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जब औरंगज़ेब ने जारी किया सभी मंदिरों को ध्वस्त करने का फरमान… काशी-मथुरा ही नहीं, पुरी से लेकर सोमनाथ तक को भी नहीं छोड़ा: कालकाजी में ब्राह्मण ने उठाई तलवार

भारत के इतिहास में एक लंबा कालखंड ऐसा रहा, जब दिल्ली में इस्लामी शासन रहा और हिन्दुओं को अपने ही देश में दोयम दर्जे का नागरिक बनकर रहना पड़ा। इसमें सबसे लंबे समय तक दिल्ली की तख़्त पर मुग़लों का शासन रहा। मुग़ल अफगान तैमूर और मंगोल चंगेज खान के वंशज थे। उनके पूर्वज भी आततायी ही थे। इसके बावजूद मुग़लों को वामपंथी इतिहासकारों ने कुछ ऐसे पेश किया जैसे वो कला व संस्कृति के सबसे बड़े संरक्षक हों। हालाँकि, सच्चाई इसके इतर थी। मुग़ल राज में हिन्दुओं को जजिया कर देना होता था। मंदिर ध्वस्त किए जाते थे। इन्हीं मुग़ल शासकों में एक था – औरंगज़ेब।

औरंगज़ेब अंतिम सबसे प्रभावशाली मुग़ल शासक था, उसके बाद मुग़लों का राज सिर्फ़ दिल्ली और फिर लाल किले तक ही सीमित होकर रह गया। लेकिन, औरंगज़ेब के शासनकाल के 5 दशक हिन्दुओं के लिए किसी अंधकार युग से कम नहीं थे। पंजाब में गुरु गोबिंद सिंह, महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी महाराज और छत्रपति संभाजी महाराज, बुंदेलखंड में छत्रसाल, असम में लाचित बरफुकन और दिल्ली के आसपास जाटों ने उसकी नाक में दम करके रखा। अपने जीवन के अंतिम ढाई दशक उसने डेक्कन फ़तह करने की कोशिश में बिता दिए। अपनी इस सनक में औरंगज़ेब ने मुग़ल साम्राज्य का सारा संसाधन गँवा दिया।

वामपंथी इतिहासकारों ने किया औरंगज़ेब का बचाव

वो औरंगज़ेब का ही कालखंड था, जब काशी स्थित विश्वनाथ मंदिर और मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर को ध्वस्त करके वहाँ मस्जिदें खड़ी कर दी गईं। सन् 1669 में काशी में मंदिर को ध्वस्त कर उसके अवशेषों के ऊपर संरचना खड़ी करके उसे ‘ज्ञानवापी मस्जिद’ नाम दे दिया गया। जबकि ज्ञान और वापी, दोनों ही संस्कृत शब्द हैं। इसका अर्थ है – विद्या का कुआँ। वामपंथी इतिहासकारों ने औरंगज़ेब का बचाव करने के लिए एक नया शिगूफा छेड़ा, वो लिखने लगे कि मंदिरों को ध्वस्त किए जाने के पीछे कोई मजहबी मंशा थी ही नहीं, ये सब राजनीतिक था।

औरंगज़ेब ने इन मंदिरों को क्यों ध्वस्त करवाया? अगर आप इतिहासकार ऑड्रे ट्रुश्के को पढ़ेंगे तो वो लिखती हैं कि औरंगज़ेब के शासनकाल के अंत में भी सैकड़ों हिन्दू-जैन मंदिर खड़े रहेमंदिर वहीं एक अन्य इतिहासकार सिंथिया टैलबोट की मानें तो मथुरा में एक दंगा होने की वजह से वहाँ के मंदिर को ध्वस्त किया गया। हालाँकि, सच्चाई आपको औरंगज़ेब के समय की ही पुस्तक ‘मआसिर-ए-आलमगीरी’ में मिल जाएगी। इसके अनुसार, औरंगज़ेब ने ‘इस्लाम की स्थापना’ के उद्देश्य से ऐसा किया था। साथ ही उसका मानना था कि इन मंदिरों में ‘काफिर’ लोग अपनी ‘झूठी किताबें’ पढ़ाते थे।

यही कारण है कि औरंगज़ेब ने न केवल मंदिरों, बल्कि कई गुरुकुलों को भी ध्वस्त करवाया। भारत हमेशा से विद्या की धरती रही है। यहाँ वर्षों से ‘विद्या ददाति विनयं’, ‘विद्या नरस्य रूपमधिकं’, ‘नास्ति विद्यासमो बंधु’ और ‘विद्या नाम नरस्य कीर्तितुला’ पढ़ाया जाता रहा है। खगोलीय गणनाओं से लेकर जाती गणित तक, अर्थशास्त्र से लेकर नीतिशास्त्र तक, सैकड़ों वर्षों से छात्र इन सबका अध्ययन करते आ रहे हैं। बख़्तियार खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय ‘रत्नोदधि’ को जलाया था तो कई लाख पुस्तकें बर्बाद हो गई थीं। औरंगज़ेब भी हिन्दू धर्म के बृहद ज्ञान-भण्डार से खार खाया रहता था।

शरिया क़ानून के हिसाब से मंदिर ध्वस्त करना वैध

साफ़ है, उसने स्थानीय बगावतों का इस्तेमाल किया अपने मजहबी एजेंडे को पूरा करने के लिए। एक बहाने के रूप में राजनीतिक परिस्थितियों का इस्तेमाल किया गया, इसे एक आवरण बनाकर अपनी कट्टरपंथी कार्रवाइयों को ढँका गया। जहाँ तक कई छोटे-छोटे मंदिरों के उसके शासनकाल के अंत तक अस्तित्व में रहने का सवाल है – किसी बड़े मंदिर को ध्वस्त करना इस्लामी आक्रांताओं के लिए बड़ा सन्देश देने का कार्य करता, सिवाए छोटे मंदिरों को तोड़ने के। हालाँकि, इस्लामी फ़ौज राह चलते छोटे मंदिरों को भी ध्वस्त करते चलते थे। फिर भी, महमूद गजनी द्वारा सोमनाथ मंदिर को ध्वस्त किया जाना पूरे इस्लामी मुल्क़ में किंवदंतियों का आधार बना। अतः, भव्य मंदिर हमेशा से निशाने पर थे।

इस्लाम में ‘हनफ़ी’ क़ानून के तहत ये वैध था। आख़िर ऑटोमन साम्राज्य ने भी तो इस्ताम्बुल स्थित हागिया सोफिया चर्च को मस्जिद में तब्दील कर दिया था। सोशल मीडिया पर जो लोग ये कहते हैं कि औरंगज़ेब बादशाह था और जो चाहे वो कर सकता था, इसीलिए अगर वो मंदिरों को ध्वस्त करने पर आता तो देश में एक भी मंदिर नहीं बचते – ऐसा मानने वालों को इतिहास का ज्ञान नहीं है। निचले स्तर पर और सेना में अधिकतर हिन्दू ही होते थे, ऐसे में औरंगज़ेब जैसे बादशाह एकदम से सारे मंदिरों को ध्वस्त नहीं कर सकते थे। ये मौक़े की तलाश में रहते थे। मुग़ल दरबार में भी हिन्दुओं का प्रभाव था, ख़ासकर के जयपुर-आमेर राजघराने का।

1669 ईस्वी में ही औरग़ज़ेब ने एक फरमान जारी करके कई मंदिरों और विद्यालयों को ध्वस्त करने का आदेश दिया था। इसमें ख़ासकर के ठट्टा, मुल्तान और वाराणसी का जिक्र था। औरंगज़ेब का दावा था कि यहाँ ‘ग़लत पुस्तकें’ पढ़ाई जा रही हैं। हालाँकि, औरंगज़ेब का ये आदेश पूरा मुग़ल साम्राज्य में लागू नहीं किया जा सका, लेकिन कई मंदिर ध्वस्त किए गए। इसी तरह, सन् 1662 में औरंगज़ेब ने पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर को ध्वस्त किए जाने का फरमान जारी किया। लेकिन, जिन स्थानीय अधिकारियों को इस आदेश की तामील करानी थी उन्हें घूस दिया गया। मंदिर को बचाने के लिए इसे कई दिनों तक बंद रखा गया। सन् 1707 में औरंगज़ेब की मौत के साथ ही यहाँ दर्शन-पूजन फिर से शुरू किया जा सका।

तीर्थस्थलों से टैक्स वसूलते थे मुग़ल

एक और तथ्य पर ध्यान दीजिए, कई बड़े मंदिरों और तीर्थस्थलों से इन मुग़लों को पैसे मिलते थे। यहाँ तक कि कुंभ जैसे आयोजनों से भी इन आक्रांता शासकों की बड़ी कमाई होती थी। हिन्दुओं से टैक्स भी वसूलना था और इस्लाम का शासन भी स्थापित करना था। मजहबी लक्ष्य तो था ही, लेकिन लुटेरे प्रवृत्ति के इन आक्रांताओं ने जहाँ टैक्स से अधिक कमाई की संभावना थी वहाँ नरमी बरती। जैसे, 1724 में भी जगन्नाथ मंदिर को ध्वस्त करने का फरमान जारी किया गया था। रामचंद्र देव द्वितीय ने इस्लाम अपनाने का नाटक किया और प्रतिमाओं को छिपा दिया गया। बाद में प्रतिमाओं को पुनः स्थापित किया गया क्योंकि 9 लाख रुपए का नुकसान हुआ था।

चूँकि मुग़लों को मंदिरों को लूटकर धन कहीं ले तो जाना नहीं था, इसीलिए उन्होंने बड़ी चालाकी से हिन्दुओं पर टैक्स लगाकर हर साल की कमाई की व्यवस्था की। औरंगज़ेब ने जिन मंदिरों को ध्वस्त करने का फरमान जारी किया था, उनमें एलोरा का कैलाशा मंदिर भी शामिल था। एक पूरी की पूरी फौज इसे ध्वस्त करने के लिए लगाई गई थी, लेकिन स्थानीय लोगों ने इसका जमकर विरोध किया। आज भी इस मंदिर को वास्तुकला के सर्वोत्तम उदाहरणों में से एक माना जाता है। उस समय भी इस मंदिर की मजबूत संरचना और श्रद्धालुओं के प्रतिरोध के कारण 3 साल प्रयास करने के बावजूद औरंगज़ेब इसमें सफल नहीं हो पाया। आज भी कैलाशा मंदिर खड़ा है, ये हिन्दू समाज की जिजीविषा का ही प्रमाण है।

कालकाजी से लेकर सोमनाथ मंदिर तक को करवाया ध्वस्त

इससे पहले औरंगज़ेब दिल्ली के कालकाजी मंदिर के ध्वस्तीकरण के लिए भी फरमान जारी कर चुका था। ये फरमान 3 सितंबर, 1667 को जारी किया गया था। कारण ये बताया गया था कि वहाँ बड़ी संख्या में हिन्दुओं का जुटान हो रहा है। इसके बाद औरंगज़ेब ने 100 मजदूरों को उस मंदिर को ध्वस्त करने के लिए भेजा। ‘सियाह अख़बारात-ए-दरबार-ए-मुअल्ला’ नामक मुग़ल दस्तावेज में ये जिक्र मिलता है कि एक ब्राह्मण ने उस दौरान तलवार निकाल कर मंदिर की रक्षा करने का प्रयत्न किया था। उसने एक को मार भी डाला। इसके बाद ब्राह्मण ने काज़ी पर हमला किया। अंततः उसे क़ैद कर लिया गया और पत्थर मार-मार कर सज़ा-ए-मौत दे दी गई।

इसी तरह, औरंगज़ेब ने सन् 1706 में सोमनाथ मंदिर को भी ध्वस्त करवाया। हालाँकि, इस आदेश की उतनी अच्छी तरह तामील नहीं हुई क्योंकि अगले ही वर्ष उसकी मौत हो गई थी। इससे पहले उसने नवंबर 1665 में भी इसे ध्वस्त किए जाने का आदेश दिया था। यानी, औरंगज़ेब के कालखंड में सोमनाथ मंदिर को दो-दो बार ध्वंस का सामना करना पड़ा। इससे पहले मजमूद गजनवी और अल्लाउद्दीन खिलजी के भाई उलुग खान ने सोमनाथ मंदिर का विध्वंस किया था। औरंगज़ेब को उसके अब्बा शाहजहाँ ने गुजरात का ही गवर्नर नियुक्त किया था, ऐसे में वो सोमनाथ मंदिर के महत्व को समझता था। औरंगज़ेब के समय मंदिरों की मरम्मत पर भी प्रतिबंध था।

हालाँकि, औरंगज़ेब के निधन के बाद मराठा शक्ति मजबूत हुई और दक्षिण भारत में हिन्दू राज्य का उदय हुआ जिसने बाद में दिल्ली को भी अपने नियंत्रण में ले लिया। औरंगज़ेब का मानना था कि एक मंदिर की तरफ देखना भी इस्लाम में हराम है। उसने गुजरात में हाटकेश्वर मंदिर को भी ध्वस्त करवाया। साथ ही उसने गुजरात के द्वारकाधीश मंदिर के ध्वस्तीकरण का आदेश भी जारी किया था, लेकिन इसपर अमल नहीं करवा सका। इसके अलावा औरंगज़ेब ने हिन्दुओं पर जजिया टैक्स भी लगाया था। हिन्दुओं को झुककर मुग़ल अधिकारियों के सामने हाजिरी लगानी होती थी और टैक्स देना होता था।

₹77 लाख के ब्लैंक चेक, ₹11 लाख नकद, बंदूकें, जमीन के कागजात… लालू के करीबी MLA के 11 ठिकानों पर छापा, रंगदारी का भी मामला

बिहार की राजनीति में बाहुबली नेताओं में से एक दानापुर के आरजेडी विधायक रीतलाल यादव का भी नाम आता है। अपने पुराने आपराधिक मामलों, दबंग छवि और राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव से नजदीकी के चलते वे अक्सर सुर्खियों में रहते हैं। हालाँकि अभी पटना पुलिस ने कोर्ट के आदेश के बाद उनके 11 ठिकानों पर एक साथ छापेमारी की है, जिसके बाद से खलबली मच गई है। छापेमारी के दौरान लाखों की नकदी और 77 लाख रुपए के ब्लैंक चेक भी बरामद हुए हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये मामला मामला रंगदारी से जुड़ा है। पुनाईचक निवासी बिल्डर कुमार गौरव ने खगौल थाना में लिखित शिकायत दर्ज करवाई थी। जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि रीतलाल यादव और उनके साथियों ने उनसे कोथवाँ गाँव में निर्माण कार्य के दौरान रंगदारी की माँग की और जान से मारने की धमकी भी दी। इसी शिकायत के आधार पर पटना पुलिस ने विभिन्न धाराओं में एफआईआर दर्ज कर, सर्च वारंट के साथ कार्रवाई की।

छापेमारी दानापुर के कोथवाँ स्थित आवास से शुरू हुई और अभियंता नगर, बिहटा सहित 11 ठिकानों पर एक साथ कार्रवाई हुई। छापे के दौरान ड्रोन कैमरों, दर्जनों पुलिस वाहनों और करीब 200 पुलिसकर्मियों की मौजूदगी रही। पुलिस ने रीतलाल यादव के घर से 11 लाख रुपये नकद, नोट गिनने की मशीन, तीन बंदूकें, पुराने स्टांप पेपर, भूमि से जुड़े दस्तावेज और ब्लैंक चेक बरामद किए।

रीतलाल यादव की प्रतिक्रिया  

रीतलाल यादव ने इस छापेमारी को लेकर एक्स पर पोस्ट किया। रीतलाल यादन ने कहा कि चुनाव से ठीक पहले उन्हें बदनाम करने की साजिश के तहत बिना वारंट उनके घर पर छापा मारा गया और परिजनों को परेशान किया गया।

रीतलाल यादव का रिकॉर्ड

रीतलाल यादव का आपराधिक रिकॉर्ड काफी बड़ा रहा है। साल 2003 में भाजपा नेता सत्यनारायण सिन्हा की हत्या के आरोप में वह चर्चा में आए थे। यह हत्या उसी दिन हुई थी, जब लालू यादव की गाँधी मैदान रैली आयोजित की गई थी। इस केस में उन्हें 2024 में निचली अदालत से बरी कर दिया गया, मगर सत्यनारायण सिन्हा की पत्नी और पूर्व विधायक आशा देवी ने पटना हाई कोर्ट में अपील दायर कर दी, जिसपर अब सुनवाई चल रही है।

बख्तियारपुर में चलती ट्रेन में रेलवे ठेकेदारों की हत्या, छठ के दिन विरोधी चुन्नू सिंह की हत्या और अवैध बालू खनन जैसे कई गंभीर आरोपों में भी उनका नाम जुड़ चुका है। स्थानीय लोगों का मानना है कि सोन और गंगा नदी में बालू खनन पर इनका एकछत्र राज रहा है और क्षेत्र में बिना इनकी मर्जी कोई बड़ा काम नहीं हो सकता।

जेल से ही बने थे एमएलसी

राजनीतिक करियर की बात करें तो रीतलाल यादव ने जेल में रहते हुए 2016 में एमएलसी का चुनाव जीता था, फिर 2020 में दानापुर से विधायक बने। 2010 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने सरेंडर किया था ताकि जेल से ही चुनाव लड़ सकें। उस समय उनकी हार हुई थी, लेकिन 2020 में उन्होंने आशा देवी को हराकर जीत हासिल की। फिलहाल पुलिस जाँच जारी है और हाई कोर्ट में कई मामलों की सुनवाई लंबित है।

 

गवर्नर ही नहीं, राष्ट्रपति के लिए भी तय कर दी डेडलाइन, जानिए तमिलनाडु विवाद में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर क्यों उठ रहे सवाल: क्या है ‘जेबी वीटो’

देश की सबसे बड़ी अदालत ने राष्ट्र के मुखिया की शक्तियों पर कैंची चला दी है। तमिलनाडु के राज्यपाल के विधेयकों को रोकने से जुड़े एक मामले में फैसला सुनाते हुए राष्ट्रपति की ‘जेबी वीटो’ से जुड़ी शक्तियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति के पास भेजे गए विधेयकों पर एक्शन के लिए समय सीमा तय कर दी है।

इस फैसले के बाद देश में न्यायपालिका के सरकारी काम में हस्तक्षेप और शक्तियों के बँटवारे पर दोबारा बहस चालू हो गई है। राष्ट्रपति की शक्तियों को लेकर यह सुप्रीम कोर्ट का एक बड़ा फैसला है और इसमें समय सीमा वाली बात ने इसे और भी गंभीर बना दिया है।

क्या है मामला?

सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल, 2025 को तमिलनाडु डीएमके सरकार द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई की। डीएमके सरकार ने यह याचिका राज्य के राज्यपाल RN रवि के विधेयकों को रोकने के खिलाफ लगाया था। तमिलनाडु की सरकार ने कहा कि उसके द्वारा पास किए गए विधेयकों को राज्यपाल मंजूरी नहीं दे रहे हैं।

तमिलनाडु की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि राज्यपाल RN रवि ने विधानसभा द्वारा पारित किए गए 10 विधेयकों को लटका रखा है। तमिलनाडु ने बताया था कि विधानसभा में 2 बार पारित किए जाने के बावजूद राज्यपाल ने इन विधेयकों को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए रोक रखा है।

इस मामले राज्यपाल पर ‘जेबी वीटो’ का इस्तेमाल करने की बात तमिलनाडु ने कही थी। तमिलनाडु ने बताया था कि यदि ऐसा होता रहा तो कानून लटक जाएँगे और शासन चलाना मुश्किल हो जाएगा। तमिलनाडु ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट से माँग की थी कि वह इन विधेयकों को पारित करने सम्बन्धी कोई स्पष्ट नियम दे।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया?

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले अंतिम सुनवाई 8 अप्रैल, 2025 को जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने की। सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार की दलीलों को मानते हुए राज्यपाल द्वारा रोक रखे गए विधेयकों को मंजूरी दे दी। सुप्रीम कोर्ट ने इसी के साथ राज्यपालों को भेजे गए विधेयकों को लेकर समय सीमा भी तय कर दी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “राज्यपाल द्वारा 10 विधेयकों के संबंध में की गई सभी कार्रवाइयों को रद्द किया जाता है। राज्यपाल के समक्ष पुनः प्रस्तुत किए जाने की तिथि से ही 10 विधेयकों को मंजूरी दे दी गई मानी जाएगी।” कोर्ट ने इसी के साथ कहा कि राज्यपाल को विधानमंडल द्वारा भेजे गए विधेयक पर तीन महीने के भीतर फैसला लेना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल को भेजे जाने के एक महीने के भीतर उसे राष्ट्रपति के पास भेजना होगा। इसके अलावा अगर वह विधेयक वापस लौटाना चाहता है, तो यह काम तीन महीने के भीतर करना होगा और दोबारा भेजे गए विधेयक को एक माह के भीतर मंजूरी देनी होगी।

राष्ट्रपति पर क्या कह दिया?

तमिलनाडु मामले में फैसला सुनाते हुए जहाँ सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल की शक्तियों पर कैंची चलाई ही, उसने राष्ट्रपति की शक्तियों पर भी टिप्पणियाँ की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा राज्यपाल द्वारा किसी विधेयक को राष्ट्रपति को भेजे जाने के तीन महीने के भीतर उस पर एक्शन लेना होगा। कोर्ट ने कहा कि इसके बाद भी विधेयक रोके जाने पर कारण बताने होगे।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “राष्ट्रपति को राज्यपाल द्वारा विचार के लिए आरक्षित विधेयकों पर उस तारीख से तीन महीने की अवधि के भीतर निर्णय लेना आवश्यक है, जिस दिन उसे यह भेजे जाएँगे। इस समय से अधिक किसी भी देरी के मामले में उचित कारणों को दर्ज किया जाना होगा और इस मामले में सम्बन्धित राज्य को भी जानकारी देनी होगी।”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रपति के किसी विधेयक को मंजूरी ना देने की स्थिति में राज्य अदालत का रुख कर सकते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर राष्ट्रपति किसी कानूनी आधार पर विधेयक को रोकते हैं, तो इस संबंध में भी विधेयक की संवैधानिकता का फैसला वह स्वयं करेगा, ना कि राष्ट्रपति।

राष्ट्रपति के किसी विधेयक पर दिए गए फैसले को भी सुप्रीम कोर्ट सुन सकता है, यह भी निर्णय में कहा गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जैसे राज्यपाल के पास किसी विधेयक को लम्बे समय तक लटका कर रखने के लिए शक्ति नहीं है, यही बात राष्ट्रपति पर भी लागू होती है। कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल और राष्ट्रपति, दोनों के पास ‘जेबी वीटो’ की शक्तियाँ नहीं है।

क्या होता है ‘जेबी वीटो’?

‘जेबी वीटो’ या ‘पॉकेट वीटो’ उस शक्ति को कहा जाता है जब राष्ट्रपति या राज्यपाल अपने पास भेजे गए किसी विधेयक को लेकर कोई फैसला नहीं लेते। वह ना इस पर मंजूरी देते हैं और ना ही इसको वापस विधानमंडल को लौटाते हैं। इसके चलते वह विधेयक लंबित की श्रेणी में रहता है और क़ानून नहीं बनता।

राष्ट्रपति की यह शक्तियाँ संविधान में नहीं लिखी लेकिन विधेयक पर मंजूरी देने या ना देने की समय सीमा तय ना होने के चलते यह मानी जाती रही हैं। संविधान के अनुच्छेद 201 में यह व्यवस्था की गई है कि राष्ट्रपति राज्यपाल द्वारा भेजे गए किसी विधेयक पर क्या निर्णय लेता है।

राष्ट्रपति विधेयक विधानमंडल को वापस लौटाने की बात राज्यपाल से कह सकता है या फिर उसे मंजूर भी कर सकता है। ऐसी स्थिति में 6 माह के भीतर दोबारा विधानमंडल को राष्ट्रपति के पास अपना विधेयक भेजना होता है। वह इसे पुराने स्वरुप में ही भेज सकते हैं या बदलाव भी कर सकते हैं।

दूसरे मौके पर राष्ट्रपति इस पर क्या निर्णय लेता है, इस को लेकर संविधान में समय सीमा तय नहीं है। राष्ट्रपति सिर्फ राज्यपाल द्वारा भेजे गए विधेयक ही नहीं बल्कि संसद द्वारा पारित विधेयक के संबंध में भी कर सकता है। यह कदम राष्ट्रपति रहने के दौरान ग्यानी जैल सिंह ने उठाया था।

उन्होंने राजीव गाँधी की सरकार द्वारा 1986 में पारित भारतीय डाक कानून (संशोधन) को लटका कर रखा था और मंजूरी नहीं दी थी। यह कानून उसके बाद लटका ही रहा और इसे मंजूरी नहीं मिल सकी। राष्ट्रपति के ‘जेबी वीटो’ का यह एक बड़ा उदारहण था। हालाँकि संसदीय कानून के संबंध में अभी सुप्रीम कोर्ट ने कोई निर्णय नहीं दिया है।

‘न्यायिक दखल’ की क्यों हो रही बात?

सुप्रीम कोर्ट के राष्ट्रपति को लेकर दिए गए इस फैसले के बाद न्यायपालिका के दखल को लेकर चर्चा चालू हो गई है। संविधान में राष्ट्रपति को देश का प्रमुख बताया गया है। आलोचकों का कहना है कि राष्ट्रपति के ऊपर समयसीमा लगाना उसकी शक्तियों को कतरने जैसा है। इसके अलावा उसके हर निर्णय को अपनी सुनवाई के दायरे में लाने पर भी यही बात कही जा रही है।

सुप्रीम कोर्ट का राष्ट्रपति के ही निर्णय को न्यायिक दायरे में लाना इसलिए भी ज्यादा चर्चा में है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति भी राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से होती है। इसी के चलते प्रश्न उठाए जा रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट में नियुक्तियाँ करने वाले राष्ट्रपति को न्यायिक दायरे में कैसे खींचा जा सकता है।

इसे आलोचकों ने ‘न्यायिक दखल’ और ‘कार्यपालिका पर अतिक्रमण’ कहा है। गौरतलब है कि संविधान में स्पष्ट तौर पर न्यायपालिका और सरकार के काम बाँटे गए हैं। कई मौकों पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के कामों को लेकर फैसले दिए हैं, जिससे विवाद पैदा हुआ है।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्तों को नियुक्त करने की प्रक्रिया में भी CJI को शामिल कर दिया था। इसे भी न्यायिक दखल माना गया था। 2015 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए पास किया गया NJAC कानून भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था। आलोचक इन्हें न्यायिक दखल का उदाहरण मानते आए हैं।

केरल के राज्यपाल राजेन्द्र आर्लेकर ने भी इस निर्णय को लेकर तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने पूछा है कि यदि संविधान में बदलाव सुप्रीम कोर्ट कर रहा है, तो फिर विधानसभा और संसद किस लिए बनाई गई हैं। उन्होंने कहा कि इस मामले को एक बड़ी बेंच को भेजा जाना चाहिए था।

राष्ट्रपति की शक्तियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का यह बीते समय में बड़ा फैसला है। ऐसे में इस पर आगे सरकार कोई एक्शन लेगी या नहीं, यह बात देखने वाली होगी।

‘बंगाल को बांग्लादेश बना रही ममता बनर्जी’: कई जिलों में हिंसा के बाद TMC सरकार पर BJP हमलावर, मंत्री बोले- हिंदू हजारों साल से लड़ रहे हैं और आगे भी लड़ेंगे, डरेंगे नहीं

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा वक्फ संशोधन कानून का विरोध करने के बाद पश्चिम बंगाल में हिंसा भड़क उठी है। सीएम का समर्थन मिलने के बाद राज्य के इस्लामवादी वक्फ कानून विरोध के नाम पर सड़कों पर उतर आए हैं। राज्य के कई जिलों में तोड़फोड़ और आगजनी की गई है। पुलिस ने करीब 120 लोगों को हिरासत में लिया है। भाजपा ने बनर्जी पर राज्य को बांग्लादेश बनाने का आरोप लगाया है।

दरअसल, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 9 अप्रैल 2025 को एक कार्यक्रम में कहा था, “याद रखो, जब तक दीदी है… दीदी तुम्हें और तुम्हारी प्रॉपर्टी को बचाएगी।” उसके पहले बनर्जी ने कहा था कि अगर केंद्र से भाजपा सरकार चली गई तो वक्फ एक्ट खत्म हो जाएगा। उन्होंने कहा था, “जैसे ही ये सरकार (भाजपा नेतृत्व वाली NDA) सत्ता से हटेगी और नई सरकार आएगी, ये बिल रद्द हो जाएगा।”

उनके इस बयान के बाद राज्य के मुर्शिदाबाद, मालदा, नादिया और बहरामपुर में कट्टरपंथी मुस्लिमों की भीड़ ने खूब बवाल किया था। अब एक बार फिर वक्फ कानून के विरोध के नाम पर पूरे राज्य को धीरे-धीरे हिंसा की आग में झोंकी जा रही है। एक बार फिर से मालदा, मुर्शिदाबाद के साथ-साथ नॉर्थ 24 परगना और साउथ 24 परगना जिले में बवाल हो गया है।

वक्फ कानून के विरोध के दौरान शुक्रवार (11 अप्रैल 2025) को मुर्शिदाबाद, नॉर्थ 24 परगना और मालदा में स्थिति बिगड़ गई। प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-12 पर सरकारी बसों और कई वाहनों में आग लगा दी गई। इतना ही नहीं, इस दौरान पुलिस पर भी पथराव किया। सुती थाना क्षेत्र के साजूर क्रॉसिंग में मुस्लिम प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर क्रूड बम फेंके।

दक्षिण 24 परगना के डायमंड हार्बर में भी हिंसा की गई है। अमतला चौराहे पर भी प्रदर्शन कर रही इस्लामी भीड़ ने पुलिस वाहन में तोड़फोड़ की थी। वेस्टर्न रेलवे ने बताया था कि अजीमगंज-न्यू फरक्का सेक्शन में दोपहर 2.46 बजे लगभग 5000 लोगों की भीड़ ने धुलियानगंगा स्टेशन के पास ट्रैक जाम कर दिया था। मुर्शिदाबाद की स्थिति और भी खराब है। शमशेरगंज में हिंदुओं के घरों-दुकानों को निशाना बनाया गया।

मुर्शिदाबाद में शनिवार (12 अप्रैल 2025) की सुबह से मुस्लिम भीड़ ने उत्पात शुरू कर दिया। जाँगीपुर में उपद्रवियों ने कई गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया। वीडियो में गाड़ियों को धू-धूकर जलते हुए देखा जा सकता है। सुती थाना क्षेत्र के साजूर क्रॉसिंग में प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर क्रूड बम फेंके गए। प्रदर्शनकारियों को खदेड़ने के लिए पुलिस ने उन पर आँसू गैस के गोले दागे।

हिन्दुओं की कई व्यापारिक प्रतिष्ठानों को भी आग के हवाले कर दिया गया, जिसमें ‘श्रीहरि हिन्दू होटल’ भी शामिल है। जलांगी में प्रखंड मुख्यालय में भी तोड़फोड़ मचाई गई। सरकारी दफ़्तरों को भी नहीं छोड़ा गया। बंगाल भाजपा के नेता दिलीप घोष ने कहा है कि मुर्शिदाबाद, मालदा, दिनाजपुर, नादिया, वीरभूम और हावड़ा से हिन्दुओं को साफ करने की साजिश है।

वेस्टर्न रेलवे ने बताया था कि 5,000 लोगों की भीड़ ने दोपहर लगभग 2.45 बजे अजीमगंज-न्यू फरक्का सेक्शन में धुलियानगंगा स्टेशन के पास ट्रैक जाम कर दिया था। इसके बाद बीएसएफ को बुलाना पड़ा था। मंगलवार से शुरू हुआ उत्पात अगले दिन शनिवार की रात तक चला था। इस दौरान 10 पुलिस कर्मी भी घायल हो गए हैं। बंगाल में यह हिंसा 7 अप्रैल से जारी है।

इलाके में इंटरनेट सेवा को बंद कर दिया गया है। इसके साथ ही इलाक़े में बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों को तैनात किया गया है। पुलिस ने चार जिलों से अभी तक 120 से अधिक हिंसक प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक, सूती थाना क्षेत्र से 70 लोगों को, शमशेरगंज इलाके से 41 लोगों को गिरफ्तार किया गया है।

बंगाल के राज्यपाल सीवी आनंद बोस ने राज्य में हिंसा का संज्ञान लिया है। उन्होंने इस विषय पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से चर्चा की है। उन्होंने केंद्रीय बलों को उपद्रवियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने का भी निर्देश दिया है। गवर्नर बोस के बयान का एक वीडियो राजभवन ने जारी किया है। उसमें राज्यपाल ने कहा है कि सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित नहीं किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विरोध का स्वागत है, लेकिन हिंसा का नहीं। विरोध के नाम पर लोगों के जीवन से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती है। उन्होंने कहा कि जो उपद्रवी सोचते हैं कि वे कानून को अपने हाथ में ले सकते हैं तो उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

बांग्लादेश बनाना चाह रही हैं ममता: भाजपा का आरोप

हिंसा को लेकर पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने राज्य की ममता बनर्जी सरकार पर हमला बोला है। भाजपा नेता ने कहा कि बंगाल में अराजकता की स्थिति है। वहाँ कानून-व्यवस्था की स्थिति खराब होती जा रही है। शुभेंदु ने कहा, “कुछ कट्टरपंथी समूह संविधान और कानून का विरोध करते हुए खुलेआम हिंसा कर रहे हैं। आम लोग असुरक्षित हैं।”

भाजपा आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने कहा कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ‘दूसरा बांग्लादेश’ बनाना चाहती हैं। उन्होंने कहा, “ममता बनर्जी को सत्ता में बनाए रखने के लिए बंगाल को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है। वह राज्य को दूसरा बांग्लादेश बनाना चाहती हैं।” भाजपा का कहना है कि ममता सरकार की तुष्टिकरण की राजनीति की वजह से राज्य में कानून-व्यवस्था बिगड़ती जा रही है।

वहीं, बंगाल भाजपा के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री सुकांत मजूमदार ने भी ममता बनर्जी पर हमला बोला है। उन्होंने कहा कि हिंसा पर ममता बनर्जी के निर्देश पर पुलिस कुछ नहीं कर रही है। पुलिस चुपचाप बैठी हैं। ममता बनर्जी राज्य को बांग्लादेश बनाने की कोशिश कर रही हैं। उन्होंने कहा कि बंगाल में हिंदुओं को डराने की कोशिश हो रही हैं। हिंदू समाज हज़ारों सालों से लड़ता आया है और आगे भी लड़ेगा। 

पुलवामा के बलिदानी हेमराज मीणा की बेटी के ब्याह में ओम बिरला ने भरा मायरा: 6 साल पहले बनाया था भांजी, अब पहुँच कर निभाया वादा

कोटा जिले के साँगोद में शुक्रवार (11 अप्रैल 2025) का दिन खुशियों से भरा था। छह साल पहले पुलवामा हमले में बलिदान हुए सीआरपीएफ जवान हेमराज मीणा के घर में उनकी बेटी की शादी का जश्न था। वीरांगना मधुबाला और उनके परिवार के चेहरे पर मुस्कान बिखरी थी, लेकिन इस खुशी में एक खास मेहमान की मौजूदगी ने सबके दिल को छू लिया। वह थे लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, जो मायरा (भात) लेकर बलिदानी हेमराज मीणा की बेटी की शादी में भाई बनकर पहुँचे। यह नजारा देख हर कोई भावुक हो उठा, क्योंकि यह सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि एक वचन का पूरा होना था।

साल 2019 में पुलवामा हमले ने हेमराज मीणा के परिवार को गहरे दुख में डुबो दिया था। पति का साया सिर से उठने के बाद मधुबाला और उनके बच्चों के सामने मुश्किलों का पहाड़ खड़ा हो गया था। उस मुश्किल वक्त में ओम बिरला ने परिवार को सहारा दिया। उन्होंने मधुबाला को बहन मानकर हर सुख-दुख में साथ देने का वादा किया था। पिछले छह सालों में यह रिश्ता और गहरा हुआ। राखी और भाई दूज पर मधुबाला ने बिरला को राखी बाँधी, तिलक किया और अपने भाई के प्यार को महसूस किया।

जब हेमराज की बेटी की शादी का मौका आया, तो बिरला ने अपना वचन निभाते हुए साँगोद में आयोजित समारोह में शिरकत की। उन्होंने विधि-विधान से मायरे की रस्म निभाई। साँगोद विधायक और राजस्थान के ऊर्जा मंत्री हीरालाल नागर के साथ बिरला ने वीरांगना मधुबाला को मायरा पहनाया। रीति-रिवाजों के तहत उन्होंने मधुबाला को चुनरी ओढ़ाई, जबकि मधुबाला ने अपने भाई का तिलक किया, आरती उतारी और बत्तीसी झिलाई। यह भावनात्मक पल हर किसी के लिए यादगार बन गया।

ओम बिरला ने बलिदानी हेमराज मीणा की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित किए और उनकी शहादत को याद किया। इस दौरान मधुबाला, बिरला और परिवार के लोग भावुक हो उठे। बलिदानी के प्रति सम्मान और उनके परिवार के लिए बिरला का स्नेह देखकर वहाँ मौजूद लोग हैरान थे। यह सिर्फ एक राजनेता का कर्तव्य नहीं, बल्कि एक भाई का फर्ज था, जो बिरला ने दिल से निभाया। इस आयोजन में इलाके के कई जनप्रतिनिधि शामिल हुए। बिरला ने न सिर्फ बलिदानी के परिवार को सम्मान दिया, बल्कि समाज को यह संदेश भी दिया कि देश के लिए जान देने वालों के परिवार को कभी अकेला नहीं छोड़ना चाहिए।

5000 मुस्लिमों की भीड़ ने ठप्प की रेलवे सेवा, प्रखंड मुख्यालय फूँका, पुलिसवालों ने मस्जिद में छिप कर बचाई जान: बंगाल में वक़्फ़ के नाम पर फिर भड़की हिंसा

संसद द्वारा बनाए गए नए वक़्फ़ क़ानून के ख़िलाफ़ एकबार फिर से पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद सहित राज्य के कई इलाक़ों में हिंसा भड़क गई। शुक्रवार (11 अप्रैल, 2025) को तो हिंसा हुई थी, अगले दिन शनिवार की सुबह से भी मुस्लिम भीड़ ने उत्पात शुरू कर दिया। जांगीपुर में उपद्रवियों ने कई गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया। वीडियोज में गाड़ियों को धू-धूकर जलते हुए देखा जा सकता है। इलाक़े में बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों को तैनात किया गया है। प्रशासन का कहना है कि जांगीपुर के सूती और शमशेरगंज में अब हालात नियंत्रण में हैं। जिले में कई संवेदनशील क्षेत्रों में पुलिस की तैनाती बढ़ा दी गई है।

इससे पहले मंगलवार को मुर्शिदाबाद के ही उमरपुर में हिंसा भड़की थी। 4 पुलिसकर्मी सहित 9 लोग घायल हुए थे, साथ ही जानमाल की काफ़ी क्षति हुई थी। राष्ट्रीय राजमार्ग 12 को जाम करने वाले मुस्लिम उपद्रवियों ने 2 पुलिस थानों को भी फूँक डाला था। राज्यपाल CV बोस ने भी हिंसा की निंदा करते हुए राज्य सरकार को जिम्मेदारीपूर्वक कर्तव्यों का निर्वाहन करने की सलाह दी थी। राज्य के शिक्षा मंत्री सिद्दीकी चौधरी ने हिंसक उपद्रवियों पर लाठीचार्ज की निंदा की थी। विपक्षी भाजपा ने ममता बनर्जी को देश का सबसे विफल मुख्यमंत्री करार दिया है।

ताज़ा हिंसा की बात करें तो न केवल सड़क मार्ग, बल्कि रेल यातायात को भी बाधित किया गया है। पत्थरबाजी में कई पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। पुलिस को लाठीचार्ज का भी सहारा लेना पड़ा। पुलिस ने भीड़ के इकट्ठे होने पर रोक लगा रखी थी, इसके बावजूद मुस्लिम भीड़ वहाँ जुट गई। जिन गाड़ियों को फूँका गया है उनमें पुलिस के वैन और सार्वजनिक बसें शामिल हैं। जुमे की नमाज़ के बाद हिंसा शुरू हुई। पुलिस का कहना है कि उसपर ‘बम जैसे कुछ पदार्थ’ भी फेंके गए। हिंसा के बीच कुछ पुलिसकर्मियों को एक मस्जिद में छिपकर शरण लेनी पड़ी

पूर्वी रेलवे ने भी एक बयान जारी करके बताया कि धूलियनगंगा और निमित्ता के बीच लगभग 5000 उपद्रवियों ने रेलवे ट्रैक को जाम कर दिया। हिंसा के बाद आई तस्वीरों में कई बसों को जलकर खँडहर की स्थिति पड़ी हुई देखा जा सकता है। हिन्दुओं की कई व्यापारिक प्रतिष्ठानों को भी आग के हवाले कर दिया गया, जिसमें ‘श्रीहरि हिन्दू होटल’ भी शामिल है। जलांगी में प्रखंड मुख्यालय में भी तोड़फोड़ मचाई गई। सरकारी दफ़्तरों को भी नहीं छोड़ा गया। बंगाल भाजपा के नेता दिलीप घोष ने कहा है कि मुर्शिदाबाद, मालदा, दिनाजपुर, नादिया, वीरभूम और हावड़ा से हिन्दुओं को साफ करने की साजिश है।

हिन्दुओं के खिलाफ कोई भी मामला हो, काले कोट में दिखता है एक ही चेहरा: अब वक्फ की पैरवी करेंगे कपिल सिब्बल, संयोग या रणनीति?

ऐतिहासिक वक्फ संशोधन विधेयक 2025 को संसद के दोनों सदनों से मंजूरी मिल चुकी है और इसे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की स्वीकृति भी प्राप्त हो गई है। इस नए वक्फ कानून का मुख्य उद्देश्य भारत में वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में सुधार लाना और विशेषाधिकार प्राप्त मुस्लिम अभिजात वर्ग द्वारा नियंत्रित वक्फ बोर्डों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर नियंत्रण करना है। इसके साथ ही वक्फ अधिनियम 1995 के तहत कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा वक्फ बोर्डों को दी गई कई अनुचित शक्तियों को भी समाप्त कर दिया गया है।

चूँकि वक्फ अधिनियम 2025 वक्फ बोर्डों से उनकी अनियंत्रित शक्तियों को हटा देता है, इसलिए इस्लामवादी, विपक्षी दल और इस्लामो-वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोग इस वक्फ कानून की आलोचना करते हुए इसे मुस्लिम मजहबी अधिकारों और स्वतंत्रता पर ‘हमला’ मानते हैं।

वक्फ अधिनियम 1995 की विवादास्पद धारा 40 कॉन्ग्रेस ने दी

तत्कालीन कॉंन्ग्रेस सरकार द्वारा लागू वक्फ अधिनियम 1995 में मुस्लिम समुदाय के अधिकारों का अनियंत्रित दुरुपयोग और संपत्तियों पर अतिक्रमण करने के लिए कई प्रावधान थे। इनमें से एक प्रमुख प्रावधान धारा 40 के तहत था, जो वक्फ बोर्ड को अपने द्वारा एकत्रित जानकारी के आधार पर यह एकतरफा निर्णय लेने का अधिकार देता था कि कोई संपत्ति वक्फ संपत्ति है या नहीं।

इस प्रावधान की पहली उपधारा के अनुसार, “बोर्ड किसी भी संपत्ति के बारे में जानकारी एकत्र कर सकता है, यदि उसे यह संदेह हो कि वह वक्फ संपत्ति है, और यदि कोई प्रश्न उठता है कि विशेष संपत्ति वक्फ संपत्ति है या नहीं, या वह सुन्नी वक्फ है या शिया वक्फ, तो बोर्ड जाँच करने के बाद, जैसा वह उचित समझे, उस प्रश्न का निर्णय कर सकता है।”

वक्फ संपत्ति के निर्धारण में वक्फ बोर्ड का निर्णय अंतिम होता था, जब तक कि न्यायाधिकरण द्वारा उसे रद्द या संशोधित न कर दिया जाए। वक्फ अधिनियम 1995 की धारा 40 वक्फ बोर्ड को प्रारंभिक जाँच के बाद ट्रस्टों और सोसायटियों की संपत्तियाँ कुर्क करने का अधिकार देती थी। इसके तहत, बोर्ड को उक्त ट्रस्टों और सोसायटियों को अनिवार्य रूप से पंजीकरण कराने का आदेश देने या ऐसा न करने पर कारण बताने का निर्देश देने का अधिकार प्राप्त था।

इस प्रावधान की मनमानी प्रकृति ने देश भर के वक्फ बोर्डों को किसी भी संपत्ति को ‘वक्फ’ घोषित करने और 1882 के ट्रस्ट अधिनियम तथा 1860 के सोसायटी पंजीकरण अधिनियम जैसे अन्य कानूनों को दरकिनार करने का अधिकार दे दिया। वक्फ बोर्डों की शक्तियों को इस हद तक चुनौती नहीं दी जा सकी कि पीड़ित पक्षों को किसी भी वक्फ बोर्ड द्वारा उनकी संपत्तियों पर स्वामित्व का दावा करने के खिलाफ केवल वक्फ न्यायाधिकरणों के निर्णय पर निर्भर रहना पड़ता था। सिविल कोर्ट द्वारा कोई मध्यस्थता नहीं होने के कारण, निर्णय अक्सर वक्फ बोर्ड के पक्ष में होते थे। यही कारण था कि भारत में वक्फ बोर्ड तीसरे सबसे बड़े भूस्वामी के रूप में उभरा।

वक्फ बोर्ड के भीतर भ्रष्टाचार, अवैध तरीके से जमीन हड़पना और अतिक्रमण, हिंदुओं के घरों, जमीनों, कॉलेजों, हिंदू मंदिरों, हिंदू बहुल गाँवों, गुरुद्वारों, चर्चों आदि पर मनमाने ढंग से दावे करना, कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा कथित ‘धर्मनिरपेक्ष’ देश में वक्फ बोर्ड को एक अजेय शक्ति बना दिया था। हालांकि, मोदी सरकार ने अंततः लंबे समय से लंबित सुधारों को लागू किया और वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 में धारा 40 को हटा दिया, जिसे औपचारिक रूप से उम्मीद अधिनियम (एकीकृत वक्फ प्रबंधन, सशक्तिकरण, दक्षता और विकास) के नाम से जाना जाता है।

लोकसभा में वक्फ बिल पेश होने से पहले, मुस्लिम तुष्टिकरण के समर्थक राजनीतिक दल, जो खुद को ‘धर्मनिरपेक्ष’ बताते हैं, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB), इस्लामिस्ट और उनके समर्थक ‘अस्थिरता’ और ‘हम सड़कों पर उतरेंगे’ जैसी धमकियाँ देने लगे थे। 2020 में एंटी-सीएए विरोध और हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों से पहले के पैटर्न की तरह, इस बार भी गलत सूचनाएँ फैल रही हैं, एक डर का माहौल बन रहा है और वक्फ अधिनियम 2025 को ‘असंवैधानिक’ बताकर भड़काऊ बयान दिए जा रहे हैं। जैसा कि एंटी-सीएए विरोध के दौरान देखा गया था, यह सब शांतिपूर्ण ढंग से शुरू हुआ था, लेकिन जल्द ही, कॉन्ग्रेस नेता सोनिया गाँधी के ‘आर या पार की लड़ाई’ वाले बयान ने भारत के कई हिस्सों, विशेष रूप से दिल्ली, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में ‘शांतिपूर्ण’ विरोध को हिंसा और आगजनी में बदल दिया।

ऐसा लगता है कि अब वही सब कुछ हो रहा है, जैसा कि सीएए विरोधी आंदोलन के दौरान हुआ था। इस्लामवादियों ने पश्चिम बंगाल में रेलवे को निशाना बनाकर एक ऐसे कानून के खिलाफ ‘विरोध’ किया है, जो केवल गरीबों को लाभ पहुँचाएगा और मुस्लिम अभिजात वर्ग के विशेषाधिकारों को समाप्त करेगा।

जिस तरह नागरिकता संशोधन अधिनियम को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी, उसी तरह वक्फ संशोधन अधिनियम भी शीर्ष अदालत तक पहुँच गया है, जिसमें कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली कई याचिकाएँ दायर की गई हैं।

इसके अलावा राजनीतिक बयानबाजी, भय फैलाने, दुष्प्रचार और सुप्रीम कोर्ट में ‘संविधान पर हमला’, ‘अल्पसंख्यक खतरे में हैं’, ‘लोकतंत्र खतरे में है’ जैसे तर्कों के साथ याचिका दायर करने का पैटर्न भी सामने आता है। ये सीएए विरोधी आंदोलन के दौरान भी दिखा था और वक्फ अधिनियम विरोधी आंदोलन में भी देखने को मिल रहा है। इन सबके बीच एक महत्वपूर्ण नाम सामने आता है कपिल सिब्बल का, जो सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील है। जिनका अतीत हिंदुओं और भारत के हितों के खिलाफ़ मुद्दों की पैरवी करना रहा है।

कपिल सिब्बल – हिंदू विरोधी कानूनी योद्धा

कपिल सिब्बल, कानूनी क्षेत्र में दशकों के अनुभव वाले एक अनुभवी वकील हैं। वे कई ऐतिहासिक मामलों में वकील के रूप में शामिल रहे हैं, जिन्होंने भारतीय लोगों में आक्रोश पैदा किया, खासकर उन मामलों में जहाँ हिंदू हित शामिल थे।

कपिल सिब्बल की सबसे विवादास्पद कानूनी गतिविधियों में से एक राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में थी। पूर्व कॉन्ग्रेस नेता और यूपीए मंत्री ने अयोध्या में तत्कालीन विवादित स्थल पर भव्य राम मंदिर के निर्माण का विरोध करते हुए सुन्नी वक्फ बोर्ड के लिए राम जन्मभूमि का मामला लड़ा था। उन्होंने विलंबकारी रणनीति भी अपनाई और सर्वोच्च न्यायालय से 2019 के आम चुनावों तक राम जन्मभूमि मामले में निर्णय को स्थगित करने के लिए कहा, यह मानते हुए कि हिंदू पक्ष के पक्ष में निर्णय भाजपा को लाभ पहुँचा सकता है।

हिंदू आस्था से जुड़े इस मुद्दे का राजनीतिकरण होने और चुनावी राजनीति से कहीं ऊपर होने के बावजूद, सुप्रीम कोर्ट के 2019 के फैसले ने अयोध्या में राम जन्मभूमि स्थल पर राम मंदिर के निर्माण का समर्थन किया, जिससे कपिल सिब्बल और उनके मुवक्किल सुन्नी वक्फ बोर्ड को भारी झटका लगा। जनवरी 2024 में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य “यजमानों” ने अयोध्या में उनके जन्म स्थान पर बने उनके भव्य निवास में भगवान राम की प्राण प्रतिष्ठा की। अदालत में पराजित होने के बाद, सिब्बल की निराशा ने उनके होश उड़ा दिए और उन्होंने अभिषेक समारोह को ‘दिखावा’ कहा। पूर्व कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता और यूपीए मंत्री ने तर्क दिया कि भगवान राम उनके दिल में बसते हैं और प्राण प्रतिष्ठा का भव्य तमाशा ‘दिखावा’ है।

कपिल सिब्बल की उपलब्धियों में एक और उपलब्धि शफीनजहाँ बनाम केएम अशोकन मामला है, जिसे हादिया लव जिहाद मामले के रूप में भी जाना जाता है। कपिल सिब्बल ने केरल उच्च न्यायालय द्वारा हादिया और शफीन की शादी को रद्द करने के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में हादिया के पति शफीनजहाँ का प्रतिनिधित्व किया।

यह याद रखना चाहिए कि अखिला नाम की एक हिंदू लड़की ने इस्लाम धर्म अपनाने और शफीन जहाँ नाम के एक मुस्लिम व्यक्ति से शादी करने के बाद अपना नाम बदलकर हादिया रख लिया था। हादिया/अखिला के पिता जो भारतीय सेना के सेवानिवृत्त सैनिक हैं, ने आरोप लगाया था कि यह लव जिहाद का मामला है। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने हादिया के पक्ष में फैसला सुनाया, जिसमें उसने एक वयस्क के रूप में अपना धर्म और जीवनसाथी चुनने के अधिकार को बरकरार रखा, यह सामने आया कि अब प्रतिबंधित इस्लामिक आतंकी संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) शफीन जहाँ के मामले में शामिल है।

इस्लामिक जिहादी संगठन ने इस मामले पर 99,52,324 रुपये खर्च किए थे। इसमें से 93,85,000 रुपये कथित तौर पर चार वरिष्ठ वकीलों कपिल सिब्बल, दुष्यंत दवे, इंदिरा जयसिंह और मरज़ूक बफ़ाकी को दिए गए थे, जिन्होंने शफ़ीन जहान की ओर से केस लड़ा था। 2020 में, प्रवर्तन निदेशालय ने आरोप लगाया कि दिसंबर 2019 में संसद के दोनों सदनों द्वारा नागरिकता संशोधन अधिनियम पारित होने के बाद देश भर में सीएए विरोधी प्रदर्शनों को बढ़ावा देने के लिए पीएफआई को भारी मात्रा में धन प्राप्त हुआ।

बताया गया कि पीएफआई ने देश में हिंसक दंगों को अंजाम देने के लिए एक महीने में लगभग 120 करोड़ खर्च किए, जिसमें प्रख्यात वकील कपिल सिब्बल, इंदिरा जयसिंह और दुष्यंत दवे को भी पीएफआई के वित्तपोषण के लाभार्थियों के रूप में नामित किया गया। सिब्बल को 77 लाख रुपये मिलने की खबर थी। हालाँकि, वरिष्ठ वकील ने एक ‘स्पष्टीकरण’ जारी करते हुए कहा कि अब प्रतिबंधित इस्लामिक जिहादी संगठन से उन्हें जो राशि मिली, वह हादिया लव जिहाद मामले में वकील के रूप में उनकी सेवाओं के लिए उनकी फीस थी।

कपिल सिब्बल ने पीएफआई सदस्य सिद्दीकी कप्पन की रिहाई की माँग की

2020 में, हाथरस मामले को लेकर जाति-आधारित अशांति और सांप्रदायिक तनाव पैदा करने की योजना बनाने के आरोप में यूपी पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए चार पीएफआई सदस्यों में से एक सिद्दीकी कप्पन की रिहाई की माँग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की गई थी। केरल पत्रकार संघ के कानूनी प्रतिनिधि और पत्रकार के रूप में काम करने वाले सक्रिय पीएफआई सदस्य सिद्दीकी कप्पन के रूप में पेश हुए सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट से संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत उन्हें उनसे संपर्क करने की अनुमति देने का आग्रह किया। हालाँकि, तत्कालीन सीजेआई एसए बोबडे ने उनके अनुरोध को अस्वीकार कर दिया था।

उत्तर प्रदेश पुलिस ने हाथरस मामले के सिलसिले में मुजफ्फरनगर के नगला के सिद्दीकी, मलप्पुरम के सिद्दीकी, बहराइच जिले के जरवाल के मसूद अहमद और रामपुर जिले के कोतवाली क्षेत्र के आलम को गिरफ्तार किया था।

दिल्ली दंगों के आरोपित उमर खालिद की ज़मानत याचिका वापसी: कपिल सिब्बल की भूमिका पर उठे सवाल

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध में हुए 2020 दिल्ली दंगों के मामले में आरोपी उमर खालिद की जमानत याचिका हाल ही में सुप्रीम कोर्ट से वापस ले ली गई। इस मामले में उमर खालिद की पैरवी वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल कर रहे थे। फरवरी 2024 में जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और पंकज मिथल की पीठ ने खालिद को याचिका वापस लेने की अनुमति दी, जिसके पीछे ‘परिस्थितियों में बदलाव’ को कारण बताया गया।

कपिल सिब्बल ने अदालत को जानकारी दी कि अब ट्रायल कोर्ट में नई जमानत याचिका दायर की जाएगी। इसके साथ ही, सिब्बल ने UAPA की कुछ धाराओं को चुनौती देने वाली एक अन्य याचिका भी वापस ले ली।

हालाँकि, इस मामले में कपिल सिब्बल की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, 2023 और 2024 में उमर खालिद की याचिका पर कुल 14 बार स्थगन हुए, जिनमें से 7 बार स्थगन की माँग खुद खालिद की ओर से की गई थी। आरोप है कि यह देरी कपिल सिब्बल की रणनीति का हिस्सा थी, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर फ़ोरम शॉपिंग (वांछित बेंच की तलाश में याचिका दाखिल करना) की कोशिश की।

ऑपइंडिया की रिपोर्ट में बताया गया कि किस प्रकार कपिल सिब्बल ने बार-बार याचिकाएँ दायर कर मामले को अलग-अलग पीठों के समक्ष रखने का प्रयास किया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार नहीं किया। सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने व्यक्तिगत रूप से इन प्रयासों को असफल किया था। यहाँ तक कि सेवानिवृत्त होने के बाद दिए गए एक साक्षात्कार में पूर्व सीजेआई ने भी इस घटनाक्रम की पुष्टि की।

यह घटनाक्रम न केवल उमर खालिद के केस में कानूनी रणनीतियों पर प्रश्न खड़े करता है, बल्कि कपिल सिब्बल की निष्पक्षता और उद्देश्य पर भी बहस छेड़ देता है। एक ओर जहाँ वे संविधान और लोकतंत्र की रक्षा का दावा करते हैं, वहीं दूसरी ओर बार-बार ऐसे मामलों में उनका पक्ष लेना, जो देश की सुरक्षा और सामाजिक समरसता से जुड़े हैं, चिंता का विषय बना हुआ है।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ट्रायल कोर्ट में उमर खालिद की जमानत याचिका पर क्या रुख अपनाया जाता है और क्या सिब्बल की रणनीतियाँ भविष्य में किसी निर्णायक मोड़ पर पहुँचती हैं या नहीं।

कपिल सिब्बल पर पक्षपात के आरोप

साल 2022 में एक सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्बल उस समय विवादों में घिर गए, जब उन्होंने भाजपा सांसद परवेश वर्मा के खिलाफ एक भ्रामक बयान दिया। सिब्बल ने अदालत में दावा किया कि वर्मा ने मुस्लिम समुदाय के आर्थिक बहिष्कार की अपील की थी, जबकि वर्मा की उस स्पीच में किसी विशेष समुदाय का उल्लेख नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस केएम जोसेफ ने जब सिब्बल से पूछा कि क्या मुस्लिम समुदाय की ओर से भी नफरत फैलाने वाले बयान सामने आए हैं, तो उन्होंने ऐसा कोई उदाहरण होने से इनकार कर दिया। यह इनकार तब आया जब देशभर में उस दौरान कई ऐसे मामले सामने आए थे, जिनमें कुछ मुस्लिम नेताओं ने हिंदुओं के खिलाफ खुलेआम भड़काऊ भाषण दिए थे।

इनमें AIMIM के कुछ नेताओं के साथ-साथ अजमेर दरगाह के खादिम सैयद आदिल चिश्ती और सावर चिश्ती के बयान प्रमुख थे, जिन्होंने हिंदुओं के आर्थिक बहिष्कार की बात सार्वजनिक मंचों पर कही थी। इसके बावजूद सिब्बल ने अदालत में उन घटनाओं की अनदेखी की और उन्हें नकार दिया।

सिब्बल की इस भूमिका को लेकर उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठे। आलोचकों का मानना है कि उन्होंने अदालत में राजनीतिक झुकाव दिखाया और एकतरफा तर्क रखे, जिससे न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगा। यह मामला आज भी बतौर उदाहरण सामने आता है, जब भी अदालत में प्रस्तुत दलीलों की सच्चाई और वकीलों की जिम्मेदारी की बात की जाती है।

राज्यसभा में कपिल सिब्बल का दो राष्ट्र सिद्धांत पर भ्रामक दावा और अंबेडकर का गलत उद्धरण

साल 2019 में राज्यसभा में नागरिकता संशोधन विधेयक (CAB) पर बहस के दौरान कॉन्ग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने एक विवादास्पद बयान देते हुए इतिहास को लेकर भ्रामक दावे किए। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत के विभाजन की नींव रखने वाला दो राष्ट्र सिद्धांत वीर सावरकर का विचार था और डॉ. भीमराव अंबेडकर भी इससे सहमत थे।

सिब्बल ने कहा कि सावरकर ने यह लिखा था कि भारत में दो विरोधी राष्ट्र रहते हैं, हिंदू – मुस्लिम और ये दोनों एक साथ शांतिपूर्वक नहीं रह सकते। उन्होंने यह भी दावा किया कि नागरिकता संशोधन विधेयक के ज़रिए सरकार इस विचारधारा को लागू कर रही है, जो भारत के एकता और समरसता की भावना के विरुद्ध है।

उन्होंने अपने भाषण में अंबेडकर की किताब ‘पाकिस्तान या भारत का विभाजन’ का हवाला देते हुए यह साबित करने की कोशिश की कि अंबेडकर ने भी सावरकर के विचारों का समर्थन किया था। लेकिन बाद में यह सामने आया कि सिब्बल ने अंबेडकर के विचारों को संदर्भ से काटकर प्रस्तुत किया था।

वास्तव में, अंबेडकर ने सावरकर के कथन का विश्लेषण करते हुए लिखा था कि भले ही भारत में दो राष्ट्रों जैसी स्थिति हो, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि देश का विभाजन होना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया था कि दोनों समुदायों को एक ही संविधान के तहत, एक ही राष्ट्र में रहना चाहिए, जिसमें हिंदू राष्ट्र को प्राथमिक स्थान मिलेगा और मुस्लिम राष्ट्र को सहयोग की स्थिति में रहना होगा।

वीर सावरकर ने भी कभी भारत के विभाजन की वकालत नहीं की थी। उन्होंने यह स्वीकार किया था कि सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से भिन्न समुदाय भारत में रहते हैं, लेकिन इसका अर्थ अलग राष्ट्रों की भौगोलिक माँग नहीं था।

कपिल सिब्बल का यह भाषण उस समय खासा विवादास्पद बन गया, जब कई इतिहासकारों और विश्लेषकों ने उनके बयानों को तथ्यात्मक रूप से गलत बताया और आरोप लगाया कि उन्होंने राजनीतिक लाभ के लिए ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा।

2जी स्पेक्ट्रम घोटाला में कपिल सिब्बल की ‘जीरो लॉस थ्योरी’

कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल का नाम 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के संदर्भ में एक बेहद विवादास्पद बयान के साथ जुड़ा है, जिसे ‘जीरो लॉस थ्योरी’ के रूप में जाना जाता है। 2011 में जब 2जी घोटाले को लेकर देशभर में आक्रोश फैला हुआ था, तब सिब्बल ने दावा किया कि इस पूरे प्रकरण में सरकार को कोई आर्थिक नुकसान नहीं हुआ है।

यह दावा उस समय और अधिक विवादास्पद हो गया जब नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि 2008 में 2जी स्पेक्ट्रम के वितरण में की गई अनियमितताओं के कारण सरकार को लगभग 1.76 लाख करोड़ रुपये का संभावित नुकसान हुआ। रिपोर्ट में बताया गया कि स्पेक्ट्रम को पारदर्शी नीलामी के बजाय ‘पहले आओ, पहले पाओ’ नीति के तहत बेहद कम कीमतों पर कंपनियों को दे दिया गया।

सिब्बल का तर्क था कि जिन कंपनियों को स्पेक्ट्रम आवंटित किया गया, उन्होंने बाद में सेवाएँ प्रदान कीं जिससे जनता को लाभ हुआ। इसलिए किसी प्रकार का ‘राजस्व हानि’ नहीं मानी जानी चाहिए। लेकिन उनका यह बयान जनभावनाओं के खिलाफ चला गया और उन्हें सरकार के भ्रष्टाचार को ढकने की कोशिश करने वाला चेहरा माना जाने लगा।

साल 2017 में जब विशेष सीबीआई अदालत ने ए. राजा, कनिमोझी समेत सभी आरोपितों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया, तब सिब्बल ने इसे ‘दोषमुक्ति’ कहकर प्रचारित किया। हालाँकि, अदालत ने साफ तौर पर यह कहा था कि अभियोजन पक्ष भ्रष्टाचार साबित करने में विफल रहा, इसलिए बरी किया गया। यह कोई ‘क्लीन चिट’ नहीं थी।

इस पूरे मामले में सिब्बल की भूमिका को लेकर यह सवाल खड़ा हुआ कि क्या उन्होंने देश के एक बड़े घोटाले को हल्का दिखाने की कोशिश की? टाइम मैगजीन ने इसे दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सत्ता का दुरुपयोग बताया था, लेकिन सिब्बल जैसे नेताओं के लिए यह महज एक ‘शून्य नुकसान’ वाला प्रकरण था।

2जी घोटाला यूपीए सरकार के कार्यकाल में हुए कई घोटालों की कड़ी में सबसे बड़ा उदाहरण था कि कैसे राजनीतिक अहंकार आर्थिक सच्चाई पर भारी पड़ सकता है।

जज की ‘कठमुल्ला’ टिप्पणी पर महाभियोग प्रस्ताव, याचिका खारिज

दिसंबर 2024 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश शेखर कुमार यादव विवादों में घिर गए जब उन्होंने विश्व हिंदू परिषद के एक कार्यक्रम के दौरान इस्लामी कट्टरपंथियों के लिए ‘कठमुल्ला’ शब्द का प्रयोग किया। उनके बयान को लेकर देश की सियासत में हलचल मच गई। इस बयान को संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना के खिलाफ बताते हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल के नेतृत्व में राज्यसभा के कई सांसदों ने न्यायमूर्ति यादव के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव राज्यसभा महासचिव को सौंपा।

इस प्रतिनिधिमंडल में सिब्बल के साथ विवेक तन्खा, दिग्विजय सिंह, पी. विल्सन, जॉन ब्रिटास, केटीएस तुलसी, मनोज कुमार झा और साकेत गोखले जैसे नेता भी शामिल थे। उनका आरोप था कि जस्टिस यादव ने सार्वजनिक मंच से इस्लामी चरमपंथियों को ‘राष्ट्रविरोधी’ करार देते हुए ‘कठमुल्ला’ शब्द का इस्तेमाल किया, जिससे न्यायपालिका की निष्पक्षता पर प्रश्नचिन्ह लगता है।

न्यायमूर्ति यादव ने कार्यक्रम के दौरान कहा था, “ये कठमुल्ला… यह शायद उचित शब्द नहीं हो, लेकिन मैं कहने से नहीं हिचकूंगा क्योंकि ये देश के लिए हानिकारक हैं, राष्ट्रविरोधी हैं और समाज को भड़काते हैं। ऐसे लोगों से हमें सावधान रहने की जरूरत है।”

इस बयान के कुछ दिनों बाद, इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने 16 दिसंबर से प्रभावी आदेश में जस्टिस यादव के न्यायिक रोस्टर में बदलाव कर दिया। इसके साथ ही 10 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए इस बयान पर नाराज़गी जताई और जज यादव को अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए बुलाया।

हालाँकि जनवरी 2025 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ दाखिल एक जनहित याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह मामला संसद की प्रक्रिया और न्यायपालिका की स्वतंत्रता के तहत आता है।

यह पूरा घटनाक्रम इस बात पर गहरा सवाल उठाता है कि क्या संविधान और न्यायिक गरिमा के नाम पर विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता को राजनीतिक नजरिए से सीमित किया जा रहा है, या फिर यह एक संवेदनशील समाज के लिए आवश्यक संतुलन का हिस्सा है।

कोलकाता रेप-हत्या मामले में कपिल सिब्बल ने पीड़िता के माता-पिता पर डाला दोष

सितंबर 2024 में कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में हुई एक मेडिकल छात्रा की बलात्कार और हत्या की भयावह घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। इस मामले में जब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई, तो पीड़िता को न्याय दिलाने की उम्मीद के बीच एक और विवाद खड़ा हो गया। इस विवाद के केंद्र में था, सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्बल का रुख।

पश्चिम बंगाल सरकार का पक्ष रख रहे सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में मामले की कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग का विरोध किया। उनका तर्क था कि इससे “पिछले पाँच दशकों में बनी वकीलों की प्रतिष्ठा बर्बाद हो जाएगी” और वकीलों को धमकियाँ मिल रही हैं। उन्होंने कोर्ट से अनुरोध किया कि लाइव फीड रोकी जाए। लेकिन CJI डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने जनहित और पारदर्शिता को प्राथमिकता देते हुए यह माँग खारिज कर दी।

सिब्बल को उस समय कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा जब उन्होंने एफआईआर में देरी को लेकर राज्य प्रशासन का बचाव किया और उल्टा पीड़िता के माता-पिता को ही दोषी ठहरा दिया। जबकि कोर्ट ने खुद राज्य की कार्रवाई पर सवाल उठाए और एफआईआर दर्ज करने में देरी को लेकर नाराज़गी जताई।

मामले की सुनवाई के दौरान सिब्बल पर कोर्टरूम में हँसने का आरोप भी लगा, जिसे उन्होंने खारिज किया। लेकिन इस बीच राज्यभर में डॉक्टर और आम नागरिक सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे थे, न्याय की माँग कर रहे थे और सरकार की निष्क्रियता पर सवाल उठा रहे थे।

यह पूरा मामला सिब्बल के रवैये और टीएमसी सरकार के बचाव में उनकी भूमिका को लेकर लोगों के बीच तीखी बहस का विषय बन गया। क्या उन्होंने एक जघन्य अपराध की पीड़िता को न्याय दिलाने की प्राथमिकता दी या अपनी कानूनी छवि और सत्ताधारी दल की राजनीतिक सुरक्षा को?

अनुच्छेद 370 मामले में सुप्रीम कोर्ट में पाक समर्थक नेता का किया प्रतिनिधित्व

सितंबर 2023 में जब सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 370 और 35A को हटाए जाने की संवैधानिक वैधता पर सुनवाई हो रही थी, तब कपिल सिब्बल एक ऐसे याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, जो पहले पाकिस्तान समर्थक नारों के चलते विवादों में आ चुका था। नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता मोहम्मद अकबर लोन, जिसने 2018 में जम्मू-कश्मीर विधानसभा में ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगाए थे, उसी का पक्ष सिब्बल अदालत में रख रहे थे।

इस पर सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने लोन की पुरानी टिप्पणियों को लेकर कपिल सिब्बल से सवाल किया, लेकिन सिब्बल ने इसके राजनीतिक असर को नजरअंदाज करते हुए कहा कि यह मुद्दा मीडिया में अनावश्यक तूल पकड़ेगा। उन्होंने लोन की टिप्पणियों की निंदा करने से परहेज़ किया और इसे बहस के केंद्र से दूर रखने का प्रयास किया।

सिब्बल न केवल लोन बल्कि अन्य याचिकाकर्ताओं का भी प्रतिनिधित्व कर रहे थे, जिन्होंने अनुच्छेद 370 को हटाने का विरोध किया। उन्होंने इसे ‘राजनीतिक निर्णय’ बताते हुए इसकी तुलना ब्रेक्जिट से की और कश्मीर में जनमत संग्रह की माँग करते हुए कहा, “जब कोई संबंध टूटता है, तो लोगों की राय ली जानी चाहिए।” इस बयान को अदालत ने खारिज कर दिया।

विवाद इस बात को लेकर और भी गहरा गया कि अनुच्छेद 370 और 35A जैसे प्रावधानों ने जम्मू-कश्मीर में दशकों से आतंकवाद, अलगाववाद और कश्मीरी हिंदुओं के खिलाफ भेदभाव को जन्म दिया था। ये प्रावधान न सिर्फ भारत के संविधान में अस्थायी थे, बल्कि इन्होंने राज्य में अलग कानून, बाहरी नागरिकों के बसने पर रोक और केंद्र सरकार की सीमित भूमिका को प्रोत्साहन दिया।

अब जब अनुच्छेद 370 हटाया जा चुका है, राज्य में सामान्य स्थिति लौट रही है, आतंकवाद में कमी आई है और निवेश के नए रास्ते खुले हैं। इसके बावजूद, कपिल सिब्बल जैसे वरिष्ठ नेता द्वारा पाकिस्तान समर्थक व्यक्तियों की पैरवी और जनमत संग्रह जैसी संवेदनशील माँगें न्यायिक एवँ राष्ट्रीय विमर्श में गंभीर चिंता का विषय बनी हुई हैं।

राफेल डील विवाद पर कपिल सिब्बल ने कैग की निष्पक्षता पर उठाए सवाल

साल 2018 में कपिल सिब्बल एक बार फिर सुर्खियों में आए, जब उन्होंने यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी और प्रशांत भूषण की ओर से सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की। इस याचिका में केंद्र सरकार द्वारा फ्रांस से खरीदे जा रहे राफेल लड़ाकू विमानों की डील पर सवाल खड़े किए गए। सिब्बल ने आरोप लगाया कि इस सौदे में पारदर्शिता की कमी है और विमानों की कीमतें पहले की तुलना में अधिक हैं। यह मामला उस समय काफी तूल पकड़ गया था, खासकर 2019 के आम चुनावों से पहले, जब कॉन्ग्रेस और विपक्षी दलों ने ‘चौकीदार चोर है’ का नारा देकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा।

हालाँकि, दिसंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने मामले में दखल देने से इनकार कर दिया और सरकार को क्लीन चिट दे दी। अदालत ने कहा कि राफेल सौदे में कोई प्रक्रिया संबंधी खामी या अनियमितता नहीं पाई गई है। इस निर्णय के बाद कपिल सिब्बल और कॉन्ग्रेस पार्टी की स्थिति कमजोर पड़ गई।

बावजूद इसके जब यह संकेत मिला कि भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) राजीव महर्षि की रिपोर्ट भी राफेल डील को क्लीन चिट देने वाली है, तो कपिल सिब्बल ने अचानक उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाना शुरू कर दिया। सिब्बल ने दावा किया कि राजीव महर्षि उस समय वित्त मंत्रालय में थे जब राफेल सौदे से संबंधित प्रक्रियाएँ चल रही थीं, इसलिए उन्हें इस मामले की ऑडिट नहीं करनी चाहिए थी।

यह घटनाक्रम दिखाता है कि कैसे एक राजनीतिक एजेंडे के तहत राफेल डील को चुनावी मुद्दा बनाया गया, लेकिन जब न्यायिक और संवैधानिक संस्थानों ने डील को वैध और पारदर्शी बताया। तब कॉन्ग्रेस और उसके वकील सवालों की दिशा बदलते नज़र आए। यह प्रकरण न केवल एक रक्षा सौदे पर उठे विवाद की कहानी है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कैसे कानूनी मंच का इस्तेमाल राजनीतिक दाँव-पेंच के लिए किया गया।

अतीक अहमद के बेटे असद पर कपिल सिब्बल की सहानुभूति भरी टिप्पणी

साल 2023 में उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था और अपराध के खिलाफ कार्रवाई के बीच, गैंगस्टर से राजनेता बने अतीक अहमद के बेटे असद अहमद की पुलिस मुठभेड़ में मौत ने देशभर में सुर्खियाँ बटोरीं। लेकिन उससे भी अधिक विवाद खड़ा हुआ तब, जब कपिल सिब्बल ने असद के पक्ष में सहानुभूति जताते हुए पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए।

कपिल सिब्बल ने कहा, “एक 19 साल का लड़का देश की सुरक्षा के लिए कैसे खतरा हो सकता है? अगर उसे पकड़ना था तो पैर में गोली मारते या मुकदमा चलाते, उसे मारना क्यों ज़रूरी था?” यह बयान तब आया जब असद अहमद का नाम उमेश पाल हत्याकांड में मुख्य आरोपितों में था। 24 फरवरी 2023 को दिनदहाड़े हुए इस जघन्य हत्याकांड ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया था और असद की भूमिका को लेकर पुलिस ने पुख्ता सबूत भी प्रस्तुत किए थे।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, असद न केवल हत्या की साजिश में शामिल था, बल्कि वह अपने अब्बू अतीक अहमद को पुलिस हिरासत से छुड़ाने और पुलिस काफिले पर हमले की योजना भी बना रहा था। इन तथ्यों की सार्वजनिक पुष्टि के बावजूद, कपिल सिब्बल ने इस पूरे मामले को एक ‘युवा लड़के की मौत’ के रूप में पेश करने की कोशिश की, जो कानून और सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय बना।

सिब्बल के बयान ने न केवल पुलिस की कार्रवाई पर सवाल खड़े किए, बल्कि यह भी दर्शाया कि कुछ राजनेता और वकील किस तरह से अपराधियों के लिए मंच तैयार करते हैं, जब उनके नाम के साथ एक खास राजनीतिक या सांप्रदायिक पहचान जुड़ी हो। यह वही कपिल सिब्बल है, जिसने पहले आतंकवादियों की उम्र को लेकर भी सवाल खड़े किए थे। जैसे 2008 मुंबई हमले में शामिल पाकिस्तानी आतंकी भी महज़ 20-21 साल का था, परंतु उससे देश को कितना बड़ा खतरा था, इतिहास गवाह है।

कानून का सम्मान और निष्पक्ष न्याय प्रक्रिया की बात करने वाले सिब्बल जैसे वरिष्ठ वकील द्वारा इस तरह की एकतरफा सहानुभूति न केवल न्याय व्यवस्था को कमजोर करती है, बल्कि अपराधियों को परोक्ष रूप से संरक्षण देने जैसा प्रतीत होती है।

असम म्यांमार का हिस्सा था’-कपिल सिब्बल के बयान से हुआ था विवाद

साल 2023 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 6A को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही बहस के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने एक ऐसा बयान दे दिया, जिसने देशभर में तीखी प्रतिक्रियाएँ जन्म दीं। 7 सितंबर 2023 को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सिब्बल ने दावा किया कि “असम मूल रूप से म्यांमार का हिस्सा था।”

सुप्रीम कोर्ट की पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ उस समय नागरिकता अधिनियम की धारा 6A की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। धारा 6A 1985 के असम समझौते के बाद अधिनियम में जोड़ी गई थी, जिसके तहत 25 मार्च 1971 तक असम में आए सभी लोगों को नागरिकता देने का प्रावधान है। यह कट ऑफ पूरे भारत के लिए तय 19 जुलाई 1949 की तारीख से अलग है।

सिब्बल, जो जमीयत उलेमा-ए-हिंद और ऑल असम माइनॉरिटी स्टूडेंट्स यूनियन (AAMSU) की ओर से पेश हो रहे थे, ने न केवल असम के म्यांमार से जुड़े होने का दावा किया। कपिल ने यह भी कहा कि “प्रवास का कोई मानचित्रण संभव नहीं है।” उनका तर्क था कि इतिहास जटिल है और सीमाएँ समय के साथ बदली हैं, इसलिए अवैध प्रवास की परिभाषा तय करना मुश्किल है।

सिब्बल का यह बयान न केवल इतिहास के तथ्यों से उलझता दिखा, बल्कि असम के लोगों की भावनाओं पर भी चोट करता नजर आया। असम जो सदियों से भारत की सांस्कृतिक और भौगोलिक पहचान का अहम हिस्सा रहा है, उसे म्यांमार से जोड़ना न केवल तथ्यात्मक रूप से संदिग्ध है, बल्कि यह भारत की एकता और अखंडता पर भी सवाल खड़े करता है।

राजनीतिक और सामाजिक संगठनों ने कपिल सिब्बल की इस टिप्पणी की कड़ी आलोचना की, इसे ऐतिहासिक तथ्यों के साथ खिलवाड़ और अवैध घुसपैठ को जायज ठहराने की कोशिश बताया। असम की पहचान और सीमाओं पर इस तरह के बयान देना न केवल संवेदनशील मसलों को और उलझाता है, बल्कि न्यायिक बहसों को भी दिशा से भटकाने का काम करता है।

कुल मिलाकर कपिल सिब्बल का यह विवादास्पद बयान एक बार फिर उनके राजनीतिक रुख और कोर्टरूम में उनके द्वारा लिए गए पक्षों को लेकर बहस का विषय बन गया ।

ईदगाह मैदान विवाद में कपिल सिब्बल ने वक्फ बोर्ड का रखा पक्ष रखा, SC ने लगाई पूजा और नमाज़ पर रोक

कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु स्थित चामराजपेट का ईदगाह मैदान एक बार फिर से धार्मिक और कानूनी विवादों के केंद्र में आ गया। यह विवाद तब और गहरा गया जब कर्नाटक वक्फ बोर्ड की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में यह कहते हुए आपत्ति जताई कि यदि वक्फ की जमीन पर हिंदू धार्मिक त्योहारों की अनुमति दी गई, तो इससे मुस्लिम समुदाय में नाराज़गी और तनाव की स्थिति पैदा हो सकती है।

कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में तर्क दिया कि पिछले 200 वर्षों से इस मैदान पर सिर्फ इस्लामी धार्मिक कार्यक्रम होते आए हैं, और ऐसे में गणेश चतुर्थी जैसे हिंदू त्योहार को अनुमति देना न केवल इस स्थान के धार्मिक स्वरूप को बदल देगा, बल्कि इससे सांप्रदायिक सौहार्द को भी खतरा हो सकता है। उन्होंने अदालत के सामने यह भी कहा कि “अगर वक्फ की जमीन पर दूसरे धर्मों के त्योहार मनाने की इजाजत दी गई, तो आप जानते हैं कि इसका अंजाम क्या हो सकता है।”

गौरतलब है कि कर्नाटक हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को सीमित अवधि के लिए इस मैदान पर गणेश चतुर्थी आयोजन की अनुमति पर विचार करने की छूट दी थी। इसके खिलाफ वक्फ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और हाईकोर्ट के आदेश को 1964 में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का उल्लंघन बताया।

विवाद की जड़ यह है कि ईदगाह मैदान पर कर्नाटक वक्फ बोर्ड और बृहत बेंगलुरु महानगर पालिका (BBMP) दोनों ही स्वामित्व का दावा कर रहे हैं। इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2022 में हस्तक्षेप करते हुए मैदान पर ‘यथास्थिति’ बनाए रखने का आदेश दिया, जिसका मतलब है कि ना वहाँ पूजा होगी और ना ही नमाज़।

यह मामला केवल एक जमीन के स्वामित्व का नहीं, बल्कि भारत में धार्मिक सहअस्तित्व और सांप्रदायिक संतुलन को लेकर गहराते मतभेदों का प्रतीक बन चुका है। कपिल सिब्बल, जो खुद को ‘गंगा-जमुनी तहज़ीब’ और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का पैरोकार बताते आए हैं, उनके बयान ने एक बार फिर राजनीति और धर्म के टकराव को उजागर कर दिया है।

सुप्रीम कोर्ट के यथास्थिति के आदेश से फिलहाल किसी भी धार्मिक आयोजन पर रोक है, लेकिन ईदगाह मैदान पर स्वामित्व और धार्मिक अधिकारों की यह लड़ाई आने वाले समय में और भी गर्मा सकती है।

वक्फ (उम्मीद) अधिनियम के खिलाफ भी सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्बल

वरिष्ठ वकील और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल एक बार फिर से वक्फ से जुड़े विवादित मुद्दे को लेकर सुर्खियों में हैं। इस बार वे जमीयत उलेमा-ए-हिंद की ओर से सुप्रीम कोर्ट में वक्फ (उम्मीद) संशोधन अधिनियम की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने के लिए पेश होंगे। यह अधिनियम हाल ही में संसद के दोनों सदनों में पारित हुआ था और राष्ट्रपति की मंजूरी भी प्राप्त कर चुका है।

कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में वक्फ अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर तत्काल सुनवाई की माँग की थी, लेकिन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने उन्हें और वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी को फटकार लगाते हुए कहा कि वे स्थापित कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करें।

विवादित वक्फ संशोधन अधिनियम का उद्देश्य वक्फ बोर्डों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाना, गैर-मुस्लिमों की संपत्तियों पर अतिक्रमण को रोकना और सरकारी या सार्वजनिक भूमि पर अवैध कब्जों को समाप्त करना है। वहीं, जमीयत उलेमा-ए-हिंद इस कानून को मुस्लिमों के धार्मिक और सामाजिक अधिकारों पर हमला मानते हुए कोर्ट का दरवाजा खटखटा चुकी है।

गौरतलब है कि जमीयत उलेमा-ए-हिंद देश के सबसे प्रभावशाली इस्लामी संगठनों में से एक है, जो पिछले एक दशक से आतंकवाद के मामलों में आरोपित मुस्लिम युवकों को कानूनी सहायता प्रदान करता रहा है। इस संगठन का दावा है कि वो ‘निर्दोष मुसलमानों’ को न्याय दिलाने का प्रयास कर रहा है। जमीयत की कानूनी टीम अब तक करीब 700 से अधिक आरोपितों को कानूनी मदद दे चुकी है, जिनमें से करीब 192 आरोपितों को अदालतों ने पर्याप्त सबूतों के अभाव में बरी कर दिया है।

संगठन ने नूहँ हिंसा के आरोपित कॉन्ग्रेस नेता मम्मन खान का भी बचाव किया है और देश में इस्लामोफोबिया के कथित मामलों के खिलाफ सख्त कानून की माँग की है। वहीं, काशी और मथुरा मंदिर विवादों में हिंदू पक्ष की याचिकाओं का भी विरोध किया गया है।

कपिल सिब्बल एक बार फिर ऐसे संगठन का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, जो खुद को शरिया आधारित विचारधारा के करीब मानता है। वक्फ अधिनियम के खिलाफ उनकी यह कानूनी लड़ाई ऐसे समय में हो रही है जब देश में धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों को लेकर पहले से ही गहमागहमी है।

तीन तलाक़ पर कपिल सिब्बल की पैरवी: सामाजिक सुधारों के विरुद्ध धार्मिक कट्टरता की वकालत?

तीन तलाक़ के ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) का प्रतिनिधित्व करते हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने एक बार फिर अपनी भूमिका को लेकर राष्ट्रीय बहस को जन्म दिया। शायरा बानो बनाम भारत संघ मामले में सिब्बल ने उस प्रथा का बचाव किया, जिसे व्यापक रूप से मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ और अत्यधिक पितृसत्तात्मक माना गया था।

सिब्बल की ओर से अदालत में दिए गए प्रमुख तर्कों में से एक था कि “तीन तलाक़ 1400 वर्षों से चली आ रही परंपरा है, इसे असंवैधानिक कैसे कहा जा सकता है?” उनके इस तर्क ने सामाजिक न्याय की आधुनिक अवधारणाओं को धार्मिक परंपराओं के अधीन रखने की प्रवृत्ति को उजागर किया। उन्होंने यहाँ तक कहा कि यदि अयोध्या में राम जन्म पर हिंदुओं की आस्था को चुनौती नहीं दी जा सकती, तो तीन तलाक पर भी मुसलमानों की आस्था को सवालों के घेरे में नहीं लाया जाना चाहिए।

सिब्बल ने यह भी तर्क दिया कि शरिया कानून संविधान के अधीन नहीं आता और बहुसंख्यक समुदाय अल्पसंख्यकों के लिए कोई सुधारात्मक कानून नहीं बना सकता, जब तक कि वह सुधार समुदाय के भीतर से न आए। लेकिन यह प्रश्न भी उठता है कि यदि 1400 वर्षों में समुदाय के भीतर से कोई सुधार नहीं आया, तो मुस्लिम महिलाएँ और कितनी सदियाँ इंतज़ार करें?

सिब्बल की इस पैरवी को समाज के एक बड़े वर्ग ने प्रतिगामी और महिला विरोधी करार दिया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने 22 अगस्त 2017 को एक ऐतिहासिक निर्णय में तत्काल तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) को असंवैधानिक घोषित कर दिया। अदालत ने कहा कि यह प्रथा संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 15 (लिंग के आधार पर भेदभाव से मुक्ति) और 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन करती है।

इसके बाद 2019 में मोदी सरकार ने कानून बनाकर तीन तलाक को आपराधिक कृत्य घोषित कर दिया, जिससे यह स्पष्ट संकेत गया कि भारत का लोकतंत्र अब धार्मिक रूढ़ियों की आड़ में महिलाओं के मौलिक अधिकारों की अनदेखी नहीं करेगा।

कपिल सिब्बल द्वारा मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का बचाव करना केवल एक कानूनी बहस नहीं थी, बल्कि उस गहरी वैचारिक लड़ाई का हिस्सा था जहाँ धर्म और संविधान आमने-सामने खड़े थे। सवाल यह भी उठता है कि क्या सिब्बल जैसे वरिष्ठ अधिवक्ता को धार्मिक परंपराओं के नाम पर सामाजिक अन्याय का समर्थन करना शोभा देता है।

तीन तलाक का मामला केवल एक कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि भारत में महिलाओं के अधिकारों की दिशा में एक निर्णायक मोड़ था, जिसमें आखिरकार संवैधानिक मूल्य विजयी रहे।

कपिल सिब्बल की वकालत या वैचारिक पक्षधरता?

वरिष्ठ वकील और पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल एक बार फिर कानूनी और वैचारिक बहस के केंद्र में हैं। वक्फ अधिनियम 2025 के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जमीयत उलेमा-ए-हिंद की ओर से पैरवी करने के निर्णय ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सिब्बल एक वकील की भूमिका में हैं या एक खास वैचारिक पक्षधरता के तहत लगातार काम कर रहे हैं।

एक ओर जहाँ कपिल सिब्बल कानून के छात्र और एक पेशेवर अधिवक्ता के रूप में किसी भी मुवक्किल की ओर से अदालत में खड़े होने के अधिकार का दावा कर सकते हैं, वहीं उनके करियर की दिशा और उनका वकालती इतिहास यह संकेत देता है कि वह अक्सर उन मामलों को चुनते हैं जो या तो हिंदू हितों के विरोध में होते हैं या ऐसे मुस्लिम संगठनों के समर्थन में जो खुद को संविधान से ऊपर मानते हैं। तथ्य यही बताते हैं कि

  • राम जन्म भूमि विवाद में उन्होंने सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से हिंदू आस्था का विरोध किया।
  • तीन तलाक जैसे महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ मानी जाने वाली प्रथा के पक्ष में उन्होंने AIMPLB का बचाव किया।
  • अनुच्छेद 370 और 35A की बहाली के लिए सुप्रीम कोर्ट में जोरदार पैरवी की।
  • 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले जैसे गंभीर आर्थिक मामलों को सामान्य दिखाने की कोशिश की।
  • और अब वक्फ अधिनियम जैसे कानून का विरोध कर रहे हैं, जो वक्फ बोर्डों द्वारा किए जा रहे संपत्ति कब्जे, सरकारी ज़मीनों पर अतिक्रमण और गैर-मुस्लिमों की संपत्तियों पर मनमाने दावों को रोकने के लिए लाया गया है।

विश्लेषकों का मानना है कि सिब्बल का यह व्यवहार केवल कानूनी रणनीति नहीं, बल्कि एक वैचारिक एजेंडे की निरंतरता है। जिस तरह उन्होंने बार-बार इस्लामी संगठनों, इस्लामवादी रुझानों और उन संगठनों का प्रतिनिधित्व किया है जिन पर कट्टरपंथ को बढ़ावा देने के आरोप हैं, वह उनके ‘धर्मनिरपेक्षता’ के दावे को संदेह के घेरे में लाता है।

विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि कपिल सिब्बल जैसे प्रभावशाली वकील और राजनेता से अपेक्षा की जाती है कि वे राष्ट्रीय एकता, सामाजिक न्याय और समावेशी विकास को प्राथमिकता देंगे, न कि केवल राजनीतिक और वैचारिक प्रतिद्वंद्विता में हिंदू हितों को चुनौती देने वाले मंचों को ही चुनेंगे।

कुल मिलाकर देखें तो कपिल सिब्बल की वकालत अब केवल एक पेशेवर कर्तव्य नहीं, बल्कि एक वैचारिक अभियान की तरह दिखने लगी है। जिसमें वे बार-बार उन पक्षों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जो बहुसंख्यक हितों के विरोध में और अल्पसंख्यक विशेषाधिकारों के पक्ष में खड़े होते हैं। यह रुख केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय विमर्श को भी प्रभावित कर रहा है। और यही बात उन्हें अन्य अधिवक्ताओं से अलग और विवादास्पद बनाती है।

मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी भाषा में प्रकाशि है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

वक्फ कानून के विरोध के नाम पर उत्पात मचा रही थी मुस्लिम भीड़, मस्जिद के सामने सड़क जाम कर पढ़ी नमाज: गुजरात पुलिस ने हिरासत में लिया, फैला रहे थे ‘मस्जिद छीने जाने’ का झूठ

मोदी सरकार ने अपने सालों पुराने वादे को पूरा करते हुए वक्फ संशोधन बिल पास करवाकर उसे लागू करवा दिया है। कट्टरपंथी मुस्लिम और ज्यादातर विपक्षी अभी भी इस सच्चाई को पचा नहीं पा रहे हैं। इसी बीच अहमदाबाद के राखियाल में मुस्लिम भीड़ वक्फ एक्ट के विरोध में सड़क पर उतर आई। हालाँकि, अहमदाबाद पुलिस की सतर्कता के चलते माहौल खराब होने से पहले ही उन्हें हिरासत में ले लिया गया।

सोशल मीडिया साइट X के यूजर सागर पटोलिया द्वारा पोस्ट किए गए वीडियो के अनुसार, मुस्लिमों ने अहमदाबाद के राखियाल में कलंदरी मस्जिद के पास सड़क को अवरुद्ध करके अव्यवस्था पैदा करने की कोशिश की। वीडियो में देखा जा सकता है कि मुस्लिम भीड़ ने मुख्य सड़क को पहले पूरी तरह अवरुद्ध कर दिया और फिर सड़क पर नमाज पढ़ना शुरू कर दिया।

यह भीड़ वक्फ अधिनियम का विरोध करने के लिए यहाँ एकत्र हुई थी और शुक्रवार के दिन जुमे की नमाज के बाद विरोध प्रदर्शन करने की योजना थी। हालाँकि, अहमदाबाद पुलिस ने समय रहते स्थिति का आकलन कर लिया और शुरुआत में सभी को हिरासत में ले लिया, ताकि स्थिति ना बिगड़े।

मोदी मस्जिदें छीन लेंगे – एक और झूठ

हिरासत अवधि का एक वीडियो भी वायरल हो रहा है, जिसमें एक मुस्लिम व्यक्ति बार-बार झूठ फैलाकर मुस्लिमों को भड़काता हुआ नजर आ रहा है। उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बयान का हवाला देते हुए कहा कि ये लोग मुस्लिमों की मस्जिदें और कब्रिस्तान छीन लेंगे।

वीडियो में वह मुस्लिम शख्स यह कहते सुनाई दे रहा है, “ये मोदी और अमित शाह कौन हैं? क्या यह उनके बाप का देश है? यह किसी के बाप की जागीर नहीं है।” फिलहाल अहमदाबाद पुलिस ने दंगाइयों को हिरासत में लेकर स्थिति पर नियंत्रण कर लिया है।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से गुजराती में लिखी गई है। उसे इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं।)

रूह आफजा की पूरी बोतल गटकने पर होनहार YouTuber रवीश राठी अस्पताल में भर्ती: बाबा रामदेव के शक्कर वाले सिरप के खिलाफ बना रहा था रील-वीडियो

होनहार यूट्यूबर रवीश राठी को बाबा रामदेव के खिलाफ वीडियो और रील बनाते समय रूह आफजा की लगभग पूरी बोतल पीने के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया है। रवीश राठी से उम्मीद है कि वे साल 2029 के लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हराएँगे।

रवीश के पिता रॉबर्ट गाँधी ने घटनाक्रम को याद करते हुए बताया, “शाम को जब वह फिजिक्स की ट्यूशन के लिए गया था, तब वह बिल्कुल ठीक था। जब मैं उसे ट्यूशन सेंटर से लेने गया और वापस घर लाया, तब भी वह सामान्य था। कार में ही उसने अजीत अंजुम और साक्षी जोशी के कुछ वीडियो देखने शुरू किए थे। वह पार्किंग एरिया में कम-से-कम 5 मिनट तक वीडियो देखता रहा।”

बताया जाता है कि अंजुम और जोशी द्वारा रूह अफजा पीने के वीडियो को देखकर रवीश काफी प्रभावित और उत्साहित हो गया था। दरअसल, रूह अफजा एक ऐसा पेय है, जिसमें मुख्य रूप से चीनी का घोल होता है और इसमें गुलाब का स्वाद भी मिलाया जाता है। उसने यह पेय बाबा रामदेव के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराने के लिए पिया था।

बाबा रामदेव ने कुछ दिन पहले ही गुलाब के स्वाद वाला शक्कर का अपना सिरप लॉन्च किया था और इसके प्रचार वाले एक वीडियो में वे रूह अफजा पर कटाक्ष करते नजर आए थे। उन्होंने कहा था कि रूह अफजा से होने वाली बिक्री का एक हिस्सा इस्लामी चैरिटी और कथित आतंकवादी गतिविधियों में जाता है।

इस लेख को लिखते समय एक कट्टरपंथी ने बीच में कहा, “दोनों एक ही बात हैं”, लेकिन उसकी राय को अस्वीकार कर दिया गया।

फिर से रवीश पर आते हैं। निजी टैक्सी चालक के रूप में काम करने वाले उसके पिता ने पुष्टि की कि यह उभरता हुआ यूट्यूबर पूरा वीडियो देखने के बाद तेजी से अपने कमरे की ओर भागा। इसके बाद स्विगी, जेप्टो, ब्लिंकिट और एक अन्य ऐप से रूह अफजा की एक बोतल मँगवाई ताकि उस तक पहुँचने का समय कम-से-कम लगे। फिर उसने अपना वीडियो शूट करना शुरू कर दिया।

रवीश के पिता ने उत्तरी दिल्ली के अस्पताल के बाहर पत्रकारों को बताया, जहाँ उसका वर्तमान में इलाज चल रहा है, “वह रामदेव को बर्बाद करने के लिए 5 मिनट का वीडियो और कम-से-कम 3 रील बनाने की योजना बना रहा था। उसने रूह अफ़ज़ा सिरप को पतला भी नहीं किया और अंजुम एवं जोशी की शैली में पीना शुरू कर दिया।”

रवीश राठी के पिता ने आगे बताया, “रील को सही करने के लिए उसे कई रीटेक की ज़रूरत पड़ी। वह उत्साह में रूह अफ़ज़ा पीता रहा। उसने पहले वीडियो के लिए लगभग 20 टेक लिए थे। इसके बाद वह गिर गया।”

बताया जाता है कि रवीश मधुमेह से पीड़ित है और चीनी का बहुत ज़्यादा सिरप पीने से उसकी तबीयत बिगड़ गई। उसने अभी सिर्फ़ एक रील की रिकॉर्डिंग पूरी की थी कि वह बेहोश हो गया। उसके पिता उसे तुरंत नज़दीकी अस्पताल ले गए जहाँ उसका इलाज प्रधानमंत्री आयुष्मान कार्ड के ज़रिए किया जा रहा है, हाल ही में इस योजना को दिल्ली में लॉन्च किया गया था।

(इस व्यंग्य को राहुल रौशन ने मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा है। इस लिंक पर क्लिक करके उसे पढ़ सकते हैं।)

कौन हैं तमिलनाडु BJP के नए अध्यक्ष नैनार नागेंद्रन? खुद अन्नामलाई ने रखा प्रस्ताव, अमित शाह ने AIADMK के साथ गठबंधन का किया ऐलान

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने अपने तमिलनाडु इकाई के नए अध्यक्ष के रूप में नैनार नागेंद्रन (Nainar Nagendran) को चुना है। यह फैसला न सिर्फ बीजेपी की रणनीति में बदलाव का संकेत देता है, बल्कि 2026 के विधानसभा चुनावों में डीएमके-कॉन्ग्रेस गठबंधन को कड़ी टक्कर देने की तैयारी को भी दर्शाता है। नैनार नागेंद्रन के नामांकन में सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि मौजूदा अध्यक्ष के. अन्नामलाई ने खुद उनके नाम का प्रस्ताव रखा, जिसे पार्टी के बड़े नेताओं ने सर्वसम्मति से स्वीकार किया।

तमिलनाडु के तिरुनेलवेली विधानसभा सीट से बीजेपी विधायक नयनार नागेंद्रन ने अकेले इस पद के लिए नामांकन दाखिल किया था। पार्टी ने कहा कि उनके नाम का प्रस्ताव वर्तमान अध्यक्ष के. अन्नामलई, केंद्रीय मंत्री एल. मुरुगन, पूर्व केंद्रीय मंत्री पोन राधाकृष्णन और भाजपा विधायक और महिला मोर्चा अध्यक्ष वनथी श्रीनिवासन ने रखा। उनके नाम की घोषणा के लिए खुद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह चेन्नई पहुँचे और नागेंद्रन-अन्नामलाई के साथ नागेंद्रन को तमिलनाडु बीजेपी का अध्यक्ष घोषित किया। यही नहीं, इसी प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान गृह मंत्री अमित शाह ने AIADMK के साथ गठबंधन का भी ऐलान कर दिया।

सवाल यह है कि आखिर नैनार नागेंद्रन कौन हैं? वे बीजेपी के लिए तुरुप का इक्का क्यों साबित हो सकते हैं? और कैसे वे बीजेपी और AIADMK के बीच गठबंधन को मजबूत कर सकते हैं? आइए, इस राजनीतिक बदलाव के हर पहलू को विस्तार से समझते हैं।

एक अनुभवी और प्रभावशाली चेहरा

नैनार नागेंद्रन तमिलनाडु की तिरुनेलवेली विधानसभा सीट से बीजेपी के मौजूदा विधायक हैं। दक्षिणी तमिलनाडु में उनकी मजबूत पकड़ और संगठनात्मक क्षमता उन्हें एक जाना-माना नाम बनाती है। हालाँकि उनका सियासी सफर यहीं शुरू नहीं हुआ। नागेंद्रन पहले AIADMK के साथ थे और जयललिता सरकार में 2001 से 2006 तक मंत्री रहे। उन्होंने बिजली और उद्योग जैसे महत्वपूर्ण विभागों को संभाला और अपनी प्रशासनिक क्षमता का लोहा मनवाया। 2017 में वे बीजेपी में शामिल हुए और जल्द ही पार्टी के भीतर अहम भूमिका में आ गए। अभी तक वे बीजेपी की तमिलनाडु इकाई के उपाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाल रहे थे और अब उन्हें पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया है।

नागेंद्रन का सबसे बड़ा ताकतवर पक्ष है उनका थेवर समुदाय से होना। तमिलनाडु में थेवर समुदाय का दक्षिणी जिलों में खासा प्रभाव है। यह समुदाय न सिर्फ सामाजिक रूप से मजबूत है, बल्कि सियासी तौर पर भी वोटों को प्रभावित करने की ताकत रखता है। बीजेपी का मानना है कि नागेंद्रन के नेतृत्व में पार्टी दक्षिणी तमिलनाडु में अपनी पैठ बढ़ा सकती है, जहाँ उसका प्रभाव अभी सीमित है।

क्यों चुने गए नैनार नागेंद्रन?

नैनार नागेंद्रन का चयन बीजेपी की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। तमिलनाडु में बीजेपी अभी चार विधायकों वाली पार्टी है, लेकिन उसका लक्ष्य 2026 में सत्ता पर कब्जा करना है। इसके लिए पार्टी को न सिर्फ संगठन को मजबूत करना है, बल्कि गठबंधन की जमीन भी तैयार करनी है। नागेंद्रन कई मायनों में इस रणनीति के लिए सही चेहरा हैं।

AIADMK के साथ गठबंधन की कड़ी

नागेंद्रन का AIADMK के साथ पुराना नाता है। जयललिता और ओ. पन्नीरसेल्वम के नेतृत्व में उन्होंने मंत्री के रूप में काम किया और पार्टी की संस्कृति व संवेदनशीलता को अच्छी तरह समझते हैं। 2023 में AIADMK और बीजेपी का गठबंधन टूटने की एक बड़ी वजह थी अन्नामलाई की आक्रामक शैली और उनके जयललिता व अन्नादुरई जैसे नेताओं पर तीखे बयान। अन्नामलाई के नेतृत्व में AIADMK के साथ गठबंधन में दिक्कतें आ रही थी, क्योंकि खुद अन्नामलाई ही इसमें सहज नहीं थे।

अब अन्नामलाई संगठन के जरूरी मुद्दों को देख सकेंगे और पार्टी अध्यक्ष होने के नाते नागेंद्रन एआईएडीएमके के साथ बीजेपी के गठबंधन को आगे बढ़ा सकेंगे। चूँकि नागेंद्रन का AIADMK से पुराना कनेक्शन रहा है, ऐसे में ये बीजेपी के लिए गठबंधन की राह आसान कर सकता है।

जातीय समीकरणों का संतुलन

तमिलनाडु की सियासत में जातीय समीकरण अहम भूमिका निभाते हैं। वर्तमान में बीजेपी अध्यक्ष अन्नामलाई और AIADMK महासचिव ई. पलानीस्वामी दोनों गौंडर समुदाय से हैं, जो पश्चिमी तमिलनाडु में प्रभावशाली है। लेकिन गौंडर नेताओं की मौजूदगी से गठबंधन में संतुलन बिगड़ने का खतरा था। नागेंद्रन थेवर समुदाय से हैं, जिसका प्रभाव दक्षिणी तमिलनाडु में है। बीजेपी का मानना है कि थेवर समुदाय का नेतृत्व गठबंधन को मजबूत करेगा और दोनों पार्टियाँ अलग-अलग क्षेत्रों में अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर सकेंगी।

प्रशासनिक अनुभव और संगठनात्मक क्षमता

नागेंद्रन का मंत्री के रूप में अनुभव और बीजेपी में उपाध्यक्ष के तौर पर उनकी सक्रियता उन्हें एक मजबूत नेता बनाती है। 2017 में बीजेपी में शामिल होने के बाद उन्होंने दक्षिणी तमिलनाडु में पार्टी के विस्तार में अहम भूमिका निभाई। तिरुनेलवेली जैसे क्षेत्रों में उनकी लोकप्रियता बीजेपी के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है।

अन्नामलाई की जगह लेने की योग्यता

अन्नामलाई ने अपनी आक्रामक शैली और ‘एन मन, एन मक्कल‘ जैसे अभियानों से बीजेपी को तमिलनाडु में नई पहचान दी। लेकिन उनकी शैली AIADMK के साथ तनाव का कारण बनी। नागेंद्रन की शांत और संतुलित छवि गठबंधन के लिए ज्यादा अनुकूल मानी जा रही है। साथ ही अन्नामलाई ने खुद उनके नाम का प्रस्ताव देकर यह संदेश दिया है कि पार्टी में कोई गुटबाजी नहीं है।

बीजेपी को कैसे होगा फायदा?

नैनार नागेंद्रन का अध्यक्ष बनना बीजेपी के लिए कई तरह से फायदेमंद हो सकता है। पहला और सबसे बड़ा फायदा है AIADMK के साथ गठबंधन, जिसका ऐलान खुद अमित शाह ने कर दिया है। । तमिलनाडु में डीएमके और कॉन्ग्रेस का गठबंधन मजबूत है। 2021 के विधानसभा चुनाव में डीएमके गठबंधन ने 234 में से 133 सीटें जीतीं, जबकि AIADMK-बीजेपी गठबंधन को 75 सीटें मिलीं। 2024 के लोकसभा चुनाव में दोनों पार्टियों को एक भी सीट नहीं मिली, जिसने गठबंधन की जरूरत को और मजबूत किया। नागेंद्रन के नेतृत्व में बीजेपी और AIADMK साथ आ चुके हैं, ऐसे में ये गठबंधन डीएमके के खिलाफ मजबूत विकल्प बन चुका है।

दूसरा- नागेंद्रन की थेवर समुदाय से होने की वजह से बीजेपी को दक्षिणी तमिलनाडु में नया आधार मिलेगा। अभी बीजेपी का प्रभाव पश्चिमी तमिलनाडु तक सीमित है। थेवर समुदाय के वोटों का समर्थन बीजेपी को 60 विधानसभा सीटों वाले दक्षिणी क्षेत्र में मजबूती दे सकता है।

तीसरा- नागेंद्रन की प्रशासनिक छवि और अनुभव बीजेपी को एक भरोसेमंद चेहरा देता है। तमिलनाडु की जनता क्षेत्रीय दलों को तरजीह देती है, लेकिन नागेंद्रन का AIADMK बैकग्राउंड और बीजेपी में उनकी सक्रियता उन्हें दोनों तरह के वोटरों से जोड़ सकती है।

2026 के विधानसभा चुनाव में तुरुप का इक्का

साल 2026 के विधानसभा चुनाव में तमिलनाडु में बीजेपी के लिए करो या मरो की स्थिति है। डीएमके की मजबूत संगठनात्मक ताकत और सामाजिक न्याय के एजेंडे ने उसे सत्ता में बनाए रखा है। बीजेपी को अगर उसे चुनौती देनी है, तो उसे गठबंधन और स्थानीय मुद्दों पर फोकस करना होगा। नागेंद्रन इस रणनीति का अहम हिस्सा हो सकते हैं।

उनका AIADMK के साथ पुराना रिश्ता गठबंधन को न सिर्फ आसान बनाएगा, बल्कि दोनों पार्टियों के बीच सीट बँटवारे और रणनीति में सामंजस्य लाएगा। साथ ही उनकी थेवर समुदाय की पकड़ बीजेपी को नए वोटरों तक पहुँचाएगी। अन्नामलाई ने बीजेपी को पश्चिमी तमिलनाडु में 54 सीटों पर मजबूत किया था। अगर नागेंद्रन दक्षिणी क्षेत्र की 60 सीटों पर ऐसा ही असर दिखा पाए, तो बीजेपी और एआईएडीएमके मिलकर 150 सीटों का आँकड़ा पार कर सकते हैं, जो सरकार बनाने के लिए जरूरी भी है।

बीजेपी की नई रणनीति का दूरगामी असर

नैनार नागेंद्रन का चयन बीजेपी की तमिलनाडु में नई शुरुआत का संकेत है। उनकी थेवर समुदाय से होने, AIADMK के साथ पुराने रिश्ते और प्रशासनिक अनुभव उन्हें गठबंधन और विस्तार के लिए सही चेहरा बनाते हैं। अन्नामलाई ने पार्टी को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया, लेकिन गठबंधन की जरूरत ने नागेंद्रन को मौका दिया। 2026 में डीएमके-कॉन्ग्रेस को हराने के लिए बीजेपी और AIADMK का गठबंधन के बीच नागेंद्रन इसकी धुरी बन सकते हैं। अगर सब कुछ योजना के मुताबिक हुआ, तो नागेंद्रन न सिर्फ बीजेपी के लिए तुरुप का इक्का साबित होंगे, बल्कि तमिलनाडु की सियासत में नया इतिहास भी रच सकते हैं।