फ्रांस के नीस शहर में आयोजित ‘भारत इनोवेट्स 2026’ के मंच से राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों का संबोधन भारत-फ्रांस संबंधों में एक नए अध्याय की शुरुआत है। उन्होंने वैश्विक समुदाय को स्पष्ट संदेश दिया कि यूरोप को अब भारत के प्रति अपने पुराने दृष्टिकोण को छोड़ना होगा। मैक्रों की इन बातों के गहरे आर्थिक और रणनीतिक मायने हैं। रक्षा सौदों में ‘मेक इन इंडिया’ को प्राथमिकता, भारतीय स्टार्टअप्स के लिए वित्तीय सहयोग और अत्याधुनिक AI तकनीक साझा करने जैसे कदम यह साबित करते हैं कि भारत अब सिर्फ तकनीक का उपभोक्ता नहीं, बल्कि फ्रांस के साथ कंधे से कंधा मिलाकर भविष्य की रूपरेखा तैयार करने वाला एक बराबर का साझेदार है।
फ्रांस अब कूटनीतिक वादों के साथ-साथ ‘फ्रेंच टेक’, ‘चूज़ फ्रांस’ और ‘फ्रांस 2030’ जैसे अपने प्रमुख तकनीकी अभियानों के दरवाजे भारतीय स्टार्टअप्स के लिए पूरी तरह से खोल रहा है। इसके अलावा, आगामी ‘विवाटेक समिट 2026’ (VivaTech 2026) में दोनों देश मिलकर भारतीय इनोवेशन को यूरोपीय बाजार में बड़े पैमाने पर लॉन्च करने की तैयारी में हैं।
नीतियों और समझौतों से परे, इस तकनीकी साझेदारी की असली और जमीनी तस्वीर तब दुनिया के सामने आई, जब इसी समिट का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।
इस प्रदर्शनी में उत्तराखंड के युवाओं द्वारा तैयार किया गया एक ऐसा नवाचार भी शामिल था, जिसने पेरिस में फ्रांस के राष्ट्रपति को भी अचंभे में डाल दिया। वायरल हो रहे इस वीडियो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को एक छोटी सी डिवाइस के बारे में बेहद बारीकी से समझाते हुए नजर आ रहे हैं। यह डिवाइस करोड़ों लोगों की जान बचाने वाला स्वदेशी ‘स्पंदन ईसीजी’ (Spandan ECG) है। यह भारत के उस स्टार्टअप का कमाल है, जिसने अपनी तकनीक से वैश्विक मंच पर अपना लोहा मनवाया है।
सौरभ बडोला, रजत जैन, साबित रावत और नितिन चंदोला की कोर टीम ने मिलकर ‘स्पंदन’ (Spandan) को विकसित किया है। माचिस की डिब्बी के आकार का यह पोर्टेबल ईसीजी उपकरण हृदय संबंधी असामान्यताओं का शुरुआती चरण में ही पता लगाने में सक्षम है। इस नवाचार का मुख्य उद्देश्य स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाना और सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में अंतिम छोर तक चिकित्सा सुविधाएँ (Last-mile connectivity) पहुँचाना है, ताकि समय रहते लोगों की जान बचाई जा सके।
यह डिवाइस उत्तराखंड के युवाओं की मेहनत का परिणाम है। इनकी कंपनी ‘सनफॉक्स टेक्नोलॉजी’ (Sunfox Technologies) ने जिस तरह से हेल्थ-टेक के क्षेत्र में क्रांति लाई है, वह काबिले तारीफ है। यह उपकरण न केवल पोर्टेबल है, बल्कि दिल की समस्याओं को घंटों पहले भांप लेने का दावा करता है।
इस सफर की शुरुआत ‘शार्क टैंक इंडिया’ (Shark Tank India) के मंच से हुई थी, जहाँ से इस आइडिया ने देश भर में पहचान बनाई। इसके बाद, माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ (Mann Ki Baat) में भारत के स्वदेशी मेडिकल नवाचारों और स्टार्टअप्स के प्रयासों की सराहना की थी, जिसमें ‘स्पंदन’ जैसे अभिनव उपकरणों की भूमिका को महत्वपूर्ण माना गया। आज ‘मन की बात’ से शुरू हुआ यह सफर पेरिस में फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों तक पहुँच चुका है।
उत्तराखंड की इस स्टार्टअप कंपनी ने अपनी अनोखी तकनीक से अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का मान बढ़ाया है। हिमालय की दुर्गम चोटियों और चारधाम यात्रा के कठिन रास्तों पर यह पोर्टेबल ईसीजी मशीन आज हजारों श्रद्धालुओं की ‘लाइफ-लाइन’ बनी हुई है।
पेरिस में आयोजित दुनिया के सबसे बड़े टेक्नोलॉजी इवेंट्स में से एक, ‘विवाटेक 2026’ (VIVATECH 2026) में सनफॉक्स टेक्नोलॉजी ने अपने उत्पादों का लोहा मनवाया। इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति मैक्रों ने कंपनी के स्टॉल का दौरा किया। मजे की बात यह है कि इस बार ‘विवाटेक’ में भारत को ‘सेंटर ऑफ अट्रैक्शन’ बनाया गया था, जहाँ देश के 20 चुनिंदा स्टार्टअप्स को अपनी तकनीक दिखाने का मौका मिला।
दोनों नेताओं ने इस तकनीक के सामाजिक प्रभाव को काफी करीब से समझा। कंपनी के सीईओ रजत जैन ने प्रधानमंत्री को बताया कि कैसे उनके पोर्टेबल ईसीजी उपकरण कम संसाधनों वाले क्षेत्रों में भी हृदय रोगों की जांच को आसान बना रहे हैं। खास तौर पर चारधाम यात्रा मार्गों पर कंपनी का मुफ्त कार्डियक मॉनिटरिंग कार्यक्रम एक मिसाल बन चुका है।
दिलचस्प बात यह रही कि प्रधानमंत्री मोदी ने स्पंदन के संस्थापकों से यह भी पूछा कि क्या यह तकनीक अमरनाथ यात्रा जैसे दुर्गम और लो-नेटवर्क वाले इलाकों में भी काम कर सकती है। कंपनी का आत्मविश्वास से भरा जवाब था कि इसे कठिन भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ही विकसित किया गया है।
Addressing the Indian community in Paris. Their deep affection for India and contribution to stronger India-France ties are truly commendable. https://t.co/sNLYVfzaV1
फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों भी इस तकनीक से काफी प्रभावित दिखे और उन्होंने फ्रांस में इसके संभावित उपयोग पर चर्चा की। अब सनफॉक्स यूरोपीय मानकों के अनुसार ‘सीई’ (CE) सर्टिफिकेशन हासिल करने की प्रक्रिया में है, जिससे यूरोप के बाजार में भी ‘मेड इन इंडिया’ की गूंज सुनाई देगी। इसके अलावा, कंपनी अब ‘कार्डियक अमाइलॉइडोसिस’ (Cardiac Amyloidosis) जैसी दुर्लभ बीमारियों पर शोध के लिए फ्रांस की एक संस्था के साथ मिलकर काम कर रही है।
यह कहना गलत नहीं होगा कि उत्तराखंड की गलियों से निकला यह स्टार्टअप अब पूरी दुनिया के दिल की धड़कन सुरक्षित करने की राह पर है। ‘मन की बात’ से शुरू हुआ यह सफर आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के बढ़ते दबदबे की कहानी कह रहा है।
जम्मू-कश्मीर के गांदरबल जिले के तुलमुल्ला गाँव में आज से वार्षिक माता खीर भवानी मेले की शुरुआत हो गई। ज्येष्ठ अष्टमी के अवसर पर आयोजित होने वाला यह मेला कश्मीरी पंडित समुदाय का सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन माना जाता है।
हर वर्ष हजारों श्रद्धालु देश के विभिन्न राज्यों से यहाँ पहुँचकर माता रग्न्या देवी के दर्शन करते हैं, पवित्र झरने में खीर अर्पित करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
#WATCH | Jammu, J&K: Devotees celebrate Kheer Bhawani Mela at Janipur Temple on Jyeshtha Ashtami. This temple is a replica of the Kheer Bhawani Temple in Srinagar and was constructed by Kashmiri migrants after their migration in the 1990s. pic.twitter.com/47GBwbhyJC
इस वर्ष भी जम्मू से हजारों श्रद्धालु संगठित काफिलों में घाटी पहुँचे हैं। प्रशासन की ओर से सुरक्षा, चिकित्सा शिविर, हेल्प डेस्क, यातायात नियंत्रण, साफ-सफाई और आपातकालीन सेवाओं के व्यापक इंतजाम किए गए हैं। मंदिर परिसर और यात्रा मार्गों पर विशेष निगरानी रखी गई ताकि श्रद्धालु शांतिपूर्ण वातावरण में पूजा कर सकें।
हालाँकि खीर भवानी मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है। यह कश्मीर की प्राचीन धार्मिक परंपराओं, कश्मीरी पंडित समुदाय की सांस्कृतिक पहचान, विस्थापन की स्मृतियों और घाटी की साझा सामाजिक विरासत से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि यह मेला आज भी धार्मिक, ऐतिहासिक और सामाजिक, तीनों स्तरों पर विशेष महत्व रखता है।
सदियों पुराना तीर्थ: क्या है माता खीर भवानी मंदिर का इतिहास?
माता खीर भवानी मंदिर जम्मू-कश्मीर के गांदरबल जिले के तुलमुल्ला गाँव में स्थित है और इसे कश्मीर के सबसे पवित्र शक्ति स्थलों में गिना जाता है। यह मंदिर देवी रग्न्या या राग्न्या भगवती को समर्पित है, जिन्हें शक्ति का स्वरूप और कश्मीरी पंडित समुदाय की कुलदेवी माना जाता है।
मंदिर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि काफी प्राचीन मानी जाती है। इस स्थल के ऐतिहासिक संदर्भ कल्हण की राजतरंगिणी, भृगु संहिता और अबू-अल-फजल की ऐन-ए-अकबरी जैसे ग्रंथों में मिलते हैं। समय के साथ यह स्थान केवल पूजा का केंद्र नहीं बल्कि कश्मीरी हिंदू समाज के सांस्कृतिक जीवन का भी प्रमुख आधार बन गया।
वर्तमान मंदिर संरचना डोगरा शासनकाल में विकसित हुई। माना जाता है कि महाराजा प्रताप सिंह ने इसके आधुनिक स्वरूप के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जबकि बाद में महाराजा हरि सिंह के समय इसका संरक्षण और विस्तार किया गया।
मंदिर की वास्तु संरचना पारंपरिक मंदिरों से कुछ अलग है क्योंकि यहाँ पूजा का केंद्र कोई विशाल गर्भगृह नहीं बल्कि मंदिर परिसर के बीच स्थित एक प्राकृतिक पवित्र झरना है, जिसके चारों ओर धार्मिक गतिविधियाँ संपन्न होती हैं। एक कथा यह भी है कि रावण के भक्ति भाव से प्रसन्न होकर माँ रग्न्या प्रकट हुई थीं।
इसके बाद रावण ने उनकी स्थापना कुलदेवी के रूप में करवाई। हालाँकि रावण के व्यवहार और बुरे कर्म के चलते देवी नाराज हो गईं और रावण की नगरी छोड़कर चली गईं। इसके बाद भगवान राम ने जब रावण का वध किया तो राम ने हनुमान से कहा कि वह देवी की स्थापना किसी उपयुक्त स्थान पर करवाएँ। इसके बाद हनुमान की मदद यहाँ स्थापना कराई गई
खीर का प्रसाद, ज्येष्ठ अष्टमी और मंदिर से जुड़ी प्रमुख मान्यताएँ
इस मंदिर की सबसे विशिष्ट परंपरा देवी को चावल की खीर खीर अर्पित करने की है। इसी वजह से इस स्थान को ‘खीर भवानी’ के नाम से जाना जाता है। श्रद्धालु मंदिर परिसर में स्थित पवित्र झरने के पास पहुँचकर खीर, दूध, फूल और अन्य प्रसाद अर्पित करते हैं। मान्यता है कि माता रग्न्या देवी भक्तों की रक्षा करती हैं और उनके जीवन में समृद्धि और शांति लाती हैं।
ज्येष्ठ अष्टमी का दिन विशेष महत्व रखता है। इसी दिन वार्षिक मेले का आयोजन होता है और इसे देवी की विशेष पूजा का अवसर माना जाता है। सुबह से ही श्रद्धालु पारंपरिक परिधान पहनकर मंदिर पहुँचते हैं, भजन-कीर्तन करते हैं और पूजा-अर्चना में भाग लेते हैं।
कई परिवारों के लिए यह केवल व्यक्तिगत श्रद्धा का विषय नहीं बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक परंपरा का हिस्सा भी है।
रहस्यमयी झरना: माता खीर भवानी मंदिर की सबसे अनोखी परंपरा और उससे जुड़ी मान्यताएँ
माता खीर भवानी मंदिर की सबसे विशिष्ट और चर्चित पहचान मंदिर परिसर के बीच स्थित पवित्र प्राकृतिक झरना है। इसी झरने के चारों ओर पूरा धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होता है और यही इस मंदिर को अन्य शक्ति स्थलों से अलग बनाता है। स्थानीय परंपरा में इस झरने को ‘स्यंध’ (Syandh) कहा जाता है और इसे अत्यंत पवित्र माना जाता है।
इस झरने से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध मान्यता इसके पानी के रंग को लेकर है। ऐसा माना जाता है कि इस झरने का पानी क्षेत्र की समृद्धि के आधार पर रंग बदलता है और इसे घाटी के भविष्य, सामाजिक परिस्थितियों या बड़े परिवर्तनों से जोड़कर देखा जाता है। सामान्य परिस्थितियों में पानी का रंग हल्का, साफ या दूधिया दिखाई देना शुभ माना जाता है।
वहीं गहरा, धुंधला या काला रंग कठिन समय या अशुभ संकेत के रूप में देखा जाता है। इस मान्यता को लेकर समुदाय में कई पीढ़ियों से कहानियाँ और स्मृतियाँ प्रचलित रही हैं। 1990 में कश्मीरी पंडितों के बड़े पैमाने पर पलायन से ठीक पहले इसका पानी कथित तौर पर काला हो गया था।
किसी प्राकृतिक आपदा की स्थिति में कुंड का जल काला हो जाता है। इससे यह संकेत मिलता है कि जम्मू-कश्मीर में कोई विपत्ति आने वाली है। 2014 की बाढ़ और कारगिल युद्ध के दौरान कुंड के जल का रंग क्रमशः काला और लाल हो गया था। हालाँकि यह कुंड घाटी की उन्नति का संकेत भी देता है।
कहा जाता है कि जब अनुच्छेद-370 हटाया गया था तब कुंड का जल हरे रंग का हो गया था। जल का यह हरा रंग कश्मीर की उन्नति और खुशहाली का प्रतीक माना गया।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह झरना केवल जल का स्रोत नहीं बल्कि देवी रग्न्या की उपस्थिति और कृपा का प्रतीक है। मंदिर में आने वाले श्रद्धालु इस झरने में खीर, दूध, पुष्प और प्रसाद अर्पित करते हैं। इसी परंपरा के कारण इस तीर्थ का नाम ‘खीर भवानी’ पड़ा। पूजा के दौरान श्रद्धालु झरने के चारों ओर परिक्रमा करते हैं और शांति तथा समृद्धि की प्रार्थना करते हैं।
पलायन के बाद भी कायम रहा रिश्ता: कश्मीरी पंडितों के लिए क्यों खास है यह मेला?
खीर भवानी मेला कश्मीरी पंडित समुदाय के लिए केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि उनकी सामूहिक पहचान का भी हिस्सा है। दशकों तक घाटी में रहने वाले कश्मीरी पंडितों के सामाजिक जीवन में यह मेला विशेष स्थान रखता था। परिवारों के लिए यह वार्षिक धार्मिक और सामुदायिक मिलन का अवसर होता था।
लेकिन 1990 के दशक की शुरुआत में कश्मीर में आतंकवाद, लक्षित हिंसा, हत्याओं, धमकियों और असुरक्षा के माहौल के बीच बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़कर पलायन करना पड़ा। इस घटना ने समुदाय की सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक जीवन को गहराई से प्रभावित किया। करीब 5 लाख कश्मीरी हिंदुओं ने अपनी मिट्टी से दूर होने का दर्द झेला।
लगातार नरसंहार और प्रताड़ना के चलते उन्हें घाटी से भागने को मजबूर होना पड़ा। विस्थापन के बाद भी खीर भवानी मेला समुदाय की स्मृति और धार्मिक परंपरा का केंद्र बना रहा। आज भी बड़ी संख्या में लोग हर वर्ष इस मेले में शामिल होकर अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ाव महसूस करते हैं।
बदलते समय में मेले की नई भूमिका
खीर भवानी मेले की एक महत्वपूर्ण पहचान इसकी सामाजिक भूमिका भी है। कई वर्षों से स्थानीय मुस्लिम समुदाय इस आयोजन में सहयोग करता रहा है। श्रद्धालुओं के स्वागत, व्यवस्थाओं और स्थानीय स्तर पर सहयोग की परंपरा को घाटी के सामाजिक संबंधों और साझा संस्कृति के उदाहरण के रूप में देखा जाता है।
इसी वजह से इस मेले को अक्सर कश्मीरियत यानी साझा सांस्कृतिक विरासत और सहअस्तित्व से भी जोड़ा जाता है। इस वर्ष प्रशासन ने सुरक्षा के विशेष इंतजाम किए। मंदिर परिसर के आसपास अतिरिक्त सुरक्षा बलों की तैनाती की गई, मेडिकल कैंप लगाए गए और सहायता केंद्र बनाए गए।
#WATCH | Tulmulla, Ganderbal | Security heightened across Ganderbal district for the annual Mata Kheer Bhawani Mela at the Tulmulla temple pic.twitter.com/aHJyZOnitY
आगामी अमरनाथ यात्रा को देखते हुए भी सुरक्षा व्यवस्थाओं को और मजबूत किया गया। इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य केवल आयोजन को सफल बनाना नहीं बल्कि श्रद्धालुओं के बीच भरोसा और सुरक्षा की भावना को बनाए रखना भी है।
आस्था से आगे: क्यों विशेष है खीर भवानी मेला?
माता खीर भवानी मेला कश्मीर की उन परंपराओं में शामिल है जहाँ धर्म, इतिहास और समाज एक-दूसरे से जुड़ते दिखाई देते हैं। तुलमुल्ला स्थित यह मंदिर केवल एक तीर्थस्थल नहीं बल्कि कश्मीरी पंडित समुदाय की आस्था, सांस्कृतिक निरंतरता और ऐतिहासिक स्मृति का केंद्र है।
आज भी जब हजारों श्रद्धालु यहाँ पहुँचकर माता रग्न्या देवी को खीर अर्पित करते हैं, तो यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं होता, यह उस परंपरा को जीवित रखने का प्रयास भी होता है जिसने समय के कई उतार-चढ़ाव देखे हैं, लेकिन अपनी पहचान को बनाए रखा है।
गुजरे दिनों फीफा (FIFA) विश्व कप में जो खेल प्रेमियों को देखने मिला, वह किसी जादू से कम नहीं था। एक के बाद एक लगातार रोमांचक मुकाबले, जो आपको रात भर सोने न दें।
सर्वप्रथम, बीती रात अटलांटा स्टेडियम में 2010 विश्व कप विजेता स्पेन का मुकाबला पिछले संस्करण में अर्जेंटीना को चौंका चुकी सऊदी अरब की टीम से था। पिछले मैच में हुई गलतियों से सबक लेते हुए स्पेनिश टीम के कोच लुई डे ला फुएन्ते ने अपनी प्लेइंग इलेवन में कुछ बदलाव किए। मिडफील्ड में दानी ओल्मो को अधिक आक्रामक भूमिका दी गई, जिससे पेड्री को आगे बढ़कर खेल रचने की अधिक स्वतंत्रता मिली।
वहीं लेफ्ट विंग पर गावी की जगह एलेक्स बाएना को मौका दिया गया। साथ ही चोट से उबरकर लामीन यमाल भी टीम में वापसी कर रहे थे।
इस बार स्पेनिश टीम अपने पिछले मैच की तुलना में कहीं अधिक संतुलित और आत्मविश्वास से भरी नजर आ रही थी। मैच के शुरुआती मिनटों से ही स्पेन ने विपक्षी गोलपोस्ट पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। रोड्री, पेड्री और दानी ओल्मो लगातार फॉरवर्ड लाइन के लिए मौके तैयार कर रहे थे।
मैच के दसवें मिनट में ही लामीन यमाल ने शानदार गोल दागकर स्पेन को बढ़त दिला दी। इसके बाद सऊदी अरब की टीम कुछ संभल पाती, उससे पहले ही सेंट्रल फॉरवर्ड मिकेल ओयारजाबाल ने दो गोल दागकर मैच के पच्चीसवें मिनट से पहले ही स्पेन को 3-0 से आगे कर दिया।
स्पेन का दबदबा पूरे मैच में साफ दिखाई दे रहा था। पहले हाफ में ही उसने मुकाबले की दिशा लगभग तय कर दी थी। दूसरे हाफ की शुरुआत में एक और गोल के साथ स्पेन की बढ़त 4-0 हो गई। लामीन यमाल की वापसी ने टीम के आक्रमण को अतिरिक्त धार दी थी। यह मैच 4-0 से जीतकर स्पेन ग्रुप एच में शीर्ष स्थान पर पहुंच गया।
मैं खबर पढ़ रहे तमाम साथियों का ध्यान एक उन्नीस वर्षीय खिलाड़ी की ओर भी दिलाना चाहूंगा, जिसे शायद उतनी चर्चा नहीं मिलती जितनी वह डिजर्व करता है। इस खिलाड़ी का नाम है पाऊ कुबार्सी।
कम उम्र में ही पाऊ कुबार्सी स्पेन की रक्षापंक्ति के महत्वपूर्ण सदस्य बन चुके हैं। डिफेंस में उनका संयम, पोजिशनिंग और खेल की समझ उन्हें अपनी पीढ़ी के सबसे प्रतिभाशाली सेंटर-बैक खिलाड़ियों में शामिल करती है। बड़े मंच पर जिस परिपक्वता के साथ वह खेलते हैं, वह वाकई प्रशंसनीय है।
आगे, रात साढ़े बारह बजे लॉस एंजिलिस स्टेडियम में केविन डी ब्रुएना की बेल्जियम का मुकाबला ईरान की टीम से था। यहां एक ऐसा परिणाम सामने आया जिसकी बहुत कम लोगों ने कल्पना की होगी। ईरान ने बेल्जियम जैसी मजबूत टीम को 0-0 की बराबरी पर रोक दिया। इस नतीजे के बाद ग्रुप जी की स्थिति और भी रोचक हो गई।
इसके बाद मियामी में ग्रुप एच के एक अन्य मुकाबले में मार्सेलो बिएल्सा की उरुग्वे को काबो वर्दे का सामना करना था। उरुग्वे के लिए यह मैच जीतना बेहद जरूरी था। दूसरी ओर, काबो वर्दे पहले ही इस विश्व कप में स्पेन के खिलाफ प्रभावशाली प्रदर्शन कर सबका ध्यान अपनी ओर खींच चुकी थी।
मार्सेलो बिएल्सा ने अपनी टीम को 4-2-3-1 फॉर्मेशन के साथ मैदान में उतारा। उगार्ते और वालवर्दे टीम के लिए यह मैच जीतना चाहते थे। वहीं काबो वर्दे के गोल की जिम्मेदारी एक बार फिर उनके अनुभवी गोलकीपर वोज़िन्हा के कंधों पर थी।
मैच शुरू होते ही काबो वर्दे ने भी आक्रामक इरादे दिखाए। दोनों टीमें लगातार हमले करती नजर आईं। मैच के इक्कीसवें मिनट में काबो वर्दे को उरुग्वे के गोलपोस्ट से लगभग तीस मीटर दूर फ्री-किक मिली। डिफेंसिव मिडफील्डर केविन पीना ने शानदार राइट-फुटेड शॉट लगाया और गेंद सीधे गोलपोस्ट में जा समाई। पूरी दुनिया को चौंकाते हुए काबो वर्दे ने बढ़त हासिल कर ली।
हालाँकि उरुग्वे ने हार नहीं मानी। मैच के चवालीसवें मिनट में मैक्सिमिलियानो अराउजो ने हेडर के जरिए बराबरी दिलाई। इसके ठीक एक मिनट बाद अराउजो के पास पर अगुस्तिन कानोब्बियो ने गोल कर उरुग्वे को 2-1 की बढ़त दिला दी। पहला हाफ समाप्त होते-होते उरुग्वे वापसी कर चुका था।
दूसरे हाफ में काबो वर्दे ने तीन बदलाव किए और उनका असर भी दिखा। सब्स्टीट्यूट खिलाड़ी हेलियो वरेला ने गोल कर स्कोर 2-2 कर दिया। इसके बाद दोनों टीमों ने जीत के लिए पूरा जोर लगाया, लेकिन कोई और गोल नहीं हो सका।
मैच 2-2 की बराबरी पर समाप्त हुआ। उरुग्वे के लिए यह निराशाजनक परिणाम था, जबकि काबो वर्दे के लिए विश्व कप इतिहास का एक यादगार क्षण। जिस साहस और अनुशासन के साथ उन्होंने पूरे मैच में संघर्ष किया, वह प्रशंसा के योग्य है।
आगे, वैंकूवर में ग्रुप जी के मुकाबले में मिस्र ने न्यूज़ीलैंड को 3-1 से हराकर अपने समूह में शीर्ष स्थान हासिल कर लिया। स्टार खिलाड़ी मोहम्मद सालाह ने भी गोल दागकर दर्शकों को झूमने का मौका दिया।
अब आज रात विश्वविजेता अर्जेंटीना भारतीय समयानुसार रात साढ़े दस बजे डल्लास में ऑस्ट्रिया के खिलाफ मैदान में उतरेगी। एक बार फिर दुनिया की निगाहें लियो मेस्सी पर होंगी। वहीं पिछले संस्करण की उपविजेता फ्रांस रात ढाई बजे फिलाडेल्फिया में इराक का सामना करेगी।
इन सभी मुकाबलों पर आपकी नजर बनी रहनी चाहिए क्योंकि इस बार विश्व कप में शानदार फुटबॉल देखने को मिल रही है। आगे भी कई रोमांचक मुकाबले बाकी हैं। बने रहिए साथ। फुटबॉल की खबरों का सिलसिला जारी रहेगा।
पश्चिम बंगाल में पहली बार सत्ता में आई BJP सरकार ने अपना पहला बजट पेश किया गया। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए यह ₹4.38 लाख करोड़ का है। राज्य सरकार ने प्रशासनिक कामकाज में पारदर्शिता लाने, तेजी से विकास करने और डिजिटल तकनीक को बढ़ावा देने के लिए ‘वेस्ट बंगाल इम्पैक्ट AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) मिशन’ शुरू किया है।
शुभेंदु सरकार ने 1 लाख खाली पदों पर भर्ती की घोषणा की साथ ही महिलाओं के लिए 33% आरक्षण की भी घोषणा की। उन्होंने 36,000 करोड़ रुपये की ‘अन्नपूर्णा योजना’ जैसी बड़ी योजनाओं को लागू करने की बात कही, साथ ही राजनीतिक हिंसा के शिकार लोगों और परिवार का भी ख्याल रखा है।
वित्त मंत्री स्वप्न दासगुप्ता ने राज्य की पहली BJP सरकार के पहले पूर्ण बजट में कई अहम घोषणाएँ कीं। रोजगार बढ़ाने से लेकर सरकारी कर्मचारियों के महँगाई भत्ते में बढ़ोतरी, महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण, 1 लाख खाली पदों में भर्ती के साथ- साथ बेरोजगारी भत्ता देने की भी घोषणा की। पूरे बजट में हर तबके का ध्यान रखा गया, किसानों, बुजुर्गों, छात्रों, बेरोजगारों, महिलाओं और बुजुर्गों के साथ-साथ नौकरीपेशा लोगों का भी पूरा ख्याल रखा।
शुभेंदु सरकार के बजट में जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को विशेष सम्मान देते हुए उनकी जयंती (6 जुलाई) को राज्य में सरकारी अवकाश की घोषणा की है। इसके साथ ही उनके पैतृक आवास के जीर्णोद्धार और उनकी 125 फीट ऊँची प्रतिमा स्थापित करने की भी घोषणा की है।
DA में अतिरिक्त 20 फीसदी की बढ़ोतरी
वित्त मंत्री स्वप्र दासगुप्ता ने बजट पेश करते हुए घोषणा की कि राज्य सरकार के कर्मचारियों, अर्ध-सरकारी कर्मचारियों, गैर-शिक्षण कर्मचारियों और पेंशनभोगियों, जिन्हें अभी तक 18 प्रतिशत की दर से महँगाई भत्ता मिलता है, उन्हें अब अतिरिक्त 20 प्रतिशत महँगाई भत्ता मिलेगा यानी कुल महँगाई भत्ता बढ़कर 38 फीसदी हो जाएगा। DA की नई दरें 1 अक्टूबर, 2026 से लागू होंगी। इससे लाखों सरकारी कर्मचारियों और रिटायर हो चुके लोगों को सीधा फायदा होगा। कर्मचारी लंबे समय से DA बढ़ाने की माँग कर रहे थे।
उन्होंने कहा, “MLA फंड को ₹70 लाख से बढ़ाकर ₹1 करोड़ कर दिया गया है। होम गार्ड और NBF कर्मियों के मासिक वेतन में ₹2,000 की बढ़ोतरी की गई है। सिविल डिफेंस वॉलंटियर्स को हर महीने 20 दिन के काम की गारंटी दी जाएगी। अर्ध-सरकारी और गैर-शिक्षण कर्मचारियों को 20 प्रतिशत अतिरिक्त महँगाई भत्ता मिलेगा। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं के साथ-साथ आशा वर्कर्स के मासिक मानदेय में भी ₹5,000 की बढ़ोतरी की गई है।”
‘संग्रामी भत्ता’ के जरिए राजनीतिक हिंसा से पीड़ितों को मदद
बजट में राज्य पुलिस बल के लिए कुल 20000 कर्मचारियों की भर्ती की घोषणा की गई है। इससे निश्चित रूप से रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और साथ ही कानून-व्यवस्था भी मजबूत होगी। एक नए ‘संग्रामी भत्ता’ (संघर्ष करने वालों या पीड़ित लोगों के लिए भत्ता) की भी घोषणा की गई है। सरकार ने साफ कहा है कि यह भत्ता उन लोगों को दिया जाएगा जो राजनीतिक विचारधारा या राजनीतिक हिंसा के शिकार हुए हैं। योजना का मकसद राजनीतिक हिंसा के पीड़ितों और उनके परिवारों के प्रति समर्थन दिखाना है।
साथ ही, उच्च शिक्षा ले रही अविवाहित छात्राओं को ₹50,000 की एकमुश्त सहायता राशि मिलेगी। मिड-डे मील पकाने वालों का भत्ता ₹1,000 बढ़ाया जाएगा, और प्राइमरी स्कूलों में मिड-डे मील के लिए प्रति छात्र आवंटन को बढ़ाकर ₹10 किया जा रहा है।
1 लाख नौकरी और बेरोजगारी भत्ता का ऐलान
विधानसभा में बजट पेश करते हुए राज्य के वित्त मंत्री स्वपन दासगुप्ता ने कहा, “21 से 45 साल की उम्र के योग्य, पढ़े-लिखे और बेरोजगार युवाओं को हर महीने भत्ता देने के लिए अक्टूबर 2026 में ‘भरोसा’ योजना शुरू की जाएगी। इस योजना के तहत, ग्रेजुएट युवाओं को ₹3,000 का भत्ता मिलेगा, जबकि दूसरों को ₹2,000 मिलेंगे। यह योजना उन परिवारों के उम्मीदवारों के लिए होगी जिनकी सालाना आय ₹1 लाख से कम है और जो अभी किसी दूसरी सोशल सिक्योरिटी स्कीम का फायदा नहीं उठा रहे हैं।”
इसके अलावा 100 मेधावी छात्रों के लिए ‘स्वामी विवेकानंद मेरिट स्कीम’ का प्रस्ताव भी बजट में है। उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही अविवाहित छात्राओं के लिए ₹50,000 की एकमुश्त आर्थिक सहायता देने की घोषणा भी की गई है।
सरकारी नौकरी की परीक्षा की तैयारी के लिए ₹30,000 की एकमुश्त ग्रांट मिलेगी। ये रकम सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त कॉलेजों के छात्रों को दी जाएगी। सालों से सरकारी नौकरियों में भर्ती की दिक्कतों को देखते हुए शुभेंदु सरकार ने अधिकतम आयुसीमा में 5 साल की छूट देने की घोषणा की है। बजट में KYC-कंप्लायंट जॉब कार्ड धारकों को 125 दिन का रोजगार देने का प्रस्ताव है और 100 दिन की काम वाली योजना के लिए ₹14,000 करोड़ का आवंटन किया गया है।
AI मिशन पर बंगाल
राज्य के सरकारी विभागों के कामकाज को पूरी तरह से पेपरलेस (कागज-रहित) बनाना और दक्षता बढ़ाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल करना है। बंगाल के पुलिस विभाग के लिए एक खास AI सेल बनाया जा रहा है, जो पुलिसिंग, अपराध नियंत्रण और जाँच में AI का अधिक से अधिक इस्तेमाल करेगा। इसके अलावा, राज्य सरकार ‘बंगाल सिलिकॉन वैली’ प्रोजेक्ट के तहत डेटा सेंटर्स और AI से जुड़े उद्योगों के लिए ₹30,000 करोड़ का निवेश करवाने जा रही है। इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
बजट के दौरान राज्य के वित्त मंत्री ने राज्य में नए आईआईटी और एम्स बनाने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि उत्तर बंगाल में एक आईआईटी और एक एम्स स्थापित किया जाएगा। कल्याणी के पास एक नया ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट बनाने के साथ-साथ एक आईआईएम स्थापित करने का प्रस्ताव भी है।
पश्चिम बंगाल के बजट में ‘बंगाल एआई मिशन’ के तहत भूमि अधिग्रहण और सरकारी कामकाज को डिजिटल बनाने पर विशेष जोर दिया गया है। हालाँकि, इसका मुख्य लक्ष्य डिजिटलाइजेशन के अलावा औद्योगिकीकरण को बढ़ावा देना और बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करना है। निवेश को आकर्षित करने,भूमि अधिग्रहण को सरल बनाने और सिंगल-विंडो सिस्टम के लिए एक नई औद्योगिक नीति लागू की गई है।
1 किलोमीटर के दायरे में शराब की कोई दुकान नहीं होगी
अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों या धार्मिक स्थलों के 1 किलोमीटर के दायरे में शराब की कोई दुकान नहीं होगी। बजट में राज्य सरकार ने यह घोषणा की गई है। मिड-डे मील रसोइयों के लिए ₹1,000 का भत्ता बढ़ाने की घोषणा की गई है। साथ ही पैरा-टीचर्स का मासिक सैलरी ₹5,000 बढ़ाया गया है।
किसान परिवार को मिलेंगे ₹36000 सालाना
बजट में हर किसान परिवार को ₹3,000 प्रति माह की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की गई है यानी सालाना हर परिवार को ₹36000 रुपए मिलेंगे। वित्त मंत्री ने बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों के लिए ₹1200 करोड़ की लागत वाले एक मास्टर प्लान की घोषणा की और कहा कि इससे बाढ़ की आशंका वाले इलाके का स्थायी विकास सुनिश्चित किया जाएगा। बजट में बुज़ुर्गों, विधवाओं और दिव्यांगों के लिए मासिक भत्ते में 500 रुपए की बढ़ोतरी की घोषणा की गई।
महिलाओं के लिए बड़ी घोषणाएँ
बजट के माध्यम से महिलाओं को सशक्त करने की शुभेन्दु सरकार ने पहल की है। इस दौरान सरकारी नौकरियों में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण की घोषणा की गई है यानी 1 लाख सरकारी नौकरी मिलने पर उसमें 33000 महिलाओं को नौकरी मिलेगी।
इसके अलावा अन्नपूर्णा योजना की घोषणा की गई है, जिसके लिए राज्य सरकार ने ₹36,000 करोड़ आवंटित किए हैं। योजना के तहत महिलाओं को हर महीने ₹3,000 दिए जाएँगे, जो सीधे बैंक खातों में जमा किया जाएगा। बजट में गर्भवती माताओं के लिए ₹21,000 की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की गई है साथ ही उन्हें छह न्यूट्रिशन किट मिलेंगी।
टोल फ्री हेल्पलाइन नंबर जारी किया गया ताकि किसी तरह की सहायता के लिए सीधा संपर्क किया जा सके और मदद पहुँचाने में देरी न हो। इससे प्रशासन को कानून-व्यवस्था दुरुस्त रखने में मदद मिलेगी। महिलाओं की सुरक्षा के लिए ‘दुर्गा स्क्वाड’ शुरू करने की घोषणा की गई है। अक्टूबर में दुर्गा पूजा से पहले 16000 नए कॉन्स्टेबल तैनात किए जाएँगे।
पश्चिम बंगाल के बजट (2026) में खनन (माइनिंग) गतिविधियों के लिए सेंट्रलाइज्ड ई-ऑक्शन प्रक्रिया लागू करने और आदिवासी बहुल क्षेत्र झारग्राम में एक नई ‘ट्राइबल यूनिवर्सिटी’ स्थापित करने की घोषणा की गई है। इससे स्थानीय जनजातीय युवाओं को उच्च शिक्षा, रोजगार-उन्मुख पाठ्यक्रम, और रिसर्च की सुविधा मिलेगी।
राज्य में रेत और दूसरे खनिजों की नीलामी में पारदर्शिता लाने और अवैध खनन और सिंडिकेट राज को खत्म करने के लिए यह व्यवस्था शुरू की गई है। खदानों की डिजिटल मैपिंग और सीसीटीवी कवरेज के माध्यम से अवैध गतिविधियों पर लगाम लगाने का प्रावधान है।
उत्तर प्रदेश के बहराइच की सालार मसूद दरगाह एक बार फिर विवादों में है। इस बार मामला दरगाह पर आने वाले चढ़ावे और उसके वित्तीय रिकॉर्ड से जुड़ा है। आरोप है कि दरगाह में पिछले कई वर्षों में आए चढ़ावे और दान का पूरा हिसाब उपलब्ध नहीं है। जिलाधिकारी की ओर से रिकॉर्ड माँगे जाने के बाद भी कई सालों का वित्तीय ब्योरा नहीं मिल पाया।
इसके बाद दरगाह में बड़े वित्तीय घोटाले की आशंका जताई जा रही है। मामले में भाजपा (बीजेपी) नेताओं ने करोड़ों रुपए की हेराफेरी का आरोप लगाया है, जबकि समाजवादी पार्टी के पूर्व मंत्री यासर शाह का नाम भी विवाद में सामने आया है। दूसरी तरफ दरगाह इंतजामिया कमेटी सभी आरोपों को बेबुनियाद बता रही है।
दरगाह के चढ़ावे को लेकर बवाल
बहराइच की सालार मसूद दरगाह को देश की प्रसिद्ध दरगाहों में गिना जाता है। यहाँ हर साल लाखों मुस्लिम पहुँचते हैं और नकद दान के अलावा सोना, चाँदी और अन्य कीमती वस्तुएँ चढ़ाते हैं। हाल के दिनों में दरगाह के चढ़ावे और संपत्तियों के प्रबंधन को लेकर सवाल उठने लगे।
विवाद तब और बढ़ गया जब दरगाह से जुड़े कुछ लोगों और भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि दरगाह में आने वाले चढ़ावे का सही हिसाब-किताब नहीं रखा गया। आरोप यह भी है कि वर्षों से जमा हुई धनराशि और अन्य संपत्तियों के उपयोग में गंभीर अनियमितताएँ हुई हैं। इसी बीच कुछ पुश्तैनी खादिमों ने दावा किया कि दरगाह में चढ़ाई गई सोने-चाँदी की कीमती ज्वेलरी अब दिखाई नहीं दे रही है। उनका कहना है कि अगर आभूषण सुरक्षित हैं तो उन्हें सार्वजनिक रूप से दिखाया जाना चाहिए।
भाजपा के आरोप
विवाद को लेकर भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष कुँवर बासिल अली ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की और पूरे मामले की SIT से जाँच कराने की माँग की है।कुँवर बासिल अली का आरोप है कि दरगाह वक्फ नंबर-19 की बेशकीमती संपत्तियों और चढ़ावे के प्रबंधन में बड़े स्तर पर अनियमितताएँ हुई हैं।
भारतीय जनता पार्टी के अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष कुंवर बासित अली ने समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव पर बोला हमला
बहराइच में सैयद सलार गाजी की दरगाह में ट्रस्ट बनाकर समाजवादी पार्टी ने चंदे की चोरी की
बासित अली ने माँग की है कि पिछले लगभग 20 वर्षों के वित्तीय लेनदेन की निष्पक्ष जाँच कराई जाए। उनका आरोप है कि दरगाह में आने वाले दान, चढ़ावे और चंदे की रकम में बड़े पैमाने पर हेराफेरी की गई है। उनका कहना है कि मामले की निष्पक्ष जाँच होने पर करोड़ों रुपए के वित्तीय गड़बड़ी का सच सामने आ सकता है।
मामला बढ़ने के बाद प्रदेश सरकार के प्रभारी मंत्री दिनेश प्रताप सिंह ने भी जिलाधिकारी अक्षय त्रिपाठी से विस्तृत रिपोर्ट माँगी है। रिपोर्ट 15 दिनों के भीतर देने को कहा गया है। इससे साफ है कि प्रशासन भी आरोपों को गंभीरता से देख रहा है।
डीएम ने माँगा ब्योरा, लेकिन रिकॉर्ड नहीं मिला
बहराइच के जिलाधिकारी अक्षय त्रिपाठी ने दरगाह के वित्तीय रिकॉर्ड की जानकारी माँगी तो कई सवाल खड़े हुए। जाँच के दौरान यह बात सामने आई कि पिछले 10 वर्षों के चढ़ावे और आय-व्यय से जुड़े कई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, दरगाह प्रबंधन की ओर से पूरा वित्तीय ब्योरा प्रस्तुत नहीं किया जा सका।
इसी वजह से बड़े वित्तीय गोलमाल या घोटाले की आशंका जताई जा रही है। जिलाधिकारी ने मामले को गंभीर मानते हुए उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड को पत्र भेजकर जाँच की आवश्यकता बताई है। जाँच में एक कर्मचारी की नियुक्ति पर भी सवाल उठे हैं, जबकि वर्तमान समय में 170 कर्मचारियों के काम करने का दावा कमेटी कर रही है। अब सवाल यह उठ रहा है कि अगर दरगाह में हर साल बड़ी मात्रा में चढ़ावा आता रहा है, तो उसका पूरा लेखा-जोखा कहाँ है और रिकॉर्ड उपलब्ध क्यों नहीं है।
सपा के पूर्व मंत्री की मिलीभगत के आरोप
इस पूरे विवाद में समाजवादी पार्टी के नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री यासर शाह का नाम भी सामने आया है। भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया है कि दरगाह की इंतजामिया कमेटी में शामिल कुछ लोगों के साथ मिलकर वित्तीय अनियमितताओं को संरक्षण दिया गया।
कुँवर बासित अली ने मुख्यमंत्री से की गई शिकायत में यासर शाह की भूमिका की भी जाँच कराने की माँग की है। उनका आरोप है कि दरगाह से जुड़े आर्थिक मामलों में पूर्व मंत्री की भी भूमिका रही है और इसकी निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए।
दरगाह कमेटी ने क्या सफाई दी?
वहीं दरगाह इंतजामिया कमेटी ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। कमेटी के वरिष्ठ सदस्य एडवोकेट दिलशाद अहमद का कहना है कि भ्रष्टाचार और गबन के आरोप पूरी तरह निराधार हैं।
कमेटी का दावा है कि दरगाह का हर वित्तीय लेनदेन नियमों के अनुसार होता है और सभी प्रक्रियाएँ वक्फ बोर्ड के नियमों के तहत संचालित की जाती हैं। कमेटी के अनुसार, चढ़ावे की गिनती सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में होती है और पूरी प्रक्रिया रिकॉर्ड की जाती है। इसलिए हेराफेरी की संभावना नहीं है। कमेटी ने यह भी कहा है कि कर्मचारियों की नियुक्तियाँ और अन्य प्रशासनिक कार्य भी पूरी पारदर्शिता के साथ किए जाते हैं।
कब-कब विवादों में रही सालार मसूद दरगाह?
बहराइच की सालार मसूद दरगाह पिछले कुछ वर्षों में कई बार विवादों में रही है। 2025 में दरगाह में लगने वाले जेठ मेले और उर्स को लेकर भी बड़ा विवाद खड़ा हुआ, जब बहराइच प्रशासन ने कानून-व्यवस्था के मद्देनजर मेले की अनुमति देने से इनकार कर दिया। इसके बाद मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुँचा और कई दिनों तक राजनीतिक व सामाजिक बहस का विषय बना रहा।
जून 2026 में एक नया विवाद तब सामने आया, जब प्रदेश सरकार के मंत्री अनिल राजभर ने दरगाह परिसर का भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से सर्वे कराने की माँग की। उनका कहना था कि दरगाह के ऐतिहासिक और पुरातात्विक पहलुओं की जाँच होनी चाहिए।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र परीक्षाओं में गड़बड़ी के नाम पर शुरू हुआ प्रदर्शन अब पूरी तरह राजनीतिक अखाड़े में तब्दील हो चुका है। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर अभिजीत दिपके और उनकी संस्था ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) पर शनिवार (20 जून 2026) को तय समय सीमा समाप्त होने के बाद भी जबरन सड़क रोकने और दिल्ली पुलिस के खिलाफ दुष्प्रचार करने के गंभीर आरोप लगे हैं। दिल्ली पुलिस ने नियम के मुताबिक शाम को अनुमति खत्म होने पर प्रदर्शनकारियों को शांति से हटने को कहा था, लेकिन दिपके और उनके साथियों ने वहां से हटने के बजाय सोशल मीडिया पर ‘विक्टिम कार्ड’ खेलना शुरू कर दिया।
प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने रात में उनकी बिजली काट दी और पानी-टॉयलेट की सुविधाएँ बंद कर दीं, जिसे बाद में बहाल कर दिया गया। हद तो तब हो गई जब अभिजीत दिपके ने सोशल मीडिया पर वीडियो और पोस्ट डालकर जनता को उकसाते हुए कहा, “पुलिस मुझे गिरफ्तार करने वाली है। मैं आप सभी से अपील करता हूँ कि अगर मुझे गिरफ्तार भी कर लिया जाए, तब भी देश भर में यह शांतिपूर्ण प्रदर्शन रुकना नहीं चाहिए!” दिल्ली पुलिस ने साफ किया है कि उनकी तरफ से कोई बल प्रयोग या शारीरिक कार्रवाई नहीं की गई है, बल्कि केवल कानून का पालन करने की हिदायत दी गई थी।
जानकारों का मानना है कि यह दिल्ली पुलिस के खिलाफ एक सोची-समझी ‘डॉग व्हिसलिंग’ (भीड़ को उकसाने की नीति) है, ताकि पुलिस को बल प्रयोग के लिए मजबूर किया जा सके। इस फ्लॉप शो को हिट बनाने के लिए अब इसमें परीक्षाओं के मूल मुद्दे को भटकाकर ‘मेरा लिंग, मेरी मर्जी’ और पुरुषों के साड़ी पहनने जैसे अजीबोगरीब वामपंथी एजेंडे शामिल कर लिए गए हैं।
यह रणनीति ठीक वैसी ही है जैसी अतीत में किसान आंदोलन के दौरान लाल किले की हिंसा और साल 2020 के दिल्ली दंगों से पहले अपनाई गई थी, जहाँ अफवाहें फैलाकर पुलिसकर्मियों पर जानलेवा हमले किए गए थे। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद जंतर-मंतर पर टेंट गाड़ने और सड़कों को अनिश्चितकाल के लिए ब्लॉक करने की इस जिद के सामने दिल्ली पुलिस ने गजब के संयम और पेशेवर रवैये का परिचय दिया है। आइए, इस पूरे मामले को विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं।
दिल्ली पुलिस का बेमिसाल संयम Vs अभिजीत दिपके का खतरनाक विक्टिम कार्ड
दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर से लेकर सोशल मीडिया के डिजिटल प्लेटफॉर्म्स तक, पिछले कुछ दिनों से एक बेहद सोची-समझी स्क्रिप्ट को अमलीजामा पहनाने की कोशिश की जा रही है। यह स्क्रिप्ट कोई नई नहीं है, बल्कि देश ने इसे पहले भी कई आंदोलनों के दौरान बार-बार देखा है। इस खेल का सीधा सा नियम है- पहले किसी मुद्दे के नाम पर प्रदर्शन की अनुमति माँगो, प्रशासन जब सहयोग करते हुए अनुमति दे दे तो चुपचाप प्रदर्शन करो, लेकिन जैसे ही अनुमति का निर्धारित समय समाप्त हो जाए, तो वहाँ से हटने के बजाय वहीं पर खूँटा गाड़कर बैठ जाओ। इसके बाद जब पुलिस कानून के दायरे में रहकर आपको वहाँ से हटने की हिदायत दे, तो तुरंत मोबाइल का कैमरा ऑन करो, चेहरे पर लाचारी का भाव लाओ और सोशल मीडिया पर ‘विक्टिम कार्ड’ खेलते हुए अफवाहें फैलाना शुरू कर दो।
इस बार इस पूरी पटकथा के मुख्य सूत्रधार बने हैं सोशल मीडिया के जरिए अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रहे अभिजीत दिपके। इस पूरे ड्रामे के बीच जो सबसे बड़ा सच दबाने की कोशिश की जा रही है, वो यह है कि दिल्ली पुलिस ने पूरे मामले में रत्ती भर भी कुछ गलत नहीं किया है। पुलिस ने तो प्रदर्शनकारियों को पूरा सहयोग दिया, लेकिन दिपके और उनके साथी जानबूझकर कानून व्यवस्था को ऐसी स्थिति में धकेलना चाहते हैं जहाँ पुलिस को मजबूरन बल प्रयोग करना पड़े और इन्हें अपनी फ्लॉप हो चुकी राजनीति को चमकाने का एक नया बहाना मिल जाए।
नियमों को ठेंगा और जंतर-मंतर को पिकनिक स्पॉट बनाने की सोची-समझी जिद
हमारा देश और इसकी व्यवस्था किसी एक व्यक्ति की सनक से नहीं, बल्कि स्थापित कानूनों और नियमों से चलती है। दिल्ली का जंतर-मंतर भले ही देश में विरोध प्रदर्शनों का एक प्रमुख केंद्र रहा हो, लेकिन वहाँ किसी भी आयोजन के लिए दिल्ली पुलिस और स्थानीय प्रशासन से एक निश्चित समय सीमा तक की लिखित अनुमति लेनी अनिवार्य होती है।
अभिजीत दिपके की संस्था ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को भी इसी नियम के तहत जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की बकायदा अनुमति दी गई थी। उन्होंने दिनभर वहाँ अपना कार्यक्रम किया भी, लेकिन असली तमाशा तब शुरू हुआ जब अनुमति का समय समाप्त हो गया। जैसे ही शाम को तय वक्त खत्म हुआ, पुलिस ने एक बेहद सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत उन्हें शांतिपूर्वक वहाँ से जाने के लिए कहा।
यह एक ऐसा नियम है जो देश के हर आम और खास नागरिक पर समान रूप से लागू होता है। मगर दिपके ने कानून का सम्मान करने के बजाय वहाँ से हटने से साफ इनकार कर दिया और सोशल मीडिया को अपना नया हथियार बना लिया। उन्होंने इंटरनेट पर यह दुष्प्रचार शुरू कर दिया कि प्रशासन ने उनकी बिजली काट दी है और पानी-टॉयलेट की सुविधाएँ बंद कर दी हैं, जबकि हकीकत यह थी कि सुरक्षा और कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए कुछ समय की प्रशासनिक मुस्तैदी के बाद सभी आवश्यक नागरिक सुविधाएँ बहाल थीं।
सोचने वाली बात यह है कि जब आपके पास उस जगह पर रुकने की कोई कानूनी वैधता ही नहीं बची, तो आप वहाँ जबरन क्यों डटे हुए हैं? दिपके और उनके मुट्ठी भर साथी अब जंतर-मंतर की उस संवेदनशील सड़क पर क्रिकेट खेल रहे हैं। यह दृश्य अपने आप में हास्यास्पद और गंभीर दोनों है। क्या जंतर-मंतर जैसी संवेदनशील जगह प्रदर्शन के लिए है या उसे किसी पिकनिक स्पॉट या खेल के मैदान में तब्दील कर दिया जाना चाहिए?
असल में प्रदर्शनकारियों की तरफ से यह दलील देना कि “अगर हमें जंतर-मंतर से हटाना है तो प्रदर्शन के लिए कोई स्थायी जगह दो” ये कुछ और नहीं बल्कि वहाँ अवैध रूप से टेंट गाड़ने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। यह ठीक उसी पुराने ढर्रे पर चल रहा है जो कभी अन्ना आंदोलन के शुरुआती दिनों में देखा गया था, जहाँ शुरुआत में प्रशासन प्रदर्शनकारियों को नजरअंदाज करता है, फिर वह जगह एक पिकनिक स्पॉट में बदलती है और देखते ही देखते वहाँ पक्के तंबू तन जाते हैं। इसके बाद धीरे-धीरे वामपंथी विचारधारा के सेलिब्रिटी, विपक्ष के तमाम बड़े नेता और खास एजेंडे वाले चेहरे वहाँ अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकने और कैमरे के सामने फोटो खिंचवाने पहुँचने लगते हैं ताकि किसी न किसी बहाने यह पूरा तमाशा राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में बना रहे।
झूठी गिरफ्तारी का खौफ पैदा कर दिल्ली पुलिस के खिलाफ डॉग व्हिसलिंग का खेल
अभिजीत दिपके ने हद तो तब कर दी जब उन्होंने सोशल मीडिया पर बाकायदा एक भावुक पोस्ट साझा करते हुए लिखा कि पुलिस उन्हें किसी भी वक्त गिरफ्तार करने वाली है। उन्होंने अपने समर्थकों से अपील कर डाली कि अगर वे गिरफ्तार भी हो जाएँ, तो देशव्यापी शांतिपूर्ण प्रदर्शन थमना नहीं चाहिए।
Police is about to arrest me. I appeal to you to not stop this peaceful protest nationwide even if I am arrested! pic.twitter.com/P7ljEJkCzP
अब इस पूरे बयान के पीछे छिपी क्रूर सच्चाई को समझिए। दिल्ली पुलिस ने दिपके या उनके साथियों पर न तो कोई लाठी चलाई, न ही उन्हें शारीरिक रूप से वहाँ से घसीटकर हटाया। पुलिस के जवान बेहद शालीनता से कानून का पालन करने की अपील कर रहे थे, लेकिन दिपके इस बात को बखूबी जानते हैं कि जब तक वे खुद को एक ‘बेचारे’ और ‘सताए हुए’ एक्टिविस्ट के रूप में पेश नहीं करेंगे, तब तक उन्हें सोशल मीडिया पर लाइक्स, शेयर्स और री-ट्वीट्स की वो अटेंशन नहीं मिलेगी जिसके वो भूखे हैं।
यह पूरी कवायद सीधे तौर पर दिल्ली पुलिस के खिलाफ ‘डॉग व्हिसलिंग’ यानी इशारों-इशारों में अपनी हिंसक भीड़ को उकसाने की एक बेहद खतरनाक कोशिश है। जब आप अपने मंच से यह झूठ फैलाते हैं कि पुलिस आपके खिलाफ दमनकारी नीति अपना रही है और आपको जेल में डालने वाली है, तो आप अनजाने में नहीं, बल्कि जानबूझकर अपने समर्थकों के दिलों में कानून के रखवालों के प्रति नफरत और गुस्से का जहर घोल रहे होते हैं। आप उस भीड़ को इस बात के लिए तैयार कर रहे होते हैं कि वे पुलिसकर्मियों को अपना दुश्मन समझें और उन पर हमला कर दें। इतिहास गवाह है कि इस तरह की गैर-जिम्मेदाराना बयानबाजी और अफवाहों का अंत हमेशा बेहद हिंसक और दुखद रहा है।
अतीत के खूनी सबक और उकसावे की राजनीति का भुक्तभोगी इतिहास
जब हम दिपके की इस उकसावे वाली रणनीति को देखते हैं, तो हमें अतीत की उन दो बड़ी और भयावह घटनाओं को कभी नहीं भूलना चाहिए जिन्होंने दिल्ली को हिलाकर रख दिया था। सबसे पहला उदाहरण है किसान आंदोलन के नाम पर हुई लाल किले की हिंसा। उस आंदोलन के दौरान भी प्रदर्शनकारियों ने महीनों तक दिल्ली की सीमाओं को बंधक बनाए रखा, सड़कों पर तंबू गाड़े और अपनी समानांतर व्यवस्था खड़ी कर ली। दिल्ली पुलिस ने महीनों तक असीम धैर्य का परिचय दिया, लेकिन आंदोलन के तथाकथित नेताओं और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स ने लगातार यह झूठ फैलाया कि सरकार और पुलिस किसानों को कुचलना चाहती है।
इस उकसावे का अंतिम परिणाम देश ने 26 जनवरी के पावन दिन देखा, जब दिल्ली की सड़कों पर सरेआम तलवारें लहराई गईं, बैरिकेड्स तोड़े गए और लाल किले की प्राचीर पर चढ़कर देश के तिरंगे का अपमान करते हुए एक धार्मिक ध्वज फहरा दिया गया। उस दिन सैकड़ों पुलिसकर्मियों को ट्रैक्टरों से कुचलने का प्रयास किया गया, उन्हें ऊँचाइयों से नीचे खाई में धकेल दिया गया, लेकिन पुलिस ने तब भी संयम नहीं खोया।
ठीक ऐसा ही खूनी खेल साल 2020 के दिल्ली दंगों के दौरान भी खेला गया था। नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध की आड़ में शाहीन बाग जैसी जगहों पर सड़कें रोकी गईं और इंटरनेट पर यह अफवाहें फैलाई गईं कि पुलिस एक खास समुदाय को निशाना बना रही है। मंचों से भड़काऊ और जहरीले भाषण दिए गए जिसका नतीजा उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भीषण हिंदू विरोधी दंगों के रूप में सामने आया।
उस हिंसा में पेट्रोल बमों और अवैध हथियारों से पूरी दिल्ली को दहला दिया गया, जिसमें दिल्ली पुलिस के हेड कांस्टेबल रतन लाल की बेरहमी से हत्या कर दी गई और आईबी अधिकारी अंकित शर्मा के शरीर पर चाकुओं के अनगिनत घाव कर उनकी लाश को नाले में फेंक दिया गया।
यह दोनों ऐतिहासिक उदाहरण इस बात के गवाह हैं कि जब-जब दिपके जैसे लोग पुलिस के खिलाफ अफवाहें फैलाकर जनता को उकसाते हैं, तब-तब उसका खामियाजा सड़क पर खड़े आम पुलिस के जवानों को अपनी जान देकर चुकाना पड़ता है।
फ्लॉप शो को हिट बनाने का आखिरी पैंतरा और भटकता हुआ एजेंडा
दरअसल, अभिजीत दिपके और उनके सहयोगियों की असली हताशा और बौखलाहट इस बात से पैदा हो रही है कि उनका यह पूरा आंदोलन जनता के बीच बुरी तरह ‘फ्लॉप’ साबित हुआ है। इस आंदोलन की शुरुआत में रणनीतिकारों को यह पूरी उम्मीद थी कि दिल्ली पुलिस पहले ही दिन जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार कर देगी, जिससे उन्हें तुरंत हंगामा करने, खुद को पीड़ित दिखाने और मीडिया की सुर्खियाँ बटोरने का मौका मिल जाएगा।
लेकिन दिल्ली पुलिस ने बेहद समझदारी दिखाते हुए उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया और उन्हें नियमपूर्वक प्रदर्शन करने की इजाजत दे दी, जिसके कारण उनका पहला प्रदर्शन पूरी तरह बेअसर रहा। इसके बाद उन्होंने लखनऊ, पुणे, नागपुर और जयपुर जैसे अन्य बड़े शहरों में भी इस तरह के प्रदर्शन आयोजित करने की कोशिश की, लेकिन देश के जागरूक युवाओं और आम जनता ने इस नौटंकी को पूरी तरह खारिज कर दिया।
जब दिपके ने देखा कि छात्र आंदोलन और परीक्षाओं की पारदर्शिता के नाम पर शुरू हुआ यह तमाशा पूरी तरह बिखर रहा है, तो उन्होंने इस आंदोलन के मूल मुद्दे को ही बदल दिया। जो प्रदर्शन देश के छात्रों की परीक्षाओं और उनके भविष्य को लेकर शुरू हुआ था, उसमें अचानक ‘मेरा लिंग, मेरी मर्जी’, ‘मेरा जेंडर, मेरी मर्जी’ और पुरुषों के साड़ी पहनने जैसे बेहद अजीबोगरीब और भटकाने वाले वामपंथी एजेंडे शामिल कर लिए गए।
CJP का विरोध प्रदर्शन तो परीक्षाओं के बारे में था। 🤡🤡🤡
अब, यह पुरुषों के साड़ी पहनने और महिलाओं के इच्छा अनुसार वॉशरूम में जाने को लेकर हो गया है 😂😂 pic.twitter.com/n1urT7vDFu
— अजय प्रताप सिंह (Ajay) (@iAjaySengar) June 21, 2026
जब देश के आम छात्रों ने देखा कि उनके नाम पर कुछ लोग अपनी व्यक्तिगत और वैचारिक राजनीति चमका रहे हैं, तो उन्होंने इस आंदोलन से पूरी तरह दूरी बना ली। अब जब इस आंदोलन के पास न तो भीड़ बची है और न ही जनता का समर्थन, तो इनके पास सिर्फ एक ही आखिरी पैंतरा बचा है कि जैसे भी हो, पुलिस को उकसाकर बल प्रयोग करने पर मजबूर किया जाए ताकि गिरती हुई राजनीतिक साख को दोबारा जिंदा किया जा सके।
क्या दिल्ली पुलिस इस राजनीतिक चक्रव्यूह को भेदने के लिए तैयार है?
यह पूरा मामला अब किसी कानून व्यवस्था की समस्या से ज्यादा एक विशुद्ध राजनीतिक मसला बन चुका है। देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं कि कोई भी व्यक्ति या समूह विरोध प्रदर्शन के अधिकार के नाम पर सार्वजनिक सड़कों, फुटपाथों या सरकारी जगहों को अनिश्चितकाल के लिए ब्लॉक नहीं कर सकता।
कानून के मुताबिक, यदि कोई प्रदर्शनकारी समय सीमा खत्म होने के बाद भी स्वेच्छा से उस जगह को खाली नहीं करता है, तो प्रशासन के पास कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए हल्का बल प्रयोग करने का पूरा अधिकार है।
लेकिन दिल्ली पुलिस अभिजीत दिपके के इस चक्रव्यूह और उनकी गहरी साजिश को अच्छी तरह समझती है। पुलिस जानती है कि दिपके और उनके साथी इसी ताक में बैठे हैं कि कब कोई पुलिसकर्मी उन पर हाथ उठाए या लाठी चलाए, और कब वे उस फुटेज को दुनिया भर में दिखाकर खुद को लोकतंत्र का सिपाही घोषित कर सकें।
यही वजह है कि दिल्ली पुलिस ने गजब के धैर्य, पेशेवर रवैये और प्रशासनिक सहयोग का परिचय दिया है। पुलिस ने बिना किसी बल प्रयोग के केवल संवाद और कानून के दायरे में रहकर स्थिति को संभाला है। अब देश के युवाओं और जागरूक नागरिकों को यह तय करना होगा कि क्या वे सोशल मीडिया पर बैठकर देश में अराजकता फैलाने वाले ऐसे फ्लॉप नेताओं के भड़काऊ वीडियो के बहकावे में आएँगे या फिर धरातल पर मुस्तैदी से अपनी ड्यूटी कर रही दिल्ली पुलिस के इस बेमिसाल संयम और सच का साथ देंगे।
जैसा कि 20 जून 2026 को दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर विवादित NEET मुद्दे पर नए विरोध प्रदर्शनों का केंद्र बन गया, तो इसी बीच ऑपइंडिया ने अमेरिका में रहने वाले सोशल मीडिया ‘एक्टिविस्ट’ की प्रदर्शनों में छाप का पता लगाया। इसमें पता चला कि उसका असर सिर्फ डिजिटल दुनिया तक ही सीमित नहीं था बल्कि दिल्ली की सड़कों तक भी फैला हुआ था।
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का यह प्रदर्शन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और सरकार के खिलाफ NEET से जुड़ी शिकायतों को लेकर युवाओं के मुद्दों पर केंद्रित कर एक आंदोलन की तरह पेश किया गया। लेकिन ग्राउंड रिपोर्टिंग में ऐसे सबूत मिले कि इस आंदोलन को ऐसे लोग हवा दे रहे थे जिनका इसमें कोई सीधा मतलब भी नहीं निकलता था औऱ हजारों मील दूर से युवाओं को उकसा रहे थे।
ऐसा ही एक व्यक्ति उस्मान फैजान अली का नाम सामने आया, जो अमेरिका में रहता है और खुद को सोशल मीडिया एक्टिविस्ट बताता है। वह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के जरिए भारतीय युवाओं को भड़काने, उन्हें संगठित करने और अधिकारियों के साथ टकराव के लिए भावनात्मक रूप से प्रेरित करने का काम कर रहा था।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान कई लोग ऐसे पोस्टर और प्लेकार्ड लिए हुए दिखाई दिए, जिन पर सोशल मीडिया कमेंटेटर ध्रुव राठी, एक्टिविस्ट अभिजीत दिपके और अभिनेत्री राखी सावंत की तस्वीरें लगी थीं। लेकिन इन पोस्टरों को ध्यान से देखने पर एक खास बात सामने आई। कई पोस्टरों पर एक दाढ़ी वाले व्यक्ति की तस्वीर भी प्रमुखता से छपी हुई थी, जिसकी पहचान ‘इंडियन उस्मान फैजान अली- फ्रॉम USA’ के रूप में की गई थी।
Who is Osman Ali, the man sitting in the US and provoking Indian youth toward unrest?
A protester reached Jantar Mantar carrying posters of Dhruv Rathee and Osman Faizan Ali.
इस खुलासे के बाद कई सवाल खड़े हो गए। सबसे बड़ा सवाल यह था कि जिस प्रदर्शन को छात्रों और स्थानीय कार्यकर्ताओं का आंदोलन बताया जा रहा था, उसमें विदेश में रहने वाले एक ‘एक्टिविस्ट’ की तस्वीर वाले पोस्टर आखिर क्यों दिखाई दे रहे थे? और उससे भी जरूरी बात यह है कि उन पोस्टरों को लेकर चल रहे लोगों में से कितने लोग वास्तव में जानते थे कि उस्मान फैजान अली कौन हैं?
जब ऑपइंडिया ने प्रदर्शन स्थल पर मौजूद कई प्रदर्शनकारियों से बात की, तो उनके जवाब चौंकाने वाले थे। कई लोगों ने माना कि उन्हें उस्मान फैजान अली के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। एक युवा प्रदर्शनकारी ने खुलकर बताया कि उसे यह पोस्टर आयोजकों की तरफ से दिया गया था और उसे यह भी नहीं पता था कि पोस्टर पर जिसकी तस्वीर लगी है, वह कौन है। अन्य प्रदर्शनकारियों से भी इसी तरह के जवाब मिले।
यह विरोधाभास एक व्यापक रणनीति की ओर इशारा करता है। अली किसी आंदोलन को स्वाभाविक रूप से खड़ा करने के बजाए उसे हाईजैक करने की कोशिश करते दिख रहे हैं, आक्रोश पैदा कर रहे हैं और जमीनी स्तर पर आसानी से प्रभावित होने वाले युवाओं को सुनियोजित प्रचार सामग्री वितरित करके जनता के गुस्से को निर्देशित कर रहे हैं।
उनकी सोशल मीडिया गतिविधियों पर नजर डालने से भी ऐसा ही पैटर्न दिखाई देता है। उस्मान अली मुख्य रूप से @bbm_india_ नाम के इंस्टाग्राम अकाउंट के जरिए सक्रिय हैं और पिछले कई हफ्तों से CJP के प्रदर्शनों से जुड़ी बेहद भावनात्मक और उग्र कंटेन्ट साझा कर रहे हैं। उस्मान के वीडियो सिर्फ प्रदर्शनकारियों का समर्थन करने तक सीमित नहीं हैं। इनमें बार-बार यह माहौल बनाने की कोशिश की जाती है कि यह आंदोलन नाराज युवाओं और भारतीय सरकार के बीच एक बड़ी लड़ाई है।
उस्मान के कंटेंट में भावनात्मक भाषा, आक्रामक संदेश और युवाओं को यह विश्वास दिलाने की कोशिश बार-बार दिखाई देती है कि वे किसी ऐतिहासिक आंदोलन का हिस्सा हैं। इसका उद्देश्य साफ नजर आता है। किसी सार्वजनिक मुद्दे को लेकर लोगों की नाराजगी को बड़े पैमाने पर ऐसे आंदोलन में बदलना, जो गुस्से और टकराव से प्रेरित हो।
इसका एक प्रमुख उदाहरण 1 जून 2026 को देखने को मिला, जब उस्मान अली ने दिल्ली पुलिस को संबोधित करते हुए एक वीडियो पोस्ट किया। इस वीडियो में शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अपील करने के बजाय चेतावनी जैसा लहजा दिखाई दिया। उन्होंने दिल्ली पुलिस से कहा कि CJP कार्यकर्ताओं और अभिजीत दिपके के समर्थकों को जंतर-मंतर पर जुटने की अनुमति देने से पहले बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया जाए।
वीडियो में उन्होंने बार-बार लोगों की ऐसी ‘सुनामी’ आने की बात कही, जिसे रोकना या नियंत्रित करना अधिकारियों के लिए मुश्किल होगा। उस्मान अली के बयान में यह संदेश देने की कोशिश दिखाई दी कि भीड़ इतनी बड़ी होगी कि प्रशासन के किसी भी प्रयास को पीछे छोड़ सकती है।
यहाँ उस्मान की भाषा काफी ध्यान देने वाली थी। शांतिपूर्ण और कानूनी तरीके से लोकतांत्रिक भागीदारी को बढ़ावा देने के बजाय, उस्मान अली ऐसा माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है कि जिससे टकराव पैदा हो। CJP के समर्थकों तक यह संदेश पहुँचाने की कोशिश की गई कि वे एक ऐसी ताकत का हिस्सा हैं जो सरकार को चुनौती देने की क्षमता रखती है।
इस तरह की भावनात्मक और आक्रामक भाषा का इस्तेमाल अक्सर वे लोग करते हैं जो भीड़ को भावनात्मक रूप से भड़काना चाहते हैं और समर्थकों को धीरे-धीरे अधिक आक्रामक रवैया अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं।
स्थिति को और गंभीर बनाने वाली बात यह है कि ये संदेश विदेश में बैठे एक व्यक्ति की ओर से दिए जा रहे थे। एक तरफ भारतीय युवाओं को सड़कों पर उतरने, पुलिस कार्रवाई का सामना करने और कानूनी जोखिम उठाने के लिए प्रेरित किया जा रहा था, वहीं दूसरी तरफ इन संदेशों को देने वाला व्यक्ति खुद विदेश में सुरक्षित माहौल में मौजूद था और किसी भी संभावित परिणाम से दूर था।
उस्मान अली का चिट्ठा सिर्फ इतना ही नहीं है। जब से CJP को सोशल मीडिया पर पहचान और समर्थन मिलने लगा, तब से वह ‘कॉकरोचेज’ को संगठित और सक्रिय करने के लिए लगातार ऐसे भड़काऊ पोस्ट साझा कर रहा है। बीते दिन भी उस्मान ने एक नया वीडियो पोस्ट किया, जिसमें जमीन पर चल रही घटनाओं को प्रभावित करने की कोशिश दिखाई दी। इस बार उन्होंने सार्वजनिक रूप से दिल्ली पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों से प्रदर्शन की अनुमति देने की अपील की। हालाँकि इस अपील के साथ एक अप्रत्यक्ष चेतावनी जैसा संदेश भी जुड़ा हुआ था।
वीडियो में बार-बार यह संकेत दिया गया कि अगर प्रदर्शनकारियों को रोका गया, तो इससे अशांति और अस्थिरता की स्थिति पैदा हो सकती है। इस तरह के संदेशों के जरिए उस्मान ने प्रशासन पर दबाव बनाने और समर्थकों के बीच तनावपूर्ण माहौल तैयार करने की कोशिश की।
यह अली का ऐसा तरीका है जिससे वह खुद को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराए जाने से बचा लेता है, लेकिन लोगों की भावनाओं को भड़काता भी रहता है। वह खुलकर हिंसा की बात नहीं करता, लेकिन बार-बार ऐसा माहौल बनाता है कि अगर प्रशासन कोई कार्रवाई करेगा तो टकराव होना तय है। इसका असर यह होता है कि लोगों में तनाव बढ़ता है, पुलिस और प्रशासन पर भरोसा कम होता है और उसके समर्थक हर सरकारी कार्रवाई को अपने ऊपर अत्याचार की तरह देखने लगते हैं। और यह सब वह अमेरिका में बैठकर कर रहा है, जबकि खुद को भारत में लोकतंत्र बचाने की लड़ाई लड़ने वाला बताता है।
अली की सोशल मीडिया गतिविधियों को देखने पर लगता है कि यह कोई एक-दो बार की बात नहीं है, बल्कि काफी समय से चला आ रहा उसका तरीका है। उसके सोशल मीडिया अकाउंट्स पर ज्यादातर पोस्ट लोगों के गुस्से को बढ़ाने, विपक्षी विचारों को ज्यादा से ज्यादा फैलाने और राजनीतिक मतभेदों को संघर्ष और विरोध की नजर से दिखाने पर केंद्रित रहती हैं।
उसका यूट्यूब चैनल “Button Ballot Movement by Osman Faizan Ali” भी उसके राजनीतिक मकसदों की झलक देता है। हालाँकि आज यह चैनल ज्यादा सक्रिय नहीं है, लेकिन पुराने वीडियो और सामग्री से पता चलता है कि वह लंबे समय से विदेश में रहते हुए भी भारतीय राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश करता रहा है।
13 मई 2024 को अपलोड की गई एक ऑडियो रिकॉर्डिंग में उस्मान अली ने हैदराबाद और सिकंदराबाद के मतदाताओं से सीधे अपील की थी। इस रिकॉर्डिंग में उसने लोगों से कहा कि वे रणनीतिक तरीके से AIMIM और कॉन्ग्रेस उम्मीदवारों को वोट दें, ताकि भाजपा को हराया जा सके। उसके संदेश का फोकस किसी खास नीति, योजना या विकास के मुद्दे पर नहीं था, बल्कि एक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को संगठित वोटिंग के जरिए हराने पर था।
यह ऑडियो रिकॉर्डिंग दिखाती है कि उस्मान अली का ‘एक्टिविज्म’ केवल छात्र मुद्दों या सामाजिक अभियानों तक सीमित नहीं हैं। इसके बजाय यह एक ऐसे पैटर्न की ओर इशारा करती है, जिसमें वह विदेश में रहते हुए भारत की राजनीतिक बहस और चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की कोशिश करते दिखाई देते हैं।
आज के समय में उस्मान का CJP के प्रति समर्थन किसी पुराने वैचारिक जुड़ाव या लंबे समय से चली आ रही प्रतिबद्धता का परिणाम नहीं लगता। बल्कि ऐसा प्रतीत होता है कि वह युवाओं के एक वर्ग के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहे इस वायरल इंटरनेट ट्रेंड का फायदा उठाने की कोशिश कर रहा है। समय और हालात के साथ उसकी राजनीतिक स्थिति और रुख भी बदलते रहे हैं।
जैसा कि 2024 में देखा गया था, उस्मान अली हैदराबाद और सिकंदराबाद के मतदाताओं से AIMIM और कॉन्ग्रेस उम्मीदवारों का समर्थन करने की खुलकर अपील कर रहे थे, ताकि भाजपा को हराया जा सके। ऐसे में CJP के प्रति उनका मौजूदा समर्थन किसी ठोस वैचारिक प्रतिबद्धता से अधिक राजनीतिक अवसरवाद जैसा प्रतीत होता है। ऐसा लगता है कि उसकी सक्रियता किसी तय विचारधारा या सिद्धांतों पर आधारित नहीं है। बल्कि वह उन आंदोलनों और मुद्दों के साथ जुड़ता दिखाई देता है, जिनसे उसे सबसे ज्यादा लोगों का ध्यान और समर्थन मिलने की संभावना होती है। 2024 तक अली AIMIM और कॉन्ग्रेस के समर्थन में प्रचार कर रहा था और भाजपा को चुनावी तौर पर चुनौती देने की बात कर रहा था। वहीं आज वह CJP के नेतृत्व वाले आंदोलन का खुलकर समर्थन करता नजर आ रहा है।
जंतर-मंतर पर हुई घटनाओं से पता चलता है कि सोशल मीडिया ने राजनीतिक लामबंदी के तरीके को कैसे बदल दिया है। पहले विरोध प्रदर्शनों का संचालन मुख्य रूप से जमीन पर मौजूद लोग करते थे और वे अपने कामों के लिए जवाबदेह होते थे। लेकिन आज, हज़ारों किलोमीटर दूर बैठे एक्टिविस्ट एक बटन दबाकर नैरेटिव बना सकते हैं, प्रोपेगैंडा तैयार कर सकते हैं, कैंपेन का मैटीरियल बाँट सकते हैं और बड़ी भीड़ के व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं।
इस मामले की सबसे चिंताजनक बात यह है कि जिन युवाओं को निशाना बनाया जा रहा है, उनमें से कई को पूरी जानकारी भी नहीं है। जंतर-मंतर पर उस्मान अली के पोस्टर लेकर चल रहे कई प्रदर्शनकारियों को यह तक नहीं पता था कि वह कौन हैं। इसके बावजूद वे अनजाने में उस्मान की छवि और संदेश को आगे बढ़ाने का काम कर रहे थे।
इसी वजह से कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं। कितने युवा ऐसे कंटेंट को देख रहे हैं, बिना यह समझे कि उसके पीछे की मंशा क्या है? कितनों को संस्थाओं के साथ टकराव को एक सकारात्मक या वांछनीय परिणाम के रूप में देखने के लिए प्रेरित किया जा रहा है? और कितने लोग यह समझते हैं कि उन्हें जोखिम उठाने के लिए प्रोत्साहित करने वाले लोग अक्सर खुद उन परिणामों का सामना नहीं करते?
जंतर-मंतर का यह प्रदर्शन एक नए तरह की राजनीति की तस्वीर दिखाता है, जहाँ विदेश में बैठे सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर स्थानीय मुद्दों और लोगों की नाराजगी का इस्तेमाल अपने बड़े राजनीतिक मकसदों के लिए करने की कोशिश करते हैं। लगातार भड़काऊ कंटेंट दिखाकर, सरकारी संस्थाओं को दुश्मन की तरह पेश करके और प्रदर्शनों को सरकार के साथ सीधी लड़ाई बताकर, उस्मान फैजान अली जैसे लोग लोगों की नाराजगी को संगठित विरोध में बदलने की कोशिश करते हैं।
जबकि धरने-प्रदर्शन में शामिल लोगों को गिरफ्तारी, कानूनी कार्रवाई या हालात बिगड़ने पर हिंसा जैसी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है, वहीं विदेश में बैठकर लोगों को उकसाने वाले लोग इन खतरों से दूर रहते हैं। ऐसे में जोखिम युवाओं को उठाना पड़ता है, जबकि पहचान और राजनीतिक फायदा सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों को मिलता है।
इसलिए जंतर-मंतर प्रदर्शन में उस्मान फैजान अली की तस्वीर का प्रमुखता से दिखना सिर्फ एक सामान्य बात नहीं है। यह दिखाता है कि विदेश में बैठा एक सोशल मीडिया एक्टिविस्ट किस तरह भारत के एक आंदोलन से खुद को जोड़ने, युवाओं में गुस्सा बढ़ाने और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए उन्हें टकराव की ओर धकेलने की कोशिश कर रहा है।
यह घटना याद दिलाती है कि सोशल मीडिया के दौर में राजनीतिक हलचल सिर्फ सड़कों पर मौजूद लोगों से नहीं बनती। अब ऐसे लोग भी उस पर असर डाल रहे हैं, जो हजारों किलोमीटर दूर बैठे हैं, लेकिन इंटरनेट के जरिए लोगों को प्रभावित करने, संगठित करने और आंदोलनों को दिशा देने की कोशिश कर रहे हैं।
(मूलरूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)
कुछ किताबें अपने समय की कहानी कहती हैं। कुछ किताबें अपने समाज का दस्तावेज़ बन जाती हैं। और कुछ किताबें ऐसी होती हैं जो समय और भूगोल दोनों को पार कर जाती हैं। वे मनुष्य के स्वभाव को समझने की चाबी बन जाती हैं।
इवान तुर्गनेव का 1862 में प्रकाशित उपन्यास Fathers and Sons ऐसी ही एक कृति है। पहली नज़र में यह रूस के एक विशेष ऐतिहासिक दौर की कहानी लगती है। एक ऐसा रूस जो सामंतवाद से आधुनिकता की ओर बढ़ रहा था। जहाँ पुरानी अभिजात संस्कृति और नई वैज्ञानिक चेतना के बीच टकराव शुरू हो चुका था। लेकिन यदि आप इस उपन्यास को केवल रूस की कहानी समझते हैं तो आप इसकी सबसे बड़ी शक्ति को नहीं समझते।
क्योंकि यह पुस्तक वास्तव में किसी देश की ना होकर हर परिवार की कहानी है। यह पिता और पुत्र की कहानी है। यह परंपरा और आधुनिकता की कहानी है। यह उस क्षण की कहानी है जब एक पीढ़ी दुनिया को बदलना चाहती है और दूसरी पीढ़ी उसे बचाकर रखना चाहती है। और इसी कारण, फादर्स डे पर शायद Fathers and Sons से अधिक प्रासंगिक कोई उपन्यास नहीं हो सकता।
बाज़ारोव: वह युवक जो हर मूर्ति तोड़ देना चाहता था
उपन्यास का केंद्रीय पात्र येवगेनी बाज़ारोव है। रूसी साहित्य के इतिहास में शायद ही कोई पात्र इतना प्रभावशाली रहा हो। बाज़ारोव स्वयं को निहिलिस्ट कहता है। आज यह शब्द बहुत लोगों को केवल दार्शनिक अवधारणा जैसा लग सकता है, लेकिन तुर्गनेव के समय में इसका अर्थ था, हर उस चीज़ को नकार देना जिसे समाज पवित्र मानता है।
परंपरा? नकार दो। कला? बेकार। कविता? समय की बर्बादी। धर्म? अंधविश्वास। रोमांस? रासायनिक प्रतिक्रिया।
बाज़ारोव का सबसे प्रसिद्ध कथन है – “एक अच्छा केमिस्ट बीस कवियों से अधिक उपयोगी है।”
यह पूरी एक पीढ़ी का घोषणापत्र था। आज के भारत में भी हमें ऐसे बाज़ारोव हर जगह दिखाई देते हैं। वे सोशल मीडिया पर हैं। विश्वविद्यालयों में हैं। स्टार्टअप्स में हैं। वे हर स्थापित सत्य से प्रश्न पूछते हैं। वे कहते हैं कि यदि कोई परंपरा तर्क की कसौटी पर खरी नहीं उतरती तो उसे बचाए रखने का कोई कारण नहीं।
वे वंश, जाति, कुल, परंपरा, सामाजिक प्रतिष्ठा और सांस्कृतिक रूढ़ियों को चुनौती देते हैं। और ठीक वैसे ही जैसे उपन्यास में होता है, पुरानी पीढ़ी उन्हें अक्सर अहंकारी, विद्रोही या संस्कारहीन मानती है। लेकिन तुर्गनेव की महानता यह है कि वे बाज़ारोव का उपहास नहीं उड़ाते। वे उसके भीतर की ईमानदारी को पहचानते हैं। बाज़ारोव झूठ नहीं बोलता।
वह जो मानता है, उसी पर जीता है। समस्या उसके विचारों में नहीं, उसके पूर्ण आत्मविश्वास में है। उसे लगता है कि मनुष्य को पूरी तरह तर्क से समझा जा सकता है। और यहीं से उसकी त्रासदी शुरू होती है।
निकोलई: वह पिता जिसे इतिहास अक्सर भूल जाता है
उपन्यास के सबसे कम चर्चित लेकिन सबसे महत्वपूर्ण पात्रों में से एक हैं निकोलई किर्सानोव। वे कोई महान दार्शनिक नहीं हैं। कोई योद्धा नहीं हैं। कोई क्रांतिकारी नहीं हैं। वे केवल एक पिता हैं। और शायद इसी कारण इतने महत्वपूर्ण हैं। निकोलई उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं जो बदलती दुनिया को देखकर घबराती भी है और उसे स्वीकार भी करना चाहती है। वे अपने बेटे अर्कादी से प्रेम करते हैं। इतना प्रेम कि जब बेटा विश्वविद्यालय से लौटता है तो उनकी खुशी छिपाए नहीं छिपती। लेकिन उसी क्षण उन्हें यह भी महसूस होता है कि उनका बेटा अब पहले वाला नहीं रहा।
उसकी भाषा बदल गई है। उसके विचार बदल गए हैं। उसके आदर्श बदल गए हैं। आज का भारत ऐसे निकोलई से भरा पड़ा है। वे पिता जो अपने बच्चों को विदेश भेजते हैं। उनके लिए लैपटॉप खरीदते हैं। उन्हें अपनी पसंद का करियर चुनने देते हैं। लेकिन भीतर कहीं यह भय भी रहता है कि कहीं आधुनिकता की दौड़ में उनका बच्चा उनसे दूर न हो जाए।
निकोलई किसी विचारधारा का प्रतिनिधित्व नहीं करते। वे उस मौन प्रेम का प्रतिनिधित्व करते हैं जो पिता अक्सर व्यक्त नहीं कर पाते।
पावेल: परंपरा की आखिरी तलवार
यदि निकोलई उदार परंपरा हैं, तो पावेल किर्सानोव उसकी कठोरता हैं। वे सम्मान, मर्यादा, प्रतिष्ठा और शिष्टाचार की दुनिया से आते हैं। उनके लिए जीवन केवल उपयोगिता का प्रश्न नहीं है। उनके लिए कुछ मूल्य ऐसे हैं जिनकी रक्षा किसी भी कीमत पर होनी चाहिए।
जब बाज़ारोव इन मूल्यों का मज़ाक उड़ाता है तो पावेल इसे केवल वैचारिक असहमति नहीं मानते। उन्हें लगता है कि यह पूरी सभ्यता पर हमला है। यहीं से दोनों के बीच तनाव बढ़ता है। और अंततः यह तनाव उस प्रसिद्ध द्वंद्व युद्ध तक पहुँचता है।
वह द्वंद्व जो वास्तव में दो व्यक्तियों का नहीं था
Fathers and Sons का सबसे प्रतीकात्मक अध्याय है पावेल और बाज़ारोव का द्वंद्व। सतह पर यह दो व्यक्तियों की लड़ाई है। लेकिन वास्तव में यह दो युगों की लड़ाई है। एक तरफ वह दुनिया है जो सम्मान, संस्कृति और परंपरा में विश्वास करती है। दूसरी तरफ वह पीढ़ी है जो विज्ञान, प्रयोग और उपयोगिता को सर्वोच्च मानती है।
द्वंद्व में कोई महान विजय नहीं होती। कोई निर्णायक परिणाम नहीं निकलता।
और शायद यही तुर्गनेव का संदेश था। इतिहास में भी ऐसा ही होता है। पुरानी पीढ़ी नई को पूरी तरह हरा नहीं सकती। नई पीढ़ी पुरानी को पूरी तरह मिटा नहीं सकती। अंततः दोनों को साथ रहना पड़ता है। आज भारत में भी यही संघर्ष दिखाई देता है।
एक ओर वे लोग हैं जो मानते हैं कि हमारी सभ्यता की जड़ें ही हमारी शक्ति हैं। दूसरी ओर वे लोग हैं जो मानते हैं कि भविष्य केवल नवाचार और वैज्ञानिक सोच से बनेगा। लेकिन वास्तविक भारत इन दोनों के बीच कहीं खड़ा है।
ओडिंत्सोवा: जहाँ तर्क पहली बार हारता है
उपन्यास का सबसे सुंदर और सबसे मानवीय हिस्सा है बाज़ारोव और अन्ना ओडिंत्सोवा का संबंध। यहाँ पहली बार बाज़ारोव अपने ही सिद्धांतों से टकराता है। जिस व्यक्ति ने प्रेम को केवल जैविक प्रक्रिया कहा था, वही प्रेम में पड़ जाता है। जिस व्यक्ति ने भावनाओं को कमजोरी कहा था, वही भावनाओं के सामने असहाय हो जाता है।
ओडिंत्सोवा उसे अस्वीकार कर देती है। लेकिन असली चोट अस्वीकृति नहीं है। असली चोट यह है कि बाज़ारोव को पहली बार महसूस होता है कि वह उतना तार्किक नहीं है जितना वह समझता था।
यह साहित्य का एक कालजयी क्षण है। क्योंकि यह केवल बाज़ारोव की कहानी नहीं है। यह हम सबकी कहानी है। हम अपने बारे में अनेक सिद्धांत बनाते हैं। हमें लगता है कि हम पूरी तरह व्यावहारिक हैं। फिर जीवन में कोई व्यक्ति आता है और हमें पता चलता है कि हम उतने मजबूत नहीं हैं जितना हमने सोचा था।
बाज़ारोव की मृत्यु: उपन्यास का सबसे बड़ा पाठ
महान साहित्य अक्सर अपने अंतिम अध्यायों में अपनी सबसे बड़ी बात कहता है। बाज़ारोव किसी क्रांति में नहीं मरता। वह किसी युद्ध का नायक नहीं बनता। वह इतिहास बदलते हुए नहीं मरता। वह एक साधारण संक्रमण का शिकार होकर मर जाता है।
यह दृश्य पढ़ते समय पाठक को झटका लगता है। इतना विशाल व्यक्तित्व। इतने बड़े विचार। इतनी तीखी बुद्धि। और अंत? इतना साधारण? लेकिन तुर्गनेव यहीं अपना सबसे गहरा संदेश देते हैं।
मनुष्य विचारधाराओं से बड़ा नहीं होता। मृत्यु के सामने निहिलिज्म भी छोटा पड़ जाता है। अंतिम क्षणों में बाज़ारोव किसी दर्शन की बात नहीं करता। वह अपने माता-पिता को याद करता है। वह प्रेम को याद करता है। वह मनुष्य बन जाता है। यहीं उसका अहंकार टूटता है। और यहीं उसकी मानवता जन्म लेती है।
भारत के ड्राइंग रूम में आज भी जीवित है यह उपन्यास
यदि आप ध्यान से देखें तो Fathers and Sons आज के भारत में हर दिन घट रहा है। जब बेटा कहता है कि परंपरा को तर्क से परखा जाना चाहिए। जब पिता कहते हैं कि हर चीज़ किताबों से नहीं सीखी जा सकती। जब परिवार के भोजन की मेज़ पर राजनीति बहस बन जाती है। जब नई पीढ़ी व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बात करती है। जब पुरानी पीढ़ी सामाजिक जिम्मेदारी की। तब कहीं न कहीं तुर्गनेव का उपन्यास जीवित हो उठता है।
इस उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता यह नहीं कि यह आधुनिकता का समर्थन करता है। और न ही यह कि यह परंपरा की रक्षा करता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह संवाद का पक्ष लेता है। तुर्गनेव किसी को खलनायक नहीं बनाते। वे हमें बताते हैं कि हर पीढ़ी अधूरी है। युवाओं के पास ऊर्जा होती है, लेकिन अनुभव नहीं। बुजुर्गों के पास अनुभव होता है, लेकिन कभी-कभी परिवर्तन का साहस नहीं। समाज तब आगे बढ़ता है जब दोनों एक-दूसरे को सुनते हैं।
हर बाज़ारोव को एक निकोलई की आवश्यकता होती है
फादर्स डे पर Fathers and Sons पढ़ना केवल एक साहित्यिक अनुभव नहीं है। यह अपने परिवार को समझने का प्रयास है। यह अपने पिता को नए दृष्टिकोण से देखने का अवसर है। यह समझने का अवसर है कि जिन लोगों से हम कभी-कभी असहमत होते हैं, उन्हीं लोगों ने हमें दुनिया को चुनौती देने का साहस भी दिया है। तुर्गनेव अंततः हमें यही सिखाते हैं कि सभ्यताएँ केवल विचारों से नहीं बनतीं। वे संबंधों से बनती हैं।
तर्क आवश्यक है। लेकिन तर्क अकेला पर्याप्त नहीं। मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने के लिए प्रेम चाहिए। करुणा चाहिए। स्मृतियाँ चाहिए। और शायद एक पिता चाहिए, जो भले ही आपकी हर बात से सहमत न हो, लेकिन फिर भी आपके लौटने का इंतज़ार करता रहे।
क्योंकि हर घर में एक बाज़ारोव होता है। और हर बाज़ारोव की कहानी के पीछे कहीं न कहीं एक निकोलई खड़ा होता है। शांत, धैर्यवान, लगभग अदृश्य।
फीफा विश्व कप का जादू सिर चढ़कर बोल रहा है। हर दिन कुछ नया कारनामा हो रहा है। यह विश्व कप हमें नित कई शानदार मैच और कई खूबसूरत कहानियां दे रहा है। संपूर्ण विश्व से फुटबॉल के दीवाने तीनों मेजबान देशों (अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको) तक पहुँचे हैं। लग ही नहीं रहा कि यह दुनिया एक माह पूर्व निराशा से घिरी हुई थी। तीनों मेजबान देशों में तमाम जग से लोग पहुंचे हैं और साथ-साथ इस महाउत्सव का आनंद ले रहे हैं।
कल कई बेहतरीन मैच खेले गए। बीते दिनों में कनाडा और मेक्सिको शानदार जीत दर्ज कर अगले दौर में अपनी जगह सुनिश्चित कर ही चुके थे। अब बारी अमेरिकी टीम की थी। उनका सामना तुर्की के विरुद्ध एक बड़ा उलटफेर कर चुकी ऑस्ट्रेलिया से था।
सिएटल के स्टेडियम में मैच शुरू होता है। दोनों ही टीमें यह मैच जीत अगले दौर में जगह बनाना चाहती थीं। स्टेडियम में हजारों की संख्या में घरेलू समर्थकों की भीड़ अपनी टीम की हौसला-अफजाई के लिए तैयार थी और अमेरिकी टीम ने अपने घरेलू समर्थकों को बिल्कुल भी निराश नहीं किया। तिरेसठ प्रतिशत समय गेंद अपने नियंत्रण में रखते हुए अमेरिकी टीम ने 2-0 से यह मैच जीत, बाकी दोनों मेजबान देशों की ही भांति अगले दौर में जगह बना ली।
आगे, बोस्टन में स्कॉटलैंड का सामना मोरक्को की टीम से था, जहां एक दफा फिर इस्माइल सैबारी ने अपनी टीम के लिए एक बेहतरीन गोल दागकर न सिर्फ जरूरी जीत दिलाई, बल्कि ब्राजील के साथ अपने ग्रुप में अंकों के आधार पर बराबरी पर खड़ा कर दिया।
अगला मैच फिलाडेल्फिया में था, जहां ब्राजील की टीम हैती के विरुद्ध मैदान में उतरने जा रही थी। यह मैच बेहद शानदार रहा। ब्राजील 4-4-2 की फॉर्मेशन के साथ मैदान में उतरी। एक बेहद ही आक्रामक फुटबॉल खेलते हुए पहले हाफ में ही ब्राजील ने तीन गोल दाग दिए थे। माथियूस कुन्हा ने दो शानदार गोल किए व एक गोल विनीसियस जूनियर ने लगाया। हालाँकि, पहले हाफ में ब्राजील को एक झटका तब लगा, जब उनके स्टार खिलाड़ी राफिन्हा को चोटिल हो जाने के कारण बीच मैच में ही मैदान से बाहर जाना पड़ा। बाद में मेडिकल टेस्ट होने पर मालूम हुआ कि उन्हें हैमस्ट्रिंग इंजरी हो गई है।
मैच का दूसरा हाफ कमोबेश थोड़ा शांत ही रहा। ब्राजील ने और गोल करने के प्रयास तो किए, मगर उन्हें सफलता नहीं मिली। फॉरवर्ड लाइन में माथियूस कुन्हा व विनीसियस जूनियर ने बेहद शानदार फुटबॉल खेलकर तमाम दर्शकों का दिल जीत लिया। दोनों के गोलों की बदौलत ब्राजील यह मैच 3-0 से जीतने में सफल रहा।
इसके पश्चात, सैन फ्रांसिस्को में इस टूर्नामेंट की डार्क हॉर्स कही जा रही तुर्की की टीम का मुकाबला पराग्वे से था। ग्रुप डी का यह मुकाबला दोनों ही टीमों के लिए ‘करो या मरो’ वाला था। खैर, मैच शुरू होता है। कोई कुछ समझ पाता, इससे पहले ही चौबीस वर्षीय मातिआस गलार्ज़ा ने एक गोल दागकर पराग्वे को मुकाबले में अहम बढ़त दिला दी। यह इस विश्व कप में किसी भी टीम द्वारा लगाया गया अब तक का सबसे तेज गोल था। तुर्की के खिलाड़ियों की हालत ऐसी थी कि काटो तो खून नहीं; एकाएक यह क्या हुआ था, वे समझ ही न पाए।
तुर्की के लिए यह मैच जीतना बेहद जरूरी था। सभी खिलाड़ी एकजुट होकर धैर्य के साथ अटैक करना शुरू कर देते हैं। चालहानोलू, अर्दा गुलर और केनान यिल्दिज़ लगातार विरोधी गोलपोस्ट पर घातक हमले करने लगे, परंतु सफलता मिल नहीं पा रही थी। तभी पहले हाफ के बिल्कुल अंतिम क्षणों में पराग्वे के सबसे अनुभवी खिलाड़ी मिग्वेल अलमिरोन को रेफरी द्वारा रेड कार्ड दिखा दिया जाता है। रेड कार्ड अर्थात मिग्वेल अलमिरोन को अब मैदान से बाहर जाना था। तुर्की के खिलाड़ियों व समर्थकों में एकाएक खुशी की लहर दौड़ जाती है। अब मैच में वापसी के द्वार खुलते नजर आ रहे थे।
दूसरा हाफ शुरू होता है। तुर्की लगातार विरोधी गोलपोस्ट पर हमले करता है; एक के बाद एक अटैक। मात्र दस खिलाड़ियों के साथ खेलने को मजबूर पराग्वे की टीम जैसे-तैसे अपने किले की रक्षा कर रही थी। आज शायद पराग्वे के लड़ाके गोल न खाने का कोई दृढ़ संकल्प करके आए थे। तुर्की के तमाम भगीरथ प्रयासों को उन्होंने नाकाम कर दिया।
मैच 1-0 से समाप्त हो जाता है और पराग्वे यह मैच जीत जाता है। चौबीस वर्षों बाद फीफा विश्व कप में वापसी करने वाली तुर्की ने इस मैच में अठत्तर प्रतिशत समय गेंद अपने कब्जे में रखते हुए पराग्वे के गोलपोस्ट पर तैंतीस दफे हमले किए। एक पूरा हाफ दस खिलाड़ियों के साथ खेल रही पराग्वे ने इन सभी तैंतीस हमलों को आज जाने कैसे गोल में तब्दील नहीं होने दिया। नतीजा यह हुआ कि अच्छा फुटबॉल खेलकर भी आज तुर्की हार गई। जोहान क्रुएफ ने सच ही तो कहा था, “जीतने के लिए, आपको अपने प्रतिद्वंद्वी से एक गोल अधिक करना होता है।” तुर्की आज यही नहीं कर पाई और इस हार के चलते वह विश्व कप से बाहर हो गई।
तुर्की ने अब तक ग्रुप स्टेज के अपने दोनों मैचों में मिलाकर विरोधी गोलपोस्ट पर कुल बासठ शॉट्स लगाए, परंतु वे टूर्नामेंट में फिलहाल एक भी गोल करने में नाकामयाब रहे हैं। यह सबसे बड़ा कारण रहा कि इतने सारे युवा सितारों से लैस तुर्की की टीम अच्छा फुटबॉल खेलने के बावजूद अपने दोनों मैच हारकर घर वापस जाएगी।
खैर आगे, ह्यूस्टन स्टेडियम में नीदरलैंड्स को स्वीडन के खिलाफ ग्रुप एफ के मैच में उतरना था। मैच शुरू होता है। लगभग उनहत्तर हजार दर्शक स्टेडियम में मौजूद थे, जिसमें स्टेडियम के तीन छोरों पर नीदरलैंड्स के समर्थक पारंपरिक नारंगी रंग पहने अपनी टीम का हौसला बढ़ाने के लिए तैयार थे।
मैच शुरू होते ही दोनों टीमें लगातार अटैक करती हैं। प्रयास यह रहता है कि मैच जीतकर ग्रुप में अपनी स्थिति मजबूत की जाए। ‘ओरांजे’ के सेंट्रल फॉरवर्ड ब्रायन ब्रॉबी मैच के पाँचवें व सत्रहवें मिनट में दो गोल दागकर अपनी टीम को 2-0 से आगे कर देते हैं। लेकिन ग्योकेरेस, एलेक्जेंडर इसाक और अयारी जैसे घातक अटैकिंग माइंडसेट वाले खिलाड़ियों की मौजूदगी के चलते स्वीडन कभी भी हताश नजर नहीं आया। वे लगातार नीदरलैंड्स के गोलपोस्ट पर हमले कर रहे थे, बस गोल स्कोर नहीं कर पा रहे थे।
दूसरा हाफ शुरू होता है, लेकिन अबकी दफा कोडी गाक्पो सैंतालीसवें व चौवनवें मिनट में नीदरलैंड्स के लिए लगातार दो गोल कर टीम को चार गोल की बढ़त दिला देते हैं। स्कोर 4-0 हो जाता है। स्वीडन फिर भी हथियार नहीं डालती, वह अब भी लड़ती है। मैच के उनसठवें मिनट में एंथोनी इलांगा स्वीडन के लिए एक गोल कर देते हैं। स्कोरबोर्ड पर अब स्कोर 4-1 हो जाता है। लेकिन मैच के अंतिम क्षणों में एक बार फिर, पिछले मैच के गोलस्कोरर समरविले एक गोल लगाकर 5-1 के स्कोर के साथ इस मैच में नीदरलैंड्स की जीत सुनिश्चित कर देते हैं। जिसने यह मैच देखा नहीं, उसे स्कोरकार्ड बताएगा कि मैच एकतरफा रहा, परन्तु ऐसा था नहीं। स्वीडन की टीम बहुत बहादुरी से अंत तक लड़ती रही। उन्होंने कई घातक काउंटर-अटैक भी किए, लेकिन आज नीदरलैंड्स के गोलकीपर वेरब्रूगन ने कई अहम बचाव किए। नीदरलैंड्स वह टीम हो गई है जिसने विश्व कप के इतिहास में सौ से अधिक गोल दागे हैं, परन्तु अब तक विश्व कप की ट्रॉफी अपने हाथों में लेने से वंचित रह गई है।
आगे, धुआंधार अंदाज में टूर्नामेंट में अपने अभियान का आगाज करने वाली जर्मनी के समक्ष टोरंटो में आइवरी कोस्ट की टीम थी। ग्रुप ई के इस मुकाबले में सभी को चौंकाते हुए आइवरी कोस्ट, फ्रैंक केसी के गोल की बदौलत मैच के तीसवें मिनट में जर्मनी पर अहम बढ़त बना लेती है। जर्मनी वापसी के प्रयास करती रहती है, परन्तु हर दफा आइवरी कोस्ट का मिडफील्ड व रक्षापंक्ति मिलकर उनके हमलों को नेस्तनाबूद कर देती है। उनके अनुभवी गोलकीपर भी लगातार कई शानदार सेव कर रहे थे। पहले हाफ की समाप्ति पर स्कोर 1-0 ही रहता है।
दूसरे हाफ का खेल शुरू होता है। लगभग बीस मिनट का खेल हो जाने पर भी आइवरी कोस्ट जर्मनी की टीम पर बढ़त बनाए हुए थी। मैच के साठ मिनट बीत जाने पर कोच नागेल्समान ट्रिपल सब्स्टीट्यूशन करते हैं और पिछले मैच के स्कोरर उंदाव के साथ अमीरी व लेवेलिंग को मैदान पर उतारते हैं। एक बार फिर उंदाव को मैदान में उतारने का फैसला तुरुप का इक्का साबित होता है। मैच के अड़सठवें मिनट में स्थानापन्न खिलाड़ी अमीरी गोल करने हेतु उंदाव की तरफ गेंद बढ़ाते हैं; उंदाव कोई गलती नहीं करते और शानदार गोल दाग जर्मन खेमे को राहत की सांस लेने का मौका दे देते हैं। स्कोर हो जाता है 1-1।
आइवरी कोस्ट लगातार काउंटर अटैक करके गोल करने की कोशिशें जारी रखती है। लेकिन, एक दफा फिर उंदाव मैच के 90+3 मिनट में गोल दाग देते हैं। आइवरी कोस्ट के तमाम समर्थकों के दिलों को तोड़ते हुए जर्मनी 2-1 से यह मैच जीतकर, पिछले दो संस्करणों की विफलताओं को पीछे छोड़, अगले दौर में अपनी जगह पक्की कर लेती है। उंदाव दो मैचों में तीन गोल दाग चुके हैं व दो गोल असिस्ट भी कर चुके हैं। निश्चित तौर पर वे अब तक जर्मनी के सबसे असरदार हथियार साबित हुए हैं। उनका यह प्रदर्शन निश्चित ही अब कोच नागेल्समान को उन्हें प्लेइंग इलेवन में जगह देने को मजबूर कर देगा।
फिर, ग्रुप ई के अन्य मुकाबले में कंसास सिटी स्टेडियम में इक्वाडोर के सम्मुख जनसंख्या के आधार पर विश्व कप में क्वालीफाई करने वाला सबसे छोटा राष्ट्र कुराकाओ था। यह मैच 0-0 के स्कोर के साथ ड्रॉ रहा, परन्तु इस मैच ने खेलप्रेमियों को आज एक नया नायक दे दिया। कुराकाओ के सैंतीस वर्षीय गोलकीपर, जिनका नाम आज से पहले यह खबर पढ़ रहे शायद ही किसी व्यक्ति ने सुना होगा, आज मैच के हीरो रहे। इक्वाडोर ने विपक्षी गोलपोस्ट पर छब्बीस शॉट्स लगाए, जिसमें से पंद्रह निशाने पर रहे। लेकिन कुराकाओ के गोलकीपर एलोय रूम ने उन सभी पंद्रह शॉट्स को गोलपोस्ट के भीतर जाने से रोक दिया। यह वाकई ऐतिहासिक था।
कुराकाओ जैसा छोटा राष्ट्र, जो पहली दफा विश्व कप का हिस्सा बना है, अपने नायक एलोय रूम के इस शानदार प्रदर्शन की बदौलत विश्व कप के इतिहास में आज अपना पहला अंक अर्जित करने में सफल हो गया।
आगे, मेक्सिको में खेले गए ग्रुप एफ के एक अन्य मुकाबले में जापान ने ट्यूनीशिया को 4-0 से रौंद दिया। पिछले मैच में जापान के लिए गोल करने वाले दाईची कमाडा ने ही आज भी जापान के लिए खूबसूरत गोल दागकर खाता खोला। इस बड़ी जीत के साथ ‘समुराई ब्लूज’ ने अपने ग्रुप में अपनी स्थिति मजबूत कर ली है।
अब, आज रात भारतीय समयानुसार रात साढ़े नौ बजे अटलांटा स्टेडियम में 2010 विश्व कप के विजेता स्पेन का मुकाबला पिछले संस्करण की विजेता (अर्जेंटीना) को हराकर संपूर्ण विश्व को चौंका देने वाली सऊदी अरब की टीम से होगा। ख़बरें हैं कि लामीन यमाल प्लेइंग इलेवन में वापसी कर सकते हैं।
आगे, रात साढ़े बारह बजे ईरान के ‘पर्शियन चीताज’ का सामना बेल्जियम की सशक्त टीम से होगा। वहीं, रात साढ़े तीन बजे उरुग्वे मियामी के स्टेडियम में काबो-वर्दे से भिड़ती नजर आएगी।
माहौल गर्माता जा रहा है। उन्माद अपने चरम पर है। बने रहिए साथ, इस खूबसूरत खेल की जादुई कहानियों का दौर जारी रहेगा।
बिहार के भोजपुर (आरा) में पुलिस एनकाउंटर में मारे गए भरत भूषण तिवारी को लेकर बिहार पुलिस पर सवाल उठ रहे हैं। अब मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इस मामले की न्यायिक जाँच के आदेश दिए हैं। भरत तिवारी को लेकर सोशल मीडिया भी दो गुटों में बँटा नजर आ रहा है। कुछ लोग उसके समर्थन में हैं तो कई उसे पुलिस पर गोली चलाने वाला अपराधी बता रहे हैं। इस लेख में समझेंगे कि इस मामले में अब तक क्या हुआ और भरत तिवारी (Bharat Tiwari) का सोशल मीडिया खँगालने पर हमें क्या पता चला है?
अब तक क्या-क्या हुआ?
इस मामले की शुरुआत 15 जून को हुई। 15 जून 2026 को और उससे पहले भी फेसबुक पोस्ट में उसने देश में क्रांतिकारी युद्ध छेड़ने और जगदीशपुर के SDM का एनकाउंटर करने की बात कही थी। इसके बाद पुलिस 15 जून को दो बार उसके घर पहुँची, एक बार वह नहीं मिला और उस दिन वह थाने नहीं पहुँचा।
इसके बाद पुलिस ने बताया कि 16 जून को भोजपुर के शाहपुर थाने को सूचना मिली थी कि एक शख्स हथियार लेकर घूम रहा है। वह शख्स बिलौटी गाँव का रहने वाला भरत भूषण तिवारी ही था। भरत की अवैध हथियार लिए कई तस्वीरें सामने आई हैं। उसी दिन पुलिस पूछताछ के लिए भरत तिवारी के घर पहुँची। पुलिस जब पूछताछ कर रही थी तो उस दौरान भी भरत हाथ में बंदूक लिए हुए था। उसके अपने फेसबुक पेज पर एक लाइव किया जिसमें वह पुलिस के सामने हथियार लिए दिख रहा है।
भरत के इस फेसबुक पोस्ट पर लिखा गया, “आज हुआ कुछ ये की बिहार सरकार और बिहार के सिस्टम के द्वारा खास करके वही सा** जगदीशपुर का वो जो बोकवा SDM है जिसका एनकाउंटर होने वाला है उसके द्वारा मेरे साथ कुछ हरकत की गई।”
पोस्ट में आगे लिखा गया, “गनीमत है की शाहपुर के अभी कुछ दिनों पहले आए नए थाना प्रभारी ने मैटर सँभाल लिया नहीं तो कहीं आज साला प्रशासन में से ही कुछ रंगबाज छपरियों का एनकाउंटर हो जाता या तो मेरा ही हो जाता और इसी के साथ इस देश में एक नई क्रांतिकारी युद्ध को जन्म दे दिया जाता।”
इस वीडियो के साथ भरत ने लिखा, “आप सभी ये देखिये की कैसे बिहार का CM और बिहार सरकार के प्रशासन का कुछ गदहवा सब सा** SDM वा के इशारे पर कैसे मेरा एनकाउंटर करना चाहता है और सुनने में आ रहा है की अब बाहर से टीम आएगी और वो भी पूरी तैयारी के साथ मेरा एनकाउंटर करने के लिए तो सा** अब कई भेड़िए मिलकर एक शेर का शिकार करेगा रे तो सा** आ जाओ तुमलोगो के साथ अब शिकार शिकार ही खेला जाएगा।”
भरत ने लोगों से अपील करते हुए आगे लिखा, “आप सभी ये देख लिजिए की ऐसा युद्ध करने में अपना बहुत कुछ कैसे खो देना पड़ता है और अभी तो ये सिर्फ शुरुवात है अभी आगे समाज और देश के लिए अपना बहुत कुछ त्याग देना पड़ेगा क्यूँकि किसी भी देश में ऐसे ही कोई क्रांति नहीं आती।”
यह खबर जब सोशल मीडिया पर फैली तो उसने अपने फेसबुक पेज पर भी इससे जुड़े की लिंक्स शेयर किए। वहीं, भोजपुर पुलिस ने भी देर रात X पर एक पोस्ट कर इस घटना की जानकारी दी। पुलिस ने बताया कि भरत मानसिक रूप से अस्वस्थ (विक्षिप्त) है।
भोजपुर पुलिस ने कहा, “शाहपुर थाना को सूचना मिली थी कि एक व्यक्ति हथियार लेकर घूम रहा है ।इस सूचना के सत्यापन हेतु जब शाहपुर थाना की पुलिस टीम संबंधित व्यक्ति के घर पहुँची , तब यह तथ्य सामने आया कि वह व्यक्ति मानसिक रूप से अस्वथ है। उसे तत्काल उचित इलाज और देखरेख के लिए मेंटल हॉस्पिटल भेजने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।”
पुलिस ने बताया कि भरत के पास मौजूद हथियार को बरामद करने और उसे नियंत्रण में लेने के लिए पुलिस टीम द्वारा लगातार प्रयास किए जा रहे हैं जिससे किसी भी अप्रिय घटना को रोका जा सके।
इसके बाद आई 17 जून की तारीख। 17 जून को सुबह-सुबह भरत तिवारी ने फेसबुक पर लाइव आकर कहा कि पुलिस उसे पागल साबित करके उसे ले जाना चाहती है। इस वीडियो में वह अपनी तुलना भगत सिंह के भी करता नजर आया। वीडियो में कह रहा है, “इन लोगों को अपना पागलपन दिखाते हैं और इन लोगों को दौड़ा-दौड़कर मारते हैं।” इसके बाद वीडियो में वह घर के बाहर मौजूद पुलिसकर्मियों पर गोली चलाता भी नजर आया।
पुलिसकर्मियों पर गोली चलाता भरत तिवारी
वीडियो में वह लगातार पुलिसकर्मियों को मारने की धमकी देता रहा। साथ ही, उसने इस पोस्ट में लिखा, “देश के इस क्रांतिकारी युद्ध में बिहार पुलिस पे गोलियाँ बरसाईं गई और उसके बाद इन सभी का मैं एनकाउंटर करने निकला तो ये सब सा** दुम दबा के भाग गया।” उसने वायरल वीडियो में दावा किया कि उसे पुलिस ने घर के भीतर ही बंद कर दिया है।
कुछ देर बाद भरत तिवारी घर से बाहर निकला और फिर एक बार पुलिसकर्मियों को एनकाउंटर की धमकियाँ देने लगा। वो लगातार पुलिसकर्मियों को गालियाँ देता रहा और उन्हें ठोकने की बात कहता रहा। इसके बाद उसने खुद को विक्षिप्त बताए जाने पर पुलिस को खूब उल्टा-सीधा कहा।
उसने फेसबुक पर लिखा, “अरे सा** बिहार का CM, बिहार पुलिस का सिस्टम और पुरे बिहार का गँजेड़ी सिस्टम सा** तु सब कौन सा नशेड़ी है रे, सा** तुम सभी मुझे सिर्फ पागल ही क्यूँ बोल रहा है उसके साथ वो सभी बातें भी बोलो जो एक क्रांतिकारी योद्धा के लिए समय समय पर इस देश में बोला जाता है।”
‘एनकाउंटर’ के दिन भरत के साथ क्या-क्या हुआ?
इसके बाद 17 जून 2026 को करीब सुबह 9 बजे भरत एक बार फिर फेसबुक पर लाइव आया और इस बार वह एक खुले मैदान में पुलिस के सामने खड़ा था। फेसबुक पर मौजूद करीब 15 मिनट के इस वीडियो में वो लगातार पुलिसकर्मियों को धमकाता और उन पर बंदूक तानता नजर आया। वह वीडियो में बंदूक दिखाकर पुलिसकर्मियों को भाग जाने की बात कहता रहा।
इस वीडियो एक पुलिसकर्मी की बात का जवाब देते हुए उसने कहा, “किस चीज का सरेंडर, यहाँ तो युद्ध होगा। या तो तुम या मैं। तुमने पागल क्यों बोला।” इसके बाद उसने पुलिसकर्मियों पर गोली भी चला दी। जिसे इस वीडियो में 2:25 मिनट के बाद देखा जा सकता है।
इस वीडियो के बाद भरत एक आखिरी बार फिर फेसबुक पर लाइव आया। करीब 3:45 मिनट के इस वीडियो में उसने कहा कि पुलिस उसकी माँगे मानने को तैयार हो गई है और उसकी बात मुख्यमंत्री तक पहुँचाई जाएगी। भरत ने लाइव वीडियो में कहा कि उसे अब हथियार डालने में कोई दिक्कत नहीं है।
उसने अपनी माँग बताते हुए कहा, “कोई भी नेता, मंत्री, विधायक और कोई भी अधिकारी समाज के साथ झूठा वादा नहीं करेगा। अगर करेगा तो उसे किसी भी हाल में पूरा करना होगा। नहीं करेगा तो मेरे जैसे लोगों को हथियार उठाना पड़ेगा।”
उसने कहा कि अब माँग पूरी होने और समाज में बदलाव आने की संभावना दिख रही है तो वह हथियार रखने जा रहा है। इसके बाद उसने वहाँ मौजूद पुलिसकर्मियों के पास अपना हथियार फेंक दिया।
भरत ने पुलिसकर्मियों के सामने फेंका हथियार (फोटो साभार: भरत तिवारी फेसबुक)
इस हथियार को फेंकने के बाद उसके एनकाउंटर की खबर आई। इसकी भी दो अलग दावे हैं, एक दावा पुलिस का है और वहाँ मौजूद लोगों का। भोजपुर पुलिस ने शाम करीब 4 बजे X एक पोस्ट में भरत तिवारी की मौत की जानकारी दी।
पुलिस ने लिखा, “9 बजे पुलिस को सूचना मिली की भरत भूषण तिवारीहाथ में पिस्टल लहराते हुए हवाई फायरिंग कर रहा है। पुलिस व STF द्वारा उससे लगातार आत्मसमर्पण करने के लिए कहा गया लेकिन वह पिस्टल से रुक-रुककर फायरिंग करता रहा। जब जवान उसकी तरफ बढ़े तो उसने पुलिस पर सीधे फायरिंग कर दी। जिसके बाद पुलिस ने आत्मरक्षा में फायरिंग की और शख्स के पैर में गोली लगी। इलाज के दौरान पटना के PMCH में उसकी मौत हो गई।”
लेकिन वहाँ मौजूद लोगों का कुछ और दावा है। दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक प्रत्यक्षदर्शी ने कहा, “भरत तिवारी ने हम लोगों के सामने हथियार फेंका, जिसके बाद पुलिसवालों ने दौड़कर उन्हें पकड़ लिया। इसके बाद कुछ दूर तक उन्हें ले गए और उन्हें गोली मार दी। हम लोगों ने देखा था कि उन्हें तीन गोलियाँ मारी गई है। अब डॉक्टर 5 गोली लगने की बात कह रहे हैं, तो भरत तिवारी को रास्ते में पुलिसवालों ने 2 और गोली मारी होगी।”
इस मुठभेड़ पर सवालों के बीच लोग आक्रोशित हो गए और 18 जून 2026 को भरत के शव को हाईवे पर रखकर हंगामा किया गया। आक्रोशित ग्रामीणों ने एनएच-922 जाम कर दिया था और इसके बाद खूब बवाल हुआ, पुलिस को लाठी तक चलानी पड़ी।
अब मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि इस हंगामे को लेकर दो FIR दर्ज की गई हैं जिनमें एक में भरत के पिता काशीनाथ तिवारी और भाई चंदन तिवारी को भी आरोपित बनाया गया है। उन पर हथियार रखने और सरकारी काम में बाधा डालने जैसे आरोप लगाए गए हैं। वहीं, हंगामे-सड़क जाम को लेकर 14 नामजद सहित 50 से अधिक अज्ञात लोगों पर दूसरी FIR दर्ज की गई है।
इस मामले में भरत तिवारी की माँ सुमन देवी ने भी आवेदन देकर माँग की है कि शाहपुर थानाध्यक्ष समेत एनकाउंटर में शामिल अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया जाए। उनका कहना है कि उनके बेटे ने पुलिस के सामने हथियार फेंककर आत्मसमर्पण कर दिया था।
CM सम्राट ने दिए न्यायिक जाँच के आदेश
इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर तो हंगामा मचा ही, बिहार ने राजनीति में भी खूब बवाल मचा हुआ है। घटना पर हंगामा बढ़ने के बाद शाहपुर थाना प्रभारी राजेश कुमार मलाकार समेत कई सिपाहियों को निलंबित कर दिया गया है।
कई नेता भरत तिवारी के घर पहुँच रहा है और परिवार के साथ संवेदनाएँ जता रहे हैं। RJD नेता तेजस्वी यादव ने सम्राट सरकार को घेरते हुए कहा कि यह फर्जी एनकाउंटर है और पुलिस ने पहले भी कई बार जाति देखकर एनकाउंंटर किए हैं।
खुद BJP और उसके सहयोगियों की तरफ से भी सवाल उठाए गए। JDU के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने कहा कि इस मामले की जाँच वरिष्ठ अधिकारी से कराकर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। बिहार में BJP के मंत्री मिथिलेश तिवारी ने भी इस एनकाउंटर पर सवाल उठाए।
लगातार सवालों के बीच मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने शनिवार (20 जून 2026) को इस मामले में जाँच का ऐलान कर दिया। उन्होंने X पर लिखा, “पुलिस मुठभेड़ की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जाँच हेतु उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश द्वारा न्यायिक जाँच कराने का निर्णय लिया गया है। न्यायिक जाँच का उद्देश्य घटना के सभी पहलुओं की निष्पक्षता एवं पारदर्शिता के साथ जांच सुनिश्चित करना है।”
भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव में दिनांक 17.06.2026 को हुई पुलिस मुठभेड़ की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच हेतु उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश द्वारा न्यायिक जांच कराने का निर्णय लिया गया है। न्यायिक जांच का उद्देश्य घटना के सभी पहलुओं की निष्पक्षता एवं…
क्रांतिकारी या अपराधी: कौन था भरत तिवारी, लोगों और उसकी सोशल मीडिया से क्या पता चला?
भरत तिवारी (Bharat Tiwari) को लेकर दो तरह की चर्चाएँ हैं एक वर्ग भरत में अपराधी देख रहा है जो हथियार लेकर सोशल मीडिया से कथित क्रांति करना चाहता था तो वहीं एक वर्ग के लिए वो हमेशा मदद करने वाला शख्स है। भरत की फेसबुक पोस्ट देखने से एक बात तो साफ है कि उसे सरकार और सिस्टम के खिलाफ भयंकर गुस्सा था और उसने कई आपत्तिजनक बातें भी लिखी हैं।
पिछले कुछ दिनों से वह लगातार सोशल मीडिया पर आक्रामक बातें लिख रहा था। वो देश में एक क्रांतिकारी युद्ध छेड़ने और एक नई तरह की सोच की बातें कर रहा था। लोगों की मदद के लिए किए गए उसके कई पोस्ट में भी आपत्तजनक और आक्रामक भाषा का इस्तेमाल किया गया है। 15 जून 2026 को एक फेसबुक पोस्ट में उसने देश में क्रांतिकारी युद्ध छेड़ने और जगदीशपुर के SDM का एनकाउंटर करने की बात कही थी।
इस पोस्ट में भरत ने लिखा, “बिहार के CM और पूरे सिस्टम को मेरा ये संदेश है की 2 दिनों में मुझे बता दो की सभी घोषणाओं और सभी विकास के कार्यों को किया जाएगा या नहीं। अगर 2 दिनों में मुझे ये पता नहीं चलता है कि सभी विकास के कार्यों को करवाया जाएगा या नहीं तो फिर उसके बाद इस देश में क्रांतिकारी युद्ध करने की घोषणा कर दी जाएगी और उसका समय भी बता दिया जाएगा और उसमें सबसे पहले जगदीशपुर के SDM का एनकाउंटर कर दिया जाएगा।”
इस पोस्ट में उसने लिखा, “अभी मेरी जैसा मैं कर रहा हूँ तो उसको देख कर…गद्दारों और देशद्रोहियों को बहुत मजा आ रहा है। खासकर इस देश को जो इस्लामिक राष्ट्र बनाना चाहते हैं। ऐसे लोग ज्यादा खुश ना हों क्यूंकि जिस दिन सा** तुम सभी का ऐसे कुछ भी इलाज करने का मुझे सिर्फ एक भी मौका मिल गया तो सा** तुम जैसे लोगों का वो हाल करूँगा की तुम्हारी रूह तक काँप उठेगी”
12 जून 2026 के एक पोस्ट में उसने प्रशासन से लोगों की मदद करने की अपील की और इसी पोस्ट में बेहद आक्रामक भाषा का भी इस्तेमाल किया गया। उसने लिखा, “जवईनिया गाँव के असहाय और मजबूर लोगों को बसाने के लिए उस गड्ढे वाले स्थान पर 1 से 2 दिनों में मिट्टी नहीं डाला गया…तो उसके बाद बिहार के सिस्टम में बैठा कोई भी सा** लुच्चा और लफंगा यहाँ आ गया तो उस सा* छपरी का एनकाउंटर कर दिया जाएगा”
भरत तिवारी का फेसबुक पोस्ट
इसी मामले को लेकर उसने 7 जून 2026 को लिखा, “गड्ढे वाले स्थान पर मिट्टी नहीं भरा गया है। 2,4 दिन मैं और देख लेता हूँ नहीं तो साला जो बोली से नहीं मानेगा तो उसको गोली खाकर जरुर मान जाना चाहिए। हाँ, SDM सा* का एनकाउंटर तो होगा।” वो पिछले दिनों से लगातार इस मुद्दे को उठा रहा था।
6 जून को एक अन्य विषय पर उसने लिखा, “आप सभी लोगो से मैं बताना चाहता हूँ बिलौटी गाँव में जो जवनिया गाँव के लोगो को बसाने का निर्णय लिया गया है और इस क्रम में जो जो विकास के कार्य यहाँ होने वाले थें तो उसमें सबसे पहले एक कार्य में लापरवाही और भ्रष्टाचार होते हुए पाया गया है जो की ये सरकारी चापा कल (हाथी पांव चापा कल) का कार्य है।”
उसने सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से जुड़ी पोस्ट भी शेयर की हैं। बाढ़ प्रभावित गाँवों की मदद से जुड़े कई पोस्ट भी भरत की फेसबुक प्रोफाइल में नजर आते हैं। नीतीश कुमार की विदाई पर भरत ने लिखा, “बिहार में छपरीबाज CM का अंत हुआ और अब आने वाला CM छपरीबाज होगा की नहीं ये तो आने वाला समय खुद बता देगा।”
इससे पहले के कई फेसबुक पोस्ट में उसने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए इसी तरह की आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया था। वह नीतीश कुमार सरकार की नीतियों की लगातार आलोचना करता रहा था।
11 सितंबर 2025 के एक पोस्ट में उसने लिखा, “आप सभी लोगो को एक सूचना देना था की मैं समाज और देश के लिए जो एक क्रांतिकारी युद्ध लड़ रहा हूँ, उस लड़ाई में मुझे एक और नया युद्ध शामिल करने का मौका मिलने वाला था लेकिन अब कुछ-कुछ छपरी CM और उसके लोग मुझे समझने लगे हैं की इसका आगे का प्लान क्या हो सकता है।” इसमें उसने लिखा कि उसकी जमीन पर कब्जे का प्रयास किया जा रहा है।
कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि भरत तिवारी का आपराधिक इतिहास भी था। मार्च 2025 में भरत तिवारी के खिलाफ सरकारी कार्य में बाधा पहुंचाने, मारपीट करने, गाली-गलौज, जान से मारने की धमकी देने तथा पुलिस पदाधिकारी के साथ दुर्व्यवहार को लेकर केस दर्ज किया गया था। आरोप था कि भरत ने पुलिस पदाधिकारी की वर्दी का कॉलर पकड़ लिया था और उनके साथ धक्का-मुक्की की थी।
पुराने फेसबुक पोस्ट दिखाने पर भरत की सिस्टम से नाराजगी साफ नजर आती है और उसने कई बार आक्रामक भाषा का भी इस्तेमाल किया है। लेकिन दूसरी तरफ कई लोगों के लिए वह एक मदद करने वाला हीरो था।
दैनिक भास्कर से बिलौटी गाँव के पास के बाढ़ प्रभावितों में शामिल एक शख्स ने कहा, “भरत तिवारी हम लोगों के लिए भगवान जैसे थे। वे रोज आते थे, देखते थे कि चापाकल में पानी आ रहा है या नहीं। लाइट आई या नहीं।” एक अन्य महिला ने कहा, “भरत तिवारी हम लोगों के लिए सब कुछ थे, वे हम लोगों के लिए भगवान जैसे थे। हम लोग उन्हें भगवान जैसा मानते भी थे।”
अंजलि नामक उस महिला ने कहा, “भरत तिवारी ने अपने गले में पहने हुए महावीरी लॉकेट को बेचकर पिस्टल खरीदी थी। ये बात उनकी माँ ने हम लोगों को बताया था। वारदात के दिन पुलिसकर्मियों की 50 से अधिक संख्या थी। 20 से अधिक गोलियाँ चली थी लेकिन भरत तिवारी ने सिर्फ तीन गोलियाँ चलाई थी, वो भी दो जमीन पर और एक हवाई फायरिंग की थी।”
एक अन्य शख्स का कहना है कि भरत तिवारी पागल या मेंटल होता तो हम लोगों की भलाई के बारे में क्यों सोचता और स्कूल खुलवाने या बिजली-पानी की व्यवस्था की बात क्यों करता। उन्होंने कहा, “प्रशासन उन्हें पागल घोषित करने में जुटा था, इसलिए भरत तिवारी ने हथियार उठाया था। भरत तिवारी हम लोगों के लिए मसीहा थे।”
बताया जाता है कि वो लगातार बाढ़ के पानी में समा गए घरों को लेकर आवाज उठाता रहता था। जवइनियां गाँव की दिक्कतों को लेकर वह लगातार जिला प्रशासन से मुलाकात करता और गाँव में बिजली, पानी की स्थिति ठीक करने की चर्चा करता रहता।
भरत तिवारी के विषय में लोगों की राय और पुलिस की थ्योरी, दोनों एक दूसरे के बिल्कुल विपरित हैं। सोशल मीडिया खँगालने पर दिखता है कि उसकी भाषा आक्रामक थी और वो एनकाउंटर करने और गोली मारने जैसी बाते लिखता था। वहीं, दूसरी और सोशल मीडिया पर ऐसी बातें भी हैं जिसमें वो लोगों के मुद्दा सड़क, गाँव, पानी, बिजली की बातें उठा रहा है। भरत नायक है या खलनायक है, उसकी हत्या हुई या पुलिसकर्मियों ने बचवा में गोली मारी ये तो अब न्यायिक जाँच ही बताएगी।