक-दो कानूनों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक सुधार है। इसके तहत 23 मंत्रालयों द्वारा संचालित 79 केंद्रीय कानूनों में संशोधन किया गया है। कुल 784 प्रावधानों में बदलाव किए गए हैं, जिनमें से 717 प्रावधान व्यापार को आसान बनाने के लिए बदले गए हैं, जबकि 67 प्रावधान सीधे आम नागरिकों की सुविधा को ध्यान में रखकर संशोधित किए गए हैं।

यानी इस विधेयक के जरिए 1000 से अधिक अपराधों को या तो खत्म किया गया है या उन्हें तर्कसंगत बनाया गया है। इसका सीधा असर यह होगा कि कई ऐसे मामले, जो पहले अदालतों में जाते थे, अब या तो वहीं खत्म हो जाएँगे या उन्हें प्रशासनिक स्तर पर ही निपटा लिया जाएगा। इससे न्यायालयों पर बोझ भी कम होगा।

किन-किन छोटे अपराधों में मिला राहत का दायरा?

विधेयक के सबसे चर्चित पहलुओं में से एक यह है कि इसमें कई ऐसे रोजमर्रा के मामलों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया है, जो सीधे आम लोगों की जिंदगी से जुड़े हैं। उदाहरण के तौर पर अब ड्राइविंग लाइसेंस की वैधता खत्म होने के बाद भी 30 दिनों तक उसे वैध माना जाएगा। पहले ऐसा नहीं था और थोड़ी सी देरी भी परेशानी का कारण बन सकती थी।

इसी तरह राष्ट्रीय राजमार्ग को जाम करने जैसे मामलों में पहले जेल की सजा का प्रावधान था, जिसे अब हटाकर केवल जुर्माने तक सीमित कर दिया गया है। आग का झूठा अलार्म देना, जन्म या मृत्यु की सूचना न देना, या कॉपीराइट रजिस्टर में गलत प्रविष्टि करना, ये सभी अब अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिए गए हैं।

इसके अलावा आवारा मवेशियों से फसल को नुकसान पहुँचने जैसे मामलों में भी सजा की जगह केवल जुर्माने का प्रावधान किया गया है। बिजली से जुड़े कुछ उल्लंघनों और कॉस्मेटिक्स के नियमों के उल्लंघन में भी जेल की सजा हटाकर आर्थिक दंड लागू किया गया है। इन बदलावों से साफ है कि सरकार ने छोटे मामलों में सख्ती कम करने का निर्णय लिया है।

सजा की जगह नया सिस्टम: चेतावनी, सलाह और जुर्माना

इस विधेयक में सजा के तरीके को भी पूरी तरह से बदलने की कोशिश की गई है। अब हर गलती पर सीधे सजा नहीं दी जाएगी, बल्कि एक क्रमबद्ध प्रक्रिया अपनाई जाएगी। उदाहरण के तौर पर, यदि कोई व्यक्ति पहली बार नियम का उल्लंघन करता है, तो उसे सलाह दी जाएगी। दूसरी बार गलती करने पर चेतावनी दी जाएगी और यदि इसके बाद भी वही गलती दोहराई जाती है, तभी उस पर जुर्माना लगाया जाएगा।

यह व्यवस्था खासतौर पर अप्रेंटिस अधिनियम जैसे कानूनों में लागू की गई है, जहाँ पहले सीधे दंड का प्रावधान था। अब इसमें सुधार का मौका देने पर जोर दिया गया है। इसके साथ ही कई कानूनों में कारावास के प्रावधान को पूरी तरह खत्म कर दिया गया है या उसकी अवधि कम कर दी गई है।

यह बदलाव इस बात को दर्शाता है कि सरकार अब दंडात्मक दृष्टिकोण के बजाय सुधारात्मक दृष्टिकोण को प्राथमिकता देना चाहती है।

जुर्माने का नया ढाँचा और समय-समय पर संशोधन

इस विधेयक में जुर्माने को भी अधिक व्यवस्थित और तर्कसंगत बनाया गया है। अब जुर्माने की राशि अपराध की गंभीरता के अनुसार तय की जाएगी, ताकि छोटे उल्लंघनों पर अत्यधिक सजा न हो और गंभीर मामलों में उचित दंड दिया जा सके।

इसके साथ ही एक महत्वपूर्ण प्रावधान यह भी जोड़ा गया है कि जुर्माने और दंड की राशि हर तीन साल में कम से कम 10 प्रतिशत बढ़ाई जाएगी। इससे यह सुनिश्चित होगा कि समय के साथ जुर्माने का प्रभाव बना रहे और वह अप्रासंगिक न हो जाए।

कुछ मामलों में जुर्माने की राशि काफी अधिक भी रखी गई है, जैसे राजमार्ग जाम करने के मामलों में, ताकि गंभीर उल्लंघनों को रोका जा सके। इस तरह यह कानून संतुलन बनाने की कोशिश करता है, यानी जहाँ जरूरत हो वहाँ सख्ती और जहाँ संभव हो वहाँ राहत।

न्याय व्यवस्था में सुधार और मामलों का तेज निपटारा

इस विधेयक का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि यह केवल अपराधों को कम करने तक सीमित नहीं है, बल्कि न्याय प्रक्रिया को भी सरल और तेज बनाने की दिशा में काम करता है। इसके तहत न्यायनिर्णय अधिकारियों की नियुक्ति का प्रावधान किया गया है, जो मामलों की जांच और दंड निर्धारण करेंगे।

इसके अलावा अपीलीय प्राधिकरणों की भी व्यवस्था की गई है, ताकि यदि कोई व्यक्ति निर्णय से संतुष्ट न हो, तो वह अपील कर सके। इससे मामलों को अदालतों में जाने की जरूरत कम होगी और उनका निपटारा जल्दी हो सकेगा।

‘इम्प्रूवमेंट नोटिस’ जैसी व्यवस्था भी लाई गई है, जिसमें पहली बार गलती करने पर व्यक्ति को सुधार का मौका दिया जाएगा। इन सभी उपायों का उद्देश्य यह है कि न्याय प्रक्रिया अधिक प्रभावी, पारदर्शी और समयबद्ध हो सके।

मोटर वाहन, नगर निगम और अन्य कानूनों में अहम बदलाव

इस विधेयक में कई ऐसे बदलाव भी शामिल हैं, जो सीधे नागरिकों के रोजमर्रा के अनुभव को प्रभावित करेंगे। मोटर वाहन अधिनियम में किए गए संशोधनों के तहत वाहन पंजीकरण को अधिक लचीला बनाया गया है और ड्राइविंग लाइसेंस से जुड़े नियमों को सरल किया गया है।

लाइसेंस के नवीनीकरण को अब उसकी समाप्ति तिथि के बजाय नवीनीकरण की तारीख से प्रभावी माना जाएगा, जिससे लोगों को नुकसान नहीं होगा। नई दिल्ली नगर परिषद अधिनियम में भी बदलाव किए गए हैं, जिनमें संपत्ति कर को व्यवस्थित करना, मूल्य निर्धारण के लिए समितियों का गठन और शिकायतों के समाधान के लिए अलग तंत्र बनाना शामिल है।

इसके अलावा विज्ञापन कर को हटाने का भी प्रावधान किया गया है। इसके साथ ही RBI अधिनियम, बीमा अधिनियम और पेंशन से जुड़े कानूनों में भी संशोधन किए गए हैं, ताकि वित्तीय और व्यावसायिक प्रक्रियाओं को सरल बनाया जा सके।

आम आदमी और कारोबार के लिए क्या बदलेगा?

जन विश्वास (प्रावधानों में संशोधन) विधेयक, 2026 एक ऐसा प्रयास है, जो भारत के कानूनी ढाँचे को आधुनिक, सरल और व्यवहारिक बनाने की दिशा में उठाया गया है। यह कानून यह संदेश देता है कि सरकार नागरिकों को शक की नजर से नहीं, बल्कि भरोसे के साथ देखना चाहती है।

इससे आम लोगों को छोटी-छोटी गलतियों के लिए जेल जाने का डर कम होगा, वहीं व्यवसायों को भी अनावश्यक कानूनी अड़चनों से राहत मिलेगी। न्यायालयों पर बोझ कम होगा, मामलों का निपटारा तेजी से होगा और एक संतुलित, पारदर्शी और भरोसेमंद व्यवस्था विकसित होने की संभावना बनेगी।

अगर इस कानून का प्रभावी ढंग से क्रियान्वयन किया जाता है, तो यह वास्तव में भारत में आसान जीवन और आसान व्यापार के लक्ष्य को हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

बंगाली और गैर-बंगाली वाली राजनीति करने में ‘नीचता’ पर उतरी TMC, शाकाहारी अमित शाह से किया ‘नॉनवेज’ वाला मजाक: पढ़िए क्यों ये हरकत मानसिक कंगाली से अधिक कुछ भी नहीं

बंगाल चुनाव 2026 करीब है, लेकिन दुख की बात यह है कि राजनीति अब विकास और मुद्दों को छोड़कर लोगों के खाने की थाली तक जा पहुँची है। अमित शाह बंगाल के 15 दिनों के दौरे पर आ रखें हैं, तो TMC ने उनके स्वागत में ‘नॉन-वेज’ खाने की एक लिस्ट जारी पेश कर दी है। यह सिर्फ एक मजाक नहीं, बल्कि बंगाल की उस पुरानी परंपरा का अपमान है जहाँ मेहमान को भगवान माना जाता है।

सोचिए, जो इंसान पूरी तरह शाकाहारी है, उसे जानबूझकर मांस-मछली की लिस्ट दिखाकर चिढ़ाना कैसी राजनीति है? क्या TMC के पास अब जनता को गिनाने के लिए अपने कांड नहीं बचे, जो उन्हें खाने-पीने जैसी निजी चीजों का सहारा लेना पड़ रहा है?

बंगाल की संस्कृति में शाकाहारी खाने की भी उतनी ही अहमियत और शान है, जितनी मछली की। ‘आलू पोस्तो’ और ‘नोलन गुड़ का पायश’ भी यहाँ की पहचान हैं। किसी के खानपान का मजाक उड़ाना सिर्फ उनकी राजनीतिक हताशा को दिखाता है। राजनीति अपनी जगह है, लेकिन मेहमाननवाज़ी में इस तरह की नीचा दिखाने वाली हरकतें केवल TMC ही कर सकती है। असली मुकाबला काम और नीतियों पर होना चाहिए, न कि इस बात पर कि कौन अपनी थाली में क्या रखता है।

शाकाहार का अपमान और बंगाल की असल पहचान

TMC ने सोशल मीडिया पर माछ-भात और चिंगरी मलाई करी की एक लिस्ट पोस्ट की। इस लिस्ट का जिक्र करके यह दिखाने की कोशिश की कि बंगाल में केवल मांसाहार ही श्रेष्ठ है। लेकिन क्या टीएमसी भूल गई कि बंगाल की शाकाहारी रसोई भी दुनिया भर में अपनी एक अलग ‘शान’ रखती है? ‘आलू पोस्तो’, ‘शुक्तो’, ‘लूची-छोलार दाल’, ‘धोकार डालना’ और ‘भापा पनीर’ जैसे व्यंजन बंगाल की पहचान का उतना ही बड़ा हिस्सा हैं जितनी कि मछली।

एक शाकाहारी व्यक्ति (अमित शाह) को नीचा दिखाने की कोशिश करना TMC की उस ‘विभाजनकारी’ मानसिकता को उजागर करता है, जहाँ वे बंगाल को एक संकुचित दायरे में बाँधना चाहते हैं। भाजपा का विरोध किसी के खाने से नहीं, बल्कि उस ‘मानसिकता’ से है जो मेहमान का स्वागत अपमान के साथ करती है। बंगाल की संस्कृति समावेशी रही है, लेकिन TMC इसे केवल ‘नॉन-वेज’ बनाम ‘वेज’ की लड़ाई बनाकर लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर रही है।

फरवरी से जारी ‘भय और झूठ’ का नैरेटिव

TMC की यह ‘फिश पॉलिटिक्स’ अचानक शुरू नहीं हुई। फरवरी से ही यह नैरेटिव गढ़ा जा रहा है कि भाजपा सत्ता में आई तो मछली-मांस बंद कर देगी। यह पूरी तरह से सफेद झूठ है। भाजपा का रुख हमेशा स्पष्ट रहा है कि व्यक्ति जो चाहे वह खा सकता है, विरोध केवल ‘अवैध बूचड़खानों’ और ‘धार्मिक स्थलों के पास खुले में मांस बिक्री’ से है। TMC इस मुद्दे को ‘बंगाली अस्मिता’ से जोड़कर केवल अल्पसंख्यक और विशेष समुदायों का तुष्टिकरण करना चाहती है।

दूसरे राज्यों में भाजपा: संस्कृति का सम्मान और स्थानीय स्वाद

TMC का आरोप है कि भाजपा ‘बाहरी’ है और यहाँ की संस्कृति नहीं जानती। लेकिन हकीकत यह है कि भाजपा जिन भी राज्यों में सत्ता में है, वहाँ उसने वहाँ की संस्कृति और खानपान को पूरे सम्मान के साथ अपनाया है। भाजपा के नेता जिस राज्य में जाते हैं, वहाँ के स्थानीय शाकाहारी व्यंजनों को न केवल चखते हैं बल्कि उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर प्रमोट भी करते हैं।

राजस्थान की ‘दाल-बाटी-चूरमा’ और ‘गट्टे की सब्जी’ को भाजपा ने अपनी संस्कृति का हिस्सा बनाया। गुजरात की ‘ढोकला’, ‘खांडवी’ और ‘फाफड़ा’ जैसे व्यंजनों को भाजपा नेताओं ने वैश्विक पहचान दिलाई। उत्तर प्रदेश की ‘कचौरी-सब्जी’ और ‘बनारसी थाली’ भाजपा के आयोजनों की शान होती है। मध्य प्रदेश का ‘पोहा-जलेबी’ और ‘भुट्टे की कीस’ जैसे शाकाहारी पकवानों को भाजपा ने हमेशा तरजीह दी है। इन राज्यों में भी संस्कृति बहुत गहरी है, और भाजपा ने बिना किसी विवाद के वहाँ की शाकाहारी परंपराओं को गौरव के साथ अपनाया है। बंगाल में भी अमित शाह ने हमेशा यही किया है।

अमित शाह और बंगाल का पुराना रिश्ता: जब जमीन पर बैठकर चखा स्वाद

TMC जिसे ‘नॉन-वेज’ का पाठ पढ़ा रही है, उसी अमित शाह ने कई बार बंगाल के आम नागरिकों के घर जाकर उनकी सादगी को अपनाया है। 2017 में नक्सलबाड़ी दौरा के दौरान शाह ने एक जनजातीय परिवार (राजू महाली) के घर जमीन पर बैठकर केले के पत्ते पर भोजन किया था। वहाँ उन्होंने चावल, दाल और परवल फ्राई जैसे ‘शाकाहारी बंगाली भोजन’ का स्वाद लिया था।

2020 में मतुआ परिवार दौरा में बागुईहाटी में नबीन बिस्वास के घर अमित शाह ने ‘शुक्तो’ और ‘नोलन गुरेर पायश’ जैसे ठेठ बंगाली शाकाहारी व्यंजनों का लुत्फ उठाया था। इन घटनाओं से साफ है कि अमित शाह ने हमेशा बंगाल की मिट्टी और वहाँ के लोगों के साथ जुड़ने की कोशिश की है। उन्हें किसी ‘नॉन-वेज लिस्ट’ की जरूरत नहीं है, क्योंकि वे बंगाल के उस ‘शाकाहारी स्वाद’ को जानते हैं जिसे TMC अब राजनीति के चक्कर में दरकिनार कर रही है।

अमित शाह के 15 दिनों के प्रवास से TMC के खेमे में मची खलबली अब साफ दिख रही है। मेहमान का मजाक उड़ाना और उनकी जीवनशैली पर टिप्पणी करना राजनीतिक शिष्टाचार के खिलाफ है। TMC की यह ‘भोजन आधारित राजनीति’ उनकी हार की हताशा दिखाती है।

केरल में वामपंथी-कॉन्ग्रेसी नेता ही नहीं पूरा इकोसिस्टम लड़ रहा चुनाव, गुरुवायुर पर पढ़ें न्यूज मिनट का एंटी हिंदू प्रोपेगेंडा: समझें- कैसे हिंदुओं पर बना जा रहा मनोवैज्ञानिक दबाव

केरल में विधानसभा चुनाव हैं। सभी पार्टियों ने अपना पूरा दम खम झोंका हुआ है। सभी अपने-अपने तरीके से जनता से कनेक्ट कर रहे हैं। इस बीच, केरल की धार्मिक नगरी गुरुवायूर में बीजेपी प्रत्याशी भी जनता से कनेक्ट कर रहे हैं। हालाँकि इस चुनाव में राजनीतिक पार्टियाँ अलग-अलग फ्रंट से चुनाव लड़ रही हैं, जिसमें प्रोपेगेंडा वाली मीडिया (पीत पत्रकारिता) भी अपना काम करने में जुटी हुई हैं। इसी कड़ी में न्यूज मिनट नाम की प्रोपेगेंडा वेबसाइट ने एक ऐसी रिपोर्ट प्रकाशित की है, जो जनता से जुड़ाव की कोशिशों को सांप्रदायिक घोषित करने पर तुली है।

इस मामले में आगे बढ़ें, इससे पहले देख लीजिए न्यूज मिनट की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट। इसका शीर्षक है- ‘Why no Hindu MLA: Guruvayur becomes BJP’s laboratory for a new pitch in Kerala

न्यूज मिनट का यह लेख साफ-साफ एंटी हिंदू और एंटी भाजपा है। यह हिंदुओं के सही सवाल को सांप्रदायिक का ठप्पा लगाकर दबाने की कोशिश कर रहा है। गुरुवायुर जैसे मशहूर श्री कृष्ण मंदिर के शहर में पिछले पचास साल से मुस्लिम विधायक का राज चल रहा है। भाजपा के उम्मीदवार बी गोपालकृष्णन ने बड़ा फ्लेक्स बोर्ड लगाकर सीधा सवाल पूछा- ‘क्या तुम यह नहीं देख रहे?’ उसमें 1977 से 2021 तक के मुस्लिम विधायकों की पूरी सूची दिखाई।

न्यूज मिनट इसे नया प्रयोग और आक्रामक हिंदू प्रतीकवाद बता रहा है। लेकिन असल बात यह है कि गुरुवायुर श्री कृष्ण मंदिर का दिल है। लाखों हिंदू तीर्थयात्री हर साल वहाँ आते हैं। मंदिर की अर्थव्यवस्था चलती है। भक्तों की आस्था जुड़ी है। फिर वहाँ पचास साल तक हिंदू विधायक न चुनना विकास की अनदेखी और आस्था की उपेक्षा नहीं तो और क्या है? न्यूज मिनट जानबूझकर इस सवाल को घुमा रहा है ताकि हिंदू खुद को गलत महसूस करें और चुप हो जाएँ। यह हिंदुओं पर मानसिक दबाव बनाने का तरीका है।

लेख की शुरुआत ही देख लें। न्यूज मिनट कहता है कि सोशल मीडिया पर एक फ्लेक्स बोर्ड घूम रहा है। उसमें भाजपा उम्मीदवार के साथ मुस्लिम विधायकों की सूची है और सवाल है- ‘क्या तुम नहीं देख रहे?’ वह इसे ‘पचास साल की उपेक्षा’ बताते हुए एनडीए उम्मीदवार को चुनने का आह्वान बता रहा है। लेकिन न्यूज मिनट यह नहीं बताता कि गुरुवायुर केरल का सबसे बड़ा तीर्थ स्थान है। यहाँ बाल कृष्ण यानी गुरुवायुरप्पन की मूर्ति है। लाखों हिंदू भक्त यहाँ आते हैं। 1977 से 2021 तक के चुनावों में ज्यादातर विधायक मुस्लिम रहे- जैसे कम्युनिस्ट पार्टी के एनके अकबर। क्या यह संयोग है? या वोट बैंक की राजनीति का नतीजा? लेख इसे प्रतिनिधित्व का सवाल बनाकर नहीं देखता। बल्कि ‘हिंदू विधायक’ शब्द को ही विवादास्पद बना देता है। गोपालकृष्णन ने चुनावी भाषणों में कहा कि गुरुवायुरप्पन ने उन्हें बुलाया है और इलाके को बचाना है। न्यूज मिनट इसे धार्मिक तस्वीर कहकर उड़ा देता है।

अरे, मंदिर के शहर में आस्था का जिक्र करना गलत कैसे? क्या मुस्लिम उम्मीदवार मस्जिद के पास चुनाव लड़ते हुए अपनी आस्था नहीं दिखाते? लेकिन न्यूज मिनट का दोहरा मापदंड यहीं से शुरू होता है।

लेख आगे कहता है कि केरल में भाजपा की बात पहले सीमित रहती थी। लेकिन इस बार गोपालकृष्णन ने शुरुआत से ही ‘हिंदू विधायक’ का मुद्दा उठाया। वे विकास के मुद्दे भी उठा रहे हैं – गंदा पीने का पानी, खराब श्मशान घाट, बंद स्वास्थ्य केंद्र, भ्रष्टाचार। लेकिन न्यूज मिनट का पूरा ध्यान सिर्फ धार्मिक मोड़ पर है। लेखक अपने साथी के साथ गोपालकृष्णन के घर गया और उनसे बात की। वहाँ गोपालकृष्णन ने विकास के मुद्दों पर विस्तार से बताया। लेकिन जब ‘हिंदू विधायक’ का सवाल आया तो न्यूज मिनट का लेखक कहता है कि स्वर बदल गए। गोपालकृष्णन ने पूछा- “तुम लोग ये असली मुद्दे क्यों नहीं दिखाते? मैंने प्रेस कॉन्फ्रेंस की, गंदा पानी दिखाया, लेकिन मीडिया ने अनदेखा कर दिया।”

न्यूज मिनट इसे जवाब दिए बिना जवाब देना बता रहा है। लेकिन असल में यही सच्चाई है। न्यूज मिनट जैसे मीडिया विकास को छोड़कर सिर्फ सांप्रदायिक कोण पर अटक जाता है। गोपालकृष्णन ने साफ कहा कि चुने गए विधायक मंदिर में आस्था नहीं रखते। कुछ उम्मीदवारों ने खुलकर कहा कि मंदिर में दीप जलाना हराम है और मूर्ति पूजा उनके विश्वास के खिलाफ है। अगर गुरुवायुर जैसी जगह पर उम्मीदवार चुनाव लड़ रहा है तो कम से कम मंदिर का सम्मान तो करे।

यहाँ न्यूज मिनट ने गोपालकृष्णन पर आरोप लगाया कि उन्होंने मौजूदा विधायक एनके अकबर पर कोई खास उदाहरण या सही बयान नहीं दिया। लेखक लिखता है कि अकबर ने कभी सार्वजनिक रूप से कहा नहीं कि मंदिर में दीप जलाना हराम है। लेकिन क्या यह पूरी सच्चाई है? इस्लाम के धर्म ग्रंथ में मूर्ति पूजा को सबसे बड़ा पाप माना जाता है। केरल में कई मुस्लिम नेता मंदिर की परंपराओं पर सवाल उठा चुके हैं। विधायक बनकर मंदिर के शहर में रहते हुए अगर कोई मंदिर की भावना का सम्मान नहीं करता तो विकास कैसे होगा? लेख कहता है कि गोपालकृष्णन ने मंदिर के कामकाज में दखल का सबूत नहीं दिया। लेकिन क्या दखल की जरूरत है? अगर विधायक का मन मंदिर से नहीं जुड़ा तो वह मंदिर की समस्याओं को प्राथमिकता नहीं देगा। यही मानसिक दबाव है – हिंदू सवाल पूछे तो ‘कोई सबूत नहीं’ कहकर खारिज कर दो।

बातचीत में गोपालकृष्णन ने तुष्टीकरण की राजनीति का मुद्दा उठाया। उन्होंने पास के चवक्काड में कंठापुरम अबूबकर मुसलियार की बड़ी रैली का उदाहरण दिया। वहाँ विधायक और नेता मौलवी के आने का इंतजार करते रहे। लेकिन दो किलोमीटर दूर कुंभ मेला जैसे हिंदू धार्मिक आयोजन में कोई नहीं गया। गोपालकृष्णन ने कहा, “मुझे कोई समस्या नहीं, यह उनकी आजादी है। लेकिन सच्चे सेकुलर होने के लिए दोनों आयोजनों में जाना चाहिए।”

न्यूज मिनट इसे पुराना तरीका बता रहा है। खास दावे से बड़े कथन में ले जाना। लेकिन यह बड़ा कथन ही सच्चाई है। केरल में राजनीतिक पार्टियाँ मुस्लिम वोट बैंक के लिए हिंदू आयोजनों से दूर रहती हैं। यही तुष्टीकरण है जो हिंदू मंदिरों पर हमले, लव जिहाद और मंदिर की जमीन पर कब्जे को बढ़ावा देता है। लेख गोपालकृष्णन के विकास और आस्था वाले तर्क को घुमावदार कहता है, “विकास की कमी इसलिए क्योंकि आस्था नहीं, इसलिए हिंदू विधायक चाहिए।” लेकिन क्या यह गलत है? मंदिर शहर में अगर विधायक मंदिर की आस्था से नहीं जुड़ा तो तीर्थयात्रा की अर्थव्यवस्था, सफाई, सड़कें कैसे सुधरेंगी? लाखों भक्त आते हैं लेकिन बुनियादी सुविधाएँ खराब। यही सवाल हिंदू पूछ रहे हैं।

असल बात यह है कि हिंदू अब जाग रहे हैं। पचपन प्रतिशत हिंदू आबादी वाले केरल में मंदिर शहर में गैर हिंदू विधायक का पचास साल का पैटर्न हिंदू पहचान पर हमला है। भाजपा नरम रहकर भी जमीन नहीं बना पा रही थी इसलिए अब अपनी असली विचारधारा दिखा रही है। लेख इसे पार्टी के अंदरूनी झगड़े कहकर भाजपा को बाँटने की कोशिश कर रहा है।

न्यूज मिनट केरल में लगातार ऐसा प्रोपेगेंडा चला रहा है। भाजपा को जमीन नहीं मिल रही इसलिए वह हिंदू मतदाता को जागरूक कर रही है। लेकिन न्यूज मिनट इसे नया प्रयोगशाला बता रहा है जैसे भाजपा हिंदुओं पर प्रयोग कर रही हो। केरल में लेफ्ट और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट का बारी बारी से राज चलता है। 1980 के दशक से मुस्लिम उम्मीदवार चुने जाते रहे। गुरुवायुर में तीर्थयात्रा की अर्थव्यवस्था पर ध्यान है लेकिन शासन की असफलताएँ आस्था की कमी से जुड़ी हैं।

लेख गोपालकृष्णन के पोस्टर, भगवा कपड़ों को उछालता है लेकिन मुस्लिम उम्मीदवारों के हरे झंडे और इस्लामी नारों को सेकुलर मान लेता है। यह दोहरा मापदंड हिंदुओं को शर्मिंदा करने के लिए है। सोशल मीडिया पर अच्छी टिप्पणियों को भी दक्षिणपंथी कहकर नजरअंदाज कर देता है। हिंदू अपना मंदिर शहर में अपना विधायक माँगे तो यह नई आक्रामक शैली। लेकिन केरल की हकीकत देखो- मंदिरों पर हमले, हिंदू त्योहारों में दखल, अल्पसंख्यक तुष्टीकरण। यही मानसिक दबाव है कि हिंदू खुद को दोषी महसूस करें।

यह नई बात नहीं। न्यूज मिनट ने कर्नाटक के धर्मस्थला मामले में भी ठीक ऐसी ही भ्रामक खबरें दी थीं। 2025 में न्यूज मिनट ने श्री क्षेत्र धर्मस्थला मंजुनाथ स्वामी मंदिर पर दो दर्जन से ज्यादा खबरें छापीं। एक ‘मास्क्ड म’” (पूर्व सफाई कर्मचारी) के दावों पर, जिसमें दावा किया गया था कि सैकड़ों हत्याएँ, बलात्कार, सामूहिक कब्र, मंदिर प्रशासन (वीरेंद्र हेगड़े, भाजपा राज्यसभा सांसद) ने छुपाया।

उस समय न्यूज मिनट की रिपोर्ट्स की हेडलाइन्स थी- ‘धर्मस्थला हॉरर’, ‘सूत्र विशेष’, ‘मास बरीअल केस’। उसने इस झूठों को बीबीसी और अल जजीरा तक पहुँचाया और हिंदू मंदिर को हत्या का अड्डा दिखाया। आस्था पर सवाल उठाए। हिंदू संस्थान को बदनाम करने की पूरी कोशिश की। लाखों हिंदू भक्तों की भावना को ठेस पहुँचाई। लेकिन एसआईटी जाँच में सच्चाई सामने आ गई। हालाँकि न्यूज मिनट ने तब भी इन मामलों की सच्चाई सामने रखने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।

धर्मस्थल मामले की याद इसलिए दिलाई गई, क्योंकि धर्मस्थल केस में भी केरल जैसा ही तरीका था, हिंदू मंदिर को निशाना, भ्रामक दावे, देश और विदेश के मीडिया में फैलाना, फिर सच्चाई आने पर चुप्पी। गुरुवायुर में भी यही हो रहा है। गोपालकृष्णन के विकास वाले इंटरव्यू को छिपाकर सिर्फ धार्मिक मोड़ पर ध्यान दिया जा रहा है। लेख का अंत सोशल मीडिया पर सांप्रदायिक संदेश का रोना रोता है। लेकिन हिंदू अगर अपना मंदिर बचाने के लिए आवाज उठाए तो उसे ये प्रोपेगेंडा दिखता है, सच्चाई नहीं।

खैर, इस रिपोर्ट पर ही नजर डालें, तो ये रिपोर्ट भले ही लक्ष्मी प्रिया ने लिखा हो, लेकिन इसका संपादन खुद न्यूज मिनट की संपादक धन्या राजेंद्रन ने किया है। धन्या राजेंद्रन एंटी हिंदू और हिट जॉब वाली पत्रकारिता के लिए बदनाम रही हैं और इसके लिए उन्हें प्रोपेगेंडा फैलाने वाले संगठनों की तरफ से सम्मानित भी किया जा चुका है।

बहरहाल, केरल में हिंदू आबादी करीब पचपन प्रतिशत है। मंदिर शहर में पचास साल का मुस्लिम विधायक पैटर्न विकास और आस्था दोनों की अनदेखी है। भाजपा अगर हिंदू प्रतिनिधित्व की बात करे तो न्यूज मिनट जैसे पोर्टल नया तरीका कहेंगे। लेकिन यह पोर्टल लेफ्ट और कॉन्ग्रेस की एजेंडा का प्रचार कर रहा है।

ऐसे में जरूरत है कि केरल के हिंदू भाई बहन इस प्रोपेगेंडा को पहचानें, क्योंकि न्यूज मिनट का यह लेख हिंदू एकता तोड़ने की साफ तौर पर साजिश है। ऐसे में आप अपना वोट, अपनी आवाज अपनी सोच के हिसाब से इस्तेमाल करें।

अंत में सवाल यही है कि क्या मीडिया का काम केवल विवाद को उभारना है या फिर हर पक्ष को संतुलित तरीके से सामने लाना? अगर किसी क्षेत्र में हिंदू समाज अपने प्रतिनिधित्व की बात करता है, तो उसे तुरंत ‘ध्रुवीकरण’ का टैग देना क्या सही पत्रकारिता है? केरल जैसे संवेदनशील और विविधतापूर्ण राज्य में इस तरह की रिपोर्टिंग न केवल राजनीतिक बहस को प्रभावित करती है, बल्कि समाज में अविश्वास भी बढ़ा सकती है। इसलिए जरूरत है कि मीडिया संस्थान आत्ममंथन करें और खबरों को संतुलित, तथ्यों पर आधारित और सभी पक्षों के प्रति निष्पक्ष तरीके से पेश करें।