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रैली में खाली रहीं कुर्सियाँ तो खड़गे ने जिलाध्यक्ष को हटाया, बिहार के बक्सर में हुई थी कॉन्ग्रेस अध्यक्ष की बेइज्जती

कॉन्ग्रेस पार्टी ने बिहार के बक्सर में अपने जिलाध्यक्ष को हटा दिया है। कारण – पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की रैली में भीड़ नहीं जुटी और वो खाली कुर्सियों के सामने भाषण देते रहे। जिलाध्यक्ष डॉ मनोज पांडेय पर अब गाज गिर गई है। पार्टी का कहना है कि उन्होंने कार्यकर्ताओं के साथ ठीक से समन्वय नहीं बिठाया, इसीलिए खड़गे की रैली फ्लॉप हुई। उनपर कार्यक्रम को लेकर लापरवाही बरतने और ठीक से काम न करने का भी आरोप लगाया गया है। खड़गे की रैली में लोगों के न पहुँचने के कारण पार्टी में असंतोष था।

वीडियो में देखा जा सकता है कि लाल रंग की कुर्सियाँ खली पड़ी थीं और इधर मल्लिकार्जुन खड़गे ‘नेशनल हेराल्ड’ भ्रष्टाचार के मामले में फँसीं सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी का बचाव करते रहे। शनिवार (19 अप्रैल, 2025) को हुई इस रैली में मल्लिकार्जुन खड़गे राज्य की सत्ताधारी पार्टियों जदयू और भाजपा और तो ख़ूब बरसे, लेकिन उन्हें सुनने के लिए लोग ही नहीं आए। उन्होंने कहा कि राहुल-प्रियंका डरने वालों में से नहीं हैं। साथ ही उन्होंने नीतीश कुमार पर कुर्सी के लिए पाला बदलने का आरोप लगाया। बता दें कि कॉन्ग्रेस भी 2 बार नीतीश सरकार का हिस्सा रह चुकी है।

पार्टी द्वारा जारी की गई प्रेस रिलीज के अनुसार, दलसागर खेल मैदान में आयोजित मल्लिकार्जुन खड़गे की रैली में तैयारियों की घोर कमी रही, साथ ही समन्वय का भी अभाव रहा। इसमें लिखा है कि जिला कॉन्ग्रेस कमिटी ने अपने दायित्वों का ठीक से निर्वहन नहीं किया। कार्यालय सचिव उमेश प्रसाद सिंह के हस्ताक्षर के साथ ये पत्र जारी हुआ है, जिसकी प्रतियाँ पार्टी के संगठन महासचिव KC वेणुगोपाल और राज्य में पार्टी के प्रभारी कृष्णा अल्लावारु को भी भेजी गई है। हाल ही में कॉन्ग्रेस ने सभी जिलों में नए अध्यक्षों की नियुक्ति की थी।

मीडिया चेयरमैन राजेश राठौड़ ने बताया कि आगे और कई लोगों पर कोताही बरतने के कारण कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने बताया कि कार्यक्रम की समाप्ति के बाद ख़ुद अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने पाया कि अगर जिलाध्यक्ष ठीक से काम करते तो ये और अच्छा हो सकता था। राजेश राठौड़ ने बताया कि उनके ही कहने पर जिलाध्यक्ष को प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम द्वारा निलंबित किया गया है।

कॉन्ग्रेस के बड़े नेता मंच पर फोटो खिंचवाने में व्यस्त रहे थे। हालाँकि, एक सत्य ये भी है कि मल्लिकार्जुन खड़गे देश की सबसे पुरानी पार्टी के अध्यक्ष होने के बावजूद बिहार में क्राउड पुलर नहीं हैं। शायद ही उन्हें अधिकतर लोग जानते हों, या जो जानते हों वो उन्हें सुनने के लिए दिलचस्पी रखें। दूसरा एक बड़ा कारण ये रहा कि बिहार में कॉन्ग्रेस पार्टी का कैडर मृतप्राय है। कन्हैया कुमार की यात्रा के जरिए इसे जीवित करने की कोशिश की गई जो विफल रही। राहुल गाँधी भी बेगूसराय में इस यात्रा में शामिल होने के लिए पहुँचे थे।

ओडिशा से धराए मुर्शिदाबाद में हिन्दू पिता-पुत्र के हत्यारे के 2 बेटे, इसराइल और सेफाउल को पकड़ने के लिए पुलिस को चलानी पड़ी गोली: हिंसा करके ईद के बाद भाग गए थे

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में 2 हिन्दुओं की हत्या के मुख्य आरोपित जियाउल शेख के 2 बेटों को गिरफ्तार किया गया है। उन्हें ओडिशा पुलिस ने गिरफ्तार किया है। यह गिरफ्तारी ओडिशा के झारसुगुड़ा जिले के बांधबहाल इलाके में हुई है। इन दोनों ने पुलिस कस्टडी से भागने का भी प्रयास किया, जिसके चलते उनका एनकाउंटर हुआ।

यह कार्रवाई सोमवार (21 अप्रैल, 2025) की सुबह हुई। ओडिशा पुलिस ने विभिन्न स्थानों पर छापा मारा। ओडिशा पुलिस टीम ने यहाँ दो व्यक्तियों सफाउल हक और बानी इसराइल को हिरासत में लिया।

पुलिस को चलानी पड़ी गोली

गिरफ्तारी के दौरान, आरोपितों के कब्जे से एक पिस्टल भी मिली। उन्होंने इसी दौरान पुलिस हिरासत से भागने का प्रयास किया। पुलिस टीम ने उन्हें रोकने के लिए हवा में चेतावनी के तौर पर 4 राउंड गोलियाँ चलाईं। ओडिशा पुलिस के एक्शन के चलते उन्हें दोबारा गिरफ्तार किया गया है।

दो आरोपित बानी इसराइल और सेफाउल हक, जियाउल शेख के पुत्र हैं और पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के समसेरगंज थाना क्षेत्र के सुलिताला गाँव के निवासी हैं। इनके पास से एक देसी पिस्तौल और 7.62 एमएम की दो जिंदा गोलियाँ बरामद की गईं।

इन दोनों के अलावा, मुर्शिदाबाद के छह अन्य लोगों को भी ओडिशा पुलिस ने हिरासत में लिया है। उनके नाम बाबुल एसके, अब्दुल खालिक, सबा करीम, रोनी एसके, मनारुल एसके और अजफरुल एसके शामिल हैं। ये सभी समशेरगंज थाना क्षेत्र के निवासी हैं और यह 11 अप्रैल, 2025 को मुर्शिदाबाद में हुई हिंसा में शामिल थे।

इसी हिंसा के दौरान हरगोविंद दास और उनके बेटे चंदन दास की इस्लामी कट्टरपंथियों ने हत्या कर दी थी। जिन आरोपितों की गिरफ्तारी हुई है वह आरोपित ईद के दौरान मुर्शिदाबाद गए थे और फिर झारसुगुड़ा लौटकर मजदूरी करने लगे थे। CCTV फुटेज और मोबाइल टावर रिकॉर्ड से जियाउल शेख की घटनास्थल पर मौजूदगी की पुष्टि हो चुकी है।

बाहर से अपराध करके आने वालों पर सख्त कार्रवाई: IG हिमांशु लाल

ओडिशा पुलिस के IG हिमांशु कुमार लाल ने इस मामले में बताया, “ओडिशा पुलिस ने जब उन्हें गिरफ्तार करने का प्रयास किया तो उन्हें भागने की कोशिश की। इसके बाद हमने फायरिंग की और उन्हें गिरफ्तार किया। इस मामले में अभी जाँच चल रही है। बाहर से अपराध करके ओडिशा आने वालों पर सख्त कार्रवाई चल रही है, हमने सभी अधिकारियों से सतर्क रहने को कहा है।”

उसपर भीड़ को उकसाने और साजिश रचने का आरोप है। जियाउल शेख को पहले ही उत्तर दिनाजपुर जिले के चोपड़ा से गिरफ्तार किया जा चुका है। इस हत्याकांड से जुड़ी अब तक कई गिरफ्तारियाँ हो चुकी हैं।

वहीं, वक्फ संशोधन अधिनियम के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान भड़की इस्लामी हिंसा को लेकर कुल 153 एफआईआर दर्ज की गई हैं और इसमें 292 लोग गिरफ्तार किए गए हैं।

क्लोजर रिपोर्ट में खुलासा – दलित नहीं था रोहित वेमुला… अब उसके नाम पर क़ानून बना रहे राहुल गाँधी-सिद्धारमैया, जाति की राजनीति छोड़ नहीं रहे कॉन्ग्रेस

कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को पत्र लिखा है। इस पत्र में राहुल ने कर्नाटक में ‘रोहित वेमुला एक्ट’ नाम से एक कानून बनाने की अपील की है। राहुल का कहना है कि इस कानून का उद्देश्य शिक्षा प्रणाली में जातिगत भेदभाव को खत्म करना है। अपने पत्र में राहुल ने डॉ. भीमराव अंबेडकर के साथ हुए भेदभाव के बारे में भी लिखा है। इस पत्र को राहुल ने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ‘X’ पर पोस्ट किया है।

राहुल गाँधी ने डॉ. BR अंबेडकर को उद्धृत करते हुए लिखा, “हमारे पास बहुत सारा भोजन था। हमारे भीतर भूख की आज जल रही थी – फिर भी हमें बिना भोजन के सोना पड़ा, ऐसा इसीलिए हुआ क्योंकि हमें पानी नहीं मिल सकता था और हमें पानी इसलिए नहीं मिल सकता था क्योंकि हम अछूत थे।”

राहुल ने लिखा कि सिद्दारमैया इस बात से सहमत होंगे कि अंबेडकर ने जो झेला वह भारत के किसी बच्चे को नहीं झेलना चाहिए। बकौल राहुल गाँधी, यह शर्म की बात है कि आज भी जनजातीय, दलित और OBC समुदायों के लाखों छात्रों को हमारी शिक्षा प्रणाली में इस तरह का भेदभाव झेलना पड़ता है।

रोहित की बात पर आते हुए राहुल ने लिखा, “रोहित वेमुला, पायल तड़वी और दर्शन सोलंकी जैसे प्रतिभाशाली युवाओं की हत्या क़तई स्वीकार्य नहीं है। इसे पूरी तरह से खत्म किए जाने का वक्त आ गया है। मैं कर्नाटक सरकार से ‘रोहित वेमुला अधिनियम’ लागू करने की अपील करता हूँ ताकि भारत का कोई भी बच्चा वह न सहे जो डॉ. BR अंबेडकर, रोहित वेमुला और लाखों अन्य लोगों ने सहा।”

रोहित वेमुला की आत्महत्या

कई लोगों का मानना है कि हैदराबाद यूनिवर्सिटी में 17 जनवरी, 2016 को जातिगत भेदभाव के कारण PhD छात्र रोहित वेमुला ने आत्महत्या कर ली थी। हालाँकि, बीते साल तीन मई को तेलंगाना पुलिस ने तेलंगाना हाइकोर्ट को एक क्लोजर रिपोर्ट सौंपी जिसमें यह साफ तौर पर लिखा था कि रोहित दलित नहीं था बल्कि उसने अपनी असली जाति के उजागर होने के डर से आत्महत्या की थी।

19 अप्रैल 2025 को कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने राहुल गाँधी को ‘X’ पर लिखकर बताया कि उन्होंने रोहित वेमुला एक्ट के लिए ड्राफ्ट बनाने के निर्देश दे दिए हैं। राहुल गाँधी के लिए उन्होंने अपने पत्र में दावा किया, “मैं भी आपकी भावनाओं से पूरी तरह सहमत हूँ। हमें दलितों, आदिवासियों और पिछड़े वर्गों को मुख्यधारा में लाने के लिए कदम बढ़ाना चाहिए। हमारी शिक्षा प्रणाली में वंचित वर्गों को अब किसी भी तरह का भेदभाव नहीं सहना पड़ेगा। मैं और मेरी सरकार समाज में सभी के प्रति समान अधिकार सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।”

रोहित की मौत के बाद राहुल गाँधी समेत विपक्ष के कई नेताओं ने उसे दलित विद्यार्थी का चेहरा देकर उसकी आत्महत्या को हत्या का रूप देने की कोशिश की। सच्चाई को उजागर करने में किसी की दिलचस्पी नहीं थी। इसके बजाय इसे एक अवसर के रूप में देखा। रोहित वेमुला की मौत को वोटों की ख़ातिर दलितों और गैर-दलितों को बाँटने वाले राजनीतिक मुद्दे में बदल दिया गया। प्रशासन की रिपोर्ट ने विपक्ष का झूठ उजागर कर दिया।

सादे लिबास में आते हैं, उठाकर ले जाते हैं, फिर मिलता है क्षत-विक्षत शव… बलूचिस्तान में पाकिस्तान की ‘Kill & Dump’ नीति, बच्चों से लेकर पत्रकार तक निशाना

पिछले कुछ महीनों के दौरान बलूचिस्तान में पाकिस्तान के खिलाफ क्रांति का नए सिरे से उभार देखने को मिला है। बलूच महिलाओं और युवाओं ने पाकिस्तानी सरकार के खिलाफ इस विद्रोह की मशाल थाम रखी है। आइए, जानते हैं कि इसका कारण क्या है। इसके मूल में पाकिस्तानी एजेंसियों की उस कुख्यात ‘किल एंड डंप’ यानी ‘हत्या करके ठिकाने लगाने’ वाली नीति की वापसी है। पाकिस्तान ने पहली बार यह नीति 2009 में अपनाई थी, जिसका मकसद बलूचिस्तान के लोगों की आवाज का दमन करना था।

यह क्रूर रणनीति निशाना बना कर हत्या और अपहरण के जरिए असहमति एवं विरोध के स्वरों को दबाने पर केंद्रित रही। इस नीति के अमल में आने के बाद से हजारों लोग मारे गए और तमाम गायब हो गए। ‘बलूच वुमन फोरम’ (BWF) ने हाल में इस कुख्यात ‘Kill & Dump’ पॉलिसी की कड़ी निंदा की है। संगठन ने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों को लेकर पाकिस्तानी सरकार की प्रतिबद्धता को लेकर गहरा संदेह भी जताया है।

BWF की प्रवक्ता ने एक बयान जारी करके कहा कि ये घटनाक्रम बलूच लोगों को व्यवस्था से अलग-थलग करने की सोच को प्रदर्शित कर रहा है। प्रवक्ता ने आगे कहा कि विगत 3 दिनों में अवैध रूप से कब्जे में लिए गए तीन बलूच युवाओं के शव माकुरण और नाल (खुजदार) के अलग-अलग स्थानों पर मिले हैं।

नाल के रहने वाले फारूक अहमद को 14 अप्रैल को जबरन हिरासत में लिया गया था। यह बलूचिस्तान में गुमशुदगी के तमाम अन्य मामलों के ढर्रे को दर्शाता है। इसके एक दिन बाद 15 अप्रैल को उसका शव नाल के समद चेक पोस्ट क्षेत्र से मिला। ‘द बलूचिस्तान पोस्ट’ के अनुसार, शव पर प्रताड़ना के निशान मिले थे।

ग्वादर जिले में पासनी के निवासी निजाम बलूच को 12 अप्रैल को उसके घर से अवैध तरीके से उठाकर एक अज्ञात स्थान पर भेज दिया गया। यह सामने आया है कि उसे 4 घंटों तक प्रताड़ित किया गया। गत 16 अप्रैल को उसका शव पासनी में फेंक दिया गया। ‘द बलूचिस्तान पोस्ट’ का दावा है कि उसे भयंकर शारीरिक प्रताड़ना दी गई।

ऐसे ही एक अन्य मामले में पासनी निवासी शेर खान निजार को 15 अप्रैल को तुरबत के जुस्साक इलाके से हिरासत में ले लिया गया और वह भी बिना किसी पूर्व सूचना या कानूनी वॉरंट के। निजार पढ़ाई करने के साथ-साथ एक डीजल डिपो पर पार्ट टाइम काम भी करता था। 16 अप्रैल की रात को उसका शव तुरबत विश्वविद्यालय के पीछे मिला। अन्य मामलों की तरह उसके शव पर घावों के निशान थे।

उल्लेखनीय है कि बलूच क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोगों के गायब होने के मामले सामने आए हैं। गुमशुदा लोग भिन्न-भिन्न आयु वर्ग और अलग-अलग कार्यक्षेत्रों से जुड़े हुए हैं। इन मामलों के चश्मदीदों का आरोप है कि ये काम पाकिस्तान की ही अलग-अलग सरकारी एजेंसियों का है। हिरासत में लिए गए चुनिंदा लोग कुछ समय बाद रिहा कर दिए गए, लेकिन उनमें से अधिकांश की हत्या हो गई और तमाम अन्य अभी भी अवैध हिरासत में कैद हैं।

सरकार को संबोधित एक बयान में BWF ने कहा है, “जबरन गायब किए गए बलूच लोगों की हम तत्काल और बिना शर्त रिहाई की माँग करते हैं। ऐसे मामलों ने बलूच समाज की शांति एवं स्थिरता को गहरी चोट पहुँचाई है। इसके अतिरिक्त, हम प्राधिकारी संस्थाओं से अनुरोध करते हैं कि इन मामलों के पीछे जो लोग हैं, उनकी जवाबदेही तय की जाए।”

‘किल एंड डंप’ पॉलिसी को समझना

‘किल एंड डंप’ यानी हत्या करके ठिकाने लगा देना जैसी बात कोई कल्पना मात्र नहीं है। यह बलूचिस्तान में आज़ादी की लड़ाई से निपटने की पाकिस्तानी रणनीति की कड़वी हकीकत है। पाकिस्तान मुल्क़ द्वारा प्रवर्तित यह नीति लोगों को जबरन गायब करने, तंत्रीय उत्पीड़न और गैर-कानूनी हत्याओं पर केंद्रित है। पीड़ितों के शव अक्सर क्षत-विक्षत हालत में मिलते हैं जो बयान करते हैं कि मौत से पहले उन्हें कितना कष्ट पहुँचाया गया होगा।

उनका शव भी खुले में या दूरदराज के सड़कों के इर्दगिर्द फेंक दिया जाता है। इन शवों की पहचान भी जनता या परिवार के सदस्यों द्वारा की जाती है। इन शवों के साथ एक अंतर्निहित या छिपा हुआ संदेश भी होता कि पाकिस्तान के खिलाफ आवाज न उठाएँ।

कैसे काम करती है यह नीति

जब लोगों की गुमशुदगी, प्रताड़ना और हत्याओं का गहनता से आकलन करते हैं तो इसमें एक रुझान सामने आता है। पीड़ितों को अक्सर सादे लिबास वाले लोगों द्वारा उठाया जाता है जो ऐसे वाहनों से ऐसे आते हैं जिनकी कोई पुख्ता पहचान नहीं होती। इन लोगों के बारे में अमूमन यही माना जाता है कि उनका संबंध ISI (इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस) जैसी पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी या फ्रंटियर कॉर्प्स जैसे अर्धसैनिक बल से होता है।

इस क़वायद में न कोई वॉरंट होता है, न सार्वजनिक रिकॉर्ड और न ही किसी कानूनी आश्रय का कोई विकल्प। लोगों को उनके घरों, सार्वजनिक स्थलों या शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शनों के दौरान कहीं से भी उठा लिया जाता है। कई मामलों में लोग महीनों या सालों तक गुमशुदा रहे। जबकि अन्य मामलों में कुछ दिनों के भीतर ही उनका शव मिला जिस पर भयावह प्रताड़ना के चिह्न होते।

वॉइस फोर बलूच मिसिंग पर्संस जैसे स्थानीय अधिकार समूहों ने पिछले कुछ वर्षों के दौरान ऐसे हजारों मामले उजागर किए हैं। वर्ष 2011 में ह्युमन राइट्स वॉच ने ‘वी कैन टॉर्चर, किल ओर कीप यू फोर ईयर्स‘ शीर्षक से एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें पाकिस्तानी सुरक्षा बलों पर इन जबरन अपहरणों और हत्याओं का आरोप लगाया था।

राज्य की संलिप्तता के पुख्ता संकेत

ये हत्याएँ केवल क्रूरता की श्रेणी में नहीं आतीं। इनमें खास तौर-तरीके जाहिर होते हैं जो स्पष्ट रूप से राज्य प्रायोजित हिंसक गतिविधियों की श्रेणी में आते हैं। ‘किल एंड डंप’ नीति के पीड़ित अक्सर बलूच युवा होते हैं। इनमें छात्र, पत्रकार, कवि और पाकिस्तान की नजर में ऐसे संदिग्ध राष्ट्रवादी होते हैं जो बलूचिस्तान में पाकिस्तान के खिलाफ आवाज उठाते हैं। उनके शरीर पर क्रूर यातना के निशान होते हैं। इसमें क्षत-विक्षत अंग, उखड़े हुए नाखून, सिगरेट से जलाने के निशान, तेजाब के चिह्न और गोलियों के घाव होते हैं। कइयों के शरीर पर फाँसी दिए जाने के संकेत भी नजर आते हैं।

पीड़ितों का शव सार्वजनिक या अर्ध-सार्वजनिक स्थलों पर फेंक दिया जाता है। इसके पीछे का कारण है, लोगों को आतंकित करना। विरोध-प्रदर्शन करने वाले परिवार खतरा महसूस करें। कई ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जहाँ परिवार के सदस्यों द्वारा गैर-कानूनी हत्याओं का विरोध करने के खिलाफ आवाज उठाने पर उन्हें अगवा कर लिया गया या फिर उनकी हत्या हो गई। सरकार ऐसी गतिविधियों को ‘आतंकवाद विरोधी’ कदम बताती है।

कानूनी लचरता और जवाबदेही का अभाव

पाकिस्तान में न्यायपालिका इस प्रकार के उत्पीड़न के लिए किसी को भी जवाबदेह ठहराने में पूरी तरह से नाकाम रही है। जब परिवार के लोग साक्ष्यों या गवाहों के साथ अदालत का रुख करते हैं तो कोई कार्रवाई नहीं होती है और यदि होती भी है तो बहुत मामूली। सैन्य एजेंसियाँ न किसी तरह की जाँच के दायरे में आती हैं और न ही उन्हें कोई नतीजा भुगतना पड़ता है, क्योंकि वे ‘राष्ट्रीय हितों’ के अंतर्गत काम करती हैं। देश में ‘एड ऑफ सिविल पॉवर रेगुलेशन’ जैसा कुख्यात कानून लागू है जो सुरक्षा बलों को बिना किसी उचित प्रक्रिया के नज़रबंदी केंद्रों में रखने की अनुमति देता है। जब इस प्रकार की नज़रबंदी होती है तो फिर परिणाम प्रताड़ना और कैद में मौत के रूप में सामने आता है, जिसमें किसी की कोई जवाबदेही नहीं होती।

उल्लेखनीय है कि बलूच मानवाधिकार परिषद के अनुसार 2000 के दशक की शुरुआत से बलूचिस्तान में 6000 से अधिक क्षत-विक्षत शव मिल चुके हैं। यह आकलन भी बहुत न्यूनतम आधार पर लगाया गया है। अभी भी एक बड़ी तादाद में लोग अभी भी गायब बताए जा रहे हैं, जिसमें किसी जाँच की भी कोई आस नहीं।

‘किल एंड डंप’ पॉलिसी असल में बलूच पहचान को मिटाने का एक हथियार है। इसके पीड़ितों में अधिकांश बलूच भाषी लोग होते हैं जो सांस्कृतिक अधिकारों की वकालत करते हैं। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPAC) परियोजना के अंतर्गत बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण का विरोध करने वालों को भी इसमें निशाना बनाया जाता है।

बलूच आबादी के प्रति भयावह उत्पीड़न के पर्याप्त साक्ष्यों के बावजूद अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस मामले में बहुत कम आवाज बुलंद की है। यदाकदा कुछ रिपोर्ट और शोध पत्रों में ही बलूच लोगों पर किए जा रहे जुल्मों और उनकी हत्या की बातें सामने आती हैं। दूसरी ओर, पाकिस्तान निरंतर सैन्य मदद, कूटनीतिक सहयोग और वित्तीय सहायता प्राप्त करता जा रहा है। मानवाधिकारों की पैरवी करने वाले अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों ने भी बलूचिस्तान के लोगों पर हो रहे अत्याचारों की ओर से आँखें फेर रखी हैं।

‘विदेशी हाथ’ का जुमला और जन-विरोधी नीतियाँ

पाकिस्तान में मीडिया संस्थानों पर मुख्य रूप से सेना का नियंत्रण है या फिर वे फौज से प्रभावित हैं। मिसाल के तौर पर ARY न्यूज, जियो टीवी और द नेशन अपनी कवरेज से ऐसा विमर्श गढ़ते हैं कि बलूचिस्तान के लोग विदेश प्रायोजित क़वायदों और राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों का हिस्सा हैं। इन मीडिया संस्थानों का मकसद गैर-कानूनी हत्याओं, सैन्य कब्जे, नस्लीय सफाये और संसाधनों के दोहन जैसी घरेलू शिकायतों से ध्यान भटकाना है।

ये संस्थान इस कदर प्रलाप करते हैं कि अपने प्रियजनों की तलाश करने वाले परिवारों को देश-विरोध करार देने लगते हैं। शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों के खिलाफ सरकारी मशीनरी लाठी चार्ज, टीयर गैस, गोलीबारी और गिरफ्तारी जैसे कदम उठाती है जो दंगाइयों से निपटने के लिए उठाए जाते हैं। उन पर सार्वजनिक व्यवस्था को बिगाड़ने या राष्ट्रविरोधी भावनाएँ भड़काने का अभियोग झेलना पड़ता है।

बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सख़्ती को बढ़ाने में चीन की भूमिका

बलूच विद्रोहियों पर पाकिस्तानी एजेंसियों की क्रूर सख्ती से जुड़ा मसला इस पहलू को देखते हुए और जटिल बन जाता है कि इसे एक अदृश्य ताकत से सहारा मिलता है। इसकी जड़ें चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपैक) जैसे अभियान से जुड़ी हैं जो चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) पहल के तहत आकार ले रही अरबों डॉलर की अहम परियोजना है। इस परियोजना ने बलूचिस्तान को एक उपेक्षित प्रांत से सैन्यीकृत आर्थिक क्षेत्र में तब्दील कर दिया है।

जहाँ सीपैक में हाईवे, बिजली संयंत्र और बंदरगाह जैसी परियोजनाओं का सब्जबाग दिखाया जा रहा है, वहीं बलूचिस्तान के लोगों को इसके जरिये उन पर बढ़ती निगरानी, हड़पी जा रही जमीन और उनकी गर्दनों को रौंदते फौजी बूट महसूस हो रहे हैं।

ग्वादर-विकास, लेकिन किसके लिए

ग्वादर बंदरगाह सीपैक परियोजना की मुकुट-मणि है। यह बलूचिस्तान के दक्षिणी तट पर स्थित है। वैसे तो इसे स्थानीय लोगों की कायापलट करने वाली परियोजना के रूप में पेश किया गया, लेकिन असल में यह बंदरगाह किसी अभेद्य किले से कम नहीं। उच्च सुरक्षा वाली एक दीवार ने बलूच समुदायों को मछली पकड़ने की उनका पारंपरिक जगह से ही परे धकेलने का काम किया है। जबकि चीनी नागरिक यहाँ पाकिस्तानी सेना की सुरक्षा में खुलेआम घूमते हैं। वहीं, स्थानीय बच्चों के लिए अभी भी स्वच्छ पेयजल और बिजली का अभाव बना हुआ है। इस बंदरगाह के फायदे अभी तक स्थानीय लोगों तक पहुँचने की राह नहीं बना पाए हैं, लेकिन इस्लामाबाद और बीजिंग तक ये लाभ बेधड़क पहुँच रहे हैं।

बलूचों ने इस अधिग्रहण का व्यापक रूप से विरोध किया, जिसका परिणाम उनके हिंसक दमन के रूप में निकला। ‘किल एंड डंप’ नीति प्रतिरोध की आवाज को दबाने की राज्य की रणनीति का हिस्सा है। इसका सीधा संदेश है-विरोध करने वाली आवाज दब जाए।

सीपीईसी मार्गों और बुनियादी ढाँचे की सुरक्षा के लिए बलूचिस्तान में हजारों की तादाद में सैन्यकर्मी तैनात हैं। हाईवे और चीनी साइटों के आसपास प्रतिबंधित क्षेत्र बन गए हैं खासतौर से राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मीडिया के लिए। यह सैन्यकरण चीनी हितों को देखते हुए उसके संग समन्वय के साथ हुआ है, जिसका परिणाम अक्सर घरों पर छापेमारियों, गिरफ्तारियों और कर्फ्यू के रूप में निकला है।

चीन ने हमेशा की तरह चुप्पी साधी हुई है। उसका सरकारी मीडिया अक्सर पाकिस्तानी नैरेटिव के सुर में सुर मिलाते हुए बलूच आंदोलन को आतंकी विद्रोह की संज्ञा देता है। यहाँ तक कि 2021 में दासु में अपने इंजीनियरों पर आत्मघाती हमले के बाद चीन ने पाकिस्तान से व्यापक सुरक्षा की गारंटी भी माँगी थी।  

बलूचिस्तान के संसाधनों का दोहन

सीपैक और अन्य द्विपक्षीय समझौतों के अंतर्गत चीनी कंपनियों को बलूचिस्तान में खनन अधिकारों से लाभ पहुँचा है। खासतौर से सोने, तांबा और रेयर अर्थ मिनरल्स के मामले में बलूचिस्तान काफी समृद्ध है। सैनडाक और रेको डिग जैसी परियोजनाएँ इसकी उदाहरण हैं, जहाँ मुनाफा हड़प लिया जाता है और स्थानीय लोग जमीन से बेदखल और बेरोजगार होकर रह जा रहे हैं। इन परियोजनाओं का विरोध करने वाले भी या तो जबरन अगवा कर लिए गए या ग्रामीण इलाकों में ‘अज्ञात शव’ पाए गए।

चीन वैसे तो प्रत्यक्ष रूप से दमन नहीं कर रहा है। हालाँकि, वह बड़ी खामोशी, लेकिन प्रभावी तरीके से बलूच विद्रोह को कुचलने में लगा है।

सांख्यिकीय सिंहावलोकन

सरकार प्रायोजित हिंसा के विरुद्ध बलूचिस्तान में आवाज़ ज़रूर उठी है, लेकिन पाकिस्तान इसकी भी हवा निकालने की पूरी कोशिश में लगा हुआ है। हालाँकि, स्वतंत्र संगठनों, लीक हुई रिपोर्ट और अधिकारों से जुड़े कार्यकर्ताओं से बहुत खराब स्थितियों के संकेत मिलते हैं।

‘वॉइस फोर बलूच पर्संस‘ (VBMP) के अनुसार, 2000 के दशक की शुरुआत के बाद 20,000 से अधिक बलूच लोग जबरन गायब कर दिए गए हैं। इनमें छात्र, डॉक्टर, पत्रकार, कवि और यहाँ तक कि बच्चे भी शामिल हैं। अधिकांश परिवारों को गिरफ्तारी का कोई कानूनी दस्तावेज नहीं मिला है और न ही संबंधित व्यक्ति के बारे में जानकारी या कोई अन्य ब्यौरा।

पाकिस्तान की ‘कमीशन ऑफ इनक्वायरी ऑन एनफोर्स्ड डिसअपिरियंस’ (COIED) ने स्वीकार किया है कि उसके समक्ष हजारों अनसुलझे मामले हैं, जिनमें से अधिकांश बलूचिस्तान से हैं। जबकि स्थानीय लोगों की दलील है कि ऐसे मामलों की पूरी जानकारी सामने नहीं रखी जा सकी है।

बलूच मानवाधिकार परिषद के अनुसार, जनवरी 2022 से दिसंबर 2022 के बीच 367 लोग गायब हो गए और गुमशुदा लोगों में से 79 के शव मिले, जिनकी गैर-क़ानूनी ढंग से हत्या कर दी गई। इनमें से 58 शवों की शिनाख्त नहीं हो पाई।

‘द ट्रिब्यून इंडिया’ के अनुसार, दिसंबर 2024 में केवल एक महीने के दौरान ही 22 लोगों को जबरन अगवा कर लिया गया जबकि पाँच लोगों की गैर-कानूनी ढंग से हत्या कर दी गई। इलाके में महीनों तक विरोध-प्रदर्शनों का सिलसिला चलता रहा।

बलूच लोग गंभीर संकट से जूझ रहे हैं, लेकिन दुनिया अभी तक खामोश है। पाकिस्तान की ‘किल एंड डंप’ नीति तमाम लोगों का जीवन ले चुकी है। इन लोगों की बात सुनने के बजाय सरकार उनका हरसंभव तरीके से दमन करने में लगी है। चीनी समर्थन और मीडिया की चुप्पी एवं सहयोग से क्रूरता का यह क्रम अनवरत जारी है। इससे पहले कि बलूचिस्तान में और जिंदगियाँ खत्म हो जाएँ, दुनिया को आगे आकर उसके पक्ष में आवाज बुलंद करनी चाहिए।

(इस खबर को मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखा है। आप इस लिंक के जरिए इसे पढ़ सकते हैं।)

स्कॉटलैंड की संसद में पेश हुआ हिंदूफोबिया के खिलाफ कानून, सांसद बोलीं- हिन्दुओं से लगातार हो रहा भेदभाव: अमेरिका में भी लाया गया था प्रस्ताव

स्कॉटलैंड की संसद में हिंदूफोबिया के खिलाफ प्रस्ताव पेश किया गया है। यहाँ पहली बार हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार को लेकर आधिकारिक रूप से निंदा की गई है। इस प्रस्ताव का नाम Motion S6M-17089 है।

इसे एडिनरबरा ईस्टर्न क्षेत्र की संसदीय सदस्य और अल्बा पार्टी की नेता ऐश रीगन ने पेश किया। इस प्रस्ताव का उद्देश्य स्कॉटलैंड में रहने वाले हिंदू समुदाय के साथ हो रहे भेदभाव, नफरत और समाज में उनकी अनदेखी के खिलाफ आवाज़ उठाना है।

संसद में पेश किए गए इस प्रस्ताव को कॉलिन बीट्टी, स्टेफनी कैलाघन और केविन स्टीवर्ट समेत कई सांसदों से समर्थन मिला है। इस प्रस्ताव में साफ तौर पर कहा गया है कि स्कॉटलैंड के हिंदू समुदाय को भेदभाव, बहिष्कार और नफरत का सामना करना पड़ रहा है।

ऐश रीगन ने प्रस्ताव पेश करते हुए कहा, “स्कॉटलैंड की विविधता इसकी ताकत है। लेकिन हम पूर्वाग्रह से पीड़ित लोगों की आवाज़ों को अनदेखा करते हुए उस विविधता का जश्न नहीं मना सकते। यह प्रस्ताव सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं है बल्कि यह एक ठोस बदलाव की माँग है।”

हिंदूफोबिया पर रिपोर्ट का असर

दरअसल, इस प्रस्ताव को एक अहम रिपोर्ट के आधार पर पेश किया गया है। गांधिवादी शांति समाज (GPS) की रिपोर्ट Hinduphobia in Scotland: Understanding, Addressing, and Overcoming Prejudice यानी ‘हिंदूफोबिया को समझना, उसका समाधान खोजना और उसे खत्म करना’ के आधार पर यह बात हो रही है।

रिपोर्ट को GPS के महासचिव ध्रुव कुमार, GPS के अध्यक्ष अनुरंजन झा, सुखी बैंस, अजित त्रिवेदी और इंडियन काउंसिल ऑफ स्कॉटलैंड एंड यूके के अध्यक्ष नील झाल ने लिखा है। रिपोर्ट में आँकड़े, पीड़ितों की गवाही और सच्ची घटनाएँ शामिल हैं।

स्कॉटलैंड के 30 हज़ार हिंदुओं की आपबीती

रिपोर्ट में कई चौंकाने वाली बातें सामने आई हैं, जिसमें मंदिरों पर हमले और तोड़फोड़, कार्यस्थल पर हिंदू कर्मचारियों के साथ भेदभाव, हिंदू त्योहारों और परंपराओं को लेकर मजाक, स्कूलों और सार्वजनिक जीवन में सांस्कृतिक अनदेखी और कई बार शारीरिक या मानसिक हमले शामिल भी शामिल की गई हैं। ये सारी घटनाएँ स्कॉटलैंड में रह रहे 30 हज़ार हिंदू आबादी से ली गई हैं।

अमेरिका के जॉर्जिया में भी आया है प्रस्ताव

स्कॉटलैंड हिंदूफोबिया के खिलाफ प्रस्ताव पेश करने वाला पहला देश नहीं है। हाल ही में अमेरिका के जॉर्जिया राज्य में हिंदूफोबिया के खिलाफ विधेयक लाया गया था। इस कानून को सीनेट में डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन सदस्यों ने समर्थन दिया है। हालाँकि अभी यह विधेयक सीनेट से पास नहीं हुआ है। अगर यह पारित होता है तो हिंदूफोबिया को घृणा आधारित अपराधों में रखा जाएगा और इसके लिए हिंदू हितों की रक्षा संबंधित नियम बनाए जाएँगे।

औरतों को क्यों दें संपत्ति में अधिकार…बांग्लादेश में महिला आयोग की रिपोर्ट पर भड़की मुल्ला जमात, बोले- ये सब इस्लाम के खिलाफ

बांग्लादेश में महिलाओं को अधिकार देने की बात पर इस्लामी कट्टरपंथी भड़क गए हैं। महिलाओं को सम्पत्ति में हिस्सा देने की बात पर कट्टरपंथी नाराज हैं। इसके लिए सिफारिश करने वाली रिपोर्ट को उन्होंने खारिज करने की बात की है। शेख हसीना के बांग्लादेश की सत्ता से जाने के बाद लगातार महिला अधिकारों पर हमले हो रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बांग्लादेश में हाल ही में महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करने वाले आयोग ने एक रिपोर्ट मोहम्मद यूनुस को सौंपी है। इस रिपोर्ट में महिलाओं की भलाई के लिए 433 सिफारिशें की गई हैं।

अब बांग्लादेश की जमात-ए-इस्लामी, इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश (IAB), और हिफाजत-ए-इस्लाम जैसे इस्लामी संगठनों ने इसे ‘नामंजूर’ बताया है। उन्होंने यूनुस सरकार से इसे रद्द करने की माँग भी की है।

महिलाओं को सम्पत्ति के अधिकार के खिलाफ हैं कट्टरपंथी

महिला आयोग की रिपोर्ट में बांग्लादेश के भीतर महिलाओं और पुरुषों को समान संपत्ति देने के अधिकार की बात की गई है। इस पर जमात के महासचिव मिया परवार ने कहा कि यह प्रस्ताव इस्लामी कानूनों के खिलाफ है और इसे लागू करना ‘शरिया के खिलाफ खड़ा होना’ होगा।

परवार ने कहा कि इसमें कई ऐसे प्रावधान है जो इस्लामी मान्यता के अनुसार निकाह, तलाक और विरासत नियमों के खिलाफ हैं। उन्होंने यह भी बताया कि इस्लाम में मर्द और औरत को बराबर रखा जाता है लेकिन दोनों के काम अलग-अलग बताए गए हैं।

कट्टरपंथी संगठन इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश की महिला शाखा ने रिपोर्ट को सांस्कृतिक और मजहबी मामलों से अलग बताया। हिफाजत-ए-इस्लाम ने महिला आयोग की पूरी संस्था को खत्म करने की माँग की और इसे इस्लामी कानूनों पर हमला करार दिया। उलेमा माशायेख परिषद ने मजहबी भावनाओं का अपमान बताते हुए रिपोर्ट को खारिज किया है। 

तख्तापलट के बाद महिलाएँ टारगेट पर

बांग्लादेश में लगातार इस्लामी कट्टरपंथियों के निशाने पर महिलाएँ हैं। यह बांग्लादेश में शेख हसीना के तख्तापलट के बाद से बढ़ा है। इससे पहले जनवरी 2025 में महिला फुटबॉल मैचों को भी निशाना बनाया गया था, जहाँ इस्लामी कट्टरपंथी महिलाओं के फुटबॉल खेलने को इस्लामी विरोधी बताकर तोड़फोड़ की गई थी।

इसके अलावा नाबालिग और महिलाओं के साथ बलात्कार और यौन उत्पीड़न की घटनाएँ भी बांग्लादेश में बढ़ती जा रही हैं। बांग्लादेश में दहेज के नाम पर हिंसा, बाल विवाह, और कार्यस्थलों पर भेदभाव अब भी व्यापक स्तर पर देखे जा रहे हैं। महिलाओं के अधिकारों की वकालत करने वाली कार्यकर्ता कई बार धमकियों और हमलों का शिकार होती हैं।

इस्लामी कट्टरपंथियों का यूसीसी विरोध

बांग्लादेश ही नहीं भारत में भी UCC जैसे कानूनों का इस्लामी कट्टरपंथी विरोध करते आए हैं। इसी कड़ी में वह UCC जैसे कानून भी लागू ना किए जाने की माँग करते रहे हैं। गौरलतब है कि साल 2024 में UCC कानून उत्तराखंड में लागू किया गया था, जिसके खिलाफ इस्लामी कट्टरपंथी आ गए थे।

जनजातियों को जगाने के लिए जमीन पर चंपई सोरेन का अभियान: बोले – संथाल परगना में 9% से 24% हो गए मुस्लिम, धर्मांतरण के बाद छीना जाए आरक्षण

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन ने संथाल परगना में लगातार जनजातीय की आबादी में आ रही कमी को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने इसका कारण धर्मांतरण बताया है। उन्होंने कहा कि अगर इसे नहीं रोका गया तो जनजातीय समाज का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। उन्होंने मौजूदा प्रदेश सरकार द्वारा खुद को ‘अबुआ सरकार’ कहे जाने पर भी तंज कसा।

दरअसल, रविवार (20 अप्रैल, 2025) को चाकुलिया शहर के टाउन में भारत जकात माझी परगना महाल एवं जनजातीय साँवता सुसार अखाड़ा के संयुक्त तत्वाधान में जनजातीय महासम्मेलन आयोजित किया गया। कार्यक्रम में शिरकत करने पहुँचे प्रदेश के पूर्व CM चंपई सोरेन ने जनजातीय समाज को जगाने की बात कही।

उन्होंने कहा, “जागो आदिवासी जागो! चाकुलिया की धरती से मैं आदिवासियों को जगाने आया हूँ। हमें झारखंड में धर्म-परिवर्तन को हर हाल में रोकना होगा। वरना, यहाँ भी मुर्शिदाबाद जैसे हालात बन जाएँगे।”

सोरेन ने कहा, “यदि धर्म-परिवर्तन नहीं रुका तो आदिवासियों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। झारखंड में सिर्फ नाम की अबुआ सरकार है। राँची, लोहरदगा, गुमला, साहिबगंज, पाकुड़ हर तरफ तेज़ी से धर्मांतरण हो रहा है। सरकार चुप्पी साधी हुई है। आदिवासियों की परंपरागत माँझी परगना महाल व्यवस्था खत्म हो रही है।”

पूर्व सीएम ने कॉन्ग्रेस पर जनजातीय समाज के साथ हमेशा से धोखा करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “वर्ष 1967 में सबसे पहले कॉन्ग्रेस पार्टी के सांसद कार्तिक उराँव ने संसद में आदिवासी परंपरा को बचाने के लिए डिलिस्टिंग लागू करने की माँग की थी। लेकिन, तत्कालीन इंदिरा गाँधी सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया। कॉन्ग्रेस ने हमेशा आदिवासियों के साथ धोखा किया है। आज राज्य की सत्ता में वह भी साझेदार है। इसलिए यह सरकार कभी आदिवासियों का विकास नहीं कर सकी।”

जनजातीय समाज की लड़कियों का आरक्षण रोकना जरूरी

चंपई सोरेन ने कहा कि संथाल परगना की हालत ऐसी है कि वहाँ मुखिया एवं जिला परिषद जनजातीय महिलाएँ हैं पर उनके पति मुस्लिम है। ऐसा यदि होता रहा तो जनजातीय समाज की संख्या और घट जाएगी। इसलिए दूसरे समुदाय में विवाह करने वाली जनजातीय लड़कियों का आरक्षण रोकना जरूरी है। इसे लेकर संथाल परगना में जल्द ही लाखों की संख्या में जनजातियों को जुटाकर बड़ा आंदोलन खड़ा किया जाएगा।

जनजातियों का इतिहास संघर्षों से भरा

पूर्व सीएम चंपाई सोरेन ने कहा, “आदिवासियों का इतिहास संघर्ष से भरा हुआ है। बाबा तिलका माँझी से लेकर सिद्धू-कान्हू, चाँद भैरव, बिरसा मुंडा सबने आज़ादी की लड़ाई लड़ी थी। उसके बाद दिशोम गुरु शिबू सोरेन एवं मेरे नेतृत्व में झारखंड अलग राज्य की लड़ाई लड़ी गई।”

उन्होंने ध्यान दिलाया कि आज धर्म-परिवर्तन के जरिए हमारे अस्तित्व एवं परंपरागत व्यवस्था पर चोट पहुँचाई जा रही है, इसके खिलाफ भी संघर्ष के लिए तैयार रहना है।

जनजातियों का अधिकार छीन रही सरकार

जनजातीय सम्मेलन में दिशोम तरफ परगना चंद्र मोहन मंडी ने कहा कि राज्य की वर्तमान सरकार जनजातीय समाज का अधिकार छीन रही है। सुप्रीम कोर्ट ने PESA Act के जरिए जो अधिकार हमें दिया है, उसका अनुपालन नहीं किया जा रहा। उन्होंने कहा कि जनजातियों पर अत्याचार एवं धर्मांतरण बढ़ता जा रहा है, राज्य की ‘अबुआ सरकार’ आदिवासियों को छलने का काम कर रही है।

संथाल परगना में मुस्लिम आबादी बढ़ी

चंपई सोरेन ने संथाल परगना में हो रहे धर्मांतरण और आदिवासियों की आबादी में कमी को लेकर चिंता जताई है। इस संबंध में झारखंड हाईकोर्ट ने भी मौजूदा हेमंत सोरेन की सरकार से साल 2024 में माँगा था। दरअसल, हाईकोर्ट में बांग्लादेशी घुसपैठ को लेकर दानियल दास की ओर से जनहित याचिका दायर की गई थी। मामले में हाईकोर्ट ने झारखंड सरकार पर प्रश्न उठाए। हाईकोर्ट ने सवाल पूछा था कि जब बांग्लादेशी घुसपैठ से इनकार किया जा रहा है तो भला जनजातीय जनसंख्या कैसे घट गई।

हाईकोईट के पास पहुँचे आँकड़ों में इस संथाल परगना में अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या 1951 में 44.67% थी जो वर्ष 2011 में घट कर 28.11% तक आ गई। इसे दिनांक 8 अगस्त, 2024 के आदेश में नोट भी किया गया है। यानी कि जनजातीय आबादी में 16 फीसदी की कमी आई है।

उस वक्त केंद्र ने जनजातीय आबादी के कम होने के पीछे दो कारण बताए थे, जिसमें पहला पलायन और दूसरा धर्मांतरण। अब धर्मांतरण के मुद्दे को ही चंपई सोरेन ने रेखांकित किया है। केंद्र ने ये भी बताया था कि जहाँ जनजातीय आबादी घटी है तो वहीं संथाल परगना में मुस्लिम आबादी 20 से 40 फीसदी तक बढ़ी है।

1951 से 2011 में हिंदू की आबादी में कमी

बता दें कि केंद्र के अनुसार, 1951 की जनगणना में संथाल परगना की कुल जनसंख्या 23,22,092 थी, जिसमें हिंदू 90.37 प्रतिशत, मुस्लिम 9.43 प्रतिशत और ईसाई 0.18 प्रतिशत थे। वहीं, 2011 की जनगणना में संथाल परगना की कुल जनसंख्या 69,69,097 हो गई, जिसमें हिंदू 67.95 प्रतिशत रह गए, मुस्लिमों की संख्या 22.73 प्रतिशत हो गई और ईसाई 4.21 प्रतिशत हो गए।

कर्नाटक में 30 साल में 94% बढ़े मुस्लिम, आबादी 39 लाख से 77 लाख पहुँची: सर्वे ने बताया- हिन्दू लिंगायत सिर्फ 8% बढ़े, रिपोर्ट देख कॉन्ग्रेस नेता भिड़े

कर्नाटक में मुस्लिम आबादी तीन दशक में लगभग दोगुनी हो गई। जबकि इस दौरान कर्नाटक के लिंगायत हिन्दुओं की जनसंख्या में लगभग 10% ही बढ़ोतरी हुई। यह सारे आँकड़े कर्नाटक में करवाए गए जातिगत जनगणना के सर्वे से सामने आए हैं। मुस्लिम कर्नाटक में दलितों के बाद सबसे बड़ा समूह हैं।

94% बढ़ी मुस्लिम आबादी

डेक्कन हेराल्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार, 1984 में कर्नाटक के भीतर जातियों की संख्या पता लगाने के लिए किए गए वेंकटस्वामी कमीशन के सर्वे ने मुस्लिमों की आबादी 39.63 लाख थी और यह प्रदेश की जनसंख्या में 10.97% का हिस्सा रखते थे। इसी सर्वे में सामने आया था कि कर्नाटक में वीराशैव-लिंगायत 61.14 लाख हैं और उनका राज्य की आबादी में 16.92% है।

इसके अलावा वोक्कालिगा समुदाय की आबादी 42.19 लाख बताई गई थी और उनका राज्य की जनसंख्या में हिस्सा तब 11.68% था। 1984 के सर्वे में राज्य की दलित आबादी 57.31 लाख बताई गई थी। दलितों का राज्य की आबादी में हिस्सा लगभग 16% था।

2015 के सर्वे में यह स्थितियाँ पूरी तरह से बदल चुकी हैं। इस सर्वे से सामने आया है कि 1984 से 2015 के बीच कर्नाटक में मुस्लिम आबादी लगभग दोगुनी हो चुकी है। इस सर्वे के अनुसार, 2015 में मुस्लिम आबादी 76.9 लाख थी। यानी इन 30 वर्षों में राज्य में मुस्लिम आबादी 94% बढ़ी है।

इसी बीच लिंगायतों की आबादी मात्र 8.50% बढ़ी जबकि वोक्कालिगा इस दौरान 46% बढ़ पाए। मुस्लिमों की आबादी दोगुनी होने के चलते वह अब OBC के भीतर सबसे बड़ा समूह हैं। उनका आरक्षण भी इस सर्वे में 4% से बढ़ा कर 8% करने की सिफारिश की गई है।

आबादी में हिस्सा भी बढ़ा

इसी सर्वे के अनुसार, राज्य की कुल आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी 18.08% है, जो 2011 की जनगणना में 12.92% बताई गई थी। सर्वे का यह आँकड़ा 2015 का है। ऐसे में 4 साल में मुस्लिम आबादी की हिस्सेदारी कर्नाटक में 5.16% बढ़ गई।

रिपोर्ट में उनका आरक्षण बढ़ाने की सिफारिश के पीछे राज्य में OBC की हिस्सेदारी सबसे अधिक होना कारण बताया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि राज्य में कुल आबादी में ओबीसी की हिस्सेदारी 69.60% है, ऐसे में उन्हें जनसंख्या के आधार पर आरक्षण मिलना चाहिए।

रिपोर्ट में और क्या?

इस सर्वे OBC आरक्षण 32% से बढ़ाकर 51% करने की सिफारिश की गई है। यह सिफारिश अगर मानी जाती हैं, तो राज्य में कुल आरक्षण 85% हो जाएगा। इस 85% में 51% OBC आरक्षण होगा जबकि 24% आरक्षण अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए रहेगा।

इसके अलावा 10% आरक्षण आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी EWS को पहले की तरह मिलता रहेगा। ध्यान देने योग्य बात यह है कि पिछड़ा वर्ग आयोग ने OBC और मुस्लिम आरक्षण को बढ़ाने की सिफारिश तो की है लेकिन SC-ST तथा EWS आरक्षण को पहले की तरह ही रखने की बात कही है।

अब हो रहा विरोध

कॉन्ग्रेस के अंदर ही अब 2015 के सर्वे का विरोध हो रहा है। कर्नाटक के उद्योग मंत्री एमबी पाटिल का कहना है कि कैबिनेट में सात लिंगायत मंत्री हैं और हम सभी एक साथ हैं। वहीं, वोक्कालिगा समुदाय के कई नेता और संत भी इस रिपोर्ट का खुलकर विरोध कर रहे हैं।

उनका कहना है कि उनकी जनसंख्या को कम आँककर उनके साथ अन्याय किया गया है। मंड्या से कॉन्ग्रेस विधायक रविकुमार गौड़ा (गनीगा) का कहना है कि रिपोर्ट में वोक्कालिगा समुदाय की संख्या कम बताई गई है। ये रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए।

17 अप्रैल, 2025 को हुई कैबिनेट बैठक में ये रिपोर्ट कैबिनेट के सामने रखी गई है, लेकिन इस पर कोई भी अंतिम फैसला नहीं लिया जा रहा है।

राहुल गाँधी ने फिर विदेश जाकर किया देश को बदनाम, चुनाव प्रणाली से लेकर EC पर भी उठाए सवाल: BJP नेता बोले- ये जॉर्ज सोरोस के एजेंट, सिर्फ ‘भारत विरोधी’ काम करेंगे

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने चुनाव आयोग को लेकर अमेरिका में विवादित बयान दिया है। राहुल गाँधी ने दावा किया है कि चुनाव आयोग समझौता कर चुका है। उन्होंने इस बयान में महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। राहुल गाँधी 2 दिन के लिए अमेरिका गए हुए हैं।

उन्होंने विदेशी धरती पर भारत का यह आंतरिक मुद्दा ब्राउन यूनिवर्सिटी में एक कार्यक्रम के दौरान उठाया। उन्होंने दावा किया कि देश की चुनावी प्रणाली में ‘बड़ी समस्या’ है। राहुल गाँधी ने कहा, “सरल शब्दों में कहूँ तो महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में जितने लोगों ने वोट डाले, उतने वयस्क (बालिग) लोग महाराष्ट्र में है ही नहीं और यह एक तथ्य के आधार पर कह रहा हूँ।”

राहुल गाँधी ने दावा किया, “शाम 5:30 बजे तक के मतदान आँकड़े उपलब्ध थे, लेकिन 5:30 बजे से 7:30 बजे के बीच जब मतदान समाप्त हो जाना चाहिए था, लेकिन इसके बाद भी 65 लाख अलग से वोट डाले गए थे।”

राहुल गाँधी ने इसे भौतिक रूप से असंभव बताया और कहा, “एक व्यक्ति को वोट डालने में लगभग 3 मिनट लगते हैं, तो यदि हम हिसाब लगाए तो इसका मतलब है कि लोग आधी रात 2 बजे तक वोट डालने के लिए लाइन में खड़े थे और मतदान पूरी रात चलता रहा, जो कि सच नहीं है।”

राहुल गाँधी ने चुनाव में मत प्रतिशत बढ़ने का यह मुद्दा चुनाव आयोग द्वारा स्पष्टीकरण दिए जाने के बाद भी उठा रहे हैं। महाराष्ट्र चुनाव के बाद दिसम्बर, 2024 में भी राहुल गाँधी ने यही बातें कहीं थी। इसके बाद चुनाव आयोग ने बताया था कि मतदान के अंतिम आँकड़े में वोटिंग के दिन आए आँकड़ों से बदलाव संभव है।

राहुल गाँधी के इस बयान को लेकर भाजपा अब हमलावर हो गई है। उनके भारत विरोधी बयान पर निशाना साधते हुए भाजपा प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने एक्स (पहले ट्विटर) पर लिखा, “जो राहुल गाँधी अपने ही देश में मतदाताओं का विश्वास नहीं जीत सकते, वे विदेश जाकर भारतीय लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे है।”

भाजपा प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने राहुल गांधी को ‘लोकतंत्र विरोधी और ‘भारत विरोधी’ बताया। उन्होंने कहा कि राहुल गाँधी जॉर्ज सोरोस के एक एजेंट है, जो हमेशा विदेशी धरती पर देश को बदनाम करते हैं, आग उगलते हैं।

यह कोई पहला मौक़ा नहीं है जब राहुल गाँधी ने विदेश में भारत और उसकी एजेंसियों को लेकर विवादित बातें की हो। इससे पहले वह सितम्बर, 2024 में अमेरिका दौरे के दौरान भी भारतीय लोकतंत्र को लेकर कई ऐसी ही बातें कह चुके हैं। उन्होंने इस दौरान भारत की तुलना सीरिया और ईराक से कर दी थी।

डर से घर छोड़ भाग गए थे हिन्दू, कोई तोड़फोड़ नहीं हुई: मुर्शिदाबाद हिंसा पर TMC विधायक अमीरुल इस्लाम का बयान, बोले- हमारे शहर में ‘सामान्य’ हो रही स्थिति

पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में इस्लामी कट्टरपंथियों के डर के चलते सैकड़ों हिन्दू पलायन कर गए थे, लेकिन राज्य में सत्तारूढ़ TMC इसे मानने को तैयार नहीं है। TMC के एक विधायक ने कहा है कि वह हिन्दू घबरा कर चले गए और उन्हें हिंसा से कोई डर नहीं था। TMC के विधायक अमीरुल इस्लाम ने यह बातें कहीं है। उन्होंने तोड़फोड़ की बात भी नकार दी है।

अमीरुल इस्लाम मुर्शिदाबाद के उसी शमशेरगंज से विधायक हैं, जहाँ सबसे अधिक हिंसा इस्लामी कट्टरपंथियों ने की थी। अमीरुल इस्लाम ने रविवार (20 अप्रैल, 2025) को हिंसा प्रभावित धुलियान और बाक़ी इलाकों का दौरा किया। उनके साथ TMC के और भी नेता थे।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमीरुल इस्लाम ने कहा, “इन लोगों (हिन्दुओं) को वापस नहीं लाया गया, वे स्वेच्छा से वापस आए हैं… उनके इलाके में घरों में तोड़फोड़ नहीं की गई, वे सिर्फ डर के मारे भाग गए। और अब वे घर लौट रहे हैं… हमारा शहर सामान्य स्थिति की ओर लौट रहा है।”

मुर्शिदाबाद में डर के चलते भागे हिन्दुओं को वर्तमान में राज्य की पुलिस वापस ला रही है। अमीरुल इस्लाम ने इन्हीं के वापस लाए जाने पर यह दावे किए हैं। जहाँ उन्होंने कोई हमला ना होने का दावा किया है वहीं हालिया रिपोर्ट्स ने बताया है कि उन्होंने इस दौरान इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा मारे गए हिन्दू चंदन दास और हरगोबिन्द दास के परिजनों से भी मुलाक़ात की।

अमीरुल इस्लाम के साथ पहुँचे MP समीरुल इस्लाम ने यहाँ पर भी अड़ियल रवैया अपनाए रखा। उन्होंने कहा कि चंदन दास का परिवार अभी मुआवजा नहीं स्वीकार कर रहा है लेकिन बाद में यह कर लेगा। चंदन दास के परिवार ने ममता सरकार द्वारा दिया गया ₹10 लाख का मुआवजा ठुकरा दिया था।

समीरुल इस्लाम ने कहा है कि जब सब बाहरी लोग चले जाएँगे तो इनके पास लोकल ही बचेंगे। इससे पहले भी TMC के नेता मुर्शिदाबाद में हुई हिंसा के ऊपर लीपापोती करते आए हैं। हालाँकि, इससे यहाँ के हिन्दुओं का खौफ नहीं जा रहा है।

गौरलतब है कि 11 अप्रैल, 2025 को मुर्शिदाबाद के धुलियान और शमशेरगंज इलाकों में वक्फ कानून के विरोध के नाम पर इस्लामी भीड़ ने भारी हिंसा की थी। इस हिंसा के दौरान हिन्दुओं के घरों-दुकानों को निशाना बनाया गया था। 3 हिन्दू मार भी दिए गए थे। इसके बाद मुर्शिदाबाद से बड़ी संख्या में हिन्दू मालदा और झारखंड भाग गए थे।

इन हिन्दुओं ने बताया था कि इस्लामी कट्टरपंथी उन्हें महिलाओं के रेप के बदले जीवित छोड़ने की बात कह रहे थे। उन्होंने BSF और बाकी केन्द्रीय सुरक्षाबलों के मुर्शिदाबाद में स्थायी रूप से तैनात किए जाने की माँग की थी।